बात की बात, 31 जनवरी 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 31 जनवरी 2020

राष्ट्रभक्त-रामभक्त की गोली, या तमाशबीन बनी तैनात पुलिस दोनों में अधिक खतरनाक क्या?

संपादकीय
31 जनवरी 2020

दिल्ली में कल जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी के बाहर प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर एक नौजवान पिस्तौल ताने पहुंचा और कई किस्म के राष्ट्रवादी नारे लगाते हुए, अपने को रामभक्त बताते हुए गोली चलाता है जिससे यूनिवर्सिटी के एक नौजवान का हाथ लहूलुहान होते दिखता है जिसे साथी ही अस्पताल ले जाते दिखते हैं। गांधी जयंती के दिन, गांधीवादी अहिंसक तरीके से आंदोलन कर रहे छात्र-छात्राओं को मारने की धमकी देते हुए ऐसी गोलीबारी जितनी खतरनाक है, उससे कई गुना अधिक खतरनाक वहां दर्जनों की संख्या में खड़ी हुई पुलिस है जो कि हवा में लहराती और गोली चलाती इस पिस्तौल के पूरे नजारे को तमाशबीन की तरह देखती रही, हाथ बांधे खड़े रही, और यह पूरा नजारा वीडियो पर कैद भी होते रहा। जिस देश की राजधानी में पुलिस इस बात के लिए तैनात की गई हो कि गांधी पुण्यतिथि पर विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं को राजघाट जाने से रोका जाए, उस देश की राजधानी की यह पुलिस इस पिस्तौलबाज के नारे और फतवे देखते और सुनते हुए खड़ी रही, अपनी जगह से हिली नहीं, और वह धर्मान्ध नौजवान अपने को राष्ट्रवादी रामभक्त कहते हुए गोली चला चुका था। बाद में आई खबरें बताती हैं कि गोपाल नाम का यह नौजवान कई दिनों से अपने फेसबुक पेज पर तरह-तरह की हिंसक धमकियां पोस्ट कर रहा था, और इस गोलीबारी के तुरंत बाद शायद दिल्ली पुलिस ने उसका वह पेज बंद करवा दिया है। जिस वक्त यह पूरा नाटक चल रहा था, उस दौरान देश के अंग्रेजी चैनलों में अपने आपको सबसे बड़ा राष्ट्रवादी करार देने वाला अर्नब गोस्वामी का रिपब्लिक चैनल इस खबर को ठीक उल्टा दिखाते रहा कि जामिया मिलिया के प्रदर्शनकारी छात्रों में से एक पिस्तौल लहरा रहा है, गोलियां चला रहा है। जबकि बाकी तमाम मीडिया और देश देख रहे थे कि इसका ठीक उल्टा हो रहा था। 

आज लिखने का मुद्दा एक धर्मान्ध नौजवान, या कि जैसा कि दावा किया जा रहा है, एक नाबालिग का गांधी पुण्यतिथि पर गोडसे के अंदाज में गोलियां चलाना भी है, और यह भी है कि केन्द्र सरकार के मातहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस का किस बुरी तरह साम्प्रदायीकरण हो चुका है, राजनीतिकरण हो चुका है। पुलिस अब मौके पर जात और धर्म देखकर कार्रवाई करती है, और जिस बेफिक्री के साथ वह लहराती पिस्तौल के साथ हवा में फहराती धमकी देखकर चुपचाप खड़ी थी, उस पर अगर इस देश में कोई जिम्मेदार अदालत बची है, तो वह इस पूरी पलटन की बर्खास्तगी का हुक्म देगी, और अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोडऩे के लिए सजा भी देगी। लेकिन अदालत का रूख भी इन दिनों देश की हवा के साथ-साथ बदला हुआ नजर आता है, और लोगों को अदालत से उस वक्त उम्मीद बहुत कम दिख रही है जब कटघरे में सरकार खड़ी हो, या उसके कटघरे में लाए जाने का एक खतरा मौजूद हो। ऐसे में जब देश की राजधानी में ही पुलिस की मौजूदगी में राष्ट्र और धर्म के लिए प्रेम दिखाते हुए ऐसी गोलीबारी हो रही है, तो फिर मीडिया के कैमरों से कुछ दूरी पर, योगी के उत्तरप्रदेश के भीतरी इलाकों में क्या होता होगा? 

इस देश में पुलिस कई वजहों से भारी भ्रष्टाचार में डूबी हुई है, काम के अधिक बोझ के चलते वह बहुत काबिल भी नहीं रह गई है, उसमें जाति और धर्म का भेदभाव कूट-कूटकर भरा हुआ दिखता है, उसका नजरिया कई राज्यों में सत्ता की मेहरबानी से साम्प्रदायिक दिखता है, और अब अगर देश की राजधानी में वर्दी में थोक में तैनाती भी गोलीबारी को ऐसा अनदेखा करने का नजारा पेश कर रही है, तो यह इस देश की पुलिस को कुछ और दूरी तक बर्बाद करने वाला काम भी है। यहां यह याद रखने की जरूरत है कि इसी दिल्ली में अभी चार दिन पहले केन्द्र सरकार के एक मंत्री ने एक चुनावी सभा में जेएनयू, शाहीन बाग, या जामिया मिलिया के प्रदर्शनकारियों के सिलसिले में नारे लगवाए थे कि देश के गद्दारों को गोली मारो सालों को। अब ऐसे नारों के बाद एक रामभक्त राष्ट्रवादी गोली मारने पहुंच गया तो पुलिस मानो केन्द्रीय मंत्री के फतवे पर अमल करते हुए नजारा देखते खड़ी रही। देश की पुलिस का मनोबल इतना तोडऩा कि वह अपनी ही लाठी छूने की भी हिम्मत न करें, उसे इतना साम्प्रदायिक बना देना कि वह सत्ता को नापसंद धर्म पर कहर बनकर टूट पड़े, उसे इतना निकम्मा बना देना कि वह अपनी बुनियादी ड्यूटी को भी जरूरी न समझे, यह पूरा सिलसिला बहुत खतरनाक है, और जब केन्द्र सरकार के मातहत देश की राजधानी में खड़ी पुलिस का यह रूख है, तो इस रूख के लिए भी केन्द्र सरकार सीधे जवाबदेह है। 

गांधी की पुण्यतिथि पर गोडसे की सोच एक बेकसूर नौजवान की हथेली से लहू बहा गई, और इससे भी अधिक खतरनाक बात यह रही कि खून के इस खेल को वहां तैनात पुलिस स्टेडियम की गैलरी से क्रिकेट की तरह देखती रही।   

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 30 जनवरी 2020

इस नौबत का मजा लेने के बजाय फिक्र करनी चाहिए

संपादकीय
30 जनवरी 2020

जो एक छोटी सी घटना होकर जांच का सामान हो सकती थी, उसने शहरी हिन्दुस्तान के एक तबके में खलबली मचा दी, और सोशल मीडिया उबलने लगा। हुआ यह कि एक टीवी समाचार चैनल के मुखिया, और देश भर में अपने हमलावर तेवरों, कांग्रेसविरोध, मुस्लिमविरोध, पाकिस्तानविरोध, और मोदीभक्ति के लिए मशहूर अर्नब गोस्वामी से एक हवाई सफर में कुणाल कामरा नाम के एक मशहूर कॉमेडियन ने सवाल करना शुरू किए और उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग भी। आमतौर पर अपने चैनल के जीवंत प्रसारण में चीखने के लिए मशहूर अर्नब ने कुणाल के तीखे जुबानी सवालों के जवाब में मुंह भी नहीं खोला। लेकिन इस घटना पर केन्द्रीय विमानन मंत्री ने नाराजगी का एक ट्वीट किया, और उसके साथ ही इस एयरलाईंस ने कुणाल कामरा के सफर पर छह महीने के लिए रोक लगा दी। कुछ ही देर में एक-एक करके चार एयरलाईंस ने रोक लगाई, और इंटरनेट पर यह भी आने लगा कि भारतीय रेल भी बदसलूकी करने वाले मुसाफिरों पर ऐसी रोक लगा सकती है। इंटरनेट पर यह भी बहस चल रही है कि क्या एयरलाईंस की ऐसी रोक जायज और कानूनी है, या फिर मोदी की बुरी तरह खिल्ली उड़ाने वाले इस कॉमेडियन पर उसकी सोच या उसके काम की वजह से एक बहाना तलाशकर ऐसी रोक लगाई गई? लोगों ने कुणाल कामरा के लिखे हुए ऐसे कुछ ट्वीट भी पोस्ट किए हैं जिनमें उन्होंने राहुल गांधी की भी बहुत तेजाबी अंदाज में खिल्ली उड़ाई है। 

वैसे तो यह बात बहुत अधिक नहीं बढऩी थी क्योंकि कुणाल कामरा जिस आदमी से सवाल कर रहे थे, चाहे वे बिना हक के ही कर रहे थे, वह आदमी हर रात हिन्दुस्तान के अपने मनचाहे शिकारों से सवाल करता है, और यह कहते हुए करता है कि देश यह जानना चाहता है। लोगों को निशाना बनाते हुए अर्नब अपने आपको देश मानकर सवाल करता है, और मनचाहा जवाब न मिलने पर धज्जियां उड़ाने का अपना सर्वाधिकार सुरक्षित भी रखता है। अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता के नाम पर कमाने, खाने, और चैनल के मालिक बनने तक का अर्नब का सफर ऐसे बहुत से जुबानी हमलों को बढ़ावा देने वाला है जिनमें हवाई सफर कर रहे नेताओं से जबर्दस्ती इंटरव्यू कर रही अपनी रिपोर्टर को वे एक नायिका की तरह पेश कर चुके हैं। तेजस्वी यादव से विमान में अर्नब के चैनल की रिपोर्टर हमलावर अंदाज में जबर्दस्ती इंटरव्यू करते उन्हीं के चैनल पर बहादुरी की तरह पेश की जा चुकी हैं। ऐसे में अभिव्यक्ति के कारोबार के एक मुखिया या सरगना को शायद एक कॉमेडियन के सवालों में कॉमेडी भी देखनी थी। लेकिन एक मुसाफिर की हैसियत से सवालमुक्त सफर का उनका हक अपनी जगह कायम तो है ही। 

अब यह मामला कानूनी जांच-पड़ताल के लिए जाएगा क्योंकि एयरलाईंस और भारत सरकार के नियम ऐसे प्रतिबंध के बाद एक जांच जरूरी मानते हैं। इसके साथ-साथ हो सकता है कि यह कॉमेडियन या उसके कोई हिमायती इन प्रतिबंधों को लोकतांत्रिक और सरकार के बदले की भावना करार देते हुए अदालत भी जाएं, और जनता की अदालत में तो यह मामला आज है ही। ऐसे में देश की किसी भी नागरिक पर उसकी जुबान की वजह से इस किस्म का व्यापक प्रतिबंध लगाना पहली नजर में गैरकानूनी और नाजायज दोनों ही इसलिए लगता है कि किसी के तीखे सवालों से विमान की हिफाजत खतरे में पडऩे का तर्क बहुत ही बचकाना या बदनीयत, या दोनों ही लगता है। खासकर तब जब अब तक की खबरों के मुताबिक अर्नब गोस्वामी की ओर से कोई रिपोर्ट नहीं लिखाई गई है, और एयरलाईंस ने भी पुलिस को कोई रिपोर्ट नहीं दी है। ऐसे में लोगों को यह भी याद पड़ रहा है कि किस तरह कुछ बरस पहले केन्द्र में सत्तारूढ़ एनडीए के उस वक्त के एक भागीदार दल, शिवसेना का एक सांसद एयरलाईंस कर्मचारी को अपनी चप्पल से पच्चीस बार पीटते कैमरे में कैद हुआ था, और उसने बाद में अपना यह जुर्म कबूल भी किया था। दिल्ली हवाई अड्डे पर उसने यह चप्पलबाजी इसलिए की थी कि उसे विमान में बिजनेस क्लास में सीट नहीं दी गई थी क्योंकि उस विमान में सिर्फ इकानॉमिक क्लास ही थी। इसकी शिकायत सरकारी एयरलाईंस के कर्मचारी ने दिल्ली पुलिस में की थी, और उसके बाद से अब तक इस सांसद पर हुई कार्रवाई सुनाई नहीं पड़ी है। अभी कुछ हफ्ते पहले दिल्ली से भोपाल आ रहे विमान में चर्चित सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने उस समय हंगामा खड़ा कर दिया जब इमरजेंसी दरवाजे के बगल की सीट उन्हें नहीं दी गई क्योंकि वहां सिर्फ मजबूत सेहत के लोगों को जगह दी जाती है जो कि किसी आपात स्थिति में और मुसाफिरों की मदद कर सकें, और साध्वी प्रज्ञा पहियों की कुर्सी पर चलने वाली, शारीरिक दिक्कतों वाली हैं। इस हंगामे की वजह से विमान पौन घंटे लेट उड़ पाया था, और आतंक के जुर्म वाले मुकदमे झेल रही, जमानत पर रिहा इस सांसद पर इस हंगामे और देर के लिए एयरलाईंस ने कोई कार्रवाई नहीं की थी, न ही भारत सरकार ने, या उसकी किसी एजेंसी ने। अब ऐसे में तमाम बड़े नेताओं की, और खासकर मोदी-शाह की, खिल्ली उड़ाने वाले एक कॉमेडियन पर ऐसी बड़ी कार्रवाई करने के लिए गलाकाट मुकाबला करने में जुट गईं एयरलाईंस मासूम नहीं लगती हैं। और फिर बिना किसी औपचारिक शिकायत के केन्द्रीय विमानन मंत्री का सोशल मीडिया पर उतरकर इस तरह का हमला करना भी जायज नहीं लगता है। एक बहुत ही तेज-तर्रार स्टैंडअप कॉमेडियन कुणाल कामरा के समर्थन में सोशल मीडिया जिस तरह टूट पड़ा है, उससे लगता है कि सरकार, और उसके दबाव में कार्रवाई कर रहीं उड़ान-कंपनियों से सरकार को बदनामी और सरकार की खिल्ली उड़ाने वाले इस कॉमेडियन को शोहरत ही मिली है। सरकार के शुभचिंतकों को इस नौबत का मजा लेने के बजाय अपनी सरकार की फिक्र करनी चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 29 जनवरी 2020

उस दिन देश की पुलिस भी जजों को बचाने नहीं रहेगी

संपादकीय
29 जनवरी 2020

दिल्ली का चुनाव बड़ा दिलचस्प हो गया है। इस केन्द्र प्रशासित प्रदेश की विधानसभा का चुनाव मौजूदा मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तो अपने चेहरे पर लड़ ही रहे हैं, लगातार तीन कार्यकाल मुख्यमंत्री रहने वाली शीला दीक्षित की पार्टी इस कदर हाशिए पर जा चुकी हैं कि उसे लोग प्रासंगिक भी नहीं मान रहे हैं। यह भी नहीं मान रहे हैं कि वह वोट काटकर किसी दूसरे का बुरा भी कर सकती है। ऐसे में भाजपा कुछ राज्यों में मुख्यमंत्री के चेहरे सामने रखने के बाद शिकस्त खाकर अब बेचेहरा चुनाव लड़ रही है, और मोदी-शाह के नाम पर वोट मांगे जा रहे हैं। बात यहां तक रहती तब भी ठीक था, लेकिन भाजपा के कुछ बड़े नेता चुनाव प्रचार में जिस दर्जे की बातें कर रहे हैं, वे एक घनघोर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की हिंसक और अश्लील कोशिश से अधिक कुछ नहीं है। केन्द्र सरकार में वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर जिस तरह भाजपा की चुनावी आमसभा में, देश के गद्दारों को गोली मारो सालों को, जैसे नारे लगवा रहे हैं, वह बात हक्का-बक्का करने वाली है। दूसरी तरफ मानो यह काफी नहीं था तो दिल्ली के भाजपा सांसद, और वहां के एक वक्त के मुख्यमंत्री साहेब सिंह वर्मा के बेटे, प्रवेश वर्मा ने देश की सबसे बड़ी समाचार एजेंसी के साथ कैमरे पर बातचीत करते हुए शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन को लेकर कहा कि अगर ये प्रदर्शन जारी रहे तो प्रदर्शनकारी लोगों के घरों में घुस सकते हैं, और उनकी बहन-बेटियों से बलात्कार कर सकते हैं। प्रवेश वर्मा भाजपा के मौजूदा सांसद हैं, और उनकी यह भाषा है- दिल्ली वालों को सोच-समझकर फैसला लेना पड़ेगा, ये लोग आपके घरों में घुसेंगे, आपके बहन-बेटियों को उठाएंगे, उनको रेप करेंगे, उनको मारेंगे। 

पिछले जाने कितने ही ऐसे चुनाव हो चुके हैं जिनमें दिए गए भाषणों को लेकर यह लगता है कि अब सोच और जुबान दोनों गटर की गहराई पर पहुंच चुके हैं, और इससे अधिक घटिया और कुछ नहीं हो सकता। फिर कुछ महीनों के भीतर किसी और राज्य के चुनाव सामने आते हैं और कुछ दूसरे लोग उससे भी अधिक घटिया बात कहते हैं, उससे भी अधिक हिंसक, उससे भी अधिक हमलावर। और जैसा कि हाल के बरसों में चुनाव आयोग का रूख रहा है, वह ऐसे बयानों का पूरा असर हो जाने तक महज अपनी जांच करता है, नोटिस जारी करके जवाब मांगता है, और फिर आखिर में एक या दो दिनों के लिए ऐसे नेताओं को प्रचार से परे कर देता है। लेकिन ऐसे नेताओं के नेता, उनकी पार्टियां, देश की अदालतें मौन साधे हुए यह पूरा सिलसिला देखते रहते हैं। चुनाव आयोग एक पूरी तरह बेअसर और बोगस संस्था होकर रह गई है जो कि एक मशीनी अंदाज में चुनाव को निपटाती है, और अपने को कामयाब कहती है। तकनीक और प्रक्रिया की कामयाबी भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में चुनाव आयोग की कामयाबी नहीं कही जा सकती। जब देश में नफरत और हिंसा को भड़काकर, साम्प्रदायिकता को खौलाकर, तेजाबी जुबान से हिंसा के फतवे जारी करके लोगों को गोली मारने की बात कही और कहवाई जा रही हो, तब चुनाव आयोग का हाथ पर हाथ धरकर बैठना देखने लायक है। 

हिन्दुस्तानी चुनावों में अब चुनाव आयोग एक मशीन से अधिक कुछ नहीं रह गया है, और सुप्रीम कोर्ट को यह सोचना चाहिए कि क्या यह मशीन काफी है, असरदार है, और क्या इसे इसी हाल पर छोड़ देना चाहिए? लेकिन अब सवाल यह उठता है कि यह सुप्रीम कोर्ट खुद किन्हीं ऊंचे आदर्शों पर काम करते नहीं दिखता, और इसके फैसले कई बार ऐसा महसूस कराते हैं कि यह अदालत सरकार के एक और विभाग की तरह काम कर रही है। यह सड़कों पर सत्तारूढ़ और सरकारी हिंसा को रोकने की अपील पर एक खोखला आदेश देती है कि पहले सड़कों पर हिंसा रूके, तब वह हिंसक घटनाओं पर सुनवाई करेगी। जिन्हें इस आदेश के पीछे और सामने के कानूनी पहलू समझ में आएंगे उन्हें यह आदेश एक लतीफे जैसा लगेगा कि मानो शहंशाह अकबर अनारकली से कह रहे हों कि सलीम तुझे मरने नहीं देगा, और हम तुझे जीने नहीं देंगे। देश की सबसे बड़ी अदालत हिंसा के शिकार लोगों से यह कहे कि जब हिंसा रूक जाएगी, तभी वे हिंसा पर सुनवाई करेंगे, तो यह हमलावरों का साथ देने जैसा अदालती रूख है। इसलिए ऐसी अदालत से चुनाव आयोग पर किसी कड़ाई बरतने की उम्मीद नहीं की जा सकती, और इसी दिल्ली में अपने बड़े बंगलों, और बड़ी अदालतों में महफूज बैठे जजों को इस बात में कुछ खतरनाक नहीं लगता कि देश की आबादी के एक हिस्से को देश का गद्दार कहकर उसे गोली मारने के नारे लगवाए जा रहे हैं। चूंकि ये नारे आज सुप्रीम कोर्ट जजों के खिलाफ नहीं हैं, चुनाव आयुक्तों के खिलाफ नहीं हैं, इसलिए वे बेफिक्र हैं। लेकिन ऐसी बेफिक्री लंबे समय तक चलेगी नहीं। एक दिन ऐसा आएगा जब सुप्रीम कोर्ट का कोई फैसला इस हिंसक भीड़ और इन हिंसक नेताओं को पसंद नहीं आएगा, उस दिन नारा लगेगा, कोर्ट के गद्दारों को, गोली मारो सालों को, और उस दिन देश की पुलिस भी जजों को बचाने के लिए नहीं रहेगी। 

लेकिन यही सुप्रीम कोर्ट है जिसने गुजरात दंगों में 33 लोगों को जिंदा जलाने वाले, हाईकोर्ट से सजा पाए हुए 17 लोगों को अभी इस शर्त पर जमानत दी है कि वे लोग आध्यात्म के रास्ते पर चलें। इस देश में आध्यात्म के रास्ते पर चलने वाले बहुत से बाबा, बापू, संत कहे जाने वाले लोग नाबालिगों से बलात्कार, लोगों को बधिया बनाने, और कत्ल करने-करवाने के एवज में जेल में कैद काट रहे हैं। अब जेल में सजा काट रहे ऐसे लोगों को आध्यात्म का काम करने की शर्त पर जमानत दी गई है जिन्होंने गुजरात के साम्प्रदायिक दंगों में 33 लोगों को जिंदा जलाकर मार डाला था। इस फैसले के बाद क्या इस देश की जेलों में सजा के खिलाफ अपील करने वाले किसी भी और मुजरिम को एक दिन भी कैद में रखने का हक सुप्रीम कोर्ट को रह जाता है? 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 28 जनवरी 2020

विधान परिषदों की कोई जरूरत है, या फिजूल हैं?

संपादकीय
28 जनवरी 2020

आन्ध्र सरकार ने तय किया है कि राज्य में विधान परिषद खत्म कर दी जाए। इसके पीछे की ताजा वजह यह है कि प्रदेश में तीन राजधानियां बनाने से संबंधित विधेयक आन्ध्र के इस उच्च सदन, विधान परिषद, में सरकार पास नहीं करवा पाई। देश के कुछ ही राज्यों में भारत की राज्यसभा की तरह की विधान परिषदें हैं जिनके सदस्य जनता के सीधे निर्वाचन से नहीं आते, बल्कि वे समाज के अलग-अलग वर्गों के लोग रहते हैं जिन्हें राजनीतिक दल अपना उम्मीदवार बनाकर सदन तक पहुंचाते हैं। ये विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों से अलग रहते हैं, और राज्यसभा या विधान परिषदों के पीछे सोच यही थी कि अलग-अलग तबकों और विषयों के विशेषज्ञ, जानकार, अनुभवी लोग चूंकि चुनाव लडऩे जैसा काम नहीं कर पाते हैं, इसलिए उन्हें मनोनयन से इन सदनों तक पहुंचाया जाए। 

लेकिन हिन्दुस्तान की राज्यसभा को अगर देखें तो वह परास्त नेताओं के एक जमावड़े सरीखी है जिसमें बड़ी संख्या में ऐसे सतही दर्जे के लोग भी किसी पार्टी से समर्थन खरीदकर पहुंच जाते हैं जिन्हें देश में कोई सम्मानजनक कुर्सी नहीं मिलनी चाहिए। लोगों को याद होगा कि विजय माल्या जैसे सोचे-समझे डिफाल्टर और भगोड़े भी एक समय राज्यसभा के सदस्य हो गए थे। पिछले कई मंत्रिमंडलों में ऐसे लोग राज्यसभा के रास्ते पहुंचे हैं जो कि लोकसभा का चुनाव हार चुके थे। इनमें मनमोहन सिंह सरीखे भले लोग भी थे जो कि अपने विषय के जानकार थे, लेकिन आज के जंगी चुनावों में जिनका जीतकर आना मुश्किल था, और उन्हें राज्यसभा के रास्ते संसद पहुंचाया गया था। दरअसल राज्यसभा को बनाने के पीछे सोच ऐसे ही लोगों के लिए थी, लेकिन धीरे-धीरे कुछ पार्टियां राज्यसभा की अपनी सीटें बेचने के लिए जानी जाने लगीं, और देश के बड़े कारोबारी उस पार्टी का समर्थन खरीदकर संसद पहुंचने लगे। कुछ कुनबे अपने विधायकों के समर्थन के दम पर अपने परिवार के तमाम लोगों को राज्यसभा पहुंचाने लगे। और संसदीय व्यवस्था में जो सदन बड़े सम्मान का होना चाहिए था, वह सदन ऐसे ही लोगों की भीड़ बनने लगा है। 

आन्ध्र में सत्तारूढ़ वाईएसआर कांग्रेस सरकार के विधान परिषद खत्म करने के फैसले के पीछे वहां पर उसका अल्पमत में होना ही वजह है, लेकिन इस मामले से परे हम सैद्धांतिक रूप से इस सदन को खत्म करने के हिमायती हैं। जहां तक मनोनीत लोगों का सवाल है कि उनका विकल्प क्या होगा, तो जिस तरह राष्ट्रपति के मनोनीत कुछ सदस्य लोकसभा के सदस्य भी होते हैं, तो उसी तरह लोकसभा या राज्य विधानसभाओं में कुछ सीटें मनोनयन के लिए रखी जा सकती हैं जिन पर राजनीतिक दल अपनी बाकी सीटों के अनुपात में मनोनयन कर सकें। एक ही सदन में निर्वाचित और मनोनीत दोनों किस्म के सदस्य बैठ सकते हैं, और मनोनीत सदन को खत्म किया जा सकता है। अब इस सोच में एक दिक्कत भी है। आज लोकसभा या विधानसभा के चुनाव के बाद कोई पार्टी या गठबंधन बहुमत से वहां सरकार बनाते हैं। लेकिन ऐसी सरकार के लाए हुए विधेयक भी लोकसभा के बाद राज्यसभा में पारित होना जरूरी रहता है जो कि लोकसभा के साथ-साथ गठित नहीं होती। राज्यसभा के सदस्य अलग-अलग राज्यों से अलग-अलग समय पर निर्वाचित होते रहते हैं और कभी भी पूरी राज्यसभा एक साथ नहीं बनती, इसलिए संसद के इन दो हिस्सों में एक शक्ति संतुलन बने रहता है। जो पार्टी या गठबंधन लोकसभा में पूर्ण बहुमत में भी हैं, उन्हें राज्यसभा में विधेयक पारित करवाने के लिए वैसा बहुमत अनिवार्य रूप से मिला हुआ नहीं होता, और उन्हें ऐसा बहुमत जुटाना पड़ता है। 

संसदीय लोकतंत्र का मतलब ही तालमेल के साथ चलना होता है, विपक्ष को भी सहमत कराकर साथ लेकर चलना होता है, और इसलिए राज्यसभा का एक महत्व भी है। लेकिन राजनीतिक दलों ने राज्यसभा में मनोनयन के लिए जैसे स्तरहीन लोगों को मनोनीत करना जारी रखा है, उससे लगता है कि ऐसे सदन का न रहना शायद बेहतर है। जिन कुछ गिने-चुने राज्यों में राज्यसभा की तर्ज पर विधान परिषद हैं, उन राज्यों को भी इस उच्च सदन को खत्म करने के बारे में सोचना चाहिए, और पूरे देश को यह सोचना चाहिए कि क्या निर्वाचित सदन में कुछ सीटों को मनोनयन के लिए रखना संसदीय व्यवस्था के लिए बेहतर होगा? 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

ताजा-ताजा हिन्दुस्तानी को इतनी बड़ी लिफ्ट करा देने की वजह आखिर क्या है?

संपादकीय
27 जनवरी 2020

हिन्दुस्तान के गणतंत्र दिवस का मौका देश के राजकीय सम्मानों की घोषणा का भी रहता है, और इस बरस जिन लोगों को पद्मश्री, पद्मभूषण, और पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया है, उनके नामों को लेकर प्रतिवर्षानुसार, और परंपरानुसार विवाद हो ही रहा है। विवाद इस बात को लेकर नहीं होता कि किन लोगों को ये सम्मान अब तक नहीं दिए गए हैं, विवाद इस पर होता है कि कौन से अपात्र लोगों को ये सम्मान दिए गए हैं। और फिर उनके संदर्भ में यह चर्चा जरूर होती है कि उन्हीं के दायरे के और कौन से ऐसे और अधिक खूबियों वाले लोग हैं जो कि बचे रह गए हैं। अब छत्तीसगढ़ में बसे हुए हिन्दी के महान कवियों में से एक विनोद कुमार शुक्ल का नाम इस लिस्ट में न आते हुए इतने बरस हो चुके हैं कि अब उनके प्रशंसक यह मानते हैं कि पद्मश्री उनके लायक अब नहीं रह गई है। सबसे अच्छे, और हकदार लोगों को राजकीय या दूसरे किस्म के अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल ही जाएं यह जरूरी नहीं होता, लोगों को याद है कि गांधी को कभी नोबल पुरस्कार नहीं मिला, और उससे गांधी की सेहत पर फर्क नहीं पड़ा, नोबल तय करने वाली कमेटियों की समझ की साख पर जरूर फर्क पड़ा। 

लंबी-चौड़ी पद्म-लिस्ट के बहुत से नामों पर लोगों को कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन फिर भी भारत का सोशल मीडिया कल से जिस एक नाम पर हैरान हैं, उबला हुआ है, वह नाम एक संगीतकार-गायक अदनान सामी का है। अदनान को एक वक्त हिन्दू संगठन हिन्दुस्तान में गाने से रोक रहे थे, और भाजपा की एक प्रवक्ता का भी यूपीए सरकार के दौरान का एक बयान कल से तैर रहा है कि इस पाकिस्तानी गायक को देश से निकाला जाए, और इस प्रवक्ता ने यह भी सवाल उठाया था कि दिल्ली में इस पाकिस्तानी गायक के कौन संरक्षक हैं? इसके बाद मोदी सरकार के आने पर अदनान सामी को भारतीय नागरिकता दी गई क्योंकि एक पाकिस्तानी मुस्लिम शोहरत के बाद अगर हिन्दुस्तान की नागरिकता चाहता है, और उसका पिता, खबरों के मुताबिक पाकिस्तानी फौज का अफसर रहा हुआ है, तो वह भारत की छवि को मजबूत करने वाला साबित हो सकता है। और शायद इसीलिए उसे भारतीय नागरिकता दी गई थी। लेकिन चार बरस पहले जो भारतीय नागरिक बना, उसके गाने या उसके सामाजिक योगदान में ऐसा कुछ भी नहीं था कि उसे पद्मश्री दी जाती। भारत के फिल्म और संगीत के क्षेत्र में सैकड़ों लोग जो दशकों से योगदान दे रहे हैं, उन्हें अब तक कैसे राजकीय सम्मान की लिस्ट में जगह मिली नहीं है। इसलिए लोगों को हैरानी होती है कि बिना योगदान वाले इस ताजा-ताजा हिन्दुस्तानी को उसके एक मशहूर गाने के मुताबिक हिन्दुस्तानी सरकार ने ऐसी लिफ्ट क्यों करा दी है? अदनान सामी का पिता पाकिस्तानी एयरफोर्स का पायलट था, और वहां अपनी बहादुरी के लिए उसे पाकिस्तान का तीसरा सबसे बड़ा फौजी सम्मान मिला था। अब न बेटे के काम हिन्दुस्तान में इतने बड़े सम्मान के लायक हैं, और न पिता की पाकिस्तानी फौज की बहादुरी किसी को भारत में सम्मान का हकदार बना सकती। अदनान सामी को यह सम्मान निहायत ही नाजायज और गैरजरूरी है। 

सम्मानों में कई और नाम ऐसे हैं जो कि गैरजरूरी हैं, या कमजोर हैं। दूसरी तरफ देश में बहुत से ऐसे लोग हैं जो कि सम्मान के जायज हकदार होते हुए भी किनारे बैठे हैं। लेकिन इन दोनों बातों से परे हम राजकीय सम्मानों को लेकर अपनी एक पुरानी बात दुहराना चाहते हैं कि भारत जैसे लोकतंत्र में सरकार को सम्मान बांटने से दूर रहना चाहिए। जो सरकारें जनता के वोट से बनती हैं, वे लुभावनी-लिस्ट बनाने से बच नहीं सकतीं। इसलिए यह पूरा सिलसिला ही गलत है कि कोई सरकार जनता में से कुछ लोगों को अधिक सम्मान के लायक छांटे। अभी-अभी हिन्दुस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा है कि विधायकों या सांसदों की पात्रता-अपात्रता तय करने का काम सदन के अध्यक्ष को देने में दिक्कत यह है कि वे खुद किसी एक पार्टी के रहते हैं, और उनसे निष्पक्ष फैसले की उम्मीद नहीं की जा सकती। उसी तरह सरकार चला रही पार्टी की अपनी सोच रहती है, और उसे ऐसे सम्मान तय करने का हक देना एक नाजायज बात है। इसके साथ-साथ हम इस बात को भी दोहराना चाहते हैं कि जो सचमुच ही सम्मान के लायक लोग हैं, उन्हें भी राजकीय सम्मानों से दूर रहना चाहिए जिनकी विश्वसनीयता जरा भी नहीं रहती। फिलहाल इस लिस्ट में सोशल मीडिया पर केन्द्र सरकार के आलोचकों को एक जायज वजह दे दी है कि वे अदनान सामी को इतनी बड़ी लिफ्ट करा देने के फैसले पर सरकार को घेरें। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 27 जनवरी 2020

बात की बात, 25 जनवरी 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 25 जनवरी 2020

संविधान की यह सालगिरह इतना सोचने मजबूर कर रही है कि जितना पहले कभी नहीं

संपादकीय
25 जनवरी 2020

आजादी पाने और संविधान बनाने की सालगिरहें हर बरस हिन्दुस्तान में सबसे बड़ा सरकारी जलसा होती हैं। दिल्ली के लालकिले और राजपथ से लेकर देश के जंगलों के बीच बसे गांव और स्कूलों में भी इन दो दिनों पर आजादी को भी याद किया जाता है, और संविधान को भी। इन दोनों ही दिन गांधी-नेहरू को भी याद किया जाता है, और संविधान की चर्चा अंबेडकर के बिना पूरी नहीं होती है। हर बरस लोग इस गफलत में भी पड़ते हैं कि यह आजादी की कौन सी सालगिरह है, या संविधान लागू होने वाले गणतंत्र दिवस के कितने बरस पूरे हो रहे हैं। लेकिन आंकड़ों के कोई मायने तो होते नहीं। आजादी की पौन सदी बाद, और उससे थोड़ा ही कम वक्त संविधान लागू होने के इतिहास का है, ऐसे वक्त में हिन्दुस्तान के पिछले कई महीने, या शायद एक पूरा ही बरस जिस कदर संविधान और आजादी की चर्चा से भरा हुआ है, वैसा तो संविधान और आजादी दोनों को स्थगित, या निलंबित, या बेअसर करने वाली इमरजेंसी में भी नहीं था। अभी जब संविधान के लागू होने की सालगिरह का जलसा कुछ घंटों बाद देश भर में मनाया जाने वाला है, तो इस संविधान के आज के हाल पर भी सोचने की जरूरत है, झंडे-डंडे से अधिक, राष्ट्रगीत से अधिक, राष्ट्रगान से अधिक, और देश की आजादी के लिए शहादत देने वाले महान शहीदों की याद से भी अधिक। 

दरअसल जब जलते-सुलगते असल मुद्दों पर कड़वी चर्चा की जरूरत रहती है, तब जलसे उस ताकतवर तबके के बड़े काम आते हैं जिस तबके को जवाबदेह रहना चाहिए। संविधान को लेकर आज देश भर के अनगिनत शहरों में लोग सर्द सड़क किनारे, चौराहों और सार्वजनिक जगहों पर हफ्तों से बैठे हुए हैं, तब गणतंत्र दिवस सत्ता को यह मौका देने जा रहा है कि वह आजादी के महान शहीदों और संविधान निर्माताओं की स्मृतियों का बखान करते हुए इतनी तालियां पिटवाए कि वे किसी कीर्तन के मंजीरों की तरह दिमाग का ध्यान दूसरी तरफ खींचकर ले जाए। इस बार का गणतंत्र दिवस कुछ नहीं, खासा अजीब सा है। लोग 1947 के बाद पहली बार इतनी जगहों पर रात-दिन बैठकर आजादी मांग रहे हैं, और 1950 के बाद पहली बार संविधान पर इतनी चर्चा हो रही है, पहली बार संविधान को इतनी अहमियत मिल रही है, उसकी भावना को समझने और समझाने की कोशिशें हो रही हैं। संविधान लागू होने के बाद यह पहला मौका है जब देश संविधान पर सोच रहा है, इतना सोच रहा है, जब लोगों के लिए संविधान इतना महत्वपूर्ण दस्तावेज हो गया है कि वह महज कानून की लाइब्रेरी में रखने की किताब न होकर लोगों की सांस और धड़कन, उनके पेट और उनकी जिंदगी, उनकी जिंदा अगली पीढिय़ों, और गुजर चुकी पिछली पीढिय़ों के लिए इतना महत्वपूर्ण हो गया है। 

कल जब दिल्ली के राजपथ पर भारत सरकार देश की कामयाबी का बखान करते हुए उसकी एक झांकी निकालेगी, उस वक्त उसकी रंगीनियों में उसी दिल्ली के शाहीन बाग में हफ्तों से रात-दिन डेरा डाले बैठीं मुस्लिम, और गैरमुस्लिम भी, औरतों की कोई जगह उसमें नहीं होगी, क्योंकि उन्हें देश का गद्दार करार दिया जा रहा है। वैसे तो हर बरस गणतंत्र दिवस पर संविधान के शब्दों और उसकी भावना के खिलाफ खड़े दिखते हालात जलसे के माहौल को चुनौती देते दिखते हैं, लेकिन इस बरस तो यह चुनौती जैसी दिख रही है, वैसी तो इस देश के इतिहास में घोषित इमरजेंसी के दौर में भी नहीं दिख रही थी, जब सत्ता एक समर्पित, और प्रतिबद्ध न्यायपालिका की कोशिश में लगी हुई थी। अब ऐसा लगता है कि न कुछ घोषित होने की जरूरत है, और न किसी बात के लिए कोशिश करने की। सब कुछ अनायास ही हो चुका दिख रहा है। अब सवाल यह है कि देश के जिन लोगों, यानी कि गणों के नाम पर यह गणतंत्र दिवस मनाया जाने वाला है, उन गणों की कोई जगह इस जलसे की झांकियों में रह सकती है, या फिर यह नुमाइश महज सरकार के कामयाबी के दावों की एक झलक रहेगी? और यह चर्चा इस बरस अधूरी रह जाएगी अगर झांकी में दर्ज होने वाली एक बात को यहां न जोड़ा जाए। इस बरस ब्राजील के जिस राष्ट्रपति को भारतीय गणतंत्र दिवस समारोह का मुख्य अतिथि बनाकर बुलाया जा रहा है, वह खुद अपने देश के इतिहास में तानाशाही का हिमायती, औरतों के लिए हिंसक सोच रखने वाला, देश का सबसे अलोकतांत्रिक और नफरतजीवी नेता दर्ज है। ये विशेषण किसी की सोच से उपजे हुए नहीं हैं, ये विशेषण इस राष्ट्रपति के खुद के दिए हुए बयानों से स्थापित तथ्य हैं, जिन बयानों के लिए उस पर वहां की संसद से लेकर वहां की अदालत तक से जुर्माना हो चुका है। यह नफरतजीवी ब्राजीली नेता अपने देश में आकर बाहर से बसने वाले लोगों के लिए एक हिंसक-हिकारत रखता है, और उन्हें आगे बच्चे पैदा करने के लायक भी नहीं मानता है। वह अपनी साथी महिला सांसद को खूबसूरत न होने की वजह से बलात्कार करने लायक भी नहीं मानता है। वह अपने बेटे के भी समलैंगिक होने की आशंका पर उसके सड़क पर कुचलकर मर जाने को बेहतर मानता है। वह देश के फौजी तानाशाहों के जुल्मों को बेहतर मानता है वहां की राजनीतिक विचारधाराओं से। क्या हिन्दुस्तान के इतिहास में किसी गणतंत्र दिवस पर पहले ऐसा कोई मेहमान आया हुआ है? यह गणतंत्र दिवस इतिहास में देश के भीतर संविधान की मांग के अंतहीन और अनगिनत आंदोलनों के साथ दर्ज हो रहा है, और एक ऐसे मेहमान की मौजूदगी के लिए भी दर्ज होने जा रहा है जिसकी सारी सोच हिन्दुस्तान के संविधान के बुनियादी मूल्यों के ठीक खिलाफ है। ऐसा मेहमान संविधान की सालगिरह पर तो ठीक नहीं लगता, उसकी बरसी पर शायद यह ठीक रहता। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 24 जनवरी 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 24 जनवरी 2020

...क्योंकि उनकी जरूरत महज जिंदा रहने की है..

संपादकीय
24 जनवरी 2020

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कल एक तकलीफदेह खबर तस्वीरों सहित सामने आई, और शायद हमारे करीब की होने के कारण, तस्वीरों के कारण वह अधिक विचलित कर गई। एक निहायत गरीब परिवार में बाप ने मां को मार डाला, और नतीजा यही होना था कि वह जेल चले गया। दो, चार, और छह बरस की तीन बेटियां पीछे रह गईं, जिनकी देखरेख कचरा बीनने वाले रिश्तेदार करते भी तो कितना करते। अब शहर के बीच एक किसी गरीब स्कूल में वे दोपहर के भोजन की गारंटी पर जिंदा हैं, लेकिन आज के वक्त में जब मां-बाप और परिवार के बीच रहते हुए भी चार-छह बरस की बच्चियां भी सुरक्षित नहीं हैं, तो ऐसी तकरीबन बेघर बच्चियों का क्या होगा यह सोचना अधिक मुश्किल नहीं है। कोई हैरानी नहीं होगी कि अगर आसपास के कुछ लोग उन पर नजरें लगाए हुए मौके की तलाश में बैठ चुके हों। 

लोकतंत्र में कोई भी समाज इससे महान नहीं बनता कि वह अपने ताकतवर और खाते-पीते लोगों को किस तरह रखता है। समाज की संवेदनशीलता इससे साबित होती है कि उसके भीतर के सबसे ही कमजोर लोगों के लिए उसका क्या रूख है। इस मामले में सरकार और समाज दोनों ही मिलकर एक जिम्मेदार इकाई बनते हैं, और उनसे मिलीजुली जिम्मेदारी दिखाने की उम्मीद की जाती है। इन दिनों खबरों में परिवारों के भीतर, और खासकर गरीब परिवारों के भीतर जितने भयानक दर्जे की हिंसा देखने मिल रही है, उससे लगता है कि हर दिन कुछ बच्चे इस तरह बेसहारा या बेघर हो रहे हैं। घरेलू हिंसा के नतीजे के रूप में बेसहारा होने वाले बच्चों से परे भी हर दिन दर्जनों नए बच्चे रेलवे प्लेटफॉर्म और फुटपाथ पर बढ़ते चले जाते हैं, और एक वक्त के बाद वे परिवार को गैरजरूरी मान बैठते हैं, और परिवार उन्हें अवांछित मान लेता है। बहुत सी गंभीर कोशिशों के बाद भी परिवारों के भीतर उनकी बसाहट आसान नहीं होती है, और बहुत से मामलों में एक बार ऐसा हो जाने पर भी वह लंबी निभती नहीं हैं। 

हाल ही में छत्तीसगढ़ की इसी राजधानी की एक खबर यह थी कि यहां फुटपाथी और बेसहारा बच्चों को नशामुक्त कराने का एक सरकारी-मदद वाला केन्द्र किस तरह नाकामयाब है। आए दिन ये खबरें तो आती ही हैं कि फुटपाथी बच्चे किस तरह पंक्चर सुधारने वाले रसायन के नशे में डूबे हुए हैं। इन सब बातों को देखें तो लगता है कि छत्तीसगढ़ की आबादी का एक बहुत छोटा सा हिस्सा, लेकिन वह पूरे राज्य में शायद लाख तक पहुंच जाए, पूरी तरह से बेसहारा है, जिसमें बहुतायत बच्चों की है, लेकिन काफी संख्या में बुजुर्ग, दिव्यांग, बीमार, विक्षिप्त लोग ही हैं। सरकार को एक संवेदनशीलता दिखाते हुए तमाम बेसहारा लोगों के लिए आश्रय का एक असरदार इंतजाम करना चाहिए जिसमें सरकारी ढांचे से बाहर के भरोसेमंद और साखदार संगठनों को शामिल करना चाहिए। जब तक फुटपाथों पर, या बाग-बगीचों में, चकाचौंध मरीन ड्राईव पर, या झोपड़ों में बेसहारा और बीमार बच्चे और बूढ़े एक-एक दिन जिंदगी की लड़ाई लड़ते हैं, तब तक यह लोकतंत्र सभ्य नहीं कहला सकता। 

पूरी दुनिया में बच्चे तरह-तरह के संघर्ष कर रहे हैं, और उनमें से अधिकतर देहशोषण के शिकार भी होते चलते हैं, नशे में पड़कर वे जिंदगी का खासा हिस्सा खो भी बैठते हैं। हालात की चुनौतियों से जूझते ऐसे बच्चों के लिए राज्य सरकारों को अलग से एक योजना बनानी चाहिए। जिस तरह शारीरिक या मानसिक दिक्कतों की चुनौती झेलने वाले बच्चों के लिए अब दुनिया भर में अलग नाम प्रचलित हो चुके हैं, उसी तरह हालात की चुनौती झेलने वाले बच्चों के लिए, सर्कमस्टांशियली चैलेंज्ड चिल्ड्रन, जैसा कोई नाम तय करने की जरूरत है, और उनका एक बेहतर तो क्या, कम से कम जिंदा रहने लायक वर्तमान और भविष्य तय करने की जरूरत है। ऐसे बच्चे वोटर नहीं हैं, शायद वोट देने की उम्र तक ये जिंदा भी न रहें, या रहें भी, तो कभी उन बेघर, बेनाम, बेपता लोगों का वोटर कार्ड भी न बने, लेकिन उनका वोट न होने से उनका हक कम नहीं हो जाता। इस धरती पर जितने साधन-सुविधा हैं, उनका इस्तेमाल करके सरकार और बाजार दोनों खूब कमाई करते हैं, उस पूरी कमाई में ऐसे सबसे कमजोर, सबसे गरीब, सबसे बेबस, और सबसे वंचित लोगों का पहला हक होना चाहिए, क्योंकि उनकी जरूरत महज जिंदा रहने की है। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 23 जनवरी 2020

एक बड़े अपहरण के बाद, और रिहाई की कामयाबी के बाद...

संपादकीय
23 जनवरी 2020

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से एक उद्योगपति के अपहरण, और 25 करोड़ फिरौती की मांग के बाद पुलिस उसे छुड़ाकर लेकर आई तो यह एक  बड़ी कामयाबी की बात रही। एक पखवाड़ा जरूर लगा, लेकिन बिहार के पेशेवर अपहरणकर्ता-गिरोह को ढूंढना, और इस चौकन्नेपन के साथ ढूंढना कि अपहरण किए गए आदमी का कोई नुकसान भी न हो, जाहिर तौर पर एक मुश्किल काम था। कल आधी रात जब पुलिस इस उद्योगपति को लेकर लौटी तो मीडिया के सामने प्रदेश के पुलिस मुखिया ने बताया कि कितने अफसर और कितने कर्मचारी इस तलाश में झोंके गए थे। आज सुबह के अखबारों में बड़ी-बड़ी सुर्खियों में यही खबर पहले पन्ने पर थी।

लेकिन आज सुबह के अखबारों में ही, कम से कम एक प्रमुख अखबार में भीतर के एक पन्ने पर एक बड़ी सी सुर्खी थी कि इसी छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले के सौ से अधिक बच्चे महीनों से गायब हैं, और रोती हुई एक मां कह रही है कि कोई उसके बेटे को ढूंढकर लाए। खबर में यह भी छपा है कि चेन्नई और हैदराबाद में ऐसे नाबालिग मजदूर बच्चों को दो-तीन हजार रूपए में बेचा जा रहा है। इन बच्चों में पंडो-आदिवासी समुदाय के बच्चे भी महीनों से गायब हैं, और लोगों को याद होगा कि इस जनजाति को राष्ट्रपति की दत्तक संतानें भी कहा जाता है। बच्चों की यह बिक्री सरकार की जानकारी में है, और देश की सर्वोच्च अदालत लंबे समय से इस बात की फिक्र कर रही है कि देश भर में लापता बच्चों की तलाश के लिए सरकार क्या कर रही है। 

यह बात सही है कि एक उद्योगपति का अपहरण, और करोड़ों की फिरौती की मांग एक बड़ी खबर बनती है, और उसकी तलाश में एक पखवाड़े पुलिस जुटी रहती है, कई राज्यों तक जाती है, लेकिन ऐसे ही दिन आई हुई यह दूसरी खबर यह सोचने पर मजबूर करती है कि इसी छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाके जशपुर से किस तरह हजारों लड़कियां महानगरों में मजदूरी के लिए ले जाई जाती हैं, और उनमें से बहुत से बेबस लड़कियों से गलत धंधा भी करवाया जाता है। किस तरह छत्तीसगढ़ से हर बरस दसियों हजार लोग बेहतर मजदूरी की तलाश में उत्तर भारत से लेकर कश्मीर और लद्दाख तक जाकर बंधुआ मजदूरों की तरह काम करते हैं, कहीं वे आन्ध्र के ईंट भट्टों से रिहा करवाए जाते हैं, तो कहीं किसी और प्रदेश से। जब उनके बंधुआ होने की खबर आ जाती है, उसके बाद पुलिस या सरकार के दूसरे महकमे के लोग जाकर उनको छुड़ाते हैं। लेकिन जब ट्रेन और बसों से थोक में लोगों को ले जाया जाता है, तो वैसे मजदूर-दलाल पुलिस की निगाह में रहने के बावजूद उन इलाकों में लगातार काम करते हैं, और छत्तीसगढ़ के मजदूरों को, यहां की लड़कियों को, बच्चों को बाहर ले जाकर बेचते हैं, बंधुआ बनाते हैं। 

जिस तरह छत्तीसगढ़ का मीडिया दो उड़ानों के लेट होने को लेकर खबर बनाने में जुट जाता है, और दर्जन भर ट्रेनें उससे अधिक लेट हों, तो भी खबर नहीं बनती, उसी तरह का रूख सरकार और पुलिस का भी रहता है। किसी संपन्न की तलाश, और किसी विपन्न की तलाश में बहुत फर्क दिखाई पड़ता है। जिंदगी तो सबकी एक बराबर ही होनी चाहिए, लेकिन लोगों की संपन्नता उनको सरकार में, या मीडिया में, कम या अधिक महत्वपूर्ण बना देती है, और फिर खबरों के दबाव में, सत्ता तक पहुंच के दबाव में सरकारी कार्रवाई होती है। किसी संपन्न को बचाना अच्छी बात है क्योंकि उसका भी हक देश के कानूनी इंतजाम पर पूरा है। लेकिन आधी रात मीडिया से बात करने वाली पुलिस क्या आज मीडिया में ही आई इस दूसरी खबर पर कुछ बोलेगी? क्या सैकड़ों बच्चों के लापता होने, बाहर जाकर बंधुआ हो जाने या बिक जाने के बारे में कुछ कहेगी? क्या इन जिलों के जिम्मेदार अफसरों की कोई जवाबदेही तय होगी? क्योंकि कल इस बड़ी रिहाई के बाद तो यह बात भी कही गई कि डीजीपी से लेकर सीएम तक किस तरह लगातार इस मामले की जांच पर नजर रखे हुए थे, और दरियाफ्त कर रहे थे। यह बात जाहिर है कि सूरजपुर के सैकड़ों बच्चों की मिलकर भी उतनी न्यूजवेल्यू नहीं है जितनी कि एक बड़े उद्योगपति की है, लेकिन अब जब पुलिस का एक बड़ा अमला जुर्म को सुलझाने से फारिग हो चुका है, तो फिर सीएम से लेकर डीजी तक, और जिलों की पुलिस तक को विपन्न बच्चों की तलाश के सुप्रीम कोर्ट के हुक्म पर भी कुछ अमल कर लेना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 22 जनवरी 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 22 जनवरी 2020

ये विशेषण हैं, या गाली?

संपादकीय
22 जनवरी 2020

अखबारनवीसी के धंधे में जो लोग ईमानदारी, या गंभीरता, या दोनों एक साथ लेकर काम करते हैं, उन्हें कुछ शब्द खासा परेशान करते हैं। बहुत से लोग उनसे निष्पक्ष या तटस्थ रहने की उम्मीद करते हैं, बहुत से लोग उनकी तारीफ में यह कहते हैं कि वे बहुत निष्पक्ष लिखते हैं, या तटस्थ लिखते हैं, या उनका अखबार बड़ा निष्पक्ष है। यह लेबल बड़ा खतरनाक है, और यह विशेषण न होकर एक किस्म की आलोचना है। अखबार समाचार और विचार दोनों के लिए होते हैं, और समाचार को पल भर के लिए अलग भी रखें, तो भी विचार कैसे निष्पक्ष हो सकते हैं? अखबारों की दुनिया में तथ्य निष्पक्ष हो सकते हैं, आंकड़े निष्पक्ष हो सकते हैं, लेकिन विचार कैसे निष्पक्ष हो जाएंगे, वे कैसे तटस्थ हो जाएंगे? नतीजा यह होता है कि समाचारों के पन्नों पर बिना लाग-लपेट खबरों को ईमानदारी से सामने रख देने की निष्पक्षता को लोग विचारों के पन्ने या पन्नों पर भी चाहने लगते हैं, जो कि अखबारनवीस की ईमानदारी में मुमकिन नहीं है। अगर अखबार या संपादक की कोई सोच है, तो वह अखबार की राय में खुलकर सामने आएगी, वरना इन दिनों बहुत से अखबार बिना संपादक, बिना विचारों के पन्नों के भी निकल रहे हैं, और राय रखने वाले अखबारों के मुकाबले अधिक सहूलियत की जिंदगी भी जी रहे हैं। 

कुछ लोग समाचारों को बनाते हुए, उन्हें छापते हुए सांसारिकता से वैराग्य किस्म की एक ऐसी तटस्थता दिखाते हैं जिनमें वे खुद अदृश्य हो जाते हैं। आज ही एक अखबारनवीस का ट्वीट है कि एक व्यक्ति कह रहा है कि बाहर बारिश हो रही है, और दूसरा कह रहा है कि बाहर बारिश नहीं हो रही है, तो अखबारनवीस का काम इन दोनों के बयानों को छाप देने जैसा तटस्थ और निष्पक्ष नहीं हो सकता, उससे इतनी समझ और अक्ल की उम्मीद भी की जाती है कि वह खिड़़की से बाहर झांककर देखे कि बारिश हो रही है या नहीं, और अपना देखा सच भी इन बयानों के साथ समाचार में लिखे। न सिर्फ इस किस्म का वैराग्य, बल्कि कई दूसरे किस्मों की निष्पक्षता भी इन दिनों बड़ी सहूलियत से इस्तेमाल की जा रही हैं जिनमें लोगों की कही हुई बातों को ज्यों का त्यों लिख देना होता है, और उनसे असुविधा खड़ी करने वाली कोई भी बात नहीं पूछी जाती। और तो और देश के बड़े-बड़े लोगों के बड़े-बड़े इंटरव्यू लेने वाले बड़े-बड़े नामी-गिरामी मीडिया-मुखिया भी फूंक-फूंककर चलते हैं, और दिक्कत का कोई सवाल नहीं पूछते। 

सरकार और बाजार, इन दोनों को तो ऐसी निष्पक्षता ठीक लग सकती है, क्योंकि अगर लोगों ने विचारों में पक्ष लिया, अपने विचार लिखे, तो वे आमतौर पर ताकतवर के खिलाफ जा सकते हैं, और कमजोर के हिमायती हो सकते हैं। ऐसा ही हाल समाचारों को लेकर भी है कि अगर अखबारों के लोग जागरूक हुए, तो वे समाचारों से विचारों को अलग तो रखेंगे, लेकिन अपनी अक्ल और समझ को घर रखकर दफ्तर या प्रेस कांफ्रेंस में नहीं जाएंगे। यह पूरा सिलसिला बड़ा खतरनाक है, खासकर उस वक्त जब कोई राय न रखना, किसी का पक्ष न लेना, तटस्थ और मौन बने रहना एक किस्म से खूबी मान ली जाती है, और लोगों की तारीफ में इन बातों को विशेषण की तरह इस्तेमाल किया जाता है। कोई पत्थर ही तटस्थ रह सकता है, या ऐसे लोग ही तटस्थ रह सकते हैं जिनके दिमाग पत्थर जैसे ठोस हों, जिनका दिल भी पत्थर जैसा हो। बाकी तो तमाम लोग वक्त और हालात को देखकर कुछ न कुछ सोचेंगे, कुछ न कुछ सोचते हैं। यह सिलसिला खत्म करने की साजिश पहले के मुकाबले अब बहुत अधिक हो गई है, और शायद सोचने वाले, जिम्मेदारी से सोचने वाले दिमाग एक खतरनाक हथियार मान लिए गए हैं। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 21 जनवरी 2020

ऐसा है इस गणतंत्र दिवस पर हिंदुस्तान का मेहमान

संपादकीय
21 जनवरी 2020

भारत के इस बरस के गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि  ब्राजील के राष्ट्रपति जेयर बोलसोनारो होंगे। आज जब देश भर में मोदी सरकार महिलाओं के आंदोलन झेल रही है, तब साल भर के इस सबसे बड़े राजकीय समारोह के मेहमान की पसंद हैरान करती है। ब्राजील की राजनीति में इस नेता को सबसे दकियानूसी दक्षिणपंथी, महिला विरोधी, समलैंगिकों का विरोधी, नस्लभेदी माना जाता है। इस नेता को दुनिया भर में एक घटिया इंसान माना जाता है, और उसे भारत ने गणतंत्र दिवस समारोह का मुख्य अतिथि बनाया है।

ब्राजील के इस नेता के बीते बरसों के बयान कैमरों पर दर्ज हैं, और अखबारी कतरनों में भी। बीस बरस पहले इसने ब्राजील की संसद को खत्म करके तानाशाही की वकालत की थी, और कहा था कि राष्ट्रपति सहित तीस हजार भ्रष्ट लोगों को गोली मार देनी चाहिए। उसके इस बयान पर वहां की संसद के नेताओं ने उसे संसद से निकालने की मांग भी की थी और राष्ट्रपति ने कहा था कि यह साफ है कि बोलसोनारो को लोकतंत्र छू भी नहीं गया है। इसके बाद टीवी कैमरों के सामने इसने एक साथी महिला सांसद के बारे में कहा- मैं तुमसे बलात्कार भी नहीं करने वाला हूं, क्योंकि तुम उस लायक भी नहीं हो।

बाद में बोलसोनारो ने संसद के भीतर भी इस बात को दुहराया जिस पर उसे चेतावनी भी दी गई और तीन हजार डॉलर का जुर्माना भी लगाया गया। अपने पूरे राजनीतिक जीवन में बोलसोनारो समलैंगिकों और ट्रांसजेंडरों के खिलाफ बयान देते आया है, जिसमें वह समलैंगिकों को पीटने की बात भी बोलते रहा, और कहा-मैं अपने बेटे के समलैंगिक होने पर उसे भी प्यार नहीं कर सकूंगा, मैं चाहूंगा कि वह किसी एक्सीडेंट में मारा जाए। अपनी वामपंथ विरोधी विचारधारा के चलते उसने तानाशाही के दिनों में ब्राजील में वामपंथियों को टॉर्चर करने वाले लोगों को देश का नायक कहा, और उनकी तारीफ की। ब्राजील का यह नेता अफ्रीकी नस्ल के लोगों के बारे में अपमानजनक बातें कहने के लिए जाना जाता है और उसका बयान है-ये लोग कुछ नहीं करते, ये लोग अपनी नस्ल भी आगे बढ़ाने के लायक नहीं हैं। इस बयान पर वहां की एक अदालत ने बोलसोनारो को अल्पसंख्यकों की बेइज्जती का दोषी पाया था, और उस पर पन्द्रह हजार डॉलर का जुर्माना लगाया था।

इस नेता के दिल में मानवाधिकारों के लिए कोई सम्मान नहीं है। उसने सार्वजनिक रूप से कहा है कि अपराधियों को गोली मारने वाले पुलिस अफसरों को ईनाम देना चाहिए। उसका बयान है-वह पुलिस अफसर जो जान से मारता नहीं, वह पुलिस अफसर ही नहीं है। बोलसोनारो  ने किसी गैरफौजी को प्रतिरक्षा मंत्री बनाने का भी विरोध किया था। इंटरनेट ब्राजील के इस घोर दक्षिणपंथी नेता के हिंसक बयानों से भरा हुआ है। अपने खुद के परिवार के बारे में इसका कहना था-मेरे पांच बच्चे हैं, लेकिन चार बच्चों के बाद एक कमजोर क्षण पर पांचवे की नौबत आई, और वह लड़की निकली। ब्राजील में बाहर से आए और बसे लोगों के बारे में इसका बयान था कि दुनिया भर की सबसे बुरी गंदगी ब्राजील आ रही है, जैसे कि हमारे पास अपनी खुद की समस्याएं कम हों। 

अब जब हिंदुस्तान गणतंत्र दिवस पर इस नेता का स्वागत करेगा, तो हिंदुस्तान के ये तमाम तबके, महिलाएं, दूसरे देशों से आकर बसे लोग, वामपंथी, अल्पसंख्यक, लड़कियां, समलैंगिक और ट्रांसजेंडर यह याद करेंगे कि उन्हें गालियां देने वाला इस देश का इस बरस का सबसे बड़ा मेहमान बनाया गया है। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

अंतरिक्ष में फौजी इरादों के खतरे समझने की जरूरत

संपादकीय
20 जनवरी 2020

अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले महीने अमरीका की अंतरिक्ष-फौज बनाने की घोषणा की थी, और अभी उस फौज की पोशाक सामने रखी गई हैं। धरती पर रेगिस्तान में, या जंगलों के बीच काम करने वाली फौज की वर्दी के कपड़े उस इलाके के प्राकृतिक नजारे से मिलते-जुलते बनाए जाते हैं, ताकि वे आसमान या जमीन से देखे जाने पर आसपास की चीजों से मिलते-जुलते दिखें, या बेहतर यह कहना होगा कि न दिखें। ऐसे में अमरीका की अंतरिक्ष-फौज के लिए बनाई गई पोशाक धरती के पेड़-पौधों, जमीन से मिलती-जुलती देखकर लोगों को हैरानी हुई है। कई लोगों ने अमरीकी सरकार से यह सवाल भी किया है कि अंतरिक्ष में इस फौज को कितने पेड़-पौधे मिलने की उम्मीद है? इस पर सरकार की ओर से सफाई दी गई है कि फौज के बाकी हिस्सों के लिए बनी हुई पोशाकों का ही अंतरिक्ष-फौज के लिए इस्तेमाल हो जाएगा, और किफायत रहेगी। 

लेकिन बात इतनी आसान लगती नहीं है। अंतरिक्ष-फौज अपने आपमें एक खर्चीला नजरिया है, और यह बाकी दुनिया पर एक किस्म से हमलावर पहल भी है क्योंकि अंतरिक्ष की सीमाएं देश की सरहदों से बंधी हुई नहीं है। समंदर को तो फिर भी तमाम देशों ने अपनी जमीन के आसपास तक अपनी सीमा तय कर रखा है, और बाकी का समंदर अंतरराष्ट्रीय माना जाता है। लेकिन अंतरिक्ष में ऐसा कुछ मुमकिन नहीं है। आज भी दुनिया के अलग-अलग देश अलग-अलग ग्रहों तक कई किस्म की यात्राएं कर रहे हैं, चांद पर कचरा छोड़कर आ रहे हैं, और अंतरिक्ष में कई किस्म का कबाड़ घूम रहा है जो कि अंतरिक्षयानों का छोड़ा हुआ है। ऐसे में एक पिछले अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के स्टारवॉर्स की सोच को फिर से जिंदा करके उसे आगे बढ़ाने का ट्रंप का फैसला एक अस्थिर और हमलावर दिमाग वाले नेता का युद्धोन्माद तो है ही, इसे किसी भी तरह से मासूम नहीं माना जाना चाहिए, और यह बात इस फौज की वर्दी पर भी लागू होती है जो कि धरती के जंगलों के बीच छुप जाने वाली दिखती है। 

लोगों को अभी कुछ बरस पहले आई हुई एक फिल्म, अवतार, याद रहनी चाहिए जिसमें एक किसी ग्रह पर एक खनिज की तलाश में धरती से हमलावर फौज पहुंचती है और वहां पर वहां के मूल निवासियों के साथ एक जंग छेड़कर उस ग्रह पर कब्जे की कोशिश करती है। वह पूरा ग्रह पेड़-पौधों से, कुदरती खूबसूरती से भरा हुआ ग्रह था, और आज भी जब अंतरिक्ष में फौजी कार्रवाई के बारे में कोई देश हमलावर-महत्वाकांक्षा रखता है, तो जाहिर है कि वह ऐसे ग्रहों की संभावनाओं को अनदेखा नहीं करेगा। अमरीका की इस नई फौज की वर्दी को इस तरह से ही देखना चाहिए कि यह ऐसे किसी दिन की कल्पना पर भी माकूल बैठती है जिसमें किसी दूसरे ग्रह पर फौजी कार्रवाई की हसरत रखी गई हो। लोगों को दुनिया के इस सबसे हमलावर देश, सबसे बड़े गुंडे, के नजरिये को कभी भूलना नहीं चाहिए कि वह किस तरह अपने आपको दुनिया के बाकी देशों से ऊपर गिनता है। अमरीकी फिल्मों में कई बार यह कहानी दिखाई जा चुकी है कि दूसरे ग्रहों से जब हमले होंगे, तो उसका सामना करने की जिम्मेदारी पूरी दुनिया में सिर्फ अमरीकी राष्ट्रपति उठाएगा। अमरीकी सरकार की वेबसाईटों को देखें, तो उनमें देश का नाम नहीं लिखा जाता, बस डॉटगवर्नमेेंट लिखा जाता है, माने वे धरती की अकेली सरकार हों। 

लेकिन वर्दी के हमारे खुद के सोचे हुए इस विवाद से परे देखें, तो अंतरिक्ष की फौज किसी दूसरे ग्रह के हमलावरों से निपटने के काम तो शायद सैकड़ों या हजारों बरस बाद आए, सबसे पहले तो वह इसी धरती पर सुरक्षा का शक्ति संतुलन खत्म करने का काम होगा। आज वैसे भी भुखमरी से भरी इस गरीब दुनिया में फौज पर खर्च अंधाधुंध बढ़ते चल रहा है, और गरीब देश पढ़ाई और इलाज से अधिक खर्च फौज पर किए जा रहे हैं। ऐसे में जंगी तैयारी को अंतरिक्ष तक ले जाना, इससे दुनिया की महाशक्तियों के बीच खर्च की एक अंधी दौड़ शुरू होगी, बढ़ेगी, और जाने कहां जाकर थमेगी। जिस तरह विज्ञान के कुछ दूसरे दायरों में मानव-क्लोनिंग जैसी मौजूदा तकनीकों पर और काम न करने की एक अंतरराष्ट्रीय सहमति बनी हुई है, उसी तरह की एक सहमति अंतरिक्ष के फौजी इस्तेमाल न करने की बननी चाहिए। जंग तो धरती और समंदर में भी, धरती के ठीक ऊपर के आसमान पर भी नहीें लड़ा जाना चाहिए, अंतरिक्ष तो दूर की बात है। लेकिन अगले चुनाव के मुहाने पर खड़े डोनल्ड ट्रंप को अपने देश के युद्धोन्माद लोगों को खुश करने के लिए यह एक आकर्षक और तुरत असर वाला झांसा सूझा है, जो कि हो सकता है कि चुनाव जीतने के बाद बहुत आगे न बढ़े, लेकिन उसके आगे बढऩे के खतरे को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए। आज दुनिया के देशों के बीच सहमति कायम करने की कोई संस्था नहीं है। संयुक्त राष्ट्र संघ एक पूरी तरह से बेअसर संगठन हो गया है जो कि पिछले कई दशकों में अमरीकी-इजराईली गुंडागर्दी को भी रोक नहीं पाया है। इसलिए अंतरिक्ष में जंगी तैयारियों के खिलाफ एक सहमति बनने की हमारी सोच आदर्शवाद अधिक है, उस पर अमल करते कोई नहीं दिखते, खासकर जिनके हाथों में सबसे अधिक ताकत है, वे तो बिल्कुल ही नहीं दिखते। यह लिखने का एक ही मकसद हो सकता है कि लोग कम से कम सामने खड़े इस खतरे के बारे में सोचें, और जंगखोर अमरीका के इस हिंसक और हमलावर, बेदिमाग और बददिमाग राष्ट्रपति के इरादों के खिलाफ सोचें।  

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 20 जनवरी 2020

नीति आयोग के ऐसे सदस्य को बर्खास्त कर, केस चले

संपादकीय
19 जनवरी 2020

नीति आयोग के एक सदस्य वी.के. सारस्वत ने कहा है कि कश्मीर में पोर्न देखने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल होता था। उनका यह भी कहना है कि वहां इंटरनेट बंद होने से अर्थव्यवस्था पर कोई खास असर नहीं पड़ा। जमीनी हकीकत यह है कि 5 अगस्त से कश्मीर में इंटरनेट बंद है और सभी तरह के कारोबार पर इसका बहुत बुरा असर पड़ा है। तकलीफदेह बात यह है कि नीति आयोग का एक सदस्य, जिसे कश्मीर की अर्थव्यवस्था को लेकर फिक्र होनी चाहिए थी, उसे कश्मीर में लोगों के गंदी फिल्में देखने पर फिक्र हो रही है, और कारोबार का कुचला जाना दिख ही नहीं रहा है। 

दिक्कत यह है कि कश्मीर को अलग-थलग करके बदनाम करने की यह हरकत इस बात को पूरी तरह अनदेखा कर रही है कि बाकी देश में इंटरनेट पर पोर्न देखा जाता है या नहीं। यह कश्मीर के खिलाफ एक हिंसक पूर्वाग्रह है जो वहां के लोगों को बदनाम करने की सोची-समझी हरकत है। नीति आयोग के इस सदस्य को, या नीति आयोग को बाकी देश के बारे में भी आंकड़े जारी करने चाहिए कि किस-किस प्रदेश में नेट का इस्तेमाल किस हद तक पोर्नोग्राफी देखने के लिए होता है। और फिर इसमें ऊपर आने वाले तमाम राज्यों में भी इंटरनेट बंद कर देना चाहिए ताकि वहां भारतीय संस्कृति बचाई जा सके। नीति आयोग का सदस्य तकलीफ से गुजर रहे एक राज्य के बारे में यह कहे कि वहां इंटरनेट न हो तो क्या फर्क पड़ता है, वैसे भी आप इंटरनेट में क्या देखते हैं, गंदी फिल्में देखने के अलावा कुछ नहीं करते आप। भारत सरकार के इस सर्वोच्च तथाकथित नीति-निर्धारक आयोग के सदस्य का ऐसा बुरा हाल शर्मनाक है, और अगर यह कोई सभ्य लोकतंत्र होता, तो अब तक यह सदस्य बर्खास्त हो चुका होता। लेकिन आज हिन्दुस्तान में केन्द्र सरकार को पसंद और नापसंद बातों को लेकर लोग कितने भी आक्रामक हो सकते हैं, अगर वे सरकार के रूख का समर्थन करते हैं।  हमारा ख्याल है कि कश्मीर की जनता में से कोई इस बयान के खिलाफ अदालत में राज्य की मानहानि का मुकदमा भी अदालत में दायर कर सकते हैं क्योंकि इससे प्रदेश की तस्वीर पूरी दुनिया में खराब बन रही है। 

आज जिन लोगों को लगता है कि कश्मीर में इंटरनेट बंद होना कोई बड़ी बात नहीं है, उन लोगों को यह भी समझना चाहिए कि उनकी अपनी जिंदगी भारत के दूसरे हिस्सों में बिना इंटरनेट कैसी रह जाएगी? आज कश्मीर के साथ ऐसी बदसलूकी हिन्दुस्तान के उन लोगों को अधिक सुहा रही है जिनको कश्मीर का एक इंच हिस्सा भी पाकिस्तान को देना कुबूल नहीं है। अपने देश के एक हिस्से को बाकी देश का दुश्मन मानें, उसे गद्दार मानें, और फिर वहां की जमीन को अपना बताएं। तो कश्मीर महज एक जमीन का नाम नहीं है, वह वहां के इंसानों का भी नाम है, वहां के इतिहास, वहां की संस्कृति, वहां के धड़कते बदनों के भीतर अरमानों का नाम भी है। कश्मीर को गंदी जुबान में गालियां देकर इस तरह बदनाम करना एक शर्मनाक हरकत है, और यह बात अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि ऐसा बयान देने वाला नीति आयोग का एक सदस्य है, उसे बर्खास्त भी करना चाहिए, और उसे अदालत में भी घसीटना चाहिए।  

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 19 जनवरी 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 19 जनवरी 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 18 जनवरी 2020

बाजार-कारोबार को लेकर सरकार तंगनजरिया क्यों?

संपादकीय
18 जनवरी 2020

नई पीढ़ी का एक नया नजरिया भी रहता है जो कि नई संभावनाएं तलाशता है। मुम्बई में ठाकरे परिवार पहली बार मुख्यमंत्री बना, और उद्ध्व ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे पर्यटन मंत्री बने। उन्होंने अभी यह तय किया है कि महानगर मुम्बई के बहुत से मॉल्स और रेस्त्रां चौबीसों घंटे खुले रहेंगे। कारोबारियों के साथ एक बैठक में, पुलिस की मौजूदगी में यह तय हुआ। आदित्य का कहना है कि इससे राज्य की कमाई बढ़ेगी, और हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा।

हमारे पुराने पाठकों को याद होगा कि हम हर कुछ बरस में प्रदेश सरकारों के लिए इसी जगह पर ऐसी सलाह लिखते आए हैं। शहरों को लेकर हमारा यह तर्क रहा है कि बाजार के दस-बारह घंटों में ही सरकारी दफ्तरों से लेकर स्कूल-कॉलेज तक का भी बोझ सडक़ों पर पड़ता है, और रात के घंटों में सडक़ें सुनसान हो जाती हैं। सडक़ों और पार्किंग का यह असंतुलित इस्तेमाल बेहतर करने की जरूरत है, और शहरियों को बाजार, सिनेमा, या रेस्त्रां की अधिक घंटों की सहूलियत भी मिलनी चाहिए। आज लोग अलग-अलग शिफ्टों में काम करते हैं, पढऩे और दूसरे इम्तिहान की तैयारियों वाले लोग रात-दिन किसी भी समय अपनी सुविधा और पसंद से पढ़ते हैं, और उन्हें खाने-पीने की जरूरत भी अपने वक्त पर पड़ती है। ऐसे में बाजार का जो हिस्सा देर रात तक या पूरी रात खुला रहना चाहे, उसे शासन-प्रशासन की ओर से इसकी छूट मिलनी चाहिए। इससे दिन और शाम के व्यस्त घंटों में लगने वाला ट्रैफिक जाम भी घटेगा, और बिजली की खपत भी अतिरिक्त बिजली वाले घंटों में खिसकेगी। आज आधी रात के बाद की कारोबारी बिजली की खपत भी कम रहती है, जो कि देर रात या सुबह तक की चहल-पहल से उन घंटों में बढ़ सकती है, और शाम के घंटों में कुछ कम भी हो सकती है। जिस तरह टीवी के चैनल रात-दिन काम करते हैं, मोबाइल फोन, प्लेन, ट्रेन, बसें, रात-दिन काम करते हैं, उसी तरह बाजार, सिनेमाघर, रेस्त्रां भी पूरे वक्त काम कर सकते हैं। जो लोग यह सोचते हैं कि रात में कारोबार बढऩे से सडक़ों पर पुलिस की हिफाजत बढ़ानी पड़ेगी, उनकी सोच शायद सही नहीं है। रात सडक़ों पर जुर्म इसलिए अधिक होते हैं कि सडक़ें सुनसान होती हैं। जब बाजारों की रौशनी रहेगी, चहल-पहल रहेगी, तो जुर्म कम होंगे।

अब दूसरे शहरों से देर रात आने-जाने वाले लोगों की गिनती बढ़ती चल रही है, पर्यटक बढ़ते चल रहे हैं, और इन्हें बाजार बंद होने से दिक्कत झेलनी पड़ती है। आज हिन्दुस्तान में कारोबार में मंदी है, बेरोजगारी बढ़ी हुई है, सरकार का टैक्स कलेक्शन घट रहा है, ऐसे में एक नई सोच से एक नई कोशिश की जानी चाहिए। यह भी याद रखना चाहिए कि मॉल्स, बाजार, सिनेमाघर, और रेस्त्रां पर कारोबारियों का पूंजीनिवेश तो हो ही चुका रहता है, उसे वे बारह घंटे चलाएं, या चौबीस घंटे। इसके बाद कोई नई लागत उन्हें नहीं लगेगी, महज बिजली और कर्मचारियों का खर्च ही लगेगा। बैंकों से ब्याज पर कर्ज लेकर कारोबार करने वाले लोगों पर बैंक का ब्याज-मीटर तो चौबीसों घंटे चलता है, इसलिए भी कारोबार की धारणा को सीमित घंटों से हटाकर पूरे वक्त की करने की जरूरत है।

आज शहरों में खुद कारोबारी अपने धंधे से निकलकर घर पहुंचते हुए इतने लेट हो जाते हैं, कि उसके बाद परिवार को लेकर बाहर नहीं निकल पाते। जिन परिवारों में अधिक लोग नौकरीपेशा हैं, उनके भी काम के घंटे अलग होने पर बाजार साथ जाने का वक्त नहीं मिलता है। पश्चिम के अधिकांश विकसित देशों में बाजार का एक हिस्सा दिन-रात काम करता है, और उससे लोगों को बड़ी सुविधा मिलती है। भारत की राज्य सरकारों को भी इस बारे में सोचना चाहिए कि जब रेलवे स्टेशनों और हवाई अड्डों पर चौबीसों घंटे कारोबार हो सकता है, तो शहरों के बीच कारोबार के बने-बनाए ढांचे का बेहतर और अधिक इस्तेमाल क्यों नहीं हो सकता? इससे सडक़ों और पार्किंग का भी बेहतर इस्तेमाल होगा, और दिन-शाम के व्यस्त घंटों में शहरों का दमघोंटू ढांचा अधिक सुविधाजनक हो सकेगा। खुद सरकार का बड़ा पूंजीनिवेश सडक़ों और पार्किंग में हो चुका है, और उसे भी इसका अधिक इस्तेमाल, बेहतर इस्तेमाल करने के बारे में सोचना चाहिए। बंधी-बंधाई लीक पर चल रहा सरकारी इंतजाम अब पुराना और बेअसर हो चुका है, और एक नई सोच की जरूरत है। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 17 जनवरी 2020

बुतपरस्ती बंद हो

संपादकीय
17 जनवरी 2020

बाम्बे हाईकोर्ट ने कल वहां के एक अस्पताल को सरकारी मदद देने से हाथ खींच लेने पर महाराष्ट्र सरकार को फटकारा है, और कहा है कि सरकार के पास मूर्तियां लगाने के लिए पैसा है, लेकिन जनता के इलाज के लिए नहीं है? अदालत ने कहा कि राज्य सरकार सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा से भी ऊंची बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिमा लगवाना चाह रही है, इस सबके लिए पैसा है, लेकिन जिन लोगों का अंबेडकर ने पूरी जिंदगी प्रतिनिधित्व किया वो मर सकते हैं? अदालत ने पूछा कि लोगों को बीमारियों से छुटकारा पाने के लिए इलाज की जरूरत है या प्रतिमाओं की? जनस्वास्थ्य कभी सरकार की प्राथमिकता नहीं रहा, और मुख्यमंत्री उद्घाटनों में व्यस्त हैं। अदालत ने यह भी कहा कि जिस तरह राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और गुजरात की सरकारें बच्चों के मरने पर कुछ नहीं कर रही हैं क्या यही नौबत महाराष्ट्र में भी आने वाली है? 

हिन्दुस्तान प्रतिमाओं के संक्रमण से घिरा हुआ देश है। जब तक किसी धर्म की प्रतिमाएं उसके धर्मालुओं के पैसों से बनती हैं, तब तक तो कोई बात नहीं है, लेकिन जब किसी धर्म पर सरकार खर्च करती है, या किसी महान व्यक्ति, या अन्य नेता की प्रतिमाओं पर बड़ी सरकारी रकम खर्च होती है, तो जाहिर है कि वह गरीब बच्चों के मुंह का कौर छीनकर, या गरीब मरीजों के इलाज में कटौती करके ही खर्च होती है। दिक्कत यह है कि भारतीय संसदीय व्यवस्था में जो बात संसद को कहना चाहिए, वह बात आए दिन अदालतें कह रही हैं, और सरकार तो मानो न संसद के प्रति जवाबदेह है, न ही अदालत के प्रति। जनता के प्रति सीधे जवाबदेह जो निर्वाचित जनप्रतिनिधि विधानसभा और संसद में ऐसी बातों को रखने वाले होने चाहिए, वे प्रतिमाओं से जुड़ी भावनाएं दुहने में लग जाते हैं, और सदनों में बड़ी-बड़ी रकम मंजूर करवाते हैं, उसकी मुनादी करवाते हैं। देश की जनता का एक बड़ा तबका इस हद तक कमअक्ल है कि उन्हें प्रतिमाओं से गौरव हासिल होता है, और बच्चों के जिंदा रहने या मर जाने से फर्क नहीं पड़ता। यह देश वैज्ञानिक चेतना से दूर धकेलकर एक ऐसे युग में ले जाया जा रहा है जहां प्रतिमाओं से ही सबसे अधिक गौरव हासिल होता है। देश भर में एकता को तबाह करने के साथ-साथ स्टेच्यू ऑफ यूनिटी के नाम से सरदार पटेल की दुनिया भर की सबसे ऊंची प्रतिमा पर तीन हजार करोड़ रूपए से अधिक खर्च कर दिए गए। अब उसी किस्म का कोई खर्च महाराष्ट्र में शिवाजी की प्रतिमा पर होने वाला है, और यह भी तय किया गया है कि बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिमा की ऊंचाई भी शायद सौ फीट बढ़ाई जाएगी, और उत्तरप्रदेश में सरकारी खर्च पर राम की आसमान छूती प्रतिमा बनाई जाएगी। 

यह देश, जैसा कि बाम्बे हाईकोर्ट ने कहा है, कई प्रदेशों में बच्चों को बेमौत मरते देख रहा है, उनका इलाज नहीं हो रहा क्योंकि उत्तरप्रदेश में ऑक्सीजन नहीं है, राजस्थान में तमाम मशीनें खराब पड़ी हैं, और दूसरे प्रदेशों में भी कमोबेश यही हाल है, सिवाय दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के जिन्होंने किसी प्रतिमा पर एक धेला खर्च नहीं किया, कोई स्मारक नहीं बनवाया, लेकिन दिल्ली की सरकारी स्कूलों को हिन्दुस्तान की सबसे अच्छी स्कूलें बनवा दिया है, और हर मोहल्ले में क्लीनिक खुलवा दिए हैं। देश की राजधानी दिल्ली में जाते तो सभी राज्यों के मंत्री-मुख्यमंत्री हैं, लेकिन दिल्ली से सबक लेने का काम कोई नहीं कर रहे हैं, और इसके लिए अदालतों को फटकार लगानी पड़ रही है। हम पिछले बरसों में लगातार भारतीय राजनीति की बुतपरस्ती के खिलाफ लिखते आए हैं कि जनता के पैसों से कोई भी प्रतिमा बनाना तुरंत बंद होना चाहिए, और जिस नेता की प्रतिमा बनवाना हो, उसे उनके मानने वाले लोग अपने पैसों से बनवाएं। यह देश टीकाकरण अभियान के लिए दूसरे देशों से मदद मांग रहा है, यहां सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की हालत इतनी खराब है कि गरीब अपनी जमीन बेचकर भी निजी अस्पताल में इलाज कराने जाते हैं, और गरीब लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजने के लिए पेट काटकर इंतजाम करते हैं। ऐसी बुतपरस्ती के खिलाफ जनता के बीच से ही एक बड़ी आवाज उठनी चाहिए। किसी भी प्रदेश या किसी भी म्युनिसिपल में प्रतिमा पर जनता का पैसा खर्च करना तुरंत बंद होना चाहिए, और देश की अदालतों को खुद होकर इस मुद्दे को एक जनहित याचिका के रूप में दर्ज करना चाहिए, सरकारों से जवाब मांगना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM