दीवारों पर लिक्खा है, 31 अक्टूबर 2020


 

गांधी-नेहरू को बदनाम करने उनके विरोधियों के पास अब कंगना ही बची!

एक वक्त हिन्दुस्तान की जनता में राजनीतिक चेतना का यह हाल था कि क्यूबा से चे गुएरा का भारत आना हुआ था, और गांवों में किसानों के बीच जाना हुआ था, तो लोगों को क्यूबा का महत्व मालूम था। उसके भी और पहले आजादी के पहले से खान अब्दुल गफ्फार खान को भारत में गांधी के दोस्त होने के नाते जो इज्जत मिली, वह दुनिया के इतिहास में कम ही लोगों को मिलती है, और इसी इज्जत के तहत उन्हें सीमांत गांधी का नाम दिया गया। हिन्दुस्तान ने ऐसा दौर देखा है जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू दुनिया के सभी बड़े मुद्दों पर अपनी राय रखते थे, और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के हितों से परे भी उनका दखल रहता था। जहां भारत का कोई लेना-देना नहीं रहता था, वहां भी विश्वकल्याण के लिए, विश्वशांति के लिए नेहरू खुलकर बोलते थे, खुलकर लिखते थे, और दुनिया के बारे में उनकी सोच किताबों की शक्ल में दर्ज है जो कि समकालीन इतिहास की अहमियत रखने वाली किताबें मानी जाती हैं। वह वक्त था जब नेहरू हिन्दुस्तान के तमाम मुख्यमंत्रियों को चि_ी लिखते थे और देश और दुनिया के मामलात पर उन्हें अपनी राय बताते थे।

 
आज हिन्दुस्तान कंगना रनौत से जान और समझ रहा है कि गांधी ने क्या गलतियां की थीं, और किस तरह नेहरू प्रधानमंत्री बनने के लायक नहीं थे। यह हैरानी की बात है कि गांधी को मारने वालों से लेकर आज नेहरू के खिलाफ झूठ फैलाकर नफरत पैदा करने वाले लोगों तक के बीच बहुत से लोगों के पढ़े-लिखे होने का भी दावा किया जाता था। ऐसे में एक फिल्म अभिनेत्री जिसकी तमाम शिक्षा-दीक्षा नफरत और साम्प्रदायिकता की हुई दिखती है, उसको नेहरू और गांधी को निपटाने के लिए तैनात कर दिया गया है! क्या नेहरू और गांधी से नफरत करने वाले लोग, उनकी स्मृतियों की हत्या करने में लगे लोग कंगना से अधिक गंभीर कोई और आलोचक नहीं ढूंढ पाए? यह सवाल छोटा इसलिए नहीं है कि कल के दिन इस देश की अर्थव्यवस्था के गंभीर विश्लेषण करने का जिम्मा कॉमेडियन कपिल शर्मा पर आ जाए, इस देश की संस्कृति-नीति को तय करने का जिम्मा शक्ति कपूर पर आ जाए, तो क्या वह राजनीतिक और सामाजिक नेतागिरी में आधी-आधी सदी गुजार चुके लोगों का दीवाला निकल जाना नहीं होगा?
 
आज सोशल मीडिया की मेहरबानी से चर्चित और नामी या बदनाम किसी भी किस्म के लोग अपनी अच्छी और बुरी बातों से दसियों लाख लोगों तक पहुंच जाते हैं। ऐसे लोगों में अमिताभ बच्चन जैसे लोग भी हैं जो कि अपनी बेमिसाल लोकप्रियता के बावजूद जलते हुए हिन्दुस्तान के बीच अपने पिता की कोई कविता पोस्ट करते हुए पूरी चौथाई सदी गुजार सकते हैं, और किसी आत्मग्लानि में भी नहीं पड़ते। कुछ लोग सोनू सूद सरीखे हैं जो कि सोशल मीडिया को समाज सेवा की जगह बनाकर चल रहे हैं, और रात-दिन लोगों की मदद जाने कहां से करते चले जा रहे हैं। बहुत से लोग देश की साम्प्रदायिक हिंसा, देश में बढ़ती असहिष्णुता, देश में बेइंसाफी के खिलाफ खुलकर लिखने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। वहीं धूमकेतु की तरह पिछले कुछ महीनों में महाराष्ट्र और फिर देश की राजनीति में वन वूमैन आर्मी की तरह उतरी हुई कंगना रनौत अब गांधी की गलतियां गिना रही हैं।
 
देश की राजनीतिक ताकतों, और देश के विख्यात सांस्कृतिक संगठनों में पूरी जिंदगी गुजारने वाले लोग क्या पूरी तरह दीवालिया हो चुके हैं कि उन्हें विवादों पर जिंदा रहने वाली एक बकवासी और खालिस हिंसक अभिनेत्री की जरूरत हिन्दुस्तान की आजादी की लड़ाई और आजाद हिन्दुस्तान की व्याख्या करने के लिए पड़ रही है? गांधी को कोसना, नेहरू को गालियां देना जिनका पसंदीदा शगल है, उन्हें कम से कम अपनी इज्जत का तो ख्याल रखना चाहिए कि अगर उनके यह काम भी कंगना कर लेगी, तो वे क्या करेंगे? सिर्फ नफरती जहर को फैलाकर अगर किसी विचारधारा को इतिहास में इज्जत मिलने वाली है, तब तो उसे इस देश में कंगनाओं को शहीद का दर्जा भी दे देना चाहिए, जो कि आज उनके हाथ में हैं।
 

टीवी के स्टूडियो में बैठकर दूसरे लोगों की जान ले लेने की हद तक नफरत और हिंसा जो लोग फैला रहे हैं, उनकी नौकरी खतरे में दिख रही है। अगर कंगनाएं उनकी जगह बिठा दी गईं, तो आज के नफरतियों के मुकाबले उनके दर्शक अधिक होंगे, वे अधिक हिंसक बातों को अधिक दर्शनीय मौजूदगी के साथ सामने रख सकेंगी, और नेहरू-गांधी की क्या औकात कि वे अपनी इज्जत बचा सकें। खैर, यह देश इतिहास के एक दिलचस्प मोड़ पर आ खड़ा हुआ है जहां इस देश के इतिहास की सबसे बड़े नायकों की चरित्र-हत्या, उन्हें घटिया और बेवकूफ साबित करने का जिम्मा अब ऐसे नाजुक कंधों पर आ टिका है, और गांधी-नेहरू के तमाम वैचारिक विरोधी आज बेअसर साबित किए जा रहे हैं। अब इस देश की जनता को भी सोचना है कि जिसके नजरिए को एक दिन गांधी और नेहरू ने बड़ी मेहनत और ईमानदारी से वैश्विक बनाया था, आज उसे कहां ले जाकर पटका गया है। गांधी के संपादित किए गए अखबारों के पुराने अंक देखें, तो देश के किसी गांव के सरपंच का पोस्टकार्ड पर पूछा सवाल मिलता है जिसमें वह फिलीस्तीन और इजराईल के तनाव को समझना चाहता है, और उसके सवाल के साथ गांधी खुलासे से इस अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर अपनी सोच लिखते थे। आज इस देश की जनता को चकाचौंधी सनसनी के नशे में उतारकर पूरी तरह गैरजिम्मेदार बना दिया गया है। 

(Daily Chhattisgarh) 

बात की बात, 30 अक्टूबर 2020


 

दीवारों पर लिक्खा है, 30 अक्टूबर 2020


 

बेकसूर का गला काटने बदनीयत के हाथ उस्तरा!

 हिन्दुस्तान में बढ़ती हुई राजनीतिक कटुता के चलते हुए अलग-अलग पार्टियों के राज वाले प्रदेशों में अलग-अलग विचारधाराओं को लेकर, अलग-अलग लोगों को लेकर जिस तरह एफआईआर हो रही है, उस पर सुप्रीम कोर्ट को सोचने की जरूरत है। अनगिनत मामलों में राज्यों की हाईकोर्ट एफआईआर को कहीं खारिज कर रही हैं, कहीं उन पर रोक लगा रही हैं, लेकिन यह काफी नहीं है। किसी मामले में एफआईआर करना है, या नहीं करना है, इसके बीच का फासला उस प्रदेश या उस शहर की राजनीतिक ताकतों के हाथ में रहता है। मामला अगर राजनीति और नेताओं से जुड़ा हुआ नहीं है, और किसी नेता या सत्ता की उसमें दिलचस्पी नहीं है, तो पुलिस अपने स्तर पर आमतौर पर उसमें कमाई की गुंजाइश देखती है। जब इनमें से कोई भी बात नहीं रहती, तब जाकर कोई-कोई एफआईआर सच्ची वजहों से भी दर्ज हो जाती है। हालांकि ऐसी नौबत कम आती है क्योंकि आमतौर पर पुलिस निचुड़े हुए गन्ने जैसी हालत में पहुंचे लोगों का भी रस निकालने की काबिलीयत रखती है। 

अब सुप्रीम कोर्ट को यह सोचना चाहिए कि एफआईआर दर्ज हो या न हो, इसमें अगर विवेक से तय करने का हाथी सरीखा विशाल और विकराल हक अगर राजनीति, सत्ता, और पुलिस के हाथ दिया जाता है, तो बेकसूरों कापिस जाना आम से भी आम बात होना तय ही है। जिसे नेता, सत्ता, और रिश्वत लेने के लिए पुलिस, इनकी मेहरबानी, और सरपरस्ती हासिल हो, उसके खिलाफ एफआईआर के लिए लोगों को अदालत तक जाना पड़ता है, और अदालतों में फिर सत्ता, नेता, और रिश्वत की ताकत से लड़ते हुए एफआईआर हो सकती है। इसके बाद भी सिलसिला थमता नहीं है, कल ही सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के एक आदेश पर रोक लगा दी है जिसमें हाईकोर्ट ने उत्तराखंड सीएम के खिलाफ एफआईआर करने, और जांच करने का हुक्म सीबीआई को दिया था। अब पल भर को यह सोचने की जरूरत है कि जहां हाईकोर्ट एफआईआर दर्ज करने का हुक्म दे रहा है, वहां पर सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के हुक्म को गलत पा रहा है, उसकी आलोचना कर रहा है। यहां पर अभी इसी हफ्ते ही सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट द्वारा यूपी पुलिस को लगाई गई फटकार पर भी गौर करने की जरूरत है जिसमें अदालत ने कहा है कि आईटी एक्ट की जिस धारा को सुप्रीम कोर्ट पिछले बरस असंवैधानिक करार दे चुका है, उस धारा के तहत यूपी पुलिस अब तक एफआईआर दर्ज कर रही है, जुर्म कायम कर रही है। 

कुल मिलाकर नौबत यह है कि राज्यों की राजनीतिक ताकतों, या रिश्वतखोर पुलिस-अफसरों की जिसके खिलाफ मर्जी हो, उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज होने से कोई रोक नहीं सकते। एफआईआर के बाद आगे की कार्रवाई में पुलिस तब तक ईश्वर जैसी ताकत रखती है जब तक कोई अदालती दखल न हो। और इसी ईश्वरीय ताकत का इस्तेमाल वे राजनीतिक ताकतें करती हैं जो पुलिस की ताकतवर कुर्सियों पर पसंदीदा या भुगतानशुदा लोगों को बिठाती हैं। ऐसे में किसी बेकसूर की गुंजाइश कहां बचती है? इसकी एक सबसे जलती-सुलगती मिसाल पिछली भाजपा सरकार के दौरान छत्तीसगढ़ के आईजी कल्लुरी के स्वायत्तशासी बस्तर में सामने आई थी। देश के कुछ प्रमुख प्राध्यापकों, और छत्तीसगढ़ के ईमानदार और संघर्षशील वामपंथी नेताओं के खिलाफ हत्या के लिए उकसाने का जुर्म कायम कर दिया गया था जिसे अभी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा खारिज करके नाजायज करार दिया गया, और नंदिनी सुंदर, अर्चना प्रसाद, संजय पराते, इन तमाम लोगों को मुआवजा भी दिलवाया गया है। लेकिन क्या एफआईआर करने और करवाने वाले पुलिस अफसरों पर कुछ हुआ? कुछ भी नहीं। इस देश में हर दिन दसियों हजार बेईमान और नाजायज एफआईआर होती हैं, जिनमें से सैकड़ों आगे जाकर किसी न किसी अदालत में गलत साबित होती हैं, लेकिन एफआईआर करने वाले भ्रष्ट या बदनीयत, या दोनों, अफसरों पर भूले-भटके ही कोई कार्रवाई हो पाती है। यह सिलसिला लोकतंत्र के हिसाब से बहुत ही भयानक है क्योंकि हिन्दुस्तान में पुलिस को आज भी अंग्रेजीराज की तरह के मनमाने हक हासिल हैं जिनके सामने किसी गरीब या कमजोर, या सत्ता का नापसंद इंसान के बचने की कोई गुंजाइश नहीं रहती है। 

मोदी सरकार ने पिछले बरसों में देश के ऐसे हजार-दो हजार कानूनों को खारिज किया है जो एक-डेढ़ सदी पहले किसी तानाशाह मकसद से बनाए गए थे, जो मनमाने और अलोकतांत्रिक थे, और जो अब किसी काम के नहीं रह गए थे, या लोकतंत्र विरोधी साबित हो रहे थे। लेकिन भारत की न्यायव्यवस्था का सिलसिला जिस पुलिस थाने से शुरू होता है, वहां थानेदार की कुर्सी को अब तक एक अंग्रेज बहादुर की कुर्सी जैसी ताकत हासिल है, एफआईआर के मामले में। यह थोड़ी सी हैरानी की बात है कि सुप्रीम कोर्ट के सामने पुलिस, या दूसरी जांच एजेंसियों के एफआईआर करने के मनमाने अधिकारों के खिलाफ कोई मामला क्यों नहीं चल रहा है। आज देश भर में किसी प्रदेश में पत्रकारों के खिलाफ, किसी प्रदेश में सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ, किसी प्रदेश में राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का अंतहीन सिलसिला चला हुआ है। और तो और जो हिन्दुस्तान आज फ्रांस में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत करते हुए खड़ा है, अपने देश में दुनिया की सबसे अधिक मुस्लिम आबादी की हकीकत के बाद भी फ्रांस के साथ खड़ा है, उस देश में खुद केन्द्र सरकार चला रही पार्टी की राज्य सरकारों में जगह-जगह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ पुलिस रिपोर्ट दर्ज हो रही है। फ्रांस में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत, और अपने देश में अपनी सत्ता के प्रदेशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जेल! लेकिन यह महज भाजपा की सोच नहीं है, अभी कल ही सुप्रीम कोर्ट ने एक प्रदेश की मालकिन ममता बैनर्जी को हडक़ाया है कि वहां लोकतंत्र कायम रहने दें। मामला सोशल मीडिया पोस्ट पर ममता बैनर्जी की आलोचना करने पर दर्ज एफआईआर का था। सोशल मीडिया पर दिल्ली के एक महिला ने बंगाल सरकार की आलोचना की थी, तो इस पर बंगाल पुलिस ने एफआईआर दर्ज करके उसे पूछताछ के लिए कोलकाता बुलवाया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार को जमकर फटकार लगाई और कहा कि उसे दिल्ली से कोलकाता बुलवाना उस पर जुल्म के अलावा कुछ नहीं है, कल चार अलग-अलग राज्यों से पुलिस किसी को कुछ लिखने पर बुलावा भेजेगी, और उसका एक ही संदेश होगा, कि अगर तुम कुछ लिखोगे तो हम तुम्हें सबक सिखाएंगे। 

लेकिन ममता बैनर्जी की बर्दाश्त की कमी, और पुलिस के बेजा इस्तेमाल का यह अकेला मामला नहीं था, ऐसे कई मामले पहले भी दर्ज हुए हैं, और कम से कम एक मामले में तो जाधवपुर विश्वविद्यालय के एक प्राध्यापक के खिलाफ एफआईआर करके उसे गिरफ्तार भी किया गया। 

सुप्रीम कोर्ट को जनता के सबसे कमजोर तबके  के हक के लिए एफआईआर की मनमानी, गिरफ्तारी की मनमानी के साथ जोडक़र यह भी देखना चाहिए कि निचली अदालतें अपने भ्रष्टाचार के लिए कितनी बदनाम हैं, और उन अदालतों के पास भी नाजायज एफआईआर, नाजायज गिरफ्तारी के मामलों में जमानत न देने का कितना भयानक विवेकाधिकार है, मनमर्जी है। सुप्रीम कोर्ट को यह भी देखना चाहिए कि पुलिस की एफआईआर आगे जाकर अगर नाजायज साबित होती है तो ऐसे अफसरों पर क्या कार्रवाई होती है, अगर कोई कार्रवाई होती है तो। सुप्रीम कोर्ट यह भी देखना चाहिए कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाकर नाजायज एफआईआर और गिरफ्तारी के जो मामले खारिज होते हैं, उनमें राज्य सरकारें अपने जवाबदेह-जिम्मेदार पुलिस अफसरों पर कोई कार्रवाई करती हैं या नहीं? इसके लिए एक बहुत आत्मनिर्भर मैकेनिज्म विकसित करने की जरूरत है कि फर्जीवाड़े के जिम्मेदार पुलिस अफसरों के खिलाफ कार्रवाई ठीक उसी तरह हो जिस तरह हर हिरासत मौत के बाद मजिस्टीरियल जांच होती ही होती है, किसी नवविवाहिता के शादी के सात बरस के भीतर अस्वाभाविक मौत होने पर उसकी जांच होती ही होती है। कुछ ऐसा ही एफआईआर की मनमानी को लेकर भी करने की जरूरत है। 

आज जब समाज के खास और आम, सभी किस्म के लोग सोशल मीडिया पर अपने मन की (असली) बात लिखने लगे हैं, और ताकतवर लोगों का बर्दाश्त खत्म हो चुका है, तो ऐसे में राजनीतिक दबावतले काम करने वाली अमूमन भ्रष्ट पुलिस के हाथ एफआईआर जैसा अंधाधुंध ताकत वाला हथियार कैसे दिया जा सकता है?
 
थोड़ी सी हैरानी की बात यह है कि अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग पार्टियों के लोग वहां की सत्ता की नाराजगी का ऐसा हमला झेल रहे हैं, लेकिन किसी पार्टी ने एफआईआर के सिलसिले को चुनौती देने का काम न संसद के भीतर किया, न ही सुप्रीम कोर्ट जाकर किया। चूंकि देश के सामाजिक कार्यकर्ता और मीडिया के लोग बड़े पैमाने पर ऐसी मनमानी के शिकार हैं, इसलिए कम से कम इस तबके के कुछ लोगों को एक जनहित याचिका लेकर सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए, और एफआईआर की जवाबदेही, और उसके अधिकार सीमित करने की मांग करनी चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 अक्टूबर


 

वोटरों को लुभाने का सिलसिला पहुंच गया अब जुर्म की हद तक

 दो दिन पहले छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में दुर्गा विसर्जन के हंगामे को रोकती पुलिस पर पथराव हुआ, थाना घेरा गया, और पुलिस ने लोगों को लाठियों से खदेड़ा। प्रतिमाओं वाली गाडिय़ां खड़ी रह गईं, और देश के सबसे कुख्यात साम्प्रदायिक मीडिया ने इस घटना को इस तरह पेश किया कि थाने में तैनात एक मुस्लिम अफसर ने दुर्गा विसर्जन पर लाठियां चलवाईं। बिहार के मुंगेर में और दो-तीन दिन पहले विसर्जन की बेकाबू भीड़ पर पुलिस को गोलियां चलानी पड़ीं जिनमें एक मौत हुई, और शायद आधा दर्जन लोग जख्मी हुए। यह सब हंगामा उस वक्त हो रहा है जब देश के अधिकतर हिस्से में मंदिरों पर भी लॉकडाऊन के कम से कम कुछ नियम तो लागू किए ही गए हैं, कम से कम कागजों पर तो लागू किए ही गए हैं। ऐसे में महाराष्ट्र में राज्य सरकार ने यह समझदारी दिखाई कि कोई धर्मस्थल नहीं खोलने दिए जिसे लेकर वहां के राज्यपाल ने शिवसेना के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को धर्मनिरपेक्ष जैसी गंदी गाली भी दे दी। लेकिन उद्धव ठाकरे अपने फैसले पर अड़े रहे, और धर्मस्थल नहीं खोले गए। 

आज कोरोना के खतरे के बीच जब देश को यह समझने की जरूरत है कि कोरोना की वजह से देश पर लादे गए लॉकडाऊन से करोड़ों लोगों के बेरोजगारी से मरने की नौबत आ गई है, और इस नौबत को दूर करने कोई ईश्वर सामने नहीं आए, तो आज जरूरत कोरोना के खतरे को घटाने की है, खत्म करने की है, ताकि लोगों का चूल्हा जल सके। लेकिन हिन्दुस्तान के लोग हैं कि ईश्वर के प्रसाद का चूल्हा पहले जलवाना चाहते हैं, चाहे फिर धार्मिक भीड़ से कोरोना और क्यों न फैल जाए, देश और बड़े आर्थिक संकट में क्यों न डूब जाए। 

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर ही नहीं, बाकी शहरों में भी जिस तरह डीजे और धुमाल पार्टियों के हंगामे के साथ बिना मास्क धक्का-मुक्की करते गैरजिम्मेदार लोगों की भीड़ अभी इस हफ्ते नाचती रही उसे देखकर कोरोना भी सोच रहा होगा कि ऐसे बेवकूफों को मारकर अपने हाथ गंदे करे, या न करे? और दिलचस्प बात यह है कि निर्वाचित विधायकों ने खुद होकर इस शोहरत का दावा किया कि विसर्जन के लिए डीजे बजाने की इजाजत जिला प्रशासन पर दबाव डालकर उन्होंने दिलवाई। जिस इलाके के नेता, जिस धर्म वाले नेता को अपने वोटरों को खतरे में धकेलना हो, वे ही ऐसा गैरजिम्मेदारी का काम कर सकते हैं जिसका नतीजा उधर बिहार के मुंगेर में निकला, इधर दो दिन पहले बिलासपुर में दिखा, और बाकी शहरों में यहां हिंसा नहीं हुई, वहां ऐसे विसर्जन-डांस से कोरोना कितना फैलेगा इसका हिसाब ऐसे गैरजिम्मेदार विधायक भी नहीं लगा पाएंगे। 

लोग जब वोटों पर ंिजंदा रहते हैं, तो गैरजिम्मेदारी को बढ़ाने की कीमत पर भी, हिंसा का खतरा बढ़ाने की कीमत पर भी, अपने सबसे अराजक वोटरों की भीड़ को लुभाने की ऐसी आपराधिक हरकत करते हैं। नतीजा यह होता है कि एक धर्म के देखादेखी दूसरे धर्म के लोग भी उससे अधिक अराजकता का हक मांगते हैं। बिलासपुर में तो यह हुआ कि जिन दुर्गा समितियों को विसर्जन में डीजे की इजाजत नहीं मिली थी, और जिन्होंने बिना हो-हल्ले के विसर्जन किया था, उन्होंने बाकी कुछ समितियों के विसर्जन में डीजे की मौजूदगी पर आपत्ति की, और वहां से पुलिस की दखल शुरू हुई। देखादेखी अराजकता बढ़ाने के लिए दूसरे धर्म की जरूरत भी नहीं पड़ी, एक ही धर्म के लोगों ने इस बात पर आपत्ति की कि जब उन्हें अराजकता की इजाजत नहीं मिली, तो दूसरों को अराजकता की इजाजत क्यों दी गई? 

एक तो धर्म वैसे भी पूरी तरह से अराजक मिजाज मामला रहता है, फिर उसमें जब सत्तारूढ़ नेता अपनी ताकत की हवन सामग्री और झोंक देते हैं, तो उसकी अराजकता और भभक पड़ती है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने अपना दमखम दिखाया, पक्का इरादा दिखाया, और धर्मस्थलों पर रोक जारी रखी। वरना वहां एक धर्म की हिंसा का मुकाबला करने के लिए दूसरा धर्म भी अपनी हिंसा, अपनी मनमानी, और अपनी अराजकता के हक का दावा करता। 

इस देश में सुप्रीम कोर्ट से लेकर दर्जन भर से अधिक हाईकोर्ट सार्वजनिक जगहों पर लाउडस्पीकर और शोरगुल के खिलाफ कड़े फैसले दे चुके हैं, इसके बावजूद कमजोर शासन और कमजोर प्रशासन धर्म तो धर्म तो धर्म, किसी शादी-ब्याह के जुलूस में भी कानून तोडऩे के सामने तुरंत दंडवत हो जाते हैं, और लोगों का जीना हराम होते रहता है। छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट ने कई बार डीजे जैसे शोरगुल के खिलाफ निर्देश दिए हैं, लेकिन विसर्जन का यह हफ्ता पूरी राजधानी को, और भी शहरों को लाउडस्पीकरों में डुबाकर चले गया। अब जहां प्रशासन ऐसी अराजकता और धर्मान्धता के सामने बिछा हुआ है, वहां पर किस आम इंसान या जनसंगठन की यह ताकत है कि वह शासन-प्रशासन की गैरजिम्मेदारी के खिलाफ हाईकोर्ट जाए, और हाईकोर्ट को याद दिलाए कि उसके आदेश पर अफसर अपने जूते रखकर बैठते हैं। 

जहां इंसानों का रोजगार शुरू नहीं हो पाया है, जहां कारोबारी हलचल मंदी पड़ी हुई है, लोग बेरोजगार बैठे हैं, लोगों की नौकरियां छूट गई हैं, तनख्वाह घटा दी गई है, काम के घंटे बढ़ा दिए गए हैं, तनख्वाहें रूकी पड़ी हैं, वहां पर उन लोगों को धर्म की फिक्र अधिक पड़ी है, जिन्हें अपने शहर, अपने प्रदेश, और अपने देश को कोरोना के सामने परोस देने में जरा भी हिचक नहीं है। ऐसी गैरजिम्मेदारी पर आज कोई कार्रवाई सिर्फ अदालत कर सकती है। सार्वजनिक जिंदगी को तबाह करके, आम लोगों को खतरे में डालकर नेता और अफसर जिस तरह धार्मिक कर्मकांडों को बढ़ावा दे रहे हैं, उसे अगर अदालत अनदेखा कर रही है, तो वह भी अपनी जिम्मेदारी से दूर भाग रही है। 

(Daily Chhattisgarh) 

सरकारी अमले को शपथ दिलाने का पाखंड कि ईमानदारी से काम करेंगे!

 हिन्दुस्तान बड़ा गजब का देश है। यहां पर साल में एक दिन देश के तमाम सरकारी दफ्तरों में अफसर-कर्मचारी शपथ लेते हैं कि वे आतंकवाद का विरोध करेंगे। अब कल की खबर है कि देश में मनाए जा रहे सतर्कता सप्ताह के तहत फौज के सारे आला अफसरों ने शपथ ली है कि वे कानून के शासन का पालन करेंगे। उन्होंने ईमानदार और पारदर्शी तरीके से काम करने के लिए ईमानदारी का संकल्प लिया। सरकारी खबर में बताया गया है कि अभी भारतीय सेना की ईमानदारी और अखंडता के मूल मूल्यों को बनाए रखने के लिए सतर्कता जागरूकता सप्ताह चल रहा है। अब अगर मंगलवार की इस फौजी खबर के विशेषणों को छोड़ दें, तो क्या बचता है? क्या फौज इस शपथ के बिना कानून के शासन का पालन नहीं करती? क्या वह ईमानदारी और पारदर्शी तरीके से काम नहीं करती? क्या वह सतर्कता और जागरूकता से काम नहीं करती? 

हिन्दुस्तान में एक नागरिक के रूप में जो बुनियादी जिम्मेदारी है, और जो सरकारी नौकरी में आने के बाद कुछ बढ़ भी जाती है, उस जिम्मेदारी को साल में एक बार या चार बार शपथ दिलाकर दुहराने का क्या मतलब है? सरकारी सेवा नियम सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों को कई ऐसे काम करने से रोकते हैं जो कि गैरसरकारी लोग कर सकते हैं। सरकारी सेवा खत्म करने के लिए लोगों का चाल-चलन गड़बड़ होना भी काफी वजह बन सकती है, जबकि गैरसरकारी लोगों पर ऐसा कुछ लागू नहीं होता है। ऐसे में लोगों की जिंदगी में जो बुनियादी बातें रहनी चाहिए, उन बातों के लिए इस तरह की शपथ दिलाना यही बताता है कि देश का कानून, सरकारी नियम, सेवा शर्तें, और लोगों में अनिवार्य जिम्मेदारी की भावना सब कमजोर हो चुकी हैं। 

क्या परिवारों में लोग रोज सुबह उठने के बाद और रात सोने के पहले यह शपथ लेते हैं कि मुसीबत में पूरा परिवार एक साथ खड़े रहेगा? क्या रिक्शेवाले सवारी को बिठाने के बाद शपथ लेते हैं कि वे उन्हें हिफाजत से मंजिल तक पहुंचाकर रहेंगे? क्या मोची इस बात की शपथ लेते हैं कि वे ईमानदारी से जूते सिलेंगे, मजबूत टांके लगाएंगे? क्या अखबारनवीस साल में एक बार, प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर या किसी और मौके पर ऐसी शपथ लेते हैं कि वे सच्ची खबर ही बनाएंगे? 
शपथ का यह पूरा सिलसिला ही इस समझ पर टिका हुआ है कि यह देश झूठा है, यहां के लोग मक्कार हैं, इन्हें कसम दिलाए बिना ये कोई काम सही नहीं करेंगे! और फिर कसम दिलाई भी किसकी जाती है? संविधान की। पन्नों का एक ऐसा पुलिंदा जिसे मानना किसी के लिए तब तक जरूरी नहीं है, जब तक उसमें देश के लिए जागरूकता न हो, ईमानदारी न हो, कानून का शासन पालन करने की इच्छा न हो। इसी संविधान की शपथ लेकर तो तमाम मंत्री काम करते हैं जिनमें से दर्जनों जेल भी जा चुके हैं। संविधान की शपथ का ही इतना वजन होता तो क्या शपथ लेने वाले कटघरे में खड़े होते? सजा पाते? जेल जाते? 

एक परिपक्व लोकतंत्र को ऐसे पाखंड से उबर जाना चाहिए। असल जिंदगी में देखें तो बात-बात पर, और गैरजरूरी बातों पर भी, सबसे अधिक कसम वे लोग खाते हैं जो कि झूठ बोलने के लिए मशहूर होते हैं। वे मां-बाप की कसम खा लेते हैं, बच्चों की कसम खा लेते हैं, ईश्वर की कसम खा लेते हैं, और तो और जिससे झूठ बोल रहे हैं उसकी कसम खाकर भी झूठ बोल देते हैं। यहां का राष्ट्रीय चरित्र ऐसा हो गया है कि झूठ बोले बिना कई लोगों का खाना नहीं पचता। आज देश के जिन बड़े फौजी अफसरों को ईमानदारी की शपथ दिलाई गई है, उन्हीं की फौज के कई अफसर बड़े-बड़े भ्रष्टाचार में गिरफ्तार हो चुके हैं, और तो और अपने मातहत अफसरों की बीवियों का देह शोषण करने का मुकदमा भी उन पर चल चुका है, और उन्हें बर्खास्त किया गया है। कौन सी कसम ने उन्हें कुछ बुरा करने से रोका?

अब अदालतों में या मंत्री पद या जज के ओहदे की शपथ लेते हुए लोग संविधान, सत्य, या धर्म की शपथ ले सकते हैं। अपनी-अपनी पसंद से लोग शपथ लेते हैं। लेकिन जो लोग धर्म की शपथ लेते हैं, उनमें से बहुत से लोग अपने धर्म को संविधान से ऊपर मानकर चलते हैं। जब बाबरी मस्जिद गिरी तो कल्याण सिंह यूपी के मुख्यमंत्री थे, और शपथ लेकर ही बने थे। उन पर संविधान तो निभाने और लागू करने की जिम्मेदारी भी थी। लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में बाबरी मस्जिद को गिरने देने में उनका जो रूख इतिहास में दर्ज है, क्या वह संविधान की शपथ वाला रूख था? और अकेले कल्याण सिंह की बात नहीं है वह तो हमने एक मिसाल के रूप में कहा है, बात तो देश के पूरे ढांचे की है जिसमें लोगों को बिना जरूरत धर्म और सत्यनिष्ठा, संविधान और कई दूसरे किस्म की शपथ दिलाई जाती हैं। पाखंड का यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। देश के सबसे बड़े फौजी अफसर अगर ऐसी शपथ के बिना कानून के राज का पालन नहीं करेंगे, ईमानदारी से काम नहीं करेंगे, तो फिर क्या वे शपथ लेकर अपना हृदय परिवर्तन कर लेंगे? 

जो समाज झूठ पर जीता है, वही सच की कसमें अधिक खाता है। दुनिया के इतिहास में जो सबसे बड़े सच्चे लोग दर्ज हैं, उनका लिखा और कहा हुआ देख लें, उनमें अपने कहे हुए के सर्टिफिकेट के रूप में कभी कोई कसम दर्ज नहीं होगी।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 अक्टूबर 2020


 

नीतीश को फिर लालू संग सरकार बनानी पड़ी तो कितने बच्चे गोद बिठाएंगे?

 चुनाव में हलकटपन बड़ी आम बात है। मध्यप्रदेश में कमलनाथ ने भाजपा की नेता इमरती देवी को आइटम कहा, और कहकर ऐसे अड़े कि अपने मालिक की नाराजगी के बाद भी अपने शब्द वापिस लेने से इंकार कर दिया। लेकिन दो-चार दिनों के भीतर ही कल के कांग्रेसी और आज के भाजपाई नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने एक चुनावी मंच से इमरती देवी को भरोसा दिलाते हुए बड़े दम-खम के साथ कहा- क्या सोचकर मेरी इमरती को डबरा में आकर आइटम कहने की हिम्मत की? अब इमरती देवी को भरोसा दिलाते हुए भी ऐसी भाषा बड़ी अटपटी है, और अपने से जरा ही छोटी एक महिला नेता के बारे में इस अंदाज में कहकर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने लोगों में इस पूरे विवाद को मजाक का सामान बना दिया। 

अब बिहार के चुनाव प्रचार में नीतीश कुमार ने पिछले चुनाव के अपने भागीदार लालू यादव का नाम लिए बिना उनके बारे में एक बहुत घटिया बात कही- 8-8, 9-9 बच्चे पैदा करने वाले बिहार का विकास करने चले हैं। बेटे की चाह में कई बेटियां हो गईं, मतलब बेटियों पर भरोसा नहीं है। ऐसे लोग बिहार का क्या भला करेंगे? 

अब लालू यादव के परिवार की तरफ से इसका जवाब तो आना था, और उनके बेटे के तेजस्वी ने नीतीश कुमार को याद दिलाया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी 6 भाई-बहन हैं, कहीं न कहीं नीतीश कुमार अपने बयान से पीएम मोदी पर भी निशाना साध रहे हैं। तेजस्वी ने कहा कि नीतीश कुमार ने एक महिला और मेरी मां की भावनाओं को आहत किया है, उन्होंने मेरे बारे में भी अपशब्द कहे हैं, वे शारीरिक और मानसिक रूप से थक गए हैं। 

नीतीश कुमार आमतौर पर बकवास करने और गंदी बात बोलने के लिए नहीं जाने जाते, लेकिन चुनाव की गर्मी ऐसी है कि उन्होंने भी गंदगी में कूद जाने से परहेज नहीं किया, और लालू यादव पर एक ऐसी पारिवारिक बात को लेकर हमला किया जो बात शायद उन्होंने खुद भी लालू से चुनावी दोस्ती और दुश्मनी के चलते हुए कभी उठाई नहीं थी। उन्होंने ही क्या, लालू के बच्चों की गिनती को किसी दूसरी पार्टी या नेता ने कभी चुनावी मुद्दा बनाया हो, ऐसा हमें याद नहीं पड़ता। लेकिन आज अगर लालू राज के भ्रष्टाचार, उनकी कुनबापरस्ती, उनके 15 बरस के लंबे कार्यकाल की बदअमनी, बदइंतजामी जैसे मुद्दों को छोडक़र 15 बरस के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अगर एक घटिया और गंदी बात करना जरूरी लग रहा है, तो फिर वे चर्चाएं सही लगती हैं कि नीतीश इस बार परेशानी में हैं, और एक तरफ चिराग पासवान उन्हें परेशान कर रहे हैं, तो दूसरी ओर भाजपा के इश्तहारों में नीतीश का नाम तक नहीं है, जबकि भाजपा यह कहते आई है कि सीटें चाहे उसे ज्यादा मिले, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही बनाए जाएंगे। आज बिहार के चुनाव को लेकर बहुत से राजनीतिक विश्लेषकों को यह गंभीर शक है कि भाजपा ने नीतीश कुमार को परेशान करने के लिए चिराग पासवान को उकसाए रखा है, और चुनाव के बाद के लिए भाजपा के दिमाग में कोई और बात भी हो सकती है। जो नीतीश कुमार पिछले चुनाव के अपने गठबंधन के भागीदार लालू यादव को लात मारकर भाजपा के साथ सरकार बनाने जैसा दलबदलू सरीखा काम कर चुके हैं, वे नीतीश कुमार अगर भाजपा से तिरस्कृत हुए तो फिर लालू यादव के कितने बच्चों को गोद में बिठाने तैयार होंगे? 

अभी 5-7 बरस पहले की ही बात है जब नीतीश कुमार ने बिहार की एक आमसभा में मोदी के साथ उनकी तस्वीर के इश्तहारों पर आपत्ति की थी, और अपने आपको आरएसएस विरोधी साबित करने की कोशिश की थी। खैर, राजनीति में न कोई स्थाई दोस्त होते हैं, न कोई स्थाई दुश्मन होते हैं, और हमबिस्तर बदलते ही रहते हैं, इसलिए नीतीश कुमार आज जहां हैं, वहां क्यों हैं और कैसे हैं ये सवाल भारतीय लोकतंत्र में बेमानी हो चुके हैं। अब विधायकों और सांसदों को खरीदना, सरकारों को बारूदी धमाकों से उड़ाना, सत्तापलट करवाना इतना आम हो चुका है कि इनमें से कोई बात अब चौंकाती नहीं है। लेकिन लालू के बच्चों की संख्या को लेकर चुनावी मंच से उन पर तंज क्या हारने की घबराहट में कही हुई घटिया बात है?

जब लोग इतिहास की किसी बात को भुलाकर, उससे उबरकर किसी गठबंधन में भागीदार होते हैं, तो उससे पहले की बातों को कहने का उनका कोई नैतिक हक नहीं रहता। जो लोग 1984 के दंगों के बाद कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ चुके हैं, सरकार में रह चुके हैं, वे बाद में किस मुंह से कांग्रेस पर सिख विरोधी होने की तोहमत लगा सकते हैं? जो लोग 1992 में बाबरी मस्जिद गिरने के बाद भाजपा और शिवसेना के साथ मिलकर गठबंधन और सरकार बना चुके हैं, चुनाव लड़ चुके हैं, वे हमेशा के लिए मस्जिद गिराने में भाजपा-शिवसेना की हिस्सेदारी पर बोलने का हक खो बैठे हैं। ऐसा ही गुजरात दंगों को लेकर, या कश्मीर के कुछ मुद्दों को लेकर हो चुका है कि उनके बाद के भागीदार भागीदारी शुरू होने के दिन से ही इस इतिहास पर बोलने का हक खो बैठे हैं। इसीलिए आज कई बातें भाजपा को याद दिलाई जा रही है कि तिरंगा न उठाने की बात कहने वाली महबूबा को मुख्यमंत्री तो भाजपा ने ही बनाया था, और खुद महबूबा के मातहत अपने मंत्री बनाए थे। दूसरी तरफ मोदी सरकार ने कश्मीर में जो किया है उसे लेकर कश्मीर के भीतर महबूबा से भी सवाल उठ रहे हैं कि इन्हीं मोदी के साथ तो कश्मीर की सरकार बनाई थी।
 
खैर, आज के मुद्दे पर लौटें, नीतीश कुमार ने एक घटिया और अप्रासंगिक बात की है जिससे उनकी जैसी भी घिसीपिटी छवि राजनीति में रही हो, उसमें गहरी चोट लगी है। यह चुनाव तो चले जाएगा, और जीत-हार अलग रहेगी, लेकिन घटिया बात जिनके साथ दर्ज हो जा रही हैं, उन्हें अब मिटाना मुमकिन नहीं है।  

ट्रंप सरकार के आखिरी हफ्तों में मंत्रियों का यह दौरा किस काम का?

  अमरीकी विदेश मंत्री माइक पाम्पियो, और अमरीकी रक्षामंत्री मार्क एस्पर आज दोपहर बाद हिन्दुस्तान पहुंचे हैं, और वे यहां मंत्री स्तर की बातचीत करेंगे। हिन्दुस्तान अमरीका के बीच आपसी हितों के बहुत से दूसरे मुद्दे हो सकते हैं, और होंगे भी, लेकिन आज चीन के साथ भारत के जारी सरहदी तनाव के वक्त पर हिन्दुस्तान के लोगों की उम्मीद यह है कि अमरीका चीन के खिलाफ भारत का कैसे साथ देता है। चूंकि दोनों देशों के इन दोनों मंत्रालयों को सम्हालने वाले लोग बैठेंगे, तो जाहिर है कि चीन एक बड़ा मुद्दा रहेगा, और भारत की जनता की आम भावना आज चीन के खिलाफ भडक़ी हुई है, इसलिए भारतीय जनता अमरीका से चीन के खिलाफ कुछ ठोस वायदों की उम्मीद भी करेगी। 

लेकिन इस बातचीत के वक्त पर भी ध्यान देना जरूरी है। अमरीका में आज डोनल्ड ट्रंप की सरकार अपने आखिरी कुछ हफ्ते गुजार रही है। वहां पर नए राष्ट्रपति को चुनने के लिए मतदान शुरू हो चुका है, और भारत से अलग अमरीका में यह मतदान कुछ हफ्ते चलता है, इसलिए भारतीय चुनाव की तरह यह दर्शनीय नहीं होता, यह अलग बात है कि 3 नवंबर के मतदान के बाद कुछ हफ्तों के भीतर अमरीकी राष्ट्रपति भवन ट्रंप से परे का कोई राष्ट्रपति काम सम्हाल सकता है, और जैसा कि वहां का चुनावी नजारा है, रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार ट्रंप के अलावा दूसरे उम्मीदवार डेमोक्रेटिक पार्टी के हैं, और अगर वे राष्ट्रपति बनते हैं, तो अमरीका की विदेश नीति, रक्षानीति में एक बुनियादी फेरबदल भी आ सकता है। ऐसे में अमरीकी विदेश मंत्री और रक्षामंत्री का यह भारत दौरा कुछ अटपटे वक्त पर हो रहा है क्योंकि हो सकता है कि ये अगली सरकार चुनने के लिए वोट डालकर यहां आए हों। अगली 21 जनवरी को अमरीकी राष्ट्रपति का शपथ ग्रहण होगा, और उसके साथ ही हो सकता है कि इसी राष्ट्रपति के रहते हुए भी सारे मंत्री बदल जाएं। ऐसे में भारत में जो लोग बहुत उम्मीद लगाए बैठे हैं, उन्हें सही संदर्भों में मंत्रियों की दो दिनों की इस बैठक को समझना चाहिए। 

हिन्दुस्तान ने अमरीका से इन बरसों में हथियारों की बड़ी खरीदी की है। हिन्दुस्तान अमरीका के लिए एक बड़ा ग्राहक भी है, और चीन का पड़ोसी होने के नाते भारत का एक रणनीतिक महत्व भी अमरीका के लिए है। हिन्दुस्तान के जो लोग यह मानते हैं कि भारत और चीन के टकराव के बीच अमरीका भारत का साथ देने आ रहा है, उन्हें यह बात सुनना अच्छा नहीं लगेगा कि चीन के साथ अपने बड़े टकराव के चलते हुए हो सकता है कि अमरीका यहां भारत का साथ लेने आ रहा हो। भारत का चीन से सरहदी टकराव तो चल रहा है, लेकिन यह टकराव चीन-अमरीका के टकराव जितना बड़ा और गंभीर नहीं है। अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र से लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन तक कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों पर पिछले महीनों में हमले किए हैं, और ये हमले एक बददिमाग और बेदिमाग राष्ट्रपति की बकवास से अधिक इसलिए रहे हैं कि इन्होंने डब्ल्यूएचओ की साख गिराने की कोशिश भी की है। ऐसे बहुत से अंतरराष्ट्रीय विदेशी मसलों पर अमरीका भारत से साथ की उम्मीद कर सकता है क्योंकि भारत का उन संस्थाओं से ऐसा कोई टकराव नहीं है। 

इन सबसे ऊपर एक बात और समझने की जरूरत है कि भारत को इतना महत्व देते हुए इन दो मंत्रियों का प्रवास इस मौके पर इसलिए भी हो सकता है कि अभी अमरीका में जितने भारतवंशियों के वोट पडऩे हैं, उन पर इस प्रवास का एक असर पड़ जाए। ऐसे ही असर के लिए राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप इसी बरस अहमदाबाद आकर अपने प्रचार की शुरूआत कर गए थे, और आज मंत्रियों का यह दौरा उसी की एक अगली कड़ी भी हो सकती है। यह बात समझने की जरूरत है कि विदेश नीति और रक्षानीति ऐसी चीज नहीं है कि जिनसे अगले कुछ हफ्तों के अमरीकी सरकार के कार्यकाल में भारत कुछ हासिल कर पाए। इसलिए यह अमरीकी वोटरों में से भारतवंशियों की जनधारणा को प्रभावित करने की एक मशक्कत हो सकती है। 

ऐसी बैठकों के महत्व का अखबारी सुर्खियों के लिए अतिसरलीकरण एक आम बात है। जिनसे हासिल कुछ भी नहीं होता, उन्हें भी बड़े जोर-शोर से शोहरत मिल जाती है। खुद अमरीकी राष्ट्रपति से भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गले मिलते देखकर हिन्दुस्तानी जनता ऐसी खुश हो गई थी कि देश में ट्रंप की जीत के लिए दर्जनों जगह हवन हुए, और कहीं-कहीं मूर्ति बनाकर पूजा भी होने लगी, लेकिन तब से अब तक के इन महीनों में ट्रंप ने भारत की बेइज्जती करने वाली ढेर सारी बकवास भी की है, जिसमें से सबसे ताजा तो अभी यह है कि हिन्दुस्तान एक बहुत ही गंदा देश है, यहां की हवा भी बहुत गंदी है। हिन्दुस्तानी कार्टूनिस्टों ने ट्रंप के ऐसे घटिया बयान पर यह कार्टून भी बनाया कि अहमदाबाद में तो झोपड़पट्टियों को छुपाने के लिए मोदी सरकार ने खासी ऊंची दीवार बनवा दी थी, फिर ट्रंप को दीवार पार की गंदगी कैसे दिख गई?
 
आज भारत में बिहार में चुनाव हो रहा है, और बाकी पूरे देश में जगह-जगह उपचुनाव भी हो रहे हैं। हो सकता है कि यह ट्रंप के अमरीकी भारतवंशी वोटरों को प्रभावित करने की कोशिश के अलावा यह कोशिश भी हो कि भारत में जहां कहीं चुनाव हो रहे हैं, वहां मतदान के ठीक पहले अमरीका के साथ प्रतिरक्षा और विदेश नीति पर ऐसी बड़ी बैठक से प्रभाव डालना। हिन्दुस्तानी वोटर गोरी चमड़ी देखकर तेजी से प्रभावित होते हैं, और हो सकता है कि इन दो दिनों में सरकार अपना मुंह खोले बिना भी ऐसा माहौल बनाने में कामयाब हो जाए कि चीन के साथ किसी बड़े टकराव की नौबत में अमरीका भारत के साथ खड़े रहेगा। 
यह बैठक अमरीकी ट्रंप-सरकार के कार्यकाल में इतनी लेट हो रही है कि इसका होना न होना एक बराबर है। ट्रंप की वापिसी से ही इस बैठक के किसी फायदे की उम्मीद की जा सकती है, लेकिन वह भी खासे दूर की बात है। तामझाम के साथ की जा रही दो दिनों की ऐसी बैठक कम से कम भारत को कुछ देकर जाने वाली नहीं है। यह जरूर हो सकता है कि अमरीकी मंत्री भारत के कुछ विदेशी हथियार-खरीद को प्रभावित कर सकें, और अमरीकी कारखानेदारों के लिए कमाई जुटा सकें। अमरीकी रक्षामंत्री अपनी किसी फौज की ताकत लेकर हिन्दुस्तान नहीं आ रहे हैं जैसा कि अमरीका अफगानिस्तान या इराक वगैरह में करते रहा है। अपने साथी देशों के लिए अमरीका के मन में कितनी इज्जत रहती है यह देखना हो तो लोगों को पाकिस्तान में घुसकर अमरीकी फौज द्वारा ओसामा-बिन-लादेन को मारने की घटना याद रखनी चाहिए जिसमें न इस हमले के पहले, और न इस हमले के बाद पाकिस्तान को भरोसे में लिया गया। किसी देश के अधिकारों के लिए ऐसी हिकारत वाले अमरीका से हिन्दुस्तान अगर कुछ पाने की उम्मीद कर रहा है, तो वह नासमझी की बात ही होगी। फिलहाल इस दौरे का सिर्फ एक महत्व हमें जाहिर तौर पर दिख रहा है, अमरीका में बसे हुए भारतवंशी वोटरों को प्रभावित करना, और हिन्दुस्तान में बिहार चुनाव-उपचुनावों में हिन्दुस्तानी वोटरों को गोरी चमड़ी दिखाना। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अक्टूबर 2020


 

एक प्रदेश में हुए बलात्कार दूसरे प्रदेश से अलग कैसे?

 भारत की आज की राजनीति में देश में पार्टियां इस कदर खेमों में बंट गई हैं, और इस हद तक कटुता इनके बीच हो गई है कि उससे परे कोई प्रतिक्रिया इनकी तरफ से आ नहीं सकती। न सिर्फ संसद और विधानसभाओं में, बल्कि सोशल मीडिया और मीडिया में भी इनके बीच बातचीत के रिश्ते खत्म हो गए हैं। नतीजा यह हुआ है कि एक अंधाधुंध हड़बड़ी में एक-दूसरे पर हमले हो रहे हैं, और अधिक वक्त नहीं गुजरता कि दूसरे खेमे के हमले का मौका मिल जाता है।

अभी कुछ हफ्ते पहले उत्तरप्रदेश के हाथरस में एक दलित युवती के साथ गैंगरेप के बाद जिस तरह उसका कत्ल हुआ, उससे देश के लोग सिहर गए थे। बड़ी-बड़ी अदालतों तक यह मामला गया, और बलात्कार के बाद अफसरों ने अपने बर्ताव और फैसलों से पीडि़त परिवार के साथ जिस तरह का दूसरा बलात्कार किया, उससे भी लोग सहम गए थे। खुद यूपी हाईकोर्ट ने शासन-प्रशासन के रूख पर भारी नाराजगी जाहिर की थी, और उस पर जमकर लताड़ लगाई थी। उस वक्त भाजपा के तमाम विरोधियों ने भाजपा पर जमकर हमले किए थे, और उत्तरप्रदेश में कानून का राज खत्म हो जाने की बात कही थी। 

कुछ ही हफ्ते गुजरे कि कल पंजाब में 6 बरस की एक बच्ची से रेप का एक मामला सामने आया जिसमें एक घर में उस बच्ची से बलात्कार के बाद उसे मार भी डाला गया, और उसके शरीर को जलाने की कोशिश भी की गई। इस बात को लेकर भाजपा के एक केन्द्रीय मंत्री और प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से पूछा है कि वे हाथरस और दूसरी जगहों पर जाते हैं, लेकिन राजस्थान में 10 जगह बलात्कार हुए, वहां क्यों नहीं गए? पंजाब में जहां कांग्रेस की सरकार है वहां बिहार के दलित प्रवासी मजदूर की 6 बरस की बच्ची के साथ ऐसा हुआ, वहां क्यों नहीं गए? प्रकाश जावड़ेकर ने तेजस्वी यादव से भी पूछा है कि उनके बिहार की इस दलित बच्ची के साथ एक कांग्रेस राज में ऐसा हुआ है, और वे वहां क्यों नहीं गए? 

यह सवाल जायज है, और आज सार्वजनिक जीवन में जब लोग एक-दूसरे से सवाल अधिक करते हैं, दूसरों के सवालों का जवाब कम देते हैं, तो प्रकाश जावड़ेकर और भाजपा का यह पूछने का हक भी बनता है। जो बात पूछना या कहना वे भूल गए, उस बात को भी हम यहां याद दिला देते हैं कि हाथरस की इस घटना के बाद छत्तीसगढ़ में भी बलात्कार की कई घटनाएं हुई हैं, पहले भी होती रही हैं, लेकिन राहुल गांधी तो छत्तीसगढ़ भी नहीं आए।

हम प्रकाश जावड़ेकर के सवालों और आरोपों को बिल्कुल जायज मानते हैं, और राहुल-प्रियंका को राजस्थान, छत्तीसगढ़ या पंजाब के बलात्कार पर फिक्र और हमदर्दी भी जाहिर करनी चाहिए, इसके अलावा बयान भी देना चाहिए। लेकिन जो बात हाथरस के बलात्कार को बाकी प्रदेशों के दूसरे बलात्कारों से अलग करती है, उस पर प्रकाश जावड़ेकर को अभी तक किसी ने जवाब दिया नहीं है। वह फर्क यह है कि अगर एक दलित युवती के साथ गैंगरेप और हत्या की शिकायत पर पुलिस और प्रशासन ने ठीक से जरूरी कार्रवाई कर दी होती, तो यह मामला इतना बुरा बनता ही नहीं। लेकिन पुलिस और प्रशासन ने बलात्कार की शिकायत आने के बाद से लेकर उस लडक़ी के अंतिम संस्कार तक एक ऐसे अपराधी गिरोह की तरह काम किया जिसकी नीयत बलात्कारियों को बचाने की, और बलात्कार के बाद मार दी गई लडक़ी को एक बार और बलात्कार करके एक बार और मारने की दिखती रही। यह बात हम ही नहीं कह रहे, उत्तरप्रदेश हाईकोर्ट की जजों ने भी हाथरस के अफसरों से लेकर लखनऊ के बड़े अफसरों तक की खूब खबर ली है, उन्हें खूब लताड़ा और फटकारा है। हाथरस का मामला महज एक बलात्कार और हत्या का मामला नहीं है, वहां पर मुजरिमों को बचाने के लिए, या रेप की शिकार मृत युवती के चाल-चलन से लेकर उसके परिवार तक पर शक के सवाल खड़े करने के लिए सरकारी नुमाइंदों की कोशिश का यह मामला है। आज बिहार चुनाव में फंसे हुए सभी नेताओं में से किसी ने इस नजरिए से प्रकाश जावड़ेकर के सवाल और आरोप का जवाब नहीं दिया है, लेकिन एक अखबार के रूप में हम इस सवाल के बिना, इस मुद्दे को उठाए बिना भाजपा के बयान को ज्यों का त्यों नहीं ले सकते। अभी तक राजस्थान, पंजाब, या छत्तीसगढ़ से ऐसी कोई खबर नहीं आई है कि राज्य सरकार या स्थानीय अधिकारी बलात्कार के मामलों को दबाकर पीडि़त परिवार की साख चौपट करने में लगे हुए हैं, अंतिम संस्कार के उनके बुनियादी हक को छीनने में लगे हुए हैं। बलात्कार और जख्मी करने के बाद की प्रशासन की भूमिका से लेकर राज्य स्तर के अफसरों तक की भूमिका में उत्तरप्रदेश को भाजपा विधायक सेंगर के बलात्कार मामले में भी  अलग प्रदेश साबित कर दिया था, और हाथरस के इस मामले में भी।
 
हमारा स्पष्ट मानना है कि बलात्कारों को कोई भी सरकार पूरी तरह रोक नहीं सकतीं, क्योंकि हर लडक़ी या महिला के पीछे सुरक्षा दस्ता तैनात नहीं किया जा सकता, लेकिन दूसरी तरफ एक बार जानकारी आ जाने पर या शिकायत आ जाने पर शासन-प्रशासन का जो रूख रहता है, वही सरकार की नीयत और जनता की नियति साबित करता है। उत्तरप्रदेश का रिकॉर्ड इस मामले में लगातार बहुत खराब है, और वहां पर सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं, सरकार के बड़े-बड़े अफसरों ने जो संवेदनशून्यता दिखाई है, उसकी कोई मिसाल देश के दूसरे राज्यों में देखने नहीं मिलती है।   

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अक्टूबर 2020


 

बात की बात, 23 अक्टूबर 2020


 

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अक्टूबर 2020


 

नेताओं के दारू पीने पर कुछ चर्चा बिना पिए हुए

 छत्तीसगढ़ के कांग्रेस और भाजपा नेताओं में शराब को लेकर बहस चल रही है। भाजपा के एक बड़े नेता, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने शराब के मिलावटी होने का आरोप लगाया, तो जवाब में कांग्रेस के लोग टूट पड़े कि कौशिक शराब पीते हैं। इस बयानबाजी के बीच पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने कांग्रेसियों के लगाए आरोपों को खराब बताया है कि नेता प्रतिपक्ष को जो शिकायतें मिलीं उनके आधार पर उन्होंने बयान दिया है, इसे इस तरह बताया जा रहा है कि मानो धरमलाल कौशिक शराब पीते हैं। 

अब शराब हिन्दुस्तान में एक हकीकत भी है, और जनधारणा उसके खिलाफ इस तरह है कि खुद तो लोग शराब पीना चाहते हैं, लेकिन अपने नेताओं से उम्मीद करते हैं कि वे शराब न पिएं। यह भी हो सकता है कि उनकी नेताओं से ऐसी उम्मीद न हो, क्योंकि उनको हकीकत का अहसास हो, लेकिन नेता खुद ही अपनी ऐसी तस्वीर पेश करना चाहते हों कि वे शराब नहीं पीते हैं। यह देश शराब के मामले में असभ्य देश है, कोई पार्टी हो, या कहीं और मुफ्त की शराब हो, लोग गिरने-पडऩे तक पीने लगते हैं, कि मानो कोई अगला सबेरा होना ही नहीं है। दुनिया के बहुत से ऐसे देश हैं जहां शराब पीना रोजमर्रा की संस्कृति है, और लोग परिवार के साथ बैठकर शराब पीते हैं, लेकिन बहकने के पहले थम जाते हैं, और वहां रिहायशी इलाकों के बीच भी शराबखाने रहते हैं, सरकारी या सामाजिक संस्थाओं की पार्टियों में भी शराब रखी जाती है, लेकिन शराब वहां गंदी चीज नहीं बन पाई है, जैसी कि हिन्दुस्तान में है। 

एक तरफ तो हिन्दुस्तान में इक्का-दुक्का नेताओं को छोडक़र कोई भी सार्वजनिक रूप से यह मंजूर नहीं करते कि वे शराब पीते हैं। कर्नाटक में रामकृष्ण हेगड़े मुख्यमंत्री रहे, और उन्होंने अपने शराब पीने की बात कभी नहीं छुपाई। शिवसेना के बाल ठाकरे बियर पीते थे, और उन्होंने वह बात नहीं छुपाई। बाल ठाकरे ने एक आमसभा में शरद पवार पर यह आरोप लगाया था कि वे रोज शाम अपने पूंजीपति दोस्तों के साथ बैठते हैं, और विदेशी शराब पीते हैं। अपने खुद के बारे में उन्होंने कहा- मैं राष्ट्रवादी हूं, और मैं सिर्फ हिन्दुस्तानी बियर पीता हूं, रोज दो बोतल बियर मेरा पेट ठीक रखती है। 

लेकिन राष्ट्रीय स्तर के कोई और नेता एकबारगी याद नहीं पड़ते जिन्होंने अपने पीने के बारे में खुलकर मंजूर किया हो। हालत यह है कि लोग अपने विरोधियों की ऐसी तस्वीरें जुटाने में लगे रहते हैं जिनमें कांच के पारदर्शी ग्लास में वे दारू के रंग का कुछ पीते दिख रहे हैं, फिर चाहे वह काली या लाल चाय ही क्यों न हों। हिन्दुस्तान में दारू पीने की संस्कृति और सभ्यता न होने से यह नौबत आई है कि दारू इतनी बदनाम हो गई है। वरना जिन लोगों को ब्रिटिश संसद जाना नसीब हुआ है, वे अगर इसके बारे में पहले से पढ़े बिना जाते हैं, तो यह देखकर हक्का-बक्का रह जाते हैं कि वहां निम्न और उच्च सदन, दोनों के सदस्यों के लिए अलग-अलग शराबखाने संसद भवन के भीतर ही हैं। वहां मीडिया के लिए भी अलग से शराबखाना है, और शायद मंत्रियों के लिए या अधिकारियों के लिए भी अलग से बार है। हिन्दुस्तान में कोई ऐसी कल्पना भी नहीं कर सकते कि संसद भवन के अपने कमरे में भी कोई शराब पी ले, और वह बात उजागर हो जाए। 

हिन्दुस्तान की राजनीति और सार्वजनिक जीवन में शराब ही अकेला पाखंड नहीं है, और भी बहुत सी चीजें यहां लोगों को बदचलन या बुरा साबित करने के लिए इस्तेमाल होती हैं। नेहरू के जो विरोधी राष्ट्रवादी होने के लिए मेहनत करते रहते हैं, उन्हें नेहरू की सिगरेट पीते हुए दो-तीन तस्वीरें इतनी पसंद हैं कि अपने माता-पिता की फोटो भी उन्हें उतनी पसंद नहीं होगी। वे सोते-जागते नेहरू की सिगरेट पीती तस्वीर को पोस्ट करके उन्हें बदचलन साबित करने की कोशिश में लगे रहते हैं। और नेहरू थे कि एक से अधिक मौकों पर उन्होंने बंद कमरे के बाहर भी सिगरेट पी थी और उनको आसपास कैमरे होने का भी अहसास था। 

लेकिन राजनीति के साथ-साथ सामाजिक जीवन में भी आम लोगों की खास लोगों से कई उम्मीदें बंध जाती हैं। चाल-चलन को लेकर आम लोग यह उम्मीद करते हैं कि उनके नेता का चाल-चलन ठीक रहे, फिर चाहे आम से लेकर खास तक तमाम लोगों का चाल-चलन हकीकत में बिगड़ा हुआ ही क्यों न रहे। और यह बात महज हिन्दुस्तान में नहीं है, ब्रिटेन से लेकर अमरीका तक बहुत से ऐसे देश हैं जहां पर नेताओं को अपने विवाहेतर संबंधों को लेकर पद छोडऩा पड़ा हो, सार्वजनिक रूप से अफसोस जाहिर करना पड़ा हो, या अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की तरह संसद में महाभियोग का सामना करना पड़ा हो। जिन पश्चिमी देशों को हिन्दुस्तानी लोग सेक्स-संबंधों के मामलों में बड़ा उदार और खुला हुआ मानते हैं, वहां पर एक-एक सेक्स-संबंध को लेकर लोगों को कुर्सियां छोडऩी पड़ जाती हैं, अगर उनका नाम डोनल्ड ट्रंप न हो। जहां तक ट्रंप का सवाल है, तो वे सार्वजनिक जीवन के किसी भी पैमाने से ऊपर हैं, और हर पैमाने के लिए उनके मन में भारी हिकारत है। 

छत्तीसगढ़ में शराब को लेकर शुरू हुई बहस शराब के बहुत से दूसरे पहलुओं तक जा सकती थी, जहां तक जानी चाहिए थी, लेकिन पूरी बहस महज इस मुद्दे पर पटरी से उतर गई कि धरमलाल कौशिक शराब पीते हैं या नहीं। क्या कांग्रेस और भाजपा के लोग अपनी पार्टी के बारे में ऐसा दावा कर सकते हैं कि उनकी पार्टी के नेताओं में शराबी कम हैं? लोगों ने छत्तीसगढ़ में ही कांग्रेस के एक मंत्री के पैर विधानसभा के भीतर लंच के बाद लडख़ड़ाते हुए देखे हैं, हालांकि वे अब इस दुनिया में नहीं हैं, इसलिए यह बात विधायकों में अब मजाक के रूप में भी ठंडी पड़ गई है। प्रदेश के आबकारी मंत्री, और आज के कांग्रेस के एक बड़े आदिवासी नेता कवासी लखमा खुलकर इस बात को मंजूर करते हैं कि वे शराब पीते हैं, और यह आदिवासी संस्कृति का एक हिस्सा है। लेकिन बारीकी से समझें तो यह बात साफ है कि वे आदिवासी के रूप में इस बात को कहते हैं जिनकी जिंदगी में छुपाने को कुछ नहीं होता, और जिनके पास दारू पीने के लिए बंद कमरा भी नहीं होता। कवासी लखमा एक कांग्रेस नेता के रूप में इस बात को ठीक उसी तरह छुपा लेते जिस तरह भाजपा के तमाम लोग अपने इतिहास के एक सबसे बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में छुपा लेते हैं। हालांकि उनके करीबी लोगों का यह मानना है कि उन्होंने खुद कभी इस बात को नहीं छुपाया, यह एक अलग बात है कि इस बात को शब्दों में मंजूर भी नहीं किया।
 
हमारा ख्याल है कि सार्वजनिक जीवन में जो लोग हैं अगर वे शराब पीना चाहते हैं तो उन्हें नशे में धुत्त हुए बिना शराब का आनंद लेना आना चाहिए। और इसके साथ-साथ उनमें इतना नैतिक मनोबल भी होना चाहिए कि वे इस बात को मंजूर कर सकें। यह वैसे तो लोगों की निजी जिंदगी की बात है, लेकिन इसे सार्वजनिक मुद्दा बना ही दिया गया है, तो पाखंडी होने के बजाय हौसलेमंद होना बेहतर है। हमारा ख्याल है कि हिन्दुस्तान में जिस प्रदेशों में शराबबंदी नहीं हैं, वहां लोग अपने नेता को हौसलेमंद देखना चाहेंगे, बजाय पाखंडी देखने के। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 अक्टूबर 2020


 

बाकी देश से कटकर बिहार में तय होगी कोरोना-टीका नीति?

 भाजपा ने बिहार चुनाव के अपने घोषणापत्र से एक ऐसे मुद्दे को छेड़ा है जो देश के किसी भी चुनाव में शायद पहली बार इस्तेमाल हो रहा है। इसमें संकल्प लिया गया है कि अगर बिहार में भाजपा सत्ता में आती है तो मुफ्त कोरोना-टीकाकरण किया जाएगा। चूंकि भाजपा केन्द्र में भी न सिर्फ सरकार में है, बल्कि सरकार की मुखिया भी है, प्रधानमंत्री भी भाजपा के हैं, इसलिए बिहार की भाजपा को देश से अलग काटकर नहीं देखा जा सकता, और भाजपा भी देश की या दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करते हुए अपने आपको बाकी दुनिया से काटकर नहीं देख सकती। इस नाते भाजपा ने यह घोषणा करके एक सवाल खड़ा किया है कि क्या केन्द्र में उसकी सरकार और उसके प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी बाकी देश के लिए उतनी नहीं है जितनी कि बिहार में भाजपा की सरकार बनने पर वहां की राज्य सरकार उठाने का दावा कर रही है?

 
चुनावों में लोगों को मुफ्त के तोहफे, कई किस्म की रियायतें, टैक्स की छूट, और जनकल्याणकारी या सार्वजनिक विकास के कार्यक्रमों का लुभावना घोषणापत्र तो अब तक मिलते ही आया है, अगर बिहार में भाजपा गठबंधन वाली सरकार बनती है, तो पूरे बिहार को मुफ्त में कोरोना का टीका भी मिलेगा। अब सवाल यह उठता है कि क्या बाकी देश ने ऐसा कोई कुसूर किया है कि वहां चुनाव की नौबत नहीं आ रही, और भाजपा को बाकी देश में भी कोरोना का टीका मुफ्त में देने का वायदा नहीं करना पड़ रहा? यह सवाल छोटा नहीं है, क्योंकि आज देश की नीति कोरोना के टीके को लेकर अभी बनी भी नहीं है, और केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री की घोषणा पर भरोसा किया जाए तो जुलाई 2021 तक देश में 20-25 करोड़ लोगों को कोरोना का टीका पहुंचाने की पूरी कोशिश केन्द्र सरकार करेगी। खुद मंत्री की कही बातों का सीधा-सीधा मतलब यह है कि जुलाई 2021 तक देश में सौ करोड़ से अधिक लोगों को कोरोना का टीका नहीं मिल पाएगा। अभी तक केन्द्र सरकार की यह नीति भी सामने नहीं आई है कि यह टीका किसी राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत लगाया जाएगा, या किसी तबके को खुद खरीदना होगा। अभी कुछ भी साफ नहीं है। और जहां तक इस महामारी का मामला है तो हमारी साधारण समझ से कोई भी केन्द्र सरकार किसी एक राज्य के साथ अलग बर्ताव नहीं कर सकती, और वह सभी राज्यों को बराबरी से ही देख सकेगी। आज जब कोरोना के टीके को लेकर कुछ भी साफ नहीं है, तब अगर भाजपा बिहार में चुनाव जीतने की हालत में लोगों से मुफ्त टीके का वायदा कर रही है, तो चुनाव हार जाने की हालत में उस पार्टी की केन्द्र सरकार क्या करेगी? भाजपा एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में क्या करेगी? बिहार की किसी भी पार्टी की सरकार अगर ऐसा करना भी चाहेगी तो क्या एक देश के भीतर ऐसा कोई कार्यक्रम किसी एक प्रदेश की सरकार अपने लोगों के लिए चला सकती है जहां पूरे देश की सरकार और पूरे देश की जिम्मेदारी देश के तमाम तबकों के लिए एक बराबर है? क्या बिहार या किसी भी दूसरी राज्य सरकार को ऐसा कोई हक रहेगा कि वे पूरे देश के लिए केन्द्र सरकार की बनाई गई नीति और कार्यक्रम से परे टीके खरीदकर अपने लोगों को लगा सकें? एक महामारी से देश की आबादी को बचाने के लिए जैसी खतरनाक नौबत आज देश के सामने खड़ी हुई है, उसे देखते हुए एक राज्य के चुनाव में ऐसी घोषणा लुभावनी चाहे जितनी हो, गैरजिम्मेदार बात है, और इसे लेकर पिछले कुछ घंटों में सोशल मीडिया पर बहुत कुछ लिखा भी जा रहा है। 

चुनाव आते-जाते रहते हैं, लेकिन देश के प्रमुख राजनीतिक दलों को, केन्द्र और राज्य की सरकारों को, अपने आपको राष्ट्रीय मूलधारा और राष्ट्रीय भावना, राष्ट्रीय आपदा, और राष्ट्रीय जरूरत से काटकर अलग नहीं रखना चाहिए। अगर बिहार का कोई क्षेत्रीय दल ऐसी कोई घोषणा करता तो वह क्षेत्रीय दल का तंगनजरिया और उसकी तंगदिली का एक सुबूत रहता। लेकिन एक राष्ट्रीय दल जिसकी मौजूदगी आज देश के हर प्रदेश में है, वह बिहार को चुनाव के मौके पर अलग से ऐसे कौन से लुभावने वायदे दे सकता है जो कि बाकी देश की जिंदगियां बचाने के लिए जरूरी हैं, और जो पूरे देश को एक बराबरी से उपलब्ध कराना केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी है। 

हम बाकी चुनावी वायदों को लेकर कुछ नहीं कहते, कोई दस लाख नौकरी का वायदा कर रहा है, तो कोई और किसी दूसरी बात का। लेकिन महामारी से बचाव के लिए टीके को लेकर किया गया ऐसा वायदा सिवाय गैरजिम्मेदारी के और कुछ नहीं है। अभी यह समझना मुश्किल है कि जिस पार्टी की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार के जिम्मे अपना विकसित किया हुआ, या दुनिया में कहीं से भी लाया हुआ टीका पूरे देश को एक नीति और एक कार्यक्रम के तहत बिना भेदभाव के उपलब्ध कराना है, उसकी पार्टी की सरकार बनने पर एक राज्य में किस तरह वह पूरी जनता को राज्य सरकार की तरफ से उपलब्ध कराया जाएगा? बात सिर्फ टीके के दाम की नहीं हैं, और यह दाम भी पूरे देश के लिए केन्द्र सरकार को ही देना चाहिए, क्योंकि एक महामारी से बचने का टीका महज पैसे वाले खरीदकर लगवा लें, और गरीब मर जाएं, ऐसा तो कोई सरकार कर नहीं सकती। अभी तो केन्द्र सरकार राज्य सरकारों से बात करके सीमित संख्या में आने वाले या बनने वाले कोरोना-टीकों को लगाने की प्राथमिकता तय करने वाली है। किस तरह यह काम होगा, वह तय होना भी अभी बाकी है। देश के लोग भी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि स्वास्थ्यकर्मियों, सुरक्षाकर्मियों, सफाईकर्मियों से होते हुए कब बाकी जनता तक यह टीका पहुंचेगा। कोरोना से बचाव का टीका चावल या दाल नहीं है जिसे कोई राज्य सरकार पहले खरीदकर, पहले आयात करके अपने लोगों में बांट दे। इसलिए बिहार चुनाव में मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए भाजपा के घोषणापत्र का यह मुद्दा जिम्मेदारी से तय नहीं किया गया है, इसलिए कि किसी राज्य सरकार की कोई भूमिका अभी तय ही नहीं है, कोरोना के टीके को लेकर कोई नीति या रणनीति ही अभी केन्द्र सरकार ने तय नहीं की है, ऐसे में कोई राज्य सरकार उसे लेकर क्या वायदा कर सकती है? 

आज जब लॉकडाऊन और कोरोना के इलाज को लेकर, देश के स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई के लिए स्मार्टफोन वाले, और बिना स्मार्टफोन के लोगों के बीच तरह-तरह की खाईयां खुद चुकी हैं, तब ऐसे में बिहार और बाकी प्रदेशों के बीच एक और खाई खोदना निहायत ही गलत बात है। एक महामारी से कोई एक प्रदेश अपने-आपको एक टापू की तरह नहीं बचा सकता, और बिहार में भाजपा को एक टापू-पार्टी की तरह बर्ताव नहीं करना चाहिए। आने वाले दिनों में बाकी देश में इस घोषणा पर और तबकों की प्रतिक्रियाएं सामने आएंगी, हो सकता है कि बिहार चुनाव में भाजपा को इसका फायदा मिल जाए, लेकिन यह हमेशा के लिए एक बहुत बुरी और नाजायज मिसाल की तरह दर्ज तो हो ही चुकी है। 

(Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 21 अक्टूबर 2020


 

आंकड़ों से निकाला अंदाज सही हो या न हो, आज का वक्त अपनी फिक्र करने का

 आंकड़े बड़े दिलचस्प होते हैं। अगर नीयत सही हो, हिसाब लगाने की काबिलीयत हो, तो उनसे भविष्य का अंदाज लगाया जा सकता है। लेकिन नीयत और काबिलीयत में से एक भी बात गड़बड़ हो, तो लोगों को एक नाजायज खुशी दी जा सकती है, या नाजायज दहशत में डाला जा सकता है। जिस तरह हिन्दुस्तान में एक गलत वैज्ञानिक हिसाब लगाया गया, और जुलाई के पहले-दूसरे हफ्ते में शुरू होने वाले कोरोना-वैक्सीन ट्रायल के बाद 15 अगस्त को वैक्सीन की घोषणा का हिसाब भी लगा लिया गया था। खैर, उस बात को छोड़ें, और एक नई दिलचस्प बात पर सोचें कि आने वाले बरसों में नौकरियों और काम के मामले में इंसानों और मशीनों का कैसा मुकाबला होगा। 

विश्व आर्थिक मंच (वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम) की एक ताजा रिपोर्ट कहती है कि आने वाले बरसों में दुनिया में 8.7 करोड़ लोगों की नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं। उसका हिसाब है कि 2025 तक ही 8.7 करोड़ नौकरियां इंसानों से छिनकर मशीनों में चली जाएंगी, लेकिन 9.7 करोड़ नए काम पैदा भी होंगे। अब पहली नजर में देखने पर तो ये आंकड़े खुशी के लगते हैं कि जितने इंसानों की नौकरियां जाएंगी, उनसे अधिक नौकरियां खड़ी हो जाएंगी। लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि आज धरती की जो आबादी है वह पांच बरस बाद कितनी होगी? इतनी आबादी तो इन पांच बरसों में अकेले हिन्दुस्तान की बढ़ जाएगी। इसलिए बढ़ती हुई आबादी के मुकाबले बढ़ती हुई नौकरियां अगर अधिक नहीं होंगी, तो वे किसी काम की नहीं रहेंगी, और मशीनें तो रोज लोगों को बेरोजगार करेंगी ही। 

अब जैसे आज की यह बात हम एक कम्प्यूटर पर टाईप कर रहे हैं जिसमें टाईपिंग के लिए एक ऑपरेटर की जरूरत पड़ रही है। लेकिन जैसा कि आज अंग्रेजी के साथ है, बिना की-बोर्ड छुए बोलकर टाईप करना चलन में आ चुका है, वैसा ही अगर बाकी भाषाओं में होते चलेगा, होने लग भी गया है, तो बोलकर टाईप करवाने के लिए एक कर्मचारी की जरूरत खत्म हो जाएगी। ऐसे अनगिनत काम हैं जिनमें से इंसानों को हटाया जा रहा है। एयरपोर्ट और विमानों में कर्मचारियों को घटाया जा रहा है, ऐसा भी नहीं कि उनमें से हर काम के लिए मशीन खड़ी हो रही हैं, दरअसल जब कंपनियां घाटे में चल रही हैं, तो वे अपने काम में सुधार करके कहीं बिजली बचा रही हैं, कहीं कर्मचारी घटा रही हैं, और कहीं सामानों की बर्बादी कम कर रही हैं। बुरा वक्त अच्छा सबक लेकर आता है, दुनिया के सारे उद्योग-धंधे आज अपने खर्च को घटाने में लगे हुए हैं, और जाहिर है कि इसकी पहली मार कर्मचारियों पर ही पड़ती है।
 
वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम की रिपोर्ट कहती है कि 2025 तक दुनिया में काम कर रहे लोगों में 9 फीसदी से लेकर 15.4 फीसदी तक की कमी आएगी, और इसी दौरान 7.8 फीसदी से लेकर 13.5 फीसदी की बढ़ोत्तरी होगी। इन आंकड़ों को बहस के लिए सही मान लें, तो भी यह है कि बढ़ती आबादी का हिसाब न लगाने पर भी नौकरियां घटने वाली हैं। अब जैसे आज के इसी एक घंटे की एक दूसरी खबर है कि हांगकांग की कैथे पैसेफिक एयरलाइंस ने साढ़े 8 हजार पदों को खत्म करने की घोषणा की है। इससे कुछ तो खाली पड़े पद खत्म हो जाएंगे, लेकिन करीब 6 हजार कर्मचारियों की नौकरी चली जाएगी। खुद हिन्दुस्तान में केन्द्र सरकार ने और कई राज्य सरकारों ने लॉकडाऊन से उबरने के लिए, और कारोबारों को पटरी पर लाने के लिए मजदूर कानूनों में भयानक बदलाव किया है, जिनसे मजदूरों के हक छिन गए हैं, मालिकों के लिए उन्हें नौकरी से निकालना आसान हो गया है, उनसे मुफ्त में ओवरटाईम करवाने का हक मिल गया है, और इसके खिलाफ कही और लिखी जा रही बातों का न केन्द्र सरकार पर असर है, न अलग-अलग राजनीतिक दलों की राज्य सरकारों पर। हुआ यह है कि जब केन्द्र और राज्य सरकारें पूंजीनिवेश पाने की कोशिश करती हैं, तो संभावित उद्योगपति उन्हें मजदूर कानून, जमीन कानून, पर्यावरण कानून की अड़चनों को गिनाना शुरू कर देते हैं कि किन वजहों से वे हिन्दुस्तान या इसके किसी प्रदेश में जाना नहीं चाहते। ऐसे में सरकारें खुलकर कानूनों को खत्म कर रही है, देश में हाल के कुछ बरसों में पर्यावरण कानून को बेअसर सा कर दिया गया है, मजदूर कानूनों का कोई मतलब नहीं रह गया है, और यह सिलसिला रूकते नहीं दिख रहा है। 

आज घरेलू कामकाज से लेकर दफ्तर और दुकान-कारखानों के काम तक, मालिक यह सोचने लगे हैं कि कर्मचारी और मजदूर घटाकर कैसे मशीनों पर काम डाला जा सकता है जो कि न हड़ताल करतीं, न लेबर कोर्ट जातीं, और न कामचोरी करतीं। मशीनों को रात-दिन काम पर झोंका जा सकता है, और कई किस्म के कारखानों में किया भी जा रहा है। और तो और बिना ड्राइवर चलने वाली कार, बस, ट्रेन के प्रयोग बरसों से सडक़ और पटरियों पर हैं, और कुछ बरसों के भीतर कारें खुद अपने को चलाने लगेंगीं, वे ड्राइवरों की नौकरियां खा जाएंगी, और उनमें बैठे लोग पूरे सफर अपने कम्प्यूटर पर काम करते हुए कुछ और लोगों की नौकरियां घटाएंगे। 

वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम का अंदाज चाहे जो हो, हमारा यह मानना है कि न सिर्फ मशीनों की वजह से, बल्कि दूसरी कई वजहों से भी नौकरियां घटती चलेंगी, खासकर इस लॉकडाऊन का तजुर्बा देखकर लोगों को खर्च घटाना होगा, और इसका पहला तरीका घटी हुई तनख्वाह रहेगी। आज हिन्दुस्तान में पिछले छह महीनों में बढ़ी हुई बेरोजगारी के आंकड़े देखें, और इन छह महीनों में बढ़ी हुई आबादी के साथ मिलाकर उसे देखें, तो कई करोड़ लोग बढ़ गए हैं, और कई करोड़ नौकरियां खत्म हो गई हैं। 

आने वाला वक्त महज नौकरियों पर निर्भर दुनिया का वक्त नहीं रहेगा, लोगों को तरह-तरह से नए रोजगार सोचने पड़ेंगे, और हो सकता है कि नौकरी के बजाय स्वरोजगार का चलन बढ़े, और लोग अपनी मेहनत के अनुपात, अपने हुनर के अनुपात में कमाने लगें, जैसा कि आज ओला या उबेर नाम की टैक्सी कंपनियों के साथ जुडक़र कमा रहे हैं। हिन्दुस्तान में आज शहरी सडक़ों पर दसियों लाख लोग खाना पहुंचाने का काम कर रहे हैं, या कूरियर एजेंसियों के मार्फत आने वाले सामान को पहुंचाने का काम। ये काम 10-15 बरस पहले हिन्दुस्तान में नहीं थे, लेकिन अब हैं, और मोटरसाइकिल चलाने के मामूली से हुनर के साथ ऐसे लोग जितनी मेहनत करते हैं, उतना कमाते हैं। 

इस पूरी तस्वीर से यह समझने की जरूरत है कि नौकरियों की किस्म बदल जाएंगी, नौकरियां स्वरोजगार में बदल जाएंगी, मशीनें लोगों को बेदखल करेंगी, लेकिन एक बात बनी रहेगी, कोई भी सेक्टर ऐसा नहीं रहेगा कि जिससे सौ फीसदी नौकरियां खत्म हो जाएं। नतीजा यह होगा कि जिस दुकान, दफ्तर-घर, कारखाने-कारोबार में जिन लोगों का काम सबसे अच्छा रहेगा, वे नौकरियों पर आखिरी तक बने रहेंगे। जो कम काबिल, कम मेहनती, कम हुनरमंद रहेंगे, वे सबसे पहले बेरोजगार होंगे। यह नौबत हर किसी को, हर कर्मचारी को अपने काम को बेहतर बनाने का एक मौका भी दे रही है। लोगों को नए हुनर सीखने चाहिए, या अपने मौजूदा हुनर में काम को बेहतर करने की कोशिश करनी चाहिए। ऐसा करने से कम से कम आज के कामगारों की पीढ़ी की जिंदगी तो निकल सकती है, अगली पीढ़ी अपने रोजगार और अपने स्वरोजगार के बारे में खुद सोचेगी। लेकिन अपने जीते जी, अपनी कामकाजी उम्र के चलते हुए बेरोजगार होने के खतरे से बचने के लिए लोगों को अधिक मेहनत तो करनी पड़ेगी, जब छंटाई होती है, तो सूखी डालें जिनसे कुछ हासिल नहीं होता, उन्हें सबसे पहले काटा जाता है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 अक्टूबर 2020


 

सरकार और कारोबार संग मीडिया की कदमताल...

 इन दिनों कोई फिल्म रिलीज होने वाली रहती है, या कोई टीवी सीरियल या रियलिटी शो शुरू होने वाला रहता है तो उससे जुड़े ढेर सारे समाचार एक साथ सैलाब की तरह टीवी और प्रिंट मीडिया की वेबसाईटों पर छा जाते हैं। मीडिया का जो हिस्सा सिर्फ डिजिटल है, वह शायद और तेज रहता है, और एक फिल्म या एक शो के अलग-अलग कलाकारों के बारे में अलग-अलग फिल्म इतने सुनियोजित ढंग से सब छापा जाता है कि किसी आर्केस्ट्रा पार्टी में कोई गाना बजाया जा रहा हो। पूरे का पूरा मीडिया मनोरंजन को लेकर, खेल को लेकर, या राजनीति को लेकर ओलंपिक में होने वाली सिंक्रोनाइज्ड स्वीमिंग की तरह बर्ताव करने लगता है। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले महाराष्ट्र में अशोक चव्हाण के मुख्यमंत्री रहते हुए जब चुनाव हुआ, तो महाराष्ट्र के बड़े-बड़े अखबारों में सरकार की स्तुति में एक सरीखे परिशिष्ट निकाले, जिनमें कामयाबी की एक जैसी कहानियां थीं, और मजे की बात यह है कि सभी का शीर्षक अशोक पर्व था। अब मानो दीवाली-पर्व हो, या होली-पर्व हो, वैसा ही अशोक-पर्व मनाने में बड़े-बड़े कामयाब-कारोबार वाले अखबार टूट पड़े थे। बाद में प्रेस कौंसिल ने उस पर एक बड़ी सी रिपोर्ट भी बनवाई थी, जो कि सबकी सहूलियत के लिए बखूबी दफन कर दी गई, उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

 
बहुत पहले जब मीडिया प्रिंट तक सीमित था, टीवी महज सरकारी दूरदर्शन था, और इंटरनेट था नहीं, तब गिने-चुने अखबारों को भी इस तरह से मैनेज नहीं किया जा सकता था जिस तरह आज मीडिया के एक बहुत बड़े हिस्से को खर्च करके मैनेज किया जा सकता है। वह एक वक्त था जब मीडिया में कोई भी जानकारी बिना हवाले के नहीं छपती थी कि वह कहां से मिली है, किसका कहना है, और अमूमन ऐसी जानकारी के साथ सवाल भी पूछे जाते थे। आज वह सब कुछ खत्म हो गया है। आज सरकार या नेता के स्तुति गान के बड़े-बड़े सप्लीमेंट बिना किसी हवाले के छपते हैं, खबरों की तरह छपते हैं, और उनका इश्तहारों की तरह सरकारी भुगतान भी हो जाता है। बीते दस-बीस बरसों में समाचार-विचार का इश्तहार से फासला खत्म कर दिया गया है, और अब इश्तहार समाचार के कपड़े पहनकर खड़े हो जाते हैं, मेहनताना भी पाते हैं। 

लेकिन इस मुद्दे पर लिखने से क्या होगा? क्या यह तस्वीर कभी बदल सकती है? अब तो हाल के कुछ बरसों में देखने में यह आ रहा है कि कारोबार और सरकार का साथ देने के लिए मीडिया जिस अनैतिक तरीके को बढ़ाते चल रहा है, वह अनैतिक तरीका अब चरित्र-हत्या के लिए, साम्प्रदायिकता को बढ़ाने के लिए, जातियों के संघर्ष को बढ़ाने के लिए, किसी धर्म को बदनाम करने के लिए, और आज की कारोबारी जुबान में कहें तो परसेप्शन मैनेजमेंट के लिए बढ़ते चल रहा है। अब सरकारों या राजनीतिक दलों से परे, बड़े-बड़े कारोबार मीडिया के इतने हिस्से को अपनी गोद में या अपनी पैरों पर रखते हैं कि उनसे मनचाहा जनधारणा-प्रबंधन हो जाए। अभी लगातार बलात्कार और लगातार साम्प्रदायिक घटनाओं से जब उत्तरप्रदेश की बदनामी सिर चढक़र बोलने लगी, तो यूपी सरकार ने एक नामी-गिरामी जनसंपर्क एजेंसी को रखा है ताकि देश-विदेश में होती सरकार की बदनामी कम हो, उसे यह जिम्मा दिया गया है।
 
एक वक्त जिस तरह इश्तहार की एक ही डिजाइन हर अखबार में एक साथ दिखती थी, और अब अखबारों के अलावा टीवी चैनलों पर भी वीडियो-इश्तहार एक साथ दिखते हैं, कुछ उसी तरह का मामला खबरों को लेकर, कुछ चुनिंदा मुद्दों और विषयों पर एक साथ लेख को लेकर, कदमताल करते हुए इंटरव्यू को लेकर हो गया है। अब मीडिया का सत्ता या कारोबार के साथ ऐसा कदमताल इस हद तक बढ़ गया है कि वह जलते-सुलगते जमीनी मुद्दों की तरफ से ध्यान को भटकाने के लिए उसे किसी एक्ट्रेस के बदन पर ले जाता है, या किसी की की हुई बकवास पर बाकी लोगों की जवाबी बकवास को दिखाने में जुट जाता है। हम इस मुद्दे पर पिछले कुछ महीनों में कई बार लिख चुके हैं, लेकिन पांच-दस दिन गुजरते हुए इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया की सोची-समझी कदमताल फिर इतनी दिखने लगती है कि अपनी सलाह दोहराने को जी करता है कि अखबारों को मीडिया नाम के इस दायरे से बाहर निकलना चाहिए, और प्रेस नाम का अपना पुराना और अब तक थोड़ा सा इज्जतदार बना हुआ लेबल फिर से लगाना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

बिना कुदाल, महज जुबान से अपनी कब्र खोदने में माहिर कांग्रेस के नेता

 सार्वजनिक जीवन में जो लोग लंबे समय से हैं, और खासकर राजनीति जैसे बेरहम पेशे में जिन्होंने जिंदगी गुजारी है, वे किसी तरह की मासूमियत का दावा नहीं कर सकते। वे लोग कहे हुए शब्दों के खतरे समझते हैं, जनता की भावनाओं को समझते हैं, और अपने देश-प्रदेश की संस्कृति को भी अच्छी तरह जानते हैं। ऐसे में जब मध्यप्रदेश में भूतपूर्व मुख्यमंत्री, और भावी मुख्यमंत्री बनने का सपना पाले हुए, कमलनाथ जब एक दलित भाजपा महिला नेता को आइटम कहते हैं, तो वे किसी रियायत के हकदार नहीं हैं। ऐसे ओछे बोल के लिए जो भी सार्वजनिक सजा हो सकती है, उन्हें होनी चाहिए, और अगर यह दलित महिला ऐसी ओछी बात को लेकर कमलनाथ के खिलाफ अदालत भी जाती है तो भी वह नाजायज नहीं होगा। ऐसा नहीं कि इस तरह की अवांछित बातें कहने वाले सिर्फ कांग्रेस पार्टी में हैं, दूसरी पार्टियों में खासकर, भाजपा में तो लोग बलात्कारियों से प्रेम उजागर करने में एक-दूसरे से मुकाबला करते दिखते हैं, जातिवाद की हिंसक बातें करने में, कानून के खिलाफ बोलने में भाजपा के सांसद और विधायक इस अंदाज में मुकाबला करते हैं कि कहीं वे दूसरे से पीछे न रह जाएं। लेकिन कांग्रेस पार्टी चूंकि अपने आपको सबसे पुरानी पार्टी, नेहरू और गांधी की पार्टी, दो-दो महिला कांग्रेस अध्यक्ष वाली पार्टी करार देती है, इसलिए सार्वजनिक जीवन में उससे उम्मीदें भी कुछ अधिक की जाती हैं। दूसरी कई पार्टियों में धर्मांधता की बातें, साम्प्रदायिकता की बातें, हिंसा, और संविधान के लिए हिकारत की बातें  होती ही रहती हैं, इसलिए उन्हें लोग गौर से नहीं देखते, लेकिन कांग्रेस के कई नेताओं में बेमौके अटपटी या ओछी बातें करके माहौल अपनी पार्टी के खिलाफ कर देने की अपार क्षमता है, और बेहद हसरत भी है। 

ऐसे हसरती लोग देश की प्रचलित भाषा और राजनीति में बातों को तोडऩे-मरोडऩे के अंतहीन खतरों को देखते हुए भी बेमौके अटपटी बात करते हैं, और फजीहत खड़ी करते हैं। बहुत पहले एक कहानी थी। एक आदमी के तीन बेटे थे, और तीनों ही तोतले थे, इस वजह से उनकी शादी नहीं हो पा रही थी। ऐसे में जब तीन कन्याओं का एक पिता रिश्ते की बात करने आता है तो लडक़ों का पिता उन्हें खूब धमकाकर तैयार करता है कि वे विनम्र बने रहेंगे, और मुंह भी नहीं खोलेंगे, जो बात करनी होगी वह पिता करेगा। इसके बाद की कहानी सभी ने सुनी हुई है और खाने की थाली के आसपास मंडराते चूहे को देखकर एक-एक करके तीनों बेटे अपना तोतलापन उजागर करते हैं, और उनका पिता अपना सिर पीट लेता है। कांग्रेस पार्टी में यह काम पिछले बहुत सारे बरसों से दिग्विजय सिंह, मणिशंकर अय्यर, शशि थरूर कुछ इसी किस्म का बड़बोलापन दिखाते हैं, और अपनी पार्टी को एक निहायत गैरजरूरी मुसीबत में डालते हैं। आज जब बिहार में चुनाव होना है, और देश में राजनीतिक ताकतें घरेलू मुद्दों के बजाय सरहदी, और सरहद पार के मुद्दों की तलाश में हैं, तब शशि थरूर पाकिस्तान जाकर वहां के किसी कार्यक्रम में भारत के बारे में कुछ कहकर भाजपा को हमला करने का मौका देते हैं। अब सवाल यह है कि जो संयुक्त राष्ट्र संघ में बरसों काम कर चुका है, जो भारत में यूपीए सरकार में विदेश राज्यमंत्री रह चुका है, उसे आज भारत-पाकिस्तान के बीच चल रहे तनाव का अंदाज नहीं है, दोनों तरफ एक-दूसरे के खिलाफ भडक़ाई जाने वाली भावनाओं का अंदाज नहीं है? जब भाजपा बिहार में कांग्रेस के एक उम्मीदवार को लेकर उसका जिन्ना-कनेक्शन स्थापित करने की कोशिश कर रही है, तब शशि थरूर को क्या पड़ी थी कि वे पाकिस्तान जाकर किसी प्रोग्राम में शिरकत करते, और वहां पर भारत के बारे में ऐसा कुछ कहते जिसका बेजा राजनीतिक इस्तेमाल होने का खतरा हमेशा ही रहता है। शशि थरूर अपनी निजी जिंदगी के हादसों और कहानियों को लेकर वैसे भी पार्टी के लिए शर्मिंदगी की वजह बनते रहे हैं, और ऐसे में अपनी जुबान से इस शर्मिंदगी की आग में ईंधन झोंकना किसी किस्म की मासूमियत नहीं हो सकती। 

दिग्विजय सिंह कांग्रेस के भीतर एक किनारे पर किए जा चुके नेता हैं, और आज मध्यप्रदेश के मिनी आम चुनाव में भी वे अधिक दिख नहीं रहे हैं। हो सकता है कि पार्टी में या मध्यप्रदेश के चुनाव-प्रभारी कमलनाथ ने सोच-समझकर उन्हें किनारे रखा हो ताकि उनके किसी बयान से हिन्दू वोटों का बहुतायत भडक़ न जाए। मुस्लिम समाज के प्रति हमदर्दी रखना न सिर्फ कांग्रेस बल्कि कई राजनीतिक दलों की घोषित नीति है। लेकिन इस हमदर्दी को इस अंदाज में लोगों के बीच रखना कि उससे गैरमुस्लिमों के बीच एक बेचैनी खड़ी हो जाए, नाराजगी खड़ी हो जाए, यह कम से कम चुनावी लोकतंत्र में जरूरी नहीं है, और जायज नहीं है। और तो और मनमोहन सिंह जैसे देश के एक सबसे संतुलित और कम शब्दों में बोलने वाले नेता ने जब यह कहा कि देश के साधनों पर पहला हक मुस्लिमों का है, तो वे शब्द भी निहायत गैरजरूरी थे। उन शब्दों से जितना नुकसान कांग्रेस का हुआ, उतना ही नुकसान मुस्लिमों की संभावना का भी हुआ कि वे एक पल में बाकी देश की आंखों की किरकिरी बन गए। 

मणिशंकर अय्यर अपनी पार्टी को नुकसान पहुंचाने वाले बयान देने के मामले में उतने ही माहिर हैं जितने कि उनके गृहराज्य तमिलनाडू से आने वाले भाजपा सांसद  सुब्रमण्यम स्वामी हैं। मणिशंकर तो अभी कुछ अरसा पहले अपनी अनर्गल बातों के लिए कांग्रेस से निलंबित भी किए जा चुके हैं, और सुब्रमण्यम स्वामी को निलंबित करना भाजपा के लिए उतना आसान काम नहीं है क्योंकि देश के बड़े-बड़े भ्रष्टाचार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लडऩे का जो ठोस काम स्वामी ने किया है, उसे अनदेखा करके उन्हें छेडऩे का हौसला शायद भाजपा में नहीं है। 

उत्तरप्रदेश में अनगिनत बलात्कारों और दूसरे वैसे ही जुर्मों की वकालत करते हुए भाजपा के सांसद-विधायक जिस तरह के वीडियो पर कैद हैं, वह भयानक है। कांग्रेस उनके मुकाबले प्रायमरी स्कूल में ही हैं। लेकिन भाजपा के लोग सोशल मीडिया पर अपनी संगठित फौज के साथ पल भर में सक्रिय हो जाते हैं, और कांग्रेस नेताओं के कहे एक भी गलत शब्द पर बवाल खड़ा कर देते हैं। कांग्रेस पार्टी ने ऐसी कोई क्षमता विकसित नहीं की है, और भाजपा के नेता अपने सबसे हिंसक बयानों के साथ भी बच जाते हैं। 

फिलहाल वही पार्टी अपने नेताओं की अवांछित बातों की फिक्र कर सकती है जिसे इनसे नुकसान पहुंचता है। भाजपा के बारे में सबका तजुर्बा है कि ऐसे हिंसक बयान सोच-समझकर दिए जाते हैं, और उनसे फायदा उठाया जाता है। कांग्रेस पार्टी अपनी सोचे, फिलहाल तो मध्यप्रदेश में एक दलित महिला नेता के मानहानि के मुकदमे से कमलनाथ कैसे बचेंगे, उनके वकीलों को इसकी फिक्र करनी चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 अक्टूबर 2020


 

दीवारों पर लिक्खा है, 18 अक्टूबर 2020


 

अब फिर लगातार हाथियों की मौतें, जिम्मेदार कौन?

  कुछ महीने पहले जब प्रदेश में एक के बाद एक हाथी मरने लगे तो प्रदेश के वन्य जीवन प्रमुख, राज्य के सबसे सीनियर आधा दर्जन आईएफएस में से एक अतुल शुक्ला की बलि चढ़ाई गई। वे इस कुर्सी पर रहते हुए जंगली जानवरों के मरने पर पूरे प्रदेश में दौड़-भाग कर रहे थे, ईमानदारी से मेहनत कर रहे थे, लेकिन हाथियों ने एक के बाद एक मरकर, और इंसानों ने उन्हें मारकर अतुल शुक्ला को कुर्सी से बेदखल कर ही दिया। अब पिछले चार दिनों में तीन हाथियों की मौत हो गई है जिनमें एक हथिनी है, और दो छोटे बच्चे हैं। अब लगातार हो रही मौतों की वजह से क्या फिर वन्य जीवन प्रमुख को हटाया जाएगा, या इस बार बारी और जिम्मेदारी उसके ऊपर किसी तक जाएगी? 

जिम्मेदारी तय करते हुए सरकारें अपनी इमेज बचाने के लिए इस तरह के कई काम करती हैं। प्रदेश के वन्य जीवन प्रमुख को हटाकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और वनमंत्री मो. अकबर ने जिम्मेदारी पीसीसीएफ वाइल्ड लाईफ अतुल शुक्ला पर तय कर दी थी। अब किस पर तय होगी? इस कुर्सी पर बैठे नरसिंह राव पर, या मंत्री पर? 

लोगों को याद होगा कि जब के.एम. सेठ राज्यपाल थे, और आर.पी. बगई मुख्य सचिव थे, तब पीएससी में गड़बड़ी की खबरें आईं, और राजभवन के सामने प्रदर्शन हुआ। सडक़ पर लग रहे नारे भीतर तक पहुंचे। ये दोनों लोग रिटायर्ड फौजी थे, और रोज शाम की राजभवन की महफिल के संगवारी भी थे। शाम के सुरूर में तय किया गया कि पीएससी चेयरमेन अशोक दरबारी को हटाकर यह दिखा दिया जाए कि पीएससी में गड़बड़ी के जिम्मेदार दरबारी थे। जबकि हकीकत यह थी कि उनके बहुत मातहत लोगों ने अपने नीचे के स्तर पर गलत काम किया था जिसकी कोई जिम्मेदारी दरबारी की नहीं थी। अब नैतिक आधार पर अगर संस्था के प्रमुख को जिम्मेदार ठहराना है तो हर बात के लिए मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को जिम्मेदार ठहराना बेहतर होगा ताकि हर विधायक को एक बार मुख्यमंत्री बनने मिले, और हर सांसद को एक बार प्रधानमंत्री बनने का मौका मिल जाए। तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह का वह पहला कार्यकाल था, और इन दो फौजी लोगों के दबाव में आकर उन्होंने दरबारी को हटा दिया। उस वक्त भी इस अखबार में जमकर लिखा गया था कि सरकार यह गलत काम कर रही है, और उसे मुंह की खानी पड़ेगी। दरबारी सुप्रीम कोर्ट तक गए, और सुप्रीम कोर्ट से जीतकर आए। लेकिन उस फैसले के पीछे के न सेठ यहां हैं, न बगई, और रमन सिंह भी, बाकी अच्छे-बुरे मुद्दों से इतने घिरे रहे कि छत्तीसगढ़ के बाहर बसे अशोक दरबारी उनके लिए स्थाई अपमान नहीं खड़ा कर पाए।
 
जब किसी की जिम्मेदारी कहीं तय करनी होती है, तो हर बात की एक सीमा होनी चाहिए। वरना एक थानेदार की तैनाती भी वैसे तो सरकार राज्यपाल के नाम से करती है, तो क्या थानेदार बलात्कार में पकड़ा जाए तो जिम्मेदारी राज्यपाल तक जाएगी? मैदानी इलाकों में जब अवैध बिजली चारों तरफ फैलाकर रखी जाती है, ताकि जंगली जानवर फसल खराब न कर सकें, तो राजधानी में बिठाए गए प्रदेश स्तर के अफसर को क्या उसके लिए जिम्मेदार ठहराकर सजा दी जा सकती है? जब जिम्मेदारी तय करने की एक जायज सीमा तय नहीं होती, तो ऐसे ही नाजायज काम होते हैं। अब कल एक दिन में ही दो अलग-अलग जगह मारे गए हाथी-शिशुओं के लिए क्या फिर से वन्य जीवन प्रमुख को बेदखल किया जाएगा? सरकार में बैठे लोगों को गलत मिसालें कायम करने से बचना चाहिए। पूरे प्रदेश में अगर बिजली का करंट फैलाकर जंगली जानवरों को खेतों से दूर रखा जा रहा है, तो यह पहली जिम्मेदारी तो बिजली विभाग की है, दूसरी जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों की है, और वन विभाग की जिम्मेदारी तो इतने हिस्से में कहीं आती नहीं है। 

जब नाजायज तरीके से किसी बड़े सिर की बलि देने की नीयत से ऐसी कोई कार्रवाई की जाती है, तो उससे ईमानदार और मेहनती, जिम्मेदार और काबिल अफसरों का मनोबल टूटता है, गलत मिसालें कायम होती हैं, और असली जिम्मेदार बच निकलते हैं। चूंकि मरने वाले जंगली जानवर थे, इसलिए बाकी विभागों को जिम्मेदारी से परे करके केवल जंगली जानवरों के लिए तैनात अफसरों को बलि चढ़ाना एक गलत सिलसिला था। आज तो सारे अफसर बदल दिए गए हैं, और सरकार ने जो इलाज किया था, उसके बाद भी हाथियों की लगातार मौतों की यह बीमारी बनी हुई है।
 
फैसला लेने वाले नेताओं के आसपास ऐसे अफसर भी रहने चाहिए जो कि नेताओं की गलत मर्जी या फैसले की चूक के खिलाफ मुंह खोल सकें। लेकिन आज दिक्कत यह है कि बड़े-बड़े अफसर सत्तारूढ़ नेताओं के पांव छूने को ऐसे लपकते हैं कि वे नेता की गलती पर उसका हाथ थामकर उसे भला क्या रोक पाएंगे। समझदार नेता वे होते हैं जो कि पांव छूने वालों के बजाय हाथ पकडऩे वालों को करीब रखते हैं। यह एक अलग बात है कि सत्ता या राजनीति में नेताओं के पैरों को हर कुछ देर में कोई न कोई उंगलियां छूते रहना चाहिए, वरना पैर बेचैन होने लगते हैं। ऐसे बेचैन पैर ही गलत फैसले लेते हैं।   

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 17 अक्टूबर 2020


 

फ्रांस के टीचर का सिर काटने से सीखने की जरूरत बाकी देशों को भी

 फ्रांस की राजधानी पेरिस में एक हमलावर ने एक स्कूल शिक्षक का सिर काट दिया। वह तो कत्ल करने में कामयाब हो गया, लेकिन पुलिस की गोली से इस हमलावर की मौत हो गई। वहां से खबर आई है कि इस शिक्षक ने अपनी क्लास अभिव्यक्ति की आजादी समझाते हुए उन कार्टूनों की मिसाल दी थी, और कार्टून दिखाए थे जो मोहम्मद पैगम्बर पर बनाए गए थे, और जिन्हें प्रकाशित करने वाली एक पत्रिका पर हमले में दर्जन भर से अधिक लोग मारे भी गए थे। शार्ली एब्दो नाम की इस पत्रिका ने कुछ बरस पहले उन्हें छापा था और इसे लेकर उस पर इस्लामी आतंकियों ने बड़़ा हमला किया था जिसमें पत्रिका के कई लोग मारे गए थे। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अभी शिक्षक के कत्ल को इस्लामिक आतंकी हमला बताया है और इसे कायराना हरकत कहा है। राष्ट्रपति उस जगह पर भी पहुंचे जहां इस शिक्षक का सिर काटा गया। उसे रोकते हुए ही पुलिस ने हमलावर को गोली से मार दिया। जब इस शिक्षक ने कक्षा में अभिव्यक्ति की आजादी समझाते हुए मिसाल के तौर पर ये कार्टून दिखाए थे तो कुछ मुस्लिम मां-बाप ने स्कूल से इसकी शिकायत की थी। और अब यह हमला हुआ। 

शार्ली एब्दो पर हुए हमले के पीछे के 14 लोगों के खिलाफ अभी मुकदमा शुरू हुआ है और फ्रांस में एक बार फिर ये कार्टून खबरों में हैं। इस पत्रिका ने अभी फिर से इन्हें प्रकाशित किया है जिन्हें लेकर फ्रांस के बाहर भी कुछ जगहों पर आतंकी हमले हुए थे। अब यह लोकतंत्र और धार्मिक संवेदनशीलता के बीच का एक जटिल अंतरसंबंध है जो जगह-जगह टकराहट की वजह बनता है। न सिर्फ फ्रांस में बल्कि दुनिया के कई देशों में धार्मिक आतंकी अपने धर्म को देश के कानून और लोकतंत्र से ऊपर मानते हैं। हिन्दुस्तान में कई लोगों को यह मिसाल खटकेगी, लेकिन हकीकत यह है कि 1992 में जिन लोगों ने बाबरी मस्जिद गिराने का अभियान छेड़ा था, और जिन लोगों ने उसे गिराया था, उन तमाम लोगों की आस्था अपने धर्म पर देश के संविधान के मुकाबले अधिक थी। उन्होंने संविधान और कानून का राज इन दोनों को खारिज करते हुए बाबरी मस्जिद को गिराया था, और उसके पहले से मंदिर वहीं बनाएंगे का नारा चले आ रहा था, जबकि मामला अदालत में था। लोगों को उस वक्त के बड़े-बड़े नेताओं के बयान याद होंगे जो कि धर्म को संविधान से ऊपर करार देते थे। और इन सब बातों ने देश के माहौल को ऐसा हमलावर बना दिया था कि लाखों लोग मस्जिद गिराने के लिए एकजुट हो गए थे।
 
अलग-अलग देशों में अलग-अलग धर्मों की संवेदनशीलता भी अलग-अलग रहती है, और वहां सरकारों की सोच भी कानून के मुताबिक, या अराजकता को बढ़ावा देने वाली रहती है। लेकिन एक बात हर जगह एक सरीखी रहती है कि धार्मिक आतंक सबसे पहले अपने धर्म का नाम ही खराब करता है, और लोकतंत्र को कमजोर करता है। आज हिन्दुस्तान में धर्मान्धता और धार्मिक कट्टरता के खतरे उसी रास्ते पर बढ़ रहे हैं जिस रास्ते पर आगे जाकर फ्रांस सहित दुनिया के कई देशों में ऐसे हमले होते हैं। 

फ्रांस योरप का एक विकसित और संपन्न देश है, वह दुनिया की सबसे बड़ी ताकतों में से एक भी है। वहां पर मुस्लिम समाज का लंबा इतिहास रहा है, और फ्रांस की राजधानी पेरिस के कई इलाके तो सिर्फ बुर्कों और दाढ़ी-टोपी से घिरे हुए दिखते हैं। लंबे समय से फ्रांस के समाज में इस धर्म के मानने वाले लोग बसे हुए हैं, और वे दूसरे धर्मों के लोगों के साथ रहना सीख चुके थे। ऐसे में वहां ताजा धर्मान्ध हमलों ने बाकी मुस्लिम समाज के लिए भी एक बड़ी दिक्कत खड़ी कर दी है। लेकिन जो देखने लायक बात है वह यह है कि फ्रांस की सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ खड़ी हुई है, और वह देश के इस बुनियादी हक के ऊपर धर्मान्धता को हावी नहीं होने दे रही है। न सिर्फ फ्रांसीसी सरकार, बल्कि वहां की संसद ने भी इस हमले के खिलाफ प्रस्ताव पास किया है, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सबसे ऊपर माना है।
 
किसी लोकतंत्र की परिपक्वता और उसका विकास इमारतों से और आसमान छूते बुतों से साबित नहीं होता। लोकतांत्रिक विकास देश के बुनियादी सिद्धांतों के सम्मान के लिए डटकर खड़े रहने से होता है। हम अभी किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विश्लेषण नहीं कर रहे हैं, लेकिन हम लोकतांत्रिक सरकारों के रूख की बात कर रहे हैं, देशों के लोकतांत्रिक मिजाज की बात कर रहे हैं। फ्रांस उन देशों में से है जहां किसी भी धर्म को लेकर व्यंग्य किया जा सकता है, किसी भी नेता को लेकर लिखा जा सकता है, और वहां की आम जनता में ऐसे तमाम लिखने और गढऩे को लेकर बहुत बर्दाश्त भी है। यह बात पश्चिम के बहुत से देशों पर लागू होती है। अमरीका की बात करें तो वहां सार्वजनिक रूप से किसी धर्मग्रंथ को जलाने के खिलाफ भी कोई कानून नहीं है। लेकिन अब दुनिया में जिन धर्मों के लोग आतंक के रास्ते दूसरे धर्मों को खत्म करना चाहते हैं, जिन्होंने कई देशों में गृहयुद्ध की नौबत खड़ी कर दी है, उन धार्मिक आतंकी संगठनों के रास्ते पर कई दूसरे गैरआतंकी संगठन भी चल निकले हैं, और इन दोनों के बीच का आतंक का फासला खत्म सा हो गया है। 

हिन्दुस्तान ने अपने अड़ोस-पड़ोस में पाकिस्तान, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका, इन तमाम जगहों पर धर्म के आतंक और धर्म के हमलावर तेवरों का नुकसान देखा हुआ है। दुनिया के बाकी देशों में जहां-जहां किसी धर्म के लोगों ने आतंकी हमले किए हैं, वहां-वहां उस धर्म के बसे हुए आम लोगों को नुकसान हुआ है, आतंकी या तो आत्मघाती हमले में खत्म हो जाते हैं, या कहीं छुप जाते हैं, या फरार हो जाते हैं। वे हमलों के बाद अपने धर्म के लोगों का नुकसान करके ही जाते हैं, कोई फायदा करके नहीं। इसलिए दुनिया के जिस-जिस देश में जिस-जिस धर्म के लोग इस तरह की हरकतें कर रहे हैं, वे कुछ लोगों को जरूर मार पा रहे हैं, लेकिन वे सबसे बड़ा नुकसान अपने धर्म के लोगों का कर रहे हैं। फ्रांस में आज अगर सरकार अभिव्यक्ति की ऐसी स्वतंत्रता के साथ खड़ी हुई है, और एकजुट होकर खड़ी है, अपने दर्जन भर लोगों को खोने वाली पत्रिका आज भी अपनी सोच के साथ खड़ी है, और दुबारा कार्टून छाप रही है, वहां की अदालतें इस आजादी के साथ हैं, तो हम दूर बैठे हुए वहां के संविधान की इन बुनियादी बातों का विश्लेषण करना नहीं चाहते। योरप के लोकतंत्रों में आजादी की बुनियाद सैकड़ों बरस पहले की है, और धार्मिक आतंक उनके मुकाबले इन देशों में कुछ नया है।
 
फ्रांस की इस घटना पर हिन्दुस्तान में लिखने का मकसद सिर्फ यही है कि जो देश धार्मिक असहिष्णुता को बढ़ावा देते हैं, धर्मोन्माद को देश की जमीनी दिक्कतों को ढांकने का एक पर्दा बना लेते हैं, उन देशों में इस किस्म का आतंक खड़ा हो सकता है। किसी भी देश की सरकार को यह समझना चाहिए कि सरकार के तख्ता पलट के लिए ही किसी फौज की जरूरत पड़ती है, आतंकी हमले के लिए तो किसी भी धर्म के मुट्ठी भर लोग काफी होते हैं, और ऐसे हमलों को हमेशा रोका नहीं जा सकता, फिर चाहे वे दुनिया के सबसे विकसित देश ही क्यों न हों।
 
सरकारों से परे भी समाज को यह सोचना चाहिए कि वे अपने लोगों के बीच लोकतांत्रिक परिपक्वता कैसे ला सकते हैं, कैसे दूसरे धर्मों का सम्मान जरूरी है, और कैसे उसके साथ-साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जोडक़र देखा जाना चाहिए। उन देशों को खासकर फिक्र करनी चाहिए जहां आज धार्मिक तनाव इस हद तक हिंसक नहीं हुआ है। भारत में धार्मिक तनाव कई वजहों से जिस तरह बढ़ा हुआ है, उससे बढ़ रहे खतरों को अनदेखा करना भी ठीक नहीं होगा क्योंकि धर्मान्धता ने पड़ोस के कई देशों को जिस तरह तबाह किया है, वह एकदम ताजा इतिहास है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 16 अक्टूबर 2020


 

जिन्हें बांग्लादेश मिसाल के तौर पर बुरा लगता है...

 अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अभी एक अनुमान बताया है कि जिस रफ्तार से बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी बढ़ रही है, और भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी की जो बदहाली चल रही है, जल्द ही बांग्लादेश भारत से बेहतर अर्थव्यवस्था बन सकता है, इस एक पैमाने पर वह आगे निकल सकता है। इस बात को लेकर कई अर्थशास्त्री सहमत हैं कि 1971 में पैदा हुए बांग्लादेश ने भारी दिक्कतें, फौजी हुकूमत, राजनीतिक अस्थिरता, धार्मिक कट्टरता, और प्राकृतिक विपदाओं को झेलते हुए भी धीमी लेकिन निरंतर गति से जैसी तरक्की की है, वह अहमियत रखती है, और बांग्लादेश दुनिया के कारोबारियों में एक भरोसेमंद जगह बन चुका है। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान के पिछले छह बरसों को लेकर राहुल गांधी ने आईएमएफ के ताजा अनुमान का हवाला देते हुए लिखा है कि भाजपा सरकार के पिछले छह बरस के नफरत भरे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की सबसे ठोस उपलब्धि यही रही है कि बांग्लादेश भी भारत को पीछे छोडऩे वाला है।

 
किसी तर्क के रूप में कोई मिसाल देना खतरनाक होता है क्योंकि लोग तुरंत ही इस पर उतर आते हैं कि भारत और बांग्लादेश में कौन-कौन से फर्क हैं जिनकी वजह से यह मिसाल ही नाजायज है। किसी तर्क को पटरी से उतारना हो तो ही कोई मिसाल देनी चाहिए। लेकिन अब एक अंतरराष्ट्रीय संगठन ने अगर एक पैमाने पर भारत, बांग्लादेश, और नेपाल सबके आंकड़े दिए हैं तो लोग तुलना कैसे न करें? मिसाल कैसे न दें? हिन्दुस्तान में आज वह पीढ़ी अभी रिटायर हो रही है जिसने अपने कॉलेज के दिनों में बांग्लादेश से आए हुए शरणार्थियों के गुजारे के लिए इंदिरा सरकार द्वारा लागू किए गए शरणार्थी टैक्स का पैसा हर सिनेमा टिकट पर दिया था। बांग्लादेश 1947 के पहले तक अविभाजित भारत का ही एक हिस्सा था, जो विभाजन में पहले पाकिस्तान में जाकर पूर्वी पाकिस्तान बना, और फिर इंदिरा गांधी के हौसले से उस हिस्से को पाकिस्तान से तोडक़र बांग्लादेश बनाया गया। अब भारत के ही बनाए हुए ऐसे बांग्लादेश में महज इंसानों की मेहनत से अगर अर्थव्यवस्था इस तरह बेहतर होती चली जा रही है तो फिर तुलना के लिए इस पड़ोसी से बेहतर और कौन सा देश हो सकता है? फिर बांग्लादेश ने यह मिसाल भी सामने रखी है कि अपनी महिलाओं को हुनर सिखाकर, कामकाज में लगाकर किस तरह पूरी दुनिया के बड़े-बड़े फैशन ब्रांड के कपड़े बांग्लादेश में सिले जा सकते हैं। अपनी मानव शक्ति का ऐसा इस्तेमाल करके इस देश ने अगर एक मिसाल सामने रखी है, तो हिन्दुस्तान में झंडा-डंडा थमाकर फर्जी मुद्दों पर झोंक दी गई कई पीढिय़ों के बारे में सोचना चाहिए कि उनसे देश की एकता के टुकड़े-टुकड़े होने के अलावा और क्या हासिल हो रहा है? 

बात राहुल गांधी ने कही है, या कि एक अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संगठन से आई है, या कि पड़ोस के एक ऐसे गरीब और छोटे देश की है जिसके साथ ‘गर्व से कहो हम भारतीय’ लोग अपनी तुलना नहीं चाहते हैं। इसलिए आज यह हिन्दुस्तान कश्मीर से 370 के खात्मे, राम मंदिर बनने, बाबरी मस्जिद केस में सबके रिहा हो जाने की खुशी में ऐसा डूबा है कि पड़ोस का गरीब मेहनत करते-करते कब उससे आगे निकल गया, यह उसे न पता लगा, और न ही वह इस हकीकत को देखना ही चाहता है। दरअसल किसी भी देश-प्रदेश की सरकार के लिए आर्थिक आंकड़े सबसे बड़ी चुनौती होते हैं, और सबसे बड़ी कसौटी भी होते हैं। ये आंकड़े अगर ईमानदारी से जुटाए जाते हैं, तो ये धोखा देने के काम नहीं आते, और सवाल बनकर मुंह चिढ़ाते हैं। ऐसे में आज भारत में किसी भी किस्म के आर्थिक सर्वे, आर्थिक विश्लेषण,  और उनसे जुड़े सवालों से मुंह चुराया जा रहा है। असली आंकड़े झंडों-डंडों से नहीं डरते, उन्हें भीड़ पीट-पीटकर मार भी नहीं सकती, वे न थाली-ताली से खुश होते हैं, और न ही दीयों की लौ से डरकर भागते हैं। अगर कोई चीज सबसे स्थाई होती है, तो वह असल और सच्चे आंकड़े होते हैं। ऐसे में बांग्लादेश की कामयाबी को चुनौती की तरह लेने के बजाय, उससे सबक लेने के बजाय, अपनी नाकामयाबी की लकीर छोटी करने के बजाय बांग्लादेश को एक मिसाल के रूप में भी खारिज कर देना अधिक आसान समझा जा रहा है। हकीकत से इस हद तक मुंह चुराकर दुनिया में कोई भी तरक्की नहीं कर सकते। आज बांग्लादेश में एक-एक महिला लाखों की सिलाई मशीनों पर दुनिया के महंगे ब्रांड के कपड़े सिलकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक साख बना रही है, और हिन्दुस्तान ऐसी संभावनाओं को अनदेखा करते हुए अपने लोगों को नारों और कीर्तन में झोंक रहा है। यह सिलसिला अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों में जारी नहीं रह सकता, क्योंकि उनके पास इस देश में दबाए गए, छुपाए गए आंकड़ों से परे भी जानकारियां हैं।
 

हिन्दुस्तान आज जिस आर्थिक बदहाली से गुजर रहा है, उससे उबरने का रास्ता मुंह छिपाने से होकर नहीं गुजरता। उससे उबरना तभी हो सकता है जब हकीकत का सामना किया जाए, समस्या को माना जाए, और उन बातों के बारे में भी सोचा जाए जो तरक्की के रास्तों पर रोड़ा हैं। एक देश जो अपने नामौजूद इतिहास के झूठे गौरव के नशे में मदमस्त रखा जा रहा है, वैसे देश का पिछडऩा तय है। और लोग हैं कि भूखे पेट उन्हें ऐसे झूठे गौरव का नशा और अधिक चढ़ रहा है। 

(Daily Chhattisgarh)