जुर्म के सामने घुटने टेकता कर्नाटक सीएम का फैसला

 कर्नाटक सरकार का एक फैसला सामने आया है कि वहां समाज कल्याण विभाग उन गांवों में सरकारी सैलून चालू करेगा जहां दलितों को सैलून में जाने से रोक दिया जाता है। देश भर के गांव-गांव में नाई की दुकान में भेदभाव की शिकायतें आती हैं, और उसका यह आसान इलाज कर्नाटक की भाजपा सरकार ने निकाल लिया है कि ऐसे सरकारी दलित-सैलून में सिर्फ दलितों के बाल काटे जाएंगे और उनकी हजामत की जाएगी। खबर बताती है कि उत्तर और मध्य कर्नाटक के कई जिलों में ऐसे मामले सामने आए हैं जब दलितों के बाल काटने से मना कर दिया गया। सरकार का कहना है कि जातिगत भेदभाव खत्म करने के लिए यह किया जा रहा है। यह फैसला मुख्यमंत्री बी.एस.येदियुरप्पा की अगुवाई में एसटीएससी अत्याचार अधिनियम समीक्षा बैठक में लिया गया है।

पहली नजर में यह फैसला दलितों के साथ इंसाफ और उन्हें एक सहूलियत देने वाला दिखता है। लेकिन दूसरी तरफ यह फैसला अपने पर अमल के पहले भी एक प्रस्ताव की शक्ल में जब सामने आया, तभी इसने यह साबित कर दिया कि भारतीय लोकतंत्र में दलितों को इंसाफ मिलना मुमकिन नहीं है। उनके बाल तभी कट सकते हैं जब सरकार उनके लिए अलग से दलित-नाई की दुकान खोले। यह फैसला सरकार का अपनी जिम्मेदारी से मुंह चुराना भी है क्योंकि ऐसा भेदभाव करने वालों को गिरफ्तार करके उन्हें सजा दिलाना सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी है, और उसे किनारे धकेलकर यह जातिवादी, छुआछूत से भरा सरकारी फैसला लिया जा रहा है। इस फैसले का मतलब तो यही है कि जिन गांवों में दलितों को कुएं से पानी भरने नहीं मिलता, वहां दलितों के लिए अलग कुआं खुदवाने को एक इलाज मान लिया जाए। तो धीरे-धीरे दलितों के लिए अलग थाना, अलग कलेक्ट्रेट, अलग अदालत, और अलग मुख्यमंत्री क्यों न हो? अगर सरकार ही जातिवादी छुआछूत को कुचलने के बजाय उसे मान्यता देकर नीची समझी जाने वाली जातियों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर उनके लिए अलग दलित-सैलून खोले, तो इसका मतलब है कि कानून ने अराजकता के सामने हथियार डाल दिए, हथियार तो क्या हाथ भी डाल दिए। 

जो सरकार इस तरह का फैसला ले रही है, उसकी समझ कहीं भी दलितों के साथ इंसाफ की नहीं है। उसकी समझ अपने संवैधानिक दायित्व की भी नहीं है जिसकी कि शपथ लेकर वह सत्ता में आई है। हम कर्नाटक के मुख्यमंत्री या संबंधित मंत्रियों-अफसरों की जाति नहीं जानते, लेकिन यह बात साफ है कि इन लोगों को भारतीय समाज में जाति आधारित छुआछूत की समझ नहीं है, और इस छुआछूत को खत्म करने की इनकी नीयत भी नहीं है। सरकारों के साथ यह आम दिक्कत रहती है कि किसी जटिल समस्या वे एक लुभावना समाधान ढूंढकर उसका अतिसरलीकरण कर देते हैं, और ऐसे में सामाजिक गुनहगार बच जाते हैं। इस सिलसिले का कोई अंत नहीं होगा। आगे चलकर स्कूली बच्चों को दोपहर के भोजन में दलित बच्चों का खाना अलग बनने लगेगा, दलितों के हाथ का पका खाना दूसरी जाति के बच्चे नहीं खाएंगे, कहीं पर कोई सरकार या प्रशासन दलित बच्चों के लिए अलग आकार की थाली का इंतजाम कर देंगे। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सरकारी जमीन पर सरकार ने दलितों के लिए एक सभागृह बनवाया है, लेकिन चूंकि उसके बगल के सरकारी बंगले में 20 बरस से मंत्री रहते आए हैं, इसलिए दलितों की शादी तो इस भवन में हो सकती है, उसमें संगीत नहीं बज सकता। इस तरह एक समुदाय के सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की एक जगह को इस आधार पर संगीत से वंचित कर दिया गया।
 
सरकार की जिम्मेदारी भेदभाव को कड़ाई से खत्म करने की है क्योंकि संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने बहुत से ऐसे फैसले दिए हैं जिनमें दलित-आदिवासी तबकों की विशेष सुरक्षा और उनके विशेष अधिकारों की बात की गई है। मध्यप्रदेश में जहां दलित दूल्हों को घोड़ी पर चढऩे नहीं मिलता वहां पर सरकार इसका एक आसान इलाज ढूंढ सकती है। वह दलित बारातियों के लिए सौ-दो सौ हेलमेट का इंतजाम कर सकती है, और दलित दूल्हे के लिए पुलिस लाईन से घोड़ी का इंतजाम कर सकती है, इसके बाद पुलिस के घेरे में बारात निकाली जा सकती है। लेकिन क्या यह हिफाजत लोकतंत्र की नाकामयाबी का सुबूत नहीं रहेगी? कर्नाटक सरकार का यह फैसला भारी शर्मिंदगी का एक कलंक है, सरकारों को जुर्म के सामने इस तरह घुटने टेकते देखना इस लोकतंत्र में शर्मनाक नौबत है। आने वाले दिनों में हमें उम्मीद है कि भारत में दलितों की हकीकत को समझने वाले कुछ सामाजिक कार्यकर्ता जरूर इस मुद्दे को उठाएंगे, और अगर इसे कोई अदालत तक ले जाए तो यह सरकारी फैसला खारिज होना तय है क्योंकि यह भेदभाव को मान्यता देता है, और उस पर कार्रवाई के बजाय उसके रास्ते से हटकर छुपकर आगे निकल जाने वाला है। यह देखना भी दिलचस्प हो सकता है कि यह फैसला लेने वाली कर्नाटक की कमेटी ने किस दर्जे के कितने दलित थे, और उन्होंने बैठक में क्या राय रखी थी? 

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