दीवारों पर लिक्खा है, 31 मार्च

मजहब के नाम पर देश पर थोप डाला सबसे बड़ा खतरा!

संपादकीय
31 मार्च 2020


दिल्ली की बहुत घनी बस्ती निजामुद्दीन में मुस्लिमों की एक ऐसी बड़ी धार्मिक बैठक कोरोना के खतरे के बीच हुई कि जो मामूली समझबूझ के भी खिलाफ जाती है। इसमें करीब दो हजार लोग जुटे, और इसी भीड़ के बीच देश में लॉकडाउन हुआ। बाद में यहां से निकलकर लोग देश भर में पहुंचे, इनमें से सात की तेलंगाना में और एक की कश्मीर में मौत की खबर है। इस धार्मिक कार्यक्रम से लौटे लोगों में से दर्जनों के कोरोना-पॉजिटिव होने की रिपोर्ट भी आ गई है। दिल्ली में सरकार इस धार्मिक संस्थान से लोगों को निकालकर क्वारंटाइन सेंटर में भर्ती करा रही है, लेकिन यहां से निकलकर देशभर में लौटे लोगों में से 9 लोग तो अंडमान में ही कोरोना-पॉजिटिव निकल गए हैं। आगे जाने क्या होगा। 
बात महज दिल्ली की नहीं है, जिस किसी धर्म में ऐसी कट्टरता हो कि जिंदगी और मौत को अनदेखा करके अपने धर्म को मानने से पूरी दुनिया पर खतरा खड़ा कर दिया जाए, तो फिर ऐसे धर्म के खिलाफ कानून का कड़ा इस्तेमाल करना चाहिए। आज जब हज यात्रा रद्द होने की खबरें हैं, तो दिल्ली में खतरा उठाकर, खतरा खड़ा करके, हजारों का धार्मिक जमावड़ा सरकार को पहले ही खत्म कर देना था। ऐसा तो है नहीं कि देश की राजधानी में मुस्लिमों की इतनी बड़ी भीड़ सरकार की खुफिया नजरों से बचकर हो गई हो, इसे पहले ही खत्म करवाना था। अभी यह खबरें भी आ रही हैं कि बिहार और झारखण्ड की कुछ मस्जिदों में विदेशों से आए हुए धर्मप्रचारक ठहरे हुए थे, बिना सरकार को खबर दिए। अगर ऐसा है, तो यह भी सरकारों की नाकामी है, और यह पूरे देश को भारी पड़ेगी। 
लोगों को याद होगा कि  कुछ बरस पहले उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में मुस्लिमों के बीच यह अफवाह फैलाई गई थी कि पोलियो ड्रॉप्स में ऐसी दवा अमरीका से मिलाकर भेजी जा रही है जिसके पिलाने से मुस्लिमों की नस्ल बढऩा ही रुक जायेगा। हिंदुस्तान में तो किसी तरह इस अफवाह पर काबू पाया गया, लेकिन कट्टरपंथी धर्मान्धता में डूबे पाकिस्तान में ऐसा नहीं हो पाया। वहां अभी कुछ महीनों पहले तक पोलियो ड्रॉप्स पिलाने वाले सरकारी कर्मचारियों को मजहबी आतंकियों ने गोली मारकर मार डाला। नतीजा यह है कि आज पाकिस्तान दुनिया की उन गिनी-चुनी जगहों में से है जहां पोलियो जिंदा है, और बाकी दुनिया के लिए खतरा भी है। 
लेकिन मुस्लिमों के बीच अशिक्षा के चलते, गरीबी की नासमझी के चलते, मदरसों की अवैज्ञानिक पढाई के चलते, मुस्लिमों को यह समझाना आसान हो गया है कि जब तक अल्लाह नहीं चाहेगा उन्हें कोई नहीं मार सकता। जिस धर्म में शिक्षा जितनी कम है, कट्टरता जितनी अधिक है, उस धर्म में धर्मगुरु, लोगों को उतनी ही आसानी से बेवकूफ बनाकर अपनी दूकान चलाते हैं। अल्लाह भी उन्हीं को बचाना चाहेगा जो  खुद को बचाना चाहेंगे, न कि ऐसे लोगों को जो कि दूसरे बेकसूर लोगों की जिंदगी पर खतरा खड़ा करें। इतिहासकार इरफान हबीब ने इसे बेवकूफी और जुर्म लिखा है कि ऐसे वक्त यह धार्मिक कार्यक्रम किया गया। उन्होंने लिखा-हैरानी की बात है कि यह जमाती खबर नहीं पा सके थे, या दुनिया भर पर मंडराते खतरे को उन्होंने जान-बूझकर अनदेखा किया ? 
अभी तक हिंदुस्तानी टीवी चैनल फिदा होकर कुछ मुस्लिम मुल्लाओं के वीडियो दिखाने में लगे हैं जिनमें नमाज के लिए मस्जिद जाने वालों को अल्लाह की मेहरबानी से हिफाज़त मिली होने के दावे किये जा रहे हैं। ऐसे लोग अपने ही मजहब के लोगों को मिटा देने पर आमादा है। जिनके ऐसे-ऐसे यार, उनको दुश्मन की क्या दरकार?
यह वक्त और दुनिया पर मंडराता खतरा बताता है कि अब किसी धर्म को दुनिया पर खतरा नहीं बनने दिया जा सकता। अब इंतजाम सरकारों की ताकत से परे के हो गए हैं, खतरे विज्ञान की ताकत से परे के हो गए हैं। ऐसे में किसी को बेवकूफ होने की छूट नहीं दी जा सकती और ना ही धर्मांध होने  की। कोई धर्म अल्पसंख्यक है, इस नाते उसे बाकी  देश  को खत्म करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। इस जमावड़े पर सख्त कानूनी करवाई करनी चाहिए ताकि बाकी धर्मों के धर्मांधों के लिए भी यह एक सबक रहे। आज दिल्ली के इस धर्मांध जमावड़े ने पूरे देश का सबसे बड़ा अकेला खतरा खड़ा कर दिया है, इतना बड़ा कि उसे सा रे ईश्वर मिलकर भी नहीं सुधार सकते। यह अलग बात है कि लोगों को यहाँ जुटाने वाले मुल्ला उन्हें हूरों का सपना दिखा रहे होंगे! 
(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 30 मार्च 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 30 मार्च 2020

बादल दिल्ली में फटा, और पूरा देश डूब गया

संपादकीय
30 मार्च 2020


लॉकडाउन के दौरान देश भर से पुलिस ज्यादती के बहुत सी खबरें आ रहीं हैं। तस्वीरें और वीडियो बताते हैं कि बेकसूरों को किस तरह लाठियां पड़  रही हैं। दरअसल पुलिस सरकार का सबसे पहले दिखने वाला चेहरा होता है। हर मुसीबत के वक्त पुलिस ही सबसे आगे, मुसीबत के सामने होती है। पुलिस के सामने सत्ता की ताकत से मदमस्त लोग होते हैं, कानून तोडऩे वाले होते हैं, आज की दिल्ली की तरह के दसियों लाख बहुत बेबस लोग होते हैं, और पुलिस का काम ऊपर के हुक्म को पूरा करना होता है, फिर चाहे वह दिल्ली का ऐतिहासिक बुरा सरकारी फैसला ही क्यों ना हो। पुलिस की वर्दी पर जिस तरह पट्टियाँ लगीं होती हैं, जिस तरह सितारे जड़े  होते हैं, उसी तरह यह भी जड़ा होता है कि उसे हुक्म मानना है। 

हम अपने आसपास की पुलिस को देख रहे हैं, तो वह सड़कों पर रात-दिन लोगों को रोकने में ही लगी हुई है। हर एक को रोककर, उसकी पहचान देखते हुए पुलिस अपने-आपको अधिक खतरे में डालती ही चलती है, कई जगहों पर बीमारों को पुलिस ही अस्पताल पहुंचा रही है, अनाज पहुंचा रही है, सब्जी पहुंचा रही है। पुलिस न सिर्फ सरकार का चेहरा हो गई है, बल्कि सरकार के हाथ-पैर सब कुछ हो गई दिखती है। क्या पुलिस सचमुच ही ऐसे तमाम कामों के लिए बनी है? और क्या ऐसी मुसीबत के वक्त बढ़े हुए तमाम काम करने की ताकत भी है पुलिस में?

आज सड़कों पर जो पुलिस दिख रही है, उसके पास अच्छे मास्क भी नहीं हैं, दिखावे के जो मास्क हैं, उन्हें देखकर कोरोना बस हँस ही सकता है। लेकिन पुलिस ऐसे लोगों की पहली मिसाल है, अकेली नहीं। सरकार के कई और दफ्तर हैं, अस्पताल हैं, एम्बुलेंस हैं, इन सबके कर्मचारियों के बचाव के इंतजाम नाकाफी हैं, और उनकी जान को जोखिम काफी है। फिर जिस तरह आज घरों में महफूज़ कैद बाकी आम लोगों के परिवार हैं, इन लोगों के भी परिवार हैं। आज भी मुहल्लों की नालियों में उतरकर सफाई कर्मचारी पानी का रास्ता बना रहे हैं, दवा छिड़क रहे हैं। और अभी तीन हफ़्तों के लॉकडाउन का पहला हफ्ता भी पूरा नहीं हुआ है। अभी कम से कम दो हफ्ते, और अधिक हुआ तो कई और हफ्ते इसी किस्म की सख्त ड्यूटी के हो सकते हैं। 

मुल्क पर अगर महज कोरोना का हमला हुआ रहता तो भी तमाम सरकारी अमले थक जाते, लेकिन मुल्क पर हमला तो कोरोना के साथ-साथ सरकारी बददिमाग-फैसले का भी हुआ है जिसने देश के करोड़ों सबसे गरीब लोगों को देश की सरहद के भीतर मुजरिम, अवांछित, शरणार्थी बना दिया है। न शहरों में, न कारखानों की बस्तियों में उनके रहने का इंतजाम है, ना ही घर जाने की इजाजत, न साधन। फिर आज देश में किसी को यह भरोसा नहीं है कि सरकार सच ही बोल रही है। जिस तरह ईश्वर पहाड़ी इलाकों में बादल फटने की सजा देता है, और नीचे के पूरे गांव डूब जाते हैं, उसी तरह इस देश में दिल्ली में बादल फटता है, और देश के तमाम गरीब डूब जाते हैं। इस बात को पुलिस भी समझती है, सफाई कर्मचारी भी समझते हैं, और राज्यों की सरहदों पर तैनात बाकी लोग भी समझते हैं। उनके मन इस रंज से भरे हुए हैं कि पूरे देश के सरकारी अमले की जिंदगी को इस तरह खतरे में क्यों डाला गया, क्यों देश के करोड़ों लोगों को इस तरह रातों-रात बेघर कर दिया गया, सड़कों पर ला दिया गया, शरणार्थी बना दिया गया। यह सब देखकर भी लोगों में जान पर खेलकर काम करने की हसरत कम होती है। लोगों के सामने मिसाल है कि नोटबंदी से देश को मौत और अंधाधुंध घाटे के सिवाय कुछ नहीं मिला था। अब उसी अंदाज में किए गए लॉकडाउन से भी लोगों को मौत और मौत के टक्कर की बेरोजगारी ही मिल रहे हैं, देश करे तो क्या करे? और मजबूर सरकारी अमला करे तो क्या करे? जान दे-दे दिल्ली के गलत फैसलों के लिए ?  

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 29 मार्च 2020

..यह अँधेरी सुरंग अंदाज से कुछ अधिक ही लम्बी रहेगी

संपादकीय
29 मार्च 2020


दिल्ली से गावों की ओर लौटते मजदूरों की तो तस्वीरें पल-पल में आ रहीं हैं, वे दिल दहला रही हैं, लेकिन पिछले दो दिनों से उनके बारे में लिखने के बाद आज फिर उसी पर लिखना ठीक नहीं, अब से कुछ देर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बोलने वाले हैं, तो आज उन्हीं को बोल लेने दिया जाये इस पर। हम अपनी बारी कल इस्तेमाल करेंगे। लेकिन आज एक और बात पर सोचने की जरूरत है। करने की तो कोई गुंजाईश अभी कई हफ्ते है नहीं, लेकिन  सोचने के लिए तो वक्त ही वक्त है।

जब कभी कोरोना-लॉकडाउन खत्म होता है, और उसके बाद जितने भी लोग बचे रहते हैं, उनके सामने आगे की पहाड़ सी जिंदगी खड़ी रहेगी। और बाजार पर कर्ज का पहाड़ भी खड़ा रहेगा। कारोबार ठप्प रहेगा, ग्राहक बचेंगे नहीं, और ऐसी हालत में निजी क्षेत्र की नौकरियां भी नहीं बचेंगी। कारखाने क्या बनाएंगे जब बाजार में खरीददार ही नहीं होंगे? यह नौबत जल्द खत्म नहीं होगी। फिर हिन्दुतान तो वैसे भी बहुत बुरी आर्थिक मंदी से गुजर रहा था। मंदी  को लेकर अर्थशास्त्रियों की परिभाषाएं जो भी कहती हों, रोज की जरूरतों के अलावा बाकी सभी सामानों के ग्राहक घर बैठ गए थे। जिनके पास भ्रष्टाचार की, दो नंबर की कमाई थी, महज वे ही लोग बाजार में महंगी खरीददारी कर रहे थे। हो सकता है कि भ्रष्टाचार जारी रहे और ऐसी कुछ खरीददारी जारी भी रहे, लेकिन उससे अर्थव्यस्था नहीं चलती। 

हकीकत यह दिख रही है कि कोरोना से जो लोग चल बसेंगे, वे तो सारी तकलीफों से आजाद हो चुके रहेंगे, लेकिन जो बचे रहेंगे, उनकी जिंदगी बहुत मुश्किल होगी। आज इस मुद्दे पर लिखने की जरूरत इसीलिए लग रही है कि  सीमित कमाई वाले तमाम लोगों को यह सोचना चाहिए कि कमाई घटी तो वे कैसे जियेंगे, नौकरी छूटी तो वे कैसे जियेंगे? कोरोना का खतरा और कोरोना की दहशत अपनी जगह है, लेकिन लॉकडाउन में खाली बैठे इस पर भी सोचना बहुत जरूरी है। लोगों को, खासकर मेहनत और ईमानदारी की कमाई पर जिंदा लोगों को अपने खर्च घाटे और कमाई बढऩे के बारे में तुरंत कुछ करना होगा। सकरी तनख्वाह पाने वाले लोग तो फिर भी अछूते रह सकते हैं, लेकिन निजी क्षेत्र के कामगार, असंगठित मजदूर, और बेरोजगार तो कुचल जाने का खतरा रखते हैं। आज हिंदुस्तान में जिस किसी गरीब कामगार के पास थोड़ी-बहुत भी बचत होगी वह अगले हफ्तों में खत्म हो चुकी रहेगी। आसपास अगर मोठे ब्याज पर भी कर्ज मिलेगा, तो भी लोग कर्ज तले दब जायेंगे। फिर उसके बाद का वक्त बेरोजगारी का रहेगा, जिसमें कर्ज लौटने की भी कोई गुंजाइश नहीं रहेगी। आज जो लोग गावों के लिए निकल पड़े हैं, वे जल्द काम पर न लौट पाएंगे, न उनके लिए काम बचा ही रहेगा। 

जहाँ तक कारोबार की बात है, तो हर क्षेत्र में सबसे नीचे के धंधे बंद होंगे। सबसे कामयाब के बचने की संभावना अधिक होगी, लेकिन कमजोर, नाकामयाब, कर्ज से लदे धंधे बंद होंगे। कड़वी जुबान में कहें तो जिस तरह जंगल में सबसे ताकतवर के जि़ंदा रहने की संभावना सबसे अधिक होती है, कारोबार में भी वही होने का पूरा ख़तरा दिख रहा है। ऐसी हालत में जो कामगार सबसे अच्छे हैं, उनका रोजगार बना रह सकता है, लेकिन बाकी? उनको बेहतर होने के बारे में सोचना चाहिए, पहला मौका मिलते ही उनको अपना हुनर बेहतर करना चाहिए। मंदी वाले बाजार में औसत के खरीददार नहीं होते। 

देश में नोटबंदी से आई तबाही जीएसटी के बुरे अमल से और आगे बढ़ी, फिर मंदी, देश में बेवजह आंदोलन खड़े करने की नौबत न्योता देकर लाई गई, नागरिकता को मुद्दा बनाकर देश की सोच को जख्मी और हिंसक बनाया गया, और अब आखिर में कोरोना आ गया, जिस पर लॉकडाउन इस बदइंतजामी का किया गया कि देश के लोगों का लोकतंत्र पर से भरोसा उठ जाये तो भी हैरानी नहीं होगी। लेकिन उस पर फिर कभी, जल्द ही। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 28 मार्च 2020

सरकार गोरी-अंग्रेज थी तब भी, और अब काली-देसी है, तब भी !

संपादकीय
28 मार्च 2020


हिंदुस्तान की बड़ी तकलीफदेह तस्वीरें सामने आ रही हैं, आती ही जा रही हैं। कोरोना से प्रभावित किसी और देश में सड़कों पर बेवजह-बेसहारा लोगों के सैकड़ों किलोमीटर सफ़र की ऐसी तस्वीरें देखने नहीं मिलीं क्योंकि वे हिंदुस्तान से अधिक सम्पन्न देश भी थे। हिंदुस्तान की सरकार विदेशों से तो हिंदुस्तानियों को मुफ्त के हवाई जहाज में बिठाकर लाई लेकिन देश के भीतर दसियों लाख, या करोड़ों, मजदूर, बेरोजगार, पैदल सफर करके अपने गांव जा रहे हैं। ऐसे में भाजपा के एक भूतपूर्व सांसद बलबीर पुंज ने उनका मखौल भी उड़ाया है ट्विटर पर, कि काम बंद होने से ये मजदूर अपने घर वालों से मिलने चले जा रहे हैं जिनसे मिलना नहीं हुआ था। बलबीर पुंज इस तरह कुछ सौ किलोमीटर पैदल जाकर देख लें, उनके बदन और दिमाग दोनों की चर्बी छंट जाएगी।

लोगों का बच्चों को, बीमारों को, जख्मी घरवालों को लेकर इस तरह सैकड़ों किलोमीटर चलना भारत-पाक विभाजन की भयानक तस्वीरों को याद दिला रहा है। कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर ऐसी दो तस्वीरों को जोड़कर तुलना भी की है। वह तो अंग्रेज सरकार का वक्त था, आज तो सरकार हिंदुस्तान की है। लेकिन ऐसे में कुछ समझदार लोग भी ऐसे मजदूरों को पलायन करने वाले लिख रहे हैं कि ये लोग आदतन हर बरस पलायन करके जाते ही हैं। यह भी लिखा जा रहा है कि अब वे शहरों से वापिस पलायन करके गाँव आ रहे हैं। क्या मजदूर पलायन करते हैं? क्या वे काम और मेहनत से दूर भागते हैं पलायन करके? सच तो यह है कि बेबस मजदूर काम की तलाश में, या बेहतर मजदूरी की तलाश में सैकड़ों-हजारों किलोमीटर दूर जाकर भी रात-दिन काम करते हैं। उनका यह जाना पलायन नहीं होता, यह तो देश-प्रदेश की सरकारों का अपनी जिम्मेदारी से पलायन होता है कि वे अपने काबिल मजदूरों को काम नहीं दे पातीं, जरूरत की मजदूरी नहीं दे पातीं। पलायन मजदूर नहीं करते, सरकारें करती हैं अपनी जिम्मेदारियों से ? लेकिन भाषा को हमेशा ताकतवर का हिमायती बनाया जाता है इसलिए पलायन का कुसूरवार मजदूरों को ठहराया जाता है। आज देश भर से, जगह-जगह से, मकान मालिक अपने किराएदार मजदूरों को भगा रहे हैं। इसमें मजदूर पलायन नहीं कर रहे, किराया लेने वाले मकान मालिक अपनी कानूनी और सामाजिक दोनों ही किस्म की जवाबदेही से पलायन कर रहे हैं।

आज कई वीडियो दिख रहे हैं कि लोग हाईवे के किनारे खड़े होकर गांव जाते लोगों को खाने के पैकेट दे रहे हैं। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के समाजवादी नेता प्रदीप चौबे ने किसानों के लिए लिखा है कि वे ट्रैक्टर (ट्रॉली) लेकर निकलें और गुजरते हुए मजदूरों को दूर तक पहुंचकर आएं। उन्होंने अपने साथियों से भी सड़कों पर मदद के लिए तैनात रहने कहा है। लेकिन सवाल यह है कि देश भर में करोड़ों लोगों को बेबसी में ऐसे क्यों जाना पड़ रहा है? जो जहां थे वहीं सरकारी और सार्वजनिक इमारतों में, सरकार के दिमाग में, लोगों के दिलों में इतनी जगह नहीं थी कि तीन हफ्ते इनको सिर पर छत और दो वक्त का खाना दिया जा सकता? समाज और सरकार के पास मिलकर भी छतें नहीं थीं? या गाडिय़ां नहीं थीं? पता नहीं खबर सच है या नहीं, एक हिंदुस्तानी एयरलाइंस स्पाईस जेट ने मुम्बई से मजदूरों को पटना तक पहुंचाने का प्रस्ताव दिया है, मुफ्त में। कुछ लोगों ने यह भी लिखा है कि महानगरों में खाली पड़ीं या आधी बनी इमारतों में भी लोगों को ठहराया जा सकता था, बजाय उनके पैदल सफर के। जो सरकार देश भर में पल भर में ट्रेनों को बंद करना जरूरी समझती है उसे यह खतरा नहीं दिखा कि लोग घने बसे महानगरों से देश के गांव-गांव तक जाएंगे जो अधिक बड़ा खतरा होगा, बजाय खाली शहरी इमारतों में ठहरने के? और गांवोंं में भी तो शहर से लौटते अपनों को घुसने नहीं दिया जा रहा है महामारी के इस दौर में। जिनके पसीने के ईंधन से देश की अर्थव्यवस्था का इंजन चलता है, वे आज यहां के नागरिक ही नहीं रह गए, न महानगरों के न गांवों के। वे बस अब सड़क नाम के एक देश के पैदल मुसाफिर हैं, नागरिक कहीं के नहीं ! विभाजन के वक्त तो गोरी अंग्रेज सरकार थी, लेकिन आज तो काली देसी सरकार है ! विभाजन जारी है !

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 27 मार्च 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 27 मार्च 2020

सडक़ों और फुटपाथों पर अनगिनत बेबस

संपादकीय
27 मार्च 2020


अभूतपूर्व और असाधारण हालात असाधारण फैसलों की मांग करते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में 21 दिन का कोरोना-लॉकडाऊन करके यही काम किया है। यह वक्त इस चूक को गिनाने का नहीं है कि मोदी ने राहुल गांधी की चेतावनी के करीब चालीस दिन बाद यह कार्रवाई की। यह वक्त यह गिनाने का भी नहीं है कि मोदी ने लॉकडाऊन के वक्त को देश पर एक धक्के की तरह क्यों लादा और संभलने का मौका क्यों नहीं दिया। लेकिन यह वक्त कुछ बुनियादी सवालों को उठाने का है जिनसे आज हिंदुस्तान के करोड़ों लोगों की जिंदगी जुड़ी हुई है। इन सवालों का अंदाज लगाने और उनके जवाब तैयार करने के लिए केन्द्र सरकार के पास कई हफ्ते थे, और आज भी वे सारे सवाल सूनी सडक़ों के किनारे फुटपाथों पर मानो किसी सवारी के इंतजार में खड़े हैं।

सबसे पहले सबसे कमजोर इंसानों की सबसे जरूरी बात। आज देश भर में लाखों बेबस और गरीब सडक़ों पर फंस गए हैं। अपने घर या गांव लौटने के लिए उनके पास कोई साधन नहीं है। मीडिया की वजह से ऐसे लोगों की तस्वीरें और खबरें सामने आ रही हैं कि वे किस तरह हजार किलोमीटर तक के पैदल सफर पर निकल पड़े हैं। कोई ऐसा भी है कि बच्चे को कंधे पर बिठाए चल ही रहा है। कुछ लोग गर्भवती महिला के साथ हैं, बिना खाने के हैं। जिस सरकार के हाथ में पल भर में लॉकआऊट का हक था, उसी के हाथ में यह चेतावनी भी थी कि ट्रेनें बंद होने से पहले लोग घर लौट जाएं। ऐसे किसी इतने कड़े फैसले की घोषणा इतनी रहस्यमय और इतनी एकाएक होगी क्यों जरूरी थी कि सबसे कमजोर करोड़ों लोगों के पैर प्रतिबंधों की सुनामी में ऐसे उखड़ जाएं ? ये सवाल आज मुसीबत के बीच में जरूरी इसलिए है कि आने वाला वक्त कई और प्रतिबंधों का हो सकता है, होगा, और उन्हें भाषण में एक लिस्ट की तरह जारी करने के बजाय, तय करते ही जल्द से जल्द जारी करना चाहिए। फैसलों का राष्ट्र के नाम संदेश होना जरूरी नहीं होता, राज्यों को विश्वास में लेकर हर चेतावनी, हर रोक ऐसे लागू करनी चाहिए कि गरीब बेबस संभल सकें। अब हर कोई मुकेश अंबानी तो है नहीं जिसके आसमान छूते घर में उसके सैकड़ों दास-दासी भी रह सकें। समाज के सबसे कमजोर को दरिद्रनारायण कह देने से ही उस नारायण को भोग नहीं लग जाता। आज देश में करोड़ों लोग इतने असंगठित और इतने बेसहारा हैं कि सरकारों की कोई तैयारी उनके लिए नहीं है। केन्द्र सरकार तो कोरोना चेतावनी पर चालीस दिन बैठी रही, लेकिन आज जनता फुटपाथ पर चालीस दिन कैसे रहे ? अस्सी बरस की बूढ़ी औरत सैकड़ों किलोमीटर का सफर कैसे पैदल तय करे ?

आज जब मुसीबत की इस घड़ी में पूरे देश को एक-दूसरे के दुख-दर्द से जुड़ा रहना चाहिए तब लोगों के बीच यह बात कचोट रही है कि विदेशों में बसे हुए या वहां गए हुए हिंदुस्तानियों को वापिस लाने के लिए तो भारत सरकार हवाई जहाज भेज रही है लेकिन देश के भीतर जो करोड़ों लोग जगह-जगह फंसे हुए हैं वे अब भी बेसहारा हैं।

आज अब राज्यों में तमाम इंतजाम राज्यों के जिम्मे आ गया है। ऐसी नौबत में जो भी करना है वह राज्यों को करना है, जिलों को करना है। केन्द्र सरकार ने राज्यों पर यह मुसीबत बाकी कई मुसीबतों की तरह एकाएक लाद दी है। यह नौबत भयानक है, और राज्य सरकारों के साथ हमारी हमदर्दी है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से लेकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल तक ने बिना किसी आलोचना के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हर कदम का साथ देने की खुली घोषणा की है। लेकिन अकेले सरकारों के बस का कुछ है नहीं। जनता में मामूली सक्षम लोगों को भी अपने आसपास के जरूरतमंद लोगों का साथ देना होगा, तभी बेबस जिंदा रह पाएंगे।  

(Daily Chhattisgarh)

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 26 मार्च 2020

कुछ अपनी बात से शुरू होकर दूसरों की बात तक

संपादकीय
26 मार्च 2020


बुरा वक्त कई अच्छी नसीहतें देकर आता है, कई नई बातें सिखा जाता है। हिन्दुस्तान में कोरोना जिस रफ्तार से लंबी-लंबी छलांगें लगाकर फैल रहा है, उसका अंदाज अब तक लोगों को लग नहीं रहा है, इसलिए कि लोगों को लगता है कि जितने लोगों की मेडिकल जांच में कोरोना पॉजिटिव निकला है वही हकीकत है। सच तो यह है कि उससे हजारों गुना लोगों को आज ही कोरोना पॉजिटिव होगा, और लाखों लोगों को तब तक हो चुका होगा, जब तक इन हजारों लोगों की शिनाख्त हो पाएगी। ऐसे में तीन दिन पहले हमें यह अखबार छापना बंद कर देना ठीक लगा था। बात महज सैकड़ों कर्मचारियों की नहीं थी, उसे लोगों तक पहुंचाने वाले हजारों लोगों की जान की हिफाजत की बात भी थी। जान है तो जहान है, आज के इस डिजिटल जमाने में लोगों की जिंदगी को खतरे में डालते हुए अखबार को बंटवाना कम से कम हमें समझदारी नहीं लगी, और बिना किसी और पर अपनी सलाह का दबाव डाले हमने उसे छापना तब तक स्थगित कर दिया जब तक कोरोना लोगों की जिंदगी पर मौत बनकर मंडराता रहे। रोज सुबह-शाम छत्तीसगढ़ में दसियों हजार हॉकर कुछ घंटे घर-घर जाएं, यह बात प्रधानमंत्री के देश के लॉकडाऊन के शब्दों और उनकी भावना, किसी के साथ भी मेल खाने वाले बात नहीं थी, चिकित्सा विज्ञान के हिसाब से तो मेल खाने वाली बात बिल्कुल भी नहीं थी। 

अब आज यह लग रहा है कि इस अखबार को तैयार करने और इंटरनेट-मोबाइल फोन पर लोगों तक पहुंचाने के लिए जिस तरह कुछ दर्जन लोग एक हॉल में कम्प्यूटरों पर काम कर रहे हैं, वह भी हिफाजत के खिलाफ है, और इसका कोई रास्ता ढूंढना जरूरी है। इसलिए आज सुबह हमने तय किया कि अखबार का न्यूजरूम तुरंत बंद कर दिया जाए, और सारे लोग अपने घरों से काम करें। टेक्नालॉजी तो मौजूद है, लेकिन ऐसी आदत नहीं रही कि बिना आसपास बैठे, बिना एक-दूसरे पर चीखे-चिल्लाए, बिना झल्लाए, बिना संवाददाताओं को फोन पर डपटाए अखबार तैयार कर लिया जाए। ऐसी दिमागी हालत में भी आज इस वक्त जब एक कम्प्यूटर पर यह हाल टाईप हो रहा है, तब दूसरे कम्प्यूटर ले लेकर कुछ साथी घर रवाना हो रहे हैं, कुछ और लोग कुछ घंटों का काम यहीं निपटाकर रवाना हो जाएंगे। जिन मशीनों पर रोज दफ्तर में काम होता है, उन्हीं मशीनों पर घर से काम होने लगेगा, और इस तरह की नेटवर्किंग जो कि दुनिया में बहुत सी जगहों पर आम हैं, वह सीखने का हमारे लिए यह एक नया मौका है। यह इसलिए मुमकिन हो पा रहा है कि इंटरनेट और टेलीफोन की सहूलियतें बढ़ी हुई हैं, और इसके लिए हम इन कंपनियों के आज भी काम कर रहे कर्मचारियों को भी शुक्रिया के साथ सलाम कर रहे हैं। 

 लोग अभी भी अखबारी कागज को महफूज बताकर यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि कोरोना कागज के मार्फत कहीं नहीं जाता। लेकिन इस कागज को लेकर घर-घर भटकने वाले, बहुत ही मामूली मजदूरी पाने वाले लोगों की जिंदगी के खतरे का अहसास करना भी जरूरी है। सरकार के कानून अखबार छापने और पहुंचाने की छूट दे रहे हैं, लेकिन स्मार्टफोन और इंटरनेट के जमाने में कुछ दिनों के लिए हॉकरों की जिंदगी खतरे में डाले बिना भी काम चल सकता है। अखबार के दफ्तर में आए बिना भी एक अखबार निकल सकता है, और छपे बिना भी बंट सकता है। यह सब हमें सीखने मिल रहा है, और हकीकत यह है कि कुछ नया सीखने के लिए स्लेट पट्टी पर पहले का लिखा हुआ साफ करना पड़ता है, और हमें एक बड़ी मेहनत उसी पुरानी सोच को मिटाने में करनी पड़ रही है। 

छत्तीसगढ़ की सड़कों पर अब भी आम लोगों की आवाजाही, लोगों का बिना मास्क लगाए निकलना, किराना दुकानों या गैस दुकानों पर लोगों की धक्का-मुक्की जैसी भीड़ से ऐसा लगता है कि कोरोना के खतरे का पूरा अहसास लोगों को है नहीं। लोगों को यह अंदाज नहीं हैं कि आज कुछ असली, कुछ फर्जी वीडियो जिस तरह तैर रहे हैं, और लाशों को इधर-उधर पड़े हुए बता रहे हैं, वह एक हकीकत भी हो सकती है। ऐसे कल से बचने के लिए आज अपने आपको बंद कर लेना जरूरी है। यह वक्त उन तमाम लोगों की जिंदगी को बचाने के लिए भी जरूरी है जो अस्पतालों में मरीजों और मौतों के मोर्चे पर डटे हुए हैं। जो लोग मरीजों को अस्पताल तक ले जा रहे हैं, और रात-दिन ड्रायवरी कर रहे हैं, स्ट्रेचर उठा रहे हैं। यह वक्त उन पुलिसवालों को भी सलाम करने का है जो लापरवाह लोगों से जूझते हुए शहरों के हर चौराहे पर खड़े हैं, और हर किसी को रोककर उससे बात करने को मजबूर हैं। आज जब लोग जायज वजहों से इस हद तक डरे हुए हैं कि अड़ोस-पड़ोस तक आना-जाना बंद है, और रहना भी चाहिए, तब भी पुलिस रात-दिन सड़कों पर है, धक्का-मुक्की और भीड़ के बीच है, अस्पताल में भी है, और थाने में भी लोगों से जूझ रही है। यह वक्त अपने परिवार से दूर काम कर रही ऐसी पुलिस को भी सलाम करने का है। 

बाजार में कुछ लोग अपनी खुद की बेबसी से सब्जी बेचने बैठे हैं, दूध पहुंचा रहे हैं, गैस सिलेंडर पहुंचा रहे हैं, बिजली घरों को चला रहे हैं, बिजली घरों के लिए कोयला निकाल रहे हैं, कोयले से लदी ट्रकें और मालगाडिय़ां चला रहे हैं। मेडिकल स्टोर खोलकर बैठे हैं जहां पर मरीजों और उनके घरवालों के अलावा कोई नहीं आते, और उनका सीधा खतरा झेल रहे हैं। ऐसे तमाम लोगों को हमारा सलाम। साथ ही बाकी लोगों से यह अपील भी कि इनमें से किसी से भी बहस न करें, उनके काम में दिक्कत न डालें। यह मौका बातों को बहुत व्यवस्थित तरीके से लिखने का नहीं है, और अपनी खुद की बात लिखते हुए यह अंदाज नहीं था कि दूसरों के लिए धन्यवाद की बात यहीं पर लिखना सूझेगा। कुल मिलाकर बिना किसी इमरजेंसी घर से न निकलें, और मानव-नस्ल को जिंदा रहने दें। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 25 मार्च 2020

बात की बात, 25 मार्च 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 25 मार्च 2020

ऐसे कोरोना-काल में कैदी को भीड़भरी जेल में क्यों रखा है?

संपादकीय
25 मार्च 2020


सुप्रीम कोर्ट ने दो दिन पहले राज्यों से कहा है कि वे जेलों में बंद कैदियों को पैरोल पर छोडऩे के लिए उच्चस्तरीय पैनल बनाएं जो कि सात बरस से अधिक तक कैद रह चुके सभी को पैरोल पर छोडऩे पर विचार करे। अदालत ने भारतीय जेलों में क्षमता से बहुत अधिक भरे गए कैदियों को कोरना जैसे संक्रमण से बचाने के लिए यह आदेश दिया है। अदालत का कहना है कि जो विचाराधीन कैदी ऐसे मामलों में जेलों में बंद हैं जिनमें अधिकतम सजा सात बरस तक ही हो सकती है उन्हें भी ऐसी ही पैरोल दी जानी चाहिए। अदालत ने इस कमेटी की बैठक हर हफ्ते एक बार करने को कहा है। अदालत ने संक्रमण से बचाने के लिए विचाराधीन कैदियों की कोर्ट-पेशी भी रोक दी है, और एक जेल से दूसरी जेल कैदियों को भेजना भी। इसके अलावा और भी बहुत से निर्देश अदालत ने दिए हैं जो कि कैदियों की जान बचाने के लिए जरूरी हैं। 

हिन्दुस्तान में आम सोच में कैदियों के साथ कोई रियायत एक गैरजरूरी या बहुत हद तक खराब बात मान ली जाती है। जब कभी कैदी के खानपान, या उसके इलाज की बात हो, या जेलों में न्यूनतम मानवीय सुविधाओं की बात हो, लोगों को लगता है कि यह तो सजा काट रहे लोग हैं, और इन्हें कोई सुविधा या रियायत क्यों मिले? यह समझने की जरूरत है कि जब ये सुविधाएं एक न्यूनतम मानवाधिकार जितनी हों, या किसी जानलेवा बीमारी से इलाज जैसी जरूरत हो, तो एक कैदी के अधिकार जेल के बाहर के एक सामान्य नागरिक के अधिकारों के अधिक ही होनी चाहिए। ऐसा इसलिए कि बाहर के नागरिक तो अपने लिए सुविधाएं जुटा सकते हैं, जेल के कैदी अपनी मर्जी से कुछ नहीं पा सकते, और वे सरकार की ही जिम्मेदारी होते हैं। 

भारत में जेलों का हाल इतना खराब है कि कैदियों के रहने की जगह नहीं, उनके नहाने या शौच की पर्याप्त जगह नहीं, और जेलों के भीतर अपराधियों का माफियाराज चलता है जो कि आम कैदियों के हक छीनने का काम भी करता है ताकि उनसे वसूली की जा सके। ऐसे में कुछ लोगों को यह लग सकता है कि आज कोरोना जैसे वायरस के संक्रमण में जेल तो सबसे ही सुरक्षित जगह है क्योंकि वह आम लोगों से कटी हुई है। लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है, सच तो यह है कि हजारों कैदियों के पीछे सैकड़ों जेल कर्मचारी भी तैनात रहते हैं जो कि रोज घर आते-जाते हैं, और जेल के बाहर की आम जिंदगी जीते हैं। इसलिए ऐसे सैकड़ों कर्मचारी अगर संक्रमित होते हैं, तो वे जेल के भीतर भी संक्रमण लेकर आ सकते हैं, और लबालब भरी हुई जेलों में संक्रमण फैलना बाहर के मुकाबले बहुत अधिक रफ्तार से होगा। कल की खबर है कि पश्चिम बंगाल की एक सबसे बड़ी जेल में कैदियों ने लगातार दूसरे दिन हिंसा की क्योंकि 31 मार्च तक अदालतें बंद होने से उनकी जमानत याचिकाओं पर सुनवाई ठप्प है, और घरवालों से साप्ताहिक मुलाकात भी रोक दी गई है। इस हिंसा में कुछ लोगों की मौत की खबर भी है, और आगजनी भी हुई है। अपराधियों की घनी आबादी वाली जेलों में हो सकता है कि यह हिंसा नाजायज भी हो, और यह भी हो सकता है कि यह कोरोना की दहशत में की गई हो। लेकिन यह नौबत कुछ सोचना भी सुझाती है। 

आज जेलों के बाहर कैदियों के परिवार हैं, और हो सकता है कि उन परिवारों के पास जिंदा रहने के लिए पूरे इंतजाम न हो। कुछ लोगों को लग सकता है कि आज अगर कैदियों को पैरोल पर छोड़ा भी जाएगा, तो वे घर कैसे पहुंचेंगे क्योंकि गाडिय़ां तो बंद हैं, इसके अलावा एक दिक्कत यह भी आ सकती है कि गांवों में लोग बाहर से या जेल से आए हुए कैदी को 14 दिन भीतर न आने दें, संक्रमण से बचने के लिए बहुत से गांवों में ऐसा किया भी जा रहा है, जहां बाहर से लौटे मजदूर गांवों के बाहर ही ठहरा दिए गए हैं। लेकिन बात महज तीन हफ्तों की नहीं है, ये तीन महीनों तक भी बढ़ सकती है, और जेल में बंद कैदी का परिवार बाहर जिंदा रहने, इलाज कराने में कमजोर भी साबित हो सकता है। हो सकता है कि इटली या स्पेन की तरह बूढ़े लोग अपने आखिरी दिन देख रहे हों, और ऐसे में उन्हें परिवार के लोगों की अपने बीच जरूरत हो। इन तमाम बातों को देखते हुए कैदियों को अगले तीन महीने के पैरोल पर तुरंत छोडऩा चाहिए, इससे जेलों के भीतर सिर्फ खूंखार कैदी बच जाएंगे, और भीड़ छंटने से जेल में संक्रमण का खतरा भी कम होगा। लोगों ने एक पखवाड़े पहले पढ़ा भी होगा कि इरान में कोरोना-संक्रमण में बुरा हाल हो जाने के बाद अपनी जेलों से 54 हजार कैदियों को एक साथ रिहा कर दिया था। इस असाधारण, अभूतपूर्व खतरे के बीच जेलों की हकीकत देखते हुए, कैदियों और उनके परिवारों के मानवाधिकार देखते हुए अधिक से अधिक कैदियों को तुरंत रिहा करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बंधनकारी न मानते हुए एक संभावना मानना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

आगे फिर किसी दिन छपकर पहुंचेंगे, तब तक फोन और कम्प्यूटर पर ही सही...

संपादकीय
24 मार्च 2020


खतरे कई किस्म के होते हैं। कुछ दिखते हैं, कुछ देर से दिखते हैं, और कुछ इतनी अधिक देर से दिखते हैं कि उनसे उबरना मुमकिन नहीं होता। आज दुनिया पर कोरोना का खतरा इस तीसरी किस्म का है। कोरोना वायरस से जब लोग संक्रमण पा चुके रहते हैं, तब भी अगला एक पखवाड़ा ऐसा हो सकता है जब उसका असर उन लोगों पर न दिखे। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे लोग इस बीच दूसरों में इस वायरस को बांट नहीं सकते। आम तौर पर वे औरों में इस वायरस को बांटने का एक बहुत बड़ा खतरा लिए चलते हैं। जब तक वे खुद चलता-फिरता बम साबित न हो जाएं, तब तक किसी को यह पता नहीं लगता कि उनमें कोई खतरा भी है। फिर जिस हिंदुस्तान के लिए हम यह लिख रहे हैं, उस हिंदुस्तान में लोगोंं की समाज के प्रति जिम्मेदारी बहुत ही कम है, और यह बात कोरोना को बहुत पसंद भी आने वाली है। आज इस देश में महज कुछ सौ लोग कोरोना-पॉजिटिव कहे जा रहे हैं, जो कि हकीकत में दसियों हजार भी हो सकते हैं, और आने वाले दिन ऐसे भयानक हो सकते हैं जैसे कि हिंदुस्तान के इतिहास में सौ बरस पहले 1918 में देखने मिले थे, और उस वक्त एक बैक्टीरिया से फैले प्लेग ने एक करोड़ बीस लाख लोगों को तीन महीने में ही मार डाला था। अगले तीन महीने मौतों का आंकड़ा अगर इतना पहुंच जाए, तो क्या देश उसके लिए तैयार है? क्या इतनी जलाऊ लकड़ी भी देश में है? या क्या इतनी जमीन भी कब्रों के लिए है? और जिनको यह बात बढ़ा-चढ़ाकर लिखी जा रही लग रही हो, उन्हें 1897 का यह इतिहास याद रखना चाहिए कि भारत के कुछ गांवों में संक्रामक बीमारी की आशंका को हिंदुस्तानी आबादी घटाने की ब्रिटिश साजिश मान लिया था। और 1918 में ऐसी खबरें छपी थीं कि किसी फौजी जहरीली गैस के खुल जाने की वजह से हजारों मौतें हो रही हैं। कुछ उसी किस्म की साजिश की खबरें आज सौ बरस बाद फिर दुनिया की हवा में हैं, लोग चीन या अमरीका को ऐसी साजिश के पीछे मान रहे हैं। 

हिंदुस्तान आज किसी भी बड़े संक्रामक-खतरे को झेलने की हालत में नहीं है। एक से अधिक विशेषज्ञों का यह मानना है कि पचीस-पचास करोड़ लोग कोरोनाग्रस्त हो सकते हैं, और लोगों को इलाज नसीब होना पूरी तरह नामुमकिन बात है। कुछ कमअक्लों का यह भी मानना है कि थाली और ताली बजाकर, या तिरंगा झंडा लहराकर कोरोना को डराकर भगाना कुछ मुश्किल होगा, और कोरोना इसे अतिथि देवो भव: वाले भारत में अपना स्वागत समारोह भी मान सकता है। ऐसे में आज जब पूरा देश बारूद के ढेर पर लापरवाही से बैठा हुआ बीड़ी पी रहा है, तो उसकी चिंगारी से तबाही कब होगी, और कितनी होगी इसका अंदाज हमारे लिए नामुमकिन है। ऐसे में कोरोना की आग को इस हिंदुस्तानी जंगल में और अधिक फैलने से रोकने की हमारी अपनी कोशिश के तहत हम हालात सामान्य होने तक आपके इस अखबार 'छत्तीसगढ़' को छापना स्थगित कर रहे हैं। बहुत से लोग कोरोना की दहशत में हंै, और उनकी समझ वैज्ञानिक भी है, और अवैज्ञानिक भी। ऐसे लोगों में से बहुत से लोगों ने हमारे हॉकरों से अखबार डालने को मना भी किया है। अखबार अपने समाचारों से तो असीमित तनाव लेकर जाता ही है, हमारे अखबार में विचार भी तनाव ही पैदा करने वाले रहते हैं। ऐसे में अखबार का कागज एक और कोरोना-तनाव लेकर जाए, यह भी कुछ ठीक नहीं है। अखबार बांटने वाले लोग आमतौर पर बहुत सीमित कमाई वाले रहते हैं, और उनकी सेहत बिगडऩे पर आने वाले दिनों में कोई इलाज मिलना भी मुश्किल होगा, इसलिए भी छपा अखबार कुछ दिनों के लिए बंद करना ही हमें बेहतर लग रहा है। 

हिंदुस्तान में अब अधिकतर आबादी के पास फोन हैं, और आधी आबादी के पास स्मार्टफोन भी हैं। ऐसे में हम अपने नियमित पाठकों तक किसी न किसी तरह पहुंच ही जाएंगे, हर दिन पहुंचेंगे, हर कुछ घंटों में पहुंचेंगे, समाचार लेकर पहुंचेंगे, विचार लेकर पहुंचेंगे, और पूरे के पूरे पन्नों के ई-पेपर लेकर भी पहुंचेंगे। आने वाले दिन हमारे खुद के लिए सोचने के होंगे, लेकिन इतना तो हमने आज सोच लिया है कि धरती पर खतरे की इस आग को हम कम से कम बढ़ाने का काम तो नहीं करेंगे।  देश के एक बड़े संपन्न अखबार ने अपनी छपाई-मशीनों पर ही अखबार छपते हुए ही उस पर सेनिटाइजर का स्प्रे करना शुरू किया है, और हो सकता है कि वैसा अखबार पाठकों के हाथों में कुछ सुरक्षित भी हो। लेकिन हिफाजत की किसी अटकल के बजाय हम पीछे बैठ जाना बेहतर समझ रहे हैं, जब तक कि हिंदुस्तान पर से करोड़ों मौतों का खतरा टल नहीं जाता। सब जिंदा रहेंगे तो छपकर पहुंचने के लिए भी बहुत लंबी जिंदगी बाकी रहेगी। फिलहाल हम कोरोना-खतरे को सीमित रखने की अपनी अखबारी-जिम्मेदारी पूरी करेंगे, और अखबारनवीसी भी जिंदा रखेंगे। आगे फिर किसी दिन छपकर आपके हाथ में पहुंचेंगे, तब तक फोन और कम्प्यूटर पर ही सही।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 24 मार्च 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 23 मार्च 2020

...बीती शाम हिन्दुस्तान के एक तबके ने बाकी दुनिया के नेताओं के लिए रश्क का सामान जुटाया

संपादकीय
23 मार्च 2020


कल हिन्दुस्तान के अधिकतर इलाकों ने एक अभूतपूर्व एकजुटता दिखाई। पहले किसी जंग के मौके पर ऐसा होता था कि शाम को सायरन बजते ही सरहदी इलाकों में लोग बस्तियों में रौशनियां बंद कर देते थे ताकि दुश्मन फौज के हवाई जहाज उन रौशनियों को देखकर हमला न कर सकें। कल दिन की चमचमाती रौशनी में भी पूरे देश ने एक किस्म से घर में रहकर वक्त गुजारा, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जनता-कर्फ्यू के आव्हान का साथ दिया। अब शाम पांच बजे जब मोदी के मुताबिक लोगों को थाली और ताली बजाकर, घंटी बजाकर घरों के दरवाजे से उन लोगों का एक प्रतीकात्मक धन्यवाद करना था जो कि कोरोना के इस खतरे के बीच भी जनता की जिंदगी बचाने के लिए रात-दिन काम कर रहे हैं, तो लोगों ने पांच-दस मिनट पहले से ही आवाजें शुरू कर दीं, और बहुत से लोगों ने पहले से यह संदेश फैलाना शुरू कर दिया था कि किस तरह थाली और घंटी की आवाज, शंखध्वनि, घंटे की आवाज से कोरोना वायरस मर जाएगा। लोगों ने इसके लिए नासा के वैज्ञानिकों के निष्कर्षों का हवाला भी देना शुरू कर दिया था जो कि हाल के बरसों में हिन्दुस्तानी अफवाहबाजों के पसंदीदा स्रोत हो गए हैं। बात यहां तक रहती तो भी ठीक था। लेकिन बात इससे बहुत आगे तक बढ़ी, और देश के बहुत से लोगों ने सड़कों पर जुलूस निकाले। उनके पास दीवाली के बचे हुए पटाखे भी थे, होली के बचे हुए रंग भी थे, हाथों में गणतंत्र दिवस के बचे हुए तिरंगे झंडे भी थे, और उनके दिलों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए अपार विश्वास भी था कि मोदी कोरोना को दौड़ा-दौड़ाकर मारेगा। 

दुनिया के किसी भी नेता को नरेन्द्र मोदी जैसे नेता से रश्क ही हो सकता है कि उनके एक आव्हान पर 25-50 करोड़ लोग इस तरह से घंटा-घंटी, ताली-थाली बजाने लग गए, कहीं भारतमाता की जय के नारे लगे, तो कहीं मोदी की जय के। सभी नारों का विस्तार इसके बाद रात तक अनगिनत शहरों में निकले, अनगिनत जुलूसों में देखने मिला जिनमें लोग ठीक वही करते रहे जो न करने की मेडिकल सलाह देश की सरकारों ने, देश और दुनिया के डॉक्टरों ने, और खासकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें दी थी। दिन भर घर में रहे और शाम को भीड़ बन गए। हासिल क्या हुआ? करोड़ों लोगों की रोजी खत्म हुई, लेकिन नारेबाजों को देश की जिंदाबाद करने का एक मौका मिला। लोगों ने पांच बजे के घंटा-घंटी के बाद उसी अंदाज में जश्न मनाया जैसे दशहरे के दिन रावण को जलाए जाने के तुरंत बाद मनाया जाता है, यह एक और बात है कि इस जश्न से एक सिर वाला कोरोना बढ़कर दस सिर वाला हो गया, और चूंकि वह दिखता नहीं है, इसलिए उसे जलाना भी मुमकिन नहीं है। कोरोना को जलाने का कोई दशहरा आने वाला नहीं है, कोई सोनपत्ती नहीं बांटी जा सकेगी, अगर आखिर में जाकर बांटने के लिए ऐसे लोग बचेंगे तो भी। 

प्रधानमंत्री ने देश भर के लोगों को घर में रहने को कहा, वह एक सही शासकीय फैसला था, जो कि हफ्तों पहले से दुनिया की कई सरकारें लेते आ रही थीं, और उसके सकारात्मक नतीजे डॉक्टरों ने दर्ज भी किए थे। प्रधानमंत्री ने डॉक्टरों और दूसरे जनसेवकों के प्रति आभार व्यक्त करने को भी कहा और वह भी एक बहुत सही कदम था, लोगों को शुक्रगुजार होना आना चाहिए। लेकिन इस देश के लोगों की वैज्ञानिक चेतना पिछले कुछ बरसों में नेहरू से दुश्मनी निभाने के चक्कर में इस कदर तबाह हो गई है कि विज्ञान शब्द का वि लोगों को विरोध का वि लगने लगता है, विपक्ष का वि लगने लगता है। लोगों ने तर्कों से सोचना बंद कर दिया है, तथ्यों से सोचना बंद कर दिया है, और सत्य-तथ्य की जगह इस देश की मानसिकता में एक काल्पनिक इतिहास में जीने वाले आक्रामक हिन्दू राष्ट्रवाद ने ले ली है। और अपने आपको विश्वगुरू मानने वाले लोगों का कोरोना भी क्या बिगाड़ लेगा, यह बीती शाम पांच बजे से लेकर रात तक सामने आया। जब दुनिया की हर मेडिकल चुनौती, या हर वैज्ञानिक चुनौती के मुकाबले हिन्दुस्तानियों के पास जिंदाबाद के कुछ नारे हैं, कुछ झंडे-डंडे हैं, तो फिर यह देश कोरोना से बचने की ताकत कहां रखता है? यह पूरा देश एक ऐसे दंभ में जी रहा है कि दुनिया का तमाम ज्ञान उसके पास था, दुनिया की सारी चिकित्सा गोबर और गोमूत्र में है, बाकी दुनिया ने हिन्दुस्तान के ज्ञान को लूटकर ही तरक्की की है। ऐसी सोच का भला क्या जवाब हो सकता है, ऐसी सोच का भला क्या इलाज हो सकता है? यह देश आज एक समूह-सम्मोहन का शिकार है, यह देश एक आत्मदंभ का शिकार है, यह देश धर्मान्धता का शिकार है, और यह देश एक ऐसी मानसिक बीमारी से ग्रस्त है जो कि कभी न हुए इतिहास को हकीकत मानकर उसके भरोसे अपना वर्तमान जी रहा है, और अपना भविष्य बन जाने का भरोसा लिए हुए हैं। मनोचिकित्सकों के पास ऐसे मामले आते हैं जिनमें लोग काल्पनिक दोस्त देख लेते हैं, काल्पनिक दुश्मन देख लेते हैं, अपने बीते हुए वक्त के लिए अपनी कल्पनाओं पर सौ फीसदी भरोसा कर लेते हैं। ऐसे देश से अगर महज थाली-घंटी बजाने कहा जाए, तो वह वैज्ञानिक सलाह के खिलाफ सड़कों पर जुलूस निकाल रहा है, और उत्तर भारत के कुछ शहरों में तो पुलिस और प्रशासन के अफसरों ऐसे जुलूस की अगुवाई करते दिख रहे हैं जो कि कोरोना पर जीत की खुशी में निकाले गए थे। जिस देश को आज एक दहशत और आशंका में जीते हुए, जिंदगी की सबसे बड़ी सतर्कता से रहना चाहिए, वह घरों में बंद रहने के बजाय गाजे-बाजे और नाच-गाने वाले जुलूस निकाल रहा है। फिर ऐसे में गरीबों की रोजी जनता कफ्र्यू के नाम पर क्यों खत्म की गई? फेरीवाले, ठेलेवाले कल भूखे रहने के बजाय मजदूरी ही कमा लिए रहते। 

जब किसी देश से वैज्ञानिक सोच को निचोड़कर निकाल लिया जाता है, तो उसकी जनता में बचे हुए कूचे की तरह बेकाम हिस्सा ही बच जाता है। कल शाम से रात तक सड़कों पर कोरोना से नफरत नहीं, नेहरू की वैज्ञानिक सोच से नफरत नंगा-नाच कर रही थी, और जिन डॉक्टरों की तारीफ के लिए थाली-ताली का आयोजन किया गया था, उन्हीं डॉक्टरों की मौत का सामान ऐसे जुलूसों और नाच-गानों में जुटाया गया है। इस देश की जनता में से जो ऐसी प्रतिक्रिया वाली मुखर भीड़ है, वह भीड़ आधे-अधूरे आव्हान को नहीं समझती, वह ऐसे नारों के आगे-पीछे अपने शब्द जोड़ लेती है, वह अपने उन्माद को कोरोना पर जीत मान लेती है, और वह अपने झूठे दंभ से यह मान लेती है कि उनके नेता ने कोरोना को पटक-पटककर मारा है। यह मौका हिन्दुस्तान में समझदार लोगों के मलाल का है, उनकी निराशा और हताशा का है। और यह मौका बाकी दुनिया के नेताओं की ईष्र्या का भी है।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 21 मार्च 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 21 मार्च 2020

कोरोना, और सरकारें...

संपादकीय
21 मार्च 2020


हिन्दुस्तान में कई बरस से वरिष्ठ नागरिकों, 58 बरस से अधिक की महिला और 60 बरस से अधिक के पुरूष को रेल टिकट में रियायत मिलते आई है। अभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उसे स्थगित किया है क्योंकि इस उम्र और इससे अधिक के बुजुर्गों पर कोरोना का हमला अधिक हो रहा है। इस बात को लेकर मोदी का मजाक भी बनाया जा रहा है कि कोरोना के बहाने से उन्होंने सरकार की बचत कर ली, लेकिन क्या यह सचमुच अकेले सरकार की बचत है? 58-60 बरस या उससे अधिक के बुजुर्गों का तीर्थयात्रा, पारिवारिक समारोहों, या इलाज के लिए सफर से परे और कौन सा आना-जाना होता है? अब इसमें से इलाज के लिए जाने पर तो पूरा मामला ही खर्चीला रहता है इसलिए रेल टिकट की रियायत बहुत मायने नहीं रखती। लेकिन जो बुजुर्ग सैलानी घूमने के शौकीन हैं, या पारिवारिक समारोहों में जा रहे हैं, उन्हें अगर रियायत कुछ वक्त के लिए रोकी जा रही है, तो यह खुद उन्हीं की सेहत के लिए बेहतर है। आज जब इटली जैसे संपन्न और विकसित देश में बुजुर्गों का कोरोना का इलाज भी नहीं हो रहा है क्योंकि उनकी बाकी जिंदगी कम हैं, और अस्पतालों की क्षमता का बेहतर इस्तेमाल अधिक बाकी उम्र वाले जवानों के लिए किया जा रहा है, तो बाकी दुनिया के लोगों को भी जिम्मेदारी से सोचना चाहिए। आज जब खेलों के टूर्नामेंट रद्द हो रहे हैं, जब जवानों की ट्रेनिंग रद्द हो रही है, सरकारी और निजी दफ्तर सबको जबरिया छुट्टी दे रहे हैं, तो बुजुर्ग क्यों इस बात पर अड़े रहें कि वे रियायती सफर करेंगे ही। मोदी की आलोचना की सौ दूसरी वजहें मिल सकती हैं, लेकिन यह रियायत खत्म करना तो उन बुजुर्गों को, उनके परिवारों को, और कुल मिलाकर देश को कोरोना जैसी जानलेवा बीमारी से बचाना है, और इस बात का मखौल नहीं उड़ाना चाहिए। 

दूसरी तरफ प्रधानमंत्री के भाषण को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। इनमें से अधिकतर बातें तो लोग अपने पूर्वाग्रह के मुताबिक कर रहे हैं जो कि भाषण का प्रसारण होने के पहले भी विशेषण तैयार लेकर बैठे थे, कुछ लोग तारीफ के विशेषण, और कुछ लोग निंदा के विशेषण। इन दोनों तबकों के तर्कों को छोड़ दें, तो कुछ बुनियादी बातें बचती हैं जो कि प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संदेश पर सवाल खड़े करती हैं। जब वे देश को भीड़ से बचने को कहते हैं, तब उन्हीं के चुनाव क्षेत्र वाले उत्तरप्रदेश में, उन्हीं के पार्टी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ रामनवमीं पर अयोध्या में दस लाख लोगों का मेला करवाने पर उतारू हैं। उन्हीं की पार्टी के नेता भोपाल में कमलनाथ सरकार गिराने की खुशी में जलसे की भीड़ लगा रहे हैं। जब उन्हीं के लोग उनकी बातों को अनसुना करते हैं, तो लोगों को लगता है कि उनकी बंदिशें क्या महज दूसरे लोगों के लिए हैं, या फिर उनकी पार्टी की कथनी और करनी के बीच रिश्ता कभी होता है कभी नहीं होता है? यह भी बेहतर होता कि प्रधानमंत्री उनकी पार्टी के बहुत से नेताओं के इन दावों पर कुछ बोलते कि गोमूत्र से कोरोना-चिकित्सा के इलाज के दावों पर जनता भरोसा न करें। प्रधानमंत्री की हैसियत से उनकी यह जिम्मेदारी बनती है कि वे अवैज्ञानिक बातों को रोकें, न कि उन्हें देखते हुए भी उन पर चुप रहें। 

छत्तीसगढ़ में आम लोग लगातार शराब दुकानों के वीडियो पोस्ट कर रहे हैं कि वहां किस तरह की भीड़ लगी हुई है। जाहिर तौर पर जो गरीब हैं वे इस भीड़ में अधिक हैं, अधिक धक्का-मुक्की, छीनाझपटी कर रहे हैं, और शराबी-गरीब होने की वजह से उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता जाहिर तौर पर खासी कम होती है। कोरोना के लिए इस राज्य की शराब दुकानें, और वहां की अराजक भीड़ एक चुनौती है, और कोरोना वायरस खासा जिद्दी कहा जा रहा है। अब सरकार इस प्रदेश में होटल-चायठेले, फेरीवाले और सिनेमाघर सब कुछ बंद करवा चुकी है, वहां पर शराब को जिंदगी के लिए इतना अनिवार्य मानकर उसके लिए भीड़ का खतरा उठाकर कमाई कितनी जायज है? छत्तीसगढ़ सरकार की बाकी तमाम सावधानी शराब दुकानों पर धरी रह जा रही है, और राज्य सरकार को इस पर तुरंत फैसला लेना चाहिए, इन्हें बंद करना चाहिए। लेकिन इस राज्य में शराब दुकानें भी चल रही हैं, और शराबखाने भी चल रहे हैं। लोगों का रोजगार छूट गया है, रोजी-मजदूरी वालों के घर में खाने की दिक्कत है, और ऐसे में नशे के आदी लोगों के लिए शराब दुकान खोलना, कम से कम गरीब शराबियों के परिवारों पर तो बहुत बुरी मार है। छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जनता कर्फ्यू के आव्हान का खुला समर्थन किया है, और बयान दिया है कि कोरोना रोकने की उनकी तमाम कोशिशों का छत्तीसगढ़ साथ देगा। भूपेश बघेल को खुद होकर राज्य में कुछ वक्त के लिए शराबबंदी करनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 20 मार्च 2020

अपने भीतर इंसानियत कितनी बची है यह तौलने का वक्त..

संपादकीय
20 मार्च 2020


छत्तीसगढ़ में कल एक युवती के कोरोना वायरस से ग्रस्त मिलने के बाद राज्य एकदम चौकन्ना हो गया है, इससे परिवार के इलाके में बाजार बंद करवाए गए हैं, और अतिरिक्त सफाई हो रही है। आसपास के इलाकों में लोगों को घरों के भीतर रहने की सलाह दी गई है, और पिछले कुछ दिनों में यह युवती बाजार और बैंक, जहां-जहां गई थी, उन सबकी पहचान और जांच की जा रही है। सरकार लोगों के जरूरत की सूचना और चेतावनी तो दे रही है, लेकिन जरूरत से परे की जानकारी नहीं दे रही जो कि दहशत भी फैला सकती है। अब लोग एक अभूतपूर्व तनाव और खतरे से गुजर रहे हैं, लोगों को एक अभूतपूर्व सावधानी बरतनी पड़ रही है, और इस आशंका की कोई सीमा भी नहीं है कि आने वाले दिन और कितने खराब होंगे। लेकिन ऐसे में आम जनता की क्या जिम्मेदारी होती है जिसे लेकर कोई सरकारी कानून सामने नहीं आ सकते, और न ही सरकार किसी को छोटी-छोटी बातों की सलाह ही दे सकती है। 

बुरा वक्त इंसानों के भीतर इंसान जितना बचा होता है, उसकी शिनाख्त का भी होता है। आज जो लोग पैसों की ताकत और पहचान के दम पर सौ-सौ मास्क खरीदकर रख ले रहे हैं, हैंड-सेनेटाइजर के पूरे बक्से कब्जा रहे हैं, उनको यह भी समझने की जरूरत है कि वे संक्रमित समुदायों के बीच किसी टापू की तरह अकेले नहीं बच पाएंगे, वे भी और लोगों के संक्रमित होने पर मारे जाएंगे। इसलिए बेहतर यही है कि जितनी सावधानी लोग अपने बारे में बरत रहे हैं, अपने परिवार के लिए बरत रहे हैं, उतनी ही सावधानी अपने घर-दफ्तर पर, अपने कारोबार में, अपने दायरे में काम करने वाले लोगों के लिए भी बरतनी चाहिए। अस्पताल का आइसोलेशन वार्ड ही एक किस्म का टापू हो सकता है, लेकिन बाहर की दुनिया में आसपास के सभी लोगों का ख्याल रखे बिना आप कोरोना जैसे वायरस-संक्रमण से नहीं बच सकते। 

यह वक्त लोगों की सामाजिक जिम्मेदारी का भी है कि वे सार्वजनिक जगहों को कितना साफ-सुथरा रखते हैं, अपनी धार्मिक-सामाजिक और राजनीतिक भावनाओं किनारे रखकर भीड़ बनाने से कितना बचते हैं, ये तमाम बातें आखिर में साबित करेंगी कि कोई मुहल्ला, कोई शहर, या कोई देश-प्रदेश कितने जिम्मेदार थे। केरल ने देश के सबसे शिक्षित प्रदेश, और राजनीतिक रूप से जागरूक, कानूनी अधिकारों के प्रति सजग प्रदेश होने का सुबूत दिया है, वहां की सरकार बच्चों के दोपहर के स्कूली भोजन को घर पहुंचाने से लेकर रोजी कमाने वाले कामगारों तक के जिंदा रहने का इंतजाम कर रही है, और कल केरल सरकार ने 20 हजार करोड़ का एक पैकेज घोषित किया है जो लोगों के इलाज, उनके खाने-पीने, और उनके जिंदा रह पाने का पूरा इंतजाम करने की एक बड़ी कोशिश है। सरकारों के हिस्से का काम सरकारें करें, और जनता के हिस्से का काम जनता करे तभी कुछ हो सकेगा, वरना ऐसी महामारी के वक्त एक-दूसरे के जिम्मे का काम करना मुमकिन नहीं हैं। 

जिन लोगों में थोड़ी सी भी अतिरिक्त ताकत और क्षमता है, वे आसपास देखें, कहीं कोई बुजुर्ग हो, बीमार हो, या किसी परिवार में अकेले बच्चे हों, तो उनकी जरूरतों को पूरा करने में अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाएं। वे अनाज न ला पाएं, और आपके घर कुछ अधिक अनाज हो तो उनके साथ बांटें, या बाजार से लाने में उनकी मदद करें, या दवाई और दूसरे सामान की उनकी जरूरत का ख्याल रखें। यह मौका इस सामाजिक जिम्मेदारी का भी है कि लोग खरीदने की अपनी ताकत से महीने भर का सामान खरीदने की ऐसी दौड़ शुरू न कर दें कि गरीबों के लिए सारा सामान ही महंगा हो जाए, बाजार से गायब हो जाए। यह याद रखने की जरूरत है कि भूखों के बीच अनाज के भंडार वाले लोग कभी सुरक्षित नहीं रह सकते। छत्तीसगढ़ के पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह का इतिहास यही दर्ज है कि जब लोग भूखे थे, तो उन्होंने जमींदार के अनाज-भंडार लूटकर गरीबों में बांट दिए थे। आज कुछ लोगों को यह तुलना कुछ अधिक बड़ी लग सकती है, लेकिन किसी ने यह सोचा है कि कोरोना अगर कई हफ्ते बढ़ते चले गया, तो नौबत क्या आएगी? इसलिए समाज के भीतर एक गैरबराबरी को बढ़ाना किसी के लिए भी अच्छा नहीं है। 

यह वक्त खतरों के बीच ड्यूटी कर रहे सरकारी कर्मचारियों के लिए शुक्रगुजार होने का भी है। पुलिस, एम्बुलेंस, अस्पताल, सफाई कर्मचारी, ऐसे कई विभागों के लोग रात-दिन खतरा झेलकर भी लोगों के इलाज में, उनके बचाव में लगे हुए हैं। ऐसे लोगों के लिए हम अपने इस अखबार में पिछले कई दिनों से लगातार सलाम लिख भी रहे हैं, और बीती रात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी उनके प्रति सम्मान जाहिर करने के लिए कहा है। यह सम्मान ताली या थाली बजाकर काफी नहीं हो सकता, लोगों को अपने आसपास के इन लोगों से सामना होने पर उनसे प्रेम की दो बातें भी करनी चाहिए, और अगर मुमकिन हो तो उन्हें चाय-बिस्किट के लिए भी पूछना चाहिए। यह भी पूछ लेना चाहिए कि उनके पास पीने का साफ पानी है या नहीं, उन्होंने कुछ खाया है या नहीं। यह वक्त अपने आपके भीतर यह टटोलने और तौलने का भी है कि अपने भीतर इंसानियत कितनी बची है यह तौलने का वक्त।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

निजी-पारिवारिक हिंसा और सरकार का जिम्मा

संपादकीय
19 मार्च 2020


पिछले कुछ दिनों में हमारे आसपास सौ-दो सौ किलोमीटर के दायरे में ही इतनी आत्महत्याएं हुई हैं कि समझ नहीं पड़ रहा कि हो क्या रहा है। सबसे भयानक तो दो नाबालिग बहनों की आत्महत्या थी जिन्होंने एक साथ फांसी लगाई, और यह चिट्ठी छोड़कर गई हैं कि उनका मामा उन दोनों से लगातार बलात्कार करता था जिससे वे थक गई थीं। अब मामा गिरफ्तार है, और दो भांजियां जा चुकी हैं। ठीक ऐसा ही एक मामला कल फिर सामने आया है जिसमें एक मामा अपनी छह बरस की भांजी की हत्या करके उसकी लाश से बलात्कार करते रहा। यह मामला आत्महत्या का तो नहीं है, लेकिन परिवार के भीतर की ऐसी हिंसा की वजह से हम उसका यहां पर जिक्र कर रहे हैं। एक बालिग-नाबालिग प्रेमीजोड़े ने दो दिन पहले एक साथ खुदकुशी कर ली क्योंकि घरवाले उन्हें शादी नहीं करने दे रहे थे। एक अपाहिज बुजुर्ग महिला की जलकर मौत की खबर है जिसे आत्महत्या बताया जा रहा है। इसके अलावा भी कई दूसरे मामले अखबारों में छपे हैं जिनमें आत्महत्या, और परिवार के भीतर ही नाबालिगों के देह शोषण की बातें सामने आई हैं। 

आत्महत्या या परिवार के भीतर हिंसा-रेप, ये सब निजी जिंदगी की हिंसा की घटनाएं हैं जो कि चाहे अपने खिलाफ हों, चाहे परिवार के दूसरे लोगों के खिलाफ हों। यह तकलीफदेह इसलिए ही है कि इसे सरकार तो दूर, समाज भी तभी जान पाता है जब ऐसी हिंसा हो चुकी रहती है। इसे या तो व्यक्ति खुद रोक सकते हैं, अपने भीतर की हिंसा पर काबू करके, अपने तनाव को किसी करीबी के साथ बांटकर, या फिर परिवार के दूसरे लोग ऐसी हिंसा घटा सकते हैं, अगर उनकी जानकारी में ये बातें आती हैं। परिवार के भीतर बलात्कार अगर लंबे समय तक चलता है, तो यह मुमकिन नहीं रहता कि वह परिवार में किसी की भी जानकारी में न आए। आमतौर पर लोग इसे घर के भीतर ही दबा देना चाहते हैं ताकि पुलिस और कोर्ट-कचहरी जाकर बदनामी न झेलनी पड़े, परिवार न टूटे। लेकिन इसका जाहिर तौर पर पहला नतीजा यह होता है कि बलात्कार के शिकार बच्चे मुंह खोलने का हौसला खो बैठते हैं, और बलात्कारी का हौसला बढ़ जाता है कि परिवार ने इस बात को मान लिया है। हौसलों का यह खाई सरीखा फासला इस हिंसा को और बढ़ाते चलता है, और बलात्कारी एक बच्चे तक सीमित नहीं रह जाता। 

हिन्दुस्तानी समाज अपने बच्चों के साथ घर के भीतर होने वाली हिंसा की रोकथाम में सबसे नाकाबिल समाजों में से एक है। बदनामी का डर, परिवार के कमाऊ सदस्य या मुखिया को जेल से बचाने का लालच अधिकतर परिवारों में बलात्कार को छुपाने की वजह बन जाता है। ये मामले हत्या या आत्महत्या, या बहुत कम मामलों में बलात्कार की रिपोर्ट से सामने आते हैं, और सामाजिक क्षेत्र के जानकार यह मानते हैं कि ये बहुत ही कम संख्या और अनुपात में रिपोर्ट होते हैं। आज जो लोग किसी दूसरी वजह से भी आत्महत्या कर रहे हैं, उनमें भी ऐसे लोग हो सकते हैं जिनका अपना बचपन इस तरह के यौनशोषण का शिकार रहा हो, और वे एक आत्मविश्वासविहीन, दबी-कुचली मानसिकता के साथ बड़े होते हैं, और किसी किस्म की हिंसा को बर्दाश्त करने के लायक नहीं रहते। लेकिन चूंकि सरकारी रिकॉर्ड आंकड़ों पर दर्ज होता है, इसलिए जिन्होंने रिपोर्ट नहीं लिखाई या आत्महत्या नहीं की, उनका समाज को पता ही नहीं चलता। 

आज जितनी बड़ी संख्या में निजी और पारिवारिक हिंसा हो रही है, उस पर तुरंत फिक्र करने की जरूरत है। लोगों को बड़ी संख्या में पारिवारिक-परामर्श चाहिए जिसके लिए इस बात में शिक्षित परामर्शदाताओं की जरूरत है। दिक्कत यह है कि सरकारी स्वास्थ्य ढांचे में परामर्शदाताओं की बहुत ही छोटी सी संख्या है जो कि बुनियादी तौर पर मानसिक चिकित्सकों की है। सरकार को बिना देर किए अपने प्रदेश के विश्वविद्यालयों में मानसिक और मनोवैज्ञानिक परामर्श के पाठ्यक्रम शुरू करने चाहिए ताकि लोगों को मानसिक चिकित्सा से पहले मानसिक परामर्श भी हासिल हो सके। सरकार को यह बात भी याद रखनी चाहिए कि आज निजी और पारिवारिक हिंसा के जो मामले दिख रहे हैं, हो सकता है कि उनकी वजहें एक पीढ़ी पहले पैदा हुई हों, और आज जो वजहें परिवारों में पैदा हो रही हैं, हो सकता है कि उनके विस्फोटक नतीजे एक पीढ़ी बाद जाकर सामने आएं। चूंकि व्यक्तित्व को निराशा से भरने या हिंसा से भरने का काम बहुत लंबे समय बाद असर दिखाता है, इसलिए पांचसाला सरकारें उसकी अधिक फिक्र नहीं करती हैं, लेकिन यह नौबत बदलना चाहिए जो कि पेशेवर परामर्शदाताओं से ही बदल सकती है।  

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 19 मार्च 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 19 मार्च 2020

बात की बात, 18 मार्च 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 18 मार्च 2020

मजदूरों को जिंदा रखने के लिए सीएम योगी की पहल

संपादकीय
18 मार्च 2020


किसने सोचा था कि एक ऐसा दिन आएगा जब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी कोई ऐसा फैसला आएगा कि जिसकी तारीफ लिखनी पड़ेगी। उन्होंने ट्विटर पर घोषणा की है कि कोरोना वायरस के बुरे असर के चलते रोजी-मजदूरी करने वाले परिवारों के जीने में दिक्कत न हो इसलिए प्रदेश सरकार ने एक तय धनराशि मजदूरों के बैंक खातों में डालने का फैसला लिया है। इस बारे में वित्तमंत्री की कमेटी तीन दिन में रिपोर्ट देगी। 

आज जब ऐसे ट्वीट की कॉपी फेसबुक पर देखने मिली, तो लगा कि योगी के लिए दिक्कत खड़ी करने के लिए यह किसी की शरारत है। लेकिन फिर योगी के ट्विटर पेज पर देखा तो यह घोषणा वहां सचमुच है। लेकिन इसके साथ ही उनके इस फैसले को लिखे बिना काम नहीं चल सकता कि कोरोना के इस भयानक खतरे के बीच योगी सरकार रामनवमी पर अयोध्या में 25 मार्च से 2 अप्रैल तक मेला करवाने पर अड़ी हुई है जिसमें देश भर से दस लाख हिन्दुओं के आने का अंदाज है। अब लाखों लोगों की ऐसी भीड़ अगर एक-दूसरे से कोरोना लेकर लौटेगी, तो देश की सरकारें उनको कैसे और कहां ढूंढेंगी?योगी का एक फैसला अ'छा है, और दूसरा फैसला शायद आज के हिन्दुस्तान में सबसे खराब सरकारी फैसला भी है। 

आज हिन्दुस्तान में कोरोना वायरस के खतरे, और उसकी दहशत के चलते एक अभूतपूर्व नौबत आई है, और इससे निपटने के लिए असाधारण कदमों की जरूरत भी है। पिछले दिनों में हम इसी जगह पर लगातार लिखते आ रहे हैं कि कोरोना का असर इंसानी सेहत से परे देश की अर्थव्यवस्था पर, बाजार और गरीबों के चूल्हों पर भी बहुत बुरी तरह पडऩे वाला है। अभी जब केरल और बिहार जैसे राज्यों ने तय किया कि स्कूलें बंद होने की वजह से जिन बच्चों को दोपहर का भोजन नहीं मिल पाएगा, उनके लिए घरों पर राशन पहुंचाने का काम होगा, या पका हुआ खाना घर भेजा जाएगा, तो हमने अन्य राज्यों से भी उम्मीद की थी कि वे भी इस बारे में सोचें कि इतने गरीब बच्चे दोपहर के खाने से वंचित कर दिए जाने के बाद किस तरह रहेंगे, और सरकार उनके लिए क्या कर सकती है। 

अभी कुछ महीने पहले की ही बात है कि साल के पहले दिन छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राजधानी के मजदूर-बाजार, चावड़ी, पहुंचकर सुबह-सुबह ही मजदूरों को कंबल का तोहफा दिया था। आज देश-प्रदेश की हालत यह है कि बाजार की मंदी की वजह से निर्माण-मजदूर लाखों की संख्या में बेरोजगार हो गए हैं। इनमें से लाखों लोग काम की तलाश में दूसरे प्रदेशों में जाते हैं, लेकिन इस बार कोरोना की दहशत के चलते लोग कम गए होंगे, या लौट आए होंगे। ऐसे में बेरोजगार होने वाले मजदूरों के लिए सरकार को कुछ करना चाहिए। अब क्या करना चाहिए, कितना करना चाहिए, यह तो राज्य  सरकार के खर्च करने की ताकत पर भी निर्भर करता है, क्योंकि कर्ज ले-लेकर एक सीमा तक ही जनकल्याण किया जा सकता है। सरकार को कई किस्म की दूसरी फिजूलखर्ची रोककर बेरोजगार हो जाने वाले मजदूरों, ठेले-खोमचे वालों, और असंगठित कर्मचारियों के लिए जिंदा रहने का इंतजाम करना चाहिए। दुनिया के संपन्न देशों में से एक, फ्रांस ने कोरोना की वजह से आई बेरोजगारी और मंदी की वजह से लोगों से बिजली-पानी के बिल लेना रोक दिया है। आज तो हिन्दुस्तान में भी बाजार के संगठनों की मांग है कि बैंकों को कर्ज के भुगतान की किश्तें फिलहाल रोक देनी चाहिए क्योंकि छोटे व्यापारियों की हालत तो बिल्कुल भी कर्ज चुकाने की नहीं रह गई है। 

जनकल्याणकारी राज्यों को महज कोरोना-बचाव और उससे इलाज से परे भी जिंदगी के बाकी दायरों के बारे में सोचना और कुछ करना चाहिए। स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई, दोपहर का भोजन, लोगों की मजदूरी, ठप्प हो गए खानपान और पोल्ट्री जैसे कारोबार, ठप्प हो गया पर्यटन और लोगों का आना-जाना, इन सबको देखते हुए सरकार को अपनी बहुत बुरी तरह घटने जा रही कमाई के बावजूद सबसे गरीब लोगों के जिंदा रहने के लिए कुछ इंतजाम जरूर करना चाहिए। सभी राज्यों को बहुत बारीकी से बाकी राज्यों के जनकल्याणकारी फैसलों को देखना चाहिए, और अपने प्रदेशों में उनकी संभावनाएं तौलनी चाहिए। फिर आज की नौबत को भारत के प्रदेशों को एक चेतावनी भी मानना चाहिए, क्योंकि कई लोगों का यह मानना है कि नौबत इससे बहुत अधिक खराब हो सकती है। वैसी हालत में क्या तो लोगों का बचाव होगा, क्या इलाज होगा, और कैसे जिंदा रहने के लिए उनका पेट भर सकेगा, यह सब एक बड़ी चुनौती होने वाली है, और जिम्मेदार सरकारों को अभी से ऐसी नौबत के लिए आपात योजनाएं बना लेनी चाहिए। 
(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM