कपिल मिश्रा को कुछ घंटे बारूद के धुएं वाले चेम्बर में बंद करके फिर पूछें...

भारत की राजधानी दिल्ली एक बार फिर बुरे प्रदूषण से घिर गई है। और ऐसे में दिल्ली सरकार ने पटाखों पर प्रतिबंध लगा दिया है। आज 7 नवंबर से 30 नवंबर तक लगाए गए इस प्रतिबंध के खिलाफ दिल्ली के एक चर्चित और विवादास्पद भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने सरकार पर हमला बोला हैऔर कहा है कि हर साल दीवाली पर पटाखों पर प्रतिबंध क्या जायज हैसरकार को हिन्दू धर्म के त्यौहारों पर तो बैन लगाना आता हैलेकिन क्या सरकार कभी यह हुक्म दे सकती है कि ईद और क्रिसमस कैसे मनाए जाएंगे?

यह सवाल बेवकूफों और साम्प्रदायिक लोगों के लिए तो जायज हो सकता है जिन्हें दीवाली और क्रिसमस-ईद में सरकार का प्रतिबंध का फर्क साम्प्रदायिक दिखेगाऔर हिन्दुओं पर आसानी से मार करने की बात समझ आएगी। यह सवाल उठाने वाले कपिल मिश्रा पहले भी घोर भडक़ाऊ और साम्प्रदायिक बयान देते आए हैंऔर केन्द्र सरकार के मातहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस की मेहरबानी से बचते आए हैं। अब एक बार फिर उन्होंने अलग-अलग धर्मों को लेकर यह सवाल उठाया है और केजरीवाल सरकार के साथ-साथ ईद और क्रिसमस पर भी हमला बोला है।

लेकिन जो तथ्य देश की सतह पर तैर रहे हैंउनको न छूकर केवल ऐसा बयान देना एक बहुत ही गैरजिम्मेदारी की बात है जिसके लिए कपिल मिश्रा को भारी शोहरत हासिल है। आज देश में कम से कम दो भाजपा सरकारेंकर्नाटक और हरियाणा में दीवाली पर पटाखों पर रोक लगाई है। तो क्या ये दोनों सरकारें ईद और क्रिसमस पर कोई और रोक लगा रही हैंदोनों ही राज्यों में खासे वक्त से भाजपा की सरकारें हैंऔर कई ईदकई क्रिसमस निकल चुकी हैंअब तक तो ईद और क्रिसमस पर कोई रोक सुनाई नहीं पड़ी हैतो कपिल मिश्रा के पैमाने पर इन सरकारों को दीवाली के पटाखों पर रोक का कोई नैतिक अधिकार तो होना नहीं चाहिए। लेकिन दिल्ली की बात करते हुए कपिल मिश्रा भाजपा के इन राज्यों के लगाए प्रतिबंध को अनदेखा कर रहे हैंऔर भेदभाव फैलाने वाले बयानों की यही खूबी होती है।

अब पल भर तो कपिल मिश्रा से अलग होकर बात करेंतो दीवाली के पटाखे किन बस्तियों और इलाकों में अधिक जलेंगेकौन लोग उन्हें अधिक जलाएंगेकिनकी सांसों में बारूद का जहरीला धुआं सबसे पहले जाएगाये तमाम लोग हिन्दू समाज के होंगेया कम से कम पटाखे जलाने वालों में हिन्दुओं की बहुतायत होगी। जो साम्प्रदायिक लोग दीवाली को एक हिन्दू त्यौहार मानते हैंऔर इस हकीकत को अनदेखा करते हैं कि भारत में इसका एक बहुत बड़ा सांस्कृतिक पहलू भी हैऔर सभी धर्मों के लोग इसमें शामिल होते हैंहम उन्हीं के तर्क का इस्तेमाल करके पटाखों से होने वाले सीधे नुकसान से हिन्दुओं की बहुतायत को जोड़ रहे हैं। अभी कोरोना के खतरे के बीच जिस धर्म के भी त्यौहार अराजकता के साथ मनाए गएकोरोना का संक्रमण और खतरा उन्हीं धर्मों के लोगों पर अधिक आया। अब ऐसी रोक को अगर किसी धर्म पर नाजायज प्रतिबंध माना जाएतो अराजकता को बढ़ाने वाले लोग उन्हीं धर्मों के लोगों का नुकसान कर रहे हैंउन्हीं की जिंदगी खतरे में डाल रहे हैं। अगर किसी प्रतिबंध का विरोध अपने लोगों को खतरे से बचाने के लिए होता हैउनको नुकसान से बचाने के लिए होता हैतो वह जायज होगा। लेकिन जो दिल्ली प्रदूषण से जूझने के सौ किस्म के उपाय कर रही हैजो आसपास के प्रदेशों में खेतों में फसल के बचे हुए ठूंठपरालीको जलाने पर भी कानूनी कार्रवाई करने की अपील कर रही हैउस दिल्ली में अगर प्रदूषण घटाने के लिए पटाखों पर रोक लगाई जा रही है तो उसे एक धर्म से जोडक़र उसका विरोध करना अराजकता को बढ़ाना और साम्प्रदायिकता को भडक़ाना है।

जो लोग पटाखों को हिन्दू धर्म से जोडक़र देखते हैंउन्हें यह भी देखना चाहिए कि रावण को मारकर जिस दिन राम अयोध्या लौटे थेउस दिन अयोध्या में रौशनी करके लोगों ने दीवाली मनाई थी। क्या उस दिन हिन्दुस्तान में बारूद थाक्या उस दिनउस युग में बारूद का आविष्कार भी हुआ थाक्या तुलसीदास से लेकर वाल्मीकि तक किसी ने पटाखों का जिक्र किया हैजो बात दीवाली की बुनियाद की असली पौराणिक कथा में नहीं हैआज उसे उस धर्म का अनिवार्य हिस्सा क्यों बना देनामस्जिदों पर लगे हुए लाउडस्पीकरों पर अजान दी जाती हैऔर उसे लेकर भी यह सवाल उठाया जाता है कि जिस दिन कुरान लिखी गई थीजब इस्लाम और अजान शुरू हुएउस दिन क्या लाउडस्पीकर थेऔर यह सवाल जायज हैसभी धर्मस्थलों से लाउडस्पीकर हटने चाहिए क्योंकि आमतौर पर धर्मस्थलों के इर्द-गिर्द उन्हीं धर्मों को मानने वाले अधिक रहते हैंऔर किसी भी किस्म के धार्मिक शोरगुल से उन्हीं का नुकसान अधिक होता है। दीवाली के पटाखे वैसे तो आसपास के सौ-दो सौ किलोमीटर तक प्रदूषण बढ़ाते हैंलेकिन सबसे अधिक प्रदूषण तो उन्हें जलाने वाले लोगों को ही शिकार बनाएगा।

आज देश में बहुत से लोगों को धर्मान्धता बढ़ाने और साम्प्रदायिकता खड़ी करने के लिए ऐसे बखेड़े खड़े करने की आदत हैयह उनका पेशा हैऔर यह अपने संगठनों के बीच अपनी जगह मजबूत करने की उनकी स्थाई और लगातार कोशिश बनी रहती है। लेकिन देश की सरकारों को सख्ती से यह रोक लगानी चाहिए। आज कोरोना से उबरे हुए लोगों को भी सांस की कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। कोरोना के बाद की यह पहली दीवाली हैऔर हर शहर में ऐसे दसियों हजार लोग हैं जो कोरोना से तो बच गए हैंलेकिन सांस की दिक्कतों को झेल रहे हैं। जिन लोगों को भी यह लगता है कि लोगों की सांसों से अधिक अहमियत हिन्दू त्यौहार पर पटाखों की हैउन्हें बारूद के धुएं वाले गैस चेम्बर में कुछ घंटे बंद रखना चाहिएऔर उसके बाद उनसे दुबारा राय लेनी चाहिए। कपिल मिश्रा जैसे लोग ऐसे कुछ घंटों के बाद कलपते मिश्रा बनकर निकलेंगेऔर हिन्दू-मुस्लिम भडक़ाऊ बातें बोलना भूल जाएंगे। लोकतंत्र का मतलब लोगों को खतरे में डालने का हक नहीं होना चाहिए। कपिल मिश्रा कल तक अरविंद केजरीवाल की पार्टी में थेआज वे एक राष्ट्रीय पार्टी भाजपा में हैंउनकी पार्टी को भी यह सोचना चाहिए कि जब खुद की दो राज्य सरकारों ने पटाखों पर रोक लगाई हैतो उसके बाद देश की राजधानी के अपने नेता को भडक़ाऊ बातें करने से रोके। 

(Daily Chhattisgarh) 

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