बात की बात, 30 जून 2020

बात की बात, 30 जून 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 30 जून 2020

अपनी तकलीफों के बीच भी भारत यह भी सोचे कि बाकी दुनिया कैसे जिंदा रहे?

संपादकीय
24 जून 2020

हिन्दुस्तान में कोरोना से तबाह जनता की सेहत, और देश की अर्थव्यवस्था की सेहत में से अधिक गंभीर हालत किसकी है, यह अंदाज लगाना कुछ मुश्किल है। कोरोनाग्रस्त लोगों के आंकड़े देखें, और यह हकीकत देखें कि जांच काफी नहीं हो रही है, तो लगता है कि जनता की सेहत अधिक खतरे में है। दूसरी तरफ उद्योग-व्यापार, और रोजगार के जानकार लोगों की बातें सुनें, तो लगता है 2020 का यह पूरा साल ही तबाह हो चुका है, और आने वाले कई महीने हालात से उबरने की कोई गुंजाइश नहीं है। सुप्रीम कोर्ट जो कि कोरोना में मजदूरों के बुरे हाल को सुनने से ही इंकार कर चुका था, वह कई महीनों बाद देश के गरीबों की हालत को दखल के लायक मानकर उसकी सुनवाई कर रहा है, और मानो अपनी पहले की अनदेखी की भरपाई करने के लिए अब यह भी कह रहा है कि क्या सरकार का बैंकों की किस्त आगे खिसकाने के बाद उन किस्तों पर और अलग से ब्याज लेना चाहिए? खैर, अदालत की जुबानी जमाखर्च और अदालत के आदेश, इन दोनों का आपस में बहुत अधिक लेना-देना हो, ऐसा भी जरूरी नहीं है। लेकिन एक दूसरी बात की सोचने की जरूरत है कि हिन्दुस्तान से परे भी बाहर एक दुनिया है, और एक वक्त इस देश के नेता बाकी दुनिया के मुद्दों की भी फिक्र करते थे, जरूरतमंद देशों की मदद करते थे, और ऐसे देशों की हालत आज क्या है? 
भारत में तो अभी हम जब यह लिख रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का प्रसारण चल ही रहा है, और वे कह रहे हैं कि दीवाली और छठ तक लोगों को मुफ्त में राशन मिलना जारी रहेगा। यह मांग उनसे लगातार की जा रही थी, और कई राज्यों से केन्द्र के खाद्यमंत्री को चिट्ठी भी लिखी गई थी जिस पर आज यह घोषणा आई है। लेकिन आज एक दूसरी खबर बाकी दुनिया के बारे में है, जिसका एक बड़ा हिस्सा हिन्दुस्तान जितने अनाज वाला नहीं है, और उसकी जो हालत आने वाले वक्त में होने वाली है, वह दुनिया का भी नागरिक होने की वजह से हमें भी फिक्रमंद करता है। हिन्दुस्तान के लोग और यहां के नेता जब अपनी खुद की फिक्र से उबर सकें, तो हमसे अधिक भूखे लोगों के बारे में भी सोचने की जरूरत खड़ी हुई है। 
संयुक्त राष्ट्र संघ ने अभी नए आंकड़े जारी किए हैं जिनके मुताबिक कोरोना के पहले जितने लोग खाद्य असुरक्षा के शिकार थे, उनमें इस बरस के आखिर तक 82 फीसदी की बढ़ोत्तरी होते दिख रही है। कोरोना से प्रभावित देश अब तक तो मोटेतौर पर संपन्न और विकसित देश थे, लेकिन अब कोरोना की बीमारी और अर्थव्यवस्था पर इसका असर ये दोनों ही गरीब देशों तक पहुंच रहे हैं। जो देश पहले से खाद्य सुरक्षा पर जी रहे थे, वे देश अब तीन गुना रफ्तार से भुखमरी की ओर बढ़ रहे हैं। इनमें दुनिया का निम्न और मध्यम आय वाला शहरी समुदाय भी शामिल है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एजेंसी के मुताबिक रोजगार खत्म होने और कमाई में भारी गिरावट आने के कारण लोग अभावग्रस्त जिंदगी की ओर खिंचते जा रहे हैं। 
संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े एक ऐसी भयानक तस्वीर पेश कर रहे हैं जो कि हिन्दुस्तान के लोग भूल चुके हैं। हिन्दुस्तान में भूख से मौत एक इतिहास बन चुका है। कहीं किसी चूक की वजह से एक-दो ऐसी मौतें आज भी अगर सामने आ रही हैं, तो उनके लिए हिन्दुस्तान के हिन्दी भाषा में अपवाद नाम का एक शब्द बना हुआ है। भारत में केन्द्र सरकार और अधिकतर राज्य सरकारें देश में मौजूद अनाज के भंडार मौसम की मार से बचाने की हालत में भी नहीं हैं। अनाज इतना अधिक है कि वह गरीबी से टक्कर लेते दिखता है। ऐसे में आर्थिक मंदी कितनी भी हो जाए, अगले साल दो साल हिन्दुस्तान में लोगों के जिंदा रहने लायक अनाज शायद मिलते रहेगा। लेकिन यह सोचने की जरूरत है कि एक समय हिन्दुस्तान दुनिया के देशों के बड़े-बड़े संगठनों का अगुवा भी था। वह गरीब और जरूरतमंद देशों को मदद भी करता था, और उस वक्त भी करता था, जब वह खुद जिंदा रहने और आगे बढऩे के संघर्ष में लगा हुआ था। आज जिस तरह बहुत से गरीबों की ऐसी तस्वीरें आती हैं जो अपनी आधी रोटी तोडक़र अपने से अधिक भूखे को देते हैं, ऐसा काम हिन्दुस्तान करते आया है। लेकिन उसके लिए एक व्यापक नजरिये की भी जरूरत होती है, और यह समझ जरूरी होती है कि अपना पेट भरने के अलावा भी लोगों की व्यापक जिम्मेदारी होती है। क्या आज हिन्दुस्तान के लोग यह सोचने की हालत में हैं कि उनसे अधिक गरीब लोग दुनिया में भूखे मरने की कगार पर हैं, और अपनी तमाम दिक्कतों के बीच भी अपनी रोटी का एक कोना हमें उन लोगों के लिए भी भेजना चाहिए जो कि मदद न मिलने पर बड़ी संख्या में मरेंगे। हिन्दुस्तान के बहुत से लोग अपनी जिस संस्कृति पर गौरव करते हैं, और वसुधैव कुटुम्बकं जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं जिसका मतलब शायद पूरी दुनिया के एक परिवार होने जैसा कुछ है, उस संस्कृति के तहत क्या अपनी रोज की जरूरतों से परे भी उनकी कोई जिम्मेदारी है? 
देश के भीतर अपने से अधिक जरूरतमंद लोगों के काम आना, देश के बाहर अपने देश से अधिक जरूरतमंद लोगों के काम आना ही किसी देश को सही मायनों में विकसित, सभ्य, और महान देश बना सकता है। आज हिन्दुस्तान को अपनी परेशानियों के बीच भी यह देखना चाहिए कि वह दुनिया के सबसे गरीब देशों पर आई हुई इस कोरोना-मंदी के दौर में उनकी क्या मदद कर सकता है? जिनके घरों में बोरियों से अनाज रहता है, वे अगर किसी को कुछ किलो अनाज दे देते हैं, तो उसमें कोई बहुत बड़प्पन की बात नहीं है। बड़प्पन तो उसमें है कि जब आपके पास कुल एक रोटी हो, और आप उसमें से आधी रोटी किसी अधिक भूखे को देकर उसकी जिंदगी बचाएं। कई लोगों को यह बात फिजूल की लग सकती है कि देश की ऐसी हालत में दूसरे देशों का क्या सोचा जाए? लेकिन हर किसी को अपने से अधिक जरूरतमंद की फिक्र करनी चाहिए, और तंगनजरिया छोडऩा चाहिए। अभी तक हिन्दुस्तान की सरकार, यहां के विपक्ष के नेता, यहां का मीडिया, कहीं से भी हमें यह बात सुनाई नहीं पड़ी है कि भूख के मरने का खतरा झेलने वाले देशों की मदद के लिए हमें क्या करना चाहिए? आने वाले महीने बारिश के हैं, और हिन्दुस्तान में अनाज के खुले में रखे गए भंडार खराब होने जा रहे हैं, हर बरस की तरह। ऐसे में सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि आने वाले कई महीनों के लिए गरीबों को अनाज देना समझदारी होगी, या फिर उन घरों के लोग अनाज बेचकर शराब पी जाएंगे?
(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 जून 2020

भारत चारों तरफ से घिरा देशों के बागी तेवरों से...

संपादकीय
24 जून 2020


भारत को पड़ोस के देशों को लेकर फिक्र करना चाहिए। कल नेपाल के प्रधानमंत्री ने इशारा किया है भारत उनका तख्तापलट करने की कोशिश कर रहा है। नेपाल के साथ अचानक एक तनाव एक नक्शे को लेकर खड़ा हो गया जिसमें वहां की पूरी संसद सरकार के साथ हो गई, और भारत को मानो यह सूझ नहीं रहा है कि इस नौबत में क्या किया जाए। नेपाली प्रधानमंत्री के आरोपों में अगर सच्चाई है, और भारत पड़ोस के एक असहमत, बागी तेवरों वाले प्रधानमंत्री को पलटने की कोशिश पर्दे के पीछे से कर रहा है, तो भी भारत कुछ कर तो रहा है। चीन के साथ तो भारत इतना भी करते नहीं दिख रहा है। हालांकि आज सोशल मीडिया पर कार्टून तैरा है जिसमें कोई प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से कह रहा है कि चीन के 40-50 सांसद खरीदकर वहां की सरकार क्यों नहीं गिरा देते। जब सरहद का मामूली दिख रहा तनाव बढ़ते-बढ़ते दशकों की सबसे बड़ी शहादत बन जाए, और उसके बाद भी सरकार को यह समझ न पड़े कि इस टकराव का नाम इलाहाबाद है, या प्रयागराज है, या कोई तीसरा नाम है, तो भारत एक मुश्किल में दिखता है। अब तक भारत सरकार के बयानों से यह समझ नहीं पड़ रहा कि हकीकत क्या है। और फिर बात केवल चीन तक रहती तो भी समझ आता, बात तो आज एक बागी नेपाल की हो गई है, जिनकी चारों तरफ धरती से घिरा हुआ लैंडलॉक्ड देश है, और भारत पर कई तरह से आश्रित भी है। दोनों देशों के नियम-कानून में एक-दूसरे के लोगों के लिए एक बड़ा उदार दर्जा रहते आया है। ऐसे में चीन से टकराव के ठीक बीच में नेपाल से यह निहायत गैरजरूरी टकराव खड़ा होना एक फिक्र की बात है। फिर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि श्रीलंका इन दिनों पूरी तरह चीन के साथ है, और वहां पर बड़ा पूंजीनिवेश, बड़ा रणनीतिक निर्माण चीन कर रहा है, और वह भारत को एक किस्म से घेरने का एक काम भी है। चीन के साथ पिछला फौजी टकराव पिछली सदी में 60 के दशक में हुआ, और इस वक्त भारत-चीन सरहद से परे कुछ नहीं था। इस बार पाकिस्तान में चीन की बहुत ही दमदार मौजूदगी है, श्रीलंका तकरीबन उसके कब्जे में है, नेपाल आज की तारीख में चीन के साथ है और भारत के खिलाफ है। अब भूटान, म्यांमार, और बांग्लादेश बचते हैं, तो बांग्लादेश के साथ हाल के बरसों में लगातार तनाव चलते आया है, एक-दूसरे देश की यात्रा भी रद्द हुई है, और टकराव के मुद्दे बने हुए हैं। 
पिछले 6 बरस में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के रहते हुए, और उनके गुजर जाने के बाद भी पूरी की पूरी विदेश नीति अपने हाथ में रखी, और खुद अकेले उस मोर्चे पर अतिसक्रिय रहे। आज चीन को लेकर लोगों को यह गिनाने का मौका मिल रहा है कि नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में सबसे अधिक बार चीन जाने वाले मुख्यमंत्री रहे, प्रधानमंत्री के रूप में सबसे अधिक बार चीन जाने वाले प्रधानमंत्री रहे, दूसरे देशों में चीन के राष्ट्रपति से सबसे अधिक मुलाकातें करने वाले भी वे रहे, और हिन्दुस्तान में उन्होंने चीनी राष्ट्रपति का बड़ा ऐतिहासिक किस्म का दर्शनीय स्वागत करके पूरी दुनिया के सामने एक अनोखा नजारा पेश किया था। उसके बाद आज एकमुश्त हिन्दुस्तान के इतने फौजी बहुत भयानक तरीके से मार डाले गए, जितने कि पिछले 40-50 बरसों में मिलाकर भी चीनी सरहद पर नहीं मारे गए थे, एक भी नहीं मारे गए थे। 
यह तमाम नौबत देखकर यह लगता है कि भारत लौटते हुए नरेन्द्र मोदी बिना बुलाए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के घर के पारिवारिक जलसे में खुद होकर चले गए थे, और अजीब किस्म का इतिहास दर्ज किया था। ऐसी गलबहियों के बाद जिस तरह के सर्जिकल स्ट्राईक की नौबत आई, वह बड़ी अस्वाभाविक थी, और वह भारत की पाकिस्तान नीति की बहुत बुरी नाकामयाबी थी, आज भी है। आज भी पाकिस्तान के साथ रोटी-बेटी तक के रिश्ते खत्म हो चुके हैं, और बोलचाल तक खत्म है। मोदी सरकार की विदेश नीति का विश्लेषण करने वाले जानकार लोग बेहतर बता पाएंगे कि क्या उनकी तमाम विदेश नीति बड़े-बड़े इवेंट के मैनेजमेंट की कामयाबी तक सीमित रह गई? ऐसा इसलिए भी पूछना पड़ रहा है कि जिस अमरीकी राष्ट्रपति का उसके अपने देश के बाहर चुनाव प्रचार भारत ने अहमदाबाद से शुरू करवाया, उस ट्रंप ने उसके बाद से कई मौकों पर भारत की परले दर्जे की बेइज्जती की जो कि भारत-अमरीकी इतिहास में कभी नहीं हुआ था। मतलब यह कि कोरोना का खतरा झेलते हुए बहुत लंबा खर्च करके जिस तरह गुजरात में नमस्ते ट्रंप करवाया गया, उससे हासिल कुछ नहीं हुआ, सिवाय दुत्कार और धिक्कार के। 
किसी विदेशी नेता का स्वागत, या उसकी जमीन पर जाकर अपने खर्च से, अपने समर्थकों से एक स्टेडियम भरकर कामयाब कार्यक्रम, यह सब विदेश नीति की कामयाबी नहीं कहा जा सकता। मोदी सरकार ने इन बरसों में लगातार अपनी जमीन, और दूसरे देशों में बड़े अनोखे किस्म के कार्यक्रम किए, जो कि अभूतपूर्व थे, लेकिन न आज वर्तमान में वे काम आते दिख रहे हैं, और न ही उनसे भविष्य में कुछ हासिल दिखता है। अब खासकर चीन के साथ जो ताजा तनाव है, और उस बीच पड़ोस के दूसरे देशों के साथ चीन के अच्छे संबंध, और भारत के खराब संबंध की जो नौबत है, उन्हें देखते हुए यह भारत की मिलिटरी तैयारी के लिए सबसे महंगी नौबत दिख रही है, सबसे बड़ा खतरा भी दिख रहा है। हिन्दुस्तान के दो दर्जन फौजी शहीद हो गए, पहले चीन के साथ झड़प में, और अब उसी मोर्चे पर पुल बनाते हुए। आगे की नौबत बहुत फिक्र की दिखती है। यह हिन्दुस्तान में भयानक आर्थिक संकट, भयानक कोरोना संकट के बीच की नौबत भी है। मोदी सरकार के अभी चार साल बाकी हैं, उसे अपनी विदेश नीति के बारे में तुरंत दुबारा सोचना चाहिए कि महज दर्शनीय स्वागत और दर्शनीय कार्यक्रम को कितनी कामयाबी माना जाए?
(Daily Chhattisgarh)

आजकल : झूठ से बढ़ेगा फौजी मनोबल?

28 जून 2020

हिन्दुस्तानी फौज में ऊपर के चार सबसे बड़े अफसरों में से एक ओहदा होता है मेजर जनरल का। अभी एक रिटायर्ड मेजर जनरल ब्रजेश कुमार ने एक वीडियो पोस्ट किया जिसमें अमरीका के बनाए हुए अपाचे फौजी हेलीकॉप्टर पानी की सतह के करीब उड़ रहे हैं। ब्रजेश कुमार ने लिखा कि लद्दाख में भारतीय फौज के लिए हमलावर हेलीकॉप्टर उड़ रहे हैं। उन्होंने इस वीडियो के साथ अपनी खुशी और फौज की तारीफ भी पोस्ट की। 
दिक्कत यह है कि आज सोशल मीडिया और इंटरनेट की मेहरबानी से लोग तुरंत ही किसी तस्वीर या वीडियो की अग्निपरीक्षा ले लेते हैं। कुछ ही देर में लोगों ने पोस्ट करना शुरू किया कि ये हेलीकॉप्टर अमरीका में हूवर बांध के जलाशय के ऊपर उड़ रहे हैं, भारत को अमरीका से मिले अपाचे हेलीकॉप्टरों का रंग अलग है। एक दूसरे ने मेजर जनरल को याद दिलाया कि लद्दाख की यह झील अब किसी भी सेना की पहुंच से परे रखी गई है। फिर किसी ने लिखा कि यह अमरीका के एरिजोना की हवासू झील है। एक रिटायर्ड ब्रिगेडियर ने ध्यान दिलाया कि इस वीडियो के बारहवें सेकंड में एक विदेशी महिला की आवाज है। इतनी जानकारियां सामने आ जाने के बाद भी मेजर जनरल ब्रजेश कुमार अपनी बात पर अड़े रहे, उन्होंने जानकारी के लिए धन्यवाद तो दिया लेकिन लिखा कि यह वीडियो भारतीय फौज के लिए फीलगुडफैक्टर है। इस पर लोगों ने कहा कि नकली खबर से बना हुआ ऐसा फैक्टर किसी काम का नहीं रहता। कुछ और लोगों ने लिखा कि नकली वीडियो से सिर्फ बेवकूफ खुश हो सकते हैं। 
चीन के साथ चल रही मौजूदा तनातनी के बीच लोगों को अपनी देशभक्ति की नुमाइश के लिए कई किस्म के रास्ते निकालने पड़ रहे हैं। बहुत से लोग घर के टूटे-फूटे चीनी खिलौनों को सड़कों पर जलाकर प्लास्टिक का जहरीला धुआं पैदा करके चीन को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वे तमाम लोग जिनका कभी चीनी कच्चेमाल से वास्ता नहीं पड़ा, जिनकी रोजी-मजदूरी या जिनका कारोबार चीनी पुर्जों से नहीं जुड़ा है, जिन्होंने अपनी मेहनत की कमाई से चीन के सामान बुलाकर बिक्री के लिए गोदामों में नहीं रखे हैं, वे सारे लोग आज देशभक्ति साबित करने के बड़े आसान तरीके पर चल रहे हैं, और चीनी सामानों के बहिष्कार का फतवा दे रहे हैं। 
लेकिन हिन्दुस्तानी फौज में मेजर जनरल होकर रिटायर हुए इंसान को इतनी गंभीरता और इतनी ईमानदारी की उम्मीद की जाती है कि वे नकली वीडियो पोस्ट करके असली गौरव पैदा करने की जालसाजी न करें। लेकिन रिटायर्ड फौजियों का हाल टीवी चैनलों पर दिखता ही है जब वे समाचार बुलेटिनों के बीच विशेषज्ञ-जानकार की तरह पेश किए जाते हैं, और पहले पाकिस्तान के खिलाफ, और अब चीन के खिलाफ आग उगलते हुए स्टूडियो के कैमरों तक थूक उड़ाते हैं। इनकी उत्तेजना देखें तो लगता है कि जो-जो जंग लडऩे का इन्हें मौका नहीं मिला, उन सबको इस बुलेटिन के चलते-चलते लड़ लेंगे। 
एक नकली वीडियो से जिस फौजी जनरल को लगता है कि फौज का मनोबल बढ़ेगा, उन्हें नकली के नुकसान की समझ बिल्कुल नहीं है। अगर कोई लड़ाई खालिस सच के दम पर लड़ी जा सकती है, और उसमें लड़ाई के चलते अगर झूठ स्वयंसेवक होकर भी आकर जुड़ जाए, तो सच उस लड़ाई को हार बैठता है। सच तभी तक सच है, और ताकतवर है जब तक वह खालिस है। झूठ मिला, और सच की सारी ताकत गई। इसलिए यह समझने, याद रखने, और अमल करने की जरूरत हमेशा रहती है कि सच अगर किसी लड़ाई में कमजोर भी पड़ रहा है, तो भी उसे झूठ का सहारा नहीं लेना चाहिए। इस बात के साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि जब सच को आधा बताया जाता है, और आधा छुपा लिया जाता है, जिसे कि अर्धसत्य कहते हैं, तो वह सच झूठ से भी गया-गुजरा हो जाता है। अर्धसत्य न सिर्फ महत्वहीन रहता है, बल्कि जिस मुंह से निकलता है, उसकी सारी साख को चौपट कर देता है। अमरीका से भारी-भरकम काम देकर जो अपाचे हेलीकॉप्टर भारतीय फौज के लिए खरीदे गए हैं, उनकी ताकत से जो मनोबल बढऩा था, वह एक फर्जी वीडियो से टूट भी जाता है कि हिन्दुस्तानी फौज में आत्मगौरव और आत्मविश्वास के लिए फर्जी वीडियो लगने लगे हैं। 
आज सोशल मीडिया पर बहुत किस्म की वैचारिक लड़ाई लड़ी जा रही है। सैद्धांतिक बहसें चल रही हैं, और मनोवैज्ञानिक भी लड़े जा रहे हैं। अगर चर्चाओं पर भरोसा किया जाए तो भारत की एक सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी ने लाखों लोगों को सोशल मीडिया पर जनधारणा-प्रबंधन के काम में झोंक रखा है। अब लाखों लोगों का असली हिसाब, या ऐसी अफवाह की हकीकत तो वह पार्टी ही बता सकती है, लेकिन सोशल मीडिया पर किसी झूठ को, किसी हमले और किसी लांछन को फैलाने, खड़ा करने, और उससे किसी की चरित्र-हत्या करने के काम की विकरालता तो आए दिन दिखती ही है। यह साफ दिखता है कि अगर आप वैचारिक रूप से किसी से असहमत हैं, तो सोशल मीडिया पर आनन-फानन इतने अधिक लोग आप पर थूकने लगेंगे कि आपका सारा वक्त उस थूक से छुटकारा पाने में ही लग जाएगा, और वैसे गीले हाथों से आप की-बोर्ड पर आगे कुछ काम कर नहीं सकेंगे। 
लोगों को याद होगा कि बहुत बरस पहले सड़कों पर ठगने और लूटने के लिए एक लोकप्रिय तरीका यह था कि किसी के कपड़ों पर पखाना उछाल दिया जाए, और उसका पूरा ध्यान उसे साफ करने में लग जाए, और उसके साथ का सामान लूट लिया जाए। ऐसा हर कुछ दिनों में होता था, अखबारों में छपता था, फिर भी फेंके गए पखाने को देखते ही असर ऐसा होता था कि लोगों का सौ फीसदी ध्यान उसे धोने-पोंछने में लग जाता था। आज सोशल मीडिया पर ट्रोल कहे जाने वाले ऐसे भाड़े के राजनीतिक कार्यकर्ताओं या मजदूरों का काम यही रहता है कि रात-दिन असहमत लोगों पर पखाना फेंका जाए, ताकि वे अगली असहमति जाहिर करने के बजाय गालियों और धमकियों की टट्टी में ही उलझे रहें। असहमति की राजनीतिक या धार्मिक सोच रखने वाले लोगों का जीना हराम करके उन्हें सोशल मीडिया पर मुर्दा बना देने की साजिश और नीयत बहुत मामलों में साफ-साफ दिखती है। यह समझ आता है कि किसी की बीवी, बहन, बेटी, या मां के साथ बलात्कार करने की धमकी देकर उसके दिल-दिमाग का सुख-चैन को खत्म किया ही जा सकता है। 
ऐसे माहौल में सच कहना खासा खतरनाक है, और खासकर तब जबकि वह सच हिन्दुस्तान में कहा जाए, और वह अमरीका के काले लोगों के अधिकारों की हिमायत करने के बजाय हिन्दुस्तान के दलित-अल्पसंख्यकों के हक की बात करे। दूर निशाना लगाना ठीक है, महफूज है, लेकिन अपने आसपास निशाना लगाना खतरनाक है क्योंकि भाड़े के लोग आप पर टूट पड़ेंगे। यह भी है कि टूट पडऩे वाले तमाम लोग भाड़े के नहीं होंगे, कई लोग ऐसे भी होंगे जिनकी नफरत और हिंसा पर अपार आस्था होगी, और जो अमन-मोहब्बत की बातों को बर्दाश्त नहीं कर पाते होंगे। ऐसे लोग सौ फीसदी भाड़े के हत्यारे होंगे, यह कहना और समझना कुछ ज्यादती होगी, लेकिन ऐसे लोग ही हमलावर-ट्रोल आर्मी के सैनिक होंगे, भुगतान पाने वाले सैनिक होंगे, ऐसा जरूर लगता है। 
हिन्दुस्तान में तनाव के वक्त तरह-तरह की झूठी कहानियों को किसी बात को साबित करने के लिए गढ़ा जाता है। देश के सम्मान को बढ़ाने की कही जाने वाली कोशिशों के लिए सब कुछ जायज मान लिया जाता है, लेकिन देश की लड़ाई को भी महज सच पर टिकाए रखने की बात बहुत कम लोगों को सुहाती है जिन्हें लगता है कि मोहब्बत, जंग, और सोशल मीडिया पर समर्थन में सब कुछ जायज होता है। 
सब कुछ जायज तो दुनिया में किसी भी बात में नहीं होता। जो लोग मोहब्बत में सब कुछ जायज मानते हैं, उनकी मोहब्बत खतरे में जीती है, और वह किसी भी दिन खत्म हो सकती है, क्योंकि नाजायज बातें किसी को लंबे समय तक जिंदा नहीं रहने देतीं, न हिटलर को, न इमरजेंसी को, और न ही सतीप्रथा को। ऐसे में देश के आत्मगौरव को बढ़ाने के लिए, या अपनी फौज का मनोबल बढ़ाने के लिए सच को छुपाने या झूठ को सिर चढ़ाने की कोशिशें नुकसान ही करती हैं, कोई नफा नहीं करतीं। जिन लोगों को फौज से आम सवाल करना भी देश से गद्दारी लगती है, वे न सिर्फ फौज का, बल्कि देश का भी बड़ा नुकसान करते हैं। और ऐसा नुकसान करने में रिटायर्ड फौजियों की बड़ी हिस्सेदारी है, खासकर उनकी, जिनकी जिंदगी में अब सबसे बड़ी कामयाबी टीवी के कैमरों के सामने बने रहना रह गई है। 
 (Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 28 जून 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 28 जून 2020

मजाक से परे गोबर की अर्थव्यवस्था गांवों को कर सकती है मदद...

संपादकीय
24 जून 2020


छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार के तौर-तरीके कांग्रेस की आम राज्य सरकारों से कुछ हटकर हैं। यह सरकार इस राज्य में प्रचलित जनमान्यता के मुताबिक राम वनगमन पथ को पर्यटन के लिए विकसित करने की बात कर रही है, गांव-गांव में उसने पशुओं, जिनमें अधिकतर गायें ही हैं, उनके लिए दिन में रहने और खाने-पीने के इंतजाम में बड़ी रकम खर्च की है, अब वह गोबर खरीदने जा रही है जिससे पशु आधारित अर्थव्यवस्था को एक नया आयाम मिल सकता है। अब राम से लेकर गाय तक, और गोबर तक, ये तमाम तो  भाजपा के पसंदीदा भावनात्मक-प्रतीक रहे हैं, और इन्हें छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल एक बड़े पैमाने पर काम में ला रहे हैं। इस सिलसिले में पिछली भाजपा सरकार में लंबे समय तक ताकतवर मंत्री रहे हुए, आज के राज्य के गिने-चुने भाजपा विधायकों में से एक, अजय चंद्राकर ने गोबर को लेकर अटपटा हमला किया है, जो गौभक्त पार्टी से निकला हुआ नहीं दिख रहा। 
सरकार का गोबर खरीदना एक मजाक जैसा भी लग सकता है, लेकिन गांधी से लेकर आरएसएस तक, ऐसी एक लंबी सोच रही है कि गाय आधारित, पूरी तरह स्वदेशी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था बहुत सी दिक्कतों का हल हो सकती है। अभी हम सरकारी गोबर खरीद के कारोबारी पहलू का अंदाज नहीं लगा पा रहे हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार की इस योजना से कुल मिलाकर गांव और गरीब इन दो का फायदा होगा। अब फायदा इन तक पहुंचते हुए बीच में लोग उसका बड़ा हिस्सा रख लें, तो उस पर निगरानी रखना एक बड़ा मुश्किल काम होगा, लेकिन गोबर शब्द को लेकर अजय चंद्राकर के बयान से चाहे जितनी ही हिकारत निकली हो, गोबर शब्द इस देश के गांवों का एक प्रतीक है, और आज जब शहरों से करोड़ों मजदूर अपने गांवों को लौटे हैं, तो गांव आधारित अर्थव्यवस्था पर फिर से सोचने, और गंभीर कोशिश करने की जरूरत है। हमने इसी जगह पिछले तीन महीनों में दो-चार बार इस बात पर जोर दिया है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कुटीर उद्योग, गांव आधारित कृषि से जुड़े दूसरे कई तरह के काम, फल-फूलों की खेती, रेशम के कीड़ों से लेकर लाख के कीड़ों तक, और मधुमक्खियों तक को पालने की तकनीक, ऐसी सैकड़ों बातें हैं जो लोगों को गांव में जिंदा रहने में मदद कर सकती हैं, और जो उनकी जिंदगी को बेहतर भी बना सकती हैं। छत्तीसगढ़ जैसा राज्य तो भरपूर खेतिहर-मजदूरी वाला राज्य है, इसने मनरेगा जैसी मजदूरी-योजना में भी अच्छा काम किया है, गांव-गांव में गोठान बनाने में भी लोगों को काम मिला है, और अब अगर गोबर को हम एक प्रतीक के रूप में मानें, तो इसे भी आर्थिक रूप से मुमकिन बनाना सरकार के लिए एक अच्छी चुनौती हो सकती है। यह समझना चाहिए कि आज शहर केन्द्रित अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन लॉकडाऊन में फ्लॉप साबित हो चुके हैं, अमानवीय साबित हो चुके हैं, और करोड़ों लोग गांवों तक वापिस आए हैं। इसे हम कोई स्थायी व्यवस्था नहीं मानते क्योंकि लोग फसल के बाद शहरी, कारोबारी और औद्योगिक रोजगार में लौटने भी लगेंगे, क्योंकि गांव में मजदूरी उतनी नहीं मिलेगी। इसके बावजूद सरकार को मजदूरी से परे भी गांवों में ऐसे आर्थिक अवसर उपलब्ध कराने चाहिए जिससे लोग अगर चाहें तो वे गांव में रहकर कमा-खा सकें, और मनरेगा की मजदूरी से बचे हुए दिनों का भी इस्तेमाल कर सकें।
हिन्दुस्तान में परंपरागत रूप से इतने ग्रामीण उद्योग, और ग्रामीण-काम चलते आए हैं कि वे खेती के साथ मिलकर गांवों को आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर ले जा रहे थे। लेकिन शहरी जिंदगी की चकाचौंध और वहां आगे बढऩे के मौकों ने गांवों से लोगों को शहर की तरफ दौड़ा दिया था, आज भी यह सिलसिला चल रहा है। गांव आज भी सामाजिक अन्याय का डेरा हैं, वे अभी भी छुआछूत और जात-पात, लैंगिक असमानता का केन्द्र हैं। ऐसे में शहर से आए हुए लोगों को गांवों में बांधकर रखना आसान तो नहीं होगा, लेकिन यह एक ऐसा मौका है जब दूसरे प्रदेशों में अधिक मेहनत करके जीने वाले मजदूरों को अपने ही गांवों में जिंदा रहने का एक मौका दिया जा सकता है, और इसके साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को विकसित भी किया जा सकता है। इस देश में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बड़ा लंबा इतिहास अच्छी तरह दर्ज है, इसलिए हम उसे यहां अधिक खुलासे से गिनाना गैरजरूरी समझते हैं, लेकिन सरकार को इसे बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाना चाहिए। देश में ग्रामीण विकास के, डेयरी के बहुत से संस्थान हो गए हैं। देश में लाखों एनजीओ भी इस काम में लगे हैं। आईआईटी से लेकर आईआईएम तक तकनीक विकसित करने का काम हुआ है जिनसे हाथों का काम करने के औजार, गांवों की उपज, फसल में वेल्यूएडिशन के लिए फूड प्रोसेसिंग जैसे काम की अपार संभावना है। आज छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था मोटे तौर पर धान की सरकारी खरीदी में मिलने वाले मोटे बोनस पर आधारित हो गई है, इसके साथ-साथ गरीब की जिंदगी रियायती चावल से चल रही है। इन दो किस्मों की रियायतों को अनंतकाल तक चलाने के बजाय लोगों की कमाई बढ़ाना एक बेहतर रास्ता है, और गोबर कामयाब हो या न हो, सरकार का रूझान गरीब और ग्रामीण के भले के लिए रहना चाहिए, और इसके कई दूसरे तरीके भी निकाले जा सकते हैं। यह भी समझने की जरूरत है कि गोबर से बनने वाले छेना और कंडे का बड़ा इस्तेमाल हिन्दू अंतिम संस्कार में किया जा सकता है। इसी राज्य में राजनांदगांव में सारे अंतिम संस्कार सिर्फ छेने से होते हैं, और लकड़ी का जरा भी इस्तेमाल नहीं होता। सरकार की दखल से ऐसा इस्तेमाल बढ़ सकता है, और खेतों में भी गोबर की खाद काम आ सकती है। आगे देखना है कि सरकार इसमें कितनी कामयाब होती है। 
(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 जून 2020

अमरीकी कारोबारियों ने दुनिया के सामने एक मिसाल रखी है..

संपादकीय
24 जून 2020


फेसबुक दुनिया का सबसे कामयाब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है, और सच तो यह है कि सोशल मीडिया शब्द कहते ही पहला ख्याल फेसबुक का ही आता है। इस शब्द के इतिहास पर जाएं तो शायद सबसे असरदार फेसबुक ही दिखाई पड़ता है, और यह इतिहास वर्तमान बन चुका है, और बहुत से लोगों को इसका खासा लंबा भविष्य दिखता है। लेकिन अपनी तमाम शोहरत के बावजूद फेसबुक पर ये तोहमतें हमेशा लगती रहीं कि वह अपने इस्तेमाल करने वालों की निजी जानकारियों को बाजार की कंपनियों को विश्लेषण के लिए बेचता है, और अमरीका के पिछले राष्ट्रपति चुनाव में उस पर ये आरोप भी लगे कि उसने चुनाव को प्रभावित करने वाली दुर्भावना की पोस्ट, विज्ञापन, इनको मालूम होते हुए भी नहीं रोका। बात बढ़ते-बढ़ते यहां तक आ गई कि अभी अमरीका की कई कंपनियों ने फेसबुक की लोकप्रियता के बावजूद उस पर इश्तहार देना बंद कर दिया, और इसकी खुली घोषणा भी कर दी। उनका मानना है कि फेसबुक पर गलत जानकारियां पोस्ट होती हैं, लोकतांत्रिक चुनावों को प्रभावित करने का काम होता है, और फेसबुक इसे रोकने के लिए कुछ नहीं करता। इस बहिष्कार से फेसबुक से 7.2 बिलियन डॉलर के इश्तहार हट गए, जिससे इस कंपनी के शेयर का दाम 8.3 फीसदी गिर गया। एक कंपनी, यूनीलीवर, ने यह भी कहा कि वह इस साल के अंत तक फेसबुक के दूसरे कारोबारों से भी अपने विज्ञापन बंद कर देगी। शेयर बाजार में रेट टूटने से फेसबुक की मार्केट वेल्यू 56 बिलियन डॉलर हट गई, और इसके मालिक मार्क जुकरबर्ग की निजी संपत्ति 82.3 बिलियन डॉलर घट गई। 
इस तरह का कारोबारी नुकसान पहले कभी देखा-सुना नहीं है, क्योंकि सोशल मीडिया पर कुछ और कंपनियां भी हैं, और अमरीका में मीडिया कारोबार में भी बहुत सी कंपनियां हैं जिन पर पूर्वाग्रह का आरोप लगता है। लेकिन ऐसा बहिष्कार पहले किसी का याद नहीं पड़ता। दरअसल पिछले राष्ट्रपति चुनाव को लेकर अमरीका ने यह महसूस किया कि ट्रंप की जीत के पीछे रूस की मदद से लेकर फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म के अनैतिक इस्तेमाल सबका बड़ा हाथ रहा। अमरीकी कंपनियां दुनिया के बाहर चाहे जैसी हों, देश के भीतर उन्होंने कम से कम इस बार एक अलग तरह की जागरूकता दिखाई है, और जिससे शिकायत है उसके पेट पर लात मारी है। अब अमरीका के इस घरेलू मुद्दे को लेकर आज हमें इस जगह पर क्यों लिखना चाहिए? शायद इसलिए कि हिन्दुस्तान की कंपनियों और यहां के कारोबार का इस बात से कोई लेना-देना नहीं रहा कि कौन सा मीडिया, कौन सा सोशल मीडिया किस तरह के सरोकार वाला है, या बिना सरोकार का है। व्यापार की दिलचस्पी अखबारों की प्रसार संख्या, टीवी चैनलों की टीआरपी, और वेबसाईटों की हिट्स पर रही। किसी मीडिया को महत्वपूर्ण मानने का एकमात्र पैमाना अंकगणित रहा, और अंकों का खुद का भला क्या सरोकार हो सकता है? अंक तो लोगों के हाथ के खिलौने होते हैं जिन्हें इस्तेमाल करने वाले अपने हिसाब से अच्छे या बुरे काम में काम लाते हैं। मदर टेरेसा की संस्था भी शून्य से 9 तक के अंकों से अपने खातेबही चलाती है, और किसी समाजसेवी संस्था को दान देने वाले दुनिया के बहुत से माफिया भी इन्हीं 10 अंकों से अपना हिसाब रखते हैं। हिन्दुस्तान में विज्ञापन देने के लिए कारोबारी और विज्ञापनदाता जिन अंकों के फैसले मानते हैं, उन अंकों को हासिल करने के लिए तरह-तरह के अनैतिक काम किए जाते हैं। हिट्स बढ़ाने के लिए वेबसाईटें जिस तरह के अश्लील फोटो और वीडियो पोस्ट करती हैं, और उनकी वजह से पोर्नोग्राफी के जिस तरह के इश्तहार भी उन पर आते हैं, उनसे हिन्दुस्तान के बाजार तो बाजार, यहां की सरकारों के इश्तहारों के फैसले भी प्रभावित नहीं होते। अंकों की स्केल पर नापना आसान होता है, उत्कृष्टता, सरोकार, और नीयत की स्केल पर नापना बड़ा मुश्किल होता है। 
आज अमरीका की कई कंपनियों ने जो जागरूकता दिखाई है, और अपने कारोबारी हितों से परे जाकर सामाजिक सरोकार के लिए, लोकतंत्र को नाजायज असर से बचाने के लिए जो फैसला लिया है, उसके बारे में दूसरे देशों के जिम्मेदार और समझदार कारोबारियों को भी सोचना चाहिए। चोली के पीछे क्या है, ऐसी तस्वीरों और ऐसे वीडियो पर हजार गुना अधिक हिट्स मिलते हैं, बजाय भूखे-सूखे पेट के पीछे वजह क्या है, के मुकाबले। हिन्दुस्तान का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपनी आत्मा को बेच देने के लिए तोहमतें झेल-झेलकर अब जायज ही बदनाम होते दिख रहा है। दूसरी तरफ बाजार से अधिक सरकार और राजनीतिक दल सभी किस्म के मीडिया को जेब में रखते दिख रहे हैं। जब बाजार अच्छे और बुरे में कोई फर्क नहीं करेगा, और मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक लोग अपने अस्तित्व के लिए सरकार के मोहताज रहेंगे, तो ऐसी ही नौबत आएगी। हिन्दुस्तान के उद्योग-व्यापार के जवाबदार लोगों को सोचना चाहिए कि उनका कारोबारी सहयोग लोकतंत्र को बचाने वाले मीडिया को होना चाहिए, या लोकतंत्र को मिटाने के लिए अपनी आत्मा बेच चुके मीडिया को? अगर महज आंकड़े ही लोगों की समझ हैं, तो फिर हिरोशिमा-नागासाकी पर गिराए गए बम बनाने वाले वैज्ञानिकों ने भी तो सिर्फ आंकड़ों की समझ से बम बनाया था, उसके गिरने से इंसानों की होने वाली तबाही को नापना उतना आसान नहीं था। लोग महज बम गिराकर तबाही नहीं लाते, लोग लोकतंत्र में किसी जिम्मेदार सरोकार को अनदेखा करके भी तबाही ला सकते हैं। कारोबार में समझ है, या महज केलकुलेटर, इस पर बहुत कुछ निर्भर करता है, और अमरीकी कारोबारियों ने दुनिया के सामने एक मिसाल रखी है जिस पर चर्चा होनी चाहिए। 
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 26 जून 2020

भारत की ऊंची अदालतों में भी महिलाविरोधी पूर्वाग्रह

संपादकीय
24 जून 2020


महिलाओं को लेकर भारतीय समाज में पुरूषों की जो आम सोच है, वह कदम-कदम पर सामने आती है। हजारों बरस से मर्द की जो हिंसक सोच हिन्दुस्तानी औरत को कुचल रही है, वह कहीं गई नहीं है। एक वक्त गुफा में जीने वाले इंसानों पर बने कई कार्टून बताते थे कि गुफा का आदमी अपनी औरत के बाल पकड़कर उसे घसीटते हुए ले जा रहा है। गुफाओं में जीना हजारों बरस पहले खत्म हो गया, लेकिन आदमी की मुट्ठी से औरत के बाल नहीं निकल पाए। और तो और जजों की कुर्सी पर बैठे हुए लोग भी अपनी मुट्ठी तब से लेकर अब तक भींचे हुए हैं, यह एक अलग बात है कि हिन्दुस्तानी औरतों का एक तबका उस मुट्ठी के बाहर अपने बाल कैंची से काटकर, शरद यादव जैसे समाजवादी और अमूमन सुलझे हुए नेताओं से परकटी कहलवाने का खतरा लेते हुए भी मुट्ठी से दूर हो चुका है। फिर भी हिन्दुस्तानी मर्द है कि मुट्ठी में दबी बालों की लट को अपनी जीत मानकर मन ही मन औरत को घसीटते हुए चलता है। लेकिन ऐसे में जब यह मर्द किसी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज की कुर्सी पर बैठ जाता है, तो दिक्कत खड़ी हो जाती है। 
अभी कर्नाटक हाईकोर्ट में बलात्कार का एक मामला पहुंचा तो वहां के जज, जस्टिस कृष्ण एस. दीक्षित ने अपने फैसले में शिकायत करने वाली महिला के चाल-चलन के बारे में कई किस्म के लांछन लगाए। उन्होंने इस महिला के बारे में कहा- महिला का यह कहना कि वह बलात्कार के बाद सो गई थी, किसी भारतीय महिला के लिए अशोभनीय है। महिलाएं बलात्कार के बाद ऐसा व्यवहार नहीं करती हैं। 
यह कहते हुए जज ने आरोपी की अग्रिम जमानत मंजूर कर दी। जज ने इस मामले में कई ऐसी टिप्पणियां कीं जिनका आरोप से कोई संबंध नहीं है, और जिनसे महिला के चाल-चलन के बारे में एक बुरी तस्वीर बनती है। जस्टिस दीक्षित ने कहा- शिकायतकर्ता ने यह नहीं बताया है कि वे रात 11 बजे उनके दफ्तर क्यों गई थीं, उन्होंने आरोपी के साथ अल्कोहल लेने पर एतराज नहीं किया, और उन्हें अपने साथ सुबह तक रहने दिया। शिकायतकर्ता का यह कहना कि वह अपराध होने के बाद थकी हुई थीं, और सो गई थीं, भारतीय महिलाओं के लिए अनुपयुक्त है। हमारी महिलाएं बलात्कार के बाद ऐसा व्यवहार नहीं करतीं। शिकायतकर्ता ने तब अदालत से संपर्क क्यों नहीं किया जब आरोपी ने कथित तौर पर उन पर यौन संबंध के लिए दबाव बनाया था? 
यह सोच चूंकि हाईकोर्ट जज की कुर्सी से निकली है, इसलिए बहुत भयानक है। इस कुर्सी तक बलात्कार के शायद तीन चौथाई मामलों पर आखिरी फैसले हो जाते हैं, और इसके ऊपर की अदालत तक शायद बहुत कम फैसले जाते होंगे। ऐसे में बलात्कार का आरोप लगाने वाली एक महिला की मानसिक और शारीरिक स्थिति, बलात्कार के साथ उसके सामाजिक और आर्थिक संबंधों की बेबसी की कोई समझ अदालत के इस अग्रिम-जमानत आदेश में नहीं दिखती। जज की बातों में एक महिला के खिलाफ भारतीय पुरूष का वही पूर्वाग्रह छलकते दिखता है जो कि अयोध्या में सीता पर लांछन लगाने वाले का था। एक महिला के खिलाफ भारत में पूर्वाग्रह इतने मजबूत हैं कि उसके पास अपने सच के साथ धरती से फटने की अपील करते हुए उसमें समा जाने के अलावा बहुत ही कम विकल्प बचता है। जब देश का कानून शब्दों और भावनाओं दोनों ही तरह से किसी महिला को बलात्कार के मामले में पुरूष के मुकाबले अधिक अधिकार देता है, तब उसकी नीयत पर शक करते हुए, उसकी शारीरिक और मानसिक स्थिति की एक डॉक्टर और मनोचिकित्सक जैसी व्याख्या करते हुए एक जज ने जैसी बातें कही हैं, वे सुप्रीम कोर्ट में जाकर पूरी तरह से खारिज होने लायक हैं। बलात्कार के कानून का बेजा इस्तेमाल होता होगा, ऐसे मामले के आरोपी को जमानत या अग्रिम जमानत देना जज का विशेषाधिकार होता ही है, लेकिन ये टिप्पणियां तमाम भारतीय महिलाओं के लिए बहुत बुरी अपमानजनक हैं, और भारतीय पुरूषवादी सोच का नमूना है जो यह तय करती है कि भारतीय महिला का आचरण कैसा होना चाहिए, उसके तौर-तरीके कैसे होने चाहिए, उसे किसके साथ, कब और कहां शराब पीनी चाहिए, कब नहीं पीनी चाहिए, और बलात्कार के बाद उसे थक जाने का कोई हक नहीं है, उसे सो जाने का कोई हक नहीं है। अदालत उस महिला पर यह सवाल भी खड़ा करती है कि जब उससे यौन संबंध के लिए दबाव बनाया गया था, उसी वक्त वह अदालत क्यों नहीं आई। 
जज की इन बातों से भारतीय समाज की हकीकत, और उसमें महिलाओं की कमजोर स्थिति, पुरूष की हिंसा के बारे में उनकी कोई समझ दिखाई नहीं पड़ती है। उनके अपने पूर्वाग्रह जरूर चीखते हुए दिखाई पड़ते हैं, लेकिन ये न्याय से कोसों दूर हैं, और तकलीफ की बात यह भी है कि ये अपने आपमें अकेले नहीं हैं, इसके पहले भी बहुत से जजों ने बलात्कार की शिकार महिला के बारे में ऐसी ही पुरूषवादी और हिंसक सोच दिखाई है, जिसके चलते वहां से किसी महिला को इंसाफ मिलना नामुमकिन सा लगता है। इससे एक और बात भी उठती है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को न सिर्फ इस मामले में बल्कि कई दूसरे किस्म के मामलों में भी उनके पूर्वाग्रह से परे कैसे रखा जा सकता है? यह बात तो तय है कि किसी के पूर्वाग्रह आसानी से नहीं मिटाए जा सकते। लेकिन यह तो हो सकता है कि पूर्वाग्रहों की अच्छी तरह शिनाख्त पहले ही हो जाए, और फिर यह तय हो जाए कि ऐसे जजों के पास किस तरह के मामले भेजे ही न जाएं। 
जिन लोगों को अमरीका में जजों की नियुक्ति के बारे में मालूम है वे जानते हैं कि बड़ी अदालतों के जज नियुक्त करते हुए सांसदों की कमेटी उनकी लंबी सुनवाई करती है, और यह सुनवाई खुली होती है, इसका टीवी पर प्रसारण होता है। और यहां पर सांसद ऐसे संभावित जजों से तमाम विवादास्पद और संवेदनशील मुद्दों पर उनकी राय पूछते हैं, उनसे जमकर सवाल होते हैं, उनके निजी जीवन से जुड़े विवादों पर चर्चा होती है, और देश की अदालतों के सामने कौन-कौन से मुद्दे आ सकते हैं उन पर उनकी राय भी पूछी जाती है। कुल मिलाकर निजी जीवन और निजी सोच इनको पूरी तरह उजागर कर लेने के बाद ही उनकी नियुक्ति होने की गुंजाइश बनती है। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जजों की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट ने अपने हाथ में रखी है, और वहीं से नाम तय होकर प्रस्ताव सरकार को जाते हैं। ऐसे में जजों की सामूहिक सोच से परे किसी और तरह की सोच आने की गुंजाइश नहीं रहती। भारत में भी जजों की नियुक्ति पर न्यायपालिका के ऐसे एकाधिकार के खिलाफ बात उठती रहती है, लेकिन न्यायपालिका इस एकाधिकार को मजबूती से थामे रखती है। 
संसद में लोकसभा में निर्वाचित होकर जो सांसद पहुंचते हैं, उनकी जमीनी हकीकत की समझ किसी भी जज से अधिक होती है। लेकिन उनकी उस समझ का कोई इस्तेमाल जजों को बनाने में नहीं होता। हमारा ख्याल है कि हिन्दुस्तान में जजों के सारे पूर्वाग्रह पहले ही उजागर हो जाने चाहिए। और इसके साथ ही यह भी दर्ज हो जाना चाहिए कि उन्हें किस किस्म के मामले न दिए जाएं, या कि उन्हें नियुक्त ही न किया जाए।
हमारा यह भी मानना है कि देश के सुप्रीम कोर्ट को अलग-अलग राज्यों के हाईकोर्ट के फैसलों की ऐसी व्यापक असर वाली बातों का खुद होकर नोटिस लेना चाहिए, और इसके लिए कौन सा सुधार किया जा सकता है उसका एक रास्ता निकालना चाहिए। एक तरफ तो देश में सामाजिक आंदोलनकारी बरसों तक बिना जमानत जेल में सड़ते हैं, दूसरी तरफ बलात्कार के आरोप से घिरे लोग इस तरह अग्रिम जमानत पा रहे हैं, यानी गिरफ्तारी के पहले ही उन्हें जमानत मिल जा रही है। यह पूरा सिलसिला देश की न्याय व्यवस्था में खामियों और कमजोरियों का एक नमूना है, और अगर न्यायपालिका इसे खुद दूर करने में सक्षम नहीं है, तो संसद को सामने आना चाहिए, यह एक अलग बात है कि संसद के पास देश के असल मुद्दों के लिए कोई समय नहीं है, और बहस के लिए संसद के विपक्ष के पास पर्याप्त संख्या नहीं है। ऐसे में सत्ता की मर्जी के बिना कुछ हो पाना मुमकिन नहीं है, और सत्ता की प्राथमिकता पता नहीं कभी जनता की ऐसी जरूरतों, उसके साथ ऐसे इंसाफ तक पहुंच पाएगी या नहीं।  
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM

कुनबापरस्ती क्या सिर्फ फिल्म-टीवी में ही है?

संपादकीय
25 जून 2020

एक अभिनेता सुशांत राजपूत की खुदकुशी के बाद से लगातार सोशल मीडिया पर लोग मुम्बई के टीवी और फिल्म उद्योग को कोस रहे हैं, वहां पर चल रहे भाई-भतीजावाद, बेटा-बेटीवाद को गालियां दे रहे हैं, और सोशल मीडिया से परे भी फिल्म-टीवी उद्योग के कुछ बड़े चेहरे इस दुनिया में कुनबापरस्तीतले कुचलने वाली प्रतिभाओं की यादें सामने रख रहे हैं। यह पहला मौका नहीं है जब बॉलीवुड के लिए इन बातों को याद किया गया है, और न ही यह आखिरी मौका होगा, दिक्कत यही है कि लोग एक कारोबार को कुनबापरस्ती से आजाद देखना चाहते हैं। 
हमें यह मानने में कोई दिक्कत नहीं है कि फिल्म-टीवी उद्योग में, संगीत की दुनिया में लोग अपने परिवार के लोगों को बढ़ावा देते होंगे। दूसरी तरफ इसी मुम्बई में आधी सदी से यह कहानी खूब जमी हुई है कि किस तरह लता मंगेशकर ने अपनी ही सगी छोटी बहन आशा भोंसले को कभी आगे नहीं बढऩे दिया, कदम-कदम पर रोड़े अटकाए। और मुम्बई में एक फिल्म भी इन दोनों के इस पहलू को लेकर बनी थी। फिल्म, टीवी और संगीत एक खालिस कारोबार हैं। इनमें ढेर सारा पैसा पहले लगाना पड़ता है, और उसके बाद कुछ चुनिंदा फिल्मों या टीवी सीरियलों को कमाई होती है, जिन्हें देखकर बाकी लोग इधर-उधर से जुटाकर पूंजीनिवेश करते रहते हैं, और डूबते रहते हैं। अब कोई कारोबार धर्मार्थ काम तो हो नहीं सकता कि उसमें फायदे की उम्मीद के बिना पैसा डाला जाए। फिर दूसरी बात यह भी है कि दुनिया का कौन सा ऐसा कारोबार है जिसमें कारोबारी अपनी अगली पीढ़ी को आगे नहीं बढ़ाते, और विरासत देकर नहीं जाते? डॉक्टरों की संतानें बनते कोशिश मेडिकल साईंस पढ़कर उनके अस्पताल सम्हालती हैं, वकीलों की संतानें वकील बनकर उनके चेम्बर की प्रैक्टिस सम्हालती हैं, और बहुत सारे, तकरीबन हर कारोबार में अगली पीढ़ी के लिए, या अगली पीढ़ी की पहली पसंद पारिवारिक पेशा होता है। इसलिए अगर लोग अपने पूंजीनिवेश से अपनी औलादों को आगे बढ़ाते हैं, तो इसमें कोई अटपटी बात नहीं है। हिन्दुस्तान जैसे देश में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में वकालत करने वाले लोगों में एक तबका ऐसे लोगों का रहता है जो कि जजों के परिवार के होते हैं, उनके रिश्तेदार होते हैं, या जजों के दोस्तों की संतानें होती हैं। ऐसे में देश की सबसे बड़ी अदालतों में अंकल-जज की एक संस्कृति जगह-जगह सुनाई पड़ती है, और शायद ही कोई जज इस चर्चा से इंकार कर पाए। हिन्दुस्तान के मीडिया कारोबार को देखें तो दो-दो, तीन-तीन पीढिय़ां मालिकाना हक पा रही हैं, और एक के बाद एक पीढ़ी संपादक भी बन जा रही है, प्रकाशक भी बन जा रही है। इसलिए सिर्फ फिल्म उद्योग को तोहमत देना तो बहुत ही नाजायज होगा। फिर यहभी है कि फिल्म उद्योग कला, तकनीक, रचनात्मक लेखन, पूंजीनिवेश, और मार्केटिंग का इतना जटिल कारोबार है कि उसमें हर किसी की अपनी पसंद हो सकती है, अपनी प्राथमिकता हो सकती है। किसी फिल्म में किसी कलाकार की भूमिका को कम या अधिक करना कुनबापरस्ती के तहत भी हो सकता है, और किसी रचनात्मकता के तहत भी। इसलिए फिल्म और टीवी को कारोबार के प्रचलित तौर-तरीकों से अलग देखने की उम्मीद निहायत ही आदर्शवाद की बात होगी, कोई दुकानदार अपनी औलाद को गद्दी देने के बजाय क्या दुकान के सबसे काबिल या सबसे पुराने नौकर को मालिक बनाकर जाता है? 
चूंकि फिल्म, टीवी, और संगीत खबरों में आसानी से सुर्खियां पा जाते हैं, इसलिए वहां विवाद न रहने पर भी विवाद ढूंढकर, या खड़ा करके खबरें बना ली जाती हैं। लता मंगेशकर की एक मिसाल हमने दी है, दूसरी और भी कई तरह मिसालें सामने हैं जो बताती हैं कि किसी बड़े कामयाब फिल्मकार की औलाद होने से ही सब कुछ नहीं हो जाता। ऐसा अगर होता तो आज 77 बरस की उम्र में देर रात और सुबह तक ओवरटाईम करने वाले अमिताभ बच्चन क्या अपने बेटे को और अधिक फिल्में दिलवाने की चाहत नहीं रखते? अभिषेक बच्चन फिल्म उद्योग के सबसे बड़े और सबसे कामयाब अभिनेता के बेटे होने के बावजूद तकरीबन बेरोजगार हैं। अभी कुनबापरस्ती के चल रहे विवाद में भी उन्होंने इस बात को कहा है। ऐसी मिसालों को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए क्योंकि जिस एकता कपूर के बनाए सीरियल्स से हिन्दुस्तानी टीवी चैनल चलते हैं, उसी एकता कपूर का भाई फिल्मों में तीसरे-चौथे या छठवें किरदार से ऊपर कभी कुछ नहीं पा सका। इस परिवार के पास तो पैसा भी था, खुद का प्रोडक्शन हाऊस भी था लेकिन घर का लड़का छोटे-मोटे काम पाकर रह गया। 
जहां तक भेदभाव और मुकाबले की बात है, तो जिंदगी के हर पेशे और हर दायरे में इस तरह की बात होती है। मीडिया को ही देखें तो इसमें हमेशा से यह तोहमत लगती रही है कि किस बड़े संपादक की पसंद के कौन से रिपोर्टरों को चर्चित मामलों पर काम करने मिलता था, क्यों मिलता था, समर्पण न करने पर किस तरह काम नहीं भी मिलता था। यह बात यूनिवर्सिटी और कॉलेज में बड़े प्रोफेसरों के मातहत जूनियरों तक भी रहती है कि किसको मर्जी के विषय पढ़ाने मिलते हैं, किसे शोध करने मिलता है, किसे कौन सा प्रोजेक्ट मिलता है। भारतीय राजनीति में देखें तो कुनबापरस्ती की मिसालें इतनी अधिक और इतनी भयानक हैं कि उनकी फेहरिस्त से यह पूरा पन्ना ही भर जाए। और तो और सांस्कृतिक, सामाजिक, और समाजसेवी संगठनों में भी लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी कायम रहते हैं। 

हमारा ख्याल है कि फिल्म-टीवी उद्योग और संगीत का कारोबार बहुत ही जटिल धंधा हैं, और इनमें व्यक्तिगत पसंद, या व्यक्तिगत नापसंद दिखने वाली बहुत सी बातें हो सकता है कि न्यायसंगत भी हों, तर्कसंगत भी हों। यह भी हो सकता है कि वे पसंद और नापसंद की बुनियाद पर टिकी हों जैसी बुनियाद हर कारोबार और हर पेशे में दिखाई पड़ती है। फिल्मों की खबरें खूब बिकती हैं, इसलिए वहां से खूब सारा झूठ, खूब सारी गंदगी, और खूब सारी तोहमतें सभी सामने आती हैं। उसकी हकीकत वे ही लोग जानें, लेकिन ऐसी बातें अगर सच भी हैं तो वे सिर्फ इसी ग्लैमरस दुनिया तक सीमित बातें नहीं हैं, और उन्हें उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए जितना कि कोर्ट में अंकल-जज संस्कृति को दिया जाता है, या मीडिया में एमजे अकबर संस्कृति को दिया गया है। चारों तरफ हाल एक सा है, यह दुनिया खबरों में कुछ अजीब है, बस।
कल शाम से लेकर 
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 25 जून 2020

बात की बात, 24 जून 2020

बात की बात, 24 जून 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 24 जून 2020

डिजिटल समाचार मीडिया, तेज धार औजार के खतरे

संपादकीय
24 जून 2020


कल ट्विटर पर एक नौजवान जोड़े ने अपना एक वीडियो पोस्ट किया, और देश के एक सबसे बड़े अखबार  की वेबसाईट पर आई खबर को दिखाया जिसमें इन दोनों की तस्वीर दिख रही थी। खबर बड़ी खराब थी, परिवार के भीतर ही हत्या और आत्महत्या जैसी कोई बात इसमें थी। उन्होंने वीडियो पर कहा कि वे दोनों जिंदा हैं, और खबर में जिस युवक और युवती, पति-पत्नी का जिक्र है, उनके नाम देखकर फेसबुक से इस दूसरे जोड़े का फोटो निकाल लिया गया, और पोस्ट कर दिया गया। एक दूसरी खबर जो खबर की शक्ल में सामने नहीं आई, लेकिन ट्रांसजेंडर तबके को सोशल मीडिया पर आकर एक बड़े अखबार के खबर का खंडन करना पड़ा। इस अखबार की वेबसाईट पर बहुत ही प्रमुखता से एक शहर की एक खबर पोस्ट हुई कि शहर के एक मुहल्ले में एक समलैंगिक नौजवान कोरोना पॉजिटिव निकला है, और उसने पिछले दिनों 34 लोगों से देहसंबंध बनाए थे, और सरकार में हड़कम्प मच गया है, और इन 34 लोगों को तलाशा जा रहा है। चूंकि शहर के मुहल्ले का भी नाम छपा हुआ था, इसलिए खतरा यह था कि उस मुहल्ले में अगर सचमुच ही कोई समलैंगिक नौजवान लोगों की जानकारी में हो, तो उसकी मॉबलिचिंग भी हो सकती थी कि वह इस तरह सेक्स बेचकर कोरोना फैला रहा है। खबर में बड़े खुलासे से जिक्र था कि किस तरह एक ब्रिटिश समलैंगिक डेटिंग एप्प से यह नौजवान ग्राहक ढूंढता था। इस खतरे को देखते हुए शहर के ट्रांसजेंडर समुदाय ने इस खबर की जड़ ढूंढी कि दिल्ली में ऐसी कोई खबर छपी थी, और उस खबर से दिल्ली हटाकर दूसरा शहर और दूसरा मुहल्ला जोड़ दिया गया, और उसे पोस्ट कर दिया गया।

पहली खबर तो एक चूक हो सकती है कि डिजिटल मीडिया इन दिनों अपनी पल-पल की हड़बड़ी के चलते फेसबुक पर उन्हीं नामों वाले किसी दूसरे जोड़े की तस्वीर निकालकर उसे पोस्ट कर दिया, लेकिन दूसरी खबर भयानक है। भयानक इसलिए कि इसके भयानक नतीजे हो सकते थे। यह कुछ उसी किस्म की थी कि किसी के बारे में यह अफवाह फैलाई जाए कि उसके घर गोमांस रखा है, और फिर उसे घर से निकालकर पीट-पीटकर मार डाला जाए, और वह उसके घर की बात ही न हो। आमतौर पर मीडिया के बारे में लिखने से मीडिया बचता है। लेकिन हम किसी एक नाम को बदनाम करना नहीं चाहते, महज आज खड़े हो गए एक खतरे को गिनाकर लोगों को चौकन्ना करना चाहते हैं क्योंकि डिजिटल इंडिया जाने के लिए नहीं आया है, वह रहने के लिए, और राज करने के लिए आया है। ऐसे में अगर उसकी गलतियों, या इसके गलत कामों को शुरू से ही रोकना-टोकना नहीं किया जाएगा, तो आगे जाकर नौबत खराब हो जाएगी। 
शुरूआत से ही अखबारों को आपाधापी में रचा गया साहित्य कहा जाता था। बाकी देशों का तो नहीं मालूम, हिन्दुस्तान में, हिन्दी में यह बात जरूर पढ़ाई जाती थी। हालांकि हकीकत यह है कि पत्रकारिता और साहित्य का आपस में कोई सीधा रिश्ता नहीं होता, और साहित्य न पढ़े हुए लोग भी अच्छे पत्रकार बन सकते हैं, और बड़े दिग्गज साहित्यकार भी बड़े बकवास संपादक साबित हो चुके हैं। इसलिए यह लाईन जरूर किसी साहित्यकार ने गढ़ी होगी कि पत्रकारिता एक किस्म का साहित्य है, जबकि उसका साहित्य से कोई लेना-देना नहीं था। एक वक्त जरूर था जब अखबारों के संपादकों का भी साहित्यकार होना अनिवार्य सा मान लिया गया था, लेकिन हिन्दी पत्रकारिता में भी वैसे दिनों को लदे हुए आधी सदी हो चुकी है। इसलिए अब यह किसी तरह का साहित्य नहीं है, लेकिन यह आपाधापी में किया गया काम जरूर है। अखबारों के वक्त यह आपाधापी कम रहती थी, फिर टीवी के वक्त थोड़ी बढ़ी कि हर घंटे में एक नया बुलेटिन आता था, और उसने खबर आ जानी चाहिए। लेकिन यह ताजा आपाधापी इंटरनेट पर डिजिटल समाचार-मीडिया की वजह से आई है कि खबर पोस्ट करने में एक पल की भी देर नहीं होनी चाहिए। और अब खबर पोस्ट करने के लिए न कोई दफ्तर लगता, न कम्प्यूटर लगते, और न ही कम्प्यूटर-ऑपरेटर लगते। अब तो रिपोर्टर मौके पर से अपने मोबाइल फोन से ही न सिर्फ टाईप की हुई खबर, बल्कि फोटो और वीडियो भी पोस्ट कर देते हैं, और इस तरह खबरों के डिजिटल मीडिया के सामने एक अजीब सा नया गलाकाट मुकाबला खड़ा हो गया है जिसमें एक-एक सेकंड मायने रखता है। लेकिन घड़ी की यह रफ्तार खबरों के मिजाज के साथ मेल नहीं खाती। खबरें उन्हें ठोक-बजाकर जानकारी को सच पा लेने के बाद बनती हैं। इन दिनों हो यह रहा है कि लोग पोस्ट पहले करते हैं, पुष्टि बाद में करते हैं। सबसे पहले न्यूज ब्रेक करने की हड़बड़ी में खबरों के सारे कायदे छूट गए हैं, और उस मेहनत से बच जाने और बरी हो जाने से लोग खुश भी बहुत हैं। अखबारनवीसों को खबर पर जो घंटों मेहनत करनी होती थी, वह मिनटों से होते हुए अब पूरी तरह से गैरजरूरी मान ली गई है, क्योंकि गलत साबित हो जाने पर उसे पल भर में मिटा देने और हटा देने का रास्ता खुल गया है। छपे हुए अखबार की कतरनें लोग पूरी जिंदगी सम्हालकर रखते थे, और बनाई गई खबर पूरी जिंदगी का बोझ रहती थी। आज डिजिटल शब्दों का कोई वजह नहीं होता, एक वक्त अखबारों के छपने के लिए सीसे जैसी धातु के बने टाईप लगते थे जिनसे छपाई होती थी, उनका खासा वजन होता था, और उतना ही वजन जिम्मेदारी का भी रहता था। इन दिनों अखबारों की जगह जो समाचार वेबसाईटें हैं, उनका कोई वजन नहीं रहता, और न ही जिम्मेदारी का बोझ ही ढोना पड़ता। 
आने वाले वक्त में सब कुछ डिजिटल जिंदा रहने वाला है। दुनिया के एक किसी भविष्यशास्त्री ने कई बरस पहले लिखा था कि अगर कोई नया काम शुरू करने जा रहे हैं, तो कौन-कौन से किस्म के काम नहीं करने चाहिए वह ध्यान रखें। उन्होंने जो आधा दर्जन काम गिनाए थे, उनमें से एक यह भी था कि ऐसा कोई काम शुरू न करें जिसमें कागज लगता हो। और आज वह हालत कोरोना के इन दो-तीन महीनों में ही दिख गई जब महानगरों के हाथियों जैसे भारी-भरकम अखबार अब हड्डी-हड्डी खच्चर की तरह दस-बारह पेज के रह गए हैं। ऐसे में कोरोना के बाद भी डिजिटल का आगे बढऩा तय है, और ऐसे में उसकी विश्वसनीयता को बढ़ाने के लिए अभी से मेहनत करने की जरूरत है। दरअसल खबरों का डिजिटल मीडिया, और सोशल मीडिया, इन दोनों के बीच कोई सरहद नहीं रह गई है, और दोनों एक-दूसरे से कई जगह मिल जा रहे हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह की हिन्दुस्तान और चीन के बीच सरहद को लेकर झगड़ा चलते ही रहता है। सोशल मीडिया को अगर अखबारों की पुरानी जुबान में कहें, तो वह संपादकीय पेज के पाठकों के पत्र कॉलम जैसा रहना था, लेकिन वह पहले पन्ने तक पसर गया है। ऐसे में डिजिटल समाचार मीडिया को अपने खुद पर नजर रखने के लिए कोई तरीका निकालना चाहिए, वरना पिछले जरा से बरसों में जिस तरह भारत के हिन्दी टीवी समाचार चैनलों की साख चौपट हुई है, उससे अधिक रफ्तार से डिजिटल समाचार मीडिया की साख चौपट होगी। इस मीडिया के औजार इतने धार वाले हैं कि अगर सम्हलकर इस्तेमाल नहीं किया गया, तो वे समाचार-विचार का निशाना लगने के पहले ही खुद को घायल कर जाएंगे।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM

बात की बात, 23 जून 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 23 जून 2020

जो आज लापरवाह हैं वे दूसरों की बेकसूर मौत के जिम्मेदार भी हैं

संपादकीय
23 जून 2020


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगे हुए अभनपुर नाम के कस्बे में तीन सैलून मालिक कोरोना पॉजिटिव मिले जो खुद लोगों के बाल काटते थे, हजामत बनाते थे। अब सैलून के बाकी कर्मचारियों और उनके परिवारों की भी कोरोना जांच हो रही है, लेकिन इन्होंने अपने ग्राहकों के रजिस्टर नहीं रखे थे, इसलिए जिन सैकड़ों लोगों ने लॉकडाऊन खत्म होने के बाद बाल कटाने और हजामत बनवाने के लिए दौड़ लगाई थी, वे लोग भी अब खतरे में होंगे। यह बात सही है कि लॉकडाऊन के चलते हुए लोगों के रोजगार बुरी तरह से खत्म हुए थे, जिनमें सैलून और पार्लर चलाने वाले लोग भी थे। जब उन्हें काम करने की छूट मिली, तो जाहिर है कि भूखों मरने के बजाय उन्होंने खतरा उठाकर भी काम शुरू किया। सैलून और पार्लर के काम करने के तरीके सबके देखे हुए हैं, और शारीरिक संपर्क के बिना, चेहरे को छुए बिना, उन्हीं सामानों को अधिक लोगों पर इस्तेमाल किए बिना इनका काम नहीं चल सकता। सरकार के नियम कागजों पर रहते हैं, और अधिकतर नियमों पर अमल करवाना खुद सरकार के बस में नहीं रहता। लागू न करवाए जा सकने वाले नियमों के आधार पर जिंदगी को खतरे में डालना सरकार की बहुत बड़ी चूक थी, और आज भी है। यह जरूर है कि हर पेशे के लोग काम पर लौटने के लिए बेसब्र हैं ताकि घर पर चूल्हा जल सके, लेकिन पंक्चर बनाने वाले और मालिश करने वाले से लोगों को हो सकने वाले खतरे में बड़ा फर्क है, और इसे ध्यान में रखते हुए ही सरकार को भी छूट देनी थी, और लोगों को भी इन जगहों पर जाना था। 
दरअसल हिन्दुस्तानियों के बीच से कोरोना का डर खत्म हो गया है। सरकारी शराब दुकानों पर जिस तरह की भीड़ और धक्का-मुक्की दिखती है उससे भी लोगों को लगता है कि अब सरकार ने ही धक्का-मुक्की की छूट दे दी है, तो फिर किसी भी काम को क्यों छोड़ा जाए? हम सैलून और पार्लर की बेरोजगारी के साथ पूरी हमदर्दी रखते हुए भी यह कहना चाहते हैं कि जिनकी जिंदगी इनके बिना चल ही नहीं सकती थी, उनका तो वहां जाना ठीक था, लेकिन इनके बिना किसकी जिंदगी नहीं चल सकती थी? क्यों खतरा उठाकर बाल कटाना या हजामत बनवाना जरूरी था? जाहिर तौर पर जो आम लोगों के लिए ऐसी जगहें रहती हैं, वहां पर साफ-सफाई की हिफाजत बड़ी सीमित ही रहती है, और सैलून-पार्लर चलाने वालों का तो काम से पेट जुड़ा हुआ था, जिनके सिर या चेहरों पर बाल इक_ा हो गए थे, वे तो भूख से नहीं मर रहे थे? जिसका रोजगार छिन गया है, वह तो काम ढूंढेंगे ही, ग्राहक ढूंढेंगे, लेकिन जिन्हें जरूरत नहीं है, वे तो ऐसे खतरे के बिना काम चला लें!
कुल मिलाकर हाल यह दिख रहा है कि लोग बेफिक्र हो गए हैं। कल जिस तरह सुप्रीम कोर्ट में केन्द्र सरकार ने एक ऐसी नौबत खड़ी कर दी कि ओडिशा सरकार को भी अनमने ढंग से केन्द्र की हां में हां मिलाकर रथयात्रा को अदालती मंजूरी दिलवाने पर मजबूर होना पड़ा। वरना ओडिशा का प्रारंभिक रूप रथयात्रा के पक्ष में नहीं दिख रहा था। पिछले महीने जब लॉकडाऊन से केन्द्र सरकार ने शराब कारोबार को छूट दी, तो राज्य सरकारों ने भी आनन-फानन दारू बेचना या बिकवाना शुरू कर दिया। जब तक केन्द्र की बंदिश थी, दारूबंदी रही, और बिना दारू के लोग कोई मर नहीं गए। देश भर में इक्का-दुक्का लोगों ने कहीं खुदकुशी कर ली, तो उससे सौ गुना अधिक शराबी नशे में रोज हत्या-आत्महत्या करते हैं। एक बार केन्द्र सरकार ढीली हुई, तो राज्य सरकारों से लेकर नाई तक, और शराबियों से लेकर पार्लर जाने वालों तक, किसी को भी रोकना, किसी को भी सावधानी की उम्मीद करना पानी में बह जाता है। आज दुनिया और देश कोरोना के जिस तरह के खतरे से गुजर रहे हैं, उसमें लॉकडाऊन को इस तरह के कामों के लिए तो बिल्कुल ही नहीं खोलना था जिनसे कोरोना फैलने का खतरा खड़ा होना ही था। आज दारू की दुकानों पर जैसी धक्का-मुक्की दिखती है,  वहां से कोरोना फैलने के आंकड़े आसानी से सामने नहीं आएंगे, लेकिन यह मानना ही नासमझी होगी कि दारू दुकानों के बाहर कोरोना खुशी से नाच नहीं रहा होगा। अभी भी वक्त है कि राज्य सरकारों को केन्द्र से मिली छूट के बाद भी अपनी अक्ल का इस्तेमाल करते हुए कुछ काम-धंधों पर रोक लगानी चाहिए क्योंकि वहां सावधानी बरतना मुमकिन ही नहीं है। यह जरूर है कि हमारी यह सलाह ऐसे कारोबारियों के साथ बहुत बड़ी बेइंसाफी होगी अगर सरकार इन्हें काम न करने के एवज में कोई मुआवजा न दे। सरकार के लिए ऐसा इंतजाम करना भारी पड़ेगा लेकिन ऐसी किसी सैलून या पार्लर से अगर कोरोना फैलेगा, तो वैसे भी पूरे इलाके को क्वारंटीन करने में धंधा बंद ही हो जाएगा, और सरकार-समाज के पास दर्जनों या सैकड़ों कोरोनाग्रस्त लोग रह जाएंगे। छत्तीसगढ़ में ही राजनांदगांव शहर की एक छोटी सी बस्ती में कोरोनाग्रस्त लोग एक से बढ़कर पचास हो चुके हैं, और मौत भी एक से बढ़कर आगे पहुंच चुकी है। यह नौबत दूसरे शहरों के दूसरे इलाकों में न आए वही बेहतर होगा। 
आखिर में यह कड़वी सलाह देना जरूरी है कि सैलून या पार्लर के बिना किसी का काम नहीं रूकता, और अगले कुछ महीने घर में गुजार लें। बाहर सड़कों पर या दूसरी जगहों पर खाए बिना किसी का काम नहीं रूकता, और घर पर खा लें। दारू पिए बिना तो देश में एक महीने से ज्यादा वक्त सबके लिए बहुत सेहतमंद था, और दारू दुकान के बाहर एक-दूसरे से कोरोना लेने-देने के बजाय उन पैसों से अपने बच्चों के लिए कुछ बेहतर सामान खाने-पीने को खरीदें, तो यह सबको बचाना होगा। तरह-तरह की लापरवाही, और तरह-तरह का रोमांच करने के लिए याद रखें कि डॉक्टर, स्वास्थ्य कर्मी, पुलिस और सफाईकर्मी, एम्बुलेंस ड्राइवर और मेडिकल स्टोर वाले आपकी जिंदगी को बचाने के लिए अपने आपको खतरे में डालकर काम कर रहे हैं। आप न सिर्फ खुद को, अपने घर-दफ्तर, कारोबार-कारखाने को खतरे में डालते हैं, बल्कि समर्पित जीवनरक्षकों की जिंदगी की खतरे में डाल रहे हैं। अकेले दिल्ली शहर में 2200 से अधिक स्वास्थ्यकर्मी कोरोना पॉजिटिव हो चुके हैं। जो लोग आज लापरवाह हैं वे बेकसूर मौतों के जिम्मेदार भी रहेंगे।  
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 22 जून 2020

हमने पहली तारीख को ही धर्मस्थलों को छूट देने के खतरे बताए थे, वही हुआ

संपादकीय
22 जून 2020


यह हिन्दुस्तान की न्यायपालिका के इतिहास का पहला मौका होगा जब सुप्रीम कोर्ट के जज अलग-अलग शहरों से अपने घर में बैठे हुए वीडियो पर एक बड़े मुद्दे की सुनवाई कर रहे हैं, जिसकी तरफ करोड़ों लोगों की नजरें टिकी हुई हैं। ओडिशा के जगन्नाथ पुरी में कल रथयात्रा निकलनी है, और देश में कोरोना फैला हुआ है। इस रथयात्रा की पुरानी तस्वीरें देखें तो लाखों भक्तजन कंधे से कंधा भिड़ाते हुए इस रथ को खींचते हैं, और इंसानों का मानो एक समंदर ही इस रथ के रास्ते में बिछा रहता है। इस मामले पर दो दिन पहले मुख्य न्यायाधीश, जस्टिस एस.ए. बोवड़े ने यह कहा था कि अगर इस बरस रथयात्रा की इजाजत दी गई, तो भगवान जगन्नाथ कभी माफ नहीं करेंगे। लेकिन एक पुनर्विचार याचिका लगाई गई और भाजपा के प्रवक्ता, ओडिशा के संबित पात्रा ने रथयात्रा की इजाजत देने के लिए अदालत में वकील खड़े किए हैं। केन्द्र सरकार का रूख बड़ा साफ है कि सदियों से चली आ रही रथयात्रा की इस परंपरा को नहीं रोका जाना चाहिए, और भक्तजन वहां न पहुंचें इसलिए राज्य सरकार जगन्नाथपुरी में कफ्र्यू लगाकर रथयात्रा की इजाजत दे सकती है, और कोरोना निगेटिव पुजारी-मंदिर सेवक इसमें शामिल हो सकते हैं। अभी हम अदालत का फैसला आने के पहले ही इस मुद्दे पर इसलिए लिख रहे हैं कि ऐसी नौबत की सोचते हुए ही हमने इस महीने के शुरू में ही इसी जगह पर धर्मस्थलों को लॉकडाऊन से छूट देने के खतरों के प्रति आगाह किया था। महीना पूरा नहीं हुआ, और तीन हफ्तों के भीतर ही एक खतरा सामने आ गया जो कि देश में किसी भी धार्मिक आयोजन में जुटने वाली सबसे बड़ी भीड़ का है, और इसकी कल्पना करते हुए कोरोना मन ही मन खुश भी हो रहा होगा। 

हमने धर्मस्थलों को खोलने की घोषणा होते ही लिखा था- ''एक खतरनाक काम जो शुरू हो रहा है वह 8 जून से धार्मिक स्थलों को शुरू करना। आज देश की कमर वैसे भी टूटी हुई है, क्योंकि वह अपनी वर्दी की नियमित जिम्मेदारी से परे कोरोना-ड्यूटी में भी रात-दिन खप रही है। ऐसी पुलिस को अगर धर्मस्थलों और धार्मिक आयोजनों की कट्टर, धर्मान्ध, हिंसक, और पूरी तरह अराजक भीड़ से जूझने में भी लगा दिया जाएगा, तो पता नहीं क्या होगा। वैसे भी जब इस देश में कुछ महीने बिना धर्मस्थलों के गुजार लिए हैं, तो यह सिलसिला अभी जारी रहने देना था, और देश की सेहत पर यह नया खतरा नहीं डालना था। सिवाय मंदिरों के पुजारियों के और किसी की कोई मांग सामने नहीं आई थी, और जहां तक हमारी जानकारी है किसी भी धर्म के ईश्वर ने वापिस आने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई थी, सभी को कोरोना से अपनी जान को खतरा है। जिस तरह कई और तबकों को केन्द्र और राज्य सरकारें मदद कर रही हैं, मनरेगा में रोजगार दे रही हैं, वैसा ही रोजगार मंदिरों के पुजारियों को, और दूसरे धर्मस्थलों के ऐसे ही दूसरे लोगों को भी देना चाहिए था। ईश्वरों के दरबारों में लगातार व्यंजन खाकर इन तमाम लोगों की सेहत वैसे भी खतरे में बनी रहती है इन्हें भी कुछ शारीरिक मेहनत करके रोजी-रोटी कमाने का मौका देना चाहिए ताकि वे लंबा जीवन जी सकें, और ईश्वर की अधिक समय तक सेवा कर सकें।''

''दूसरा यह कि जिन लोगों का देश की जनता पर बड़ा असर है, जिनकी कही बातों को सुनकर लोग दस्त लगे होने पर भी शंख बजाने को तैयार हो जाते हैं, उन्हें तो यह चाहिए था कि वे अपनी अपील में इसे जोड़ते कि लोग अपने धर्मस्थानों के कर्मचारियों के जिंदा रहने का इंतजाम करें, क्योंकि अगर ये ही जिंदा नहीं रहे, तो एक तो ईश्वरों की साख बड़ी चौपट होगी कि अपने सीधे नुमाइंदों को भी वे नहीं बचा पा रहे हैं, और फिर भक्तों के सामने भी यह दिक्कत रहेगी कि वे दुबारा अपने ईश्वर तक कैसे पहुंचेंगे। लेकिन देश के नाम आधा दर्जन या अधिक संदेशों में भी धर्मस्थलों पर ईश्वरों की उपासना का पेशा करने वाले लोगों के लिए ऐसी कोई अपील नहीं की गई।''

''आज जगह-जगह अलग-अलग धर्मों के लोग सारे लॉकडाऊन के चलते, चार से अधिक की भीड़ के खिलाफ लागू धारा 144 के चलते हुए भी जिस तरह से जलसे मना रहे हैं, वह देखना भयानक है। कम से कम हम तो ईश्वरों के भक्तों को ऐसा थोक में कोरोनाग्रस्त होते देखना नहीं चाहते क्योंकि कल के दिन कोरोना के पास तो इंसानों को मारने का एक लंबा रिकॉर्ड रहेगा, ऐसे में ईश्वर तो बिना भक्तों के रह जाएगा, और बिना प्रसाद, पूजा-पाठ, प्रशंसा-स्तुति के ईश्वर पता नहीं कैसे जी पाएगा। इसलिए भक्तों को बचाना बहुत जरूरी है। धर्मस्थलों पर से जो रोक हटाई जा रही है, वह आस्थावान लोगों के लिए एक बड़ा खतरा लेकर आएगी, और आस्थावानों में से भी जो सचमुच ही सक्रिय धर्मालु हैं, उन पर अधिक बड़ा खतरा रहेगा। केन्द्र की मोदी सरकार में बैठे हुए किसी नास्तिक ने ही ऐसा धर्मविरोधी फैसला लिया होगा जो कि धर्म को, और उसके धर्मालुओं को खतरे में डाल सकता है। अभी देश ने करोड़ों मजदूरों को सैकड़ों मील का पैदल सफर करते देखा, लेकिन सामने आई लाखों तस्वीरों, और हजारों वीडियो में से एक में भी कोई मजदूर किसी ईश्वर को याद करते नहीं दिखे। ऐसे में उन मजदूरों की मदद करना, और धर्मस्थल जाने वाले धर्मालुओं को खतरे में डालना बहुत ही खराब बात है।''

''हम धर्म और ईश्वर की हिफाजत के लिए, पुजारियों और आस्थावानों की हिफाजत के लिए यह चाहते हैं कि मंदिर-मस्जिद, चर्च-गुरुद्वारे, और बाकी धर्मस्थल तभी खोले जाएं जब कोरोना पूरी तरह से चले जाने के वैज्ञानिक सुबूत सामने आएं। वैसे भी इतने महीनों में एक भी देववाणी तो ऐसी हुई नहीं कि ईश्वर कोरोना से निपटने के लिए तैयार है, रामायण की तरह तीर चलाकर कोरोना को निपटा देगा, या ऐसा भी कुछ नहीं दिखा कि कोरोना ईश्वर से डरकर दुनिया छोड़कर जाने की सोच रहा है। ऐसे माहौल में ईश्वर के दरवाजे भक्तों के लिए खोलना एक धर्मविरोधी काम है, एक खतरनाक काम है, और यह बिल्कुल नहीं होना चाहिए।'' 

''हिन्दुस्तान ही नहीं पूरी दुनिया का यह इतिहास है कि जंगों से अधिक मौतें धर्म से होती हैं, और आज अदृश्य कोरोना और अदृश्य ईश्वर को आमने-सामने करने से, जो भीड़ लगेगी उससे मानव जाति पर अदृश्य हो जाने का खतरा खड़ा हो जाएगा। केन्द्र सरकार ने चाहे जो हुक्म निकाला हो, राज्यों को इस पर अमल नहीं करना चाहिए। केन्द्र सरकार ने दारू की छूट दी थी, और आज तो शराब की बिक्री, शराब पीने वाले लोगों की हालत देखते ही यह समझ में आता है कि कोरोना को एक शराबी में बड़ी उपजाऊ जमीन दिख रही होगी। केन्द्र की दी गई छूट कोई बंदिश नहीं है कि उस पर पालन किया जाए। जो राज्य समझदार होंगे, जिन्हें अपने इंसानों की अधिक फिक्र होगी, उन्हें धर्मस्थलों को खोलना और कुछ महीनों के लिए टालना चाहिए क्योंकि इन महीनों में भक्त और ईश्वर दोनों ही एक-दूसरे के आमने-सामने हुए बिना जीना कुछ हद तक तो सीख ही चुके हैं।''

अब आज जब सुप्रीम कोर्ट के तीन जज दुबारा इस मामले को सुन रहे हैं, और किसी भी पल अदालत का फैसला आ सकता है, तो हम उसके पहले ही अपनी बात लिख देना चाहते हैं। जिस ओडिशा में यह आयोजन होना है वहां की सरकार ने तो खुलकर यह कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का जो आदेश होगा वो उसे मानेगी। लेकिन केन्द्र सरकार का रूख प्रतिबंधों के साथ रथयात्रा निकालने का है, फिर चाहे इसके लिए कफ्र्यू लगाकर लोगों को घरों में बंद रखा जाए। हमारे हिसाब से इंसानों के लिए इतने बड़े पैमाने पर खतरे का कोई धार्मिक आयोजन नहीं किया जाना चाहिए, धार्मिक परंपराएं आगे जारी रह सकती हैं, और हम 18 जून को मुख्य न्यायाधीश का यह कहा हुआ सही मानते हैं कि आज अगर रथयात्रा की इजाजत दी गई, तो भगवान जगन्नाथ कभी माफ नहीं करेंगे। सुप्रीम कोर्ट को अपने इस रूख पर कायम रहना चाहिए क्योंकि यही इंसानों की जिंदगी को बचा सकता है। 
5:00 PM

सावधानी हटी, दुर्घटना घटी, कोरोना घटा नहीं, बढ़ रहा...

संपादकीय
21 जून 2020


जिन लोगों को अभी तक छत्तीसगढ़ सबसे सुरक्षित लग रहा था, और देश के बाकी राज्यों के मुकाबले यह कोरोना से बचा हुआ भी था, वह वक्त गुजर गया है। अब तो थोक में कोरोनाग्रस्त लोगों की शिनाख्त हो रही है, और एक-एक करके शहर, कस्बे, गांव की बस्तियां कंटेनमेंट जोन घोषित होती जा रही हैं। एक सबसे घने बसे हुए शहर राजनांदगांव के एक मोहल्ले में ही 49 पॉजिटिव निकल गए हैं, वह एक भयानक नौबत है। और कोरोना के खतरे को सिर्फ जिंदगी और मौत से जोड़कर देखना ठीक नहीं है, हर मोहल्ले के कंटेनमेंट के पीछे दर्जनों पुलिस कर्मचारी झोंके जाते हैं, दर्जनों म्युनिसिपल कर्मी, दर्जनों स्वास्थ्य कर्मचारी वहां लग जाते हैं। ऐसे एक-एक मोहल्ले के सैकड़ों नमूनों की जांच में लैब व्यस्त हो जाती है, और शासन-प्रशासन हर किसी का वक्त, उसकी ताकत, उसका पैसा सब कुछ उस पर खर्च होता है। यह भी याद रखना चाहिए कि लॉकडाऊन खुलने के बाद जिस तरह से कारोबार पटरी पर लाने की कोशिश हो रही है, वह ट्रेन आगे बढऩे के पहले ही फिर बेपटरी हो जा रही है। इन इलाकों में कारोबार बंद, इन इलाकों से लोगों की आवाजाही बंद, और इन इलाकों की जिंदगी एक किस्म से स्थगित। यह नौबत एक-एक पखवाड़े तक तो चलना ही है। और यह पखवाड़ा अर्थव्यवस्था के बिना रहेगा, पढ़ाई के बिना रहेगा, किसी कामकाज के बिना रहेगा। 
आज चूंकि देश के दूसरे प्रदेशों में मौतें बड़ी अधिक संख्या में हो रही हैं, इसलिए छत्तीसगढ़ लोगों को सुरक्षित लग रहा है। लेकिन कोरोना के जाने में अभी कई हफ्तों से लेकर कई महीनों तक का वक्त लग सकता है, और ऐसे में सरकार की क्षमता भी चुक सकती है, और लोगों के शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी। आज भी अगर ईमानदारी से बड़े पैमाने पर कोरोना की जांच हो जाए, तो इस प्रदेश की सारी तैयारी धरी रह जाएगी, और 10-15 हजार मरीजों को रखने की क्षमता हफ्ते भर में ही खत्म हो जाएगी। हो सकता है कि सरकार ने अघोषित रूप से यह फैसला लिया हो कि जांच इतनी अधिक न की जाए कि वह भर्ती करने की क्षमता को खत्म कर दे। हो सकता है कि सरकार में कुछ लोगों का यह सोचना हो कि बहुत से पॉजिटिव लोग बिना जांच, और बिना किसी गंभीर इलाज से अपने आप ही ठीक हो जाएंगे, लेकिन इससे नौबत बहुत अधिक खतरनाक ही हो सकती है। बिना शिनाख्त के कोरोना पॉजिटिव लोग चारों तरफ घूमते रहेंगे, जैसा कि कल राजनांदगांव में सामने आया है, और एक व्यक्ति से दर्जनों तक पहुंचने में चार दिन ही लगेंगे, फिर चाहे शिनाख्त में हफ्ते-दो हफ्ते ही क्यों न लग जाएं। इसलिए सरकार के तौर-तरीकों पर भरोसा करने के बजाय लोगों को अपनी खुद की सावधानी पर भरोसा करना चाहिए और अपनी जिंदगी को इस हिसाब से ढालना चाहिए कि कोरोना के साथ जीना सीखना है।
भारत के बहुत से ऐसे राज्य रहे हैं जहां पर 16-16 घंटे का पॉवरकट रहता है। लोगों ने वहां उसके साथ जीना सीख लिया है। बिजली आते ही कौन-कौन से काम तेजी से निपटाने हैं, उनके दिमाग में पुख्ता बैठ चुका है। जब बिजली नहीं है तब किस ठिकाने पर मोबाइल चार्ज हो सकता है, यह भी लोगों को अच्छी तरह समझ आ गया है। कोरोना के साथ जीना कुछ उसी तरह सीखना पड़ेगा, सावधानी बरतने को मिजाज में ही बैठाना पड़ेगा, गैरजरूरी मटरगश्ती को आत्मघाती मानना पड़ेगा, और लापरवाह-दुस्साहसियों को आत्मघाती दस्ता मानकर उनसे परहेज भी करना पड़ेगा। आज लापरवाह लोग खुद अकेले नहीं मरने जा रहे। वे उस शराबी बस ड्राइवर की तरह हैं जिसके साथ 50 जिंदगियां और भी जुड़ी हुई हैं। ऐसे में आज जब लोग लापरवाह होते दिख रहे हैं, तो यह याद रखने की जरूरत है कि कोरोना के मुकाबले भी लापरवाही अधिक संक्रामक है। एक लापरवाह इंसान सौ सतर्क इंसानों की सतर्कता खत्म करने की प्रेरणा देते हैं। ऐसे में लोगों को कतरा-कतरा लापरवाही के बजाय कतरा-कतरा सावधानी बरतनी चाहिए, आसपास के लोगों को एकदम कड़ाई से सावधान करना चाहिए। मोहल्ले या किसी इमारत में एक कोरोनाग्रस्त निकलने पर हजारों लोगों पर एक पखवाड़े की जो रोक लग रही है, उससे उनकी निजी जिंदगी की और देश की उत्पादकता बहुत बुरी तरह बर्बाद हो रही है। अभी यह बात खुलकर सामने नहीं आई है, लेकिन ऐसे लॉकडाऊन और ऐसे कंटेनमेंट से लोग मानसिक रूप से विचलित हो रहे हैं, और खुदकुशी तक कर रहे हैं। इसलिए राज्य सरकार या केन्द्र सरकार की दी गई छूट को इस्तेमाल करना ही है, ऐसी लापरवाही से लोगों को बचना चाहिए। सरकारी छूट जनता को मिला अधिकार भर है, उसे अनिवार्य रूप से इस्तेमाल करना उस पर कोई जिम्मेदारी नहीं है। इसलिए सरकारी नसीहत से अधिक सावधानी बरतें, घर-परिवार और दफ्तर-कारोबार में अधिक से अधिक सावधानी रखें, और उसके बाद भी बुरी से बुरी नौबत के लिए तैयार भी रहें। 
आज दुनिया में देश के और बाहर के जो जानकार-विशेषज्ञ ऐसी भविष्यवाणी कर रहे हैं कि हिन्दुस्तान में कोरोना की सर्वाधिक संख्या जुलाई अंत में या अगस्त में किसी समय आ सकती है, उन्हें कोई ढकोसले वाला ज्योतिषी मानकर न चलें। ये लोग वैज्ञानिक आधार पर एक अनुमान बता रहे हैं, जो कि अगर थोड़ा गलत होगा तो यह भी हो सकता है कि कोरोना की सर्वाधिक संख्या और एक-दो महीने आगे तक खिसक जाए। ऐसे में कई महीनों की सावधानी के लिए लोगों को शारीरिक, मानसिक, और आर्थिक रूप से तैयार रहना चाहिए। कभी सुशांत राजपूत, तो कभी चीन की खबरों को ऐसा हावी नहीं होने देना चाहिए कि जिंदगी में कोरोना से परे भी बहुत सी चीजें हैं। लोगों की निजी जिंदगी में आज सबसे जरूरी यही है कि वे अपनी सेहत कोरोना से बचाकर रखें, और उसके लिए खुद की सावधानी के अलावा आसपास के सारे दायरे की सावधानी के लिए भी मेहनत करना जरूरी है। जैसा कि सड़क किनारे ट्रैफिक के बोर्ड पर लिखा रहता है, सावधानी हटी, दुर्घटना घटी, ठीक वैसी ही नौबत कोरोना को लेकर है। चिट्ठी को मौत का तार समझना, वरना बीमार को पार समझना। आगे आप खुद समझदार हैं। (जिनको तार शब्द का मतलब नहीं मालूम है, एक वक्त सबसे तेज खबर पहुंचाने के लिए इस्तेमाल होने वाले टेलीग्राम को तार कहा जाता था)।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM

वादाखिलाफी यानी बलात्कार, कानून नाजायज और बेइंसाफ

21 जून 2020

हिन्दुस्तान में जगह-जगह आए दिन ऐसी पुलिस रिपोर्ट होती है कि किसी युवती या महिला ने किसी युवक या आदमी पर बलात्कार का जुर्म लगाया, और रिपोर्ट में यह रहता है कि उसने शादी का वायदा करके देह संबंध बनाए, और बाद में शादी से मुकर गया। मौजूदा कानून और बड़ी अदालतों के ढेर सारे फैसलों की रौशनी में ऐसे मामले तुरंत बलात्कार कानून के तहत दर्ज हो जाते हैं। पुलिस की सीमा मौजूदा कानून रहती है, और कानून बारीक नुक्ताचीनी के लिए बड़ी अदालतों के सामने खड़ा भी होता है, और बड़ी अदालतें कभी-कभार कानून की कुछ बातों को गलत भी मानती हैं, और वैसे में यह संसद के सामने रहता है कि वह अदालती फैसलों को देखते हुए कानून में कोई फेरबदल करे, या सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू हो जाने दे। 

आज इस मुद्दे पर लिखते हुए यह बात साफ है कि सुप्रीम कोर्ट और देश के कई हाईकोर्ट ने ऐसे मामलों में ऐसे साफ फैसले दिए हैं कि ऐसी शिकायतें बलात्कार गिनी जाएंगी। फैसले अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन फैसलों से परे यह समझने की जरूरत है कि असल जिंदगी में ऐसे मामलों की बुनियाद क्या है। यह लिखते हुए इस बात का पूरा अंदाज है कि इसे महिलाविरोधी कहा जा सकता है, ऐसे में इसे बलात्कारी आदमी के लिए एक हमदर्दी भी कहा जा सकता है, लेकिन असल जिंदगी की हकीकत को देखते हुए इस पर चर्चा जरूरी भी है। 

जिंदगी के प्रेमसंबंधों या स्त्री-पुरूष की दोस्ती को अगर देखें, और खासकर बालिग लोगों की दोस्ती देखें, तो उनमें से बहुत सी दोस्तियां देहसंबंधों तक पहुंच जाती हैं। उनमें से बहुत के साथ ऐसी अंतहीन उम्मीदें जुड़ी रहती होंगी कि यह सिलसिला शादी तक पहुंच जाएगा, दूसरी तरफ ऐसी भी उम्मीदें हो सकती हैं जो कि किसी वायदे के बाद पैदा हुई होंगी, और शादी का वायदा पूरा न होने पर उस वायदाखिलाफी की वजह से पहले के सहमति के देहसंबंध अब बलात्कार की परिभाषा के तहत लाए गए हों। हम कानून की बारीकियों में नहीं जा रहे, क्योंकि उन्हीं पर तो बड़ी अदालतों के बड़े फैसले रहे होंगे, लेकिन अपनी खुद की देखी हुई जिंदगियों का तजुर्बा यह है कि शादी की नीयत, और शादी के वायदे सचमुच के होने के बावजूद बहुत सी नौबतें ऐसी आ जाती हैं कि शादी नहीं हो पाती। यह वायदा लड़के की तरफ से भी टूट सकता है, और लड़की की तरफ से भी। बहुत से मामलों में समाज और परिवार का इतना दबाव हो जाता है कि चाह कर भी ईमानदार प्रेमीजोड़े शादी नहीं कर पाते। ऐसी ही नौबतें तो रहती हैं जिनके चलते प्रेमीजोड़े एक साथ खुदकुशी कर लेते हैं कि साथ जी न सके तो न सही, कम से कम साथ मर तो लें। 

अब जिनकी साथ मरने जैसी ईमानदार नीयत रहती है, उनके बीच के देहसंबंध कई वजहों से शादी में तब्दील नहीं हो पाते। ऐसे में बरसों की सहमति के देहसंबंध वायादाखिलाफी की वजह से बलात्कार करार दिए जाएं, यह बात कुछ गले नहीं उतरती। फिर एक बात यह भी है कि हिन्दुस्तान का बलात्कार कानून लैंगिक समानता पर आधारित नहीं है। यह महिला के पक्ष में, और पुरूष के खिलाफ असंतुलित तरीके से झुका हुआ है, और सामाजिक हकीकत को देखें तो ऐसा रहना भी चाहिए। एक पुरूष ही शारीरिक और मानसिक रूप से, सामाजिक और आर्थिक रूप से एक महिला का शोषण करने की हालत में अधिक रहता है। लेकिन एक ऐसी स्थिति की कल्पना करें जब संपन्नता की ताकत रखने वाली कोई लड़की किसी विपन्न लड़के के साथ मोहब्बत करती हो, और दोनों के बीच देहसंबंध भी हों, और बरसों के ऐसे संबंध के बाद किसी वजह से वह लड़की शादी से इंकार कर दे, तो क्या बरसों के ऐसे देहसंबंधों को एक संपन्न द्वारा एक विपन्न का देहशोषण करना करार दिया जाएगा? भारत के मौजूदा कानून के तहत ऐसा नहीं हो सकता, और यहां पर कानून थोड़ा सा बेइंसाफ भी लगता है। 

आज चारों तरफ ऐसे दसियों हजार लोग जेलों में बंद हैं जिनके खिलाफ बरसों के सहमति-संबंधों के बाद बलात्कार की शिकायत दर्ज कराई गई है। अब इनके तो फैसले मौजूदा कानून के आधार पर हो ही जाएंगे, और फैसले तक वे बहुत मुश्किल से मिली, बहुत महंगी पड़ी जमानत पर शर्मिंदगी के साथ जीते रहेंगे, लेकिन कानून से परे, क्या यह सचमुच इंसाफ है? 

अपने दिल-दिमाग और अपनी रीति-नीति से महिलाओं के कट्टर हिमायती होते हुए भी यह सिलसिला ठीक नहीं लगता है। इस कानून में फेरबदल की जरूरत है क्योंकि बिना बल प्रयोग के, आपसी सहमति से, दो वयस्क लोगों के बीच बने देहसंबंधों का दर्जा महज वादाखिलाफी से बलात्कार नहीं होना चाहिए। वायदे तो कई वजहों से पूरे नहीं हो पाते हैं। बहुत से लोगों के बीच ऐसे रिश्ते तय होते हैं, सगाई होती है, जो कि टूट जाती है, और शादी नहीं हो पाती। बहुत से ऐसे प्रेमसंबंध और देहसंबंध रहते हैं जो बरसों के लंबे वक्त से गुजरते हुए एक-दूसरे को बाकी जिंदगी के लायक नहीं पाते, और समझदारी के साथ अलग होना तय कर लेते हैं। 

वादाखिलाफी के आधार पर बलात्कार का जुर्म तय होना लोगों के बीच एक किस्म से भरोसा खत्म करने वाला है। लोगों के बीच संबंध रहें, और जिस दिन वे स्वस्थ न रहें, उन्हें महज इसलिए ढोना पड़े कि संबंध तोडऩा बलात्कार की सजा दिलवाएगा, तो यह सिलसिला नाजायज है, और बेइंसाफी है। बीच-बीच में किसी-किसी हाईकोर्ट ने ऐसे फैसले दिए भी हैं कि इन्हें बलात्कार न गिना जाए, लेकिन कुल मिलाकर आज जो व्यवस्था लागू है, वह सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को लेकर है, और उसके बाद किसी का बचाव नहीं है।

यह कानून इस बात को पूरी तरह अनदेखा करता है कि वादाखिलाफी तो जिंदगी के हर दायरे में हो सकती है, होती है, और यह भी जरूरी नहीं होता कि वह सोच-समझकर ही की जाए, कई बार तो अनचाहे भी किसी वायदे को अधूरा छोडऩे की नौबत आ जाती है। यह कानून ऐसी तमाम मानवीय, और सामाजिक नौबतों को अनदेखा करता है, और सिर्फ एक पक्ष के बयान को अनुपातहीन-असंतुलित वजन देते हुए उसके आधार पर दूसरे पक्ष को कुसूरवार मानकर चलता है। कानून का यह पूर्वाग्रह उसकी बुनियाद में ही रखा गया है, और भारत में महिलाओं को खास हक और हिफाजत देने के लिए रखा गया है, लेकिन उसका यह इस्तेमाल न्याय की भावना के तो सीधे-सीधे ही खिलाफ है, न्याय के शब्दों के भी यह खिलाफ है, फिर चाहे यह लिखित कानून की भाषा ही क्यों न हो। 

हम अपनी इस सोच के अलावा और लोगों से भी इस मुद्दे पर, कानून के इन पहलुओं पर आपस में चर्चा करने, बहस और सलाह-मशविरा करने की सलाह दे रहे हैं, ताकि समाज के भीतर इस सोच के पक्ष में, या इसके खिलाफ एक जनमत तैयार हो सके। अलग-अलग लोगों के अलग-अलग तर्क हो सकते हैं, लेकिन मौजूदा कानून को, मौजूदा मामलों को देखते हुए इसी तरह छोड़ देना ठीक नहीं है।  
 (Daily Chhattisgarh)