संपादकीय
12 दिसंबर 2016

जिस बड़े पैमाने पर देश भर में जगह-जगह करोड़ों के नए नोट बरामद हो रहे हैं, उससे कुछ बुनियादी सवाल खड़े होते हैं। पहला तो यह कि कालाधन किस तरह और किस हद तक कुछ हाथों में इक_ा हो सकता है, इसकी एक मिसाल नोट हैं, जो कि कुल कालेधन के कुल चार फीसदी होने का अंदाज अर्थशास्त्रियों को है। दूसरी बात यह कि आज जब देश की अधिकतर आबादी कुछ सौ या कुछ हजार नोटों के लिए तरसते घूम रही है, तब चार हफ्ते पहले जारी दो हजार के नए नोट किस तरह थोक बंडलों में एक साथ जमा मिल रहे हैं। तीसरी बात यह कि देश के बैंक बड़े पैमाने पर नोटों की अदला-बदली में गैरकानूनी काम करते शामिल दिख रहे हैं, और हमारे आसपास की बाजार की चर्चा भी यही कहती है कि बैंकों में जगह-जगह कर्मचारी ही कारोबारियों से मिलकर सब तरह का काम कर रहे हैं। नोटबंदी की पहली रात ही कई बैंकों में जो छोटे नोट जमा थे, उनके बदलने का इंतजाम कर लिया गया था, और वहां से लेकर अभी थोक में नए नोट निकलने तक हर तरह का काम बैंकों में हो रहा है। बाजार की जानकारी यह है कि हजार-पांच सौ के नकली नोट भी नियमित ग्राहक बैंकों की मेहरबानी से खपा दे रहे हैं क्योंकि सबको यह भरोसा है कि पुराने नोटों का यह समंदर कभी जांचा नहीं जा सकेगा। आज ही खबर है कि प्रधानमंत्री ने देश के सैकड़ों बैंकों में स्टिंग ऑपरेशन करवाया है, और उसमें गड़बडिय़ां पकड़ में भी आई हैं। दिल्ली में एक्सिस बैंक में जैसी साजिश के साथ कालेधन को सफेद करने का काम किया गया है, वह तो देखने लायक है, और देश के बहुत से सहकारी और सरकारी बैंक भी अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग किस्म की साजिशों में हिस्सेदार पकड़ाते रहे हैं, और ऐसा मानने की कोई वजह नहीं है कि नोटबंदी के इस दौर में उन्होंने भी बहती गंगा में हाथ नहीं धोए होंगे।
अब तक की जानकारी यह कहती है कि हजार-पांच सौ के जितने नोट प्रचलन में थे, वे शायद पूरे के पूरे अगले पखवाड़े बैंक पहुंच जाएंगे। ऐसे में नोटों की शक्ल में जो कालाधन होने का अंदाज था, और जो नकली नोट प्रचलन में होने का अंदाज था, उन सबका बैंकों से बाहर हो जाने का मकसद शायद पूरा होते नहीं दिख रहा है। ऐसे में अब कई तरह के सवाल उठ रहे हैं कि क्या नोटबंदी की पहली घोषणा में प्रधानमंत्री ने जिन फायदों को गिनाया था, क्या उनमें से कोई भी पूरे नहीं होने जा रहे, और क्या अब कैशलेस का नया नारा जोड़कर इस नाकामयाबी को ढांका जा रहा है? यह बात यह है कि संसद के भीतर और संसद के बाहर भाषणों में अलग-अलग नेता चाहे जो कहें, आने वाले दिनों में सरकार को नोटबंदी से जुड़े हुए सारे तथ्यों को सामने रखना होगा कि इसकी लागत घोषित रूप से कितनी आई, बाजार के जानकार अर्थशास्त्री बनाएंगे कि नोटबंदी से अघोषित नुकसान कितना हुआ, और जनता आने वाले चुनावों में बताएगी कि नोटबंदी को उसने देशपे्रम कितना माना, और उसके जख्म राष्ट्रवाद के मरहम से कितने भरे। आज नोटबंदी के बारे में सोशल मीडिया पर कही जा रही एक बात सही लगती है कि खाया-पिया कुछ नहीं, गिलास फोड़ा सत्तर पैसा। लेकिन नोटबंदी से कालेधन के मोर्चे पर, आतंक की फंडिंग के मोर्चे पर, और नकली नोटों के मोर्चे पर नाकामयाबी के बावजूद एक नई कामयाबी की शुरूआत इसके बाद जरूर हो सकती है, भारतीय ग्राहकों और दूकानदारों के एक बड़े हिस्से को कैशलेस बनाने की। लेकिन नोटबंदी का यह तो मकसद था नहीं, और इससे लोगों की जिंदगी, उनका रोजगार, ये सब जिस कदर तबाही से गुजरे हैं, उसकी कोई जरूरत तो भारतीय बाजार को कैशलेस बनाने के लिए थी नहीं। आने वाले दिन बहुत से सवाल लेकर खड़े हैं, और नई साल की पहली सुबह बैंकों से निकलने वाले आंकड़ों के साथ सवाल लिए खड़ी रहेगी।
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