अपने सिर पर सवार हुए पूर्वाग्रह अपडेट भी करें

हिन्दुस्तान में किसी भी विवाद की चर्चा हो, और उसे धर्म और जाति से अलग रख दिया जाए, ऐसा मुश्किल से ही होता है। लोग इलाज में गड़बड़ी होने से तुरंत ही आरक्षण के फायदे से मेडिकल कॉलेज दाखिला पाने वाले लोगों की जात पर उतर आते हैं। सरकारी दफ्तरों में अगर कोई अफसर रिश्वत कम मांगते हैं, तो इसे लोग उनकी नीची समझी जाने वाली जात का असर बताते हैं कि पांच-पांच सौ रूपए ले लेता है। मानो ऊंची समझी जाने वाली जात का अफसर उसी काम के पांच हजार लेता तो बेहतर होता। लोग आरक्षण के खिलाफ बहस में खुलकर कहते हैं कि क्या किसी कोटे से डॉक्टर बनने वाले से अपना इलाज कराओगे? और आज दिल्ली की खबर है कि सबसे ऊंची समझी जाने वाली जाति का एक डॉक्टर जिसका नाम भी देवताओं के इन्द्र के नाम पर था, वह गरीबों का अपहरण करता था, किडनी निकालकर बेच देता था, और लाशों को मगरमच्छ को खिला देता था। हर दस दिन में ऐसी एक हत्या करते-करते वह सौ लोगों को मार चुका था, फिर गिनती गिनना बंद कर दिया था। ठीक भी है, किसी भी बात का शतक पूरा हो जाने के बाद उसे गिनना बंद कर देना चाहिए। सौ बरस के हो जाएं तो उसके बाद केक क्या काटना। 

अब सवाल यह है कि धर्म और जाति को लेकर हिन्दुस्तान में लोगों के मन में बैठे हुए पूर्वाग्रह इतने पुख्ता और इतने हिंसक हैं कि अपनी जाति, अपने धर्म से परे के लोगों के गुनाह उन्हें आसमान पर चमकते दिखते हैं। और अपनी जाति के लोगों के गुनाह उन्हें जाति व्यवस्था के तहत जायज लगते हैं। यह समाज धर्म के आधार पर, जाति के आधार पर टुकड़े-टुकड़े हो चुका है। बहुत से शहरों में बहुत सी कॉलोनियों में, या रिहायशी इमारतों में, या मुहल्लों में कुछ धर्म के लोगों, कुछ जाति के लोगों को न किराए पर रहने दिया जाता, न ही उन्हें मकान खरीदने दिए जाते। बहुत सारे ऐसे लोग हैं जिन्हें नाम बदलकर मकान किराए पर लेना पड़ता है। कहने के लिए यह देश धर्मनिरपेक्ष है, और हिन्दुस्तान की गौरवगाथा का जब बखान करना होता है, तो लोग इसे 15 अगस्त और 26 जनवरी को विविधता में एकता वाला देश करार देते हैं। लेकिन साल के बाकी 363 दिन दूसरे धर्म, और दूसरी जाति को परहेज में जुट जाते हैं। हाल के महीनों में जब कोरोना की दहशत फैली, तो कई राज्यों में फल के ठेलों तक पर लोगों ने एक धर्म के बैनर लगा दिए कि यह हिन्दू फलवाले की दुकान है। दूसरी तरफ बहुत से शहरों में ऐसे खुले फतवे जारी किए गए, हिन्दुस्तान का सोशल मीडिया नफरत के फतवों से पट गया कि किसी मुस्लिम से कोई सामान न खरीदें। लेकिन देश-प्रदेशों की सरकारों ने इस पर कोई कार्रवाई की हो, ऐसा अधिक सुनाई नहीं पड़ा। ऐसे लाखों पोस्ट किए गए, लेकिन शायद ही कहीं किसी पर जुर्म कायम हुआ होगा, जबकि साइबर जुर्म में सुबूत तो अपने आप दर्ज होते चलते हैं, किसी गवाह की जरूरत नहीं रहती है। 

उत्तरप्रदेश में हाल ही में विकास दुबे नाम के एक बहुत कुख्यात कहे जाने वाले पुराने मुजरिम को पुलिस ने एक कथित मुठभेड़ में मार गिराया। उसने इसके ठीक पहले अपने घर पहुंचे पुलिसवालों में से 8 को मार डाला था। विकास दुबे के साथ जुर्म के कारोबार में जितने लोग लगे थे, कुछ को पुलिस ने मारा, कुछ को गिरफ्तार किया, और बिना किसी अपवाद के ये सारे लोग एक ही जाति के थे। अब जुर्म में भी एक ही जाति के लोगों का ऐसा गिरोह बना, यह जुर्म के भीतर अपनी जाति से लगाव का मामला कहें, या फिर क्या कहें? हिन्दुस्तान में और भी कई जगहों पर दूसरे धर्म और दूसरी जातियों की जुर्म के लिए ऐसी एकजुटता दिखती है, लेकिन लोगों को दूसरे धर्म, दूसरी जाति के जुर्म ही दिखते हैं, अपने खुद के नहीं दिखते। 
लोगों की सोच को तो एकदम से एक-दो सदी में बदला नहीं जा सकता, लेकिन हिन्दुस्तान जैसे लोकतांत्रिक देश में जब धर्म और जाति की व्यवस्था के तहत लोग दूसरे धर्म और दूसरी जाति के खिलाफ हिंसा के फतवे जारी करते हैं, तो उनके ट्विटर या फेसबुक खाते बंद करवाना काफी नहीं है, उन्हें उनके बदन को भी जेल में बंद करना जरूरी है। 

जिन लोगों को सरकारी दामाद, पठान, चमार, आदिवासी, पिछड़े जैसे शब्दों की गालियां बनाना अच्छा लगता है, उन लोगों को देश के बड़े-बड़े जुर्म में लगे हुए लोगों के धर्म, और उनकी जाति जरूर देखनी चाहिए। गांधी का हत्यारा किस जाति का था, इंदिरा का हत्यारा किस जाति का था, देश का सबसे बड़ा शेयर घोटाला करने वाला किस जाति का था, देश का सबसे बड़ा बैंक लुटेरा किस जाति का था, और आज का यह ताजा मामला सामने है, जिन लोगों को रिजर्वेशन की बदौलत डॉक्टर या इंजीनियर बनने मिलता है, और फिर उनसे ऑपरेशन कराने में जिनका भरोसा नहीं बैठता, या जिनके बनाए हुए पुल गिर जाने का डर जिन्हें लगता है, उन लोगों को देश के बड़े-बड़े जुर्म करने वाले डॉक्टर, और बड़े-बड़े भ्रष्टाचार के निर्माण करने वाले इंजीनियरों के जाति-धर्म भी देखने चाहिए, हो सकता है कि हकीकत उनको पूर्वाग्रह के अपने बोझ से छुटकारा पाने में मदद करे। यह बात तो हिन्दुस्तान में एक बुनियादी सच है ही कि कुछ धर्मों और कुछ जातियों की ताकत इतनी होती है कि उनके मुजरिम बचते ही चले जाते हैं, पुलिस से भी, और अदालतों से भी। इसलिए ताकतवर समझे जाने वाले धर्म, और ऊंची समझी जाने वाली जातियों के लोगों को उनके साथ बेइंसाफी होने का तो खतरा रहता नहीं है। अब इसे तमाम लोग इतना ही करते चलें कि बड़े-बड़े जुर्म के साथ सामने आने वाले मुजरिमों के नाम और उपनाम भी देखते चलें, और अपने सिर पर सवार पूर्वाग्रहों को अपडेट भी करते रहें। पिछले दिनों जब उत्तरप्रदेश पुलिस के हाथों विकास दुबे नाम का वहां का एक बड़ा मुजरिम मारा गया तो सोशल मीडिया पर जिस तरह एक जातिवादी उन्माद से भरे हुए पोस्ट किए गए थे उन पर देश के जिम्मेदार मीडिया ने लेख भी लिखे थे, और उनकी दर्जनों मिसालें भी दी थीं। जब जाति का उन्माद सिर पर ऐसा सवार हो कि अपनी जाति के माफिया सरगना पर शर्म आने के बजाय उस पर गर्व होने लगे, तो ऐसी नौबत फिक्र का सामान तो है ही।  https://dailychhattisgarh.com/article-details.php?article=48654&path_article=18

(Daily chhattisgarh)

बात की बात, 31 जुलाई 2020


दीवारों पर लिक्खा है, 31 जुलाई 2020


दीवारों पर लिक्खा है, 30 जुलाई 2020


फ्रेंच इंजीनियरों को पता ही नहीं था कि वे रफाल की शक्ल में बना चुके हैं भारत के लिए वियाग्रा...

अमिताभ बच्चन के लिखे एक-एक शब्द करोड़ों बार दुहराए जाते हैं। वे 25 शब्दों का ट्वीट करते हैं, तो वह हिन्दुस्तान के हर अखबार, हर टीवी चैनल, और हर समाचार पोर्टल पर खबर बन जाता है। प्रकृति ने कहीं-कहीं आवाज गूंजने वाली जगहें बनाई हैं, कहीं पहाड़ से, तो कहीं गुफा में लोग कुछ बोलकर अपनी ही आवाज वापिस सुन लेते हैं। अमिताभ बच्चन की पूरी जिंदगी ही ऐसी हो गई है कि आधी रात वे कुछ ट्वीट करें, और अगली सुबह तमाम अखबार उसमें काफी कुछ जोड़-घटाकर उसकी बड़ी सी खबर ले लें। टीवी चैनल एक-एक ट्वीट पर टूट पड़ते हैं, और कई मिनटों का एयरटाईम उसी को समर्पित हो जाता है। शोहरत लोगों को इतनी अहमियत दिला देती है कि उनके एक-एक शब्द बहुत मायने रखते हैं। विराट कोहली जैसे मशहूर क्रिकेटर, या प्रियंका चोपड़ा जैसी मशहूर एक्ट्रेस के बारे में चर्चा रहती है कि वे इंस्टाग्राम पर एक-एक पोस्ट के लिए करोड़ रूपए से अधिक पाते हैं। अब ऐसी खबरों की हकीकत तो महज ऐसे सितारे, या आयकर विभाग बता सकते हैं, लेकिन चर्चा तो ऐसी ही रहती है। 

अब आज अमिताभ बच्चन की खबरों के सैलाब के बीच इस मुद्दे पर लिखा क्यों जा रहा है, यह भी एक सवाल है। और इसका जवाब यह है कि अमिताभ बच्चन की तंगदिली से, सामाजिक सराकारों से कोई वास्ता न रखने जैसी उनकी खामियों के बीच भी उनके व्यक्तित्व और उनकी जिंदगी की एक बात ऐसी है जिससे तमाम लोग काफी कुछ सीख सकते हैं। आज की पीढ़ी को शायद यह याद नहीं होगा कि कुछ दशक पहले अमिताभ बच्चन ने फिल्मों में काम करने से परे मनोरंजन उद्योग  का कारोबार शुरू किया था, और उसमें वे लंबे घाटे में चले गए थे, डूब गए थे। किसी एक इंटरव्यू में उन्होंने बतलाया था कि कर्ज से उस दौर में फिल्म उद्योग के ही दूसरे लोग अपनी वसूली के लिए अमिताभ के पास लोग भेजकर उन्हें किस तरह बेइज्जत करते थे। लेकिन उस पूरे दौर में दो बातें अमिताभ के साथ रहीं, और जो किसी को भी कैसी भी मुसीबत से उबरने में मदद कर सकती हैं। अमिताभ ने हिम्मत नहीं छोड़ी, मेहनत नहीं छोड़ी, वे लगातार संघर्ष करते रहे, और आज भी फिल्म उद्योग में सबसे अधिक मेहनत करने वाले लोगों में से वे एक हैं, रात 3 बजे, 4 बजे वे किसी रिकॉर्डिंग या शूटिंग से लौटते हुए भी ट्वीट करते हैं, लौटकर ब्लॉग लिखते हैं। यह तो हुई एक बात, और दूसरी बात यह कि मुसीबत के उस दौर में हिन्दुस्तान के कुछ ताकतवर लोग उनके करीबी दोस्त थे, उनके साथ थे, और ऐसी चर्चा है कि उन्होंने कर्ज से उबरने में अमिताभ की मदद की थी। 

जो भी हो, कम से कम अमिताभ बच्चन किसी जुर्म की कमाई से कर्ज से नहीं उबरे थे, और उन्होंने कर्ज चुकाने के बाद लगातार शोहरत और कामयाबी के नए रिकॉर्ड कायम किए, और वन मैन आर्मी की तरह वे लगातार आगे बढ़ते चले गए। इस किस्से को सुनाने का एक मकसद यह है कि जो लोग आज कर्ज में डूब गए हैं, परेशानी में फंसे हैं, जिन्हें रौशनी की कोई किरण नहीं दिख रही है, उन्हें भी अमिताभ का उबरना देखना चाहिए। वे हिन्दुस्तान की एक सबसे बड़ी मिसाल हैं कि सबसे बुरे हालात से उबरकर कैसे आसमान पर पहुंचा जाता है। लेकिन उनके उबरने में, जैसी कि चर्चा है, अगर उनके कुछ बहुत ताकतवर और अतिसंपन्न दोस्त उनके मददगार रहे, तो लोगों को जिंदगी में इस बात का ख्याल भी रखना चाहिए। वैसे तो आदर्श स्थिति यह है कि दोस्ती बिना मतलबपरस्ती के होना चाहिए, लेकिन हकीकत यह है कि दोस्तों में कम से कम कुछ तो ऐसे रहें जो कि आड़े वक्त पर आकर खड़े रह सकें, किसी काम आ सकें। सोच-समझकर किसी संपन्न से किसी मकसद से दोस्ती नहीं की जा सकती। लेकिन आसपास अपने दोस्तों को छोटी-छोटी परेशानियों के वक्त छोटी-छोटी बातों के लिए कसौटी पर कस लेना चाहिए कि क्या आड़े वक्त पर वे साथ खड़े रहेंगे? और बात महज पैसों की मदद की नहीं होती है, हौसले की भी होती है, और खराब वक्त में सार्वजनिक रूप से साथ देने की भी होती है। अधिकतर लोग इस खुशफहमी में जीते हैं कि उनके दोस्त इतने भरोसेमंद हैं कि जरूरत पडऩे पर वे उनके लिए अपनी जान भी दे देंगे, लेकिन जिनसे किडनी पाने की उम्मीद रखी जाती है, वे वक्त पर एक दिन के अपनी कार भी देने से परहेज करते हैं। इसलिए जिंदगी में इस बात के लिए भी तैयार रहना चाहिए कि अपने आसपास के लोगों को तौल लिया जाए कि बुरे वक्त वे कितना कंधा देने तैयार रहेंगे। बहुत पहले एक बार इसी पन्ने पर हमने लिखा था कि लोगों को दो चक्कों वाली एक अर्थी, या जनाजा, बनवाकर रखना चाहिए, ताकि चार लोग न जुटें, तो दो ही लोग उसे धकेलकर ले जा सकें। लोगों को ऐसी नौबत के खतरे को अनदेखा नहीं करना चाहिए, और उसके लिए तैयार भी रहना चाहिए। 

इन दोनों बातों को मिला लें तो कुल मिलाकर बात यह बनती है कि दिन चाहे कितने ही खराब आ जाएं, हौसला नहीं छोडऩा चाहिए, उससे उबरना नामुमकिन नहीं मानना चाहिए। अंग्रेजी के शब्द इम्पॉसिबल के अंग्रेजी हिज्जों को तोडक़र ही एक दूसरा शब्द बनता है आई एम पॉसिबल। और इसकी एक बड़ी शानदार और अच्छी मिसाल अमिताभ बच्चन हैं। लेकिन ऐसी दूसरी भी बहुत सी मिसालें हैं जिन्हें लोगों ने दोनों पैर खो दिए, और दोनों नकली पैरों के साथ जो एवरेस्ट पर पहुंचे। ऐसे लोग जिनकी आंखें नहीं थीं, वे भी एवरेस्ट पर पहुंचे। कहीं कोई अकेली लडक़ी या महिला दुनिया के कई समंदर चीरते हुए एक बोट पर अकेले ही आधी दुनिया पार कर लेती है। ऐसे बहुत से असल जिंदगी के किस्से हैं, जो खालिस हकीकत हैं, और जो मुसीबत में फंसे लोगों को एक बढिय़ा रास्ता भी दिखाते हैं। अमिताभ बच्चन की बात चल रही है इसलिए यह भी याद करना ठीक होगा कि जिस वक्त वे मुंबई के फिल्म उद्योग में आए थे, उन्हें उनकी बहुत अधिक लंबाई के बारे में कहा गया था कि वे नीचे से पैर एक फीट कटाकर आएं। कोई उन्हें फिल्म देने तैयार नहीं थे। और आज उनकी हालत यह है कि हिन्दुस्तान के गहनों के सबसे बड़े ब्रांड की मॉडलिंग करके वे गहने बिकवाते हैं, और हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी गिरवी रखने वाली कंपनी की मॉडलिंग करके सोने के गहने गिरवी भी रखवाते हैं। फिल्मों की कामयाबी, टीवी की शोहरत, मॉडलिंग और ब्रांड प्रमोशन के अलावा वे पता नहीं क्या-क्या करते हैं, और कैसे-कैसे कितना-कितना कमाते हैं। लेकिन यह याद रखने की जरूरत है कि एक फिल्म की शूटिंग के दौरान जख्मी होकर वे मौत के मुंह में जा चुके थे, और वहां से लौटकर आए थे। उन्हें पिछले दस-बीस बरस से एक बहुत गंभीर बीमारी चले आ रही है, और वे उसके साथ ही एक उद्योग की तरह रात-दिन काम करते रहते हैं। इसलिए महज दोस्तों से कुछ नहीं होता, महज संपन्न दोस्तों से कुछ नहीं होता, खुद का हौसला भी रहना जरूरी होता है, खुद मेहनत भी करनी होती है, और बुरे वक्त के लायक तैयार भी रहना होता है। यह बात हम आज इसलिए लिख रहे हैं कि आज चारों तरफ आम से काफी अधिक गिनती में आत्महत्याएं हो रही हैं, लोगों को ऐसा लगता है कि तकलीफ और दहशत के इस दौर में खुदकुशी बढ़ भी सकती है। लोगों को हौसला रखना चाहिए, और हो सके तो अपनी दीवारों पर उन लोगों की तस्वीरें चिपाककर रखनी चाहिए जिन्होंने दोनों नकली पैरों के साथ एवरेस्ट पर फतह हासिल की है। 

(Daily chhattisgarh)

लापरवाह लोगों के साथ सरकारी नरमी किसलिए?

हिन्दुस्तान में कोरोना का जो हाल चल रहा है, वह  बहुत फिक्र पैदा करता है। कई प्रदेशों में अस्पतालों में जगह नहीं बची है, तो बड़े-बड़े स्टेडियमों में पलंग लगाकर कोरोना वार्ड बना दिए गए हैं। मौतें बहुत रफ्तार से इस देश में आगे नहीं बढ़ रही हैं, इसलिए लोग बेफिक्र हैं। यह एक अलग बात है कि पिछले चौबीस घंटों में 52 हजार से अधिक लोग पॉजिटिव निकले हैं, और दो सौ से अधिक मौतें भी हुई हैं। 

देश में झारखंड ने मास्क न लगाने वालों पर एक लाख रूपए जुर्माना लगाया है। इसके पहले सबसे बड़ा जुर्माना केरल ने 10 हजार रूपए का लगाया था। इनसे परे देखें तो छत्तीसगढ़ जैसे बहुत से राज्य सौ-दो सौ रूपए का जुर्माना लगा रहे हैं जिसे लोग मजाक बनाकर चल रहे हैं। यह भी खबर सामने आ रही हैं कि किस तरह बड़े अफसर, मंत्री और विधायक, सांसदों से लेकर पार्षदों तक राजनीति के लोग लापरवाही दिखा रहे हैं। उनके आसार गड़बड़ दिख रहे हैं, लेकिन वे कोरोना टेस्ट के लिए नमूना देने के बाद घर बैठने के बजाय जनसंपर्क कर रहे हैं। 

कहने के लिए तो महामारी का कानून बड़ा कड़ा है, और जानकारी छुपाने वालों के लिए सजा है, लापरवाही बरतने वालों के लिए भी सजा है। लेकिन सरकार में बैठे छोटे-छोटे कर्मचारियों, और पुलिस कर्मचारियों की इतनी हिम्मत कहां हो सकती है कि वे ताकतवर नेताओं और बड़े अफसरों के बारे में किसी कार्रवाई की सोच भी सकें। छत्तीसगढ़ में ताजा-ताजा मिसाल वन विभाग के एक सबसे छोटे कर्मचारी वनरक्षक की है जिसने अपने खासे बड़े अफसर को बांस की अवैध कटाई करते पकडक़र जुर्म दर्ज कर लिया था, अब उसी के खिलाफ कार्रवाई हो रही है। महामारी का खतरा और हिन्दुस्तान में छत्तीसगढ़ किस्म के दर्जनों राज्यों में राजनीतिक दबदबा मेल नहीं खा रहे हैं। महामारी से लापरवाह लोग अकेले नहीं बच सकते, वे औरों को साथ लेकर डूबते हैं, और अपने आसपास हम रात-दिन देखते हैं कि लोग किस तरह गैरजिम्मेदार हैं। 

यह सिलसिला बहुत खतरनाक इसलिए है कि इसमें बेकसूर मारे जाएंगे, ठीक उसी तरह जिस तरह कि सडक़ पर नशे में कोई ड्राईवर गाड़ी चलाए, और बाकी लोगों की जिंदगी भी खतरे में आ जाए। आज एक-एक कोरोना पॉजिटिव निकलने पर जिस तरह सैकड़ों लोगों के काम छिन जा रहे हैं, लोग बेरोजगार हो जा रहे हैं, लॉकडाऊन फिर से लागू हो रहा है, उससे करे कोई, भरे कोई की नौबत आ रही है। जो लोग सरकारी तनख्वाह वाले हैं, या कमाई वाले कारोबारी हैं, उनको तो जिंदा रहने में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन बार-बार होते लॉकडाऊन की वजह से असंगठित कर्मचारी, तकरीबन तमाम मजदूर, और फेरीवाले, खोमचेवाले, छोटे-छोटे कारोबारी भूखे मरने की नौबत में हैं। कम से कम इन लोगों को देखते हुए सरकार को महामारी के प्रतिबंध बहुत कड़ाई से लागू करना चाहिए। छत्तीसगढ़ लॉकडाऊन के एक और दौर से गुजर रहा है, रोज सैकड़ों कोरोना पॉजिटिव की लिस्ट देखें, तो किसी भी दिन आधा दर्जन से कम पुलिसवाले, और आधा दर्जन से कम स्वास्थ्य कर्मचारी उसमें नहीं रहते। और ये अधिकतर स्वास्थ्य कर्मचारी सरकारी अस्पतालों के हैं। बहुत से सफाई कर्मचारी कोरोना पॉजिटिव निकल रहे हैं। ये सारे के सारे लोग जनसुविधाओं का काम करते हुए अपनी जान जोखिम  में डाल रहे हैं। देश-प्रदेश में नियम और प्रतिबंध न होना खतरनाक होता है, लेकिन होने के बाद भी उनको लागू न करना, उन पर अमल न होना और भी खतरनाक होता है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य इसी लापरवाही और अनदेखी के शिकार हैं कि यहां हजारों लोग राजधानी में ही बिना मास्क घूम रहे हैं, और खतरा झेलकर पुलिस सडक़ों पर तैनात है, सफाई कर्मचारी से लेकर स्वास्थ्य कर्मचारी तक अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर काम कर रहे हैं। लोग इस नौबत के खतरे को भी नहीं समझ रहे हैं कि कोरोना पॉजिटिव का आसार दिखने पर जांच होने में वक्त लग रहा है, और फिर रिपोर्ट आने में कई दिन लग रहे हैं। इसके बाद राजधानी में हाल यह है कि कोरोना पॉजिटिव घर बैठे एम्बुलेंस की राह देखते हैं जो तीन-चार दिनों तक नहीं आ पा रही है। इसके पीछे सरकारी विभागों में तालमेल की कमी है, या एम्बुलेंस की कमी है, इसे तो सरकार ही जाने, लेकिन ऐसी नौबत की सोच तक लोगों को अपने-आपको खतरे से दूर रखना चाहिए, लेकिन ऐसी कोई नीयत लोगों की दिख नहीं रही है। 

अधिकतर लोग इस खुशफहमी में जीने वाले हैं कि खाली चम्मच पीटने से और शंख बजाने से कोरोना मर जाएगा, जबकि ऐसा पाखंड फर्जी साबित हो चुका है। इसके बाद तरह-तरह के दूसरे पाखंड इस्तेमाल हो रहे हैं। पिछले चार दिनों से देश इसमें डूबा है कि मानो नए आए लड़ाकू विमान रफाल से बम गिराकर कोरोना का मार दिया जाएगा। जब लोगों की वैज्ञानिक सोच ही खत्म हो जाती है, तो वे किसी भी पाखंड पर भरोसा करने लगते हैं, और वैज्ञानिक तर्कों को तेजी से खारिज करने लगते हैं, क्योंकि वैज्ञानिक बातों पर भरोसा करने का एक मतलब दिमाग पर जोर देना भी होता है, और जिम्मेदार बनना भी। भला कौन जिम्मेदार बनना चाहते हैं जब तरह-तरह के नारों से काम चल रहा है। 

पॉजिटिव निकलने के बाद मौतें कम होने से लोग कोरोना से तो कम मर रहे हैं, लेकिन भुखमरी और बेरोजगारी से अधिक लोग मर रहे हैं, लॉकडाऊन के तनाव में आत्महत्याएं बढ़ती जा रही हैं, और गरीबी से लोग कुपोषण के शिकार होकर भी मरने वाले हैं जो कि सरकारी रिकॉर्ड में नहीं आएंगे। ऐसी नौबत में सरकार को चाहिए कि वह लापरवाह और गैरजिम्मेदार लोगों पर कड़ी कार्रवाई करे, ताकि कुछ लोगों को समझ आ सके। आज गैरजिम्मेदार लोगों के लिए मैदानी सरकारी अमला अपनी जान देते जुटा हुआ है, और ऐसे गैरजिम्मेदार लोग ऐसी सरकारी सेवा पाने के हकदार नहीं हैं। जिन लोगों को अपने पैसों का अधिक गुरूर है उन पर झारखंड की तरह लाख रूपए का जुर्माना न सही, केरल की तरह दस हजार रूपए का जुर्माना तो लगाना ही चाहिए। 

(Daily chhattisgarh)

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का काँव-काँव, 28 जुलाई


दीवारों पर लिक्खा है, 28 जुलाई


बाबा-ब्रांड साजिश जिन्हें दिखती नहीं, उनके लिए..

अमिताभ बच्चन के लिखे एक-एक शब्द करोड़ों बार दुहराए जाते हैं। वे 25 शब्दों का ट्वीट करते हैं, तो वह हिन्दुस्तान के हर अखबार, हर टीवी चैनल, और हर समाचार पोर्टल पर खबर बन जाता है। प्रकृति ने कहीं-कहीं आवाज गूंजने वाली जगहें बनाई हैं, कहीं पहाड़ से, तो कहीं गुफा में लोग कुछ बोलकर अपनी ही आवाज वापिस सुन लेते हैं। अमिताभ बच्चन की पूरी जिंदगी ही ऐसी हो गई है कि आधी रात वे कुछ ट्वीट करें, और अगली सुबह तमाम अखबार उसमें काफी कुछ जोड़-घटाकर उसकी बड़ी सी खबर ले लें। टीवी चैनल एक-एक ट्वीट पर टूट पड़ते हैं, और कई मिनटों का एयरटाईम उसी को समर्पित हो जाता है। शोहरत लोगों को इतनी अहमियत दिला देती है कि उनके एक-एक शब्द बहुत मायने रखते हैं। विराट कोहली जैसे मशहूर क्रिकेटर, या प्रियंका चोपड़ा जैसी मशहूर एक्ट्रेस के बारे में चर्चा रहती है कि वे इंस्टाग्राम पर एक-एक पोस्ट के लिए करोड़ रूपए से अधिक पाते हैं। अब ऐसी खबरों की हकीकत तो महज ऐसे सितारे, या आयकर विभाग बता सकते हैं, लेकिन चर्चा तो ऐसी ही रहती है। 

अब आज अमिताभ बच्चन की खबरों के सैलाब के बीच इस मुद्दे पर लिखा क्यों जा रहा है, यह भी एक सवाल है। और इसका जवाब यह है कि अमिताभ बच्चन की तंगदिली से, सामाजिक सराकारों से कोई वास्ता न रखने जैसी उनकी खामियों के बीच भी उनके व्यक्तित्व और उनकी जिंदगी की एक बात ऐसी है जिससे तमाम लोग काफी कुछ सीख सकते हैं। आज की पीढ़ी को शायद यह याद नहीं होगा कि कुछ दशक पहले अमिताभ बच्चन ने फिल्मों में काम करने से परे मनोरंजन उद्योग  का कारोबार शुरू किया था, और उसमें वे लंबे घाटे में चले गए थे, डूब गए थे। किसी एक इंटरव्यू में उन्होंने बतलाया था कि कर्ज से उस दौर में फिल्म उद्योग के ही दूसरे लोग अपनी वसूली के लिए अमिताभ के पास लोग भेजकर उन्हें किस तरह बेइज्जत करते थे। लेकिन उस पूरे दौर में दो बातें अमिताभ के साथ रहीं, और जो किसी को भी कैसी भी मुसीबत से उबरने में मदद कर सकती हैं। अमिताभ ने हिम्मत नहीं छोड़ी, मेहनत नहीं छोड़ी, वे लगातार संघर्ष करते रहे, और आज भी फिल्म उद्योग में सबसे अधिक मेहनत करने वाले लोगों में से वे एक हैं, रात 3 बजे, 4 बजे वे किसी रिकॉर्डिंग या शूटिंग से लौटते हुए भी ट्वीट करते हैं, लौटकर ब्लॉग लिखते हैं। यह तो हुई एक बात, और दूसरी बात यह कि मुसीबत के उस दौर में हिन्दुस्तान के कुछ ताकतवर लोग उनके करीबी दोस्त थे, उनके साथ थे, और ऐसी चर्चा है कि उन्होंने कर्ज से उबरने में अमिताभ की मदद की थी। 

जो भी हो, कम से कम अमिताभ बच्चन किसी जुर्म की कमाई से कर्ज से नहीं उबरे थे, और उन्होंने कर्ज चुकाने के बाद लगातार शोहरत और कामयाबी के नए रिकॉर्ड कायम किए, और वन मैन आर्मी की तरह वे लगातार आगे बढ़ते चले गए। इस किस्से को सुनाने का एक मकसद यह है कि जो लोग आज कर्ज में डूब गए हैं, परेशानी में फंसे हैं, जिन्हें रौशनी की कोई किरण नहीं दिख रही है, उन्हें भी अमिताभ का उबरना देखना चाहिए। वे हिन्दुस्तान की एक सबसे बड़ी मिसाल हैं कि सबसे बुरे हालात से उबरकर कैसे आसमान पर पहुंचा जाता है। लेकिन उनके उबरने में, जैसी कि चर्चा है, अगर उनके कुछ बहुत ताकतवर और अतिसंपन्न दोस्त उनके मददगार रहे, तो लोगों को जिंदगी में इस बात का ख्याल भी रखना चाहिए। वैसे तो आदर्श स्थिति यह है कि दोस्ती बिना मतलबपरस्ती के होना चाहिए, लेकिन हकीकत यह है कि दोस्तों में कम से कम कुछ तो ऐसे रहें जो कि आड़े वक्त पर आकर खड़े रह सकें, किसी काम आ सकें। सोच-समझकर किसी संपन्न से किसी मकसद से दोस्ती नहीं की जा सकती। लेकिन आसपास अपने दोस्तों को छोटी-छोटी परेशानियों के वक्त छोटी-छोटी बातों के लिए कसौटी पर कस लेना चाहिए कि क्या आड़े वक्त पर वे साथ खड़े रहेंगे? और बात महज पैसों की मदद की नहीं होती है, हौसले की भी होती है, और खराब वक्त में सार्वजनिक रूप से साथ देने की भी होती है। अधिकतर लोग इस खुशफहमी में जीते हैं कि उनके दोस्त इतने भरोसेमंद हैं कि जरूरत पडऩे पर वे उनके लिए अपनी जान भी दे देंगे, लेकिन जिनसे किडनी पाने की उम्मीद रखी जाती है, वे वक्त पर एक दिन के अपनी कार भी देने से परहेज करते हैं। इसलिए जिंदगी में इस बात के लिए भी तैयार रहना चाहिए कि अपने आसपास के लोगों को तौल लिया जाए कि बुरे वक्त वे कितना कंधा देने तैयार रहेंगे। बहुत पहले एक बार इसी पन्ने पर हमने लिखा था कि लोगों को दो चक्कों वाली एक अर्थी, या जनाजा, बनवाकर रखना चाहिए, ताकि चार लोग न जुटें, तो दो ही लोग उसे धकेलकर ले जा सकें। लोगों को ऐसी नौबत के खतरे को अनदेखा नहीं करना चाहिए, और उसके लिए तैयार भी रहना चाहिए। 

इन दोनों बातों को मिला लें तो कुल मिलाकर बात यह बनती है कि दिन चाहे कितने ही खराब आ जाएं, हौसला नहीं छोडऩा चाहिए, उससे उबरना नामुमकिन नहीं मानना चाहिए। अंग्रेजी के शब्द इम्पॉसिबल के अंग्रेजी हिज्जों को तोडक़र ही एक दूसरा शब्द बनता है आई एम पॉसिबल। और इसकी एक बड़ी शानदार और अच्छी मिसाल अमिताभ बच्चन हैं। लेकिन ऐसी दूसरी भी बहुत सी मिसालें हैं जिन्हें लोगों ने दोनों पैर खो दिए, और दोनों नकली पैरों के साथ जो एवरेस्ट पर पहुंचे। ऐसे लोग जिनकी आंखें नहीं थीं, वे भी एवरेस्ट पर पहुंचे। कहीं कोई अकेली लडक़ी या महिला दुनिया के कई समंदर चीरते हुए एक बोट पर अकेले ही आधी दुनिया पार कर लेती है। ऐसे बहुत से असल जिंदगी के किस्से हैं, जो खालिस हकीकत हैं, और जो मुसीबत में फंसे लोगों को एक बढिय़ा रास्ता भी दिखाते हैं। अमिताभ बच्चन की बात चल रही है इसलिए यह भी याद करना ठीक होगा कि जिस वक्त वे मुंबई के फिल्म उद्योग में आए थे, उन्हें उनकी बहुत अधिक लंबाई के बारे में कहा गया था कि वे नीचे से पैर एक फीट कटाकर आएं। कोई उन्हें फिल्म देने तैयार नहीं थे। और आज उनकी हालत यह है कि हिन्दुस्तान के गहनों के सबसे बड़े ब्रांड की मॉडलिंग करके वे गहने बिकवाते हैं, और हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी गिरवी रखने वाली कंपनी की मॉडलिंग करके सोने के गहने गिरवी भी रखवाते हैं। फिल्मों की कामयाबी, टीवी की शोहरत, मॉडलिंग और ब्रांड प्रमोशन के अलावा वे पता नहीं क्या-क्या करते हैं, और कैसे-कैसे कितना-कितना कमाते हैं। लेकिन यह याद रखने की जरूरत है कि एक फिल्म की शूटिंग के दौरान जख्मी होकर वे मौत के मुंह में जा चुके थे, और वहां से लौटकर आए थे। उन्हें पिछले दस-बीस बरस से एक बहुत गंभीर बीमारी चले आ रही है, और वे उसके साथ ही एक उद्योग की तरह रात-दिन काम करते रहते हैं। इसलिए महज दोस्तों से कुछ नहीं होता, महज संपन्न दोस्तों से कुछ नहीं होता, खुद का हौसला भी रहना जरूरी होता है, खुद मेहनत भी करनी होती है, और बुरे वक्त के लायक तैयार भी रहना होता है। यह बात हम आज इसलिए लिख रहे हैं कि आज चारों तरफ आम से काफी अधिक गिनती में आत्महत्याएं हो रही हैं, लोगों को ऐसा लगता है कि तकलीफ और दहशत के इस दौर में खुदकुशी बढ़ भी सकती है। लोगों को हौसला रखना चाहिए, और हो सके तो अपनी दीवारों पर उन लोगों की तस्वीरें चिपाककर रखनी चाहिए जिन्होंने दोनों नकली पैरों के साथ एवरेस्ट पर फतह हासिल की है। 

(Daily chhattisgarh)

कुछ मिसालों को देखकर हौसला पाया जा सकता है

अमिताभ बच्चन के लिखे एक-एक शब्द करोड़ों बार दुहराए जाते हैं। वे 25 शब्दों का ट्वीट करते हैं, तो वह हिन्दुस्तान के हर अखबार, हर टीवी चैनल, और हर समाचार पोर्टल पर खबर बन जाता है। प्रकृति ने कहीं-कहीं आवाज गूंजने वाली जगहें बनाई हैं, कहीं पहाड़ से, तो कहीं गुफा में लोग कुछ बोलकर अपनी ही आवाज वापिस सुन लेते हैं। अमिताभ बच्चन की पूरी जिंदगी ही ऐसी हो गई है कि आधी रात वे कुछ ट्वीट करें, और अगली सुबह तमाम अखबार उसमें काफी कुछ जोड़-घटाकर उसकी बड़ी सी खबर ले लें। टीवी चैनल एक-एक ट्वीट पर टूट पड़ते हैं, और कई मिनटों का एयरटाईम उसी को समर्पित हो जाता है। शोहरत लोगों को इतनी अहमियत दिला देती है कि उनके एक-एक शब्द बहुत मायने रखते हैं। विराट कोहली जैसे मशहूर क्रिकेटर, या प्रियंका चोपड़ा जैसी मशहूर एक्ट्रेस के बारे में चर्चा रहती है कि वे इंस्टाग्राम पर एक-एक पोस्ट के लिए करोड़ रूपए से अधिक पाते हैं। अब ऐसी खबरों की हकीकत तो महज ऐसे सितारे, या आयकर विभाग बता सकते हैं, लेकिन चर्चा तो ऐसी ही रहती है। 

अब आज अमिताभ बच्चन की खबरों के सैलाब के बीच इस मुद्दे पर लिखा क्यों जा रहा है, यह भी एक सवाल है। और इसका जवाब यह है कि अमिताभ बच्चन की तंगदिली से, सामाजिक सराकारों से कोई वास्ता न रखने जैसी उनकी खामियों के बीच भी उनके व्यक्तित्व और उनकी जिंदगी की एक बात ऐसी है जिससे तमाम लोग काफी कुछ सीख सकते हैं। आज की पीढ़ी को शायद यह याद नहीं होगा कि कुछ दशक पहले अमिताभ बच्चन ने फिल्मों में काम करने से परे मनोरंजन उद्योग  का कारोबार शुरू किया था, और उसमें वे लंबे घाटे में चले गए थे, डूब गए थे। किसी एक इंटरव्यू में उन्होंने बतलाया था कि कर्ज से उस दौर में फिल्म उद्योग के ही दूसरे लोग अपनी वसूली के लिए अमिताभ के पास लोग भेजकर उन्हें किस तरह बेइज्जत करते थे। लेकिन उस पूरे दौर में दो बातें अमिताभ के साथ रहीं, और जो किसी को भी कैसी भी मुसीबत से उबरने में मदद कर सकती हैं। अमिताभ ने हिम्मत नहीं छोड़ी, मेहनत नहीं छोड़ी, वे लगातार संघर्ष करते रहे, और आज भी फिल्म उद्योग में सबसे अधिक मेहनत करने वाले लोगों में से वे एक हैं, रात 3 बजे, 4 बजे वे किसी रिकॉर्डिंग या शूटिंग से लौटते हुए भी ट्वीट करते हैं, लौटकर ब्लॉग लिखते हैं। यह तो हुई एक बात, और दूसरी बात यह कि मुसीबत के उस दौर में हिन्दुस्तान के कुछ ताकतवर लोग उनके करीबी दोस्त थे, उनके साथ थे, और ऐसी चर्चा है कि उन्होंने कर्ज से उबरने में अमिताभ की मदद की थी। 

जो भी हो, कम से कम अमिताभ बच्चन किसी जुर्म की कमाई से कर्ज से नहीं उबरे थे, और उन्होंने कर्ज चुकाने के बाद लगातार शोहरत और कामयाबी के नए रिकॉर्ड कायम किए, और वन मैन आर्मी की तरह वे लगातार आगे बढ़ते चले गए। इस किस्से को सुनाने का एक मकसद यह है कि जो लोग आज कर्ज में डूब गए हैं, परेशानी में फंसे हैं, जिन्हें रौशनी की कोई किरण नहीं दिख रही है, उन्हें भी अमिताभ का उबरना देखना चाहिए। वे हिन्दुस्तान की एक सबसे बड़ी मिसाल हैं कि सबसे बुरे हालात से उबरकर कैसे आसमान पर पहुंचा जाता है। लेकिन उनके उबरने में, जैसी कि चर्चा है, अगर उनके कुछ बहुत ताकतवर और अतिसंपन्न दोस्त उनके मददगार रहे, तो लोगों को जिंदगी में इस बात का ख्याल भी रखना चाहिए। वैसे तो आदर्श स्थिति यह है कि दोस्ती बिना मतलबपरस्ती के होना चाहिए, लेकिन हकीकत यह है कि दोस्तों में कम से कम कुछ तो ऐसे रहें जो कि आड़े वक्त पर आकर खड़े रह सकें, किसी काम आ सकें। सोच-समझकर किसी संपन्न से किसी मकसद से दोस्ती नहीं की जा सकती। लेकिन आसपास अपने दोस्तों को छोटी-छोटी परेशानियों के वक्त छोटी-छोटी बातों के लिए कसौटी पर कस लेना चाहिए कि क्या आड़े वक्त पर वे साथ खड़े रहेंगे? और बात महज पैसों की मदद की नहीं होती है, हौसले की भी होती है, और खराब वक्त में सार्वजनिक रूप से साथ देने की भी होती है। अधिकतर लोग इस खुशफहमी में जीते हैं कि उनके दोस्त इतने भरोसेमंद हैं कि जरूरत पडऩे पर वे उनके लिए अपनी जान भी दे देंगे, लेकिन जिनसे किडनी पाने की उम्मीद रखी जाती है, वे वक्त पर एक दिन के अपनी कार भी देने से परहेज करते हैं। इसलिए जिंदगी में इस बात के लिए भी तैयार रहना चाहिए कि अपने आसपास के लोगों को तौल लिया जाए कि बुरे वक्त वे कितना कंधा देने तैयार रहेंगे। बहुत पहले एक बार इसी पन्ने पर हमने लिखा था कि लोगों को दो चक्कों वाली एक अर्थी, या जनाजा, बनवाकर रखना चाहिए, ताकि चार लोग न जुटें, तो दो ही लोग उसे धकेलकर ले जा सकें। लोगों को ऐसी नौबत के खतरे को अनदेखा नहीं करना चाहिए, और उसके लिए तैयार भी रहना चाहिए। 

इन दोनों बातों को मिला लें तो कुल मिलाकर बात यह बनती है कि दिन चाहे कितने ही खराब आ जाएं, हौसला नहीं छोडऩा चाहिए, उससे उबरना नामुमकिन नहीं मानना चाहिए। अंग्रेजी के शब्द इम्पॉसिबल के अंग्रेजी हिज्जों को तोडक़र ही एक दूसरा शब्द बनता है आई एम पॉसिबल। और इसकी एक बड़ी शानदार और अच्छी मिसाल अमिताभ बच्चन हैं। लेकिन ऐसी दूसरी भी बहुत सी मिसालें हैं जिन्हें लोगों ने दोनों पैर खो दिए, और दोनों नकली पैरों के साथ जो एवरेस्ट पर पहुंचे। ऐसे लोग जिनकी आंखें नहीं थीं, वे भी एवरेस्ट पर पहुंचे। कहीं कोई अकेली लडक़ी या महिला दुनिया के कई समंदर चीरते हुए एक बोट पर अकेले ही आधी दुनिया पार कर लेती है। ऐसे बहुत से असल जिंदगी के किस्से हैं, जो खालिस हकीकत हैं, और जो मुसीबत में फंसे लोगों को एक बढिय़ा रास्ता भी दिखाते हैं। अमिताभ बच्चन की बात चल रही है इसलिए यह भी याद करना ठीक होगा कि जिस वक्त वे मुंबई के फिल्म उद्योग में आए थे, उन्हें उनकी बहुत अधिक लंबाई के बारे में कहा गया था कि वे नीचे से पैर एक फीट कटाकर आएं। कोई उन्हें फिल्म देने तैयार नहीं थे। और आज उनकी हालत यह है कि हिन्दुस्तान के गहनों के सबसे बड़े ब्रांड की मॉडलिंग करके वे गहने बिकवाते हैं, और हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी गिरवी रखने वाली कंपनी की मॉडलिंग करके सोने के गहने गिरवी भी रखवाते हैं। फिल्मों की कामयाबी, टीवी की शोहरत, मॉडलिंग और ब्रांड प्रमोशन के अलावा वे पता नहीं क्या-क्या करते हैं, और कैसे-कैसे कितना-कितना कमाते हैं। लेकिन यह याद रखने की जरूरत है कि एक फिल्म की शूटिंग के दौरान जख्मी होकर वे मौत के मुंह में जा चुके थे, और वहां से लौटकर आए थे। उन्हें पिछले दस-बीस बरस से एक बहुत गंभीर बीमारी चले आ रही है, और वे उसके साथ ही एक उद्योग की तरह रात-दिन काम करते रहते हैं। इसलिए महज दोस्तों से कुछ नहीं होता, महज संपन्न दोस्तों से कुछ नहीं होता, खुद का हौसला भी रहना जरूरी होता है, खुद मेहनत भी करनी होती है, और बुरे वक्त के लायक तैयार भी रहना होता है। यह बात हम आज इसलिए लिख रहे हैं कि आज चारों तरफ आम से काफी अधिक गिनती में आत्महत्याएं हो रही हैं, लोगों को ऐसा लगता है कि तकलीफ और दहशत के इस दौर में खुदकुशी बढ़ भी सकती है। लोगों को हौसला रखना चाहिए, और हो सके तो अपनी दीवारों पर उन लोगों की तस्वीरें चिपाककर रखनी चाहिए जिन्होंने दोनों नकली पैरों के साथ एवरेस्ट पर फतह हासिल की है। 

(Daily chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 जुलाई 2020

कोरोना के चलते हुए ही घर, कारोबार, सरकार सभी सुरक्षित तरीके तलाशें

संपादकीय
26 जुलाई 2020

सरकार और समाज दोनों को आज ऐसी योजना बनाने की जरूरत है कि जब कभी कोरोना का खतरा खत्म होगा, उस वक्त आज बनाए गए ढांचे का क्या इस्तेमाल होगा। दुनिया के तकरीबन हर देश, और हिन्दुस्तान के तकरीबन हर प्रदेश ने इस दौरान मेडिकल जांच की क्षमता कई गुना कर ली है, अस्पतालों में मरीजों को दाखिल करने की क्षमता अंधाधुंध बढ़ा ली है। सरकारों ने अपनी बहुत सी गैरजरूरी इमारतों को अस्पतालों में तब्दील कर दिया है, मेडिकल मशीनें खरीद ली गई हैं। इसी तरह कारोबार में भी एक संक्रामक रोग के चलते अपने तौर-तरीकों को बदल डाला है, कई नई चीजें ईजाद की गई हैं। सरकारी दफ्तरों में काम का अंदाज बदल गया है। लोग कागजों से परहेज करने लगे हैं। बहुत से काम कहीं गए बिना वीडियो कांफ्रेंस से होने लगे हैं। अब यह एक नई पटरी बिछ गई है जिस पर कोरोना-प्रतिरोधक एक्सप्रेस दौड़ रही है।
यह मौका बंद कमरों में बैठकर योजनाएं बनाने वाले लोगों के लिए है जो कि हो सकता है कि आज एक कमरे में बैठक करने के बजाय किसी वीडियो कांफ्रेंस पर दूसरे जानकार-विशेषज्ञों से बात करके इसकी तैयारी कर सकते हैं कि कोरोना के बाद की दुनिया और जिंदगी में आज खड़े किए गए ढांचे,जुटाए गए साधन, और सीखी गई नई तकनीकों का क्या इस्तेमाल हो सकता है। ऐसा लगता है कि सरकारें अगर अभी से योजना बनाएं तो साल-छह महीने बाद कोरोना का खतरा खत्म होने पर सरकारें सरकारी दफ्तरों में आवाजाही घटा सकती हैं, वहां पर लोगों का इंतजार खत्म कर सकती हैं, जगह-जगह लगने वाली कतारों का कोई इलाज निकाला जा सकता है, और सरकार कागजों का काम घटा सकती है। सरकारी काम का सरलीकरण इसलिए जरूरी है कि सरकारी दफ्तर कोरोना फैलने की एक बड़ी वजह अगर आज नहीं भी थे, तो भी कल किसी और संक्रामक रोग के समय ऐसा हो सकता है,इसलिए जनता को सरकार के पास कम से कम जाना पड़े, ऐसा प्रशासनिक सुधार अभी से सोचा जाना चाहिए। दूसरी बात यह कि जिन लोगों को भी एक-दूसरे से कागज लेने पड़ रहे हैं, नोट लेने पड़ रहे हैं, पहचानपत्र देखने के लिए लेना पड़ रहा है, उन सब रोजमर्रा के चीजों के ऐसे डिजिटल रास्ते निकालने की जरूरत है जिसमें लोग अपने मोबाइल फोन को दूर से दिखाकर ही काम चला सकें, या पहचानपत्र को सुरक्षाकर्मी के फोन पर भेज सकें,ताकि एक-दूसरे का फोन भी छूने की जरूरत न पड़े। दुनिया को यह मानना ही नहीं चाहिए कि कोरोना खत्म होने के साथ दुनिया से संक्रामक रोग खत्म हो जाएंगे, या कम से कम सौ बरस पहले की पिछली संक्रामक महामारी की तरह अब अगली संक्रामक महामारी सौ बरस बाद आएगी। लोगों को ऐसी खुशफहमी में नहीं जीना चाहिए। हो सकता है कि कोरोना का कुंभ के मेले में बिछुड़ा हुआ कोई भाई अगले बरस ही आ जाए जिसके तेवर इसके मुकाबले भी कई गुना अधिक खतरनाक हों, जो कि इंसानों के साथ-साथ जानवरों को भी प्रभावित करने वाला हो। ऐसी हालत में सावधानी की तैयारी आज से भी कई गुना अधिक लगेगी, और समाज से लेकर सरकार तक, और कारोबार तक सबको इसके लिए आज के सबक और आज की तैयारी का इस्तेमाल करना चाहिए।
आज सरकार और समाज सबकी जिंदगी एक बहुत बड़े घाटे में आ गई है। यह भी एक वजह है कि सबको ऐसे रास्ते निकालने चाहिए कि खर्च घटे, खपत घटे, काम आसान हो। सरकारें आज तो युद्धस्तर पर काम करके मरीजों को बिस्तर देने के संघर्ष में लगी हैं, और यह क्षमता भी खत्म हो चुकी है इसलिए उत्तरप्रदेश जैसे बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री ने भी यह कह दिया है कि वह कुछ किस्म के कोरोना पॉजिटिव मरीजों को कुछ शर्तों के आधार पर घर पर रहने की छूट देंगे। ऐसी ही बात बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी पहले ही कर चुकी हैं। छत्तीसगढ़ में भी नौबत इसके करीब पहुंच रही है, हालांकि यहां स्वास्थ्य मंत्री इस रियायत के खिलाफ अड़े हुए हैं। ऐसे में यह कल्पना कर लेना जरूरी है कि अगले ही बरस अगर इससे भी अधिक जानलेवा कोई दूसरा संक्रामक रोग आता है, तो उससे बचने के लिए सरकार कैसे तैयार रहे, और जनता कैसे तैयार रहे। कैसे सरकार इस तकलीफ से गुजर रही जनता के बर्बाद हो चुके इस पूरे साल की भरपाई के लिए उसकी जिंदगी आसान कर सकती है। सरकार को जनता से कागज भरवाना और कागज लेना खत्म करना चाहिए। यह सरकार की किफायत के लिए जरूरी है, जनता की बचत के लिए जरूरी है, और दोनों की जिंदगी बचाने के लिए भी जरूरी है। पूरे देश में सरकारी कामकाज के जानकार, टेक्नालॉजी के विशेषज्ञ, और सामाजिक कार्यकर्ता साथ बिठाए जाने चाहिए कि वे सरकारी और कारोबारी कागजी खानापूरी को शून्य करने की तरफ कैसे बढ़ें। यह बात आसान नहीं होगी क्योंकि सरकार में तो जितने रोड़े अटकाए जा सकते हैं, ऊपरी कमाई की संभावना उतनी ही बढ़ती है। लेकिन अपने कर्मचारियों और अधिकारियों की जनता की कतारें लगवाने की हसरतों को खत्म करना चाहिए, और लोग घर बैठे सरकारी काम करवा सकें, इसके पूरे तरीके अभी से शुरू कर देना चाहिए क्योंकि अगली महामारी तो जब आए तब आए, आज भी गैरजरूरी सरकारी औपचारिकताएं जानलेवा हैं ही।
इसी तरह स्कूलों को, आने-जाने के साधनों को, ट्रेनों के सफर और उनमें खानपान को आसान करने की जरूरत है। हर विभाग और हर क्षेत्र को यह कहना चाहिए कि वे अपने काम को आसान बनाने का काम तेजी से शुरू करें। हर घर-परिवार को सावधानी से यह सीखना चाहिए कि वे किसी भी संक्रमण से बचने के लिए किस तरह सावधान रहें। खरीददारी से लेकर किसी दूसरी बीमारी के लिए भी अस्पताल, डॉक्टर, या मेडिकल स्टोर जाना कैसे कम किया जा सकता है, इसकी भी तरकीबें लोगों को खुद सोचनी चाहिए।
हम घूम-फिरकर बार-बार बचाव की बातों पर इसलिए आ जाते हैं, और मसीहाई अंदाज में नसीहत और बिन मांगी सलाह इसलिए देने लगते हैं कि बचाव ही सबसे सस्ता है, और कई मायनों में तो बचाव ही है जिससे कि जिंदगी बच सकती है, वरना आज हम देख रहे हैं कि सुरक्षाबलों के सेहतमंद जवान भी कोरोना में मारे जा रहे हैं। जो लोग एकदम फिट हैं, उनकी भी प्रतिरोधक क्षमता कोरोना के सामने जवाब दे रही है, और छत्तीसगढ़ में किसी एक तबके के लोग सबसे अधिक संख्या में कोरोनाग्रस्त निकले हैं, तो वे केन्द्रीय सुरक्षाबलों के लोग हैं जिनका कि जनता से वास्ता बहुत कम पड़ता है, जो सेहतमंद रहते हैं, जिनका खानपान फिट रहता है, और जिन्हें इलाज हासिल रहता है।
इसलिए कोई भी लोग अपने आपको महफूज न मानें, खतरा सब पर है, और सबसे है। ऐसे में इस बार के कोरोना या अगले बार के उसके किसी जुड़वां भाई से बचाव के लिए हर किसी को लेन-देन, आवाजाही, कागजी कार्रवाई, कतारें, इन सबको घटाना चाहिए। आज वक्त रहते अगर देशों और प्रदेशों की सरकारों ने इस पर सोचना शुरू नहीं किया तो थोक में आती मौतों को रोकना नामुमकिन भी रहेगा, और अंधाधुंध महंगा भी पड़ेगा।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
26 जुलाई 2020

कांग्रेस ने एक बड़ा हैरान  
 (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 जुलाई 2020

आपदा को अवसर में बदलने का अवसर है

संपादकीय
25 जुलाई 2020


इन दिनों एक नारा हवा में बड़ा तैर रहा है, आपदा में अवसर। बहुत बरस पहले हिन्दुस्तान में एक किसी बड़े रेल हादसे में बड़ी संख्या में मुसाफिर मारे गए थे, और आसपास के गांव के लोगों ने लाशों और जख्मियों के बदन से घड़ी और गहने उतार लिए थे, उसके बाद भी अगर वे उनकी जान बचाने में मदद करते तो भी उस लूट को अनदेखा किया जा सकता था, लेकिन उन्होंने सिर्फ लूटने का काम किया, मदद नहीं की। उन्होंने आपदा को अवसर में तब्दील कर लिया था। दुनिया के बहुत से देशों में ऐसा ही होता है, और अपने एक काल्पनिक इतिहास पर अपार गर्व करने वाले हिन्दुस्तान में कुछ अधिक होता है। जिस समाज में दलित अपने जन्म से ही आपदा में जीते और बड़े होते हैं, वहां उनके आसपास के ऊंची कही जाने वाली जातियों के दबंग इसे अपने लिए अवसर में तब्दील करते ही रहते हैं। लेकिन कोरोना के साथ शुरू हुए हिन्दुस्तानी लॉकडाऊन को देखें तो इस देश में कोरोना फैलने की शुरूआत अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के अहमदाबाद प्रवास से हुई जो कि एक किस्म से अमरीका में बसे भारतवंशी वोटरों के बीच चुनाव प्रचार की शुरूआत थी, उसमें भी एक आपदा के बीच एक अवसर निकाल लिया था, और अवसर को निचोडऩे के बाद छिलकों की तरह कोरोना यहां छोडक़र चले गया था। 
इन सबके बीच देखें तो सबसे बड़ा अवसर इस देश और इसके प्रदेशों की सरकारों ने निकाल लिया, उन्होंने इस आपदा को इस अवसर में बदल दिया कि देश-प्रदेश की तमाम दिक्कतें अब अनदेखी करनी चाहिए क्योंकि कोरोना का प्रकोप इतना अधिक है, और लॉकडाऊन से सरकारों की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि वे इससे बेहतर कुछ नहीं कर सकते। तमाम सरकारों को आपदा के बीच यह एक अवसर मिल गया है, अपनी नाकामयाबी को अदृश्य कोरोना के पीछे छिपा लेने का। कुछ ऐसा ही अवसर हिन्दुस्तान के कारोबारियों ने ढूंढ निकाला है कि जब पहले से चली आ रही मंदी के बाद कोरोना और लॉकडाऊन से आई तबाही से धंधा चौपट हो ही गया है, तो उसे पूरी तरह चौपट बताया जाए, जहां सत्यानाश, वहां सवा सत्यानाश। बहुत से कारोबारी ऐसे रहे जिन्होंने बैंकों के कर्ज को न चुकाने का एक अवसर इस आपदा के बीच से ढूंढ निकाला, और अब बिना घोषणा के वे दीवाला का निकालने का तैयार बैठे हैं। 
लेकिन ऐसी तमाम नकारात्मक बातों के बीच बहुत सी सकारात्मक बातें भी हुई हैं जिन्हें अनदेखा करना नाजायज होगा। जो समझदार लोग थे उन्होंने लॉकडाऊन के इन महीनों में खाली मिले वक्त से बहुत से नए हुनर सीखे, अपने पुराने हुनर को बेहतर किया, और मांज लिया। लोगों ने बकाया बेहतर किताबें पढऩे का काम पूरा कर लिया, जिन अच्छी फिल्मों को देखना था उनको देख लिया। घर के स्टोर रूम से लेकर कम्प्यूटर और मोबाइल फोन, हार्डडिस्क तक से कचरा साफ कर लिया। ऑनलाईन कई किस्म के हुनर सीख लिए, वीडियो कांफ्रेंस करना सीख लिया, वीडियो मीटिंग करना सीख लिया।  जो लोग खबरों की दुनिया में हैं, उन्होंने ऑनलाईन बहुत सी बेहतर खबरों को ढूंढा, पढ़ा, और उनसे बहुत कुछ सीख भी लिया। लोगों ने साफ रहने की आदत बना ली, और चाहे मजबूरी में ही सही, गप्प मारते हुए फिजूल में वक्त बर्बाद करना बंद करना पड़ा, और बहुत से लोगों ने ऐसे बचे हुए वक्त का बेहतर इस्तेमाल करना सीख लिया। आपदा में से अवसर निकालना बहुत मुश्किल काम नहीं है, वह नारियल के मोटे छिलके के भीतर से मीठा गूदा निकालने जैसा मुश्किल काम नहीं है, जिस तरह कोई मुजरिम लाश पर से घड़ी उतार लेते हैं, उसी तरह भले इंसान ऐसी आपदा के बीच वक्त का बेहतर इस्तेमाल निकाल लेते हैं। 
लेकिन पिछले कुछ महीनों में कई बार हमने इस जगह इस मुद्दे पर लिखा था कि लोगों को लॉकडाऊन के वक्त का बेहतर इस्तेमाल करना चाहिए। आज फिर इस बारे में लिख रहे हैं कि बहुत से लोगों ने ऐसा बेहतर इस्तेमाल किया है, और आने वाले कई महीने लोगों के पास सीमित व्यस्तता के असीमित खाली घंटे रहने वाले हैं, और जिन्होंने अब तक ऐसे खाली वक्त का बेहतर इस्तेमाल नहीं किया है, वे भी अब शुरू कर सकते हैं, क्योंकि कोरोना की मेहरबानी से, और हिन्दुस्तानी सरकार की हसरत से परे, वैक्सीन बनने में अभी कई महीने बाकी हैं, और लोगों को इनका बेहतर इस्तेमाल सोचना चाहिए। और कुछ नहीं है तो अपनी और परिवार की सामाजिक-राजनीतिक सोच को बेहतर-परिपक्व बनाने की कोशिश करनी चाहिए, जो कि हिन्दुस्तानियों की प्राथमिकता सूची में कहीं नहीं है। लॉकडाऊन के इस पूरे दौर में पांच-दस करोड़ प्रवासी मजदूरों को घरवापिसी के लिए, रास्ते में खाने-पीने के लिए, उनके कुछ घंटे आराम के लिए अगर राह के बाकी सौ करोड़ नागरिकों ने सोचा रहता, तो आज ऐसी बुरी हालत हिन्दुस्तान के लॉकडाऊन-इतिहास में दर्ज नहीं हुई होती। लोगों के सामाजिक सरोकार निर्वाचित लोगों की नीयत से भी अधिक कमजोर हैं, और अपनी बस्ती में बेबस गरीबों की लाशें गिर जाती हैं, तो भी लोगों के सरोकारों की नींद नहीं टूटती है। इसलिए महज हुनर को बेहतर बनाना आपदा को अवसर में बदलने का अकेला तरीका नहीं है, अपनी समझ को भी इंसानी बनाना जरूरी है, अपने परिवार और अपने दायरे को भी इंसाफपसंद बनाना जरूरी है। आज जब लोगों के पास पढऩे और पढ़ाने के लिए अधिक वक्त है, तो लोगों को इस आपदा को जागरूकता के ऐसे अवसर में भी बदल लेना चाहिए। दुनिया का इतिहास गवाह है कि भले लोगों को किसी अवसर के लिए किसी आपदा की जरूरत नहीं रहती, और बुरे लोगों को अपनी बुरी नीयत पूरी करने के लिए भी आपदा अनिवार्य नहीं रहती, लेकिन इन दोनों तबकों के बीच का जो बहुत बड़ा ढुलमुल तबका है, उसके लिए आपदा का अधिक इस्तेमाल है, और उसे इसका सकारात्मक उपयोग करना चाहिए। 
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 24 जुलाई 2020

पुलिस में दर्ज होने वाली और दर्ज न होने वाली, हर किस्म की हिंसा में बढ़ोत्तरी

संपादकीय
24 जुलाई 2020


इन दिनों हत्या, आत्महत्या, और बलात्कार की खबरें कुछ महीने पहले के मुकाबले अधिक दिख रही हैं। अभी ऐसी तुलना करने के कोई आंकड़े तो नहीं हैं, लेकिन पहली नजर में ऐसा लगता है कि ऐसे अपराध, और आत्महत्या जैसे अब गैरअपराध करार दिए जा चुके मामले बढ़ रहे हैं। मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक भी यह बतला रहे हैं कि कोरोना और लॉकडाऊन, बीमारी की दहशत और बेरोजगारी-फटेहाली का मिलाजुला असर इसी किस्म से होने जा रहा है कि लोग तनाव और निराशा में ऐसे काम अधिक करेंगे। 
एक अनदेखी-अनसुनी बीमारी की अंधाधुंध दहशत से लोग उबर नहीं पा रहे हैं। खासकर वे लोग जो कि कोरोना के खतरे को अधिक गंभीरता से ले रहे हैं, वे अधिक दहशत में हैं। जो लोग अधिक लापरवाह हैं, शायद उनकी दिमागी हालत बेहतर होगी, क्योंकि वे बेफिक्र हैं। लेकिन दुनिया पर से कोरोना का खतरा अभी घट नहीं रहा है, बल्कि बढ़ते चल रहा है। हिन्दुस्तान में हर दिन आज से पचास हजार या अधिक लोग कोरोनाग्रस्त मिल रहे हैं। किसी परिवार के एक व्यक्ति के कोरोनाग्रस्त होने से उस परिवार को जिस तरह घर में कैद रहना पड़ रहा है, जिस तनाव के बीच अस्पताल में अपने सदस्य को छोडऩा पड़ रहा है, जिस तरह अड़ोस-पड़ोस और समाज के लोगों की नजरों का सामना करना पड़ रहा है, उससे जाहिर है कि एक अभूतपूर्व और गंभीर तनाव सबके सामने है। किसी एक घर से किसी के कोरोनाग्रस्त होते ही आसपास के तमाम घरों का सुख-चैन, अगर अब तक थोड़ा सा बचा हुआ है तो, छिन जाता है। जो लोग इससे अब तक बेफिक्र हैं, उसमें भी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनका काम-धंधा बंद हो चुका है, रोजी छिन चुकी है, कर्ज बढ़ते चल रहा है, और जैसा कि किसी ने अभी-अभी सोशल मीडिया पर लिखा है, लंबी अंधेरी सुरंग के आखिर में जो रौशनी दिख रही है, वह बैटरी तकरीबन खत्म हो चुके फोन की स्क्रीन की रौशनी है, जाने कब पूरी तरह चल बसे। ऐसे में लोग अंधाधुंध तनाव में हैं। कल की ही खबर है कि उत्तर भारत में एक गरीब किसान ने अपनी गाय बेच दी क्योंकि स्कूल में शिक्षकों ने उसे यह कहा था कि बच्चों की ऑनलाईन पढ़ाई अगर करवानी है, तो उनके लिए स्मार्टफोन लेना पड़ेगा, और ऐसा फोन लेने का अकेला जरिया उसके पास गाय बेचकर ही निकल पाया। अब अगर देश में हो रहीं बहुत सी दूसरी आत्महत्याओं में यह भी एक जुड़ जाए तो क्या हैरानी होगी? बेरोजगारी की वजह से, घर में खाने का जुगाड़ न होने की वजह से तनाव में लोग आसपास के लोगों पर हिंसा कर बैठें, या अपने पर हिंसा करें, उसमें कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए। 
आज पूरे देश में कोरोना से बचाव, कोरोना के इलाज, और लॉकडाऊन के असर से उबरने का संघर्ष ही चल रहा है। सरकारों से लेकर निजी लोग तक इसी में जुटे हुए हैं। ऐसे में लोगों की मानसिक स्थिति सरकार से लेकर घर-परिवार तक किसी की भी प्राथमिकता में नहीं है। आज कोई अपनी दिमागी परेशानी करीब के किसी के साथ बांटने की कोशिश भी करे, तो वे लोग खुद ही बेरोजगारी-फटेहाली में डूबे हुए हैं, कोरोना की दहशत में डूबे हुए हैं, और अधिकतर लोग इस बात पर हैरान होंगे कि जो आज जिंदा हैं, अस्पताल में नहीं हैं, खाना खा चुके हैं, उनके दिमाग में भी कोई परेशानी है!

ऐसे में तनाव जब बांटा नहीं जा सकता, तो वह बढ़ते-बढ़ते हिंसक या आत्मघाती हो रहा है। आने वाले महीनों में जब देश भर के आंकड़े सामने आएंगे, और पिछले बरस के इन्हीं महीनों से उनकी तुलना होगी, तो पता लगेगा कि हकीकत में हिंसा बढ़ी है या नहीं। लेकिन यह बात तो तय है कि पुलिस और नेशनल क्राईम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों से परे रहने वाली छोटी घरेलू हिंसा लगातार बढ़ रही है। दरअसल इंसानी मिजाज हजारों बरस की विकास यात्रा के बाद अब इस किस्म का रह नहीं गया है कि परिवार के तमाम लोग पूरे वक्त साथ रहें। इसके साथ-साथ इंसानी मिजाज ऐसा भी नहीं रह गया है कि लोग बाहर के अपने दोस्तों और दूसरे लोगों से मिले बिना रह सकें। बीमारी और फटेहाली का तनाव अलग है, और अचानक जिंदगी के तौर-तरीकों में आया यह बदलाव अलग है, इन दोनों का मिलाजुला असर लोगों पर बहुत बुरा हो रहा है। आज जब सरकार और समाज बीमारी और बेरोजगारी से ही जूझ रहे हैं, तो मनोवैज्ञानिक रास्ते निकालने और उन्हें समाज में प्रचलित करने की उम्मीद कुछ ज्यादती होगी। आज जरूरत यह है कि जिस तरह ऑनलाईन क्लास चल रही हैं, जिस तरह ऑनलाईन बैठकें चल रही हैं, उसी तरह ऑनलाईन मनोवैज्ञानिक परामर्श मुहैया कराया जाए ताकि लोग मानसिक अवसाद या मानसिक तनाव से बचे रह सकें। इसके लिए जानकार विशेषज्ञ और परामर्शदाता कुछ वीडियो बनाकर भी लोगों को भेज सकते हैं, इंटरनेट पर पोस्ट कर सकते हैं, और भडक़ाऊ वीडियो के बजाय लोगों को ऐसे वीडियो आगे बढ़ाने चाहिए। अभी इन सब तनावों के कई महीने और जारी रह सकते हैं, इसलिए सरकार न सही समाज से लोगों को रास्ते ढूंढने चाहिए। 
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM

संसद और विधानसभाओं को रेडलाईट इलाका न बनने दें...

संपादकीय
23 जुलाई 2020


हिन्दुस्तान में आज गिने-चुने मुद्दे ही खबरों में रह गए हैं। यह तो चीन की सरहद पर चीनी फौज की हिन्दुस्तान में घुसपैठ न होती तो महज कोरोना पढ़-सुनकर लोग थक गए होते। अब चीन के साथ तनातनी बैक बर्नर पर खिसका दी गई है क्योंकि राजस्थान से अधिक चटपटी और सनसनीखेज खबरें निकल रही हैं। एक प्रदेश जिसे आज पूरी ताकत से कोरोना से जूझना था वह अपनी ही पार्टी के विधायकों से जूझ रहा है। सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के विधायक या तो जयपुर के किसी महंगे रिसॉर्ट में कैद हैं, या हरियाणा में। तरह-तरह के मामले दर्ज हो गए हैं, तरह-तरह से खरीद-बिक्री और सरकार पलटने की साजिश की खबरें हैं, और हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कई पिटीशन दाखिल हो गई हैं, दोनों जगह सुनवाई चल रही है, दोनों जगह बड़े-बड़े दिग्गज अरबपति वकील खड़े हुए हैं। जिस बुनियादी जिम्मेदारी के लिए लोगों ने राजस्थान में कांग्रेस के विधायकों को चुना था, वह जिम्मेदारी गटर में फेंक दी गई है, और आपस में सत्ता की लूटपाट चल रही है। 
यह किस किस्म का हिन्दुस्तानी लोकतंत्र हो गया है कि संसद और विधानसभाओं से बाहर रिसॉर्ट में मंत्री-मुख्यमंत्री और सांसद-विधायक इसी तरह अपने लोगों की हिफाजत करते बैठते हैं जैसे एक वक्त दुश्मन के हमले के खिलाफ लोग अपने किलों के पुल उठा लेते थे, और हथियार लेकर ऊपर की दीवारों पर जम जाते थे। उसी तरह का हाल आज हो गया है जब अपने विधायकों को भेड़-बकरी की तरह आंककर कोई इस बाड़े में ले जा रहे हैं, तो कोई किसी और बाड़े में। जानकारों ने यह भी लिखा है कि इस किस्म के दलबदल और सत्ता पलट के बारे में भारत के संविधान निर्माताओं ने कभी कल्पना नहीं की थी, वरना वे तबाही और गंदगी रोकने के कुछ और इंतजाम संविधान में करते। 
आज जब पांच बरस के लिए निर्वाचित होने वाले विधायक अपनी देह को बेचते हुए घूम रहे हैं, और बेशर्मी से एक पार्टी से दूसरी पार्टी जा रहे हैं, अपनी सरकार को गिरा रहे हैं, और जिस जनता ने हाथ छाप पर वोट दिया था, उसे अब महज ठेंगा दिखा रहे हैं। ऐसे में इनको विधायक क्यों रहना चाहिए? पार्टी छोडऩे के साथ ही लोगों की विधानसभा या संसद की सदस्यता न सिर्फ खत्म हो जानी चाहिए, बल्कि पूरे पांच बरस के कार्यकाल में उनमें जनता के पास दुबारा जाने का मौका भी नहीं मिलना चाहिए। ऐसा हो जाए तो इस देश से दलबदल का दलदल कुछ या काफी घट जाएगी। आज हालत यह है कि जनता से एक पार्टी के निशान पर वोट मांगकर, उसी कार्यकाल के भीतर दूसरी पार्टी के निशान से वोट मांगकर मंत्री बनने और सत्ता को निचोड़ लेने का नंगा नाच चल रहा है, और कानून एक मूढ़ और मूर्ख की तरह बस देखने के लायक रह गया है। यह संविधान और यह कानून इस देश की संसदीय गंदगी को साफ करने की ताकत अब नहीं रखते क्योंकि यह गंदगी बहुत अधिक जहरीली हो गई है, बहुत अधिक हो गई है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। यह भी कोई संसदीय लोकतंत्र है कि जनता वोट किसी पार्टी को दे, और सरकार किसी और पार्टी की बने? यह भी कोई संसद या विधानसभा है जिसके झगड़े स्थाई रूप से हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को घेरे रहें? यह भी कोई सरकार है कि जब कर्नाटक बाढ़ में डूबा रहे, तो वहां के विधायक आन्ध्र के पांच सितारा होटलों में पड़े रहें, जब मध्यप्रदेश में कोरोना की सबसे बुरी मार चल रही हो, तब वहां के विधायकों मेें तोडफ़ोड़ करवाकर सत्ता गिरवाना चलता रहे? और आज जब राजस्थान में पूरी सरकार को ही एकजुट होकर कोरोना से लडऩा था, आर्थिक मोर्चे पर लोगों को भूखों मरने से बचाना था, तब वहां का उपमुख्यमंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी का अध्यक्ष ही सरकार पलटने में जुट गया है। यह ऐसा हुआ कि मानो किसी कुर्सी के दो पाये उसके बाकी दो पायों को काटने में जुट जाएं। लोगों को अपना तन और अपना मन, अपना ईमान और अपना इतिहास, जो भी बेचना हो, उसकी उन्हें आजादी रहनी चाहिए, लेकिन संसद और विधानसभाओं को रेडलाईट एरिया बनने से रोकना चाहिए। और यह लिखना भी रेडलाईट एरिया की वेश्याओं का परले दर्जे का अपमान इसलिए है कि वे महज अपनी देह बेचती हैं, अपने चुनाव क्षेत्र के मतदाताओं का भरोसा नहीं। ऐसी गंदगी कम से कम जारी कार्यकाल तक तो सदन से बाहर फेंक देनी चाहिए, और हमारी सोच से अगर संविधान बने, तो जारी कार्यकाल के बाद एक और कार्यकाल चुनाव लडऩे पर रोक रहनी चाहिए, पल भर में इस देश में तन-मन की यह मंडी बंद हो जाएगी। 
हिन्दुस्तानी लोकतंत्र एक बुरी तरह से बोगस और उजागर हो चुका झांसा रह गया है। सबसे पहले चुनावों के वक्त लोग दूसरी पार्टियों से उठाकर लाए गए मुजरिमों और भ्रष्ट लोगों, दंगाईयों और बलात्कारियों को टिकट देते हैं, फिर गरीब जनता को पैसे और दारू से लादकर उसका वोट छीन लेते हैं। यह सब होने के बाद भी अगर सदन में बहुमत नहीं रहता, तो उसके लिए जरूरत के लायक विधायकों या सांसदों को खरीद लेते हैं। यह भी कोई लोकतंत्र है? यह लोकतंत्र के नाम पर कलंक है, बड़ा सा काला धब्बा है, और जनता को दिया गया खालिस धोखा है। इस देश में इस चल बसे दलबदल-कानून की जगह एक बहुत साफ-सुथरे कानून की जरूरत है, वरना लोगों में राजनीति के लिए नफरत और अधिक बढ़ती ही जाएगी।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM

बात की बात, 23 जुलाई 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 23 जुलाई 2020

ऑटोमेटिक रायफलों के अश्लील, हिंसक प्रदर्शन से कोरोना मारा जाएगा?

संपादकीय
22 जुलाई 2020


छत्तीसगढ़ में आज से कई जिलों में एक हफ्ते का लॉकडाऊन शुरू हो रहा है क्योंकि कोरोना के मामले बढ़ते चल रहे थे, और इसके पहले कि वे एकदम बेकाबू हो जाते सरकार ने अलग-अलग जिलों पर फैसला छोड़ा कि वे कब से, कितना, कितना कड़ा लॉकडाऊन चाहते हैं। नतीजा यह हुआ कि पिछले कुछ दिनों की लगातार मुनादी के बाद आज दोपहर के करीब राजधानी रायपुर में आजादी के प्रतीक जयस्तंभ चौक से पुलिस ने एक फ्लैगमार्च किया। पुलिस के कई गाडिय़ों के काफिले में कमांडो दस्ते के जवान मुंह पर काला कपड़ा बांधे ऑटोमेटिक मशीनगनों से चारों तरफ निशाना लगाते हुए खुली गाडिय़ों पर सवार निकले ताकि लोग लॉकडाऊन को गंभीरता से लें। 
नक्सलियों से लगातार टकराव की वजह से छत्तीसगढ़ पुलिस के पास बहुत किस्म के हथियार रहते हैं, इनमें से कई हथियार तो ऐसे रहते हैं जिनकी जरूरत गैरनक्सल इलाकों में शायद ही कभी पड़ती हो। राजधानी रायपुर में पिछली बार पुलिस को मामूली रायफल से भी गोली कब चलानी पड़ी थी, यह हमारे सरीखे इस शहर के बाशिंदे को भी याद नहीं पड़ रहा। किसी बदमाश को मुठभेड़ में मारने की शहर में एक घटना चौथाई सदी के भी पहले हुई थी। इस शहर में कभी किसी ने, किसी भीड़ ने पुलिस को मार डाला हो, ऐसा याद नहीं पड़ता। ऐसे में पुलिस दर्जनों ऑटोमेटिक हथियार लेकर आज किसे डराने निकली है? कोरोना को? घरों से बिना वजह बाहर निकले हुए लोगों को, या किसी और को? सवाल यह है कि लोगों के घर से निकलने पर कोई ऐसी रोक नहीं लगाई गई है कि उन्हें देखते ही गोली मारने का हुक्म जारी हुआ हो। अभी तो पिछले लॉकडाऊन के दौरान राजधानी में एक जगह पुलिस थानेदार की चलाई अंधाधुंध लाठियों की ही जांच अभी नहीं हो पाई है, तो फिर इतनी ऑटोमेटिक रायफलें लेकर पुलिस किसमें दहशत पैदा करने निकली है?

लोकतंत्र किसी भी कार्रवाई के अनुपात और संतुलन में रहने का नाम है, हर कार्रवाई जरूरत के मुताबिक न्यायसंगत और तर्कसंगत रहनी चाहिए। हिन्दुस्तान के तमाम शहरों से सबसे अधिक शांत दो-चार शहरों में रायपुर का नाम है। यहां पिछली भीड़त्या कब हुई थी किसी को याद नहीं है। पिछला कफ्र्यू कब लगा था, यह याद करने के लिए 1984 में जाना पड़ेगा, जब किसी सिक्ख की इस शहर में हत्या नहीं हुई थी। यहां साम्प्रदायिक दंगों की वजह से कब कफ्र्यू लगा, यह भी किसी को याद नहीं होगा। ऐसे में जो जनता पुलिस की मार खाकर भी चुप है, पुलिस के खिलाफ न कोई आंदोलन हुआ, न ही किसी ने अदालत में मुकदमा किया, वैसे शहर में बड़ी-बड़ी रायफलों का ऐसा अश्लील और हिंसक प्रदर्शन लोकतंत्र की समझ का जरा भी न होना है। अपनी ही जनता, अपनी ही शांतिप्रिय जनता की तरफ निशाना लगाकर ऐसी बंदूकों को लेकर एक फौजी फ्लैगमार्च उस शहर में तो ठीक है जहां पर दिल्ली के ताजा दंगों की तरह बस्तियां जल रही हैं, लोगों को थोक में मारा जा रहा है, और हिंसा बेकाबू है। आज जब डॉक्टरों की जरूरत अस्पताल में कोरोना के मरीजों की देखभाल के लिए है, उस वक्त अगर एम्बुलेंस की छत पर सवार होकर डॉक्टर और नर्सें ऑपरेशन के तरह-तरह के औजार हवा में लहराते हुए एक फ्लैगमार्च करें, तो उससे क्या साबित होगा, और उसका क्या असर होगा? क्या उससे कोरोना डर जाएगा? क्या उससे स्वस्थ लोगों के मन में अधिक सावधानी बरतने के लिए एक दहशत पैदा होगी? 
आज दरअसल हिन्दुस्तान में लोकतंत्र की समझ इतनी कमजोर होती चल रही है कि अस्पतालों में भर्ती छोटे-छोटे से नेता भी वीआईपी दर्जा पाने को मरे पड़ रहे हैं, लोकतंत्र की ऐसी समझ के भीतर पुलिस की यह समझ राज कर रही है कि लोगों को घर बिठाने के लिए ऐसे कमांडो और ऐसी बंदूकों का बलप्रदर्शन किया जाए जो कि गिरती लाशों के बीच जलती बस्तियों के दंगाईयों को भीतर करने के लिए इन बंदूकों का खौफ पैदा किया जाए। यह पूरा सिलसिला लोकतंत्र की परले दर्जे की बेइज्जती है, और सत्ता पर बैठे लोगों में लोकतंत्र की बारीक समझ की कमी भी है। आज निर्वाचित सरकार ने अफसरों और स्थानीय प्रशासन को इस किस्म की छूट दे रखी है कि वे शांत इलाके की शांत जनता के बीच दहशत पैदा करने की यह पुलिसिया हरकत कर रहे हैं। 
दरअसल पुलिस हो या कोई और बंदूकधारी फोर्स, उनके बीच इस तरह के तामझाम का चलन अंग्रेजों के वक्त से चले आ रहा है। अंग्रेजी राज के लिए तो यह बात जायज हो सकती थी कि गुलाम बनाए जा चुके हिन्दुस्तानियों को दहशत में रखा जाए। लेकिन आज आजादी की पौन सदी होने के करीब भी अगर पुलिस इस सोच से बाहर नहीं आ सकी है कि उसे जनता की सेवा करनी है, उसमें इस तरह खौफ पैदा नहीं करना है, तो यह वर्दी की कमसमझ तो हो सकती है, लेकिन उसे नियंत्रित करने वाले निर्वाचित लोगों की भी यह कमसमझ है जो कि खुद बंदूकों के तामझाम को अपनी शान मानते हैं। हमारा यह स्पष्ट मानना है कि जो प्रदेश शांत है, उसमें पुलिस का बंदूकें लेकर निकलना भी अलोकतांत्रिक है, और शांत जनता का अपमान भी। इसी राजधानी में अभी कुछ हफ्ते पहले पुलिस ने राह चलते गरीबों को बेदम पीटा था, चूंकि उसके वीडियो चारों तरफ तैर गए, और सरकार को बड़ी शर्मिंदगी हुई, इसलिए कुछ हफ्तों के लिए उस अफसर को किनारे किया गया, और उसके बाद उसे ले जाकर एक बड़े महत्वपूर्ण दफ्तर में स्थापित किया गया। आज तो सरकार और पुलिस जनता के प्रति इस बात के लिए जवाबदेह है कि लाठियों से की गई पिछली हिंसा की जांच का क्या हुआ, उस पर कार्रवाई का क्या हुआ, वह जवाब देना तो दूर रहा, आज इस शहर को भारी अशांत और भारी हिंसाग्रस्त साबित करने की यह हथियारबंद पुलिसिया फ्लैगमार्च निकाला जा रहा है! देश में किसी भी तरह की बंदूकधारी वर्दी हो, उसकी लोकतांत्रिक समझ में कमजोरी रहती है, लेकिन यह कमजोरी अगर निर्वाचित लोगों के मिजाज में भी आ जाए, तो आम जनता कहां जाएगी? बंदूकों का ऐसा अश्लील और हिंसक प्रदर्शन खत्म होना चाहिए, और सरकार के मन में लोकतंत्र के प्रति सम्मान हो तो ऐसा आदेश निकलना चाहिए जब तक कोई बेकाबू हिंसा न हो, जब तक गोलियां मारने की नौबत न हो, तब तक शांत जनता का ऐसा अपमान न किया जाए।  हथियारों के ऐसे गैरजरूरी प्रदर्शन से शांत नागरिक इलाकों में पुलिस की बददिमागी भी बढ़ती है, और उसकी वजह से ही लोगों के साथ वह बदसलूकी करने लगती है। हथियारों को सिर पर नहीं चढऩे देना चाहिए।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 22 जुलाई 2020

कोरोना और लॉकडाऊन पर कतरा-कतरा बातें

संपादकीय
21 जुलाई 2020


जैसा कि बहुत से लोगों को लग ही रहा था, हिन्दुस्तान एक बार फिर लॉकडाऊन की कगार पर खड़ा हुआ है। छत्तीसगढ़ में बीते कल हरेली का त्यौहार मना लिया गया, और आने वाले कल से बहुत से जिलों में लॉकडाऊन हो रहा है। हर जिले के फैसले उनके हिसाब से होंगे। इसी तरह देश में अलग-अलग कई प्रदेशों ने अगले एक या अधिक हफ्तों का लॉकडाऊन पिछले कुछ हफ्तों में अपने हिसाब से लागू किया है। लॉकडाऊन खोलने के बाद के दिनों में जिस तरह भयानक रफ्तार से कोरोना के मामले बढ़े हैं, उनसे राज्य सरकारें भी हिल गई हैं। आज तो पिछले चौबीस घंटों का आंकड़ा 40 हजार पार कर गया है, यह एक अलग बात है कि मौतें घट रही हैं, और लोगों के ठीक होने की रफ्तार बढ़ रही है। कोरोना पॉजिटिव निकलने पर जिस तरह एक-एक मरीज के पीछे एक-एक दफ्तर, या एक-एक इमारत बंद करनी पड़ रही है, उससे भी एक अघोषित लॉकडाऊन टुकड़े-टुकड़े में हो ही रहा है। जिस वक्त हम यह लिख रहे हैं उसी वक्त अलग-अलग खबरें आ रही हैं कि किस तरह एक निधन पर तीन सौ से अधिक लोग इक_े हुए, और उसमें से डेढ़ दर्जन पॉजिटिव निकल आए। एक दूसरी खबर में यह है कि शादी की किसी दावत में सैकड़ों लोग इक_ा हो गए, और सौ लोग पॉजिटिव निकल गए, अब मेजबान पर जुर्म दर्ज हो रहा है। सबसे भयानक एक खबर तो आज ही सुबह मिली है कि झारखंड में एक महिला की मौत हुई, दो दिन बाद उसके कोरोना पॉजिटिव होने का पता लगा। पूरे नर्सिंग होम को खाली कराया गया, और उसका अंतिम संस्कार करने वाले पांच बेटे एक-एक करके कोरोना पॉजिटिव होकर इस पखवाड़े में चल बसे, और छठवां बेटा कोरोनाग्रस्त होकर अस्पताल में गंभीर हालत में है। 
सरकारों का इंतजाम बहुत अधिक मायने रख सकता है, लेकिन अगर सरकारों ने पर्याप्त जांच की हुई है तो उन्हें कोरोना पॉजिटिव मिल भी रहे हैं, लेकिन बहुत से प्रदेशों में सरकारें जांच ही कम कर रही हैं। बिहार और उत्तरप्रदेश जैसे राज्य भयानक हालत में पहुंच रहे हैं, आज की ही एक तस्वीर है कि किस तरह उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में कोरोना पॉजिटिव पाए गए लोग वार्ड में भर्ती होने के लिए सरकारी अस्पताल के बाहर लंबी कतार में खड़े हुए हैं। आज ही वहां के सीएम योगी आदित्यनाथ का बयान है कि राज्य में कोरोना पॉजिटिव लोगों को गंभीर लक्षण न होने पर कुछ शर्तों के साथ घर पर रहने की इजाजत दी जाएगी। इसका मतलब यही है कि सरकार का अपना इंतजाम चूक गया है, यही बात एक-दो महीने पहले जब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने कही थी, तो उनकी खासी आलोचना हुई थी। लेकिन यह बात जाहिर है कि राज्य सरकार की अपनी सीमा है, और कुछ महीनों के भीतर उसे बढ़ाने की भी एक सीमा है। हम छत्तीसगढ़ की राजधानी में देखते हैं कि कई हफ्तों पहले से बड़े-बड़े स्टेडियम मरीजों के लिए वार्ड बनाकर तैयार रखे गए हैं, हालांकि आज तक उनकी जरूरत नहीं पड़ी है क्योंकि अस्पतालों की मौजूदा क्षमता अभी चुकी नहीं है। 
लेकिन इलाज से परे लॉकडाऊन के दूसरे पहलुओं को देखें, तो अभी बाजार ठीक से शुरू भी नहीं हो पाया था, और वह एक-एक हफ्ता बंद रहने जा रहा है। बाजार से सिर्फ  खपत के सामान नहीं लिए जाते, बहुत से कलपुर्जे ऐसे लिए जाते हैं जिनके बिना मजदूरों और कारीगरों का काम नहीं चलता। इस नौबत को देखें तो साफ है कि बाजार का कारोबार, लोगों के छोटे-छोटे धंधे और मजदूरों की रोजी-रोटी सभी ठप्प है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दीवाली, और चुनाव के मुहाने पर खड़े बिहार के सबसे बड़े त्यौहार छठ तक के लिए को मुफ्त अनाज देने की घोषणा की है, लेकिन आज सबसे गरीब इंसान की जिंदगी भी अनाज के अलावा कई दूसरे खर्च मांगती है, और वहां पर आकर सरकार भी कुछ नहीं कर पा रही है। 
आज तमाम किस्म के कारखाने और कारोबार बैंकों की कर्ज अदायगी की हालत में नहीं रह गए हैं। यह एक अभूतपूर्व संकट है, और सरकारों को यह सोचना होगा कि अनाज से परे वह किस तरह सबसे जरूरतमंद गरीबों की कुछ और मदद भी कर सकती है, और काम-धंधों से बैंक कर्ज की वसूली किस तरह टाल सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने भी एक पिटीशन पर रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय से विचार करने को कहा है कि अभी जो बैंक किस्त नहीं ली जा रही है, उसका ब्याज आगे न वसूलने के लिए क्या किया जा सकता है। यह मामला सरकारी कमाई और खर्च से जुड़ा हुआ है, इसलिए अदालत की इस पर सीधे-सीधे कुछ नहीं कह पा रही है, लेकिन आज जो हालात दिख रहे हैं उनमें कर्ज से चलने वाले कारखाने-कारोबार को भी साल 2020 ब्याजमुक्त चाहिए। अगर यह रियायत नहीं मिलेगी, तो इतनी बड़ी संख्या में उद्योग-धंधे बंद हो जाएंगे कि उन्हें फिर खड़ा करना भी मुश्किल होगा। केन्द्र सरकार और रिजर्व बैंक को यह देखना चाहिए कि लॉकडाऊन शुरू होने के बाद कम से कम 31 दिसंबर तक तो कोई भी ब्याज न लिया जाए, और इसकी भरपाई के लिए कहां से टैक्स वसूला जा सकता है। यहां पर यह याद दिलाना ठीक होगा कि योरप और अमरीका में बहुत से खरबपतियों ने सरकारों से कहा है कि उन्हें अतिसंपन्न तबकों से कोरोना-टैक्स लेना चाहिए क्योंकि सरकारों को धरती की बाकी आबादी पर अंधाधुंध खर्च करना पड़ रहा है। लॉकडाऊन को लेकर हम किसी एक फार्मूले या समाधान की बात नहीं कर सकते, और इसी तरह कतरा-कतरा बातों से हम आज के माहौल पर, आज की दिक्कतों पर कुछ कह पा रहे हैं। लेकिन एक बात जो रह गई है, वह यह कि आम जनता अगर अभी सरीखी लापरवाही से काम लेगी, तो फिर न तो कोई सरकार, और न ही कोई ईश्वर मानव जाति को बचा सकेंगे। कोरोना खत्म होने तक अधिकतर सरकारें दीवालिया होने की हालत में रहेंगी, काम-धंधे बर्बाद हो चुके रहेंगे, लोग बेरोजगार हो चुके रहेंगे, और ऐसे में आज से लोग सावधानी बरतकर कोरोना से बचने का काम नहीं करेंगे, तो वे एक ऐतिहासिक अपराध करेंगे जिसका नुकसान उनकी आने वाली पीढिय़ों को भी भुगतना होगा।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 21 जुलाई 2020

नफरत फैलाने के आरोप से पहले आईने में अपना चेहरा देखने की जरूरत..

संपादकीय
20 जुलाई 2020


तमिलनाडू में कुछ हफ्ते पहले लॉकडाऊन के दौरान पुलिस से एक बाप-बेटे-दुकानदार की कुछ बहस हुई, तो दोनों को गिरफ्तार करके थाने ले जाया गया, और वहां उनके साथ ऐसा हिंसक बर्ताव किया गया कि दोनों मर गए। पिटाई की आम हिंसा के अलावा इन दोनों के गुप्तांगों से भी हिंसा की गई और जब तमाम बातें सामने आईं, तो बहुत से पुलिसवालों पर कार्रवाई हुई, मामला सीबीआई को देना पड़ा, और हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने बाप-बेटे को जेल भेजने में भारी लापरवाही की, और गलत काम किया। चूंकि यह पूरा मामला दक्षिण भारत का था, इसलिए हिन्दीभाषी प्रदेशों में इसकी अधिक प्रतिक्रिया नहीं हुई। लेकिन तमिलनाडू की एक रेडियोजॉकी सुचित्रा रामादुराई ने इस हिंसा पर एक वीडियो बनाकर इंटरनेट पर डाला था जिससे दुनिया भर में लोगों ने इसे देखा, और तमिलनाडू पुलिस की हिंसा पर थू-थू हुई। 
कई हफ्ते बाद अब इस पर लिखने की नौबत इसलिए आ रही है कि पुलिस ने सुचित्रा पर दबाव डालकर यह वीडियो इंटरनेट से हटवा दिया है। हालांकि इसके पहले दो करोड़ लोग इसे देख चुके हैं। सुचित्रा ने इस वीडियो में पुलिस की हिंसा के बारे में बखान किया था, और पुलिस ने उसे कहा कि वह इसे हटा दे क्योंकि इससे पुलिस के खिलाफ नफरत फैल रही है। पुलिस ने उससे यह भी कहा कि वह गलत तरीके से मामले को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही है जिसका कोई सुबूत नहीं है। पुलिस का कहना था कि वीडियो में जो घटनाक्रम बताया गया है वो मारे गए बाप-बेटे की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से मेल नहीं खाता। सुचित्रा का कहना है कि जब उसने पोस्टमार्टम रिपोर्ट मांगी तो उसे यह कहकर मना कर दिया गया कि यह एक सीलबंद दस्तावेज है जो सीधे मामले की सुनवाई कर रहे जज को ही दिया जाएगा। जिस पर सुचित्रा का कहना है कि वह हैरान थी कि जब रिपोर्ट सीलबंद है तो पुलिस अफसर ने उसके वीडियो में ऐसी बातें कहां से पकड़ लीं जो पोस्टमार्टम से मेल नहीं खातीं। 
दिलचस्प बात यह है कि हाल के बरसों में पुलिस की ठंडे दिमाग से की गई यह देश की सबसे बुरी हिंसा रही है जिसमें दुकानदार बाप-बेटे को उनके शरीर के भीतर लाठी डालकर ऐसी भयानक हिंसा के साथ मारा गया। जिस हिंसा की जानकारी सुनकर निचली अदालत के जज के अलावा बाकी पूरी दुनिया के दिल हिल गए, उसका बखान करने वाला वीडियो अगर पुलिस के खिलाफ नफरत पैदा कर रहा है तो पुलिस को अपनी हरकतों पर काबू करना चाहिए, न कि सच्चाई बताने वाले वीडियो पर। 
और जहां तक किसी के वीडियो से नफरत फैलने का सवाल है, तो आज हिन्दुस्तान में कई तबकों के खिलाफ नफरत फैलाने के लिए महज सच बोलना काफी  है। राजनीति का अधिकतर हिस्सा, सरकार का बड़ा हिस्सा, मीडिया का एक हिस्सा, धार्मिक और सामाजिक संगठनों में से बहुत से ऐसे हैं जिनके बारे में सच कहा जाए तो जनता के बीच उनके लिए हिकारत और नफरत के अलावा कुछ नहीं फैलेगा। अभी इस तमिलनाडू से बहुत दूर, हिन्दी-हिन्दुस्तान के बीच उत्तरप्रदेश पुलिस की मुजरिमों के साथ जिस तरह की गिरोहबंदी सामने आई है, और उसके बाद पुलिस की थोक में हत्या करने वाले मुजरिम को जिस तरह मुठभेड़ के नाम पर मारा गया है, उन सबसे पुलिस के लिए लोगों के मन में हिकारत और नफरत ही पैदा हुई है। इसलिए नफरत से बचने का काम, अच्छे कामों से हो सकता है, लोगों के वीडियो, उनके ट्वीट, या उनकी पोस्ट हटवाकर नहीं। 
भारत में आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बदहाली कर दी गई है। बहुत से प्रदेशों में पत्रकारों को गिरफ्तार किया जा रहा है, हिरासत में रखा जा रहा है, एक-एक ट्वीट पर लोगों के खिलाफ जुर्म दर्ज हो रहे हैं। हालत यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को थाने के स्तर पर तय किया जा रहा है, या प्रदेश में सत्तारूढ़ पार्टी के शहर के दफ्तर में यह तय होता है कि कौन सी कही गई बात जुर्म के दायरे में आती है। यह सिलसिला खतरनाक है, और देश की अदालतें भी इन पर फैसला देने में खासा वक्त ले रही हैं। 
इस बीच कल सुप्रीम कोर्ट की खबर आई है कि अदालत ने देश के आईटी कानून में रखी गई अंधाधुंध कड़ी धारा 66-ए को रद्द कर दिया है। अदालत ने इसे असंवैधानिक करार दिया है, और कहा है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बुनियादी अधिकार के खिलाफ है। इस फैसले के बाद अब सोशल मीडिया या कहीं और पोस्ट करने के आधार पर किसी की गिरफ्तारी नहीं हो सकेगी। इसके पहले 66-ए के आधार पर पुलिस मनचाही गिरफ्तारियां करते रहती थीं। इधर तमिलनाडू में पुलिस ने यह जलता-सुलगता मुद्दा उठाने वाली युवती से उसका वीडियो हटवाया, और शायद उसके एक-दो दिन के भीतर ही यह आदेश आया है। 
अदालतें बात-बात पर अपनी अवमानना की ढाल का इस्तेमाल करने लगती हैं, संसद और विधानसभाएं छोटी-छोटी बातों पर विशेषाधिकार भंग का मुद्दा उठा लेती हैं। देश में इस किस्म के कानूनों पर काबू की जरूरत है, और लोकतंत्र की सभी शाखाओं और संस्थाओं को पहले तो अपना घर सुधारने की फिक्र करनी चाहिए, उसके बाद उंगली उठाने वालों के हाथ काटने का फतवा देना चाहिए। आज जब हम यह लिख रहे हैं उस वक्त हमारे सामने इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक दूसरी खबर भी है। 18 जुलाई को वहां के एक जज जस्टिस नारायण शुक्ला रिटायर हुए जो कि भ्रष्टाचार के आरोपों में सीबीआई की नजरों के नीचे थे, और जिन्हें 2018 में ही अदालती कामकाज से अलग कर दिया गया था। एक पिछले सुप्रीम कोर्ट मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने जस्टिस शुक्ला को हटाने की सिफारिश की थी। उन्हें इस्तीफा देने के लिए भी कहा गया था जिससे उन्होंने इंकार कर दिया था। 2018 से अब तक बिना काम बैठाए गए जज दो दिन पहले रिटायर हुए, लेकिन तमाम सुबूत रहते हुए भी हाईकोर्ट जज को हटाना आसान नहीं था क्योंकि उसके लिए संसद में महाभियोग लाना जरूरी होता है। अब अगर इस पर कोई वीडियो बनाए और उसे अदालत अपनी अवमानना माने, तो उसके पहले यह भी सोचने की जरूरत है कि संस्था का अपना बर्ताव, उसके भीतर भ्रष्टाचार को रोकने की नीयत और व्यवस्था है या नहीं है? सवाल पूछने के लिए रिश्वत लेने वाले सांसदों को संसद से बर्खास्त तो किया गया था, लेकिन उनके खिलाफ कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सका। तो जब जज और सांसद-विधायक अपने आपको ऐसे सुरक्षा घेरे में रखकर चलेंगे, तो कोई वीडियो जनता के बीच उनके प्रति नफरत फैलाने वाला भी हो सकता है। और अब तो खुद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला लिया है कि महज सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर पुलिस किसी की गिरफ्तारी नहीं कर सकती। इस फैसले के बाद लाठी दिखाकर थाने में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की सीमा और परिभाषा तय करना बंद होगा।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM