दीवारों पर लिक्खा है, 31 अगस्त 2020


 

ज्ञान और समझ में रिश्ता दस पीढ़ी दूर का भी नहीं

 एक अमरीकी प्राध्यापक और विज्ञान कथा लेखक इसाक एसिमोव के लिखे या कहे हुए वाक्य अक्सर इधर-उधर उनके नाम के साथ दिखते हैं, और चोरी के शौकीन लोग उनकी कही बातों को अपने नाम के साथ भी खपाते रहते हैं। उन्होंने करीब पांच सौ किताबें लिखी हैं, या संपादित की हैं, और उनकी लिखी हुई करीब 90 हजार चिट्ठियां प्रकाशित हैं। अमरीका में पढ़ाने वाले इस रूसी मूल के विज्ञान-शिक्षक का लिखा हुआ एक वाक्य आज फिर हमारी नजरों के सामने आया है। उन्होंने लिखा था- जिंदगी का सबसे दुखद पहलू यह है कि विज्ञान इतनी रफ्तार से ज्ञान जुटा लेता है, जिस रफ्तार से समाज समझ नहीं जुटा पाता। 

हम इस अखबार में और इसके अलग-अलग कॉलम में पहले भी कई बार ज्ञान और समझ को लेकर लिख चुके हैं। बहुत से लोग बहुत पढ़े-लिखे लोगों को ज्ञानी मान लेते हैं, और फिर ज्ञानियों को समझदार मान लेते हैं। इन दोनों का जाहिर तौर पर कोई रिश्ता नहीं होता है। दुनिया के अलग-अलग लाखों आदिवासी इलाकों में बसे हुए लोगों में बहुत सी जातियां ऐसी हैं जिन्होंने पढ़ा कुछ भी नहीं क्योंकि वे अशिक्षित हैं, और शहरी जुबान में कहें तो वे ज्ञान से दूर हैं। लेकिन उनकी समझ किसी भी शहरी की समझ के मुकाबले अधिक तगड़ी या अधिक इंसाफपसंद हो सकती है, आमतौर पर होती है। वे कुदरत और दूसरे प्राणियों के लिए रहमदिल होते हैं, और प्राकृतिक न्याय पर अपार भरोसा भी करते हैं, अमल भी करते हैं। अपनी जरूरत से अधिक इकट्ठा नहीं करते हैं, और दूसरा को देखकर किसी हीनभावना या भड़ास में भी नहीं जीते हैं। अपनी महिलाओं को शहरियों के मुकाबले अधिक बराबरी का दर्जा देते हैं। वे शहरी ज्ञान से दूर हैं, लेकिन गहरी समझ से लैस हैं। 

इस बुनियादी समझ के साथ इस मुद्दे से थोड़ा हटकर सोचें तो आज की शहरी और आधुनिक दुनिया में ऐसी बहुत सी चीजें हो रही हैं जो कि अपनी जरूरत से खासी अधिक रफ्तार से घट रही हैं। एक वक्त लोगों के पास, खासकर संपन्न लोगों के पास एक रिकॉर्ड प्लेयर होता था, और गिने-चुने रिकॉर्ड होते थे। घर के लोग इक_े होकर, या मेहमान के आने तक कोई रिकॉर्ड बजाते थे, और तीन मिनट तक सारे लोग ध्यान से उस संगीत को सुनते थे। जाहिर है कि जब सब एक साथ सुनते थे, तो उसके बाद उस पर चर्चा भी करते थे। अब एक माइक्रोचिप में कई घंटों का संगीत आ जाता है, या कई दिनों तक लगातार अलग-अलग बजने वाला संगीत आ जाता है, लेकिन लोगों का सुनना कम हो गया है। पहले लोगों के पास गिनी-चुनी किताबें रहती थीं, और एक-दूसरे से लेन-देन करके भी पढ़ते थे, आज इंटरनेट पर लाखों-करोड़ों किताबें मुफ्त में हासिल हैं, लोग छोटे से किंडल पर हजारों किताबें लेकर उसे जेब में डालकर चलते हैं, लेकिन पढऩा कम हो गया है। ठीक उसी तरह ज्ञान बढ़ते चल रहा है, विज्ञान बढ़ते चल रहा है, लेकिन उसके साथ उस अनुपात में समझ नहीं बढ़ रही है। आज लोग बिना समझे हजारों तस्वीरें, सैकड़ों वीडियो, और लाखों पन्ने कम्प्यूटर पर सेव कर लेते हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल घट गया है। 

आज ही एक बहुत पुरानी तस्वीर सैकड़ों बार नजरों के सामने से आने के बाद एक बार फिर सामने आई। एक जापानी बच्चा खड़ा हुआ है, और उसकी पीठ पर उसके छोटे भाई की लाश टंगी हुई है। वह जापान के नागासाकी का बच्चा है, और अमरीका द्वारा वहां पर गिराए गए हाइड्रोजन बम से मारे गए लोगों में से एक यह छोटा बच्चा भी था। अपने छोटे भाई की लाश को लिए हुए वह अंतिम संस्कार के लिए एक लंबा सफर कर रहा है। इस उम्र में अगर यह जापानी बच्चा पढ़ा भी होगा, तो भी बहुत अधिक नहीं पढ़ा होगा। और अमरीका के बड़े-बड़े वैज्ञानिक जिन्होंने हाइड्रोजन बम बनाया, जिन्होंने हवाई जहाज से लेकर उस बम को जापान पर गिराया, और अमरीकी सरकार में बैठे हुए लोग जिन्होंने इस हमले का फैसला लिया, वे तमाम लोग तो इस जापानी बच्चे के मुकाबले हजार-लाख गुना अधिक पढ़े हुए होंगे, लेकिन उन अमरीकियों की समझ महज इतनी थी कि उन्होंने बम बनाया, गिराने का फैसला लिया, जाकर गिराया, और लाखों को मार डाला। दूसरी तरफ यह बच्चा अपने बचपन में ही अपने छोटे भाई के अंतिम संस्कार के लिए उसकी लाश पीठ पर बांधे हुए एक लंबे पैदल सफर पर निकला हुआ है। इस बच्चे की हालत को देखें, उसकी दिमागी हालत को देखें तो दिल हिल जाता है। उसकी समझ इतनी गजब की है कि वह छोटे भाई के एक उचित अंतिम संस्कार का जिम्मा भी इतनी जिम्मेदारी के साथ उठा रहा है। तो पश्चिम का वह ज्ञान कहां काम आया, और जापान के इस बच्चे की बिना ज्ञान की समझ किस हद तक काम आ रही है, कितनी बड़ी मिसाल का इतिहास दर्ज कर रही है, यह सोचने लायक है। 

ज्ञान एक अहंकारी शब्द हो गया है, अहंकार हो गया है, बददिमाग हो गया है, और हमलावर हो गया है, वह बेइंसाफ भी हो गया है, बेरहम तो है ही। दूसरी तरफ इस ज्ञान की किसी भी जरूरत के बिना समझ एक ऐसा छोटा सा आसान शब्द है जो कि ऊपर लिखे गए ज्ञान के तमाम विशेषणों से दूर है। लोग आम बोलचाल की जुबान में कहते हैं- पढ़े-लिखे समझदार हो, फिर भी ऐसी बात कहते हो। जबकि ये दो बातें एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं, पढ़ा-लिखा होना और समझदार होना इनका कोई रिश्ता नहीं है। आज जब लोग अपने बच्चों को यह दुआ देते दिखते हैं कि खूब पढ़ो-लिखो, खूब कामयाब बनो, तो थोड़ी सी हैरानी भी होती है कि क्या समझदारी की बात यह नहीं हुई होती कि खूब समझदार बनो, खूब अच्छे इंसान बनो? 

ज्ञान को नापना-तौलना कुछ आसान है। लोग किसी के बारे में उसका ज्ञान बताते हुए आसानी से गिना सकते हैं कि उसने कौन-कौन सी डिग्रियां हासिल की हैं। हिन्दुस्तान के एक नेता श्रीकांत जिचकर के बारे में कहा जाता है कि वे देश में सबसे अधिक डिग्रियां पाने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने विश्वविद्यालयों की 42 परीक्षाओं में शामिल होकर 20 डिग्रियां हासिल की थी, और देश में सबसे कमउम्र, 26 बरस में विधायक बनने वाले व्यक्ति थे। उनकी डिग्रियों की लंबी लिस्ट देखने लायक है। ज्ञान का ऐसा मूर्त रूप होता है कि उसे गिना, नापा, तौला जा सकता है। दूसरी तरफ समझ एक अमूर्त चीज होती है। लोगों को यह आसानी से पता ही नहीं चलता कि दूसरे कौन लोग कितने समझदार हैं, या खुद कितने नासमझ हैं। इसलिए यूनिवर्सिटी की डिग्री का महत्व अधिक मान लिया जाता है क्योंकि वह आंखों से दिखती है, लेकिन लोगों की समझदारी का महत्व नहीं माना जाता क्योंकि वह आंखों से परे की बात रहती है।
 
आज ज्ञान-विज्ञान छलांग लगा-लगाकर आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन लोगों की समझ, लोगों के सरोकार, अंग्रेजी में कहें तो लोगों की विज्डम की रफ्तार बड़ी धीमी है, इससे होता यह है कि जिस तरह किसी नौसिखिए मोटरसाइकिल-चालक के हाथ अंधाधुंध रफ्तार की मोटरसाइकिल लग जाए और उसे अंधाधुंध ट्रैफिक के बीच चलाना पड़े, उसी तरह ज्ञान-विज्ञान के औजार-हथियार इतनी तेजी से आ रहे हैं कि उन्हें इस्तेमाल करना सीखने का भी मौका लोगों के पास नहीं है। नतीजा यह है कि समझ ज्ञान से 20 स्टेशन पीछे चल रही है। एक और अजीब सी दिक्कत यह भी है कि अंग्रेजी की कई डिक्शनरियों में विज्डम की परिभाषा में ज्ञान को भी जोड़ लिया गया है, और कई लोग इन दोनों को एक-दूसरे का विकल्प इसलिए भी मान बैठते हैं। 

(Daily chhattisgarh)

बात की बात, 30 अगस्त 2020


 

बात की बात, 30 अगस्त 2020


 

दीवारों पर लिक्खा है, 30 अगस्त 2020


 

यह सुशांत की मौत से उठे मुद्दों को लेकर है, उस मौत पर नहीं...

 यूं तो सुशांत राजपूत की मौत के मामले में लोगों का पढऩे का बर्दाश्त खत्म हो चुका होगा, और हम इस मौत के बारे में लिख भी नहीं रहे, लेकिन इस मौत से जुड़े हुए जो इंसानी मिजाज सामने आ रहे हैं, हम उनके बारे में लिखना चाहते हैं जो कि किसी और केस में भी सामने आ सकते हैं। एक कामयाब सितारे की भूतपूर्व दोस्त या प्रेमिका, उसकी ताजा प्रेमिका, आसपास के लोग, और नाहक ही बदनाम किए जाने वाले गिद्धों की तरह मंडराने वाला मीडिया। इन सबको देखें तो लगता है कि लोगों को किसी प्रेमसंबंध में पडऩे के पहले, या किसी से दोस्ती करने के पहले बहुत सी बातों के बारे में सोचना चाहिए। वक्त निकल जाता है लेकिन बीते वक्त में दर्ज बातें टेलीफोन और कम्प्यूटर के तरह-तरह के रिकॉर्ड से कहीं नहीं निकल पातीं, और आगे चलकर वे सुबूत भी बन जाती हैं, और बदनामी की जड़ भी। 

सुशांत राजपूत के मामले को देखें, या इस किस्म के और बहुत से दूसरे चर्चित मामलों को देखें, तो यह समझ पड़ता है कि लोग अच्छे वक्त अपने करीबी लोगों पर भरोसा करके उनके साथ जिन बातों को बांटते हैं, वे बातें उन लोगों के चाहे-अनचाहे किसी भी दिन जांच एजेंसियों के हाथ लग सकती हैं, मीडिया के हाथ लग सकती हैं, और वे खुद भी दूसरे लोगों को इन्हें बांट सकते हैं। इसलिए अंतरंगता के दौर में अपनी नाजुक और कमजोर बातों को दूसरों के साथ बांटने के पहले सुशांत की मौत के मामले में जांच एजेंसी से निकलकर फैलने वाली बातों को भी देख लेना चाहिए, और टीवी पर इंटरव्यू देने के लिए बेताब करीबी लोगों को भी सुन लेना चाहिए। 

यह मौत बताती है कि किस तरह महीनों और सालों पहले के गड़े मुर्दों को उखाड़ा जा रहा है, और उखाड़ा जा सकता है। मीडिया आज उत्तरप्रदेश में इस कहानी की किरदार एक युवती के स्कूल तक पहुंच रहा है, और सुशांत की स्कूल तक भी जा रहा है। पिछले साल-छह महीने की घटनाओं से उपजी यह मौत आज जिंदगी की उतनी पुरानी कब्रों को भी खोद रही है। लोगों के फोन को जांच एजेंसियां परख रही हैं, और देश के कड़े कानून के मुताबिक महज सुबूत जुटाने के लिए, सुराग पाने के लिए कॉल रिकॉर्ड और मैसेज देखे जा सकते हैं, लेकिन आज तो जांच किसी किनारे पहुंची नहीं है, और इस मौत से जुड़े तमाम लोगों के एक-एक संदेश मीडिया में छप रहे हैं। एक बार कोई चर्चित हो जाए तो उसकी जिंदगी की निजता तो खत्म कर ही दी जाती है, उसके आसपास के लोगों के साथ भी यह सुलूक होता है। इसलिए चर्चित, या गैरचर्चित, आप जैसे भी हों, आपके आसपास के लोग जैसे भी हों, उनसे कुछ भी बांटते हुए यह कल्पना कर देखें कि वे बातें अगर पोस्टर बनकर सडक़ किनारे की दीवारों पर चिपक जाएंगी, तो आपका सुकून कितना बचेगा, कितना बर्बाद होगा। 

आज अगर कोई सभ्य या विकसित देश होता जहां देश के कानून की इज्जत होती, तो वहां यह सवाल भी उठता कि सुशांत के करीबी लोगों के दूसरे परिचित लोगों की जिंदगी की निजता को खत्म करने का हक जांच एजेंसियों को किसने दिया है, और मीडिया को किसने दिया है। आज ही एक दूसरी खबर यह कहती है कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी एनआईए के एक भूतपूर्व अफसर के खिलाफ जुर्म दर्ज हुआ है क्योंकि उसने अपने कामकाज के दौरान किसी भी केस से संबंध न रखने वाले किसी फोन नंबर के कॉल डिटेल्स निकलवाए थे जो कि कानून के तहत जुर्म है। आज जब यह खबर छप रही है उसी वक्त सुशांत राजपूत की मौत की जांच करती सीबीआई के अफसरों के नाम से मीडिया में ऐसे सवालों की लिस्ट छप रही है कि सीबीआई ने सुशांत की करीबी रही एक अभिनेत्री से क्या-क्या सवाल किए। एक बहुत बड़े मीडिया संस्थान के टीवी की आज की ही सुर्खी उसकी वेबसाईट पर टंगी है कि सीबीआई के किस सवाल से इस अभिनेत्री के माथे पर पसीना छलक आया! अब क्या सीबीआई चौराहे या फुटपाथ पर टीवी कैमरों के सामने पूछताछ कर रही है जिसमें सवाल से माथे पर आने वाले पसीने के दर्शन हो रहे हैं? यह पूरा सिलसिला बहुत ही घातक है। सार्वजनिक जीवन के चर्चित लोग कुछ सीमा तक तो अपनी निजता खो बैठते हैं, लेकिन उनके आसपास के लोग, और इन लोगों के पास-दूर के लोग, जितने लोगों की निजता खत्म हो रही है, वह पूरी तरह से गैरकानूनी काम है, जुर्म है, और हमारी समझ से अदालत उस पर सजा भी दे सकती है। 

इस मामले से जुड़े हुए जो कई पहलू आज फिर इस पर लिखने को बेबस कर रहे हैं, उनमें सबसे बड़ा तो निजी संबंधों में राज बांटने का है। लोगों को इस मामले का हाल देखकर यह समझ लेना चाहिए कि उनका क्या हाल हो सकता है, उनके आसपास के लोगों का क्या हाल सकता है, अगर वे किसी जांच के घेरे के आसपास कुछ मील की दूरी तक भी दिखेंगे। यह सिलसिला खुद जांच एजेंसियों के सोचने का है कि उनके हवाले से किस तरह के राज छप रहे हैं, अगर वे सच हैं तो भी फिक्र की बात है क्योंकि किसी की निजी जिंदगी का भांडाफोड़ करने का हक कानून भी सीबीआई को नहीं देता। आज एनआईए के रिटायर्ड अफसर के खिलाफ जिस तरह का जुर्म दर्ज हुआ है, उसे भी जांच अफसरों को याद रखना चाहिए। मीडिया को भी यह सोचने की जरूरत है कि देश की प्रेस कौंसिल ने कल एक लंबा बयान जारी करके मौत के इस चर्चित मामले के कवरेज को लेकर मीडिया को उसकी जिम्मेदारी, और उसकी सीमाएं याद दिलाई हैं। 

हम इस मौत पर कुछ भी लिखना नहीं चाहते, लेकिन इस मौत से जो सवाल उठ रहे हैं, उन सवालों की चर्चा इसलिए जरूरी है कि इनमें से एक या कई सवाल बहुत से दूसरे मामलों को लेकर भी उठने की नौबत आ सकती है, और वह न आए तो बेहतर होगा।

(Daily chhattisgarh)

घुट-घुटकर जीती पीढ़ी, गलत फैसलों का खतरा

 उत्तरप्रदेश की एक ताजा घटना अभी एक टीवी चैनल के वेबसाईट पर पढऩे मिली जिसमें वॉट्सऐप पर हुई गोष्ठी के चलते एक मुस्लिम युवती अपने वॉट्सऐप-प्रेमी से शादी करने के लिए तीन सौ किलोमीटर अकेले सफर करके उसके घर पहुंच गई, और वहां जाकर उसे पता लगा कि वह लडक़ा तो उससे पांच बरस छोटा है, और नाबालिग है। उसकी बहुत सी तस्वीरें भी इस वेबसाईट पर आई हैं जिनमें वह एकदम गरीब इस परिवार के घर के बाहर खाट पर डेरा डालकर बैठ गई है, और वह अपने इस फेसबुक-प्रेमी के बड़े भाई से भी शादी करने को तैयार है, इस्लाम छोडक़र हिन्दू बनने को तैयार है लेकिन वह अपने घर जाना नहीं चाहती क्योंकि वहां सौतेली मां है जो उसे प्रताडि़त करती है। 

एलएलबी कर रही एक युवती की यह कहानी हैरान करती है, और दिल भी दहलाती है कि लोग बिना कुछ देखे-समझे, बिना किसी जानकारी के किस तरह पूरी जिंदगी किसी के साथ गुजारने के लिए न सिर्फ तैयार हो जाते हैं बल्कि आमादा भी हो जाते हैं। सोशल मीडिया पर होने वाले रिश्तों की कहानी आसानी से मैसेंजर सर्विसों तक पहुंच जाती है, और फिर फोटो-वीडियो का लेन-देन हो जाता है, अंतरंग पलों की रिकॉर्डिंग हो जाती है, और अनगिनत मामलों में ब्लैकमेल की नौबत आ जाती है, हत्या या आत्महत्या हो जाती है। इस नौबत को देखकर यह समझना जरूरी है कि ऐसा लापरवाह मिजाज आखिर होता कैसे है? 

हिन्दुस्तान में तो एक बहुत बड़ी वजह यह है कि देश के बहुत बड़े हिस्से में अभी भी जवान लडक़े-लड़कियों का मिलना-जुलना बहुत आसान नहीं है। महानगरों, और दूसरे शहरों तक तो लडक़े-लड़कियां मिल लेते हैं, लेकिन जहां बात छोटे शहरों या कस्बों की आती है, तो बेचैन और बेकरार दिल इसी तरह टेलीफोन और इंटरनेट के सहारे जीते हैं, और जब ऐसा जीना मुमकिन नहीं रह जाता तो साथ मर जाते हैं। इंटरनेट की दोस्ती कब मोहब्बत में तब्दील हो जाती है, और कब जिंदगी के राज, जिंदगी के नाजुक पल दूसरे के साथ बंटना शुरू हो जाते हैं, वह भी पता नहीं चलता। जिस तरह एक पहाड़ी नदी ऊंचाई से नीचे पहुंचते हुए चट्टानों से टकराते बेतहाशा रफ्तार पकड़ लेती है, कुछ वैसी ही बात ताजा-ताजा मोहब्बत के साथ होती है, आंखें और अक्ल दोनों बंद हो जाते हैं, किसी बुरे वक्त के बारे में सोचना बंद हो जाता है, और लोग मोबाइल-कैमरों के सामने तन-मन खोलकर बैठ जाते हैं, और हत्या-आत्महत्या की नौबत का सामान बन जाते हैं। यह पूरा सिलसिला टेक्नालॉजी का मामला तो कम है, समाज में लोगों के मिलने-जुलने पर जो रोक-टोक है, उससे उपजा हुआ अधिक है। 

दुनिया के जिन देशों में हमउम्र लोगों के साथ उठने-बैठने पर, साथ रहने पर, साथ जीने और घूमने पर रोक नहीं रहती है, वहां इस किस्म की नौबत कम आती है, या हो सकता है कि न भी आती हो। जहां लोगों को अपनी पसंद के जीवन-साथी के साथ रहने मिलता है, वहां शायद इस किस्म की अपरिपक्व हरकत भी कम होती होगी। लेकिन हिन्दुस्तान ऐसा देश है जहां ऑनरकिलिंग के नाम पर अपने ही बच्चों को उनके प्रेमी-प्रेमिका के साथ सार्वजनिक रूप से मार डालकर लोग फख्र महसूस करते हैं कि उन्होंने खानदान की इज्जत बरकरार रखी। हिन्दी फिल्में भी ऐसे तानाशाह, अकबर-मिजाजी जल्लाद बाप की कहानियों से भरी रहती हैं जिनमें बच्चों को मर्जी से जीने नहीं दिया जाता। फिल्में समाज से प्रेरित होकर बनती है, और समाज फिल्मों से प्रेरित होता है, और मां-बाप ऐसे ही फिल्मी किरदार बनने के लिए एक पैर पर खड़े रहते हैं जो नापसंद बहू को घर से निकाल दें, या नापसंद दामाद को बेटी सहित मार ही डालें। 

हिन्दुस्तान में नौजवान पीढ़ी इस कदर भड़ास में जीती है कि जिसकी कोई हद नहीं। लडक़े-लड़कियों का साथ पढऩा मुश्किल, साथ घूमना-फिरना मुश्किल,  मां-बाप टेलीफोन तक की जासूसी पर उतारू, वेलेंटाइन डे या फ्रेंडशिप डे पर धर्मान्ध साम्प्रदायिक संगठन बाग-बगीचों में पीटने को तैयार, और वहां मौजूद पुलिस वहां से भगाने को तैयार। कुल मिलाकर देश का माहौल जवान हसरतों को जिंदा रहने देने के बहुत ही खिलाफ है। लोग अपने बच्चों के लिए कॉलेज पहुंच जाने पर भी आगे की पढ़ाई तय करते हैं, उनके टी-शर्ट का रंग पसंद करते हैं, लड़कियों के घर आने-जाने का वक्त एक कडक़ चौकीदार की तरह तय करते हैं। ये ही तमाम वजहें हैं कि अपने घर से थके हुए लडक़े-लड़कियां आपा खोकर फैसला लेते हैं, कहीं किसी के साथ जीने के लिए चले जाते हैं, तो कहीं किसी के साथ मरने के लिए। 

हम इस मुद्दे पर लिख तो रहे हैं, लेकिन इसका कोई आसान इलाज हमारे पास नहीं है। फिर यह भी समझने की जरूरत है कि यह बात महज नौजवान पीढ़ी तक सीमित नहीं है, हर दिन ऐसी कई खबरें रहती हैं जिनमें शादीशुदा लोग भी जीवन-साथी से परे किसी और के साथ रिश्ता शुरू कर लेते हैं, बातचीत फेसबुक से शुरू होती है, और बाद में उन्हें किसी बंद कमरे से पीट-पीटकर निकालते हुए वीडियो चारों तरफ फैलते हैं। हिन्दुस्तानी अधेड़ लोगों ने भी फेसबुक जैसे सोशल मीडिया के रास्ते घर बैठे ऐसे संबंध बनने की बात कभी सोची नहीं थी, समाज में ऐसा कुछ आसान नहीं था, और आजकल अपने जीवन-साथी से थके हुए या निराश लोग बड़ी संख्या में ऐसे ऑनलाईन रिश्तों में पड़ जाते हैं क्योंकि ऑनलाईन एक-दूसरे की खूबियां ही खूबियां दिखती हैं, खामियां तो लोग मामूली समझदारी से ही छुपाए रख जाते हैं। 

अब एलएलबी की एक छात्रा अपना परिवार और अपना धर्म छोडक़र महज वॉट्सऐप-दोस्ती के रास्ते एक अनजान परिवार में शादी के लिए पहुंच जाती है, और प्रेमी के नाबालिग निकलने पर उसके भाई से भी शादी करके वहीं रहना चाहती है। यह सिलसिला भयानक है, नौजवान पीढ़ी को अधिक परिपक्व होने की जरूरत है, और उनके मां-बाप को, उनके भाई-बहनों को यह समझ आना जरूरी है कि लोग अपनी मर्जी से भी जीना चाहते हैं। प्रेम-संबंधों में नाकामयाब होने पर अनगिनत हत्या-आत्महत्या होती हैं, और प्रेम कामयाब रहने पर भी अगर उसके शादी में बदलने में कामयाबी नहीं मिलती, तो भी ऐसी ही किस्म की हिंसा होती है। इस देश के समाज को सार्वजनिक परामर्श की जरूरत है, पूरी की पूरी आबादी को अगली पीढ़ी के हक की इज्जत करना सिखाने की जरूरत है। जब तक ऐसा नहीं होगा, नई पीढ़ी घुट-घुटकर जिएगी, और घुट-घुटकर ही मर जाएगी। समाज की ऐसी सोच के खिलाफ लोगों को खुलकर सार्वजनिक बातचीत करनी चाहिए।

(Daily chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 अगस्त 2020


 

पूरे का पूरा हिन्दुस्तान शांतता कोर्ट चालू आहे का मंच बन गया है!

 हिन्दुस्तान का मीडिया और सोशल मीडिया दोनों अलग-अलग, और मिलकर भी विजय तेंदुलकर का एक नाटक खेल रहे हैं, शांतता कोर्ट चालू आहे। कई दशक पहले यह नाटक खूब खेला जाता था, और उसकी जितनी सीमित याद अभी है, उसके मुताबिक किसी जगह एक रात फंस जाने, और वक्त गुजारने को मजबूर लोगों की एक टोली एक खेल खेलती है। एक अदालत का सीन गढ़ा जाता है जिसमें कोई जज, कोई वकील, और कोई आरोपी बन जाते हैं। एक महिला को आरोपी बनाया जाता है, और उसके बाद उसके खिलाफ केस साबित करने के नाटक में वकील बना व्यक्ति, और शायद गवाह भी अपने मन की सारी भड़ास, अपनी सारी कुंठाएं उसके खिलाफ निकालते हैं, और उसे बदचलन साबित करने की कोशिश करते हैं। खेल-खेल में खेला गया यह नाटक उस महिला को कटघरे में तोड़ देता है। विजय तेंदुलकर के लिखे इस नाटक का बस इतना ही जिक्र यहां काफी है। 

हिन्दुस्तान इन दिनों जिस अकेले नाटक को खेल रहा है, सुशांत राजपूत की मौत नाम का यह नाटक अंतहीन चल रहा है। देश के मीडिया को इसमें एक रोजगार मिल गया है, जिंदा रहने का एक रास्ता मिल गया है, देश की तमाम कुंठाग्रस्त आबादी, सेक्सवंचित लोगों को यह मुद्दा मिल गया है जिसमें यह एक खूबसूरत और मादक अभिनेत्री को प्यार, सेक्स, और बेवफाई के साथ-साथ मौत से रिश्ते के जुर्म में भी घेर पा रहे हैं। मीडिया के हमलावर तेवर इस हद तक चले गए हैं कि इस अभिनेत्री की इमारत में कहीं खाना पहुंचाने आए कूरियर एजेंसी के लडक़े को 15 टीवी कैमरे घेरे हुए हैं, और उससे उसका नाम जानना चाहते हैं, यह जानना चाहते हैं कि उस अभिनेत्री ने खाने क्या बुलाया है, और वह लडक़ा कहे जा रहा है कि वह जानता भी नहीं है कि वे किसके बारे में पूछ रहे हैं। टीवी-मीडिया का यह हमलावर दस्ता उस अभिनेत्री को खलनायिका साबित करने को एक राष्ट्रवादी कर्तव्य मानकर, बिहार के आने वाले चुनाव में मृतक अभिनेता को शहीद का दर्जा दिलाने के तेवरों के साथ इमारतों के बाहर टूटा पड़ा है, और स्टूडियो तो कहीं इस अभिनेत्री को काला जादू करने वाली साबित कर रहे हैं, तो कहीं बदचलन, कहीं बेवफा, कहीं हत्यारी, कहीं नशे की सौदागर, और कहीं अंडरवल्र्ड की हसीना, डॉन की साथी वगैरह-वगैरह। 

और लोग विजय तेंदुलकर का नाटक असल जिंदगी में कैसे न खेलें? मुम्बई में एक फिल्म अभिनेता की मौत, जो कि पहली नजर में खुदकुशी लगती है, उसका किस्सा बढ़ते-बढ़ते हत्या की कहानी तक पहुंच गया, और फिर मृतक अभिनेता के गृहराज्य बिहार के पुलिस प्रमुख जिस अंदाज में महाराष्ट्र की पुलिस पर तोहमत लगा रहे हैं, वैसा तो शायद इस देश में इसके पहले कभी न हुआ हो, और इन दोनों प्रदेशों के बीच में दो बड़े-बड़े प्रदेश और न हुए होते, तो हो सकता है कि दोनों के बीच जंग छिड़ गई होती, हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की तरह। जिस अंदाज में बिहार के डीजीपी एक अभिनेत्री के बारे में सार्वजनिक रूप से यह कहते कैमरे पर दिखे कि उसकी औकात क्या है कि वह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर कोई टिप्पणी करे, वह रूख भी लोकतांत्रिक भारत के किसी राज्य के पुलिस प्रमुख का न होकर विजय तेंदुलकर के नाटक के एक किरदार का था। 

बॉलीवुड की किसी फिल्मी कहानी को भी फीका साबित करने वाली यह कहानी अनायास ही गढ़ गई हो, ऐसा तो नहीं लगता है। इस आजाद हिन्दुस्तान का इतना विशाल मीडिया जब इतने धार्मिक समर्पण के साथ एक मौत के पीछे की वजहें ढूंढने के बजाय, एक सेक्सी अभिनेत्री को कातिल, ड्रग डीलर, और भी जानें क्या-क्या साबित करने पर उतारू हो गया है, तो आज देश के नाजुक हालात के साथ मिलाकर इस मीडिया-रूख को समझने की जरूरत है। आज बिहार बाढ़ में डूबा हुआ है, दसियों लाख लोग बेघर हैं, देश कोरोना की मार से कराहता हुआ सरकारी अनाज की मदद पर बस जिंदा ही है, उससे अधिक कुछ नहीं, तो ऐसे में देश की बदहाली को ढांकने के लिए एक गोरी-सेक्सी अभिनेत्री की खाल उतारकर उससे देश की दिक्कतों को ढांक दिया गया है। क्या इतना सब कुछ अनायास और मासूम हो सकता है? हमारे पास इसके मासूम न होने के कोई सुबूत तो नहीं है, लेकिन ऐसा समझने की एक मामूली समझ जरूर है। 

सेक्स से वंचित, उस भूख की वजह से कुंठित, और एक मादक महिला पर हमले के लिए मत चूको चौहान के ऐतिहासिक अंदाज में टूट पडऩे को आमादा हिन्दुस्तानियों से अधिक उपजाऊ जमीन ऐसी किसी कहानी के लिए और भला क्या हो सकती थी? नतीजा यह है कि जिस तरह झारखंड और छत्तीसगढ़ में किसी अकेली, बेसहारा, कमजोर महिला को घेरकर, उसे बदनीयत से टोनही या जादूगरनी करार देकर उसका कत्ल कर दिया जाता है, आज कुछ वैसी ही भीड़त्या का माहौल इस एक अभिनेत्री के खिलाफ बना दिया गया है। लोगों का, और सोशल मीडिया पर अच्छे-खासे समझदार दिखते चले आ रहे लोगों का रूख यह है कि कल जब एक समाचार चैनल ने इस अभिनेत्री को इंटरव्यू किया, उसका पक्ष जाना, उसकी बातें दिखाईं जिनमें वह यह भी कह रही है कि उसे लग रहा है कि वह आत्महत्या कर ले, तो इस टीवी चैनल के खिलाफ सोशल मीडिया पर लोगों का एक बहुत बड़ा हिस्सा टूट पड़ा है। उस चैनल से पूछा जा रहा है कि वह कितने में बिका, जिस टीवी-जर्नलिस्ट ने इस अभिनेत्री से बात की, उसे गालियां दी जा रही हैं, उसे भड़वा कहा जा रहा है। अब सवाल यह उठता है कि जिसके खिलाफ हफ्तों या महीनों से हर गंदी तोहमत लगाई जा रही है, क्या उसकी बात को सामने रखना गुनाह हो गया? उसकी बात तमाम तोहमतों पर सवाल खड़ा करती है, क्या इसीलिए वे बातें लोगों को अब सुनना भी बर्दाश्त नहीं है? क्या लोग अब शांतता कोर्ट चालू आहे की उस रात की तरह बस एक महिला के चरित्र पर अंतहीन हमले ही जारी रखना चाहते हैं? यह पूरा सिलसिला जो कल तक मीडिया के खिलाफ लिखने की वजह लग रहा था, आज उसके साथ-साथ एक और बड़ी वजह लिखने की यह बनी है कि तोहमतों से जख्मी किसी युवती की कराह सुनना भी क्या अब इस देश के लोगों को मंजूर नहीं है? यह अभिनेत्री अगर इस सिलसिले में तीसरी खुदकुशी बनती है, तो उसकी जिम्मेदारी मीडिया पर रहेगी, सोशल मीडिया पर रहेगी, या उसकी औकात गिनाने वाले एक सरकारी वर्दीधारी आईपीएस पर रहेगी, किस पर रहेगी? 

हिन्दुस्तान का लोकतंत्र भेडिय़ों के एक झुंड सरीखा हो गया है, इसे गोश्त से भरा कोई बदन दिखा, तो यह उस पर टूट पड़ा। ऐसा लगता है कि सेक्स से भूखे इस देश में चूंकि 99.99 फीसदी मर्दों को ऐसी खूबसूरत युवती नसीब नहीं हो सकती, इसलिए उनके बागी तेवरों और तोहमतों के लिए मानो यह भी एक काफी वजह है। हिन्दुस्तानी लोकतंत्र से और परे जाकर देखें तो हिन्दुस्तानी समाज के भीतर की वह आदिम और हिंसक सोच आज पूरे हमलावर तेवरों के साथ ओवरटाईम कर रही है जो कि लोकतंत्र के हजारों बरस पहले थी, और आज लोकतंत्र को किनारे धकेलकर भीड़ की शक्ल में इस युवती को घेरना चाहती है, उसकी देह का एक हिस्सा चाहती है। 

हाल के बरसों में किसी एक मामले में हिन्दुस्तान के लोगों के हिंसक मिजाज को इस हद तक उजागर किया हो, ऐसा याद नहीं पड़ता। अगर मीडिया, और सोशल मीडिया पर भाड़े के सैनिक देश को सोते-जागते इसी एक सेक्स-क्राईम थ्रिलर में बांधे रखना चाहते हैं, तो देश के असल मुद्दों से ध्यान हटाने की यह एक बड़ी कामयाब तरकीब रही है। बेरोजगार, बाढ़ से बेघर, भूखी देह इसके मुकाबले भला किसका ध्यान खींच सकती है? और एक बार सेक्स और क्राईम का यह नॉनस्टॉप सीरियल शुरू हो गया है तो देश में किसी इस बात की परवाह है कि वह डूबे बिहार के सुशासन बाबू को उनका जिम्मा याद दिला सके, उनकी देहरी पर तो एक वर्दीधारी, सबसे अधिक सितारों वाली वर्दी में उनका अफसर बाकी हिन्दुस्तान को औकात गिनाते खड़ा ही है। उधर ऊपर आसमान के और ऊपर विजय तेंदुलकर की आत्मा यह देखकर हैरान होगी कि किस तरह हिन्दुस्तान, पूरे का पूरा हिन्दुस्तान उनके शांतता कोर्ट चालू आहे का मंच बन गया है! 

(Daily chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 28 अगस्त 2020


 

देश को खतरे में डालने का एक गैरजिम्मेदार काम, दाखिला-इम्तिहान तुरंत टालें...

 भारत सरकार जिस तरह से बड़े कॉलेजों में दाखिले के इम्तिहान लेने पर अड़ी हुई है, और उसे उसकी जिद पर सुप्रीम कोर्ट का साथ भी मिल गया है, वह देश के लिए एक बड़ा खतरा हो सकता है। कोरोना-महामारी का पूरा असर पहले कभी किसी का देखा हुआ नहीं है इसलिए खतरे का अंदाज लगा पाना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं है, सुप्रीम कोर्ट के लिए भी नहीं। इस खतरे का अहसास कराने के लिए कुछ छात्रों का यह कहना काफी होना चाहिए कि मां-बाप बड़ी बीमारियों के मरीज हैं, संक्रमण का खतरा उठाते हुए वे कैसे इम्तिहान देने जाएं?

कोरोना के खतरे ने इस देश और इसके प्रदेशों को दाखिला-इम्तिहान जैसे तरीके के बारे में एक बार और सोचने का मौका भी दिया है। छत्तीसगढ़ सरकार इस बरस बी.एड. जैसे कड़े दाखिला-इम्तिहान की जगह ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट इम्तिहानों में मिले नंबरों के आधार पर दाखिला देने की सोच रही है। देश को यह भी सोचना चाहिए कि आज बड़े कॉलेजों की हर दाखिला-परीक्षा की तैयारी के लिए देश में ऐसे कारखाने चल रहे हैं जहां आबादी के सबसे ऊंचे एक चौथाई लोग ही अपने बच्चों को भेज पाते हैं। बाकी तीन चौथाई की तो ऐसे मुकाबलों में संभावना ही नहीं रहती क्योंकि वे बराबरी की तैयारी की सरहद तक भी नहीं पहुंच पाते।

लोगों को याद होगा कि जब कोरोना का हमला हुआ तो राजस्थान के कोटा शहर में दाखिलों की तैयारी के कारखानों में किस तरह लाखों बच्चे थे और उन्हें राज्य सरकारों ने घर वापिस लाने के इंतजाम किए थे। हर बरस के दाखिला-इम्तिहान देश में सामाजिक असमानता की खाई को और गहरा, और चौड़ा कर देते हैं। और यह खाई महज एक पीढ़ी तक नहीं रह जाती, वह आने वाली तमाम पीढिय़ों के लिए हो जाती है। कोरोना ने एक मौका दिया है कि बड़े कॉलेजों, या बाकी कॉलेजों में भी दाखिले के तरीकों के बारे में फिर सोचा जाए। अभूतपूर्व हालात अभूतपूर्व तरीकों को भी पैदा करते हैं। 

जानकार लोगों को एक ऐसा तरीका निकालना चाहिए कि स्कूली इम्तिहानों से लेकर कॉलेज के इम्तिहानों तक के चुनिंदा नंबरों को भी आगे के दाखिलों और नौकरियों में वजन मिले। यह महत्व मिले बिना पढ़ाई का महत्व खत्म हो चुका है और बस दाखिला-इम्तिहानों की ही अहमियत रह गई है। यह बात हिंदुस्तान को दुनिया के समझदार देशों के मुकाबिले हमेशा ही बहुत पीछे रखेगी। अगर स्कूलों के कुछ चुनिंदा बोर्ड इम्तिहानों और कॉलेज इम्तिहानों के औसत नंबरों को आगे दाखिले-नौकरी की पूर्व शर्त रखा जाए तो बच्चों की पढ़ाई की तरफ वापिसी हो सकती है। 

फिलहाल आज की बात करें तो देश का माहौल बिल्कुल भी इन परीक्षाओं के लायक नहीं है। यह सामान्य जिंदगी नहीं है कि इतना बड़ा इंतजाम किया जा सके, और उससे संक्रमण न फैले। कल कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने और साथी मुख्यमंत्रियों के साथ यह सही पहल की है। बाकी राजनीतिक दलों को भी इस बारे में सोचना चाहिए। यह सबकी राजनीतिक जिम्मेदारी का वक्त है। आज जो पार्टी जलते-सुलगते मुद्दों पर चुप रह जाएंगी वो इतिहास में गैरजिम्मेदार दर्ज होगी। आज की महामारी ने देश को जिस हद तक बर्बाद किया है, उसे  और अधिक बढऩे देने के खतरे वाला कोई भी गैरजिम्मेदाराना काम नहीं करना चाहिए। कोरोना का टीका आने, सबको लगने में हो सकता है कि एक-दो और पन्द्रह अगस्त निकल जाए। टीके के लोकार्पण की जो हड़बड़ी आईसीएमआर दिखा रहा था, वह हड़बड़ी पढ़ाई के लिए दिखाना ठीक नहीं है। भारत की सबसे बड़ी चिकित्सा विज्ञान संस्था अपने फर्जी दावे के साथ जिस तरह औंधे मुंह गिरी है, वह नौबत भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय की नहीं होनी चाहिए। नाजुक मौके के बीच ऐसी दाखिल परीक्षा से दसियों लाख छात्र-छात्राएं और उनके परिवारों के करोड़ों लोग एक गैरजरूरी और भयानक खतरे में पड़ेंगे। 

(Daily chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 अगस्त 2020


 

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अगस्त 2020


 

लॉकडाऊन की तरह कुछ हफ्ते सफाईकर्मियों बिना रहने की कल्पना कर देखें !

 रोज सुबह से कचरा ले जाने के लिए गाड़ी आती है, और छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की तरह देश के और भी बहुत से शहरों में कचरा बाहर लाने के लिए गाना बजाती होगी। सामाजिक सरोकार रखने वाले कुछ जिम्मेदार लोगों ने ऐसे कार्टून बनाए और अपने बच्चों को समझाते भी हैं कि वे कचरे वाले नहीं हैं, वे सफाई वाले हैं, कचरे वाले तो लोग हैं जिनके घरों में इतना कचरा पैदा होता है कि जिसे ले जाने के लिए गाडिय़ों को दिन में कई फेरे लगाने पड़ते हैं। 

अभी जब पिछले कुछ महीनों में लोगों के घरों में काम करने वाले कम रहे या नहीं रहे, तो उन्हें कचरे की बाल्टियां ले जाकर बाहर रखनी पड़ीं, और खाली बाल्टियां वापिस लानी पड़ीं। इतने में ही लोगों के होश उड़ गए कि इन बाल्टियों से कैसी बदबू आती है, और इनमें कहीं चीटियां भर जाती हैं, तो कहीं दूसरे कीड़े। अब उन लोगों की कल्पना करें जो दिन में कम से कम आठ घंटे ऐसी ही बाल्टियों को उठा-उठाकर कचरे की गाडिय़ों में पलटते हैं, अपने सिर से ऊपर तक उठाते हैं, और बाल्टियां वापिस गेट पर छोडक़र जाते हैं। बारिश के दिनों में इन बाल्टियों में पानी भर जाता है, और जब कचरा-गाड़ीवाले इन्हें पलटते हैं तो उनके ऊपर यह पानी गिरते भी रहता है। 

यह तो फिर भी ठीक है, लेकिन शहरों में गटर सफाई करने वाले लोगों को जिस तरह गटर में उतरना पड़ता है, और कीचड़ के पानी में डुबकी लगाकर फंसे हुए कचरे को निकालना पड़ता है, उस जिंदगी की कल्पना करना भी उस तबके के बाहर के लोगों के लिए नामुमकिन है। और यह तबका हिन्दुस्तान में हिन्दू धर्म के भीतर सबसे ही हिकारत और नफरत के लायक माना गया दलित तबका है, दलितों में भी और नीचे के दलित जिन्हें कि सफाई के अलावा और किसी काम के लायक माना नहीं गया है। 

अब पल भर के लिए कल्पना करें कि हिकारत के लायक समझी जाने वाली, अछूत मानी जाने वाली यह जाति खत्म हो जाए। लोगों के घरों का कचरा तो खत्म नहीं होगा, लोगों के मुहल्लों और शहरों की नालियां, उनके गटर तो खत्म नहीं होंगे, फिर क्या होगा? अगर तमाम दलित यह तय कर लें कि सफाई के जिस काम की वजह से उन्हें अछूत माना जाता है वह काम करना ही नहीं है, तो सफाईकर्मियों की ऐसी जातियां तो मेहनत का कोई दूसरा काम एक बार कर भी लेंगी, शर्तियां ही कर लेंगी, लेकिन लोग अपने कचरे और अपनी फंसी हुई नालियों का क्या करेंगे? उनका काम तो कचरा पैदा करने वाले लोगों, उनसे ऊंची जातियों के लोगों के बिना एक बार चल जाएगा, वे तो मनरेगा जैसी किसी सरकारी योजना में मिट्टी भी खोद लेंगे जो कि कचरा और गटर के मुकाबले बेहतर काम होगा, लेकिन बाकी हिन्दुस्तानी क्या करेंगे? वे अपना कचरा लेकर कहां जाएंगे? और घरों में, इमारतों में पखाने की टंकियां भर जाएंगी, तो क्या होगा? अलग-अलग इलाकों में गटर का पानी सडक़ों पर फैल जाएगा तो क्या होगा? 

ऐसी नौबत के बारे में कुछ देर सोचना चाहिए, फिर गटर में काम करने वाले लोगों के हाल पर भी सोचना चाहिए, और फिर यह सोचना चाहिए कि उन्हें खुद यह काम करना पड़ा तो वे क्या कर पाएंगे? यह पूरा सिलसिला अब उन दिनों का नहीं रह गया है जब गंदगी साफ करने वाले लोगों के बिना भी ऊंची मानी जाने वाली जातियों के लोग पखाने के लिए गांव के बाहर खेत चले जाते थे, और नालियां खुली रहती थीं, गटर रहते नहीं थे, न पखाने होते थे न उनकी टंकियां। उन दिनों वैसे में तो सफाईकर्मियों के बिना काम चल जाता था, लेकिन अब क्या होगा? क्या सफाईकर्मियों के ऐसे मजबूत संगठन बन सकते हैं जो कि अपनी खतरनाक नौबत के मुताबिक अधिक मेहनताना और अधिक मुआवजा मांग सकें? और फिर इस बात का मुआवजा भी मांग सकें कि समाज की गंदगी को ढोने की वजह से उन्हें जिस सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है, उसके लिए भी तो गंदगी पैदा करने वाला समाज कुछ दे। 

लेकिन जाति व्यवस्था और समाज व्यवस्था से परे भी एक बात समझने की जरूरत है। आज शहरों में, और खासकर संपन्न लोगों में जिस बड़े पैमाने पर कचरा पैदा किया जा रहा है, क्या उससे निपटना हमेशा के लिए मुमकिन हो पाएगा? आज छोटे-छोटे से सामान भी ऑनलाईन ऑर्डर करके बुलाए जा रहे हैं, और वे भारी-भरकम पैकिंग के भीतर आ रहे हैं। क्या इतनी पैकिंग के निपटारे के लिए कोई शहरी ढांचा बना हुआ है, या इतनी पैकिंग बनाने के लिए भी धरती पर काफी पेड़ हैं? ये तमाम बातें सोचना इसलिए जरूरी है कि कुछ लोगों को यह भी लग रहा है कि ऑनलाईन खरीदी से लोगों का बाजार जाना कम हो रहा है, और ईंधन बच रहा है, उसका प्रदूषण बच रहा है। हमारे पास अभी कोई वैज्ञानिक आंकड़े इस बात के नहीं हैं कि ईंधन कितना बच रहा है, और पैकिंग कितनी अधिक लग रही है, और इनमें से कौन सी बात धरती के लिए अधिक नुकसानदेह है। लेकिन यह बात तय है कि आज दुनिया की सरकारों को कारोबार पर नकेल कसकर यह देखना होगा कि पैकिंग कितनी गैरजरूरी हो रही है, और उसे कैसे कम किया जाना चाहिए। यह राज्यों को भी अपने स्तर पर देखना चाहिए कि उनकी जमीन पर चाहे स्थानीय बाजार में पहुंचने वाले सामान, या फिर ऑनलाईन ऑर्डर से कूरियर के मार्फत आने वाले सामान की पैकिंग कितनी है? हमने कई बरस पहले भी इसी जगह यह बात सुझाई थी कि स्थानीय सरकारों को अपने प्रदेश में एक गार्बेज टैक्स लगाना चाहिए जिसमें आई हुई पैकिंग का पूरा वजन हो, और उसके भीतर इस्तेमाल होने वाले सामान का भी वजन हो। जितना भी प्लास्टिक, पु_ा, या किसी और किस्म का पैकिंग मटेरियल आ रहा है, उस पर एक टैक्स लगाना चाहिए। हर बक्से या पैकेट पर यह लिखने का नियम रहे कि उसके भीतर इस्तेमाल के सामान का वजन कितना है। बाकी तो पूरा का पूरा कचरा बनकर उस प्रदेश पर बोझ रहेगा, और उस पर एक टैक्स लगाना चाहिए। हो सकता है कि केन्द्र सरकार के स्तर पर ऑनलाईन कंपनियों से लेकर बाजार में जाने वाले थोक सामान तक पर ऐसा एक टैक्स लग सके जिससे लोगों को यह भी समझ में आए कि गैरजरूरी पैकिंग एक गलत बात है, और उसके लिए टैक्स या जुर्माना लग रहा है। आज छोटे-छोटे से सामानों को सजावटी और आकर्षक दिखाने के लिए उनकी ढेर-ढेर पैकिंग की जाती है। 

इस बात को लिखने का सीधा रिश्ता इस बात से है जिससे कि आज हमने यहां लिखना शुरू किया है। यह सारी गैरजरूरी पैकिंग कचरा भी बढ़ा रही है, और नालियों को चोक भी कर रही है, इन दोनों के चलते इस देश से कभी भी सफाई कर्मचारी कम नहीं होने वाले हैं, और जब तक उनका यह काम जारी रहेगा, तब तक यह जाति व्यवस्था भी कायम रहेगी। इसलिए कचरे को कम करने की जितनी जरूरत है, उतनी ही जरूरत कचरे के व्यवस्थित निपटारे की भी है ताकि वह धरती पर कम बोझ बने, और उसे उसका निपटारा करने वाले लोगों को वह इंसानों की तरह माने भी। धरती को बचाने, इंसानों को बचाने, और शहरी जिंदगी को बचाने के लिए इन तमाम बातों पर सोचने की जरूरत है। घर या दफ्तर, दुकान से ही, बाजार से ही कचरे को अलग-अलग करना शुरू हो, स्थानीय म्युनिसिपल अलग-अलग कचरे को अलग-अलग उठाए, उसका अलग-अलग निपटारा हो, और ऐसे में ही यह निपटारा करने वाले इंसान इंसान की तरह जी सकेंगे। आज पिछले पांच-छह महीनों में लॉकडाऊन से और कोरोना-सावधानी से लोगों को जैसी जिंदगी जीनी पड़ी है, वे यह सोचकर देखें कि छह हफ्ते भी अगर सफाई कर्मचारियों के बिना जीना पड़ा तो क्या होगा? 

आज अपनी सेहत के लिए खतरा उठाकर, अमानवीय परिस्थितियों में गंदगी का काम करते हुए, सामाजिक बहिष्कार और छुआछूत झेलते हुए जो लोग इंसानी जिंदगी से गंदगी को कम कर रहे हैं, उनको इतना संगठित करने की जरूरत है कि वे अपने इस काम के लिए अतिरिक्त भुगतान पा सकें। वे तो दूसरी जातियों के लोगों का काम कर लेंगे, लेकिन उनके काम के लिए तो आरक्षण को कोसने वाली जातियों के पास भी कोई ऐसे लोग नहीं हैं जो सफाई में आरक्षण मांगें।

फिलहाल हर कोई अपने-अपने स्तर पर यह सोचे कि सुबह से उनके घर कचरा लेने आने वाले लोग भी इंसान हैं, और कैसे उन पर बोझ कम किया जा सकता है। हिन्दुस्तान में दक्षिण भारत में कई म्युनिसिपल ऐसी हैं जिन्होंने पिछले बरसों में बिना किसी खर्च के वैसी सफाई हासिल की है जैसी सफाई के लिए इंदौर जैसा शहर सैकड़ों करोड़ रूपए सालाना खर्च कर रहा है। देश के बाकी शहरों को भी ऐसी म्युनिसिपलों से कुछ सीखना चाहिए। 

(Daily chhattisgarh)

ग्रेस की इस खुली चिट्ठी को दफन करना आसान न होगा

 कांग्रेस के चाय के कप में आया तूफान थम गया दिखता है। हाल के बरसों में, या पिछले कुछ दशकों में पहली बार इस पार्टी के करीब दो दर्जन लोगों ने गैरचापलूसी का एक रूख दिखाया था, और वह रूख पार्टी पर कोई असर नहीं डाल पाया। कल कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक सुबह से शाम तक चली, और वह इस नतीजे पर खत्म हुई कि फिलहाल सोनिया गांधी पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष बनी रहेंगी। इस पार्टी की सबसे ताकतवर कमेटी की बैठक भी अगले अध्यक्ष के बारे में न कुछ सोच पाई, न कोई तरीका सोच पाई, और चिट्ठी लिखने वालों के तरीकों के खिलाफ सोनिया से लेकर नीचे तक बहुत से नेताओं ने नाराजगी और असहमति जताई। 

बहस के लिए हम यह मान भी लेते हैं कि जब चिट्ठी लिखने वाले 23 लोगों में से आधा दर्जन से अधिक लोग कांग्रेस कार्यसमिति के मेम्बर भी थे, जहां उनके पास इस बात को उठाने का मौका था, तो फिर शायद यह चिट्ठी इस मीटिंग के पहले मीडिया में पहुंचना एक अच्छी बात नहीं थी। लेकिन एक दूसरे नजरिए से देखें तो अजगरी अंदाज में चलती इस पार्टी का ध्यान खींचने के लिए सार्वजनिक रूप से कुछ ढोल बजाने में बुराई क्या थी? इस चिट्ठी में कोई आरोप नहीं लगाए गए थे, किसी को नाकामयाबी का जिम्मेदार नहीं बताया गया था, महज एक सकारात्मक बदलाव की बात की गई थी। तो क्या आज कांग्रेस पार्टी ऐसे मोड़ पर खड़ी है कि वह किसी सकारात्मक बदलाव की मांग करने वाले अपने ही दो दर्जन बड़े नेताओं की बात को बगावत मान रही है? अगर यह बगावत है, तो यह कांग्रेस पार्टी के हित में है। वह युग खत्म हो गया जब नेहरू-गांधी परिवार से परे की संभावनाओं को सोचने पर उसे हिन्दू धर्म का सबसे बड़ा पाप मान लिया जाता था। अब पार्टी को यह तय करना है कि उसे जिंदा रहना है, या मौजूदा लीडरशिप को पार्टी की अगुवाई में जिंदा रखना है? बहुत से संगठनों में एक वक्त ऐसी नौबत आ जाती है कि उसके नेता पार्टी को आगे ले जाने की अपनी क्षमता के सर्वोच्च स्तर तक पहुंच चुके रहते हैं, और वहां से आगे मशाल किसी और को ही ले जानी होती है। अब अगर पार्टी यह मानकर चले कि वे सोनिया या राहुल की अगुवाई में जहां तक पहुंचे हैं, उससे आगे जाने की पार्टी की कोई महत्वाकांक्षा नहीं है तो एक अलग बात है। आज सोनिया-परिवार के हिमायती दिग्विजय सिंह का बयान लीडरशिप की एक थोड़ी सी और संभावना वाला है। उन्होंने सोनिया और राहुल का नाम लेने के बजाय यह कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष का पद गांधी परिवार में ही रहना चाहिए। इसका मतलब यह है कि वे प्रियंका गांधी की संभावनाओं को अनदेखा नहीं कर रहे हैं, फिर चाहे वे अभी शब्दों में उसे नहीं कह रहे हैं।

हमने कल भी इस बारे में लिखा था, इसलिए बहुत से तर्कों को आज एक दिन के भीतर यहां दुहराने का कोई मतलब नहीं है, लेकिन यह बात साफ है कि दो दर्जन बड़े नेता अगर इस चिट्ठी पर दस्तखत करने वाले हैं, तो कई दर्जन और बड़े नेता भी इस चिट्ठी के साथ होंगे, और अभी हवा का रूख देख रहे हैं, या पानी में एक पैर डालकर गहराई देख रहे होंगे। यह बात समझने की जरूरत है कि ये दो दर्जन नेता अगर कांग्रेस के विभाजन पर उतारू होते हैं, तो पार्टी का बड़ा नुकसान भी होगा। वे अगर पार्टी संविधान के मुताबिक अध्यक्ष के चुनाव पर अड़ते हैं, तो भी पार्टी के भीतर एक ढांचे के भीतर भी विभाजन हो जाएगा। यह सोनिया-परिवार के सोचने की बात है कि पार्टी का अब क्या करना चाहिए? अगर दूसरे लोग यह सोचने वाले रहेंगे, तो हो सकता है कि आगे चलकर इस परिवार की मर्जी का अध्यक्ष भी न बने। 

एक अखबार के रूप में हमें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कांग्रेस का अध्यक्ष कौन रहे। लेकिन इस बात हमें फर्क पड़ता है कि देश का एक बड़ा विपक्षी दल अगर और कमजोर होते चला गया तो भारत के लोकतंत्र में भाजपा और एनडीए की ताकत अनुपातहीन ढंग से अधिक हो जाएगी, और वह कोई बहुत अच्छी नौबत जनता के हित में नहीं होगी। कांग्रेस को आज न केवल अपना घर सम्हालने की जरूरत है, बल्कि अपने घर की मरम्मत की भी जरूरत है, और अपने भविष्य के बारे में भी उसे सोचना चाहिए। यह भी सोचना चाहिए कि क्या नौबत ऐसी आ गई है कि सोनिया-परिवार का भविष्य और कांग्रेस पार्टी का भविष्य दो अलग-अलग बातें हो चुकी हैं? 

हमारा ख्याल है कि कांग्रेस के भीतर कुछ लोग जिसे असंतोष और बगावत कह रहे हैं, वह किसी भी पार्टी के जिंदा रहने का पहला सुबूत है। यह कांग्रेस के लिए एक अनहोनी हो सकती है कि उसके भीतर के कुछ लोग उसे जिंदा करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि आमतौर पर चापलूसी को इस पार्टी के लिए काफी माना जाता है, और उससे अधिक कुछ क्यों किया जाए, यह सवाल हमेशा ही पार्टी की नीति बने रहता है। 

लेकिन अब हिन्दुस्तान की राजनीति के तौर-तरीके मोदी युग के हैं, अब कांग्रेस या कोई भी दूसरी पार्टी यह मानकर नहीं चल सकतीं कि मोदी की गलतियों से वे सत्ता में आ जाएंगे। और जब सत्ता से परे रहना एक लंबा भविष्य दिख रहा है, तो बहुत से नेताओं को अपनी पार्टी से अधिक असरदार, अधिक लड़ाकू, और आखिर में अधिक कामयाब बनाने की जरूरत लग सकती है। अभी तक जो बातें सामने आई हैं उनके मुताबिक तो पार्टी के पास एक पखवाड़े से पड़ी हुई इस चिट्ठी को लेकर कल की कार्यसमिति की बैठक में कोई अधिक बात नहीं हुई, या कम से कम उस पर कोई कार्रवाई होते नहीं दिखी। कल की बैठक के पहले पार्टी जहां पर थी, गांधी परिवार की उसी देहरी पर, उसी जगह, उसी तरह आज भी खड़ी हुई है, बस इतना ही फर्क पड़ा होगा कि ये 23 लोग पार्टी में घोषित रूप से अवांछित बन गए हैं, और जैसा कि दुनिया में कहीं भी होता है इतनी बड़ी संख्या में अवांछित लोग अपने वांछित नतीजों को पाने के लिए आगे भी कुछ न कुछ करते हैं। कांग्रेस पार्टी में आने वाले दिनों में अगर यह संघर्ष बढ़ता है तो भी वह पार्टी के लिए अच्छा ही होगा। पार्टी को तर्कहीन तरीके से अंतहीन चापलूस बने रहना उसे किसी किनारे नहीं पहुंचा सकता। जिन लोगों ने यह चिट्ठी लिखी, उनकी नीयत क्या थी, और आगे उनकी तैयारी क्या है, इसका खुलासा तो आगे धीरे-धीरे होगा लेकिन कांग्रेस पार्टी कम से कम एक जिंदा पार्टी बनी दिख रही है, और वह भी कोई छोटी कामयाबी नहीं है। इस चिट्ठी में उठाए गए मुद्दों पर इस पार्टी को सोचना चाहिए, क्योंकि उसके अलावा उसके पास सोचने को कुछ और तो अधिक बचा भी नहीं है।

(Daily chhattisgarh)

गंदे पानी को छुपाने के लिए जलकुंभी से सतह को पाट देना आसान

 जिस तरह पानी की सतह पर जब जलकुंभी फैल जाती है, और उसके नीचे यह भी नहीं दिखता कि पानी है कि कोई और कचरा है। यह तो दूर की बात है कि उस पानी के नीचे तलहटी में कोई मोती हैं और वे दिख जाएं। ठीक उसी तरह आज हिन्दुस्तान में खबरों का हाल है। कल से देश का मीडिया टूट पड़ा है कि मोदी जिस मोर को दाना खिला रहे हैं, उस वक्त मोदी के बाल इतने कम क्यों दिख रहे हैं? प्रधानमंत्री निवास से बनकर जो वीडियो बाहर आया है, वह वीडियो कैसे बना, उसने मोदी ने कितनी पोशाकें बदलीं, प्रधानमंत्री निवास के भीतर मोरों का दिखना कोई नियम तोड़ रहा है या नहीं, ऐसी कई बातें कल से चारों तरफ छाई हुई हैं। कार्टूनिस्ट भी जमकर पिल पड़े हैं, और सोशल मीडिया पर लोग इसी पर बहस कर रहे हैं। इससे परे देश के वित्तमंत्री बनने की हसरत लिए हुए दुनिया के हर मुद्दे पर अपनी जानकार राय वाले हमलों के योद्धा सुब्रमण्यम स्वामी अब सुशांत राजपूत की मौत पर टूट पड़े हैं, और जांच करती सीबीआई को शर्मिंदा करने लायक जांच कर रहे हैं, जानकारियां ट्विटर पर पोस्ट कर रहे हैं। फिर मानो यह भी काफी न हो तो बलात्कार का एक आरोपी नित्यानंद जिसने कि देश से फरार होकर कहीं एक टापू खरीदकर कैलाश नाम का एक देश बनाने की घोषणा की थी, वह अब वहां अपनी करेंसी के बाद अपनी हिन्दू संसद बनाने की घोषणा कर चुका है। पूरा देश हर किस्म की गैरजरूरी खबरों में डूब गया है, जितने गहरे पानी में बिहार की गरीब जनता डूबी हुई है, उससे बहुत अधिक गहरे इस देश की जनता गैरजरूरी अफवाहों और गॉसिप में डूबी हुई हैं। 

दरअसल एक वक्त अखबारों का जो मीडिया लोगों तक समाचार, और समाचार से जुड़े विचार पहुंचाने का जरिया था, उसकी जगह को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, और डिजिटल मीडिया ने ऐसा अवैध कब्जाया है कि अब चतुर और धूर्त नेताओं और पार्टियों के परसेप्शन मैनेजमेंट के लिए प्रिंट की जरूरत नहीं पड़ती, टीवी चैनलों के गलाकाट मुकाबले में जितनी भी अधिक बेबुनियाद बात उछाली जाए, वह उतनी ही तेजी से लपकी जाती है, और फिर डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया भी चैनलों के किए शिकार में से हड्डियों में चिपके मांस को नोचने के लिए तैयार रहते हैं। कभी-कभी उल्टा भी होता है कि सोशल मीडिया या डिजिटल मीडिया शिकार करते हैं, और टीवी चैनल उसके कंकाल में चिपके कुछ टुकड़ों को नोंचते रह जाते हैं। अखबारों को समझ ही नहीं पड़ता कि ऐसे मुकाबले में वे कहां खड़े रहें, क्या करें, और ऐसे में कई बार वे प्रिंट की परंपरागत जिम्मेदार सोच को छोडक़र शिकार की लाश में मुंह मारने में लग जाते हैं। अब यह मुकाबला इस दर्जे का हो गया है कि इसमें पानी में डूबे हुए लोग, बिना इलाज मरते हुए लोग, बिना पीपीई किट के अस्पतालों में ड्यूटी करते डॉक्टर-नर्स, नौकरी खो चुके लोग, बिना मजदूरी भूखों मरने के करीब लोग किनारे बैठे या लेटे हुए यह देख रहे हैं कि इस देश का तथाकथित मीडिया, और सोशल मीडिया किस किस्म की मुद्दों पर गलाकाट मुकाबले में लगे हुए हैं। इसके बीच कुछ-कुछ देर के लिए खबरें ऐसी आती हैं कि दस कदम पीछे उनका खंडन भी दौड़ते हुए आते ही रहता है। दाऊद पाकिस्तान में है, और नहीं है, इन दोनों को मिलाकर आधा-एक घंटा गुजर जाता है। राहुल गांधी ने चि_ी लिखने वालों को भाजपा के साथ मिला हुआ कहा, और नहीं कहा, इन दोनों के बीच कपिल सिब्बल जैसे लोग राहुल पर टूट पड़े, अपना राजनीतिक-धर्मनिरपेक्ष जनेऊ निकालकर दिखाने लगे, और बिहार की बाढ़ में इतनी देर में और कुछ हजार लोग बेघर हो गए। 

किसी देश में वहां के लोगों की जिंदगी से जुड़े हुए असल मुद्दे किस तरह धकेलकर हाशिए पर कर दिए जाते हैं, उसकी आज के हिन्दुस्तान से बेहतर मिसाल मिलना मुश्किल है। जाने महीना हुआ है, या दो महीने, सुशांत राजपूत की मौत के बाद यह देश उसे राष्ट्रीय मौत साबित करने में जुट गया, केन्द्र और राज्य के संबंध कसौटी पर चढ़ा दिए गए, राज्यों के आपसी संबंध सरहद पर जंग करते खड़े हो गए, और ऐसा लगा कि मीडिया बॉलीवुड के तमाम गंदे कपड़े धोने का धोबीघाट बन गया है। मीडिया में उन सवालों की फेहरिस्त सिलसिलेवार छपने लगी कि सुशांत राजपूत से जुड़े और जुड़ी किन-किन लोगों से पुलिस या सीबीआई, ईडी या मुम्बई पुलिस ने क्या-क्या पूछताछ की है। इस मौत से जुड़े हुए लोगों के बीच आपस में निजी मैसेंजरों पर क्या-क्या बात हुई वह हैरानी की हद तक खुलासे के साथ जांच एजेंसियों से निकलकर मीडिया में छा गई, और देश सुशांत राजपूत की मौत के समारोह में डूब गया। मीडिया के तकरीबन तमाम लोगों ने इस बात की परवाह नहीं की कि निजी बातचीत को क्यों नहीं छापना चाहिए, क्योंकि न छापें तो गंदगी के गलाकाट मुकाबले में बहुत पीछे रह जाएंगे। इसलिए देश कीचड़ फेंकने के इस मुकाबले की रनिंग कमेंटरी करने वाले मीडिया को देखते रह गया, पढ़ते रह गया। 

कहने वाले लोग इसे बहुत पहले से जानते हैं, और कहते हैं कि जब कभी देश के सामने जलते-सुलगते मुद्दे रहते हैं, किस तरह एक पड़ोसी दुश्मन देश से आए कुछ आतंकी पकड़ाते हैं, किस तरह वे बयान देते हैं कि वे हिन्दुस्तान के किन बड़े लोगों को मारने आए थे, किन बड़े शहरों की कौन सी धार्मिक जगहों पर हमले करने वाले थे, और दो-चार दिन मीडिया उसी में डूब जाता है। यह जनधारणा प्रबंधन गजब का है, और मीडिया की इस अघोषित साजिश में भागीदारी करने की बेसब्र और बेचैन हसरत भी गजब की है। देश के जलते-सुलगते असल मुद्दे फुटपाथों पर इंतजार करते हुए बुझे हुए चूल्हों सरीखे हो जाते हैं, और झूठ, अफवाहें, और इन सबसे बढक़र अर्धसत्य, गैरजरूरी सत्य, ये सब उसी तरह धूम-धड़ाके के साथ सडक़ पर से परेड करते निकलते रहते हैं जैसे कि ब्राजील में चकाचौंध मादकता वाली सांबा नर्तकियां सालाना जलसे में निकलती हैं। अब मीडिया और सोशल मीडिया, और मैसेंजर सर्विसों के बीच की विभाजन रेखा झाड़ू लेकर मिटा दी गई है, और इन सारे औजारों का इस्तेमाल परसेप्शन मैनेजमेंट में गजब की पेशेवर खूबी से हो रहा है। इसलिए जिस बिहार में लोग, दसियों लाख लोग बाढ़ से बेघर हैं, उस बिहार को खुश करने के लिए आज यह काफी साबित किया जा रहा है कि सुशांत राजपूत की मौत की जांच मुम्बई पुलिस से छीनकर सीबीआई को दी जा रही है। ऐसे ही तमाम और मुद्दे हैं जो लोगों को असल जलती हुई हकीकत की जमीन पर पांव भी नहीं रखने देंगे क्योंकि उतने सुलगते पैरों के साथ लोग अगर संसद और अदालत की ओर बढ़ चले, तो फिर बगावत सी हो जाएगी। उसके मुकाबले एक मौत का राष्ट्रीयकरण अधिक आसान और अधिक सहूलियत का है।  

(Daily chhattisgarh)

नेताओं की चिट्ठी के बाद अब कांग्रेस का भविष्य कल तय हो सकता है...

 आखिर कांग्रेस पार्टी में बम फूटा। पार्टी में मायने रखने वाले दो दर्जन लोगों ने सोनिया गांधी को लगभग खुली चिट्ठी लिखकर संगठन में ऊपर से नीचे तक बदलाव की मांग की है, और कहा है कि कांग्रेस को एक पूर्णकालिक और प्रभावी लीडरशिप चाहिए। जाहिर है कि न तो सोनिया गांधी, और न ही राहुल पूर्णकालिक हैं, और किसी दूसरी वजह से न सही, इसी एक वजह से तो कम से कम प्रभावहीन हैं हीं। पार्टी के जिन लोगों ने बहुत कड़वा लगने वाला यह खत लिखा तो सोनिया गांधी के नाम पर है, लेकिन मीडिया में इसके पूरे के पूरे छप जाने की वजह से यह जाहिर है कि इसे भेजने के पहले ही इसे जनता के सामने भी रख देना तय किया गया था। वैसे भी जब किसी चिट्ठी पर देश भर में बिखरे हुए 23 बड़े कांग्रेस नेताओं के दस्तखत हो रहे हैं, तो वह चिट्ठी कम, पोस्टर अधिक है।

खैर, इसमें कोई बुराई नहीं है क्योंकि पिछले दिनों ही हमने कम से कम दो-तीन बार इस मुद्दे पर लिखा, और अभी चार-छह दिन पहले ही यह भी लिखा कि किसी कारोबार के मालिक को खुद मैनेजरी करके उसे नाकामयाब नहीं बनाना चाहिए, बल्कि एक काबिल मैनेजर रखकर कारोबार को कामयाब करना चाहिए। यह बात गांधी परिवार पर भी लागू होती है कि जब वह एक संगठन को चलाने के लिए पूरा वक्त नहीं दे पा रहा है, तो उसे मेहनत करने वाले लोगों को रखना चाहिए, काबिल ढूंढने चाहिए, और ऐसे लोगों को डूबे हुए टाइटैनिक को तलहटी से सतह तक लाने का जिम्मा देना चाहिए। लेकिन यह लिखते हुए भी हमें यह उम्मीद नहीं थी कि कांग्रेस के इतने नेता खुलकर सोनिया गांधी को लिखेंगे, बल्कि जिस वक्त हमने लिखा, उस वक्त वे इस चिट्ठी को सोनिया को भेज भी चुके थे। इसमें लोकसभा और राज्यसभा के पार्टी के बड़े-बड़े नेता, आधा दर्जन भूतपूर्व मुख्यमंत्री, कई प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे हुए लोग शामिल हैं, जिनके नाम खबर में जा रहे हैं, इसलिए यहां पर उस फेहरिस्त को देने का कोई मतलब नहीं है। 

इस चिट्ठी में कांग्रेस कार्यसमिति के चुनाव मांगे गए हैं, और पार्टी के पुनरूद्धार के लिए सामूहिक रूप से, संस्थागत नेतृत्व-तंत्र की बात कही गई है। इस चिट्ठी के बाद कल, सोमवार सुबह कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक है, और इस बैठक में इस पर चर्चा हो सकती है। हमारा मानना है कि हाल के बरसों में कांग्रेस पार्टी के भीतर यह सबसे बड़ा समुद्रमंथन है, जिससे कुछ लोगों को अमृत की उम्मीद होगी, और कुछ लोगों को जहर का खतरा दिखेगा। लेकिन हम भारतीय लोकतंत्र के हित में कांग्रेस का मजबूत बने रहना जरूरी मानते हैं, और उसके लिए इस पार्टी के भीतर ऐसी हलचल भी जरूरी है। अभी कई बरस से कांग्रेस संगठन के फैसले अजगर के करवट बदलने के फैसले से भी धीमी रफ्तार से होते थे। यह बात देश में मजाक हो चली कि हर चुनाव के बाद राहुल गांधी बिना किसी जनसूचना के निजी प्रवास पर विदेश चले जाते हैं, सोनिया गांधी उपलब्ध नहीं रहती हैं, प्रियंका गांधी अपने को मोटेतौर पर उत्तरप्रदेश तक सीमित रखती हैं, और पार्टी के बाकी बहुत से नेता जनता की राजनीति के पैमाने पर फॉसिल (जीवाश्म) हो चुके हैं। यह बात हम किसी नेता की उम्र को लेकर नहीं कह रहे, उनके जनाधार, और उनके जनसंघर्ष को लेकर कह रहे हैं। 

कांग्रेस के इन नेताओं ने मोदी की कामयाबी की हकीकत को माना है, और अच्छा ही काम किया है क्योंकि हकीकत को माने बिना किसी बात का हल तो निकल नहीं सकता। और मोदी इस देश के राजनीतिक इतिहास की एक अनोखी कामयाबी बन चुके हैं, जो कि आने वाले वक्त में भी आसानी से हराने लायक नहीं दिखते। आज ही एक पुराने अखबारनवीस ने लिखा है कि मोदी को सिर्फ एक व्यक्ति हरा सकता है, खुद नरेन्द्र मोदी। ऐसी हकीकत के दौर में अगर कांग्रेस पार्टी छींके के नीचे बैठी बिल्ली की तरह लेटी रहेगी, तो उससे उसे कुछ हासिल नहीं होना है। दुनिया में लोकतंत्र, चुनाव, सोशल मीडिया, और जनधारणा-प्रबंधन के सारे के सारे पैमाने बदल चुके हैं, नए हथियार चलन में आ गए हैं, रोजाना के औजार भी तमाम ऑटोमेटिक हो गए हैं। ऐसे में एक पार्टी अपने को सवा सौ से अधिक साल पुरानी मानते हुए सवा सौ से अधिक साल पुराने तौर-तरीकों और हथियार-औजारों संग जीने की कोशिश अगर कर रही है, तो वह न तो भविष्य गढ़ रही, न ही वर्तमान में जी रही, वह महज इतिहास लिख रही है। 

कांग्रेस अगर अपनी कल की कार्यसमिति में इस चिट्ठी के मुद्दों पर खुलकर चर्चा नहीं करती, तो यह जाहिर है कि राहुल की यह बात जुबानी जमाखर्च थी कि गांधी परिवार के बाहर का अध्यक्ष होना चाहिए। अभी जब प्रियंका गांधी का एक इंटरव्यू आया जिसमें उन्होंने भाई की इस बात से सहमति जताई थी, तो अगले ही दिन कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने प्रियंका के बयान को साफ-साफ खारिज करने के बजाय यह कहकर खारिज सा कर दिया कि यह इंटरव्यू तो साल भर पहले दिया गया था, मानो इस एक साल में कांग्रेस इसरो पर सवार होकर अंतरिक्ष पहुंच चुकी हो, और हालात बदल गए हों। इस एक साल में कांग्रेस के हालात अगर किसी किस्म से बदले हैं, तो वे बद से बदतर ही हुए हैं। ऐसे में राहुल और प्रियंका का कुछ कहना, और फिर कांग्रेस प्रवक्ता का उससे एक किस्म से मुकरना एक लतीफे सरीखा है। 

भारतीय लोकतंत्र और देश के हित में, और खुद कांग्रेस पार्टी के हित में यही है कि वह संगठन में लोकतंत्र लेकर आए, अधिक से अधिक यही तो होगा कि कई लोगों के बागी तेवर उसके ढांचे को हिलाकर रख देंगे। लेकिन आरामकुर्सी पर चढ़ती हुई चर्बी के मुकाबले बहता हुआ पसीना हमेशा ही बेहतर होता है। कांग्रेस को आज जितने बड़े बदलाव की जरूरत है, वह पूरे का पूरा नेताओं की इस चिट्ठी में सामने आया है। इस पार्टी का भला चाहने वाले लोगों को इस पर खुलकर चर्चा करनी चाहिए, यह गांधी परिवार के भी हित में होगा कि उसे पार्टी कुछ वक्त के लिए आजादी दे। इसी परिवार की पीठ पर इस तरह से सवारी करते रहने ने इस पार्टी को आरामतलब कर दिया है। इसे संघर्ष करने के लिए दूसरों के हवाले करना चाहिए, और चिट्ठी में यह बात सही लिखी हुई है कि देश की सबसे बड़ी और सबसे कामयाब पार्टी की सरकार के मुखिया रहते हुए एक तरफ तो नरेन्द्र मोदी शायद 16 घंटे रोज काम कर रहे हैं, दूसरी तरफ कांग्रेस के पास कोई भी पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं है, जबकि उसे संघर्ष की जरूरत अधिक है। 

कांग्रेस के नेताओं की यह चिट्ठी बहुत सही मौके पर आई है और कल कांग्रेस कार्यसमिति में समझदारी भी सामने आ सकती है, और पारंपरिक चापलूसी भी। इस पार्टी का भविष्य एक किस्म से कल तय भी हो सकता है।  

(Daily chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 अगस्त 2020

 

आज हमारे विचारों की जगह अरूण शौरी और कुरियन जोसेफ की बातें

 वकील प्रशांत भूषण के मामले में सुप्रीम कोर्ट का रूख उसे भारतीय लोकतंत्र के अधिकतर समझदार लोगों से अलग कर रहा है। और ये समझदार क्रिकेट या रॉकेट साईंस के समझदार नहीं हैं, बल्कि ये संविधान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायपालिका की स्वतंत्रता जैसे जटिल मुद्दों को समझने वाले लोग हैं। इनमें सबसे ताजा नाम एक भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री रहे, आपातकाल के खिलाफ लड़े, और इंडियन एक्सप्रेस जैसे धाकड़ अखबार के दमदार संपादक रहे अरूण शौरी का है। उन्होंने अभी खुलकर कहा कि देश का जो सुप्रीम कोर्ट दो ट्वीट से अपने को खतरे में समझ रहा है वह देश की जनता को खतरे से क्या बचाएगा। उन्होंने बहुत से शब्दों में इस बात को कहा है- मुझे हैरानी हो रही है कि 280 अक्षर-मात्राओं के ट्वीट लोकतंत्र के झंडे को हिला रहे हैं। उन्होंने कहा मुझे नहीं लगता है कि सुप्रीम कोर्ट की छवि इतनी नाजुक है। 280 अक्षर-मात्राओं से सुप्रीम कोर्ट अस्थिर नहीं हो जाता। उनका कहना है कि इस फैसले से पता चलता है कि लोकतंत्र का यह स्तंभ इतना खोखला हो चुका है कि महज दो ट्वीट से इसकी नींव हिल सकती है। उन्होंने प्रशांत भूषण के माफी मांगने से इंकार पर कहा कि यह उनका निजी फैसला हो सकता है, लेकिन अगर वे माफी मांगते तो मुझे हैरानी होती। 

अरूण शौरी ने इस बारे में कहा- पिछले कुछ दिनों में प्रशांत भूषण ने इस पर विचार किया होगा। कोर्ट ने 108 पेज का फैसला सुनाया है, कोर्ट का स्तर बहुत ऊंचा है। अगर आप कुल्हाड़ी से मच्छर मारेंगे तो आप अपने आपको चोट पहुंचाएंगे। आपको पता है जो शख्स ऊंचे ओहदे पर बैठता है, चाहे वह राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, या जज कोई भी हो, वो कुर्सी बैठने के लिए होती है, न कि खड़े होने के लिए। उन्होंने कहा- कोर्ट का मान ट्वीट से नहीं, जजों के काम से और उनके फैसलों से घटता है। यदि सुप्रीम कोर्ट खुद को सुरक्षित नहीं रख सकता, तो वह हमारी रक्षा कैसे करेगा। शौरी ने कहा- अगर कोई विज्ञापन कंपनी ट्विटर के लिए विज्ञापन बनाना चाहती है तो इससे अच्छा कोई विज्ञापन नहीं होगा कि ‘आओ ट्विटर से जुड़ो, हमारा प्लेटफॉर्म इतना शक्तिशाली है कि इस पर किया गया ट्वीट दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के केंद्रीय स्तंभ को हिलाने की क्षमता रखता है।’

अरूण शौरी ने कहा- प्रशांत भूषण के ट्वीट नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों द्वारा की गई इन टिप्पणियों के चलते लोगों का विश्वास सुप्रीम कोर्ट से घटेगा। लोग कहेंगे ‘अरे यार तुम सुप्रीम कोर्ट के पास भाग रहे हो कि वो तुम्हें बचाएंगे, जबकि वो खुद कह रहे हैं कि वे इतने कमजोर हो गए हैं कि दो छोटे से ट्वीट सारे ढांचे को गिरा देंगे।’ उन्होंने कहा, ‘यह वही बात हुई जैसा कि शायर कलीम आजि•ा ने कहा है, ‘हम कुछ नहीं कहते, कोई कुछ नहीं कहता, तुम्ही क्या हो तुम्ही सबसे, कहलवाए चले हो।’’ शौरी ने कहा कि कोर्ट के फैसलों की आलोचना और विश्लेषण करना अवमानना नहीं होता है। उन्होंने कुछ मामलों की मिसाल देते हुए कहा कि कोर्ट के कई ऐसे फैसले हैं जहां अदालत ने तर्कों को नजरअंदाज करते हुए फैसला दिया, या अभी भी लंबित है। उन्होंने कहा कि जैसा कोर्ट ने जजलोया और रफाल मामले में फैसला दिया, दोनों मामलों में महत्वपूर्ण सुबूतों की ओर से मुंह फेर लिया गया। 

अरूण शौरी ने कहा कि अदालत हमारे संविधान के केन्द्र में स्थित बेहद महत्वपूर्ण विषयों, कश्मीर, मुठभेड़-हत्या, नागरिकता-संशोधन एक्ट को लगातार नजरअंदाज कर रही है। उन्होंने कहा, ‘क्या सत्य को उस देश में रक्षा के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा, जिसका आदर्श राष्ट्रीय वाक्य सत्यमेव जयते है? जिस देश के राष्ट्रपिता ने बार-बार कहा है कि सत्य ही भगवान है।’ उन्होंने कहा, ‘न्यायिक व्यवस्था का मान किसी ट्वीट से कम नहीं होता है, बल्कि अन्य कई कारणों, जैसे तथ्यों को नजरअंदाज करने, महाभियोग जैसे मामलों को डील करने की प्रक्रिया अपर्याप्त और निष्पक्ष न होने, और पूर्व मुख्य न्यायाधीशों के खिलाफ दुराचार के आरोपों के संबंध में पूरी तरह गोपनीयता बरतने, से कोर्ट का मान घटता है। किसी के ट्वीट पर अपना गुस्सा निकालने से अच्छा है कि इन कमियों को दूर किया जाए। याद रखें कि भ्रष्टाचार का अर्थ केवल धन स्वीकार करना नहीं है। हो सकता है कि एक अकादमिक या पत्रकार पैसे स्वीकार न करे, और फिर भी वह बौद्धिक रूप से भ्रष्ट हो कि वह आदतन दूसरों के काम को अपना बताकर छापता हो, या उससे नकल करता हो।

शौरी ने कहा कि इस तरह यदि कोई भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं तो इसका मतलब हमेशा ये नहीं होता कि वे पैसे के भ्रष्टाचार की बात कर रहे हों। एक व्यक्ति, एक जज, या एक राजनेता पैसे के मामले में पूरी तरह से ईमानदार हो सकता है, लेकिन नैतिक रूप से भ्रष्ट हो सकता है। वह किताबों में उच्च सिद्धांतों की खूब पैरवी करता होगा, मौलिक अधिकारों के बारे में खूब बोलता होगा, लेकिन जब इसे लागू करने की बात होती हो, तो वह पीछे हट जाता होगा। इस तरह के भ्रष्टाचार के ढेरों उदाहरण हैं।’

अरूण शौरी ने अलग-अलग कई अखबारों और समाचार माध्यमों से बातें की हैं, और उनकी बातों को हल्के में खारिज करना नाजायज होगा। वे खुद देश की कई सरकारों के खिलाफ लड़ चुके हैं, और वे लोकतंत्र के तमाम पहलुओं से बहुत अच्छी तरह वाकिफ इंसान हैं। आज अपने अखबार के विचारों की इस जगह पर उनकी बातों को जस का तस धर देने के पीछे इस जगह को भर देने की नीयत नहीं है, बल्कि इस अखबार की अपनी सोच से मेल खाने वाली उनकी जो सोच कल सामने आई है उसे हम पिछले कुछ दिनों में अपनी लिखी बातों के एक विस्तार के रूप में यहां रख रहे हैं, और इसीलिए उनकी बातों को पूरे खुलासे से देना ठीक लगा है। 

सुप्रीम कोर्ट अगले एक-दो दिनों में इस मामले पर अपना तय किया जा चुका रूख सामने रखेगा, और अदालत की जुबान में इसे सजा का निर्धारण कहा जाएगा। प्रशांत भूषण के मुद्दे पर हमारे तर्क फिलहाल खत्म हो चुके हैं, और अभी दो दिन पहले ही हमने इस बारे में लिखा था कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में फैसला भी दे सकता है, और इंसाफ भी कर सकता है। यह पूरा सिलसिला सुप्रीम कोर्ट की एक अनुपातहीन अधिक ताकत के खतरे भी बता रहा है कि दर्जनों जजों वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच पूरी न्यायपालिका के सम्मान पर एक फैसला ले रही है, और इस बेंच से दस गुना अधिक दूसरे जज इस बुनियादी और लोकतांत्रिक मुद्दे पर राय देने से बाहर हैं। सुप्रीम कोर्ट से अभी रिटायर हुए जज जस्टिस कुरियन जोसेफ ने किसी विवाद को लेकर दो दिन पहले एक बयान जारी करके कहा है कि मामले की सुनवाई पांच या सात जजों की संवैधानिक बेंच को करनी चाहिए। इस तरह के महत्वपूर्ण मामलों को कोर्ट के भीतर विस्तृत रूप से सुना जाना चाहिए जहां व्यापक चर्चा, और व्यापक भागीदारी की गुंजाइश हो। उन्होंने लिखा- भारत के सर्वोच्च न्यायालय की तीन जजों की पीठ ने न्यायालय की अवमानना के दायरे और सीमा पर कुछ गंभीर प्रश्नों को सुनने का फैसला लिया है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक स्वत: संज्ञान मामले में दोषी ठहराए व्यक्ति को अंतर-अदालत की अपील का मौका मिलना चाहिए क्योंकि आपराधिक मामलों में सजा की अन्य सभी स्थितियों में दोषी व्यक्ति के पास अपील के माध्यम से दूसरे अवसर का अधिकार है। अदालत की अवमानना अधिनियम के तहत एक अंतर-अदालत अपील दी जाती है जहां उच्च न्यायालय के एकल जज द्वारा आदेश पारित किया जाता है तो मामले में डिवीजन बेंच सुनवाई करती है, जिसकी अपील भारत के सर्वोच्च न्यायालय में निहित है। उन्होंने लिखा यह सुरक्षा शायद न्याय के अंत की आशंका से बचने के लिए भी प्रदान की गई है। क्या अन्य संवैधानिक न्यायालय, भारत के सर्वोच्च न्यायालय में भी इस तरह की सुरक्षा नहीं होनी चाहिए, जब एक स्वत: संज्ञान आपराधिक अवमानना मामले में सजा हो? 

जस्टिस कुरियन ने अपने बयान में लिखा है- न्याय किया जाना चाहिए, भले ही आसमान टूट पड़े, ये बात न्यायालयों द्वारा न्याय के प्रशासन की बुनियादी नींव है। लेकिन अगर न्याय नहीं किया जाता है, या न्याय विफल होता है, तो आसमान निश्चित रूप से टूट पड़ेगा। भारत के सर्वोच्च न्यायालय को ऐसा नहीं होने देना चाहिए। वर्तमान अवमानना मामले केवल एक या दो व्यक्तियों से जुड़े हुए नहीं हैं, बल्कि न्याय से संबंधित देश की अवधारणा और न्यायशास्त्र से संबंधित बड़े मुद्दे हैं। इन जैसे महत्वपूर्ण मामलों को विस्तृत रूप से सुना जाना चाहिए जहां व्यापक चर्चा और व्यापक भागीदारी की गुंजाइश है। लोग आ सकते हैं, और लोग जा सकते हैं, लेकिन भारत के सर्वोच्च न्यायालय को सर्वोच्च न्याय के न्यायालय के रूप में हमेशा के लिए रहना चाहिए।

(Daily chhattisgarh)

बात की बात, 21 अगस्त 2020

 

दीवारों पर लिक्खा है, 21 अगस्त 2020

 

फिल्मी खलनायक देश का सबसे बड़ा नायक, तो फिर सत्तारूढ़ नायक आखिर क्या साबित हुए?

 फिल्म उद्योग के कलाकार सोनू सूद की समाजसेवा पर हम पहले भी एक-दो बार इसी जगह पर लिख चुके हैं, और कई खबरें भी छापी हैं। जिस तरह देश भर से इस नौजवान कलाकार को मदद की अपील मिल रही हैं, और वह जिस तरह लोगों का इलाज करवा रहा है, संगठित रूप से लोगों को नौकरियां दिलवा रहा है, किसी का मकान बनवा रहा है, तो किसी को बह गई भैंस दिलवा रहा है, सोशल मीडिया पर कोई तस्वीर आई कि एक किसान अपनी बेटियों को हल में जोतकर खेत में काम कर रहा है, तो सोनू सूद की तरफ से ट्रैक्टर उनके घर पहुंच जाता है। यह पूरा सिलसिला अनोखा है, और अटपटा है। क्या इतना बड़ा देश लोगों की अंतहीन जरूरतों के लिए किसी एक जिंदा इंसान के कंधों पर इस हद तक सवार होकर चल सकता है? इस देश में केन्द्र सरकार है, राज्य सरकारें हैं, स्थानीय म्युनिसिपल और पंचायतें हैं, बड़ी-बड़ी कंपनियों के सीएसआर फंड हैं, बड़े-बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समाजसेवी संगठन हैं, क्या इन सबके ढांचे ढह चुके हैं? क्या पूरे हिन्दुस्तान की जरूरतें इस रफ्तार से एक मददगार पर टूट पड़ेंगी कि किसी एक दिन उसे 41 हजार अपीलें मिलें? कोई एक इंसान, इंसान की ताकत से बहुत ऊपर उठकर अगर जरूरतमंदों का ऐसा मददगार हो रहा है, तो यह क्षमता अविश्वसनीय है। सोनू सूद की विनम्रता भी अविश्वसनीय है, उसकी रफ्तार भी अविश्वसनीय है, और मदद का उसका आकार भी अविश्वसनीय है। इस सिलसिले को नाकामयाबी के पहले दूसरे लोगों को खुद मदद की जरूरत है। अगर एक इंसान ही अंतहीन इस हद तक करते चलेगा, तो फिर लोगों को किसी ईश्वर की जरूरत क्यों होगी? इसलिए हिन्दुस्तानी लोकतंत्र के बाकी तबकों को सोनू सूद नाम के एक आईने में अपना चेहरा देखना चाहिए, और अपने-अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभानी चाहिए। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो अब अपने पीएम केयर्स फंड को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक से क्लीन चिट पा चुके हैं कि उसमें कुछ गलत नहीं है। इस फंड में यह भी इंतजाम है कि इसके दानदाताओं को टैक्स में छूट मिलेगी, कंपनियों के सीएसआर का पैसा इस फंड में दिया जा सकेगा, और इसे सीएजी से ऑडिट भी नहीं करवाना पड़ेगा। अब तक पब्लिक सेक्टर कंपनियों से ही इसे हजार-दो हजार करोड़ मिल चुके हैं, और देश की बाकी बड़ी कंपनियों से भी। आज सोनू सूद किसी राजनीतिक दल का झंडा उठाए बिना जिस अंदाज में लोगों की मदद के लिए जादूगर मैन्ड्रेक और महाबली बेताल का मिलाजुला रूप बनकर सुपरमैन की तरह आसमान पर उड़ते हुए पूरे देश के गांव-गांव तक पहुंच जा रहा है, दरअसल वह अंदाज हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री को बेहतर सुहाता। नरेन्द्र मोदी अगर ट्विटर पर देख-देखकर देश भर के लोगों की दिक्कतों को इसी तरह दूर करते, तो वह लोकतंत्र में ऐसी सेवा का एक फायदेमंद काम भी होता कि उन्हें चुनाव में इसका असर देखने मिलता। लेकिन सोनू सूद फिलहाल तो किसी राजनीतिक दल में गए नहीं हैं, किसी पार्टी का प्रचार कर नहीं रहे हैं, किसी पार्टी से चुनाव लडऩे की नीयत नहीं दिख रही है, और फिर वे अकेले बिहार की मदद भी नहीं कर रहे हैं। इसलिए उनके अविश्वसनीय नेक काम पर हम शक करके उसकी बेइज्जती करना नहीं चाहते। अगर वे चुनाव लड़ते भी हैं, तो भी आज उनके किए हुए कामों से जिन लाखों जिंदगियों को राहत मिली है, या मिलने जा रही है, वह काम तो खत्म नहीं हो जाता। अब सवाल यह है कि 130 करोड़ आबादी के इस देश में सुबह से रात तक जरूरतमंद लोगों की ऐसी मदद से भी क्या तकलीफें खत्म हो जाएंगी? या तो समाज के संपन्न लोग सोनू सूद के साथ आएं, और एक ट्रस्ट बनाकर उन्हें ऐसी ताकत दें कि वे इस काम को जारी रख सकें। दूसरा रास्ता यह हो सकता है कि सरकारें अपनी जिम्मेदारी पूरी करें, मकान देने के लिए सरकारों के पास बजट है, और उनके इलाकों में गरीबों की शिनाख्त भी है, तो किसी को मकान बनवाकर देने की जिम्मेदारी सोनू सूद तक पहुंचनी क्यों चाहिए? छत्तीसगढ़ में बारिश से किसी आदिवासी छात्रा की सारी किताबें भीगकर खत्म हो गईं, टूटी छत बिना दीवारों वाला घर, उसे देखकर सोनू सूद ने किताबों और मकानों दोनों का भरोसा दिलाया है। अब यह काम छत्तीसगढ़ के जिस हिस्से में भी होना है, वहां पर स्थानीय शासन है, राज्य शासन के आला अफसर हैं, और समाज के भी ताकतवर लोग हैं, क्या ये तमाम लोग भी सोनू सूद की ट्वीट जमीन पर उतरते देखने की राह तकेंगे? या इनकी खुद की भी अपने इलाकों के लिए कोई जिम्मेदारी बनती है? 

यह पूरा सिलसिला मुंबई से मजदूरों को उनके गांव वापिस भेजने से शुरू हुआ था। सोनू सूद ने हजारों बसों में लोगों को भेजा, कई रेलगाडिय़ां चलवाईं, और दर्जनों विमानों से भी मजदूरों को भेजा। यही काम कई राज्य सरकारें भी कर रही थीं। लेकिन क्या किसी सरकार ने अपने राज्य में लौटे हुए मजदूरों के लिए सोनू सूद को भुगतान की पेशकश की? कम से कम एक-दो राज्यों के मंत्रियों की तो हमें याद भी है कि किस तरह उन्होंने सोशल मीडिया पर ही सोनू सूद को इस बात के लिए धन्यवाद लिखा था कि उन्होंने उनके राज्य के मजदूरों को भिजवाया। सोनू सूद ने तो अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से लाख गुना अधिक करते हुए ऐसे काम किए हैं, लेकिन क्या सरकारों का जिम्मा बस इतना ही बनता है कि थैंक्यू सोनू सूद टाईप करके पोस्ट कर दें? 

लोकतंत्र अगर अपनी व्यापक जिम्मेदारियों को, अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों को किसी एक करिश्माई व्यक्ति के भरोसे छोड़क़र खुद चादर तानकर सो जाए, तो यह करिश्माई की कामयाबी कम है, लोकतंत्र की नाकामयाबी और गैरजिम्मेदारी अधिक है। आज इस देश के तमाम सत्तारूढ़ लोगों को यह सोचना चाहिए कि सोनू सूद के किए हुए कौन-कौन से काम दरअसल उनकी (सत्तारूढ़ लोगों की) जिम्मेदारी थे, और उन्होंने जब जरूरतमंदों की मदद नहीं की, तो लोगों को यह एक आदमी देश का सबसे बड़ा मददगार, सबसे बड़ा भरोसेमंद, सुपरमैन, और ईश्वर सरीखा दिखने लगा।
 
हमको पक्का भरोसा है कि कम से कम ईश्वर को तो ऐसी तुलना नहीं सुहाएगी, क्योंकि वह अपने आपको तमाम इंसानों से ऊपर रखना चाहेगा, लेकिन क्या अदालतों, सरकारों, और सामाजिक संगठनों पर काबिज लोगों को ऐसी तुलना सुहा रही है कि कल का एक छोकरा, फिल्मों में खलनायक बनने वाला, मार खाने वाला, आज देश का सबसे बड़ा नायक बनकर उभर रहा है? जिन लोगों के हिस्से के काम सोनू सूद कर रहे हैं, उन लोगों को अपने बारे में सोचना चाहिए कि इतिहास उनके जिम्मे की नाकामयाबी को भी दर्ज करते चल रहा है। जब एक आम एक्टर देश का सबसे बड़ा नायक बन रहा है, देश का रहनुमा माना जा रहा है, तो फिर जनता के पैसों पर कुर्सियों पर बैठे हुए नायक तो खलनायक ही साबित हुए न? और इतिहास इस बात को भी दर्ज करते चल रहा है कि मजदूरों को लेकर जब लोग सुप्रीम कोर्ट तक दौड़े थे, तब सुप्रीम कोर्ट का क्या रूख था।

(Daily chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 अगस्त 2020

 

प्रशांत भूषण पर सुप्रीम कोर्ट फैसला भी दे सकता है, और इंसाफ भी कर सकता है...

 देश के एक प्रमुख वकील और सार्वजनिक मुद्दों पर कई सरकारों, कई जजों के कटु आलोचक रहते आए प्रशांत भूषण के दो ट्वीट पर सुप्रीम कोर्ट उन्हें अदालत की अवमानना की सजा सुना रही है। दो दिन पहले इसी जगह हमने इस मुद्दे पर अपनी सोच खुलासे से सामने रखी थी, और आज उसे दुहराने का हमारा कोई इरादा नहीं है। इसलिए हम आज प्रशांत भूषण के समर्थन में कुछ लोगों के बयानों के कुछ हिस्से यहां दे रहे हैं, और खुद प्रशांत भूषण का आज सुप्रीम कोर्ट में दिया गया एक बयान भी दे रहे हैं क्योंकि इनसे अधिक हमारे पास दो दिन के भीतर लिखने के लिए और कुछ नहीं है। 

प्रशांत भूषण की जिन दो ट्वीट को अदालत ने अवमानना माना है, और उन्हें सजा का हकदार माना है उनमें उन्होंने लिखा था- जब इतिहासकार भारत के बीते 6 सालों को देखते हैं, तो पाते हैं कि कैसे बिना आपातकाल के देश में लोकतंत्र खत्म किया गया। इसमें वे (इतिहासकार) उच्चतम न्यायालय, खासकर चार पूर्व न्यायाधीशों की भूमिका पर सवाल उठाएंगे। 

दो दिन बाद अगली ट्वीट में प्रशांत भूषण ने मुख्य न्यायाधीश एस.ए.बोबड़े की विदेशी मोटरसाइकिल पर बैठी फोटो पोस्ट की थी, और लिखा था- मुख्य न्यायाधीश ने कोरोना काल में अदालतों को बंद रखने का आदेश दिया था। 

सुप्रीम कोर्ट में आज प्रशांत भूषण को सजा देने पर चल रही बहस के दौरान प्रशांत भूषण ने एक लिखित बयान में महात्मा गांधी का जिक्र किया और कहा- बोलने में विफलता कर्तव्य का अपमान होगा। मुझे तकलीफ है कि मुझे अदालत की अवमानना का दोषी ठहराया गया है, जिसकी महिमा मैंने एक दरबारी या जय-जयकार के रूप में नहीं, बल्कि 30 बरस से एक चौकीदार के रूप में बनाए रखने की कोशिश की है। मैं सदमे में हूं और इस बात से निराश हूं कि अदालत इस मामले में मेरे इरादों का कोई सुबूत दिए बिना इस निष्कर्ष पर पहुंची है। कोर्ट ने मुझे शिकायत की कापी नहीं दी, मुझे यह विश्वास करना मुश्किल है कि कोर्ट ने पाया कि मेरे ट्वीट ने इस संस्था की नींव को अस्थिर करने का प्रयास किया। लोकतंत्र में खुली आलोचना जरूरी है। हम ऐसे समय में रह रहे हैं जब संवैधानिक सिद्धांतों को सहेजना व्यक्तिगत निश्ंिचतता से अधिक महत्वपूर्ण होना चाहिए। बोलने में असफल होना कर्तव्य का अपमान होगा। यह मेरे लिए बहुत ही बुरा होगा कि मैं अपनी प्रमाणित टिप्पणी के लिए माफी मांगता रहूं। 

प्रशांत भूषण ने महात्मा गांधी के बयान का जिक्र करते हुए कहा- ‘‘मैं दया की अपील नहीं करता हूं। मेरे प्रमाणित बयान के लिए कोर्ट की ओर से जो भी सजा मिलेगी, वह मुझे मंजूर है।’’ 

प्रशांत भूषण ने कहा- मेरे द्वारा किए गए ट्वीट देश के एक नागरिक के रूप में सच को सामने रखने की कोशिश है। अगर मैं इस मौके पर नहीं बोलूंगा तो मैं अपनी जिम्मेदारी को निभा पाने में नाकामयाब रहूंगा। मैं यहां पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की एक बात को रखना चाहूंगा। उन्होंने कहा था- मैं दया करने के लिए नहीं कहूंगा, मैं उदारता दिखाने के लिए नहीं कहूंगा, मैं अदालत द्वारा दी गई किसी भी सजा को स्वीकार करूंगा, और यही एक नागरिक का पहला कर्तव्य भी है। 

अदालत ने जब प्रशांत भूषण को अवमानना पर अदालत से माफी मांगने पर विचार करने के लिए दो दिन और देने की बात कही तो प्रशांत भूषण ने कहा- मैंने जो कुछ भी कहा है, वह बेहद सोच-समझकर और विचार करने के बाद ही कहा है। अगर अदालत मुझे समय देना चाहती है तो मैं इसका स्वागत करता हूं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि इसका कोई फायदा, इससे अदालत का समय ही बर्बाद होगा। इसकी बहुत संभावना नहीं है कि मैं अपना बयान बदलूंगा। 

इस मामले में देश के अलग-अलग राजनीतिक दलों के 21 नेताओं ने बयान जारी करके प्रशांत भूषण के प्रति समर्थन जताया है, और लिखा है- न्याय देने में आ रही दिक्कतों, और लोकतांत्रिक संस्थाओं में गिरावट को लेकर उनके दो ट्वीट पर अवमानना की कार्रवाई की गई। यह दुखद है कि माननीय न्यायालय ने यह जरूरी नहीं समझा कि रचनात्मक आलोचना और दुर्भावनापूर्ण बयान में अंतर करे। हम ऐसी एप्रोच के लिए वैध आधार नहीं समझ पा रहे हैं क्योंकि यह एक आम व्यक्ति के लिए अपनी नागरिकता के उस दायित्व को निभाने में बाधा खड़ी करेगा जो दायित्व हमारे लोकतांत्रिक गणतंत्र के बारे में तथ्यपरक अभिव्यक्ति देने के रूप में है। हमारा विश्वास है कि बोलने की आजादी की रक्षा की जाए, और इसको बढ़ावा दिया जाए क्योंकि हमारे युवा लोकतंत्र में अलग-अलग नजरिए की विविधता और सभी संस्थाओं के सार्थक होने के लिए मुस्तैदी जरूरी है। 

इसके पहले बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने भी इस मामले में गहरी चिंता जताई थी, और मंगलवार को एक बयान जारी करके कहा था- जैसे यह अवमानना-कार्रवाई की गई है उससे अदालत की प्रतिष्ठा बने रहने से ज्यादा नुकसान पहुंचने की आशंका है। कुछ ट्वीट से सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता। जब कोर्ट ने इस मामले का संज्ञान लिया था तब हमने अपना पक्ष सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया था, लेकिन गलती से सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में इसे शामिल नहीं किया। हमारे बयान में बार के बोलने की ड्यूटी से जुड़ी धारा का भी उल्लेख था जिसमें कहा गया है- न्यायपालिका, न्यायिक अधिकारियों, व न्यायिक आचरण से संबंधित संस्थागत और संरचनात्मक मामलों पर टिप्पणी करना सामान्य रूप से न्याय प्रशासन और एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर भी वकीलों की ड्यूटी है। 

देश के पन्द्रह सौ से ज्यादा वकीलों ने प्रशांत भूषण के पक्ष में बयान जारी करके कहा है- सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले पर पुनर्विचार करे ताकि न्याय की हत्या न हो। अवमानना के डर से खामोश बार से सुप्रीम कोर्ट की स्वतंत्रता, और आखिरकार ताकत कम होगी। 

सुप्रीम कोर्ट की एक प्रमुख वकील इंदिरा जयसिंह ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि जस्टिस अरूण मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने प्रशांत भूषण के खिलाफ जो फैसला दिया है उस पर पुनर्विचार किया जाए। उन्होंने सुनवाई के लिए 32 जजों की एक पूरी अदालत की मांग की है। उन्होंने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में अपने भाषण में कहा- अगर मैं अपने मन की बात कहती हूं, इसलिए मेरा अस्तित्व है, लेकिन अगर यह अधिकार खतरे में पड़ता है तो मेरा अस्तित्व भी नहीं बच पाएगा। एक अदालत जिसके पास जनहित याचिका की सुनवाई की शक्ति है, वह असंतोष के स्वरों को सुनने से खुद को नहीं रोक सकती। हमारा कर्तव्य है कि यदि हम न्यायालय को उसके रास्ते से भटकते हुए देखें, तो बोलें। नागरिक के रूप में हमारा कर्तव्य है कि हम जीवंत आलोचना करें। हमें स्वतंत्र रूप से बोलने की अनुमति क्यों नहीं दी जा रही। सुप्रीम कोर्ट जनता का सहयोगी है, और एक भारतीय नागरिक का सार्वजनिक क्षेत्राधिकार सार्वजनिक है, इसलिए नागरिकों को असहमति का अधिकार है। अदालत यह दिखाने में विफल रही कि ट्वीट न्याय में हस्तक्षेप कैसे हो सकता है? फैसले में कहा गया है कि न्यायालय पर से जनता का विश्वास हिल जाएगा। क्या जनता से सलाह ली गई थी? क्या तीन जज ही जनता हैं? कई संपादकीय और बयान फैसले के खिलाफ आए हैं, और उनसे स्पष्ट है कि लोग बोलने की आजादी के हिमायती हैं। मैं सुप्रीम कोर्ट के 32 जजों की एक पूर्ण अदालत द्वारा फैसले पर पुनर्विचार पर अपील करती हूं, हम यह जानना चाहते हैं कि क्या यह (फैसला) पूरे न्यायालय का नजरिया है? 

अलग-अलग लोगों के बयानों के हिस्से ऊपर देने के साथ-साथ हम अपनी तरफ से आज यहां बस इतना लिखना चाहते हैं कि आज सुप्रीम कोर्ट के सामने दो विकल्प हैं, वह सजा पर फैसला भी दे सकता है, और वह इंसाफ भी कर सकता है। यह एक ऐतिहासिक मौका है, और आज इस बेंच में मौजूद तीन जजों के जाने के बाद भी लोकतंत्र और न्यायपालिका, हिन्दुस्तान का संविधान, और जनता की जिम्मेदारी, इन सब मुद्दों पर जमकर इतिहास लिखा जाएगा। 

(Daily chhattisgarh)