अगली पीढ़ी को मिल रही एक बहुत जहरीले सोशल मीडिया की विरासत

28 फरवरी 2026 

 

सोशल मीडिया आज दुनिया के किसी भी देश का या किसी भी भाषा का ऐसा सबसे बड़ा सार्वजनिक मंच बन चुका है, जहाँ आम से लेकर खास लोग तक अपनी राय, अपने विचार और अपनी भावनाएँ बिना किसी रोक-टोक, बिना किसी संपादन के जब चाहे तब पोस्ट कर सकते हैं। जब चाहे तब उसे मिटा सकते हैं। दूसरे लोग जब चाहे तब उसे आगे बढ़ा सकते हैं, उसकी तारीफ कर सकते हैं, उसकी कॉपी करके उसे अपने नाम से आगे बढ़ा सकते हैं। बात यहाँ तक रहती तब भी ठीक रहता, लेकिन दिक्कत यह है कि नफरत की बातें सोशल मीडिया पर जंगल की आग की रफ्तार से फैलती हैं। चाहे वह दूसरे देश के लोगों से नफरत हो, दूसरे रंग, दूसरी नस्ल, दूसरे धर्म, दूसरी भाषा, दूसरे प्रदेश या दूसरी राजनीतिक पसंद के लोगों से नफरत, यह सिलसिला थमता नहीं दिख रहा है।

सोशल मीडिया पर जिन लोगों को ट्रोल कहा जाता है, वे लोग एक पेशेवर अंदाज़ में किसी के भी पीछे लग जाते हैं, उसे घेरकर परेशान करने के अंदाज में। हम यह तो नहीं जानते कि ऐसे सारे लोग हर पोस्ट पर, हर नफरत पर, किसी के पीछे पडऩे पर, किसी को पसंद या नापसंद करने पर कोई भुगतान पाते हैं या वे अपनी सोच के चलते समर्पित कार्यकर्ता हैं। इनमें जो भी बात हो, लेकिन जो सामने दिखता है वह यह है कि नफरत, उत्तेजना और भडक़ाने वाली बातें लगातार सोशल मीडिया पर अधिक बढ़ावा पाती हैं। शायद नकारात्मक बातों को पसंद करने वाले लोग अधिक होते हैं और इसलिए सोशल मीडिया के एल्गोरिथ्म नकारात्मक बातों को तेजी से आगे बढ़ाते हैं। यह सिलसिला बढ़ते-बढ़ते अब बहुत से गंभीर लोगों को, जो सकारात्मक या किसी काम की बात सोशल मीडिया पर करते हैं, हतोत्साहित करने लगा है। अब लोगों को कोई न्यायसंगत और दर्द से जुड़ी बात लिखने से पहले यह सोचना पड़ता है कि कितने लोग उन्हें गालियाँ देने लगेंगे। सच यह है कि हर किसी में इतनी गालियाँ बर्दाश्त करने की क्षमता भी नहीं होती। आज हालात यह हैं कि हिंदुस्तान में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आँकड़ों के अनुसार 2024 में साइबर अपराधों में सबसे अधिक संख्या नफरत फैलाने वाले सोशल मीडिया पोस्ट की थी, जिनमें धार्मिक उन्माद, जातिगत टिप्पणियाँ, महिलाओं के खिलाफ गालियाँ और क्षेत्रीय भेदभाव की बातें सबसे आम थीं।

सोशल मीडिया को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानने में हमें कोई तकलीफ नहीं है, लेकिन यह इस हद तक अराजक हो चुकी है और अधिकतर देशों में इस पर कोई प्रभावी कानूनी काबू नहीं है। सरहदों के आर-पार फैले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को किसी एक देश के कानून के तहत बाँध लेना आसान भी नहीं है। भारत का ही तजुर्बा यह है कि ऐसे प्लेटफॉर्म लगातार सरकार के नोटिस झेलते रहते हैं कि किस पोस्ट को हटाया जाए। अब सरकारों का, चाहे वह किसी प्रदेश की हों या किसी देश की, अपना तंग नज़रिया और राजनीतिक एजेंडा होता है, और वे अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर कुछ पोस्ट हटवाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं। लेकिन दूसरी तरफ हम देखते हैं कि भारत जैसे देश में ही सत्ता के विरोधियों के खिलाफ जिस हद तक हिंसक और अश्लील बातें लिखी जाती हैं, जिन पर कानून के तहत कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए, वहाँ अक्सर कुछ भी नहीं होता। इस तरह सत्ता अपनी पसंद और नापसंद के आधार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आजादी और अराजकता के दो हिस्सों में बाँट देती है। लेकिन दूसरी बात भी है, सरकार तो केवल कानूनी कार्रवाई के समय सामने आती है या उससे बचती है। दूसरी तरफ जनता के वे लोग, जो अपने नाम से सामने हैं, जो अपनी असली तस्वीरें लगाते हैं, अपने बच्चों की तस्वीरें लगाते हैं या अपने ईश्वरों की तस्वीरें भी लगाते हैं, जिनका हर चौथा-पाँचवाँ पोस्ट धर्म, आध्यात्मिक गुरु या पसंदीदा राजनेता के बारे में होता है, ऐसे लोग भी लगातार हिंसा फैलाने, अश्लील बातें लिखने और गंदी गालियाँ देने से परहेज़ नहीं करते। सोशल मीडिया आने से पहले तक इस किस्म की गंदी बातें लोग सिर्फ सार्वजनिक शौचालयों की दीवारों के भीतर वाले हिस्सों में लिखते थे, और कहीं और ऐसी बातें लिखने का हौसला बिना नाम के भी नहीं होता था। अब हालात यह हो गए हैं कि लोग सोशल मीडिया पर अपने नाम से दूसरों को धमकियाँ देते हैं, महिलाओं को बलात्कार की धमकियाँ देते हैं। कई बड़े क्रिकेटरों और फि़ल्मी सितारों की छोटी बच्चियों तक को बलात्कार की धमकियाँ सोशल मीडिया पर दी गईं, और कार्रवाई कुछ भी नहीं हुई।

कहने को हिंदुस्तान का आईटी कानून इतना कठोर है कि लोगों के बच निकलने की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर एक बार कोई पोस्ट हो जाए तो वह इतना पुख्ता डिजिटल या साइबर सबूत बनकर मौजूद रहता है कि मिटा देने के बाद भी खत्म नहीं होता। फिर भी देश में हर दिन लाखों लोग हजारों लोगों के खिलाफ अश्लील और हिंसक बातें लिखते रहते हैं और उनके ऊपर कोई कार्रवाई नहीं होती। नतीजा यह होता है कि लोगों को लगने लगा है कि यही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, जिसे चाहे बलात्कार की धमकियाँ दो, उनकी माँ-बहनों को, बेटियों को गालियाँ दो, और यह सिलसिला बढ़ता जा रहा है। अब समाज को सोचना होगा कि ऐसे लोगों का क्या किया जाए। समाज उन्हें घेरकर मार नहीं सकता, वह गैरकानूनी होगा। लेकिन क्या समाज ऐसे हिंसक और अश्लील पोस्ट करने वालों के खिलाफ कोई लोकतांत्रिक विरोध भी नहीं कर सकता? और अगर नहीं कर सकता, तो फिर वह कैसा समाज है? उसकी जरूरत किसे है? क्या वह सिर्फ जिंदगी और मौत के जलसों पर इकट्ठा होने वाला समाज है, या इस समाज की कोई सामूहिक या राजनीतिक चेतना भी है? क्या उसकी राजनीति इसका जवाब देगी और जिम्मेदारी भी लेगी?

यह पूरा सिलसिला लोकतंत्र में बड़ी निराशा पैदा करता है। दूसरी दिक्कत यह है कि किसी संक्रामक रोग की तरह यह नई पीढ़ी को इस तरह प्रभावित कर रहा है कि वे इसे ही नया सामान्य मानकर गालियाँ देने लगे हैं। सोशल मीडिया अपने मिजाज की वजह से जवाबदेही से मुक्त भी रहता है और गैर-जिम्मेदार भी। आज इस मंच पर जिम्मेदारी की बात करने वाले, मोहब्बत की बात करने वाले, गालियाँ देकर चुप करा दिए जाते हैं। दूसरी तरफ नफरत की बात करने वालों के इतने समर्थक खड़े हो जाते हैं कि उन्हें लगता है कि वही इंसानियत की बात है। यह पूरा सिलसिला गहरी निराशा पैदा करता है। भारत की अदालतों से भी इस पूरे मामले में दखल को लेकर पूर्ण भरोसा नहीं दिखता। ऐसे में समाज के ही जागरूक तबके को सोशल मीडिया पर सामने आना होगा, सही और गलत में फर्क करना होगा और अश्लील व हिंसक बातों का विरोध करना होगा। ऐसा किए बिना हम अगली पीढ़ी को एक बहुत ही जहरीला सोशल मीडिया देकर जा रहे हैं। 

(Daily Chhattisgarh)         

दीवारों पर लिक्खा है, 27 फरवरी 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

दुनिया एक चकलाघर क्यों लगती है? साहिर ने एपस्टीन फाइल्स देख ली थीं!

 27 फरवरी 2026 

 

सुनो जी, तुम क्या-क्या खरीदोगे

यहाँ तो हर चीज बिकती है

कहो जी, तुम क्या-क्या खरीदोगे

सुनो जी, तुम क्या-क्या खरीदोगे

लालाजी तुम क्या-क्या

मियाँ जी तुम क्या-क्या

बाबू जी, तुम क्या-क्या खरीदोगे

सुनो जी, तुम क्या-क्या खरीदोगे

कहो जी तुम...

ये बलखाती हुई जुल्फें,

ये लहराते हुए बाज़ू ये होठों की जवाँ मस्ती,

ये आँखों का हसीं जादू

अदाओं के खजाने,

जवानी के तराने

बहारों के जमाने

कहो जी तुम क्या-क्या खरीदोगे...

तड़पती शोखियाँ दे दूँ,

मचलता बाँकपन दे दूँ

अगर तुम एक कली माँगो,

तो मैं सारा चमन दे दूँ

ये मस्ती के घेरे,

ये महके अँधेरे

ये रंगीन डेरे

कहो जी तुम क्या-क्या खरीदोगे...

मोहब्बत बेचती हूँ मैं,

शराफत बेचती हूँ मैं

ना हो गैरत तो ले जाओ,

के गैरत बेचती हूँ मैं

निगाहें तो मिलाओ,

अदाएँ न दिखाओ

यहाँ न शर्माओ

कहो जी तुम क्या-क्या खरीदोगे...

गाने में तवायफ (वैजयंतीमाला) खुद को बाजार का माल बता रही है। एपस्टीन के ‘लिटिल सेंट जेम्स’ आइलैंड और न्यूयॉर्क मैनहट्टन टाउनहाउस में भी वही था, एक प्राइवेट ‘बाजार’ जहां पावरफुल लोग ‘खरीद’ सकते थे। क्लिंटन, ट्रंप, गेट्स, प्रिंस एंड्र्यू, कुछ ताकतवर भारतीय नाम भी फाइल्स में आए। ये लोग ‘खरीद’ रहे थे, न सिर्फ सेक्स, बल्कि ब्लैकमेल पावर, बिजनेस डील्स, और साइलेंस। साहिर की ये लाइन बहुत कड़वी है, एक औरत को अपनी भावनाएं, सम्मान और शर्म भी बेचनी पड़ रही है। एपस्टीन ने सैकड़ों नाबालिग लड़कियों को ‘ग्रूम’ किया, उन्हें बताया कि ये ‘मॉडलिंग’ या ‘मसाज’ जॉब्स हैं। फिर उन्हें ताकतवर लोगों से ‘मिलवाया’। उसकी पार्टनर ने कई लड़कियों को रिक्रूट किया। फाइल्स में दिखता है कि ये सब ‘डील्स’ थे, एक लडक़ी की बॉडी के बदले आर्थिक या राजनीतिक एहसान। गैरत, शर्म का कोई मतलब नहीं रहता था।

लालाजी, मियांजी, बाबूजी गाने में हर क्लास के ‘खरीदार’ को न्यौता दिया गया है। एपस्टीन का नेटवर्क भी ऐसा ही था, अरबपति, राजनेता, साइंटिस्ट, सेलिब्रिटी, नोबल पुरस्कार विजेता, और राजकुमार। हर तरह के ‘बाबूजी’ वहां थे। भारत के मंत्री हरदीप पुरी के दर्जनों मेंशन (ईमेल और मीटिंग्स) से लगता है कि ये ग्लोबल नेटवर्क भारत तक फैला हुआ था, और इसमें अंबानी जैसे ताकतवर भारतीय भी शामिल थे। अदाओं के खजाने, जवानी के तराने। ये लाइनें जवानी और आकर्षण को ‘प्रोडक्ट’ की तरह बेचने की बात करती हैं। एपस्टीन की लड़कियां ज्यादातर 14-17 साल की थीं, जवानी का ‘तराना’। वो उन्हें ट्रेन करता था कि कैसे ‘अदा’ दिखानी है, कैसे ‘मिलना’ है। फाइल्स में वीडियो और फोटोज हैं जो ब्लैकमेल के लिए यूज होते थे। गाने की तरह, ये सब ‘बिकने’ के लिए था।

एपस्टीन स्कैंडल दिखाता है कि सभ्यता की चमड़ी बहुत पतली है। त्वचा के नीचे वही प्राचीन इंसान है, जो वासना, दौलत, ताकत, और काबू के लिए कुछ भी कर सकता है। साहिर लुधियानवी ने 1958 में ही ये लिख दिया था कि समाज में औरत को (या कमजोर को) माल की तरह देखा जाता है। एपस्टीन ने इसे ग्लोबल स्केल पर किया। वासना सब ओवरटेक कर लेती है, क्लिंटन, ट्रंप, गेट्स जैसे लोग, जो दुनिया बदल सकते थे, लेकिन अपनी इच्छाओं के आगे झुक गए। पावर इम्यूनिटी देता है, ब्रिटेन के हटाए गए राजकुमार एंड्र्यू की गिरफ्तारी हुई है, लेकिन दुनियाभर में कई ताकतवर लोग बचे हुए हैं। एपस्टीन फाइलों से परे भी भारत में भी प्तरूद्गञ्जशश में कई ताकतवर आरोपी बिना सजा के घूम रहे हैं। ग्लोबल ब्रोकर, एपस्टीन जैसे लोग नेटवर्क बनाते हैं। वो पैसे, लक्जरी, और ‘प्राइवेसी’ देते हैं, बदले में ब्लैकमेल। नाबालिग देह उनका सामान और सेवा बन जाते हैं। भारत में भी अंबानी और हरदीप पुरी का नाम आना दिखाता है कि ये स्कैंडल सरहदों से परे है। भारत के भी पावरफुल लोग (पॉलिटिशियन, सेलिब्रिटी, बिजनेसमैन) ऐसे नेटवर्क में फंस सकते हैं। हैरानी यह भी है कि जो इंटरपोल दुनिया भर के चाइल्ड-सेक्स मुजरिमों की जानकारी दुनिया भर की सरकारों को देता है, वह एपस्टीन से अनजान रहा!

एपस्टीन का मामला बड़े-बड़े नामों की भागीदारी की वजह से दुनिया का आज तक का सबसे बड़े लोगों का सेक्स-स्कैंडल बन गया है। लेकिन इतने सारे नामों के एक साथ होने से परे अगर देखें तो इसमें नया कुछ भी नहीं है। दुनिया के जितने बड़े लोग हैं, खासकर ताकत, शोहरत, और दौलत के मालिक, उनमें से बहुत से लोग अक्सर ही यह मानकर चलते हैं कि उनकी ये ताकतें उन्हें किसी भी लडक़ी या महिला के बदन पर हाथ डालने का हक दे देती हैं। ट्रंप के उस बयान को दुनिया कैसे भूल सकती है जो उनकी ही आवाज में चारों तरफ फैला था जिसमें उसने कहा था कि एक कामयाब मर्द जिस औरत को चाहे उसे, उसके गुप्तांगों से दबोच सकता है। लेकिन दौलत-शोहरत जैसी ताकत से परे के कुछ दूसरे लोगों को देखें जो एपस्टीन फाइल्स में दर्ज हैं, तो उसमें नोबल पुरस्कार विजेता, बड़े-बड़े लेखक, या नोम चॉम्स्की जैसे वामपंथी विचारक भी हैं, जो कि एपस्टीन की बाल यौन शोषण की शोहरत के दस-दस बरस बाद भी उसकी मेहरबानियों के मोहताज रहे।

साइकॉलॉजी में इंसान की वासना मानव सभ्यता के पहले से चली आ रही एक अस्तित्व की जरूरत है, यह इंसानी पीढिय़ों को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी देह-संबंधों से तो जुड़ी हुई है ही, यह फ्रॉयड के शब्दों में इंसान की (शायद मर्दों की) बुनियादी ऊर्जा है जो समाज के पैमानों पर एक अंहकार से भी जुड़ी रहती है। ताकतवर लोगों में अपनी वासना से जुड़े हुए देह-संबंधों को पाने का, मनचाही देह को जीतने का, और वर्जित संबंध बनाने का अहंकार इतना बड़ा होता है कि वे सामाजिकता के आम नियमों को भी तोड़ देते हैं। एपस्टीन मामले में नाबालिग बच्चियों की देह को पाकर दुनिया के ये सबसे ताकतवर मर्द सेक्स तो कम पा रहे थे अपने अहंकार के अधिक सहला रहे थे। मानव सभ्यता विकास के मनोविज्ञान में यह बात दर्ज है कि किस तरह पुरूष अधिक भागीदार चाहते हैं, शायद उनके भीतर की यह आदिम समझ रहती है कि उन्हें अधिक से अधिक देह-संबंध बनाकर अगली पीढ़ी बढ़ानी है, यह एक अलग बात हो सकती है कि वह वासना तो मानव सभ्यता के विकास के साथ जारी रही, लेकिन उसका पीढ़ी बढ़ाने वाला मकसद अब जरूरी नहीं रह गया। शायद यह भी एक वजह है कि बड़े-बड़े ओहदों पर पहुंचने वाले, शोहरत के आसमान को छूने वाले लोग भी अपनी इस आदिम लालसा के हाथों मजबूर होकर, सडक़ की जुबान में कहें, तो चारों तरफ मुंह मारने लगते हैं। एपस्टीन फाइल में दर्ज दुनिया के एक सबसे बड़े कारोबारी, और एक सबसे बड़े दानदाता बिल गेट्स ने अभी अपनी समाजसेवी संस्था के कर्मचारियों से यह मंजूर किया है कि उनके दो रूसी लड़कियों से संबंध थे। भारत में नारायण दत्त तिवारी से लेकर एमजे अकबर और तरुण तेजपाल तक ने अपनी शोहरत और अपने ओहदे से यही काम किया था।

अब हम एक बार फिर उसी गाने पर लौटें, जिससे आज की बात शुरू की थी, तो साहिर लुधियानवी का लिखा ये गाना और एपस्टीन फाइल्स एक ही बात कहते हैं, सत्ता और वासना मिलकर इंसान को जानवर बना देते हैं। ‘यहां तो हर चीज़ बिकती है’ आज भी सच है, बस तरीका बदल गया है। ऑनलाइन, प्राइवेट आइलैंड्स, और पावरफुल नेटवक्र्स में। दुनिया चकलाघर जैसी लगती है क्योंकि हमने सभ्यता के ऊपर सिर्फ एक पतली परत चढ़ाई है, नीचे वही गुफाकाल का इंसान है, जो वासना या ताकत के लिए सब कुछ बेच या खरीद लेता है। सवाल ये है, क्या हम कभी इस चक्र से निकल पाएंगे, या हमेशा ‘कहो जी, तुम क्या-क्या खरीदोगे’सुनते रहेंगे? 

(Daily Chhattisgarh)         

लाखों बरस का इंसानी दिमाग, एक पीढ़ी में ही इतना ओवरलोड

26 फरवरी 2026 

 

एल्विन टॉफलर ने अपनी प्रसिद्ध किताब ‘फ्यूचर शॉक’ (1970) में एक ऐसी भविष्यवाणी की थी जो आज पूरी तरह सत्य साबित हो रही है। उन्होंने कहा था कि तकनीकी और सामाजिक बदलाव इतनी तेजी से होंगे कि इंसान का दिमाग और भावनाएं उन्हें संभाल नहीं पाएंगी। इस स्थिति को उन्होंने ‘फ्यूचर शॉक’ नाम दिया, यानी भविष्य का झटका। टॉफलर के अनुसार, औद्योगिक युग में बदलाव धीमे होते थे, लेकिन 20वीं सदी के अंत और 21वीं सदी में जानकारी, तकनीक और जीवनशैली में बदलाव इतनी तेजी से आएंगे कि लोग लगातार तालमेल (एडजस्टमेंट) की कोशिश में थक जाएंगे। वे लिखते हैं कि जब बदलाव की गति इंसान की तालमेल क्षमता से ज्यादा हो जाती है, तो व्यक्ति में तनाव, भ्रम, चिंता और निर्णय लेने में असमर्थता पैदा होती है। उन्होंने तीन तरह के झटकों की बात की। तकनीकी बदलाव (नई मशीनें, कंप्यूटर), सामाजिक बदलाव (परिवार, रिश्ते, काम का तरीका), सांस्कृतिक बदलाव (मूल्य, विश्वास, जीवनशैली) टॉफलर ने चेतावनी दी कि अगर समाज ने इस तेजी को नियंत्रित नहीं किया, तो लोग ‘ओवरलोड’ महसूस करेंगे। जानकारी की बाढ़, विकल्पों की अधिकता और लगातार अनिश्चितता से। आज सोशल मीडिया, स्मार्टफोन और 24x7 न्यूज से हम ठीक वही अनुभव कर रहे हैं। टॉफलर की भविष्यवाणी ने हमें बताया कि बदलाव अच्छा है, लेकिन उसकी गति अगर इंसान से ज्यादा तेज हो, तो वह ‘शॉक’ बन जाता है।

टॉफलर ने आधी सदी के और पहले भविष्य का अपना जो अनुमान सामने रखा था वह कई टुकड़ों में सही साबित हो रहा है। आज इंफर्मेशन ओवरलोड दुनिया के लोगों की एक बहुत बड़ी समस्या बन चुका है। जो देश, समाज, या व्यक्ति जितने अधिक विकसित, संपन्न, या कामकाजी हैं, वे उतने ही अधिक थके हुए भी हैं। जिस तरह किसी ऊंची इमारत पर रेत की बोरी चढ़ाते हुए मजदूर थकते हैं, कुछ वैसे ही आज लोग थके हुए हैं। अमरीका की एक शोध रिपोर्ट बताती है कि वहां एक औसत व्यक्ति दिन में 74 बार फोन चेक करते हैं, और साल में हजारों घंटे से ज्यादा डिजिटल कंटेट पढ़ते, सुनते, या देखते हैं। बहुत से लोग व्यस्त कामकाजी रहते हैं, और वे कंप्यूटरों पर काम करते हुए कुछ सुनते भी रहते हैं, या किसी दूसरी स्क्रीन पर कुछ देखते भी रहते हैं। यह डिजिटल-सहूलियत लोगों पर एक पीढ़ी के भीतर ही आ गई है। 1990 के दशक के लोगों को टीवी, और साधारण मोबाइल फोन ही हासिल थे। धीरे-धीरे वॉक-मैन जैसे चलते-फिरते संगीत उपकरण भी मिलने लगे। लेकिन तब से अब तक की एक पीढ़ी के भीतर ही अब नए लोग दिन में 8-10 घंटे तक स्क्रीन पर गुजारने लगे हैं। इंसानी दिमाग का विकास लाखों बरस में हुआ, लेकिन डिजिटल युग ने इसे इस तेजी से बदला है और एक साथ बहुत से काम करने का बोझ उस दिमाग पर लाद दिया है जो एक वक्त पर दो-चार ही चीजों पर ध्यान देता था। अब हर स्क्रीन एक औसत व्यक्ति के लिए कई तरह के मैसेंजरों पर लगातार संदेश या सूचना लाती है, सोशल मीडिया के जाने कितने ही प्लेटफॉर्म पर उसे उसकी दिलचस्पी के फोटो-वीडियो, या पोस्ट सुझाती है, दफ्तर या कारोबार का काम लादती है, दोस्तों या रिश्तेदारों के सुख और दुख की खबरें पहुंचाती है। एक स्क्रीन आज इंसानों के आंख-कान के रास्ते उसके दिमाग को चारों तरफ से सूचनाओं से घेर देती है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि दिमाग की वर्किंग मेमोरी सीमित रहती है, और ओवरलोड से आगे का सीखना भी धीमा होता है, और बुरी तरह प्रभावित होता है। यह ठीक उसी तरह का है जैसे कम क्षमता के कंप्यूटर, धीमे प्रोसेसर पर कोई बड़ा सा वीडियो एडिट करने के लिए बैठ जाए। कुछ मनोवैज्ञानिकों का यह कहना है कि जब किसी व्यक्ति के सामने देखने, सुनने, पढऩे की अपार पसंद पेश हो जाती है, तो उनकी पसंद करने की क्षमता को लकवा सरीखा मार जाता है। हमारा खुद का यह मानना है कि जब लोग लगातार, पल-पल निजी, कारोबारी, और महज दिलचस्पी के संदेशों और पोस्ट से घिरे रहते हैं, तो इन सबको पल-पल देखने की उनकी बेचैनी बढ़ती जाती है। कुछ दशक पहले जब ई-मेल शुरू हुआ तो पश्चिम की एक संपन्न महिला एक सैलानी जहाज पर गई हुई थी। समंदर के बीच उस वक्त उसे इंटरनेट हासिल नहीं था, और अपने ई-मेल बॉक्स में झांके बिना उसे चैन नहीं पड़ रहा था। ऐसे में उसने जहाज से संदेश भिजवाकर किराए का हेलिकॉप्टर बुलवाया उससे वह किनारे पहुंची, अपना ई-मेल बॉक्स देखा, जिसमें कुछ भी काम का नहीं था, लेकिन इसके बाद ही वह लौटकर सैलानी जहाज पर अपना बाकी का वक्त चैन से गुजार सकी।

आज फ्रांस सरीखे कुछ विकसित देशों ने ऐसे कानून बना दिए हैं कि कोई भी कंपनी, या एम्प्लॉयर अपने किसी कर्मचारी को दफ्तर या कंपनी के कामकाज के बारे में काम के घंटों के बाद न कोई संदेश भेज सकते, न कोई ई-मेल भेज सकते। सरकार का मानना है कि अगर दफ्तर का कोई ई-मेल आया हुआ रहता है, तो घर बैठे या पिकनिक पर गए हुए लोग भी उसे खोलकर पढ़े बिना चैन से नहीं रह सकते। ऐसी बेचैन हो चुकी दुनिया ने एक-दो पीढ़ी के भीतर ही दिन में एक बार आने वाले अखबार, या कुछ बार आने वाले रेडियो-टीवी के बुलेटिन से परे ले जाकर अब उसे पल-पल खबर देना शुरू किया है। बहुत से लोग ऐसे समाचार-संदेशों के साथ नोटिफिकेशन भी चालू रखते हैं, और नतीजा यह होता है कि दूर कहीं किसी हादसे में 20 लोगों के मरने की खबर पुख्ता होने के पहले वे उसके एक दर्जन नोटिफिकेशन देख चुके रहते हैं, और इनमें से किसी से उनका अधिक लेना-देना नहीं रहता, किसी को भी अपनी जिंदगी में पल-पल की ऐसी खबर की जरूरत नहीं रहती, सिवाय खबरों के पेशे में काम करने वाले लोगों के। लेकिन आज हालत यह है कि तरह-तरह के मीडिया के नोटिफिकेशन लोग लेना शुरू करते हैं, और अपने दिमाग की धार कम हो जाने तक भी वे उसमें उलझे रहते हैं। दूसरा यह कि लोग अपनी पसंद या अपने शौक से बिना किसी उपयोग की फालतू की रील देखते घंटों गुजार देते हैं। इसके बाद ऐसी रील दिखाने वाले प्लेटफॉर्म उनकी पसंद भांपकर उनके सामने वैसी ही पोस्ट की कतार लगा देते हैं। किसी के नशे का अंदाज लगाकर उसके सामने उसी नशे की कतार लगा देने जैसा यह काम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लगातार कर रहे हैं। नतीजा यह हो रहा है कि लोगों की अपनी कोई पसंद सीमित करना उनके हाथ में नहीं रह जाता, सोशल मीडिया के एल्गोरिदम हर दिन उनकी पसंद पर अधिक हद तक कब्जा करते चलते हैं, और वे डिजिटल कैदी होकर रह जाते हैं। आज चारों तरफ थोड़े से समझदार लोग भी लगातार नोटिफिकेशन की आवाज बंद करने का काम कर रहे हैं, बहुत से समझदार लोग अपने ऊपर ही बंदिश लगा लेते हैं कि वे दिन में एक या दो बार से अधिक बार सोशल मीडिया को चेक नहीं करेंगे। कुछ लोग छुट्टी के दिन को डिजिटल डी-टॉक्स की तरह इस्तेमाल करने लगे हैं, स्क्रीन से उपवास का एक दिन। यह अनुशासन याद दिलाता है कि किस तरह दुनिया के बहुत सारे धर्मों में हफ्ते में एक दिन खान-पान के उपवास का रहता था, अब लोग खान-पान के साथ-साथ अपने धार्मिक आराध्य के किसी दिन, या छुट्टी के दिन डिजिटल-उपवास कर सकते हैं।

हम मनोविज्ञान की भाषा में बहुत अधिक तकनीकी जानकारी यहां देना नहीं चाहते, लेकिन लोग इतना जरूर समझ लें कि जिस तरह एक सब्जीवाली के टोकरे पर अंधाधुंध वजन रहने से उसकी गर्दन का हमेशा के लिए नुकसान होता था, जिस तरह ओवरलोड मजदूर अपने बदन का नुकसान झेलते हैं, ठीक वैसे ही आज लोग स्क्रीन का नुकसान झेल रहे हैं। लोगों को बहुत सोच-समझकर आज चारों तरफ से हो रही कंटेट की बौछार को संभलकर झेलना चाहिए, वरना प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की वॉटर-कैनन की धार जिस तरह उनके पांव उखाड़ती है, उसी तरह आज इंसान की जिंदगी में डिजिटल बौछारें तेज धार से उसके दिमाग के पांव उखाड़ रही हैं। यह नौबत ऐसी भयानक है कि लोग इसे अपनी कामयाबी मानते हैं कि वे कितना कुछ देख लेते हैं, और उन्हें समझ ही नहीं पड़ रहा कि वॉटर-कैनन की धारदार मार से अस्पताल पहुंच जाने वाले लोगों की तरह उनके दिमाग को अस्पताल की जरूरत आ चुकी है।

अपने धार्मिक, या खान-पान के उपवास की तरह, डिजिटल उपवास के बारे में सोचें, और दिल-दिमाग के अघा जाने तक उसे कचरा न खिलाएं, सोच-सोचकर अपनी सेहत और जरूरत के लायक चीजें ही उसे परोसें। 

(Daily Chhattisgarh)         

दीवारों पर लिक्खा है, 26 फरवरी 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

दीवारों पर लिक्खा है, 25 फरवरी 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

मालिक के प्रति वफादार नौकर की तरह जजों को संविधान के प्रति वफादार होना चाहिए

25 फरवरी 2026 

 

मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस जीआर स्वामीनाथन एक बार फिर विवादों में हैं। उनके ताजा बयान, जो 23 फरवरी 2026 को तमिलनाडु के होसुर में एक आध्यात्मिक कार्यक्रम ‘गुरू वंदना उत्सव’ में दिए गए, उसने देशभर में बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा कि जो लोग आध्यात्मिक गुरुओं को भगवान का रूप नहीं मानते, वे ‘रास्कल्स (दुष्ट), फूल्स (मूर्ख) और बार्बेरियंस (बर्बर)’ हैं। उन्होंने यह बयान तमिलनाडु के कुछ रेशनलिस्टों (तर्कवादियों) के खिलाफ दिया, जो उनके अनुसार गुरु-भक्ति को मूर्खता बताते हैं। उन्होंने कहा, ‘तमिलनाडु में कुछ लोग खुद को रेशनलिस्ट कहते हैं। वे हमें गुरु को भगवान का रूप मानने पर ‘दुष्ट, मूर्ख और बर्बर’ कहते हैं। मैं कहता हूं कि ऐसे कहने वाले खुद दुष्ट, मूर्ख और बर्बर हैं।’ उन्होंने गुरुओं को ‘भगवान का जीवंत रूप’ बताया और कहा कि गुरु की निकटता से ‘आध्यात्मिक आभा’ मिलती है, जो व्यक्तिगत कमजोरियों को दूर करती है। यह बयान उनकी नौकरी के सेवा के बाकी चार सालों में उनके आलोचकों को और भडक़ा रहा है। यह बयान जस्टिस स्वामीनाथन की हिंदू धर्म और आध्यात्मिक झुकाव वाली छवि को मजबूत करता है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि एक जज के रूप में उन्हें सेकुलर (धर्मनिरपेक्ष) रहना चाहिए। सोशल मीडिया पर यह बयान वायरल हो गया है, जहां कुछ ने इसे ‘धार्मिक कट्टरता’ कहा, जबकि समर्थकों ने इसे ‘आस्था की रक्षा’ बताया। रेशनलिस्ट ग्रुप्स ने इसे ‘असंवैधानिक’ बताया, क्योंकि जज का पद सार्वजनिक बयानों में निष्पक्षता मांगता है। यह बयान उनके पहले के विवादों से जुड़ता है, जहां वे धार्मिक मुद्दों पर बोलते रहे हैं। जस्टिस जीआर स्वामीनाथन मदुरै बेंच के जज हैं और कई हाई-प्रोफाइल केस संभाल चुके हैं। उनके फैसले और बयान अक्सर धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक बहस छेड़ते हैं। उदाहरणस्वरूप, दिसंबर 2025 में तिरुपरनकुंड्रम दरगाह के पास ‘दीपाथून’ (एक पत्थर का स्तंभ) पर दीपक जलाने का आदेश दिया, जो एक हिंदू परंपरा है। उन्होंने राज्य सरकार के कानून-व्यवस्था बिगड़ जाने के तर्क को खारिज किया और कहा कि ‘कानून-व्यवस्था’ कोर्ट के आदेशों को न मानने का बहाना नहीं बन सकता। यह आदेश 1 दिसंबर 2025 को आया, जब एक हिंदू की याचिका पर सुनवाई हुई। दरगाह के वकील ने कहा कि सुनवाई में उन्हें बोलने नहीं दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन था।

इस केस ने जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को जन्म दिया। दिसंबर 2025 में 107 से ज्यादा सांसदों (डीएमके, कांग्रेस, अन्य इंडिया ब्लॉक पार्टियां) ने लोकसभा स्पीकर को प्रस्ताव दिया। आरोप लगाया गया कि पक्षपात, सेकुलरिज्म के खिलाफ काम, ‘एक विशेष राजनीतिक विचारधारा’ से प्रभावित फैसले, और ‘एक विशेष समुदाय’ (ब्राह्मण) के वकीलों को उपकृत करते हैं। सांसदों ने 13-पॉइंट प्रतिनिधित्व पहले राष्ट्रपति और देश के मुख्य न्यायाधीश को दिया था, लेकिन कोई कार्रवाई न होने पर महाभियोग प्रस्तुत किया। आलोचकों ने कहा कि यह जज को दबाने-धमकाने की कोशिश है। महाभियोग अभी पेंडिंग है, क्योंकि स्पीकर को इसे स्वीकार या रिजेक्ट करना है। कानूनी विशेषज्ञ कहते हैं कि फैसलों से असहमति महाभियोग का आधार नहीं हो सकती, सिर्फ साबित हो रहा दुराचार ही इसका आधार हो सकता है।

जस्टिस स्वामीनाथन पहले भी अपने कई सार्वजनिक बयानों में और अदालती फैसलों-आदेशों में अपना हिंदुवादी रुख दिखाते रहे हैं। 2023 में उन्होंने कहा- ‘अगर हम वेदों की रक्षा करेंगे, तो वेद हमारी रक्षा करेंगे’ उन्होंने कहा अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक बहस में यह कहा था- ‘देश का संविधान इसकी आबादी के धर्म के अनुपात (डेमोग्राफिक प्रोफाइल) पर निर्भर करता है।’ यहां यह उल्लेखनीय है कि तमिलनाडु देश में दलित राजनीति का एक बड़ा केंद्र है, और वहां पर हिंदू धर्म से जुड़े हुए मुद्दों को दलितों के नजरिए से भी देखा जाता है। ऐसे में जस्टिस स्वामीनाथन का वाचाल होना और खुलकर एक धर्म की मान्यताओं का साथ देना विवाद खड़ा करते ही रहता है।

लेकिन भारत के हाईकोर्ट और यहां के सुप्रीम कोर्ट के जजों के पहले के भी कुछ बयान, फैसले, और व्यक्तिगत जीवन की उनकी मान्यताएं विवाद खड़े करती रही है। भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रहे आरएम लोढ़ा ने 2014 में राजस्थान के एक कार्यक्रम में सार्वजनिक रूप से सतीप्रथा को महिलाओं के त्याग और पवित्रता का प्रतीक बताया था। इस प्रथा के आलोचक सतीप्रथा को विधवा-दहन की तरह देखते हैं, जिसके खिलाफ कड़े कानून हैं। ऐसे आलोचकों ने जस्टिस लोढ़ा की जमकर आलोचना की थी। महिला अधिकार समूहों ने इस बयान की कड़ी आलोचना की थी और जजों से उनके बयानों पर काबू करने की मांग की थी। यह बयान जस्टिस लोढ़ा ने रिटायरमेंट के बाद अदालत के बाहर दिया था। एक दूसरे मामले में राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस महेश चंद्र शर्मा ने गाय से जुड़े एक फैसले में अदालत में कहा था कि मोर जीवन भर ब्रह्मचारी रहता है और यौन संबंध से बच्चे पैदा नहीं करता। इसके साथ ही उन्होंने गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने की सिफारिश की थी और कहा था कि गाय दिव्य रहती है।

ऐसे बहुत से मामले और भी हैं लेकिन उन सबका जिक्र करने पर यह पूरा पेज ही उनसे भर जाएगा। हम इतने नमूने पेश करने के बाद अब अपनी राय रखना चाहते हैं कि जिन ऊंची अदालतों के जजों से हर धर्म, जाति, क्षेत्रीयता, पेशे, और लिंग के लोगों को इंसाफ की उम्मीद रहती है, उन्हें अदालत के भीतर, या अदालत के बाहर बकवासी नहीं होना चाहिए। जिस दिन इस देश में संविधान लागू हो गया उस दिन कोई भी दूसरी आस्था, धार्मिक परंपरा, या धार्मिक ग्रंथ संविधान के शब्दों और उसकी भावनाओं के ऊपर नहीं रह गए। किसी भी लोकतंत्र में आस्था और संविधान के बीच कुश्ती नहीं चल सकती। भारत में अक्सर ही बहुसंख्यक तबकों से आए हुए जजों के ऐसे बयान आए हैं जिन्होंने अपने धर्म, या बहुसंख्यकवाद का हवाला देते हुए, उसका जिक्र करते हुए इस बात का खुलकर प्रदर्शन किया है कि उनका धार्मिक रूझान क्या है। लोकतंत्र में जिन बड़े जजों को संविधान की भी व्याख्या करने, जरूरत पडऩे पर उस पर भी सवाल उठाकर संसद को गौर करने की सिफारिश करने के हक हासिल हैं, उन्हें अपनी निजी आस्था से उपजे बेइंसाफ इरादों को किसी भी मंच से उजागर नहीं करना चाहिए। इसके अलावा हमारा यह भी मानना है कि धर्म, आध्यात्म, या इससे संबंधित मुद्दों को लेकर अगर उनका एक मजबूत पूर्वाग्रह है, तो उन्हें ऐसे मामलों की सुनवाई से भी अपने को अलग कर देना चाहिए। हम तो इसे एक बुनियादी जरूरत मानते हैं कि एक जज निष्पक्ष, न सिर्फ रहे, बल्कि दिखे भी। अदालत में उन्हें इस ऊंची कुर्सी पर किसी धर्मग्रंथ ने नहीं बैठाया है, उन्हें संविधान ने यह इज्जत दी है, हर नौकर को मालिक के प्रति वफादार रहना चाहिए जो कि इस मामले में संविधान है।

भारत के लोकतंत्र में एक-एक कर सभी स्तंभों के प्रति लोगों की आस्था कमजोर होती जा रही है। सरकार, संसद, अदालत, और स्वघोषित चौथा स्तंभ, प्रेस को भी आस्था के इस स्खलन को घटाने की कोशिश करनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)        

दीवारों पर लिक्खा है, 24 फरवरी 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

भूखे-प्यासे दानवों को दावत का न्यौता देती उत्साही दुनिया

24 फरवरी 2026 

 

अमरीका के एक बड़े डेमोक्रेटिक लीडर बर्नी सैंडर्स ने अभी सोशल मीडिया पर यह चेतावनी दी है कि एआई डेटा सेंटर्स पर रोक लगाने की उनकी कुछ महीने पहले की मांग की गूंज अब अलग-अलग जगहों से सुनाई पड़ रही है। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने एआई डेटा सेंटर्स पर मोरेटोरियम (अस्थायी रोक) का प्रस्ताव रखा था तो इसे विकास के खिलाफ, तकनीक के खिलाफ कट्टरपंथी सोच मान लिया गया था। लेकिन आज अमरीका के एक बड़े शहर डेनवर के मेयर ने देशभर के बहुत से दूसरे शहरों और वहां के निर्वाचित लोगों की राह पर चलते हुए अपने शहर में डेटा सेंटर्स पर मोरेटोरियम की घोषणा कर दी है। बर्नी सैंडर्स ने कहा है कि एआई डेटा सेंटर्स जमीन और पानी के इस्तेमाल पर गहरा असर डालेंगे, बिजली की लागत बहुत बढ़ा देंगे, और पर्यावरण पर बुरा असर होंगे। उन्होंने आगे कहा है कि लेकिन यही अकेली वजह नहीं है, एआई का अमरीकी कामकाजी वर्क पर विनाशकारी असर पडऩे वाला है। यह हर क्षेत्र में सफेदपोश और शारीरिक मेहनत वाली, दोनों किस्म की लाखों-करोड़ों नौकरियां खत्म कर देगा। उन्होंने आगे कहा है कि एआई जिस हैरतअंगेज रफ्तार से छलांगें लगाकर आगे बढ़ रहा है, कई जानकार विशेषज्ञों को डर है कि यह क्रांतिकारी तकनीक जल्द ही इंसानों से ज्यादा होशियार हो जाएगी और इंसानी काबू से बाहर भी, और इसके विनाशकारी नतीजे हो सकते हैं। उन्होंने आखिर में कहा है कि ऐसे में लोग चुप नहीं बैठ सकते, और कुछ मु_ीभर बड़ी टेक कंपनियों के मालिकों को यह फैसला करने की इजाजत नहीं दे सकते कि वे हमारी अर्थव्यवस्था, हमारे लोकतंत्र, और मानवता के भविष्य को अपनी मनमानी बदल दें। उन्होंने कहा कि इस बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे पर गंभीर सार्वजनिक बहस और लोकतांत्रिक निगरानी की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अब कार्रवाई का समय है और अमरीका को राष्ट्रीय स्तर पर एआई डेटा सेंटर्स पर मोरेटोरियम की जरूरत है।

दुनिया के एक सबसे विकसित और टेक्नॉलॉजी-संपन्न देश अमरीका को एआई के विकास की लीडरशिप भी हासिल है, और तबाही का खतरा बढ़ाने में भी। इसलिए बाकी दुनिया जहां अमरीकी टेक्नॉलॉजी पर अमल कर रही है, उसे अमरीका के भीतर कारोबार से परे के जनसरोकारी लोगों की उठाई गई बातों पर भी सोचने और फिक्र करने की जरूरत है। बर्नी सैंडर्स ने जो कहा है उसके पीछे का तर्क यह है कि एआई डेटा सेंटर्स को बिना रुके हर पल हजारों-लाखों सर्वर चलाने पड़ते हैं। ये किसी छोटे शहर जितनी बिजली अकेले खा सकते हैं और आगे चलकर लोगों के लिए बिजली महंगी हो सकती है। बिजली की मांग बढऩे से कोयले या गैस पर आधारित बिजलीघर लगाने की नौबत आ सकती है जिसका मतलब होगा अधिक खदानें, जंगलों की अधिक कटाई, पानी की अधिक खपत, और अधिक प्रदूषण। एआई डेटा सेंटर्स सभी जगह किसी प्यासे ऊंट से अधिक पानी पीते हैं (ऊंट भाई-बहन माफ करें), उनके सर्वर इतने गर्म होते हैं कि उन्हें ठंडा रखने के लिए एक-एक डेटा सेंटर को हर दिन लाखों लीटर पानी लगता है। जिन इलाकों में पहले से पानी की कमी है वहां यह भयानक खतरा पैदा कर सकता है। इसके अलावा एआई डेटा सेंटर्स से निकलने वाली गर्मी और उसका शोरगुल आसपास के लोगों का जीना हराम करने ही लगा है। पर्यावरण के हिसाब से देखें तो लगातार भारी इस्तेमाल से सर्वर और चिप्स जल्दी बेकार होते हैं, और इनको बदलने से भारी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक कचरा बढ़ता है। लेकिन इसके भी पहले एआई के लिए बनने वाले खास किस्म के असाधारण ताकतवर चिप्स बनाने में भी अंधाधुंध ऊर्जा और साधन लगते हैं, जिससे पर्यावरण का बड़ा नुकसान होता है।

पर्यावरण के इन नुकसानों से परे देखें, तो एआई से जितने तरह की नौकरियां और रोजगार खत्म होने जा रहे हैं उनके बारे में अलग-अलग विशेषज्ञ-जानकार लगातार चेतावनियां दे ही रहे हैं। अभी-अभी एआई-विकास में लगी हुई एक सबसे बड़ी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट के एआई मुखिया ने एक इंटरव्यू में कहा था कि किस तरह एक-डेढ़ बरस में ही एआई अमरीका के ऑफिस-जॉब बड़ी संख्या में खत्म कर देगा। पूरी दुनिया का यह तजुर्बा है कि बड़ी-छोटी सभी तरह की कंपनियां अपने कर्मचारियों को यह साफ कह चुकी हैं कि वे अपने काम में एआई का अधिक से अधिक इस्तेमाल करें। मतलब यह कि इन कर्मचारियों को यह कह दिया गया है कि अपने फंदे के लिए रस्सियां बुनें। जिन लोगों को यह बात कुछ बढ़-चढक़र कही हुई लगती है, उन्हें यह देखना चाहिए कि अब दुनिया में अनुवादकों, डिजाइनरों, कॉपी राइटरों की शायद ही कोई नौकरी निकलने वाली है। जिन देशों में मजदूर और कर्मचारी कानून मालिकों के पक्ष में है वहां लोगों को बड़े पैमाने पर निकाला जा चुका है। एआई ही कंपनियों को यह बता रहा है कि उसके कौन से कर्मचारी कम जरूरी हैं, अधिक नालायक हैं, कामचोर हैं, या एआई उस काम को मुफ्त में करने के लिए तैयार खड़ा है। जिन लोगों को अभी तक एआई से बेरोजगारी का खतरा दिख नहीं रहा है, वे रेत में सिर घुसाए शुतुरमुर्ग की तरह रेतीली आंधी के गुजर जाने की राह देख रहे हैं, हालांकि कुछ जानकारों का कहना है कि शुतुरमुर्ग को लेकर यह अवैज्ञानिक कहावत बनाई गई है, और वे इंसानों जितने बेवकूफ नहीं होते कि आंधी को अनदेखा करें।

भारत में अभी-अभी दुनिया की सबसे बड़ी एआई समिट निपटी ही है। प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस के लोगों ने वहां पर शर्ट खोलकर एक चौथाई-नग्न प्रदर्शन किया है (अर्धनग्न कहना ज्यादती होगी), यह सही था या गलत था इस गुणदोष पर गए बिना हम यही कह सकते हैं कि एक अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में ऐसी अभूतपूर्व हरकत शायद एक फ्रॉडियन हरकत थी कि मानो इन लोगों को यह अंदाज लग गया था कि एआई जल्द ही सबको नंगा करके छोड़ेगी। कायदे की बात तो यह होती कि मजदूरों और कर्मचारियों के संगठन चौथाई, या अर्धनग्न होकर यहां पर प्रदर्शन करते कि एआई फोटो-वीडियो के अलावा रोजगार में भी उनके कपड़े उतारने जा रहा है।

भारत में भी एआई डेटा सेंटर को बहुत से प्रदेश अपनी संभावित संपत्ति मानकर उसके लिए अंधाधुंध रियायतें घोषित कर रहे हैं, और उसे एक सुनहरे सपने की तरह पेश कर रहे हैं। दुनिया के इतिहास के इस सबसे गर्म-मिजाज और सबसे प्यासे कारखाने का अंदाज जनता को नहीं है, इसलिए वह अपनी सरकारों की बातों को मुग्ध होकर सुन रही है। इसे नई औद्योगिक क्रांति का इंफ्रास्ट्रक्चर कहा जा रहा है। खासकर जो राज्य समंदर के किनारे हैं, जहां तक समुद्री केबल की कनेक्टिविटी अधिक है, जहां पर बिजली सप्लाई विश्वसनीय है, तकनीकी हुनर वाले कामगार मौजूद हैं, वहां पर एआई डेटा सेंटर्स गिद्धों की तरह मंडरा रहे हैं। जिस महाराष्ट्र में पहले ही भयानक जलसंकट चल रहा है, लोग एक-एक घड़े पानी के लिए सौ-सौ फीट गहरे कुओं में उतर रहे हैं, वहां पर देश के एआई डेटा सेंटर्स का लगभग 40 फीसदी से अधिक हिस्सा आया है। इसके बाद तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में करीब 23 फीसदी एआई डेटा सेंटर्स पहुंचे हैं जो कि टैंकरों के भरोसे गला तर करने वाला महानगर है, और अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कंप्यूटर इंसानों के हाथ से गिलास छीनकर खुद पीने लगेंगे। हालत यह है कि देश के अलग-अलग राज्य एआई डेटा सेंटर्स की दानवों की बारात को पीली चिट्ठी लिखकर न्यौता दे रहे हैं, शानदार जनवासे की तस्वीरें भेज रहे हैं, पकवानों की लिस्ट भेज रहे हैं और कह रहे हैं, पधारो सा।

दानवों को दावत के लिए न्यौता देने वाले देश-प्रदेश के लोगों को यह समझ लेना होगा कि उन्हें जल्द ही एआई डेटा सेंटर्स पर पंखा झलते हुए, खुद प्यासे रहकर कंप्यूटर-सर्वरों को पानी पिलाने की जिंदगी मिलने जा रही है। और यह सब इसलिए नहीं कि एआई बीमारी पकड़ेगा, इलाज सुझाएगा, यह सब इसलिए कि वह लोगों के रोजगार छीनेगा, लोगों की झूठी अश्लील फिल्में गढ़ेगा। जिस दानव के खान-पान से देश-प्रदेश वाकिफ नहीं हैं, वे उसे उस तरह न्यौता दे रहे हैं जैसा भेड़ों की बस्ती भेडि़ए को मुख्य अतिथि बनाने जाए।

दुनिया के मजदूरों और कामगारों को बहुत जल्द अपने बैनर-पोस्टर बदलने होंगे, अब किसी कंपनी या मालिक के खिलाफ प्रदर्शन की जरूरत नहीं रहेगी, क्योंकि एआई अकेला ही मजदूर-कामगार का सबसे बड़ा दुश्मन रहेगा। सर्वहारा वर्ग की अगली क्रांति रूस के जार लोगों के खिलाफ नहीं होगी, एआई के खिलाफ होगी। लोगों को एआई के लिए अपने बिछाए लाल कालीन के टुकड़े ही खाने के लिए नसीब होंगे, तिलचट्टे तो कालीन के रेशे खाकर भी जिंदा रह लेते हैं, इंसानों को तो कुदरत ने इस काबिल भी नहीं बनाया है। आगे-आगे देखें, होता है क्या।

(Daily Chhattisgarh)        

सूखी धरती के प्यासे लोग मरते जाएंगे तभी पानी की अंधाधुंध खपत घटेगी...

23 फरवरी 2026 

 

आज जब चारों तरफ कहीं नंगई की राजनीति चल रही है, कहीं ओछेपन की हिंसानियत दिखाते हुए बड़े-बड़े नेता हवा में जहर घोल रहे हैं, तब इन सब उथली और छिछली बातों को छोडक़र जिंदगी और दुनिया के कुछ असल और अहम मुद्दों पर बात करना बेहतर है। ट्रम्पियापे की शिकार आज की दुनिया में साफ हवा की तो कोई बात हो नहीं सकती क्योंकि जलवायु परिवर्तन धीमा करने की चर्चाओं को इस मूढ़मगज ने पटरी से उतारकर ही दम लिया, और अब दुनिया के एक सबसे बड़े प्रदूषक-देश अमरीका के गैरजिम्मेदार हो जाने पर दुनिया के बाकी बड़े देशों को भी यह लगने लगा है कि वे ही दुनिया को साफ रखने, और मानव प्रजाति को बचाने की महंगी जिम्मेदारी क्यों ढोएं? इसलिए हवा को लेकर अब अधिक उम्मीद नहीं की जा सकती, दूसरी तरफ हवा के तुरंत बाद लोगों की जो जरूरत है, वह पानी की है। खाने की बारी पानी के बहुत बाद आती है। पानी का हाल बाकी दुनिया से कुछ आगे बढक़र हिन्दुस्तान में और भयानक इसलिए है कि जिन लोगों के पास जमीन का एक टुकड़ा है, उस पर बंगला, मकान, या कारखाना है, कोई सर्विस सेंटर है, या होटल है, उन तमाम लोगों ने यह मान लिया है कि उतनी जमीन पर खोदे गए जितने भी नलकूप मुमकिन हैं, उन सबसे धरती के पेट से पानी उलीच लेना उनका हक है। यह काम सरकार के नियमों के खिलाफ कारखानों में भी हो रहा है, और कारोबारों में भी हो रहा है। घरों में तो हो ही रहा है जहां पर लोग संपन्न कॉलोनियों में घर के बाहर की सडक़ तक तेज धारदार पानी वाले पाईप से धोते हुए दिखते हैं, और हर दिन गाड़ी धोने के लिए रखे गए लोग उन्हें धान का खेत मानकर मानो सींचते रहते हैं। लोग देश के सबसे गर्म इलाकों में भी छतों पर बगीचे लगाकर रखते हैं, क्योंकि उनके नीचे पानी है, उनके पास भारी-भरकम पंप हैं, और बिजली का बिल चुकाने की हिंसक ताकत भी है। इन सबका मिलाजुला नतीजा यह है कि जिस तरह कोई दौलतमंद बिगड़ैल अपनी गाड़ी से कुचलकर किसी को मार सकते हैं, उसी तरह ऐसे ही दूसरे कुछ दौलतमंद बिगड़ैल धरती का पूरा ही पानी निकालकर इस्तेमाल कर लेने का हिंसक इरादा रखते हैं। 

हम दशकों से इस बात को लिखते आ रहे हैं कि चाहे सरकारी नलों से आने वाला पानी हो, चाहे अपनी जमीन पर नलकूप खुदवाकर उससे अपने पंप और बिजली से खींचा जाने वाला पानी हो, इन सब पर मीटर लगने चाहिए। पानी जहां से भी इस्तेमाल किया जा रहा है, अगर वह साफ-सुथरा जमीनी पानी है, या टंकियों से आने वाला फिल्टर किया हुआ पानी है, तो उसकी खपत पर काबू रखना जरूरी है। छत्तीसगढ़ के पड़ोस के नागपुर में जब पानी की सप्लाई का निजीकरण किया गया, तो निजी कंपनी ने पाईप बदले ताकि हर घर तक पानी चौबीसों घंटे पहुंच सके, रास्ते में उसका लीक होना बंद हो, पानी की चोरी बंद हो। इन सबके साथ जब मीटर लगाए गए, तो कुछ सीमा तक पानी हर परिवार को मुफ्त दिया जा रहा है, लोग बाकी का मामूली भुगतान कर रहे हैं, और अधिक खपत वाले अधिक भुगतान। इसके पहले तक महिलाओं और बच्चों को रात-रात जागकर नल या टैंकर आने की राह देखनी पड़ती थी, जैसा कि छत्तीसगढ़ के भी बहुत से शहरों में गर्मियों में देखने मिलता है। देश के लोग इतने गैरजिम्मेदार हैं कि मुफ्त में मिलने वाले पानी की कोई कदर नहीं है। इसलिए जब मामूली दाम देने पड़ेंगे, तो उस पानी की इज्जत होने लगेगी। जो लोग पानी के निजीकरण के खिलाफ हैं, और अपने आपको जनता के लिए फिक्रमंद मानते हैं, वे अगर मीटरों का विरोध करते हैं, तो वे उसी जनता को एक सूखे कल की तरफ ले जा रहे हैं, जब हिन्दुस्तान जैसे देश में भी अफ्रीका के देशों की तरह इलाका छोडक़र जाने को मजबूर होना पड़ेगा। 

किसी भी देश-प्रदेश को यह समझने की जरूरत है कि गरीब को तो एक परिवार के लिए हर दिन दो-चार सौ लीटर पानी मुफ्त दिया जा सकता है, और बाकी के लिए उसे रियायती बिजली की तरह कुछ भुगतान करना पड़ सकता है। दूसरी तरफ देश के एक-एक करके बहुत से शहर सूखे का शिकार होते चल रहे हैं, जहां एक दिन पैसा देने पर भी पानी नसीब नहीं होगा। नेताओं को, और अपने आपको जनता का हिमायती कहने वाले, निजीकरण के विरोधी लोगों को ऐसी नौबत लाने के लिए ओवरटाइम नहीं करना चाहिए। किसी भी राजनीतिक दल, या सरकार के लिए पानी की मीटरिंग एक लुभावना काम नहीं हो सकता। दूसरी तरफ पानी के निजीकरण के खिलाफ आंदोलन करके कई तरह के नारे उठाना आसान काम रहता है। लेकिन इन दोनों ही तबकों के पास जनता को जिम्मेदार बनाने का और कोई भी तरीका नहीं है, सिवाय पानी की मीटरिंग के। आज भी पानी जैसी ही जरूरत बन चुकी बिजली पर मीटरिंग तो है ही, और सरकार अपने दम-खम पर जितनी यूनिट मुफ्त दे सकती है, उतनी यूनिट देती है, बाकी को रियायती दर पर देती है, और बड़ी खपत पर बड़ा ऊंचा रेट भी लगता है। ठीक ऐसा ही काम पानी को लेकर होना चाहिए, जिसमें सरकारी पाईप लाईन, और लोगों के निजी नलकूप दोनों ही शामिल हों। आज तो शहरी सडक़ों के किनारे बड़े-बड़े ऐसे सर्विस सेंटर चलते हैं जो नलकूप के पानी में तेज धार वाले जेट लगाकर कारों को धोने का काम करते हैं, और उन्हें रोकने वाले कोई नहीं हैं। यह अदूरदर्शिता लोगों के मिजाज में ऐसी अराजकता भर चुकी है कि उन्हें किसी भी चीज का पैसा देना अखरता है। वे अनाज का पैसा देना नहीं चाहते, पढ़ाई या इलाज का पैसा देना नहीं चाहते, बिजली या पानी का पैसा देना नहीं चाहते, और इनमें से हर मामले में मुफ्त में मिली रियायत में भी तरह-तरह की जालसाजी और धोखाधड़ी हो रही है। सरकारी खजाने को चूना लगाने का कोई भी मौका न अमीर छोड़ रहे, न गरीब से गरीब छोड़ रहे। जिन्हें अनाज तकरीबन मुफ्त मिलता है, वे भी उसका एक हिस्सा दुकानदार को ही बेचकर उसकी दारू पी जाते हैं। 

आज जिस तरह दिल्ली बिना साफ हवा के छटपटा रहा है, ठीक उसी तरह हिन्दुस्तान का बहुत बड़ा हिस्सा बिना पानी के छटपटाते रहेगा, प्यासा मरने की नौबत आ जाएगी। सच तो यह है कि लाखों बरसों से चली आ रही धरती पिछले सौ-दो सौ बरस की बिजली, और पिछले 25-50 बरस के गहरे पंपों की मेहरबानी से आज सूखने के कगार पर है, और हो सकता है कि इससे मानव प्रजाति खत्म होते-होते धरती पर एक ऐसा संतुलन कायम हो जाएगा कि पानी की खपत अपने आप कम हो जाएगी। लेकिन यह याद रखने की जरूरत है कि तबाही के इस दौर में सबसे पहले सबसे गरीब प्यासे मरेंगे, और पैसेवाले अपनी ताकत से कई बरस और जिंदा रह लेंगे। एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब पानी के लिए राह चलते लोग कत्ल करने लगेंगे। किसी एक देश को छोडक़र दूसरे देश में प्यासे लोग उसी तरह घुसेंगे जिस तरह पूर्वी पाकिस्तान को छोडक़र दसियों लाख शरणार्थी भारत में घुसे थे। ऐसे दिन की कल्पना करना भी नेताओं को अगले चुनाव के लिए नहीं सुहाता। लेकिन धरती की इतनी ताकत नहीं है कि सैकड़ों फीट गहरे पंप और पाईप लगाकर, स्ट्रॉ की तरह उसका पेट खाली कर देने वालों की हवस पूरी कर सके। आज दिल्ली की हवा से जिस तरह की इमरजेंसी खड़ी हुई है, कल पानी की कमी से हिन्दुस्तान के बहुत बड़े हिस्से में वैसी ही इमरजेंसी रहेगी।

(Daily Chhattisgarh)       

दीवारों पर लिक्खा है, 23 फरवरी 2026

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 22 फरवरी 2026



(Daily Chhattisgarh)

 

प्रेमचंद के गांव, और श्रीलाल शुक्ल के कस्बे से शहर के सफर के पहलू

22 फरवरी 2026

पूरी दुनिया में गांवों से शहरों की ओर लोगों का जाना एक नजर में इसलिए नहीं दिखता है कि गांव बहुत छोटे-छोटे हैं, बिखरे हुए हैं, वहां से लोगों का जाना वहां के बाकी लोगों को तो दिखता है, लेकिन बाहर के लोगों को नहीं दिखता। दूसरी तरफ शहरों में यह बात कुछ अधिक आसानी से दिखती है क्योंकि वहां गांवों से आए हुए लोगों की बसाहट शहर के किनारे-किनारे बढ़ती जाती है, शहर की बढ़ती जरूरतों के लिए मजदूरों की मौजूदगी भी बढ़ती ही रहती है। इस एक तस्वीर के दो अलग-अलग पहलू हैं। और इन दोनों को मिलाकर देखें, तो ऐसा लगता है कि बढ़ता शहरीकरण दुतरफा असर डाल रहा है, गांवों को नजरों से परे की हद तक प्रभावित कर रहा है, और वहां से शहर आने वाले लोगों की जिंदगी को भी सामान्य से अधिक हद तक। 

गांवों से शहरों की तरफ लोगों के जाने की सबसे बड़ी वजह रोजगार की तलाश में होती है। गांवों तक मनरेगा जैसी योजनाएं पहुंची थीं, जिन्होंने लोगों को गांवों में बने रहने की एक छोटी सी संभावना दी थी, सहारा दिया था, लेकिन अब सुनते हैं कि इस योजना के जी राम जी हो जाने के बाद ऐसी संभावनाओं को जय राम जी हो जाने की आशंका बढ़ गई है। केन्द्र सरकार ने योजना में जिस तरह के फेरबदल किए हैं, उनसे कई लोगों को लगता है कि राज्य अपने ऊपर बढ़े हुए ऐसे बोझ को अधिक नहीं ढो पाएंगे। खैर, इस योजना पर चर्चा आज का मकसद नहीं है, आज का मकसद गांवों से शहर आने की मजबूरी है। 

यह भी समझने की जरूरत है कि जिन लोगों ने गांव को भोगा नहीं है, उन्होंने गांव को भुगता भी नहीं है। गांव जाति व्यवस्था के, संयुक्त परिवार व्यवस्था के, संपन्नता और विपन्नता के बड़े उदाहरण रहते हैं। गांवों को लेकर जितनी रोमांटिक तस्वीर बनती है, हकीकत उतनी ही क्रूर रहती है। कुछ लोगों को गांव प्रेमचंद की कहानियों सरीखे लग सकते हैं, और कुछ अधिक लोगों को गांव श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी के बैद जी के गांव या कस्बे सरीखे मिल सकते हैं। जाति व्यवस्था से, और दूसरे शोषण-अत्याचार से थककर भी कुछ लोग शहरों की ओर चले जाते हैं, गांव कभी न लौटने के लिए।

छत्तीसगढ़ जैसे राज्य ने एक वक्त सूखे महीनों में लाखों या दसियों लाख लोगों का प्रदेश से बाहर जाना देखा है। हो सकता है कि सरकार ने कभी भी इन आंकड़ों को पूरी सच्चाई के साथ उनकी असली हद तक दर्ज न किया हो क्योंकि सरकारी अमले के हाथों शोषण से बचने के लिए अधिकतर लोग सरकार को खबर किए बिना ही बाहर जाते थे, और आज भी उसी तरह जाते हैं। लेकिन इनके मुकाबले थोड़े से ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो कि मजबूरी के विस्थापन वाले न हों, और बेहतर रहन-सहन, अधिक शहरी सुविधाओं, पढ़ाई-लिखाई या इलाज के लिए बाहर जाते हों। जो भी हो, आज पूरी दुनिया में गांवों की आबादी घटती चल रही है, और शहरों के बारे में बेरहम जुबान में कहा जाता है कि उन पर बोझ बढ़ते चल रहा है। 

गांवों से लोगों के निकल चले जाने का हाल भारत के ही कुछ पहाड़ी राज्यों से लेकर पश्चिम के कई देशों तक ऐसा है कि अच्छे-खासे बसे हुए गांव अब घोस्ट टाऊन कहलाते हैं, यानी भुतहा गांव या कस्बा। हिन्दुस्तान में भी हिमाचल तरफ कई ऐसे गांवों की कहानियां आती हैं जिनमें गिने-चुने लोग रह गए हैं, बाकी सारे चले गए हैं। पश्चिम के कुछ देशों में ऐसे गांवों में आकर बसने के लिए सरकार कुछ अनुदान भी दे रही है। जब गांवों के उजाड़ होने की नौबत इतनी भयानक है, तो यह भी समझने की जरूरत है कि क्या इंसानों के अलावा भी गांवों को कुछ और छोडक़र जाते हैं? 

गांवों की अपनी एक अलग संस्कृति रहते आई है, वहां के रीति-रिवाज, त्यौहार, सामाजिक परंपराएं, लोक कथाएं, लोकगीत और संगीत, लोककला जैसी बहुत सी जिंदगी की महीन ऐसी बातें हैं जो कि सरकारी जनगणना के आंकड़ों में कहीं नहीं आतीं, लेकिन जब गांव उजड़ते हैं, तो इनमें से तमाम बातें भी उजडऩे लगती हैं। अब कल्पना करें गांव की एक ऐसी संगीत टोली का, जिसके एक-दो वादक या गायक गांव छोडक़र चले गए, तो बाकी का क्या होगा? ऐसे विलेज-बैंड के लोग पूरी तरह से गाने-बजाने पर जिंदा नहीं रहते, वे दूसरे काम भी करते हैं। अब अगर ऐसे दूसरे काम छिन गए, उन्हें काम की तलाश में बाहर जाना पड़ा, तो कुछ लोगों के बाहर जाने से बैंड के बाकी लोग भी बेकार हो गए, और हो सकता है कि उस गांव की लोक संगीत की एक परंपरा ही टूट जाए। 

यह भी सोचें कि अगर गांव के किसी भित्ति चित्रकार को काम की तलाश में बाहर जाना पड़ा, तो गांव में उसके साथ काम कर-करके जो सहायक इस शैली को सीख रहे थे, वही खत्म हो गई, तो क्या होगा? उसके दुबारा जिंदा होने की संभावना कम ही रहती है। लोग कम होते जाते हैं, तो सभी समारोह भी कम होने लगते हैं, और परंपराएं कमजोर पडऩे लगती हैं। 

इसलिए यह समझने की जरूरत है कि गांव को महज आबादी छोडक़र नहीं जाती, उस गांव की संस्कृति, परंपराएं, रीति-रिवाज, और हर किस्म की लोककला, लोक साहित्य, सभी कुछ छोडक़र चले जाने का एक खतरा रहता है। दूसरी तरफ जब यही आबादी देश भर के अलग-अलग शहरों में बिखर जाती है, तो हां पर एक नई अर्थव्यवस्था में जिंदा रहने की चुनौती इतनी बड़ी रहती है, लोग इतने दूर-दूर छिटक गए रहते हैं कि वहां पर वे अपनी ग्रामीण परंपराओं को जारी नहीं रख पाते, अगली पीढ़ी तो उसके बिना ही बड़ी होती चलती हैं, और परंपराओं से उसका रिश्ता कायम ही नहीं हो पाता। 

अब हम इस सिक्के के दूसरे पहलू को देखें, तो गांवों से शहर पहुंचने वाले लोग एक अंधाधुंध गर्मी, और प्रदूषण के बीच भी पहुंच जाते हैं। यहां लिखने का मतलब सांस्कृतिक प्रदूषण नहीं है, सांस लेने वाली हवा का प्रदूषण है। गर्मी वह गर्मी है जो कि शहरी संपन्नता के एयरकंडीशनरों से निकलकर फैलती है, और खुले में जीने को बेबस मजदूरों को हासिल हवा को और गर्म करती है। गरीबों के आने-जाने की कोई भी गाडिय़ां एसी तो रहती नहीं हैं, इसलिए फुटपाथों पर जीते हुए, लालबत्तियों के इर्द-गिर्द ट्रैफिक के धुएं के बीच काम करते हुए, कहीं निर्माण स्थल पर निर्माण-प्रदूषण को सीधे झेलते हुए, कहीं छोटे-बड़े कारखानों, और भट्टियों के आसपास रहते हुए गांव से आए हुए गरीब मजदूर, पहले से बसे हुए शहरी मजदूरों के साथ-साथ शहरी धूल, धुएं, धूप, और बाकी प्रदूषण के गुबार को झेलते हैं। 

एक तरफ उनका छोड़ा हुआ गांव संस्कृति को खोने के खतरे में पड़ चुका रहता है, दूसरी तरफ शहरों में पहुंचे हुए इन ग्रामीणों की सेहत असहनीय शहरी हालात का शिकार रहती है। ये ग्रामीण अपने गांवों से दूर कुछ अलग किस्म से झुलसते हैं, दूसरी तरफ गांव की संस्कृति एक अलग किस्म से झुलसती है। इन दोनों में अगर आपको कोई रिश्ता दिखता है, तो आप देख सकते हैं, वरना ये एक सिक्के के दो अलग-अलग पहलू हैं जो कि एक साथ नहीं दिख पाते, लेकिन इन दोनों को मिलाकर ही सिक्का पूरा होता है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि गांवों से शहरों की तरफ के विस्थापन से ही आज की यह दुनिया पूरी होती है। अपना कहे जाने वाले गांव को छोडक़र निकलना, और पराया समझे जाने वाले शहर में बसना, बहुत से लोगों के लिए यह आगे बढऩे का एक सिलसिला होता है। जिंदगी की रोज की लड़ाई में जिंदा रह पाना अधिकतर लोगों के लिए इतना महत्वपूर्ण और जरूरी होता है कि गांव से जुड़ी हुई संस्कृति और वैसी दूसरी महीन बातों को ढोने के लिए उनके कंधों पर न जगह बचती है, न रीढ़ की हड्डी में उतनी ताकत। 

गांव और शहर के बीच के इंसान को देखने के कई नजरिए हो सकते हैं, अलग-अलग कवि, लेखक, और पत्रकार की नजर से देखने पर यह एक ही इंसान कई अलग-अलग इंसान की तरह दिखते हैं। देखते हैं कि आपको इनमें से कौन सा इंसान दिखता है।

(Daily Chhattisgarh) 

माँ गिरफ्तार हुई, तो बेटे ने की खुदकुशी, तात्कालिक कारण से परे की वजहें भी

22 फरवरी 2026 

 

कल छत्तीसगढ़ में एक नौजवान ने खुदकुशी कर ली। कुछ अरसा पहले पिता की मौत हुई थी, और आपदा राहत राशि हड़पने वाले एक गिरोह ने परिवार को झांसा दिया कि अगर सांप के काटने से मौत दिखाई जाए तो सरकार से चार लाख मिल सकते हैं। ऐसे में कई तरह के फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए, और निकली रकम में से विधवा महिला को कुल 50 हजार रूपए मिले, और बाकी रकम इस गिरोह के लोगों ने बांट ली। जब दस्तावेज फर्जी पाए गए, तो इस महिला को कल गिरफ्तार किया गया, और बेटे ने सदमे में आकर थाने से घर जाकर खुदकुशी कर ली। हम आत्महत्या की कई अलग-अलग वजहों को लेकर कई बार लिखते हैं क्योंकि उन्हें ठीक से समझने की समाज को जरूरत लगती है। अभी दो-चार दिन पहले ही या तो इसी जगह, या अपने अखबार के यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर हमने बच्चों की खुदकुशी का मुद्दा भी उठाया था। अब यह आत्महत्या सामने आई है, इसलिए समाज में आत्महत्या की वजहों के बारे में कुछ अधिक खुलासे से सोचने-समझने, और उस पर चर्चा करने की जरूरत है।

जब समाज में तरह-तरह के जुर्म, जालसाजी, और ठगी-धोखाधड़ी का चलन बढ़ गया हो, तो धीरे-धीरे लोगों को यह आसान कमाई सुहाने लगती है, और मेहनत के कामकाज को जरूरी मानना बंद कर देते हैं। नतीजा यह होता है कि कुछ लोग लगातार जुर्म करते रहते हैं, और बहुत से लोग लगातार जुर्म के शिकार होते रहते हैं। हवा में एक नकारात्मकता छाई रहती है। कई लोग जुर्म करके खतरे की आशंका में तनावग्रस्त रहते हैं, और बहुत से लोग जुर्म के शिकार होकर, नुकसान झेलकर एक अलग किस्म की कुंठा में चलते हैं। हवा में तनाव घुला रहता है। इससे परे जब कभी जिस देश-प्रदेश में, किसी शहर-समाज में जातिवाद या साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद या भाषा के विवाद चलते रहते हैं, तो उससे भी एक तनाव रहता है। जब किसी इलाके में स्थानीय और बाहरी-परदेसिया का मुद्दा रहता है, तो दोनों ही तबकों के लोग एक अलग तरह के तनाव में रहते हैं। जिन्हें बाहरी-परदेसिया कहा जाता है, वे संख्या में कम रहते हैं, और वे आशंका से भर जाते हैं, उन्हें अपने काम और कारोबार, संपत्ति और परिवार को लेकर आशंकाएं रहती हैं। दूसरी तरफ जो स्थानीय होने का दावा करते हैं, रहते हैं, उन्हें जब स्थानीयता का कोई अतिरिक्त फायदा नहीं दिखता, तो उनके भीतर भी भड़ास का गुबार बढ़ते चलता है। 

जब लोगों को यह लगता है कि उनके दिए हुए वोट से सत्ता पर आने वाले लोग भ्रष्ट हैं, दुष्ट हैं, और वोट के दिन उनके पास ऐसे ही लोगों में से किसी एक को छांटने की मजबूरी है, तो उनके भीतर भी लोकतांत्रिक-निराशा बढ़ती चलती है। इसी तरह कहीं किसी सरकारी दफ्तर की भ्रष्ट व्यवस्था से लोग निराश रहते हैं, कहीं पर अदालत की धीमी रफ्तार लोगों को बेइंसाफी लगती है, और वह रहती भी है। ऐसे बहुत से कारण रहते हैं जो कि लोगों में निराशा बढ़ाते हैं। लोगों को किसी आत्महत्या के पीछे इतनी सारी वजहों को हमारा गिनाना हो सकता है कि गैरजरूरी लगे, लेकिन हमारा यह साफ-साफ मानना है कि किसी देश-प्रदेश या समाज में लोगों के खुश रहने का अपना एक असर होता है, जहां जिंदगी बेहतर, सुख से भरी हुई, संभावनाओं वाली, और खुशहाल होती है, वहां तो लोग इतनी खुदकुशी नहीं करते होंगे। आज अगर हिन्दुस्तान में बच्चों से लेकर बूढ़ों तक बड़ी संख्या में खुदकुशी होती है, तो वह उनके सामने की एक तात्कालिक वजह के साथ-साथ बहुत सी परोक्ष वजहें भी उनके मामले में रहती है, जो कि उनकी दिमागी हालत को आत्मघाती बनाने का काम करती हैं। 

जिस देश-प्रदेश, या समाज को खुश रहना है, उन्हें नफरत, हिंसा, और बाकी किस्म के नकारात्मक कारणों से छुटकारा पाने की तरकीबें ढूंढनी चाहिए। आज लोग अपने घरों में अगर नफरत की बातें करते हैं, तो घर के दूसरे बालिग सदस्यों के साथ-साथ बच्चों की रगों में भी लहू के साथ-साथ नफरत भी दौडऩे लगती है। बच्चे स्कूलों में उस नफरत का इस्तेमाल शुरू कर देते हैं, और फिर उस नफरत के शिकार दूसरे बच्चों में उसकी एक प्रतिक्रिया भी होने लगती है। आत्महत्या हो, या हत्या, दोनों के पीछे एक हिंसक इरादे की जरूरत रहती है, चाहे वह अपने खिलाफ हो, चाहे दूसरों के खिलाफ। कुछ बच्चे दूसरों के हाथों परेशान होकर खुदकुशी कर सकते हैं, और कुछ दूसरे बच्चे दूसरों का कत्ल। अभी कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ के दुर्ग में कुछ मुस्लिम स्कूली बच्चों को पाकिस्तान के एक आतंकी-हैंडलर के साथ संपर्क में पकड़ा गया। इन बच्चों को इनकी स्कूल के दूसरे गैरमुस्लिम बच्चे धर्म की वजह से आतंकी कहते हुए, पाकिस्तानी कहते हुए प्रताडि़त करते थे। नतीजा यह हुआ कि किसी तरह यह घटना पता लगने पर पाकिस्तान में बैठे भारत में आतंक फैलाने वाले एक एजेंट ने इन मुस्लिम बच्चों को भडक़ाना शुरू किया, और इन बच्चों ने इंटरनेट पर डार्क वेब वाली जुर्म की दुनिया में जाकर हथियारों की पूछताछ शुरू कर दी थी। इसी वक्त भारत की एजेंसियों की नजर इन पर पड़ी, तो पता लगा कि स्कूल में दूसरे बच्चों की प्रताडऩा की वजह से इन बच्चों के मन में हिंसक भावनाएं भडक़ रही थीं। 

इस तरह हर हत्या या आत्महत्या के पीछे तात्कालिक कारण जो भी हों, ऐसी हिंसा करने की दिमागी सोच, उतनी ताकत या नफरत लोगों में रातोंरात नहीं जुटती हैं, इसके पीछे हवा में फैली हुई नफरती हिंसा, दूसरे किस्म के तनाव, या कि किसी दाखिला इम्तिहान या नौकरी के मुकाबले में बेईमानी जैसी कोई बेइंसाफी भी एक वजह हो सकती है। समाज में दिमागी सुकून आसानी से नहीं आता है। जो लोग यह सोचते हैं कि बहुसंख्यक तबके का राज आ जाने से पूरे देश में अमन-चैन आ जाएगा, उन लोगों को दुनिया के दूसरे देशों का इतिहास और वर्तमान भी देखना चाहिए। लोकतंत्र में बहुसंख्यक तंत्र खुशहाली नहीं ला सकता, बहुलतावादी तंत्र ला सकता है। और जब तक खुशहाली नहीं आती, तब तक लोगों के पास की निजी आत्मघाती वजहों को बढ़ावा देने के लिए सामाजिक तनाव हमेशा ही हाथ बंटाता रहेगा। बात थोड़ी जटिल है, लेकिन पूर्वाग्रहों को अलग रखकर अगर सोचेंगे, तो यह बहुत जटिल भी नहीं लगेगी।

(Daily Chhattisgarh)       

अफगान महिलाएं, जरा याद इन्हें भी कर लो, आंखों में भर लो पानी

21 फरवरी 2026 

 

करीब 20 बरस अफगानिस्तान पर राज करने के बाद अमरीका को जब यह समझ आया कि वह किसी किनारे पहुंच नहीं रहा है, न तो अफगानिस्तान में किसी तरह का लोकतंत्र, या पिट्ठू सरकार कायम करने की गुंजाइश है, और न ही इतने लंबे खर्च को, अमरीकी सैनिकों की जिंदगी को खतरे में डालते हुए जारी रखना मुमकिन है, तो उसने 2021 में दुम दबाई, और रातों-रात अफगानिस्तान छोडक़र भागा। उस दिन वहां की जो खबरें आ रही थीं, वे बता रही थीं कि किस तरह राजधानी काबुल के एयरपोर्ट से अमरीकी विमानों पर सवार होकर अमरीकी सैनिक भाग रहे थे, और तालिबान एयरपोर्ट की तरफ बढ़ते चले जा रहे थे। आखिर में हाल यह था कि ढेर सारे हथियार, गोला-बारूद, और फौजी हेलीकॉप्टर भी छोडक़र अमरीकी भागे थे। लेकिन इसके साथ-साथ अमरीका अपने तमाम अफगान मददगारों को भी धोखा देकर भागा था, जो कि इतने बरस तक अमरीकी हुकूमत की मदद कर रहे थे, उसकी फौज के साथ काम कर रहे थे, तालिबानों के खिलाफ अफगान महिला जज फैसले दे रही थीं, महिलाएं तरह-तरह के दूसरे सरकारी कामकाज में लगी हुई थीं, इन सबको छोडक़र, तालिबान के हवाले करके अमरीका भाग गया था। नतीजा यह निकला कि अभी पांच बरस होने को हैं, अफगान तालिबानों ने दुनिया की सबसे जुल्मी महिलाविरोधी सरकार कायम करके रखी है, और अमरीका सहित दुनिया के कोई भी देश उनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रही है। 

ऐसे तालिबानों ने छांट-छांटकर उन महिलाओं के खिलाफ पहले कार्रवाई की जो कि अमरीकी फौजी शासन के साथ मिलकर काम कर रही थीं। उनमें से अधिकतर को अफगानिस्तान की कोई न कोई सरहद पार करके पड़ोसी देश के रास्ते भागना पड़ा। लेकिन जो महिलाएं वहां बच गईं, उनकी पढ़ाई-लिखाई, कामकाज, कोई नौकरी करना, अकेले घर से निकलना, या घर पर भी खुली आवाज में नमाज पढऩा, इन सब पर तालिबानी रोक लग गई। एकदम से अमरीका के छोड़े गए शून्य में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के अभूतपूर्व और असाधारण पैमाने लागू हो गए। विश्व समुदाय इस बात को लेकर दुविधा में फंस गया कि भूखे और बीमार मरते अफगान लोगों को मदद करने के लिए वह तालिबान हुकूमत के सामने महिला अधिकारों की शर्त रखे, या अफगान आबादी को जिंदा रहने में मदद करे? भारत जैसे बहुत से देशों के लिए रणनीतिक रूप से यह आसान नहीं था कि वह तालिबानों को महिला अधिकार का सम्मान करना सिखाए, और उस शर्त पर उनसे बातचीत करे। भारत जैसे बहुत से देशों ने तालिबानी हुकूमत को मान्यता नहीं दी है, लेकिन बहुत से देशों ने तालिबानी नेताओं के साथ औपचारिक और अनौपचारिक बातचीत का सिलसिला जारी रखा है, और लोगों को याद होगा कि कुछ अरसा पहले इस सरकार का एक बड़ा नेता भारत आया था, तो उसकी प्रेस कांफ्रेंस में महिला पत्रकारों को नहीं बुलाया गया था। इस पर बवाल होने के बाद अगले दिन फिर एक प्रेस कांफ्रेंस हुई जिसमें महिला पत्रकारों को भी शामिल किया गया। कई दिनों तक अफगान नेता भारत में रहा, और मान्यता दिए बिना भी भारत अफगान सरकार के साथ एक बड़े तालमेल के साथ चल रही है क्योंकि वह पाकिस्तान से लगा हुआ देश भी है, और उसका पाकिस्तान के साथ बड़ा टकराव भी चल रहा है, और यह बात भारत अनदेखी नहीं कर सकता। 

आज इस पर लिखने की जरूरत इसलिए है कि अफगान-तालिबान के सबसे बड़े नेता ने अभी पिछले ही महीने 90 पेज का एक नया क्रिमिनल कोड जारी किया है जो कि महिलाओं को संपत्ति की तरह मानता है, और पत्नी पर पति की हिंसा को एक बड़ी सीमा तक कानूनी दर्जा देता है। यह लिखित नियम बताते हैं कि अगर पति पत्नी को इस बुरी तरह पीटता है कि उसकी हड्डियां टूट जाती हैं, जख्म आते हैं, लहू निकलता है, तो इसके सुबूत अगर पत्नी अदालत में देती है, तो उस पर अधिकतम 15 दिनों की कैद का प्रावधान है। दूसरी तरफ जानवरों को चोट पहुंचाने पर इससे अधिक सजा है। इस क्रिमिनल कोड का एक दूसरा हिस्सा बताता है कि पत्नी अगर पति की अनुमति के बिना मायके या रिश्तेदारों के घर जारी है, और वापिस नहीं लौटती है, तो पत्नी और उसके परिवार को तीन महीने की कैद हो सकती है। कुल मिलाकर पति को ‘विवेकपूर्ण सजा’ की छूट है, जिसका मतलब है कि हड्डी तोड़े बिना, खून बहाए बिना पीटना। दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों ने महिला पर ऐसी भयानक हिंसा को कानूनी दर्जा दे देने के तालिबानी फैसले की जमकर निंदा की है। 

2021 में अफगान सत्ता पर लौटने से अब तक तालिबानों ने महिलाओं के बारे में 80 से ज्यादा हुक्म जारी किए हैं, जिनमें 54 ऐसे हैं जो महिलाओं के खिलाफ तरह-तरह की बंदिशों वाले हैं। अफगानिस्तान अब दुनिया का अकेला देश है जहां लड़कियां 6वीं कक्षा से ज्यादा नहीं पढ़ सकती। इसकी वजह से 10 लाख से अधिक लड़कियों की पढ़ाई छूट गई है, या शुरू ही नहीं हो पाई है। 2024 में तालिबान सरकार ने नया नैतिकता कानून बनाया जिसमें महिलाओं पर सार्वजनिक जगहों पर बोलना, बिना चेहरा ढांके जाना, बिना पुरूष पारिवारिक साथी के कहीं सफर करना, सब पर रोक लगा दी गई है। यूनिसेफ जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के मुताबिक अफगानिस्तान में दसियों लाख लड़कियां शादी के पहले पुरूषों का शोषण झेलती हैं। संयुक्त राष्ट्र ने अफगानिस्तान को महिलाविरोधी कानून और व्यवस्था को देखते हुए लैंगिक-रंगभेदी देश करार दिया है। ह्यूमन राइट्स वॉच की 2025 की रिपोर्ट में कहा गया है कि अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों की पिछले 20 बरस की प्रगति खत्म हो चुकी है। इस तरह की जानकारी अथाह है, अफगानिस्तान में महिलाओं के जिस पहलू को देखें, वह जुर्म की हिंसा से लहूलुहान है। ऐसे में अब यह बाकी दुनिया की जिम्मेदारी है कि वह तालिबान को किस तरह काबू में करे, किस तरह अफगानिस्तान को आर्थिक या दूसरी मदद देने के एवज में तालिबानी सरकार की बांहें मरोडक़र उसे महिलाओं को बेहतर, और अधिक हक देने पर मजबूर करे। आज दिक्कत यह है कि दुनिया भर की सरकारें न सिर्फ अफगानिस्तान, बल्कि दुनिया के किसी भी देश के साथ नैतिकता की बात करने में दिलचस्पी नहीं रखतीं, सिर्फ अपने राष्ट्रीय हितों को देखती हैं, जिनके मुकाबले कोई नैतिकता अहमियत नहीं रखती। अफगान महिलाएं दुनिया में सबसे अधिक लैंगिक भेदभाव की हिंसा झेलने वाली हो गई हैं, और उनके हक के लिए कई सरकारों की कोई दिलचस्पी नहीं है, कई सरकारों को उसे अनदेखा करना सहूलियत का लग रहा है। दुनिया का इतिहास इन तमाम बातों को अच्छी तरह दर्ज करते चल रहा है, लेकिन आज दुनिया में जो नेता पांच-पांच बरस के अपने भविष्य और अस्तित्व से दूर का नहीं सोच पाते हैं, उन्हें इस बात की भला क्या फिक्र होगी कि इतिहास उन्हें कैसा दर्ज करेगा? 

(Daily Chhattisgarh)       

दीवारों पर लिक्खा है, 21 फरवरी 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

स्कूली बच्चों की आत्मघाती हिंसा से उठते हैं कई सवाल, पर जवाब सरकार के पास

20 फरवरी 2026 

 

छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में अभी 48 घंटे के भीतर स्कूली इम्तिहानों में शामिल होने जा रहे चार नाबालिग बच्चों ने खुदकुशी कर ली। इनके पीछे मोटेतौर पर पढ़ाई का तनाव दिख रहा है, लेकिन जैसा कि किसी की भी जिंदगी में होता है, यह भी हो सकता है कि साथ-साथ कोई दूसरा तनाव भी हो। एक नाबालिग ने तो खुदकुशी की जो चिट्ठी लिख छोड़ी है उसमें परिवार से कहा है कि उसका शरीर मेडिकल कॉलेज को दे दिया जाए। यह अतिपरिपक्व सोच इस उम्र के हिसाब से कुछ अधिक गंभीर है, और हक्का-बक्का करने के अलावा यह हैरान भी करती है। वैसे तो बालिगों, या नाबालिगों, अक्सर ही प्रेमीजोड़ों, या वैध-अवैध कहे जाने वाले रिश्तों में उलझे हुए लोगों की खुदकुशी की खबरें आती रहती हैं, लेकिन एक ही जिले में दो दिनों के भीतर इम्तिहान के मौसम में चार नाबालिग छात्र-छात्राओं की खुदकुशी दिल दहलाती है, और लोग इसे गंभीर मानें तो यह सोचने का एक बहुत बड़ा मुद्दा है। वरना इसे कोई महत्व न देना हो, तो यह पुलिस, अस्पताल, पोस्टमार्टम का मामला है, और इसके साथ ही केस बंद हो जाएगा। समाज या सरकार के सामने इससे अधिक कुछ करने की कोई बेबसी नहीं है।

एक बिल्कुल अलग मामले में धमतरी जिले की एक सरकारी स्कूल में 35 बच्चे ऐसे मिले हैं जिन्होंने अपने कलाई पर किसी नुकीली या धारदार चीज से खरोंच लगाई है, अपने ही बदन को नुकसान पहुंचाया है, कई मामलों में काटने का निशान मिला है। यह जानकारी तो अभी सामने आई है, लेकिन इस मिडिल स्कूल के छात्र-छात्राओं की कलाई पर ये निशान कुछ हफ्तों तक से कुछ महीनों तक के पुराने दिख रहे हैं। इनमें लडक़े-लड़कियां दोनों ही शामिल हैं, और किसी ने घर के तनाव की वजह से ऐसा किया है, किसी ने दिल टूट जाने के कारण। ऐसा लगता है कि एक-दूसरे के देखादेखी इन बच्चों ने अपने को नुकसान पहुंचाने का यह तरीका निकाला है। इसे लेकर अधिकारी हड़बड़ाए हुए हैं, और बच्चों से और उनके मां-बाप से बात करने के लिए किसी परामर्शदाता को गांव भेजा भी गया है। यह मामला खुदकुशी तक नहीं पहुंचा है, लेकिन कुछ कम दर्जे का आत्मघाती मामला तो है ही, अपने को नुकसान पहुंचाने का। 

हम किसी भी खुदकुशी को उस व्यक्ति की असफलता के साथ-साथ उसके पारिवारिक और सामाजिक दायरों की असफलता भी मानते हैं जिन्होंने वक्त रहते अपने बीच के सदस्यों की निराशा को नहीं भांपा, और वे खुदकुशी कर बैठे। अधिकतर मामलों में यह होता है कि खुदकुशी की कगार पर पहुंचने के पहले लोगों के बर्ताव से आसपास के लोगों को यह अहसास हो सकता है कि कहीं कुछ गड़बड़ है। लोग चाहें तो अपने बीच के व्यक्ति को संभाल सकते हैं, और कोई ठोस मदद न सही, कम से कम दिलासा दिला सकते हैं, उनमें आत्मविश्वास जगा सकते हैं। जब लोगों के मन में जिंदगी छोड़ देने का ख्याल आता है, तब वे ऐसी अस्थिर मानसिक स्थिति में रहते हैं कि वे निराशा जरा सी और बढऩे पर कगार के बाहर कदम बढ़ा सकते हैं, और हौसला थोड़ा सा मिल जाए, तो वे उस कगार से वापिस भी लौट सकते हैं। इम्तिहानों के दिनों में कई नेता, कहीं-कहीं पर प्रशासन और पुलिस के अधिकारी भी छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए सामान्य अपील जारी करते हैं, लेकिन इन दिनों सोशल मीडिया और मोबाइल सरीखे उपकरणों की मेहरबानी से लोगों को सिर्फ सबसे अधिक आकर्षक, सनसनीखेज, या उत्तेजक सामग्री ही बांध पाती है, और ऐसे में नसीहत की बातें उन पर अधिक असर नहीं करती, सच तो यह है कि उनका ध्यान तक नहीं खींचती। 

सरकार और समाज को आज की परीक्षा के मौसम की अपीलों से बढक़र कुछ सोचना होगा। हमने अपने अखबार में, और यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर बार-बार इस मुद्दे को उठाया है कि आज समाज में हर उम्र के लोग जिस तरह से हिंसक या आत्मघाती होते चल रहे हैं, उसे देखते हुए समाज के बीच अधिक परामर्शदाताओं की जरूरत है। आज मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं को देखें, तो पौन घंटे की उनकी फीस ही हजारों रूपए होती है, और एक-एक की उलझन को सुलझाने में कई बार ले जाना पड़ता है। आज देश में कितने ऐसे लोग हैं जो कि अपने परिवार के एक सदस्य पर हजारों रूपए खर्च कर सकें? फिर यह भी है कि देश में अंधविश्वास की वजह से मानसिक उलझन के लोगों को प्रेत-बाधा का शिकार मान लिया जाता है, या किसी ने जादूटोना कर दिया होगा, ऐसा मान लिया जाता है। मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता, या मनोचिकित्सक न आसानी से उपलब्ध हैं, और न ही वे सस्ते हैं, दूसरी तरफ झाड़-फूंक करने वाले, भूत उतारने वाले, तंत्र-मंत्र करने वाले पाखंडी गली-गली मौजूद हैं, और वे मनोविज्ञान के पेशेवर लोगों के मुकाबले बड़े-बड़े दावे भी करते हैं, भरोसा दिलाते हैं, और उनके गिरोह में शामिल लोग उनसे ठीक होने वाले लोगों की कहानियां भी फैलाते रहते हैं। कई धर्मों में इस तरह के पाखंडी लोगों का बड़ा बोलबाला है, और कई तरह के बाबा, चंगाईसभा करने वाले पादरी लोगों पर से दुष्टात्मा हटाने का पाखंडी-प्रदर्शन करते हैं। कई तरह की धार्मिक सभाओं में असली या नकली मानसिक विचलित लोगों को तरह-तरह की अस्वाभाविक हरकतें करते दिखाया जाता है, और फिर धार्मिक पाखंड से जुड़े हुए लोग उन्हें ठीक कर देते हैं। देश में जब अंधविश्वास एक आम ढर्रा बन जाता है, तो पेशेवर मनोवैज्ञानिकों की जरूरत भी कम रहती है, और वे वैसे भी लोगों की पहुंच के बाहर हैं। 

हम शायद 50वीं बार अपनी इस सलाह को दुहरा रहे हैं कि केन्द्र और राज्य सरकारों को यह चाहिए कि अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले विश्वविद्यालयों के मनोविज्ञान विभाग में बड़े पैमाने पर परामर्शदाता तैयार करने का ढांचा खड़ा करे। इसके लिए स्कूलों के मौजूदा प्रशिक्षित शिक्षकों को भी आमंत्रित किया जा सकता है कि वे अपनी तनख्वाह पाते हुए भी मनोवैज्ञानिक-परामर्श का एक या दो बरस का एक कोर्स करें, और फिर अपनी तैनाती की जगह पर अपनी स्कूल के बच्चों के अलावा भी वे शहर-कस्बे की दूसरी स्कूलों में जाकर वहां भी हर हफ्ते बच्चों की उलझन सुलझाएं। इससे नाबालिग हिंसा, और आत्मघाती हरकतों के मामले घटेंगे। यह भी होगा कि जब कम उम्र से बच्चे मानसिक रूप से अधिक मजबूत रहेंगे, तो वे बेहतर बालिग भी साबित होंगे। लेकिन आज न सिर्फ बच्चों, बल्कि समाज के बड़े लोगों के लिए भी तरह-तरह के परामर्शदाताओं की जरूरत है। स्कूलों के शिक्षक चूंकि पढ़ाने के बीएड जैसे कोर्स किए हुए रहते हैं, इसलिए वे परामर्श के कोर्स करने के लिए अधिक सही व्यक्ति भी होते हैं। सरकारें अगर समाज में औपचारिक जगहों पर, और अनौपचारिक रूप से भी मनोवैज्ञानिक-परामर्श की सहूलियत मुहैया नहीं कराएंगी, तो एक तो सरकार के हाथ हिंसा के बहुत से मामलों से भरे रहेंगे, दूसरी बात यह भी रहेगी कि एक बीमार या विचलित समाज कभी भी एक स्वस्थ और खुश समाज जितना उत्पादक नहीं हो सकता। हमें आज के लिए सबसे जरूरी, और सबसे आसान बात यही लगती है कि सरकार अपने ढांचे में मौजूद शिक्षकों को ऐसी पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करे, और अभी से इस बात की घोषणा करे कि आने वाले बरसों में शिक्षकों के लिए जिस तरह बीएड अनिवार्य है, उसी तरह मनोवैज्ञानिक-परामर्श का कोर्स किए हुए लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी। भारत में समाज इतना सक्षम और संपन्न नहीं है कि वह अपनी बहुत सी दिक्कतों को खुद सुलझा सके, इसलिए सरकारों का योगदान जरूरी है, जिसके बिना कई तरह के खतरे टल नहीं सकते।

(Daily Chhattisgarh)       

दीवारों पर लिक्खा है, 20 फरवरी 2026



 

दीवारों पर लिक्खा है, 19 फरवरी 2026


(Daily Chhattisgarh)




 

हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों से महिला की देह फिर फोकस में..

19 फरवरी 2026 

 

कल छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के दो अलग-अलग मामलों में दिए गए फैसले बलात्कार में लडक़ी या महिला की अलग-अलग स्थितियां तय करते हैं। इन दोनों की आपस में तुलना करने की कोई वजह नहीं है, दोनों की घटनाएं अलग हैं, लेकिन भारतीय कानून में महिलाओं की स्थिति, और भारतीय हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के नजरिए को लेकर इन दोनों की एक तुलना करना जरूरी भी है। बिलासपुर हाईकोर्ट ने एक जिला अदालत द्वारा सुनाई गई सात साल की सजा को घटाकर साढ़े तीन बरस कर दिया, क्योंकि हाईकोर्ट जज का यह मानना था कि किसी महिला की योनि पर अगर आरोपी ने अपना गुप्तांग टिकाया था, और वहीं उसका स्खलन हुआ, तो जब तक उसने योनि के भीतर प्रवेश नहीं किया था, तब तक वह बलात्कार नहीं, सिर्फ बलात्कार का प्रयास कहलाएगा। यह पूरी बात सुनने में बड़ी अप्रिय लगती है, लेकिन सेक्स अपराधों के मामले में इस चर्चा से इसलिए नहीं बचा जा सकता कि ऐसे बारीक तकनीकी फर्क से कानून के नजर में जुर्म बदल जाता है। हाईकोर्ट ने इस तकनीकी फर्क के आधार पर मौजूदा कानून के तहत इसे बलात्कार की कोशिश ही माना, और उस आधार पर ही सजा सुनाई, ट्रॉयल कोर्ट की दी गई सजा घटाकर आधी कर दी। 

एक दूसरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पिछले बरस इलाहाबाद हाईकोर्ट के दिए गए उस विवादास्पद आदेश को रद्द कर दिया जिसमें एक नाबालिग लडक़ी को सीना पकडक़र, उसका नाड़ा खींचा गया था, उसे पुल के नीचे ले जाया गया था, और हाईकोर्ट ने इसे बलात्कार का प्रयास मानने से भी इंकार कर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को रद्द कर दिया है। हमने पिछले बरस के इस फैसले के तुरंत बाद इसी जगह यह लिखा था कि जज का यह तर्क सही नहीं है कि उस नाबालिग लडक़ी का सीना भींचना, और उसका नाड़ा खोलने या तोडऩे की कोशिश करना बलात्कार की कोशिश नहीं है। इसके खिलाफ हमने अपने अखबार के यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल पर जमकर कहा था, और सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि इस फैसले को तुरंत खारिज करे। इसे खारिज करने में सुप्रीम कोर्ट ने करीब 11 महीने लगा दिए, और सर्वोच्च अदालत को जो संवेदनशीलता दिखानी थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राममनोहर नारायण मिश्रा का नाम तब से हमारे दिमाग में घूम ही रहा था कि कैसे कोई जज इतना संवेदनाशून्य हो सकता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के ही एक दूसरे जज संजय कुमार सिंह ने बलात्कार के एक आरोपी को जमानत देते हुए लिखा था कि पीडि़ता ने खुद ही मुसीबत को न्यौता दिया था, और वह खुद जिम्मेदार है। हमने इस पर पहले भी लिखा था कि सुप्रीम कोर्ट जब अदालती संवेदनशीलता के लिए कुछ निर्देशक-सिद्धांत बनाना चाहता है, तो उसे सबसे पहले यह तय करना चाहिए कि इस तरह की हिंसक, पुरुषवादी, महिलाविरोधी, और संवेदनाशून्य टिप्पणियां करने वाले जजों को उनकी बाकी नौकरियों तक इस किस्म के मामलों से अलग रखा जाए। जो जज सदियों का पूर्वाग्रह ढोते हुए हिंसक बने हुए हैं उन्हें ऐसे किसी भी मामले की सुनवाई का हक नहीं है। हम जजों से यह उम्मीद तो नहीं करते कि वे पुरखों से मिली हिंसा की विरासत से पूरी तरह मुक्त हो सकेंगे, लेकिन उन्हें महिलाओं और बच्चों के मामलों से, धर्म या जाति के मामलों से पूर्वाग्रह की वजह से ही अलग रखना चाहिए। 

जब-जब हमारी कही कोई बात सुप्रीम कोर्ट में जायज करार दी जाती है, तो थोड़ी तसल्ली होती है कि प्राकृतिक न्याय पर आधारित हमारी सीमित समझ सही साबित हुई है। इससे भी अधिक तसल्ली यह होती है कि भारतीय समाज में जो तबके सबसे कमजोर हैं, उन तबकों के साथ, उनमें से कम से कम किसी एक तबके के साथ यह थोड़ी हमदर्दी की बात हुई है। हालांकि इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के मामले में नफरती-बयान की याचिका पर जो रूख दिखाया है, वह एकदम ही निराश करने वाला है। सुप्रीम कोर्ट के पिछले, रिटायर हो चुके जजों ने हेट-स्पीच के मामले में जो साफ-साफ फैसले दिए थे, और पूरे देश के प्रशासन पर एफआईआर दर्ज करने की जो जिम्मेदारी डाली थी, आज के चीफ जस्टिस खुद ही हाल के बरसों के उस फैसले को अनदेखा करते हुए दिख रहे हैं। खैर, आज लड़कियों और महिलाओं के हक, उनकी गरिमा, उनके साथ इंसाफ की चर्चा में हम नफरती-बयानों के मुद्दे को जोडक़र सब कुछ बहुत जटिल करना नहीं चाहते, इसलिए उस पर अलग से। 

फिलहाल बिलासपुर हाईकोर्ट का यह ताजा फैसला कुछ फिक्र खड़ी करता है कि कोई पुरूष अपने निजी अंग को महिला के निजी अंग पर दस मिनट तक रखे, और वहीं उसका स्खलन हो जाए, और उसे बलात्कार न माना जाए। जज अपनी जगह सही होंगे, क्योंकि भारत के कानून में बलात्कार की परिभाषा में महिला की देह के भीतर प्रवेश एक अनिवार्य शर्त है, और उसके बिना उसे रेप नहीं माना जा सकता। लेकिन यह कानून जब भी बना होगा, उस वक्त इस बात को अनदेखा किया गया कि महिला के गुप्तांग पर इस तरह स्खलित होने का मतलब उस महिला को एड्स सहित दूसरे सभी सेक्स-संक्रमित बीमारियों को देना भी है। इनमें से एड्स अभी तक पूरी दुनिया के लिए लाइलाज है। इसे उस लडक़ी या महिला की पूरी जिंदगी के लिए एक जानलेवा खतरा बनाने वाले को अगर बलात्कारी न माना जाए, तो क्या माना जाए? एक संकुचित परिभाषा के तहत उसे बलात्कारी न मानना तकनीकी रूप से जायज तो हो सकता है, लेकिन उसे महज बलात्कार के प्रयास का आरोपी मानकर छोड़ देना तो कानून की बहुत ही अदूरदर्शी, और सीमित सीमाओं का एक सुबूत है। जज ने अपने हिसाब से तंगनजरिए वाले कानून के तहत सही व्याख्या की होगी, लेकिन हमारी समझ यह भी कहती है कि हाईकोर्ट को कानून की व्याख्या करने के साथ-साथ जरूरत पडऩे पर उसमें फेरबदल भी सुझाना चाहिए। इस फैसले में जज ने वह सुझाया है या नहीं, वह पूरा फैसला अभी हमें देखने नहीं मिला है। लेकिन जिस संसद से कानून बनते हैं, उस संसद में यह बात आनी चाहिए कि किसी लडक़ी या महिला को इस तरह एड्स के खतरे में डालने को क्या कहा जाए? जिंदगी का खतरा, पूरी जिंदगी की बीमारी का खतरा, यह बलात्कार के दर्जे में नहीं आ रहा है, यह गैरइरादतन हत्या के दर्जे में नहीं आ रहा है, तो फिर कहां आ रहा है? एक तरफ तो सुप्रीम कोर्ट इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला खारिज करते हुए लडक़ी के नाड़े तोडऩे को बलात्कार का प्रयास मान रहा है, तो दूसरी तरफ लडक़ी के बदन से अपना गुप्तांग रगडक़र वहीं स्खलित हो जाने को भी बलात्कार का प्रयास ही माना जा रहा है। इन दोनों में साफ-साफ फर्क होना चाहिए। और अगर जरूरत हो तो बलात्कार से जुड़े हुए कानूनों में बारीकी से इस बात का प्रावधान करना चाहिए कि एड्स जैसी बीमारी का खतरा पैदा करने वाले बलात्कार की कोशिश करने वाले को पूरा बलात्कारी माना जाए, या गैरइरादतन हत्या का मुजरिम माना जाए? इस पर संसद को बात करना चाहिए, और एक खास सजा का इंतजाम करना चाहिए। बदलते हुए वक्त, और हो रही अलग-अलग घटनाओं को लेकर कानून में फेरबदल की जरूरत आते रहती है, और संसद को एक ऐसा कानून भी बनाना चाहिए कि किस तरह के फैसले देने वाले जजों को उस तरह के मामलों से अलग रखने की अनिवार्यता अदालती-प्रशासन पर लागू हो। क्या पक्ष-विपक्ष की लड़ाई में उलझी हुई संसद को भारतीय कानून और अदालत की ऐसी जटिलताओं पर कोई गंभीर बात करने का वक्त है? 

(Daily Chhattisgarh)      

बाल सुधारगृहों से बच्चे तो भाग जाते हैं, अपने पीछे कई सवाल छोड़ भी जाते हैं

18 फरवरी 2026 

 

छत्तीसगढ़ में अभी सरगुजा के एक बाल सुधारगृह में गंभीर अपराधों में बंद किए गए 13 नाबालिग फरार हो गए। उनमें से 4 पकड़ा गए हैं, लेकिन 9 को कई जिलों में ढूंढा जा रहा है। समाचार बताता है कि वे गार्ड को बंधक बनाकर, उन पर हमला करके, दीवाल से छलांग लगाकर भाग निकले। इन नाबालिगों पर कुछ सबसे गंभीर अपराधों के मामले किशोर न्यायालय में चल रहे हैं। यह पहला मौका नहीं है कि इस राज्य के बाल सुधारगृह में हिंसा करके वहां बंदी बनाए गए किशोर फरार हुए हों, लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले तो दुर्ग के एक बाल सुधारगृह की छत पर चढ़ गए लडक़े रसोई गैस सिलेंडर को पुलिस पर फेंकने के लिए उठाकर खड़े थे, और दिल दहलाने वाली उनकी वैसी तस्वीरें सामने आई थीं। देश का कानून नाबालिगों को मुजरिम नहीं मानता है, उन्हें कानून से टकरा रहे नाबालिग ही मानता है। सुप्रीम कोर्ट में एक बहस यह भी चल रही है कि बहुत भयानक जुर्म में शामिल नाबालिगों को भी क्या बालिग मानकर सजा नहीं दी जानी चाहिए? इस मामले में मानवाधिकारवादी लोगों का कहना है कि नाबालिगों के साथ अलग सुलूक होना चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ निर्भया जैसे भयानक सामूहिक बलात्कार कांड में शामिल एक नाबालिग ने निर्भया की देह के साथ जैसे जुल्म किए थे, उसे देखते हुए लोगों को यह भी लगता है कि कई किस्म के जुर्म उम्रसीमा से परे मान लेने चाहिए। 

हम बाल सुधारगृह के नाम पर ही आते हैं। इसे सुधार माना गया है। लेकिन वहां का जो हाल रहता है, क्या उसमें सचमुच ही किसी तरह के सुधार की कोई गुंजाइश रहती है? एक तो जो नाबालिग वहां पहुंचते हैं, उनमें से बहुत सारे लगातार जुर्म के बीच बरसों से जीते हुए रहते हैं। वे नशा सीख चुके रहते हैं, दूसरे बालिग मुजरिमों के मातहत और उनके साथ काम करते हुए वे जुर्म की दुनिया का हिस्सा बन चुके रहते हैं। किसी मामले में पकड़ में आने के बाद जब उन्हें बाल सुधारगृह भेजा जाता है, तब तक वे अपराधों में रम चुके रहते हैं। बहुत ही कम नाबालिग ऐसे रहते होंगे जो अपनी पहली चूक या पहली गलती, पहले गलत काम के साथ ही पकड़ाए जाते हों, और बाल सुधारगृह भेज दिए गए हों। फिर सरकार के दूसरे किसी भी इंतजाम की तरह बाल सुधारगृह में नाबालिगों के भीतर के भी अलग-अलग उम्र सीमा के सभी तरह के बच्चे वहां रहते हैं, और जैसा कि बालिगों की जेल में होता है, जो अधिक बड़े मुजरिम रहते हैं, उन्हीं का राज चलता है। बाल सुधारगृह में भी अधिक बड़े जुर्म में पकडक़र भेजे गए लडक़ों का दबदबा रहता है, और यह बात तो बहुत आम है कि देश की सबसे सुरक्षित जेलों में भी मोबाइल भी पहुंच जाते हैं, नशा भी पहुंच जाता है। यह मानना भी फिजूल होगा कि नशे के आदी हो चुके नाबालिग सुधारगृह में नशे का जुगाड़ करने की कोशिश नहीं करते होंगे। सरकारों की सारी व्यवस्था जितनी भ्रष्ट रहती है, उसमें ऐसा इंतजाम बहुत मुश्किल भी नहीं रहता होगा। बाल सुधारगृह तो जेलों जैसी बहुत कड़ी सुरक्षा व्यवस्था वाले भी नहीं रहते, हथकड़ी, बेड़ी, सलाखों की कोठरियां उनमें नहीं रहतीं, और ऐसे में अधिक बड़े जुर्म वाले, अधिक अराजक हो चुके लडक़ों का वहां अधिक दबदबा स्वाभाविक ही लगता है। 

जब देश का कानून नाबालिगों को एक अलग दर्जा देता है, और किसी जुर्म में उनके शामिल होने पर भी न उन्हें मुजरिम कहता, न उन्हें दी जाने वाली सजा को कैद कहता, और सब कुछ सुधार के नजरिए से किया जाता है। ऐसे में सच तो यह है कि सरकारों को सुधारगृहों को सचमुच ही सुधार के लायक बनाना होगा, वरना नाबालिगों को वहां रखकर उन्हें जुर्म से अधिक वाकिफ करके ही छोड़ा जा रहा है। बड़े या बालिग कैदियों की जेलों में भी यही होता है, जिनको वहां बंद रखा जाता है, वे और अधिक बड़े, और अधिक कड़े मुजरिम बनकर निकल सकते हैं। अब बच्चों के, नाबालिगों के सुधारगृह में भी अगर माहौल वैसा ही है, तो फिर सरकारें अपनी न्यूनतम बुनियादी जिम्मेदारी भी पूरी करते नहीं दिखती हैं। यह बात भी समझना चाहिए कि बड़े लोगों की जेलों में पहुंचे हुए लोग जिंदगी का अधिक बड़ा हिस्सा गुजारने के बाद वहां पहुंचते हैं, और वहां पर वे अपने जुर्म के अनुपात में ही लंबे बरसों के लिए कैद रहते हैं। दूसरी तरफ बाल सुधारगृह में पहुंचे हुए नाबालिगों की उम्र बहुत बाकी रहती है, उन्हें सुधारगृह में बंद रखने का वक्त भी बड़ा कम रहता है, और अगर वे जुर्म में मंजकर बाहर निकलते हैं, तो वे समाज में लंबे समय के लिए एक खतरा रहते हैं। इसलिए सरकार को समाज की व्यापक हिफाजत और भलाई के लिए कानून से टकरा रहे बच्चों के लिए बेहतर इंतजाम करना चाहिए। हम किसी रहस्य की बात नहीं कर रहे हैं, पूरी दुनिया का यही तजुर्बा है कि अगर वहां बच्चों को ठीक से नहीं रखा गया, तो भविष्य बहुत लंबे वक्त के लिए बर्बाद होता है, उन बच्चों का भी, और पूरे समाज का भी। 

बाल सुधारगृहों की पूरी सोच को आम सरकारी ढर्रे से अलग हटकर विश्लेषण की जरूरत है। सरकारों को समाज के जानकार और विशेषज्ञ तबकों से सलाह लेना चाहिए, और बाल सुधारगृहों के अनुभवी लोगों से भी यह पूछना चाहिए कि अलग-अलग सीमा तक अराजक हो चुके, अलग-अलग सीमा तक जुर्म सीख चुके, नशे के आदी हो चुके, अलग-अलग उम्र के बच्चों को एक साथ रखना क्या जायज है? क्या यह सभी तरह के जानवरों को एक बाड़े में बंद कर देने सरीखा नहीं है? क्या बिना किसी पुख्ता हिफाजत, और इंतजाम के, अलग-अलग दर्जे के बिगड़े हुए बच्चे एक साथ रखने से, कम बिगड़े हुए बच्चों के अधिक बिगड़ जाने का एक बड़ा खतरा नहीं रहता है? ये सारे असुविधाजनक सवाल किसी बाल सुधारगृह में हिंसा, या अराजकता सामने आने पर उठ खड़े होते हैं, कम से कम हमारे मन में तो उठते ही हैं, लेकिन हमारा मन काफी नहीं है, ये सरकारों के सामने, और समाज के बीच भी उठने चाहिए। आज के नाबालिग बच्चे अधिक जुर्म सीखकर, अधिक हिंसक होकर, अधिक बड़े मुजरिम बनकर बालिग होकर बाहर निकलेंगे, तो वे समाज और सरकार दोनों के लिए एक बड़ी समस्या रहेंगे। इस समस्या को देखते हुए ही नहीं, देश के बच्चों का इससे परे भी ख्याल रखने के लिए सरकार और समाज दोनों को बाल सुधारगृहों की पूरी सोच और व्यवस्था के बारे में गंभीरता से विश्लेषण, और आत्ममंथन करना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)     

दीवारों पर लिक्खा है, 18 फरवरी 2026


(Daily Chhattisgarh)