मीडिया-मालिक के किस गैरमीडिया कामकाज पर उसे हिफाजत हासिल हो?

 मुम्बई में आज सुबह से हडक़म्प मचा हुआ है क्योंकि रिपब्लिक टीवी के मालिक अर्नब गोस्वामी को पुलिस ने आत्महत्या के लिए प्रेरित करने की एक शिकायत पर गिरफ्तार किया है। अर्नब गोस्वामी का मामला इसलिए कुछ अधिक तूल पकड़ रहा है कि वे देश में सत्तारूढ़ भाजपा के भक्त हैं, रात-दिन सोनिया गांधी और कांग्रेस से नफरत पर जिंदा रहते हैं, वे पड़ोस के पाकिस्तान से जंग की भरसक कोशिश करते हैं, हिन्दुस्तान के भीतर साम्प्रदायिकता को बढ़ाने के लिए रात-रात जागते हैं, और खुद को नापसंद लोगों के बारे में आमतौर पर ऐसी जुबान में अपने टीवी पर रात-दिन चीखते हैं जिस जुबान को लोग सडक़छाप कहकर बदनाम करते हैं। हमने तो सडक़ पर किसी आम इंसान को कभी इतनी नफरत फैलाते नहीं देखा है। अर्नब की गिरफ्तारी इस वजह से भी अधिक तूल पकड़ रही है कि पिछले महीनों में उनका महाराष्ट्र की शिवसेना की अगुवाई वाली राज्य सरकार से बहुत बुरा टकराव चल रहा है, मुम्बई पुलिस के साथ उनका कुकुरहाव चल रहा है। ऐसे में उनकी गिरफ्तारी के कुछ मिनटों के भीतर यह जायज ही था कि केन्द्र सरकार के बड़े-बड़े कई मंत्री उन्हें बचाने के लिए ट्विटर पर टूट पड़े। 

अब सवाल यह है कि आपातकाल में मीडिया पर हुए हमले से इसकी तुलना करना जो शुरू हो गया है, क्या वह तुलना सचमुच जायज है? आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का यह मामला एक इंटीरियर डेकोरेटर के भुगतान का है। उसकी आत्महत्या की चिट्ठी में लिखा मिला था कि अर्नब गोस्वामी ने उसके कई करोड़ रूपए का भुगतान नहीं किया, और उसी तकलीफ में वह आत्महत्या कर रहा है। खुदकुशी करने वाले की मां ने भी आत्महत्या कर ली थी। इंटीरियर डेकोरेटर की पत्नी ने पुलिस में 2018 में रिपोर्ट दर्ज कराई थी और मृतक की चिट्ठी भी लगाई थी जिसमें अर्नब और दो दूसरे लोगों द्वारा 5.04 करोड़ रूपए का बकाया भुगतान न करने की बात लिखी थी, और आर्थिक तंगी की वजह से आत्महत्या करने की। 

अब सवाल यह उठता है कि क्या अर्नब गोस्वामी के हक आत्महत्या करने को मजबूर हुए मां-बेटे के, या उनके बाद रह गए लोगों के हक से अधिक हो सकते हैं? क्या एक टीवी चैनल के मालिक और उसकी जोर-जोर से चीखकर बोलने की ताकत के मुकाबले दो मुर्दों की जुबान, और उनके पीछे जिंदा बाकी परिवार की जुबान बंद कर देना जायज होगा? क्या देनदारी के विवाद के बाद हुई आत्महत्या पर इसलिए कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए कि देनदार एक टीवी चैनल का मालिक है, जो अपने को जर्नलिस्ट भी बताता है? आज हिन्दुस्तान में श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन खत्म हो चुका है जो कि आजादी के बाद से अपने मरने तक इस देश में पत्रकारिता के नीति-सिद्धांत और पैमाने तय करता था। अब उसकी जगह जगह-जगह प्रेस क्लब बने हैं, या एडिटर्स गिल्ड जैसे दूसरे संगठन। एडिटर्स गिल्ड ने भी आज एक बयान जारी करके इस गिरफ्तारी का विरोध किया है। 

हम अभी इस मामले में अपनी कोई राय इस पहलू पर देना नहीं चाहते कि देनदारी का झगड़ा जायज था या नाजायज। लेकिन इतना तो है कि दो आत्महत्याओं के बाद मिली ऐसी चिट्ठी के बाद कोई कानूनी कार्रवाई तो होनी थी, और किसी को कानूनी कार्रवाई से इस वजह से तो छूट मिल नहीं सकती कि वह अपने को पत्रकार बता रहा है, या टीवी चैनल का मालिक है, या उसका सरकार के साथ कोई झगड़ा चल रहा है। देश में अगर अखबार या बाकी मीडिया के लोग ईमानदारी से अपना काम करते हैं, तो राज्य या केन्द्र की सरकारों के साथ उनका कोई न कोई झगड़ा तो हो ही सकता है। लेकिन क्या ऐसे में उनके खिलाफ दूसरी किसी भी शिकायत पर कोई कार्रवाई करना नाजायज होगा? 

यह बात महज महाराष्ट्र की नहीं है, देश के बहुत से प्रदेशों में पत्रकारों पर तरह-तरह की कार्रवाई चल रही है। छत्तीसगढ़ में भी बहुत से पत्रकारों पर एफआईआर दर्ज हुई है। ऐसे मामलों में यह समझने की जरूरत है कि किसी पत्रकार पर कार्रवाई पत्रकारिता की वजह से हुई है, या पत्रकारिता से परे की किसी वजह से हुई है? इस देश में श्रमजीवी पत्रकारों में शुमार के लिए यह जरूरी होता था कि उसकी आय का कोई और जरिया न हो। केन्द्र और बहुत से राज्यों में ऐसे कई नियम हैं जो कि अखबारों के मैनेजमेंट देखने वाले लोगों को मान्यता प्राप्त पत्रकार बनने से रोकते हैं। जाहिर है कि अखबार और बाकी मीडिया के कारोबार में लगे लोगों में भी उनके पत्रकार होने, और गैरपत्रकार मीडिया कर्मचारी होने पर फर्क किया जाता है। ऐसे में मीडिया के मालिक, या मैनेजमेंट में दखल रखने वाले और साथ-साथ समाचार-विचार का काम भी देखने वाले लोग पत्रकारिता से परे के अपने सौदों के लिए कितनी सुरक्षा के हकदार माने जा सकते हैं? आज देश भर में बहुत सी जगहों पर ईमानदार और मेहनतकश, पेशेवर पत्रकारों के खिलाफ भी ज्यादती हो रही है, लेकिन बहुत सी जगहों पर पत्रकारों या दूसरे मीडियाकर्मियों के गैरपत्रकारीय कामकाज की वजह से उन पर जुर्म दर्ज हो रहे हैं, और उनके वैसे कामकाज को अगर मीडिया अपने ऊपर ढोने का शौक पालेगा, तो मीडिया की रही-सही जरा सी बाकी इज्जत भी मिट्टी में मिल जाएगी। अर्नब गोस्वामी के केस की सच्चाई जो होगी उसमें उनको अपना पक्ष रखने में सुप्रीम कोर्ट तक बड़े-बड़े वकील हासिल हैं, और ऐसे जज भी जो कि आधी रात उनका केस सुनने तैयार हो जाते हैं। इसलिए कानूनी बचाव उनके सामने कोई समस्या नहीं है। उनकी देनदारी के किसी झगड़े की कोई समस्या है, तो उससे एडिटर्स गिल्ड अपने आपको किस तरह जोड़ रहा है, उसे वह जाने। 

जिस तरह किसानों की आत्महत्या के मामले में बहुत सी सरकारें हाथ झाड़ लेती हैं कि वह गैरकिसानी वजहों से की गई आत्महत्याएं हैं। अब किसी किसान का पड़ोस की किसी दूसरी शादीशुदा महिला से प्रेम या देहसंबंध रहा हो, और उसका विवाद होने के बाद वह आत्महत्या कर ले, तो इसे किसानी-कर्ज की आत्महत्या से अलग गिनना ठीक होगा। इसी तरह मीडिया के कर्मचारी या मालिक के गैरमीडिया कामकाज पर हुई कार्रवाई को कानूनी नजरिए से ही देखना ठीक होगा, वरना मीडिया से जुड़े संगठन अपने से जुड़े एक इंसान के हिमायती होकर उसके कथित शिकार मृतक के साथ ज्यादती ही करेंगे।
 
अभी तक इस मामले में जो जानकारी सामने आई है, वह किसी समाचार या टेलीकास्ट को लेकर की गई कानूनी कार्रवाई नहीं बता रही, और यही बता रही है कि यह आत्महत्या के मामले से जुड़ी हुई गिरफ्तारी है। मीडिया के संगठनों को, और मीडियाकर्मियों को यह तय करना होगा कि वे अपने पेशे और कारोबार के मालिकों और कर्मियों के कितने और कैसे-कैसे गैरमीडिया कामकाज के साथ खड़े रहेंगे। और जब इस मामले पर बात चल ही रही है, तो यह भी बात हो जानी चाहिए कि एडिटर्स गिल्ड इस देश में मीडिया के नाम पर फैलाई जा रही नफरत और गंदगी के बारे में क्या सोचता है? क्या जिन लोगों को बचाने के लिए वह आज आगे आया है, क्या महज उन्हें बचाना ही एक पेशेवर संगठन के रूप में उसकी जिम्मेदारी है, या मीडिया के नाम पर जो हिंसा, बेइंसाफी, नफरत और गंदगी फैलाई जा रही है, उस पर भी उसे मुंह खोलना चाहिए? देश का कोई भी हिस्सा हो, अखबारनवीस या दूसरे किस्म के मीडियाकर्मी, उनके कामकाज की जिम्मेदारी और जवाबदेही एक सीमा तक ही उनके हिमायती पेशेवर संगठनों को लेनी चाहिए, उनकी दीगर गतिविधियों पर उन्हें बचाते हुए ऐसे पेशेवर संगठन अपनी साख खो बैठने का खतरा उठाएंगे, उठा रहे हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

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