एक अकेला चना कैसे भाड़ फोड़ सकता है, यह भी देखें

संपादकीय
31 मई 2020


एक पुरानी कहावत हिन्दुस्तान में बहुत इस्तेमाल की जाती है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। और जिंदगी की हकीकत यह कहती है कि बहुत सारे भाड़ अकेले चने के फोड़े हुए ही रहते हैं। देश में किसी बड़े सामाजिक आंदोलन को देखें, कई किस्म के अंतरराष्ट्रीय मैडल देखें, या दिल्ली जैसे प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा की परंपरागत सत्ता के बाद केजरीवाल जैसे नए नवेले नेता को देखें, बहुत से ऐसे अकेले लोग रहते हैं जो भाड़ फोड़ पाते हैं। 

जिस मुम्बई में बार-बार मजदूरों की भीड़ रेलवे स्टेशनों पर लग रही थी, जिन्हें मार-मारकर भगाया जा रहा था, उसी मुम्बई में एक फिल्म अभिनेता सोनू सूद जाने कहां से आया, और बेबस मजदूरों की मदद पर उतारू हो गया। न महाराष्ट्र सरकार, और न यूपी-बिहार की सरकार जो कर पा रही थीं, वह इस अकेले आदमी ने कर दिखाया। और यह बात महज एक चेक काटकर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री राहत कोष में भेज देने जैसी नहीं थी। सोनू सूद अपने तन, मन, और धन तीनों के साथ सड़कों पर मौजूद हैं, रात-दिन टेलीफोन और ट्विटर पर मौजूद हैं, और अपने साथियों के साथ मिलकर अपने जेब के पैसों से रात-दिन बसें करवाकर मजदूरों को उनके गांव रवाना कर रहे हैं। यह वक्त महज रूपए-पैसे की मदद का नहीं है, यह वक्त मजदूरों की हौसला अफजाई का भी है, कि उन्हें जिंदा रहने का हक है, उन्हें अपने गांव लौटने का हक है, और सैकड़ों मील पैदल चलते जान देने की जरूरत नहीं है, क्योंकि सोनू सूद अकेले ही हर मजदूर को बस की सीट दिलाने के लिए काफी है। 

आज जब चारों तरफ सरकारों पर निकम्मेपन की तोहमतें लग रही हैं, तो फिल्म उद्योग का एक सफल अभिनेता झुलसाने वाली गर्मी में, कोरोना के खतरे से डरे बिना रात-दिन बसों के बीच, मजदूरों के बीच घूमते दिख रहा है, मजदूरों को बसों में चढ़ाने के बाद खुद भी उस बस में चढ़कर उन्हें लौटकर आने का न्यौता भी दे रहा है, और यह भरोसा भी दिला रहा है कि वे लौटेंगे तब फिर मुलाकात होगी। कहां तो इन मजदूरों को सरकारी हिकारत और पुलिस की लाठियां हासिल थीं, और कहां उन्हें कोई भाई और बहन कहने वाला मिला है, इतना मशहूर अभिनेता एक-एक संदेश और टेलीफोन कॉल का जवाब दे रहा है, और बिना सरकारी मदद के इतना बड़ा इंतजाम कर रहा है। एक-दो और ऐसे अभिनेता हुए हैं, सलमान खान, और आमिर खान ने फंसे हुए मजदूरों के लिए राशन का इंतजाम किया है, अमिताभ बच्चन ने दस बसों का इंतजाम किया है, स्वरा भास्कर ने तेरह सौ से अधिक मजदूरों के लिए बस का इंतजाम किया है, लेकिन इनमें से अधिकतर के मुकाबले शायद कम कमाने वाले सोनू सूद ने मानो अपने पूरे बैंक खाते को दांव पर लगा दिया है, और हर मजदूर से वादा किया है कि उन्हें उनकी साइकिल या उनके सामान सहित उनके गांव तक भिजवाकर रहेंगे। आज ही की एक दूसरी खबर यह है कि कल केरल के कोच्चि से 167 फंसे हुए मजदूरों को उनके गृहप्रदेश, ओडिशा हवाई जहाज से भिजवाने का काम सोनू सूद ने किया है। 

यह सब उस वक्त हुआ है जब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर यह ये तोहमतें लग चुकी हैं कि वे वहां ऐसी स्थितियां पैदा कर चुके हैं कि मजदूर दिल्ली छोड़कर जाएं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने मजदूरों को वापिस लेने से मना कर चुके थे, लेकिन उन्होंने तो शुरू में कोटा-कोचिंग से बिहारी छात्रों को वापिस लेने से भी मना किया था। मोदी सरकार लगातार इस बात को लेकर राज्यों से लड़ती रही कि मजदूर ट्रेनों का भाड़ा कौन दे। जब सरकार से परे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को यह घोषणा करनी पड़ी कि मजदूरों का किराया कांग्रेस पार्टी देगी। ऐसे माहौल में बिना किसी राजनीतिक दल से जुड़े हुए, बिना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से किसी घरोबे के, सोनू सूद ने जिस अंदाज में अकेले चलकर यह अभियान चलाया है, और चला रहे हैं, वह किसी एक व्यक्ति की इच्छाशक्ति से मिलने वाली कामयाबी की एक सबसे बड़ी मिसाल है। इसी मुम्बई शहर में, इसी फिल्म इंडस्ट्री में सोनू सूद से सौ-सौ गुना अधिक कमाए हुए सैकड़ों लोग होंगे, लेकिन एक-दो ऐसे रहे जिन्होंने प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को चेक दे दिए, एक-दो अभिनेता ऐसे रहे जिन्होंने मजदूरों को राशन भेजा, या कुछ के खाते में नगद रकम भी जमा कराई। लेकिन एक अलग ही अंदाज में सोनू सूद ने न सिर्फ खर्च किया, बल्कि मजदूरों को भाई कहकर, बहन कहकर, लौटने का वायदा लेकर, एक बहुत बड़ा हौसला भी दिया जिसमें वे रास्ते में बेमौत मरने के बजाय गर्व से बस में घर लौट रहे हैं, और बाकी पूरी जिंदगी के लिए उन्हें यह बात  पीढिय़ों तक को बताने के लिए याद रहेगी कि एक फिल्मी सितारे ने उनकी घरवापिसी का इंतजाम किया था। 

यह मिसाल देश के और कुछ लोगों को ऐसा या इससे बड़ा करने का हौसल न दे, तो वैसे सक्षम लोग सिर्फ धिक्कार के हकदार रहेंगे। देश में एक से बढ़कर एक संपन्न लोग हैं, और एक से बढ़कर एक ताकतवर लोग हैं जो एक राजनीतिक सभा के लिए हजारों बसों का जुगाड़ कर लेते हैं। ऐसा कोई भी दूसरा इंसान देश में सामने नहीं आया है जिसने आम मजदूरों के लिए ऐसा कुछ किया हो। अब कई लोगों को यह आशंका लग सकती है कि आगे चलकर सोनू सूद किसी राजनीतिक दल में जाकर मुम्बई से कहीं चुनाव तो नहीं लड़ेंगे? ऐसी आशंकाओं के लिए आज वक्त नहीं है क्योंकि आज जब सड़क किनारे किसी धर्म के लोग खाना बांटते खड़े रहते हैं, तो किसी मजदूर को किसी धर्म से परहेज नहीं होता है। इसी तरह आज की जानलेवा मुसीबत के बीच इतना बड़ा मददगार कल अगर अपनी मर्जी से किसी राजनीतिक दल में भी चले जाता है तो भी आज का उसका योगदान न खत्म होता, न घटता। आज जब चारों तरफ नेताओं और सरकारों, अफसरों और देश के खरबपतियों से करोड़ों मजदूरों को निराशा ही निराशा मिली है, तब एक अकेला इंसान अगर उनमें उम्मीद जगा रहा है, तो देश के बाकी लोगों को अपनी क्षमता और अपने दायरे के तहत खुद को तौलना चाहिए कि वे क्या करने के लायक हैं, और क्या कर रहे हैं?  
(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 31 मई 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 30 मई 2020

बेमिसाल रहे जोगी

संपादकीय
30 मई 2020


छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी का जाना पिछले कुछ दिनों से डॉक्टरों को तय सा लग रहा था, लेकिन फिर भी जाने क्यों ऐसा लगता था कि वे एक बार फिर मौत को पीछे धकेलकर अस्पताल से निकल सकते हैं। जिंदगी में उन्होंने इतनी बार मौत को पीछे धकेला है कि वे अपने नाम के मुताबिक अजीत लगते थे जिन पर मौत जीत नहीं पाई। आज जब अजीत जोगी के पूरे जीवन और पूरे कार्यकाल, इन दोनों पर एक नजर डालें तो लगता है कि आज, इस वक्त जब अजीत जोगी के शव पर बिलासपुर में फूल चढ़ रहे होंगे, तब यह वक्त उनके मूल्यांकन के लिए ठीक नहीं है। कम से कम गुजरने का एक दिन हर किसी को बिना आलोचना के नसीब होना चाहिए, ऐसा बहुत से लोग मानते हैं। लेकिन क्या अजीत जोगी भी आज होते तो क्या यह उम्मीद करते कि लोग उनके तमाम पहलुओं को न देखें, और महज श्रद्धांजलि के विशेषण बोलें? जो जितने बड़े होते हैं, उन्हें उतने ही बेरहम मूल्यांकन के लिए तैयार रहना चाहिए। उनका जीवन इतने अधिक लोगों को प्रभावित कर चुका होता है कि वे समाज के प्रति उतने ही जवाबदेह भी रहते हैं। अजीत जोगी की स्मृतियां बहुत लंबे समय तक छत्तीसगढ़ के साथ रहने वाली है, और वे स्मृतियों में भी इस राज्य के प्रति जवाबदेह तो रहेंगे ही। 

अजीत जोगी एक विचित्र किंतु सत्य किस्म के राजनेता थे, और राजनेता से भी पहले वे कुछ उसी किस्म के अफसर भी थे। सबसे ही वंचित ग्रामीण तबके से आकर जिस तरह से उन्होंने पढ़ाई में अव्वल दर्जा पाया, देश की सबसे अव्वल नौकरी पाई, उस नौकरी की सबसे अव्वल कुर्सी पर बैठे-बैठे ही उन्होंने राज्यसभा जाने का न्यौता पाया, कांग्रेस पार्टी के भीतर उसके बेहतर दिनों में इतना महत्व पाया, और छत्तीसगढ़ नया राज्य बना, तो विधायक न होते हुए भी उन्होंने मुख्यमंत्री का ओहदा पाया। हिन्दुस्तान में ऐसे कितने लोग हो सकते हैं जिन्हें इतना कुछ हासिल होते रहा हो? दूसरी तरफ अजीत जोगी का अतिसक्रिय अफसरी और राजनीतिक कार्यकाल उपलब्धियों जितने ही अप्रिय विवादों से भी घिरा रहा जिसके बारे में राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि वे सारे के सारे गैरजरूरी थे, अवांछित थे, और आम लोगों के पैमानों पर अप्रिय भी थे। लेकिन एक विवाद से उबरने के बाद, दूसरे विवाद में उलझने के बीच जोगी ने कभी ऐसी बातों से परहेज किया हो, वह भी नहीं लगा। अच्छे, और बुरे, सभी तरह के दौर से गुजरते हुए जो एक बात बराबर बनी रही, वह थी उनकी लडऩे की अंतहीन हिम्मत। कभी विरोधियों से लडऩे की, कभी चुनाव में सामने के उम्मीदवार से लडऩे की, कभी पार्टी के भीतर प्रदेश के दूसरे नेताओं से लडऩे की। ऐसा कोई दौर याद नहीं पड़ता जब जोगी किसी न किसी मुकाबले में लगे हुए न रहे हों। जब वे नया राज्य बनने के बाद सन् 2000 में पहले मुख्यमंत्री बने, तो उन्हें कांग्रेस हाईकमान से लेकर प्रदेश में कांग्रेस विधायकों के ठोस बहुमत तक का समर्थन हासिल था। लेकिन ऐसे दौर में भी वे बिना किसी जरूरत के एक दर्जन से अधिक भाजपा विधायकों को दल-बदल करवाकर कांग्रेसमें लेकर आए, एक भाजपा विधायक से सीट खाली करवाकर विधानसभा उपचुनाव जीता। 

जोगी का व्यक्तित्व निराला था। वैसा कोई और नहीं था। हिन्दी का एक टीवी सीरियल आया था, जस्सी जैसी कोई नहीं। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस-भाजपा की राजनीति के पूरे इतिहास में जोगी सरीखा कोई नहीं रहा। वे हर पार्टी के पीढिय़ों के छत्तीसगढ़ी नेताओं के मुकाबले कहीं अधिक खालिस छत्तीसगढ़ी थे, वे किसी भी दूसरे एक अफसर, या एक नेता के मुकाबले इस राज्य को बेहतर जानते थे, वे यहां की संस्कृति, यहां की लोगों की समझ की सबसे अच्छी पहचान भी रखते थे, यह एक अलग बात थी कि लोगों के सांस्कृतिक और राजनीतिक बर्दाश्त को आंकने में उन्होंने कभी-कभी चूक भी की थी। पार्टी छोडऩे में, या नई पार्टी बनाने में, या किसी विवाद में पडऩे में, कोर्ट-कचहरी की निरंतरता में वे लोगों के बड़े या छोटे तबके की सोच को समझते हुए भी उसे कई बार अनदेखा करते रहे। 

कांग्रेस की राजनीति में रहते हुए जोगी को इतना कुछ मिला जितना कि किसी दूसरे नेता को नहीं मिला होगा। लेकिन जोगी कभी उससे संतुष्ट नहीं रहे, वे सबसे अधिक पर भरोसा नहीं करते थे, वे समस्त, संपूर्ण, और एकाधिकार से कम कुछ भी नहीं चाहते थे। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस पार्टी का इलास्टिक खिंचते-खिंचते आखिरकार टूट गया, और जोगी पार्टी से बाहर कर दिए गए। अपने आपको लेकर एक क्षेत्रीय दल बनाने की उनकी कल्पना नाकामयाब रही, और वे हर छोटे-बड़े चुनाव में और किनारे लगते चले गए। पिछले विधानसभा, लोकसभा, और म्युनिसिपल-पंचायत चुनाव के बाद जोगी छत्तीसगढ़ की चुनावी राजनीति में अप्रासंगिक हो गए थे, फिर चाहे वे सपत्नीक विधानसभा पहुंच क्यों न गए हों। 

जोगी ने इतना कुछ पाया, और इतना कुछ खोया, कि उसका हिसाब-किताब करना आसान नहीं है। उनके व्यक्तित्व पर जो भी लिखा जाए, उसके खिलाफ मिसालें ढूंढना किसी के लिए बहुत आसान बात होगी। यहां जो कुछ लिखा जा रहा है, उससे परे भी ऐसी बहुत सी मिसालें होंगी जिससे यहां का मूल्यांकन गलत साबित हो। लेकिन इतनी विविधता से भरा हुआ, सकारात्मकता और नकारात्मकता के बीच इतना अधिक शटल करता हुआ उनका राजनीतिक जीवन हर किसी के लिए सीखने को एक बहुत अच्छा सबक है। सरकारी नौकरी, राजनीति, सार्वजनिक जीवन, और सत्ता में क्या-क्या करना चाहिए, और क्या-क्या नहीं करना चाहिए इसकी जोगी से बड़ी मिसाल छत्तीसगढ़ में और कुछ नहीं हो सकती। 

जोगी के गुजरने के बाद अब उनकी पत्नी, और बेटा-बहू राजनीति में हैं, और उनकी चुनावी परंपरा को आगे भी बढ़ा सकते हैं। जोगी के बिना उनकी पार्टी में जो कुछ भी बाकी बचा है, उसे हम अभी नहीं तौल रहे, लेकिन उनके पारिवारिक और राजनीतिक वारिसों को चाहिए कि वे जोगी की अब तक की कमाई हुई राजनीतिक उपलब्धियों को चाहे आगे न बढ़ा सकें, कम से कम उतना ही बनाए रखें। बहुत से लोगों का यह मानना है कि जोगी के बाद उनकी पार्टी में उतना वजन नहीं रह जाएगा, यह तो आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन यह बात जोगी को चाहने वाले लोग भी चाहेंगे कि उनकी स्मृतियां महत्व न खोएं। करीब दो दशक पहियों की कुर्सी पर जीते हुए भी वे तकरीबन पूरे समय प्रदेश के सबसे अधिक दौरों वाले कांग्रेस नेता बने हुए थे, और लोगों के सुख-दुख में पहुंचने के लिए वे पहियों की कुर्सी और एम्बुलेंस के तकलीफदेह सफर से कभी पीछे नहीं हटे। उनका यह हौसला बेमिसाल था, और उनके सड़क हादसे में आधा बदन खोने के बाद जब भी उनकी चर्चा होती थी तो लोग मानते थे कि उनकी जगह कोई और होता, तो कई बार मर चुका होता। जिंदा रहने और हासिल करने की उनकी अदम्य इच्छा ने उनकी जिंदगी को इतना लंबा चलाया कि वे लोगों के सामने हमेशा एक मिसाल बने रहेंगे। इतने लंबे और इतने सक्रिय व्यक्तित्व को हमारी श्रद्धांजलि।  
(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 26 मई 2020

लॉकडाऊन से निकलते हुए चौकन्ने भी हों, जागरूक भी

संपादकीय
26 मई 2020


अब जब लॉकडाऊन एक हकीकत हो चुका है, और सेहत को लेकर साफ-सफाई की सावधानी अगले कम से कम साल दो साल के लिए एक स्थायी जरूरत हो चुकी है, तो लोगों को न सिर्फ अपनी जिम्मेदारी को पूरा करते हुए अपने, परिवार के, और समाज के प्रति अधिकारों का इस्तेमाल भी करना चाहिए। ऐसी जगह से सामान खरीदी बंद करना चाहिए जहां दुकानदार या फेरीवाले मास्क लगाने से परहेज करते हों। ऐसा करना जरूरी इसलिए भी है कि उन्हें एक चेतावनी मिले, और ऐसा खतरा उठाने वाले लोगों से खरीददारी से बचना अपनी खुद की सेहत के लिए जरूरी है। किसी सार्वजनिक जगह पर जाना हो, और वहां लोग बिना मास्क लापरवाही से दिखें तो अपने नागरिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए तुरंत इस बात का विरोध करना चाहिए टोकना और रोकना चाहिए। आपकी जागरूकता चार और लोगों तक संक्रमण की तरह फैलती है, और बाकी लोग भी जागरूक होते हैं। अब कोई आने वाला वक्त नहीं है, जो खतरा है वह पूरी तरह आ चुका है, और पूरी तरह छा चुका है। इसलिए अगर बचाव के मोड में नहीं आया गया, तो पता नहीं कौन बचेंगे, और कौन नहीं बचेंगे। 

कुछ लोग बचाव की सावधानी भी न बरतें, और इनकी वजह से बाकी लोगों पर दहशत छाने जैसी नौबत आ जाए यह बात ठीक नहीं है। हमारी सामाजिक जिम्मेदारी अपनी खुद की सावधानी तक सीमित नहीं है, वह समाज को सावधान करने की हद तक भी जाती है। यह बात याद रखने की जरूरत है कि सत्ता या दौलत, इनमें से किसी भी किस्म की ताकत वाले लोग लापरवाही अधिक बरतेंगे क्योंकि उन्हें रोकने की ताकत कम लोगों में होगी। लेकिन यहीं पर लोगों के नैतिक मनोबल की बात भी आती है कि अगर आप खुद सावधानी बरत रहे हैं तो दूसरों को रोकने-टोकने की नैतिक ताकत भी आपको मिल जाती है। यह जरूरी इसलिए भी है कि आज के वक्त में कोई भी अकेले सुरक्षित नहीं हैं, या तो सब सुरक्षित हैं, या कोई भी सुरक्षित नहीं हैं। दूसरी बात यह कि हिन्दुस्तान में दो तबकों के लोग ऐसे हैं जो अपनी गलती से नहीं, अपनी ड्यूटी करने की वजह से कोरोना के शिकार हुए। बड़ी संख्या में पुलिस वाले और बड़ी संख्या में नर्स-डॉक्टर जैसे स्वास्थ्य कर्मचारी कोरोना से मारे गए हैं। सोशल मीडिया पर बहुत से बच्चों की तस्वीरें ऐसे पोस्टरों सहित आती हैं जिनमें वे कहते हैं कि उनकी मॉं या उनके पिता लोगों को बचाने के लिए अस्पताल में ड्यूटी पर हैं, या सड़कों पर गश्त कर रहे हैं, वे लोगों को बचाने के लिए बाहर हैं इसलिए लोग उनको बचाने के लिए घर पर रहें। 

जब तक घर पर रहना एक बंदिश था, तब तक तो लोग फिर भी काबू में रह लिए, लेकिन जब से लॉकडाऊन में छूट शुरू हुई है, लोग लापरवाही बरतने लगे हैं, और उन्हें लग रहा है कि पहले जैसा वक्त फिर आ गया है। लोग दिखावे के लिए मास्क को मुंह पर पहनने के बजाय उसे गले में टांगे रखते हैं। कल जब महीनों बाद हिन्दुस्तान में मुसाफिर विमान शुरू हुए, तो एयरपोर्ट पहुंचने वाले मुसाफिर तो चौकन्ने थे, लेकिन अलग-अलग टीवी चैनलों के लिए काम करने वाले रिपोर्टरों का हाल यह था कि वे मास्क हटाकर रिपोर्टिंग कर रहे थे, और उनमें से कई तो मुसाफिरों से बात कर रहे थे जो खुद भी अपना मुंह दिखाने के लिए मास्क हटा रहे थे। हिन्दुस्तान में जिस तरह आमतौर पर लोग हेलमेट को सिर पर धर लेते हैं, उसका बेल्ट नहीं लगाते, उसी तरह लोग मास्क को बदन पर तो टांग ले रहे हैं, लेकिन उससे नाक और मुंह कवर नहीं करते। 

जैसे-जैसे लोगों की आवाजाही देश भर में शुरू हो रही है, और जैसे-जैसे लॉकडाऊन में ढील मिल रही है, मुसाफिर ट्रेन शुरू हो रही हैं, हवाई सेवा शुरू हो रही है, उससे जाहिर है कि कोरोना-संक्रमण का खतरा बढ़ते ही जाएगा। फिर यह बात भी समझने की जरूरत है कि अधिकतर राज्यों ने कोरोना की जांच में सोच-समझकर देर की क्योंकि उनके पास कोरोना मरीजों को भर्ती करने के लिए, या क्वारंटीन की जरूरत होने पर उसके लिए गुंजाइश नहीं थी। पिछले कई हफ्तों में अधिकतर राज्यों ने अपनी इलाज और रखने की क्षमता बढ़ाई है, और अब कम से कम कुछ राज्य जरूरत के लायक जांच शुरू कर रहे हैं। यह भी एक वजह है कि अब छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में रोजाना का कोरोना मरीजों का आंकड़ा इकाई से बढ़कर दहाई पर चले गया है, और दहाई से दर्जनों तक। आज शायद यह आंकड़ा हाफ सेंचुरी लगा ले। अधिकतर राज्यों में जहां कहीं देर से सही, जांच ईमानदारी से हो रही है, जरूरत के लायक हो रही है, वहां पर आंकड़ा इसी तरह बढ़ते चलना है। 

लेकिन सरकार और अस्पताल इनकी एक क्षमता है। दुनिया का सरदार बना बैठा देश अमरीका, और उसकी वित्तीय राजधानी न्यूयार्क का हाल दुनिया के सामने है जहां दुनिया का सबसे महंगा इलाज, सबसे बड़े पैमाने पर उपलब्ध है, लेकिन उस एक शहर में लाशें जितनी बड़ी संख्या में गिरी हैं, उसकी मिसाल और कहीं शायद ही हो। इसलिए यह बात समझ लेना चाहिए कि हिन्दुस्तान जैसे कमजोर स्वास्थ्य ढांचे के देश में अगर हालात बिगड़े, तो सारी बीमारी बेकाबू हो जाएगी, सारी क्षमता नाकाफी हो जाएगी। लॉकडाऊन की वजह से हिन्दुस्तान में और चाहे हजार दिक्कतें हुई हों, कम से कम राज्य सरकारों को इलाज का ढांचा तैयार करने का वक्त मिल गया, और छत्तीसगढ़ ने जिस रफ्तार से इसे जितना मजबूत किया है, उसकी तारीफ करते एम्स-रायपुर के डायरेक्टर भी नहीं थकते। 

सरकारें अपना काम कर रही हैं, और उसमें जो चूक है, जो कमी और खामी है, उसके बारे में लिखने के लिए अब परंपरागत मीडिया से परे सोशल मीडिया भी है। उस पर लिखी जा रही बातों को लेकर सरकारों को अपना काम सुधारने का एक मौका मिलता है, लेकिन आम लोगों को अपने-आपको सुधारने के लिए कोई दूसरे नहीं कहेंगे, उन्हें अपने, परिवार के, और समाज के हित में खुद ही चौकन्नापन सीखना होगा। दूसरी बात यह कि हिन्दुस्तानियों में एक बात को लेकर जबर्दस्त आत्मविश्वास दिखता है कि कोरोना किसी और के लिए होगा, उनके लिए नहीं है। यह आत्मविश्वास किसी काम का नहीं है, क्योंकि जो कोरोना दिखता नहीं है, उसके बारे में कोई मूर्ख ही इतना दुस्साहसी हो सकते हैं। 

अब चूंकि लॉकडाऊन से बाहर निकलकर लोगों को काम-धंधे से भी लगना है, जरूरत पडऩे पर दूसरों से मिलना भी है, इसलिए यह जरूरी है कि लोग अधिक से अधिक सावधानी बरतें, अपनी खुद की जीवनशैली में ऐसा फेरबदल लाएं कि वे सुरक्षित रह सकें, औरों को सुरक्षित रख सकें। जब बात जिंदगी और मौत की है तो दूसरों की चूक से मरने के बजाय यह जरूरी है कि लापरवाह लोगों को टोका जाए, न कि उन्हें अनदेखा किया जाए। यह मामला कुछ वैसा ही है कि आप खुद को सड़क पर अगर गाड़ी सावधानी से चला भी रहे हैं, और सामने से गाड़ी लेकर आने वाले लोग नशे में हैं, तो उन्हें नशा करने से रोकने की सामाजिक जिम्मेदारी सरकार से परे भी लोगों की है। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

खेती की रियायत और मदद से बड़े किसान बाहर हों...

संपादकीय
25 मई 2020


छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और भाजपा के बीच जुबानी जंग चल रही है कि किस-किस नेता को धान की फसल पर सरकार द्वारा पहले घोषित दाम का बकाया अब कितना-कितना मिल रहा है। भाजपा के कई बड़े नेताओं के नाम खबरों में हैं कि उन्हें कितने-कितने लाख रूपए मिले हैं। कांग्रेस नेताओं ने अनौपचारिक रूप से ये नाम जारी किए हैं। और अब यह बात उठ रही है कि सिर्फ भाजपा नेताओं के नाम क्यों सामने आए, कांग्रेस के बड़े नेताओं के नाम सरकारी बहीखाते से निकलकर जनता में क्यों नहीं पहुंचे। राज्य सरकार ने सरकार बनते ही किसानों को धान का समर्थन मूल्य 25 सौ रूपए देने की घोषणा की थी, लेकिन केन्द्र सरकार की आपत्ति के बाद वह भुगतान नहीं किया जा सका, और आज उसी बकाया को राज्य सरकार ने किस्तों में देना शुरू किया है। 

छत्तीसगढ़ में किसानों को मदद एक बड़ा मुद्दा है। चाहे धान का बोनस हो, चाहे रियायती बिजली हो, चाहे कुछ और हो। और इस राज्य में धान अपनी जरूरत से अधिक उगने लगा है, केन्द्र सरकार भी एफसीआई में उतने धान का चावल लेती नहीं है। राज्य ने केन्द्र से इजाजत मांगी है कि उसे अपने अतिरिक्त धान से एथेनाल बनाने की मंजूरी दी जाए। कुल मिलाकर मतलब यह कि यह राज्य धान-सरप्लस प्रदेश है, जरूरत से अधिक धान, सरकार की खरीदने की ताकत से अधिक धान, और देश की राष्ट्रीय जरूरत के नजरिए से भी छत्तीसगढ़ का धान अतिरिक्त है। अब ऐसी अतिरिक्त फसल को कोई बढ़ावा या प्रोत्साहन देने का तो कोई तर्क नहीं हो सकता, जरूरतमंद किसानों की मदद का एक तर्क है जो कि किसी भी जनकल्याणकारी राज्य में की जाती है, और वह जरूरत के हिसाब से ही की जाती है। छत्तीसगढ़ में छोटे किसानों, कम ऊपज वाले किसानों, अधिया किसानों या खेतिहर मजदूरों को मदद तो समझ आती है, लेकिन रईस और बड़े किसानों को कोई मदद न्यायसंगत कैसे हो सकती है? जिस प्रदेश में तकरीबन आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, और एक रूपए किलो चावल की वजह से जिसका पेट भरता है, उस प्रदेश का पैसा उन बड़े किसानों को कैसे दिया जा सकता है जो कि मदद के जरूरतमंद नहीं हैं? ये किसान जरूर हैं, लेकिन ये इतने बड़े हैं कि इनकी खेती अपने आपमें फायदेमंद होती है। राज्य सरकार इनकी ऊपज को केन्द्र के समर्थन मूल्य पर ले ले वहां तक तो ठीक है, लेकिन उसके बाद का जो बकाया भुगतान अभी किया जा रहा है, वह कुछ अटपटा लगता है। 

धान इतना ज्यादा हो रहा है कि यह छत्तीसगढ़ के पर्यावरण को भी प्रभावित कर रहा है, और यहां के भूजल को भी। ऐसे में इस राज्य को अधिक फसल की जरूरत बिल्कुल भी नहीं है, बल्कि छोटे किसानों की खेती पर निर्भरता आर्थिक रूप से सक्षम हो, बस उतनी ही जरूरत है। आज होना यह चाहिए कि बड़े किसानों को एक क्रीमीलेयर की तरह इस अतिरिक्त फायदे से बाहर करना चाहिए। आज सरकार ने एक एकड़ के किसान के इस बकाया-भुगतान की अधिकतम सीमा दस हजार रूपए तय कर दी है। लेकिन जो बड़े किसान हैं उनकी खेती की जमीन को लेकर कोई सीमा नहीं है। जब जनता के खजाने का पैसा किसी रियायत या मदद के रूप में दिया जाता है, तो वह दो वजहों से ही दिया जाना चाहिए, उस काम की जरूरत हो, और उस ऊपज या उत्पादन की भी जरूरत हो। छत्तीसगढ़ में धान के बड़े किसानों को सरकारी रियायत या मदद से एक सीमा के बाद बाहर कर देना चाहिए। हमारा ख्याल है कि दस एकड़ से अधिक के किसान ऐसी रियायत के पात्र नहीं माने जाने चाहिए। 

कांग्रेस और भाजपा के बीच की बयानबाजी के चलते इस पहलू की तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। हो सकता है कि हमारी इस सोच में कोई व्यवहारिक कमी भी हो, अगर है तो उस पर भी बात होनी चाहिए। लेकिन खेती के और कृषि अर्थव्यवस्था के जानकार लोगों से बात करने पर पता लगता है कि सरकार की आज की रियायत सिर्फ तीन फसलों तक सीमित है जिसमें धान-गन्ना-मक्का है। हालांकि मुख्यमंत्री ने दलहन और तिलहन, कोदो-कुटकी को भी शामिल करने की बात कही है, लेकिन जो सबसे कमजोर, आदिवासी किसान हैं उनके उगाए हुए कोदो-कुटकी की तो कोई सरकारी खरीदी भी नहीं होती है, इसलिए उनको आगे सरकार की इस न्याय योजना में कैसे लाया जाएगा यह भी देखना बाकी है। जानकार लोगों का मानना है कि राज्य में अधिया जैसी व्यवस्था के तहत काम करने वाले लाखों किसान हैं, जिन्हें इससे कोई फायदा नहीं होना है, बल्कि वे अगर धान बेचते समय सोसायटी में रजिस्ट्रेशन नहीं कराते हैं, तो भूस्वामी को भी कोई फायदा नहीं होना है। इसके अलावा आज बड़ा नुकसान झेल रहे सब्जी उत्पादकों, फल उत्पादकों की भी अभी तक सरकार की इस न्याय योजना में जगह नहीं दिख रही है। 

यह बात सही है कि किसी भी योजना में सारे लोग नहीं लाए जा सकते, और न ही पहले दिन से ही सारे लोग किसी योजना में आ सकते हैं। आज की भूपेश बघेल सरकार का रूख अब तक की सरकारों के मुकाबले अधिक ग्रामीण और अधिक कृषक है। इसलिए जब सरकार हजारों करोड़ का कर्ज लेकर भी किसानों से अपना वायदा पूरा कर रही है, तो इस योजना पर खर्च पूरी तरह न्यायसंगत होना चाहिए। हम आखिर में एक बार फिर इस बात पर जोर डालेंगे कि खेती को मिलने वाली रियायतों और मदद से क्रीमीलेयर को बाहर करना चाहिए, और ऐसे तमाम फायदों को आमतौर पर 10 एकड़ तक के किसानों तक सीमित रखना चाहिए। अगर सरकार के पास खेती को बढ़ावा देने के लिए आर्थिक क्षमता और हौसला है, तो वह लघु और मध्यम किसानों तक ही सीमित रखना चाहिए।  लेकिन मुद्दे की बात यह है कि दोनों ही पार्टियों के बड़े किसान और बड़े नेता इस पर तो चर्चा नहीं कर रहे, क्योंकि बड़े नेता या तो शुरू से बड़े किसान रहते हैं, या फिर राजनीति में आने के बाद बड़े किसान बन जाते हैं, और इन दोनों बड़ी पार्टियों के लोग किसानों के भीतर किसी मलाईदार तबके को फायदे से बाहर करने के खिलाफ होंगे। लेकिन गरीब प्रदेश में इसे एक मुद्दा बनाना चाहिए। 
(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 25 मई 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 24 मई 2020

मुफ्तखोर से हरामखोर के दायरे में तो नहीं ?

संपादकीय
24 मई 2020


दिल्ली के फुटपाथ से हिन्दुस्तानियों की बेशर्मी का एक दमदार वीडियो सामने आया जिसमें एक आम बेचने वाले के सारे आम लोग लूट-लूटकर ले गए। कई दिनों के लॉकडाऊन के बाद कहीं से 30 हजार रूपए जुटाकर उसने आम खरीदे थे, और आसपास के संपन्न लोग दिनदहाड़े खुली रौशनी में हाथों में भर-भरकर आम लूटकर चले गए। अभी कुछ अरसा पहले छत्तीसगढ़ का एक वीडियो आया था जिसमें मुर्गियों से भरी हुई एक ट्रक पलट गई थी, और लोग मुर्गियां लूटकर ले गए, भीड़ के सामने ड्राइवर भी कुछ नहीं कर पाया। ऐसा कई मौकों पर होता है, खासकर जब फल-सब्जी, या दारू की बोतलों से भरी कोई ट्रक पलट जाए, तो हिन्दुस्तानी उसमें कुछ बाकी नहीं छोड़ते। कई बरस पहले के ये समाचार याद हैं जिनमें किसी रेल हादसे के बाद आसपास के गांवों के लोगों ने आकर घायलों और लाशों के बदन से घडिय़ां और गहने भी उतार लिए थे। हराम का मिले, तो हिन्दुस्तानी दौड़ में अव्वल रहते हैं। लेकिन यह बात हर हिन्दुस्तानी पर लागू होती हो ऐसा भी नहीं है। अभी जब करोड़ों मजदूरों की घरवापिसी हो रही है, तो उनकी मदद के लिए सड़कों पर सामान लेकर खड़े हुए लोगों का तजुर्बा यह है कि अपनी जरूरत से अधिक पानी की बोतल या खाने का सामान लोग नहीं ले रहे। जबकि सैकड़ों किलोमीटर का पैदल सफर बाकी है, और रास्ते में खाने-पीने का कोई ठिकाना भी नहीं है, लेकिन लोग कुछ घंटों की जरूरत से ज्यादा सामान नहीं बटोर रहे। यह फर्क क्यों है इसे बंद कमरे से लिखना तो ठीक नहीं है, लेकिन अंदाज हमारा यह है कि अधिक मेहनत करने वाले हरामखोरी कम करते हैं, या नहीं करते हैं। 

हिन्दुस्तानी शहरों को देखें तो जब किसी त्यौहार पर सड़क किनारे कई जगह भंडारे लगते हैं, और लोगों को दोना-पत्तल में प्रसाद या खाना मिलता है, तो अच्छी-खासी लाख-पचास हजार रूपए की मोटरसाइकिल किनारे रोक-रोककर लोग टूट पड़ते हैं, और अधिक से अधिक खाकर फिर अगले भंडारे तक जाते हैं, और वहां भी खाना खत्म करने के अभियान में लग जाते हैं। यह मुफ्तखोरी निहायत गैरजरूरी होती है, और भूखे मजदूरों की मजबूरी से बिल्कुल अलग भी होती है जो कि तीन-तीन, चार-चार दिन के ट्रेन सफर में खाने का कोई भी इंतजाम न रहने पर दो-चार जगहों पर खाना लूटते भी देखे गए हैं। भूख की बुरी हालत में पेट भरने के लिए किया गया कोई भी जुर्म हम जुर्म नहीं मानते, महज खाने तक सीमित जुर्म कोई जुर्म नहीं है। फर्क यही है कि भूखे और बेबस, अनिश्चितता के शिकार मजदूर अपवाद के रूप में कहीं लूट रहे हैं, तो भरे पेट वाले लोग अपने इलाके में पलटी किसी ट्रक को लूटने में इस हद तक जुट जाते हैं, कि पेट्रोल टैंकर से बिखरे पेट्रोल को बटोरने के चक्कर में आग लगने से भी बहुत से लोग मारे जाते हैं। 

दिल्ली में आम की लूट बहुत ही परले दर्जे की हरामखोरी रही, और इस पर मामूली लूट से सौ गुना बड़ी सजा होनी चाहिए, क्योंकि गाडिय़ां रोक-रोककर लोग एक गरीब दुकानदार के आम लूट रहे थे। और इन तमाम लुटेरों के घर भरे हुए थे, और वे स्वाद के लिए जुर्म कर रहे थे, पेट भरने के लिए नहीं, वे अपने से गरीब के खिलाफ जुर्म कर रहे थे, किसी बड़े के खिलाफ नहीं। यह तो वीडियो सुबूत होने की वजह से इनमें से चार लोग गिरफ्तार हुए हैं, और कुछ और लोग भी हो सकते हैं। इस खबर के साथ एनडीटीवी ने इस फुटपाथी फलवाले से बातचीत प्रसारित की थी, और उसका बैंक खाता नंबर भी लिखा था क्योंकि लॉॅकडाऊन से बुरे हाल में आए हुए इस फलवाले के पास कुछ नहीं बचा था। एक जिम्मेदार मीडिया की अपील पर उसके खाते में आठ लाख रूपए आ गए क्योंकि हिन्दुस्तान में कुछ लोग जिम्मेदार भी हैं। अब अदालत को ऐसे संपन्न आम लुटेरों से मोटा जुर्माना लेकर इस फलवाले को दिलवाना चाहिए। 

हिन्दुस्तानी मिजाज में मुफ्तखोरी का कोई अंत नहीं है। लोग ट्रेनों में मिलने वाले कंबल और टॉवेल से जूते पोछे बिना ट्रेन से नहीं उतरते, और उस वक्त वे यह भी फिक्र नहीं करते कि अगली बार उन्हें जो चादर-कंबल मिलेगा वह अगर किसी और के जूते साफ किया हुआ होगा तो क्या होगा? यह तो अच्छा हुआ कि अब कोरोना की दहशत में हिन्दुस्तान में मुफ्तखोरी, हरामखोरी, और चीजों का बेजा इस्तेमाल कुछ घटेगा क्योंकि लोगों को अपनी नीयत और अपने हाथ अपने काबू में रखना मजबूरी लगेगा। जो सबसे बेबस नहीं हैं, वे ही लूटपाट कर रहे हैं, वरना मजदूरों की भीड़ जिन रास्तों से गुजर रही थी, वहां अगर वे अपनी जरूरत के मुताबिक सामान लूट भी लेते, तो भी कोई ज्यादती नहीं होती। 

धार्मिक और सामाजिक संगठनों को, दानदाताओं को भी एक बात सोचना चाहिए कि प्रसाद या भंडारे के नाम पर वे लोगों को मुफ्तखोर न बनाएं। आस्था के लिए तो बहुत थोड़ा सा प्रसाद भी दिया जा सकता है, और वह इतना कम हो कि मोटरसाइकिलें रोकने वालों का उत्साह न रहे तो बेहतर है। मुफ्त का खाना पाने के लिए बड़े अस्पतालों के बाहर रोज बंटने वाले खाने की कतार में बहुत से लोग लग जाते हैं जिनका अस्पताल से कुछ लेना-देना नहीं है, या जो गरीब भी नहीं हैं। जो लोग खरीदकर खा सकते हैं वे भी मुफ्त का मिलने पर कतार में लग जाते हैं। अभी छत्तीसगढ़ में एक होटल के बंद होने से उसके पौने दो सौ कर्मचारी दो महीने से वहीं डटे हुए हैं। होटल मालिक ने उनके खाने का पूरा इंतजाम किया है। इन कर्मचारियों में से कुछ दर्जन पास के एक गांव में किराए के मकानों में रहते हैं। अभी लॉकडाऊन की वजह से जब सरकार मुफ्त राशन बांटने लगी, तो गांव के बाकी लोगों के साथ-साथ ये दर्जनों लोग भी कतार में लगकर राशन ले चुके थे। बाद में प्रशासन को पता लगा तो उन्होंने होटल मालिक को बताया, जो दो महीनों से इन कर्मचारियों को मुफ्त में तीन वक्त खिलाते आया है। इसके बाद इन कर्मचारियों की लिस्ट लेकर उनको मिले अनाज की भरपाई होटल मालिक ने प्रशासन को की। कर्मचारियों का जवाब था कि मुफ्त में मिल रहा था तो वो कतार में लग गए थे। 

हिन्दुस्तानी अपनी नीयत को तौलें कि वे कहीं मुफ्तखोर से हरामखोर के बीच तो नहीं आते हैं, इस दायरे से बाहर रहना ही ठीक है।  
(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 23 मई 2020

और अब कोरोना लाने की तोहमत भी मजदूरों पर !

संपादकीय
23 मई 2020


अब एक-एक कर हर प्रदेश में यह माहौल बन रहा है कि लौट रहे प्रवासी मजदूरों की वजह से कोरोना फैल रहा है। जो आंकड़े आ रहे हैं ये तो यही बता रहे हैं, और पहली नजर में यह तोहमत एकदम खरी लगती है। लेकिन यह समझने की जरूरत है कि लोग मुसीबत के हर मौके पर एक पसंदीदा निशाना तलाश लेते हैं। जब कोरोना दिल्ली से आगे बढऩा शुरू हुआ तो उस वक्त मानो तश्तरी पर पेश किया हुआ एकदम तर्क मिला कि दिल्ली में तब्लीगी जमात में गए हुए लोगों की वापिसी से कोरोना फैल रहा है, और वे सबके पसंदीदा निशाना बन गए। बात सही थी कि, धर्म के नाम पर ऐसी बेवकूफी करने वाले, विज्ञान को हिकारत से देखकर ऐसी भीड़ लगाने वाले लोगों को तोहमत तो मिलनी ही चाहिए। इसके पहले विदेश से लौटे हुए लोगों की बारी भी आई कि कोरोना तो इम्पोर्टेड बीमारी है, भारत में तो वह पहले थी नहीं, और पासपोर्ट वाले इसे बाहर से लेकर आए, और लाकर राशन कार्ड वालों को तोहफा दे दिया जिसे गरीब बीमारी और बेकारी, दोनों ही शक्लों में भुगत रहे हैं। 

अब मजदूर हैं निशाने पर कि मजदूरों के आने से कोरोना लौट रहा है, कोरोना आ रहा है, कोरोना छा रहा है। यह बात भी सच तो है ही क्योंकि अभी जो कोरोना पॉजीटिव मिल रहे हैं वे तकरीबन सारे के सारे लौटे हुए प्रवासी मजदूर ही हैं, इसलिए तोहमत तो उन्हीं पर आएगी। यहीं पर यह समझने की जरूरत है कि क्या मजदूर तब्लीगी जमात के लोगों सरीखे हैं? या क्या वे अपनी पसंद और मर्जी से विदेश जाने वाले लोगों सरीखे हैं? या उनका मामला कुछ अलग है? हिन्दुस्तानी मजदूर काम-धंधे से लगे हुए थे, और देश के हर विकसित, संपन्न, औद्योगिक, और कारोबारी प्रदेश में गरीब प्रदेशों से गए हुए करोड़ों मजदूर बदहाली में जीते हुए भी परिवार सहित पड़े हुए थे, कहीं गंदी बस्तियों में, तो कहीं कारखानों की कच्ची खोलियों में पड़े रहते थे। मजदूरी के अलावा जिंदगी में कुछ नहीं था लेकिन बहुतों के साथ बीबी-बच्चे रह पाते थे, जो साथ रख नहीं पाते थे वे भी साल में एक बार घर लौटकर आते थे, बचत छोड़ जाते थे, और फिर से शहर लौटकर काम पर लग जाते थे। 

ऐसे मजदूरों के सिर पर ठीक आज ही के दिन दो महीने पहले बिजली गिरी, जब एक दिन का जनता कफ्र्यू लगा, और इसके तुरंत बाद लॉकडाऊन कर दिया गया। कारखाने बंद, धंधा बंद, किसी भी तरह का कारोबार बंद, इमारतों और घरों में कामवालों का जाना बंद, जाहिर है कि तनख्वाह या मजदूरी, या ठेके का हिसाब, ये सब भी साथ-साथ बंद हो गए, बकाया मिलना थम गया, महज भूख जारी रही, और दहशत बढ़ती चली गई, एक अनसुनी बीमारी की भी, और बेकारी की भी। इस देश में यह सवाल पूछना देश के साथ गद्दारी हो गया, आज भी है, कि आज करोड़ों मजदूरों के सैकड़ों मील के पैदल सफर से गांव पहुंच जाने के बाद भी करोड़ों मजदूर अभी गांव लौटने की कतार में क्यों लगे हैं? जो रेलगाडिय़ां डेढ़ महीना निकल जाने के बाद भी शुरू की गईं, वे रेलगाडिय़ां लॉकडाऊन के शुरूआत में ही क्यों शुरू नहीं की गईं, और क्यों मजदूरों को इस बदहाली से गुजरते हुए कोरोना का शिकार होने दिया गया? भूखों मरने दिया गया, लोकतंत्र पर से उनका विश्वास खत्म किया गया? इसके पीछे क्या वजह थी, इसका क्या फायदा था? सिवाय उन कारखानेदारों और कारोबारियों के, जिन्हें पहले दो हफ्ते का लॉकडाऊन खुलने के तुरंत बाद मजदूरों की जरूरत पडऩी थी, और मजदूरों के बिना जिनका धंधा चल नहीं  सकता था। ऐसे कारखानेदारों और कारोबारियों के अलावा मजदूरों को शहरों में बेबस बंदी बनाकर रख लेने में और किसका फायदा था? लेकिन यह सवाल भी पूछना आज देश के साथ गद्दारी करार दी जाएगी क्योंकि लोगों के पास अटकलों के ऐसे आंकड़े हैं कि अगर लॉकडाऊन उस वक्त नहीं किया जाता, तो देश कोरोना में डूब गया रहता। इन आंकड़ों पर कोई बात भी नहीं कर रहे हैं कि देश में कितने मजदूरों को कितने महीनों का काम खोकर, कितने महीनों की मजदूरी छोड़कर, कितने हफ्तों का पैदल सफर करके घर लौटना पड़ा, और उनके लिए अब वर्तमान क्या है, और भविष्य क्या है? देश के एक प्रमुख पत्रकार शेखर गुप्ता ने कुछ दिन पहले ट्वीट किया कि मजदूरों की तबाही और त्रासदी के इस दौर में क्या किसी को याद है कि इस देश का श्रम मंत्री कौन हैं? क्या श्रम मंत्री का कोई बयान आया? किसी फैसले में श्रम मंत्री का नाम भी आया? यह जिज्ञासा सही है क्योंकि आज यह लिखते हुए भी हमें खुद होकर यह याद नहीं पड़ रहा है कि देश का श्रम मंत्री कौन हैं? गूगल पर पल भर में पता चल जाएगा, लेकिन दो महीनों में मजदूरों पर दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी गुजर रही है, और देश का श्रम मंत्री नजरों से ओझल है, खबरों से ओझल है, अस्तित्वहीन है। 

ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या रोज कमाने-खाने वाले, हर हफ्ते चुकारा पाने वाले मजदूरों को कोरोना पसंद था? आज अगर जो लौटकर गांव आ रहे हैं, और उनमें से कुछ कोरोना पॉजीटिव निकल रहे हैं, तो क्या इसके लिए वे जिम्मेदार हैं? या देश-प्रदेश की वे सरकारें जिम्मेदार हैं जो कि स्टेशनों और बस अड्डों पर, प्रदेश की सरहदों पर लाखों मजदूरों की भीड़ लगने दे रही हैं, क्योंकि उनके पास मजदूरों की घरवापिसी का कोई रास्ता नहीं है, और उनके रोजगार के शहरों में उनके जिंदा रहने का कोई इंतजाम भी न सरकारों के पास है, न शहरों के पास है। जिस केन्द्र सरकार ने अचानक यह लॉकडाऊन किया था, उसे मानो दस करोड़ से अधिक ऐसे मजदूरों के अस्तित्व का ही एहसास नहीं था। जैसे-जैसे लॉकडाऊन आगे बढ़ा, वैसे-वैसे सरकारों को दिखा कि अरे इस देश में मजदूर ही हैं। और फिर ऐसे मजदूरों को एक-एक कोठरी में पच्चीस-पचास लोगों के सोने पर मजबूर होना पड़ रहा था, कहीं दूध के टैंकर में एक पर एक लदकर, तो कहीं सीमेंट कांक्रीट मिक्सर में सीमेंट के घोल की तरह भरकर सफर करना पड़ा। एक-एक ट्रक पर सौ-सौ लोगों को एक-दूसरे पर चढ़े हुए सफर करना पड़ा, रास्ते में एक-एक सरहद की चेकपोस्ट पर हजारों को भीड़ की शक्ल में कतार में लगना पड़ा, राशन के लिए धक्का-मुक्की करनी पड़ी, पानी के लिए धक्का-मुक्की करनी पड़ी, वापिसी की ट्रेन के रजिस्ट्रेशन के लिए धक्का-मुक्की करनी पड़ी। क्या यह सब कुछ मजदूरों की पसंद का था? जिन मालिकों ने इन मजदूरों को रखा था, वे चाहे कारोबारी हों, चाहे घरेलू हों, अगर वे इनको गुजारे के लायक मदद करते तो क्या ये मजदूर पूरे के पूरे ऐसी दहशत में गांव लौटते? जाहिर तौर पर सरकार, कारोबार, और परिवार, किसी ने भी अपने मजदूरों, कामगारों, और नौकरों का साथ नहीं दिया। उन्हें लौटने से रोकने के लिए मारा, सड़कों पर नाकाबंदी की ताकि उन्हें उनके ही प्रदेश में घुसने न मिले, नतीजा यह हुआ कि पटरियों पर कटते हुए भी ये मजदूर पटरी-पटरी गांव लौटे। क्या इसके लिए भी वे खुद जिम्मेदार थे? जो रेलागाडिय़ों आज दो महीने बाद चलाई जा रही हैं, क्या वे लॉकडाऊन के पहले के जनता कफ्र्यू के और पहले से नहीं चलाई जा सकती थीं? उस वक्त तो मजदूर बिना कोरोना लिए हुए भी लौट सकते थे क्योंकि कोरोना मोटेतौर पर विदेशों से लौटने वाले लोगों, उनके शहरों, और उनके प्रदेशों तक सीमित था। लेकिन लॉकडाऊन को दुनिया के इतिहास की सबसे कड़ी नागरिक-कार्रवाई साबित करने के लिए, ऐसा एक रिकॉर्ड बनाने के लिए उसे इस तरह थोपा गया कि छत वालों की तो छतों ने बोझ ले लिया, लेकिन बिना छत वाले या कच्ची छत वाले मजदूरों के कंधों और कमर को इस बोझ ने तोड़ दिया। ऐसे में जानवरों से बदतर हालत में ये इंसान जब घर लौट रहे हैं, तो शहरी-संपन्न मीडिया को वे कोरोना लेकर आते हुए दिख रहे हैं। कल तक जो मजदूर थे, मेहनतकश थे, वे आज मुजरिम भी ठहराए जा रहे हैं कि मानो वे अपनी पीठ पर अपने मां-बाप, विकलांग बच्चों, या गर्भवती पत्नी को ढोकर नहीं लाए, कोरोना ढोकर लाए हैं। 

ऑस्ट्रेलिया में अभी कुछ बरस पहले जब सरकार ने आदिवासियों के खिलाफ कई दशक पहले तो अपने एक ऐतिहासिक जुर्म को कुबूल किया, तो वहां की संसद में आदिवासियों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित करके पूरी संसद ने खड़े होकर आदिवासियों से माफी मांगी थी। कायदे की बात तो यह है कि हिन्दुस्तान की संसद में अगर धेले भर की भी शर्म हो, तो मजदूरों को संसद में आमंत्रित करके पूरी संसद को पूरे गैरमजदूर देश की तरफ से, खासकर देश-प्रदेश की सरकारों की तरफ से माफी मांगनी चाहिए कि इस आजाद हिन्दुस्तान में इन मजदूरों को नागरिक तो छोड़ इंसान भी नहीं माना गया था, और इसलिए यह लोकतंत्र चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहता है, और इसलिए देश के प्रतिनिधि के रूप में यह संसद सिर झुकाकर हाथ जोड़कर माफी मांगती है। 

जितने जानवरों का एक गाड़ी में लादकर ले जाना पशु प्रताडऩा कानून के तहत कैद का हकदार बनाता है, उससे कई गुना ज्यादा इंसानों को अपने सामान बेचकर भी ट्रकों में इस तरह लदकर जाना पड़ा, कि मानो वे हिन्दुस्तानी नागरिक न हों, किसी और देश से तस्करी से लाया गया नशा हों। धिक्कार के हकदार ऐसे लोकतंत्र में आज लौटे हुए मजदूरों को कोरोना लाने का जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, ऐसा बेईमान, और ऐसा बेशर्म देश, खासकर इसका गैरमजदूर-तबका किसी अधिकार का हकदार नहीं है, धिक्कार का हकदार है।  
(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

यह साफ है कि कोरोना पूरी तरह मार्क्सवादी है...

संपादकीय
22 मई 2020


बुरा वक्त बहुत सी अच्छी नसीहतें लेकर आता है, और बहुत सी नई संभावनाएं भी। इस बात को हमने इसी जगह कई मुद्दों को लेकर बार-बार लिखा है, और एक बार फिर इस पर लिखने का मौका आया है। आज कोरोना के खतरे को देखते हुए दुनिया के बहुत से देशों ने कुछ देशों की पहले शुरू की गई एक पहल को आगे बढ़ाने का फैसला लिया है कि अपनी सबसे गरीब आबादी को एक न्यूनतम वेतन या भत्ता दिया जाए ताकि उसका जीवन स्तर सुधरे। एक-एक करके समझदार देश आगे बढ़ते जा रहे हैं, और यह बात सबको समझ में आ रही है कि देश के एक तबके को बहुत गरीबी में रखने का एक मतलब यह भी होता है कि उसे बीमारियों के खतरे में छोड़ देना, और फिर ऐसा नहीं है कि देश की गरीब आबादी किसी टापू पर रहती है, और उसकी बीमारी से बाकी लोगों को खतरा नहीं होगा। बाकियों को भी ऐसे गरीब और बीमार से खतरा रहेगा, और कोरोना जैसी अदृश्य बीमारी का खतरा तो कहीं नजर आता भी नहीं है, जब किसी के बदन में कोरोना घुस जाता है, संक्रमित कर चुका रहता है, तभी जाकर उसका पता लगता है। इसलिए यह बात साफ है कि जब तक दुनिया में आबादी का एक हिस्सा, जो कि हिन्दुस्तान में तकरीबन आधी आबादी है, वह खतरे में रहेगा तो बाकी आधी आबादी भी खतरे में रहेगी। हमने कुछ अरसा पहले इसी संदर्भ में पाकिस्तान के एक सबसे मशहूर शायर जॉन एलिया की लाईनें लिखी थीं- अब नहीं कोई बात खतरे की, अब सभी को सभी से खतरा है..। 

यह बात अब सब पर लागू हो रही है, और बहस के लिए तो यह कहा जा सकता है कि गरीब तबका तो अमीर तबके के बिना जिंदा रह लेगा, लेकिन अमीर तबका गरीब नौकर-चाकर मिले बिना, कामगार मिले बिना जिंदा नहीं रहेगा। गरीबों ने तो पिछले दो महीनों में हिन्दुस्तान की सड़कों पर एक अंतहीन पैदल सफर करके दिखा दिया है कि वे तो जिंदगी की आंच में तपकर फौलाद बने हुए लोग हैं, यह अलग बात है कि अपने आलीशान घरों में बैठे संपन्न लोगों की जिंदगी मुश्किल हुई है। और फिर जिस तरह आज दुनिया के सबसे संपन्न और सबसे विकसित देशों में, न्यूयार्क जैसे सबसे अधिक चिकित्सा सुविधा वाले शहर में एक अकेले कोरोना के गिराए दिन भर में सैकड़ों लाशें गिरी हैं, उनको देखते हुए लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि यह तो विज्ञान या कुदरत का एक नमूना है, ऐसे और भी नमूने आ सकते हैं, और सबसे संपन्न चिकित्सा सुविधा वाले देशों के रईस भी मारे जा सकते हैं। इसलिए आगे का रास्ता कुल एक है, धरती पर सहूलियतों की एक न्यूनतम बराबरी की गारंटी। 

ऐसा लगता है कि कार्ल मार्क्स का मार्क्सवाद पूरी दुनिया में गिनी-चुनी जगहों पर कामयाब हुआ, और बचा हुआ है। बाकी जगहें या तो पूंजीवाद की गिरफ्त में हैं, या फिर पूंजीवाद को मर्जी से अपनाया हुआ है। ऐसे तमाम लोगों को इस एक कोरोना से यह बात समझ तो आ चुकी है कि जब तक पूरी आबादी खतरे के बाहर नहीं रहेगी कोई भी महफूज नहीं रहेंगे। अब देखना यह है कि यह ताजा-ताजा समझ कोरोना के रहते हुए जनकल्याण के फैसलों में तब्दील होती है, या फिर यह श्मशान वैराग्य की तरह तेरहवीं के पहले चल बसेगी, और एक बार फिर गरीब अपने हाल पर जीने, और मरने के लिए छोड़ दिए जाएंगे? ऐसा लगता है कि दुनिया के संपन्न, पूंजीवादी, और मार्क्सवाद-विरोधी तबकों के बीच भी उस बात को लेकर एक खलबली तो मची हुई है कि एयरकंडीशंड कमरों में अगर चैन से सोना है, तो गरीबों की झोपड़पट्टियों को भी कम से कम इंसानों के जीने लायक रिहायशी इलाकों में तब्दील करना होगा। अब यह बात सोची-विचारी तो जा रही है कि क्या हर गरीब को इलाज का एक हक देना तय नहीं किया गया, तो फिर दुनिया का कोई इलाज अमीरों को बचा भी नहीं सकेगा। अब यह बात सत्ता के बंद कमरों के टेबिलों पर तो है कि हर किसी को एक न्यूनतम आय दी जाए ताकि वे ठीक से जिंदा रह सकें, और वे कोरोना या अगली किसी बीमारी का डेरा न बनें।

लोगों को याद होगा कि पिछले आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने उस वक्त नोबल पुरस्कार न पाए हुए अर्थशास्त्री अभिजीत बैनर्जी की सलाह पर चुनावी घोषणापत्र में एक न्याय योजना की घोषणा की थी जिसमें न्यूनतम आय योजना के अक्षरों से न्याय योजना नारा बनाया गया था, और पांच करोड़ परिवारों को साल में 72 हजार रूपए देने का वायदा किया गया था। यह देश की सबसे गरीब 20 फीसदी परिवार होते हैं, और कांग्रेस ने अभिजीत बैनर्जी की राय पर यह कार्यक्रम घोषणापत्र में जोड़ा था। कांग्रेस सत्ता में नहीं आई, और इस योजना की नौबत नहीं आई, इसलिए इसका नफा-नुकसान अभी गिन पाना मुमकिन नहीं है, लेकिन इस साल भर में बाकी दुनिया के सभ्य और विकसित लोकतंत्रों में बहुत से देशों ने न्यूनतम आय की ऐसी योजनाएं चालू की हैं, और समाज में उनका फायदा भी देखा है। 

एक दिलचस्प बात यह है कि दुनिया के गरीब लोगों की तरफ तो नजरें गई ही हैं, उनसे भी अधिक बेजुबान जो जानवर हैं, उनकी तरफ भी नजर गई है। इंसान की नस्ल पैदा होने के बाद से पिछले दो महीने शायद पहले ऐसे रहे होंगे जब पशु-पक्षियों को, मछलियों को इतना कम खाया गया है। अब एक बात यह भी उठ रही है कि कुछ जानवरों से कोरोना और ऐसी दूसरी बड़ी बीमारियां शुरू हुई हैं तो क्या मांस खाना बंद कर दिया जाए, या कम कर दिया जाए? बेबस इंसानों की फिक्र के साथ-साथ अब खाए जाने वाले प्राणियों की भी एक फिक्र हो रही है कि किसी चमगादड़ की आह से अगर कोरोना शुरू हो सकता है तो इस नौबत से कैसे बचा जाए?

कोरोना ने पूंजीवाद, तानाशाह, और बाहुबली लोकतंत्र को उनकी औकात दिखा दी है। कोरोना जॉन एलिया के शेर को पढ़कर आया है, और उसी पर अमल करते हुए उसने यह नौबत खड़ी कर दी है कि सबको सबसे खतरा है। बड़े-बड़े घरों में काम न करने की आदी सेठानियों को बर्तन मांजने की नौबत इसी कोरोना ने ला दी है। इसी कोरोना ने कफन-दफन से लेकर अंतिम संस्कार, कपालक्रिया, और अस्थि विसर्जन जैसी सदियों की परंपराओं को तहस-नहस कर दिया है। आल-औलाद अपने मां-बाप का अंतिम संस्कार नहीं कर पा रहे हैं। श्मशान में एक के ऊपर एक इतने अंतिम संस्कारों की अस्थियां जमा हो रही हैं कि उनके बीच कोई चाहकर भी अपने पुरखे की अस्थियां छांट न सके। ऐसी दुनिया में आज रास्ता एक ही है कि सबसे कमजोर, सबसे बेबस, और सबसे वंचित इंसान को न्यूनतम आय और बराबरी की चिकित्सा दोनों मुहैया कराई जाए। अगर कोरोना दुनिया को इस तरफ आगे बढऩे के लिए मजबूर कर सकता है, तो हमारा ख्याल है कि कोरोना मार्क्सवादी है, और वह चीन की किसी प्रयोगशाला में न भी बना हो, वह एक वामपंथी विचारधारा लेकर आया है, और दुनिया में एक अभूतपूर्व बराबरी की संभावना भी लेकर आया है। एक वाक्य में कहें तो यूबीआई और यूएचएस की नौबत आ गई है। हमने इस भाषा में इसलिए लिखा है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ऐसी भाषा सुहाती है, वरना आम लोगों के समझने के लिए यह बताना जरूरी है कि यूनिवर्सल बेसिक इन्कम, और यूनिवर्सल हेल्थ सर्विस आज की जरूरत है, और जो अंग्रेजी के इतने शब्दों से सबक न ले सकें, उनके लिए तो जॉन एलिया ने लिखा ही था- अब नहीं कोई बात खतरे की, अब सभी को सभी से खतरा है..।
(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 22 मई 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 22 मई 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 21 मई 2020

किसानों से भूपेश का वादा पूरा, राजीव न्याय योजना..

संपादकीय
21 मई 2020


भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की शहादत के दिन छत्तीसगढ़ सरकार ने किसानों से विधानसभा चुनाव में किए अपने वायदे का आखिरी हिस्सा आज न्याय योजना के नाम से पूरा किया। लोगों को प्रधानमंत्री बनने के पहले की राजीव गांधी की छत्तीसगढ़ यात्राएं भी याद हैं। वे इंडियन एयरलाईंस के पायलट की हैसियत से कई बार उड़ान लेकर रायपुर आते थे, और उन्हें लोग इंदिरा गांधी के बेटे की तरह जानते थे। बाद में वे इंदिरा गांधी के रहते हुए ही कांग्रेस की राजनीति में आए और मजदूर दिवस पर भिलाई में उनका एक कार्यक्रम हुआ था। प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव और सोनिया अविभाजित रायपुर जिले के दुगली और कुल्हाड़ीघाट पहुंचे थे। आतंकी हमले में वे वक्त के पहले चले गए, और यह दिन भारत में आतंक के खिलाफ शपथ लेने का दिन माना जाता है। इस मौके पर आज छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने किसानों के साथ अपने वायदे का यह आखिरी हिस्सा पूरा किया है। विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस ने किसानों से 25 सौ रूपए क्विंटल पर धान लेने का वायदा किया था, जो कि सरकार बनने के बाद केन्द्र सरकार की आपत्ति की वजह से पूरा नहीं हो पाया था। धान को समर्थन मूल्य से अधिक पर खरीदने पर केन्द्र ने आपत्ति की थी, और यही वजह है कि सरकार अपनी एक दूसरी जेब से निकालकर बकाया पैसा किसानों को दे रही है। इसे राजीव गांधी किसान न्याय योजना नाम दिया गया है, और इसमें धान के बकाया भुगतान से परे भी कई पहलू जोड़े गए हैं। 

धान खरीदी के वक्त का बकाया 57 सौ करोड़ रूपया चार किस्तों में किसानों को मिलेगा, और आज पहली किस्त उनके खातों में चली गई। लेकिन धान के साथ-साथ मक्का और गन्ना के किसानों को भी इस योजना के फायदे में जोड़ा गया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 19 लाख किसानों को इस योजना का फायदा मिलेगा। लोगों को याद होगा कि देश में जब आम चुनाव हुए तो कांग्रेस पार्टी ने न्याय योजना नाम से गरीबों को सीधे फायदा देने की एक घोषणा की थी, लेकिन वह सरकार में नहीं आ पाई और योजना धरी रह गई। बाद में यह बात सामने आई कि नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अभिजीत बैनर्जी के सुझाव पर कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में देश के पांच करोड़ परिवारों को 72 हजार रूपए सालाना की न्यूनतम आय सहायता देने का वादा किया था। ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने उसी योजना के नाम का इस्तेमाल करके छत्तीसगढ़ के गरीब किसानों की मदद करना तय किया है। कहने के लिए छत्तीसगढ़ के किसानों में कुछ फीसदी बड़े किसान भी हो सकते हैं, लेकिन अधिकतर किसान छोटे हैं, और बहुत से तो ऐसे हैं जो दूसरे किसानों की जमीन लेकर उस पर आधी फसल के सौदे से खेती करते हैं। ऐसे अधिया-किसानों को सरकारी योजनाओं का पूरा फायदा नहीं मिल पाता क्योंकि जमीनों के कागज उनके नाम पर नहीं रहते, और फसल के भुगतान से लेकर इस न्याय योजना की रकम तक सीधे भूस्वामी के खाते में पहुंचती है। पता नहीं सरकार की किसी योजना में ऐसे लोगों की जगह बन पाती है या नहीं। 

लेकिन छत्तीसगढ़ की किसानी में लगे हुए तमाम लोगों की मदद अगर करनी है, तो यह भी समझना होगा कि खेतिहर मजदूरों की एक बड़ी संख्या ऐसी है जो कि सरकार की किसी भी योजना के दायरे में नहीं आती है, और फायदों से अछूती रह जाती है। आज जब पूरा देश प्रवासी मजदूरों के अस्तित्व को पहली बार इस तरह देख रहा है तो यह भी समझने की जरूरत है कि छत्तीसगढ़ के बाहर लाखों मजदूर जाते क्यों हैं? अगर यहीं पर उन्हें सरकारी कामों में पर्याप्त मजदूरी मिल जाती, या किसानी के काम से मजदूरी ठीक मिलती तो शायद ये लोग बाहर नहीं गए होते। खेती के कुछ जानकारों का यह मानना है कि नया राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ 2003 में जो समर्थन मूल्य दे रहा था, वह अब बढ़कर दोगुने के करीब हो गया है, लेकिन खेतिहर मजदूरों की मजदूरी उस अनुपात में बिल्कुल नहीं बढ़ी है। चूंकि यह तबका असंगठित हैं, बिखरा हुआ है, इसके कुछ कामों को करने के लिए अब बड़ी-बड़ी मशीनों की शक्ल में विकल्प हैं, इसलिए इसकी जरूरतों को अधिक देखा नहीं जाता है। खेती से जुड़ी हुई कोई भी न्याय योजना खेतिहर मजदूरों के भले के बिना पूरी नहीं हो सकती, और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अभी बिना अधिक जानकारी के इतना कहा जरूर है कि इसमें खेतिहर मजदूरों को जोड़ा जाएगा। 

छत्तीसगढ़ के किसान ही इस राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था बनाते हैं। इनकी खेती को सिर्फ अधिक दाम पर खरीदना काफी नहीं है। उनकी खेती में ऐसे फेरबदल की कोशिश भी करनी चाहिए जिससे कि वह सरकारों की नीतियां बदलने पर भी अपने आपमें जिंदा रहने लायक हो सकें। हमने कुछ दिन पहले भी यहीं पर लिखा था कि बाहर से लौटकर आ रहे मजदूरों में से कुछ जरूर ऐसे होंगे जो कि अब वापिस जाना नहीं चाहेंगे। ये बाहर के अनुभव पाकर भी लौटे हैं, और इनका किसी हुनर का ज्ञान भी है। ऐसे में गांवों के लायक कुटीर उद्योग या फसलों के इस्तेमाल वाले छोटे उद्योग बढ़ाने चाहिए ताकि लोग बेबसी में प्रदेश के बाहर न जाएं, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था सिर्फ सरकारी रियायत-मदद की मोहताज न हो। फिलहाल भूपेश सरकार के इस फैसले से किसानों को सही समय पर एक मदद मिल रही है, और फसल के इस मौसम में वह उत्पादक काम आ सकती है। 
(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

एक कतरा सच, सच तो है, पर वह पूरा सच न भी हो..

संपादकीय
20 मई 2020


जब कोई बड़ी त्रासदी होती है, तो उसके बहुत से शिकार होते हैं जिनमें से एक मीडिया भी होता है। भोपाल गैस त्रासदी हो, 1984 के दंगे हों, 2002 के गुजरात दंगे हों, या अभी लॉकडाऊन हो, ऐसी व्यापक त्रासदी पर लिखना आसान नहीं होता। किसी किताब के लेखक के लिए तो इनमें से किसी पर भी लिखना बहुत मुश्किल नहीं होता है क्योंकि इनकी रिपोर्टिंग के गट्ठे मौजूद रहते हैं, जिन्हें पढ़कर रिसर्च किया जा सकता है, और लिखा जा सकता है। लेकिन जब ये घटनाएं होती हैं, खासकर व्यापक त्रासदी से भरी ऐसी घटनाएं जिनमें लाखों लोग प्रभावित हैं, और किसी भी मीडियाकर्मी के लिए उनमें से बस कुछ गिने-चुने लोगों से बातचीत मुमकिन रहती है। ऐसी रिपोर्टिंग अगर महज तथ्यों पर आधारित एक सीमित रिपोर्टिंग है, तब तो ठीक है, लेकिन ऐसे सीमित तथ्यों पर आधारित किसी विश्लेषण से पत्रकारिता का कोई निष्कर्ष भी निकाला जा रहा है तो खतरा वहां से शुरू होता है। 

अंग्रेजी में ऐसे संदर्भ में एक लाईन कही जा सकती है, एनेकडोटल रिपोर्टिंग, या एनेकडोटल विचार-लेखन। इसका मतलब कुछ चुनिंदा मामलों को लेकर एक व्यापक निष्कर्ष निकालने जैसा काम। होता यह है कि ऐसी विशाल, विकराल, और बड़े पैमाने की त्रासदी के कुछ कतरे जब लोगों के सामने आते हैं तो लोग उन्हीं को सब कुछ मान बैठते हैं। अब जैसे आज के लॉकडाऊन को ही लें, तो किसी एक शहर से मानो रोज सौ बसों में लोगों को भेजा जा रहा है, सौ-दो सौ ट्रकों पर भी चढ़ाया जा रहा है जो कि बहुत कानूनी बात तो नहीं है, लेकिन लोगों को जल्द से जल्द उनके गृह प्रदेश, और उनके गांव तक पहुंचाने की नीयत से, या फिर अपने प्रदेश से बला टालने की नीयत से, जो भी बात हो, लोगों को आज देश भर में ट्रकों पर भी चढ़ाकर भेजा जा रहा है, और जो प्रदेश जितनी दिलचस्पी ले रहे हैं, जिसकी जितनी क्षमता है, उतनी बसों में भी भेजा जा रहा है। ऐसे में किसी भी वक्त वहां पहुंचने वाले रिपोर्टर-फोटोग्राफर को, सामाजिक कार्यकर्ता को, या कि आम लोगों को कई तरह के नतीजे निकालने का मौका मिल सकता है। बसों में जा चुके 4 हजार लोग तो नजरों से दूर जा चुके हैं, लेकिन जो 4 सौ लोग बाकी हैं, उन 4 सौ में से 40 लोगों का रोना, और सचमुच की तकलीफ से रोना, सामने मौजूद रह जाता है। इसलिए मीडिया में भी ऐसी ही कहानियां अधिक आती हैं, और चूंकि चौबीसों घंटे ये घटनाएं चल रही हैं इसलिए यह समझ पाना कुछ मुश्किल रहता है कि अनुपात क्या है। तस्वीर अनुपातहीन ढंग से अधिक नकारात्मक, या अनुपातहीन अधिक सकारात्मक दिख सकती है। जब तस्वीर ऐसी दिखेगी तो उस पर आधारित नतीजे भी उससे प्रभावित होंगे। 

हम आज हिन्दुस्तान को एक देश मानकर कम से कम दो दर्जन राज्यों में बिखरी दुख-तकलीफ की हजारों कहानियों के आधार पर जो निष्कर्ष निकाल रहे हैं वह निर्विवाद रूप से घनघोर सरकारी नाकामयाबी का, और अभूतपूर्व मानवीय त्रासदी का है। लेकिन यह नतीजा निकालना कम कहानियों के आधार पर नहीं हो सकता था, न ही कुछ सीमित प्रदेशों की ऐसी हालत को एक राष्ट्रीय त्रासदी कहा जा सकता था। आज जब निर्विवाद रूप से यह नौबत दिखाई पड़ रही है कि देश में बेदखली से तकलीफ ही तकलीफ है, और देश की तैयारी करोड़ों लोगों को तकलीफ में डालने के पहले शून्य थी, इस बेदखली का या तो अंदाज नहीं था, और या अंदाज था तो उसके मुताबिक तैयारी शून्य थी। लेकिन ऐसे नतीजे पूरी तरह से एकतरफा त्रासदी के नजारों से आसान हो जाते हैं। अगर यह तस्वीर मिलीजुली होती, तो यह आसान नहीं होता। इसलिए जब किसी प्रदेश में, किसी शहर में, किसी एक क्वारंटीन सेंटर में हो रही घटनाओं को व्यापक तस्वीर का एक छोटा हिस्सा मानने के बजाय व्यापक तस्वीर मानकर उसे ही सब कुछ गिन लिया जाता है, तो निष्कर्ष बहुत गलत साबित होते हैं। 

दिक्कत यह है कि अखबारनवीसी में जितने शिक्षण-प्रशिक्षण की जरूरत है, उससे गुजरे बिना भी अखबारों में लिखने का हक मिल जाने भर से लोग विश्लेषक भी हो जाते हैं, और विचार लेखक भी। उनके निष्कर्षों की बुनियाद न गहरी होती है, न ही पर्याप्त चौड़ी होती है। ऐसे में वह उथली जमीन पर खड़ा हुआ एक ऐसा निष्कर्ष रहता है जो कि विपरीत तथ्यों से पल भर में धड़ाम हो सकता है, हो जाता है। अब बात जब अखबारों से बढ़कर टीवी और ऑनलाईन मीडिया तक आती है, तब तो बुनियाद इतनी भी गहरी नहीं बचती, इतनी भी चौड़ी नहीं बचती। कई बार तो इन नए मीडिया में निष्कर्ष जमीन पर ही टिके हुए नहीं होते, हवा में तैरते होते हैं। ऐसे में जब इनको कुछ बिखरी हुई खुशियां दिख जाती हैं, या कुछ बिखरे हुए दुख दिख जाते हैं, तो उन्हें ही सब कुछ मान लेने, और सब कुछ को वैसा ही मान लेने का एक बड़ा खतरा हाल के बरसों में मीडिया में हो गया है। 

अपने देखे को सच मान लेने तक तो ठीक है, क्योंकि इससे बड़ा सच और क्या हो सकता है, लेकिन आज बहुत से लोग ऐसे व्यापक और जटिल मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हुए अच्छी या बुरी नीयत से, जैसा भी हो, एक यह बड़ी चूक कर रहे हैं कि वे अपने देखे हुए को ही संपूर्ण सत्य मान रहे हैं। उनकी बात में बार-बार अपने देखे का दंभ एक आत्मविश्वास और एक सुबूत की तरह सामने आता है। उनका देखा सच है, लेकिन हर सच सम्पूर्ण सत्य नहीं होता। सच का एक कतरा किसी संदर्भ से परे उठाकर दुनिया के महानतम व्यक्ति को निष्कृष्टतम साबित करने का हथियार बन सकता है। किसी बहुत ही अप्रत्याशित और जटिल खतरे के बीच बड़े से बड़ा इंतजाम भी बड़ी आसानी से नाकाफी साबित किया जा सकता है, और कुछ छोटी-छोटी मिसालों को देकर, लोगों के कहे हुए सच को एक सम्पूर्ण सत्य की तरह पेश करके उन्हें काफी और कामयाब भी साबित किया जा सकता है। एनेकडोटल रिपोर्टिंग ऐसी ही होती है जिनमें लोग किसी एक मामले, अपनी देखी हुई किसी एक घटना, अपने को सुनाई पड़े किसी एक बयान पर आधारित एक व्यापक निष्कर्ष निकाल लेते हैं। 

अखबारनवीसी आसान काम नहीं है। एक तो इसकी शुरूआत में ही एक शब्द से बड़ी गलतफहमी पैदा होती है। पब्लिक इंटरेस्ट। इन शब्दों के दो मायने होते हैं, जनहित में क्या है, और जनरूचि का क्या है। अब इन दोनों के बीच फासले को समझना तो आसान है, लेकिन जब न समझना नीयत हो, तो इन दोनों में घालमेल उससे भी ज्यादा आसान है। किसी बात को जनरूचि का बनाने के लिए उसे जनहित का साबित करना जरा भी मुश्किल नहीं रहता। और खासकर ऐसे वक्त जब एक कतरा सच का सहारा भी मिला हुआ हो, जो कि व्यापक सच बिल्कुल भी न हो, लेकिन एक कतरा सच जरूर हो। आज मीडिया में अखबारनवीसी के दौर की गंभीरता और ईमानदारी दोनों ही चल बसे हैं। फिर भी अखबारों से परे की मीडिया की एक मौजूदगी एक हकीकत है जिसे अनदेखा करना मुमकिन नहीं है। लेकिन ऐसे में यह भी याद रखना चाहिए कि जो मीडिया हर पल की हड़बड़ी में हो, उसके पास चौबीस घंटों में एक बार छपने वाले अखबारों जितना न सब्र हो सकता, न ही चीजों को कुछ घंटों के व्यापक कैनवास पर देखने जितनी समझ ही हो सकती। यह वक्त जिस किस्म की आपाधापी का है, जिस किस्म से न्यूजब्रेक करने का है, जिस किस्म से सिर्फ और सिर्फ सबसे पहले रहने के दुराग्रह का है, उस वक्त में विश्लेषक और विचार-लेखक भी धैर्य खो चुके हैं। अब साप्ताहिक कॉलम जैसी कोई बात किसी को नहीं सुहाती। आमतौर पर तो जब घटना घटती रहती है, तो उसे टीवी पर तैरते देखकर, या इंटरनेट पर उसकी पल-पल जानकारी पाकर उस पर विचार लिखना भी शुरू हो जाता है। कई बार हम भी ऐसा करते हैं, और उसके खतरों को झेलते भी हैं। तैरती हुई घटनाओं पर निष्कर्ष और विचार लिखते हुए साल में एकाध मौका ऐसा भी आता है कि वे तथ्य जो कि लिखते वक्त तथ्य थे, वे बाद में जाकर गलत साबित होते हैं। इसलिए आज जब सदी की एक सबसे महान त्रासदी पर लिखने की बात आती है, तो दो चेहरों की मुस्कुराहट, और चार चेहरों पर आंसू को आधार बनाना ठीक नहीं है। कोई निष्कर्ष निकालने के पहले ठीक उसी तरह पूरी तस्वीर को कुछ दूर हटकर, कुछ ऊपर जाकर एक व्यापक नजर से देखना चाहिए जिस तरह शवासन करने वालों को सिखाया जाता है कि ऐसी कल्पना करें कि वे ऊपर से अपने खुद के शरीर को देख रहे हैं। जो मीडिया में हड़बड़ी में ताजा घटनाओं को दर्ज कर रहे हैं, वे जब तक शवासन की तरह ऊपर उठकर व्यापक नजरिए से देख न सकें, तब तक उन्हें अपने देखे हुए को सच मानने के बजाय सच का एक कतरा मानना चाहिए, अपना देखा हुआ। और इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि सच के ऐसे और भी बहुत से कतरे हो सकते हैं जो कि उनके अनदेखे हों, और जो नतीजों को पूरी तरह बदलने की ताकत रखते हों। क्या ऐसे व्यापक नजरिए की मेहनत करने के लिए मीडिया के लोग तैयार हैं? या क्या ऐसी मेहनत की पाठक, दर्शक, श्रोता में कोई कद्र है?
(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बड़ा कड़ा वक्त कल्पनाओं को बड़ा भी कर जाता है, सोचें..

संपादकीय
19 मई 2020


चूंकि कोरोना को कुछ खाना-पीना नहीं पड़ता है, और उसके दूसरे खर्च भी नहीं हैं, इसलिए वह तो आसानी से जिंदा है, लेकिन इंसानों को उसके साथ जिंदा रहना पड़ रहा है, और उसके साथ जिंदा रहना खासा भारी भी पड़ रहा है। रोजगार चले गए हैं और खर्च तकरीबन वैसे ही कायम हंै। ऐसे में कमाई के नए रास्ते ढूंढना जरूरी है, और खर्च में खासी कटौती करना भी जरूरी है। कंपनियां और छोटे मालिक सभी लोग तनख्वाह घटाते चल रहे हैं, और नौकरियां भी, इसलिए लोगों को जिंदा रहने के नए रास्ते ढूंढने होंगे। 

अभी कुछ दिन पहले एक कंपनी ने ऐसे मास्क बाजार में उतारे हैं जिनमें तरह-तरह के दिलचस्प वाक्य लिखे हुए हैं। अभी एक अलग तस्वीर देखने में आई जिसमें बिहार के लोक कलाकार फेस मास्क पर कलाकारी दिखा रहे हैं, और एक साधारण सा अटपटा लगने वाला मास्क भी खूबसूरत हुए जा रहा है। हमें अधिक वक्त नहीं दिखता कि हाथ के बुने हुए, हाथ के छपे हुए कपड़ों से पोशाकें बनाने वाली देश की बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने बाकी कपड़ों के साथ-साथ मैचिंग-मास्क मुफ्त देने लगें, या कपड़ों की कतरनों से अलग से भी मास्क बनाने लगेंं। यह संकट एक अवसर लेकर भी आया है कि हर राज्य अपने हस्तशिल्पियों, बुनकरों को लगाकर अब नई जरूरतों के मुताबिक हस्तकला की संभावनाएं देखें। मिसाल के तौर पर छत्तीसगढ़ की गुदना कला (टैटू) को हाल के बरसों में बदन से उतरकर कपड़ों में भी आते देखा गया है, और अब लोक कलाकार बिल्कुल बदन के टैटू की तरह कपड़ों पर वैसी ही पक्की काली स्याही से टैटू जैसी कलाकृतियां बनाने लगे हैं। आज दुनिया की अर्थव्यवस्था का बुरा हाल है, और ऐसे में हस्तशिल्प एक सबसे ही गैरजरूरी सामान हैं जिसे कि लोग महज शौक के लिए लेते हैं। ऐसे में अगर फेस मास्क को लोककला से जोड़ा जाए, तो एक नई संभावना निकलती है। 

इसी तरह डिजाइनरों को यह भी सोचना चाहिए कि क्या कमर में बांधे जाने वाले ऐसे कुछ पट्टे फैशन में आ सकते हैं जिनमें मोबाइल भी रखा जा सके, और जिनमें लिक्विड सोप और हैंड सेनेटाइजर की जगह भी हो? आमतौर पर विदेशी सैलानी कमर में ऐसे बेल्ट लगाए रहते हैं जिनमें चेन के भीतर ऐसी छोटी-मोटी चीजें रखी जाती हैं। ऐसे बेल्ट अगर लोक कलाकारों से स्थानीय कलाकृतियों के साथ बनवाए जा सकें, तो आने वाला वक्त उनका ग्राहक हो सकता है। अपने सामानों को संक्रमण से बचाने के लिए, और सफाई की जरूरी छोटी बोतलें रखने के लिए ऐसे बेल्ट का फैशन आ सकता है, या लाया जाना चाहिए क्योंकि अब मोबाइल फोन को भी हर जगह मेज पर रखना खतरनाक ही कहलाएगा। देश-प्रदेश के कारोबारियों, सरकार के संबंधित अधिकारियों, और डिजाइनिंग के छात्र-छात्राओं को ऐसे प्रयोग करने चाहिए। 

यह मौका ऐसी कल्पनाओं के चैरिटी में भी इस्तेमाल करने का है। आज जब देश के धर्मस्थलों में भी तनख्वाह देने लायक कमाई नहीं बची है, और बड़े-बड़े फिल्मी सितारों से लेकर क्रिकेट खिलाडिय़ों तक, सब खाली बैठे हैं, तो ऐसे समाजसेवी संगठन जिनको दान की जरूरत है, वे मशहूर लोगों से संपर्क कर सकते हैं, और अमिताभ बच्चन के दस्तखत वाले फेस मास्क, या सचिन तेंदुलकर और विराट कोहली के ऑटोग्राफ वाले फेस मास्क लाखों रूपए कमा सकते हैं। लोगों को याद रखना चाहिए कि जब किसी पहाड़ी पर कोई विमान गिर जाता है, और कई दिनों तक कोई बचाव दल नहीं रहता, तो लोग उन पहाडिय़ों पर ही किसी तरह जिंदा रहना सीखने लगते हैं, और जिंदा रहने की चाह उन्हें बहुत कल्पनाशील बना देती है। वे पेड़ों के पत्तों पर जमीं ओस की बूंदों से पीने के लिए पानी जुटा लेते हैं, वे चकमक पत्थरों से आग सुलगा लेते हैं, और कुछ फिल्में ऐसी भी आई हैं जिनमें किसी टापू पर अकेले फंस गए इंसान के जिंदा रहने के संघर्ष की कहानी है। आज तमाम लोगों को ऐसा कल्पनाशील होना पड़ेगा। 

आज जब देश भर में स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई बुरी तरह पिछड़ गई है, बहुत से छोटे स्कूल-कॉलेज बंद भी होने की नौबत आ गई है, तो उस वक्त एक नई संभावना यह निकलती है कि संपन्न मां-बाप अपने बच्चों की पिछड़ गई पढ़ाई की भरपाई के लिए उनकी ट्यूशन लगवाएं, और बहुत से नौजवानों को, शिक्षकों को ऐसा रोजगार मिल सकता है। आज कोरोना जैसा खतरा अगर लंबा जारी रहा, स्कूल-कॉलेज बंद रहे, तो मां-बाप बच्चों को किसी कोचिंग क्लास भेजने के बजाय अपनी संपन्नता के मुताबिक बच्चों के लिए घर पर ही ट्यूशन लगवा सकते हैं। लोगों को काम की ऐसी संभावना के बारे में जरूर सोचना चाहिए, और अपनी शैक्षणिक योग्यता, अपने तजुर्बे के आधार पर अपना बायोडेटा बनाकर तैयार रखना चाहिए, एक प्रभावशाली संदेश बनाकर सोशल मीडिया और वॉट्सऐप पर भेजना भी चाहिए कि वे किस तरह के काम के लिए उपलब्ध हैं। हमारा अंदाज है कि छात्र-छात्राओं वाले हर संपन्न परिवार में किसी न किसी शिक्षक या ट्यूटर की कई महीनों की संभावना निकल सकती है। और लोगों को यह बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि जब ऐसा कोई काम बहुत अच्छे से किया जाता है तो लोग उन सेवाओं को लंबे समय तक जारी रखते हैं। 

कोरोना संक्रमण के खतरे को देखते हुए कई किस्म के कलाकार, या दूसरे किस्म के प्रशिक्षक भी अपने-अपने हुनर की वीडियो क्लास ले सकते हैं, और रायपुर में ही एक पेशेवर शिक्षिका स्कूल जाने से पहले की उम्र वाले बच्चों के लिए ऐसी वीडियो क्लास लेना ने शुरू भी कर दिया है। कहते हैं कि ऊपर वाला एक दरवाजा बंद करता है, तो दूसरा खोल देता है। फिलहाल तो कोरोना से डरे-सहमे उस ऊपर वाले का तो पता-ठिकाना नहीं लगता है, लेकिन लोग खुद अपने लिए नई संभावनाएं तलाश सकते हैं। आज का वक्त ऐसा है जब बहुत सारे संपन्न लोग डिप्रेशन से भी गुजर रहे हैं, और ऐसे में उन्हें पेशेवर परामर्श की जरूरत भी है। मनोविज्ञान के जानकार और प्रशिक्षक ऐसा नया काम पा सकते हैं। सरकारों को चाहिए कि वे मौलिक सूझबूझ वाले जानकार और कल्पनाशील लोगों को लगाकर ऐसी संभावनाओं पर एक पर्चा तैयार करवाए, और इन नई संभावनाओं को स्किल डेवलपमेंट जैसी योजना से जोड़े ताकि समाज की एक नई जरूरत पूरी हो सके। 

आज भी लोगों के घरों में जाकर दीमक का इलाज और दीमक से बचाव करने वाले लोगों का एक बड़ा कारोबार है। अब तक कई होशियार लोग घरों को वायरस और बैक्टीरिया से मुक्त कराने के कारोबार की योजना बना चुके होंगे, वह एक नई संभावना है, और उसमें कारोबार के अलावा प्रशिक्षित कर्मचारियों की जरूरत भी होगी, और लोगों को ऐसे नए कारोबार की भी सोचना चाहिए। जिस तरह आज हर चौराहे पर मोबाइल फोन के कवर, या नए सिमकार्ड बेचने वाले लोग छाता लगाकर बैठे रहते हैं, उस तरह से लिक्विड सोप और हैंड सेनेटाइजर बेचने वाले लोग भी रह सकते हैं, और ऐसे फुटपाथी हैंडवॉश करवाने वाले लोग भी रह सकते हैं जो लिक्विड सोप और सेनेटाइजर से आपके हाथ साफ करवाकर एक-दो रूपए ले सकें। ऐसे नए कारोबार, ऐसे नए पोर्टेबल सिंक के बारे में भी जरूर सोचना चाहिए क्योंकि कई किस्म की भीड़ भरी जगहों से धक्का खाकर निकलने के बाद हो सकता है कि लोग एक रूपए में हाथ साफ करवाना चाहें। चूंकि लोगों के मुंह अब आमतौर पर ढके रहेंगे, इसलिए वे ऐसे टी-शर्ट भी पहन सकते हैं जो आगे-पीछे पूरे इश्तहार छपे हुए हों, और उन्हें मुफ्त में मिल जाएं, या साथ में कुछ पैसे भी मिल जाएं। 
हमने यहां पर सिर्फ कुछ मिसालें सामने रखी हैं। सरकार में स्किल डेवलपमेंट से जुड़े लोग, बाजार में व्यापारियों के संगठन, और जनता के बीच तरह-तरह के सामाजिक संगठन आने वाली अर्थव्यवस्था में लोगों के जिंदा रहने के लिए ऐसी तरकीबें सोच सकते हैं, उनकी बुनियाद पर योजनाएं बना सकते हैं। खुद बेरोजगारों को आपस में ऐसी वीडियो चैट करनी चाहिए, या डिस्कशन-ग्रुप बनाकर ऐसी योजनाएं बनानी चाहिए। वक्त जब अधिक कड़ा होता है तो वह कल्पनाओं को अधिक बड़ा भी कर जाता है। हम तो अखबार के एक कमरे में कैद रहकर, बिना बेरोजगारी के कुछ कल्पनाएं कर पा रहे हैं, लेकिन असल जिंदगी में संघर्ष करते लोग, असल जिंदगी में कारोबार खोते हुए लोग अधिक दूर तक कल्पना कर सकते हैं। अगर आप इसमें लेट होंगे, तो आपके ही इलाके की लोककला छपा हुआ फेस मास्क चीन से आकर आपके गांव-मोहल्ले में बिकने लगेगा, फिर उसके बहिष्कार की बात से कुछ हासिल नहीं होगा। 
(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

कम से कम उन्हें देखकर ही और लोग कुछ सीख जाएं

संपादकीय
18 मई 2020


हमारे आसपास और दूसरी जगहों पर लोगों की मदद करने के लिए बाहर निकले हुए लोगों की तारीफ में हम पहले भी कई बार लिख चुके हैं। लेकिन मुसीबत और खतरे की ऐसी घड़ी में अगर तारीफ के लायक कुछ बातों का दुबारा भी जिक्र हो जाए तो क्या हर्ज है? आज सुबह छत्तीसगढ़ के रायपुर में मंजीत कौर बल नाम की सामाजिक कार्यकर्ता ने फेसबुक पर पोस्ट किया है कि जिन कॉलोनियों या इमारतों में लोगों के पास पानी की खाली बोतलें हों वे 20 बोतलों में पानी भरकर इन नंबरों पर फोन करें, तो बोतलें ले जाकर शहर के सिरे पर मजदूरों के जमघट को दे दी जाएंगी ताकि आगे के सफर में उनके पास पानी रहे, और बोतल रहे। पानी की खाली बोतलें हर संपन्न परिवार में एक बोझ होती हैं, लेकिन खाते-पीते परिवारों के कई नौजवान, कई आदमी, कई महिलाएं, और कई बुजुर्ग रात-दिन मजबूर-मजदूरों के लिए इस कदर लगे हुए हैं कि मानो उनके अपने घर में आग लगी है। भोपाल में एक अधेड़ या बुजुर्ग दिखतीं लेखिका तेजी ग्रोवर रात-दिन छत्तीसगढ़ के मजदूरों के लिए लगी हुई हैं कि उन्हें खाना पहुंच जाए, अनाज पहुंच जाए, वे पैदल छत्तीसगढ़ रवाना न हों, वे पागलों की तरह सोशल मीडिया पर मदद की अपील करती हैं, मदद जुटाती हैं, और अपने परिचितों को लेकर हर किस्म के इंतजाम में लगी हुई हैं। इस मुद्दे पर आज लिखना दो बातों से सूझा है जिसमें से एक 20 मिनट पहले तेजी ग्रोवर का फेसबुक पोस्ट है कि गाजियाबाद के दोस्तों तुरंत संपर्क करो, हम लोग छत्तीसगढ़ के मजदूरों के एक समूह को वहां रोकने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वे पैदल रवाना न हों, उनके लिए गाड़ी का इंतजाम कर रहे हैं। उसके पहले उन्होंने अपने किसी परिचित का नाम लेकर लिखा कि तुरंत संपर्क करो, छत्तीसगढ़ के मजदूर विजय नगर चौराहे पर हैं, और उन्हें पैदल वापिस नहीं आने देना है, उनके लिए इंतजाम कर रहे हैं। लेकिन इससे इन कोशिशों से कुछ अधिक विचलित करने वाली एक तस्वीर मध्यप्रदेश की है जिसमें ऊचेहरा नाम की जगह पर दो गरीब बच्चे नंगे पांव सड़क के बीच खड़े हैं और आते-जाते मजदूरों को पूछ-पूछकर खाने के पैकेट बांट रहे हैं, और बता भी रहे हैं कि पैसे नहीं लगेंगे। 
एक तरफ रायपुर में एक महिला शाम सात से रात दो तक मजदूरों के जमघट के बीच इंतजाम में लगी है, अपने तमाम परिचितों को झोंककर रखा है, विचलित होकर कभी सरकार के खिलाफ लिख रही है, तो कभी सरकार के अच्छे काम की तारीफ में लग जाती है। कुल मिलाकर वह पल-पल इन मजदूरों की मदद करने में लगी है जिनकी मदद इस देश की सरकारें ठीक से नहीं कर पा रहीं, लोकतंत्र बिल्कुल नहीं कर पा रहा है। ऐसी कहानियां जगह-जगह है। कृष्ण कांत नाम के एक पत्रकार ने दो-तीन दिन पहले की एक तस्वीर पर दर्द के साथ लिखा है कि किस तरह सूरत से उत्तरप्रदेश रवाना हुए दो कपड़ा-मजदूर रास्ते में एक की तबियत बिगडऩे पर एक साथ उतर गए। बाकी मजदूरों ने साथ नहीं दिया, और वे ट्रक में आगे बढ़ गए। दोस्त की मदद करते हुए अस्पताल ले जाकर तमाम कोशिशों के बावजूद जब वह मर गया, तो उस हिन्दू नौजवान के साथ सिर्फ उसका वह मुस्लिम दोस्त मौजूद था। 
यह सब जिस वक्त हो रहा है उस वक्त उत्तरप्रदेश में थानेदार नोटिस जारी करके सड़क के किनारे के घरवालों को लिख रहा है- एक नोटिस जारी कर रही है सड़क किनारे के कई घरवालों को लिखा गया है- प्राय: देखने में आ रहा है कि आपके द्वारा पैदल चल रहे प्रवासी मजदूरों को अपने आवास के सामने रोक लिया जाता है। इस आशय की गोपनीय जानकारी प्राप्त हुई है कि आपके द्वारा रास्ते में मजदूरों को अपने आवास पर खाने-पीने की वस्तुओं की लालच देकर बुलाया जाता है। इससे कोविड-19 के नियमों का उल्लंघन हो रहा है। आप सचेत हों, भविष्य में आपके द्वारा इस प्रकार करने पर महामारी अधिनियम के अनुसार आपके विरुद्ध वैधानिक कार्यवाही की जाएगी। 
अब सवाल यह है कि राह चलते मजदूरों को कोई क्या लालच देकर अपने घर बुला लेंगे, और उन्हें खिला-पिलाकर उनसे क्या हासिल कर लेंगे? उनके पास मेहनत से कमाया हुआ टूटा-फूटा, फटा-पुराना जो कुछ था, वह सब तो पूंजीवाद, लोकतंत्र और सरकार ने मिलकर पूरी तरह लूटा हुआ है, उनके पास से लूटने के लिए अब और क्या निकल सकता है? अगर हजार मील के सफर पर चलते मजदूर परिवारों कोई रोककर खाना खिला रहे हैं, कुछ पल बैठने की जगह दे रहे हैं, तो उस पर उत्तरप्रदेश की योगी सरकार की पुलिस का यह रूख है! यह हाल तब है जब सरकारों ने अधिकतर जगहों पर लोगों को ठीक उसी तरह बेसहारा छोड़ दिया है जिस तरह आमतौर पर गाय-बकरियों के मालिक उन्हें घूरों पर खाने के लिए छोड़ देते हैं। इन मजदूरों की ऐसी हालत के बीच भी अगर आम लोगों के बीच से निकलकर महान लोग सामने आ रहे हैं, और अपनी महानता की कोई तस्वीर छपवाने नहीं आ रहे, तो उस बीच सरकारों में जो संवेदनशीलता होनी चाहिए, वह कम से कम उत्तरप्रदेश सरकार के इस नोटिस में तो नहीं है।
लेकिन आज देश भर में जगह-जगह जिस तरह बिना किसी प्रचार के लालच के लोग खतरे में पड़कर भी लोगों की मदद करने में रात-दिन लगे हैं, कहीं एक कोई मुस्लिम आदमी है जो लावारिस छोड़ दी गई हिन्दू, मुस्लिम तमाम किस्म की लाशों को उनके धार्मिक रीति-रिवाजों के मुताबिक निपटा रहा है, बहुत सी जगहों पर लोग अपने धर्मस्थान दूसरे धर्म के लोगों के लिए खोलकर, खाना खिलाने के लिए बैठे हैं, इन सब बातों से हिन्दुस्तान के बेहतर इंसानों का पता लगता है, और यह भी पता लगता है कि सरकारों में बैठे बहुत से लोग, बहुत सी सरकारें ऐसी बेहतर बातों से ठीक उतनी ही दूर हैं जितनी दूर मजदूर अपने घरों से हैं। लोगों के समर्पण, लोगों के हौसले, लोगों के नि:स्वार्थ त्याग, और लोगों के सरोकार, इन सब पर भी बार-बार चर्चा होनी चाहिए क्योंकि लोगों में भलमनसाहत के बारे में जिस तरह से भरोसा खत्म हो चुका है, उस भरोसे का वापिस आना, और कायम होना भी जरूरी है। यह दुनिया अब तक चाहे जिस किसी झांसे में जी रही थी, कोरोना ने हिन्दुस्तान में यह साबित कर दिया है कि लोकतंत्र, या देश की सरकार सबसे गरीब के सबसे नाजुक वक्त में उससे हजार मील दूर बैठी हुई है, और दिल्ली में अपने ऐशोआराम की खूबसूरती बढ़ाने के लिए 20 हजार करोड़ रूपए मंजूर करके बैठी है, उसे खर्च करने पर आमादा है। देश के गरीबों को यह समझ आ गया है कि उनकी जगह सरकारों के लिए पांच बरस में एक बार पोलिंग बूथ के बाहर तो है, लेकिन उससे अधिक कुछ नहीं है। ऐसे में कुछ राज्य सरकारें अच्छा काम कर रही हैं, और यह बात भी इतिहास में अच्छी तरह दर्ज होगी। फिलहाल हम यह चाहते हैं कि जो लोग तरह-तरह के गढ़े हुए झूठ फैलाकर नफरत बढ़ाना चाहते हैं, उनके बीच कम से कम कुछ जिम्मेदार लोग तो बेहतर और महान इंसानों के त्याग के बारे में बाकी लोगों को बताएं, हो सकता है कि बाकियों में से कुछ को इससे प्रेरणा मिले, और हो सकता है कि बाकी में से कुछ ऐसे में घर बैठे शर्म खाकर चुल्लू भर पानी में डूब मरें। ऐसे लोगों के मरने से भी धरती पर से बोझ ही कम होगा। 
आज सोशल मीडिया गिनती में चाहे कम हो, लेकिन भले और सरोकारी लोगों की वजह से मानवता कही जाने वाली इस खूबी की कहानियां देख रहा है। इनसे सीखकर लोगों को खुश तो करना चाहिए। और कुछ नहीं तो सूखे बिस्किट और पानी की घर में भरी हुई साफ बोतलों को लेकर राह पर निकल पड़ें, और जहां जो दिखे उससे पूछते चलें, उसे देते चलें। ऐसे अनगिनत वीडियो सामने आए हैं जिसमें मजदूर सैकड़ों किलोमीटर बाकी सफर के लिए भी जरूरत से अधिक बिस्किट-पानी लेने से मना कर रहे हैं। कम से कम उन्हें देखकर ही और लोग कुछ सीख जाएं।
(Daily Chhattisgarh) 

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