दीवारों पर लिक्खा है, 9 अगस्त 2020

 

संतान की मंगलकामना के पर्व पर महिलाएं संतानों में जिम्मेदारी की कामना भी करें

 छत्तीसगढ़ में आज कमरछठ का त्यौहार मनाया जा रहा है। यह पर्व संतान प्राप्ति, और अपने बच्चों की लंबी जिंदगी की कामना के लिए किया जाता है, और जाहिर है कि नियमों के पालन और उपवास वाला पर्व है, तो इसे तो महिला को ही मानना पड़ता है, आदमी तो पैदा होने से लेकर मरने तक एक भी दिन भूखा रहे बिना जिंदगी गुजार सकता है, उस पर तो कोई बंदिश होती नहीं है। अपने बच्चों की मंगलकामना के लिए मनाए जाने वाले कमरछठ या हलषष्ठी के दिन एक बात याद आ रही है कि इसी छत्तीसगढ़ में बहुत से बूढ़े मां-बाप बेसहारा छोड़ दिए जाते हैं, ठीक बाकी हिन्दुस्तान की तरह, और ठीक बाकी दुनिया की भी तरह। लेकिन वृद्धाश्रम में रहते हुए भी बूढ़ी मां को अगर कमरछठ का यह त्यौहार याद होगा तो वह बिना चूके अपने बच्चों की लंबी और अच्छी जिंदगी के लिए पूजा भी कर रही होगी, और उपवास भी कर रही होगी। 

आज महिलाओं के पूजा के दिन इस मुद्दे पर लिखना थोड़ा सा अटपटा लग सकता है, लेकिन इस अटपटेपन के बीच यही सही मौका है जब लोगों को याद दिलाया जाए कि औलाद पर भरोसा, और उस पर निर्भर रहने की एक सीमा रहनी चाहिए। एक दूसरी सीमा रहनी चाहिए कि अपने बेटों और बेटियों के बीच फर्क न करने की। हिन्दुस्तान के अधिकतर हिस्से में कामना होती है तो पुत्र प्राप्ति की, कन्यारत्न की प्राप्ति के लिए कोई कामना नहीं होती, और हिन्दुस्तान के कम से कम, हिन्दुओं के बीच, कन्या को नवरात्रि के बाद के कन्यापूजन, देवी प्रतिमाओं के रूप में तो माना जाता है, लेकिन बाकी मामलों में कन्या की कोई जगह नहीं रहती। जब जमीन-जायदाद की वसीयत की बात आती है तो लोग लडक़ी को पराये घर की मानकर सब कुछ बेटों के नाम कर जाते हैं। इसलिए इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि वृद्धाश्रम में जितने मां-बाप हैं, अगर उनके पास कुछ छोडऩे लायक रहा होगा, तो यह साफ है कि वह बेटों के लिए ही छोड़ा गया होगा। और अगर वृद्धाश्रम जाने से लोग बचे हैं, तो उनमें से बहुत से ऐसे होंगे जो बेटियों की वजह से बचे हैं, और बेटियों के साथ हैं। 

लोगों की अपने बेटों के लिए सब कुछ छोड़ जाने की हसरत कभी खत्म भी नहीं होती। कारोबारी हिन्दू परिवारों में आमतौर पर यह मान लिया जाता है कि लडक़ी का जो हक बनता है, वह उसकी शादी के वक्त उसे दे दिया जाता है, और बाकी तो फिर लडक़ों के ही बीच बंटना रहता है। आज कमरछठ के दिन अपनी संतानों की मंगल कामना के लिए पूजा करने वाली तमाम महिलाओं को, और इस त्यौहार को न मानने वाले मां-बाप के लिए भी यह समझना जरूरी है कि सबसे पहले अपनी दौलत को अपने जीते-जी पूरी तरह से संतानों को नहीं दे देना चाहिए। सबसे पहले उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने का मौका देना चाहिए, जिंदगी के संघर्ष की आंच में तपने देना चाहिए, इसके बाद ही अपनी वसीयत में ऐसा इंतजाम करना चाहिए कि अपनी पूरी जिंदगी अपने दम पर पार करने के लायक पैसे अपने पास रखें, और बाकी को सारी संतानों में बराबर बांटना चाहिए, न कि सिर्फ बेटों में। 

भारत में उत्तराधिकार के कई कानून इस सोच के करीब हैं। हिन्दू उत्तराधिकार कानून शायद लड़कियों के हक को कुछ कम मान्यता देता है, लेकिन मान्यता देता तो है। और यह बात भी सच है कि हिन्दू लडक़ी को अपना हक पाने के लिए अक्सर ही अदालती लड़ाई तक जाना पड़ता है, उसे उसका हक न तो मां-बाप के रहते मिलता, और बाद में भाईयों से कुछ हासिल करना तो नामुमकिन सा रहता है।
 
लोगों के पास धन-दौलत कम हो, या अधिक हो, जिंदगी सबके पास बड़ी लंबी रहती है, उसकी कोई सीमा नहीं रहती। अभी-अभी छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में कोरोना से वहां की जेल की एक महिला कैदी एक बड़े निजी अस्पताल में गुजर गई। वह 90 बरस की थी। अब यह सोचें कि 90 बरस तक उसे जेल में रखकर देश और कानून को आखिर क्या हासिल हो रहा है? और मान लें कि ऐसा कोई कानून भी बने जो इस उम्र में कैदी को अनिवार्य रूप से रिहा कर दे, तो सोचें कि वह इस उम्र में बाहर निकलकर कहां जाएगी? बहुत से ऐसे परिवार हैं जिनमें इस बुढिय़ा को मंजूर नहीं किया जाएगा, और शायद वह जेल के मुकाबले भी अधिक बुरी हालत में आ जाएगी क्योंकि जेल में दो वक्त खाना तो मिल ही जाता है। अब यह बात हमारी कल्पना से परे की है कि इस उम्र की महिला ने अपने लिए कुछ बचाकर रखा होगा। यह भी मुमकिन नहीं है कि जेल के भीतर उसने रोज मजदूरी करके थोड़ी सी रकम जुटाकर रखी हो और छूटने पर वह उसके काम आती। अब तो खैर वह कोरोना की मेहरबानी से जेल, बदन, और दुनिया सबसे छूट गई है, लेकिन क्या ऐसे बुजुर्ग लोग कभी अपनी मौत तक का इंतजाम करके रखते हैं? 

लोगों को एक सामाजिक परामर्श की जरूरत है क्योंकि  जिन संतानों के लिए कमरछठ की जाती है, वे संतानें ही मां-बाप का भावनात्मक दोहन करके उन्हें जीते-जी इतना निचोड़ लेते हैं कि वे मरने तक महज एक गुठली की जिंदगी जीते रह जाते हैं, एक कप चाय या दो बिस्किट के लिए आल औलाद के मोहताज होने वाले मां-बाप हमने देखे हुए हैं। आज कमरछठ के मौके पर लोगों को न सिर्फ संतानों की लंबी और अच्छी जिंदगी की कामना करनी चाहिए, बल्कि यह कामना भी करनी चाहिए कि उनकी औलादें उनके प्रति भी जवाबदेह बनी रहें, जिम्मेदार बनी रहें, और समाज के प्रति भी। समाज के भीतर लोगों को एक-दूसरे को ऐसी जिम्मेदारी और सावधानी सुझानी चाहिए, जिम्मेदारी आल-औलाद को, और सावधानी बुजुर्ग मां-बाप को।

(Daily chhattisgarh)

बात की बात, 8 अगस्त 2020

 

दीवारों पर लिक्खा है, 8 अगस्त 2020

 

केरल के इन दो हादसों से खड़ी होती है बड़ी फिक्र..

  कल का दिन केरल के लिए बहुत ही खराब दिन था। इस राज्य का पर्यटन का एक नारा है- गॉड्स ओन कंट्री, यानी ईश्वर का अपना प्रदेश। वहां जाएं तो उसकी खूबसूरती देखकर सचमुच यही लगता है। लेकिन कल के दिन को देखें तो लगता है कि अगर यह ईश्वर का अपना प्रदेश है तो ईश्वर कल कुछ खुदकुशी करने बैठा था। दिन में वहां पहाड़ी से जमीनें और चट्टानें बहकर नीचे आईं, और दर्जन भर से अधिक लोग मारे गए। रात वहां एक विमान उतरते-उतरते हवाई पट्टी पर फिसलकर खाई में जा गिरा, और उसमें भी डेढ़ दर्जन या अधिक लोग मारे गए। एक ही दिन में केरल में ये दो बड़ी विपदाएं हुईं, और एक किस्म से दोनों ही मौसम की वजह से हुईं, खूब बारिश से भूस्खलन हुआ, और खूब बारिश के बीच विमान उतारते हुए एक बहुत ही अनुभवी पायलट विमान को बचा नहीं पाया। इन दोनों को देखें तो लगता है कि कुदरत की ताकत कितनी है!

ये दोनों हादसे उत्तराखंड में कुछ बरस पहले की बाढ़ और भूस्खलन के मुकाबले बहुत छोटे से हैं, हमने उस वक्त हजारों मौतों को देखा था, और हजारों को लापता होते भी देखा था जिनकी अब कोई चर्चा भी नहीं होती कि वे मिले हैं, या नहीं मिले हैं। दूसरी तरफ हिन्दुओं के चार तीर्थों को जोड़ते हुए चारोंधाम के बीच जैसी चौड़ी सडक़ें बनाई जा रही हैं, वे इन पहाड़ी इलाकों में बहुत बड़ा जमीनी फेरबदल कर रही हैं, जिसकी वजह से पर्यावरण और भौगोलिक तकनीकी जानकारी रखने वाले लोग बहुत फिक्रमंद हैं। दुनिया में बहुत सी जगहों पर भूकंप का बड़े बांधों से रिश्ता जोड़ा जाता है, नदियों में बाढ़ का रिश्ता नदियों के किनारे शहरी विकास, पेड़ों की कटाई, और नदियों में गाद भर जाने से जोड़ा जाता है। इंसान अपनी हरकतों से या अपनी लापरवाही से कुदरत को एक ऐसी कगार पर ले जाकर खड़ा कर देते हैं कि वहां से आगे का रास्ता केवल तबाही की तरफ बढ़ता है। 

एक तो धरती की अपनी बनावट कुछ ऐसी है कि उसमें कुछ किस्म की तबाही रोकी नहीं जा सकती। हर तबाही के पीछे इंसान जिम्मेदार हों ऐसा भी नहीं है, बहुत किस्म के भूकंप बिना किसी इंसानी योगदान के सिर्फ धरती के भीतर के ढांचे की वजह से होते हैं, और इंसान शायद चाहें तो भी उसे रोक नहीं सकते। सारा विज्ञान और सारी तकनीक मिलाकर भी इंसान इतना ही कर पा रहे हैं कि भूकंप के खतरे वाले इलाकों की शिनाख्त हो जाती है, और उन इलाकों में ऐसी तकनीक से मकान और इमारतों को बनाया जाता है कि भूकंप को वे कुछ हद तक झेल सकें, और इंसानों की जिंदगी पर खतरा घटे। लेकिन इंसानों ने कुदरत को कई जगह अपना गुलाम सा मानकर काम किया है। अब कल केरल में जिस पहाड़ी एयरपोर्ट पर यह प्लेन ठीक से लैंड नहीं कर पाया, उस किस्म के एयरपोर्ट टेबलटॉप कहे जाते हैं, यानी पहाड़ी के बीच बनाई गई एक हवाई पट्टी ऐसी रहती है जिसकी जगह बहुत सीमित रहती है। अब ऐसी जगह पर हवाई पट्टी बनाना और उस पर विमान उतारना हमेशा ही थोड़े से खतरे की बात रहती है, लेकिन कल तो भारी बारिश थी, दूर तक दिख नहीं रहा था, और यह काबिल, एक पुराना एयरफोर्स पायलट, दो बार कोशिश करके भी विमान वहां उतार नहीं पाया था, और तीसरी बार में यह हादसा हुआ जिसमें विमान के दो टुकड़े हो गए, और दोनों पायलटों सहित 18-20 मौतें हो गईं, दर्जनों लोग बुरी तरह जख्मी हो गए। 

अब यह सोचने की जरूरत है कि इंसानों का शहरी विकास किस कीमत पर हो और उसके लिए कितने खतरे उठाए जाएं? एक तरफ समंदर के किनारे इतने करीब तक शहरी बसाहट हो रही है कि समंदर की लहरों और तूफान से बचने की जो प्राकृतिक सुरक्षा थी, वह भी खत्म हो जा रही है, और सुनामी जैसी अभूतपूर्व तबाही सामने आ रही है जिससे बचाव का कोई जरिया विज्ञान और इंसानों के पास नहीं है। आज भी दुनिया के अनगिनत शहरों के सामने यह खतरा कायम है कि अगले सौ-पचास बरस में वे समंदर के बढ़ते हुए जलस्तर के मुकाबले नीचे आ जाएंगे, और वे शहर डूब जाएंगे। अब कोई शहर अगर सौ-दो सौ बरस की जिंदगी भी नहीं रखता है, तो उस शहर का रहना ही अपने आपमें खतरनाक है क्योंकि शहर रहेगा, तो आगे और बसेगा, आगे और बढ़ेगा, जबकि उसकी जिंदगी सीमित है, और अगर वैज्ञानिकों का हिसाब-किताब थोड़ा सा गड़बड़ साबित हुआ, समंदर के पानी के ऊपर जाने की रफ्तार बढ़ी तो हो सकता है कि ये शहर कुछ और पहले डूब जाएं। 

इंसान ने अपनी सोच के साथ विज्ञान से मिले औजारों को हथियारों की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, और धरती को, कुदरत को अपना गुलाम मान लिया। अब केरल की जिस पहाड़ी पर यह एयरपोर्ट बनाया गया था, क्या सचमुच वहां ऐसे मौसम में विमान को ले भी जाना चाहिए था? क्या उत्तराखंड और अगल-बगल के प्रदेशों के पहाड़ों पर चारधाम के लिए ऐसी चौड़ी फोरलेन सडक़ों को पहाड़ काटकर बनाना चाहिए? क्या नदियों के किनारे बाढ़ की जद में आने वाले इलाकों पर बसाहट करनी चाहिए? क्या समंदर के करीब तक जाकर बसाहट जरूरी है? इंसान कुदरत की बांह मरोडक़र उससे कई किस्म की रियायतें हासिल करने के इतने आदी हो गए हैं, उन्हें इतनी लत पड़ गई है कि कुदरत की विशाल विकराल ताकत के सामने उन्हें अपनी तकनीक के ज्ञान का घमंड होने लगा है। एक वक्त था जब कहा जाता था कि दुनिया की सभ्यता नदियों के किनारे विकसित हुई है। आज कम से कम हिन्दुस्तान जैसे देश को देखें तो लगता है कि नदियों के किनारे असभ्यता विकसित हो चुकी है, कानपुर जैसे औद्योगिक शहरों का अंतहीन जहर सीधे गंगा में छोड़ा जा रहा है, गंगा या बाकी किसी भी नदी के किनारे बसे हुए शहरों की रोजाना की गंदगी सीधे नदियों में छोड़ी जा रही है, और तमाम धरती का प्लास्टिक-प्रदूषण इन नदियों के पानी के साथ होकर समंदर को प्रदूषित कर रहा है। अभी-अभी एक वैज्ञानिक हिसाब सामने आया था कि कितने बरस बाद समंदर में वहां के प्राणियों से अधिक प्लास्टिक हो जाएगा। 

केरल की तो एक छोटी सी बात थी जहां से हमने लिखना शुरू किया था, लेकिन सच यह है कि कुदरत से लड़ते हुए बारिश के बीच किसी पहाड़ी एयरपोर्ट के छोटे से रनवे पर विमान उतारने का ऐसा दुस्साहस कानूनी रूप से बंद कर देना चाहिए। अधिक से अधिक क्या होता, कुछ सौ किलोमीटर के किसी सुरक्षित एयरपोर्ट पर प्लेन उतारा जाता, और वहां से लोग कुछ घंटों में अपने घर पहुंच जाते। कुदरत की ताकत, उसकी विकरालता, और उसके बेकाबू मिजाज को लेकर इंसानों को बहुत आजादी नहीं लेनी चाहिए। 

हिन्दुस्तान का सारा मौसम विज्ञान, और सारी अंतरिक्ष मौसम प्रणाली, भूकंप नापने की मशीनें, और हिन्दुस्तान के विश्व विख्यात संस्थानों के जानकार लोग मिलकर भी उत्तराखंड की तबाही का अंदाज नहीं लगा पाए थे। अब धरती को छेडऩे, कोंचने का जो काम चल रहा है, वह भी आगे-पीछे किसी दिन आत्मघाती साबित होगा। हाल के बरसों में हिन्दुस्तान में पर्यावरण तो किसी भी किस्म की प्राथमिकता से हटाकर कचरे की टोकरी में फेंक दिया गया है क्योंकि कारखानेदारों को पर्यावरण नाम की सावधानी से परहेज है। अभी-अभी पिछले कुछ महीनों में पर्यावरण के मुद्दे उठाने वाले लोगों के खिलाफ कई किस्म की कार्रवाई भी की गई है। हिन्दुस्तान को इतनी समझदारी की जरूरत है कि यह मौसम की जैसी बुरी मार से हर बरस गुजर रहा है, उसे और लापरवाह होने की इजाजत नहीं लेनी चाहिए, और अधिक चौकन्ना होना चाहिए। असम से लेकर बिहार तक जिस किस्म की बाढ़ से हर बरस देश की एक बड़ी आबादी घिर जाती है, बेदखल हो जाती है, उसे देखते हुए ही पर्यावरण को तबाह करने वाले फैसले थमना चाहिए, उन्हें पलटना चाहिए। इन बातों का केरल के कल के हादसे से अधिक लेना-देना नहीं है, सिवाय इसके कि इतनी प्रतिकूल परिस्थितियों में एयरपोर्ट बनाना, इतने प्रतिकूल मौसम में उड़ानों को जारी रखना, इतनी विकराल बाढ़ के बावजूद उसके आसपास इंसानी बसाहट करना किसी भी किस्म से समझदारी नहीं है, और यह सिलसिला खत्म करना चाहिए। लोग कुदरत और धरती दोनों को अपने अंदाज जितना ही मानकर चलते हैं, और इन दोनों ने बार-बार यह साबित किया है कि इनकी नाराजगी जब होती है, तो उसकी कोई सीमा नहीं रहती है। यह वक्त आज चारों तरफ विकास के नाम पर कुदरत और धरती के विनाश के चल रहे सिलसिले को थामने का है, वरना धरती को इससे कुछ फर्क नहीं पड़ेगा कि उस पर से कुछ करोड़ लोग घट जाएं। आज कोरोना के चलते हुए ही हो सकता है कि कुछ करोड़ लोग पॉजिटिव होकर मरें, और कई करोड़ लोग इसकी वजह से आगे चलकर दूसरी बीमारियों से मरें। हिन्दुस्तान जैसे देश को पर्यावरण को अनदेखा करके अपनी आने वाली पीढिय़ों के नाम जानलेवा खतरे की एक विरासत नहीं छोडऩी चाहिए। समझदारी की बात तो यह है कि यह धरती इंसानों को बस जीने के लिए मिली है, और इसे तबाह किए बिना अपनी अगली पीढ़ी को देने के लिए मिली है, यह धरती इंसानों की किसी पीढ़ी को तबाह करने के लिए नहीं मिली है। हिन्दुस्तान में आज ठीक यही हो रहा है, और फैसले लेने वाले नेता और अफसर बेफिक्र हैं कि जिस दिन तोहमत की नौबत आएगी, वे तो धरती पर रहेंगे नहीं।

(Daily chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 7 अगस्त 2020

 

जिन्हें जरूरत नहीं, उन्हें भी गैरजरूरी तोहफा बांटकर मुफ्तखोरी क्यों बढ़ाई जाए?

 छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले की पुलिस ने राखी के दिन लोगों को मास्क बांटने का एक रिकॉर्ड कायम किया है। और आए दिन आसानी से रिकॉर्ड का सर्टिफिकेट बांट देने वाली एक संस्था, गोल्डन बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड्स ने सीमित 6 घंटों में सबसे अधिक 12 लाख से अधिक मास्क बांटने का रिकॉर्ड रायगढ़ पुलिस के नाम दर्ज किया है। जाहिर है कि ये मास्क ढूंढ-ढूंढकर गरीब और जरूरतमंद को तो दिए नहीं गए होंगे, 6 घंटे में 12 लाख मास्क बांटने का मकसद व्यस्त जगहों पर हर किसी को मास्क दिया गया होगा। वर्ष 2011 की जनगणना में रायगढ़ जिले की आबादी 15 लाख से कम थी। इन 10 बरसों में आबादी बढ़ी भी होगी, तो भी 12 लाख मास्क बांटने के लिए जिले के आधे से अधिक लोगों को इन्हें दिया गया होगा, और 6 घंटों में जिले की आधे से अधिक आबादी कैसे कवर हुई होगी, यह एक अलग हैरानी की बात है। लेकिन इस दावे और दर्ज रिकॉर्ड को चुनौती देना हमारा मकसद नहीं है। हम तो पुलिस के ऐसे मास्क बांटने के बारे में बात करना चाहते हैं। 

राह चलते लोगों को मास्क देकर पुलिस ने उन पर एक उपकार तो किया है, यह एक अलग बात है कि पुलिस ने यह इंतजाम अपने या दूसरों के पैसों से कैसे किया होगा, और क्यों किया होगा? इन दिनों जब पुलिस की साख को चौपट करने के लिए हिंसा के एक-दो वीडियो ही देश भर में काफी होते हैं, तो छत्तीसगढ़ में पुलिस कई तरह के अच्छे काम करके अपनी छवि को बेहतर भी बनाने की कोशिश करती है, और हो सकता है कि सचमुच ही जनसेवा की उसकी नीयत हो। लोगों को याद होगा कि कई महीने पहले राजधानी रायपुर की पुलिस ने इसी तरह 15 हजार लोगों को हेलमेट बांटे थे, और उसमें खासे संपन्न लोग भी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के हाथों हेलमेट लेकर मुस्कुराते हुए तस्वीर खिंचवा रहे थे। वे हेलमेट भी जनता के बीच कारोबारी संगठनों से जुटाए गए थे जिन्होंने पुलिस के कहे एक समाजसेवा करने की नीयत से, या मजबूरी से वे हेलमेट दिए थे। 

हमारे पाठकों को याद होगा कि उस वक्त भी हमने इस बात को लेकर लिखा था कि जो लोग लाख-पचास हजार रूपए की मोटरसाइकिल पर चलते हैं लेकिन हजार रूपए से कम में मिलने वाले हेलमेट खरीदकर अपनी जान बचाने, और जुर्माने का खर्च बचाने की जिन्हें न परवाह है, न जिम्मेदारी की नीयत है, उन पर पुलिस समाज का पैसा क्यों खर्च करे? अगर पुलिस के पास इतनी ही अतिरिक्त क्षमता है, तो सोच-समझकर गैरजिम्मेदारी दिखाने वाले, और नियम तोडऩे वाले लोगों का चालान करना चाहिए, और सरकारी खजाने में जमा होने वाले उस पैसे का ट्रैफिक सुधार में या दूसरे नियमों के पालन में कोई इस्तेमाल करना चाहिए। जब सक्षम और संपन्न लोग अपनी गैरजिम्मेदारी और लापरवाही के एवज में पुलिस से तोहफा पाने लगें, तो यह तारीफ की नहीं फिक्र की बात है, कि सरकार की कोई एजेंसी ऐसा क्यों कर रही है? रायगढ़ की पुलिस ने हर आते-जाते को मास्क बांटे होंगे तभी 12 लाख से अधिक मास्क 6 घंटों में बांटे जा सके। क्या सचमुच ही इन तमाम लोगों को मास्क खरीदने की ताकत नहीं थी? और मास्क तो कोई खरीदकर भी बांधना जरूरी नहीं रहता, कोई गमछा भी बांधा जा सकता है, या गरीब लोग घर के किसी पुराने कपड़े के टुकड़े को भी बांधकर काम चला रहे हैं। 

पुलिस में ऐसे कामों के लिए, लौटते हुए मजदूरों में खाना बांटने के लिए उत्साह बहुत अधिक रहता है। पुलिस के अफसरों के कहे हुए लोग ऐसी मदद देने के लिए तैयार हो जाते हैं, और पुलिस के इलाके में लोगों को धंधा करना है, तो वे उसकी किसी बात पर आमतौर पर मना भी नहीं करते। लेकिन अपने इस दबदबे का ऐसा अंधाधुंध बेजा इस्तेमाल ठीक नहीं है। समाज में मुफ्तखोरी की आदत इतनी नहीं बढ़ जानी चाहिए कि कार-स्कूटर वाले लोग भी, काफी कमाने वाले लोग भी मुफ्त बंटते हुए सामान को लेने के लिए खड़े हो जाएं। 

हिन्दुस्तान के बहुत से शहरों में मंदिरों और दूसरे धर्मस्थलों के आसपास कई दानदाता रोज मुफ्त में खाना बांटने के लिए खड़े हो जाते हैं, और राह चलते गैरगरीब भी कतार में लग जाते हैं कि मुफ्त में मिल रहा है। इस सिलसिले के खिलाफ भी हम कई बार लिख चुके हैं कि दान के नाम पर, ईश्वर के नाम पर, प्रसाद या मदद के नाम पर हर किसी को मुफ्त खिलाना गलत सिलसिला है। यह इसलिए भी है कि दानदाताओं के पास असली जरूरतमंदों की शिनाख्त करने, वहां तक पहुंचने का कोई आसान जरिया नहीं है। इसलिए कई बार सचमुच ही लोगों की सेवा करने की हसरत वाले, और कई बार अपने किसी अपराध या पाप के बोझ से मुक्ति पाने के लिए लोग ऐसे भंडारे खोल लेते हैं, खाना बांटने लगते हैं। गैरजरूरतमंदों की ऐसी मदद उन्हें और नालायक, और निकम्मा बनाने के अलावा कुछ नहीं करती, और ऐसा खर्च करने वाले लोगों को मन में यह झूठी राहत मिलती है कि उन्होंने पुण्य का कोई काम किया है। ऐसे दानदाताओं की नजरों से दूर सचमुच के भूखे लोग भूखे रह जाते हैं, और शहर के आते-जाते लोग मोटरसाइकिलें रोक-रोककर खाने की कतार में लग जाते हैं। 

लॉकडाऊन और कोरोना जैसे खतरों के चलते हुए समाज में कई किस्म की मदद की जरूरत भी है। लेकिन यह मदद मुफ्तखोरी को बढ़ाने वाली नहीं होनी चाहिए। आधी आबादी को मास्क बांटने का मतलब यही है कि बहुत से लोग खरीदने की ताकत रखने के बावजूद या तो मास्क लगा नहीं रहे थे, या मुफ्त में मिल रहा है तो लेकर चले गए थे। न पुलिस न किसी दूसरे विभाग को ऐसे काम में पडऩा चाहिए। जो सबसे ही गरीब लोग हैं उन्होंने भी अब तक मास्क या चेहरा बांधने का कपड़़ा न होने की कोई शिकायत नहीं की है। पुलिस अगर दानदाता जुटाकर उनसे कोई काम करवा सकती है, तो वह सार्वजनिक हित के होने चाहिए, निजी गैरजरूरी मदद वाले नहीं। 

(Daily chhattisgarh)

चूंकि हवा में चारों तरफ मर्यादा पुरूषोत्तम राम का नाम है, इसलिए जज सोचें

 सुप्रीम कोर्ट के एक चर्चित वकील और सामाजिक मुद्दों को लेकर अदालत के बाहर भी खड़े दिखने वाले प्रशांत भूषण को अदालत की अवमानना में सुप्रीम कोर्ट ने कटघरे में खड़ा किया है। इसकी एक वजह तो न्यायपालिका के बारे में ट्विटर पर उनकी की गई आलोचनात्मक टिप्पणियां हैं, और दूसरी वजह मुख्य न्यायाधीश के एक महंगी विदेशी मोटरसाइकिल पर बैठी तस्वीर को न्यायपालिका का अपमान बताने वाला ट्वीट है। उनके खिलाफ 10 बरस से अधिक पुराना एक अवमानना केस और खोल लिया गया है जिसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कई जजों को भ्रष्ट बताया था, और माफी मांगने से इंकार कर दिया था। 

मौजूदा मुख्य न्यायाधीश लॉकडाऊन के वक्त नागपुर में अपने घर पर रहते हुए ऑनलाईन अदालती काम कर रहे हैं, और इसी दौरान सुबह घूमते हुए उन्हें एक महंगी विदेशी मोटरसाइकिल दिखी, तो वे उस पर सवार होकर बैठने का लालच छोड़ नहीं पाए। बाद में पता लगा कि वे अपनी वकालत के दिनों में भी एक भारी-भरकम मोटरसाइकिल चलाने के शौकीन रहे हुए हैं, और अभी जिस विदेशी मोटरसाइकिल पर वे बैठे थे, वह भाजपा के एक बड़े नेता की थी। वैसे तो सार्वजनिक जगह पर किसी मोटरसाइकिल पर बैठकर उसे देखना इतना बड़ा मुद्दा नहीं बनना चाहिए था, लेकिन उसकी तस्वीरें आकर्षक थीं, और मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक लोगों को उस पर कहने के लिए कुछ न कुछ था। कुछ को अदालतों से कोई शिकवा-शिकायत चले आ रही थी, तो कुछ को जज का ऐसी महंगी, और भाजपा नेता के बेटे की विदेशी फटफटी पर बैठना अटपटा लगा। 

अब प्रशांत भूषण की ओर से सुप्रीम कोर्ट को कहा गया है कि जो अवमानना का कानून हिन्दुस्तान में चले आ रहा है वह एक लोकतांत्रिक-संविधान के अनुकूल नहीं है। इसे लेकर अदालत में संविधान पर एक बुनियादी बहस चलनी है, और उसके तकनीकी पहलुओं पर हम यहां जाना नहीं चाहते, लेकिन इतना जरूर कहना चाहते हैं कि अदालतों के जजों को बात-बात पर अपनी अवमानना देखना बंद करना चाहिए। अपने आपको किसी टूथपेस्ट के इश्तहार के सुरक्षाचक्र के भीतर हिफाजत से रखने की सोच लोकतांत्रिक नहीं है। प्रशांत भूषण के लगाए हुए आरोपों पर अदालत ने पिछले 10 बरस से कार्रवाई रोक रखी थी, और अब उसे फिर से खोलना भी इसलिए अटपटा है कि उनकी ताजा आलोचना सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा मुख्य न्यायाधीश की है। 

लेकिन इस मुद्दे पर लिखने आज हम नहीं बैठे होते अगर कल राम मंदिर का भूमिपूजन नहीं हुआ रहता, और वह भूमिपूजन नहीं हुआ रहता अगर पिछले मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कमर कसकर रात-दिन सुनवाई चलाकर इस मामले में फैसला न दिया होता। हम जजों के ओवरटाईम के खिलाफ भी नहीं हैं, क्योंकि अदालतों में 50-50 साल से मुकदमे खड़े और पड़े हुए हैं। लेकिन कल दिन भर राम का नाम सुनते हुए और देखते हुए यह लगा कि जिस रंजन गोगोई की बेंच के सुनाए फैसले की वजह से राम को यह मंदिर नसीब हो रहा है, वह राम सुप्रीम कोर्ट के फैसलों, और उसके अपने चाल-चलन में कहां हैं? 

राम का नाम हिन्दुस्तान में बहुत सम्मान के साथ मर्यादा पुरूषोत्तम कहकर लिया जाता है। उन्होंने सार्वजनिक जीवन की मर्यादाओं को, प्रजा की अपेक्षाओं को, इतनी बारीकी से और इतनी बेरहम हद तक जाकर निभाया था कि किसी एक गैरजिम्मेदार नागरिक के उछाले हुए सवाल पर उन्होंने अपनी गर्भवती पत्नी तक को घर और राज से बाहर निकाल दिया था। रंजन गोगोई रामजन्म भूमि मामले की सुनवाई करते हुए कई हजार बार राम के बारे में सुन चुके रहे होंगे। दूसरी तरफ जब रंजन गोगोई के निजी स्टाफ की एक महिला कर्मचारी ने उन पर सेक्स-शोषण का आरोप लगाया था, तो रंजन गोगोई ने सार्वजनिक जीवन की आम मर्यादा, और देश के कानून के तहत आम जांच-नियमों को कुचलते हुए उस महिला की सुनवाई करने के लिए खुद ही जजों की बेंच में बैठना तय किया था। हमारी कानून की बहुत ही साधारण समझ यह कहती है कि उनका यह काम पूरी तरह से नाजायज था, और कानून के खिलाफ था। उनकी उस हरकत से पूरे सुप्रीम कोर्ट की इज्जत मिट्टी में मिली थी, और हिन्दुस्तान की आम महिला के मन में अपने खुद के अधिकारों के प्रति भरोसा चकनाचूर हो गया था। उस वक्त कुछ और जज रंजन गोगोई के साथ बेंच पर बैठने के लिए तैयार भी थे, बैठे भी, उन्होंने रंजन गोगोई को उम्मीदों के मुताबिक बेकसूरी का सर्टिफिकेट भी दे दिया, और दूसरी तरफ उस शिकायतकर्ता महिला की नौकरी भी बहाल कर दी। यह पूरा सिलसिला कीचड़ में मिला दिए गए पानी की तरह इतना गंदला था कि लोगों को इसके मुकाबले डबरे का कीचड़ अधिक पारदर्शी दिख रहा था। रामजन्म भूमि मामले की सुनवाई करने वाले, और अपने कार्यकाल में उस फैसले को सुना देने के लिए कसम खाकर बैठे चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने राम के चाल-चलन से पूरी तरह अछूते रहते हुए अपने खुद पर लगी सबसे बुरी तोहमत के केस में कटघरे में खड़े रहते हुए भी जज की कुर्सी पर बैठना तय किया था जो कि न्याय के सामान्य और प्राकृतिक सिद्धांतों के भी खिलाफ बात थी। 

अब ऐसी न्यायपालिका अगर अपने आपको अवमानना की फौलादी ढाल के पीछे छुपाकर, बचाकर रखना चाहती है, तो क्या यही लोकतांत्रिक न्याय व्यवस्था है? प्रशांत भूषण के मामलों की तकनीकी बहस आगे चलेगी, और उस पर हम कानूनी बारीकियों के जानकार नहीं हैं। लेकिन बहुत से ऐसे मौके रहते हैं जब कानून का कम जानकार होना कानून के प्रति एक बुनियादी और स्वाभाविक समझ में मदद करता है। हमारा मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या किसी दूसरे जज की आलोचना, उनके व्यक्तिगत चाल-चलन, उनकी संदिग्ध ईमानदारी की आलोचना किसी कोने से भी अदालत की आलोचना नहीं कही जा सकती। जज कभी न्यायपालिका नहीं हो सकते। अगर ऐसा है तो फिर मोदी देश हैं, एक समय इंदिरा देश थीं, कभी सरकार को राष्ट्र मान लेने की चूक होगी, और कभी सरकार की आलोचना को राष्ट्रविरोध करार दे दिया जाएगा। यह सिलसिला निहायत अलोकतांत्रिक है कि किसी ओहदे पर बैठे हुए व्यक्ति को ही वह ओहदा मान लिया जाए, वह संस्था मान लिया जाए। 

आज जब चारों तरफ मर्यादा पुरूषोत्तम राम की धुन बज रही है, लोग दो-तीन दिन कोरोना को भी भूलकर महज शिलान्यास और भूमिपूजन की चर्चा में डूब गए, जब पूरा देश टीवी पर मंदिर ही देखता रह गया, तो सुप्रीम कोर्ट के जजों को भी यह समझना चाहिए कि जिनके हाथों में राम राज चलाने जैसे अधिकार होते हैं, उन्हें अपना निजी जीवन किस तरह पारदर्शी रखना पड़ता है। अवमानना का पहला शिकार पारदर्शिता होती है। यह कानून लोकतंत्र के साथ कदम मिलाकर नहीं चल सकता। इसे खत्म किया जाना चाहिए, और हो सकता है कि प्रशांत भूषण के मामले की सुनवाई चलते-चलते सुप्रीम कोर्ट के जजों को किसी बोधिवृक्ष के तले बैठने जैसा कोई असर हो, और देश की न्यायपालिका पारदर्शी और लोकतांत्रिक हो सके।  

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जिन बातों की वजह से उन्हें मर्यादा-पुरूषोत्तम कहा गया, आज उन बातों को भी सोचें

अयोध्या में आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रामजन्म भूमि पर मंदिर बनाने की औपचारिक शुरुआत की है, और देश के उन तमाम हिन्दुओं के लिए यह पिछले दशकों का सबसे बड़ा मौका है जो इस जगह को रामजन्म भूमि मानते थे, और वहां मौजूद बाबरी मस्जिद, या उसका ढांचा, जो भी कहें, गिराकर भी मंदिर बनाने के हिमायती थे। अदालतों में लंबे वक्त तक मुकदमेबाजी के बाद जब सुप्रीम कोर्ट ने कमर कसी, और अब भाजपा के सांसद बने हुए जस्टिस रंजन गोगोई ने अपना कार्यकाल खत्म होने के पहले इस मामले को निपटाने का बीड़ा उठाया, तो फिर सब कुछ तेजी से चला। अदालत ने माना कि बाबरी मस्जिद को गिराना गलत था, लेकिन उसका फैसला यह रहा कि यह जमीन मंदिर ट्रस्ट को दी जाए, और मुस्लिमों को अयोध्या में कहीं मस्जिद बनाने जमीन दी जाए। इस फैसले को लेकर बहुत तरह की असहमति भी लिखी गई, इसकी कड़ी आलोचना भी की गई, और रंजन गोगोई के भाजपा की तरफ से राज्यसभा पहुंचने को भी उससे जोडक़र देखा गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट अड़े रहा, उसने किसी पुनर्विचार याचिका की कोई गुंजाइश नहीं मानी, और मंदिर अब हकीकत है। आज से मंदिर बनना शुरू भी हो गया है, और अगले आम चुनाव के पहले शायद वहां से प्रसाद मिलना शुरू हो जाएगा, और जाहिर है कि पहला लड्डू प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को हासिल होगा। 

आज जब नरेन्द्र मोदी ने यहां भूमिपूजन किया, तो यह साफ नहीं है कि मंदिर के लिए देश में रथयात्रा निकालने वाले लालकृष्ण अडवानी टीवी पर भूमिपूजन देख रहे होंगे, या वकीलों के साथ बैठे बाबरी मस्जिद गिराने के केस में अदालत में पूछे गए सवालों के जवाब तैयार कर रहे होंगे। अडवानी के साथ-साथ मुरली मनोहर जोशी, और कई दूसरे भाजपा के, हिन्दू नेताओं पर बाबरी मस्जिद गिराने का मुकदमा अभी चल ही रहा है। यह अपने आपमें भारतीय न्यायपालिका के भीतर का एक दिलचस्प पहलू है कि बाबरी मस्जिद गिराने का मुकदमा तो अभी निचली अदालत में ही चल रहा है, और उस मस्जिद के गिराने के बाद जो रास्ता खुला था, उस पर चलकर सुप्रीम कोर्ट ने भव्य मंदिर बनाने का हुक्म दिया, जिस पर अमल भी शुरू हो गया। अडवानी, जोशी, उमा भारती, कल्याण सिंह जैसे कई नेता अभी कटघरे में हैं, और जिस मंदिर के लिए अडवानी ने यात्रा निकाली, जिस यात्रा की वजह से देश में दंगे भडक़े, जिसकी वजह से बड़ी संख्या में मौतें हुईं, वह मामला अभी किसी किनारे नहीं है, उसमें कोई गुनहगार साबित भी हों, तो उनके सामने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक का इतना लंबा सफर बाकी रहेगा, कि उनकी बाकी की उम्र उसके लिए छोटी पड़ेगी। 

यह सिलसिला भारतीय लोकतंत्र और न्यायपालिका में कई किस्म के विरोधाभास उजागर करता है। मस्जिद गिराने के 25-30 बरस बाद भी ट्रायल कोर्ट का काम जारी है, और जुर्म का फैसला होने के पहले मंदिर बनना शुरू हो गया। लोकतंत्र में अदालत में एक सीमा तक ही लड़ा जा सकता है, उसके बाद अदालत के फैसले को मान लेना सबके लिए जरूरी हो जाता है, चाहे वह इंसाफ हो, या महज फैसला। देश में आबादी का अधिकतर हिस्सा ऐसा है जो जटिल मुद्दों के महज अतिसरलीकरण को ही समझ पाता है, फिर चाहे ऐसी अतिसरल व्याख्या सही हो, या न हो। फिर जब किसी जटिल मुद्दे से बहुसंख्यक आबादी का धर्म जुड़ा रहता है, जब देश में आपातकाल के दौरान भी न्यायपालिका के सरकार से प्रतिबद्ध होने की उम्मीद की जा रही थी, तो आज अगर ऐसे जटिल मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला बहुसंख्यक आबादी के साथ दिखता है, तो भी क्या किया जा सकता है। बहुसंख्यक तबके की आस्था के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब केन्द्र सरकार पर सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया पार्टी के लिए भारी सहूलियत के वक्त पर मंदिर निर्माण शुरू हुआ है, और देश की प्रमुख विपक्षी पार्टियों के पास भी इस मौके पर सिवाय राम-नाम जपने के और कुछ रह नहीं गया है। 

लोकतंत्र के हित में अब बस यही उम्मीद की जा सकती है कि धार्मिक उग्रवाद का नारा लगाने वाले लोगों के कहे हुए अब देश के दूसरे धर्मस्थलों के विवाद पर कोई समुदाय आक्रामक तरीके से काम न करे। यह बात हम भी जानते और समझते हैं कि धार्मिक उन्माद से ऐसी उम्मीद करना फिजूल की बात होती है, लेकिन फिर भी लोकतंत्र में कुछ अच्छा होने की उम्मीद पूरी तरह छोड़ देना ठीक नहीं होता, इसलिए हम उम्मीदें जारी रखते हैं। हिन्दू समाज के लिए आज का दिन बड़ा ही ऐतिहासिक दिन है, और ऐसे दिन इसके धर्मालु लोगों को मंदिर भूमिपूजन और शिलान्यास की खुशी मनाते हुए मर्यादा पुरूषोत्तम कहे जाने वाले भगवान राम के व्यक्तित्व की उन बातों पर जरूर विचार करना चाहिए जिनकी वजह से उन्हें मर्यादा-पुरूषोत्तम कहा गया है। 

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कुछ दूसरे देश कोरोना के दूसरे-तीसरे दौर भी देख रहे हैं, हम सम्हलें

हिन्दुस्तान में अभी लोग यह भी समझने को तैयार नहीं हैं कि कोरोना का कोई दूसरा दौर भी आ सकता है। बल्कि लोग तो अभी पहले दौर से भी अपने आपको अछूता मानकर चलते हैं कि यह तो दूसरों को ही हो सकती है, वे तो बहुत सावधान हैं। दुनिया के कुछ देशों ने कोरोना के दूसरे दौर को भी भुगता है, वहां इसके पांव पहले पड़े थे, और इसलिए एक बार फारिग होकर वे दुबारा इसके जाल में फंसे। जापान जैसे देश के बारे में कहा गया कि वहां के लोगों ने लंबे समय तक साफ-सफाई की सावधानी बरती, संक्रमण से बचने की कोशिश की, लेकिन आखिर में जाकर लोग सफाई की सावधानी से थक गए, और लापरवाह हो गए। अब कुछ वैसी ही खबर हांगकांग से आ रही है, जो कि उससे बढक़र है, और जिससे हिन्दुस्तान के लोगों को बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। 

हांगकांग में अभी ऐसी आशंका है कि वहां कोरोना का तीसरा दौर आ सकता है, और उस दौर में अस्पतालों की क्षमता चुक जाएगी। हांगकांग में जनवरी से ही कोरोना पहुंच गया था, लेकिन यहां मामले तेजी से नहीं बढ़े। हम यहां हांगकांग की मिसाल को लेकर बातें अधिक बारीकी से इसलिए लिख रहे हैं कि इनमें से बहुत सी बातें हिन्दुस्तान पर भी लागू हो रही है, और लोगों को, सरकारों को, समाज को यहां के बारे में भी सोच लेना चाहिए। वहां पर मार्च में संक्रमण का दूसरा दौर आया जब विदेश से छात्र और नागरिक लौटने लगे। हांगकांग एक विकसित जगह है, इसलिए वहां बाहर से आए लोगों की कलाई पर ऐसे पट्टे पहनाए गए जिससे उन पर नजर रखी जा सके, और उन्हें घर पर ही रखा गया। लेकिन अभी पिछले 9 दिनों से लगातार वहां कोरोना के सौ से अधिक मामले रोजाना दर्ज हो रहे हैं, और इसे लेकर वहां तीसरी लहर की आशंका खड़ी हो रही है। 

वहां के विशेषज्ञों का यह मानना है कि कोरोना पॉजिटिव लोगों को जब घरों में क्वारंटीन किया गया, तो उन पर तो बाहर निकलने पर रोक थी, लेकिन परिवार के दूसरे लोग बाहर आ-जा रहे थे। उनकी वजह से भी खतरा बढ़ा। फिर वहां के कुछ किस्म के कारोबार में काम करने वाले लाखों लोगों को हांगकांग आने पर टेस्टिंग और क्वारंटीन में राहत दी गई थी ताकि कारोबार चलता रह सके। इससे भी खतरा बढ़ा। एक बार नौबत खतरनाक होने के बाद अब फिर ऐसे कारोबार पर रोक लगा दी गई है। महीनों से चले आ रहे प्रतिबंधों के बाद जून में हांगकांग में सामूहिक समारोहों में 50 लोगों तक की छूट दी, और नतीजा यह हुआ कि प्रतिबंधों से थके हुए लोग दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलने लगे। 

हांगकांग और हिन्दुस्तान की स्थितियां एक जैसी नहीं है, लेकिन अलग-अलग स्थितियों के बावजूद एक-दूसरे से सीखने का तो सबके पास कुछ न कुछ रहता है। हिन्दुस्तान में प्रतिबंधों को लागू करने या छूट देने पर अमल का जिम्मा और अधिकार राज्यों का है। इसलिए यहां के राज्यों को यह समझना चाहिए कि कैसे खतरों को घटाया जा सकता है। अभी-अभी ब्रिटेन की यह खबर सामने आई है कि वहां कोरोना के दूसरे दौर की आशंका को देखते हुए पूरे देश में एक नए लॉकडाऊन की तैयारी चल रही है जिसमें 50 बरस से अधिक उम्र के दसियों लाख लोगों को घरों में ही रहने के लिए कहा जा सकता है। 50 बरस से अधिक उम्र के लोगों पर खतरा अधिक रहता है, और देश के अस्पतालों के ढांचे पर से बोझ कम करने के लिए उन्हें घरों में रखना जरूरी समझा जा सकता है। 

कुछ मामलों को लेकर हम पहले भी लिखते आए हैं, और एक बार और लिखने में कोई हर्ज नहीं है कि देश भर में जहां-जहां शराबबंदी नहीं है, वहां पर शराब की बिक्री शुरू करने से खतरा बढ़ा है। शराबियों में बड़ा अनुपात गरीबों का है जिनके झोपड़े भी छोटे हैं, वहां पर कोई शारीरिक दूरी हो नहीं सकतीं, और नशे में लौटे हुए लोग किसी नियम का क्या ख्याल रख सकते हैं? इसलिए शराब दुकानों पर अंधाधुंध धक्का-मुक्की से लेकर शराबियों के जाहिर तौर पर गैरजिम्मेदार बर्ताव को देखते हुए शराब की छूट देना केन्द्र सरकार का एक बहुत खराब फैसला रहा, और कमाई न कर पा रहे राज्यों ने इस फैसले को लपककर हाथोंहाथ लिया, और दारू की बिक्री शुरू कर दी। यह सिलसिला जानलेवा साबित हो रहा है। सरकारें अंधाधुंध खर्च को बेबस हैं, कमाई बंद है, केन्द्र सरकार जीएसटी का बकाया देने से बताया जा रहा है कि हाथ उठा चुकी है, और ऐसे में दारू ही सरकारों का एक सहारा है। लेकिन अब यह बोलने वाले लोग लगातार बढ़ते जा रहे हैं कि सरकारों की तमाम कोशिशें दारू में बह जाएंगी, और कोरोना खुशी में बोतल खोल लेगा। दूसरी चूक लॉकडाऊन के दूसरे, तीसरे, या चौथे दौर में यह हो रही है कि बाजारों में जरूरी सामानों की दुकानों को भी सीमित घंटों के लिए खोला जा रहा है जिससे उन पर भीड़ टूट पड़ रही है। कारोबार के दीवाला होने की नौबत अलग रही, हम जनता की सेहत की बात करें, तो वह भी ऐसी भीड़ की वजह से खतरे में पड़ रही है। सीमित घंटों से असीमित खतरा बढ़ रहा है। जरूरी सामानों की दुकानें, सब्जी बाजार तो काफी अधिक समय तक खोलने की जरूरत है ताकि वहां भीड़ न लगे। इन बातों को हम पहले भी लिख चुके हैं, लेकिन आज जब दूसरे देशों से कोरोना के दूसरे और तीसरे दौर की खबरें आ रही हैं, तो हिन्दुस्तान के इलाज-इंतजाम को देखते हुए यह आशंका लगती है कि प्रशासनिक चूक से, सरकार की नीतियों की चूक से कोरोना का खतरा न बढ़े। आज तो कोरोना का हमला, और स्वास्थ्य सेवा का इंतजाम एक-दूसरे से भिड़े हुए हैं। ऐसे में अगर शासन-प्रशासन के फैसलों की गलती से कोरोना को मौका मिलता है, तो महीनों से थके हुए अस्पतालों पर उसका बोझ कितना बढ़ेगा, इसका अंदाज लगाना आसान नहीं है। सरकार की कमाई जरूर मारी जाएगी, लेकिन दारू को बंद इसलिए भी करना चाहिए कि बिना मजदूरी, बिना कारोबार गरीब लोग आखिर परिवार का पेट काटकर ही दारू खरीद रहे हैं। यह सिलसिला चला, और बेरोजगारी जारी रही, तो जितने लोग कोरोना से मरेंगे, उतने ही लोग कुपोषण से भी मारे जाएंगे। भारत का इंतजाम, उसकी क्षमता कहीं से भी दूसरे और तीसरे दौर के लायक नहीं है, और ऐसे में भारत सरकार को ही देश में शराबबंदी लागू करनी चाहिए। छत्तीसगढ़ का तजुर्बा सामने है कि यहां महीने-दो महीने की दारूबंदी से भी कोई मौतें नहीं हुईं। केन्द्र सरकार ने शराब की बिक्री करने को नहीं कहा था, उसने बिक्री की छूट दी थी। यह राज्यों के अपने फैसले पर था कि वे बिक्री शुरू करते हैं या नहीं। लेकिन कोई भी राज्य ऐसा नहीं था जिसने शराब बिक्री पर रोक जारी रखी। 

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बरस के रक्षाबंधन ने किस तरह की रक्षा दी, और यह किस पर बंधन?

हिन्दुस्तान में आज राखी का त्यौहार मनाया जा रहा है जो कि एक ऐसा अनोखा त्यौहार है जिसकी जड़ें किसी धर्म में नहीं है, महज सामाजिक रिवाजों में है। दुनिया में शायद ही दूसरे देशों में ऐसा त्यौहार हो जिसमें बहन भाई की कलाई पर राखी या रेशमी डोरी बांधकर उससे अपनी सुरक्षा का वादा ले। रक्षाबंधन अपने शब्दों के मायने, और परंपरा दोनों हिसाब से यही कहता है कि बहन अपनी हिफाजत के लिए भाई को राखी बांधती है। 

अब सवाल यह है कि यह रिवाज जब बना होगा तब बना होगा, और शायद कुछ सौ साल पहले से तो इसका इतिहास भी है। लेकिन यह समाज की उस वक्त की सोच को बताने वाला रिवाज भी है कि एक लडक़ी या महिला को हिफाजत के लिए भाई की जरूरत पड़ती है। फिर चाहे आज के माहौल में भाई बहन की मदद को जाते हों या न जाते हों, मां-बाप की जायदाद में बंटवारे के लिए बहन पर हमला करते हों, जो भी हो राखी की यह सामाजिक परंपरा चली आ रही है। आज के मुद्दे से हटकर एक दूसरी बात का जिक्र यहां करना जरूरी लग रहा है कि हाल के 20-25 बरसों में जब से हिन्दूवादी आक्रामक संगठनों को पश्चिमी प्रेम की संस्कृति से अपने देश को बचाना जरूरी लगा है, तब से फ्रेंडशिप डे पर, और वेलेंटाइन डे पर बाग-बगीचों में और सार्वजनिक जगहों पर बैठे हुए लडक़े-लड़कियों को ट्वीट कर उनमें राखी बंधवाई जाती है। यानी जो लडक़ा लडक़ी के साथ रहता है, और जो उसे हिफाजत से लेकर बैठा है, उसको राखी बंधवाई जा रही है कि वह उस लडक़ी की हिफाजत करेगा। तो उसका सीधा मतलब तो यही निकलता है कि अगर उस लडक़े में ताकत हो तो ऐसे धर्मान्ध और हिंसक राष्ट्रवादी गिरोह के लोगों को वह अकेले पीट-पीटकर भगाए, क्योंकि जिसे उसकी बहन बनाया गया है, उसे वह गिरोह ही तो परेशान कर रहा है, वही उसकी बेइज्जती कर रहा है। 

लेकिन आज राखी के दिन यह सोचने की जरूरत है कि रक्षाबंधन नाम का यह शब्द तो ऐसे लोगों के लिए है जो रक्षा करते हैं, शब्द के मायने तो कहीं नहीं बताते कि भाई ही बहन की रक्षा करे, बहुत से मामलों में तो बहन भाई की मदद करती है, उसकी रक्षा करती है। दूसरी बात यह भी है कि सैकड़ों बरस पुराने इस रिवाज के पीछे जो मर्दाना सोच रही होगी, क्या आज 21वीं सदी में भी उसका सम्मान करना जरूरी है? यह शब्द समाज की सोच में इतने गहरे पैठा हुआ है कि इसमें लोगों को कोई खामी भी नहीं दिख पाती। लोगों को यह एक सामाजिक रिवाज लगता है, और इसकी किसी भी किस्म की आलोचना लोगों को हिन्दुस्तानी संस्कृति या हिन्दू धर्म का विरोध लगने लगेगी, इस रिवाज का हिन्दू धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। 

भारतीय समाज में ऐसे बहुत सारे भेदभाव से भरे हुए रिवाज चले आ रहे हैं। हिन्दुओं के बीच कुंवारी लडक़ी से 16 सोमवार के उपवास करवाए जाते हैं, ताकि उसे अच्छा पति मिले। हिन्दू धर्म में सैकड़ों बरस से चले आ रहे इस रिवाज को किसी ने बदलकर ऐसा बनाने की नहीं सोची कि लडक़े 16 सोमवार का उपवास करें ताकि वे बेहतर पति बन सकें। सुहागिन महिलाओं से करवाचौथ का व्रत करवाया जाता है, और पति की मंगलकामना करते हुए वे उपवास करती हैं, और रात में पति के चेहरे को देखकर चांद देखा मानकर फिर वे कुछ खाती हैं। आमतौर पर निर्जला व्रत का चलन है। पति चाहे साल में दो बार थाईलैंड जाकर आने वाला क्यों न हो, अपने ही देश और शहर में मौका मिलते ही इधर-उधर मुंह मारने वाला क्यों न हो, उसकी मंगलकामना के लिए, उसके लंबे जीवन के लिए, और खुद सुहागन मरने के लिए महिलाओं से करवाचौथ का व्रत करवाया जाता है। 

महिलाओं को इस किस्म की सोच का कैदी बनाए रखने के रिवाज अंतहीन हैं। हिन्दू विवाह में लडक़ी के मां-बाप लडक़ी का कन्यादान करते हैं। अच्छे-भले प्रगतिशील सोच के लोग भी इस रिवाज से टकराने की नहीं सोचते कि रिवाज में फेरबदल करने से शादी करवा रहे पंडित पटरी से न उतर जाएं। जिस वक्त दूल्हे को यह समझ आता है कि उसे दुल्हन दान में मिल रही है, तो फिर वह उस दुल्हन के साथ दहेज में चारा भी चाहता है, दान में मिली उस बछिया को बांधने के लिए एक शेड भी चाहता है। ऐसी सोच के बाद ही दान से लेकर दहेज-प्रताडऩा और दहेज-हत्या तक की नौबत आती है। 

हिन्दू और हिन्दुस्तानी समाज में महिला को नीचा दिखाने के तरीकों में कोई कमी नहीं रखी, और उसकी सोच को इस कदर कुचला कि वह बराबरी की कभी सोच भी न पाए। आबादी के एक बड़े हिस्से में बचपन से ही बच्चियों को घर का काम सीखने को कहा जाता है, और भईया, भईया तो पढऩे के लिए है, या कुर्सी पर बैठकर बहन से सामान मंगवाने के लिए है। बहुत से परिवारों में लडक़े और लड़कियों के खानपान में भी फर्क किया जाता है। छत्तीसगढ़ की एक तस्वीर को लेकर हमने कई बार इस बात को लिखा है कि गांवों की स्कूलों में लडक़े तो पालथी मारकर बैठकर दोपहर का खाना खाते हैं, लेकिन लड़कियां उकड़ू बैठकर खाती हैं। किसी ने इसके पीछे का तर्क बताया तो नहीं, लेकिन हमारा अंदाज है कि इस तरह बैठकर खाने पर लड़कियां कम खा पाती होंगी, और शायद किसी समय किसी इलाके में उनके इस तरह बैठने का रिवाज ऐसी ही सोच से शुरू हुआ होगा। क्योंकि आम हिन्दुस्तानी घरों में महिला खाने वाली आखिरी प्राणी होती है, ताकि जो बचा है उससे उसका काम चल सके बाकी तमाम लोगों को पहले पेटभर खाना मिल जाए। यह बात महिला से बढक़र परिवार की लड़कियों तक पहुंच जाती है, लेकिन पुरूष और लडक़े इससे अछूते रहते हैं। बहुत से परिवारों में लडक़े और लड़कियों के इलाज में भी फर्क किया जाता है। मुम्बई के सबसे बड़े कैंसर अस्पताल, टाटा मेमोरियल का एक सर्वे है कि वहां जिन बच्चों में कैंसर की शिनाख्त होती है, और जिन्हें आगे इलाज के लिए बुलाया जाता है, उनमें से लडक़े तो तकरीबन तमाम लाए जाते हैं, लेकिन बहुत सी लड़कियों को इलाज के लिए नहीं लाया जाता कि उनका इलाज कराने से क्या फायदा। 

हिन्दुस्तानी समाज में महिलाओं से भेदभाव की मिसालें अंतहीन हैं, और उनमें से अधिकतर तो ऐसी हैं जो 15वीं सदी में शुरू हुई होंगी, या उसके भी हजार-पांच सौ बरस पहले, और आज 21वीं सदी तक चल ही रही हैं। एक वक्त पति को खोने के बाद महिला को सती बनाया जाता था, उसे चिता पर साथ ही जिंदा जला दिया जाता था। आज भी जब वृंदावन के विधवा आश्रमों को देखें, तो समझ पड़ता है कि विधवा महिलाओं के साथ समाज का क्या सुलूक है। जिन्हें विधवा आश्रम नहीं भेजा जाता, उनको भी घर में किस तरह पीछे के कमरों में, शुभ कार्यों से दूर, दावतों से दूर कैसे रखा जा सकता है, यह हिन्दुस्तान में देखने लायक है। एक लडक़ी अपने नाम के आगे कुमारी लिखकर कौमार्य का नोटिस लगाकर चलती है, शादी होते ही वह श्रीमती होकर अपने सुहाग की घोषणा करते चलती है। लेकिन पुरूष तो श्री का श्री ही रहता है। लडक़ी या महिला के नाम के साथ पहले पिता का नाम जुड़ा होता है, अगर शादीशुदा है तो पति का नाम जुड़ा होता है। बच्चों को नौ महीने पेट में रखकर पैदा मां करती है, लेकिन जब उनके नाम के साथ सरकारी कागजात में नाम लिखाना होता है, तो बाप का नाम पूछा जाता है, वल्दियत पूछी जाती है। हाल के बरसों में लंबी अदालती लड़ाई के बाद कुछ सरकारी और कानूनी कामकाज में कागजों पर मां का नाम लिखने का भी विकल्प दिया जाने लगा है, लेकिन हकीकत में उसके लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है, और सरकारी मिजाज बाप के नाम के बिना आसानी से तसल्ली नहीं पाता।

अब सवाल यह है, और आज रक्षाबंधन के मौके पर यह सवाल अधिक जरूरी है कि सैकड़ों बरस से हिन्दुस्तानी लडक़ी और महिलाएं लडक़ों और आदमियों को राखियां बांधते आ रही हैं, और एवज में उन्हें कौन सी सुरक्षा मिली है? उनका रक्षाबंधन क्या इतनी सदियोंं में भी असरदार नहीं हो पाया? न पिता न भाई न पति, न अड़ोस-पड़ोस के दूसरे लडक़े, और न ही छेडख़ानी या बलात्कार के वक्त आसपास खड़े दूसरे लोग क्या किसी पर भी रक्षा के किसी बंधन का कोई असर नहीं हुआ? तो अगर यह रिवाज इस कदर बेअसर है, तो यह रिवाज क्यों है? क्या हिन्दुस्तानी समाज की मर्द-मानसिकता लडक़े-लड़कियों, आदमी-औरतों के बीच संबंधों को लेकर ऐसी दहशत में जीती थी कि उसने एक वर्जित-रिश्ता बनाने के लिए ऐसा रिवाज खड़ा किया जिसे आमतौर पर तमाम लोग वर्जित मानते ही हैं। यह हिन्दुस्तानी रीति-रिवाजों के और बहुत से पाखंडों की तरह एक और पाखंड बनकर रह गया है जिसके पीछे की नीयत कुछ और रहती है, और जिसे सामने कुछ और बनाकर पेश किया जाता है? रक्षाबंधन का यह सिलसिला हिन्दुस्तानी लडक़ी और महिला को कोई रक्षा तो नहीं दे पाता, उसे बंधन के लायक साबित करने का एक मजबूत रिवाज जरूर लागू करता है। भ्रूण हत्या से बचकर निकल गई कोई लडक़ी अगर जिंदा रह भी गई, तो उसे कभी भाई से रक्षा के बिना न रहने लायक साबित करो, कभी शादी की रस्म में दान के लायक मान लो, कभी उसे पति के गुजर जाने पर सती कर दो, सती करना मुमकिन नहीं रह गया है तो उसे सफेद कपड़ों में सिर मुंडाकर विधवा बनाकर मरने तक के लिए आश्रम भेज दो। इस समाज के मर्द सैकड़ों बरस से महिलाओं से राखी भी बंधवा रहे हैं, और उन्हें इसी दर्जे की रक्षा दे रहे हैं। 

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अमर सिंह के लंबे जीवन से बहुत से सबक लेने चाहिए

लंबे समय तक समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव से व्यक्तिगत रूप से जुड़े रहे, और पार्टी में आने-जाने, पार्टी की तरफ से संसद में आने-जाने वाले मौजूदा सांसद अमर सिंह कल गुजर गए। उनके जाने पर कुछ लोगों ने अफसोस भी जाहिर किया है। उनके एक वक्त के सबसे करीबी दोस्तों में से एक रहे अमिताभ बच्चन के ट्विटर पोस्ट को देखें तो उनसे कुछ कहते ही नहीं बना, और उन्होंने बस अपने झुके हुए चेहरे की तस्वीर पोस्ट कर दी थी, और आज सुबह अपने ब्लॉग पर दो लाईनें किसी फलसफे जैसी लिखी हैं। 

हमारा विश्वास एक अखबार के रूप में न श्रद्धांजलि में है, न अभिनंदन में। औपचारिकता के लिए न तो हम किसी के गुजरने पर इस अखबार के पन्नों पर उसकी स्तुति में कुछ लिखते, न ही किसी के 60 या 75 बरस के हो जाने पर उसके अभिनंदन में। लोगों का आना-जाना कुदरत का एक सिलसिला है, और उसे उससे अधिक गंभीरता से नहीं देखा जाना चाहिए। जिन लोगों को अमर सिंह की जिंदगी और उनके व्यक्तित्व के बहुत से सकारात्मक पहलू सूझ रहे हों, उन्हें भी अमर सिंह का एक सम्पूर्ण और समग्र मूल्यांकन करना चाहिए। जाने वाले लोग भी कई ऐसी बातों की मिसाल छोड़ जाते हैं कि क्या-क्या करना चाहिए, और उससे भी अधिक अहमियत इस बात की रहती है कि वे कौन सी बातों की मिसाल छोड़ जाते हैं कि क्या-क्या नहीं करना चाहिए। 

कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर अमर सिंह के बारे में लिखा है कि फिल्मी ग्लैमर, राजनीति की ताकत, और कार्पोरेट-दुनिया की दौलत, इन तीनों पर अमर सिंह की बराबरी की पकड़ थी। यह बात सही है कि उनकी पकड़ इन तीनों दायरों में थी, हिन्दुस्तान के बहुत से बड़े-बड़े कारोबारियों से उनके निजी रिश्ते थे, और राजनीति में वे जिस पार्टी में रहे, उससे परे के नेताओं तक भी उनकी पहुंच रही। कुछ ऐसे नाजुक मौके भी रहे जब संसद में कोई सरकार गिरने को थी, और अमर सिंह ने एक बहुत काबिल बिचौलिए की तरह कोई रास्ता निकाला, और सरकार को गिरने से बचाया। जब लोग अमर सिंह के बारे में अपमानजनक जुबान में बात करते थे, तो वे अपने आपको खुद होकर पॉवरब्रोकर या दलाल भी कह लेते थे। उन्हें हकीकत में इस बात का अहसास था कि वे क्या हैं। 

फिल्मी दुनिया का ग्लैमर उनके साथ ऐसा जुड़ा हुआ था कि आज उनके न रहने पर लोगों को यह याद रखना चाहिए कि अपने करीबी लोगों के बारे में कैसी बातें न सोचना चाहिए, न कहना चाहिए। अमर सिंह की टेलीफोन पर कही गईं फूहड़ और अश्लील बातों की रिकॉर्डिंग जब सामने आईं, तो उन्हें उनका प्रकाशन रोकने के लिए शायद सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा था। अमर सिंह इस बात की ठोस मिसाल हैं कि लोगों को लापरवाही से बातचीत करते हुए कैसी घटिया और गंदी बातें नहीं करना चाहिए। कैसे अपने करीबी लोगों की बेइज्जती करने वाली बातें नहीं करनी चाहिए। 

अमर सिंह की जिंदगी से सीखने का बहुत कुछ है। बहुत से लोग उन्हें देखकर और उनकी कही हुई बातों को याद करके यह भी सबक ले सकते हैं कि जिंदगी में इस किस्म के इंसान को लोगों को दोस्त क्यों नहीं बनाना चाहिए। खुद अमर सिंह के शब्दों में जिस अमिताभ बच्चन के परिवार की शादी में, शादी के कार्ड पर अमर सिंह के पूरे कुनबे का नाम घरवालों की तरह छपा था, उसी बच्चन परिवार की महिला के बारे में, बहू के बारे में, अमिताभ के बारे में अमर सिंह ने कैसी-कैसी घटिया बातें बार-बार कैमरों के सामने, सार्वजनिक रूप से नहीं कहीं? अपने दूसरे करीबी दोस्त मुलायम सिंह यादव के परिवार में फूट डालने की शोहरत अमर सिंह के नाम रही। यह तो उस परिवार का अपना सोचना होना चाहिए कि किसी के कहे वह फूटे कि न फूटे, लेकिन इस आदमी ने सार्वजनिक रूप से मुलायम-कुनबे के बारे में क्या-क्या अपमानजनक बातें नहीं कहीं, और बेटे को बाप से लड़वाने वाली बातें क्या-क्या नहीं कहीं, यह भी सोचने की जरूरत है। और हम किसी गॉसिप कॉलम में पढ़ी हुई बातें नहीं कह रहे हैं, हम खुद अमर सिंह के अनगिनत टीवी इंटरव्यू में देखी-सुनी बातों को कह रहे हैं। 

जो अमर सिंह अपनी बहुत ही करीबी फिल्म अभिनेत्री जयाप्रदा को लेकर टेलीफोन पर गंदी बातें करते रिकॉर्ड हुआ हो, जिसने बीबीसी के एक रेडियो इंटरव्यू में अमिताभ की बहू के बारे में लापरवाही से नाजायज अंदाज में बातें कही हों, वैसा दोस्त बनाने से लोगों को कैसे और क्यों बचना चाहिए, यह भी अमर सिंह की मौत के मौके पर लोगों को समझना चाहिए। 

किसी का गुजरना उसके परिवार के, करीबी लोगों के लिए तकलीफ की बात तो होती ही है लेकिन बाकी तमाम लोगों को ऐसे जाने वाले के बारे में तमाम बातों को याद करना चाहिए। भारतीय संसद और सरकार में, उत्तरप्रदेश की सरकार में, केन्द्र और राज्य दोनों जगह बहुत ही ताकतवर ओहदों पर रहने वाले मुलायम सिंह के परिवार में अमर सिंह ने जितनी ताकत भोगी है, और उसका जैसा-जैसा बेजा इस्तेमाल किया है, उसे अनदेखा करना अमर सिंह के साथ भी ज्यादती होगी। जो हिन्दुस्तान के सबसे मुंहफट लोगों में से एक रहा हो, उसे इस पर मलाल ही होगा कि उसे याद करते हुए लोग लिहाज करें। हमारा यह मानना रहता है कि जाने वाले किसी अतिरिक्त सम्मान के हकदार नहीं रहते, और अगर वे सार्वजनिक जीवन के प्रमुख व्यक्ति रहते हैं, तो वे एक खुले मूल्यांकन के हकदार जरूर रहते हैं। इसलिए अमर सिंह हमारी नजरों में एक ऐसी मिसाल बनकर गुजर गए हैं कि लोगों को कैसा-कैसा नहीं होना चाहिए, लोगों को कैसे-कैसे दोस्त नहीं बनाने चाहिए, और लोगों को अपने करीबी लोगों और परिवारों की निजी बातों को कैसे-कैसे सार्वजनिक नहीं करना चाहिए। आज के मौके पर अमर सिंह के परिवार के साथ हमदर्दी जताते हुए लोगों को उनके लंबे जीवन से ये तमाम सबक लेना चाहिए। 

(Daily chhattisgarh)

देश की सबसे बड़ी सेवाओं के लोग सबसे अधिक भ्रष्टाचार में डूबे

छत्तीसगढ़ सरकार में तैनात भारतीय वन सेवा के कुछ अफसरों की बर्खास्तगी की चर्चा ही चर्चा 10-20 बरस से चल रही है। उनके भ्रष्टाचार जंगल से लेकर शहर की आरामिलों तक हर किसी की जानकारी में हैं,  लेकिन वे हैरतअंगेज और रहस्यमय तरीके से अपने तमाम भ्रष्टाचार के साथ न सिर्फ बच जाते हैं, बल्कि दुबारा जंगल के राजा बनकर हजारों करोड़ के फंड और हजारों अरब के जंगलों को लूटते हैं। अभी भी दिल्ली और रायपुर के बीच में कुछ ऐसी फाइलें चल रही हैं जो कि कुछ सबसे बदनाम आईएफएस अफसरों को अनिवार्य सेवानिवृत्त करने की हैं, लेकिन ऐसी फाइलों पर दिल्ली से लेकर रायपुर तक, दोनों राजधानियों में मेहरबानियां ऐसे बरसती हैं कि मानो निर्मल बाबा के दरबार में सुझाई गई बातों के आधार पर कृपा बरस रही हो। अब यह तो नहीं पता कि परले दर्जे के ऐसे भ्रष्ट अफसर किस काले कुत्ते को रोटी डालते हैं, किस भूरी गाय को गुड़ खिलाते हैं, लेकिन उन पर कृपा बरसती ही रहती है, यह तय है। 

छत्तीसगढ़ सरकार में बड़े ओहदों पर बैठे तमाम लोगों को यह मालूम है कि पिछली सरकार के वक्त एसीएस रहे हुए, और बीते कल एनएमडीसी से सीएमडी के ओहदे से रिटायर हुए एन.बैजेन्द्र कुमार ने इस राज्य के सबसे भ्रष्ट आईएएस अफसरों के भ्रष्टाचार के केस देखे थे, इनमें से एक को वे बरी कर गए थे, और बाकी दो को राज्य सरकार में उन्होंने माफी नहीं मिलने दी थी। उन्होंने बार-बार कार्रवाई की फाईल दिल्ली भेजी थी, और उनका तजुर्बा था कि दो दिनों के भीतर दिल्ली से फाईल वापिस सरकार के पाले में फेंक दी जाती थी, बजाय भ्रष्ट लोगों पर कोई कार्रवाई करने के। 
छत्तीसगढ़ का वन विभाग राज्य बनने के बाद से किसी भी वक्त थोड़ा भी कम भ्रष्ट रहा हो, ऐसा किसी को याद नहीं है। विभाग का सचिव कोई भी हो, मंत्री कोई भी हो, इस संवेदनशील विभाग पर कब्जा भ्रष्ट लोगों का रहा, फिर चाहे किसी वक्त विभाग का मुखिया ईमानदार क्यों न रहा हो, विभाग तो भ्रष्ट ही लोग चलाते रहे। इस सरकार में भी मो.अकबर जैसे कड़ी पकड़ वाले मंत्री के रहते हुए हाल यह रहा कि आधे से ज्यादा फारेस्ट डिवीजन में गैरआईएफएस लोगों को तैनात किया गया, और जानकार लोगों का कहना था कि ऐसा करने वाला छत्तीसगढ़ देश में अकेला राज्य है। यह सिलसिला किसी भी कोने से मासूम नहीं कहा जा सकता क्योंकि एक-एक डिवीजन में पोस्टिंग पाने के लिए हमेशा से ही दसियों लाख रूपए का लेन-देन प्रचलन में रहा है, और वह आज भी जारी है। अब विभाग चलाने वाले लोग और राज्य चलाने वाले लोग यह देखें और तय करें कि अपात्र लोगों की ऐसी तैनाती किस दाम पर हुई थी, और वह रकम गई कहां थी। 

यह केन्द्र में मोदी सरकार का छठवां बरस चल रहा है। कहने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बड़े कडक़ प्रशासक कहे जाते हैं। लेकिन देश भर से भ्रष्ट अफसरों की फाइलें दिल्ली में जिस तरह धक्का खाती हैं, और बार-बार राज्यों को लौटकर आती हैं, वह देखने लायक है। अगर केन्द्र सरकार में बैठे हुए लोग छत्तीसगढ़ के एक आईएएस अफसर द्वारा अपने सरकारी बंगले में बनवाए गए स्वीमिंग पूल की देश भर में छपी तस्वीरों के बाद भी उस अफसर को बर्खास्त करने के लायक नहीं समझ रहे हैं, तो यह कौन सी कडक़ मोदी सरकार है? 
एक वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी ने छत्तीसगढ़ के उस वक्त के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को सलाह दी थी कि बड़े अफसर जितने कम रहें, राज्य उतना ही अच्छा चलेगा। उन्होंने रमन सिंह को प्रस्ताव दिया था कि छत्तीसगढ़ में जरूरत हो तो वे गुजरात से कुछ आईएएस और दूसरे अखिल भारतीय सेवा के अफसर भेज देते हैं। इस राज्य में आईएफएस अफसरों की अलग एसोसिएशन है, आईएएस की अलग, और आईपीएस की अलग। लेकिन इसी राज्य में पूरी जिंदगी गुजारने के बाद हमें याद नहीं पड़ता कि अपने किसी सदस्य-अफसर के खुले भ्रष्टाचार के खिलाफ एक शब्द भी इनमें से किसी ने कहा हो। ये सारी एसोसिएशन अपने सदस्यों पर हुए किसी हमले के खिलाफ सक्रिय होती हैं, और जब उनके सदस्य देश के, जनता के हितों पर हमलावर रहते हैं, तब ये सारे एसोसिएशन चैन की नींद सो जाते हैं। 

छत्तीसगढ़ सरकार अगर अपने भीतर के बड़े अफसरों के भ्रष्टाचार पर काबू नहीं करेगी, तो उनके मातहत नीचे का अमला तो भ्रष्ट रहेगा ही रहेगा। गंगोत्री से गटर का पानी बहे, तो वह हरिद्वार में निर्मल गंगाजल नहीं हो सकता। राज्य सरकार को एक कड़ा रूख अपनाना चाहिए, और अपने भ्रष्ट लोगों को हटाना चाहिए। इसके बिना इस प्रदेश का हाल पिछले बीस बरस में सब देख ही रहे हैं कि किस तरह इसे लूटा जाता रहा है। 

यह हाल महज इसी प्रदेश में नहीं है, देश की सबसे बड़ी सेवाओं के लोग  गले-गले तक भ्रष्टाचार में डूबे रहते हैं, और केन्द्र की, राज्य की किसी भी कार्रवाई से बचे भी रहते हैं। छत्तीसगढ़ के कुछ अफसरों की जमीन-जायदाद की लिस्ट अगर देखें तो लगता है कि सामाजिक अन्याय का शिकार होने के बावजूद वे इसी राज्य में राज करते हुए 21वीं सदी के जमींदार हो गए हैं।   

(Daily chhattisgarh)

बात की बात, 1 अगस्त 2020



दीवारों पर लिक्खा है, 1 अगस्त 2020


अपने सिर पर सवार हुए पूर्वाग्रह अपडेट भी करें

हिन्दुस्तान में किसी भी विवाद की चर्चा हो, और उसे धर्म और जाति से अलग रख दिया जाए, ऐसा मुश्किल से ही होता है। लोग इलाज में गड़बड़ी होने से तुरंत ही आरक्षण के फायदे से मेडिकल कॉलेज दाखिला पाने वाले लोगों की जात पर उतर आते हैं। सरकारी दफ्तरों में अगर कोई अफसर रिश्वत कम मांगते हैं, तो इसे लोग उनकी नीची समझी जाने वाली जात का असर बताते हैं कि पांच-पांच सौ रूपए ले लेता है। मानो ऊंची समझी जाने वाली जात का अफसर उसी काम के पांच हजार लेता तो बेहतर होता। लोग आरक्षण के खिलाफ बहस में खुलकर कहते हैं कि क्या किसी कोटे से डॉक्टर बनने वाले से अपना इलाज कराओगे? और आज दिल्ली की खबर है कि सबसे ऊंची समझी जाने वाली जाति का एक डॉक्टर जिसका नाम भी देवताओं के इन्द्र के नाम पर था, वह गरीबों का अपहरण करता था, किडनी निकालकर बेच देता था, और लाशों को मगरमच्छ को खिला देता था। हर दस दिन में ऐसी एक हत्या करते-करते वह सौ लोगों को मार चुका था, फिर गिनती गिनना बंद कर दिया था। ठीक भी है, किसी भी बात का शतक पूरा हो जाने के बाद उसे गिनना बंद कर देना चाहिए। सौ बरस के हो जाएं तो उसके बाद केक क्या काटना। 

अब सवाल यह है कि धर्म और जाति को लेकर हिन्दुस्तान में लोगों के मन में बैठे हुए पूर्वाग्रह इतने पुख्ता और इतने हिंसक हैं कि अपनी जाति, अपने धर्म से परे के लोगों के गुनाह उन्हें आसमान पर चमकते दिखते हैं। और अपनी जाति के लोगों के गुनाह उन्हें जाति व्यवस्था के तहत जायज लगते हैं। यह समाज धर्म के आधार पर, जाति के आधार पर टुकड़े-टुकड़े हो चुका है। बहुत से शहरों में बहुत सी कॉलोनियों में, या रिहायशी इमारतों में, या मुहल्लों में कुछ धर्म के लोगों, कुछ जाति के लोगों को न किराए पर रहने दिया जाता, न ही उन्हें मकान खरीदने दिए जाते। बहुत सारे ऐसे लोग हैं जिन्हें नाम बदलकर मकान किराए पर लेना पड़ता है। कहने के लिए यह देश धर्मनिरपेक्ष है, और हिन्दुस्तान की गौरवगाथा का जब बखान करना होता है, तो लोग इसे 15 अगस्त और 26 जनवरी को विविधता में एकता वाला देश करार देते हैं। लेकिन साल के बाकी 363 दिन दूसरे धर्म, और दूसरी जाति को परहेज में जुट जाते हैं। हाल के महीनों में जब कोरोना की दहशत फैली, तो कई राज्यों में फल के ठेलों तक पर लोगों ने एक धर्म के बैनर लगा दिए कि यह हिन्दू फलवाले की दुकान है। दूसरी तरफ बहुत से शहरों में ऐसे खुले फतवे जारी किए गए, हिन्दुस्तान का सोशल मीडिया नफरत के फतवों से पट गया कि किसी मुस्लिम से कोई सामान न खरीदें। लेकिन देश-प्रदेशों की सरकारों ने इस पर कोई कार्रवाई की हो, ऐसा अधिक सुनाई नहीं पड़ा। ऐसे लाखों पोस्ट किए गए, लेकिन शायद ही कहीं किसी पर जुर्म कायम हुआ होगा, जबकि साइबर जुर्म में सुबूत तो अपने आप दर्ज होते चलते हैं, किसी गवाह की जरूरत नहीं रहती है। 

उत्तरप्रदेश में हाल ही में विकास दुबे नाम के एक बहुत कुख्यात कहे जाने वाले पुराने मुजरिम को पुलिस ने एक कथित मुठभेड़ में मार गिराया। उसने इसके ठीक पहले अपने घर पहुंचे पुलिसवालों में से 8 को मार डाला था। विकास दुबे के साथ जुर्म के कारोबार में जितने लोग लगे थे, कुछ को पुलिस ने मारा, कुछ को गिरफ्तार किया, और बिना किसी अपवाद के ये सारे लोग एक ही जाति के थे। अब जुर्म में भी एक ही जाति के लोगों का ऐसा गिरोह बना, यह जुर्म के भीतर अपनी जाति से लगाव का मामला कहें, या फिर क्या कहें? हिन्दुस्तान में और भी कई जगहों पर दूसरे धर्म और दूसरी जातियों की जुर्म के लिए ऐसी एकजुटता दिखती है, लेकिन लोगों को दूसरे धर्म, दूसरी जाति के जुर्म ही दिखते हैं, अपने खुद के नहीं दिखते। 
लोगों की सोच को तो एकदम से एक-दो सदी में बदला नहीं जा सकता, लेकिन हिन्दुस्तान जैसे लोकतांत्रिक देश में जब धर्म और जाति की व्यवस्था के तहत लोग दूसरे धर्म और दूसरी जाति के खिलाफ हिंसा के फतवे जारी करते हैं, तो उनके ट्विटर या फेसबुक खाते बंद करवाना काफी नहीं है, उन्हें उनके बदन को भी जेल में बंद करना जरूरी है। 

जिन लोगों को सरकारी दामाद, पठान, चमार, आदिवासी, पिछड़े जैसे शब्दों की गालियां बनाना अच्छा लगता है, उन लोगों को देश के बड़े-बड़े जुर्म में लगे हुए लोगों के धर्म, और उनकी जाति जरूर देखनी चाहिए। गांधी का हत्यारा किस जाति का था, इंदिरा का हत्यारा किस जाति का था, देश का सबसे बड़ा शेयर घोटाला करने वाला किस जाति का था, देश का सबसे बड़ा बैंक लुटेरा किस जाति का था, और आज का यह ताजा मामला सामने है, जिन लोगों को रिजर्वेशन की बदौलत डॉक्टर या इंजीनियर बनने मिलता है, और फिर उनसे ऑपरेशन कराने में जिनका भरोसा नहीं बैठता, या जिनके बनाए हुए पुल गिर जाने का डर जिन्हें लगता है, उन लोगों को देश के बड़े-बड़े जुर्म करने वाले डॉक्टर, और बड़े-बड़े भ्रष्टाचार के निर्माण करने वाले इंजीनियरों के जाति-धर्म भी देखने चाहिए, हो सकता है कि हकीकत उनको पूर्वाग्रह के अपने बोझ से छुटकारा पाने में मदद करे। यह बात तो हिन्दुस्तान में एक बुनियादी सच है ही कि कुछ धर्मों और कुछ जातियों की ताकत इतनी होती है कि उनके मुजरिम बचते ही चले जाते हैं, पुलिस से भी, और अदालतों से भी। इसलिए ताकतवर समझे जाने वाले धर्म, और ऊंची समझी जाने वाली जातियों के लोगों को उनके साथ बेइंसाफी होने का तो खतरा रहता नहीं है। अब इसे तमाम लोग इतना ही करते चलें कि बड़े-बड़े जुर्म के साथ सामने आने वाले मुजरिमों के नाम और उपनाम भी देखते चलें, और अपने सिर पर सवार पूर्वाग्रहों को अपडेट भी करते रहें। पिछले दिनों जब उत्तरप्रदेश पुलिस के हाथों विकास दुबे नाम का वहां का एक बड़ा मुजरिम मारा गया तो सोशल मीडिया पर जिस तरह एक जातिवादी उन्माद से भरे हुए पोस्ट किए गए थे उन पर देश के जिम्मेदार मीडिया ने लेख भी लिखे थे, और उनकी दर्जनों मिसालें भी दी थीं। जब जाति का उन्माद सिर पर ऐसा सवार हो कि अपनी जाति के माफिया सरगना पर शर्म आने के बजाय उस पर गर्व होने लगे, तो ऐसी नौबत फिक्र का सामान तो है ही।  https://dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=48654&path_article=18

(Daily chhattisgarh)

बात की बात, 31 जुलाई 2020


दीवारों पर लिक्खा है, 31 जुलाई 2020


दीवारों पर लिक्खा है, 30 जुलाई 2020


फ्रेंच इंजीनियरों को पता ही नहीं था कि वे रफाल की शक्ल में बना चुके हैं भारत के लिए वियाग्रा...

अमिताभ बच्चन के लिखे एक-एक शब्द करोड़ों बार दुहराए जाते हैं। वे 25 शब्दों का ट्वीट करते हैं, तो वह हिन्दुस्तान के हर अखबार, हर टीवी चैनल, और हर समाचार पोर्टल पर खबर बन जाता है। प्रकृति ने कहीं-कहीं आवाज गूंजने वाली जगहें बनाई हैं, कहीं पहाड़ से, तो कहीं गुफा में लोग कुछ बोलकर अपनी ही आवाज वापिस सुन लेते हैं। अमिताभ बच्चन की पूरी जिंदगी ही ऐसी हो गई है कि आधी रात वे कुछ ट्वीट करें, और अगली सुबह तमाम अखबार उसमें काफी कुछ जोड़-घटाकर उसकी बड़ी सी खबर ले लें। टीवी चैनल एक-एक ट्वीट पर टूट पड़ते हैं, और कई मिनटों का एयरटाईम उसी को समर्पित हो जाता है। शोहरत लोगों को इतनी अहमियत दिला देती है कि उनके एक-एक शब्द बहुत मायने रखते हैं। विराट कोहली जैसे मशहूर क्रिकेटर, या प्रियंका चोपड़ा जैसी मशहूर एक्ट्रेस के बारे में चर्चा रहती है कि वे इंस्टाग्राम पर एक-एक पोस्ट के लिए करोड़ रूपए से अधिक पाते हैं। अब ऐसी खबरों की हकीकत तो महज ऐसे सितारे, या आयकर विभाग बता सकते हैं, लेकिन चर्चा तो ऐसी ही रहती है। 

अब आज अमिताभ बच्चन की खबरों के सैलाब के बीच इस मुद्दे पर लिखा क्यों जा रहा है, यह भी एक सवाल है। और इसका जवाब यह है कि अमिताभ बच्चन की तंगदिली से, सामाजिक सराकारों से कोई वास्ता न रखने जैसी उनकी खामियों के बीच भी उनके व्यक्तित्व और उनकी जिंदगी की एक बात ऐसी है जिससे तमाम लोग काफी कुछ सीख सकते हैं। आज की पीढ़ी को शायद यह याद नहीं होगा कि कुछ दशक पहले अमिताभ बच्चन ने फिल्मों में काम करने से परे मनोरंजन उद्योग  का कारोबार शुरू किया था, और उसमें वे लंबे घाटे में चले गए थे, डूब गए थे। किसी एक इंटरव्यू में उन्होंने बतलाया था कि कर्ज से उस दौर में फिल्म उद्योग के ही दूसरे लोग अपनी वसूली के लिए अमिताभ के पास लोग भेजकर उन्हें किस तरह बेइज्जत करते थे। लेकिन उस पूरे दौर में दो बातें अमिताभ के साथ रहीं, और जो किसी को भी कैसी भी मुसीबत से उबरने में मदद कर सकती हैं। अमिताभ ने हिम्मत नहीं छोड़ी, मेहनत नहीं छोड़ी, वे लगातार संघर्ष करते रहे, और आज भी फिल्म उद्योग में सबसे अधिक मेहनत करने वाले लोगों में से वे एक हैं, रात 3 बजे, 4 बजे वे किसी रिकॉर्डिंग या शूटिंग से लौटते हुए भी ट्वीट करते हैं, लौटकर ब्लॉग लिखते हैं। यह तो हुई एक बात, और दूसरी बात यह कि मुसीबत के उस दौर में हिन्दुस्तान के कुछ ताकतवर लोग उनके करीबी दोस्त थे, उनके साथ थे, और ऐसी चर्चा है कि उन्होंने कर्ज से उबरने में अमिताभ की मदद की थी। 

जो भी हो, कम से कम अमिताभ बच्चन किसी जुर्म की कमाई से कर्ज से नहीं उबरे थे, और उन्होंने कर्ज चुकाने के बाद लगातार शोहरत और कामयाबी के नए रिकॉर्ड कायम किए, और वन मैन आर्मी की तरह वे लगातार आगे बढ़ते चले गए। इस किस्से को सुनाने का एक मकसद यह है कि जो लोग आज कर्ज में डूब गए हैं, परेशानी में फंसे हैं, जिन्हें रौशनी की कोई किरण नहीं दिख रही है, उन्हें भी अमिताभ का उबरना देखना चाहिए। वे हिन्दुस्तान की एक सबसे बड़ी मिसाल हैं कि सबसे बुरे हालात से उबरकर कैसे आसमान पर पहुंचा जाता है। लेकिन उनके उबरने में, जैसी कि चर्चा है, अगर उनके कुछ बहुत ताकतवर और अतिसंपन्न दोस्त उनके मददगार रहे, तो लोगों को जिंदगी में इस बात का ख्याल भी रखना चाहिए। वैसे तो आदर्श स्थिति यह है कि दोस्ती बिना मतलबपरस्ती के होना चाहिए, लेकिन हकीकत यह है कि दोस्तों में कम से कम कुछ तो ऐसे रहें जो कि आड़े वक्त पर आकर खड़े रह सकें, किसी काम आ सकें। सोच-समझकर किसी संपन्न से किसी मकसद से दोस्ती नहीं की जा सकती। लेकिन आसपास अपने दोस्तों को छोटी-छोटी परेशानियों के वक्त छोटी-छोटी बातों के लिए कसौटी पर कस लेना चाहिए कि क्या आड़े वक्त पर वे साथ खड़े रहेंगे? और बात महज पैसों की मदद की नहीं होती है, हौसले की भी होती है, और खराब वक्त में सार्वजनिक रूप से साथ देने की भी होती है। अधिकतर लोग इस खुशफहमी में जीते हैं कि उनके दोस्त इतने भरोसेमंद हैं कि जरूरत पडऩे पर वे उनके लिए अपनी जान भी दे देंगे, लेकिन जिनसे किडनी पाने की उम्मीद रखी जाती है, वे वक्त पर एक दिन के अपनी कार भी देने से परहेज करते हैं। इसलिए जिंदगी में इस बात के लिए भी तैयार रहना चाहिए कि अपने आसपास के लोगों को तौल लिया जाए कि बुरे वक्त वे कितना कंधा देने तैयार रहेंगे। बहुत पहले एक बार इसी पन्ने पर हमने लिखा था कि लोगों को दो चक्कों वाली एक अर्थी, या जनाजा, बनवाकर रखना चाहिए, ताकि चार लोग न जुटें, तो दो ही लोग उसे धकेलकर ले जा सकें। लोगों को ऐसी नौबत के खतरे को अनदेखा नहीं करना चाहिए, और उसके लिए तैयार भी रहना चाहिए। 

इन दोनों बातों को मिला लें तो कुल मिलाकर बात यह बनती है कि दिन चाहे कितने ही खराब आ जाएं, हौसला नहीं छोडऩा चाहिए, उससे उबरना नामुमकिन नहीं मानना चाहिए। अंग्रेजी के शब्द इम्पॉसिबल के अंग्रेजी हिज्जों को तोडक़र ही एक दूसरा शब्द बनता है आई एम पॉसिबल। और इसकी एक बड़ी शानदार और अच्छी मिसाल अमिताभ बच्चन हैं। लेकिन ऐसी दूसरी भी बहुत सी मिसालें हैं जिन्हें लोगों ने दोनों पैर खो दिए, और दोनों नकली पैरों के साथ जो एवरेस्ट पर पहुंचे। ऐसे लोग जिनकी आंखें नहीं थीं, वे भी एवरेस्ट पर पहुंचे। कहीं कोई अकेली लडक़ी या महिला दुनिया के कई समंदर चीरते हुए एक बोट पर अकेले ही आधी दुनिया पार कर लेती है। ऐसे बहुत से असल जिंदगी के किस्से हैं, जो खालिस हकीकत हैं, और जो मुसीबत में फंसे लोगों को एक बढिय़ा रास्ता भी दिखाते हैं। अमिताभ बच्चन की बात चल रही है इसलिए यह भी याद करना ठीक होगा कि जिस वक्त वे मुंबई के फिल्म उद्योग में आए थे, उन्हें उनकी बहुत अधिक लंबाई के बारे में कहा गया था कि वे नीचे से पैर एक फीट कटाकर आएं। कोई उन्हें फिल्म देने तैयार नहीं थे। और आज उनकी हालत यह है कि हिन्दुस्तान के गहनों के सबसे बड़े ब्रांड की मॉडलिंग करके वे गहने बिकवाते हैं, और हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी गिरवी रखने वाली कंपनी की मॉडलिंग करके सोने के गहने गिरवी भी रखवाते हैं। फिल्मों की कामयाबी, टीवी की शोहरत, मॉडलिंग और ब्रांड प्रमोशन के अलावा वे पता नहीं क्या-क्या करते हैं, और कैसे-कैसे कितना-कितना कमाते हैं। लेकिन यह याद रखने की जरूरत है कि एक फिल्म की शूटिंग के दौरान जख्मी होकर वे मौत के मुंह में जा चुके थे, और वहां से लौटकर आए थे। उन्हें पिछले दस-बीस बरस से एक बहुत गंभीर बीमारी चले आ रही है, और वे उसके साथ ही एक उद्योग की तरह रात-दिन काम करते रहते हैं। इसलिए महज दोस्तों से कुछ नहीं होता, महज संपन्न दोस्तों से कुछ नहीं होता, खुद का हौसला भी रहना जरूरी होता है, खुद मेहनत भी करनी होती है, और बुरे वक्त के लायक तैयार भी रहना होता है। यह बात हम आज इसलिए लिख रहे हैं कि आज चारों तरफ आम से काफी अधिक गिनती में आत्महत्याएं हो रही हैं, लोगों को ऐसा लगता है कि तकलीफ और दहशत के इस दौर में खुदकुशी बढ़ भी सकती है। लोगों को हौसला रखना चाहिए, और हो सके तो अपनी दीवारों पर उन लोगों की तस्वीरें चिपाककर रखनी चाहिए जिन्होंने दोनों नकली पैरों के साथ एवरेस्ट पर फतह हासिल की है। 

(Daily chhattisgarh)

लापरवाह लोगों के साथ सरकारी नरमी किसलिए?

हिन्दुस्तान में कोरोना का जो हाल चल रहा है, वह  बहुत फिक्र पैदा करता है। कई प्रदेशों में अस्पतालों में जगह नहीं बची है, तो बड़े-बड़े स्टेडियमों में पलंग लगाकर कोरोना वार्ड बना दिए गए हैं। मौतें बहुत रफ्तार से इस देश में आगे नहीं बढ़ रही हैं, इसलिए लोग बेफिक्र हैं। यह एक अलग बात है कि पिछले चौबीस घंटों में 52 हजार से अधिक लोग पॉजिटिव निकले हैं, और दो सौ से अधिक मौतें भी हुई हैं। 

देश में झारखंड ने मास्क न लगाने वालों पर एक लाख रूपए जुर्माना लगाया है। इसके पहले सबसे बड़ा जुर्माना केरल ने 10 हजार रूपए का लगाया था। इनसे परे देखें तो छत्तीसगढ़ जैसे बहुत से राज्य सौ-दो सौ रूपए का जुर्माना लगा रहे हैं जिसे लोग मजाक बनाकर चल रहे हैं। यह भी खबर सामने आ रही हैं कि किस तरह बड़े अफसर, मंत्री और विधायक, सांसदों से लेकर पार्षदों तक राजनीति के लोग लापरवाही दिखा रहे हैं। उनके आसार गड़बड़ दिख रहे हैं, लेकिन वे कोरोना टेस्ट के लिए नमूना देने के बाद घर बैठने के बजाय जनसंपर्क कर रहे हैं। 

कहने के लिए तो महामारी का कानून बड़ा कड़ा है, और जानकारी छुपाने वालों के लिए सजा है, लापरवाही बरतने वालों के लिए भी सजा है। लेकिन सरकार में बैठे छोटे-छोटे कर्मचारियों, और पुलिस कर्मचारियों की इतनी हिम्मत कहां हो सकती है कि वे ताकतवर नेताओं और बड़े अफसरों के बारे में किसी कार्रवाई की सोच भी सकें। छत्तीसगढ़ में ताजा-ताजा मिसाल वन विभाग के एक सबसे छोटे कर्मचारी वनरक्षक की है जिसने अपने खासे बड़े अफसर को बांस की अवैध कटाई करते पकडक़र जुर्म दर्ज कर लिया था, अब उसी के खिलाफ कार्रवाई हो रही है। महामारी का खतरा और हिन्दुस्तान में छत्तीसगढ़ किस्म के दर्जनों राज्यों में राजनीतिक दबदबा मेल नहीं खा रहे हैं। महामारी से लापरवाह लोग अकेले नहीं बच सकते, वे औरों को साथ लेकर डूबते हैं, और अपने आसपास हम रात-दिन देखते हैं कि लोग किस तरह गैरजिम्मेदार हैं। 

यह सिलसिला बहुत खतरनाक इसलिए है कि इसमें बेकसूर मारे जाएंगे, ठीक उसी तरह जिस तरह कि सडक़ पर नशे में कोई ड्राईवर गाड़ी चलाए, और बाकी लोगों की जिंदगी भी खतरे में आ जाए। आज एक-एक कोरोना पॉजिटिव निकलने पर जिस तरह सैकड़ों लोगों के काम छिन जा रहे हैं, लोग बेरोजगार हो जा रहे हैं, लॉकडाऊन फिर से लागू हो रहा है, उससे करे कोई, भरे कोई की नौबत आ रही है। जो लोग सरकारी तनख्वाह वाले हैं, या कमाई वाले कारोबारी हैं, उनको तो जिंदा रहने में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन बार-बार होते लॉकडाऊन की वजह से असंगठित कर्मचारी, तकरीबन तमाम मजदूर, और फेरीवाले, खोमचेवाले, छोटे-छोटे कारोबारी भूखे मरने की नौबत में हैं। कम से कम इन लोगों को देखते हुए सरकार को महामारी के प्रतिबंध बहुत कड़ाई से लागू करना चाहिए। छत्तीसगढ़ लॉकडाऊन के एक और दौर से गुजर रहा है, रोज सैकड़ों कोरोना पॉजिटिव की लिस्ट देखें, तो किसी भी दिन आधा दर्जन से कम पुलिसवाले, और आधा दर्जन से कम स्वास्थ्य कर्मचारी उसमें नहीं रहते। और ये अधिकतर स्वास्थ्य कर्मचारी सरकारी अस्पतालों के हैं। बहुत से सफाई कर्मचारी कोरोना पॉजिटिव निकल रहे हैं। ये सारे के सारे लोग जनसुविधाओं का काम करते हुए अपनी जान जोखिम  में डाल रहे हैं। देश-प्रदेश में नियम और प्रतिबंध न होना खतरनाक होता है, लेकिन होने के बाद भी उनको लागू न करना, उन पर अमल न होना और भी खतरनाक होता है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य इसी लापरवाही और अनदेखी के शिकार हैं कि यहां हजारों लोग राजधानी में ही बिना मास्क घूम रहे हैं, और खतरा झेलकर पुलिस सडक़ों पर तैनात है, सफाई कर्मचारी से लेकर स्वास्थ्य कर्मचारी तक अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर काम कर रहे हैं। लोग इस नौबत के खतरे को भी नहीं समझ रहे हैं कि कोरोना पॉजिटिव का आसार दिखने पर जांच होने में वक्त लग रहा है, और फिर रिपोर्ट आने में कई दिन लग रहे हैं। इसके बाद राजधानी में हाल यह है कि कोरोना पॉजिटिव घर बैठे एम्बुलेंस की राह देखते हैं जो तीन-चार दिनों तक नहीं आ पा रही है। इसके पीछे सरकारी विभागों में तालमेल की कमी है, या एम्बुलेंस की कमी है, इसे तो सरकार ही जाने, लेकिन ऐसी नौबत की सोच तक लोगों को अपने-आपको खतरे से दूर रखना चाहिए, लेकिन ऐसी कोई नीयत लोगों की दिख नहीं रही है। 

अधिकतर लोग इस खुशफहमी में जीने वाले हैं कि खाली चम्मच पीटने से और शंख बजाने से कोरोना मर जाएगा, जबकि ऐसा पाखंड फर्जी साबित हो चुका है। इसके बाद तरह-तरह के दूसरे पाखंड इस्तेमाल हो रहे हैं। पिछले चार दिनों से देश इसमें डूबा है कि मानो नए आए लड़ाकू विमान रफाल से बम गिराकर कोरोना का मार दिया जाएगा। जब लोगों की वैज्ञानिक सोच ही खत्म हो जाती है, तो वे किसी भी पाखंड पर भरोसा करने लगते हैं, और वैज्ञानिक तर्कों को तेजी से खारिज करने लगते हैं, क्योंकि वैज्ञानिक बातों पर भरोसा करने का एक मतलब दिमाग पर जोर देना भी होता है, और जिम्मेदार बनना भी। भला कौन जिम्मेदार बनना चाहते हैं जब तरह-तरह के नारों से काम चल रहा है। 

पॉजिटिव निकलने के बाद मौतें कम होने से लोग कोरोना से तो कम मर रहे हैं, लेकिन भुखमरी और बेरोजगारी से अधिक लोग मर रहे हैं, लॉकडाऊन के तनाव में आत्महत्याएं बढ़ती जा रही हैं, और गरीबी से लोग कुपोषण के शिकार होकर भी मरने वाले हैं जो कि सरकारी रिकॉर्ड में नहीं आएंगे। ऐसी नौबत में सरकार को चाहिए कि वह लापरवाह और गैरजिम्मेदार लोगों पर कड़ी कार्रवाई करे, ताकि कुछ लोगों को समझ आ सके। आज गैरजिम्मेदार लोगों के लिए मैदानी सरकारी अमला अपनी जान देते जुटा हुआ है, और ऐसे गैरजिम्मेदार लोग ऐसी सरकारी सेवा पाने के हकदार नहीं हैं। जिन लोगों को अपने पैसों का अधिक गुरूर है उन पर झारखंड की तरह लाख रूपए का जुर्माना न सही, केरल की तरह दस हजार रूपए का जुर्माना तो लगाना ही चाहिए। 

(Daily chhattisgarh)

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का काँव-काँव, 28 जुलाई


दीवारों पर लिक्खा है, 28 जुलाई


बाबा-ब्रांड साजिश जिन्हें दिखती नहीं, उनके लिए..

अमिताभ बच्चन के लिखे एक-एक शब्द करोड़ों बार दुहराए जाते हैं। वे 25 शब्दों का ट्वीट करते हैं, तो वह हिन्दुस्तान के हर अखबार, हर टीवी चैनल, और हर समाचार पोर्टल पर खबर बन जाता है। प्रकृति ने कहीं-कहीं आवाज गूंजने वाली जगहें बनाई हैं, कहीं पहाड़ से, तो कहीं गुफा में लोग कुछ बोलकर अपनी ही आवाज वापिस सुन लेते हैं। अमिताभ बच्चन की पूरी जिंदगी ही ऐसी हो गई है कि आधी रात वे कुछ ट्वीट करें, और अगली सुबह तमाम अखबार उसमें काफी कुछ जोड़-घटाकर उसकी बड़ी सी खबर ले लें। टीवी चैनल एक-एक ट्वीट पर टूट पड़ते हैं, और कई मिनटों का एयरटाईम उसी को समर्पित हो जाता है। शोहरत लोगों को इतनी अहमियत दिला देती है कि उनके एक-एक शब्द बहुत मायने रखते हैं। विराट कोहली जैसे मशहूर क्रिकेटर, या प्रियंका चोपड़ा जैसी मशहूर एक्ट्रेस के बारे में चर्चा रहती है कि वे इंस्टाग्राम पर एक-एक पोस्ट के लिए करोड़ रूपए से अधिक पाते हैं। अब ऐसी खबरों की हकीकत तो महज ऐसे सितारे, या आयकर विभाग बता सकते हैं, लेकिन चर्चा तो ऐसी ही रहती है। 

अब आज अमिताभ बच्चन की खबरों के सैलाब के बीच इस मुद्दे पर लिखा क्यों जा रहा है, यह भी एक सवाल है। और इसका जवाब यह है कि अमिताभ बच्चन की तंगदिली से, सामाजिक सराकारों से कोई वास्ता न रखने जैसी उनकी खामियों के बीच भी उनके व्यक्तित्व और उनकी जिंदगी की एक बात ऐसी है जिससे तमाम लोग काफी कुछ सीख सकते हैं। आज की पीढ़ी को शायद यह याद नहीं होगा कि कुछ दशक पहले अमिताभ बच्चन ने फिल्मों में काम करने से परे मनोरंजन उद्योग  का कारोबार शुरू किया था, और उसमें वे लंबे घाटे में चले गए थे, डूब गए थे। किसी एक इंटरव्यू में उन्होंने बतलाया था कि कर्ज से उस दौर में फिल्म उद्योग के ही दूसरे लोग अपनी वसूली के लिए अमिताभ के पास लोग भेजकर उन्हें किस तरह बेइज्जत करते थे। लेकिन उस पूरे दौर में दो बातें अमिताभ के साथ रहीं, और जो किसी को भी कैसी भी मुसीबत से उबरने में मदद कर सकती हैं। अमिताभ ने हिम्मत नहीं छोड़ी, मेहनत नहीं छोड़ी, वे लगातार संघर्ष करते रहे, और आज भी फिल्म उद्योग में सबसे अधिक मेहनत करने वाले लोगों में से वे एक हैं, रात 3 बजे, 4 बजे वे किसी रिकॉर्डिंग या शूटिंग से लौटते हुए भी ट्वीट करते हैं, लौटकर ब्लॉग लिखते हैं। यह तो हुई एक बात, और दूसरी बात यह कि मुसीबत के उस दौर में हिन्दुस्तान के कुछ ताकतवर लोग उनके करीबी दोस्त थे, उनके साथ थे, और ऐसी चर्चा है कि उन्होंने कर्ज से उबरने में अमिताभ की मदद की थी। 

जो भी हो, कम से कम अमिताभ बच्चन किसी जुर्म की कमाई से कर्ज से नहीं उबरे थे, और उन्होंने कर्ज चुकाने के बाद लगातार शोहरत और कामयाबी के नए रिकॉर्ड कायम किए, और वन मैन आर्मी की तरह वे लगातार आगे बढ़ते चले गए। इस किस्से को सुनाने का एक मकसद यह है कि जो लोग आज कर्ज में डूब गए हैं, परेशानी में फंसे हैं, जिन्हें रौशनी की कोई किरण नहीं दिख रही है, उन्हें भी अमिताभ का उबरना देखना चाहिए। वे हिन्दुस्तान की एक सबसे बड़ी मिसाल हैं कि सबसे बुरे हालात से उबरकर कैसे आसमान पर पहुंचा जाता है। लेकिन उनके उबरने में, जैसी कि चर्चा है, अगर उनके कुछ बहुत ताकतवर और अतिसंपन्न दोस्त उनके मददगार रहे, तो लोगों को जिंदगी में इस बात का ख्याल भी रखना चाहिए। वैसे तो आदर्श स्थिति यह है कि दोस्ती बिना मतलबपरस्ती के होना चाहिए, लेकिन हकीकत यह है कि दोस्तों में कम से कम कुछ तो ऐसे रहें जो कि आड़े वक्त पर आकर खड़े रह सकें, किसी काम आ सकें। सोच-समझकर किसी संपन्न से किसी मकसद से दोस्ती नहीं की जा सकती। लेकिन आसपास अपने दोस्तों को छोटी-छोटी परेशानियों के वक्त छोटी-छोटी बातों के लिए कसौटी पर कस लेना चाहिए कि क्या आड़े वक्त पर वे साथ खड़े रहेंगे? और बात महज पैसों की मदद की नहीं होती है, हौसले की भी होती है, और खराब वक्त में सार्वजनिक रूप से साथ देने की भी होती है। अधिकतर लोग इस खुशफहमी में जीते हैं कि उनके दोस्त इतने भरोसेमंद हैं कि जरूरत पडऩे पर वे उनके लिए अपनी जान भी दे देंगे, लेकिन जिनसे किडनी पाने की उम्मीद रखी जाती है, वे वक्त पर एक दिन के अपनी कार भी देने से परहेज करते हैं। इसलिए जिंदगी में इस बात के लिए भी तैयार रहना चाहिए कि अपने आसपास के लोगों को तौल लिया जाए कि बुरे वक्त वे कितना कंधा देने तैयार रहेंगे। बहुत पहले एक बार इसी पन्ने पर हमने लिखा था कि लोगों को दो चक्कों वाली एक अर्थी, या जनाजा, बनवाकर रखना चाहिए, ताकि चार लोग न जुटें, तो दो ही लोग उसे धकेलकर ले जा सकें। लोगों को ऐसी नौबत के खतरे को अनदेखा नहीं करना चाहिए, और उसके लिए तैयार भी रहना चाहिए। 

इन दोनों बातों को मिला लें तो कुल मिलाकर बात यह बनती है कि दिन चाहे कितने ही खराब आ जाएं, हौसला नहीं छोडऩा चाहिए, उससे उबरना नामुमकिन नहीं मानना चाहिए। अंग्रेजी के शब्द इम्पॉसिबल के अंग्रेजी हिज्जों को तोडक़र ही एक दूसरा शब्द बनता है आई एम पॉसिबल। और इसकी एक बड़ी शानदार और अच्छी मिसाल अमिताभ बच्चन हैं। लेकिन ऐसी दूसरी भी बहुत सी मिसालें हैं जिन्हें लोगों ने दोनों पैर खो दिए, और दोनों नकली पैरों के साथ जो एवरेस्ट पर पहुंचे। ऐसे लोग जिनकी आंखें नहीं थीं, वे भी एवरेस्ट पर पहुंचे। कहीं कोई अकेली लडक़ी या महिला दुनिया के कई समंदर चीरते हुए एक बोट पर अकेले ही आधी दुनिया पार कर लेती है। ऐसे बहुत से असल जिंदगी के किस्से हैं, जो खालिस हकीकत हैं, और जो मुसीबत में फंसे लोगों को एक बढिय़ा रास्ता भी दिखाते हैं। अमिताभ बच्चन की बात चल रही है इसलिए यह भी याद करना ठीक होगा कि जिस वक्त वे मुंबई के फिल्म उद्योग में आए थे, उन्हें उनकी बहुत अधिक लंबाई के बारे में कहा गया था कि वे नीचे से पैर एक फीट कटाकर आएं। कोई उन्हें फिल्म देने तैयार नहीं थे। और आज उनकी हालत यह है कि हिन्दुस्तान के गहनों के सबसे बड़े ब्रांड की मॉडलिंग करके वे गहने बिकवाते हैं, और हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी गिरवी रखने वाली कंपनी की मॉडलिंग करके सोने के गहने गिरवी भी रखवाते हैं। फिल्मों की कामयाबी, टीवी की शोहरत, मॉडलिंग और ब्रांड प्रमोशन के अलावा वे पता नहीं क्या-क्या करते हैं, और कैसे-कैसे कितना-कितना कमाते हैं। लेकिन यह याद रखने की जरूरत है कि एक फिल्म की शूटिंग के दौरान जख्मी होकर वे मौत के मुंह में जा चुके थे, और वहां से लौटकर आए थे। उन्हें पिछले दस-बीस बरस से एक बहुत गंभीर बीमारी चले आ रही है, और वे उसके साथ ही एक उद्योग की तरह रात-दिन काम करते रहते हैं। इसलिए महज दोस्तों से कुछ नहीं होता, महज संपन्न दोस्तों से कुछ नहीं होता, खुद का हौसला भी रहना जरूरी होता है, खुद मेहनत भी करनी होती है, और बुरे वक्त के लायक तैयार भी रहना होता है। यह बात हम आज इसलिए लिख रहे हैं कि आज चारों तरफ आम से काफी अधिक गिनती में आत्महत्याएं हो रही हैं, लोगों को ऐसा लगता है कि तकलीफ और दहशत के इस दौर में खुदकुशी बढ़ भी सकती है। लोगों को हौसला रखना चाहिए, और हो सके तो अपनी दीवारों पर उन लोगों की तस्वीरें चिपाककर रखनी चाहिए जिन्होंने दोनों नकली पैरों के साथ एवरेस्ट पर फतह हासिल की है। 

(Daily chhattisgarh)