बात की बात, 30 सितंबर 2020


 

बाबरी गिराने के जुर्म से तमाम 32 अभियुक्त बरी!

   बाबरी मस्जिद गिराने के मामले में 28 बरस से चले आ रहा मुकदमा अब निपटा है, और दो लाईनों में निपट गया। अदालत ने सभी 32 अभियुक्तों को बरी कर दिया है कि उनके खिलाफ कोई ठोस सुबूत नहीं है। ये 32 अभियुक्त मामला शुरू होने के समय 49 थे, और फैसले के इंतजार में 17 अभियुक्तों को कुदरत की तरफ से ही सजा मिल चुकी है। अब आज से लालकृष्ण अडवानी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती जैसे बाकी तमाम अभियुक्त-नेता भी इस मुकदमे से आजाद हो चुके हैं। पता नहीं कैसे कल से ही यह आने लग गया था कि यह फैसला दो हजार पेज का रहने वाला है। अगर पूरे फैसले को सुनकर नतीजा सुनाया जाता तो वह शायद दो-तीन दिन बाद सामने आता, लेकिन जाहिर है कि फैसले से काम की बात को सीबीआई विशेष अदालत के जज ने आनन-फानन सुना दिया, और लोगों की दिलचस्पी अदालत पर से खत्म हो गई। जज का कार्यकाल पहले ही पूरा हो चुका था, लेकिन नए जज को यह मामला देने से यह और 10-20 बरस चलता, इसलिए इस फैसले तक जज का कार्यकाल सुप्रीम कोर्ट ने संविधान का एक विशेष प्रावधान इस्तेमाल करके बढ़ा दिया था, और आज इस फैसले के साथ ही जज का काम भी खत्म हो गया। 

इस फैसले से देश को बड़ी निराशा हुई है। इतना बड़ा बाबरी-ढांचा गिराया गया, जिसे इन तमाम अभियुक्त-नेताओं ने खास बनाए गए एक मंच पर बैठकर देखा था। इसके पहले लालकृष्ण अडवानी ने एक बड़ी रथयात्रा निकाली थी जो कि बाबरी मस्जिद को गिराने की जमीन बनाते चल रही थी, और इस ढांचे को गिराने के बाद देश में हुए दंगों की जमीन भी। इस स्टेज पर विराजमान होकर जब ये नेता ढांचा गिरना देख रहे थे, खुशी में एक-दूसरे से लिपट रहे थे, उमा भारती मुरली मनोहर जोशी की पीठ पर खुशी के मारे लटक गई थीं, तब देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई इस मामले में कुछ भी साबित न कर सकी, यह देश को और निराश करने वाली बात है। यह जाहिर है कि इस मामले के तकरीबन सभी अभियुक्त अगली किसी ऊपरी अदालत का कोई फैसला आने के पहले सबसे ऊपर की अदालत तक पहुंच जाने की उम्र या सेहत में हैं। और हिन्दुस्तान की अदालतों की रफ्तार देखते हुए यह समझा जा सकता है कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से बाबरी-ढांचे पर आखिरी फैसला आने के पहले तक ये सारे ही अभियुक्त बाकी 17 गुजर चुके अभियुक्तों से मिलने रवाना हो चुके होंगे। 

आज जिस वक्त हम यह लिख रहे हैं, देश भर में हिन्दूवादी ताकतें जश्न मना रही हैं। उनके लिए यह राम मंदिर बनाने के फैसले के बाद एक और बड़ा फैसला है, और अब मंदिर मार्ग से तमाम कांटे दूर मान लिए गए हैं। एक फैसले ने यह माना कि बाबरी मस्जिद तो गिराई गई थी, लेकिन वहां पर अब मंदिर बनाने का हक दिया जाता है। आज इस अदालत ने यह माना है कि बाबरी-ढांचे को गिराना सुनियोजित साबित करने के लिए ठोस सुबूत नहीं हैं। अब पूरी दुनिया जिस नजारे को टीवी पर देख रही थी, और ये सारे अभियुक्त वहीं सामने बैठकर मंच से रूबरू देख रहे थे, एक-दूसरे को मिठाईयां खिला रहे थे, और एक किस्म से आने वाले दिनों में देश भर में दंगों में हजारों मौतों की जमीन भी तैयार कर रहे थे, उस नजारे को साबित करने का काम सीबीआई नहीं कर पाई। यह वक्त प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंहराव की सरकार का था जिनके कुछ न करने की वजह से, जिनके बंद कमरे में बैठ जाने की वजह से लोगों को मस्जिद गिराने का यह मौका मिला था, उनके वक्त सीबीआई को जब इसके पुख्ता सुबूत जुटाने का मौका था, तो लगता है कि वह काम हो नहीं पाया। जो सुबूत पूरी दुनिया में बंटते लड्डुओं की शक्ल में अयोध्या की मस्जिद के सामने मंच पर देखे थे, वे भी सीबीआई को नहीं दिखे। 

ऐसे में मुस्लिम राजनीति करने वाले एक प्रमुख नेता, एआईएमआईएम के अध्यक्ष और सांसद असदउद्दीन ओवैसी ने कहा है कि इस मामले की चार्जशीट में लिखा था कि उमा भारती ने कहा था- एक धक्का और दो, कल्याण सिंह ने कहा था- निर्माण पर रोक है, तोडऩे पर नहीं, ऐसे सुबूतों के बाद भी मस्जिद को गिराया गया, और अब इन सबको बरी करके यह संदेश दिया जा रहा है कि मथुरा और काशी में भी यही करते चलो। 

जज ने दो हजार पेज के फैसले में कहा है कि मस्जिद की विध्वंस की कोई पूर्व योजना नहीं थी, इसके पीछे कोई आपराधिक साजिश नहीं थी। फैसले में यह भी कहा है कि इन आरोपियों ने भीड़ को रोकने और उन्हें उकसाने की कोशिश नहीं की थी। फैसले में कहा कि सीबीआई द्वारा प्रस्तुत ऑडियो और वीडियो क्लिप की प्रमाणिकता साबित नहीं हुई है। 

जाहिर है कि कई सरकारों के मातहत काम करते हुए सीबीआई ने अभी जो सुबूत पेश किए थे, वे काफी नहीं थे, और भरोसेमंद नहीं थे। इससे परे देश की जनता को कोई और उम्मीद भी नहीं थी। 

सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी ने इस फैसले को एक मजाक बताया। उन्होंने लिखा- यह न्याय का मजाक है। मस्जिद क्या खुद गिर गई? उस समय की सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली संवैधानिक पीठ ने इसे कानून का भयावह उल्लंघन बताया था। उसके बाद अब ये फैसला! शर्मनाक है। 

देश के एक वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा- इस फैसले से यही माना जाएगा कि न्यायपालिका में न्याय नहीं होता है, बस एक भ्रम रहता है कि न्याय किया जाएगा। यही होना संभावित था क्योंकि विध्वंस के केस में फैसला आने के पहले ही जमीन के मालिकाना हक पर फैसला सुना दिया गया, वो भी उस पक्ष के हक में जो मस्जिद ढहाए जाने का आरोपी था। इससे मुस्लिम समुदाय में द्वेष बढ़ेगा क्योंकि कोई भी फैसला उन्हें अपने हक में नहीं लगेगा। मुसलमान समुदाय को दोयम दर्जे का नागरिक बनाया जा रहा है, उनके सामने इस वक्त और बड़ी चुनौतियां हैं, जैसे-जैसे हिन्दू राष्ट्र के निर्माण की कोशिशें हो रही हैं। 

आने वाले दिनों में कानून के हमसे अधिक बड़े जानकार इस फैसले की खूबियों और खामियों को गिनाने का काम करेंगे, हम भी तब तक दो हजार पेज को पढक़र उस विश्लेषण को समझने लायक बन चुके रहेंगे।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 सितंबर 2020

 

तैश में नाजायज बातें कहना आसान, पर उन्हें ढोना बड़ा मुश्किल

  कई बड़े मोर्चे बड़ी छोटी बात पर लोग हार जाते हैं। मुम्बई में यही हुआ, और सडक़ों से लेकर मीडिया तक साबित होने के बाद अब बाम्बे हाईकोर्ट में यही बात फिर साबित हो रही है। कल वहां जो बहस चली वह थी तो फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत के दफ्तर को म्युनिसिपल द्वारा तोडऩे की, लेकिन उसके पीछे शिवसेना के सांसद संजय राऊत का हाथ होने की बात उठी। जज इस बात पर अड़ गए कि संजय राऊत ने हरामखोर लडक़ी किसे कहा था? अब चूंकि मामला अदालत में है, और वहां संजय राऊत के बयान की ऑडियो क्लिप बजाकर सुनी गई है, तो यह बात अदालत की जानकारी में है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की पार्टी के सांसद संजय राऊत ने किसी को हरामखोर कहा, और उसे सबक सिखाने की जरूरत बताई। अब अदालत में संजय राऊत के वकील यह कह रहे हैं कि उनके मुवक्किल ने किसी का नाम नहीं लिया था। जिस राजनीतिक दुस्साहस के साथ संजय राऊत ने यह हमला किया था, वह किनारे धरा रह गया। और अभी अदालत में आगे मुश्किल बाकी है क्योंकि हाईकोर्ट के जज इस बात पर अड़े हुए हैं कि हरामखोर लडक़ी किसे कहा गया, यह बताया जाए। 

यह कोई अनोखा बयान नहीं था, लेकिन यह बयान ेएक ऐसी अभिनेत्री के खिलाफ दिया गया था जिसके साथ आज केन्द्र सरकार खड़ी हुई है, और महाराष्ट्र में एक ताकतवर पार्टी भाजपा भी। इन दोनों के अलावा फिल्म उद्योग के कुछ या अधिक लोग भी उनके साथ खड़े हुए हैं, और महंगे वकीलों की सेवाएं तो हासिल हैं ही। ऐसे में हमला करके बचकर निकल जाना बहुत आसान नहीं होता। लोगों को याद होगा कि हाल ही के बरसों में अरविंद केजरीवाल को मानहानि के कुछ मुकदमों में दिल्ली में माफी मांगनी पड़ी थी, और यह पहले भी होते आया है जब बहुत से नेता अपनी कही हुई बातों को जायज नहीं ठहरा पाते, और अदालत के बाहर समझौता करते हैं, या अदालत में माफी मांगते हैं। जब भीड़ सामने होती है, कैमरे सामने होते हैं, माईक सामने होते हैं, तो लोग तेजी से अपना आपा खोने लगते हैं, ऐसे ही उत्तेजना के पल होते हैं जब लोग अवांछित बातें कह बैठते हैं जिन्हें साबित करना नामुमकिन होता है। अब कंगना रनौत के खिलाफ हजार दूसरी बातें हो सकती हैं, देश आज दो खेमों में बंटा है, और एक खेमा चूंकि उसके साथ है, इसलिए दूसरा खेमा उसके खिलाफ है। खिलाफ होने तक कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन जब नाजायज बातें कहकर हमला किया जाता है, तो वे बातें वहीं तक खप पाती हैं जब तक उन्हें अदालत में चुनौती नहीं दी जाती। 
यह बात महज नेताओं पर लागू नहीं होती, यह मीडिया के लोगों पर भी लागू होती है, और किसी के खिलाफ कोई अभियान जब गालियों की बैसाखियों पर चलता है, तो वह दूर तक नहीं चल पाता। जब गंदे विशेषणों से ही किसी के खिलाफ अभियान चलता है, तो वे विशेषण लंबी दूरी तक साथ नहीं देते। सत्य और तथ्य के बजाय जब लफ्फाजी की बातों से हमला किया जाता है, तो ऐसा हमला किसी को असली नुकसान नहीं पहुंचा पाता, पल भर को उन लोगों को तो खुश कर सकता है जो कि हमले के निशाने के पुराने विरोधी हैं। 

हमने देश भर में जगह-जगह, और छत्तीसगढ़ में भी मीडिया में, सोशल मीडिया में ओछी जुबान और झूठी बातों को लिखते लोगों को देखा है जिन्हें बाद में जाकर माफी मांगनी पड़ती है। ऐसी हरकत के लिए हिन्दी में एक भद्दी सी मिसाल दी जाती है, थूककर चाटना। लेकिन जो जरूरत से अधिक बड़बोले होते हैं, जिनका अपनी जुबान पर काबू नहीं होता, उन लोगों के साथ ऐसी दिक्कत आती रहती है। मीडिया में भी जो लोग गंदी जुबान के सहारे कुछ साबित करने की कोशिश करते हैं, वे अपनी जुबान को गंदा साबित करने के अलावा और कुछ नहीं कर पाते। ऐसे लोग चाहे जिस पेशे में हों, खुद तो कोई इज्जत नहीं कमा पाते, अपने संगठन या संस्थान को भी कोई इज्जत नहीं दिला पाते, बल्कि उनकी इज्जत भी अपने साथ-साथ मटियामेट करते हैं।
 
आज मसीहाई नसीहत लिखते हुए यहां मकसद सिर्फ एक है कि लोगों को याद दिलाना कि बड़े बुजुर्ग समझदार लोग यह मशविरा दे गए हैं कि दो-चार बाद सोचने के बाद ही कुछ बोलना चाहिए। जिस तरह कोई समझदार दुकानदार पहले लिखता है, फिर देता है, उसी तरह समझदार बोलने वाले पहले समझते हैं, सोचते हैं, फिर बोलते हैं। आज मुम्बई हाईकोर्ट में संजय राऊत जिस तरह फंसे हैं, उससे उनकी, और उनकी पार्टी की साख और मुम्बई में धाक, दोनों चौपट हो रही हैं। शिवसेना के हाथ कंगना के बड़बोलेपन, उसकी कही हुई ओछी बातों को लेकर एक बड़ा मुद्दा था, और इस मुद्दे को लेकर यह पार्टी कंगना और इस कंगने के पीछे के हाथों पर भी हमला बोल सकती थी, लेकिन आज वह अदालती कटघरे में खड़ी होकर बचाव देख रही है। इसलिए लोगों को कम बोलना चाहिए, सोच-समझकर बोलना चाहिए, और नाजायज बातें इसलिए नहीं बोलना चाहिए कि अदालत में उन्हें साबित नहीं किया जा सकता, और हो सकता है कि सामने वाले लोगों को महंगे वकील हासिल हों।  

(Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 28 सितंबर 2020


 

दीवारों पर लिक्खा है, 28 सितंबर 2020


 

कल के अफसर, आज के उम्मीदवार, पूरी तरह गलत

 बिहार में जैसी उम्मीद थी ठीक वैसा ही हुआ। पिछले कुछ महीनों से बिहार की चर्चा बाढ़ को लेकर, कोरोना को लेकर, बिहार में जुर्म को लेकर कम थी, मुम्बई में एक अभिनेता की मौत को लेकर अधिक थी, क्योंकि वह रातों-रात बिहार का गौरव करार दे दिया गया था, और बिहार में भारतीय जनता पार्टी ने इस अभिनेता की तस्वीर और नाम वाले स्टिकर भी छपवा लिए थे कि तुम्हें नहीं भुलाएंगे सुशांत। जब सुशांत की मौत की जांच मुम्बई पुलिस से छीननी थी, और बिहार में दर्ज की गई एफआईआर से यह काम नहीं हो पा रहा था, तो सीबीआई ने इस मामले को ले लिया, और पूरी तरह मुम्बई की एक मौत की जांच महाराष्ट्र सरकार की मर्जी के खिलाफ केन्द्र सरकार ने छीनकर सीबीआई को दे दी। लेकिन इस सिलसिले पर लिखना आज का मकसद नहीं है, आज का मकसद बिहार के कल तक के डीजीपी, और आज के सत्तारूढ़ पार्टी के सदस्य, और आने वाले कल के विधानसभा चुनाव उम्मीदवार गुप्तेश्वर पांडेय हैं। 

लोगों को याद होगा कि जिस तरह और जिस भाषा में गुप्तेश्वर पांडेय बिहार की तरफ से मुम्बई की एक फिल्म अभिनेत्री पर हमला बोल रहे थे, उसे देश के अधिकतर सभ्य लोगों ने एक असभ्य जुबान करार दिया था, और इसकी वजह से जल्द ही इस सबसे सीनियर बिहारी पुलिस अफसर को अपने शब्द वापिस भी लेने पड़े थे। लेकिन वापिस लेने के पहले वे अपना असर डाल चुके थे, वे नीतीश कुमार के प्रति इस डीजीपी की निजी निष्ठा को सीमा से अधिक साबित कर चुके थे, और आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए उन्हें एक दमदार उम्मीदवार साबित कर चुके थे। हुआ वही, नौकरी बाकी रहते हुए भी चुनावी घोषणा के ठीक पहले गुप्तेश्वर पांडेय ने इस्तीफा दिया, घंटों में वह मंजूर हुआ, और एक या दो दिन में वे सत्तारूढ़ पार्टी के मेम्बर बन गए, और विधानसभा सीट सहित उनके नाम की उम्मीदवारी की खबरें शुरू हो गईं। 

अब सवाल यह उठता है कि एक या दो दिनों के भीतर सरकारी अफसर अफसरी छोडक़र अपने ही कार्यक्षेत्र के भीतर चुनावी उम्मीदवार बन जाए, तो यह किस पैमाने पर सही कहा जा सकता है? सरकारी नौकरी के पैमाने पर, या चुनाव आयोग के पैमाने पर? अगर चुनाव आयोग के नियम ऐसी कोई रोक नहीं लगाते हैं, तो आयोग के नियम बदलने की जरूरत है। अगर भारत सरकार की इस एक सबसे बड़ी नौकरी के नियम ऐसी कोई रोक नहीं लगाते हैं, तो नौकरी के नियमों को बदलने की जरूरत है। हिन्दुस्तान की किसी अदालत का जज रिटायर होते ही उसी जगह उसी अदालत में वकालत शुरू कर दे, तो बहुत से ऐसे जज रहेंगे जो उसके मातहत रहते आए हैं, और वे उनकी पैरवी से असुविधा महसूस करेंगे। अगर कारोबार से जुड़े हुए किसी विभाग के बड़े अफसर रहे लोग नौकरी छोड़ते ही उस कारोबार में काम करने चले जाएं, तो उससे सरकार में एक गंदगी का माहौल बनना तय है। लोगों को याद होगा कि भिलाई स्टील प्लांट के एमडी रहे विक्रांत गुजराल नौकरी छोड़ते ही आनन-फानन बीएसपी के मुकाबले काम करने वाली जिंदल नाम की कंपनी में छत्तीसगढ़ में ही चले गए थे, और इसे बहुत से लोगों ने नाजायज माना था। सरकार या अदालत में ऐसी कुछ रोक रहती भी है, और रहनी भी चाहिए। लेकिन ऐसा लगता है कि यह रोक काफी नहीं रहती है, एक वक्त इंदौर के कलेक्टर रहते हुए अजीत जोगी को भी जब अर्जुन सिंह और राजीव गांधी ने राज्यसभा भेजना तय किया था, तो उनका इस्तीफा इसी तरह आनन-फानन रातों-रात मंजूर करके उन्हें राज्यसभा उम्मीदवार बनाया गया था। 

अब चुनाव आयोग या सुप्रीम कोर्ट को पहल करनी चाहिए, और दलबदल करके दूसरी पार्टी में जाने वाले लोगों पर कम से कम कुछ बरस चुनाव लडऩे पर रोक लगानी चाहिए। जनता के पैसों पर तनख्वाह पाने वाले, और बाद में पेंशन भी पाने वाले लोगों पर भी, जजों, अफसरों पर इस्तीफा देने के बाद अगले कुछ बरस तक चुनाव न लडऩे, निजी कारोबारों में नौकरी न करने, कंपनियों के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स न बनने की रोक लगनी चाहिए। सरकारी जुबान में इसे कूलिंग-ऑफ पीरियड कहा जाता है, और जहां आज नियमों में ऐसी बंदिशें नहीं हैं, वहां भी इन्हें लागू करना चाहिए। इसके बिना हितों का टकराव होता है। बिहार की ही मिसाल लें तो गुप्तेश्वर पांडेय की राजनीतिक महत्वाकांक्षा कुछ महीनों से उछाल मार रही थी। ऐसी चर्चा है कि उनकी विधानसभा सीट भी पहले से छांटी हुई है, तो ऐसे में पिछले महीनों में वे ऐसी ताकत की जगह पर थे कि उस विधानसभा सीट पर अपने पसंदीदा पुलिस अफसरों को तैनात कर पाते, वहां की खुफिया रिपोर्ट हासिल कर पाते, दूसरे संभावित उम्मीदवारों के खिलाफ जानकारी जुटा पाते, और यह सब कुछ अनैतिक आचरण की आशंकाओं में आता है। सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग को जनता के पैसों पर तनख्वाह, मेहनताना, भत्ता पाने वाले तमाम लोगों का कूलिंग-ऑफ पीरियड तय करना चाहिए, और उनके चुनाव लडऩे पर, नौकरी करने पर अपात्रता तय करनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 सितंबर 2020


 

देवताओं की धरती यूपी में दलितों से ऐसे गैंगरेप से कोई दिल नहीं हिलते?

 इंटरनेट पर समाचारों को देखना अखबारों में देखने से कुछ अलग होता है। बलात्कार की एक खबर पढ़ें, तो उसक खबर के बीच-बीच में बलात्कार के दूसरे मामलों के हॉटलिंक भी दिखते रहते हैं, अगर दिलचस्पी हो तो एक क्लिक करके उन दूसरी घटनाओं को भी पढ़ा जा सकता है। आज उत्तर भारत की एक घटना मीडिया में छाई हुई है कि दिल्ली से दो सौ किमी. दूर यूपी में एक दलित युवती के साथ गैंगरेप किया गया, उसे बुरी तरह पीटा गया, और कई हड्डियां टूट जाने के साथ-साथ उसकी जीभ भी कट गई है, हालत बेहद खराब है, और डॉक्टर उसे दिल्ली भेजने की जरूरत महसूस कर रहे हैं। चारों आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है जो कि ऊंची कही जाने वाली एक जाति के हैं। इस खबर को देखते हुए यूपी के ही कई दूसरे हॉटलिंक दिख रहे हैं, नाबालिग के साथ सामूहिक बलात्कार, दो गिरफ्तार, अगली खबर है- लखीमपुर के बाद गोरखपुर में किशोरी से रेप, सिगरेट से दागा शरीर। 

उत्तरप्रदेश दलितों के साथ ऐसी हिंसा और जुर्म का एक आम मैदान हो गया है। कहने के लिए तो राज्य के मुखिया योगी आदित्यनाथ हैं, लेकिन वे अपनी सोच और अपनी सरकार में जो रूख दिखाते हैं, वह सवर्ण हिन्दुत्व की आक्रामकता को बढ़ाने वाला है, और उसमें दलितों की कोई जगह नहीं है। लोगों को याद होगा कि इसी प्रदेश में भाजपा के विधायक, भाजपा के एक भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री बलात्कार के मामलों में लंबी मशक्कत के बाद गिरफ्तार हुए। एक मामले में तो भाजपा विधायक के खिलाफ बलात्कार की शिकायत करने वाली लडक़ी के कुनबे के कई लोगों को चुन-चुनकर मार डाला गया। यह प्रदेश कानून के राज को खो बैठा है। इसके तुरंत बाद का हाल देखें तो मध्यप्रदेश है जहां पिछले 15-17 वर्षों से लगभग लगातार भाजपा का राज चल रहा है, और लगातार दलितों पर हिंसा भी चल रही है। 

हिन्दुस्तान में जिन लोगों को लगता है कि जाति व्यवस्था खत्म हो गई है, उन्हें जुर्म के आंकड़ों का विश्लेषण करना चाहिए। जो जातियां हिन्दू समाज में सबसे नीचे समझी और कही जाती हैं, वे जुर्म का सबसे अधिक शिकार होती हैं। जो जातियां ऊंची समझी और कही जाती हैं, वे जुल्म के मामलों में मुजरिम अधिक होती हैं। और यह बात हम एक-दो मामलों को देखकर नहीं कह रहे हैं, यह आम रूख है, यह आम ढर्रा है कि जुल्म वाले अधिकतर जुर्म अधिक ताकतवर लोगों के हाथों कमजोर लोगों पर होते हैं, और ताकत के इस संतुलन में जातियों का एक बड़ा किरदार है। 

ये मामले वे हैं जो कि हिंसा आसमान तक पहुंच जाने के बाद छुपाए नहीं छुपते, और पुलिस तक पहुंच जाते हैं, मीडिया तक पहुंच जाते हैं। यूपी के जिस गंैगरेप की खबर से आज हमने यह लिखना शुरू किया है वह 14 सितंबर को हुआ, और आज मीडिया तक पहुंचा। जाहिर है कि दलित-आदिवासी या दूसरे किसी किस्म से कमजोर तबकों की खबरों को लंबा सफर करके मीडिया तक पहुंचना पड़ता है, और फिल्मी सितारों पर कैमरे फोकस करके बैठे मीडिया का कंधा थपथपाना पड़ता है कि हमारे साथ रेप हुआ है, हमें भी देखो। यह सिलसिला पूरे देश के लिए शर्मिंदगी का होना चाहिए, लेकिन ऊंची कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों के मन की बात में भी दलितों पर बलात्कार, उसके बाद उन्हें सिगरेट से जलाने, उनकी आंखें निकाल देने, उनकी हड्डियां तोड़ देने को जगह नहीं मिल पाती है। हिन्दुस्तान में ताकतवर तबकों और कमजोर तबकों के बीच फासला इतना लंबा है, बीच की खाई इतनी गहरी है कि संविधान नाम की एक किताब इस पर पुल बनकर काम नहीं कर पाती। 

यह पूरा सिलसिला एक राष्ट्रीय शर्म का मामला है कि जिस तबके को जोडक़र हिन्दू समाज अपनी आबादी अधिक बताता है, अपने समाज के भीतर उन दलितों के साथ समाज के ही गिनती में कम, ऊंची कही जाने वाली जातियों के लोग कैसा सुलूक करते हैं। आबादी बढ़ाने के लिए तो दलित हिन्दू हैं, लेकिन बलात्कार करते वक्त उनकी औरतें बस बदन हैं। इसके बाद भी लोग अपने आपको अपने धर्म पर गर्व करने वाला बताते हैं। लोगों को सोचना चाहिए कि गर्व करने के लिए कुछ बुनियादी बातें जरूरी होती हैं, क्या इस समाज में कमजोर बनी हुई और नीची कही-समझी जाने वाली जातियों पर होने वाले उच्च-वर्ण के जुल्म पर कोई चर्चा भी होती है? वह तो जब पुलिस के पास सिवाय जुर्म दर्ज करने के और कोई विकल्प नहीं बचता है, जब मामला उजागर हो ही जाता है, तभी जाकर दलितों पर जुल्म लिक्खे जाते हैं। उत्तरप्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कर्मकांडी धार्मिक हिन्दू हैं, और उनके चाहने वालों में से बहुत से लोग उनमें हिन्दुस्तान का अगला प्रधानमंत्री देखते हैं। आज उनकी सरकार में दलितों का क्या हाल है, यह भी देखने की जरूरत है। जिस देश की अदालतों के बड़े-बड़े जजों को अपनी इज्जत के लिए लंबे मुकदमे चलाने की फुर्सत है, वे यह भी देखें कि दलितों पर बलात्कार के मुकदमों में सजा का औसत क्या है, फैसलों का वक्त क्या है, और निचली अदालतों में मिली सजा का भविष्य ऊपर की अदालतों में क्या है?

(Daily Chhattisgarh)


बात की बात, 25 सितंबर 2020


 

दीवारों पर लिक्खा है, 26 सितंबर 2020


 

एक खास न्यूज चैनल के साथ कटघरे में सरकार ने धकेल दिया कई और को!

सुप्रीम कोर्ट में अभी एक महत्वपूर्ण मामला सुना गया, और अदालत ने उस पर कड़ा रूख दिखाते हुए एक हुक्म भी दिया। देश के सबसे साम्प्रदायिक-भडक़ाऊ चैनल, सुदर्शन टीवी को मुस्लिमों के खिलाफ नफरत फैलाने के लिए जाना जाता है। इसके तेवर किसी समाचार माध्यम से अलग, तलवार लेकर खड़ी हुई किसी फौज सरीखे दिखते हैं। जब इसने साम्प्रदायिकता उफनाते हुए एक कार्यक्रम प्रसारित करने की घोषणा की, तो वह घोषणा ही लोकतंत्र की बुनियादी समझ को हिला देने वाली थी। कुछ लोग इसके खिलाफ अदालत तक गए, और अदालत ने केन्द्र सरकार से भी जवाब-तलब किया। आज यहां लिखने का मुद्दा इसी जवाब को लेकर खड़ा हो रहा है जो कि केन्द्र ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को दिया। 

सुप्रीम कोर्ट ने सुदर्शन टीवी नाम के इस हमलावर चैनल के इस कार्यक्रम पर रोक लगाते हुए इस पूरे मामले पर सरकार से जब जवाब मांगा तो सरकार ने इस मुद्दे को लात मार-मारकर किनारे नाली में गिरा दिया, और अपना पूरा जवाब डिजिटल मीडिया पर काबू करने के बारे में दिया। डिजिटल मीडिया सुप्रीम कोर्ट में मुद्दा ही नहीं था, मुद्दा था टीवी चैनल। सरकार ने कहा कि प्रिंट और इलेक्ट्र्रॉनिक मीडिया को नियंत्रित करने के लिए तो देश में बहुत से नियम पहले से हैं, आज उनसे अधिक जरूरत डिजिटल मीडिया को नियंत्रित करने की है। यह कुछ उसी किस्म का हुआ कि अदालत ने वेलेंटाइन डे पर बाग-बगीचों में दोस्त या प्रेमीजोड़ों पर होने वाले हमलों के बारे में पूछा, और सरकार ने बगीचे के पेड़ों पर लगे कीड़ों के बारे में जवाब दिया। केन्द्र सरकार की इस खास टीवी चैनल के लिए हमदर्दी कोई सुप्रीम कोर्ट पहुंचकर ही नहीं दिखती, जहां पर इसका नाम लिए बिना भी केन्द्र सरकार ने इसे बचाने के लिए कमर कस रखी दिखती थी। केन्द्र ने पूरी बहस को पटरी से उतारने की पूरी कोशिश की, और पता नहीं सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार की इस नीयत और हरकत पर कोई कड़ी टिप्पणी की है या नहीं। ऐसी कोई बात हमारे पढऩे में नहीं आई है, लेकिन हम अपने पढ़े हुए को ही सब कुछ मानकर इस बारे में कोई टिप्पणी करना नहीं चाहते। 

देश के कई मीडियाकर्मियों ने केन्द्र सरकार की इस चतुराई को समझते हुए सवाल किया है कि जब मुद्दा एक टीवी चैनल को लेकर था, और केन्द्र सरकार टीवी चैनलों के लाइसेंस देने के लिए हजार किस्म के नियम लगाती है, बहुत कड़ी शर्तें रखती है, तब फिर किसी चैनल के ऐसे लगातार भडक़ाऊ और साम्प्रदायिक प्रसारण पर उसने उन नियमों के तहत क्या किया जिनका वह हवाला अपने हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट में दे रही थी? और मानो इस चैनल को कटघरे में अकेले छोडऩे के बजाय उसमें तमाम डिजिटल मीडिया को और ठेल दिया। 

अब सवाल यह है कि जिस देश में एक टीवी चैनल शुरू करने के लिए लाइसेंस पाने को लोगों को बरसों लग रहे हैं, और सरकार खुफिया रिपोर्ट से लेकर पुलिस रिपोर्ट तक तमाम चीजें जुटाती हैं कि कोई गलत व्यक्ति टीवी चैनल का मालिक न हो जाए, उस देश में एक चैनल इस तरह लगातार हिंसक और साम्प्रदायिक, और शाब्दिक अर्थों में तस्वीरों और वीडियो के साथ तलवार और कटार लिए हुए चैनल संपादक को दिखाते हुए हमलावर बना हुआ है, और उस पर कोई कार्रवाई करने के बजाय केन्द्र सरकार उसके इर्द-गिर्द दूसरे लोगों को संदिग्ध बताते हुए भीड़ लगा दे रही है, यह बात पूरी तरह हैरान करने वाली है, या सच कहें तो हैरान नहीं भी करती है। 

हिन्दुस्तान में मीडिया पर निगरानी रखने वाली तमाम संवैधानिक और निजी संस्थाएं पूरी तरह कागजी और बोगस साबित हो रही हैं। देश में पत्रकारिता के नीति-सिद्धांत तय करने और लागू करने का काम आखिरी बार श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन के वक्त हुआ था, जहां वह आंदोलन खत्म हुआ, वहां नीति-सिद्धांत भी उसके साथ ही दफन हो गए। उस वक्त देश के शहरों में वही कर्मचारी-संघ काम करता था, आज वह गायब हो गया, और अब प्रेस क्लब नाम की एक संस्था देश भर के शहरों में हर जगह काबिज हो गई जिसका पेशेवर नीति-सिद्धांतों से कोई लेना-देना नहीं है, और जो पत्रकारों के अपने हित की बात करने वाली, उनके मनोरंजन का ख्याल रखने वाली संस्था रह गई है। हालत यह है कि सुप्रीम कोर्ट में इसी केस में जब टीवी समाचार चैनलों के खुद के संगठन न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन में हलफनामा दिया, तो उसने कहा कि वह सिर्फ अपने सदस्यों के कामकाज के लिए जवाबदेह संगठन हैं, और यह चैनल एसोसिएशन का सदस्य नहीं है, इसलिए इस संगठन के कोई नियम-कायदे उस पर लागू नहीं होते।

अब यहां पर दूसरा सवाल यह उठता है कि इस एक समाचार चैनल को निशाना बनाने के बजाय देश के बाकी समाचार चैनलों की बात की जाए, तो उनमें से बहुतायत निहायत गैरजिम्मेदार साबित हो रहे हैं, और अपने आपको एक-दूसरे से और अधिक गैरजिम्मेदार बनाने पर आमादा हैं। पिछले दिनों एक चैनल के जीवंत समाचार-बहस प्रसारण में एक रिटायर्ड फौजी जनरल ने दूसरे पैनलिस्ट को खुलकर मां की गाली दी, और उस पर आज तक कोई कार्रवाई सुनाई नहीं पड़ी है। अब केन्द्र सरकार जिन नियमों के तहत देश भर के इक्का-दुक्का चैनलों को साल भर में एक-दो दिन प्रसारण रोकने, या माफीनामा दिखाने का हुक्म दे दी है, हमें तो याद नहीं पड़ता कि इस फौजी जनरल की सबसे मोटी गाली के बाद भी उस चैनल का लाइसेंस सस्पेंड हुआ हो, या उसे माफीनामा दिखाना पड़ा हो। सरकार प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक के लिए जिस किसी नियम-कायदे की बात अपने हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट में कह चुकी है, वे भी नामौजूद और बेअसर से हैं। 

देश में आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को लेकर लोगों के मन में बड़ा रंज है। इसी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक हिस्सा बाकी हिस्से के खिलाफ लगातार कह भी रहा है, और सोशल मीडिया तो उबला पड़ा है। इस खेल में, दर्शक संख्या वाली टीआरपी के इस खेल में प्रिंट मीडिया के करने का कुछ है नहीं। ऐसे में हम हाल के बरसों में कई बार लिखी गई अपनी बात दुहराना चाहते हैं कि आज के हिन्दुस्तानी समाचार टीवी चैनलों को देखते हुए यहां के प्रिंट मीडिया को अपने आपको मीडिया नाम के दायरे से बाहर ले आना चाहिए, और पहले की तरह अपने आपको प्रेस ही कहना चाहिए। बाकी रह गए मीडिया, और मीडिया नाम का शब्द अपना क्या करना चाहते हैं, वे देखते रहें। प्रेस नाम का शब्द अखबारों के लिए अधिक इज्जत का था, और आज भी मीडिया नाम के शब्द के मुकाबले प्रेस नाम का शब्द अधिक ईमानदार, अधिक साख वाला, और अधिक इज्जतदार बना हुआ है। केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जिस तरह अप्रासंगिक बात कहते हुए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की सुनवाई में सबको भागीदार बना दिया है, उसका विरोध कोई तभी कर सकेंगे जब वे मीडिया शब्द से बाहर आकर अपने पुराने नाम, प्रेस का इस्तेमाल शुरू करेंगे। 

(Daily Chhattisgarh) 

बात की बात, 25 सितंबर 2020


 

दीवारों पर लिक्खा है, 25 सितंबर 2020


 

गावस्कर का आत्मघाती मजाक खासा महंगा पड़ा

हिन्दुस्तानी क्रिकेट के एक बड़े नामी-गिरामी और इज्जतदार भूतपूर्व खिलाड़ी, वर्तमान कमेंटेटर सुनील गावस्कर अपनी एक लापरवाह एक टिप्पणी को लेकर ऐसे बुरे फंसे हैं कि उन्होंने कभी ऐसा सोचा भी नहीं होगा। गावस्कर का नाम तमाम विवादों से परे रहते आया है, और उनके बारे में यह कल्पना भी मुश्किल है कि वे किसी महिला पर ओछी बात कहेंगे या लिखेंगे, लेकिन उन्होंने ठीक यही किया है। अभी कमेंट्री करते हुए गावस्कर ने विराट कोहली के कमजोर खेल पर उन्होंने कहा- उन्होंने लॉकडाऊन में तो बस अनुष्का की गेंदों की प्रैक्टिस की है। 

इस ओछी बात पर अनुष्का शर्मा ने गावस्कर की जमकर खबर ली है। सोशल मीडिया पर अपने अकाऊंट में अनुष्का ने लिखा- मिस्टर गावस्कर आपकी बात बड़ी विचलित करने वाली है, और बहुत बुरे टेस्ट की है, लेकिन मैं चाहूंगी कि आप मुझे यह बताएं कि आपने किसी के खेल के लिए उसकी पत्नी को जिम्मेदार ठहराने वाला ऐसा बयान क्यों दिया? मुझे भरोसा है कि बीते बरसों में आपने हर खिलाड़ी के खेल पर टिप्पणी करते हुए उसकी निजी जिंदगी का सम्मान किया होगा। आपको यह नहीं लगता कि मेरे लिए, और हमारे लिए आपको वैसा ही सम्मान दिखाना चाहिए था? मुझे पूरा भरोसा है कि मेरे पति के खेल-प्रदर्शन पर टिप्पणी करने के लिए आपके पास बहुत से दूसरे शब्द और वाक्य हो सकते थे, यह 2020 का साल चल रहा है, और मेरे लिए चीजें अभी तक बदली नहीं हैं। कब तक ऐसी टिप्पणियां करने के लिए मेरे नाम को क्रिकेट में घसीटा जाता रहेगा? सम्माननीय मिस्टर गावस्कर, आप एक महान व्यक्तित्व हैं जिनका नाम जेंटलमैन लोगों के इस खेल में बड़ा ऊंचा माना जाता है। मैं आपको महज यह बतलाना चाहती थी कि जब मैंने आपको यह कहते सुना, मैंने क्या महसूस किया।

यह मामला हालांकि गिने-चुने शब्दों का है, लेकिन इस पर लिखने की जरूरत इसलिए लग रही है कि गिने-चुने शब्द कितने घातक हो सकते हैं, कितने आत्मघाती हो सकते हैं, इसकी यह एक शानदार मिसाल है। गावस्कर को लेकर आमतौर पर इज्जत से ही बात होती है, और यह भी हो सकता है कि वे जिस अंग्रेजी जुबान में कमेंट्री करते हैं, उस जुबान में बोलचाल में इस तरह की छूट लेने का रिवाज रहा हो। यह भी हो सकता है कि खिलाड़ी भावना की उम्मीद के साथ उन्होंने यह मजाक किया हो, लेकिन मजाक तभी तक मजाक रहता है जब तक वह जिसके साथ किया गया हो वह भी उसे मजाक की तरह ले। अगर उसने उसे अपमान की तरह ले लिया, तो फिर वह मजाक नहीं रह जाता, वह अपमान ही हो जाता है। 
हमारा ख्याल है कि गावस्कर इसमें बहुत बुरे फंसे हैं। क्रिकेट कमेंटेटर खेल के अलावा और भी बहुत सी मजाकिया बातें करते रहते हैं क्योंकि यह खेल हॉकी या फुटबॉल की तरह तेज रफ्तार नहीं होता जिसमें बोलते चले जाने पर भी वक्त कम पड़ता हो। क्रिकेट तो ऐसी मुर्दा रफ्तार का खेल है कि जिसमें आसमान के इन्द्रधनुष से लेकर दर्शकदीर्घा की सुंदरी की कान की बालियों तक कैमरे से दिखानी पड़ती है, और उसके बारे में बोला भी जाता है। ऐसे खेल में लगातार बोलते हुए इस एक चूक ने गावस्कर के लिए यह बड़ी शर्मिंदगी पैदा कर दी है। 

लेकिन हम इसके साथ-साथ एक दूसरी बात की वजह से भी इस मुद्दे पर आज यहां लिख रहे हैं। वैसे तो अभिनेत्री अनुष्का शर्मा की जितनी उम्र होगी, उतने बरस गावस्कर को क्रिकेट खेले, और छोड़े हो चुके होंगे। लेकिन अनुष्का ने इस मुद्दे को उठाकर महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक बड़ा बयान खड़ा किया है, जिसके बारे में सोचने की जरूरत है। हिन्दुस्तान का सोशल मीडिया, यहां का साहित्य, यहां के कार्टून, यहां के व्यंग्य, ये सब औरत और पत्नी को मजाक का सामान बनाकर चलते हैं। हम महिलाओं के साथ भाषा और समाज की सोच की ज्यादती पर अक्सर लिखते हैं। आज एक महिला ने जिस तरह गावस्कर की खबर ली है, उससे बहुत से और लापरवाह बड़बोले कुछ तो समझेंगे कि उनकी बेसमझी की बातें जरूरी नहीं हैं कि केवल लोगों को गुदगुदाकर शांत हो जाएं। वे बातें हो सकता है कि बूमरैंग की तरह घूमकर लौटें, और उसे चलाने वाले को ही जख्मी कर जाएं। गावस्कर की बात मजाक रहते हुए भी एक घटिया मजाक की तरह दोहरे मतलब वाली बात थी। उन्हें सुनने वाले तमाम लोगों ने उनके शब्दों से अनुष्का के बारे में क्या कल्पना की होगी, यह सोचना कोई मुश्किल काम नहीं है। इसलिए एक महिला ने, गावस्कर के मुकाबले बड़ी कमउम्र की महिला ने जिस तरह से उन्हें जवाब दिया है, वह भी बड़ा शानदार कदम है। लोगों को अपने अधिकार और अपने सम्मान के लिए ऐसे ही चौकन्ना रहना चाहिए। यह बात सिर्फ व्यक्ति और निजी स्तर की बात नहीं है, यह सार्वजनिक रूप से कही गई बात है, और महिलाओं के सारे तबके को अपमानित करने वाली बात है। 

कुछ शब्दों से खड़े हुए इस विवाद को लेकर यह समझने की जरूरत है कि जब माईक पर लगातार बोलने के लिए ही दसियों लाख रूपए मिलते हों, तब भी चटपटी और गुदगुदी बात कहते हुए यह तौल लेना चाहिए कि वह कितनी घातक हो सकती है। दूसरी बात यह कि अगर आपके खिलाफ किसी बड़े ने भी ओछी बात कही है, तो उसका विरोध करना चाहिए, न कि बुजुर्गियत का सम्मान करते हुए मन मारकर चुप बैठ जाना चाहिए। आज सोशल मीडिया की मेहरबानी से समर्थन या विरोध करने के लिए लोग तुरंत जुट जाते हैं, और विराट कोहली और अनुष्का शर्मा के प्रशंसकों ने तुरंत ही गावस्कर को कमेंटरी से हटाने की मांग उठा दी है। लेकिन अपनी लड़ाई महज दूसरों के कंधों पर नहीं छोडऩी चाहिए, लोगों को खुद भी प्रतिकार करना चाहिए, और इतना हौसला दिखाने के लिए अनुष्का शर्मा बड़ी तारीफ की हकदार है।  

(Daily Chhattisgarh) 

बात की बात, 24 सितंबर 2020


 

दीवारों पर लिक्खा है, 24 सितंबर 2020


 

पासवर्ड से अधिक भरोसा करें सरकारों की बदनीयत पर...

देश में किसानों और मजदूरों के हितों के खिलाफ कहे जा रहे कानून थोक में बन रहे हैं, और संसद में उन्हें विपक्ष की गैरमौजूदगी में ध्वनिमत से इस तरह पारित किया जा रहा है कि मानो कपिल शर्मा के कॉमेडी शो में नामौजूद दर्शकों की रिकॉर्ड की हॅंसी और खिलखिलाहट बजाई जा रही हो। दूसरी तरफ देश के टीवी चैनलों पर किसानों और मजदूरों को कोई जगह न मिल जाए इसलिए कंगना और नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो मिलकर तमाम बुलेटिनों को भर दे रहे हैं, और मानो दीपिका पादुकोन का चेहरा काफी न रहा हो, उसके वॉट्सऐप की बातचीत भी एक-एक शब्द मीडिया में आ रही है। ऐसे चटपटे मौके पर भला मीडिया के अपने नीति और सिद्धांत की बात सोचकर भला किस चैनल को भूखे मरना है, चैनल वाले क्या किसानों के साथ टंग जाएं? 

लेकिन अभी जो जानकारी सामने आ रही है, उसे कुछ और खबरों के साथ जोडक़र देखना जरूरी है। गुजरात के आकार पटेल नाम के एक पत्रकार या सामाजिक कार्यकर्ता के तीन ट्वीट को लेकर एक जुर्म दर्ज हुआ है कि उन्होंने जातिवादी नफरत फैलाने की कोशिश की है। उन्हें पुलिस ने अपना मोबाइल फोन जमा कराने के लिए कहा है। लोगों को याद होगा कि देश के एक और प्रमुख शांतिप्रिय लेखक, दिल्ली के प्राध्यापक अपूर्वानंद को भी पुलिस ने हिंसा भडक़ाने के आरोप में अपना फोन जमा कराने का नोटिस दिया है। 

यहां हमारी फिक्र सिर्फ यह है कि आज सोशल मीडिया पर किसी की लिखी गई महज एक लाईन के खिलाफ देश में कहीं भी एक एफआईआर दर्ज की जा सकती है, उसके बाद वहां की पुलिस या जांच एजेंसी ऐसे मोबाइल को, लैपटॉप या कम्प्यूटर को जब्त कर सकती है। लेकिन जब्त करने के साथ ही उस व्यक्ति की पूरी निजी जिंदगी उस जांच एजेंसी के हाथ रहेगी, और उसकी जानकारी इसी तरह छांट-छांटकर मीडिया में लीक की जा सकेगी जिस तरह पिछले चार दिनों में संसद की खबरों के मुकाबले मोर्चे पर तैनात करने के लिए मुम्बई के नशे के संदेश खड़े किए जा रहे हैं। 

लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि उनके फोन पर से मिटाई जा चुकी हर बात को वापिस हासिल किया जा सकता है, उनके हर संदेश, हर फोटो या वीडियो को वापिस लाया जा सकता है। बहुत से लोग इस धोखे में हैं कि वॉट्सऐप पर संदेश सुरक्षित रहते हैं। वे सुरक्षित तभी तक रहते हैं जब तक फोन या कम्प्यूटर पुलिस या जांच एजेंसी के हाथ न लग जाए। एक बार हाथ लगे उपकरण तमाम राज उगल देते हैं, मिटाए हुए भी, बंद किए हुए खातों के भी, और आपके साथ-साथ आपके आसपास के तमाम लोगों को एक मोबाइल फोन हमाम के तमाम नंगे बनाकर रख देता है। 

आज फिक्र महज यह नहीं है कि आपको कोई जुर्म कर रहे हैं या नहीं, आज फिक्र यह भी है कि आपके खिलाफ कहीं कोई एक फर्जी रिपोर्ट लिखा दे, आपके फोन-कम्प्यूटर जब्त हो जाएं, आपके ई-मेल और सोशल मीडिया खाते जांच एजेंसी के हाथों खुल जाएं, और उनके सारे नए-पुराने संदेश, रखे हुए या मिटाए हुए फोटो-वीडियो, सब कुछ राजनीतिक ताकतों के हाथ लग जाएं। अभी कल ही छत्तीसगढ़ में भाजपा के एक प्रवक्ता की फेसबुक पोस्ट पर कांग्रेस के नेताओं ने पुलिस में शिकायत की है, और इस आदमी के फोन-कम्प्यूटर जब्ती से बस एक कदम दूर खड़े हैं।
 
अब हालत यह है कि लोगों की जासूसी करने के लिए लोगों के फोन सुनना, उनके कॉल डिटेल्स निकालना, ऐसे नाजुक काम करने का खतरा भी उठाने की जरूरत नहीं है। हिन्दुस्तान में तो इतने धर्म हैं और लोगों की धार्मिक भावनाएं कदम-कदम पर आहत होती रहती हैं, इतनी जातियां हैं कि लोग किसी भी बात को अपनी जाति के खिलाफ नफरत फैलाने की हरकत मान सकते हैं, इसके बाद लोगों के निजी फोन-कम्प्यूटर जब्त करना आसान बात हो जाती है। 

हमने इस कॉलम में भी, और इस अखबार के दूसरे स्तंभों में भी एक अमरीकी फिल्म ‘एनेमी ऑफ द स्टेट’ का जिक्र किया है जो कि सन् 2000 में जारी हुई थी, और जिसमें एक नौजवान वकील के पीछे अमरीका की सरकार का एक ताकतवर मंत्री सरकार की तमाम एजेंसियों को लेकर टूट पड़ता है, और किस तरह उसकी जिंदगी का हर पल नंगा कर दिया जाता है, किस हद तक उसकी निगरानी होती है, किस तरह उसके घर के चप्पे-चप्पे पर माइक्रोफोन और कैमरे लगा दिए जाते हैं, उसका पीछा किया जाता है। यह कल्पना तो किसी ने 2000 के खासे पहले की होगी तभी 2000 में यह फिल्म बनकर जारी हो गई थी। आज के हिन्दुस्तान में अगर सरकार अपनी कानूनी और गैरकानूनी ताकत को लेकर किसी पर इस तरह टूट पड़े, तो सबसे आसान बात रहेगी उस व्यक्ति या उसके किसी करीबी के खिलाफ ऐसी रिपोर्ट दर्ज कराई जाए जिससे उसके फोन और कम्प्यूटर जब्त हो सकें। 

हम यह बात लोकतंत्र को हांकने वाली सरकारों की जानकारी के लिए नहीं लिख रहे हैं, सरकारों को तो इसकी तमाम जानकारी है कि इस हथियार का कैसे इस्तेमाल किया जाए, हम इसे उन लोगों के लिए लिख रहे हैं जो अपने लिखने और बोलने की वजह से, सडक़ों पर आंदोलन करने की वजह से सरकारों की नजरों में खटकते हैं, और जिनके खिलाफ उनके फोन-कम्प्यूटर को खड़ा करना आसान काम है। लोगों को अपने औजारों से ज्यादा सरकारों की नीयत पर भरोसा होना चाहिए, और अपने तौर-तरीके एकदम से काबू में रखना चाहिए। जहां तक पिछली बातों को मिटाने का सवाल है, तो इंटरनेट पर इसके लिए कई किस्म की सलाह मौजूद है, और लोग अपने इतिहास को थोड़ा सा कम तो कर सकते हैं, पूरा चाहे न मिटा सकें। जो लोग फोन और कम्प्यूटर पर कुछ नाजुक बात करते हैं, काम करते हैं, उन्हें ऐसी किसी जब्ती के पहले एक स्वच्छता पखवाड़ा चलाना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 23 सितंबर 2020


 

आंकड़ों की महिमा अपार, पर उनसे सवाल भी जरूरी

  इन दिनों पत्रकारिता में एक नई शैली आगे बढ़ रही है, डाटा-जर्नलिज्म। आंकड़ों का विश्लेषण करके कोई नतीजा निकालना, और उसके आधार पर समाचार या रिपोर्ट तैयार करना, कोई विश्लेषण करना या विचार लिखना। डाटा-जर्नलिज्म के साथ दो चीजें जुड़ी रहती हैं जिनकी वजह से वह आम अखबारनवीसों या दूसरे किस्म के पत्रकारों के लिए, मीडियाकर्मियों के लिए कुछ मुश्किल होता है, उसके लिए गणित की जानकारी जरूरी है, और आंकड़ों के विश्लेषण के तरीके भी आने चाहिए। यह तो बुनियादी औजार हुए, इसके बाद फिर समाचार की एक समझ होनी चाहिए कि इन आंकड़ों से किया क्या जाए, इनसे कैसे नतीजे निकाले जा सकते हैं, इनके आधार पर कैसी तुलना हो सकती है। जिन लोगों को सांख्यिकी की समझ न हो, और अखबारनवीस की नजर न हो, उनके लिए आंकड़े ऊन का उलझा हुआ गोला रहते हैं जिन्हें सुलझाना उनके बस का नहीं रहता। 

आज इस पर चर्चा की जरूरत इसलिए हो रही है कि दुनिया और देश-प्रदेश में कोरोना से जुड़े हुए आंकड़ों को लेकर रोजाना खूब सारे ग्राफ और चार्ट बन रहे हैं, विश्लेषण हो रहे हैं कि किस प्रदेश में कोरोना सबसे अधिक रफ्तार से बढ़ रहा है, कहां पर मौतें अधिक हो रही हैं। लेकिन लोग संख्याओं की तुलना करते हुए अधिकतर जगहों पर इस बात की तुलना नहीं करते कि ये आंकड़े आबादी के अनुपात में हैं या नहीं। होता यह है कि सबसे अधिक आबादी वाले यूपी-बिहार के आंकड़ों की तुलना अगर सीधे-सीधे सिक्किम-अरूणाचल के आंकड़ों से कर दी जाएगी, तो उन आंकड़ों से कोई मतलब नहीं निकलेगा। चाहे कोरोना पॉजिटिव का मामला हो, चाहे मौतों का, इन तमाम आंकड़ों को जब तक प्रति लाख या प्रति दस लाख आबादी के साथ जोडक़र उनकी तुलना नहीं की जाएगी, वे एक झूठी तस्वीर पेश करने वाले आंकड़े रहेंगे। 

डाटा-जर्नलिज्म इसीलिए एक अपेक्षाकृत नई ब्रांच है, और वह लोगों के मन से लिखी जाने वाली बातों के मुकाबले अधिक वैज्ञानिक तथ्य सामने रखने वाली पत्रकारिता है। यह भी जरूरी है कि इस औजार के साथ-साथ सामाजिक जमीनी हकीकत की समझ भी हो, और उसे ध्यान में रखते हुए आंकड़ों का विश्लेषण किया जाए। अब लगातार तरह-तरह के कोर्स हो रहे हैं कि डाटा-जर्नलिज्म कैसे हो। जो बड़े मीडिया हैं, उनमें रोज ही आंकड़ों के आधार पर चार्ट और ग्राफ, नक्शे और बक्से बनाए जाते हैं जिनसे एक नजर में लोग निष्कर्ष निकाल सकते हैं। इंफोग्राफिक नाम से बहुत से ऐसे सांख्यिकीय तुलनात्मक अध्ययन इन दिनों चलन में है जिनसे लंबे-लंबे लिखे हुए तथ्यों के मुकाबले बात अधिक आसानी से समझ में आ जाती है। 

लेकिन डाटा-जर्नलिज्म का एक बड़ा खतरा यह है कि अगर कम समझ के साथ आंकड़ों से खिलवाड़ किया गया तो एक गलत तस्वीर निकलकर आ सकती है, और पाठकों में से तो बहुत ही कम लोग इतनी गहरी समझ वाले रहते हैं कि आंकड़ों के साथ-साथ देशों की आबादी, या प्रदेशों की आबादी के अनुपात में उन आंकड़ों को तौल सकें। इसलिए जहां कहीं कोई मीडिया आंकड़ों की अखबारनवीसी कर रहे हों, वहां उनमें एक गहरी समझ भी जरूरी है। आज तो हाल यह है कि भारत सरकार या प्रदेशों की सरकारें भी जिन आंकड़ों को सामने रख रही हैं, वे सही परिप्रेक्ष्य में नहीं तौले जाते हैं। अब जैसे प्रति दस लाख आबादी पर कोरोना के कितने टेस्ट हुए, यह बात तो इसी सही तरीके से इसलिए तौली जा रही है कि इसका एक अंतरराष्ट्रीय पैमाना चले आ रहा है, और बाकी दुनिया के आंकड़ों के विश्लेषण देखते हुए हिन्दुस्तान में भी आबादी और जांच का अनुपात देखा जा रहा है। लेकिन उससे परे जब प्रदेशों में मिलने वाले कोरोना के नए आंकड़े देखे जाएं, या होने वाली मौतों को लेकर प्रदेशों की तुलना हो, तो मामला गड़बड़ा जाता है। तीन करोड़ से कम आबादी वाला प्रदेश और दस करोड़ से अधिक आबादी वाला प्रदेश भी एक-एक प्रदेश ही गिनाते हैं, और उनमें मौतें भी अगल-बगल रखकर गिन दी जाती हैं, बिना यह देखे कि इनके आबादी का फर्क क्या है। छोटे अखबारों और दूसरे छोटे मीडिया कारोबार में सांख्यिकी के जानकार अलग से नहीं रखे जा सकते, इसलिए वहां तो दूर, बड़े-बड़े अखबारों में भी आंकड़ों की पकी-पकाई तुलना को परखने का काम कोई नहीं करते। कम से कम आम पाठक को इस बात के लिए जागरूक करना चाहिए कि वे बहुत से दूसरे पैमानों को ध्यान में रखते हुए ही पेश किए गए चुनिंदा आंकड़ों से कोई निष्कर्ष निकालें। पत्रकारिता की पढ़ाई में भी डाटा-जर्नलिज्म अनिवार्य रूप से पढ़ाना चाहिए क्योंकि अब कम्प्यूटरों के अधिक से अधिक इस्तेमाल के साथ यह काम बढ़ते जाना है। 

(Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 22 सितंबर 2020


 

दीवारों पर लिक्खा है, 22 सितंबर2020


 

सत्ता की गुंडागर्दी बिना सजा न खप जाए, यह पुख्ता इंतजाम हो

 उत्तरप्रदेश में जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अपने शहर गोरखपुर में ऑक्सीजन की कमी से बड़ी संख्या में बच्चे मारे गए थे, तब खबरों में आए एक लोकप्रिय और समर्पित चिकित्सक डॉ. कफील खान को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अभी कुछ दिन पहले रिहा किया। उन्हें महीनों से योगी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जेल में डाल रखा था। हाईकोर्ट ने उन्हें हिरासत में लेने को पूरी तरह गैरकानूनी बताया। गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के शिशुरोग विशेषज्ञ डॉ.कफील खान को नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ एक प्रदर्शन में हिस्सा लेने पर छह महीने पहले योगी सरकार ने गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया था, और अभी फिर उनकी हिरासत को तीन महीने के लिए बढ़ा दिया था जिसे हाईकोर्ट ने पूरी तरह गैरकानूनी करार दिया है। 

अब सवाल यह उठता है कि बाढ़ और पानी में घूम-घूमकर लोगों का इलाज करने वाले इस डॉक्टर के जो छह महीने जेल में गुजरे हैं, उनका क्या होगा? खासकर उस हालत में जब इसके पीछे सरकार की बदनीयत की बात पहले दिन से उठाई जा रही थी, और अदालत में एक किस्म से यह साबित भी हुई है। एक पेशेवर डॉक्टर मुसीबत के इन छह महीनों में मरीजों की सेवा करने के बजाय एक फर्जी मामले में जेल में रखा गया, क्या इस पर सरकार को सजा देने का कोई कानून नहीं होना चाहिए? क्योंकि लोकतंत्र में अगर सरकार ही बदनीयत हो जाए, उसकी मशीनरी बेईमानी और धोखे से, दबावपूर्वक या कपट से गवाह और सुबूत जुटाकर, या इसके भी बिना कोई कार्रवाई करे, तो उससे बड़ी अदालत से राहत मिलने के पहले तक तो और कोई बचाव नहीं हो सकता। ऐसा सिर्फ डॉ. कफील के केस में नहीं हुआ है, हमारे बहुत करीब छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी दर्जनों मामलों में ऐसा हुआ है जिनमें देश के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं को, राजनीतिक नेताओं को झूठे मामलों में फंसाया गया, और कम से कम ऐसे एक मामले में तो अभी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राज्य की रमन सरकार के वक्त दर्ज किए गए फर्जी मामलों पर देश के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं को नगद मुआवजा भी दिलवाया है। एक तरफ तो कहां इन लोगों को रमन सरकार के बस्तर के आईजी कल्लूरी ने झूठे मामलों में उलझाया था, बरसों तक ये लोग मामला झेलते रहे, और अब उसका मुआवजा मिला है। 

हमारा यह भी मानना है कि सरकार में बैठे लोग जब कोई कार्रवाई करते हुए बदनीयत के लिए पकड़े जाते हैं, तो उनके सर्विस रिकॉर्ड में ऐसे मामलों को दर्ज किया जाना चाहिए, उनकी पदोन्नति के वक्त उनकी ऐसी हरकतें आड़े आनी चाहिए, उन पर जुर्माना लगना चाहिए, और इन दिनों मोदी सरकार जिस तरह अफसरों को तीस बरस की नौकरी या पचास बरस की उम्र के बाद रिटायर करने की बात कर रही है, तो उसमें ऐसे अफसरों के बारे में अनिवार्य रूप से सोचने की एक प्रक्रिया लागू की जानी चाहिए। जिन अफसरों के खिलाफ महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, अदालतों ने टिप्पणियां की हैं, उन तमाम अफसरों के सर्विस रिकॉर्ड में, या जिसे सीआर कहा जाता है उसमें, ऐसे कागजात अनिवार्य रूप से लगाए जाने चाहिए, और इस बात की भी गारंटी करनी चाहिए कि जिस तरह के हालात में, जिस तरह के इलाकों में, जिस तरह के लोगों के साथ इन अफसरों ने ऐसा सुलूक किया है, उनके बीच इनकी कभी पोस्टिंग न हो। इस मामले में सामाजिक कार्यकर्ता भी एक काम कर सकते हैं कि वे सरकार और अदालत, या राजभवन जैसी संवैधानिक संस्था के पास लिखित शिकायत दे सकते हैं कि ऐसे अफसरों के रिकॉर्ड में इन बातों कों दर्ज किया जाए। सीआर देखने का काम ऐसे अफसरों के सीनियर ही करते हैं, और वे लोग आमतौर पर अपने साथी अफसर, अपने मातहत अफसर के साथ रहमदिली दिखाने का काम करते हैं। सरकार को इसके खिलाफ भी एक तंत्र बनाना चाहिए, और एक पारदर्शी जनभागीदारी शुरू करनी चाहिए जिसमें किसी कर्मचारी या अधिकारी के खिलाफ शिकायतें, भ्रष्टाचार के मामले, ज्यादती के मामले, गैरकानूनी बर्ताव के मामले लोग दर्ज करवा सकें, और सीआर लिखने वाले सीनियर पर यह बंदिश रहे कि वे उन्होंने देखने के बाद ही सीआर लिखें। आज बंद कमरे में, बंद फाईल में लिखी गई सीआर दो लोगों के बीच का एक आपसी सहमति का दस्तावेज भर रह जाता है। 

छत्तीसगढ़ के बस्तर में ऐसे दर्जनों केस हुए हैं जिनमें सुरक्षाबलों ने गरीब और निहत्थे आदिवासियों की बस्तियां जला दीं, ये मामले अदालत या मानवाधिकार आयोग में भी गए, वहां इन ज्यादतियों की शिकायतों को सही भी पाया गया, लेकिन हुआ क्या? कुछ भी नहीं। इसी प्रदेश में कई बड़े-बड़े पुलिस अफसरों पर देह शोषण के आरोप लगे, मातहत के शोषण के आरोप लगे, लेकिन हुआ क्या? कुछ भी नहीं। पिछली रमन सरकार के रहते हुए ऐसे एक भी अफसर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई, हर किसी को बचाया गया, और आज भूपेश सरकार आने के बाद भी वही रूख जारी है। 

हमारा ख्याल है कि जनता के बीच के लोग अगर राज्यपाल, हाईकोर्ट, और राज्य सरकार से लिखकर कहेंगे कि ऐसे लोगों के रिकॉर्ड में ये मामले दर्ज किए जाएं, और ऐसा न करने पर सरकार में बैठे लोग अपनी संवैधानिक या कानूनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करेंगे, गुनाह में भागीदार रहेंगे, तो इन बातों का कुछ असर हो सकता है। बस्तर के जिस मामले में नंदिनी सुंदर से लेकर संजय पराते तक, बहुत से सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को अभी मुआवजा मिला है, उस मामले में झूठी तोहमतों में फंसाए गए ये तमाम लोग ऐसी पहल करने में सक्षम लोग हैं, और उन्हें हर स्तर पर कोशिश करनी चाहिए। हो सकता है कि इसी से एक ऐसी नजीर बन जाए जो आगे काम आए। लोकतंत्र में हर किस्म के अधिकार किसी न किसी एक मामले से शुरू होकर ही आगे बढ़ते हैं, सूचना का अधिकार भी ऐसे ही बना था, और दूसरे कई लोकतांत्रिक कानून भी। इसलिए सरकार में बैठे लोग जब गुंडागर्दी करते हैं, जब जुर्म करते हैं, तब उनको सजा मिलने का एक पुख्ता ढांचा तैयार करना चाहिए, और उनके मामले इकट्ठा करने के लिए जनभागीदारी को एक अहमियत की बात मानना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

सेक्स वर्करों को मदद करने का सुप्रीम कोर्ट, का साहसिक आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने देश में देह बेचने वाले लोगों की मदद करने का एक हौसला दिखाया है। देश में लॉकडाऊन के लंबे महीनों के दौरान सेक्स का कारोबार बंद सरीखा रहा है। ऐसे में उनके बुनियादी नागरिक हकों के लिए एक याचिका दायर की गई थी जिस पर अदालत ने केन्द्र और तमाम राज्यों को सेक्स वर्करों को सभी बुनियादी सुविधाएं देने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा है कि सेक्स वर्करों को राशन कार्ड के बिना राशन दिया जाए, और बुनियादी जरूरतें मुहैया कराई जाएं। जस्टिस एल.नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि अधिकारी सेक्स वर्करों को राहत देने के लिए ऐसे कदम उठाने पर विचार कर सकते हैं जो ट्रांसजेंडर समुदाय की मदद के लिए उठाए गए हैं। देश भर में हजारों ट्रांसजेंडरों को केन्द्र सरकार की ओर से 15 सौ रूपए महीना गुजारा भत्ता दिया जा रहा है। 

हम सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को इस मायने में बहुत क्रांतिकारी मान रहे हैं कि उन्होंने एक ऐसे तबके के मदद करने के लिए कहा है जिसको आज भी हिन्दुस्तान में मुजरिम माना जाता है। हम अपने आसपास आए दिन देखते हैं कि वेश्यावृत्ति में लगी हुई महिलाओं को किस तरह कभी उनके दलाल के साथ, तो कभी ग्राहकों के साथ गिरफ्तार किया जाता है। इसलिए आज अदालत अगर उनके मुजरिम होने का जिक्र किए बिना उनके बुनियादी नागरिक अधिकारों का जिक्र करते हुए उनकी मदद करना सरकार की जिम्मेदारी करार दे रही है तो यह एक हौसले का, और कल्याणकारी आदेश है। यह मुकदमे में आखिरी फैसला नहीं है, यह अगली सुनवाई तक का आदेश है। हमारा ख्याल है कि यह वेश्याओं को इंसान मानने का एक रूख है जिसे आगे बढ़ाना चाहिए। 

इस देश में वेश्यावृत्ति को कानूनी दर्जा देने की बात एक राजनीतिक फैसला होगी, और राजनीतिक दल देश की इस जमीनी हकीकत को अनदेखा करते हुए अपना सिर रेत में घुसाए रहेंगे कि मानो वेश्यावृत्ति इस देश में होती ही नहीं है। आज हालत यह है कि दसियों लाख महिलाएं इस देश में अपनी देह बेचकर ही जिंदा हैं। वेश्यावृत्ति को कानूनी दर्जा न मिलने से यह एक जुर्म है, और जुर्म होने से इस पर पलने के लिए दलालों से लेकर  सरकारी अमले तक बहुत से लोग मैदान में रहते हैं। इलाकों के मवाली, कई किस्म के नेता, पुलिस, और सरकार के दूसरे लोग अपने इलाकों में चलने वाले चकलों को एक दुधारू गाय की तरह दुहते रहते हैं। शायद यह भी एक वजह है कि कोई भी वयस्क वेश्यावृत्ति को जुर्म के दायरे से बाहर निकालना नहीं चाहते, क्योंकि जैसे ही लोगों को अपनी देह बेचने का कानूनी हक मिल जाएगा, उनसे अवैध उगाही बंद हो जाएगी। 

हम आज जिंदा रहने के लिए जरूरी मदद वाले इस अदालती आदेश का ऐसा कोई क्रांतिकारी विस्तार नहीं देखते कि इससे वेश्यावृत्ति के कानूनी दर्जे तक बात जा पाएगी। अभी तो एक खतरा यह है कि जैसे ही कोई महिला या पुरूष अपने आपको सेक्स वर्कर बताते हुए सरकारी अनाज के लिए जाएंगे, वैसे ही सरकार के पास एक रजिस्टर बनते जाएगा कि अनाज देने के बाद आगे किन पर कार्रवाई करनी है। सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा आदेश से स्थानीय अधिकारियों के हाथ आगे उगाही का एक रजिस्टर लग जाएगा। आज का अदालती आदेश ऐसे किसी खतरे को देखते हुए नहीं दिया गया है, और अपने आपको सेक्स वर्कर घोषित किए बिना अनाज या कोई दूसरी मदद मिल भी नहीं सकती। 

आज अदालत ने इस सिलसिले में आदेश देते हुए एक चूक भी की है कि किसी मदद के संदर्भ में उसने ट्रांसजेंडरों की मिसाल दी है। देश में ट्रांसजेंडरों से लोगों को जो परहेज है, उनमें से एक यह भी है कि उनमें से कुछ या कई लोग सेक्स वर्करों की तरह काम भी करते हैं। यह बात ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग भी मानते हैं कि उनके कुछ लोग देह सेवा बेचते हैं। अब आज अदालत ने सेक्स वर्करों के संदर्भ में ट्रांसजेंडरों की मिसाल देकर एक सामाजिक चूक की है और लोग इन दोनों तबकों को एक ही किस्म का मान बैठेंगे। 

खैर, इन तमाम बातों से परे यह लिखने की जरूरत है कि जब सेक्स वर्कर को सेक्स वर्कर मानते हुए मदद का हकदार माना जा रहा है, तो फिर उस सेक्स-वर्क को जुर्म कैसे माना जाए? लोगों को याद है कि अंग्रेजों के वक्त से समलैंगिकता को जुर्म बनाने का सिलसिला अभी पिछले बरसों तक जारी था, और हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को जुर्म के दायरे से बाहर किया है। वेश्यावृत्ति के मामले में अगर देश की इन दसियों लाख महिलाओं और शायद हजारों पुरूषों को इंसानों की तरह रहने देना है, तो इसे कानूनी बनाना चाहिए ताकि इन्हें हिफाजत मिल सके, इनकी सेहत की जांच हो सके, और इनके ग्राहकों की सेहत भी बची रह सके। यह एक बड़ा मुद्दा है, और महिलाओं के कुछ हिमायती भी हमारी इस सोच के खिलाफ हैं, बहुत से महिला आंदोलनकारियों को यह कानूनी दर्जा महिलाओं को नुकसान पहुंचाने वाला लगता है, और इस पर एक व्यापक सार्वजनिक बहस होनी चाहिए। आज सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश की बड़ी छोटी सीमाओं के भीतर ही हमें ऐसी विस्तृत और विशाल बहस की संभावना दिखती है। सुप्रीम कोर्ट ने आज महज जिंदा रखने के लिए इनके पक्ष में यह आदेश दिया है, लेकिन यह सेक्स वर्करों को अपराधी के दर्जे से अलग करने की सोच दिखाता है। उसी को आगे बढ़ाने की जरूरत है।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 21 सितंबर 2020


 

दीवारों पर लिक्खा है, 20 सितंबर 2020


 

इस एक हिंसा से उठे हैं बच्चों की संख्या के मुद्दे

जब कभी यह लगने लगता है कि हैवानियत अब इससे अधिक कुछ नहीं हो सकती, कुछ नए मामले सामने आकर खड़े हो जाते हैं, और पूछने लगते हैं-हमारे बारे में नहीं सोचा था? 

कल रात एक खबर आई कि एक नौजवान ने अपने बाप को गोली मार दी ताकि उसकी जायदाद पर कब्जा कर सके। दूसरी तरफ कल ही रात यह खबर आई कि एक पंडित ने एक गर्भवती महिला के बारे में जब यह भविष्यवाणी की कि उसकी छठीं संतान भी लडक़ी ही होने वाली है, तो उसके पति ने हंसिया लेकर पेट काटना शुरू कर दिया ताकि देख सके कि भीतर लडक़ा है या लडक़ी। 

अपने आपको इंसानियत से भरपूर समझने वाले लोगों के भीतर खासा हिस्सा हैवानियत का होता है। और अपने भीतर के इस गोडसे वाले हिस्से को मारकर गांधी वाले हिस्से को बढ़ाने में कुछ लोग कामयाब हो पाते हैं, अधिक लोग नाकामयाब रहते हैं। लेकिन ये तमाम किस्म के इंसान अच्छी हरकतों को इंसानियत करार देते हैं, और भाषा भी अच्छे, रहमदिल को ही इंसानियत मान लेती है, और बुरे कामों को, बुरी नीयत को हैवानियत का लेबल लगा देती है, मानो वह इंसान के बाहर का कोई राक्षस हो। बातचीत में भी भाषा और शब्दों में भी इंसान यह मानने को तैयार नहीं होते कि हैवानियत कही जाने वाली चीज उनके भीतर की नहीं है। इसलिए पांच बेटियों के बाद छठवीं संतान भी बेटी तो नहीं है यह देखने के लिए बीवी का पेट काटने वाले इस इंसान की हरकत भी हैवानियत करार दे दी जाएगी ताकि बाकी इंसान अपने इंसान होने पर शर्मिंदगी न झेलें।
 
लेकिन भाषा से परे की दो बुनियादी बातों पर सोचने की जरूरत है। पहली तो यह कि हिन्दुस्तान में बेटों की चाह पहले तो छठवीं संतान तक ले जा रही है, और फिर बीवी का पेट काटकर जेल भी पहुंचा रही है। इस चाह को क्या नाम दें जिसके खिलाफ कड़े कानून बने हुए हों, और दुनिया भर में बेटियों ने यह साबित किया है कि मां-बाप की सेवा करने में भी वे बेटों से कहीं कम नहीं हैं। कल रात जब यह पेट कट रहा था, उसी वक्त एक बेटा जायदाद के लिए अपने बाप को गोली मारकर खुद भी मर गया। इसके बावजूद अभी दो दिन पहले छत्तीसगढ़ में मां-बाप की सेवा करने का एक सम्मान एक महिला सिपाही को दिया गया जिसका नाम श्रवण कुमार सम्मान था। सम्मान की हकदार एक युवती है, लेकिन सम्मान का नाम श्रवण कुमार के नाम पर रख दिया गया क्योंकि हिन्दुस्तानी समाज में सेवा करने वाली बेटी की कोई कहानी कभी प्रचलित नहीं की गई, महज श्रवण कुमार की कहानी प्रचलित की गई। आज मुद्दे की बात यह है कि बेटों की चाह में छठवीं संतान पैदा करने जा रहे लोगों को क्या कहा जाए? और खासकर यह मामला जिस तरह की पारिवारिक हिंसा का है उसमें यह साफ है कि यह परिवार मर्द के दबदबे वाला है, और इसमें महिला की कोई जुबान ही नहीं है। न परिवार के दूसरे लोगों ने, और न ही इस हिंसक मर्द ने खुद होकर यह सोचा कि दो बेटियों के बाद तीसरी संतान क्यों चाहिए थी, चौथी क्यों चाहिए थी, पांचवीं क्यों चाहिए थी, और अब छठवीं क्यों चाहिए? हिन्दुस्तान के अलग-अलग जातियों के समाजों को यह भी सोचना चाहिए कि किस धर्म के लोगों में बेटियों की हत्या आम हैं, भ्रूण हत्या आम हैं, और किन धर्मों में बेटे-बेटियों में फर्क नहीं किया जाता, गर्भपात का चलन नहीं है। समाज में सभी लोग हकीकत जानते हैं, और सबसे अहिंसक होने का दावा करने वाले धर्मालु लोग कन्या भ्रूण हत्या में अव्वल रहते हैं, और जिन जाति-धर्मों के लोग हिंसक माने जाते हैं, उनमें कन्या भ्रूण हत्या सुनी भी नहीं जाती है। इस सिलसिले को तोडऩे की जरूरत है। हकीकत के आंकड़े देखने हो तो केरल और हरियाणा, इन दो राज्यों में लडक़े-लड़कियों के अनुपात में फर्क देख लेना चाहिए, पढ़े-लिखे और कामकाजी केरल में लड़कियां लडक़ों से अधिक हैं, और दकियानूसी अंदाज में खाप पंचायतों के राज में जीने वाले हरियाणा में लडक़ों को शादी के लिए लड़कियां नहीं मिल रही हैं, जबकि हिन्दुस्तान मेें नौजवान और अधेड़ अपने से पांच-सात बरस छोटी लड़कियों से शादी पसंद करते हैं, जिसका एक मतलब यह भी होता है कि उन्हें लड़कियों की अधिक आबादी में से दुल्हन छांटना हासिल रहता है, ऐसे में भी अगर हरियाणा के कुंवारों को शादी के लिए लड़कियां नहीं मिल रही हैं तो वहां लडक़े-लड़कियों के अनुपात का फर्क आसानी से समझा जा सकता है। 

इस देश में अधिक बच्चों के होने का मुद्दा संजय गांधी के आपातकाल से लेकर अब तक नाजुक बना हुआ है। बहुत से लोग दो बच्चों का कानून बनाने को मुस्लिमों पर हमले की तरह देखते हैं। सवाल यह है कि अगर ऐसा कानून बना दिया जाता है, तो उससे मुस्लिमों का भी भला होगा या बुरा होगा? क्या आज हिन्दुस्तान के मुस्लिमों का कोई बड़ा हिस्सा तीसरी और चौथी संतान का खर्च उठाने की हालत में हैं? क्या कम बच्चों पर पढ़ाई और इलाज का अधिक खर्च करना मुस्लिमों को नुकसान करेगा? और फिर एक बात यह भी है कि जो कट्टर हिन्दूवादी लोग दो बच्चों का कानून बनवाना चाहते हैं, उनके अपने हिन्दू धर्म के लोग क्या पहली दो लड़कियों के बाद तीसरी और चौथी संतान की तरफ नहीं बढ़ते हैं? इसलिए अगर अधिक संतान रोकी जा सकती है, तो उसमें क्या मुस्लिमविरोधी होगा, और क्या हिन्दूविरोधी होगा? 

जिस दर्जे की निजी हिंसा इस परिवार में देखने मिली है, वह बहुत भयानक है। पेट में लडक़ी है या लडक़ा देखने के लिए अगर आदमी अपनी बीवी का पेट चीरकर अपनी ही संतान की जिंदगी खतरे में डाल रहा है, तो उसे हैवान कहना किसी बात का इलाज नहीं होगा। इस एक मामले में तो कानूनी कार्रवाई हो जाएगी क्योंकि यह खबरों में बहुत अधिक आ गया है, लेकिन इसके परे भी समझने की जरूरत है जहां बेटे की हसरत बढ़ते हुए पारिवारिक हिंसा की शक्ल में तब्दील हो जाती है, वहां पर यह भी समझना चाहिए कि पहले जो दो-तीन, चार या पांच लड़कियां हो चुकी हैं उनके साथ कैसा सुलूक रहता होगा? इसलिए अगर दो बच्चों की सीमा तय की जाती है, तो हो सकता है कि हिन्दुओं में भी ऐसी पारिवारिक हिंसा घट जाए क्योंकि आगे की संतान आने पर सरकारी नौकरी, मुफ्त इलाज या सरकारी योजनाओं का फायदा मिलना बंद हो सकता है। हमारी ऐसी सोच के खिलाफ हमारे ही पास एक तर्क यह है कि दो बच्चों की सीमा होने पर बेटों की हसरत में डूबे लोग पेट के बच्चे का सेक्स जानने के लिए जांच की तरफ और अधिक जाएंगे, कन्या भ्रूण हत्या और अधिक करेंगे क्योंकि दो से ज्यादा बच्चे तो वे पैदा नहीं कर पाएंगे। बच्चों पर रोक लगाना आज एक साम्प्रदायिक मामला भी समझा जाएगा, और बहुत सारे लोग इसे बुनियादी अधिकार कुचलना भी मानेंगे। लेकिन हमारा मानना है कि और किसी वजह से न सही तो कम से कम गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों में बच्चों की बेहतर देखरेख के लिए संतानों की सीमित संख्या जरूरी है। 

इस एक घटना ने कुछ मुद्दों पर सोचने के लिए मजबूर किया है, और इन बातों को अनदेखा नहीं करना चाहिए। हिन्दू-मुस्लिम के खुश या नाराज होने के चक्कर में बच्चों की सीमा लागू करने की बात किनारे न धरी रह जाए। 

(Daily Chhattisgarh) 

बात की बात, 19 सितंबर 2020


 

बात की बात, 19 सितंबर 2020


 

बेकाबू कोरोना के बीच छत्तीसगढ़ एक बार फिर लॉकडाऊन की ओर बढ़ा, यह नासमझी भरा न हो...

 छत्तीसगढ़ के कुछ जिलों में रोजाना सैकड़ों कोरोना पॉजिटिव मिल रहे हैं, और राजधानी रायपुर तो हर दिन पांच सौ से अधिक का आंकड़ा पेश कर रही है। ऐसे में अब तक रायपुर और उससे लगे हुए औद्योगिक जिले दुर्ग में लॉकडाऊन की घोषणा की गई है। आज जब यह घोषणा हो रही थी उस वक्त राजधानी की सडक़ों का हाल यह था कि उस पर से गुजर रहे लोगों में से आधे लोग भी मास्क लगाए हुए नहीं थे, और सडक़ किनारे फल-सब्जी और दूसरी चीजें बेचते हुए लोगों में से पांच फीसदी लोग भी मास्क लगाए नहीं दिख रहे थे। यह देश ऐसे गैरजिम्मेदार लोगों का देश हो गया है कि जो न अपने मरने की परवाह करते, न ही अपने आसपास के लोगों की मौत की। ऐसी ही गैरजिम्मेदारी लोगों में हेलमेट और सीट बेल्ट को लेकर दिखती है, लेकिन उसमें मौत उनकी अकेले की होती है, हेलमेट न पहनने से दूसरे नहीं मारे जाते, लेकिन मास्क न पहनने से जो संक्रमण फैल रहा है उससे दूसरे लोग भी मारे जा रहे हैं। 

छत्तीसगढ़ जैसे बहुत से प्रदेश हैं जहां लोग इसी तरह गैरजिम्मेदार हैं। और ऐसे लोगों के बीच राज्य सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि महामारी कानून का कड़ा इस्तेमाल करके अराजक लोगों पर बड़ा जुर्माना लगाए, उनकी गाडिय़ां जब्त करे, गिरफ्तारी छोडक़र बाकी किस्म की सजा मिलने पर ही लोगों पर कोई असर हो सकता है। आज गिरफ्तारी की बात हम इसलिए नहीं सुझा रहे क्योंकि जेलें अपने आपमें खतरनाक जगह हो गई है, और सरकार को वहां की आबादी घटाना भी चाहिए। लेकिन लोगों पर मोटा जुर्माना लगे, उनकी गाडिय़ां जब्त हों, अगर बिना मास्क लगाए वे सामान बेच रहे हैं तो सामान जब्त हों, तो ही जाकर लोगों को कुछ अकल आ सकती है। महामारी को रोकने के लिए एक कड़ा कानून बना इसीलिए है कि नालायकों से संक्रमण बेकसूर और जिम्मेदार लोगों तक न पहुंचे, बीमारी और मौत पर काबू पाया जा सके। 

हम लगातार इस मुद्दे पर लिख रहे हैं, और कल ही हमने इम्तिहानों के खिलाफ लिखा था, और स्कूल-कॉलेज खोलने के खिलाफ लिखा था। आज जिस प्रदेश में नौबत इतनी खराब है कि हर दिन आधा दर्जन से लेकर एक दर्जन तक जिलों में सौ-सौ से अधिक कोरोना पॉजिटिव निकल रहे हैं, वहां पर स्कूल-कॉलेज खोलने का फैसला एक आत्मघाती बेवकूफी के अलावा और कुछ नहीं हो सकता था। आज भी यह साफ नहीं है कि सरकार स्कूल-कॉलेज के बारे में भी कोई फैसले ले रही है, या नहीं। लेकिन जिस राजधानी में बाकी जिलों के मुकाबले बहुत अधिक पुलिस है, वहां हाल यह है कि लोगों के मास्क पहनने की निगरानी नहीं रखी जा रही है। आमतौर पर राजधानी प्रदेश में एक नमूना होती है कि जिसे देखकर बाकी जिलों के अफसर भी कुछ सोचें, लेकिन छत्तीसगढ़ में आज राजधानी में कोई अफसर किसी तरह की सख्ती बरतना नहीं चाह रहे हैं, सडक़ों पर मास्क लागू करवाने का काम भी नहीं हो रहा है। ऐसे गैरजिम्मेदार जिले में यह तो होना ही था कि कोरोना इस रफ्तार से बढ़ता। आज भी अगर राजधानी को देखकर बाकी जिलों के लोग सबक नहीं लेंगे, तो श्मशान पर जलने के लिए भी जगह नहीं मिलेगी। 

शुरूआती महीनों में छत्तीसगढ़ सुरक्षित लगता था। उसकी एक वजह यह थी कि यहां न कोई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा था, और न ही किसी पड़ोसी देश की सरहद इस प्रदेश को छूती थी। यह महानगरों से बहुत दूर भी था, और आदिवासी इलाकों, ग्रामीण इलाकों का शहरों से संपर्क कम था इसलिए बीमारी यहां तेजी से नहीं फैली थी। लेकिन अब यह प्रदेश बेकाबू दिख रहा है, और यह अकेले स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी नहीं है, यह पूरे राज्य शासन की जिम्मेदारी है जो कि प्रशासन का उपयोग नहीं कर पा रहा है। 

हमने कल इसी जगह दुकानों और बाजारों में भीडक़े बारे में लिखा था, दारू दुकानों में बेकाबू धक्का-मुक्की के बारे में लिखा था, और विश्वविद्यालय-कॉलेजों में छात्र-छात्राओं की धक्का-मुक्की वाली भीड़ के बारे में लिखा था। पूरी बात को यह दुहराना जगह की बर्बादी होगी लेकिन हम इतना जरूर कहना चाहते हैं कि जहां-जहां भीड़ लगती है, उन जगहों को अगर सरकार खुला रखना चाहती है, तो उन्हें रात-दिन पूरे वक्त के लिए खोल देना चाहिए। सीमित घंटों की खरीददारी में ऐसी ही मारामारी होना तय है। अभी फिर लॉकडाऊन के दौरान सीमित घंटों के लिए जरूरी सामानों की दुकानें खुलने देने का फैसला लिया गया है। ये सीमित घंटे ही कोरोना का संक्रमण बढ़ाएंगे, और जब तक भीड़ को शून्य करने का इंतजाम नहीं होगा, तब तक यह लॉकडाऊन बेअसर रहेगा। हम अफसरों की ऐसी सोच से बिल्कुल सहमत नहीं हैं कि किराना-सब्जी अगर रात-दिन खुले रखे जाएंगे, तो लोग इस बहाने घूमते रहेंगे। कोरोना लोगों की सडक़ों पर आवाजाही से नहीं फैल रहा है, भीड़ से फैल रहा है। ठेलों पर साथ में खाने से फैल रहा है, दारू दुकानों पर धक्का-मुक्की से फैल रहा है, कॉलेजों में उत्तरपुस्तिका के लिए धक्का-मुक्की से फैल रहा है। प्रदेश में जिलों का मैनेजमेंट कमजोर है क्योंकि अफसरों ने कभी ऐसी महामारी को काबू करना सीखा नहीं है। बेहतर यह होगा कि भीड़ और धक्का-मुक्की रोकने के बहुत आसान से मौजूद तरीके इस्तेमाल किए जाएं, न कि घंटों का प्रतिबंध लगाया जाए। 

बड़े नेताओं को भी अपना चेहरा बिना मास्क के दिखाना बंद कर देना चाहिए। तस्वीरों में चेहरा दिखने का मौका आगे कई बरस रहेगा, लेकिन आज अगर बड़े लोग ही बिना मास्क दिखते हैं, तो आम जनता का लापरवाह होना स्वाभाविक लगता है। नेताओं को कैमरा देखकर मास्क हटाने की आदत रहती है, लेकिन आम जनता तक अगर मास्क का संदेश देना है, तो कैमरों के सामने भी नेताओं के चेहरों को अपने को काबू में रखना होगा। और देश के कुछ नेता जिस तरह कलफ लगाया हुआ, प्रेस करके तह जमाया हुआ गमछा मुंह के सामने लपेटकर कोरोना से बचाव का संदेश देते हैं, वह भी बेअसर है। ऐसा कोई कडक़ और तह किया हुआ गमछा कोई कोरोना नहीं रोक सकता। 

आने वाले वक्त में कोरोना-महामारी कितनी बेकाबू हो सकती है यह अंदाज लगाना नामुमकिन है, इसलिए राज्य सरकार को जिलों के मार्फत सख्त फैसले लेने होंगे, और हमारा इतना अंदाज तो है कि हफ्ते भर का लॉकडाऊन काफी नहीं होगा। लॉकडाऊन आधी अधूरी इच्छाशक्ति से लागू नहीं होना चाहिए। जनता को भी इससे अधिक लंबे लॉकडाऊन के लिए तैयार रहना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 सितंबर 2020


 

दीवारों पर लिक्खा है, 18 सितंबर 2020


 

किसी भी किस्म की भीड़ की नौबत तुरंत टाले सरकार...

केन्द्र सरकार के निर्देश पर देश भर में जगह-जगह विश्वविद्यालय अपने इम्तिहान की तैयारी कर रहे हैं। उसका एक नमूना कल छत्तीसगढ़ में देखने मिला जब यहां कॉलेजों में छात्र-छात्राओं को उत्तरपुस्तिकाएं लेने के लिए बुलाया गया, और वहां पर उनकी ऐसी भीड़ टूट पड़ी, उनकी ऐसी भयानक खतरनाक तस्वीरें सामने आईं कि रात होने तक सरकार को यह इंतजाम वापिस लेना पड़ा। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम इसी जगह पर पिछले महीनों में लगातार इस बात को लिखते आ रहे हैं कि स्कूल-कॉलेज खोलने में कोई हड़बड़ी नहीं करनी चाहिए और हमने यहां तक लिखा कि अगर सरकार स्कूल-कॉलेज जबर्दस्ती खोलती भी है तो भी लोगों को अपने बच्चे नहीं भेजना चाहिए, पढ़ाई तो होती रहेगी, गई जिंदगी तो लौटेगी नहीं। 

इस देश में पढ़ाई को लेकर एक अजीब सा बावलापन चल रहा है कि कोरोना महामारी के इस दौर में, लॉकडाऊन के बीच, बीमारी के खतरे के बीच बिना तैयारी के दाखिला-इम्तिहान लिए जाएं, बिना कॉलेजों की पढ़ाई के, बिना किसी डिजिटल-ढांचे के इम्तिहान लिए जाएं। आज हालत यह है कि छत्तीसगढ़ में ही एक विश्वविद्यालय ने किसी किस्म की ऑनलाईन परीक्षा लेना शुरू किया, तो पहले ही दिन सारा इंतजाम चौपट हो गया। एक के बाद एक अलग-अलग विश्वविद्यालयों और अलग-अलग शहरों में यह बवाल देखने मिल रहा है, और आज जब कोरोना जंगल की आग की तरह आगे बढ़ रहा है, तब सरकार मानो बचे हुए पेड़ों पर पेट्रोल छिडक़ने का काम कर रही है। 

छत्तीसगढ़ में जिस रफ्तार से कोरोना बढ़ रहा है, और जिस रफ्तार से अस्पतालों में मरीजों के लिए बिस्तर खत्म हो चुके हैं, उसे देखते हुए प्रदेश के कुछ शहरों में व्यापारियों के संगठनों ने लॉकडाऊन दुबारा करने की मांग की है, उसके लिए दबाव डाला है। ये वही संगठन है, यह वही बाजार है जो कि कुछ हफ्ते पहले खुलने के लिए बेताब था क्योंकि लोगों की रोजी-रोटी खत्म हो गई थी। लेकिन आज कोरोना की लपटें जब पड़ोस तक आ चुकी हैं, तो दुकानदार और बाजार भी बंद हो जाना चाहते हैं, राजधानी रायपुर से लगे हुए एक जिले में 20 से 30 सितंबर तक पूरी तरह का लॉकडाऊन बाजार की मांग पर ही घोषित किया है। आज पूरे प्रदेश को लेकर सरकार को यह तय करना चाहिए कि वह भीड़ कैसे-कैसे घटा सकती है, कैसे-कैसे गैरजरूरी काम बंद किए जा सकते हैं, और जिन लोगों की रोजी-रोटी छिन रही है उन्हें जिंदा रहने में कैसे मदद की जा सकती है। एक तरफ केन्द्र सरकार नई संसद और उसके आसपास का नया अहाता कोई 20 हजार करोड़ खर्च करके बनाने जा रही है, दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में सरकार नई विधानसभा पर पौने 3 सौ करोड़ खर्च होने वाले हैं। कुल 90 निर्वाचित, और एक मनोनीत, इतने जनप्रतिनिधियों का काम फिलहाल मौजूदा विधानसभा से अच्छी तरह चल रहा है, और आज के माहौल में यह खर्च छत्तीसगढ़ की कांग्रेस पार्टी से मोदी के दिल्ली के 20 हजार करोड़ के खर्च की आलोचना करने का हक छीन चुका है। 

आज कोरोना के खतरनाक माहौल को देखते हुए, और आगे मौजूद साल-छह महीने, या इससे भी लंबे चलने वाले खतरे को देखते हुए सरकारों को तमाम गैरजरूरी काम खत्म करने चाहिए, जिसमें हम स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई, और परीक्षाओं को भी गिन रहे हैं। कल जिस तरह की भीड़ कॉलेजों में लगी है, यह तय है कि छत्तीसगढ़ में उससे दसियों हजार लोगों तक संक्रमण बढ़ जाना तय है। कॉलेजों से ही हजारों छात्र-छात्राएं कोरोना का संक्रमण लेकर लौटे होंगे। 

अभी हम जब यह लिख रहे हैं तभी छत्तीसगढ़ के एक जिले से खबर आ रही है कि वहां जंगल की जमीन पर कब्जे के आरोप में वन विभाग लोगों की गिरफ्तारी के लिए पहुंचा, और वहां से दर्जनों महिलाओं ने दर्जनों बच्चों सहित गिरफ्तारी दी और वे लोग कल से जिला अदालत में पेशी के लिए पड़े हुए हैं, कल उनकी बारी नहीं आई तो आज भी किसी एक भवन को जेल घोषित करके उन्हें वहां रखा गया है। यह कमअक्ल हमारी समझ से परे है कि आज ऐसे किसी मामले में गिरफ्तारी की जा रही है जो कि आज ही जरूरी नहीं है। आज तो अधिक से अधिक लोगों को जेलों से पैरोल पर छोड़ देना चाहिए ताकि एक सीमित जगह में असीमित भीड़ पर कोरोना का खतरा घट सके। लेकिन सरकारी अफसरों का मिजाज अधिक से अधिक प्रतिबंध, अधिक से अधिक कार्रवाई का रहता है, क्योंकि उन्हें इलाज का वही एक तरीका मालूम है। आज शहरों में जिन दुकानों पर खूब भीड़ लगती है, उनके खोलने का समय भी सीमित घंटों का रखा गया था, हमने बार-बार इसके खिलाफ लिखा भी था, लेकिन निर्वाचित नेता मानो अफसरों की सलाह से परे खुद कुछ नहीं सोच पा रहे हैं, उन्होंने अफसरों को हर कहीं ऐसी मनमानी की छूट दी, और दुकानों पर अंधाधुंध भीड़ लगी रही। आज कोरोना के तेजी से बढ़ते मामलों के बीच हम एक बार फिर यह सुझाव दे रहे हैं कि सरकारों को अपनी तमाम गैरजरूरी कार्रवाई अगले कई हफ्तों या महीनों के लिए रोक देनी चाहिए, स्कूल-कॉलेज और इम्तिहान इनको अगले कई हफ्तों के लिए रोक देना चाहिए, बाजार में जिन दुकानों और कारोबार को खोलने की छूट देना जरूरी है, उन्हें चौबीसों घंटे खुले रखने की छूट देनी चाहिए, ताकि उन पर कोई भीड़ न जुटे। छत्तीसगढ़ में शराब एक बड़ा मुद्दा है, और बाकी का बाजार बात-बात पर शराब की मिसाल भी देता है कि किराना बंद है, और शराब शुरू है। हम इस मौके पर कांग्रेस पार्टी की इस चुनावी घोषणा पर तुरंत अमल नहीं सुझा रहे कि प्रदेश में शराबबंदी की जाए। लेकिन अगर शराब बेचना है तो दुकानों को रात-दिन खोल देना चाहिए, ताकि जिनको पीना है उनकी भीड़ न लगे। आज भी दुकानों पर धक्का-मुक्की के बीच शराब लेने वाले लापरवाही से बीमारी भी ले-दे रहे हैं, और इस बात का हमारे पास कोई सुबूत तो नहीं हैं, लेकिन सामान्य समझ कहती है कि शराब की वजह से, शराबियों की भीड़ और धक्का-मुक्की के मार्फत कोरोना अधिक फैला है। इसलिए अगर दारू बेचना है तो उसे बिना भीड़, बिना धक्का-मुक्की, बिना समय के नियंत्रण के रात-दिन बेचना चाहिए, उसी तरह किराना, दूध, गैस, चौबीसों घंटे बिकना चाहिए जैसे कि पेट्रोल और डीजल बिकते हैं। किसी भी तरह का काबू जिससे भीड़ इक_ी हो सकती है, वह काबू नहीं आत्मघाती आदेश रहेगा। अभी पूरा प्रदेश एक और लॉकडाऊन के लायक हो चुका है  क्योंकि शासन-प्रशासन ने बिना मास्क वाले लापरवाह लोगों पर कोई भी कार्रवाई नहीं की। ऐसी महामारी के बीच भी अगर अफसरों की हिम्मत कार्रवाई की नहीं हो रही है, तो यह बहुत ही शर्म की बात है, बहुत ही निराशा की बात है। सरकार को आज कमर कसकर बैठना चाहिए, और पूरे प्रदेश से किसी भी किस्म की भीड़ के मौके खत्म कर देना चाहिए, वरना श्मशान में लाशों और चिताओं की जो भीड़ बढ़ती चल रही है, उसकी गिनती होना मुश्किल हो चुका है।

(Daily Chhattisgarh) 

बकवासी-नफरती हो चुके सोशल मीडिया से सावधान

 अखबार में काम करते हुए और रात-दिन खबरों से जूझते हुए यह मुमकिन नहीं रह जाता कि सोशल मीडिया से बचकर चल सकें। लेकिन सोशल मीडिया खबरों में मदद करता हो वहां तक तो ठीक है, जब वह खबरों पर सोचने-विचारने वाली समझ को तोडऩे-मरोडऩे लगता है, तो उसका खतरा समझ आता है। 

आज एक औसत व्यक्ति ट्विटर या फेसबुक पर जिस तरह के पूर्वाग्रही, दुराग्रही, या आग्रही लोगों का सामना करने को मजबूर हो जाते हैं, वह एक फिक्र की बात है। जो लोग सोशल मीडिया को जानकारी और तर्क के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं, उनका खासा वक्त ऐसे ग्रहों से जूझने में बर्बाद होता है जिनके पास किसी बहस के लायक कोई तर्क नहीं होते, तथ्य नहीं होते, और महज जुमले, फतवे, नारे, या स्तुतियों की भरमार रहती है। 

सोशल मीडिया पर किन लोगों को फॉलो करना है, किनकी दोस्ती छांटनी है, इस बारे में लोगों को बड़ी गंभीरता से सोचना-विचारना चाहिए। हम कई बार इस बात को लिख चुके हैं कि आज सोशल मीडिया पर रोज खासा वक्त गुजारने वाले लोग अपनी असल जिंदगी में उतने ही अच्छे हो पाते हैं जितने अच्छे उनके इर्द-गिर्द के लोग हैं। आपके आसपास के लोगों का औसत अच्छा, या औसत बुरा ही आपको बनाता है। इस बात को समझे बिना जो लोग महज सनसनी, नफरत, मोहब्बत, या अंधभक्ति के चलते हुए अपना दायरा तय करते हैं, वे जिंदगी के बहुत से फायदों से दूर रह जाते हैं, और घटिया लोगों के करीब रह जाते हैं। एक वक्त था जब लोगों के दोस्त असल जिंदगी में रहते थे, वह वक्त खत्म हो गया। अब असल जिंदगी के लोग बड़े कम रह गए हैं, और लोगों का अधिक वक्त ऑनलाईन दोस्तों, और वॉट्सऐप दोस्तों के साथ गुजरता है, और ऐसे में वे उसी तरह का नफा या नुकसान पाते हैं जिस तरह अच्छी या बुरी सोहबत की वजह से असल जिंदगी में पाते थे। असल जिंदगी में तो बुरे असर की एक सीमा रहती थी, लेकिन आज सोशल मीडिया, और ऐसी दूसरी जगहों पर ऐसी कोई सीमा नहीं रह गई है। नफरती लोग तेजी से एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं, झूठ बढ़ाते हैं, नफरत फैलाते हैं। इसलिए यह समझने की जरूरत है कि सोशल मीडिया पर जो लोग नफरत और हिंसा फैलाने वाले हैं, अंधभक्ति फैलाने वाले हैं, उनकी सोहबत से वक्त की बड़ी बर्बादी भी होती है, और अपने दिल-दिमाग की, अपने संस्कारों की भी। 

आज मुम्बई की फिल्म इंडस्ट्री से शुरू हुई गंदगी का हाल यह है कि वह संसद के भीतर भी दाखिल हो रही है, और संसद के भीतर अगर कोई समझदारी की बात की जा रही है, तो उस पर भी संसद के बाहर गंदगी पोतने का काम हो रहा है। यह एक भयानक नौबत है जब हिन्दुस्तान के आम लोग, इस देश के बड़े छोटे से तबके वाले खास लोगों के गैरजरूरी मुद्दों को आम जिंदगी के जरूरी मुद्दों से ऊपर मानकर गंदगी की होड़ में शामिल हो गए हैं। यह कुछ उसी किस्म का है कि कई दिनों का भूखा कोई इंसान राह चलती किसी रईस बारात के बैंड की धुन पर नाचने लगे। यह नौबत बहुत खराब है जब देश के एक बड़े तबके को अपनी हकीकत का अहसास नहीं रह गया है, और वह अतिसंपन्न तबके की अफवाहों, उसकी गंदगी में उसी तरह शामिल हो गया है जिस तरह एक वक्त योरप के गरीब राजकुमारी डायना की जिंदगी से जुड़ी हुई अफवाहों में शामिल रहते थे। जनता के पैसों पर पलने वाला ब्रिटिश राजघराना जिस किस्म की सनसनीखेज सेक्स-चर्चाओं को जन्म देता था, शायद वही सनसनी जनता के टैक्स की भरपाई भी थी। आज हिन्दुस्तान में लोग फिल्म इंडस्ट्री से निकली हुई मुफ्त की सनसनी को अपनी जिंदगी के सच के ऊपर रखकर चल रहे हैं। नतीजा यह है कि ऐसी लापरवाह कौम को देश का मीडिया भी गंदगी परोस रहा है क्योंकि उसे जनता के टेस्ट की समझ हो गई है, या मीडिया ने एक सामूहिक साजिश के तहत जनता के टेस्ट को बर्बाद करने का काम जारी रखा है। 

एक वक्त यह कहना भी कुछ अधिक कड़ी बात लगती थी कि लोगों को अखबार और टीवी छांटते हुए जिम्मेदारी से काम लेना चाहिए क्योंकि कोई व्यक्ति उतने ही अच्छे हो सकते हैं जितने अच्छे अखबार वे पढ़ते हैं, या जितने अच्छे टीवी चैनल वे देखते हैं। लेकिन अब ये दोनों किनारे हो गए हैं, और लोग अब उतने ही अच्छे रह पाते हैं जितने अच्छे लोगों को वे सोशल मीडिया पर फॉलो करते हैं, पढ़ते हैं, देखते हैं। इसलिए आज यहां इस मुद्दे पर लिखने का मकसद महज यह याद दिलाना है कि जिंदगी बहुत छोटी है, उसमें हर दिन सोशल मीडिया में झांकने के घंटे भी अमूमन सीमित रहते हैं, इसलिए उनका बहुत समझदारी से इस्तेमाल करना चाहिए, ऐसा न हो कि सोशल मीडिया पर लोग उन घंटों में अपनी बदनीयत के लिए आपको इस्तेमाल करते रहें।

(Daily Chhattisgarh)