दीवारों पर लिक्खा है, 30 अप्रैल 2020

अमरीका को लेकर हिन्दुस्तान को हीनभावना से बाहर आना चाहिए

संपादकीय
30 अप्रैल 2020


अभी कल से हिन्दुस्तान में यह खलबली मची हुई है कि अमरीकी राष्ट्रपति के घर-दफ्तर, व्हाईटहाऊस के ट्विटर हैंडल ने भारत के प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति को फॉलो करना बंद कर दिया है। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने तो इसे सदमा पहुंचाने वाला बताकर कहा है कि विदेश मंत्रालय इस मामले में देखे। जिन लोगों को किसी भी बात पर मोदी की या अमरीका की आलोचना करना ही है, उन्हें यह एक मौका और मिल गया है, और कल से सोशल मीडिया पर वे लोग भी जुट गए हैं जिन्हें ऐसे जुटने के लिए कोई भुगतान नहीं मिलता है। 

अगर किसी बंद कमरे में भारतीय विदेश मंत्रालय या भारतीय दूतावास से जुड़े हुए कोई लोग अमरीका में अपने समकक्ष अमरीकी अधिकारियों से शराब के एक प्याले पर मजाक में इसकी चर्चा कर देते, तो भी बहुत होता। उससे अधिक महत्व का इसे समझना भारत की एक हीनभावना की दिख रही है कि वह अमरीका से महत्व पाने के ऐसे छोटे-छोटे टुकड़ों का मोहताज है। यह एक पूरी तरह महत्वहीन बात है, और इसे मीडिया के चटपटे कॉलमों तक सीमित रखना था। राहुल गांधी का इस मामले को उठाना एक महत्वहीन बात को तूल देना है, अगर ऐसी कोई बात लिखनी भी थी तो कांग्रेस पार्टी की तरफदारी करने वाले कुछ चर्चित लोग सोशल मीडिया पर ऐसा कर सकते थे। 

दिक्कत एक यह भी रही कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के बहुत से फैसले ऐसे ही रहते हैं जिनसे दुनिया में विवाद होते रहता है। खुद अमरीकी राष्ट्रपति उबासी लेने के लिए भी मुंह खोलते हैं, तो उतनी देर में भी एक विवाद खड़ा कर देते हैं। उनका हर बयान पिछले बयान से थोड़ा अधिक घटिया, थोड़े अधिक पागलपन का होता है, और आम अमरीकी यह मानकर चलते हैं कि उन्हें ऐसा ही एक राष्ट्रपति झेलना है जो कि सुधारा नहीं जा सकता। भारत के मुकाबले अमरीका में एक फर्क यह है कि ट्रंप को एक कटु आलोचक मीडिया का सामना करना पड़ रहा है, जो कि भारत में नामौजूद है। इसलिए ट्रंप के दफ्तर ने भारत से दवाई मिलते ही ट्विटर पर भारत को फॉलो करना शुरू कर दिया था, और उस दवाई की खेप पहुंचने के बाद अब शायद जरूरत न रह जाने पर मोदी-राष्ट्रपति तक को अनफॉलो कर दिया। यह बेहूदा हरकत खुद अमरीकी राष्ट्रपति की तस्वीर अधिक बिगाड़ रही है, और भारत को तो जिस दिन दवा न मिलने पर ट्रंप की धमकी पर कुछ प्रतिक्रिया दिखानी थी, उस दिन भी भारत ने नहीं दिखाई, अब तो इस पर कोई प्रतिक्रिया जरूरी भी नहीं है, क्योंकि महत्वहीन लोगों के लिए ही यह महत्वपूर्ण होता है कि वे इस बात को मुद्दा बनाएं कि उन्हें कौन-कौन फॉलो करते हैं। हिन्दुस्तान में नरेन्द्र मोदी कभी यह चर्चा नहीं करते कि उन्हें कौन फॉलो करते हैं, दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर दूसरों को बलात्कार और हत्या की धमकियां आए दिन पोस्ट करने वाले बहुत से ऐसे लोग हैं जो कि फख्र के इस बात का जिक्र अपने सोशल प्रोफाईल पर करते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उन्हें फॉलो करते हैं। जहां तक नरेन्द्र मोदी का सवाल है तो वे पिछले बरसों में लाखों लोगों द्वारा उठाए गए इस सवाल के जवाब में कुछ भी नहीं कहते। 

भारत को अमरीका के मुकाबले अपने आपको इतना हीन नहीं समझना चाहिए कि अमरीकी राष्ट्रपति की नजरे-इनायत के लिए वह बेताब रहे। देश की सरकार का रूख इस बारे में ठीक है कि उसने ट्रंप के ट्विटर हैंडल को भगवान की तरह नहीं माना, और उसके रूख को मुद्दा नहीं बनाया। भारत अमरीका के मुकाबले कई मायनों में एक बेहतर देश है, इसने दूसरे देशों पर अमरीका की तरह हमले नहीं किए हैं, और कारोबार की गुंडागर्दी भी नहीं की है। इसलिए भारत को न अमरीकी धमकी में आना चाहिए, और न ही अमरीका की ओर मंत्रमुग्ध होकर देखना चाहिए। वैसे भी ट्रंप अपने इस कार्यकाल के आखिरी कुछ महीनों में है, और वह इस हद तक नाशुकरा इंसान है कि कोरोना के खतरे को उठाते हुए भी अहमदाबाद में मोदी ने जिस तरह ट्रंप की मेहमाननवाजी की, उसकी भी कोई इज्जत ट्रंप ने नहीं की, और दवा न मिलने की बात छेड़कर उस पर भारत को खुली धमकी भी दे डाली। आज ट्रंप की उस लाखों की भीड़ के बाद अहमदाबाद कोरोना की मार झेल रहा है, और ट्रंप है कि हिन्दुस्तान के किसी भी एहसान को नहीं मान रहा है। ऐसा व्यक्ति दुबारा चुनाव जीतकर आ जाए तो अलग बात है, वरना ऐसे बददिमाग और बेदिमाग तथाकथित दोस्त से छोड़छुट्टी पा लेना ही बेहतर है। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 29 अप्रैल 2020

तैयार हो जाइये कोरोनोत्तर युग की दुनिया के लिए...!

संपादकीय
29 अप्रैल 2020


दुनिया के अलग-अलग देश, अलग-अलग दर्जे के लॉकडाउन झेल रहे हैं, कहीं-अधिक, कहीं कम। हिंदुस्तान भी जबरदस्त लॉकडाउन देख रहा है। बच्चों ने इतने लम्बे वक्त तक माँ-बाप को सर पर सवार देखा नहीं होगा, माँ-बाप बच्चों को इतने वक्त, ऐसी नौबत में पहली बार ही देख रहे होंगे। छोटे या बड़े, किसी भी आकार के परिवार ने पहली बार सबको इतना झेला होगा। लोग खुलकर इस बारे में अधिक बोलेंगे नहीं, कि लॉकडाउन के बीच जान बचाने कहाँ जाएंगे। लेकिन हकीकत यह है कि अब इंसान बहुत अधिक समय तक सिर्फ परिवार के लोगों के साथ उस तरह रहने के आदी नहीं रह गए हैं, जिस तरह गुफा में रहने वाले इंसान रहा करते थे। और उस वक्त के इंसान को तो गुफा के भीतर न वाई-फाई हासिल था, न गुफाबैठे वे सोशल मीडिया के दोस्तों से जुड़े रहते थे। अब तो इंसान को घरवालों के बीच रहते हुए भी बाहर की दुनिया में जीने का एक बड़ा मौका हासिल है, लेकिन इस दसियों हजार बरस में इंसान ने धीरे-धीरे अपना मिजाज बदल लिया है। अब घर बैठे लोग बाहर निकलने के लिए बेचैन हैं। सबको यह समझ आ गया है कि छुट्टी नाम की अच्छी चीज भी बहुत अधिक मिलने पर जी उसी तरह अघा जाता है जिस तरह रईस बारात में बाराती को जबरदस्ती खानी पड़ रही दसवीं रसमलाई भारी पड़ती है। 
अब लोगों को काम करने की जरूरत भी समझ आ रही होगी, बाहर निकलने की भी, और लोगों से सशरीर मिलने की भी। कोरोना ने जिंदगी में अहमियत रखने वाली बहुत सी चीजों की समझ विकसित कर दी है। लोगों की पहचान करा दी है, और हम पहले भी लिखते आए थे कि बुरा वक्त अच्छे-अच्छे लोगों की पहचान करा देता है। वह हो भी रहा है, लेकिन इससे भी अधिक अभी होगा। आने वाले महीनों में लोग ऐसा बोलते मिलेंगे कि फलां को पहचानने में बड़ी देर हो गई। वक्त बहुत खराब आने वाला है, और घर के भीतर, घर के बाहर रिश्ते, बहुत खराब भी होने जा रहे हैं। 
लेकिन ये तमाम बातें तो उन लोगों के बारे में हैं, जो लोग घरों में बैठे हैं, जिनके अधिक संबंध हैं, अधिक दोस्त हैं। हिंदुस्तान जैसे देश में दसियों करोड़ लोग ऐसे हैं जहां लोग घरों से बाहर हैं, या मजदूरी के लिए फिर जिन्हें बाहर निकलना होगा। जिनके अधिक रिश्ते भी नहीं होंगे। जिन्होंने आज बेरोजगारी, फटेहाली देखी होगी, भुखमरी के कगार पर पहुँच गए होंगे। ऐसे परिवारों में बुजुर्गों ने ऐसे बुरे वक्त अपने बच्चों का एक नया बर्ताव देखा होगा, छोटे बच्चों ने अपने माँ-बाप को सैकड़ों मील पैदल चलते देखा होगा, जिंदगी की एक अलग दर्जे की लड़ाई लड़ते देखा होगा। उनके मन में अपने माँ-बाप की ऐसी योद्धा सरीखी तस्वीर बनने का और तो कोई मौका आना नहीं था। इसलिए यह नई पीढ़ी जिंदगी की लड़ाई की एक नई समझ भी लेकर बड़ी होगी, अपने जुझारू माँ-बाप से यह पीढ़ी बहुत कुछ सीखकर भी बड़ी होगी। 
दुनिया में आज इस बात को कहने वाले लोग कम नहीं हैं कि कोरोना के बाद दुनिया अलग ही हो जाएगी। कुछ लोगों ने बिफोर क्राइस्ट और आफ्टर क्राइस्ट की तरह बिफोर कोरोना और ऑफ्टर कोरोना के लिए बीसी और एसी भी लिखना शुरू भी कर दिया है। समाजशास्त्री और मनोवैज्ञानिक, एंथ्रोपोलॉजिस्ट और अर्थशास्त्रियों के पास कोरोनोत्तर दुनिया के बारे में लिखने को और भी बहुत कुछ होगा। फिलहाल सौ बरस पहले की महामारी के बाद की इस महामारी के बाद के लिए अपने-आपको तैयार करते चलिए।
(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 28 अप्रैल 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 28 अप्रैल 2020

यह तो अच्छा हुआ कि उसका नाम मुरारी था...

संपादकीय
28 अप्रैल 2020


उत्तर प्रदेश के बुलंद शहर से बुरी खबर आई है कि दो साधुओं को एक मंदिर में सोते हुए किसी ने धारदार हथियार से मार डाला। मौत तो बहुत बुरी थी, लेकिन उस बीच भी गनीमत यह है कि मारने वाला एक हिन्दू गिरफ्तार हुआ है जिससे दो दिन पहले साधुओं का सार्वजनिक झगड़ा हुआ था, और वह उन्हें धमकी देते हुए गया था। अभी-अभी महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं को उनके ड्राइवर सहित पीट-पीटकर मार डाला गया, देश के एक नफरतजीवी तबके ने दिल्ली में अपने अपने बड़े-बड़े नेताओं की अगुवाई में, और बाकी नफरतजीवियों ने अर्नब गोस्वामी नाम के टीवी-दंगाई की अगुवाई में उन साधुओं की हत्या की तोहमत पहले दिन मुस्लिमों की तरफ मोडऩे की कोशिश की, लेकिन पता चला कि मारने वाले तमाम लोग हिन्दू आदिवासी थे। आदिवासी अपने को हिन्दू नहीं मानते लेकिन जिस हिन्दू-हिस्से की बात हो रही है, वह उनको हिन्दू गिनता है। तो मुस्लिम उस भीड़त्या की तोहमत से बाहर हो गए, लेकिन आदिवासियों की नाम के साथ ईसाई जोडऩा आसान रहता है, इसलिए यह जोड़ा गया कि मारने वाले ईसाई हैं, और उनको बचाने में सोनिया गाँधी के करीबी लोग जुट गए हैं। फिर यह झूठ भी चौबीस घंटों से अधिक खड़े नहीं रह पाया, तो फिर अर्नब गोस्वामी का वीडियो खूब काम आया कि किस तरह सोनिया गाँधी ने अपनी सरकार के राज में हिन्दू साधुओं की ह्त्या के बाद खुशी से भरकर रोम रिपोर्ट भेजी है कि किस तरह हिन्दू साधू मारे गए। यह नफरत शायद देश में दंगा करवाने में बड़ी काम आती, लेकिन अब हिंदुस्तान में मुस्लिम, हिन्दू अर्थी उठाने में लगे हैं, अंतिम संस्कार कर रहे हैं, हिन्दू, मुस्लिमों को अपने घर में रख रहे हैं, उनकी जान बचा रहे हैं, खाना खिला रहे है, मुस्लिम कॉरोनामुक्त होने के बाद अपने खून का प्लाज़्मा दे रहे हैं। कुल-मिलाकर अभी दंगे के लायक माहौल अर्नब, और बेचेहरा नफरती, मिलकर भी नहीं बना पा रहे। इसलिए देश का सबसे संवेदनशील प्रदेश, उत्तर प्रदेश भी तनाव से बच गया, और साधुओं का हिन्दू हत्यारा पकड़ा गया। 

देश में धर्म को सर पर चढ़ा लिया गया है। और महज त्योहारों के लिए नहीं, नफरत, राजनीति, और डूबते हुए मीडिया-कारोबार को चलाने के लिए धार्मिक नफरत को बढ़ावा दिया जा रहा है। धार्मिक प्रेम किसी को आसानी से नहीं जोड़ पाता लेकिन धार्मिक नफरत तुरंत ही इस देश के अर्नबों को एक कर देती है। देश की सबसे बड़ी अदालत का मिजाज हैरान करता है कि नफरत की आग की लपटें उगलते ड्रैगन पर सवार अर्नब गोस्वामी रात में सुप्रीम कोर्ट पहुँचता है, और अगले दिन राहत हासिल कर लेता है। नफरत की इन लपटों से देश में अगर दंगे हो गए होते तो? इस बहुत ही हकीकत के खतरे को भी देखने से सुप्रीम कोर्ट इंकार कर रहा है! अर्नब की बुनियाद ही नफरत से बनी है, जिसे देश की सबसे बड़ी अदालत ने हैरतअंगेज अंदाज से अनदेखा कर दिया है। ऐसे में देश में नफरत मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय भावना बन गयी है, और धार्मिक सद्भावना को जिंदा रखना आम लोगों की जिम्मेदारी हो गयी है। 

यह तो अच्छा हुआ कि साधुओं का चिमटा किसी हिन्दू ने ही चुरा लिया था, खुला झगड़ा भी हुआ था, धमकी भी हुई थी, और मुरारी नाम का वह नशेड़ी पकड़ा भी गया। नहीं तो जाने क्या होता। देश को एक बारूद के ढेर पर बिठाने की कोशिश हो रही है, कब तक वह उससे बच पायेगा यह भी अंदाज लगाना मुश्किल है। आज कोरोना की दहशत से लोगों के मन में जो श्मशान वैराग्य आया है, उससे लोग नफरत से छुटकारा पा सकेंगे यह भी ठीक से समझ नहीं पड़ रहा है। लेकिन यह तय है कि तब्लीगियों के मज़हब से लेकर अर्नब के हिंदुत्व तक, धर्म ने लोगों को पागल कर रखा है। जब किसी लोकतंत्र पर, सरकार पर, अदालत पर, धर्म हावी हो जाता है, तो उसका क्या होता है इसकी एक उम्दा मिसाल बगल का पाकिस्तान है। जिंदगी पर, राजनीति पर, निजी मामलों से लेकर सड़कों तक, जब धर्म का इतना बोलबाला हो जाता है, तो फिर लोकतंत्र धार्मिक आतंक होकर रह जाता है। हिंदुस्तान को हिन्दू पाकिस्तान बनाने के लिए रात-दिन ओवरटाइम मेहनत करने वाले अरनबों की तालिबानियत इस देश की जम्हूरियत को खत्म तो शायद न कर पाए, लेकिन बर्बाद जरूर कर दे रही है। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

पंजाब डीजीपी को सलाम

संपादकीय
27 अप्रैल 2020


पंजाब पुलिस के 80 हजार लोगों में से हर कोई आज हरजीत सिंह है। एएसआई हरजीत सिंह ने कुछ दिन पहले पटियाला में सड़क पर कफ्र्यूू पास पूछा तो एक निहंग ने तलवार से उनके दोनों हाथ काट दिए थे। चंडीगढ़ में पीजीआई के डॉक्टरों में बड़ी मेहनत और हुनर की सर्जरी से उनके दोनों हाथ जोड़ दिए। ऐसे बहादुर पुलिस अफसर का सम्मान करने के लिए, आज पंजाब में डीजीपी से लेकर सिपाही तक, हर किसी ने वर्दी पर अपनी नेमप्लेट पर हरजीत सिंह का नाम लगाया और उसे सम्मान दिया। डीजीपी दिनकर गुप्ता की यह पहल देश में याद रखी जाएगी, और इससे पंजाब पुलिस का सीना अपने मुखिया के नाम पर फख्र से तन जाएगा। 
न सिर्फ वर्दी वाली फोर्स में, बल्कि किसी भी जगह मुखिया अपने लोगों के साथ किस हद तक खड़े रहते हैं, यह बात बहुत मायने रखती है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहाँ नक्सल मोर्चे पर साल भर में 100 -200 जवान भी मारे जाते हैं, वहां हमको याद नहीं पड़ता कि पुलिस के मुखिया कभी किसी शहीद के घर गए हों। इतने शहीदों के अंतिम संस्कार में जा पाना तो किसी अफसर के लिए मुमकिन नहीं हो सकता, लेकिन किसी दौरे के वक्त भी कोई डीजीपी किसी शहीद के घर गए हों, ऐसा खबरों में तो कभी आया नहीं। प्रदेश के मंत्री-मुख्यमंत्री, और वर्दी वाले अफसर, इन सबका काम शहीद के शव को उसके घर रवाना करने के पहले सलामी देने के साथ ख़त्म हो जाता है। 
पंजाब पुलिस के मुखिया के लिए भी यह काफी हुआ होता कि वे एक बार हरजीत सिंह को अस्पताल में देख लेते, इनाम की घोषणा कर देते। लेकिन उन्होंने जो किया उससे पंजाब पुलिस के छोटे बड़े सभी लोगों के मन में एक नया हौसला आया होगा। मुखिया को इस नजरिये से सोचना चाहिए। एक बक्से के बाहर सोचना बहुत से लोगों को आता नहीं है। राजीव गाँधी जब प्रधान मंत्री थे तो वे अपने सुरक्षा कर्मचारियों-अधिकारीयों से दोस्ताना सम्बन्ध रखते थे। लोगों को याद होगा कि जब इंदिरा गाँधी को खुफिया एजेंसियों ने चौकन्ना किया था कि स्वर्ण मंदिर पर कार्रवाई की वजह से कोई सिख सुरक्षा कर्मचारी उनके लिए खतरा बन सकता है, तो उन्होंने किसी भी सिख को हटाने की बजाय जान दे देना बेहतर माना था। अपने साथ के लोगों को बचाने के लिए बहुत से बड़े नेता भी उनका ख़तरा अपने ऊपर लेने के लिए जाने जाते हैं, और अदालतों तक खड़े रहते हैं। कोई मुखिया अपने लोगों के साथ खड़े रहकर ही मुखिया रहने के हकदार हो सकते हैं, उनको मुसीबत में धकेलकर खुद बचकर नहीं। पुलिस हो, फौज हो, या कोई और संगठन, बड़प्पन वाले मुखिया का नाम ही इतिहास में दर्ज होता है। आज हम सरकार में बहुत से ऐसे आला अफसर देखते हैं जो मातहत को मुसीबत में छोड़कर खुद बच निकलने में महारत हासिल कर चुके हैं। ऐसे में पंजाब डीजीपी को सलाम।
(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अप्रैल 2020

दलित-आदिवासी आरक्षण से क्रीमी लेयर तुरंत खत्म हो

संपादकीय
26 अप्रैल 2020


दलित-आदिवासी आरक्षण हिंदुस्तान में अलग-अलग वजहों से तनाव का कारण बने ही रहता है, फिर हाल के बरसों में सुप्रीम कोर्ट के बड़े साफ-साफ रूख की वजह से एक नयी बेचैनी खड़ी हुई है। बात दलित-आदिवासी आरक्षण कम करने की नहीं है, बल्कि इन तबक़ों के भीतर मलाईदार तबक़ों को कम करने की है। हम बरसों से इस बात को लिखते आ रहे हैं, कि इन तबक़ों से क्रीमी लेयर को हटाने की जरूरत है क्योंकि अपनी बेहतर सामाजिक, आर्थिक स्थिति की वजह से इन समुदायों का यह हिस्सा ही सारे फायदों पर एकाधिकार जमा बैठता है, ओर इन्हीं तबकों के गरीब वंचित ही रह जाते हैं। 

अब चार दिन पहले, 22 अप्रेल को सुप्रीम कोर्ट (उच्चतम न्यायालय) में संविधान पीठ की ये टिप्पणी कि सरकार एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर सिद्धांत लागू करे, सरकार के लिए एक बार फिर से दिक्कत बन गई है। साल 2018 में सप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा जरनैल सिंह केस में की गईं टिप्पणियां अभी फैसले से हटी नहीं हैं कि अब दूसरी संविधान पीठ ने यही टिप्पणियां फिर से कर दी हैं। अदालत ने इस बार कहा है-एससी-एसटी वर्ग के जो लोग आरक्षण का लाभ लेकर धनी हो चुके हैं, उन्हें शाश्वत रूप से आरक्षण देना जारी नहीं रखा जा सकता है। कल्याण के उपायों की समीक्षा करनी चाहिए ताकि बदलते समाज में इसका फायदा सभी को मिल सके। ताजा टिप्पणियां कोर्ट ने आंध्र व तेलंगाना के अनुसूचित क्षेत्रों में एसटी वर्ग को 100त्न आरक्षण देने के आदेश को रद्द करते हुए 22 अप्रैल को की हैं।

इस बारे में एक समाचार का हिस्सा कहता है- वर्ष 2018 में की गई क्रीमी लेयर की टिप्पणियों के दलित वर्ग में कड़े विरोध के बाद केंद्र ने दिसंबर 2019 मे शीर्ष कोर्ट में याचिका दायर कर टिप्पणियों को फैसले से हटाने का आग्रह किया था। सरकार ने कहा था ये मामला सात जजों की बेंच को भेजा जाए क्योंकि एससी-एसटी वर्ग में क्रीमी लेयर नहीं लागू की जा सकती। उनका आर्थिक रूप से सशक्त होना भी उनसे दलित होने का दाग नहीं मिटा पा रहा है। सरकार की यह याचिका शीर्ष कोर्ट में लंबित है। मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने उसे सात जजों की बड़ी बेंच को भेजने पर विचार करने की सहमति दी है। अब तक क्रीमी लेयर का सिद्धांत अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी में ही लागू होता है।
केंद्र सरकार 2018 के अदालती फैसले के खिलाफ 2019 में सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी कि अदालत के पिछले बरस के एक फैसले को एक बड़ी बेंच सुने। सर्वोच्च न्यायालय में पांच जजों की बेंच ने अनुसूचित जाति-जनजाति के पदोन्नति में भी मलाईदार तबके को फायदे से बाहर करने का फैसला दिया था, और केंद्र सरकार पिछले बरस एक बार फिर अदालत के फैसले को पलटवाने के लिए इस मामले को सात जजों की बेंच को भेजने की अपील की थी। सरकार के वकील ने अदालत को कहा था कि यह एक भावनात्मक मामला है और सरकार चाहती है कि अधिक बड़ी बेंच इसे सुने। सुप्रीम कोर्ट में इसके पहले 2006 में पांच जजों की एक बेंच प्रमोशन से एसटी-एससी के मलाईदार तबके को बाहर कर चुकी थी, और 2018 में भी एक दूसरी बेंच ने ऐसा ही आदेश दिया था।

हमने उस वक्त भी लिखा था- केंद्र सरकार की यह अपील पूरी तरह नाजायज है, और एसटी-एससी तबकों की क्रीमीलेयर को पदोन्नति से बाहर तो रखना ही चाहिए, इसके साथ-साथ देश के आरक्षण कानून में भी इन तबकों के मलाईदार हिस्से को तमाम फायदों से बाहर करना जरूरी है। हम इसके बारे में पहले भी दर्जनभर बार लिख चुके हैं कि इन तबकों को जिस आधार पर आरक्षण दिया गया था, वे आधार आज भी जारी हैं, इसलिए आरक्षण जारी रहना चाहिए। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी बात यह है कि दलित-आदिवासी तबकों के भीतर भी आरक्षण का फायदा पाने वाली पीढ़ी सरकारी नौकरियों से लेकर संसद और विधानसभा तक पहुंच चुकी है, और ऐसी ताकत पाने वाली पीढ़ी की संतानों को अतिरिक्त फायदे की जरूरत नहीं रहनी चाहिए। ऐसे मलाईदार तबके का बड़ा सहज तर्क यह रहता है कि वे आज भी सामाजिक भेदभाव के शिकार हैं, और इसलिए उन्हें आरक्षण का फायदा जारी रहना चाहिए, यह बात कुछ हद तक अगर सही भी है, तो भी इन तबकों के भीतर इनसे कमजोर नौबत वाली एक बहुतायत वाली आबादी है जो कि किसी फायदे तक नहीं पहुंच पाई है। इन तबकों के भीतर ताकतवर हो चुकी पीढ़ी के बच्चे संपन्नता और पढऩे-लिखने की सहूलियत, कोचिंग के चलते हुए इतने ताकतवर हो जाते हैं कि उनके स्वजातीय या स्वधर्मी बच्चे उनके आसपास भी नहीं फटक पाते। ऐसे में इस मलाईदार तबके को इन तबकों के ऊपर से ठीक उसी तरह हटाने की जरूरत है जिस तरह कढ़ाई में खौलते दूध के ऊपर से मलाई को किनारे किया जाता है, तब नीचे का दूध औंट पाता है। इन तबकों के लिए आरक्षित अवसरों और इनकी आबादी के बीच कोई अनुपात नहीं है। ऐसे में आरक्षण के फायदे घूम-फिरकर अगर उन्हीं सीमित लोगों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिलते चले जाएंगे, तो वह एक असंतुलित तबका बनने के अलावा और कुछ नहीं होगा। यह सामाजिक हकीकत समझना चाहिए कि क्रीमी लेयर को बाहर किए बिना उसी समाज के सबसे कमजोर लोगों की कोई संभावना नहीं बनती। जिस तरह और जिस तर्क के आधार पर ओबीसी के भीतर क्रीमी लेयर को फायदे से परे किया गया है वह तर्क एसटी-एससी पर भी लागू होता है और इसे अनदेखा करना सत्ता पर काबिज एसटी-एससी लोगों के पारिवारिक हित में जरूर है, लेकिन इन तबकों के बाकी गैरमलाईदार बहुतायत लोगों के हितों के ठीक खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट के सामने अभी यह व्यापक मुद्दा गया नहीं है, लेकिन इसके बारे में  दलित-आदिवासी तबकों के गरीब-कमजोर लोगों को जाना जरूर चाहिए।

ऊपर की बात हमने पिछले बरस लिखी थी, हम आज भी उसी पर कायम हैं, इसलिए उस बात को यहाँ दुबारा दिया है। सरकारों में फैसले लेने वाले तमाम दलित-आदिवासी लोगों के बच्चे इस फैसले को अमल में लाने से फायदों से बाहर हो जाएँगे, इसलिए अब इसके खिलाफ रास्ता ढूँढा जाएगा, और दलित-आदिवासी वंचित तबका वंचित ही रह जाएगा। 
(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अप्रैल 2020

नमस्ते ट्रम्प, अपने अहमदाबाद में छलांग लगते कोरोना की खबर तो आप ले ही रहे होंगे?

संपादकीय
25 अप्रैल 2020


कोरोना दुनिया में छलांग लगाकर आगे बढ़ रहा है, जहां घट गया था, उस जापान में समंदर की लहर की तरह वह लौटकर आया, और वहां के प्रधानमंत्री को कहना पड़ा है कि महिलाएं सामान खरीदने सुपरमार्केट ना जाएँ क्योंकि वे अधिक बारीकी से देखकर, तुलना करके खरीदती हैं, आदमियों को भेजें जो कि तेजी से खरीदते हैं। बाजार से भीड़ को घटाने ऐसी तरकीबें सोचनी पड़ रही हैं। जिन लोगों को लग रहा है कि कोरोना खत्म होने को है उन्हें दुनिया के बड़े-बड़े कई विशेषज्ञों की भी सुनना चाहिए कि यह अभी साल-दो साल भी चल सकता है। अभी बहुत फिक्र की खबर है कि हिंदुस्तान के गुजरात की राजधानी अहमदाबाद में कोरोना देश में सबसे तेज बढ़ रहा है। जब देश में पहला कोरोना मरीज मिल चुका था, उसके तीन हफ्ते बाद इसी शहर में 'नमस्ते ट्रम्पÓ हुआ था, ऐतिहासिक भीड़ जुटी थी, हजारों अमरीकी लोग भी आये थे, और शायद ही किसी की कोरोना जांच हुई थी। आज की खबर है कि इसी अहमदाबाद में हर 4 दिन में कोरोना पॉजिटिव दो गुने हो रहे हैं, पूरे गुजरात के मुकाबले इसी शहर में सबसे अधिक हैं। और वहां की भाजपा सरकार के म्युनिसिपल कमिश्नर ने कहा है कि अगर इसी रफ्तार से कोरोना पॉजिटिव बढ़े तो मई के आखिर तक अहमदाबाद में 8 लाख लोग कोरोनाग्रस्त हो सकते हैं। अब तक के करीब पौने 3 हजार कोरोनाग्रस्त में से आज सुबह तक सवा सौ से अधिक मारे जा चुके हैं। क्या अभी यह याद दिलाना गलत होगा कि राहुल गाँधी ने 12 फरवरी को कोरोना के खतरे के बारे में ट्वीट करके मीडिया के एक हिस्से में अपना मखौल बनवा लिया था, मीडिया के कुछ लोग उनकी खिल्ली उड़ाते हुए अतिसक्रिय हो गए थे। अब राहुल की ही बात सही साबित हुई है, और नमस्ते ट्रम्प के बाद के ये खतरनाक नतीजे अहमदाबाद को अमरीका बनाकर छोड़ रहे हैं। 

इस पर चर्चा जरूरी इसलिए है कि आज अलग-अलग हिन्दुस्तानी राज्य अपने-अपने हिसाब से कोरोना से लड़ रहे हैं, जिस उत्तर प्रदेश से सीएम योगी केरल को इलाज सिखा रहे थे, वह केरल देश में कोरोना-मोर्चे पर अव्वल कामयाब साबित हो रहा है। छत्तीसगढ़ ने खूब अच्छी तरह काबू किया है, लेकिन गुजरात अब तक ट्रम्प को ढो रहा है। इसी से सबक मिलता है कि नेता को एक वैज्ञानिक खतरे के वक्त तो अपने राजनीतिक फैसलों को अलग रखकर विशेषज्ञों को अपना काम करने देना चाहिए। नमस्ते ट्रम्प डोनाल्ड ट्रम्प का चुनाव अभियान तो था, लेकिन हिंदुस्तान से नमकीन ढोकला खाकर गए ट्रम्प ने हिंदुस्तान को धमकी देने में वक्त नहीं लगाया था। इसलिए मेडिकल खतरे के वक्त तो इस देश के नेता राजनीति, अपनी जिद, और अपने दम्भ दूर रखें तो ही उनकी आबादी बच पाएगी। 

आने वाले दिन अब तक की चुनौतियों से बहुत अधिक खराब होने के आसार हैं, और ऐसे में अगर लोग अपनी जिद से काम करते रहेंगे, तो डॉक्टर, मेडिकल वर्कर अपनी जान गंवाने के अलावा और कुछ नहीं कर पाएंगे। कुछ राज्यों ने राजस्थान के कोटा में पढ़ रहे अपने बच्चों को बसें भेजकर वापिस बुलवा लिया है, कुछ और राज्य तैयारी में हैं, छत्तीसगढ़ की बसें रास्ते पर हैं। इन बच्चों के लौटने के साथ ही राज्यों के सामने एक-एक पखवाड़े की चुनौतियां शुरू हो जाएंगी, और फिर यह सामाजिक तनाव तो है ही, कि गरीब मजदूर खुले आसमान तले छोड़ दिए गए हैं और कमरों में बसे संपन्न बच्चे कोचिंग से वापिस लाए जा रहे हैं। ये सारे सामाजिक सवाल राजनीतिक असुविधा बनकर खड़े होने वाले हैं, और दिक्कत यह भी आने वाली है कि प्रदेशों की सरहदों पर रोके गए गरीबों को वहां बियाबान में रोकने का अब क्या न्यायसंगत जवाब है? सामाजिक और राजनीतिक दबावों के चलते इस किस्म के और भी बहुत से तनाव सरकारी फैसलों पर पडऩे वाले हैं। कल ही छत्तीसगढ़ में एक गरीब ने चौराहे पर आत्मदाह की कोशिश की जिसे अपनी बची को झारखण्ड से लाने की इजाजत नहीं मिली थी। आज राहुल गाँधी की चेतावनी को अनदेखा करने वाले मोदी सवालों के घेरे में हैं, लेकिन जैसे-जैसे वक़्त गुजरेगा, और भी नेता सवालों के बीच होंगे। बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार परेशानी झेल ही रहे हैं, उनकी सरकार में भागीदार भाजपा बिहार के बच्चों को वापिस लाने को लेकर तनाव की मुद्रा में है ही। 

गुजरात की भयानक हालत से बात शुरू हुई थी, इसलिए उसी पर लौटना ठीक है, कोरोना के भयानक खतरे को नेताओं के मनमाने फैसलों पर छोडऩा भयानक होगा। हर नेता के नमस्ते ट्रम्प जैसे गलत फैसले हो सकते हैं, जिनकी कीमत आम जनता जान देकर चुकाएगी, 12 बरस की एक मजदूर बच्ची तेलंगाना से छत्तीसगढ़ के रास्ते दम तोड़ ही चुकी है, वह तानाशाह लॉकडाउन की शहीद रही। आगे नेताओं की मनमानी के चलते जाने क्या होगा, कितने और शहीद होंगे।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अप्रैल 2020

मुसीबत के वक्त कुछ बर्बादी तो होगी लेकिन मदद जरूरी

संपादकीय
24 अप्रैल 2020


कुछ भला करने में कई बार हाथ भी जलते हैं। इन दिनों हिंदुस्तान में लॉकडाउन के चलते करोड़ों मजदूर जगह-जगह फंसे हुए हैं, और लोग उनके खाने-पीने के इंतजाम में मदद भी कर रहे हैं। किसी दूसरे शहर में फंसे हुए अपने प्रदेश के मजदूरों के लिए दूर से फोन पर खुद और सरकार की मदद से भी कुछ लोग लगे हुए हैं। उन्होंने मदद करवाई, और फिर यह शिकायत सुनने मिली कि जिन लोगों के नाम मिले हैं, उनमें से बहुत सारे तो बरसों से उन्हीं शहरों के बाशिंदे हो गए हैं, वहीं मजदूरी करते हैं, और मुफ्त में राहत मिलते देख उन्होंने भी अपना नाम लिखा दिया था। सुनकर बुरा भी लगता है, लेकिन हकीकत यही है, इस देश में लोगों को राह चलते किसी त्यौहार के दिन कई भंडारे खुले दिखते हैं, तो मोटरसाइकिल खड़ी करके कई जगह प्रसाद के नाम पर खाना खा लेते हैं। ऐसे में आज मजदूरी बंद है, दुकानें बंद हैं, तो कुछ पुराने बसे लोग भी राशन ले रहे होंगे। 
कितने ऐसे लोग हैं जो मुफ्त लेना नहीं चाहते? अखबार मालिक रियायती जमीन चाहते हैं, पत्रकारों में से बहुत से हैं जो एक  से ज्यादा रियायती जमीन-मकान भी ले लेते हैं, मन्त्री और विधायक अपने मकान के बाद भी सरकारी मकान लेते हैं, फिर रियायती जमीन और रियायती मकान खरीद भी लेते हैं। करोड़पति बुजुर्ग भी रेल टिकट पर रियायत चाहते हैं। बहुत से संपन्न लोग ऐसे भी हैं जो कि बूढ़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मां-बाप को सूटकेस-बैग की तरह लेकर चलते हैं। सरकार ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को एक सहायक लेकर चलने की छूट दी है, तो औलाद उन्हें साथ में टांगकर भी चलती है। गरीब मजदूर मुफ्त का राशन पाकर भी कितना दौलतमंद हो जायेगा? हफ्ते भर का राशन नहीं खरीदना पड़ेगा। लेकिन उसका तो काम भी महीनों का छिना हुआ है। इसलिए उसकी नीयत पर अधिक हमला बोलना ठीक नहीं। 
यह तो वह देश है जिसमें आपातकाल में मीसाबंदी रहे लोगों के कुनबे छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में मीसा-पेंशन बंद होने के खिलाफ अदालत से फैसला लाते हैं, फिर चाहे संपन्न लोगों को उसकी जरूरत ही ना हो। मुफ्त का माल किसको बुरा लगता है? हिंदुस्तान में तो ट्रेन से बर्थ का रैग्जीन काटकर लाकर लोग उसका थैला बना लेते हैं, ट्रेन के पखाने से जंजीर लगा स्टील का मग्गा चुरा लेते हैं, होटलों में रखे सामानों को मुफ्त का मानकर सब कुछ भरकर लाने की फेर में रहते हैं। ऐसे देश में फंसे हुए बेरोजगार मजदूर के सामने यह दिक्कत भी है कि दुकानें खुली नहीं हैं, काम बंद है, मजदूरी बंद है, इसलिए भी कुछ सामान जुटाकर रखने की नीयत  हो सकती है।
गरीब की नीयत जरूर डोलती होगी, लेकिन पैसेवालों की ना डोलती हो ऐसा भी नहीं। इसलिए आज के इस भयानक संकट के बीच भी लालची गरीबों को अनदेखा करके सभी गरीबों की मदद करनी होगी। और यह मदद कोई बहुत बड़ी नहीं है, यह थोड़े से अनाज की ही है, जो कि देश की सरकारों के लिए गोदामों से बाहर उफनकर एक दिक्कत भी बना हुआ है। छत्तीसगढ़ में जब राशन कार्ड बन रहे थे, और गरीबी के पैमाने तय नहीं हो पा रहे थे, तब उस वक़्त की भाजपा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में उसके सलाहकारों के कहे हुए यह मान लिया था जो भी गरीब, जिस भी लिस्ट में गरीबी की रेखा के नीचे आ रहे हों, उन्हें गरीब मानकर राशन दिया जाये। आज की नौबत वही है, जो अपने को भूखा कहे, उसके खाने का इंतजाम करना है। 100 में से चाहे 50 गरीब ना हों, लेकिन उनके चक्कर में बचे 50 भूखे-गरीब ना छूट जाएँ। संकट के वक्त ऐसी बर्बादी होती ही है, कुछ लोग ट्रक भरकर अनाज गायब करते हैं, कुछ लोग बिना जरूरत 5 किलो ले लेते हैं। बर्बादी रोकने के लिए राहत नहीं रोकी जा सकती।
(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अप्रैल 2020

लोगों के 3, सरकारों के 6 महीने पूरे बर्बाद हुए...

संपादकीय
23 अप्रैल 2020


भारत सरकार ने तय किया है कि उसके कर्मचारियों, अधिकारियों को बढ़ा हुआ मंहगाई भत्ता अगले एक बरस नहीं दिया जायेगा। इससे एक करोड़ से अधिक कर्मचारियों-अधिकारियों को नुकसान होगा, और सरकार को 37 हजार करोड़ से अधिक की बचत। इस कड़े फैसले का असर राज्यों में भी होगा जिनकी कमाई गड्ढे में जा चुकी है और चुनौतियां आसमान जितनी ऊंची हो गई हैं। राज्य सरकारें भी ऐसे में भत्ते देने में कटौती करेंगी। ऐसे में सरकारों को न सिर्फ इस बरस के लिए, बल्कि अगले कम से कम 5 बरस के लिए कमर कस लेनी चाहिए। केंद्र, राज्य, और स्थानीय संस्थाएं, सभी की जिंदगी बदल जाएगी। आज देश और दुनिया पर जितनी बड़ी मुसीबत टूट पड़ी है, उसे देखते हुए बहुत ही कड़े फैसलों का वक्त आया है, जो आज दिल कड़ा नहीं कर पाएंगे, वे कल मिट ही जायेंगे। देश के कई कारोबारों ने अपने लोगों की तनख्वाहों को कंपनी की कमाई से जोड़ दिया है, और वे लोग एक किस्म से कारोबार के नफे-नुकसान में भागीदार बनकर काम कर रहे हैं। पहले सुनाई पड़ता था कि कौन से बड़े फिल्मी सितारे फिल्म निर्माता से कमाई में हिस्से की शक्ल में मेहनताना लेते थे, अब अखबारों के कर्मचारी भी ऐसा कर रहे हैं। सवाल यह है कि कंपनी की ही कमाई नहीं रह जाएगी, तो कर्मचारी क्या पाएंगे, कहाँ से पाएंगे?

पिछले दिनों में हमने कई बार इस बात को इस जगह पर लिखा है कि कारोबारी-मैनेजर अब कर्मचारियों को यह देखकर ही काम पर जारी रखेंगे कि उनके बिना धंधे का काम क्या बिल्कुल ही बंद हो जायेगा? बहुत से बड़े धंधों से लोगों को निकाला गया है, लेकिन वह खबर इसलिए बनी क्योंकि वे धंधे अभी लॉकडाउन के दौरान भी चल रहे थे। टीवी और अखबार से निकाले लोगों की बातों की पहुंच भी अधिक थी इसलिए भी हम तक भी तैरती हुई बात जल्द पहुँच गई। लेकिन देश के 90 फीसदी कारोबार तो अभी बंद ही हैं, उनके शुरू होने पर पता चलेगा कि किसमें किस कर्मचारी की जगह है, ओर किसमें मालिक की जगह बची हुई है। लॉकडाउन पूरी तरह ख़त्म हो जाने के बाद पता लगेगा कि क्या बचा है, और क्या कोरोना के साथ ही चल बसा है। 

लोगों को याद होगा कि नोटबंदी के साथ शुरू हुई बर्बादी जीएसटी के शुरू होने के साथ तेज होती गई थी, और कोरोना के आने के पहले ही हिन्दुस्तानी बाजार कराह रहा था। काम-धंधों का बुरा हाल था। और कोरोना की मार तो ऐसी बुरी हुई है कि लोगों की निजी, और छोटे कारोबारियों की 3 महीने की पूरी देनदारी खत्म कर दी जाये, तो ही वे पैरों पर खड़े हो सकेंगे। मजदूरों का सवाल है, तो उनके 3 महीने तो तबाह दिख ही रहे हैं, उनकी बकाया मजदूरी देनेवाले अपने कारोबार में पता नहीं दुबारा नजर आएंगे भी या नहीं। सरकारों के सामने दिक्कत यह है कि उसके खर्च तो बंधे हुए हैं, जिनमें कोरोना से लडऩे के लिए तो कुछ था ही नहीं, किसी राज्य के पास अपने लोगों को जि़ंदा रखने से अधिक के लायक कुछ नहीं रहेगा। केंद्र और राज्यों को नए कर्ज जुटाने होंगे ताकि वे लोगों को तनख्वाह दे सकें, और मजदूरों को रोजी का काम दे सकें। ऐसा लग रहा है कि कोरोना देश-प्रदेश के आधे सालाना-बजट को बर्बाद करके जायेगा, कमाई बंद, और अभूतपूर्व खर्च जारी। 

लोगों को याद होगा कि हम सरकारों के लिए यह लिखते आये हैं कि सरकारों को विपदा के लिए, बुरे वक्त के लिए तैयार रहना चाहिए।न देश, न प्रदेश की सरकारों ने ऐसे किसी वक्त के लिए कुछ सोचा था। फिर आज के हालात बताते हैं कि ये मेडिकल बंदिशें और साल-छह महीने चल सकती हैं। उसका खर्च अभी आना बाकी ही है। ऐसे में सरकारों को अगले 5 बरस के लिए अपनी इमारतों का रंग-रोगन बंद कर देना चाहिए, सारी साज-सज्जा, सौंदर्यीकरण को बंद कर देना चाहिए। नई इमारतें रोक देनी चाहिए, खासकर दिल्ली में संसद के इर्द-गिर्द के इलाके के लिए अभी मंजूर किये गए 20 हजार करोड़ रूपये तो तुरंत ही रद्द कर देने चाहिए। राज्य सरकारों को तो चाहिए कि ऐसे आर्थिक संकट के अधिक जानकार कुछ विशेषज्ञों से सलाह लेकर अगले कुछ साल तय करें। बाकी फिर।

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 22 अप्रैल 2020

कितने अच्छे, कितने बुरे ?

संपादकीय
22 अप्रैल 2020


कोरोनाग्रस्त हिंदुस्तान में देश भर से दिल दहलाने वाली खबरें आ रही हैं, कुछ खबरें संघर्ष की हैं, कुछ त्याग की, और कुछ उस हैवानियत की जिसे इंसान अपने से परे मानते हैं, हालाँकि जो है उनके भीतर की ही। बहुत सी जगहों पर हिन्दुओं का अंतिम संस्कार मुस्लिम कर रहे हैं, कहीं घर वाले अंतिम संस्कार को तैयार ना हुए तो एक तहसीलदार ने अंतिम संस्कार किया। कई जगहों पर कोरोना से मरीजों को बचाते हुए मरने वाले डॉक्टरों को उनके धर्म के कब्रिस्तान में दफनाने से समाज के लोग रोक रहे हैं, तो ताबूत को लिए हुए सरकारी कर्मचारी एक से दूसरे कब्रिस्तान भटक रहे हैं। डॉक्टरों, नर्सों, और पायलटों से मकान खाली करवाने के भी बहुत से मामले हो गए हैं, अभी मध्यप्रदेश में 13 सामानों की सरकारी मदद-किट में कुल दो सामान निकल रहे हैं। ऐसे में ही बहुत से भले लोग दूसरों की सेवा करते-करते जान भी दे-दे रहे हैं। रात दिन मदद करने में लगा एक सिक्ख नौजवान इसी दौरान सड़क-हादसे में मारा गया है। छत्तीसगढ़ के रायपुर में ही सरकारी राहत शिविर में लोगों की सेवा में एक सामाजिक कार्यकर्ता मंजीत कौर बल अपने दर्जनों साथियों के साथ रात-दिन लगे हुए हैं, और सैकड़ों किलोमीटर के पैदल सफर पर निकले गरीबों को सड़क से मनाकर राहत शिविर में लाकर ठहरा रही हैं। 

एक ईसाई डॉक्टर के कोरोना-मोर्चे पर लड़ते हुए शहीद हो जाने पर जो ईसाई समुदाय अपने कब्रिस्तान में दफनाने नहीं दे रहा, वह ईसाई समुदाय कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए जाना जाता था, और मदर टेरेसा जैसे लोग इस समुदाय में हुए थे। कहने को यह धर्म पड़ोसी से प्रेम करने को कहता है, लेकिन आज उसके कब्रिस्तान के दिल में भी समाज के एक हीरो के ताबूत के लिए जगह नहीं बची ! बुरा वक्त अच्छे लोगों की खूबियों और बुरे लोगों की खामियों के उजागर होने का बड़ा अच्छा वक्त होता है, और वही हो भी रहा है। देश, काल, और धरम से परे, सिक्ख सेवा में लगे हैं, तो लगे हैं। ऐसे वक्त उत्तर प्रदेश का एक निजी अस्पताल इश्तहार छपवाकर मुस्लिम मरीजों को आने से मना करता है, और देश में बढ़ाई जा रही सांप्रदायिक नफरत में अब अस्पताल भी अगर इश्तहार छपवाकर पेट्रोल डाल रहे हैं, तो फिर अब बचता क्या है?

देश की बहुत सी सरकारों में यह सोच दिख रही है कि ताकतवर और पैसेवाले तबकों को बचा लिया जाए, और मजदूर तो बिना छत के रहने के आदी ही हैं, इसलिए उन्हें खुले में छोड़ दिया जाए। यह सोच भी सरकारों में तथाकथित इंसानियत की कमी बताती है, और सरकार का अपना कोई दिल-दिमाग तो होता नहीं है, इसलिए यह सरकार चलाने वाले लोगों की संवेदनशून्यता है। देश के पैसे वालों में कितनी हमदर्दी है, यह उनके दिए दान से दिख चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कारोबारियों के सीएसआर की रकम को प्रधानमंत्री के नए बनाये कोष में देने की तो छूट दे दी है, लेकिन राज्यों के मुख्यमंत्रियों के राहत कोष में उसे नहीं दिया जा सकता। यह बहुत ही बेतुका फैसला है, कोरोना से निपटने की सीधी जिम्मेदारी तो राज्य सरकारों की है, उनका तो अपने राज्य के कारोबार के सीएसआर पर पहला हक होना चाहिए। इस तरह इस बुरे वक्त में सरकार और समाज, दोनों की अच्छी सोच खुलकर सामने आ रही है। फिर यह भी समझ लेने की जरूरत है कि आज हिंदुस्तान पर कोरोना का कहर दुनिया से सबसे बुरे कहर वाले देशों के आस-पास भी नहीं है। अगर यहां भी सड़कों में लाशें गिरती होतीं तो क्या होता? यहाँ भी बुलडोजर से लाशों को कब्रिस्तान में भरना होता तो क्या होता? किसी दिन अगर कोरोना से बचने का टीका बाजार में आएगा और गिना-चुना आएगा तो ताकतवर लोग अपने परिवार के लिए उसे झपटने के लिए क्या करेंगे? क्या लोग एक-दूसरे का गला काटने को तैयार नहीं हो जायेंगे? बहुत सी टुकड़ा-टुकड़ा बातें हैं सोचने के लिए, आज से बहुत अधिक बुरे वक्त की कल्पना करके उसमें अपने-आपको रखकर देखें, कि हम कितने अच्छे, कितने बुरे हो सकते हैं?

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 21 अप्रैल 2020

खाली वक्त पर क्या करें, और क्या ना करें, दोनों...

संपादकीय
21 अप्रैल 2020


अभी कुछ महीने पहले तक किसने सोचा था कि एक ऐसा दिन आएगा कि लोगों के पास 40 दिनों से अधिक का वक्त खाली रहेगा, करने को कुछ नहीं रहेगा, घर बैठे लोग काम पर लौटने को तरस जायेंगे। लेकिन ऐसा दिन न सिर्फ आ चुका है बल्कि आधे से अधिक दिन गुजर चुके हैं। अब अगर लॉकडाउन और भी आगे नहीं बढ़ता है तो भी लोग अपनी जिंदगी का इतना बड़ा वक्त बर्बाद कर चुके हैं कि जितना किसी ने कभी सोचा ना होगा। लेकिन लॉकडाउन के ठीक पहले तक कामयाब लोगों का यही रोना रहता था कि उनके पास वक्त नहीं है। अब जब वक्त ही वक्त है तो क्या कर ले रहे हैं?

अभी भी दस दिन तो बाकी हैं ही, अगर चाहें, तो अपने पास बिना पढ़े रखी किताबें पढ़ सकते हैं, या दोस्त आपस में अपने पास की किताबों के नाम बाँट सकते हैं। एक-दूसरे  से लेकर पढ़ सकते हैं। एक दूसरे को फूहड़ लतीफों और पोर्नो से अलग कुछ अच्छे लेख, इंटरव्यू के लिंक भी भेज सकते हैं। बहुत से लोगों के पास वाईफाई है, वे चुनिन्दा फिल्में देख सकते हैं। इंटरनेट से दुनिया के महान लोगों के व्याख्यान सुन सकते हैं। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि बुजुर्ग कह गए हैं कि खाली दिमाग शैतान का घर। जो मकान खंडहर हो जाते हैं, वहां मुजरिम अड्डा बना लेते हैं। इसलिए अपने वक्त का अच्छा इस्तेमाल करना मकसद चाहे ना हो, कम से कम उसका बुरा इस्तेमाल ना हो जाये यह ख्याल तो रख लेना चाहिए। जो लोग कुछ लिख पाते हैं, उनको अपनी आत्मकथा लिखना शुरू करना चाहिए, फिर चाहे वह कतरा-कतरा ही क्यों ना हो। छत्तीसगढ़ के एक बुजुर्ग कारोबारी हैं जो फेसबुक पर सक्रिय भी हैं। वे अपनी आत्मकथा के अंश लिखकर पोस्ट करते रहते हैं, लोगों की प्रतिक्रिया भी मिलती रहती है, और लिखने का काम भी निपटते रहता है। कारोबारी फायदा यह है कि अच्छे लिखे के खरीददार भी तैयार होते चल रहे हैं! जब किताब छापेंगे खरीददार इंतजार करते मिलेंगे!

यह वक्त लोगों को पुराने कागजात छांटने के लिए भी अच्छा मिला है, और कागजात में से फिजूल को निकलकर फेंकने का भी। घर के फालतू सामान, बेकार के कपड़े, जूते, बैग निकालने का भी अच्छा मौका है। अपना बोझ कम हो, औरों की जरूरत पूरी हो, और दूसरों की इन सामानों की जरूरत के लिए धरती पर बोझ बढऩे से बचे। जिन किताबों को दुबारा ना पढऩा हो, उन्हें दूसरों को देने के त्याग के बारे में भी सोचना चाहिए ताकि किताब छपने में जिस पेड़ की जिंदगी गई, उसके बलिदान का बेहतर, अधिक, इस्तेमाल भी हो जाये। बच्चे बड़ों का मोह छुड़वाएं, बड़े बच्चों का। लॉकडाउन खत्म होने तक घर का कबाड़ कम हो, बांटने के लिए लॉकडाउन खुले के दिन दूसरों के काम आ सकें इसकी तैयारी करके रखना चाहिए। 

जिंदगी में जब थोपा हुआ खाली वक्त छप्पर फाड़कर आया है, ऐसे में यह सावधानी भी बरतनी चाहिए कि इसका बुरा इस्तेमाल ना हो जाये। ठलहा बैठे लोग किसी ना किसी की बुराई करने में जुट जाते हैं, व्हाट्सएप्प पर किसी के बारे में बुरा भेजने लगते हैं, फेसबुक-ट्विटर पर नफरत, हिंसा, और गंदगी फैलाने लगते हैं। याद रखें कि सोशल मीडिया या मैसेंजर पर एक बार का लिखा हमेशा के लिए दर्ज हो जाता है। कर्नाटक के एक नौजवान भाजपा सांसद ने बरसों पहले खाड़ी के देशों की महिलाओं की सेक्स लाइफ के बारे में गंदी बातें लिखी थीं, वे आज सामने आकर उनका मुंह चिढ़ा रही हैं। आज के खाली वक्त में ऐसा कुछ ना करें कि आपका परिवार बाकी जिंदगी आपकी वजह से शर्मिंदगी झेले, जेल में टिफिन लेकर आये। आज का यह अंतहीन खाली वक्त बहुत अच्छी संभावनाओं और बहुत बुरी आशंकाओं, दोनों को लेकर आया है। जिंदगी में दुबारा शायद इतना टोकरा भरकर वक्त ना मिले, पिछली बार ऐसा वक्त 102 बरस पहले आया था, इसलिए सोच-समझकर इसका अच्छा इस्तेमाल करें, और अच्छा ही इस्तेमाल करें। शुभकामनायें। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 20 अप्रैल 2020

बोए पेड़ बबूल के तो आम कहाँ से होय?

संपादकीय
20 अप्रैल 2020


महाराष्ट्र में एक गांव में भीड़ ने वहां से गुजरते हुए तीन लोगों को पीट-पीटकर मार डाला। कार से जाते हुए इन लोगों पर पहले पत्थरों से हमला भी किया गया। ऐसा कहा जा रहा है कि उस इलाके में बाहर से आने वाले लोगों को लेकर कई तरह की अफवाहें चल रही थीं। देश के लॉकडाउन के बीच यह कार वहां पहुँची आगे जाने के लिए, लेकिन बच्चा-चोरों के लेकर किडनी-चोरों तक, कई किस्म की अफवाहें थीं। भीड़ ने तीनों कार सवारों को मार डाला। बाद में सामने आया कि इनमें से दो साधू थे। गांव के 100 से अधिक लोग गिरफ्तार हो चुके हैं। जाहिर है कि हिन्दुओं में से बहुतों की भावनाएं बहुत आहत भी हुई होंगी। सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े हिंदूवादी नेता देश के बाकी लोगों पर हमला बोल रहे हैं कि जो लोग मुस्लिमों की भीड़-हत्या पर विरोध करते थे वे आज चुप क्यों हैं ? उनका सवाल सही है, और उसका एक बड़ा छोटा सा जवाब भी सही है, कि मुस्लिमों की भीड़त्या के पीछे हिन्दू हमलावर थे, और इस बार हिन्दू साधुओं की भीड़त्या के पीछे हिन्दू ही हैं। अब इसमें किसी साम्प्रदायिक हमले की बात तो है नहीं, इसलिए देश के बाकी लोग इस पर बोलें तो क्या बोलें ? बहुत खराब हिंसा हुई है, पुलिस ने सबको गिरफ्तार कर लिया है, 114 लोगों को। 

आज दिक्कत यह हो गई कि सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने के 'राष्ट्रधर्मÓ में लगे हुए लाखों लोगों को इस भीड़त्या के साथ पहले के मुस्लिमों की भीड़त्या के नाम गिनाकर एक बार फिर हिन्दू-मुस्लिम नफरत भड़काने का धंधा मिल गया है। हिन्दू धर्म पर इसे हमला बताते हुए पोस्ट करते हुए इसकी तुलना मुस्लिमों की भीड़त्या से इस तरह हो रही है कि मानो इस बार मारने वाले मुस्लिम थे। इस बात को बड़ी धूर्तता से छुपा लिया जा रहा है कि मारने वाले भी हिन्दू थे। असत्य बोले बिना खालिस अर्धसत्य से यह धारणा बनाई जा रही है कि इस बार भीड़ ने हिन्दू साधुओं को मारा तो ये लोग चुप हैं जो कि उस वक्त मुस्मिल की भीड़त्या पर इतना बोल रहे थे। यह चालबाजी, यह धूर्तता मासूम नहीं है, ठीक उसी तरह जिस तरह कोई भी सांप्रदायिक बात मासूम नहीं होती। ऐसे लोग यह भी मानकर चलते हैं कि उनकी नफरत के ग्राहक परले दर्जे के बेवकूफ हैं जो कि इस जालसाजी को समझ नहीं पाएंगे। 

इस देश में भीड़ को हत्या का हक देने की शुरुआत हाल के बरसों में हुई। दर्जनों जगहों पर कहीं दलितों को मारा गया तो कहीं मुस्लिमों को। लेकिन मारने वाले बिना किसी अपवाद के हिन्दू रहे, और बाद में उनकी हिमायत में बड़े-बड़े बयान भी बड़े बड़े लोगों ने दिए। जम्मू में जिस मुस्लिम खानाबदोश बच्ची से मंदिर में पुजारी से लेकर पुलिस तक दस हिन्दू लोगों ने बलात्कार करके उसे मार डाला, उन मुजरिमों को बचाने के लिए जम्मू-कश्मीर के हिन्दू भाजपाई मंत्री तक सड़कों पर उतरे, तिरंगे झंडे लिए हुए जुलूस निकाले गए। जिस देश में भीड़ के राज का इतना हिंसक सिलसिला शुरू किया गया, बढ़ाया गया, बचाया गया, उसके बारे में हमने बार-बार लिखा था कि मौके पर किया गया भीड़ का इंसाफ तभी तक सुहायेगा जब तक भीड़ के बीच कोई अपना ना फंसा हो। और वह दिन आ ही गया। जब देश में भीड़त्या की परंपरा शुरू कर दी गयी तो फिर एक न एक दिन यह तो होना ही था। आज भी नफरत के सौदागरों को यह समझ नहीं पड़ रहा है कि यह मौका मुस्लिमों के खिलाफ नफरत फैलाने का नहीं है। हिन्दू मारे, हिन्दू मरे, इसमें मुस्लिम क्या करे?

आज जो लोग देश की धर्मनिरपेक्ष ताकतों से रोने-पीटने को कह रहे हैं, उनको समझना चाहिए कि धर्मनिरपेक्ष ताकतें ही इतने बरसों से समझा रही थीं कि नफरत फैलाना बंद करो वरना किसी दिन यह आग दूसरे धर्मों को भी जला देगी, कातिलों के धर्मों को भी जला देगी, और महाराष्ट्र में अभी ठीक वही हुआ। देश में भीड़त्या की संस्कृति को भारतीय संस्कृति का दर्जा दिला देने वालों को अब भी समझ लेना चाहिए, वरना अगली भीड़त्या उनके घरवालों की भी हो सकती है, उन्हीं के धर्म वालों के हाथों।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 19 अप्रैल 2020

कदम-कदम पर मुल्क में हो गए हैं दो किस्म के कानून

संपादकीय
19 अप्रैल 2020


सोच छुपती नहीं है। कल ही इसी जगह हमने लिखा था कि किस तरह देश में करोड़ों गरीबों को बेघर, बेसहारा, बेरोजगार छोड़कर भाजपा के बड़े-बड़े नेता अपने राज्यों में ले गए। नरसिम्हा राव नाम के भाजपा के बड़े नेता-सांसद उत्तर भारत में फंसे अपने तीर्थ यात्रियों को अपने आंध्र-तेलंगाना ले गए, उत्तरप्रदेश से योगी अपने प्रदेश के बच्चों को राजस्थान के कोटा से महंगी कोचिंग के बीच से निकलकर ले गए, और सबसे पहले तो उत्तराखंड में फंसे गुजरात के तीर्थयात्रियों को गुजरात भेजा गया था। गरीब और अमीर के बीच एक सरकारी खाई है। दूसरे देशों में बसे संपन्न हिन्दुस्तानियों के लिए मुफ्त का हवाई जहाज, और देश के मेहनतकश मजूरों के लिए सड़कों पर भूखे पेट पर लाठियां !

अब मानो वही काफी नहीं था, देश की छोटी-बड़ी दूकानें लॉकडाउन में बंद ही रहेंगी, लेकिन लोग जरूरी सामानों की ऑनलाइन खरीदी कर सकेंगे। कल तो मोदी सरकार का हुक्म ऑनलाइन सब कुछ खरीदने की छूट वाला था, भारी विरोध के बाद अब ऑनलाइन खरीदी सिर्फ जरूरी चीजों की हो सकेगी। लेकिन मजदूर किसके सामने विरोध करे ? उसके पास तो चैम्बर ऑफ कॉमर्स या कैट जैसी कोई संस्था है नहीं, इसलिए उसे भूख खत्म करने का सामान ऑनलाइन ही बुलाना होगा, शायद रोजगार भी ऑनलाइन आ जायेगा। मजदूर की औकात आज सिर्फ जहर खरीदने जितनी रह गई है। 

देश के भीतर सम्पन्नता के आधार पर भेद-भाव बढ़ते ही चल रहा है। कर्नाटक में भूतपूर्व प्रधानमंत्री और भूतपूर्व मुख्यमंत्री के परिवार की शादी तमाम नियमों को तोड़कर हुई, उसमें भाजपा के मौजूदा मुख्यमंत्री भी शरीक हुए, और भीड़ भरी तस्वीरों के बाद भी कह दिया कि इस मुद्दे पर किसी बात की जरूरत नहीं है। उधर गुजरात के एक मंदिर में हुई शादी में पुलिस ने दूल्हा-दुल्हन, परिवार, पंडितों, 14 लोगों को गिरफ्तार कर लिया, क्योंकि वे मामूली लोग थे। पहले लॉकडाउन की वजह से एक बार शादी आगे बढ़ी थी, फिर लॉकडाउन बढ़ गया तो थककर मंदिर में शादी कर रहे थे। 

उत्तर भारत की एक तस्वीर है कि एक बूढ़ा रिक्शा चला रहा है, और पुलिस के सामने गिड़गिड़ा रहा है कि उसके चक्के की हवा ना खोलें, वह भूख से मर जायेगा। अनगिनत शहरों के वीडियो हैं कि किस तरह पुलिस और बाकी अफसर सब्जी वालों के ठेले पलट रहे हैं, लात मारकर सब्जियां गिरा रहे हैं। दूसरी तरफ महाराष्ट्र सरकार की खबर है कि एक कुख्यात खरबपति कारोबारी के कुनबे के 32 लोगों को महाराष्ट्र के एक हिल स्टेशन के अपने रिसोर्ट तक जाने के लिए एक आईपीएस अफसर इजाजत देता है, और खुद सरकार को अफसर के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ती है। इसी महाराष्ट्र में सब्जी वाले पुलिस की लातें खा रहे हैं, सब्जी गँवा रहे हैं। किसी कार वाले को पीटने की एक भी तस्वीर किसी ने देखी है?

इस देश में इसके पहले गरीब की ऐसी मौत थी? 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 18 अप्रैल 2020

जिसको ईश्वर ने ही धिक्कार रखा है, उस बेघर मजदूर को सरकार भी धिक्कारे तो उसमें हैरानी कैसी?

संपादकीय
18 अप्रैल 2020


पहले गुजरात के तीर्थयात्रियों की खबर आई थी, कि उत्तराखंड के हरिद्वार में फंसे 1800 तीर्थयात्रियों को गुजरात भेजने के लिए केंद्रीय गृहमंत्री ने राज्य के भाजपा-मुख्यमंत्री को फोन किया, और वहां से आरामदेह बसों में लोगों को वापिस गुजरात भेजा गया। फिर एक खबर आई कि दक्षिण के एक भाजपा संसद की दखल से दक्षिण के हजारों तीर्थयात्रियों को उत्तर भारत से वापिस रवाना किया गया। फिर कल खबर आई कि राजस्थान के कोटा में मंहगी कोचिंग ले रहे उत्तरप्रदेश के 3000  छात्रों को वापिस लेने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बसें भेजी हैं। अब आज की खबर है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने केंद्र सरकार से इजाजत मांगी है कि इस राज्य के कोटा में पढ़ रहे छात्रों को वापिस लाने की छूट दी जाए। इस बीच खबर आ रही है कि देश के एक प्रमुख वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका लगाई है कि देश भर में फंसे हुए प्रवासी मजदूरों को वापिस उनके गांव पहुंचने का आदेश सरकार  को दिया जाये। 

यह फैसला चाहे किसी राज्य का हो, किसी पार्टी की सरकार का हो, हम इसके सख्त खिलाफ हैं। आज केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने तो करोड़ों मजदूरों की जिंदगी की जिम्मेदारी से पूरी तरह हाथ झाड़ लिए हैं। एक माफी माँगी प्रधानमंत्री ने, और रास्तों में फंसे करोड़ों मजदूरों ने उसे एक वक्त भूनकर खा लिया, माफी से उनका एक वक्त का पेट भर गया। कुछ की भूख कम रही होगी तो दो वक्त का पेट भी भर गया होगा। लेकिन उसके बाद ? तीन हफ्तों के लॉकडाउन के बाद फिर तीन हफ्तों का अगला लॉकडाउन! एक माफी को कोई कितने दिन तक खाये? और फिर मानो माफी की सब्जी में मिर्च और नमक डालने की जरूरत थी, राज्य अपने-अपने इलाकों के सम्पन्न लोगों को निकालकर ले जा रहे हैं! योगी आदित्यनाथ कोटा में महंगी कोचिंग ले रहे बच्चों को निकालकर ला रहे हैं, जो कि वहां पर हॉस्टलों में हैं, या किराए के मकानों में हैं, जिनके पास खाने के पैसे हैं, जिनके पास एटीएम कार्ड हैं, फोन हैं, रहने की जगह है! और जो मजदूर राज्यों की नाकामी के चलते दूसरे राज्यों में काम पर जाने को मजबूर होते हैं, उनके लिए क्या? उनके लिए धिक्कार-दुत्कार और खुले आसमान तले भूखी मौत? ऐसी भूखी मौत की बद्दुआ तो जिसको लगनी होगी लगेगी ही, लेकिन मौत से पहले भी पल-पल इनकी बद्दुआ किसी न किसी को लग ही रही होगी। 

हमारा तो मानना है कि सम्पन्नता के पैमानों पर इतने ऊपर के लोगों को सरकारी साधनों, और जांच-इलाज की प्राथमिकता देना एक जुर्म है। जिस मोदी सरकार ने दूसरे देशों में बसे हिन्दुस्तानियों को देश लाने के लिए हवाई जहाज भेजे, उसने देसी मजदूरों को आस-पास के लोगों की भीख पर जि़ंदा रहने को मजबूर करके छोड़ दिया? आज करोड़ों मजदूर देश भर में जगह जगह फंसे हैं, उनके साथ औरत-बच्चे भी हैं, और जरा दूरी पर खड़ी टकटकी लगाए देखती मौत है। खुद छत्तीसगढ़ सरकार के रोज के जारी किए हुए आंकड़े बता रहे हैं कि किस राज्य में कितने हजार लोगों को छत्तीसगढ़ सरकार वहां अनाज दिलवा रही है, मदद कर रही है। ऐसे बेघर गरीब लोगों की गिनती लाखों में होगी। लेकिन जब इनको लाने के कोई इंतजाम नहीं हैं, तो फिर राजस्थान कोटा के कमरों में महफूज़ बच्चों को लाने की मशक्कत क्यों? हैरानी यह है कि जिस प्रशांत भूषण को चुनाव नहीं लडऩा है वह तो गरीबों की बात कर रहे हैं, और जो नेता आम, गरीब जनता के वोटों से चुनाव जीतते हैं, वे संपन्न तीर्थयात्रियों की, महंगी कोचिंग के बच्चों की फिक्र कर रहे हैं। क्या चुनावी-वोटों के लिए भी अब गरीब वोटों की दरकार नहीं रह गई है? क्या कोई प्रवासी मजदूर वोट के दिन भी दूसरे राज्य में ही मजदूरी करते रहते हैं ? 

आज देश में वैसे भी संपन्न और विपन्न, घरवालों और बेघर के बीच सामाजिक दूरी हो चुकी है। कोरोना के पहले भी, और कोरोना के बाद तो और भी अधिक। अब लोग खुद कोरोनाग्रस्त रहते हुए अपने नौकरों को पुलिस के हवाले कर रहे हैं। देश की किसी सरकार को यह हक भी नहीं है कि अपने सीमित साधन-सुविधाओं का इस्तेमाल बेबसों को किनारे धकियाकर सम्पन्नों को बचाने पर लगाए। लोगों को वापिस लाने के बाद उनकी मेडिकल जांच और इलाज की भी तो जिम्मेदारी आएगी, उनको क्वारंटाइन सेंटरों में रखने की बात भी आएगी। क्या सब पर सम्पन्नों का ही हक रहेगा? देश में आरक्षण के विरोधी 'कोटा' को गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं, अब सरकारें एक सम्पन्नता-कोटा लागू कर रही हैं !

जिस उत्तरप्रदेश की 3सौ बसों की कोटा जाने की तस्वीरें कल से तैर रही हैं, उसी उत्तरप्रदेश के बगल के बिहार के एनडीए मुख्यमंत्री, और भाजपा के भागीदार नीतीश कुमार का एक बयान अभी सामने आया है जिसमें उन्होंने कहा- 'कोटा में पढऩे वाले छात्र संपन्न परिवार के आते हैं अधिकतर अभिभावक अपने बच्चों के साथ रहते हैं। फिर उन्हें क्या दिक्कत है? जो गरीब अपने परिवार से दूर बिहार के बाहर हैं, फिर तो उन्हें भी बुलाना चाहिए।'

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 17 अप्रैल 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 17 अप्रैल 2020

जरूरी चीजों के बाजारों पर गैरजरूरी रोक से पैदा खतरे

संपादकीय
17 अप्रैल 2020


पूरे हिंदुस्तान में लॉकडाउन का अभी आधा वक्त गुजरा है और उन लोगों को भी दिक्कतें होने लगी हैं जिनके सर पर छत है, और घर पर महीने-पखवाड़े का खाना है। इन लोगों के पास अगले कुछ या कई महीनों के लिए जिंदगी की गारंटी भी है। हम उन लोगों के बारे में तो इसी जगह लगातार लिखते आ रहे हैं जो बेघर हैं, भूखे हैं, प्रदेशों की सरहदों पर अटके हुए हैं, सामने अगले खाने की भी कोई गारंटी नहीं है। कल मुंबई के एक कमरे में रह रहे बिहार के दर्जनों मजदूरों का एक वीडियो आया है जिसमें वे बता रहे हैं कि किस तरह बिना खाए हुए वे एक-एक कमरे में 50 -50 लोग जी रहे हैं, और कोरोना जैसे संक्रमण से बचने का शारीरिक दूरी का कोई रास्ता ऐसे में उनके पास नहीं है। लेकिन इनके बारे में कल और आगे फिर से, आज हम उन शहरों के बारे में बात करना चाहते हैं जहां की आबादी के पास खरीदने-खाने को है, और जिनकी भीड़, या लंबी कतारें दुकानों पर लग रही हैं। 

पिछले दिनों में छत्तीसगढ़ के शहरों में कई किस्म के प्रयोग देखे जा रहे हैं। जिले के अफसर तय करते हैं कि भीड़ लगने से कैसे रोका जाए ताकि कोरोना को शारीरिक संपर्कों से सफर करने ना मिले। इसके लिए सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली तरकीब दुकानों को कुछ ही घंटों के लिए खोलना है। राजधानी रायपुर में अभी तीन दिनों का एक अघोषित कफ्र्यू सा कहा जा रहा है, वह चल रहा है। सड़कों पर रोका जा रहा है, दुकानों, और सुपरबाजारों पर लोग बीते कल टूट पड़े क्योंकि तीन दिन सब बंद रहने की मुनादी की गई थी। आज जिलों में तैनात अफसरों ने कभी किसी महामारी के दौरान इंतजाम देखा नहीं है क्योंकि ऐसी जरूरत वाली महामारी सौ बरस पहले आई थी। अफसर इसे कफ्र्यू की भाषा में देख रहे हैं, और कफ्र्यू की तरह लागू कर रहे हैं। नतीजा यह है कि गिनी-चुनी दुकानों के गिने-चुने घंटों में लोग टूटे पड़ रहे हैं। इस पूरी मशक्कत का पूरा मकसद ही खत्म हो जा रहा है। कफ्र्यू की जरूरत आम तौर पर किसी सांप्रदायिक दंगे के वक्त आती है, जब पुलिस को खतरा लगता है कि लोग घरों के बाहर निकलते ही हिंसा करेंगे। अभी तो ऐसा कोई खतरा है नहीं। अभी तो जरूरी सामानों के सारे बाजारों को एक साथ खोल दिया जाये तो भीड़ ख़त्म हो जाएगी। आज खतरा भीड़ का है जो कि पुलिस दुकानों पर, सब्जी बाजारों पर नहीं रोक पा रही है। शहर में गिने-चुने सब्जी बाजारों को इजाजत देने का मतलब ही भीड़ इक_ी होने देना है। शहर के सौ-दो सौ स्कूल-कॉलेज के अहातों में सब्जी बाजार की छूट दे दी जाये तो सारी धक्का-मुक्की खत्म हो जाये। 

दिक्कत यह है कि जिसका जो हुनर होता है, उसे उसी में इलाज दिखता है। पुलिस और प्रशासन को प्रतिबंध, रोक, बलप्रयोग ही समझ पड़ता है, इसलिए वे किसी भी दिक्कत में उसी का इस्तेमाल करते हैं। और विकसित देशों में म्युनिसिपल इन बातों को तय करती है, तो हमारे इधर के राज्यों में अधिकतर शहरों में म्युनिसिपल की दिलचस्पी महज कंस्ट्रक्शन और खरीदी में रहती है। नतीजा यह है कि किसी सांप्रदायिक दंगे वे वक्त के इंतजाम को महामारी की नौबत में लागू किया जा रहा है। पिछले सौ  बरस में कभी किसी महामारी के इंतजाम में रोक-टोक लगी नहीं थी, कम से कम हिंदुस्तान के इस इलाके में। 

अफसरों को कम से कम रोक-टोक से रोज की जिंदगी चलने देनी चाहिए, खासकर जिन बातों के लिए भीड़ लग रही है, उन बातों पर से रोक तुरंत हटा देनी चाहिए। बड़ी अजीब बात है कि लोगों को किराने के लिए जूझना पड़ रहा है, लेकिन सस्ती-महंगी, हर किस्म की शराब आसानी से मिल रही है। बड़ी-बड़ी होटलों के वीडियो हवा में तैर रहे हैं कि किस तरह लोग जा रहे हैं और दारू खरीद रहे हैं। प्रशासन और पुलिस के अफसरों को शहरी बसाहट के जानकार लोगों से राय लेकर बाजार का इंतजाम करना चाहिए, क्योंकि वहीं पर हुई गलती आज बीमारी फैला सकती है। अभी लॉकडाउन पता नहीं और कितने हफ्ते चले, लेकिन जरूरी चीजों के बाजार पर गैरजरूरी रोक से नुकसान छोड़ कुछ नहीं हो रहा। 
(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 16 अप्रैल 2020

जिनको बचाने जा रहे, वे ही पथराव कर रहे ! सबसे कड़ी सजा मिले

संपादकीय
16 अप्रैल 2020


उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद में कल जब सरकारी डॉक्टर और पुलिस के लोग एक मुस्लिम बस्ती में कोरोनाग्रस्त लोगों के करीबी लोगों को लेने गए तो उन पर जमकर पथराव हुआ। जाहिर तौर पर पथराव उन्हीं मुस्लिम बस्तियों के उन्हीं मुस्लिम लोगों ने किया। अभी कुछ दिन पहले एमपी के इंदौर में भी ऐसा ही हुआ था। देश भर में मुस्लिम ही कोरोना से सबसे बुरी तरह प्रभावित मिल रहे हैं, और उन्हीं के बीच के बाकी लोगों को खुद उन्हीं के भले के लिए भी जांच के दायरे में लाना ही पड़ा है। लेकिन मुस्लिमों का एक तबका ऐसा है जो आज भी मानकर चल रहा है कि मारना और बचाना ऊपरवाले के हाथ होता है, और मरने के लिए मस्जिद सबसे अच्छी जगह होती है। उनके इस भरोसे के साथ दिक्कत महज यह है कि दुनिया के पास ऐसा कोई टापू नहीं है जहाँ ले जाकर ऐसे आस्थावान लोगों को छोड़ा जा सके कि वे बचें तो कुछ बरस बाद वापिस लाए जाऐंगे। कोरोना जैसे खतरे के सामने दुनिया एक गांव ही रह गया है, और किसी एक धर्म के लोग, किसी देश के लोग जिद करके खुद तो खत्म हो सकते हैं, लेकिन वे साथ-साथ दूसरों को भी खत्म करके जाएंगे। इसलिए आज प्रदेशों को, देशों को अपने सबसे सख्त कानूनों का इस्तेमाल करके जांच-इलाज का विरोध करने वालों पर कार्रवाई करनी चाहिए, साथ ही हमलावर लोगों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई ठीक है, जरूरी है। 

हिंदुस्तान में मुस्लिमों के साथ दिक्कत यह है कि उनमें से एक हिस्सा धर्म को न सिर्फ कानून से ऊपर मानकर चलता है, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारियों से अपने को आजाद भी मानता है। यह उसी किस्म का हिस्सा है जैसे दूसरे धर्मों के कट्टर और धर्मांध लोगों के हैं, जो अपने धर्मों को कानून से ऊपर मानते हैं। दिल्ली में तब्लीगी जमात की बैठक, मरकज, से कोरोना फैलने का जो सिलसिला शुरू हुआ है, वह थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। कुछ धर्मांध मुल्लाओं के मुजरिमाना-पागलपन, और केंद्र सरकार की लापरवाही ने मिलकर दिल्ली में कोरोना का पोल्ट्री फॉर्म ही बना दिया। हजारों देशी-विदेशी लोग हफ्तों तक कोरोना का खतरा शुरू होने के बाद भी जमघट लगाए रहे, और केंद्र सरकार जो कि दिल्ली में पुलिस और खुफिया विभाग चलाती है, उसने इस जाहिल जमघट को तितिर-बितिर नहीं किया। दिल्ली की केजरीवाल सरकार की भी इसमें थोड़ी सी जिम्मेदारी बनती दिखती है कि उसके जिला प्रशासन ने वक्त रहते इस खतरे को नहीं आंका, और इस जमघट को खत्म नहीं करवाया। नतीजा यह निकला है कि आज देश में बाकी धर्मों के नफरती, हर मुस्लिम को  जमाती मान रहे हैं, उनके खिलाफ झूठ फैला रहे हैं, और इस भड़काई जा रही आग में पेट्रोल डालने का काम कुछ और मुस्लिम पत्थर चलाकर कर रहे हैं। देश में वैसे भी कोरोना के स्वागत में साम्प्रदायिकता कालीन की तरह बिछी हुई थी, उस पर कुछ मुल्लाओं ने अपनी धर्मान्धता और बिखेर दी। नतीजा यह हुआ कि तब्लीगी जमात ने देश के मुस्लिमों का इतना बड़ा नुकसान कर दिया, जितना कि  6 दिसंबर 1992 को भी नहीं हुआ था। रही-सही कसर अब वे मुस्लिम कर रहे हैं जो कि अपनी बस्ती में अपने लिए आए हुए डॉक्टरों और पुलिस वालों पर पथराव कर रहे हैं। ये पत्थर पत्थरयुग की सोच का नतीजा है जो कि अभी तक ज्यों की त्यों चली आ रही है। 

आज हिंदुस्तान में पत्थरबाज, जमाती, और जाहिल मुस्लिमों के तबके बाकी तमाम मुस्लिमों के लिए जिंदगी का सबसे बड़ा ख़तरा खड़ा कर रहे हैं। यह मौका हिंदुस्तान में हर किसी के लिए यह भी सोचने का है कि लोकतंत्र के भीतर धर्म या मजहब, देश के कानून के साथ किस-किस किस्म के टकराव खड़े करते हैं। फिलहाल हिंसा करने वाले लोगों को सबसे कड़े कानूनों के तहत सबसे कड़ी सजा दिलवानी चाहिए। लोकतंत्र में किसी भी धर्म के लोगों को अराजक कबीलाई सोच की हिंसा करने की छूट नहीं दी जा सकती। मुस्लिमों के बीच से कुछ मुस्लिमों की तरफ से भी इस हिंसा का जमकर विरोध हो रहा है, सलमान खान का एक वीडियो भी सामने आया है जिसे सभी को देखने की जरूरत है। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 15 अप्रैल 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 15 अप्रैल 2020

जबरा मारे भी और रोने भी ना दे..!

संपादकीय
15 अप्रैल 2020


कल मुंबई में कुछ तो अफवाह उड़ी, और कुछ एक टीवी समाचार चैनल ने खबर प्रसारित कर दी कि वहां के एक स्टेशन से उत्तर भारत जाने के लिए ट्रेन जाने वाली हैं। नतीजा यह हुआ कि कई हजार लोग वहां पहुँच गए। इसे लेकर केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार के बीच बयानबाजी चल रही है। कुछ समाचार चैनलों को अपनी भूख का सामान मिल गया कि मजदूरों के पीछे मस्जिद दिख रही है। अब अगर मुंबई के इस स्टेशन के पास पहले से मस्जिद है, तो पूरे महानगर से वहां पहुँचने वाले हजारों मजदूर क्या पहले उसे हटाएँ, और फिर ट्रेन की तरफ जाएँ ? इसीलिए कहा गया था कि जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। कुछ को भूखे मजदूर दिखे कि उनके पास अगले 3 हफ्ते और जिंदा रहने का इंतजाम नहीं है, कुछ को मजदूरों के पीछे खड़ी मस्जिद दिखी। आज भी हिंदुस्तान का मीडिया इस पर बंटा हुआ है कि आखिर यह किसकी साजिश थी कि इतने हजार मजदूर स्टेशन पहुँच गए। आज उत्तरप्रदेश में भी यह मांग उठ रही है कि जो भारत सरकार दूसरे देशों तक प्लेन भेजकर लोगों को मुफ्त में लेकर आई है, वह सरकार ट्रेन चलाकर भूखे गरीबों को उनके इलाकों तक क्यों नहीं पहुंचा रही?

चूँकि यह मामला मुंबई का था इसलिए खबरों में खूब आया, मीडिया के हजारों कैमरे मुंबई में हैं, और वहां की हर बात, दिल्ली की हर बात की तरह, बड़ी खबर बनती है। लेकिन देश भर में जगह-जगह गरीब फंसे हुए हैं, क्योंकि लॉकडाउन-1 जब हुआ, तो प्रधानमंत्री की मुनादी के बाद कुल 3 -4 घंटे ही देश खुला हुआ था। देश ऐसी सच्ची कहानियों से भरा हुआ है कि किस तरह लोग सैकड़ों, हजार-हजार किलोमीटर चलकर अपने गाँव पहुँच रहे हैं, रास्तों में फंसे हुए हैं। रोज कमाने-खाने वाले लोग महीनों तक मुंबई में किस तरह बिना काम जिंदा रहेंगे? कौन उन्हें उधार देंगे? लेकिन लॉकडाउन-1 में इसका कोई ख्याल नहीं था, और लॉकडाउन-2 में भी इसका कोई जिक्र नहीं है। मामला महज इनके खाने का नहीं है, मामला कोरोना का भी है, इनको हिफाजत से रहने की जगह नहीं मिलेगी तो दहशत में भीड़ की शक्ल में ये कैसे रहेंगे? क्या खाएंगे?

कोरोना के बीच मीडिया के एक हिस्से को हिंदुस्तान की भूख के पीछे मस्जिद दिख रही है, इसलिए कि कई मीडिया के ऐसे लोगों के पेट अब तक तो भरे हुए हैं। जिस दिन इनके पेट खाली होंगे, उस दिन इन्हें मंदिर-मस्जिद की बजाय रोटी दिखने लगेगी। आज देश के बड़े मीडिया से गरीब, बेघर, भूखे मजदूरों की तकलीफ गायब है, आज ताली-थाली, और दिया जलाओ बज रहा है। तीन हफ्ते गुजरने की बाद भी जिनकी रोटी का इंतजाम नहीं हुआ है, जो करोड़ों लोग आज खैरात में पहुँचने वाले फूड पैकेट पर जिंदा हैं, वे सुर्खियों से गायब हैं। देश के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा कोरोना के खिलाफ युद्धोन्माद से भर गया है कि जीतेगा तो मोदी ही। यह नौबत शर्मनाक है, अमानवीय है, हैवानियत से भरी हुई है।  इस देश की सरकार को कोरोना से जीतने के अलावा अपने लोगों की भूख से भी जीतना है। महीने भर से ज्यादा पहले से जिस कोरोना का ख़तरा राहुल गाँधी को दिख रहा था, उस वक्त, वक्त रहते लोगों को गांव पहुँचाने, या शहर में ठीक से ठहरने के इंतजाम से किसने रोका था? जिस देश में आईआईटी और आईआईएम से निकले लोगों को आज अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने वहां की अर्थव्यवस्था जिंदा करने की जिम्मेदारी दी है, उन्हीं संस्थानों के लोगों को हिंदुस्तान के लॉकडाउन की योजना में नहीं लगाना था? 

आज हम कोरोना की मुसीबत के बीच भी इस बात को उठाना जरूरी इसलिए समझ रहे हैं कि जब मोदी का दोस्त ट्रम्प अपने देश को जिंदा रखने हिन्दुस्तानी प्रतिभा को योजना बनाने में शामिल कर चुका है, भारत सरकार में कोई सरकार के भीतर भी ढंग की योजना बनाते नहीं दिख रहे, बाहर की प्रतिभाओं को शामिल करने की बात तो दूर रही। ऐसी नौबत में मुंबई के बेबस मजदूरों पर तोहमत लगाने वाली मीडिया को चार दिन पहले गुजरात में मजदूरनों के जुलूस के बारे में याद रखना था, वहां तो शिवसेना का मुख्यमंत्री नहीं है, वहां तो पीछे मस्जिद नहीं थी, फिर कैसे हजारों मजदूरों ने घर लौटने के लिए सड़क पर जुलूस निकाला? गुजरात सरकार ने 1300 पर तो मुकदमा ही दर्ज किया है। अब मोदी के लॉकडाउन-2 में जब इन मजदूरों के गाँव लौटने के बारे में कुछ नहीं है, तो वे टीवी चैनल की खबर पर भरोसा करके स्टेशन पहुँच गए तो कौन सा गुनाह कर दिया? भारत सरकार को अब रेलवे स्टेशन उन्हीं  जगहों पर बनाना चाहिए जहां आसपास तोहमत के लायक कोई मस्जिद ना हो। 

यह यह देश आज दो किस्म के तबकों में बाँट गया है, एक वह जिसके हाथ में फैसले लेना है, और दूसरा वह जिसे उन फैसलों की मार खाना है। इतिहास इसे भी दर्ज कर रहा है, और मीडिया को भी। जबरा मारे भी और रोने भी ना दे..!

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM