बलात्कारियों को बधिया बनाने के बारे में एक बार देश में चर्चा की जरूरत

संपादकीय
30 नवम्बर 2019
हैदराबाद में एक युवती के दुपहिया को पंक्चर करके जिस तरह एक साजिश के साथ चार लोगों ने उससे बलात्कार किया और उसे जिंदा जलाकर मार डाला, उससे देश एक बार फिर हिल गया है कि बलात्कारों का आखिर क्या किया जाए? कल जब यह देश हिला हुआ ही था तो रांची से भी भूकंप का एक और झटका लगा, वहां कानून की पढ़ाई कर रही एक छात्रा से दर्जन भर लोगों ने बलात्कार किया था जो गिरफ्तार किए गए। कुछ पलों के लिए हिलते हुए इस देश में कुछ लोगों को यह भी याद आया कि बरसों पहले, सात-आठ बरस पहले दिल्ली में एक बस में युवती के साथ जिस तरह गैंगरेप किया गया था, और बलात्कारियों में एक नाबालिग भी था, उससे भी देश हिला था, खासा अधिक हिला था, और उस वक्त सुप्रीम कोर्ट के कहे केन्द्र सरकार ने 3100 करोड़ रूपए का एक निर्भया फंड भी बनाया था कि बलात्कार रोके जा सकें। यह फंड खर्च नहीं हुआ, या थोड़ा सा खर्च हुआ तो महज इश्तहारों पर खर्च हो गया, और उसका मकसद तो किसी कोने से भी पूरा नहीं हुआ। आमतौर पर बलात्कार की खबरों पर हिलने वाला देश कुछ देर में हिलना बंद कर देता है, और फिर ऐसी हर खबर के साथ उसकी संवेदनशीलता घटती चलती हैं। धीरे-धीरे लोगों का हाल यहां तक सीमित हो जाता है कि बलात्कार की शिकार लड़की या महिला का जाति-धर्म क्या था, वह किस उम्र या आय वर्ग की थी, बलात्कारी किस जाति-धर्म के थे, कितने थे, बलात्कार के बाद उन्होंने कत्ल किया या नहीं? रेप की खबरों की ऐसी बुनियादी जानकारी तक सीमित समाज की संवेदनशीलता घटती चलती है और जब वारदात अधिक खूंखार हो जाती है, तो कुछेक मोमबत्तियां निकलती हैं, कुछेक प्रदर्शन होते हैं, और फिर बात आई-गई हो जाती है। 
यह बात सही है कि हिन्दुस्तानी समाज में जब तक लड़कियों और महिलाओं का दर्जा बराबरी का नहीं होगा, तब तक बलात्कार कम नहीं होंगे, लेकिन हो सकता है कि बराबरी का दर्जा आने में दो सदियां लग जाएं। हो सकता है कि देश में महिला आरक्षण लागू करने में मौजूदा संसद सौ बरस और लगा दे, और उसके भी बाद एक सदी तक उसका असर धीरे-धीरे जमीन तक पहुंच सके। इसलिए समाज सुधार की ऐसी धीमी रफ्तार का लंबा इतिहास देखते हुए यह जरूरी है कि बलात्कार पर कुछ कड़ी कार्रवाई तय की जाए, जो कि मौजूदा कानूनों के तहत मुमकिन नहीं है। मौजूदा कानून बलात्कारी को एक लंबी कैद, अधिक से अधिक उम्रकैद या मरने तक की कैद दे सकते हैं, बलात्कार के बाद हत्या करने वालों को फांसी दे सकते हैं, लेकिन ऐसा दिखाई देता है कि समाज में इन दोनों सजाओं का कोई असर अब बाकी नहीं रहा है। लोग आए दिन खबरें पढ़ते हैं कि बलात्कारी को उम्रकैद हुई, लेकिन इससे लोगों के मन में सजा का खौफ रह नहीं गया है। ऐसे में मानव अधिकार आंदोलनकारियों की फिक्र को किनारे रखकर कुछ ऐसी सजा का प्रावधान करना चाहिए जिससे कि बलात्कार की हसरत रखने वाले लोगों के दिल कुछ हिलें। यह बात अलोकतांत्रिक और क्रूर लग सकती है, लेकिन बलात्कार की शिकार लड़की या महिला से पूछकर देखें कि वह कितनी लोकतांत्रिक और कितनी विनम्र रहना चाहती है, एक गैंगरेप के बाद भी। और गैंगरेप के बाद जलाकर मार डाली गई लड़की की राख से तो यह भी नहीं पूछा जा सकता। 
दुनिया के कुछ देशों में बच्चों के साथ बलात्कार करने वालों को रसायनों से बधिया करने का एक कानून है। हिन्दुस्तान में भी इस पर कई बार बहस हो चुकी है, और आखिरकार इस सोच को खारिज किया गया कि यह बहुत अधिक अमानवीय सोच है। लेकिन आज देश भर में जिस धड़ल्ले से बलात्कार हो रहे हैं, और ऐसा लग रहा है कि हिन्दुस्तानी मर्दों की आबादी के एक हिस्से के लिए महिला से छेडख़ानी और बलात्कार पसंदीदा शगल बन गया है, उसे देखते हुए लगता है कि लोगों को एक अधिक कड़ी चेतावनी की जरूरत है। जिस देश के कानून में मौत की सजा को जारी रखने के अधिकतर लोग हिमायती हैं, वहां पर बलात्कारियों को रासायनिक इंजेक्शन से, या किसी सर्जरी से बधिया करने की सजा मौत की सजा से तो अधिक ही नर्मदिल होगी। अगर ऐसी सजा के बजाय किसी और तरीके से लोगों को लगता है कि बलात्कार रोके जा सकते हैं, तो उस तरीके को इस्तेमाल किया जाए। लेकिन आज के हालात में हमको जो बात सूझ रही है वह यही है कि एक ऐसी सजा का इंतजाम हो जिससे लोगों को अपनी देह की वह हिंसक मर्दानगी खो देने का खतरा दिखे, हमेशा के लिए खो देने का खतरा दिखे, तो हो सकता है कि उसका कुछ असर हो। बलात्कार की घटनाएं अधिकतर मामलों में रोकने के लायक नहीं रहती हैं। लड़कियों और महिलाओं को कामकाज के लिए बाहर निकलना ही होगा, सड़कों से आना-जाना होगा, और ऐसे में पुलिस की हिफाजत की एक सीमा रहेगी। बहुत से मामलों में पुलिस बलात्कार में हिस्सेदार भी हो जाती है, इसलिए महज पुलिस के इंतजाम से बलात्कार रोके नहीं जा सकते, और न ही पुलिस का इतना बड़ा इंतजाम ही यह देश कर सकता है। ऐसे में समाज में जागरूकता और बराबरी का दर्जा स्थापित होने तक की सदियों के लिए ऐसे कानून की जरूरत है जिससे कम से कम कुछ अरसे के लिए तो लोगों के मन में जुर्म करने पर कानून का एक खौफ आए। आज देश के शरीफों के मन में तो कानून का खौफ दिखता है, लेकिन बलात्कारी सरीखे मुजरिमों के मन में नहीं दिखता, उसी का कुछ इलाज करना जरूरी है, और बलात्कारियों को बधिया बनाने के बारे में एक बार चर्चा छिडऩी चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 30 नवंबर

बात की बात, 29 नवंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 29 नवंबर

गांधी-नेहरू की जगह सरकारी दफ्तरों में लालू, चौटाला की तस्वीरें टंगें

संपादकीय
29 नवम्बर 2019


बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव की जेल जारी है। चारा घोटाले में उन्हें कुछ मामलों में सजा हो चुकी है, कुछ की सुनवाई जारी है, और लोग अब इन मामलों की गिनती भी भूल गए हैं, और सच कहा जाए तो लालू यादव को भी भूल गए हैं कि क्या वे अब जेल से बाहर आ भी पाएंगे? बीमारी के चलते उन्हें कभी-कभी जमानत भी मिली है, और अस्पताल में रहते हुए भी वे मोटे तौर पर खबरों से परे से हो गए हैं। उनके बारे में लिखने की जरूरत आज इसलिए लग रही है कि हिन्दुस्तान में केन्द्र और राज्य सरकारें मिलाकर करीब तीस सरकारें होती होंगी, और अब स्थानीय संस्थाओं में, म्युनिसिपल और पंचायतों में, गिनें तो देश भर में कुछ हजार स्थानीय सरकारें भी हो जाएंगी। इन सबमें सत्ता पर काबिज लोगों के सामने अच्छा काम करके एक मिसाल छोड़ जाने, और भ्रष्टाचार करके सुबूत छोड़ जाने की संभावनाएं हैं, और लालू यादव एक ऐसी मिसाल हैं जिनका यह हाल देखकर बाकी देश के उन लोगों को एक नसीहत लेनी चाहिए जो कि आज भ्रष्टाचार करने की ताकत रखते हैं। 

सरकार में भ्रष्टाचार बिना सुबूत छूटे कम ही हो पाता है। लोग रिश्वत या कमीशन लेते हैं, तो उसके भी ऑडियो-वीडियो सुबूत सामने आ ही जाते हैं, सरकारी फाईलों पर भी कुछ न कुछ गड़बड़ी रह जाती है। जो लालू यादव एक वक्त बिहार के मालिक सरीखे थे, और जो इतनी ताकत रखते थे कि अपनी घरेलू पत्नी को भी पल भर में उन्होंने अपनी वारिस बनाकर मुख्यमंत्री बना दिया था, जो देश में साम्प्रदायिकता-विरोधी मोर्चे के इतने बड़े नेता थे कि वामपंथियों और कांग्रेसियों समेत अधिकतर लोग उनके साथ एकजुट होते थे, जो इतने दमदार नेता थे कि उन्होंने देश भर में एक भड़काऊ और दंगाई रथयात्रा निकालने वाले लालकृष्ण अडवानी को बिहार में कदम रखते ही गिरफ्तार करवा दिया था, उस लालू यादव का आज यह हश्र क्यों हुआ है? लालू यादव का कुनबा सत्ता की अलग-अलग डालियों पर बैठा हुआ था, और आज भी बैठा हुआ है। यह ठीक से याद भी नहीं है कि उनकी पत्नी और बच्चों में से कौन बिहार में विधायक हैं, और कौन लोकसभा या राज्यसभा में हैं, लेकिन इनमें से कोई भी ऐसे नहीं हैं जो कि अनुपातहीन संपत्ति के गंभीर मुकदमे न झेल रहे हों। बिहार का बेताज बादशाह रहा यह समाजवादी नेता साम्प्रदायिकता-विरोध की अपनी कामयाबी के बावजूद आज भ्रष्टाचार और अनुपातहीन संपत्ति के मामलों में परिवार को ऐसी गहरी दलदल में छोड़कर जेल में पड़ा हुआ है कि उसकी हालत पर महज तरस आ सकता है। 

राजनीति या सरकार, या सार्वजनिक जीवन में भी जिन लोगों के हाथों में किसी किस्म की ताकत होती है, उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि कानून तोडऩे या मनमानी करने का सिलसिला किसी भी दिन इस तरह जेल में डाल सकता है कि वहां से निकलना मुश्किल हो। हो सकता है कि कुछ लोगों को यह लगे कि वे इतने होशियार हैं कि सरकारी भ्रष्टाचार करके, या किसी का कत्ल करवाकर भी बच सकते हैं, और ऐसी कुछ मिसालें तो सामने रहती भी हैं जिनमें लोग इस तरह बचे हुए दिखते हैं, लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि इन बचे लोगों के मुकाबले कई लोग सजायाफ्ता भी रहते हैं। अब लालू यादव के बेटी-दामाद के नाम की सैकड़ों करोड़ की दौलत सरकारी जांच एजेंसियां जब्त कर चुकी हैं, हरियाणा के एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री, और देश के एक सबसे बड़े नेता देवीलाल के बेटे रहे, हरियाणा के पूर्व सीएम ओमप्रकाश चौटाला भ्रष्टाचार में कैद भुगत रहे हैं। अब ऐसे में सवाल यह है कि इंसान की अपनी आने वाली पीढिय़ों के लिए भी कितनी कमाई की जरूरत रहती है? और किन खतरों को उठाकर ऐसी कमाई करनी चाहिए? 

लेकिन सत्ता का नशा ऐसा रहता है कि अतिआत्मविश्वास लोगों के सिर चढ़कर बोलने लगता है। नेता तो नेता, अफसरों में भी यह देखने में मिलता है, और पड़ोसी मध्यप्रदेश के एक आईएएस जोड़े के पास जिस तरह सैकड़ों करोड़ की संपत्ति मिली थी, और जिस तरह की सजा का खतरा ऐसे लोगों पर रहता है, वह भी भ्रष्ट लोगों को नजर आना चाहिए। हमारा ख्याल तो यह है कि सरकारी दफ्तरों में गांधी-नेहरू, प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री-राज्यपाल की तस्वीरें लगाने के बजाय इन दफ्तरों में लालू यादव और चौटाला जैसों की तस्वीरें लगानी चाहिए ताकि वे भ्रष्टाचार करते हुए लोगों को अगर थोड़ी सी समझदारी दे सकें तो दे दें। जिस तरह कई शहरों में पुलिस लोगों की जागरूकता के लिए एक्सीडेंट में कुचल गईं, तहस-नहस गाडिय़ां चौराहों पर सजा देती है, ठीक उसी तरह तहस-नहस जिंदगी वाले लोगों की तस्वीरें सरकारी दफ्तरों में लगाना चाहिए। जिस तरह पहाड़ी रास्तों पर घुमावदार मोड़ पर चेतावनी के नोटिस लगते हैं, उसी तरह सत्ता पर बैठे ताकतवर लोगों के सामने लगातार जेल के सीखचों का कोई प्रतीक चिन्ह रहना चाहिए। अभी लोगों की मेज पर तिरंगे झंडे को सजा देखा जा सकता है, उसकी जगह जेल की सलाखों का एक छोटा मॉडल रखना चाहिए, शायद उसका कुछ अधिक असर हो।  

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

देश की संसद अभी जाने कितनी और गोलियां गांधी पर दागेगी...

संपादकीय
28 नवम्बर 2019


लोकसभा में कल भोपाल की आतंक-आरोपी भाजपा सांसद प्रज्ञा ठाकुर ने गांधी के हत्यारे गोडसे को एक बार फिर देशभक्त करार देकर हंगामा खड़ा कर दिया। इसके पहले जनता के बीच तब हंगामा हुआ था जब भाजपा ने आम चुनाव में लोकसभा से प्रज्ञा ठाकुर को उम्मीदवार बनाया था, और साध्वी कही जाने वाली यह महिला अदालत में आतंकी मामलों में आरोपी चले आ रही है, और इलाज के लिए जमानत पाकर जेल के बाहर है। जिस भाजपा का देश भर में इतने करोड़ सदस्यों के होने का दावा है कि जिनकी बदौलत वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने की बात करती है, उतने करोड़ लोगों में से कुल कुछ सौ सांसद उम्मीदवार उसे चाहिए थे, और वह साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पर आकर टिकी थी। खैर, चुनाव प्रचार के दौरान इस उम्मीदवार ने मुम्बई आतंकी हमले में शहीद हुए पुलिस अफसर हेमंत करकरे के खिलाफ गंदी, ओछी, और हिंसक बातें करते हुए यह दावा किया था कि उसके (साध्वी के) श्राप से हेमंत करकरे की मौत हुई थी। उल्लेखनीय है कि साध्वी प्रज्ञा को आतंकी मामलों में हेमंत करकरे द्वारा की गई जांच के आधार पर ही गिरफ्तार किया गया था। प्रज्ञा ठाकुर ने एक किस्म से मुम्बई आतंकी हमला करने वाले आतंकियों के बारे में यह कहा था कि वे भगवान की तरफ से हेमंत करकरे को सजा देने के लिए आए थे। उन्होंने कहा था- हेमंत करकरे को मैंने कहा था तेरा सर्वनाश होगा। चुनाव चल ही रहा था और पार्टी ने उससे यह बयान वापिस लेने को कहा था। फिर प्रज्ञा ठाकुर ने भोपाल चुनाव प्रचार के दौरान ही नाथूराम गोडसे को देशभक्त कहा था, और कहा था कि वे देशभक्त हैं, और रहेंगे। इस पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अफसोस जाहिर करते हुए कहा था कि वे उन्हें मन से कभी माफ नहीं करेंगे। लेकिन अभी जब देश के सबसे महत्वपूर्ण एक मंत्रालय, प्रतिरक्षा मंत्रालय की संसदीय सलाहकार समिति बनी तो उसमें प्रज्ञा ठाकुर का नाम देखकर देश फिर हक्का-बक्का रह गया क्योंकि इतनी महत्वपूर्ण समिति में नामांकन प्रधानमंत्री की मर्जी के खिलाफ होने का तो सवाल ही नहीं उठता है।

अब देश भर में भारी आलोचना हो जाने के बाद, चौबीस घंटे गुजरने पर भाजपा ने लोकसभा में प्रज्ञा ठाकुर के बयान की निंदा की है, और उन्हें प्रतिरक्षा मंत्रालय की संसदीय कमेटी से हटाने की घोषणा की है। यह भी कहा है कि भाजपा संसदीय दल की बैठक में उन्हें आने नहीं दिया जाएगा। लेकिन प्रज्ञा ठाकुर खुद शब्दों की कलाबाजी करते हुए अपने ही कैमरों पर कैद बयान को अब तोड़-मरोड़ रही हैं, बिना किसी अफसोस या मलाल के। ऐसे में सवाल यह उठता है कि प्रज्ञा ठाकुर को उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने अपना जो रूख दिखाया था, क्या वही रूख आज की इस नौबत के लिए जिम्मेदार नहीं हैं कि जिस संसद भवन के बाहर गांधी को राष्ट्रपिता के रूप में स्थापित किया गया है, उसी संसद भवन की कार्रवाई में गोडसे को देशभक्त करार दिया जाए? इस नौबत से भाजपा किस तरह अपने को अलग कर सकती है, और तोहमत से बच सकती है?

यह सिलसिला देश में एक अकेली घटना नहीं है। सोशल मीडिया पर स्कूली बच्चों को पढ़ाने के लिए, उन्हें देश का इतिहास बताने के लिए जो पोस्टर फैले हुए हैं, उनमें ऐसे भी हैं जिनमें सावरकर की तस्वीर तो है, लेकिन न नेहरू की तस्वीर है, और न ही सरदार पटेल की। पूरे देश में हवा को जहरीला करने का काम कोई मासूम अनायास चूक नहीं है, यह पूरा सोच-समझकर किया जा रहा काम है, और इसी सोच के तहत प्रज्ञा ठाकुर को भाजपा उम्मीदवार बनाया गया, और संसद तक पहुंचाया गया। लगातार एक के बाद दूसरी ऐसी बयानबाजी कहीं न कहीं चलती है, और यह बात एकदम साफ दिखती है कि इनमें से कुछ भी अनायास नहीं है, बल्कि देश के असल मुद्दों की तरफ से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए भी इन्हें कहा जाता है, और ऐसा कहकर देश के लोगों का बर्दाश्त भी तौला जाता है, और धीरे-धीरे करके ऐसे बयानों को सामान्य का दर्जा भी दिलाया जाता है। लोगों के मन में ऐसी सोच को किस्तों में बैठाया जा रहा है कि गांधी को मारना देशभक्ति का काम था। और गांधी से जो शिकायत गोडसे की थी, वह गोडसे की मुस्लिम विरोधी सोच से उपजी हुई थी, और इस बहाने मुस्लिम विरोधी सोच को भी बढ़ाया जा रहा है। 

दीवारों पर लिक्खा है, 28 नवंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 27 नवंबर

महाराष्ट्र के गठबंधन से हुई शुरूआत बाकी देश में भी...

संपादकीय
27 नवम्बर 2019



अब जब महाराष्ट्र में एक सरकार बनना तय हो गया है, और अपने आपको धर्मनिरपेक्ष कहने और मानने वाली कांग्रेस पार्टी एक घोर हिन्दूवादी शिवसेना के साथ मिलकर सरकार बनाने जा रही है, और इन दोनों के बीच में महाराष्ट्र के सबसे बड़े नेता शरद पवार की पार्टी, एनसीपी, गठबंधन की बुनियाद है, तो कई सवाल खड़े हो रहे हैं। शरद पवार के भतीजे और दो दिन उपमुख्यमंत्री रहे अजित पवार को लेकर ये सवाल खड़े ही हुए हैं कि उन पर भ्रष्टाचार की जितनी तोहमतें लगी हैं उनका क्या होगा? दूसरी तरफ यह खबर भी दिलचस्प थी कि दो दिन के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस के रहते हुए महाराष्ट्र के भ्रष्टाचार निवारण ब्यूरो ने अजित पवार के खिलाफ दर्ज बहुत से मामले वापस ले लिए थे। अब नई गठबंधन सरकार इस फैसले को जारी रखकर अजित पवार को मुकदमों से बचा भी सकती है और यह कह भी सकती है कि यह तो भाजपा के मुख्यमंत्री के लिए गए फैसले हैं। लेकिन देश भर में जो बुनियादी सवाल उठ रहे हैं, वे धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता को लेकर हैं। शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने बाबरी मस्जिद को गिराने की पूरी जिम्मेदारी और पूरी वाहवाही खुद होकर ली थी, और उस वक्त देश में कांग्रेस के प्रधानमंत्री नरसिंह राव की सरकार थी जिसे कि मस्जिद के ढांचे की हिफाजत न कर पाने का जिम्मेदार माना गया था। वक्त ऐसा बदला है कि ये दोनों पार्टियां आज महाराष्ट्र की सरकार में एक होने जा रही हैं। शायद ऐसे ही वक्त के लिए यह कहा जाता है कि राजनीति में हैरान कर देने वाले हमबिस्तर होते हैं, और राजनीति में कभी नहीं शब्द का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। 
लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा को दो दिन के लिए सरकार में आने का मौका मिला इसलिए था कि एनसीपी-शिवसेना-कांग्रेस को गठबंधन की बुनियाद तय करने में वक्त लग रहा था। सार्वजनिक रूप से जो कहा गया है उसके मुताबिक तीनों पार्टियां मिलकर एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम तैयार कर रही थीं, और उसमें वक्त लगना जायज था। राजनीति के विश्लेषक वैसे भी कर्नाटक में कांग्रेस की गठबंधन सरकार के ताजा इतिहास को गिनाते हुए महाराष्ट्र को लेकर अपनी आशंकाएं बता रहे हैं, और ऐसे में यह समझना जरूरी है कि कांग्रेस को गठबंधन तोडऩे वाली पार्टी की अपनी छवि से उबरना भी होगा। लेकिन एक दिलचस्प बात यह है कि शरद पवार की शक्ल में महाराष्ट्र में इस गठबंधन के एक इतने बड़े नेता मौजूद हैं जो कि कांग्रेस की आज की अध्यक्ष सोनिया गांधी के भरोसे के हैं, और जिनकी उद्धव ठाकरे पर भी खासी पकड़ है। ऐसे में पवार की शक्ल में एक ऐसी धुरी मौजूद है जिसके इर्द-गिर्द इन तीनों पार्टियों के टकराव या सरकार के कई मुद्दे सुलझ सकते हैं, और शायद सुलझ भी जाएंगे। पवार इस उम्र और ऐसी सेहत में भी न सिर्फ अपनी पार्टी, बल्कि इस गठबंधन की बाकी पार्टियों पर भी जितना वजन रखते हैं, वह इस गठबंधन सरकार की लंबी जिंदगी में मददगार बात हो सकती है। 

महाराष्ट्र को लेकर कांग्रेस और शिवसेना दोनों पर बहुत से तंज कसे जा सकते हैं, और हम भी उसका मजा ले ही रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि जनता ने जब एक ऐसा मिलाजुला फैसला दिया था, और सत्तारूढ़ चले आ रहे गठबंधन के भीतर गंभीर मतभेद थे, जिन्हें कि कोई सुलझा नहीं पा रहा था, तो वैसे में दो ही विकल्प थे। या तो प्रदेश फिर से एक चुनाव में जाता, जिससे कि कोई हल निकलने की गारंटी नहीं दिख रही थी, और दूसरी बात प्रदेश की पार्टियां मिलकर कोई संभावना खड़ी करतीं। आज महाराष्ट्र का गठबंधन ऐसी ही तीन पार्टियों की संभावना लेकर सामने आया है, और इसे साम्प्रदायिकता के मुद्दों को अलग रखकर एक अच्छी सरकार चलाना चाहिए ताकि देश में बाकी प्रदेशों में भी क्षेत्रीय दल और राष्ट्रीय दल मिलकर बेहतर विकल्प बन सकें। अभी दो दिनों से भारत के प्रदेशों पर काबिज पार्टियों का जो नक्शा चारों तरफ फैल रहा है वह दिलचस्प है कि किस तरह भाजपा का कब्जा सिमटा है, और गैरभाजपाई कब्जा बढ़ा है। यह बात तय है कि भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व इस बात को लेकर फिक्रमंद होगा, लेकिन यह बात भी तय है कि पिछले पांच-छह बरस में भाजपा की अगुवाई में चल रही मोदी सरकार ने पूरे देश की जनता को निराश करने के बहुत सारे फैसले और बहुत सारे काम सामने रखे हैं। ऐसे में महाराष्ट्र का यह गैरभाजपाई-गैरएनडीए गठबंधन बाकी देश के लिए एक शुरूआत हो सकता है, और लोकतंत्र की सेहत के लिए ऐसी संभावनाएं हमेशा ही जनता के सामने रहनी चाहिए।  

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 26 नवंबर

बात की बात, 26 नवंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 26 नवंबर

इस दर्जे की बेशर्मी लाते कहां से हो विधायकजी?

संपादकीय
26 नवम्बर 2019


एक-एक करके कई राज्यों का यह नाटक सामने आया कि वहां कोई सरकार बनाने के लिए, या कि गिराने के लिए, जब विधायकों को खरीदने के बाद, या बिक्री के पहले, भेड़ों के रेवड़ की तरह हांककर कहीं ले जाया जाता है, तो उन्हें किसी दूसरे प्रदेश की राजधानी की सबसे महंगी होटल या रिसॉर्ट में ही ठहराया जाता है। जाहिर है कि ये महंगी जगहें इन विधायकों के अपने विधानसभा क्षेत्रों की जनता के सपनों से भी परे की होती हैं, और हिन्दुस्तान की एक फीसदी जनता भी मरने तक ऐसी किसी जगह को देख भी नहीं सकती। चुनाव के वक्त गरीब जनता के वोटों के लिए तरह-तरह के वायदे करने वाले उम्मीदवार, विधायक या सांसद बनने के बाद जिस बेशर्मी के साथ ऐसी जगहों पर रहते हैं, और जरूरत पडऩे पर हफ्तों तक रहते हैं, विशेष विमानों से आते-जाते हैं, वह देखकर लगता है कि क्या इन्हें यह डर नहीं रहता कि लौटकर कभी अपनी जनता को मुंह दिखाना है? 


इस सिलसिले में छत्तीसगढ़ के एक आदिवासी मंत्री कवासी लखमा का खुद का सुनाया हुआ संस्मरण याद पड़ता है। पूरी तरह निरक्षर यह मंत्री कई बार का विधायक है, और अपने साफ दिल और साफगोई के लिए जाना भी जाता है। कवासी लखमा ने लोगों के बीच अपने उस दिन की कहानी बताई जब वे पहली बार विधायक बनकर अपने विधानसभा क्षेत्र लौटे, तो वे एक सरकारी जीप में थे जो कि कलेक्टर की तरफ से विधायकों को अपने क्षेत्र का दौरा करने के लिए दी जाती है। जब वे अपने गांव पहुंचे, तो उनके पिता ने उन्हें जीप से उतरते देखकर पीटना शुरू कर दिया। बाद में काफी मार खाने के बाद जब कवासी लखमा ने पिता से वजह पूछी तो उन्होंने कहा कि विधायक बनने के बाद इतनी जल्दी इतनी रिश्वत खाने लगा कि जीप खरीद ली? उस मासूम आदिवासी बुजुर्ग का आदिवासी आत्मसम्मान बेटे के भ्रष्ट हो जाने की गलतफहमी से ही इतना घायल हो गया था कि जवान बेटा पिट गया। क्या आज पांच सितारा और सात सितारा मेहमाननवाजी से लौटे हुए विधायकों को जरा सी भी फिक्र सताती है कि वे अपने इलाके में क्या मुंह दिखाएंगे? 

कर्नाटक में जब आयरन ओर माफिया के नाम से कुख्यात दो रेड्डी बंधु मंत्री रहते हुए सत्तारूढ़ भाजपा के विधायकों को लेकर हैदराबाद के सात सितारा होटलों में पड़े थे ताकि अपने मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को हटा सकें, तब कर्नाटक के इन विधायकों के इलाके बाढ़ के बाद कीचड़ में डूबे पड़े थे, और अपने वोटरों की तकलीफ में उनकी तरफ झांकने के बजाय ये लोग देश की सबसे महंगी खातिरदारी में मालिश करवा रहे थे। जितना महंगा राज्य होता है, जितना संपन्न होता है, उतनी ही महंगी खातिरदारी वहां के खरीदे जा चुके, या बिकने से रोके जा रहे विधायकों की की जाती है। यह सिलसिला बेशर्मी की तमाम हदों को पार कर गया है, और अपने विधायकों को दलबदल से बचाने के लिए, या दलबदल के लिए लाए गए विधायकों को रखने के लिए आम इंसानों जैसी किसी आम जगह का इस्तेमाल नहीं होता, विधायकों की ईमानदारी को बचाने के लिए, या उनको बेईमान बनाने के लिए हर बार हर कहीं इतना महंगा इंतजाम ही क्यों लगता है? क्या ईमानदारी सस्ते और किफायती इंतजाम में नहीं बच सकती? 

आज की राजनीति में भ्रष्टाचार के बोलबाले से वाकिफ लोगों को ये बातें निहायत फिजूल की लग सकती हैं कि जब हजारों करोड़ की कमाई की कोई सरकार बननी है, तो उसे बनाने या बचाने के लिए कुछ करोड़ खर्च करने में क्या दिक्कत है? लेकिन सवाल यह उठता है कि देश की आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, कुपोषण की शिकार है, उसे इलाज नसीब नहीं है, पेट भर खाना और सिर छुपाना भी नसीब नहीं है, और ऐसे लोगों के वोट पाकर जो नेता विधायक बनते हैं, वे एकाएक इतनी बेशर्मी कैसे ले आते हैं? क्या उन्हें पल भर को भी यह नहीं लगता कि ऐसे अश्लील और हिंसक काले इंतजाम में रहने के बजाय एक किफायती इंतजाम में रहा जाए?

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 25 नवंबर

हिन्दुस्तान को है दवा, सर्जरी, और रेडिएशन, तीनों से इलाज की जरूरत, कैंसर की तरह

संपादकीय
25 नवम्बर 2019



महाराष्ट्र का पिछले एक महीने का हाल देखें, तो ऐसा लगता है कि भारत की संसदीय व्यवस्था में कुछ बुनियादी फेरबदल करने की जरूरत है। इस देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव तो पहले ही गैरजमीनी मुद्दों को उठाकर, लोगों को भड़काकर, खरीद-बेचकर, और पैसों की ताकत पर लड़कर सदन तक पहुंचने वाले हो गए थे। यह सब कुछ अब और भी ऊंचे, या नीचे, दर्जे का होने लगा है। लेकिन इसके साथ-साथ अब जीते हुए विधायकों, जीते हुए गठबंधन, जीती हुई पार्टियों को जिस तरह से जोडऩा और तोडऩा चल रहा है, जिस तरह से घोड़ों को बदनाम करते हुए हार्स ट्रेडिंग जैसा शब्द बदनाम सांसदों और विधायकों की मंडी के लिए इस्तेमाल हो रहा है, वह एक बड़े आमूलचूल फेरबदल की मांग कर रहा है। अब देश की जनता की नजरों में यहां की बनने वाली सरकारें सिवाय हिकारत के किसी और का सामान नहीं हैं। अब लोग इतने लतीफे और इतने कार्टून बना-बनाकर चारों तरफ फैला रहे हैं कि वह लोकतंत्र से उनके मोहभंग का एक बड़ा सुबूत भी है। ऐसी हालत में देश के संविधान को जिंदा रखने में भरोसा रखने वाले लोगों को सोचना चाहिए कि कैसे यह काम किया जा सकता है। 

इस देश ने पिछले दो-तीन चुनावों में जिस दर्जे की तिकड़मों को देखा है, उनकी कोई कल्पना संविधान बनाने वालों ने शायद की नहीं होगी, और इसीलिए संविधान में इन तिकड़मों से बचने का कोई जरिया नहीं है। जब जुर्म से ही सदन तक जाने का रास्ता बनने लगा है, तो उस रास्ते को बंद करके कोई दूसरा रास्ता बनाना चाहिए, या नहीं? आज जिस तरह से सरकार बनाने के पहले ही आसमान छूती हुई भ्रष्ट खरीद-बिक्री हो रही है, उससे यह तो जाहिर है ही कि सरकार बनने के बाद इस लागत को कैसे निकाला जाएगा, और जनता के हक कहां-कहां कुचले जाएंगे। आज भारत की संसदीय चुनाव व्यवस्था पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है, और कस्तूरबा गांधी के मरने के वक्त जिस पेनिसिलिन के इंजेक्शन को गांधी ने उन्हें लगने नहीं दिया था, उस इंजेक्शन से आज की भारतीय लोकतंत्र की बीमारी ठीक होते दिख नहीं रही है। तब से अब तक एंटीबायोटिक की कई पीढिय़ां आकर चली गई हैं, और भारतीय लोकतंत्र को भी उससे उबरना होगा, आगे बढऩा होगा, और बचाव के लिए नई दवाईयां या नए इलाज को ढूंढना होगा। 

भारत में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव जिस तरह आज पैसों, और जुर्म के काले पैसों, टैक्स की चोरी के पैसों, और भ्रष्टाचार के पैसों का खेल हो गया है, उसे देखते हुए इसका इलाज ढूंढना होगा। आज जिस तरह धर्म और जाति के भड़कावे पर चुनाव लड़े जा रहे हैं, जिस तरह सदनों में पहुंचे हुए लोग नफरत फैलाने को अपना पेशा बना चुके हैं, उसे भी रोकने और खत्म करने के लिए कोई इलाज ढूंढना होगा। फिर चुनाव के दौरान का वक्त, चुनाव के बाद सरकार बनाने का तरीका और वक्त, और दलबदल कानून का फायदा उठाते हुए थोक में दलबदल करवाने की आम हो चली तकनीक को खत्म करने की कोई दवाई ढूंढनी होगी। आज कितने ऐसे चुनाव हैं, और कितनी ऐसी सरकारें हैं जिनके बारे में यह कहा जा सकता है कि वे लोकतंत्र के रास्ते चुनकर आई हैं, और लोकतांत्रिक हैं? यह सिलसिला तोडऩा होगा ठीक उसी तरह जिस तरह कैंसर से घिरी हुई किसी देह से कैंसर को खत्म करने के लिए दवा भी दी जाती है, रेडिएशन से भी इलाज होता है, और जरूरत पडऩे पर सर्जरी भी की जाती है। आज भारत की संसदीय निर्वाचन प्रणाली, और यहां की संसदीय व्यवस्था, ये दोनों ही ऐसे बुरे लाइलाज कैंसर की शिकार हैं कि इन्हें जिंदा रखने के लिए इन तीनों किस्मों के इलाज की जरूरत है, और इससे परे भी कुछ और तरह के इलाज की जरूरत पड़ सकती है। यह नौबत बहुत ही गंभीर है, और यह रास्ता लोकतंत्र को खत्म करके एक तानाशाही की तरफ जा सकता है, देश में अराजकता खड़ी कर सकता है, और देश को बेच देने जैसी नौबत भी ला सकता है। यह नौबत बुनियादी फेरबदल की मांग कर रही है, और सत्ता पर बैठे लोग चूंकि ऐसे किसी फेरबदल के हिमायती कभी नहीं होंगे इसलिए जनता के बीच से, छात्रों के आंदोलन से ही ऐसी कोई उम्मीद की जा सकती है। पिछले बरसों में दुनिया में जहां-जहां फेरबदल हुए हैं, वे व्यापक जनआंदोलनों और छात्र आंदोलनों के रास्ते से ही हुए हैं। क्या हिन्दुस्तान कोई उम्मीद कर सकता है?

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 24 नवंबर

पंच-सरपंचों की अनिवार्य शिक्षा खत्म करना, शहरी और शिक्षित अहंकार का खात्मा भी है...

संपादकीय
24 नवम्बर 2019



छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल ने कल यह तय किया कि पंचायत चुनावों में पंच बनने के लिए पांचवीं और उससे ऊपर के पद के लिए आठवीं पास होने की जो अनिवार्यता चली आ रही थी, उसे खत्म किया जाए। यह बंदिश पिछली भाजपा सरकार ने अपने एक कार्यकाल में लगाई थी, जो कल छत्तीसगढ़ कैबिनेट ने हटा दी। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से इस बात के लिए लिखते आ रहे थे, और अपने तर्क के समर्थन में हमने मिसालें भी गिनाई थीं कि किस तरह तमिलनाडू के एक सबसे महत्वपूर्ण कामराज नाडर बचपन में पिता के गुजर जाने के बाद मां का साथ देने के लिए 11 बरस की उम्र में ही स्कूल छोड़ चुके थे। छत्तीसगढ़ सरकार के अब तक के पैमाने के मुताबिक वे यहां सरपंच भी नहीं बन सकते थे लेकिन तमिलनाडू में उन्होंने मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा को ग्यारहवीं तक लागू करके साक्षरता और शिक्षा को बढ़ाने का महान काम किया था, और गरीब स्कूली बच्चों के लिए दोपहर के भोजन की योजना लागू की थी। उन्होंने यह सब काम 1954 से 1963 के बीच किया था जब देश में साक्षरता और शिक्षा इतना बड़ा मुद्दा ही नहीं थीं। इस छत्तीसगढ़ राज्य में पहली कांग्रेस सरकार में गृहमंत्री रहे नंदकुमार पटेल राज्य बनने के पहले से अविभाजित मध्यप्रदेश की दिग्विजय सरकार में भी मंत्री थे, और वे अपने पूरे कार्यकाल में सबसे अच्छे और काबिल मंत्रियों में से एक थे, और अभी उपलब्ध जानकारी के मुताबिक वे आठवीं भी पास नहीं थे, और जब उन्होंने अर्जुन सिंह के लिए खरसिया विधानसभा सीट खाली की थी, तब वे वहां के सरपंच ही थे। अभी कल तक लागू नियम उनके वक्त भी लागू रहता, तो शायद वे सरपंच का चुनाव भी नहीं लड़ पाते, और राज्य को एक काबिल मंत्री मिलने की संभावना भी शुरू ही नहीं हो पाती। 

दरअसल राज्य के लिए कानून बनाने की विधानसभा की ताकत, और देश के लिए कानून बनाने की संसद की ताकत ने कई किस्म की तानाशाही भी दिखाई है। जब इस देश में पंचायत के स्तर पर, पंचायत के भीतर के पंच के लिए भी अनुसूचित जाति, जनजाति, और ओबीसी की महिलाओं तक का आरक्षण लागू है, शहर के मेयर के लिए, या किसी वार्ड मेम्बर के लिए भी इनमें से हर तबके की महिला के लिए आरक्षण लागू है, तब विधानसभा सीट और लोकसभा सीट के लिए आरक्षण लागू नहीं है। महिला आरक्षण का मुद्दा जाने अनंतकाल से संसद में चले आ रहा है, और तमाम पार्टियां उससे मुंह चुराते आ रही हैं। ऐसे में इन सांसदों और विधायकों ने अपने सदनों से वार्ड स्तर तक तो अलग-अलग जातियों की और तबकों की महिलाओं के लिए भी आरक्षण कर दिया, लेकिन अपने सदनों को इससे इंस अंदाज में परे रखा है कि मानो इनमें महिलाएं बढ़ जाने पर ये सदन उसी तरह अपवित्र हो जाएंगे जिस तरह कुछ ईश्वरों के घर हो जाते हैं। 

इससे परे एक और शहरी, शिक्षित, और बाहुबलि अहंकार पंचायत चुनावों पर लादी गई थी कि दो से अधिक बच्चे होने पर निर्वाचित पंच-सरपंच की पात्रता भी खत्म हो जाएगी, छत्तीसगढ़ में ऐसे बहुत से मामले हुए भी थे, और एक सामाजिक तनाव ऐसा भी खड़ा हो गया था कि दो से अधिक बच्चे होने पर पंच-सरपंच परिवार उन्हें छुपाने भी लगे थे। लेकिन 9 बच्चों के साथ लालू यादव सांसद बने हुए थे, और इतने ही बच्चों के साथ देश भर में बहुत से दूसरे सांसद और विधायक थे, लेकिन छत्तीसगढ़ में पंच-सरपंच पर दो बच्चों की शर्त थोप दी गई थी। दिलचस्प बात यह है कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी के वक्त में बनाई गई त्रिस्तरीय शासन प्रणाली में स्थानीय संस्थाओं में पंचायतों और म्युनिसिपलों को तो एक साथ रखा गया था, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह शर्त सिर्फ पंच-सरपंचों पर लगी थी, शहरी वार्ड मेम्बरों और मेयरों पर नहीं। बाद में इस राज्य में पिछली भाजपा सरकार ने इस रोक को खत्म किया था, और सत्ता के इस लादे गए शहरी पूर्वाग्रह के खिलाफ हम लंबे समय से यह मांग कर रहे थे जो शर्तें सांसद और विधायकों पर नहीं लादी गई हैं, वे पंच-सरपंच पर भी नहीं लादी जानी चाहिए। और दिलचस्प बात यह है कि पंच-सरपंच के लिए जिस महिला आरक्षण की व्यवस्था की गई, उस व्यवस्था को संसद और विधानसभाओं में भी लागू करने में पुरूष प्रधान संसदीय राजनीति ने कोई दिलचस्पी नहीं ली। अविभाजित मध्यप्रदेश के समय पंचायतों में महिला आरक्षण जब लागू किया गया, तो देश के सर्वाधिक राजनीतिक चेतना वाले केरल जैसे राज्यों के पंचायत मंत्री और सचिव इन प्रावधानों के अध्ययन के लिए राजधानी भोपाल पहुंचे थे। 
कल भूपेश मंत्रिमंडल ने शिक्षा की यह पूरी तरह से अनैतिक अनिवार्यता खत्म करके एक अच्छा काम किया है। जो अनिवार्यता विधायक और सांसद बनने के लिए भी नहीं है, उसे गांव के लोगों पर लादना एक शहरी अहंकार है, और इसे खत्म किया ही जाना चाहिए था। छत्तीसगढ़ को एक और काम करना चाहिए कि विधानसभा में संसद-विधानसभा के महिला आरक्षण के लिए एक शासकीय संकल्प लाया जाए कि संसद जल्द से जल्द महिला आरक्षण विधेयक को पास करे और लागू करे। इस बात का और कोई महत्व हो या न हो, कम से कम एक प्रतीकात्मक महत्व रहेगा और महिला आरक्षण का इतिहास इसे दर्ज करेगा। यह विधेयक संसद में 2008 से चले आ रहा है जो कि महिलाओं को आबादी के अनुपात में आधी सीटों पर आरक्षण भी नहीं देने वाला है, महज एक तिहाई सीटों पर आरक्षण देगा, लेकिन इसे भी लोकसभा आज तक पास नहीं कर रही है। छत्तीसगढ़ विधानसभा को एक पहल करके यह प्रतीकात्मक संदेश बाकी देश को देना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 23 नवंबर

बिजूका बनाने की तैयारी में लगीं रहीं एनसीपी, शिवसेना, कांग्रेस, और चिडिय़ा चुग गई खेत...

संपादकीय
23 नवम्बर 2019



आज सुबह-सुबह जब महाराष्ट्र में देवेन्द्र फडनवीस के फिर मुख्यमंत्री बन जाने की खबर आई, तो लोगों ने बाकी खबर के पहले तारीख देखी कि आज कहीं अप्रैल फूल का दिन तो नहीं है। इसके बाद अजित पवार के उप मुख्यमंत्री बनने की बात पढ़ी, तो शरद पवार को कोसना चालू कर दिया कि उन्होंने शिवसेना और कांगे्रस दोनों को धोखा दे दिया। फिर कुछ घंटे गुजरे और पवार ने यह साफ किया कि भतीजे अजित पवार से न उनकी पार्टी सहमत है, और न ही परिवार, तो लोगों को यह तय करते नहीं बना कि शरद पवार ने देश को रात में धोखा दिया, या अब धोखा दे रहे हैं, या फिर भतीजे से धोखा खाए हुए हैं। जो भी हो, महाराष्ट्र में फिलहाल तो भाजपा के पिछले मुख्यमंत्री फडनवीस मुख्यमंत्री बन चुके हैं, और अब विधानसभा में बहुमत साबित करने का अकेला जरिया उनके पास यही है कि एनसीपी के विधायकों का इतना बहुमत शरद पवार के खिलाफ जाकर अजित पवार का साथ दे कि विधानसभा में विश्वासमत पाया जा सके। आज इस वक्त जो लोग केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को इस एक और कामयाबी के लिए वाहवाही दे रहे हैं, उनका मानना है कि शाह है तो मुमकिन है। 

अब बिना किसी पसंद-नापसंद के महाराष्ट्र की राजनीति को देखें तो आज सुबह के इस शपथग्रहण के पहले तक शिवसेना, एनसीपी, और कांगे्रस का जो गठबंधन आजकल में महाराष्ट्र में सरकार बनाते दिख रहा था, और जिसने औपचारिक रूप से पिछले दिनों में बार-बार इस फैसले की घोषणा भी की थी, वह गठबंधन एक पूरी तरह से अनैतिक और अप्राकृतिक गठबंधन था, ठीक वैसा ही जैसा कि आज सुबह भाजपा-अजित पवार की शक्ल में सत्ता पर आया है। अभी फडनवीस की वह ट्वीट सोशल मीडिया पर तैर ही रही है जिसमें उन्होंने अजित पवार के भ्रष्टाचार के किस्से गिनाते हुए कड़ी कार्रवाई का वायदा किया था। अब पुलिस और हवालाती अगल-बगल की दो कुर्सियों पर बैठे हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह माथे पर धर्मनिपरेक्षता का गुदना गुदाई हुई कांग्रेस पार्टी देश की एक सबसे साम्प्रदायिक पार्टी शिवसेना के साथ भागीदारी को तैयार थी। अब यह तो केंद्र सरकार के मातहत, उसके एक विभाग की तरह काम करने वाले राजभवन की मेहरबानी है कि वह किस अनैतिक गठबंधन को न्यौता दे, और दो अलग-अलग नस्लों के प्राणियों को एक विचित्र संतान पैदा करने को बढ़ावा दे।

इस मौके पर राजभवन की संवैधानिक भूमिका की असंवैधानिक बातों को लेकर काफी कुछ कहा जा सकता है, लेकिन राजभवन का बेजा इस्तेमाल तो इंदिरा के वक्त से चले आ रहा है जब राज्यपाल अंग्रेज सरकार के एक एजेंट की तरह बर्ताव करते हुए लंदन का एजेंडा लादते थे। राजभवन नाम की संवैधानिक संस्था का कुल जमा इस्तेमाल असंवैधानिक मौकापरस्ती को बढ़ावा देने का बना हुआ है, और आंकड़ों और चिट्ठियों की हकीकत सामने आने के बाद यह समझ आएगा कि महाराष्ट्र का राजभवन में अगर आज सुबह-सुबह अनैतिक काम किया है, तो वह किस दर्जे का अनैतिक है? फिलहाल जब हम इन लाइनों को लिख रहे हैं, मुंबई में एनसीपी, कांग्रेस, शिवसेना की प्रेस कांफ्रेंस जारी है, और उद्धव ठाकरे उसमें कह रहे हैं कि महाराष्ट्र पर फर्जिकल स्ट्राइक की गई है, पवार कह रहे हैं कि उन्हें शपथग्रहण का सुबह पता लगा है, और यह फैसला अजित पवार का है जिनके साथ दस-बारह विधायक ही रहेंगे। और कांग्रेस इन दोनों के साथ बनी हुई है।

दूसरी तरफ कांगे्रस के अभिषेक मनु सिंघवी जैसे बहुत से लोग हैं जो सोशल मीडिया पर इन तीनों पार्टियों की अंतहीन बैठकों को इस नुकसान के लिए जिम्मेदार मान रहे हैं कि वक्त पर फैसला नहीं लिया गया तो ऐसी नौबत आई। कांग्रेस और एनसीपी जनता के बीच मखौल का सामान भी बन गए हैं कि वे हफ्ते भर बैठक-बैठक खेलते रहे, और भाजपा गोल मारकर चली गई। इन तीनों पार्टियों ने जब एक अप्राकृतिक और अनैतिक गठबंधन बनाना तय कर ही लिया था, तो राजनीति की मांग यही थी कि वे तेजी से दावा करते। जब चिडिय़ा खेत चुग गई, तब तक ये तीनों मिलकर खेत में खड़ा करने के लिए बिजूके की कद-काठी, उसके कपड़े, उसके सिर के लिए हंडी तय करते रहे। अब ये तीनों पार्टियां मिलकर खेत में बाकी पराली को जलाकर ठंड में हाथ ताप सकती हैं, या फिर एक आखिरी कोशिश कर सकती हैं कि विधानसभा में फडनवीस-अजित पवार बहुमत साबित न कर सकें।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 22 नवंबर

...कुछ अपनी मिसालों से सीखें, और कुछ विदेशी मिसालों से भी

संपादकीय
22 नवम्बर 2019



हिन्दुस्तान अंग्रेजों का गुलाम रहा इसलिए आजाद होने के बाद भी यह देश अंग्रेजों के देश, उसकी भाषा, उसकी पोशाक और तहजीब से अधिक जुड़ा रहा। इसलिए वहां होने वाली खबरों पर हिन्दुस्तानियों का ध्यान अधिक जाता है। अभी वहां के एक पुराने और दुनिया के प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की खबर है कि एक कॉलेज के डाइनिंग हॉल में लगी हुई 17वीं सदी की एक महत्वपूर्ण पेंटिंग को हटा दिया गया क्योंकि उसमें मांस के बाजार का चित्रण था, और शाकाहारी छात्र-छात्राओं को उससे दिक्कत होती थी, खाते समय यह पेंटिंग देखना उनके लिए तकलीफ की बात थी। 

लोकतंत्र में दुनिया की अलग-अलग सभ्यताएं एक-दूसरे से बहुत कुछ सीख भी सकती हैं। एक-दूसरे को किस तरह बर्दाश्त किया जाए, किस तरह एक-दूसरे का सम्मान किया जाए, यह बात जहां से भी सीखने मिले लोगों को सीखनी चाहिए। हिन्दुस्तान में बहुत से धर्मोँ और जातियों के लोग कभी धार्मिक स्थान पर पशु-पक्षियों की बलि देते थे, कभी रिहायशी इलाकों में भी जानवरों को काट देते थे, वह सब धीरे-धीरे कानून, या स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था के तहत कम होता गया, अब तकरीबन बंद सा हो गया है। सरकार से परे भी कुछ ऐसे निजी संस्थान रहे हैं जिन्होंने इस बात के लिए खासी आलोचना झेली कि वे अपने कर्मचारियों को दफ्तर की कैंटीन में मांसाहार नहीं करने देते। देश का एक प्रमुख अखबार, द हिन्दू, इस बात के लिए आलोचना का शिकार रहा, लेकिन उसने अपने शाकाहारी कर्मचारियों का ध्यान रखते हुए खाने के वक्त अरूचि पैदा न होने देने के लिए इस नियम को कड़ाई से लागू किया। 

शाकाहार के हिमायती लोगों का यह तर्क है कि मांसाहारी तो शाकाहार करते ही हैं, लेकिन शाकाहारी लोग मांसाहार नहीं करते। और खानपान का यह तरीका महज किसी जाति या धर्म से जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि प्राणियों के जीवन को लेकर इंसानों की सोच से भी जुड़ा हुआ है, और आमतौर पर जिन जाति-धर्मों के लोग मांसाहारी होते हैं, उनके बीच भी कई लोग अपनी पसंद से शाकाहारी हो जाते हैं। हिन्दुस्तान में अगर उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों में जाएं, जैसे मिजोरम में सौ फीसदी लोग मांसाहारी हैं, और वहां स्कूलों में दोपहर के भोजन में बिना गोश्त वाला कोई खाना नहीं बनता। और गोश्त भी ऐसे जानवरों का रहता है जिनमें से कोई किसी धर्म को मंजूर नहीं है, तो कोई किसी दूसरे धर्म को। लेकिन वहां की सरकारी स्कूलों में भी बिना मांसाहार के कोई खाना नहीं रहता, और वहां यह मुद्दा भी नहीं रहता क्योंकि शायद कोई भी शाकाहारी नहीं है। 

लेकिन इस मुद्दे पर आज चर्चा महज खानपान तक सीमित रखने का कोई इरादा नहीं है। जिंदगी के बाकी पहलुओं में भी लोगों के बीच फर्क रहता है, सोच का भी, रीति-रिवाज का भी, और भाषा-पहरावे का भी। हिन्दुस्तान में इन दिनों लोकतंत्र की शक्ल कुछ ऐसी दिखती है कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा महज अपने हक और बाकियों की जिम्मेदारी की व्यवस्था चाहता है। जबकि सभ्य और विकसित लोकतंत्रों में व्यवस्था अपनी जिम्मेदारी और बाकियों के हक के सम्मान से ही चलती है। हम हिन्दुस्तान की और किस्मों की बारीक मिसालों में जाना नहीं चाहते, लेकिन सभी धर्मों और जातियों के लोगों को, सभी संस्कृतियों और सोच के लोगों को दूसरों का सम्मान करना भी आना चाहिए, करना चाहिए। इसके बिना यह देश बहुत बुरे किस्म के टकराव का शिकार हो चुका है, और हिन्दुस्तान का नक्शा सूबों की सरहदों में तो वैसा ही दिख रहा है, लेकिन इन सरहदों के भीतर समाजों में नई सरहदें खड़ी होती जा रही हैं जो कि इस देश के न केवल मिजाज के खिलाफ हैं, बल्कि इस देश की जरूरतों के भी खिलाफ हैं। यह देश इंसानों के बीच की खाई और दीवारों के रहते हुए आगे बढ़ नहीं सकता, बल्कि वहीं के वहीं खड़ा भी नहीं रह सकता। हाल के बरसों में हिन्दुस्तान की चौपट हुई अर्थव्यवस्था से लोग समाज के इस विघटन को जोड़कर अभी शायद देख नहीं पा रहे हैं, लेकिन इन नई खाईयों ने दसियों लाख रोजगार खत्म किए हैं, दहशत खड़ी की है, और आर्थिक विकास की संभावनाओं को सीमित भी किया है। देश की संस्कृति, देश में सद्भाव, देश की एकता का अर्थव्यवस्था से भी रिश्ता रहता है, हालांकि उसे आंकड़ों में तुरत-फुरत तौला नहीं जा सकता। भारत के लोगों को देश के भीतर भी जगह-जगह से बर्दाश्त और सद्भावना की मिसालें मिलती हैं, और उनसे भी सीखना चाहिए, साथ-साथ कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के इस मामले में जो सद्भावना देखने मिली है, उसको भी देखकर अपने आपको भी देखना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 21 नवंबर

पता नहीं इस देश में और कौन-कौन से दिन देखना बाकी है

संपादकीय
21 नवम्बर 2019



बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से एक मुस्लिम प्राध्यापक के विरोध का ऐसा घटिया आंदोलन सामने आ रहा है कि हिन्दूवादी हमलावर छात्रों ने विश्वविद्यालय के इस चयन पर सवाल उठाया है कि कोई मुस्लिम संस्कृत कैसे पढ़ा सकता है? दूसरी तरफ विश्वविद्यालय का कहना है कि उन्होंने प्राध्यापक चयन के सारे पैमाने तय करके सबसे अच्छे उम्मीदवार को चुना है जो कि संस्कृत का विद्वान है। एक मुस्लिम से संस्कृत पढऩे पर जिनके नाजुक हिन्दुत्व पर बड़ी आंच आ रही है, वे लोग विश्वविद्यालय कैम्पस में ढोलक लेकर धार्मिक प्रदर्शन कर रहे हैं। दूसरी तरफ उत्साही मीडिया की मेहरबानी से यह बात सामने आ रही है कि राजस्थान का यह मुस्लिम नौजवान किस तरह बचपन से ही संस्कृत पढ़ते आ रहा है, किस तरह उसका परिवार कृष्ण का भक्त रहा है, पिता जगह-जगह घूमकर कृष्ण के भजन-कीर्तन करते रहे हैं, और इसके बाद भी मुस्लिम होने की वजह से इस नौजवान का संस्कृत पढ़ाने से रोका जा रहा है। हमारा तो यह मानना है कि अगर इसका परिवार कृष्ण भक्त न भी होता, तो भी क्या उसका किसी भाषा को बढ़ाने का हक कुछ कम हो सकता है? 

यह देश ऐसी गौरवशाली परंपराओं वाला देश रहा है कि यहां पर योरप से आकर बसे हुए फॉदर कामिल बुल्के न केवल हिन्दी भाषा के प्रकांड विद्वान थे, बल्कि वे रामचरित मानस पर भी एक बहुत बड़े विद्वान माने जाते थे। और वे हिन्दुस्तान में एक ईसाई मिशनरी की तरह बेल्जियम से आए थे, और महान हिन्दी प्रेमी हो गए थे। वे आजादी के वक्त रांची विश्वविद्यालय में संस्कृत पढ़ाते थे, हिन्दी साहित्य में उनकी पीएचडी थी जो कि रामकथा का विकास विषय पर की गई थी। आज अगर कामिल बुल्के इस देश में होते, तो राम का नाम लेने वाले ईसाई होने के नाते हो सकता है उन्हें रांची में भीड़त्या का शिकार होना पड़ता। यह कैसा हिन्दुस्तान हो गया है कि किसी धर्म के व्यक्ति को दूसरे धर्म की बपौती मानी जाने वाली भाषा को पढ़ाने से रोका जा रहा है। अमरीका के स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में भारतीय दर्शन पढ़ाने वाली एक प्राध्यापक लिंडा हेस चौथाई सदी से अधिक वक्त से हिन्दुस्तान आकर कबीर का अध्ययन करती आई हैं, और वे महादेवी वर्मा से लेकर हजारीप्रसाद द्विवेदी तक से मिलती रही हैं, बनारस के कबीर चौरा से लेकर छत्तीसगढ़ के दामाखेड़ा तक कबीर का अध्ययन करती रही हैं, और इन दिनों वे मध्यप्रदेश के कबीर गायक प्रहलाद टिपणिया को लेकर अमरीका में जगह-जगह कबीर गायन का आयोजन कर रही हैं। ऐसी विदुषी महिला और ऐसी महान कबीर भक्त को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के ये साम्प्रदायिक छात्र वहां पढ़ाने न दें कि एक ईसाई किस तरह कबीर को पढ़ा सकती है। 

और दिलचस्प बात यह है कि संस्कृत का विद्वान यह मुस्लिम नौजवान धर्म भी नहीं पढ़ाने वाला था, वह महज एक भाषा पढ़ाने वाला था, और मानो संस्कृत भाषा ने जनेऊ पहनकर हिन्दू धर्म की दीक्षा ले ली है, हिन्दू छात्रों ने इस व्याख्याता की नियुक्ति का उग्र विरोध किया। यह पूरा सिलसिला सिर्फ नफरत से उपजा हुआ है, नफरत पर फलाफूला है, और अब उसके नुकसान दे रहा है, किसी भी धर्म या भाषा के लिए यह गौरव की बात होनी चाहिए कि दूसरे धर्म के लोग, या दूसरी भाषा के लोग भी उनमें दिलचस्पी लेते हैं। सिर्फ परले दर्जे के मूर्ख ही ऐसी बात पर विरोध कर सकते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान की हालत आज इस कदर खराब हो चुकी है कि पूरे देश में धार्मिक सद्भाव को बढ़ाने वाले जेएनयू को देश का गद्दार करार दिया जा रहा है, और जो बीएचयू के छात्र इस तरह की साम्प्रदायिक नफरत फैला रहे हैं उन्हें देशभक्त करार दिया जा रहा है। नेहरू के हिन्दुस्तान की धार्मिक सद्भाव की सोच, जनता के कम से कम एक तबके की वैज्ञानिक सोच, यह सब इस कदर तबाह कर दी गई है कि आज बीएचयू जैसे ऐतिहासिक विश्वविद्यालय की यह घोर साम्प्रदायिक घटना भी राज्य या केन्द्र सरकार का मुंह नहीं खुलवा पा रही है। पता नहीं इस देश में और कौन-कौन से दिन देखना अभी बाकी है। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 20 नवंबर

आपसी लोगों द्वारा खुद किए और करवाए कत्ल के पीछे की वजहें...

संपादकीय
20 नवम्बर 2019



बीते एक दिन में ही अपने आसपास के दो-तीन अखबारों को देखने पर खबरें दिल दहलाने वाली है। एक मां ने सौतेले बेटे को मारने के लिए सुपारी दी, एक लाश मिलने के मामले की जांच में पता लगा कि पांच दोस्तों ने चाकू से हत्या की थी, एक युवती की हत्या में साथी युवक को उम्रकैद सुनाई गई, और एक फिल्म अभिनेत्री पर उसके ही प्रमोटर और साथियों ने हमला किया था, क्योंकि वह उससे एकतरफा प्रेम करता था, और अभिनेत्री उसे भाई मानती थी। 

यह फेहरिस्त बड़ी लंबी चली जाएगी अगर चार दिन के पन्ने पलटे जाएंगे, लेकिन उसके बिना भी यह बात साफ जाहिर है कि कत्ल के अधिकतर मामलों में परिवार के लोग, दोस्त, भागीदार, या प्रेमी-प्रेमिका शामिल मिल रहे हैं। ऐसे कितने ही मामले लगातार खबरों में आ रहे हैं जिसमें कोई पत्नी प्रेमिका के साथ मिलकर पति को मार रही है, या भाड़े के हत्यारों को ठेका दे रही है। अब न रिश्तों का कोई भरोसा रहा, न यारी-दोस्ती का, और न कारोबारी भागीदारी या पड़ोस के संबंधों का। निजी मामलों की वजह से होने वाले ऐसे कत्ल रोक पाना किसी भी पुलिस के लिए मुमकिन नहीं है क्योंकि गले में हाथ डले हों, और जेब में छुरा हो, तो पुलिस क्या अंदाज लगा लेगी? फिर ऐसे हाल में लोगों की यह भयानक बेवकूफी भी है कि वे कत्ल करके बच जाएंगे। कत्ल की सजा तो सबको मालूम है, फांसी न भी हुई तो भी उम्रकैद तो तय है, फिर भी लोग अगर कत्ल कर और करवा रहे हैं, ठंडे दिल से साजिश करके करवा रहे हैं, तो परले दर्जे की ऐसी मूर्खता के चलते कत्ल रूकें तो कैसे रूकें? क्योंकि अखबारों में रोज जितनी खबरें कत्ल की छपती हैं, तकरीबन उतनी की उतनी खबरें कातिलों की गिरफ्तारी की भी छपती हैं, और थोड़ी-बहुत खबरें पांच-दस बरस बाद होने वाली सजा की भी छपती हैं, लेकिन इनसे सचेत होकर लोग कत्ल जैसे मामले में न फंसें, ऐसा पता नहीं कितने मामलों में होता है क्योंकि कत्ल तो बढ़ते ही चल रहे हैं। 

ऐसा लगता है कि समाज में सामाजिक, पारिवारिक, और भावनात्मक जिम्मेदारी घटती चल रही है, यह भी लगता है कि लोगों में अपने आपके कानून से बच निकलने की खुशफहमी भी बढ़ती चल रही है। यह भी लगता है कि बहुत से लोग तैश और आवेश में, नशे और नफरत में आपा खोकर कत्ल कर बैठते हैं, और हैरानी की बात यह है कि आसपास के कई करीबी लोग मिलकर भी कत्ल कर रहे हैं, जबकि उनमें से किसी एक की समझदारी को तो ऐसा जुर्म रोकना था। हो सकता है कि कई जुर्म रूकते भी हों, और न हो पाए जुर्म सामने तो आते नहीं हैं, न एफआईआर बनते हैं, न खबर बनते हैं, इसलिए पूरे के पूरे समाज की नासमझी मान लेना भी ठीक नहीं होगा, लेकिन बढ़ते हुए कत्ल बढ़ती हुई फिक्र का सामान जरूर हैं। 

चूंकि आपस के लोगों द्वारा किए और करवाए गए कत्ल पुलिस द्वारा रोक पाना मुमकिन नहीं हैं, इसलिए समाज में जब तक एक जागरूकता नहीं बढ़ेगी, लोगों के बीच रिश्तों को लेकर एक भड़काऊ भावना नहीं घटेगी, जब तक एकतरफा प्रेम अपने को पूरा हकदार मान लेने की खुशफहमी नहीं छोड़ेगा, जब तक लोग जीवन-साथी या प्रेम-संबंध में सौ फीसदी वफादारी को अनिवार्य समझ लेने की खुशफहमी नहीं छोड़ेंगे, तब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे, ऐसे कत्ल होते रहेंगे। लेकिन ऐसे मामलों में महज कातिलों को पकड़ लेना काफी नहीं हो सकता, किसी भी सभ्य और जिम्मेदार समाज में अपराधों को घटाते चलना, जिम्मेदारी की भावना को बढ़ाते चलना भी जरूरी है। इसलिए भारतीय समाज में लोगों की सामाजिक चेतना, और व्यक्तिगत जिम्मेदारी को बढ़ाना ही होगा। ये दोनों ही बातें बड़ी ही अमूर्त बातें हैं, और यह समझना आसान नहीं है कि यह कैसे होगा, लेकिन यह जरूरी इसलिए भी है कि समाज में नए-नए किस्म के खतरे बढ़ते चल रहे हैं, और ऐसे में हर किस्म के खतरों को घटाना भी जरूरी है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के दो ऐसे वीडियो अभी हवा में तैर रहे हैं जिनमें एक सूने स्कूली क्लासरूम में यूनीफॉर्म पहनी हुई बच्चियां शराब की बोतल से ग्लास में शराब निकालकर पी रही हैं, और एक दूसरे वीडियो में दस बरस का दिखता एक बच्चा बुरी तरह शराब के नशे में बकवास करते हुए दिख रहा है। लेकिन इन वीडियो से परे भी देश के हर शहर में हजारों ऐसे बेघर और फुटपाथी बच्चे हैं जो कि तरह-तरह के रासायनिक नशे कर रहे हैं, और उनमें से कम से कम कुछ बच्चे तो तरह-तरह के जुर्म में शामिल भी रहते हैं। सरकारों की कोई योजना इन बच्चों को नशे से बचाने, बसाने, और उनकी जिंदगी संवारने के लिए दिखती नहीं हैं। इन दिनों लगातार ऐसे अपराध भी बढ़ते चल रहे हैं जिनमें बच्चों के सुधारगृह में रखे गए बच्चे जुर्म में शामिल हैं, और हिंसा करके सुधारगृह से फरार हो रहे हैं। कुल मिलाकर बड़ों के किए जुर्म, और बच्चों के किए जुर्म सबको देखें, तो लगता है कि समाज में जागरूकता की एक बड़ी जरूरत है, और आम लोगों में ऐसी जरूरत के पहले उन लोगों में जागरूकता की जरूरत है जो कि सरकार में हैं, संसद में हैं, विधानसभाओं में हैं, और देश के लोगों में लगातार तरह-तरह की गैरजिम्मेदारी को बढ़ा रहे हैं। राजनीतिक और साम्प्रदायिक वजहों से देश के लोगों को जब किसी एक मोर्चे पर गैरजिम्मेदार बनाया जाता है, तो देश की बाकी आबादी भी कई मोर्चों पर साथ-साथ गैरजिम्मेदार होते चलती है। इन बातों का आपस में रिश्ता सतह पर तैरता हुआ दिखता तो नहीं है, लेकिन सतह के नीचे ये मजबूत जड़ों से जुड़े हुए जुर्म हैं जो कि समाज में बढ़ती हुई, बढ़ी हुई गैरजिम्मेदारी का सुबूत हैं।  

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5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 19 नवंबर

हनीट्रैप वीडियो में सामने आए आरोप-तथ्य की कड़ी जांच हो

संपादकीय
19 नवम्बर 2019



मध्यप्रदेश के हनीट्रैप मामले का एक नया वीडियो सामने आया है जिसमें पिछली भाजपा सरकार के एक विवादग्रस्त मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा को एक महिला के साथ बताया गया है। इस वीडियो के साथ जो बातचीत मध्यप्रदेश के अखबारों में छपी है वह इस मंत्री के अपने मुख्यमंत्री, शिवराज सिंह, और उनके परिवार पर लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों से भरी हुई भी है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आज मध्यप्रदेश की कांगे्रस सरकार ऐसे आरोपों की जांच करवाने का काम करे, या इसे छोड़ दे?

हमने पहले देश और कई प्रदेशों की सरकारों को लेकर लगातार यही बात लिखी है कि संविधान की शपथ लेकर जो मंत्री-मुख्यमंत्री सत्ता पर आते हैं, यह उनकी पसंद का मामला नहीं हो सकता कि वे ऐसे आरोपों की जांच करवाएं, या न करवाएं। यह तो पद की संवैधानिक बाध्यता रहती है कि भ्रष्टाचार या किसी गलत काम की जो जानकारी उनके सामने आए, चाहे वह किसी शिकायत की शक्ल में रहे, या फिर वह मीडिया के मार्फत सार्वजनिक रूप से सामने आए, उसकी जांच करवानी ही चाहिए। यह आरोप डराने वाला नहीं होना चाहिए कि विपक्षियों और विरोधियों की जांच के पीछे राजनीतिक दुर्भावना रहती है। जब कोई जुर्म होते हैं, उस जुर्म के कोई सुबूत या गवाह होते हैं, तो उनकी कही हुई बातों के आधार पर जांच जरूर ही होनी चाहिए। अगर सत्ता पर आए लोग विरोधियों से रियायत करते हुए जांच से परहेज करें, तो यह राजनीतिक लेन-देन का एक बड़ा भ्रष्टाचार बन जाएगा।

आज मीडिया, सोशल मीडिया, और तरह-तरह के स्टिंग ऑपरेशनों के चलते हुए बहुत से ऐसे मामले सामने आते हैं जिनके पुख्ता सुबूत ऑडियो-वीडियो शक्ल में मौजूद रहते हैं। इनकी मदद से जांच करके आगे कार्रवाई करना हर सरकार की जिम्मेदारी रहती है, और बहुत से मामलों में जब सरकार कार्रवाई नहीं करती है, तो अदालतें दखल देती हैं। मध्यप्रदेश के ही इस हनीट्रैप मामले में हाईकोर्ट को एक से अधिक बार यह कहना पड़ा कि राज्य सरकार बार-बार जांच अफसर क्यों बदल रही है? राज्य सरकार हो या केंद्र सरकार, सामने आए हुए हर संदिग्ध मामले की जांच तो होनी ही चाहिए। हम पहले भी यह बात लिख चुके हैं कि जब किसी प्रदेश में किसी पार्टी की सत्ता बदलती है, तो विपक्ष से सत्ता पर आने वाली पार्टी के बीते बरसों में लगाए गए अनगिनत ऐसे आरोप रहते हैं जिनमें सत्ता के भ्रष्टाचार को उठाया गया था। सत्ता पर आने के बाद यह उस पार्टी की भी जिम्मेदारी रहती है कि वह अपनी ही उठाई गई बातों को सही साबित करे, और अपने लगाए आरोपों की जांच भी करे। अभी मध्यप्रदेश के हनीट्रैप मामले से सत्ता के इतने लोग जुड़े हुए थे कि जिस-जिस वीडियो में जो तथ्य सामने आए, उन तमाम लोगों की कड़ाई से जांच करनी चाहिए क्योंकि सत्ता किसी पार्टी का घरेलू सामान नहीं होती है, वह देश की व्यवस्था रहती है, और उसके बेजा इस्तेमाल पर सजा मिलनी ही चाहिए।

(Daily Chhattisgarh) 
5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 18 नवंबर

...चूंकि धरती पर फिट बैठने वाला कोई हेलमेट बना नहीं है इसलिए...

संपादकीय
18 नवम्बर 2019



सड़कों की जगह पानी की नहरों वाले इटली के वेनिस शहर के इलाके की एक क्षेत्रीय काऊंसिल की बैठक चल रही थी, और वहां एक पार्टी के लोगों ने जलवायु परिवर्तन के खतरों के बारे में विचार करने का प्रस्ताव रखा। इसे दूसरी बड़ी पार्टियों ने खारिज कर दिया। बैठक चल ही रही थी। कुदरत की चेतावनी का शायद दुनिया के इतिहास का इतना बड़ा दूसरा मामला दर्ज न हुआ हो, बैठक में प्रस्ताव खारिज हुआ, जलवायु परिवर्तन के खतरों पर विचार करने की जरूरत नहीं समझी गई, और दो मिनटों के भीतर बैठक के कमरे में पानी भरना शुरू हो गया, देखते ही देखते पानी टेबिल तक पहुंच गया। और यह किसी साजिश के तहत किसी टंकी से लाकर भरा गया पानी नहीं था, यह समंदर से जुड़ी हुई वेनिस की नहरों से आया हुआ पानी था जिसने पूरे शहर को डुबाकर रख दिया। जलवायु परिवर्तन के खतरों को देखते हुए लोगों ने प्रस्ताव रखा था कि आसपास के इलाकों में डीजल इंजनों पर रोक लगाई जाए और कुछ दूसरे कदम भी उठाए जाएं, लेकिन जब बैठक में हिस्सेदार लोगों ने यह तय किया कि ऐसे कदम उठाने की जरूरत नहीं है, ऐसे कोई कदम नहीं उठाए जाएंगे, तो कुदरत ने ही एक कदम उठाया, और मीटिंग रूम के भीतर पहुंच गई। 

कुदरत की चेतावनी पहले भी कहीं सुनामी की शक्ल में, कहीं बाढ़ की शक्ल में, और कहीं फटी हुई धरती के सूखे की शक्ल में सामने आती रही है। लेकिन अगर इस मीटिंग के बीच दो मिनटों के भीतर पानी ऐसा नहीं पहुंचा होता तो शायद यह किसी विज्ञान कथा या किसी फिल्म की बात ही मानी जाती। लेकिन कुदरत ने बैठक के भीतर घुसकर लोगों को बतलाया कि यह उसकी खुद की जरूरत का मामला नहीं है, यह डूबने जा रहे शहरों में बसे लोगों की जरूरत का मामला है, उसने शहर को डुबाकर एक नमूना सामने रख दिया। आज पूरी हिन्दुस्तान में एक्स्ट्रीम वैदर, या वैदर एक्स्ट्रीम के मामले जिस रफ्तार से बढ़ते चल रहे हैं, शहरों को पाटने वाली बर्फ की ऊंचाई जितनी बढ़ती चल रही है, दिल्ली जैसा प्रदूषण जितना बढ़ते चल रहा है, महाराष्ट्र जैसा जलसंकट जितना बढ़ते चल रहा है, नए-नए इलाकों में बाढ़ जितनी तबाही बढ़ाते चल रही है, उन सबको देखें तो लगता है कि कुदरत के साथ खिलवाड़ के खतरे धीरे-धीरे दिखते हैं, या सुनामी की शक्ल में इस रफ्तार से आते हैं कि दौड़कर समंदर से दूर जाने का वक्त भी नहीं मिलता। लेकिन जब इस खतरे से बचने के बारे में सोचा जाए, तो दुनिया का अधिकतर हिस्सा अपनी आज की सुख-सुविधा को देखते हुए खतरे को कल की तरफ धकेल देता है, और रात में एसी शुरू करके सो जाता है। 

लेकिन यह समझने की जरूरत है कि समझदार दुनिया किस तरह अपनी ऊर्जा की खपत को काबू करने के साथ-साथ ऊर्जा पैदा करने के तरीकों को बदल भी रही है ताकि धरती की तबाही धीमी हो सके। अभी पश्चिम के एक विकसित देश की खबर है कि किस तरह उसने यह तय किया है कि वह कोयले से चलने वाले अपने सारे बिजलीघरों को बंद कर रहा है। दुनिया में आज सौर ऊर्जा जितनी सस्ती होती जा रही है, अभी दो दिन पहले ही उसने पेट्रोलियम से चलने वाली गाडिय़ों के मुकाबले अधिक किफायती होना साबित कर दिया है। इंसान की कल्पना से भी अधिक रफ्तार से सौर ऊर्जा पेट्रोलियम और कोयले जैसे जीवाश्म से पैदा होने वाली बिजली से सस्ती होने जा रही है, या हो चुकी है। ऐसे में यह पता भी नहीं चलेगा कि कब कोयले का बिजलीघर अपने तमाम धुएं और प्रदूषण के साथ, या उसे अनदेखा करने पर भी, सौर ऊर्जा से महंगा पडऩे लगेगा, या शायद आज भी महंगा पड़ चुका है। ऐसे में छत्तीसगढ़ जैसे उन प्रदेशों को अपनी चली आ रही सोचने की रफ्तार को कुछ थामकर नए किस्म से सोचना चाहिए क्योंकि इस राज्य में जंगलोंतले, आदिवासी इलाकोंतले दबी हुई कोयला खदानों को खोलने की एक बड़ी मशक्कत चल रही है जिसका सामाजिक कार्यकर्ता जमकर विरोध भी कर रहे हैं। लेकिन हिन्दुस्तान के एक सबसे बड़े उद्योगपति के हवाले होने जा रही छत्तीसगढ़ की कोयला खदानों को लेकर यह भी समझने की जरूरत है कि क्या दस-बीस बरस बाद सचमुच ही इतने कोयले की जरूरत बची रहेगी, या सस्ती सौर ऊर्जा कोयला-बिजलीघरों को कबाड़ बनाकर रख देगी? यह भी समझने की जरूरत है कि जब कोयले के खरीददार नहीं बचेंगे, तो बेदखल किए गए आदिवासियों को उनके हक की जमीन, और उनके हक के जंगल कहां से लाकर, और कैसे लौटाए जा सकेंगे? यह भी समझने की जरूरत है कि कोयले की बिजलीघरों के घाटे में चले जाने के बाद उन पर लगे हुए पूंजीनिवेश का क्या होगा, और क्या वे दीवालिया होकर बैंकों में आम जनता की जमा पूंजी को ही डुबाएंगे? लेकिन बैंकों के डूबने से परे, आम जनता की जमा पूंजी के डूबने से परे, धरती के डूबने के बारे में पहले सोचना चाहिए। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के सामने, और हिन्दुस्तान के अधिकतर राज्यों के सामने एक ऐसी बड़ी संभावना मौजूद है जो कि दुनिया के बहुत से दूसरे देशों में नहीं है। यहां पर साल के कम से कम आठ महीने सूरज की इतनी रौशनी रहती है कि सौर बिजलीघर जरूरत की तकरीबन सारी बिजली पैदा कर सकते हैं। हर घर और हर इमारत की छत भी अपनी जरूरत का बिजलीघर बन सकती है, हिन्दुस्तान में ही कई जगहों पर नहरों पर ऐसे सोलर पैनल कामयाबी से लग चुके हैं जो वहां के पंप चलाते हैं। छत्तीसगढ़ जैसे कोयला खदान वाले राज्य को कुछ थमकर यह देखना चाहिए कि कोयला खदानों को बढ़ाए बिना भी, कोयला उत्पादन बढ़ाए बिना भी किस तरह देश-प्रदेश का काम चल सकता है? और भारत सरकार को चाहिए कि एक तरफ सौर ऊर्जा के कोयला-बिजली से सस्ते हो जाने के बाद, और दूसरी तरफ पेट्रोलियम की जगह बैटरियों से चलने वाली गाडिय़ों के किफायती हो जाने के बाद, इस देश की ऊर्जा की जरूरत और इसकी तकनीक के बारे में एक बार फिर से सोचे। और तब तक यह होना चाहिए कि केन्द्र और राज्य सरकारें थोड़ी सी दूरदर्शिता दिखाते हुए इतना काम करें कि कोयला खदानों के नाम पर जंगलों और आदिवासियों को बेदखल और खत्म करना रोक दें। पर्यावरण और कारोबार दोनों से जुड़ा हुआ यह इतना बड़ा मुद्दा है कि हिन्दुस्तान की सर्वोच्च अदालत, या नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल खुद होकर भी ऐसी एक रोक लगा सकती हंै, या कम से कम केन्द्र और राज्य सरकारों को नोटिस भेजकर ऐसा अनुमान मांग सकती हैं कि आने वाले दिनों में ऊर्जा की जरूरत, ऊर्जा की तकनीक, और कोयले के बिजलीघरों का भविष्य, इन सब पर जवाब दे। छत्तीसगढ़ जैसे कोयला-राज्य को इस मामले में पहल करनी चाहिए, और जंगल-आदिवासियों की बेदखली को तो तुरंत ही स्थगित करना चाहिए। जो पानी इटली की एक क्षेत्रीय काऊंसिल की बैठक में पहुंचकर लोगों के दिमाग को खटखटा चुका है, वह खटखटाहट किसी और शक्ल में पूरे हिन्दुस्तान के सिर पर भी हो सकती है, छत्तीसगढ़ के सिर पर भी। अभी तक कुदरत की मार से धरती नाम के इस गोले को बचाने के लिए इतना बड़ा कोई हेलमेट बना नहीं है, इसलिए देश-प्रदेश की सरकारें धरती की जिंदगी को अपनी पांच बरस की जिंदगी से अधिक लंबा मानकर चलें, अपने कार्यकाल से अधिक महत्वपूर्ण मानकर चलें। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

लगता है हिन्दुस्तानी लोकतंत्र एक बड़ा पाखंड रह गया है...

संपादकीय
17 नवम्बर 2019



चुनाव आयोग में राजनीतिक दलों को अपना खर्च बताना होता है। आन्ध्र की सत्तारूढ़ वाईएसआर कांग्रेस ने अपने खर्च में साढ़े 37 करोड़ रूपए राजनीतिक और चुनावी सलाह देने के लिए मशहूर प्रशांत किशोर की कंपनी को दिए हैं। विधानसभा चुनाव के पहले इस पार्टी के अध्यक्ष और अब आन्ध्र के मुख्यमंत्री जगन मोहन ने प्रशांत किशोर की कंपनी की सेवाएं ली थीं। राजनीतिक दलों द्वारा किया गया खर्च चुनाव आयोग की प्रत्याशी खर्च सीमा में नहीं आता, और इसलिए 176 सीटों वाली इस विधानसभा के चुनाव में प्रशांत किशोर पर इस पार्टी ने हर सीट के लिए औसतन 21 लाख रूपए खर्च किए। चुनाव आयोग की एक सीट पर खर्च करने की सीमा उम्मीदवार के लिए तो इससे कम है लेकिन जाहिर तौर पर पार्टी में आयोग की छूट इस्तेमाल करते हुए प्रत्याशी से अधिक खर्च सलाहकार पर कर दिखाया है। लोगों को पिछले काफी समय से लगातार खबरों में आ रहे चुनावी चंदे की भी याद होगी कि किस तरह देश में आज अधिकतर चुनावी चंदा भाजपा को मिल रहा है, और बाकी पार्टियां उसके बहुत पीछे हैं। चुनाव आयोग में अगर चुनावी खर्च का एक छोटा सा हिस्सा ही पार्टियां घोषित करती हैं, ऐसा अंदाज है। अब एक पार्टी चुनाव सलाहकार कंपनी को कितना पैसा चेक से देती है, और कितना नगद कालाधन, इसका हिसाब न तो आयोग रख पा रहा है, और न ही केन्द्र और राज्य सरकारों की कोई एजेंसियां। लोगों का अंदाज यह है कि घोषित खर्च के मुकाबले अघोषित खर्च पांच से दस गुना तक अधिक रहता है। अब सवाल यह है कि एक पार्टी आयोग के नियमों के तहत ही अगर एक-एक विधानसभा सीट पर सलाह और रणनीति के लिए किसी कंपनी को 21-21 लाख रूपए का घोषित भुगतान कर रही है, तो किस तरह की पार्टियां विधानसभाओं में पहुंचेंगी, किस तरह की पार्टियों की सरकार बन सकेगी? और जब विधानसभाओं में ऐसा हाल है, तो यह सोचना एक नासमझी ही होगी कि लोकसभा में हाल कुछ और होगा। 

कुल मिलाकर हालत यह है कि घोषित और अघोषित वजहों से भारतीय राजनीति में चुनावी दल इतने बड़े चंदे के कारोबार में लग गए हैं, और सामान्य समझबूझ के मुताबिक घोषित चंदा अघोषित के मुकाबले बहुत थोड़ा सा होता है, ऐसे में क्या चुनाव जीतना महज पैसों का खेल नहीं रह गया है, जिन पैसों से जनधारणा प्रबंधन से लेकर चुनावी रणनीति तक, और वोटरों की खरीदी तक आम बात है। अब चुनाव हो जाने के बाद विधायकों की खरीदी, पार्टियों में विभाजन की खरीदी, और पूरी की पूरी पार्टी का गठबंधन बदल एक और बात है जो कि बहुत अनजानी नहीं है। ऐसे में यह सोचने की जरूरत है कि हिन्दुस्तानी चुनाव क्या सचमुच ही लोकतांत्रिक रह गए हैं, और क्या वे सचमुच ही जनता की स्वतंत्र पसंद का जरिया रह गए हैं? अब आन्ध्र में जगन रेड्डी की पार्टी की उस वक्त से धनकुबेर होने की साख थी जब जगन के पिता वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री थे। उस वक्त से ही जगन की टकसाल जैसी कमाई की चर्चा रहती थी। कई किस्म की जांच भी चली, और शायद अब तक कार्रवाई जारी भी है। ऐसे अथाह पैसे से अगर कोई पार्टी ऐसे सलाहकार और रणनीतिकार की सेवा खरीद सकती है जिसने कभी मोदी को गुजरात जीतने में मदद की, तो कभी नीतीश कुमार को बिहार जीतने में, तो फिर ऐसे पैसे के मुकाबले अगर दूसरी कोई ईमानदार पार्टी है, दूसरे कोई ईमानदार उम्मीदवार हैं, तो उनके जीतने की कोई गुंजाइश बच भी जाती है? 

आज जो लोग चुनाव के तौर-तरीकों को जानते हैं, वे एक मामूली सा केलकुलेटर लेकर अपने प्रदेश की विधानसभा की एक औसत सीट पर किया गया पूंजीनिवेश आसानी से हिसाब कर सकते हैं। इसी तरह अपने प्रदेश की लोकसभा सीटों पर किया गया पूंजीनिवेश भी लोग निकाल सकते हैं। मतलब यह कि कोई विधानसभा, या लोकसभा काम शुरू करने के पहले ही इतने बड़े पूंजीनिवेश की बुनियाद पर बनी होती है कि उसकी भरपाई, और अगले ऐसे कुछ चुनावों की तैयारी प्रतिनिधियों और पार्टियों का एक बड़ा मकसद रहता है। जाहिर है कि ऐसे सदन किसी भी तरह से गरीब के हिमायती नहीं रह सकते, उन्हें गरीबों की फिक्र नहीं रह सकती क्योंकि चुनाव जीतने के लिए गरीबों के जो वोट लगते हैं, वे मतदान के पहले के ताजा-ताजा नोटों से पाए जा सकते हैं, पाए जा रहे हैं। तकनीकी रूप से हिन्दुस्तान के हर वोटर के हाथ में बराबर का हक है, लेकिन हकीकत यह है कि इन वोटों में से एक बड़ा हिस्सा नोटर के हाथ बिकने वाला रहता है, और जीतने वाले उम्मीदवार की कामयाबी का एक बड़ा हिस्सा रहता है। यह भी सोचने की जरूरत है कि जहां पर सबसे ताकतवर खरीददार जीत को खरीद सकते हैं, वहां पर अपने मन को झांसा देने के लिए भी क्या यह सोचना ठीक है कि यह जनता का लोकतांत्रिक फैसला है? क्या हिन्दुस्तान में अब चुनावों का फैसला वोटों के साथ-साथ, या वोटों से अधिक, नोटों से तय नहीं होने लगा है? क्या जनता भी ऐसे ताकतवर और संपन्न उम्मीदवार को पसंद नहीं करने लगी है जो अगले पांच बरस उसकी जायज और नाजायज जरूरतों को पूरा कर सके? क्या जनता के वोट प्रदेश और देश का भविष्य तय करने के बजाय, उसके खुद के आज और आने वाले कल की सहूलियतों को तय करने के हिसाब से नहीं डाला जा रहा है? क्या जिंदगी के, देश और प्रदेश के असल मुद्दों से परे निहायत ही खोखले लेकिन भड़काऊ-भावनात्मक मुद्दे चुनावी नतीजे तय करने के लिए नोटों पर सवार होकर वोटों तक जा रहे हैं? इन तमाम पहलुओं को देखें तो लगता है कि हिन्दुस्तान का लोकतंत्र एक बड़ा पाखंड रह गया है। यह लिखा हुआ छपने जा ही रहा था कि एक खबर सामने आई, कर्नाटक में कांग्रेस छोड़ भाजपा जाने वाले विधायक-मंत्री एमटीबी नागराज ने 5 दिसंबर को होने वाले उपचुनाव के लिए भरे पर्चे में अपनी संपत्ति 1223 करोड़ घोषित की है, जो कि 18 महीने पहले की घोषणा से 160 करोड़ अधिक है। दौलत की ऐसे तेज रफ्तार और ताकतवर सुनामी के सामने किस पार्टी के कौन से उम्मीदवार टिक सकते हैं? 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 17 नवंबर