दीवारों पर लिक्खा है, 29 फ़रवरी 2020

सरकार से असहमति को राजद्रोह मानने की सोच...

संपादकीय
29 फ़रवरी 2020
 
दिल्ली के जेएनयू में वहां के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार ने चार बरस पहले राजद्रोह में गिरफ्तारी के बाद या पहले जो भाषण दिया था उस पर दिल्ली सरकार ने राजद्रोह का मुकदमा चलाने के लिए कानूनी मंजूरी दे दी है। कई बरस से मंजूरी का यह कागज केजरीवाल सरकार के पास पड़ा हुआ था, और कई बार केजरीवाल सवालों के घेरे में भी आए कि इस पर फैसला क्यों नहीं लिया जा रहा है। कुछ लोगों का यह भी मानना था कि कल तक सामाजिक कार्यकर्ता रहे केजरीवाल इस फर्जी दिखते मामले को लेकर कन्हैया कुमार के खिलाफ इजाजत नहीं देंगे। लेकिन अब दिल्ली का चुनाव निपट जाने के बाद उन्होंने यह इजाजत दे दी है। इसके पहले लोगों को याद रहना चाहिए कि कन्हैया कुमार के बताए जाने वाले नारों के वीडियो अदालत की फोरेंसिक जांच में झूठे साबित हो चुके हैं, और कम से कम एक अदालत ने यह माना था कि कन्हैया कुमार के कहे में कोई राजद्रोह नहीं था। लेकिन ऐसा लगता है कि चुनाव जीतने के बाद अब केजरीवाल के सामने दिल्ली के नौजवानों के समर्थन की कोई जरूरत रह नहीं गई है, और उन्होंने देश के एक सबसे बड़े नौजवान नेता को कटघरे में खड़े करने का रास्ता खोल दिया है।

सिर्फ कन्हैया कुमार की वजह से नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल करके कोई भी गंभीर राजनीतिक या सामाजिक बातचीत करने वाले लोगों पर जब राजद्रोह लगाया जा रहा है, तो वह देश के लोकतंत्र के लिए एक बड़ा खतरा है। किसी एक राज्य के हाईकोर्ट ने हाल ही में यह कहा भी है कि सरकार की नीतियों से असहमति जाहिर करना किसी भी तरह से राजद्रोह नहीं हो सकता। दिक्कत यह है कि भारत की आज की राजनीतिक हवा में सरकार से असहमति को देश से असहमति मान लिया गया है। और लोकतंत्र में तो देश से असहमति भी कोई गद्दारी नहीं होती, वह लोकतंत्र का एक अविभाज्य और अपरिहार्य हिस्सा होती है। गणतंत्र दिवस पर जब भारत सरकार ने ब्राजील के एक घोर महिला विरोधी राष्ट्रपति को अतिथि बनाकर बुलाया, तो देश के बहुत से तबकों ने खुलकर उसकी आलोचना की। अब इसे केन्द्र सरकार से असहमति भी कहा जा सकता है, और देश के फैसले से भी। लेकिन क्या इसे राजद्रोह या देश के साथ गद्दारी भी कहा जाएगा? लोगों को याद रखना चाहिए कि भारत के मुकाबले जो अधिक परिपक्व लोकतंत्र हैं, उनमें से अमरीका में वहां की सरकार के युद्ध के फैसले के खिलाफ अनगिनत प्रदर्शन होते रहते हैं, अमरीकी राष्ट्रपति के जलवायु-परिवर्तन फैसलों के खिलाफ प्रदर्शन चलते ही रहते हैं। इसी तरह जब इराक पर अमरीकी हमले में ब्रिटेन ने साथ दिया था, तो ब्रिटिश जनता सड़कों पर उतर आई थी, और राजधानी लंदन ने 10 लाख लोगों का एक ऐसा प्रदर्शन देखा था जिसकी कोई मिसाल ब्रिटिश इतिहास में भी नहीं थी। इसलिए एक बात लोगों को साफ तौर पर समझ लेना चाहिए कि कोई नेता देश का विकल्प नहीं होता, कोई सरकार देश का विकल्प नहीं होती, और किसी सरकार का फैसला हमेशा देश के हित में ही हो, यह भी जरूरी नहीं होता। ऐसे में बात-बात पर लोगों को गद्दार और राजद्रोही करार देना पूरी तरह से अलोकतांत्रिक काम है। 

कन्हैया कुमार को जिन लोगों ने सुना है, वे जानते हैं कि देश के लिए इतने दर्द के साथ इतनी लोकतांत्रिक बातें कहने वाला इतना असरदार और कोई दूसरा नौजवान नेता है नहीं। ऐसे नेता के ऊपर राजद्रोह का मुकदमा चलाना किसी सरकार के कानूनी अधिकार में तो आता है, लेकिन यह भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत ही शर्मनाक बात है, और हमारी कानून की सामान्य समझ यह कहती है कि इस मामले का अदालती फैसला जब होगा, मुकदमा चलाने वाली एजेंसियों और सरकारों को अदालती लताड़ ही पड़ेगी। यह असहमति को कुचलने का एक फैसला है, और पूरी तरह से बेकसूर दिख रहे एक नौजवान को बर्बाद करने की कोशिश भी है। लोकतंत्र में लोगों के कानूनी अधिकार तो रहते हैं, लेकिन उन अधिकारों के तहत बेकसूर साबित होते-होते एक पूरी जिंदगी निकल जाती है। देश के कई अल्पसंख्यकों के मामले सामने है जिन पर दस-बीस मुकदमे चलाए गए, और बीस-पच्चीस बरस के बाद वे बेकसूर साबित होकर अदालत से निकले हैं, इस बीच उनकी जिंदगी तो खत्म हो ही गई, उनके किस्म की सोच रखने वाले तमाम लोगों के लिए यह एक बड़ी धमकी भी रही। जो लोग जेएनयू के नौजवानों का मिजाज जानते हैं, उन्हें यह मिजाज शहीद भगतसिंह की याद दिलाता है, और यह तुलना इस देश की या किसी प्रदेश की सरकार के किस तरह के होने की याद दिलाता है, यह लोग खुद तय करें। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 28 फ़रवरी 2020

देश दिल्ली से बहुत किस्म के सबक भी लेता है, भड़कावे भी

संपादकीय
28 फ़रवरी 2020
 
दिल्ली की ताजा साम्प्रदायिक हिंसा को लेकर अब खबरें सामने आ रही हैं कि किस तरह जब दंगाईयों की भीड़ एक-दूसरे को गोली मार रही थीं, घर और दुकान जला रही थीं, तब कुछ इलाकों में हिन्दू और मुस्लिम मिलकर दंगाईयों को भगा रहे थे, यह जिम्मा खुद उठा रहे थे क्योंकि पुलिस कहीं नहीं थी। एक सच्ची कहानी ऐसी भी आई है कि दंगों के दिन ही एक हिन्दू लड़की की शादी तय थी, और आसपास के सारे मुस्लिमों ने मिलकर उस शादी में काम किया, उसे हिफाजत के साथ निपटाया। मुस्लिमों के बताए हुए कुछ ऐसे मामले भी सामने आ रहे हैं जिनमें हिन्दू परिवारों ने अपने घर में उन्हें रखा, और उन्हें बचाया। यह सब ऐसे माहौल में हो रहा था जब दिल्ली के कुछ नेता लगातार भड़काने वाली बातें कर रहे थे, ट्वीट कर रहे थे, या बोलने की जगह पूरी तरह चुप भी थे। यह सब उस माहौल के बीच हुआ जब लोग अगल-बगल की कई दुकानों में से कुछ चुनिंदा दुकानों को उनके नाम देखकर, उनके धर्म के आधार पर जला रहे थे, और उनके बगल की दुकानें जिन ईश्वरों के नाम की वजह से बच गई थीं, उन ईश्वरों ने पड़ोस की बेकसूर दुकान को भी नहीं बचाया था। यह सब उस माहौल के बीच हुआ जब देश के मीडिया का एक हिस्सा इन दंगों को देश में दंगों के इतिहास के साथ जोड़कर एक तुलना भी सामने रख रहा था। कुल मिलाकर आम इंसान जगह-जगह इंसान थे, और धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले लोग धर्म की आबादी का अनुपात गिनाते हुए कम होने पर भी अधिक (कत्ल) की धमकियां दे रहे थे, या दूसरी तरफ से कानून अपने हाथ में लेने की बात कर रहे थे। इस बीच एक कार्टून ऐसा भी छपा जिसमें जमीन पर गिरे एक आदमी को दूसरा खड़ा हुआ आदमी मारने पर उतारू है, और गिरा हुआ आदमी अपना मोबाइल फोन दिखाकर उसे याद दिला रहा है कि वे दोनों फेसबुक-फ्रेंड हैं। 

दिल्ली की साम्प्रदायिक हिंसा को कुछ लोग दंगा मानने से इंकार कर रहे हैं, और इसे अल्पसंख्यकों पर बहुसंख्यकों का हिंसक और हत्यारा हमला कह रहे हैं। दूसरी तरफ बहुसंख्यकों की ओर से कुछ तस्वीरें और कुछ वीडियो सामने रखे जा रहे हैं कि किस तरह अल्पसंख्यकों की छतों से हमले हुए हैं। इन तमाम बातों की जांच जब भी होगी, उस पर देश की आज की दिमागी हालत पता नहीं भरोसा कर पाएगी या नहीं क्योंकि आज तो हालत यह है कि कानूनी समाचारों की एक प्रतिष्ठित वेबसाईट ने यह तुलना सामने रखी है कि दंगों की रात पुलिस को फटकारने वाले एक हाईकोर्ट जज को तुरंत हटा देने के बाद अगले दिन सुनवाई करने वाले जजों का रूख कैसा बदला हुआ था। आमतौर पर ऐसी तुलना होती नहीं है, लेकिन जब एक ही मामले की सुनवाई में जज बदल जाने के बाद जब रूख जमीन-आसमान किस्म का बदल जाता है, तो आम लोगों के मन में ऐसी तुलना होती ही है, इसे एक कानूनी वेबसाईट ने बारीकी से सामने रखा है। इसलिए आज जब अदालत के रूख को भी आम जनता सोशल मीडिया पर खुलकर कोसने की दिमागी हालत में है, तो ऐसे में वहां कौन सी जांच लोगों का भरोसा जीत पाएगी, यह सोचना कुछ मुश्किल है। 

लोकतंत्र में कानून और व्यवस्था लागू करने का काम शासन, प्रशासन, पुलिस का रहता है, और जुर्म के निपटारे का काम अदालत का रहता है। दिल्ली में पिछले कुछ हफ्तों में इन तमाम संस्थाओं ने अपनी विश्वसनीयता और साख को कुछ या अधिक हद तक खोया है, और यह नुकसान करीब 40 जिंदगियों के नुकसान से कम नहीं है क्योंकि लोकतंत्र अपनी संस्थाओं की साख पर चलने वाली व्यवस्था है। दिल्ली का यह हाल हिन्दुस्तान में बहुत समय बाद इस किस्म के दंगों की याद ताजा कर रहा है, देश में साम्प्रदायिकता के एक खतरे को ताजा कर रहा है, और पुलिस की पूरी तरह खोई हुई साख के खतरे सामने रख रहा है, फिर चाहे उसके पीछे पुलिस की राजनीति से  अपनी खुद की दहशत हो, या कोई और वजह। यह सिलसिला मौतों की गिनती से कहीं अधिक नुकसान का है, और आग उगलने वाले कुछ हिन्दू-मुस्लिम नेताओं को कैद में भी डाल दिया जाए, तो भी अड़ोस-पड़ोस के जिन लोगों ने एक-दूसरे के घर-दुकान जलाए हैं, उनके बीच की दरार हो सकता है कि अगली एक-दो पीढ़ी तक कायम रहे। दिल्ली देश की राजधानी है, और इस नाते उसे कई मामलों में बाकी देश के सामने एक मिसाल भी बनकर रहना चाहिए। दिल्ली सत्ता का केन्द्र है, दिल्ली पुलिस जिसके मातहत है, वह केन्द्रीय गृहमंत्री भी इन दंगों से कुछ ही किलोमीटर पर थे, और प्रधानमंत्री भी। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज भी इन दंगों वाले शहर में ही थे, और दिल्ली के गैरराजनीतिक मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी। ऐसे में अगर इनमें से किसी ने, इन सबने, अपनी जिम्मेदारी से कन्नी काटी है, तो वह देश के सामने एक बहुत बुरी मिसाल पेश कर रही है, और उनकी साख को भी चौपट कर रही है। दिल्ली में विधानसभा के चुनाव जरूर निपट गए हैं, लेकिन उस वजह से किसी की जिम्मेदारी नहीं निपट गई है। देश दिल्ली की ओर न सिर्फ देख रहा है, बल्कि वह दिल्ली से बहुत किस्म के सबक भी लेता है, और भड़कावे भी। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 27 फ़रवरी 2020

एक बेहतर हिस्सेदारी वाला सीएम दिल्ली में बेहतर होता

संपादकीय
27 फ़रवरी 2020
 
हाल ही के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को विलुप्त और भाजपा को रौंद देने वाली आम आदमी पार्टी के सामने दिल्ली की ताजा साम्प्रदायिक हिंसा एक नए किस्म की चुनौती खड़ी कर चुकी है। कहने के लिए तो कानूनी व्यवस्था यह है कि दिल्ली की पुलिस केन्द्र सरकार के मातहत काम करती है, और राज्य सरकार किसी दूसरे राज्य की सरकार जैसी नहीं है, वह लेफ्टिनेंट गवर्नर के मातहत काम करने वाली, सीमित अधिकारों वाली एक व्यवस्था है। लेकिन इस सीमित-सरकार को चुनते तो वोटर ही हैं, और यह चुनाव एक राजनीतिक व्यवस्था भी है। इसलिए जब दिल्ली एक साम्प्रदायिक हिंसा से गुजर रहा है, तो पुलिस के लिए तो केन्द्र सरकार जवाबदेह है, लेकिन दिल्ली की जनता के प्रति अपनी नैतिक जिम्मेदारी से केजरीवाल सरकार भी बच नहीं सकती है। 

पिछले पांच बरस तक दिल्ली में सरकार चलाने वाले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, और उनकी आम आदमी पार्टी ने भारतीय राजनीति में एक नए किस्म का मॉडल सामने रखने की कोशिश की जो कि अपने आपको राजनीति से परे, एनडीए और यूपीए से परे, नागरिकता, धर्म, जाति जैसे मुद्दों से परे, आरक्षण और खानपान की लड़ाई से परे की पार्टी साबित करती रही। नतीजा यह हुआ कि आम आदमी पार्टी के राजनीतिक विरोधी कोई नहीं रह गए, और उसने जो अच्छे सरकारी काम किए थे, उनका फायदा पाकर वह चुनाव फिर जीत गई। हमने पहले भी इसी जगह लिखा था कि केजरीवाल ने अपने आपको एक काबिल और कल्पनाशील म्युनिसिपल-कमिश्नर साबित किया, और दिल्ली पर राज करते हुए भी शाहीन बाग जैसे एक सबसे चर्चित मुद्दे पर मुंह भी नहीं खोला, और चुनाव लड़ लिया। यह चुनाव इस कदर गैरराजनीतिक रहा कि जिस शाहीन बाग पर गद्दारी की तोहमतें लगाकर भाजपा ने चुनाव लड़ा, और जिस तरह बाकी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों ने आंदोलनकारियों का साथ दिया, उन सबसे आम आदमी पार्टी ने अपने को अलग रखा। और तो और जेएनयू, कन्हैया कुमार, जामिया जैसे बाकी जलते मुद्दों पर भी आम आदमी पार्टी ऐसी तटस्थ बनी रही जैसी कोई पार्टी हिन्दुस्तान में कभी नहीं रही। 

अब दिल्ली की इस साम्प्रदायिक हिंसा के बीच की बात देखें, तो दंगा हो जाने के बाद, हमलों में मौतों के बाद केजरीवाल ने महज दिल्ली पुलिस के बेअसर होने की बात कही, और फौज को बुलाने की बात कही। लेकिन जलती-सुलगती दिल्ली को बचाने के लिए केजरीवाल की पार्टी और उनकी सरकार की कोई पहल जमीन पर नहीं दिखी। अब सवाल यह उठता है कि क्या दिल्ली में राजनीति, सामाजिक सुरक्षा, अल्पसंख्यकों के मुद्दे, ये सब महज केन्द्र सरकार और बाकी विपक्ष के बीच के रहेंगे, और केजरीवाल एक अफसर की तरह काम करते हुए स्कूल-अस्पताल, मैट्रो जैसी जनसुविधाओं तक अपने को सीमित रखेंगे? यह बहुत अजीब किस्म का मॉडल है, और विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद हमने इसी जगह लिखा भी था कि यह एक शहर वाले, सीमित अधिकारों वाले राज्य दिल्ली तक तो कामयाब हो सकता है, लेकिन जटिल आर्थिक-सामाजिक, धार्मिक और जातीय व्यवस्था वाले, विविधता से भरे हुए हिन्दुस्तान में यह कामयाब नहीं हो सकता। तनाव के इस दौर में केजरीवाल ने अगर कुछ साबित किया है, तो वह यही साबित किया है कि वे एक अफसर की तरह काम करने वाले, भारत की व्यापक राजनीतिक व्यवस्था से परे जीने वाले नेता हैं, और उनकी पार्टी भी उसी किस्म से चलने वाली है। दिल्ली को एक बेहतर हिस्सेदारी करने वाला मुख्यमंत्री ऐसे मौके पर अधिक काम का होता।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 26 फ़रवरी 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 26 फ़रवरी 2020

दिल्ली पर कल के बाद आज फिर लिखने की जरूरत आई

संपादकीय
26 फ़रवरी 2020
 
दिल्ली में चल रही हिंसा को लेकर कल ही इसी जगह लिखने के बाद क्या आज फिर लिखने की जरूरत पडऩी चाहिए थी? यह सवाल किसी भी अखबार के संपादक को परेशान कर सकता है क्योंकि गंभीर विचारों को पढऩे वाले बहुत सीमित लोग होते हैं, और उन पर एक ही मुद्दे का वजन लगातार कितनी बार डाला जा सकता है? लेकिन सवाल यह है कि कल से अब तक जब लाशें और बहुत सी गिर चुकी हैं, एक से अधिक मस्जिदों को जलाया जा चुका है, जब एक-एक करके बहुत से ऐसे वीडियो सही साबित किए जा चुके हैं जिनमें दिल्ली पुलिस दंगाईयों के एक तबके के साथ मिलकर हिंसा कर रही है, नागरिकता-संशोधन विरोधियों को पीट-पीटकर जख्मी करने के बाद जमीन पर पड़े लोगों को लाठियों से पीटते हुए उनसे राष्ट्रगान गवाया जा रहा है, और पुलिस में से ही एक उसका वीडियो बना रहा है, तो फिर आज और किस मुद्दे पर लिखा जा सकता है? कुछ ईमानदार-पेशेवर समाचार वेबसाईटों के रिपोर्टरों ने अपनी आंखों देखी लिखी है कि किस तरह मस्जिद को जलाकर उस पर बजरंग बली का झंडा फहराया गया है, तो फिर क्या इस साम्प्रदायिक तनाव को अनदेखा करना जायज होगा? और क्या साम्प्रदायिकता के इस कैंसर को इस देश की देह में और बड़ी गठान बनने देना ठीक होगा? इसके साथ इस बात को भी देखने की जरूरत है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने तुरंत दंगाग्रस्त इलाकों में कफ्र्यू लगाने के साथ-साथ दिल्ली में आर्मी बुलाने की मांग केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह से की है, क्या 1984 के दंगों के बाद दिल्ली में पहले ऐसा कभी हुआ है? केजरीवाल ने कहा है कि पुलिस हालात नहीं सम्हाल पा रही है, और तुरंत सेना बुलाई जाए, तैनात की जाए। 

दिल्ली में आज जो हिंसा चल रही है, उसमें 20 से अधिक लोगों की मौतों की बात कई लोगों ने पोस्ट की है जो कि गंभीर पत्रकार हैं, और अभी जलते इलाकों की रिपोर्टिंग भी कर रहे हैं। ये आंकड़े कम हो सकते हैं, अधिक भी, लेकिन जितने इलाकों में जितने बड़े पैमाने पर पुलिस की मौजूदगी में दंगे हो रहे हैं, और आगजनी हो रही है, वह मामूली बात नहीं है। दिल्ली पुलिस पर राज करने वाली केन्द्र सरकार के सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री-गृहमंत्री की कोई अपील भी अब तक सामने नहीं आई है। और दिल्ली भाजपा के नेता कपिल मिश्रा लगातार घोर साम्प्रदायिक और हिंसक बातें कह रहे हैं और ट्वीट कर रहे हैं। यह सब तब चल रहा है जब उनकी पार्टी के भीतर दिल्ली में दोफाड़ दिख रहा है कि कपिल मिश्रा को रोका जाए, या इसी तरह ढील देकर रखा जाए? यह सब तब चल रहा है जब आधी रात दिल्ली की एक अदालत को दिल्ली पुलिस को यह हुक्म देना पड़ता है कि फंसे हुए जख्मी मुस्लिमों को उनके इलाकों से अस्पताल तक पहुंचाने के लिए सुरक्षित रास्ता मुहैया कराया जाए। इसलिए आज दिल्ली के बारे में जो कुछ लिखा जाए, कहा जाए, और समझा जाए, उसे इन तमाम जानकारियों के साथ जोड़कर ही किया जाना चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि किस तरह दिल्ली में सबसे अधिक साख वाले अखबारों से जुड़े अनगिनत हिन्दू रिपोर्टरों ने अपना दिल दहलाने वाला साबका लिखा है कि दंगाईयों की भीड़ ने उनके कागजात जांचे कि वे हिन्दू हैं या नहीं, इसके बाद उनके फोन से सब कुछ मिटा दिया गया, उन्हें चेतावनी दी गई, यह तक कहा गया कि हिन्दू हो इसलिए बच गए, एक महिला संवाददाता की काली बिंदी पर आपत्ति की गई कि हिन्दू हो तो सिर्फ लाल बिंदी लगानी चाहिए। कुछ संवाददाताओं ने आंखों देखा हाल लिखा है कि किस तरह पुलिस की मौजूदगी में, पुलिस के संरक्षण में लोगों ने घरों और दुकानों में आग लगाई, सुरक्षा-कैमरे तोड़े, और सलाखें लेकर हिंसा करते रहे। एक संवाददाता ने यह तक लिखा है कि दंगाईयों ने एक मुस्लिम घर पर आंसू गैस का गोला फेंका ताकि लोगों को बाहर निकाला जा सके। उसने यह सवाल भी उठाया है कि ये गोले तो सिर्फ पुलिस के पास होते हैं, और दंगाई इनका इस्तेमाल कैसे कर रहे हैं? एक संवाददाता ने लिखा कि उसके गले की रूद्राक्ष माला ने उसकी जिंदगी बचाई क्योंकि दंगाईयों को इसी से भरोसा हुआ कि वह हिन्दू है। एडिटर्स गिल ऑफ इंडिया ने मीडिया पर इस तरह के साम्प्रदायिक हमले क खिलाफ तुरंत कार्रवाई के लिए कहा है, और प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया अपने हाल के बरसों के मुर्दा-रूख के मुताबिक आरामदेह दफ्तर में चैन की बंशी बजाते हुए बैठा है। कुछ भड़काऊ समाचार चैनल अभी भी पूरी ताकत से झूठी तस्वीरों और झूठे वीडियो के साथ गलत जानकारी दिखाते हुए हकीकत को छुपाने की कोशिश कर रहे हैं जो कि कुछ घंटों के भीतर ही सत्यशोधक वेबसाईटें भांडाफोड़ भी कर रही हैं। देश की राजधानी अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के दो दिन के भारत प्रवास से मुक्त हुई है, और मानो इन दो दिनों तक केन्द्र सरकार को जलती दिल्ली को न देखने का एक बहाना मिला हुआ था, अब ट्रंप-वापिसी के बाद देखा जाएगा कि केन्द्र सरकार क्या करती है। इस बीच दिल्ली हिंसा और दिल्ली पुलिस के मुद्दे को लेकर इस वक्त देश के कुछ प्रमुख वकील दिल्ली हाईकोर्ट में खड़े हैं, और इस पन्ने के छपने तक हो सकता है कि अदालत का कुछ रूख सामने आए, और हो सकता है कि न भी आए, और हाईकोर्ट देश के सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक रूख पर जमा रहे कि जेएनयू-जामिया की हिंसा जब थम जाएगी, तभी अदालत उस पर सुनवाई करेगी। देश के डॉक्टर जजों के इस रूख से कुछ सीखकर जख्मी मरीजों को भगाना शुरू न कर दें कि जब जख्म भर जाएंगे तभी वे इलाज करेंगे। फिलहाल तो गुरू तेग बहादुर हॉस्पिटल के अधीक्षक ने कहा है कि वहां लाए गए लोगों में से 189 जख्मी हैं, और 20 मरे हुए हैं। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 25 फ़रवरी 2020

बात की बात, 25 फ़रवरी 2020

बात की बात, 25 फ़रवरी 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 25 फ़रवरी 2020

दिल्ली-हिंसा का सबसे बड़ा नुकसान आखिर हुआ किसे?

संपादकीय
25 फ़रवरी 2020

दिल्ली में कल नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ एक प्रदर्शन एक संघर्ष में बदल गया, और अभी यह अटकलें लगाना ठीक नहीं होगा कि इस भारी हिंसा के लिए कौन कुसूरवार हैं। फिर भी एक मुस्लिम नौजवान एक पिस्तौल से गोलियां चलाते कैमरों पर कैद हुआ है, एक पुलिस जवान पथराव में मारा गया है, और बहुत से रिपोर्टरों का यह कहना है कि उनकी आंखों के सामने पुलिस और नागरिकता-विरोधी मिलकर हमला करते रहे, इसके वीडियो भी कल से तैर रहे हैं। मीडिया के एक हिस्से का यह भी कहना है कि दिल्ली के भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने दो दिन पहले यह सार्वजनिक भाषण दिया था कि पुलिस कुछ जगहों पर शुरू हुआ नागरिकता-विरोधी धरना खत्म करवाए, वरना तीन दिन बाद वे पुलिस की भी नहीं सुनेंगे। कुछ लोगों का कहना है कि इस भाषण के जरा देर बाद ही हिंसा शुरू हो गई थी। लेकिन हम दिल्ली से दूर बैठे हैं, और अलग-अलग समाचार माध्यमों से आ रही खबरों को देखकर ही इस पर लिख रहे हैं, आंखों देखी नहीं। 

दो महीने से अधिक से दिल्ली के शाहीन बाग में एक पूरी तरह शांतिपूर्ण आंदोलन नागरिकता-संशोधन के खिलाफ चल रहा था, जिसकी चर्चा पूरे देश में हो रही थी, और बाकी दुनिया में भी जिनको हिंदुस्तान मेंं दिलचस्पी है वे इसे गौर से देख रहे थे। इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत इसका शांतिपूर्ण होना था, यह एक अलग बात है कि कुछ लोगों ने उसके बीच बुर्का पहनकर घुसकर बवाल खड़ा करने की कोशिश की भी थी। महीनों तक चले इस आंदोलन का इतना शांत रहना देश में एक अलग किस्म की मिसाल बन चुका था। ऐसे में उसी मुद्दे पर दिल्ली के कुछ और इलाकों में शुरू हुए आंदोलन, और उसके खिलाफ खड़े हुए आंदोलन के बीच हुए संघर्ष में एक पुलिस जवान सहित कई मौतों की खबर है। इस बीच अधिकतर समाचार स्रोतों का यह कहना है कि दिल्ली की पुलिस तनाव पर काबू के मुताबिक तैनात नहीं थी, बहुत से लोगों का कहना है कि उसने समय रहते कार्रवाई नहीं की, और बहुत से लोगों का यह भी कहना है कि नागरिकता संशोधन-विरोधियों के साथ मिलकर, उन्हें साथ लेकर दिल्ली पुलिस ने नागरिकता-विरोधियों पर पथराव किया, हमला बोला। यह किसी निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच से भी साबित हो सकता है कि देश की राजधानी में इस अचानक हिंसा के लिए कौन जिम्मेदार हैं, और आज के वक्त में ऐसी जांच कुछ मुश्किल भी दिख रही है। जिन लोगों को दिल्ली की व्यवस्था मालूम नहीं है, उन्हें यह बताना जरूरी है कि देश की राजधानी की पुलिस केंद्र सरकार की मातहत है, केजरीवाल सरकार की नहीं। अभी मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने यह बयान दिया है कि दिल्ली पुलिस दंगाईयों पर कार्रवाई करने के बजाय ऊपर से निर्देश आने का इंतजार करती रहती है, और जाहिर है कि यह ऊपर केंद्र सरकार का गृह मंत्रालय ही है। 

जो भी हो, यह समझने की जरूरत है कि इस ताजा हिंसा से एक बहादुर पुलिसकर्मी की मौत हुई है, और कुछ नागरिकों की भी। बहुत से इलाकों में हिंसा फैली है जो कि एक बड़ा नुकसान है। लेकिन इन सबके मुकाबले एक अधिक बड़ा नुकसान नागरिकता संशोधन-विरोधी आंदोलन का हुआ है जो कि अब तक सौ फीसदी शांतिपूर्ण चल रहा था, और अब कम से कम एक तबके के हाथ यह तोहमत तो लग ही गई है कि ये आंदोलनकारी हिंसा कर रहे हैं। तोहमतों से परे दिल्ली और बाकी देश को भड़काऊ भाषणों से बचाने की जरूरत है, और हिंसा से भी। यह बात बहुत मायने नहीं रखती कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दिल्ली में रहते हुए ऐसी हिंसा हुई है। प्रधानमंत्री की पार्टी के नेता कपिल मिश्रा ने पुलिस अफसर की मौजूदगी में, उनके रोकते-रोकते भी सार्वजनिक रूप से यह भाषण दिया था कि वे अभी ट्रंप के प्रवास की वजह से चुप हैं, और तीन दिन के बाद वे पुलिस की भी नहीं सुनेंगे। दिल्ली की ताजा घटनाओं में यह अच्छी तरह दर्ज है कि इसके पहले भी कपिल मिश्रा और उनके जैसे एक-दो और नेताओं के हिंसक बयानों के बाद तनाव भड़का था, दिल्ली विधानसभा चुनाव के वक्त चुनाव आयोग को इन पर रोक भी लगानी पड़ी थी। ऐसे नेताओं की पार्टियों को तनाव के ऐसे दौर में इनकी बदजुबानी के बारे में सोचना चाहिए, और फैसला लेना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 24 फ़रवरी 2020

बात की बात, 24 फ़रवरी 2020

जुल्म जब हद से बढ़ जाता है, वह बगावत को जन्म देता है, दिल्ली में हुई माहवारी-दावत

संपादकीय
24 फ़रवरी 2020

जब समाज के किसी तबके पर नाजायज हमला होता है, तो उससे बेइंसाफी के खिलाफ लोगों के खड़े होने की एक संभावना भी खड़ी होती है। अगर गुजरात में स्वामीनारायण सम्प्रदाय के चलाए जा रहे एक महिला कॉलेज की लड़कियों के साथ माहवारी को लेकर बदसलूकी न हुई होती, इस सम्प्रदाय के कॉलेज-इंचार्ज स्वामी ने अगर यह बयान नहीं दिया होता कि माहवारी में खाना पकाने वाली महिला अगले जन्म में कुतिया बनती है, तो माहवारी एक मुद्दा नहीं बनती। लेकिन हफ्ते भर के भीतर यह ऐसा मुद्दा बनी कि दिल्ली में कल एक महिला संगठन ने एक सार्वजनिक आयोजन किया, और उसमें दर्जनों ऐसी महिलाओं ने खाना बनाया जो कि माहवारी से गुजर रही हैं, और तीन सौ से अधिक लोग वहां खाने पहुंचे, जिनमें दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया भी थे। इस मौके की तस्वीरें अब चारों तरफ फैल रही हैं जिनमें महिलाएं अपने एप्रन पर यह लिखा हुआ दिखा रही हैं कि वे माहवारी से हैं, और वे खाना बनाते दिख रही हैं। इस आयोजन को माहवारी-दावत नाम दिया गया है, और इसके बैनर-पोस्टर, इसके न्यौते की सूचना चारों तरफ फैल रहे हैं। 

सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ सामाजिक जागरूकता वाले कलाकारों ने भी इस बारे में कलाकृतियां बनाई हैं जो कि महिला अधिकारों को लेकर एक नई जागरूकता सामने रख रही है, और पिछले बरसों में समाज में भारी मेहनत से फैलाई गई अवैज्ञानिकता पर हमला भी कर रही हैं। एक पाखंडी स्वामी ने अपनी बकवास से महिलाओं के, और महज महिलाओं के ही क्यों, प्राणियों के एक वैज्ञानिक मुद्दे की तरफ देश का ध्यान खींचा है, और इस पाखंड को ध्वस्त करने के लिए लोग उठ खड़े हुए हैं, चाहे झंडे-डंडे लेकर न सही, महज सोशल मीडिया पर। लेकिन आज कई किस्म की जंग सोशल मीडिया पर ही शुरू होकर वहीं खत्म हो रही है, और यह अच्छा ही हुआ कि एक ओछा हमला हुआ, एक गंदी बात कही गई, और न सिर्फ महिलाएं अपने हक के लिए उठ खड़ी हुई, बल्कि आदमियों ने भी खुलकर उनका साथ दिया। 

दरअसल धर्म शुरू से ही मर्दों के कब्जे में रहा है, उनका गुलाम रहा है, और मर्दानी सोच जगह-जगह बेइंसाफी करती है जिसका एक बड़ा शिकार महिलाएं रहती हैं। अभी जब स्वामीनारायण सम्प्रदाय के इस घटिया स्वामी ने ऐसी गंदी बकवास की, तो लोगों ने धर्म की मर्दानी सोच के कुछ और पहलुओं को भी उठाया, और लोगों को सोचने के लिए मजबूर किया। अगर महिला इतनी ही अछूत है कि देश के कुछ मंदिरों में, और साथ-साथ दूसरे धर्मों की मस्जिदों-दरगाहों जैसी जगहों पर भी, महिलाओं का दाखिला सुप्रीम कोर्ट भी नहीं करा पा रहा है, तो उसके पीछे की कई वजहों में से एक यह वजह भी समझने की जरूरत है कि किस तरह सुप्रीम कोर्ट में महिला जजों की जगह नहीं के बराबर है, फौज में महिलाओं को मोर्चे पर लीडरशिप देने से फौज और केन्द्र सरकार कतराती आ रही हैं। ऐसे माहौल में कुतिया बनने का श्राप जब छपा, तो लोगों ने यह सवाल उठाया कि हिन्दू देवी मंदिरों में देवियों के कपड़े बदलने का काम पुरूष पुजारी ही क्यों करते हैं? इस काम के लिए महिला पुजारी क्यों नहीं रखी जाती? और हिन्दू मंदिरों की ही बात अगर करें, तो उनमें महिला की जगह इतिहास में महज देवदासियों की रही है जो कि वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर करने वाली महिलाएं थीं, और आज भी कुछ हद तक हैं। 

जब समाज में ओछे हमले होते हैं, तो एक सीमा तक ही वे किसी को घायल कर पाते हैं, उसके बाद वे एक बगावत को जन्म देते हैं, और वह बगावत उन हमलों के तमाम हथियारों को मोड़कर रख देती है। आज देश में वैसा ही कुछ हो रहा है। महिलाएं देश के इतिहास का सबसे बड़ा आंदोलन करते बैठी हैं, और वे महिलाएं यह कर रही हैं जिनके घर से बाहर निकलने पर भी देश में सत्तारूढ़ कुछ बड़े ओहदे वाले आपत्ति कर रहे हैं कि मानो वे घरेलू सामान की तरह ही ठीक थीं, वे कैसे बाहर निकल आईं। ज्यादती करने वाले लोगों को यह याद रखना चाहिए कि वे लोगों के बर्दाश्त का इम्तिहान भी लेते चलते हैं, और किसी भी दिन वह बर्दाश्त जवाब दे सकता है। कहावत और मुहावरों में कई बार समझदारी की बातें भी रहती हैं, और ऐसे ही किसी संदर्भ में किसी ने यह लिखा होगा कि डोर को इतना न खींचो कि वह टूट ही जाए। माहवारी के मुद्दे पर यह डोर अब टूट चुकी है, ठीक उसी तरह जिस तरह की हरिजन कहे जाने वाले दलितों के मंदिर प्रवेश पर डोर एक वक्त टूट चुकी थी, और हिन्दू समाज के शुद्र कहे जाने वाले उन अछूत हरिजन-दलितों ने हिन्दू मंदिरों को खारिज करके बौद्ध धर्म में दाखिला लिया, और बुद्ध-अंबेडकर के अपने मंदिर बना लिए। आज जो लोग महिलाओं पर बिना किसी जरूरत के ऐसे हिंसक और अश्लील हमले करके उन्हें कोंच रहे हैं, वे अब एक बगावत भी झेलेंगे। और बात निकलेगी तो इतने दूर तलक जाएगी कि स्वामीनारायण सम्प्रदाय के प्रमुख स्वामी महिलाओं पर अपनी नजर भी पडऩे की सीमा से उनको दूर क्यों रखते हैं? क्या वे एक महिला की कोख से नहीं जन्में हैं? और एक सम्प्रदाय अगर महिलाओं को इतनी हिकारत का सामान मानता है, तो उस सम्प्रदाय के लिए तमाम धर्मों के तमाम लोगों के मन में उससे बड़ी हिकारत क्यों नहीं होनी चाहिए? 

दिल्ली में जिस महिला संगठन ने यह आयोजन किया है, उसने जागरूकता का एक साहसी काम किया है, और जिस तरह देश भर में शाहीन बाग के मॉडल की नकल हो रही है, जिस तरह देश भर में बलात्कार के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं, उसी तरह देश भर में मर्दानी सोच के खिलाफ ऐसे आंदोलन होने चाहिए, और पुरूषों को भी महिलाओं का हौसला बढ़ाना चाहिए कि वे पाखंड में डूबे हुए समाज को झकझोरने का काम करें, और वे उनके साथ हैं, वे उनके पीछे हैं। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 23 फ़रवरी 2020

शाहीन बाग बातचीत, केन्द्र सरकार का काम सुप्रीम कोर्ट कर रही

संपादकीय
23 फ़रवरी 2020

दिल्ली में नागरिकता के मुद्दे पर महीनों से चले आ रहे शाहीन बाग आंदोलन को लेकर अब मिलीजुली खबरें आ रही हैं। सत्तर दिनों से इस आंदोलन के सामने की सड़क बंद थी, और नागरिकों के जत्थे ने इस तरह सड़क-बंदी का विरोध भी किया था। लेकिन यह सड़कबंदी किसने की, इसे लेकर आज एक अलग खबर आई है। सुप्रीम कोर्ट ने यह रास्ता खुलवाने की याचिका पर तीन वार्ताकार नियुक्त किए थे जिन्हें शाहीन बाग आंदोलनकारियों से बात करने भेजा गया था। चार दिनों से यह बातचीत चल ही रही थी कि अब खबर आई है कि इन तीनों वकीलों ने मौके पर जाकर लोगों से बात की, और अब अदालत में एक हलफनामा दायर किया है। एक वकील की तरफ से दायर इस हलफनामे में कहा गया है कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा है, पुलिस ने पांच जगहों पर सड़क रोकी है, अगर यह रोक हटा दी जाती तो सामान्य ट्रैफिक चलते रहता। हलफनामे में कहा है कि पुलिस ने बेवजह रास्ता बंद किया जिसकी वजह से लोगों को परेशानी हुई। अब कल सुप्रीम कोर्ट में इस पर आगे सुनवाई होगी। लेकिन कल तक आने वाली खबरें ऐसा बता रही थीं कि मानो रास्ता आंदोलनकारियों ने बंद किया है। 

सच इन दोनों में से कोई भी हो, या इनके बीच का हो, यह समझने की जरूरत है कि आंदोलनकारियों से बातचीत करने के लिए सुप्रीम कोर्ट को वार्ताकार नियुक्त करने पड़े, और भेजना पड़ा। दूसरी तरफ दो महीने से ज्यादा से चल रहे इस आंदोलन ने देश के किसी भी दूसरे आंदोलन के मुकाबले अधिक जगह खबरों में पाई, और यह आंदोलन देश में न सिर्फ मुस्लिम महिला आंदोलन के रूप में, बल्कि एक महिला आंदोलन के रूप में बहुत मजबूती से दर्ज हुआ है। आज देश के दर्जनों शहरों में नागरिकता के मुद्दे पर चल रहे धरनास्थल को शाहीन बाग नाम दिया जा चुका है, और दिल्ली के विधानसभा चुनाव में अगर इस आंदोलन का कोई असर हुआ है, तो वह सीधे-सीधे केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ ही हुआ है। यहां पर न तो अभी हम नागरिकता के मुद्दे पर बात करना चाहते, न ही इस आंदोलन पर। सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता या वार्ता की पहल पर बात करना जरूरी है। 

शाहीन बाग का आंदोलन पूरी तरह से राजनीतिक आंदोलन था, और दिल्ली चुनाव के पहले और दिल्ली चुनाव के बाद भी केन्द्र सरकार की ओर से, या केन्द्र में सत्तारूढ़ गठबंधन की किसी भी पार्टी की ओर से आंदोलनकारियों से बातचीत की कोई पहल नहीं की गई। बल्कि केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने सार्वजनिक रूप से यह बयान दिया था कि वे नागरिकता संशोधन अधिनियम पर किसी से भी बातचीत के लिए तैयार हैं और उनका दफ्तर तीन दिन के भीतर इसके लिए समय देगा। लेकिन जब आंदोलनकारियों ने उनसे मिलने का समय मांगा, आंदोलन से परे के कुछ लोगों ने समय मांगा तो उन्हें कोई जवाब भी नहीं मिला। दूसरी तरफ अमित शाह और नरेन्द्र मोदी एक के बाद एक कई बड़ी सभाओं में यह घोषणा करते रहे कि नागरिकता संशोधन के मुद्दे पर कोई वापिसी नहीं होगी। हो सकता है कि दिल्ली चुनाव के पहले इसका एक चुनावी इस्तेमाल रहा हो, लेकिन प्रधानमंत्री ने तो चुनाव के बाद भी इस बात को दुहराया। अब इस किस्म की कड़ी घोषणाओं के साथ ही बातचीत की संभावना कम हो जाती है। 

यह समझने की जरूरत है कि लोकतंत्र में बातचीत की संभावनाओं को कभी भी खत्म नहीं होने देना चाहिए। आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी असम के बोडो आंदोलनकारियों के साथ जिस समझौते की घोषणा करते हैं, वह आंदोलन चौथाई सदी से चल रहा था, उसमें बड़ी संख्या में मौतें हुई थीं, लेकिन जो भी समाधान निकला वह बातचीत से ही निकला। और अपने ही देश के लोगों से क्यों, दुश्मन समझे जाने वाले पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ तो आजादी से लेकर अब तक बातचीत चल ही रही है, कई मौकों पर चीन से बात हुई, कई मौकों पर श्रीलंका से। देश के भीतर नक्सलियों से बात हुई, पंजाब में आतंक के दौर में बातचीत हुई, और उसी से कोई रास्ता निकला। ऐसे में दिल्ली में रहते हुए केन्द्र सरकार ने शाहीन बाग आंदोलन को लेकर जिस तरह की अरूचि दिखाई थी, वह लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं थी। अब सुप्रीम कोर्ट के वार्ताकार अगर यह पा रहे हैं कि आंदोलनकारियों ने सड़क बंद नहीं की है, बल्कि सड़क केन्द्र सरकार के मातहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस ने बंद की है, तो इससे दिल्ली से दूर बसे लोगों के मन में बनी हुई तस्वीर बदलती है। जो पहल सुप्रीम कोर्ट ने की, वह पहल केन्द्र सरकार को करनी चाहिए थी, एनडीए में शामिल किसी राजनीतिक दल को करनी चाहिए थी, या केन्द्र सरकार के विश्वासपात्र किसी सामाजिक कार्यकर्ता को करनी चाहिए थी। सुप्रीम कोर्ट की पहल देश की राजनीतिक सत्ता की नाकामयाबी का एक सुबूत भी है कि जो काम सरकार को करना था वह काम अब अदालत कर रही है। किसी देश या प्रदेश की सरकार को किसी मुद्दे को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाना चाहिए। लोकतंत्र में लोग सरकार से बातचीत के लिए तैयार हों, यही सरकार की कामयाबी होती है, यही लोकतंत्र के लिए जरूरी भी होता है। सुप्रीम कोर्ट की दखल से हो सकता है कि इस धरनास्थल के सामने की सड़क खुल जाए, लेकिन आंदोलन अभी बाकी है, नागरिकता का मुद्दा पूरे देश में बाकी है। केन्द्र सरकार को अपना रूख लचीला रखना चाहिए, और सभी तबकों से बातचीत जारी रखनी चाहिए। लोकतंत्र में संसद या विधानसभा में बाहुबल से बना दिए गए कानून उतने सम्मान के नहीं होते जितने कि आम राय तैयार करके एक व्यापक बहुमत, व्यापक सहमति से बनाए हुए कानून रहते हैं। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 22 फ़रवरी 2020

बात की बात, 22 फ़रवरी 2020

एक नए अराजक औजार ने किस तरह बदलकर रख दिया पुराने अहंकारी मीडिया को!

संपादकीय
22 फ़रवरी 2020

सोशल मीडिया को लोग देश और दुनिया के अमन-चैन को खत्म करने वाला मान लेते हैं, और बहुत से लोगों को यह गलतफहमी भी रहती है कि वॉट्सऐप मैसेंजर भी एक सोशल मीडिया है। मैसेंजर तो एक के संदेश को दूसरे तक पहुंचाता है, और वॉट्सऐप जैसे ग्रुप में भी बस उसी ग्रुप के सदस्य एक-दूसरे से बात कर सकते हैं। लेकिन फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया जो कि तकरीबन सभी के लिए खुले रहते हैं, वहां अधिकतर लोग अधिकतर लोगों का लिखा देख सकते हैं, उस पर बात आगे बढ़ा सकते हैं, वह सचमुच ही सोशल मीडिया है जो कि दस-बीस बरस पहले तक प्रचलन में नहीं था। अब इसकी मेहरबानी से आम लोगों को भी खास लोगों की लिखी हुई बातों पर प्रतिक्रिया जाहिर करने का मौका मिलता है, और अगर खास लोग कुछ चुनिंदा आम लोगों को ब्लॉक भी कर देते हैं, तो भी बाकी लोग उनकी लिखी बातों को देख ही लेते हैं, और उस पर अपनी राय रख भी देते हैं। सोशल मीडिया एक अजीब किस्म का लोकतांत्रिक औजार है जो कि अराजकता की हद तक छूट देता है, और भारत जैसे देश में जहां केन्द्र या राज्य सरकारों का आईटी एक्ट का इस्तेमाल अपनी पसंद-नापसंद पर टिका होता है, वहां पर तो यह लोकतांत्रिक हथियार एक जुर्म की हद तक आगे बढ़ जाता है, खुलेआम बलात्कार की धमकियां भी देखने मिलती हैं, और उन पर सरकारी चुप्पी भी दर्ज होते चलती है। अब तो कई बरस से ये सवाल भी उठ रहे हैं कि बलात्कार की धमकियां देने वाले लोगों को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी क्यों फॉलो करते हैं? 

लेकिन सोशल मीडिया से एक और बहुत बड़ा काम हो रहा है जो कि असल लोकतंत्र का एक विस्तार है। आज मीडिया में गंभीर विचार लिखने वाले, ताजा समाचार का संपादन करने वाले वरिष्ठ लोगों में से शायद ही कोई ऐसे हों जो कि सोशल मीडिया न देखते हों उस पर मुद्दे न देखते हों, उस पर लोगों का रूख न देखते हों। सोशल मीडिया के पहले तक मीडिया के दिग्गजों का रूख एकतरफा होता था, और वे अपनी सोच से लिखते और छापते जाते थे, बाद में टीवी पर बोलते और दिखाते जाते थे। लेकिन अब वे दिन लद गए, अब छोटी-छोटी बातों के लिए लोगों को सोशल मीडिया पर जानकारी भी देखनी होती है, और लोगों का रूख भी देखना होता है। अब जैसे आज ही की बात लें, तो ट्रंप के गुजरात प्रवास को लेकर बहुत से लोगों ने तंज कसा है कि वहां भाजपा सरकार पचास बरस के अपने कामकाज को दीवार उठाकर उसके पीछे छुपा रही है, और ट्रंप की बेटी दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार की बनाई स्कूलों को देखने खुद होकर जा रही है। हो सकता है कि अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता, या पूर्वाग्रह के चलते मीडिया के बहुत से दिग्गज इस तरह की तुलना से बचे रहते, लेकिन अब जब ऐसी बातें खुलकर लिखी जा रही हैं, आम लोगों द्वारा लिखी जा रही हैं, खास लोगों की नजरों के सामने भी आ रही है, तब उन्हें एक हद से अधिक अनदेखा करना हद से अधिक की बेशर्मी होगी, और मीडिया के कम से कम कुछ लोग तो आम लोगों की बातों को अपने पन्नों और अपने बुलेटिनों की खास जगह पर कुछ तो जगह देंगे ही। 

हम पहले भी इसी जगह लिख चुके हैं कि एक वक्त टीवी की खबरों ने अखबारों को प्रभावित करना शुरू किया था, और अखबारों ने इस नए माध्यम के साथ जीना सीखने के लिए अपने में कुछ तब्दीली की थी क्योंकि बहुत सी सुर्खियां टीवी पर घंटों पहले आ चुकी रहती थीं। अब उसके बाद सोशल मीडिया ने टीवी और अखबारों को, दोनों को ही बहुत बुरी तरह बदलकर रख दिया, और अब किसी अखबार, किसी टीवी चैनल के लिए यह मुमकिन नहीं है कि ट्विटर और फेसबुक पर नजर रखने के लिए कुछ लोगों को तैनात किए बिना अपनी दुकान चला लें। आज सोशल मीडिया अपनी असीमित ताकत, और अपने लोकतांत्रिक या अराजक मिजाज से मुख्यधारा के कहे जाने वाले मीडिया को बहुत बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। यह बात अगर जुर्म की धमकियों वाली नहीं है, तो यह लोकतंत्र के हित में है, उसकी अधिक वकालत करने वाली है। सोशल मीडिया ने मुख्यधारा के मीडिया के पूर्वाग्रह का भांडाफोड़ करने का काम भी किया है, जिसके चलते बड़े-बड़े पत्रकारों को शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है, और लोग कुछ या कई बरस पहले अपनी कही या लिखी बातों को छुपा भी नहीं पा रहे हैं, लोग उनके कामों की कब्र खोदकर हड्डियां निकालकर नुमाइश कर रहे हैं कि इस मुद्दे पर इस पत्रकार ने दूसरी पार्टी की सरकार के रहते क्या-क्या नहीं कहा था। सोशल मीडिया का जिस तरह का संक्रामक असर मूलधारा की मीडिया पर हो रहा है, वह एक बहुत ही दिलचस्प दौर है, और मीडिया-सोशल मीडिया का इस दौर का इतिहास अध्ययनकर्ताओं और शोधकर्ताओं के लिए बड़ी दिलचस्प चुनौती पेश कर रहा है। 


(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 21 फ़रवरी 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 21 फ़रवरी 2020

लोग सुबूत रिकॉर्ड करके कोर्ट जाएं, और कोई इलाज नहीं है

संपादकीय
21 फ़रवरी 2020

आमतौर पर किसी देश-प्रदेश की राजधानी में कानून जिस हद तक लागू होते हैं, वे उस देश-प्रदेश की बेहतर हालत बताते हैं। राजधानियों के बाहर कानूनों की और बदहाली होती है, और हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज अपने दिए हुए बड़े-बड़े फैसलों को लेकर अगर बिना पुलिस हिफाजत अकेले निकल जाएं, तो उन फैसलों के लिए उनकी इतनी खिल्ली उड़ाई जाएगी कि वे आईने में अपना मुंह नहीं देख पाएंगे। और हिन्दुस्तान का आज का हाल जैसा दिख रहा है, उसमें तो कोई हैरानी नहीं होगी कि अलोकप्रिय फैसले देने वाले जजों के किसी भीड़ में अकेले फंस जाने पर उनकी कम्बल-कुटाई भी हो जाए। 

खैर, हिंसा की ऐसी आशंकाओं और ऐसे खतरों के बीच यह देखने की जरूरत है कि अपने आपको अपने ओहदे और अपनी वर्दी से भी बड़ा अफसर मानने वाले लोग जनता के जिंदा रहने के लिए जरूरी कानून लागू करने के वक्त किस तरह दुबककर अपने सुरक्षित कमरों में छुप जाते हैं, और अपने इलाकों में भीड़ का राज करने देते हैं। और यह भीड़ किसी बारात की एक दिन की अराजक भीड़ हो यह भी जरूरी नहीं है, यह भीड़ किसी धार्मिक त्यौहार की हफ्ते-दस दिन की हिंसक भीड़ हो, यह भी जरूरी नहीं है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य की राजधानी में तो चाहे किसी को शोरगुल का कानून तोडऩा हो, या फिर शादियों के मौकों पर पार्किंग का कानून तोडऩा हो, पुलिस और प्रशासन उनकी हिफाजत करते चलते हैं। अभी नई राजधानी में खुली प्रदेश की सबसे बड़ी या सबसे महंगी होटल की दावतों में बजते लाऊडस्पीकर से देर रात तक नींद हराम होने की शिकायत एक सामाजिक कार्यकर्ता ने बार-बार की, पुलिस के खूब मशहूर किए गए फोन नंबर पर भी शिकायत की, कोई कार्रवाई नहीं की गई। अब इसमें न तो धार्मिक तनाव का खतरा था, न राजनीतिक तनाव का, लेकिन एक महंगी होटल की गुंडागर्दी को छूने की हिम्मत भी पुलिस और प्रशासन में नहीं थी। और शादियों के हर महूरत पर इन कारोबारियों की ऐसी ही गुंडागर्दी से दसियों लाख रूपए एक रात में कमाने का मुकाबला चलता है, और पुलिस वहां पर इंतजामअली बनकर काम करती है, जहां होटल मालिकों को गिरफ्तार करके जेल भेजना चाहिए, वहां पुलिस पार्किंग ठेकेदार की तरह काम करती है। 

शोरगुल को लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक के इतने कड़े आदेश हैं कि कोई सामाजिक कार्यकर्ता अगर शोर नापने के उपकरण से नापकर, वीडियो रिकॉर्डिंग करके, और अनसुनी रह गई शिकायतों के सुबूत के साथ अदालत जाए, तो पुलिस और प्रशासन के साथ-साथ राज्य सचिवालय के अफसर भी कटघरे में होंगे। दिक्कत यह है कि सरकार के पास, अफसरों के पास अदालती मामलों में मुफ्त के वकील रहते हैं, सुबूत अपने हिसाब से मोडऩे-तोडऩे की सहूलियत रहती है, और सामाजिक कार्यकर्ताओं को सत्ता की ताकत के बहाव के खिलाफ जाकर खर्च करना पड़ता है, जूझना पड़ता है। छत्तीसगढ़ में सामाजिक कार्यकर्ताओं का तजुर्बा बहुत खराब है, और अदालतों से व्यापक जनहित के मुद्दों पर भी कोई राहत नहीं मिलती है। 

एक-एक शादी कई-कई दिनों तक अपने इलाके के लोगों का जीना हराम कर देती है। एक-एक धर्मस्थल पूरे इलाके को जहन्नुम और नर्क बनाकर छोड़ता है, लेकिन सरकारी अमला अपने और सत्ता के रिहायशी इलाकों में शोरगुल रोककर चैन से सोता है, बाकी जनता का जीना हराम रहता है, नींद हराम रहती है। शायद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के इलाकों में भी लाऊडस्पीकर बंद करवा दिए जाते हैं, इसलिए उन्हें लगता है कि पूरे मुल्क में उनका हुक्म मजबूती से लागू है। हकीकत यह है कि जनता की सेहत, उनकी नींद, उनका सुख-चैन, उनका कामकाज, सब कुछ बुरी तरह बर्बाद होता है, और पुलिस को शिकायत करने वालों का तजुर्बा यह है कि कानून तोड़कर शोरगुल करने वाले लोगों को शिकायतकर्ता का नाम-नंबर, पता बता दिया जाता है कि जाकर कहां झगड़ा करना है। फिर भी प्रदेश में एक आखिरी उम्मीद सिर्फ अदालत से बची है, और उसके लायक सुबूत रिकॉर्ड करके लोगों को वहां जाना चाहिए ताकि अफसर अपने घरौंदों के बाहर भी देखने को मजबूर हों।   

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 20 फ़रवरी 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 20 फ़रवरी 2020

पहले विश्वास करें, फिर इस्तेमाल करें...

संपादकीय
20 फ़रवरी 2020

दुनिया में जब सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ा, तो एक लतीफा चल निकला कि अमरीकी सरकार ने सीआईए का बजट छोटा काट दिया है कि अब लोग खुद होकर अपने बारे में इतना कुछ लिखने लगे हैं कि अधिक जासूसी की तो जरूरत ही नहीं रह गई। मानो इतना ही काफी नहीं था, तो अब ट्विटर और फेसबुक जैसी जगहों पर कोई भी व्यक्ति तरह-तरह के सर्वे कर रहे हैं कि लोग किस पार्टी को, किस उम्मीदवार को, किस मुद्दे को चाहते हैं और किसके खिलाफ हैं। लोगों को लगता है कि यह एक मासूम सर्वे है, लेकिन कल्पना करें कि किसी पार्टी या संगठन के आईटी सेल के लोग बैठकर ऐसे सर्वे कर रहे हों, और लोगों के सामाजिक-राजनीतिक रूझान, उनकी पसंद और उनकी नफरत का घर बैठे हिसाब लगा रहे हों। 

अभी-अभी एक किसी संस्था की तरफ से फेसबुक पर एक सर्वे किया जा रहा है जिसमें लोगों से तरह-तरह के सवाल करके उन्हें बताया जाता है कि उनकी सोच कितने फीसदी कम्युनिस्ट है। जिस दिन सोच के आधार पर समाज में हिंसा की जरूरत पड़ेगी, ऐसे सर्वे में हिस्सा लेने वाले लोगों का रिकॉर्ड इस संस्था के पास, या जो भी इससे आंकड़े हासिल कर सके, खरीद सके, या हैक कर सके, उसके पास रहेगा कि कौन से इंसान की सोच कितने फीसदी कम्युनिस्ट है। दुनिया का इतिहास बताता है कि अलग-अलग दौर में अलग-अलग देशों में लोगों को उनकी कम्युनिस्ट सोच की वजह से मारा गया है। हिन्दुस्तान में भी आज विचारधाराओं से नफरत करने वाले लोग कम नहीं हैं, किसी विचारधारा से नफरत कम, किसी से अधिक। ऐसे में लोग ऐसे हर एप्लीकेशन, या ऐसी हर वेबसाईट को मासूम मानकर उसके सर्वे में हिस्सा लेने लगते हैं, ट्विटर पर सवालों के जवाब देने लगते हैं, और चतुर या चालबाज लोग उन्हें उनकी सोच के हिसाब से अलग-अलग लिस्टों में दर्ज करते चल रहे हैं। जिस दिन सोच के आधार पर लोगों को मारने का सिलसिला शुरू होगा, उस दिन सौ फीसदी कम्युनिस्ट पहले मारे जाएंगे, फिर नब्बे फीसदी वाले, और फिर आखिर में जाकर कमजोर कम्युनिस्ट-सोच वालों की बारी आएगी। हत्यारों की ताकत बेकार न जाए इसलिए खालिस वामपंथियों की लिस्ट तैयार रहेगी, और प्राथमिकता के आधार पर लोगों को खत्म किया जाएगा। 

जिन लोगों को भी यह बात कल्पना की एक उड़ान लग रही है, उन्हें इतिहास को भी पढऩा चाहिए, वर्तमान में अपने आसपास का माहौल देखना चाहिए, और भविष्य के खतरों के प्रति सावधान रहना चाहिए। आज किसी एक वेबसाईट पर आप छाता ढूंढ लीजिए, तो बाद में आप इंटरनेट पर चाहे कोई भी पेज खोलें, उस पर छातों का इश्तहार दिखने लगेगा। इंटरनेट ने लोगों को नंगा करके रख दिया है, और ऐसे में जब लोग अपनी जरूरत की सर्च से परे लोगों के किए जा रहे सर्वे में शामिल हो रहे हैं, तो फिर वे अपने दिल-दिमाग पर से, अपने बदन पर से खुद ही तौलिया हटाकर फेंक दे रहे हैं। यह बात समझने की जरूरत है कि लोगों की सोच, और उनके रूझान के हिसाब से हो सकता है कि सरकारी और निजी नौकरियां तय होने लगें। कल के दिन देश-प्रदेश की सरकारों के हाथ ऐसा डेटा लगे, और वे अपने काबू की कंपनियों को कहें कि इन लोगों को नौकरी पर नहीं रखना है, तो किसी को हैरान नहीं होना चाहिए। अपने खुद के उजागर किए बिना भी लोग अपनी डिजिटल जिंदगी में बहुत हद तक उजागर हैं ही, ऐसे में हर किसी को सावधान रहने की जरूरत है क्योंकि आने वाले कल नहीं, आज ही हर कोई खतरे में भी है। इसलिए लोगों को बिना जरूरत अपनी सोच को ऐसे एप्लीकेशन, सर्वे, या अध्ययन में झोंक नहीं देना चाहिए। डिजिटल खतरों का एक फीसदी एहसास भी लोगों को है नहीं, एक मामूली सा गूगल लोकेशन आपके पिछले कई हफ्तों-महीनों की जानकारी आपके फोन पर पल भर में दिखा देता है कि किस दिन, किस वक्त आप कितनी देर कहां गए, कहां रहे। यह पूरा सिलसिला लोगों की कल्पना से बहुत ही अधिक खतरनाक है, इसलिए बाजारू इश्तहार के इस नारे पर भरोसा नहीं करना चाहिए- पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें। होना तो यह चाहिए कि पहले विश्वास करें, फिर इस्तेमाल करें...।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 19 फ़रवरी 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 19 फ़रवरी 2020

जजों की पांच-पांच बरस से खाली कुर्सियों पर भी नाम नहीं सुझा रहे हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट !

संपादकीय
19 फ़रवरी 2020

हिन्दुस्तान के किसी भी मामूली खाते-पीते आम घर में रसोई का सामान खत्म होने के हफ्ता-दस दिन पहले सामान लाकर रख दिया जाता है। उस घर को बहुत ही बुरे इंतजाम का शिकार माना जाता है जहां शक्कर, नमक, चायपत्ती, अदरक जैसे सामान खत्म हो जाते हों। ऐसे में जब हिन्दुस्तान के सुप्रीम कोर्ट में खड़े होकर भारत सरकार का वकील अदालत को कहता है कि देश की अदालतों में सैकड़ों पद इसलिए खाली पड़े हैं कि अदालतें समय पर भावी जजों के नाम केन्द्र सरकार को नहीं सुझाती हैं। अदालतों के खाली पदों को लेकर चल रही एक बहस में अटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने कहा कि उच्च न्यायालयों में जजों के 36 फीसदी पद खाली होने के लिए न्यायपालिका भी जिम्मेदार है। उन्होंने गिनाया कि अभी उच्च न्यायालयों के 396 खाली पदों में से 199 के लिए केन्द्र सरकार को कोई नाम भेजे ही नहीं गए हैं। उन्होंने कहा कि कई मामले तो ऐसे हैं जिनमें हाईकोर्ट कॉलेजियम पद खाली होने के पांच बरस बाद भी उसके लिए नाम नहीं सुझा रहे हैं। 

हिन्दुस्तान में अदालत के चक्कर में फंसने वाले लोगों की लोकतंत्र और न्यायपालिका पर आस्था पूरी ही खत्म हो जाती है। कई मामलों में लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी अदालत में खड़े रहते हैं, कई मामलों में फैसला सामने आने तक दोनों ही पार्टियां कंगाल हो जाती हैं, और हिन्दी के एक मशहूर उपन्यास में वर्णन के मुताबिक, जीतने वाले से अदालत के बाबू उसकी लंगोट भी उतरवा लेते हैं। ऐसे में जो एक सबसे बड़ी वजह इंसाफ में लेट-लतीफी की है, वह जजों की खाली कुर्सियां हैं। एक तिहाई से अधिक कुर्सियां खाली हैं, तो जाहिर तौर पर हर मामला एक तिहाई अधिक वक्त लंबा खिंच ही जाएगा। अटार्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट जजों की नियुक्ति में सरकार को औसतन 127 दिन लगे हैं क्योंकि उसे प्रस्तावित नामों के बारे में खुफिया रिपोर्ट भी बुलानी पड़ती है। लेकिन दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कॉलेजिमय में ही नाम बढ़ाने में 119 दिन लगाए। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने मिलाकर 18 दिनों में ही फाईल क्लीयर कर दी। उन्होंने अदालती बहस के दौरान यह सुझाया कि चूंकि जज नियुक्त करने में अदालत और सरकार-राष्ट्रपति को एक साल लग जाता है, इसलिए जज रिटायर होने के एक साल पहले से नए जज के लिए नाम तय कर लिए जाने चाहिए ताकि कुर्सी खाली न रहे। पटना और राजस्थान हाईकोर्ट में तो जजों की 50 फीसदी से अधिक कुर्सियां खाली हैं। 

अब देश भर में इतनी सारी लॉ यूनिवर्सिटी खुली हुई हैं, अदालतों में लाखों वकील प्रैक्टिस कर रहे हैं, निचली अदालतों में दसियों हजार, या लाखों जज काम करते हैं, ऐसे में हाईकोर्ट जज बनाने के लिए लोगों के नाम की कमी तो होनी नहीं चाहिए। कुर्सियां खाली रहें, और मामलों के ढेर शहरी कचरे के ढेरों से ऊंचाई का मुकाबला करते रहें, तो लोकतंत्र तो गटर में ही चले गया मान लेना चाहिए। जब गरीब और बेबस लोग इंसाफ की उम्मीद में अदालती फैसला पाने के लिए पूरी जिंदगी गुजार देते हैं, और उसके बाद भी जरूरी नहीं है कि उन्हें इंसाफ मिले, हो सकता है कि उन्हें सिर्फ फैसला मिले, तो वैसे में रसोई के नमक-शक्कर की तरह अदालतों में जजों का इंतजाम समय रहते क्यों नहीं किया जा सकता? यह सिलसिला बहुत ही निराश करने वाला है। जो अदालत देश के हर व्यक्ति पर अपना हुक्म चलाती है, उसके खुद के घर का हाल गड़बड़ है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के बड़े-बड़े जज समय रहते अदालती रसोई के लिए अदरक-चायपत्ती का इंतजाम नहीं करते तो यह छोटी बात नहीं है। 

जून 2019 में केन्द्रीय कानून मंत्री ने संसद को बताया था कि देश के 25 हाईकोर्ट में 43 लाख से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से 8 लाख से अधिक एक दशक से अधिक पुराने हैं। उस दिन सुप्रीम कोर्ट में डेढ़ लाख से अधिक मामले चल रहे थे। इसके एक बरस पहले का एक और आंकड़ा है, जिसमें तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था कि भारतीय अदालतों में तीन करोड़ तीस लाख मामले लंबित हैं। इनमें 16.58 लाख मामले अकेले बिहार में लंबित थे, जहां के हाईकोर्ट में जजों की आधी कुर्सियां खाली पड़ी हैं।

एक तरफ तो देश में आए दिन अलग-अलग किस्म के जुर्म के लिए अलग-अलग फास्ट ट्रैक अदालतें बनाने की बात होती है, पूरे देश में चुनाव याचिकाओं की जल्द सुनवाई के लिए विशेष अदालतें बनी हुई हैं ताकि सांसद या विधायक का कार्यकाल खत्म हो जाने के पहले उनकी पात्रता-अपात्रता पर फैसला हो सके। अदालतों के बड़े-बड़े जज अपने बीच के वकीलों या छोटे जजों के नामों में से अगर हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के लिए नाम तय नहीं कर सकते, तो यह हैरान करने वाली तकलीफदेह बात इसलिए भी है कि कुर्सी खाली होने के पहले ही उस कुर्सी के काबिल दावेदार-हकदार सामने रहते हैं, और जिस तरह लोक अदालतें लगाकर मामलों का बोझ खत्म करने की कोशिश होती है, अदालतों को अपने कॉलेजियम को भी लोक अदालत की तरह बिठाना चाहिए, हर खाली कुर्सी को भरने का काम भी करना चाहिए। कायदे की बात तो यह होगी कि किसी जज के रिटायर होने के पहले ही उसकी जगह नियुक्त होने वाले वकील और छोटे जज छांट लिए जाने चाहिए जिन्हें यह पता हो कि किस तारीख से उन्हें कहां काम सम्हालना है। हम जजों के नाम छांटकर सरकार को सुझाने की हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की प्रक्रिया को कम नहीं आंक रहे, उसका अतिसरलीकरण नहीं कर रहे, लेकिन उसे वक्त पर करने की जरूरत जरूर बता रहे हैं। आज हिन्दुस्तानी अदालतें जब अपनी खुद की खाली कुर्सियों के साथ इंसाफ नहीं कर पा रहे, वे किसी दूसरे के साथ क्या इंसाफ करेंगी?
  
(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

मां को कुतिया कहने वाले भगवों से भरा हिंदुस्तान...

संपादकीय
18 फ़रवरी 2020

पहले गाय को बचाने के नाम पर मरे जानवरों की खाल निकालने वाले दलितों को निशाना बनाया गया, और गुजरात के उना की वे तस्वीरें भूलती नहीं हैं जिनमें दलितों की नंगी पीठ पर दिनदहाड़े खुली सड़क पर बेल्ट से कोड़े लगाए गए। इसके बाद देश के आदिवासियों के खानपान पर हमला हुआ, दलितों और अल्पसंख्यकों के खानपान पर हमला हुआ, मांसाहारियों पर हमले हुए, और हिंदू धर्म के अलावा बाकी किसी भी धर्म को मानने वाले पर जुबान से और हथियारों से हमले हुए। इस हद तक हुए कि जब आरएसएस ने सिखों को हिंदू करार दिया, तो अकाली दल से लेकर अकालतख्त तक ने इसका विरोध किया। हिंदू धर्म के भीतर एक सनातनी व्यवस्था को न मानने वाले तमाम लोगों को गद्दार कहा गया, जो जय श्रीराम न कहे उसे पाकिस्तान जाने कहा गया, और जो मोदी की जरा भी आलोचना करे उसे देशद्रोही कहकर देशनिकाले के फतवे दिए गए। लेकिन नफरत और हिंसा के मुंह खून लग जाता है, और वे रूकने से मना कर देते हैं। जंगल के जानवरों के बारे में मानवभक्षी हो जाने की बात कही जाती है कि उनके मुंह इंसानों का खून लग जाए तो वे इंसानों को मारने लग जाते हैं, जानवरों का तो पता नहीं, लेकिन धर्म के नाम पर, एक आक्रामक राष्ट्रीयता के नाम पर हिंसा करने वाले लोगों के मिजाज में हिंसा घर कर जाती है, और वे हिंसा करने के लिए नए निशाने ढूंढने लगते हैं। पिछले तीन दिनों में एक ऐसा निशाना सामने आया हैै जिसने पूरे के पूरे हिंदू-समुदाय को जन्म दिया है, हिंदू महिला।

गुजरात में वहां के एक प्रमुख हिंदू समुदाय, स्वामीनारायण सम्प्रदाय के चलाए जाने वाले एक कन्या कॉलेज से खबर आई कि वहां माहवारी की किसी लड़की का एक पैड खुले में पड़े मिला तो पूरे कॉलेज की लड़कियों के कपड़े उतरवाकर जांच की गई कि किस-किस की माहवारी चल रही है। अब उस धार्मिक कॉलेज की बाकी खबरें भी आ रही हैं कि किस तरह वहां लड़कियों को माहवारी के दिनों में तलघर में अलग रखा जाता था। फिर मानो यह भी काफी नहीं था, तो इस कॉलेज ट्रस्ट के एक भगवा स्वामी, स्वामी कृष्णस्वरूप दासजी का यह बयान आया कि अगर कोई महिला माहवारी के दिनों में खाना पकाती है, तो वह अगले जन्म में कुतिया बनती है। जिन लोगों को न मालूम हो वे यह जान लें कि स्वामीनारायण सम्प्रदाय के प्रमुख स्वामी को महिलाओं से इस हद तक परहेज रहता है कि वे जिस सभा भवन में बैठते हैं, उसके बाहरी दरवाजों के सामने से भी किसी महिला के गुजरने पर रोक रहती है ताकि स्वामी की नजरें किसी महिला पर न पड़ें। 

दूसरी तरफ आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने अपनी घिसीपिटी दकियानूसी बातों को फिर दुहराया है कि शिक्षित घरों में तलाक के अधिक मामले होते हैं। वे एक किस्म से शिक्षा को खतरनाक बता रहे हैं, और इसके पहले वे कई बार यह बात कह चुके हैं कि महिला को घर संभालना चाहिए, और परिवार चलाने के लिए कमाई का जिम्मा आदमी पर छोडऩा चाहिए। अलग-अलग समय पर दिए गए उनके इन बयानों को देखें तो यह समझ आता है कि उन्हें पढ़े-लिखे परिवारों में महिला की पढ़ाई-लिखाई ही खतरनाक दिख रही है। महिलाओं के खिलाफ दकियानूसी बातें कहते हुए उनके भाषण आते ही रहते हैं, और पिछले चार दिनों में आई इन दोनों बातों को मिलाकर देखें तो लगता है कि हिंदू समाज के दो अलग-अलग किस्म के स्वघोषित नेता अब अपना निशाना अल्पसंख्यकों के बाद हिंदू महिलाओं की तरफ मोड़ चुके हैं। 

यह नौबत एक दिन आनी ही थी क्योंकि हिंसा करने और धार्मिक भेदभाव करने के आदी लोग हमेशा से महिलाओं को एक पसंदीदा-निशाना मानते आए हैं, और अब फिर थोड़े समय तक गाय, गोबर, गोमूत्र, हिंदुत्व, मंदिर के मुद्दे इस्तेमाल कर लेने के बाद अब वे फिर महिलाओं को कुतिया बनाने के अपने पसंदीदा शगल में लग गए हैं। ऐसी बकवास करते हुए लोगों को यह भी नहीं दिख रहा कि वे एक औरत की माहवारी की वजह से, उसके माहवारी के खून के बीच नौ महीने गुजारने के बाद ही पैदा हुए थे। लेकिन हिंदुस्तान जिस तरह बलात्कारी आसाराम के भक्तों से भरपूर है, मां को कुतिया कहने वाले के भक्तों की भी यहां कमी नहीं रहेगी, इनके खिलाफ अदालत तक जाने की जरूरत है।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 18 फ़रवरी 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 18 फ़रवरी 2020

बात की बात, 17 फ़रवरी 2020

बात की बात, 17 फ़रवरी 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 17 फ़रवरी 2020

एक ट्रेन में भगवान बैठे, देश की बाकी रेलगाडिय़ों में भी तब्दीली की जरूरत

संपादकीय
17 फ़रवरी 2020

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लोकसभा क्षेत्र बनारस से काशी महाकाल नाम की एक मुसाफिर ट्रेन शुरू हुई है जो कि इंदौर तक जाएगी। स्थानीय सांसद होने के नाते मोदी ने इसे झंडी दिखाई, और भीतर एसी-3 के एक डिब्बे में एक बर्थ स्थाई रूप से भगवान शंकर को अलॉट करके वहां मंदिर बना दिया गया है, और ट्रेन में धार्मिक संगीत बजेगा, उसकी सजावट धर्म के हिसाब से होगी। अब यह एक नया सिलसिला सरकार ने एक फैसले के तहत लिया है जो कि मुम्बई जैसे शहर में लोकल ट्रेन में मुसाफिरों की बहुतायत पहले से बलपूर्वक लागू करते आई है। वहां लोकल में गणेशोत्सव के समय रोज के मुसाफिर एक डिब्बे में गणेश प्रतिमा बिठाते हैं, पूजा-आरती करते हैं, और ढोल-मंजीरे संग संगीत भी करते हैं। अब इस ट्रेन के साथ यह काम सरकारी स्तर पर शुरू कर दिया गया है, जिसका अंत पता नहीं कहां जाकर होगा। 

अब केन्द्र की मोदी सरकार के सबसे मजबूत भागीदार, अकाली दल के सामने यह चुनौती होगी कि अमृतसर तक जाने वाली मुसाफिर रेलगाडिय़ों में वह स्वर्ण मंदिर के तीर्थयात्रियों के हिसाब से कैसी सजावट करवाए, और कैसा संगीत बजवाए। हिन्दुस्तान में अकेले अमृतसर में शुरू से ही आकाशवाणी से स्वर्ण मंदिर की सुबह की  गुरूवाणी का जीवंत प्रसारण होते आया है। इसके बाद नीतीश कुमार भी एनडीए के एक बड़े भागीदार हैं, और बिहार में इसी बरस चुनाव भी है, ऐसे में नीतीश कुमार की यह जिम्मेदारी हो जाती है कि उनके राज्य के बोधगया के हिसाब से उन्हें कुछ रेलगाडिय़ों को बुद्ध को समर्पित करवाना चाहिए, और आसपास से निकलने वाली ट्रेनों में एसी-3 नहीं, बल्कि एसी-1 में बुद्ध को बर्थ दिलवानी चाहिए, और बौद्ध संगीत भी बजना चाहिए। इसके बाद कई बार भाजपा की सरकार बनवाने वाले राजस्थान के अजमेर जाने वाली ट्रेन में वहां की दरगाह के हिसाब से साज-सज्जा होनी चाहिए, और पूरे रास्ते उसमें ख्वाजा की कव्वाली भी बजनी चाहिए। इससे कम में राजस्थान का सम्मान नहीं होगा, और प्रधानमंत्री मोदी के लोग बार-बार देश को याद दिलाते हैं कि वे केवल भाजपा के प्रधानमंत्री नहीं हैं, वे पूरे देश के प्रधानमंत्री हैं इसलिए अब मौका है कि देश भर के लोग अपने-अपने तीर्थस्थानों के हिसाब से रेलगाडिय़ां बनवा लें। कोलकाता जाने वाली गाडिय़ों में काली मंदिर बनाए जा सकते हैं, और प्रधानमंत्री की निजी आस्था के हिसाब से बेलूर मठ की साज-सज्जा वाली कुछ गाडिय़ां भी बनाई जानी चाहिए। तिरूपति जाने वाली गाडिय़ों की साज-सज्जा कैसी होगी यह एकदम साफ है, और उस ट्रेन में खाने की जगह तिरूपति के प्रसाद के विख्यात लड्डू मिलने चाहिए। मुम्बई की कुछ गाडिय़ां हाजी अली के हिसाब से, कुछ गाडिय़ां पारसियों के अग्नि-मंदिरों के हिसाब से, कुछ गाडिय़ां सिद्धि विनायक के गणेश की साज-सज्जा की होनी चाहिए। शिरडी के सांई बाबा के हिसाब से भी पास के स्टेशन से गुजरने वाली गाड़ी बननी चाहिए, और असम में भाजपा की सरकार है, वहां की कामाख्या के हिसाब से भी गाडिय़ां सजनी चाहिए। 

फिर जब इतनी धार्मिक भावना से सब कुछ हो रहा है, तो इन ट्रेनों में जैमर लगाकर मोबाइल-इंटरनेट बंद करवाने चाहिए, क्योंकि जो ईश्वर की ट्रेन में बैठे हैं, उन्हें इधर-उधर की बात करने, नेट-सर्फिंग करने के बजाय केवल कीर्तन पर ध्यान देना चाहिए। यह भी याद रखना होगा कि जिस ट्रेन में खुद ईश्वर को बर्थ अलॉट की गई है, उसमें से शौचालयों को तो हटाना ही होगा क्योंकि ईश्वर के आसपास ऐसा रहना ठीक नहीं है। बल्कि बेहतर तो यह होगा कि जिन पटरियों से यह ट्रेन गुजरेगी, वहां पूरे रास्ते लोगों को पखाने से रोकना होगा, ठीक उसी तरह जिस तरह आज गुजरात के अहमदाबाद में अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप की नजरों से झोपडिय़ों को रोकने के लिए ऊंची दीवार बनाई जा रही है। अभी तक तो ईश्वर मंदिर-मस्जिद या चर्च-गुरूद्वारे में रहते थे, इसलिए केवल उन जगहों को शौचालय-मुक्त कर देना काफी रहता था, लेकिन अब महाकाल काशी से इंदौर जाएंगे, और उनके गुजरते हुए पटरियों के किनारे शौच से धार्मिक भावनाएं बहुत बुरी तरह आहत होंगी। इसलिए पटरियों से पांच सौ मीटर दूर ही ऐसे गंदे काम की इजाजत देनी चाहिए जिस तरह कि सुप्रीम कोर्ट ने हाईवे से पांच सौ मीटर दूर शराबखानों को इजाजत दी थी। 

भारत चूंकि एक धर्मनिरपेक्ष देश है, और यहां पर सर्वधर्म समभाव की बात कही जाती है, इसलिए देश की बाकी ट्रेनों को भी उनकी मंजिलों के तीर्थस्थानों के हिसाब से ढालने की जरूरत है, क्योंकि आज देश के बहुत से लोगों को यह लग रहा है कि इस देश का अब भगवान ही मालिक है। लेकिन चूंकि देश धर्मनिरपेक्ष है और भगवान शब्द केवल हिन्दुओं के हिसाब से रहता है, इसलिए बाकी धर्मों को भी बराबरी का सम्मान देते हुए इस नौबत को बदलना चाहिए, ताकि लोगों को लगे कि इस देश का अब ईश्वर ही मालिक है, ईश्वर शब्द में सभी धर्म आ जाते हैं। रेलगाडिय़ां पूरे भारत की एकता का सबसे बड़ा प्रतीक है, और उसे ही सभी लोगों की भावनाओं का, खासकर धार्मिक भावनाओं का सम्मान करने में जोता जा सकता है, इसलिए देश के बाकी तीर्थस्थानों के लिए भी गाडिय़ों को चलाया जाए, वर्तमान गाडिय़ों को बदला जाए, और देश में आस्था के एक नए युग को शुरू किया जाए। ईश्वर के आशीर्वाद से ही यह देश पटरी पर लौट सकता है, और लौटेगा। देश की मोबाइल कंपनियां सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वैसे भी दुकानें बंद कर सकती हैं, ऐसे में लंबे-लंबे सफर में कीर्तन, कव्वाली, और दूसरे धर्मों की आराधना का बड़ा सहारा रहेगा।  

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM