दीवारों पर लिक्खा है, 31 अक्टूबर

प्रिंट को अपनी सीमित पहुंच, और असीमित साख के साथ टीवी से अलग गिनाना चाहिए

संपादकीय
31 अक्टूबर 2019



पाकिस्तान में अभी एक दिलचस्प बहस छिड़ी है जिस पर हिन्दुस्तान के लोग भी सोच सकते हैं। पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी, पेमरा, ने अभी दो दिन पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को एक निर्देश जारी किया था कि जिसमें उन्होंने अदालतों में चल रहे मामलों को लेकर टीवी पर चलने वाली बहस पर अपनी राय दी थी। इसके मुताबिक उसने टीवी शो होस्ट करने वाले एंकर कहे जाने वाले लोगों से कहा था कि उन्हें केवल एक तटस्थ संचालक की तरह बहस में शामिल लोगों को बोलने का मौका देना चाहिए, न कि खुद किसी विषय विशेषज्ञ की तरह खुद अपने विचार रखने चाहिए। निर्देशों में यह भी सुझाया गया है कि चैनलों को बहस में आने वाले लोगों को छांटने में भी सावधानी बरतनी चाहिए कि विषयों के विशेषज्ञ लोग ही बुलाए जाएं जो कि उस विषय के जानकार लोग हों। पेमरा ने यह निर्देश पाकिस्तान की एक बड़ी अदालत के एक आदेश को दुहराते हुए जारी किए थे जिसमें अदालत ने यह पाया था कि हाल ही में भूतपूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को जमानत मिलने को लेकर कुछ चैनलों की बहसों पर लोग अदालती आदेश को लेकर अटकलें भी लगा रहे थे। 

यह मामला तो पाकिस्तान का है, लेकिन इसमें से पाकिस्तान शब्द को हटा दें, और वहां हिन्दुस्तान लिख दें, तो यह इस देश पर भी पूरी तरह लागू होता है। इधर अदालतों में किसी मामले की सुनवाई चलती है, उधर टीवी चैनलों में किसी फिल्म या टीवी सीरियल की तरह के सेट तैयार करके एंकर कहीं वकील तो कहीं फौजी बनकर अदालती मामलों पर घटिया से घटिया बहस छिड़वाने के लिए अधिक से अधिक बकवासी लोगों को छांटकर लाते हैं, और फिर उनके बीच मुर्गा लड़ाई करवाते हुए उकड़ू बैठकर चैनल को दर्शकों के बीच बेचते हैं। बहुत से लोग अब हिन्दुस्तान में यह लिखने और बोलने लगे हैं कि टीवी चैनलों ने मानो दंगा करवाने को, नफरत और हिंसा फैलाने को, झूठ कहने और लावा उगलवाने को अपना धंधा बना लिया है। हमारा ख्याल है कि एक ऐसा वक्त आ गया है जब प्रिंट मीडिया को अपने और टीवी चैनलों के लिए इन दिनों इस्तेमाल होने वाले मीडिया नाम के एक अकेले शब्द का विकल्प ढूंढना चाहिए, और अखबारों को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की संदिग्ध साख के साथ एक बोट पर सवार नहीं होना चाहिए। आज देश में अखबारों का काम और चैनलों का काम बिल्कुल अलग-अलग किस्म का हो गया है, दोनों की नीयत और जरूरत अलग-अलग हो गई हैं, और दोनों के पत्रकारों-कामगारों का मिजाज भी अलग-अलग हो गया है। अब मीडिया नाम का एक शब्द इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को साख दिला रहा है, और उसी के साथ गिने जाने की वजह से प्रिंट की साख गिरा रहा है। एक वक्त था जब पत्रकारिता या अखबारनवीसी के मायने सीधे-सीधे प्रिंट मीडिया ही होते थे। उसके बाद धीरे-धीरे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दाखिल हुआ, और हावी हुआ, उसने पेशे को इस हद तक बिगाड़ दिया कि पेशा खत्म होकर महज कारोबार रह गया। ऐसे में आज प्रिंट को अपने लिए एक अलग शब्द छांटना चाहिए, और अपने आपको मीडिया में गिनने से लोगों को रोकना चाहिए। 

आज इलेक्ट्रॉनिक समाचार चैनलों के जो तौर-तरीके रह गए हैं, जिन्हें लेकर पाकिस्तान में ब्रॉडकास्टिंग की संवैधानिक संस्था ने फिक्र जाहिर की है, जिसे लेकर वहां एक हाईकोर्ट ने एक आदेश जारी किया है, उससे हिन्दुस्तान को भी एक सबक लेना चाहिए, एक नसीहत लेनी चाहिए। यहां अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की साख के साथ प्रिंट को नहीं खड़े होना चाहिए, और मीडिया नाम की एक बड़ी छतरी से बाहर आकर अपने को सिर्फ प्रिंट कहने का काम करना चाहिए। वैसे भी अगर कानूनी रूप से देखा जाए तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के नाम के रजिस्ट्रेशन से लेकर उसके मालिकाना हक तक बहुत सी बातें अलग किस्म की हैं, और प्रिंट मीडिया के लिए कानून बिल्कुल अलग हैं। इन दोनों का साथ में इज्जत के साथ गुजारा नहीं है, और गरीब अखबारों को महंगे चैनलों से परे अपनी दुनिया अलग रखनी चाहिए। पत्रकारिता के नीति-सिद्धांत का ख्याल रखने वाले श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन के खात्मे के पीछे भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कामगारों का एक अलग मिजाज रहा है, और अब प्रिंट को अपनी सीमित पहुंच, और असीमित साख के साथ अलग गिनाना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 30 अक्टूबर

दीवारों पर लिक्खा है, 30 अक्टूबर

सार्वजनिक परिवहन पर होने वाला घाटा दरअसल फायदा

संपादकीय
30 अक्टूबर 2019



दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने वहां की बसों में लड़कियों और महिलाओं का सफर मुफ्त कर दिया है। कुछ महीने पहले उसने दिल्ली मेट्रो को महिलाओं के लिए मुफ्त कर दिया था। इस बार की घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि सरकार के सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि बस और मेट्रो मुसाफिरों में से महिलाएं 30 फीसदी से कम हैं। उन्होंने इसका यह मतलब बताया कि समाज में महिलाओं के काम करने के मौके कम हैं इसलिए उनकी आवाजाही भी कम होती है। इसका दूसरा मतलब यह भी निकलता है कि उनके लिए आवाजाही मुश्किल या महंगी है, इसलिए भी वे काम कम कर पाती हैं, पढ़-लिख कम पाती हैं। 

आंकड़े अपने-आपमें कई बार एक गलतफहमी भी पैदा करते हैं, इस मामले में भी हो सकता है कि महिलाओं का अनुपात मेट्रो-बसों में कम होने के पीछे एक वजह यह भी है कि वे देर रात अकेले सफर नहीं करतीं, और उस वक्त के मुसाफिरों ने तकरीबन सारे ही लोग पुरूष ही होते हैं। लेकिन ऐसी जो भी वजह हो, यह बात सही है कि महिलाओं के काम करने के मौके कम हैं, महिलाओं को सफर करना अधिक मुश्किल या महंगा पड़ता है, और मुफ्त स्थानीय सफर उनके आगे बढऩे में बहुत बड़ा हाथ बंटा सकता है। केजरीवाल ने यह भी कहा है कि मुफ्त सफर को बुजुर्गों और छात्र-छात्राओं तक भी बढ़ाया जा सकता है। 

केजरीवाल की इस घोषणा के तुरंत बाद दीवाली पर प्रदूषण के जो आंकड़े आए हैं, वे भयानक हैं। दिल्ली एक बार फिर भयानक प्रदूषण की शिकार है, और सबसे संपन्न तबके के लिए विदेशों में बने हुए घरेलू उपकरणों के इश्तहार दिल्ली के अखबारों में जो कि घर की हवा को छोटे बच्चों तक के लिए महफूज बना देने का दावा कर रहे हैं। लेकिन गिने-चुने लोगों को छोड़कर बाकी तमाम लोग तो सड़क-चौराहों और फुटपाथों के जानलेवा प्रदूषण में जीने के लिए मजबूर हैं। ऐसे में पूरी दुनिया में हर समझदार महानगर का यह तजुर्बा है कि सार्वजनिक परिवहन अधिक आसानी से हासिल हो, अधिक सस्ता या मुफ्त हो, तो निजी गाडिय़ों का इस्तेमाल घटता है, और प्रदूषण भी। जो लोग महानगरों में स्थानीय यातायात को रियायती या मुफ्त करने के खिलाफ रहते हैं, वे इस बात को अनदेखा करते हैं कि निजी गाडिय़ों से, या टैक्सी-ऑटो के अधिक इस्तेमाल से जो प्रदूषण बढ़ता है, वह मुफ्त बस-मेट्रो से अधिक महंगा पड़ता है। 

दिल्ली सरकार की यह सोच और कार्रवाई कई मायनों में मायने रखती है। पहली बात तो यह कि चुनाव करीब आने की वजह से यह घोषणा हो रही हो ऐसा भी नहीं है क्योंकि इस सरकार ने आते ही बिजली-पानी को बहुत सस्ता किया था, स्कूलों को बेहतर बनाया था, और सस्ता या मुफ्त इलाज सबको मुहैया कराया था। इस सरकार के इस पहले और मौजूदा कार्यकाल में महिलाओं के लिए मुफ्त मेट्रो और मुफ्त बस उसी सिलसिले की एक कड़ी होने के साथ-साथ महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक क्रांतिकारी कदम भी है। भारत एक ऐसा संघीय देश है जिसमें ढाई दर्जन के करीब प्रदेश हैं, और ये सब एक-दूसरे के तजुर्बों से सीख सकते हैं। ऐसा पहले भी होते रहा है कि किसी एक प्रदेश की कामयाबी से दूसरे प्रदेशों में उससे सीखा और अपना काम भी बेहतर किया। पूरे देश को बेहतर सार्वजनिक परिवहन की जरूरत है, और इसके साथ-साथ अगर वे प्रदेश महिलाओं को, बुजुर्गों और छात्र-छात्राओं को, बीमारों को मुफ्त स्थानीय सफर दे सकते हैं, तो उन्हें जरूर देना चाहिए। यह महज वोटों की खातिर दिया गया मुफ्त तोहफा नहीं है, यह पूरी की पूरी धरती को बचाने के लिए प्रदूषण घटाने का एक ऐसा तरीका है जिससे कि हर प्रदेश बाकी दुनिया को बचाने में भी मदद कर सकते हैं। 

भारत सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस बात को जोर-शोर से उठाना चाहिए कि प्रदूषण को घटाने की किसी देश-प्रदेश की ऐसी कोशिशों के लिए लगने वाली लागत में बाकी संपन्न दुनिया को भी हाथ बंटाना चाहिए। कार्बन-उत्सर्जन के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कहीं-कहीं ऐसा तालमेल है भी कि इसे घटाने वाले देशों को बाकी देशों से किस तरह की मदद मिले, और औसत से अधिक कार्बन-उत्सर्जन करने वाले अमरीका जैसे देश किस तरह उसका बोझ उठाएं। इस बात को अंतरराष्ट्रीय मंच पर और अधिक जोरों से उठाना चाहिए ताकि दुनिया भर के मंझले शहरों को भी सार्वजनिक यातायात में विकसित देशों से मदद मिल सके। केजरीवाल सरकार का महिलाओं के लिए मेट्रो-बस मुफ्त करने का फैसला ऐतिहासिक है, और हमारा मानना है कि आने वाले बरसों में सरकारों को यह मानना पड़ेगा कि सार्वजनिक परिवहन पर होने वाला घाटा दरअसल फायदा है। आखिर में यह बात भी लिखने लायक है कि दिल्ली की बसों के लिए केजरीवाल सरकार ने महिलाओं की हिफाजत के लिए वर्दीधारी मार्शल तैनात किए हैं, इससे भी इस कुख्यात शहर में महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ेगा। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 29 अक्टूबर

कश्मीर में हिंदुस्तानी नहीं, कट्टरपंथी फिरंगी सांसद!

संपादकीय
29 अक्टूबर 2019



पिछले छह बरसों का क्या कोई ऐसा भी हफ्ता गुजरा है जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश को चौंका न दिया हो? और इस बार तो उन्होंने हिंदुस्तानियों के साथ-साथ योरप के लोगों को भी चौंका दिया है क्योंकि वे यूरोपीय संघ के सत्ताईस ऐसे सांसदों की मेजबानी कर रहे हैं जिन्हें धारा 370 खत्म होने के बाद का कश्मीर देखना नसीब होगा। वह कश्मीर जिसे खुद के वहां के तीन-तीन भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों को अपनी खिड़की के भीतर से देखना नसीब नहीं हो रहा है, कश्मीर में पैदा हुए और संसद में पहुंचे हुए गुलाम नबी आजाद जैसे लोगों को नसीब नहीं हो रहा है, हिंदुस्तानी और विदेशी मीडिया को नसीब नहीं हो रहा है, दुनिया के इस महान लोकतंत्र रहे हिंदुस्तान के मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को नसीब नहीं हो रहा है। ऐसे में हिंदुस्तान को डेढ़ सौ बरस गुलाम बनाकर रखने वाले अंगे्रजों के सांसदों और उनके यूरोपीय भाई-बहन गोरों को यह नसीब हो रहा है, तो यह दुनिया को चौंकाने वाली बात है।

लेकिन हिंदुस्तानी मीडिया में जो खबरें आ रही हैं, उनके मुताबिक यूरोपीय संसद के इन सत्ताईस सांसदों में से कम से कम बाईस ऐसे हैं  जो कि अपने-अपने देशों में दक्षिणपंथी या कट्टर दक्षिणपंथी माने जाते हैं। वे इटली में परदेशियों के बसने के खिलाफ हैं, जो यूके को यूरोपीय संघ से अलग करना चाहते हैं, और जो एक दूसरे देश में आवाजाही, कामकाज के खिलाफ राष्ट्रवादी सांसद हैं। इनमें से एक ऐसे हैं जो कि अभी डेढ़ बरस पहले एक नेता पर भद्दी नाजीवादी टिप्पणी करने की वजह से यूरोपीय यूनियन के उपाध्यक्ष पद से बर्खास्त किए गए थे। ईयू के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था। कुछ दूसरे सांसद ऐसे आए हैं जो कि अपने देशों में मानवाधिकार उल्लंघन पर आंखें मूंदे रखते हैं। कोई सांसद ऐसा है जिसे इस बात पर हैरानी है कि हिटलर के इतने मानव संहार के बाद इतने यहूदी बच कैसे गए थे?

एक तरफ सीपीएम के सीताराम येचुरी ने इन सांसदों, ऐसे सांसदों के कश्मीर दौरे का विरोध किया है, और साथ-साथ दिलचस्प बात यह है कि भाजपा के सांसद, सुब्रमण्यम स्वामी ने इस दौरे को रद्द करने की मांग करते हुए कहा है कि उन्हें हैरानी है कि विदेश मंत्रालय ने यूरोपीय संघ के सांसदों के व्यक्तिगत तौर पर जम्मू-कश्मीर इलाके का दौरा करने के इंतजाम किए हैं। उन्होंने कहा- यह हमारी राष्ट्रनीति से पीछे हटना है, मैं सरकार से यह दौरा रद्द करने की अपील करता हूं, क्योंकि यह अनैतिक है। कांगे्रस नेता राहुल गांधी ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के दौरे पर जाने के लिए योरप के सांसदों का स्वागत किया जा रहा है जबकि भारतीय सांसदों के कश्मीर दौरे पर प्रतिबंध लगाकर रखा गया है, यह बहुत गलत है। कांगे्रस के जयराम रमेश ने लिखा है- जब भारतीय नेताओं को जम्मू-कश्मीर के लोगों से मिलने से रोका जा रहा है तो सीना ठोककर राष्ट्रवाद की बात करने वालों ने क्या सोचकर यूरोपीय नेताओं को जम्मू-कश्मीर जाने की इजाजत दी? उन्होंने कहा कि यह सीधे-सीधे भारत की अपनी संसद और हमारे लोकतंत्र का अपमान है।

इन तथ्यों से यह मामला साफ है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी किस तरह अंतराष्ट्रीय मंच पर कश्मीर के आज के हालात पर सकारात्मक बातें कहलवाने के लिए यह काम कर रहे हैं। भारत सरकार के रूप में उनका यह काम ठीक है क्योंकि सरकार को अपने फैसले के पक्ष में डिंडोरा पीटने का हक है, यह उसकी जिम्मेदारी भी है। लेकिन जो तथ्य सामने आ रहे हैं, उनसे नफे  के बजाय सरकार को नुकसान ज्यादा होते दिख रहा है। और यह नुकसान महज सरकार का नहीं है, यह पूरे देश का नुकसान है जिसकी साख इस बात से चौपट होगी कि चुनिंदा कट्टरपंथी और नफरतजीवी फिरंगी सांसदों को लाकर उनसे भारत जैसा लोकतंत्र एक चरित्र प्रमाणपत्र हासिल करने जा रहा है। आजादी की पौन सदी बाद भी अगर गोरों से सर्टिफिकेट अपनी खुद की संसद के समर्थन से अधिक मायने का समझा जा रहा है, तो यह भारतीय लोकतंत्र की बड़ी शिकस्त है और उसकी बड़ी बेइज्जती है। कश्मीर के हालात को हिंदुस्तानी संसद और सांसदों की नजरों से दूर रखकर विदेशी सांसदों को कश्मीर दिखाने पर खुद भाजपा के एक जानकार और जागरूक सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने जो कहा है, उससे अधिक हम क्या कहें? मोदी ने देश के लोगों को चौंकाने का सिलसिला इस हफ्ते भी जारी रखा है, लेकिन इससे उनके भक्तों से परे, और आए हुए कट्टरपंथियों से परे शायद ही किसी और तबके में उनका, देश का, और भारतीय लोकतंत्र का सम्मान बढ़ेगा। कश्मीर के लोगों में तो बिल्कुल भी नहीं बढ़ेगा।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 26 अक्टूबर

बात की बात, 26 अक्टूबर

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अक्टूबर

और वे लोग अपने तमगे लौटाने के लिए भी लौट भी नहीं सकते

संपादकीय
26 अक्टूबर 2019



विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न दिया जाए या नहीं इस पर देश के लोग दो खेमों में बंट गए हैं। इन खेमों के आकार देश में मोदी की शोहरत वालों, और मोदी पर तोहमत वालों के आकार के हो सकते हैं, लेकिन इतिहास को गिनाने के लिए तो गिनती के दस्तावेज काफी होते हैं, और इतिहास जनमत संग्रह तो होता नहीं है। देश के इतिहास के दस्तावेज बताते हैं कि सावरकर ने एक वक्त भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया था, और फिर जेल से ही उन्होंने अंग्रेजों से बार-बार माफी मांगते हुए अपनी रिहाई करवाई थी, अंग्रेज सरकार के लिए वफादारी के वायदे लिखकर दिए थे, अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया था, अंग्रेज सरकार से गुजारा-भत्ता या पेंशन हासिल की थी, उसे बढ़ाने की मांग भी की थी। वे गांधी हत्या के मुकदमे में भी घिरे थे, और बाद में सुबूत न मिलने पर बरी किए गए थे। अब महाराष्ट्र चुनाव के पहले भाजपा ने महाराष्ट्र के इस बेटे को भारत रत्न देने की घोषणा की थी जो कि पूरी तरह केन्द्र सरकार के हाथ की बात है, और एनडीए की गठबंधन सरकार के भीतर भला भाजपा या नरेन्द्र मोदी-अमित शाह की घोषणा का कौन विरोध कर सकते हैं? 

अब सवाल यह उठता है कि गांधी के हत्यारों के साथ बड़े गहरे रिश्तों वाले और अंग्रेजों की वफादारी की कसमें खाने वाले, अंग्रेजों से पेंशन पाने वाले को अगर भारत रत्न दिया जाता है, तो फिर यह सरकारी सम्मान और किसी भी, कैसे को भी क्यों नहीं दिया जा सकेगा? इसलिए जब सत्ता की ताकत किसी को अच्छी तरह दर्ज इतिहास को खारिज करते हुए, लोगों के हाथ के लिखे हुए माफीनामे को अनदेखा करते हुए, सरकारी खजाने से पेंशन मिलने के खातों को अनदेखा करते हुए देश का रत्न साबित करने का हक देता है, तो क्या सचमुच ही लोकतंत्र में ऐसा कोई हक रहना चाहिए? और इस बात को हम आज पहली बार इस सिलसिले में नहीं उठा रहे हैं, बरसों से हम लगातार यह लिखते आ रहे हैं कि सरकारों को किसी भी सम्मान या पुरस्कार देने से अपने को अलग रखना चाहिए। जो सरकारें वोटों की बदौलत बनती हैं, उनके समझौतापरस्त होने की गारंटी रहती है, और ऐसे में उन सरकारों को कैसे यह हक दिया जा सकता है कि वे अपनी मर्जी से लोगों का सम्मान करें? किसी चुनाव के पहले, किसी धर्म या जाति के लोगों को खुश करने के लिए, किसी के रिश्तेदारों का समर्थन संसद या विधानसभा में पाने के लिए जो सम्मान दिए जा सकते हैं, उन सम्मानों का वैसे भी क्या महत्व रहता है? इस बात को हम पहले भी दस-दस बार लिख चुके हैं कि सरकारों को सम्मान और पुरस्कार के कारोबार से अपने को परे रखना चाहिए। सरकारी सम्मान-पुरस्कार कभी विश्वसनीय या सम्माननीय नहीं हो सकते। देश में हर बरस दर्जनों लोगों को पद्मश्री, पद्मभूषण, और पद्मविभूषण जैसे सम्मान दिए जाते हैं। और तो और प्रणब मुखर्जी जैसे पेशेवर सत्ता-नेता को भी इनमें से कोई सम्मान दिया जा चुका है जबकि वे यूपीए की दोनों सरकारों के हर उस फैसले में शामिल थे जिन्हें बाद में भ्रष्ट पाया गया था। ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रीय सम्मान देने का हक भी अगर सरकार को होता है, तो ऐसे हक को खत्म कर दिया जाना चाहिए। और अब तो बात देश के सबसे बड़े सम्मान की आ गई है, और देश के एक सबसे ही विवादास्पद आदमी को जब उसे देने की राजनीतिक घोषणा हो चुकी है, तो देश के समझदार तबके को एक बार फिर यह सोचना चाहिए कि क्या कोई भी सरकारी अलंकरण जारी रहने चाहिए? दिक्कत यह है कि देश के बड़े-बड़े लेखक और विचारक, कलाकार और फिल्मकार बीते बरसों में इन सम्मानों को खुशी-खुशी हासिल करते रहे हैं, और देश के गिने-चुने ही ऐसे लोग हैं जिन्होंने इसे मना किया हो। इसलिए उम्मीद तो बिल्कुल नहीं है कि सरकारी सम्मानों को खत्म करने पर अधिक लोग बात करेंगे, लेकिन हम इस मुद्दे को उठाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहे हैं कि इसके पहले न हो पाया तो न सही, कम से कम अब तो राष्ट्रीय सम्मान-पुरस्कार बंद कर दिए जाएं ताकि इसके विरोध में लोग अपने को मिले ऐसे सम्मान-पुरस्कार लौटाने को मजबूर न हों। आज तो भारत रत्न पाने वाले अधिकतर लोग गुजर चुके हैं, और वे लोग अपने तमगे लौटाने के लिए भी लौट भी नहीं सकते। 

(Daily Chhattisgarh)

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अक्टूबर

पड़ोस में कमजोर लोकतंत्र सब पर बड़ा खतरा रहता है

संपादकीय
25 अक्टूबर 2019



पड़ोस के देश भारत के साथ तुलना न भी की जाए, तो भी पाकिस्तान की हालत अपने आपमें बहुत ही खराब है। एक प्रधानमंत्री इमरान खान जिनके चुनकर आने के वक्त से यह चर्चा रही कि वे फौज की मदद से जीतने वाले नेता हैं, और फौज की मेहरबानी से ही प्रधानमंत्री हैं, वे कम से कम आज तो जाहिर तौर पर फौज के मोहताज दिख रहे हैं। इमरान के खिलाफ उनके राजनीतिक विरोधियों ने एक आजादी मार्च निकालने की घोषणा की, तो इस विपक्षी नेता से मिलकर पाकिस्तानी फौज के प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने कहा कि वे आजादी मार्च न निकालें। ऐसी खबरें आई हैं कि फौज ने पाकिस्तान की राजधानी तक पहुंचने वाली सड़कों को खोद दिया है ताकि प्रदर्शन के लिए आने वाली गाडिय़ां न पहुंच पाएं। फौज ने अपनी पूरी ताकत लगा दी है कि इमरान के खिलाफ कोई जंगी प्रदर्शन न हो पाए। और दिलचस्प बात यह भी है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कहा है कि उनके खिलाफ आजादी मार्च की योजना से भारत खुश है, और इस प्रदर्शन को विदेश से समर्थन हासिल है। इमरान ने यह भी कहा कि यह प्रदर्शन कश्मीर के मुद्दे को नुकसान पहुंचाएगा। विपक्ष के नेता फजल उर रहमान ने इमरान का इस्तीफा मांगते हुए फौज की सलाह को खारिज कर दिया है, और प्रदर्शन करने की घोषणा की है। 

पाकिस्तान के हाल पर लिखने के लिए भारत के साथ उसकी कोई तुलना करने की जरूरत नहीं है। यह समझने की जरूरत जरूर है कि उसका यह बुरा हाल क्यों हुआ है। एक ही दिन आजाद हुए ये दोनों देश आज इतने फर्क वाले क्यों हो गए हैं? पाकिस्तान शुरू से ही धर्म के आधार पर बना हुआ देश रहा, और वहां पर धर्मान्ध कट्टरपंथियों की ताकत लगातार बढ़ती रही। पाकिस्तान में लंबे समय से आजादी के बाद से ही कई बार फौजी हुकूमतें आईं जिन्होंने निर्वाचित नेताओं को जेल में डाला, फांसी चढ़ाया, या देश के बाहर रहने को मजबूर किया। धार्मिक कट्टरपंथियों के अलावा पाकिस्तान ने समय-समय पर अपने सरहदी मकसदों से जिस तरह हमलावर आतंकियों को बढ़ावा दिया, वह भी उसे घुन की तरह खोखला करने वाला काम साबित हुआ। मीडिया की आजादी को कुचलने का काम हुआ, सामाजिक आंदोलन खत्म कर दिए गए, और सवालों का जवाब गोलियों से देने का सिलसिला चलते रहा। इस देश में मजहब को इतनी अहमियत दी गई कि लोगों की रोटी, कपड़े, और मकान की जरूरतें किनारे धरी रह गईं, और एक वक्त ऐसा आया जब इसके नेताओं ने खुलकर कहा कि वे चाहे घास खाकर जिंदा रह लेंगे, लेकिन परमाणु बम जरूर बनाएंगे, और आज यह देश परमाणु हथियारों पर तो बैठा है, लेकिन इसके औजार खाली पड़े हैं, लोगों के रोजगार गायब हैं, फौज से लेकर कट्टरपंथियों तक, और आतंकियों तक हर कोई बेकाबू है। जो अकेली वजह इस देश के बनने से लेकर अब तक सबसे अधिक बर्बाद करने वाली दिखती है वह मजहबी कट्टरता है जो कि जाने कब अपना दायरा पार करके धर्मान्ध हमलावर आतंक में बदल गई, और फौज की सियासी हसरतें बढ़ती चली गईं। 

पाकिस्तान आज एक तरफ अमरीका और दूसरी तरफ चीन के रहमोकरम पर दो वक्त की रोटी पा रहा है, लेकिन उसका अपना हाल बड़ा फटेहाल है। इंग्लैंड में पढ़े हुए एक के बाद दूसरे प्रधानमंत्री भी इसका कुछ नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि मुल्क की बदहाली एक कैंसर की तरह लाइलाज हो चुकी दिखती है। आज दुनिया में जगह-जगह पाकिस्तान को आतंकियों की पनाहगाह माना जा रहा है, और उस पर खुलकर चर्चा हो रही है। इस हाल को देखकर दुनिया के बाकी देशों को कई किस्म के सबक लेने की जरूरत है कि किस तरह राजनीति में धर्म का घालमेल देश को अराजक बनाता है, और बर्बाद करता है। यह भी समझने की जरूरत है कि जब देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को एक-एक कर कमजोर और खत्म किया जाता है, तो देश के लोगों को लोकतंत्र से परे फौज पर भरोसा होने लगता है, कानून अपने हाथ में ले लेना आसान और बेहतर लगने लगता है। यह पूरा सिलसिला पाकिस्तान की इस खतरनाक नौबत को तो बताता ही है, लेकिन कमजोर और खोखले हो चुके एक लोकतंत्र के पड़ोस के देशों पर कई किस्म के खतरे भी बताता है। दुनिया में यह उत्तर कोरिया के बाद दूसरा ऐसा देश है जहां के लोग, जिम्मेदार और ताकतवर ओहदों पर बैठे हुए लोग लापरवाही से परमाणु हथियारों की चर्चा करते हैं, उनके इस्तेमाल की चर्चा करते हैं। हाल यह है कि पाकिस्तान को अपने गंभीर बीमार लोगों को इलाज के लिए हिन्दुस्तान भेजना पड़ता है, लेकिन वह अपने परमाणु हथियारों के दंभ को छोड़ नहीं पा रहा है। किसी भी ऐसे देश में परमाणु हथियार पूरी दुनिया के लिए बहुत बड़ा खतरा है जहां पर किसी पल भी फौज हुकूमत सम्हाल सकती है, या फौजी निगरानी के बीच भी मजहबी आतंकी किसी भी हथियार तक पहुंच सकते हैं। आर्थिक रूप से दीवालिया हो चुके इस देश में निराशा इतनी बड़ी हो चुकी है कि अपने लोगों को उसके बीच फख्र की एक वजह देने के लिए देश की सरकार या फौज पड़ोसी पर हमला करके एक जंग की तरफ लोगों का ध्यान बांट सकती है। पाकिस्तान के पड़ोसी लोकतंत्रों को इस नौबत से खुश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि पड़ोस में कमजोर लोकतंत्र सब पर बड़ा खतरा रहता है।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 24 अक्टूबर

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अक्टूबर

बस्तर के दो उपचुनावों के पीछे की वजहें क्या रहीं...

संपादकीय
24 अक्टूबर 2019



एक तरफ जब महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे दो पुराने कांग्रेसी रहे हुए राज्यों में कांग्रेस सीटें बढ़ाकर भी सरकार बनाने से बहुत दूर है, उस बीच छत्तीसगढ़ के बस्तर में चित्रकोट विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस की जीत कुछ दूसरे रिकॉर्ड भी कायम कर रही है। बस्तर में इतनी जल्दी-जल्दी दो उपचुनाव हुए जिनमें पिछले दंतेवाड़ा विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस ने भाजपा के नक्सल-हिंसा शिकार विधायक की खाली हुई सीट पर कब्जा ही नहीं किया, बल्कि दंतेवाड़ा विधानसभा में जीत की लीड का एक नया रिकॉर्ड भी बनाया। वह जीत इस मायने में भी अधिक मायने रखती थी कि वहां पर भाजपा ने नक्सल-हिंसा के शिकार हुए विधायक भीमा मंडावी की पत्नी को उम्मीदवार बनाया था, और ताजा-ताजा हादसे की याद के बावजूद कांग्रेस पार्टी ने वहां भाजपा को कड़ी शिकस्त दी थी। अब दो महीने के भीतर के चित्रकोट विधानसभा उपचुनाव में भाजपा की सारी कोशिश के बाद भी कांग्रेस पार्टी ने जिस अंदाज में जीत हासिल की है, वह देखने लायक है। 

जैसा कि भारत के अधिकतर प्रदेशों में आमतौर पर कांग्रेस और भाजपा की सरकारें रहने पर होता है, छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस का संगठन मोटेतौर पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नाम पर ही चलता है। ऐसे में अगर चित्रकोट में कांग्रेस की हार हुई होती, तो इसकी तोहमत भूपेश बघेल पर ही लगती, और अगर जीत हुई है, तो उसके हकदार भी भूपेश बघेल और कांग्रेस संगठन हैं। इस नतीजे के बाद अब राज्य के दोनों बड़े आदिवासी इलाकों से भाजपा पूरी तरह खत्म हो गई है, और विधानसभा में बस्तर और सरगुजा से कोई भाजपा विधायक नहीं रहेंगे। यह एक अलग बात है कि इन दोनों ही आदिवासी इलाकों में भाजपा के एक-एक सांसद जरूर हैं। छत्तीसगढ़ के इन दोनों उपचुनावों में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की अगुवाई में जिस दम-खम और एकता के साथ चुनाव लड़ा, उसका मुकाबला भाजपा नहीं कर पाई। लेकिन इन दोनों जीत का श्रेय सिर्फ चुनाव अभियान को देना ठीक नहीं होगा। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव अभियान के दौरान अपने घोषणापत्र के वक्त से आदिवासी इलाकों के लिए जो बड़ी बातें कही थीं, और उन्हें राज्य में सरकार बनते ही जिस तरह पूरा करना शुरू किया था, उसका खासा असर हुआ था। और नतीजा यह था कि लोकसभा चुनाव के वक्त राज्य की 11 सीटों में से जो दो लोकसभा सीटें कांग्रेस को हासिल हुईं, उनमें से एक आदिवासी बस्तर सीट भी थी। कांग्रेस ने जिस तरह टाटा के लिए ली गई आदिवासी जमीन उसके मालिकों को वापिस की, वह बस्तर में एक अनोखा काम था, और उसका असर उन आदिवासियों पर भी हुआ जिनकी जमीनें नहीं गई थीं। दूसरा फर्क यह हुआ कि भूपेश बघेल की सरकार बनने के बाद बस्तर के नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की हिंसा बहुत कम हुई क्योंकि पुलिस और बाकी सुरक्षा बलों को यह समझ आ गया कि उनके जुर्म अब पिछले बरसों की तरह बर्दाश्त नहीं होंगे। आदिवासियों के लिए यह एक बड़ा फर्क था कि उन्हें इंसानों की तरह माना जाने लगा, और हमारा यह मानना है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की इस मोर्चे पर कड़ाई से आदिवासियों के मन में कांग्रेस के लिए जगह बनी है। फिर ऐसी भी खबरें हैं कि मुख्यमंत्री हाट बाजार स्वास्थ्य योजना के तहत पूरे बस्तर में ही जगह-जगह जिस तरह मड़ई और बाजार में क्लिनिक लगाकर इलाज किया गया, दवाईयां दी गईं, उसका भी असर हुआ है। मुख्यमंत्री ने पूरे प्रदेश में सुपोषण योजना को जितने आक्रामक तरीके से लागू किया है, उसका भी असर इस उपचुनाव में देखने मिला है। एक और बड़ी चीज जिसका असर इस चुनाव पर हुआ होगा, वह है तेंदूपत्ता का दाम बढ़ाना, और उसका बोनस बढ़ाना, लघु वनोपज का दाम बढ़ाना। इन बातों का असर पूरे प्रदेश के जंगल वाले इलाकों में होना तय है, और दंतेवाड़ा-चित्रकोट की जीत में इसका भी योगदान रहा होगा। 

अब मोटेतौर पर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव पूरे निपट गए हैं, उपचुनाव भी फिलहाल निपट गए हैं, और भूपेश बघेल एक विजेता की तरह उभरकर सामने आए हैं। लोकसभा चुनाव में जहां पूरे देश में कांग्रेस की सीटों में बहुत मामूली बढ़ोत्तरी हुई थी, वहां पर छत्तीसगढ़ में सीटें बढ़कर एक से दो हुई थीं, जो बहुत अच्छी कामयाबी नहीं थी, तो बहुत बुरी भी नहीं थी। आने वाले महीनों में प्रदेश में म्युनिसिपल और पंचायत चुनाव होंगे, और वह भूपेश बघेल सरकार, और कांग्रेस संगठन दोनों के लिए एक बड़ी कसौटी होगी। फिलहाल कांग्रेस के लिए यह खुशी मनाने का मौका है, और भाजपा के लिए छत्तीसगढ़ में एक लंबे आत्ममंथन का मौका भी है, और म्युनिसिपल-पंचायत के चुनावों में अपनी वापिसी की कोशिश करने का भी। कुल मिलाकर इन दो उपचुनावों के बाद भूपेश बघेल संगठन के भीतर भी अधिक ताकतवर और कामयाब होकर उभरे दिखते हैं।  

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM
संपादकीय
24 अक्टूबर 2019



एक भारतवंशी अर्थशास्त्री 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अक्टूबर

साजिश कर सजा दिलाने वाली पुलिस को उसी जुर्म के लिए तय सजा जितनी सजा मिले..

संपादकीय
23 अक्टूबर 2019



जम्मू-कश्मीर के जम्मू इलाके में आठ बरस की एक मुस्लिम खानाबदोश बच्ची के साथ मंदिर में पुजारी से लेकर पुलिस तक, एक घर की दो पीढिय़ों तक के लोगों ने जिस तरह गैंगरेप किया था, और अपने परिचितों को बुला-बुलाकर बलात्कार करवाया था, बाद में उस बच्ची की हत्या कर दी थी, उस मामले की जांच करने वाली राज्य की पुलिस के खिलाफ अदालत ने साजिश करने की एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है। देश को याद होगा कि कठुआ रेप-मर्डर नाम से चर्चित इस मामले में हिन्दू बलात्कारियों को बचाने के लिए देश के कई हिन्दू संगठनों ने तिरंगे झंडे लेकर जुलूस निकाले थे, इनमें राज्य के दो भाजपा मंत्री भी शामिल थे जिन्हें बाद में इस्तीफा देना पड़ा था। और जम्मू में तो हालत यह थी कि इस बच्ची का मामला लडऩे से वकीलों को रोका गया था, और वैसे बागी माहौल में एक हिन्दू महिला वकील ने बड़े हौसले के साथ हत्यारे-बलात्कारियों को सजा दिलवाने में कामयाबी पाई थी। अब इस बच्ची के रेप-मर्डर की जांच करने वाली विशेष पुलिस टीम के खिलाफ एफआईआर इसलिए दर्ज हो रही है कि उसने कुछ बेकसूर लोगों के खिलाफ गवाही देने के लिए दूसरे लोगों की हिंसक प्रताडऩा की थी। जाहिर है कि मामले की जांच में राज्य पुलिस की यह टीम जिसमें हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही अधिकारी-कर्मचारी शामिल थे, उन्होंने बेईमानी की थी, और बाद में सुबूत नष्ट करने के लिए भी कुछ पुलिसवाले गिरफ्तार हुए थे। आज मुद्दे की बात यह है कि इस भयानक रेप-हत्या मामले में झूठे गवाह तैयार करने के जुर्म में अदालत के आदेश से पुलिस की विशेष जांच टीम पर एफआईआर हो रही है। 

इस मामले को देखकर छत्तीसगढ़ राज्य के शुरू के तीन बरसों का सबसे चर्चित जग्गी हत्याकांड याद पड़ता है जिसमें राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रदेश कोषाध्यक्ष और तत्कालीन एनसीपी नेता विद्याचरण शुक्ल के एक करीबी, रामावतार जग्गी, को खुली सड़क पर मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बंगले पर आने-जाने वाले लोगों ने मार डाला था। इस मामले में हत्या के तुरंत बाद हत्यारों को भगाने के लिए, जांच को बर्बाद करने के लिए, और बेकसूरों को फंसाने के लिए रायपुर पुलिस के उस वक्त के कुछ अफसरों को अदालत से सजा हुई थी, वे बर्खास्त हुए थे। रायपुर का वह हत्याकांड उस वक्त सत्ता का संरक्षण प्राप्त हत्यारों को बचाने के लिए था, लेकिन वह सबसे पहले साजिश में शामिल पुलिसवालों पर भारी पड़ा था, और बर्खास्तगी के बाद भी ऐसे कई पुलिसवाले अभी ऊपर की अदालत में मुकदमा झेल ही रहे हैं। देश में जगह-जगह ऐसे मामले सामने आते हैं जिनमें पुलिस की साजिश, उसकी हिंसा, और उसके जुर्म पर दस-बीस बरस बाद भी सजा होती है, और लंबी-चौड़ी सजा होती है, बहुत से लोग बहुत बरसों के लिए, पूरी जिंदगी के लिए जेल चले जाते हैं। 
ऐसे मामलों को देखकर यह लगता है कि पुलिस को सत्तारूढ़ नेताओं या अपने बड़े अफसरों के कहे हुए भी किसी जुर्म में भागीदार नहीं बनना चाहिए क्योंकि अब अदालतों में कई किस्म के सुबूत जुर्म को साबित करने के लिए इस्तेमाल होने लगे हैं। मोबाइल फोन के डिटेल्स, सीसीटीवी फुटेज, और फोरेंसिक लैब में साबित सुबूत लगातार अधिक कारगर होते जा रहे हैं। लोगों की कानूनी जागरूकता भी बढ़ी है, और कमजोर तबकों की कानूनी मदद के लिए कुछ जनसंगठन भी सामने आए हैं। बस्तर जैसे नक्सलग्रस्त इलाके में सरकारी बंदूकों की लंबी मौजूदगी से वहां सत्ता की हिंसा के भी अनगिनत मामले सामने आए हैं जिनमें से कई मामले सुप्रीम कोर्ट में पहुंचे हुए हैं। लोगों को याद होगा कि पंजाब के आतंकवाद के दिनों में वहां के पुलिस-मुखिया केपीएस गिल की अगुवाई में पुलिस और सुरक्षा बलों ने जो हिंसा की थी उसे लेकर दशकों बाद भी अदालतों से गिल के पुलिसवालों को उम्रकैद जैसी सजा हुई हैं, और आज के कुछ बरस बाद अगर बस्तर में कई बरस पहले पुलिस और सुरक्षा बलों के जुर्म सजा पाएं, तो भी किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। 

हमारा ख्याल यह है कि बेकसूरों को जैसे गंभीर जुर्म में फंसाने की बात साबित होती है, उन जुर्मों के लिए जिन सजाओं का प्रावधान होता है, उतनी सजा साजिश करने वाले पुलिसवालों को दी जानी चाहिए। हत्या या बलात्कार का झूठा जुर्म किसी पर थोपने की साजिश के लिए पुलिस को उतनी ही कैद देनी चाहिए जितनी कि हत्या या बलात्कार के जुर्म में दी जा सकती थी। ऐसा इसलिए जरूरी है कि अगर किसी बेकसूर को ऐसी सजा दिलवाना कामयाब हो गया होता, तो पुलिस को बनाने का पूरा मकसद ही उल्टा साबित हो जाता। मुजरिम पुलिस को जल्द से जल्द, और अधिक से अधिक सजा इसलिए भी होनी चाहिए कि देश में दूसरी जगहों पर भी पुलिस को ऐसी साजिश का हौसला न हो।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 22 अक्टूबर

अभिजीत बनर्जी की आलोचना के बहाने इस चूक पर चर्चा...

संपादकीय
22 अक्टूबर 2019



पश्चिम बंगाल की भाजपा के बारे में एक खबर है कि पार्टी के राष्ट्रीय संगठन ने वहां के अपने नेताओं को नसीहत दी है कि नोबल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी के विचारों को लेकर उनकी आलोचना न करें। ऐसी खबर है कि पार्टी को लगता है कि बंगाल के लोग जिस नोबल विजेता पर गर्व कर रहे हैं, उसकी आलोचना से पार्टी का राजनीतिक नुकसान हो सकता है। कहने के लिए तो यह बात छोटी सी है, लेकिन आज देश के व्यापक संदर्भ में इस पर चर्चा करने की जरूरत है। अभिजीत बनर्जी के खिलाफ शुरूआत मोदी सरकार के एक प्रमुख भाजपा केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने की जब उन्होंने अभिजीत बनर्जी का मखौल उड़ाते हुए कहा कि उन्होंने कांगे्रस के चुनाव अभियान के एक प्रमुख नारे, न्याय नाम के कार्यक्रम को तैयार करने में सैद्धांतिक मदद की थी जिसे देश की जनता ने चुनाव में पूरी तरह खारिज कर दिया। नेताओं का एक-दूसरे के खिलाफ ओछा और नाजायज बोलना तो चलते रहता है, लेकिन दुनिया ने जिस अर्थनीति को महत्वपूर्ण मानते हुए उसके पीछे के तीन अर्थशास्त्रियों को नोबल पुरस्कार का हकदार माना, उसकी खिल्ली उड़ाकर भाजपा कुछ भी हासिल नहीं कर सकती। और फिर एक बात यह भी है कि देश के पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी और एनडीए को ऐतिहासिक जनसमर्थन मिलने से कांगे्रस की न्याय नामक योजना जनता ने खारिज कर दी ऐसा सोचना अपने-आपमें एक राजनीतिक अपरिपक्वता से किया गया अतिसरलीकरण है, और पीयूष गोयल जैसे परिपक्व को ऐसी गलती नहीं करनी चाहिए।

किसी के विचारों से, किसी के सिद्धांतों से असहमति एक बात है, लेकिन उसे खारिज करते हुए किसी चुनाव के नतीजों को उसी एक बात से जोड़कर देखना एक बड़ी चूक है। चुनाव के नतीजे एक बहुत ही जटिल फैसला होते हैं, और मतदाताओं के सामने मौजूद विकल्पों के बीच से वे किन मुद्दों से कितना प्रभावित होते हैं, इसका अंदाज लगाना आसान नहीं होता। और फिर हिंदुस्तान के चुनाव पिछले बरसों में लगातार एक मैनेजमेंट का करिश्मा भी साबित होते आए हैं, इसलिए एक अर्थशास्त्री के सिर पर उसका घड़ा नहीं फोडऩा चाहिए। और फिर इस अर्थशास्त्री के साथ तो यह भी जुड़ा हुआ है कि वह दुनिया के गरीबों की मददगार अर्थनीतियों के लिए जाना जाता है। उसकी खिल्ली उड़ाना आत्मघाती ही हो सकता है। अभिजीत बनर्जी के पहले अमत्र्य सेन भी बंगाल के, गरीबों के अर्थशास्त्री रहे, नोबल विजेता रहे, लगातार गरीबों की भलाई की नीतियों और कार्यक्रमों के लिए जाने जाते रहे, और मोदी सरकार उनसे पूरी तरह असहमत रही। लेकिन उनकी खिल्ली उड़ाने से केंद्र सरकार या भाजपा का नुकसान छोड़कर और कुछ नहीं हो सकता। लेकिन आज यहां इस मुद्दे पर लिखने का मकसद महज अभिजीत बनर्जी के बारे में लिखना नहीं है, आज हिंदुस्तान में लोगों को असहमति की वजह से बोलते हुए यह जरूर देखना चाहिए कि उनकी आलोचना नाजायज तो नहीं हो जा रही है? यह बात सावरकर को लेकर भी लागू होती है, और कई दूसरे लोगों को लेकर भी। आलोचना जहां नाजायज होती है, वहां वह आत्मघाती और प्रतिउत्पादक (काउंटरप्रोडक्टिव) हो जाती है। आज ही एक वरिष्ठ स्तंभकार ने इस बारे में लिखा है कि जनसंघ की आलोचना करते हुए इंदिरा ने कभी उसे हिंदू पार्टी कहकर नहीं कोसा, उसे बनियापार्टी कहकर कोसा। उनका मानना है कि यह इंदिरा की सोची-समझी रणनीति थी कि वे देश के हिंदुओं की विशाल आबादी को अपने बयानों से अपने खिलाफ करने की चूक नहीं कर रही थीं। चुनावी राजनीति पर आधारित भारतीय लोकतंत्र में सैद्धांतिक लड़ाई लड़ते हुए भी सामान्य समझबूझ को ताक पर धरना न अच्छी रणनीति हो सकती, न ही समझदारी।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 21 अक्टूबर

सुप्रीम कोर्ट में एक बड़ी अहमियत की सुनवाई...

संपादकीय
21 अक्टूबर 2019



सुप्रीम कोर्ट में किसी मामले की सुनवाई का सबसे महत्वपूर्ण तरीका संविधान पीठ होता है, और दो दिन बाद वहां इस मुद्दे पर जजों की बड़ी बेंच बैठकर विचार करेगी कि क्या बलात्कार और हत्या जैसे गंभीर अपराधों पर मंत्री और अफसर बयानबाजी कर सकते हैं? अदालत के सामने यह मुद्दा कुछ बरस पहले तब सामने आया था जब उत्तरप्रदेश में एक बलात्कार पर वहां के नेता आजम खां ने उसे राजनीति प्रेरित साजिश कहा था। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि उस वक्त भी इस लड़की के पिता की शिकायत पर जब सुप्रीम कोर्ट ने आजम खां को कटघरे में खड़ा किया था, तो उसके पहले ही हम आजम खां का बयान आते ही यह सुझा चुके थे कि सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर ऐसे बयानों पर कार्रवाई शुरू करनी चाहिए, और बकवासी नेताओं को सजा देनी चाहिए। बाद में आजम खां से बहुत बुरी तरह माफी मंगवाकर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें छोड़ तो दिया था, लेकिन इस मामले पर सैद्धांतिक और संवैधानिक सवालों पर विचार करना रह गया था जिसके लिए उस वक्त संविधान पीठ बनी थी, और वह अब सुनवाई शुरू करने वाली है। 

लोगों को याद होगा कि जब-जब नेता या अफसर ऐसे बयान देते हैं, हम कई बार उनके खिलाफ लिखते आए हैं। एक वक्त जब आसाराम को एक नाबालिग शिष्या के साथ बलात्कार की तोहमत का सामना करना पड़ा, तो देश में बहुत से भाजपा नेताओं ने इसे एक हिन्दू संत के खिलाफ राजनीतिक साजिश करार दिया था। उस वक्त भी हमने खुलकर ऐसे बयानों के खिलाफ लिखा था और सुझाया था कि प्रदेशों और देश के महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, बाल अधिकार परिषद में बैठे लोग चूंकि सत्तारूढ़ पार्टी की मर्जी से मनोनीत होते हैं, इसलिए वे ऐसे गंदे बयानों और बकवास पर भी कोई नोटिस जारी नहीं करते, तब तक जब तक कि ऐसे बयानों के पीछे कोई विपक्षी नेता न हो। यह समझने की जरूरत है कि जब सत्ता पर काबिज लोग ऐसे गंदे और हिंसक बयान देते हैं जो कि जांच भी शुरू होने के पहले फैसला देने के बराबर होते हैं, तो ऐसे बयान जांच एजेंसियों पर एक बड़ा भारी दबाव रहते हैं कि उन्हें सत्ता की मर्जी से ही जांच का नतीजा निकालना है। 

यह एक अच्छी बात है कि सुप्रीम कोर्ट बरसों बाद जाकर वही काम कर रहा है जिसके लिए हम हमेशा से उसे उकसाते आए हैं कि शिकायतकर्ता का इंतजार किए बिना सुप्रीम कोर्ट को ऐसे बयानों को खुद होकर एक जनहित याचिका दर्ज करके बकवासी नेताओं को कटघरे में खींचना चाहिए। यह एक तकलीफदेह नौबत है कि ऐसे बयान आते और हिन्दुस्तानी लोकतंत्र को शर्मनाक बनाते हुए आधी सदी गुजर गई है, और उसके बाद जाकर सुप्रीम कोर्ट को यह सूझ रहा है कि सत्ता और राजनीतिक ताकत की ऐसी हिंसा पर काबू पाना चाहिए, और उसे शायद सजा भी देना चाहिए। हमारा मानना है कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में एक ऐसी मिसाल कायम करनी चाहिए कि गैरजिम्मेदारी से बयान देने वाले, शिकायतकर्ता पर आरोप लगाने वाले, उसके चरित्र पर लांछन लगाने वाले, और जांच एजेंसियों को प्रभावित करने वाले नेताओं और अफसरों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान होना चाहिए क्योंकि ये लोग जनता के पैसों पर तनख्वाह पाते हैं, और ताकतवरों की हिंसा की शिकार जनता के जख्मों पर नमक छिड़कते हुए उनका चरित्र भी दागदार साबित करने की कोशिश करते हैं। सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में कार्रवाई इसलिए करनी चाहिए कि देश की संसद में ऐसे बकवासी लोग भरे हुए हैं जो बलात्कार की शिकार बच्चियों को भी राजनीतिक साजिश बताते हैं, जो अपने बयानों से साम्प्रदायिक नफरत और हिंसा फैलाने की कोशिश करते हैं, जो इस देश के सद्भाव के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने में लगे रहते हैं। संसद के भीतर कही ऐसी बातें तो अदालत की बांहों से परे की रहती हैं, लेकिन जब-जब संसद के बाहर, विधानसभा के बाहर ऐसी गंदी और हिंसक बातें कही जाती हैं, तो उन पर कैद से कम किसी सजा का इंतजाम नहीं रहना चाहिए। ऐसा अगर होता है तो बरसों से हमारे उठाए गए मुद्दों को सुप्रीम कोर्ट का समर्थन साबित होगा। देश के कमजोर तबकों को, आम लोगों को इस फैसले का इंतजार रहेगा ताकि खास लोग उनके साथ अलोकतांत्रिक हिंसा करके शान से घूमते न रहें।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 20 अक्टूबर

फिट इंडिया के लिए कई पहलुओं पर सोचना जरूरी

संपादकीय
20 अक्टूबर 2019



प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में फिट इंडिया का एक नारा दिया है जिसमें लोगों की सेहत बेहतर बनाने के लिए अभियान छेडऩे की बात है। जब देश के लोगों की सेहत के बारे में सोचा जाता है, तो लोगों का रहन-सहन, शहरी आवाजाही, हवा का प्रदूषण, लोगों का खानपान, और जीवनशैली, ऐसी बहुत सी बातें सूझती हैं जिनमें बेहतरी की जरूरत है, और हिंदुस्तान को फिट बनाने के लिए ऐसी कई बिखरी-बिखरी बातों पर काम करने की जरूरत है।
आज हिंदुस्तान के एयरपोर्ट और रेल्वे स्टेशनों को देखें, तो वहां खाने-पीने की अधिक से अधिक चीजें ऐसी मिलती हैं जिनसे सेहत खराब होती है। कारखानों में बने हुए सामानों में घी-मक्खन या तेल भरा रहता है, शक्कर और नमक जरूरत से ज्यादा रहते हैं, और मैदा भरा रहता है। कुल मिलाकर सेहत के लिए खराब सामान ही अधिक मिलते हैं। कोई यह सोचे कि किसी एयरपोर्ट पर फल खरीदकर खाया जाए, या बहुत सादा खाना खाया जाए, तो वह न एयरपोर्ट पर मुमकिन है, और न ही प्लेन में। कमोबेश ऐसा ही हाल रेल्वे स्टेशनों और टे्रन के भीतर कर दिया गया है जहां खानपान का ठेका दे दिया जाता है, और कोई भी सादी चीज रखकर ठेकेदार अपना नुकसान करना नहीं चाहते।
लेकिन बात महज सफर तक सीमित नहीं है, घर के बाहर खाने जाएं तो रेस्त्रां में कोई भी सामान आधा प्लेट नहीं मिलता, और जब लोगों की मेज पर जरूरत से अधिक सामान आ जाता है, जिसका भुगतान भी करना है, तो लोग उसे खा-पीकर खत्म करते हैं, और बदन का नुकसान करते हैं। आज किसी भी रेस्त्रां में फलाहार जैसा कोई विकल्प नहीं रखा जाता क्योंकि पचीस-पचास रुपये के फल को आखिर कितने दाम पर बेचा जाएगा? और तो और साधारण कमाई वाले लोगों के लिए जो इंडियन कॉफी हाऊस चलते हैं, वहां पर भी एक दोसा इतना बड़ा ही मिलता है कि उसे खत्म करने के लिए एक हट्टे-कट्टे इंसान की जरूरत पड़ती है। कई बरसों से यह चर्चा चल रही है कि रेस्त्रां में आधा प्लेट खाना भी मिलना चाहिए ताकि लोग अपनी भूख जितना खाएं, अपने भुगतान जितना नहीं, लेकिन ऐसा कोई नियम आजतक बन नहीं पाया है।
अभी दुनिया की सेहत का एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे सामने आया है जिसके शुरू के पचास से अधिक देशों को देखें, तो उसमें हिंदुस्तान का कहीं नाम भी नहीं है। पूरी लिस्ट दिखी नहीं, इसलिए पचास के बाद भी हिंदुस्तान कहां है यह पता नहीं। एक तरफ तो यह देश प्राकृतिक जीवनशैली, प्राकृतिक चिकित्सा, योग पर आधारित जीवन, और आयुर्वेद जैसी बातों पर गर्व करता है, लेकिन दूसरी तरफ इसकी सेहत का हाल बहुत खराब है। भारत में डायबिटीज के मरीज अंधाधुंध रफ्तार से बढ़ते जा रहे हैं, लोगों की मानसिक सेहत बहुत बुरी नफरत और हिंसा से भरती चली जा रही है, और शहरों का प्रदूषण लोगों की जान ले रहा है, चारों तरफ तंबाकू और गुटखा से मौतें बढ़ रहीं हैं। शारीरिक से लेकर मानसिक स्वास्थ्य तक गड़बड़ है और निजी सेहत से लेकर सामाजिक और सामुदायिक सेहत खतरे मेें है। इसके तमाम पहलुओं पर गंभीरता से सोचने-विचारने की जरूरत है।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 19 अक्टूबर

सोशल मीडिया पर जिंदगी, अपनी मर्जी की, या फिर...

संपादकीय
19 अक्टूबर 2019



एक जागरूक पाठक ने पिछले दिनों एक अखबारनवीस को फोन करके इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि गांधी जयंती पर इस बरस लोगों ने सोशल मीडिया पर मानो गांधी का बहिष्कार कर दिया है। लेकिन अखबारनवीस का तजुर्बा इससे ठीक उल्टा था, और उसकी नजर में इस बरस गांधी पर पहले से अधिक लिखा गया था। तजुर्बे का यह इतना बड़ा फर्क कैसे आया? दरअसल सोशल मीडिया खुली जगह पर एक बड़े बुलबुले की तरह रहता है जिसे जिस तरफ से देखा जाए, वह उसी तरफ के रंगों को अधिक दिखाता है, उसी तरफ की तस्वीर दिखाता है। होता यह है कि लोग, खासकर सोचने-समझने वाले लोग, दोस्तों का अपना दायरा अपनी विचारधारा और अपनी पसंद-नापसंद के आधार पर तय करते चलते हैं। इसी आधार पर नए लोग जुड़ते जाते हैं, पुराने लोगों में से कुछ लोग घटते जाते हैं। और फिर इसके ऊपर फेसबुक या दूसरे सोशल मीडिया का अपना कम्प्यूटर एल्गोरिदम होता है जो आपकी पसंद-नापसंद को आपके बताए बिना भी समझते चलता है, और हिन्दी फिल्म के एक पुराने गाने की तरह काम करता है- जो तुमको हो पसंद, वही बात करेंगे...।
सोशल मीडिया एक इतनी अधिक नियंत्रित दुनिया है कि जिसमें लोग अपने पसंद के लोगों से घिर जाते हैं, पसंद के मुद्दों से भी, और नापसंद लोगों को दूर रखना बड़ा आसान है उन्हें ब्लॉक करके, या उन्हें 30 दिनों के लिए नजरों से दूर करके। जो लोग यह मानकर चलते हैं कि सोशल मीडिया पर तरह-तरह की विचारधाराओं के बीच अच्छी बहस की गुंजाइश रहती है, तो वह कम ही लोगों के साथ, कम ही मामलों में रहती है। अधिकतर तो एक ही विचारधारा के लोग जुटने लगते हैं, और एक-दूसरे को सुहाती बातें करने लगते हैं, क्योंकि असहमति पर दूसरे लोगों की जो प्रतिक्रिया होती है, उसे बर्दाश्त करना भी आसान होता नहीं है। फिर यह भी है कि सोशल मीडिया लोगों की जिंदगी को एक खुली किताब की तरह भी सामने रख देता है, और हिन्दुस्तान में जिस तरह सरकारों का, सत्तारूढ़ लोगों का बर्दाश्त कम होते चल रहा है, उससे भी लोगों को अपने हमख्याल लोगों के बीच रहना अधिक महफूज लगता है कि उनमें से कोई सत्ता तक उनकी शिकायत नहीं करेंगे, और आज के वक्त में सत्ता महज सत्तारूढ़ पार्टी या मंत्री-अफसर नहीं होते, समाज के कोई भी ताकतवर तबके सत्ता की एक किस्म तो होते ही हैं। 
सोशल मीडिया ने एक तरफ जहां लोगों के लिए सोचने-समझने और बातचीत की पूरी दुनिया खोल दी है, वहीं दूसरी तरफ उसने लोगों को अपनी दुनिया का आकार, उसकी किस्म, उसके लोग छांटने का जो अभूतपूर्व मौका दिया है, वैसा तो इंसान के समाज में पहले कभी भी नहीं था। लोगों को न अपने रिश्तेदार छांटने मिलते थे, न ही अपनी क्लास के बाकी बच्चे, और न ही अड़ोस-पड़ोस। लोगों को अपनी स्कूल या कॉलेज की टीम के बाकी लोग भी छांटने का मौका नहीं मिलता था, और न ही अपने साथ काम करने वाले दूसरे लोग छांटने मिलते थे। लेकिन सोशल मीडिया ने लोगों को ऐसे परले दर्जे का छंटैल बना दिया है कि वे बात-बात को छांटते चलते हैं। ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर लोगों को यह पसंद भी हासिल है कि वे किन शब्दों को देखना नहीं चाहते। फेसबुक पर कुछ दूसरे तरह का काबू हासिल है। मतलब यह कि लोग अपनी ही पसंद की दुनिया में जीते हैं, और नतीजा यह होता है कि किसी को लगता है कि सोशल मीडिया पर गांधी का बहिष्कार चल रहा है, किसी को लगता है कि मोदी का कीर्तन चल रहा है, किसी को लगता है कि गोडसे की स्तुति हो रही है, और किसी को लगता है कि किसी किस्म की नफरत फैलाई जा रही है।
लाखों बरस से इंसानों ने इस तरह के काबू को कभी देखा-सुना नहीं था। पिछले 50 हजार बरस से अधिक का इंसानों का ताजा इतिहास हाल के कुछ बरसों में, खासकर अभी के दस-बीस बरस में जिस तरह बदल गया है, उसके साथ लोग जी तो रहे हैं, लेकिन उन्होंने जीना सीख लिया है, या मान लेना भी कुछ गलत होगा। आज जिस तरह सामाजिक अंतरसंबंध बदल रहे हैं, लोगों की सोच को पल-पल हथौड़ा लग रहा है, या लोगों को सहलाया जा रहा है, वह सब भी बिल्कुल नया है। इंसान का दिमाग एकदम से ऐसे माहौल के लिए तैयार हो गया होगा, ऐसा माना नहीं जा सकता। इसलिए सोशल मीडिया से निजी सोच, निजी जीवन, और सामाजिक अंतरसंबंधों पर क्या असर पड़ रहा है यह अंदाज लगाना आसान नहीं है। 
अभी-अभी हिन्दुस्तान के बाहर की एक महिला ने सोशल मीडिया पर लिखा कि फेसबुक पर किसी राजनीतिक दल या नेता का प्रचार इतना आसान है कि फेसबुक की बनाई हुई नीतियों की कोई रोक वहां काम नहीं करती। उसने फेसबुक पर ही एक इश्तहार डलवाया जिसमें लिखा था कि फेसबुक और उसके मालिक मार्क जुकरबर्ग ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को दुबारा राष्ट्रपति बनाने के लिए अपना समर्थन दिया है। यह झूठा विज्ञापन देकर उसने साबित किया कि फेसबुक पर भुगतान करके कोई भी झूठी बात प्रचारित की जा सकती है। और आज जब लोग अपनी दुनिया को अपने बनाए हुए दायरे तक सीमित कर चुके हैं, तो वैसे में इस किस्म के नियंत्रित इश्तहारों से, जो कि कम्प्यूटरों की मेहरबानी से सीधे चुनिंदा लोगों तक पहुंचते हैं, दुनिया को काबू करना कितना आसान हो गया है। लोग समझ रहे हैं कि वे सोशल मीडिया पर अपनी दुनिया अपनी मर्जी से तय कर रहे हैं, और हकीकत यह भी है कि वहां पर भुगतान करके लोग दूसरों की सोच को इस तरह प्रभावित भी कर रहे हैं!

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5:00 PM

बात की बात, 18 अक्टूबर

दीवारों पर लिक्खा है, 18 अक्टूबर

...जबरा मारे भी, और रोने भी न दे

संपादकीय
18 अक्टूबर 2019



महाराष्ट्र के एक बड़े सहकारी बैंक, पीएमसी के डूबने से उसमें जिंदगी भर की कमाई रखने वाले लोगों के मरने की नौबत आ गई है, बल्कि कुछ लोग मर भी गए हैं, कुछ लोगों के पास किडनी-ट्रांसप्लांट के बाद की जीवनरक्षक अनिवार्य दवाओं के लिए भी पैसे नहीं रह गए हैं, लेकिन उनकी याचिका सुनने से सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया है, और उन्हें हाईकोर्ट जाने के लिए कहा है। किसी भी मामले के हाईकोर्ट होते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचने का मतलब कुछ महीनों से लेकर कुछ बरसों तक की देरी हो सकता है, और जब लोगों को बैंक में जमा अपनी रकम नहीं मिल पा रही है तो क्या वे सचमुच ही यह इंतजार कर सकते हैं? 
देश के कानून की मामूली समझ भी बताती है कि संपत्ति का अधिकार लोगों का बुनियादी अधिकार है, और केन्द्र सरकार से, रिजर्व बैंक से लाइसेंस पाने के बाद उनके प्रति जवाबदेही के साथ, उनकी जांच और निगरानी के तहत काम करने वाले बैंकों में अगर जालसाजी होती है, तो आरबीआई और केन्द्र सरकार को सीधे जवाबदेह रहना चाहिए। आज देश में मोदी सरकार ने अपने बैंकिंग और बाकी नियम-कायदों को ऐसा बनाकर रखा है कि लोग अधिक रकम लेकर चल नहीं सकते, घर पर अधिक रकम रख नहीं सकते, किसी काम के लिए बड़ा भुगतान नगद कर नहीं सकते, इसलिए सरकार ने लोगों को घेरघारकर एक ऐसे कोने में पहुंचाया है जो कि बैंक है। वहां भी एटीएम से एक दिन में रकम निकासी की सीमा तय कर दी है, तरह-तरह की फीस लाद दी है, इन सबके चलते लोग बैंकों में ही जमा रख सकते हैं। ऐसे में जब बैंकों की रकम डूबती है, और बैंक चलाने वालों की जालसाजी से डूबती है, तो उसकी गारंटी सरकार के मत्थे ही रहनी चाहिए। लेकिन सरकार और बैंकों ने अपने हाथ धो लिए हैं कि किसी की कितनी भी रकम जमा रहे, उसमें से बस एक लाख रूपए तक की वापिसी की गारंटी है। 
जो सरकार देश में कैशलेस अर्थव्यवस्था चाहती है, जो डिजिटल भुगतान को ही अनिवार्य बना देने की कोशिश कर रही है, वह सरकार अगर बैंक-धोखाधड़ी की जिम्मेदारी से कतराती है, तो यह जनता के साथ एक गैरजिम्मेदाराना बर्ताव भी है, और शायद कानूनी रूप से गलत भी है। केन्द्र सरकार चाहे जो कानून बनाकर अपनी जिम्मेदारी से कतराए, हमारी सामान्य बुनियादी समझ यह कहती है कि ऐसे बच निकलने के कानून सुप्रीम कोर्ट में टिक नहीं पाएंगे, और केन्द्र सरकार को बैंकों की डूबत का आम लोगों का पैसा देना ही पड़ेगा, देना ही चाहिए। यह याद रखने की जरूरत है कि बैंकों की कमाई की रकम केन्द्र सरकार ने आरबीआई की बांह मरोड़कर निकाली है, और उसे बैंकों को दिया है ताकि वे नए कर्ज दे सकें। अब सवाल यह है कि जिसने जिंदगी भर की खून-पसीने की कमाई जमा की है, उसके डूबने के खिलाफ सरकार का कोई बचावतंत्र नहीं है, दूसरी तरफ जिन लोगों ने बैंकों से कर्ज लेकर उसे डुबा दिया है, या लेकर भाग गए हैं, उनकी भरपाई करने के लिए केन्द्र सरकार बैंकों को आरबीआई से लेकर रकम दे रही है। कुल मिलाकर सरकार का बैंकिंग का सिलसिला ईमानदार जमाकर्ताओं से छीनकर बेईमान कर्जदारों पर डुबाने का है, और यह सिलसिला महज संसद में कोई बैंकिंग नियम बनाकर जायज नहीं हो जाता, यह सुप्रीम कोर्ट में खारिज हो जाना तय है। आज सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को चाहे तकनीकी आधार पर हाईकोर्ट ले जाने कहा है, लेकिन हाईकोर्ट संसद के बनाए कानून को पलटने की ताकत नहीं रखता है, और बैंकों में लुटे हुए जमाकर्ताओं में से बहुतों की मौत के बाद भी सुप्रीम कोर्ट इसे सुनेगा, और उस वक्त जज जैसे रहेंगे, वैसा इंसाफ होगा। आज तो सरकार नगद रखने नहीं दे रही, और बैंक डूबने पर लोगों को रकम नहीं दे रही है। इसी के लिए कहा गया है कि जबरा मारे भी और रोने भी न दे। 
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5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 17 अक्टूबर

कश्मीर से आते हुए सेबों पर लिखी हुई भड़ास समझें

संपादकीय
17 अक्टूबर 2019



कश्मीर से जम्मू होते हुए नीचे पहुंचने वाले सेबों पर भारतविरोधी, पाकिस्तान समर्थक, और आजादी के नारे लिखे हुए मिले हैं। ट्रक भर-भरकर आने वाले ऐसे सेब दसियों लाख होते हैं, और उनमें से कुछ पर अगर ऐसा लिखा हुआ है, तो इसमें हैरानी की कोई बात इसलिए नहीं है कि वहां तो दीवारों पर भी ऐसे नारे देखने में आते रहे हैं, और अब चूंकि पिछले दो महीने से अधिक से वहां सुरक्षा बलों का ऐसा पहरा है कि दीवारों पर भी लिखने का मौका शायद न मिला हो, फोन और इंटरनेट बंद होने से भी शायद सोशल मीडिया पर भड़ास निकालने या विरोध करने का मौका न मिला हो, और बाकी हिन्दुस्तान के साथ अपने मन की बात बांटने का यह मौका कश्मीर के कुछ लोगों को शायद पहली बार मिला, और उन्होंने ऐसे संदेश भेजे। लोगों को याद रखना चाहिए कि समंदर के पानी में तैरकर आई हुई कई बोतलों में ऐसे संदेश रहते हैं जिन्हें दस-बीस बरस पहले दुनिया के किसी दूसरे हिस्से में किसी ने लिखकर बोतल में बंद करके समंदर में छोड़ दिया हो, और वे किसी और कोने में जाकर लोगों को मिलते हैं। जेलों में बंद कैदी भी तरह-तरह के रास्ते निकालकर अपनी बात बाहर भेजते हैं, स्कूल-कॉलेज के हॉस्टलों में अगर बच्चों को कड़ी निगरानी में रखा जाता है, तो वे भी अपनी बात गुमनाम चि_ियों के रास्ते बाहर भेजते हैं। अभी-अभी बस्तर में नक्सल मोर्चे पर तैनात एक सीआरपीएफ जवान ने उत्तरप्रदेश में अपने परिवार की जमीन की दिक्कत गिनाते हुए अपना एक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, और उसके बाद उसकी शिकायत की जांच शुरू हुई है। 
जहां से लोगों को अपनी बात बाहर भेजने का हक नहीं रह जाता, वहां लोग तरह-तरह के रास्ते अपनाते हैं। लोगों ने यह देखा हुआ है कि हिन्दुस्तान में लोग नोटों पर किसी के बारे में कुछ लिखकर उसे चला देते हैं, या ताजमहल जैसी इमारत की दीवार पर, नदी के किनारे चट्टान पर, या किसी किले और महल में अपने दिल की बात लिखकर मोहब्बत का इजहार करते हैं, या पखानों के बंद दरवाजों के भीतर की तरफ खरोंचकर नफरत का इजहार। ऐसे में अगर कश्मीर के कुछ लोगों ने अपने मन की बात सेब पर लिखकर भेजी है, तो इसी आधार पर वहां के सेब का बहिष्कार करने का फतवा ठीक नहीं है। किसी प्रदेश को जब देश के लोग अपना मानते हैं, तो वहां के लोगों की भावनाओं को सुनना भी लोगों की जिम्मेदारी होती है। बिना हिंसा, बिना आतंक की धमकी के अगर ऐसी बात लिखकर कुछ लोग अपने मन की भड़ास निकाल रहे हैं, तो इसे एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया मानना चाहिए, इसे हिन्दुस्तान के खिलाफ कोई धमकी मानना ठीक नहीं है। फिर इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए कि किसी के सचमुच ही ऐसा लिखे बिना भी किसी साजिश के तहत, कश्मीर के लोगों को बदनाम करने के लिए, उनके खिलाफ माहौल बनाने के लिए भी एक मार्कर पेन की मदद से ऐसा करने वाले लोग भी हो सकते हैं। हर वक्त आंखों के सामने जो रहता है, जो दिखता है, उसे पूरी तरह सच मान लेना भी ठीक नहीं है। कश्मीर में पाकिस्तान के हिमायती भी हमेशा से बने रहे हैं, और आतंकी भी रहे हैं जिनमें हो सकता है कि स्थानीय लोग भी हों। ऐसे लोग भी यह चाह सकते हैं कि कश्मीर को बाकी हिन्दुस्तान से काटकर, अलग-थलग करके कश्मीरियों को ऐसी बेबसी में लाया जाए कि वे एक अलग राज्य में, पाकिस्तान के साथ जुडऩे में अपना भला चाहें। इसलिए दो-चार सेब पर, या दो-चार सौ सेब पर ऐसी लिखी गई बातों को लेकर बवाल खड़ा करना ठीक नहीं है क्योंकि देश और समाज के व्यापक हित में यह जरूरी है कि साजिश की आशंका वाली ऐसी हरकतों को पहली नजर में ही सच न मान लिया जाए, और न ही यह माना जाए कि यह तमाम कश्मीरियों की सोच है। 
ऐसी छोटी-छोटी हरकतों को लेकर बड़ी-बड़ी नफरतें पाल लेना ठीक नहीं होगा। कश्मीर ही नहीं, बाकी हिन्दुस्तान में भी जब लोगों से बोलने, बात करने, लिखने का हक छीन लिया जाए, तो उनके मन की भड़ास किसी न किसी शक्ल में तो निकलेगी ही, और ऐसे नारे ऐसी भड़ास का एक अहिंसक जरिया है जिसे अधिक तूल नहीं देना चाहिए।  

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5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 16 अक्टूबर

म्युनिसिपल चुनाव कैसे हों? सुधार का एक मौका

संपादकीय
16 अक्टूबर 2019



छत्तीसगढ़ सरकार की एक मंत्रिमंडल उपसमिति ने तय किया है कि म्युनिसिपल के मेयर और अध्यक्षों के लिए सीधा चुनाव नहीं होगा और वे पार्षदों के बीच से चुने जाएंगे। राज्य में पिछले कुछ चुनाव मेयर के सीधे चुनाव वाले थे, और इस दौरान बहुत से शहरों ने बड़े महंगे चुनाव देखे थे। मेयर की कुर्सी के उम्मीदवारों के वार्डों में अपनी पार्टी के पार्षद प्रत्याशियों के जिताने के लिए भी खासा खर्च करना पड़ता था। जाहिर है कि इतने बड़े पूंजीनिवेश की भरपाई के लिए म्युनिसिपल की सत्ता में आते ही लोगों को बड़ी-बड़ी कारोबारी योजनाएं बनानी पड़ती थी। मेयर का चुनाव सीधे लडऩा सम्पन्नता से भी जुड़े रहता था और म्युनिसिपल दायरे में आने वाले किस्म-किस्म के कारोबारी माफिया भी मेयर-प्रत्याशी पर दांव लगाते थे। चुनाव महज पार्षदों का होने से भ्रष्टाचार का यह एक पहलू कम होगा। वैसे भी जब देश में पीएम और राज्य में सीएम विधायकों के बहुमत से चुने जाते हैं, वे स्थानीय संस्थाओं के लिए सीधे निर्वाचन की एक अधिक महंगी और अधिक भ्रष्ट व्यवस्था गैरजरूरी है।
अब चूंकि राज्य में स्थानीय संस्थाओं के चुनावों का ढांचा तय होना है इसलिए कुछ और पहलुओं पर चर्चा होना जारी है। एक विचार यह चल रहा है कि क्या पंचायतों की तरह म्युनिसिपल चुनाव भी गैरदलीय आधार पर होने चाहिए? उम्मीदवार बिना पार्टी, बिना पार्टी निशान के लड़ें जैसे कि छत्तीसगढ़ में ही पंचायतों में लड़ते आए हैं? अगर ऐसा होता है तो म्युनिसिपल चुनाव अधिक लोकतांत्रिक होंगे और पार्टी के भीतर दबदबे या चापलूसी की वजह से लोगों का पार्टी टिकट पाना खत्म होगा? अधिक लोग चुनाव लड़ सकेंगे और एक किस्म से पार्टियों के भीतर भी मुकाबला होगा। एक बात यह उठ रही है कि जब म्युनिसिपल चुनाव संसदीय प्रणाली पर हो रहे हैं, और अगर पार्टी निशान पर हो रहे हैं तो इन पर संसद या विधानसभा की तरह दलबदल विरोधी कानून लागू होना चाहिए। यह एक अच्छी सोच है कि किसी पार्टी के झंडेतले जीतकर आए लोग दलबदल न कर सकें। यह एक अलग बात है कि छत्तीसगढ़ के पहले कांग्रेसी मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने तेरह भाजपा विधायकों को फोड़कर कांग्रेस में शामिल कर लिया था और एक तिहाई से अधिक होने से वे अपात्र भी नहीं हुए। इस कानून की सबसे बड़ी हत्या यह है कि इसमें मतदाताओं के समर्थन के साथ बलात्कार पर तो सजा है, लेकिन सामूहिक बलात्कार की छूट है। पार्षदों का चुनाव अगर पार्टी निशान पर होता है तो उनके दलबदल पर अपात्रता का नियम बनना चाहिए।
यह मौका है जब छत्तीसगढ़ सरकार इन चुनावों में काले धन की माफिया-दखल भी घटा सकती है। प्रचार में होर्डिंग, बैनर, पोस्टर, पर रोक लगाकर सिर्फ छोटे पंपलेट से प्रचार करने का एक किफायती नियम लागू किया जा सकता है। इससे काले धन की दखल भी घटेगी, और पर्यावरण भी बचेगा। वार्ड का चुनाव तो घर-घर जाकर लडऩा चाहिए और इस तरीके से सही जनमत सामने आ सकेगा। इस राज्य की नई सरकार के सामने सुधार करने का एक मौका है और उसे चुनाव न्यूनतम खर्च वाला करना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 15 अक्टूबर

बात की बात, 15 अक्टूबर

गरीबों के हिमायती अर्थशास्त्रियों को नोबल मिलने की नसीहतें...

संपादकीय
15 अक्टूबर 2019



एक भारतवंशी अर्थशास्त्री अभिजीत बैनर्जी और उनकी पत्नी एस्थर डुफ्लो के साथ एक अन्य अर्थशास्त्री माइकल क्रेमर को इस बरस का नोबल पुरस्कार दिया गया है। उन्हें अर्थशास्त्र की उनकी सोच से दुनिया की गरीबी कम करने में मिली मदद की वजह से उन्हें इसका हकदार माना गया। भारत में जन्मे, कोलकाता में पढ़े, और फिर जेएनयू से अर्थशास्त्र पढऩे वाले अभिजीत बैनर्जी को दुनिया का यह सबसे बड़ा सम्मान मिलना अमरीका में उनके विश्वविद्यालयों के लिए गौरव की बात है जहां से उन्होंने पीएचडी की, और जहां वे पढ़ाते हैं। दूसरी तरफ जेएनयू को भी हाल के बरसों में देश का गद्दार होने की जो बदनामी बख्शी गई थी, उस पर भी बदनाम करने वालों को सोचने की नौबत है कि गरीबों की भलाई का अर्थशास्त्री इसी जेएनयू से निकला हुआ है, और जेएनयू के हमेशा के बागी तेवरों का प्रतिनिधि रहते हुए वह इंदिरा के राज में कुलपति विरोधी आंदोलन में दस दिन जेल में भी रह चुका है। अभिजीत बैनर्जी ने हाल ही के लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस पार्टी को चुनावी घोषणापत्र के लिए गरीबों की हिमायती आर्थिक नीतियां सुझाई थीं। उनके नाम से यह भी अच्छी तरह दर्ज है कि उन्होंने भारत की नोटबंदी की कड़ी आलोचना की थी, और आज भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर वे बहुत निराश भी हैं।
हम यहां पर उनके बारे में और अधिक लिखना नहीं चाहते लेकिन उनके बहाने से इस पर चर्चा जरूर चाहते हैं कि देश की अर्थनीति गरीबों के लिए हमदर्दी की कैसे होनी चाहिए, और इस तरह अभिजीत बैनर्जी की नीतियों को पूरी दुनिया में महत्वपूर्ण माना गया है, और कई देशों में गरीबी से उबरने के लिए उनके सुझाए गए कार्यक्रमों पर अमल हुआ है, उनका फायदा देखने मिला है। यहां पर हम अभिजीत की चर्चा बंद करते हुए गरीबों की चर्चा पर बात आगे बढ़ाना चाहते हैं जिनका देश के साधनों पर पहला हक होना चाहिए। आज भारत की अर्थव्यवस्था बड़े औद्योगिक घरानों की हिमायती लग रही है, और उससे परे की एक बात यह भी है कि वह पूरी तरह बेकाबू भी लग रही है। हिन्दुस्तान की सरकार गिनाने के लिए सकल राष्ट्रीय उत्पादन के नए तरीके से गढ़े गए आंकड़ों की मदद लेती है, लेकिन दुनिया के बहुत से अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ऐसे गढ़े हुए आंकड़ों से कोई लंबी मदद नहीं मिलती है। अभी कल ही इसी अखबार में हमने देश के एक अर्थशास्त्री का एक लेख छापा था जिसमें उन्होंने मोदी सरकार को सुझाया है कि नेहरू के मॉडल को कोसने के बजाय उसे नरसिंह राव-मनमोहन सिंह के खड़े किए हुए आर्थिक ढांचे को अपनाना चाहिए जिससे देश की आज की हालत सुधर सके। अपने किस्म के ऐसे बहुत से लेखों से परे इस लेख का एक महत्व यह भी है कि इसके लेखक देश की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के पति हैं। उन्होंने खुलकर ऐसा आलोचनात्मक लेख लिखा है जिसके साथ इस बात को याद रखना चाहिए कि राजनीति में आने के पहले निर्मला सीतारमण पति के साथ ही एक ही संस्था में काम करती थी। दो दिनों में ये दो बातें ऐसी आई हैं जो कि देश की अर्थनीति और आर्थिक स्थिति दोनों पर कुछ सोचने के लिए मजबूर करती हैं। मोदी सरकार के नोटबंदी से लेकर दूसरे कई किस्म के फैसलों के आलोचक को नोबल पुरस्कार मिलना, और वित्तमंत्री के पति का केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियों से गहरी सहमति रखना। अब यह तो सरकार के ऊपर है कि वह इन दोनों को देश के खिलाफ मानकर उनकी बातों को खारिज कर दे, या आज की देश की मंदी और बदहाली से जूझने के लिए निंदकों और आलोचकों की बात सुनकर उससे कुछ सीखने की कोशिश करे। 
कुल मिलाकर आज हालत यह है कि पूरी दुनिया में गरीबों की हालत बेहतर बनाने वाली आर्थिक नीतियों का सम्मान हुआ है, और यह निर्विवाद रूप से माना जा रहा है कि गरीबों को साथ-साथ ऊपर लाए बिना दुनिया, कोई भी देश-प्रदेश ऊपर नहीं आ सकते। पूरे देश की अर्थव्यवस्था के आंकड़ों का जोड़़ चाहे किसी देश को ऊपर जाता हुआ बता दे, लेकिन जहां आबादी का अधिकांश हिस्सा बदहाल हो, पिछड़ा हुआ हो, वहां पर जीडीपी जैसे आंकड़े कोई हकीकत नहीं बताते। अब यह मोदी सरकार पर है कि वह आलोचकों की बात सुनना चाहती है या नहीं, और वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण पर है कि वे घर की बात सुनना चाहती हैं या नहीं।  

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