रथयात्रा में कुचलकर मौतें, सीएम की माफी काफी नहीं, वीआईपी कल्चर खत्म हो...

30 जून 2025 

 

ओडिशा के जगन्नाथपुरी में सालाना रथयात्रा दुनिया का एक सबसे भीड़भरा मौका रहता है जब एक रथ को खींचने के लिए लाखों लोग इकट्ठे होते हैं, और यह समारोह कई दिनों तक चलते रहता है। जगन्नाथ की पूजा के विधि-विधान कई दिनों तक चलते हैं, इस बीच भगवान कभी मौसी के घर जाते हैं, कभी बीमार पड़ते हैं, और हर रीति-रिवाज से लाखों भक्त जुड़े रहते हैं। इस रथयात्रा के लिए लकड़ी का जो विशेष रथ बनाया जाता है, उसे लेकर अंग्रेजी भाषा में एक शब्द भी जोड़ा गया है। जो अतिविशाल गाडिय़ां या वाहन रहते हैं, उन्हें अंग्रेजी में जगरनॉट कहा जाता है। यह शब्द जगन्नाथ के रथ से लिया गया है। ऐसी रथयात्रा के दौरान कल इतवार की सुबह मुंहअंधेरे भगदड़ मची, और तीन भक्तों की मौत हो गई, 50 लोग घायल हो गए। इसके पहले भी भीड़ में दबने और दम घुटने से सैकड़ों लोगों को अस्पताल में भर्ती किया गया, जिनमें से कई की हालत खराब बताई गई थी। राज्य के मुख्यमंत्री मोहन माझी ने लोगों से माफी मांगी है, और लिखा है कि यह लापरवाही अक्षम्य है, सुरक्षा में कमी की तत्काल जांच होगी, और जिम्मेदारों के खिलाफ उदाहरणीय कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने आगे लिखा कि रथयात्रा के दिन प्रभु जगन्नाथ के रथ को खींचने में बेहिसाब देरी को महाप्रभु की इच्छा करार देना, एक शर्मनाक बहाना है, जो प्रशासन की जिम्मेदारी से पल्ला झाडऩे की कोशिश है।

हादसा तो हो चुका है, लेकिन उसके बाद सबसे अच्छी बात यही हो सकती है कि घायलों की मदद की जाए, और घटना से सबक लिया जाए। इसके साथ-साथ यह भी जरूरी रहता है कि जिम्मेदार लोगों को हटाया जाए, और सरकार अपनी जिम्मेदारी माने। ओडिशा के भाजपा मुख्यमंत्री की इस बात के लिए तारीफ करनी होगी कि उन्होंने खुलकर सरकार की बदइंतजामी और लापरवाही, दोनों को माना है, कलेक्टर और एसपी को तुरंत बदला है, जांच के आदेश दिए हैं, और खुलकर माफी मांगी है। हम इतनी उम्मीद और करते हैं कि सरकार इससे एक सबक भी लेगी। इसके पहले भी कभी-कभी रथयात्रा के दौरान ऐसे हादसे हुए हैं, और अपार बेकाबू भीड़ में कुछ मौतें भी हुई हैं। हादसे का यह पहला मौका नहीं है, लेकिन इस बार जो कुछ पहलू सामने आ रहे हैं, उनकी भी जांच करने की जरूरत है, और अगली बार से ऐसा न हो, इसके लिए एक लिखित निर्देश अभी से जारी होने चाहिए। 

इस बार की रथयात्रा में एक अलग ‘वीआईपी कल्चर देखने मिला, और ओडिशा के विपक्षी नेताओं से परे, बहुत से चश्मदीद गवाहों ने भी इसका जिक्र किया है। लोगों का कहना है कि घटना के एक दिन पहले शनिवार सुबह अडानी समूह के अध्यक्ष गौतम अडानी के लिए अलग इंतजाम किया गया, ताकि वे रथ को खींच सकें, इसके लिए रथ के रास्ते को खाली कराया गया। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि शुक्रवार की शाम जान-बूझकर तीनों रथों को बीच रास्ते रोक दिया गया था, ताकि शनिवार सुबह अडानी को रथ खींचने का मौका दिया जा सके। एक अलग समाचार बताता है कि भगदड़ के वक्त भक्तों के निकलने के गेट को बंद कर दिया गया था, क्योंकि वहां से ‘वीआईपी लोगों को भीतर ले जाया जा रहा था, और इसमें भीड़ बढ़ती चली गई, और बाद में भगदड़ हुई। जो भी हो, भारत के धर्मस्थलों पर अरबपतियों, नेताओं, और बड़े अफसरों या जजों के लिए अलग से इंतजाम कोई अनोखी बात नहीं है, और जिस तिरुपति में लोगों को 24-24 घंटे लाईन में लगने के बाद सिर्फ पलक झपकने जितनी देर के लिए प्रतिमा के दर्शन हो पाते हैं, उसी तिरुपति में देश के सबसे संपन्न लोगों के पहुंचने पर पूरा ट्रस्ट उनके साथ पूजा की वर्दी में चलकर फोटो खिंचवाता है, और देव प्रतिमा के सामने से बाकी भक्तों को हटवाता है। यह देश के अधिकतर तीर्थस्थानों पर होता है, और देवस्थानों से परे भी। 

कल का ही एक वीडियो यूट्यूब, और फेसबुक पर देखने मिल रहा है जिसमें उत्तर भारत में कहीं पर एक पुल की मरम्मत चल रही है, बैरियर पर मरम्मत का बैनर लगाकर गार्ड खड़े हैं, वहां से निकलने वाले एक शव वाहन को रोक दिया गया है, और परिवार के लोग शव को पैदल ले जा रहे हैं, और वहां पहुंचे विधायक महोदय की गाड़ी को रास्ता देने के लिए बैरियर हटाया जा रहा है, लाश पैदल जा रही है, और विधायक की बड़ी सी गाड़ी उसी मरम्मत-पुल पर जाने दी जा रही है। यह जगह-जगह देखने मिलता है। कई जगह तो नेताओं के काफिले में एम्बुलेंस फंसती है, मरीज मर जाते हैं। कई जगह चौराहों पर नेताओं के काफिले रोके जाते हैं, और बारिश में भीगते हुए बाकी लोग खड़े रहते हैं। भारतीय लोकतंत्र में यह सामंती मिजाज और इंतजाम बड़ा ही आम हैं, और हर खास व्यक्ति अपने वक्त को अधिक कीमती मानते हुए आम लोगों को गुठली की तरह इस्तेमाल करते हैं। 

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से भी किसी दखल की उम्मीद हम नहीं करते क्योंकि जब सुप्रीम कोर्ट के जज भी किसी तीर्थस्थान पर पहुंचते हैं, तो आम लोगों की कतार को रोककर उन्हें इस अंदाज में पहले दर्शन करवाए जाते हैं कि मानो खुद ईश्वर जज साहब के दर्शनाभिलाषी हों। कभी-कभी लगता है कि जो कोई तथाकथित वीआईपी इस हड़बड़ी में ईश्वर तक जाते हैं, उनकी हड़बड़ी देखकर उन्हें ईश्वर कतार तोडक़र अपने पास क्यों नहीं बुला लेते? अगर सुप्रीम कोर्ट में कोई जज अपने ऐसे सामंती-वीआईपी विशेषाधिकार को छोडऩे तैयार हो, तो वे ऐसी घटना से खुद होकर एक मामला दर्ज कर सकते हैं, और देशभर से धर्मस्थानों से जवाब मांग सकते हैं कि उनके यहां तथाकथित वीआईपी लोगों के लिए कौन से ऐसे इंतजाम हैं जो कि आम लोगों के हक छीनते हैं, उन्हें लेट करते हैं? देखना है कि इस देश की न्यायपालिका को इसकी जरूरत महसूस होती है या नहीं। पूरे देश में ऐसे नियम बनाए जाने चाहिए कि भीड़ की जगहों पर, लोगों की कतार की नौबत में किसी भी धार्मिक या आध्यात्मिक जगह पर, या कार्यक्रम में बारी से परे किसी को दर्शन न कराया जाए। अगर तीर्थस्थान या कार्यक्रम किसी को बहुत ही बड़ा मान रहे हों, तो फिर ईश्वर से बात करके ईश्वर को ही ले जाकर सर्किट हाऊस या होटल में इन तथाकथित वीआईपी के दर्शन करवा देने चाहिए, ताकि भगदड़ में आम लोग न मरें। हर प्रदेश में ऐसी जगहें, और ऐसे मेले या दूसरे कार्यक्रम अच्छी तरह जाने-पहचाने रहते हैं, और हर प्रदेश के हाईकोर्ट भी सरकार को नोटिस देकर ऐसे इंतजाम में भेदभाव के खिलाफ हलफनामा ले सकते हैं, लेकिन उसके लिए हाईकोर्ट जज का भी नास्तिक होना जरूरी होगा। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 जून 2025



 

ऐसे साहित्यकार को न धिक्कारने वाले, साहित्य के इतिहास में धिक्कार के हकदार

 29 जून 2025

फेसबुक पर एक लंबी बहस छिड़ी हुई है। पटना में किसी संस्था ने दो लेखकों को कुछ वक्त रहकर, राइटर इन रेसीडेंसी जैसे किसी नाम से लिखने का मौका दिया। कैसे इनको छांटा गया, यह भी एक अलग कहानी है। लेकिन जब इन्हें एक जगह रखा गया, तो पहले से तरह-तरह के विवादों में घिरे हुए, और घोषित तौर पर महिलाओं के प्रति भारी हिकारत की भावना रखने वाले हिन्दी के एक जाने-माने कवि, या किसी और किस्म के साहित्यकार ने शायद वहां रखी गईं दूसरी एक लेखिका के साथ बदसलूकी की, और उसके विरोध करने पर इस लेखक को वहां से बिदा कर दिया गया। अब फेसबुक हिन्दी के लेखक, कवि, या और किस्म के साहित्यकार, और पाठक-प्रकाशक तबकों की भीड़ के बीच बहस का मंच बन गया है कि महिला के प्रति बरसों से हिकारत की सार्वजनिक पोस्ट करने वाले इस लेखक को इस आयोजन के लिए छांटा कैसे गया, और अब आयोजकों ने लेखिका की शिकायत के बाद भी पुलिस या दूसरी कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की? 

अब यह लड़ाई लेखकों के अलग-अलग खेमों से ऊपर उठकर, या नीचे गिरकर औरत और मर्द के मुद्दों पर भी चली गई है, और हिन्दी के एक बड़े जाने-माने, और अच्छे समझे जाने वाले कवि ने इसमें जातियों को भी जोड़ दिया है। यह बहस बढ़ती चल रही है, जंगल की आग की तरह, और मुफ्त का फेसबुक एक बड़ा अखाड़ा मुहैया करा रहा है, हर उस्ताद के शागिर्दों के लिए। 

मैं व्यक्तिगत रूप से इनमें से किसी साहित्यकार के काम से जरा भी परिचित नहीं हूं। साहित्य से मेरा लेना-देना दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी, या फैज जैसे हाल-फिलहाल के लोगों से है, या फिर प्रेमचंद्र और मंटो जैसे पिछली पीढ़ी के लेखकों से है। और वैचारिक रूप से कबीरपंथी होने के नाते लेखन या साहित्य के पूरे इतिहास में मेरा सबसे अधिक लेना-देना कबीर से है। इसलिए मैं इस मुद्दे पर बिना किसी खेमेबाजी के, और बिना किसी पूर्वाग्रह के लिखने के लायक बचा हुआ हूं। 

आज जिस कवि या साहित्यकार को महिला से बदसलूकी के आरोप में घेरा गया है, उनके बारे में मैं सामान्य दिलचस्पी से ही बरसों से देखते आ रहा हूं कि वे कई लेखिकाओं को लेकर बदचलनी के आरोप सरीखे लगाते रहे हैं, और विवादों में घिरे रहे हैं। मैं एक इंसान के रूप में इसको सबसे घटिया बात मानता हूं कि जिस मां से पैदा हुए हैं, उसी मां के जेंडर को हिकारत से देखना, बेबुनियाद तरीके से बदनाम करना, और लोगों पर व्यक्तिगत लांछन लगाना, खासकर महिलाओं पर। फिर मुझे साहित्य की इस खूबी या खामी पर भी बड़ी हैरानी होती है कि इस किस्म की गंदी और घटिया बातें करने वाले लोगों को पाठक भी मिलते हैं, प्रकाशक भी, और उनकी मेजबानी करने के लिए साहित्य संस्थाएं भी। 

मैंने कहीं पर पढ़ा था कि हिटलर भी एक पेंटर था। और जब मुझे पता लगा तभी मैं इस बात को सोचता था कि क्या हिटलर की पेंटिंग का चित्रकला के पैमानों पर कोई मूल्यांकन हो सकता है, किया जाना चाहिए, या क्या मैं उसकी पेंटिंग सचमुच ही देखना चाहूंगा? तो मुझे लगता था कि हिटलर की जिंदगी के बाकी पहलुओं को देखते हुए उसकी पेंटिंग को देखा भी नहीं जा सकता। ठीक उसी तरह जिस तरह कि दुबई में दाऊद इब्राहिम की जन्मदिन की पार्टी में झूम-झूमकर नाचते और गाते हुए अन्नू मलिक को देखने के बाद उसे एक जज के रूप में किसी रियलिटी शो में देखना मेरे लिए नामुमकिन था। दाऊद के चारण और भाट को मुम्बई ब्लास्ट के बाद दाऊद की स्तुति गाते देखना, और फिर उसे टीवी के पर्दे पर देखना मेरे लिए तो मुमकिन नहीं था। अब हिन्दी के जिस लेखक-कवि के बारे में यह ताजा महिलाविरोधी विवाद सामने आया है, उसकी भी वकालत करने वाले लोग हो सकते हैं, इसमें मुझे अधिक हैरानी इसलिए नहीं होती कि मैंने दुनिया के सबसे घटिया लोगों, सबसे बुरे मुजरिमों के तरफदार भी देखे हुए हैं। लेकिन एक सीरियल महिलाविरोधी मुजरिम की वकालत पेशेवर वकील करें तो करें, कई जाने-माने ऐसे दिग्गज भी इसे बचाने में कूद पड़े हैं जिनके बारे में साहित्य के जानकार लोग बड़ा ऊंचा ख्याल रखते हैं। मैं किसी भी पक्ष-विपक्ष के पूर्वाग्रह से मुक्त हूं, इसलिए किसी की रचनाएं मुझे उसके चाल-चलन के बारे में राय बनाने को मजबूर नहीं करतीं। मेरा मानना है कि एक इंसान के रूप में जो घटिया है, उसके रचनात्मक काम के मूल्यांकन के चक्कर में भी मैं नहीं पड़ता। जिसमें इंसानियत की कमी है, जिसमें जीवन के बुनियादी मूल्यों की कमी है, जिसमें एक महिला के लिए सम्मान की कमी है, उसके काम को मैं भला सम्मान की कसौटी पर कैसे परख सकता हूं? 

मुझे उन नामी-गिरामी, और स्वघोषित सरोकारी लोगों की समझ पर तरस आ रहा है जो कि एक पेशेवर और आदतन महिलाविरोधी की फिक्र करते हुए उस पर रहम कर रहे हैं, महिला पर शक कर रहे हैं। कुछ इसी किस्म के लोग दिल्ली के बड़े-बड़े अखबारों में भी थे, और खासकर एक अखबार इंडियन एक्सप्रेस में एक बड़ी नामी-गिरामी कॉलमिस्ट थी जिसने पंजाब की एक महिला अधिकारी के खिलाफ लिखा था। किसी पार्टी में पिए-खाए केपीएस गिल ने जब वहां की एक आईएएस अधिकारी के नितंब पर च्यूंटी काट दी थी, और उसने इसकी शिकायत दर्ज कराई थी, तो इस महिला कॉलमिस्ट ने लिखा था कि पंजाब से आतंक के खात्मे में केपीएस गिल का योगदान देखते हुए इस महिला को यह बर्दाश्त कर लेना था, और यह शिकायत नहीं करनी थी। इस पैमाने से तो महानता के मामले में जो लोग आसमान पर हैं, उन्हें बीस-बीस बलात्कारों की छूट मिलनी चाहिए, और उनके 21वें बलात्कार पर ही उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज होनी चाहिए। 

यह पूरा सिलसिला इतना बदमजा और इतना घटिया है कि मुझे साहित्य के खेमों से दूर रहने की बड़ी राहत महसूस हो रही है। जो व्यक्ति दस-दस बरस से महिलाओं के खिलाफ घटिया और अश्लील, चरित्र हनन वाली बातें लिखते आ रहा था, वह व्यक्ति कुछ प्रगतिशील नाम के साहित्य संगठनों का भी बाप बना बैठा था। मैं नहीं जानता कि महिला के अपमान में प्रगतिशीलता की कोई भूमिका हो सकती है, लेकिन जब प्रगतिशीलों के संगठन ऐसी गंदगी को अपने माथे पर चंदन के तिलक की तरह सजाकर रखते थे, तो ऐसे संगठनों के लोगों को भी यह सोचना चाहिए कि इनके साथ जुड़े रहकर भी वे महिलाविरोधी तो हो ही रहे हैं। 

हिन्दुस्तान जैसे देश में महिला वैसे भी हजार किस्म की बेइंसाफी जिंदगी के हर दायरे में झेलती है, हर जगह उस पर हाथ डालने की कोशिश होती है, और जहां कहीं उस हाथ को झिटक दिया जाता है, वह हाथ पत्थर उठाकर महिला को बदचलन बताकर उसे चौराहे पर बांधकर पत्थर चलाने लगता है। इस विषय पर लिखना शुरू करने के पहले मुझे एक लाईन सूझ रही थी जिसे फेसबुक पर लिखते-लिखते मैं रह गया था, और यह कॉलम लिखना पहले शुरू कर दिया, - मर्द की सारी नैतिकता अमूमन किसी महिला पर झपटने का पहला मौका मिलते ही शीघ्रस्खलन का शिकार हो जाती है। 

जिस दोस्त से फोन पर बात करते हुए इस लाईन को मैंने कहा, उसने सुझाया था कि मैं यह लिख न दूं। लेकिन इसका कोई विकल्प मुझे नहीं सूझा, और अब मैं इसे फेसबुक पर अलग से लिखने के बजाय इस कॉलम में लिख रहा हूं। इस उम्मीद के साथ कि एक दिन ऐसा आएगा जब साहित्य में, खासकर हिन्दी साहित्य में मर्द को औरत से ऊपर नहीं माना जाएगा, मर्द के सामने समर्पण से मना करने वाली महिला को बदचलन नहीं माना जाएगा, और सचमुच के बदचलन और हिंसक मर्द को उसके साहित्य से परे भी एक इंसान के रूप में मूल्यांकन करके पहले देखा जाएगा, उसके साहित्य के मूल्यांकन को बाद में किया जाएगा। 

मैं साहित्य या किसी भी दूसरे किस्म की खेमेबंदी से परे अकेले चलने और लिखने वाला व्यक्ति हूं। मैं विचारधारा से भी मुक्त हो चुका हूं, पिछले कुछ महीनों में लगातार यह अहसास किया है कि विचारधारा एक धारा ही रहती है जिसमें बहना जरूरी रहता है, और वह बहना मुर्दों को अधिक माकूल बैठता है। मैं अपने खुद के लिए अब मूल्यों को सबसे ऊपर मानता हूं, और किसी भी तरह की विचारधारा को उसके नीचे, और अपने लिए बेकार। किसी की विचारधारा मुझे उसके साथ कोई रियायत करने, या उससे कोई बदला निकालने के लिए प्रेरित नहीं करती। मैं उससे ऊपर उठ चुका हूं। इसलिए मैं साहित्य के मवालियों के खिलाफ भी लिख सकता हूं क्योंकि मेरा उनके साहित्य से लेना-देना नहीं है, उनके हिंसक और महिलाविरोधी जुर्म से लेना-देना है। जो लोग ऐसे लोगों को धिक्कार नहीं सकते, वे सब इतिहास में धिक्कार के हकदार की तरह दर्ज होंगे, ऐसे मौके न सिर्फ साहित्य में बल्कि हर सार्वजनिक बहस में यह साबित करने के लिए जरूरी रहते हैं कि पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? 

दीवारों पर लिक्खा है, 29 जून 2025



 

...कंडोम में आपत्तिजनक क्या है हिन्दुस्तानी पुलिस?

29 जून 2025 

 

किसी चकलाघर, स्पा सेंटर, या किसी और जगह पर पुलिस का छापा पड़ता है, तो उसके प्रेसनोट में गिरफ्तारी वगैरह के बाकी जिक्र के साथ-साथ यह बात भी आती है कि वहां से कुछ आपत्तिजनक सामग्री बरामद हुई। यह आपत्तिजनक सामग्री आमतौर पर कंडोम रहती है जिसे जब्त करके पुलिस यह साबित करने की कोशिश करती है कि वहां पर कोई वयस्क गतिविधि चल रही थी। लेकिन ऐसे प्रेसनोट का जो बड़ा नुकसान होता है, वह यह है कि पहले से अतिसंवेदनशील चल रहे भारतीय समाज में कंडोम को आपत्तिजनक मान लिया जाता है। हो सकता है कि अदालत में यह पुलिस को एक सुबूत की तरह कोई बात साबित करने में काम आए, लेकिन एक मासूम से सामान को इस तरह बदनाम करके पुलिस लोगों के बीच बचाव के इस साधन को आपत्तिजनक करार देती है। 

अब कल्पना करके देखें कि अगर ऐसे किसी छापे में कंडोम जब्त न हों, तो क्या उससे समाज का, अपना बदन या अपनी सेवा बेचने वाली महिला का, या उसे खरीदने वाले पुरूष का कुछ भला हो जाएगा? विज्ञान और टेक्नॉलॉजी ने अवांछित गर्भ को रोकने के लिए, और तरह-तरह की सेक्स बीमारियों को रोकने के लिए यह आसान सा सामान बनाया है। सैकड़ों बरस पहले भी जब रबर से बने कंडोम का जमाना नहीं आया था, तब भी कुछ जानवरों की अंतडिय़ों से बना हुआ कंडोम अभी-अभी एक नीलामी में सामने रखा गया है। एक वक्त ऐसा था जब सेक्स से फैलने वाली बीमारियों का इलाज भी नहीं था, और उनसे बचाव ही सबसे बड़ी हिफाजत थी। उस वक्त से लेकर अब तक गर्भ और बीमारी इन दोनों को रोकने के लिए इससे आसान कोई जरिया नहीं है। और ब्रिटेन जैसा विकसित देश अपनी स्कूल की बड़ी कक्षाओं के बच्चों के लिए स्कूलों में ही कंडोम उपलब्ध कराता है क्योंकि वह इन बच्चों के स्कूली जीवन में ही मां-बाप बनने को रोकना चाहता है। और अगर वहां पर बच्चों के बीच किशोरावस्था में सेक्स हो रहा है, जिसे रोक पाना संभव नहीं है, तो फिर उसे सुरक्षित बनाना ही समझदारी की बात है। कोई भी समझदार समाज ऐसी समझदारी की बात करता है, न कि हिन्दुस्तानी पुलिस की तरह कंडोम को आपत्तिजनक करार देता है। 

अभी चार दिन पहले छत्तीसगढ़ में एक धर्मस्थल के पास की पहाड़ी में एक बाबा का आश्रम पकड़ाया, और करोड़पति बाबा गांजा बेचते मिला। यह भी पता लगा कि उसके गोवा में गुजारे बरसों के दौरान उसके जो विदेशी संपर्क थे, वहां के लोग अभी भी बाबा के आश्रम में योग, या नशा, या शायद दोनों करने के लिए आते रहते थे, और आश्रम में कई तरह के सेक्स टॉयज भी मिले। अब पुलिस और समाचारों में इनको आपत्तिजनक सामान करार दिया जा रहा है। पुलिस तो आमतौर पर अदालती जरूरतों को समझते हुए इस तरह के पिटे हुए ढर्रे का काम करती रहती है, लेकिन पुलिस प्रेसनोट देखकर मीडिया भी उसे ज्यों का त्यों आपत्तिजनक लिखने लगती है। हमारे हिसाब से कंडोम का इस्तेमाल, उसे रखना आपत्तिजनक नहीं है, उसे आपत्तिजनक लिखना आपत्तिजनक है। क्या बिना कंडोम सेक्स-संबंध समाज के हित में हैं? क्या विज्ञान ऐसा सुझाता है, क्या दुनिया के कोई भी डॉक्टर ऐसा सुझा सकते हैं? तो फिर नैतिकता के पाखंड की वजह से कंडोम से परहेज कहां की समझदारी है? इसके साथ-साथ दूसरा सवाल यह भी उठता है कि लोगों के अपने देह सुख के लिए बनाए गए सेक्स-खिलौनों में कौन सी बात आपत्तिजनक है? भारत में सैकड़ों बरस पहले के बने हुए हाथीदांत के सेक्स-खिलौनों का इतिहास अच्छी तरह दर्ज है, और बाकी दुनिया में भी लोगों ने अपने-अपने तरीके से सुख पाने के रास्ते निकाले हुए हैं। दरअसल भारत में नैतिकता के नाम पर पाखंड इतना अधिक है कि किसी भी किस्म के सेक्स-सुख के खिलाफ बड़े-बड़े प्रवचनकर्ता इसे वासना करार देते हुए इसे एक जुर्म बताने लगते हैं, और इसे लेकर लोगों के बीच आत्मग्लानि भर देते हैं। जीवन में जो कुछ सुख दे सकते हैं, उन सबके खिलाफ धर्म, और समाज की तथाकथित नैतिकता कोई न कोई तर्क ढूंढ लेते हैं। लोगों को अपराधबोध से भर देते हैं। दूसरी तरफ धर्म के बताए हुए पाखंड को मानने वाले लोगों को मरने के बाद स्वर्ग या जन्नत में इन्हीं सब चीजों का वायदा भी करते हैं। अरे, जो धरती पर पाप है, वह स्वर्ग में जाकर उपहार बन जाएंगे? 

धर्म की एक बहुत बड़ी भूमिका लोगों को अपनी जिंदगी में अपने आपको पापी महसूस कराने की रहती है। अगर लोग अपने आपको पापी नहीं मानेंगे, तो पापमुक्त होने के लिए वे क्यों किसी नदी में डुबकी लगाने जाएंगे, क्यों वे किसी पंडित या ब्राम्हण को दान देंगे, क्यों मंदिर या मस्जिद बनाएंगे? लोगों के मन को पाप और अपराधबोध से भरकर ही धर्म का कारोबार चलता है, और धार्मिक पैमाने धीरे-धीरे सामाजिकता के नैतिक पैमानों पर हावी होते हुए इतने आगे बढ़ जाते हैं कि जिस तरह धर्म लोगों को काम वासना से दूर रहने की नसीहत देता है, उसी तरह पुलिस लोगों को सेक्स के दौरान भी कंडोम से दूर रहने की एक अघोषित नसीहत देती है। यह सिलसिला जानलेवा और खतरनाक है। जिस तरह पुलिस की बात लोगों को एड्स जैसी खतरनाक बीमारी दे सकती है, अवांछित गर्भ दे सकती है, उसी तरह धर्म लोगों को कई किस्म के अवांछित अपराधबोध देता ही है। इतिहास को जरा सा खंगालेंगे, तो यह तुरंत ही दिख जाएगा कि किस तरह वेटिकन और उसके मातहत लाखों चर्च हमेशा से कंडोम के खिलाफ रहे। यह तो आखिर में जाकर उन्हें समझ आया कि अफ्रीकी देशों में अगर कंडोम का इस्तेमाल नहीं बढ़ा, तो चर्च में सिर्फ उल्लू और चमगादड़ बचेंगे, तब जाकर चर्च ने वहां पर कंडोम का विरोध बंद किया। दरअसल धर्म सेक्स को सिर्फ अगली पीढ़ी लाने का सामान मानता है। और जब अगली पीढ़ी की गिनती पर्याप्त हो गई, तो वह पति-पत्नी के बीच भी सेक्स को नीची नजरों से देखने लगता है, और पति-पत्नी आपस के इस सबसे स्वाभाविक काम को भी पाप मानकर शर्म और अपराधबोध में डूब जाते हैं। पुलिस के प्रेसनोट कंडोम के रास्ते सेक्स को एक पाप साबित करने के जाने-अनजाने अभियान में लगे रहते हैं, लेकिन शायद अखबार वालों को एक सनसनीखेज शब्द से ऊपर उठकर इस छोटे से सामान के सामाजिक योगदान को समझना चाहिए, और इसे आपत्तिजनक लिखना बंद करना चाहिए।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 28 जून 2025


(Daily Chhattisgarh)

 

कोलकाता में छात्रा से फिर गैंगरेप, और बाकी देश में?

28 जून 2025 

 

ममता बैनर्जी की बंगाल की राजधानी कोलकाता में कल एक लॉ कॉलेज में तृणमूल कांग्रेस से जुड़े हुए कुछ छात्र-नौजवानों ने वहां की एक छात्रा के साथ कॉलेज में ही गैंगरेप किया, और उसका वीडियो बनाकर उसे चुप रहने की धमकी भी दी। पुलिस ने इनमें से तीन छात्रों को गिरफ्तार किया है, जो अलग-अलग स्तर पर तृणमूल कांग्रेस छात्र परिषद से जुड़े हुए थे। इसे लेकर बंगाल में प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा ने मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी को घेरा है, और यह मुद्दा बनाया है कि बंगाल में लड़कियां और महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। जो तीन नौजवान कल गिरफ्तार किए गए हैं, उनमें से दो, प्रमित मुखर्जी, और जे.अहमद इसी कॉलेज में पढ़ते हैं, और तीसरा अभियुक्त मनोजित मिश्र यहां का भूतपूर्व छात्र है। इन्होंने छात्रा को कॉलेज छात्रसंघ का अध्यक्ष बनाने की बात कहकर बुलाया था, और वहां गार्डरूम में उसके साथ तीनों ने बलात्कार किया। अब तृणमूल कांग्रेस यह कहकर हाथ झाड़ रही है कि अभियुक्त सालों पहले उसके छोटे-मोटे पद पर थे, और उन्हें कोई बड़ा पद नहीं दिया गया था। इसके जवाब में विपक्ष इन अभियुक्तों की तृणमूल नेताओं के साथ तस्वीरें सामने रख रहा है।

देश भर में बलात्कार राजनीतिक दलों को तभी दिखता है जब वह किसी विपक्षी पार्टी के राज में होता है। अपनी पार्टी के राज का बलात्कार पारदर्शी रहता है। अभी पिछले हफ्ते अमरीकी सरकार की अपने नागरिकों के लिए यह चेतावनी सामने आई कि महिलाओं को भारत में अकेले नहीं घूमना चाहिए, क्योंकि यहां बलात्कार और यौन अपराध बहुत होते हैं, और अकेली महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। इस पर कांग्रेस ने कई जगह इसे मुद्दा बनाया, लेकिन खुद कांग्रेस का राज रहते हुए कई प्रदेशों में बलात्कार की घटनाएं बहुत ज्यादा होती रहीं। हमने भारत में आबादी के अनुपात में अलग-अलग प्रदेशों में बलात्कार के आंकड़े देखे, तो वे कुछ विश्वसनीय नहीं लग रहे। भारत सरकार के नेशनल क्राईम रिकॉर्ड ब्यूरो में वही आंकड़े जाते हैं, जो राज्य सरकार में पुलिस रिपोर्ट मेें दर्ज होते हैं। इनमें बड़े राज्यों में राजस्थान सबसे आगे है जहां प्रति एक लाख महिला आबादी पर 13.8 मामले दर्ज हो रहे हैं। इसके तुरंत बाद हरियाणा और दिल्ली का नंबर है। लेकिन देश की राष्ट्रीय प्रति लाख आबादी औसत बलात्कार दर 4.7 है, लेकिन जो पांच राज्य सबसे ऊपर हैं, उत्तराखंड, चंडीगढ़, राजस्थान, हरियाणा, और दिल्ली, इनमें राष्ट्रीय औसत से तीन गुना अधिक तक बलात्कार दर्ज हो रहे हैं। ऐसे में बंगाल में यह संख्या राष्ट्रीय औसत के आधे से भी कम है, 2.3 जो कि इस बात से भी प्रभावित हो सकती है कि कुछ राज्यों में पुलिस को जुबानी हुक्म रहते हैं कि वे बलात्कार की शिकार महिलाओं का रिपोर्ट दर्ज कराने का हौसला न बढ़ाएं। उत्तरप्रदेश में भी बलात्कार राष्ट्रीय औसत से बहुत कम 3.27 प्रति लाख महिला आबादी दर्ज हुए हैं। भाजपा के ही शासन वाले राजस्थान में यह आंकड़ा 13.84 प्रति लाख महिला है, और यूपी में 3.27, यह कुछ हैरान करता है कि अगल-बगल के दोनों हिन्दीभाषी प्रदेशों में इतना फर्क कैसे हो सकता है, सिवाय इसके कि इन जगहों पर पुलिस की रिपोर्ट लिखने में उदासीनता में फर्क हो।

लेकिन इन आंकड़ों से परे एक और चीज को देखने की जरूरत है कि देश में बलात्कार के दर्ज मामलों में कुल एक चौथाई लोगों को ही सजा हो पाती है। बाकी लोगों के मामले या तो झूठे रहते हैं, या जांच और सुबूत जुटाने में पुलिस कमजोरी करती है, या फिर दोनों पक्षों में कोई समझौता हो जाता है, या जांच और सुनवाई में जिस भ्रष्टाचार की आम चर्चा रहती है, उसके चलते भी लोग छूट जाते हैं। हम आए दिन खबरें देखते हैं कि बलात्कार के किसी आरोपी को जब जेल भेजा जाता है, तो उसका परिवार या उसका गिरोह शिकायतकर्ता के परिवार का जीना हराम कर देते हैं। ऐसे में बहुत सारे मामलों में लडक़ी या महिला शिकायत वापिस ले लेते हैं। दूसरी तरफ जमानत पर छूटकर आते ही आरोपी बहुत से मामलों में शिकायतकर्ता पर फिर हमला करते हैं, कहीं चाकू भोंकते हैं, कहीं तेजाब फेंकते हैं, और कहीं मार डालते हैं। इसलिए भारत में लडक़ी या महिला बलात्कार की रिपोर्ट लिखाते हुए यह भी ध्यान में रखती हैं कि उसके बाद वे कितनी सुरक्षित रह सकेंगी, या उन पर कितना खतरा बढ़ जाएगा। इस हिसाब से हमें एक पल को बंगाल और यूपी ेमें आंकड़े एकदम कम होने की एक वजह समझ में आती है कि वहां शिकायतकर्ता को अपनी हिफाजत खतरे में लगती है, इसलिए वे रिपोर्ट लिखाती नहीं हैं। बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी पहले भी बलात्कार की शिकार नाबालिग लडक़ी और महिला को राजनीतिक साजिश का हिस्सा बता चुकी हैं, और उत्तरप्रदेश में कई किस्म की अराजकता के राज एक-दूसरे के समानांतर चलते हैं, वहां जाति के असर से, या राजनीतिक ताकत से, पुलिस की मनमानी से, कई मुजरिम फंसते हैं, कई बचते हैं। इसलिए भी हो सकता है कि यूपी में शिकायत कम दर्ज होती हो।

ऐसा लगता है कि भारत में बलात्कारी, और बलात्कार की शिकार की सामाजिक पृष्ठभूमि को लेकर एक विस्तृत विश्लेषण होना चाहिए कि आर्थिक स्थिति, धर्म या जाति, ग्रामीण या शहरी पृष्ठभूमि, इन सबमें कौन-कौन से पहलू बलात्कार के पीछे रहते हैं। पुलिस के आम आंकड़ों से परे ऐसा व्यापक अध्ययन जरूरी है ताकि आर्थिक और सामाजिक पहलुओं का समाधान निकाला जा सके। बलात्कार होने के बाद बलात्कारी को सजा दिलवाने से शिकार लडक़ी या महिला की जिंदगी बहुत बेहतर नहीं हो जाती, बल्कि उस पर हमेशा के लिए एक जख्म लगता है। अमरीकी सरकार की अपने नागरिकों को दी गई चेतावनी का बुरा मानने की जरूरत किसी को नहीं है। भारत में सचमुच ही लड़कियां और महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। अभी सोशल मीडिया पर हिन्दी साहित्य का संसार एक बड़ी अप्रिय बहस से भरा हुआ है कि पटना में एक किसी आयोजन में किस तरह एक नामी-गिरामी लेखक ने एक नौजवान लेखिका के कमरे में जाकर उससे यौन-बदसलूकी की। जो लोग लगातार खबरों और चर्चाओं में रहते हैं, वे भी शोषण का मौका नहीं छोड़ते। भारत में जो पुरूषप्रधान सोच लडक़ों को बचपन से ही विरासत में मिलती है, उसका असर उनके मरणासन्न होने तक भी कायम रहता है, अगर अस्पताल में उनकी आखिरी धडक़न के वक्त आसपास कोई नर्स हो। भारत में महिला असुरक्षित है, यह बताकर अमरीका ने कोई परमाणु रहस्य नहीं बता दिया है, यह बात सूरज के पूरब से निकलने सरीखी हर किसी को मालूम बात है। इस पर आत्ममंथन और आत्मचिंतन की जरूरत है, नेताओं के एक-दूसरे पर बरसने की नहीं।

(Daily Chhattisgarh)

हाथियों के पैरोंतले कुचलने से बचने पर ले लें सबक...

27 जून 2025 

 

गुजरात के अहमदाबाद में रथयात्रा बड़ी विख्यात रहती है। आज इस वक्त दोपहर 12 बजे वहां रथयात्रा निकल रही है, और सडक़ों पर एक भगदड़ भी मची हुई है। यात्रा की झांकियों में शामिल कई हाथी बेकाबू हो गए हैं, और सडक़ों पर मनमानी भाग रहे हैं। साधुओं सरीखे कपड़ों में उनके महावत दौड़-दौडक़र उनको काबू में करने की कोशिश कर रहे हैं। ये वीडियो देखना भी डरावना लग रहा है क्योंकि सडक़ें लोगों से पटी हुई हैं, और उससे भी अधिक यह कि चारों तरफ बहुत तेज आवाज में लाउडस्पीकर बज रहे हैं जो कि भारत में हर धार्मिक त्यौहार का आम हाल है। अब अगर इन हाथियों के विचलित हो जाने के पीछे यह शोरगुल जिम्मेदार होगा, तो हमें जरा भी हैरानी नहीं होगी। जो आवाज अंधभक्तों को छोडक़र बाकी किसी को भी बर्दाश्त नहीं हो सकती, उस दर्जे के शोरगुल से हाथी जैसे बड़े कानों वाले प्राणी विचलित होना, आपा खोना, और उस जगह से भाग निकलने की कोशिश करना बड़ा स्वाभाविक लगता है। अब हाथियों को लेकर सरकार के जो भी नियम हों, उनमें अगर नहीं भी है, तो भी इस बात को जोड़ा जाना चाहिए कि हाथी, ऊंट, घोड़े जैसे जानवरों को किसी भी शोभायात्रा में, या लाउडस्पीकरों वाली जगह पर न ले जाया जाए। अगर वे आपा खोकर हिंसक नहीं भी होते हैं, तो भी वे किस बुरी हद तक प्रताडि़त होते हैं, इसे वे ही समझ सकते हैं। इंसान तो फिर भी कानों में रूई लगा सकते हैं, कान बंद कर सकते हैं, या अपनी अंधभक्ति की वजह से उस शोरगुल का मजा भी ले सकते हैं, लेकिन जानवरों की तो ऐसी कोई अंधभक्ति होती भी नहीं है। इस मुद्दे पर लिखना इसलिए भी जरूरी लग रहा है कि यह तो सालाना एक बार की रथयात्रा है, लेकिन हम अपने ही शहर में तरह-तरह के राजनीतिक, धार्मिक, और सामाजिक जुलूस ऐसे देखते हैं जिनमें डीजे के भयानक शोरगुल के बीच इन जानवरों को सजाकर, इनके ऊपर संपन्न तबके के लोगों को, उनके बच्चों को बिठाकर शोभायात्रा निकाली जाती है, और इसे शान-शौकत की बात माना जाता है कि किस जुलूस में हाथी-घोड़ा-पालकी, कितने थे। 

छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट राज्य के प्रमुख चौकीदार की तरह लाठी लेकर राज्य सरकार के पीछे लगा हुआ है कि डीजे का शोरगुल बंद कैसे होगा। अब तक सरकार को जारी नोटिसों की शायद सेंचुरी ही पूरी हो चुकी होगी। इस राज्य में डीजे के शोरगुल की वजह से मौतें भी हो चुकी हैं, और कत्ल भी हो चुके हैं। लेकिन जुर्म, और अस्पताल के आंकड़ों से परे शोरगुल से लोग जितना प्रताडि़त होते हैं, उसके कोई आंकड़े नहीं होते। शोरगुल को लेकर देश के तकरीबन हर हाईकोर्ट ने कई बार आदेश दिए हैं, सुप्रीम कोर्ट के कई आदेश हैं, लेकिन सरकारें इसलिए अमल नहीं करती हैं कि शोरगुल करने वाले किसी धर्म, जाति, राजनीतिक दल, या किसी संगठन के संगठित लोग रहते हैं, और जहां कुछ हजार लोगों की संगठित भीड़ हो, वहां पर सत्ता को ठंड में भी पसीना आने लगता है। सरकार किसी भी भीड़ को नाराज करना नहीं चाहती, नतीजा यह होता है कि भीड़ चाहे रेल के डिब्बे में बारात की हो, स्टेशन पर किसी सुरक्षा एजेंसी की हो, सडक़ों पर धर्म, या जाति की हो, वह एक अराजक और हिंसक हमलावर टोली की तरह कानून तोड़ती है, और पुलिस उन्हें ही हिफाजत देते हुए साथ-साथ चलती है। छत्तीसगढ़ में यह देखना बड़ा हैरान करता है कि हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अपनी ही दर्जनों नोटिसों के बाद थककर और निराश होकर यह कहते हैं कि अफसर उसके हुक्म, और कानून मानना ही नहीं चाहते, और हाईकोर्ट की इस बात में जरा भी ज्यादती नहीं है, बस जजों की बेबसी है। कभी-कभी तो हमें लगता है कि अगर जज सरकार को कटघरे में खड़ा करके कहें कि उनसे गलती हो गई थी जो कि सरकार को नोटिस जारी किया था, और अब उन्हें अपनी सीमित, और सरकार की असीमित ताकत का अंदाज हो गया है, और सरकार से वे माफी चाहते हैं, उन्हें राज्य जैसा चलाना हो, चलाए। 

अहमदाबाद की इस घटना से और कोई सबक ले या न ले, अदालतों की बात कोई सुनते हों, या न सुनते हों, सुप्रीम कोर्ट को इस घटना का नोटिस लेना चाहिए, और गुजरात सहित देश की हर सरकार से जवाब मांगना चाहिए कि बेबस जानवरों की शोरगुल और भीड़ के बीच ऐसी प्रताडऩा की इजाजत वे कैसे देती हैं, और इसे रोकने के लिए उनकी क्या योजना है। हमारा यह भी मानना है कि सुप्रीम कोर्ट को जनहित के ऐसे अलग-अलग कई मामलों में भरोसेमंद और साख वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों, या कुछ रिटायर्ड अफसरों को अपना जांच कमिश्नर बनाना चाहिए जो कि अदालत की तरफ से देश भर में ऐसे मामलों पर नजर रख सकें, और अदालत को समय-समय पर इन मुद्दों पर देश के हालात बता सकें। अदालतें कई मामलों में ऐसा करती हैं, कहीं वे जांच कमिश्नर बनाती हैं, कहीं वे किसी जटिल अदालती मामले को समझने के लिए अपनी मदद के लिए किसी निष्पक्ष वकील को न्यायमित्र नियुक्त करती हैं। हमने छत्तीसगढ़ के संदर्भ में इस बात को पहले भी लिखा था कि हाईकोर्ट को प्रदेश स्तर पर एक जांच कमिश्नर बनाकर, हर जिले में कुछ पर्यवेक्षक रखकर ऐसे सामाजिक लोगों से रिपोर्ट मंगानी चाहिए, और उस पर फिर राज्य सरकार और जिला प्रशासन से जवाब मांगना चाहिए। 

अपनी शान-शौकत दिखाने के लिए समाज के तबके जब बेजुबान पशुओं का ऐसा हिंसक इस्तेमाल करते हैं, तो वह शान-शौकत असभ्य होती है, हिंसक तो होती ही है। किसी भी जनकल्याणकारी राज्य में सरकार और अदालत दोनों की ही यह जिम्मेदारी होती है कि ऐसी असभ्यता को रोके। सबसे पहले तो सरकार को ही यह जिम्मा निभाना था, लेकिन भारत का तजुर्बा यह है कि जनकल्याण के शायद ही कोई काम जनहित याचिका के बिना होते हों। जिन अदालतों का काम विवाद निपटाना रहना चाहिए, उन अदालतों को सरकार को उसका काम सिखाने में ही आधा वक्त गंवाना पड़ता है। यह सिलसिला लोकतंत्र की बुनियादी व्यवस्था को ही चौपट कर रहा है, जब अदालत को सुपर-शासन-प्रशासन की तरह काम करना पड़ता है। जिन मामलों में संसद और विधानसभाओं को काम करना चाहिए, उन पर भी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट अपना वक्त जाया करने को मजबूर होते हैं। लोकतंत्र में इन तीनों संस्थाओं के अलग-अलग काम तय हैं, लेकिन जब इन तीनों में से कोई एक अपनी जिम्मेदारी पूरी न करे, तो फिर बाकी दो को दखल देनी होती है। यह नौबत बहुत खराब है। फिलहाल तो गुजरात और दूसरे प्रदेशों की सरकारों को अहमदाबाद की आज की इस घटना से सबक लेना चाहिए जिसमें दर्जनों लोगों की जानें भी जा सकती थीं, और ये जिंदगियां सरकारी इंतजाम से नहीं बची हैं, सरकारी बदइंतजामी के बावजूद बची हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 जून 2025



 

वक्त बड़ा नाजुक है, ऐसे में तनाव बढ़ाने से बचना जरूरी

26 जून 2025 

 

कल एक जगह एक महिला घर पर नहा रही थी कि उसे अहसास हुआ कि बाथरूम के रौशनदान से कोई उसकी फोटो ले रहा है। फ्लैश की चमक देखकर उसने आवाज लगाई, तो पति और बेटों ने जाकर पकड़ा, तो पता लगा कि पास का एक व्यक्ति जो कि जमानत पर जेल से छूटकर आया था, वही यह काम कर रहा था, और पकड़े जाने पर उसने अपने भाईयों के साथ इस परिवार के लोगों को पीटा भी। बाद में मामला बढऩे पर उसे गिरफ्तार किया गया। दिक्कत की एक बात यह भी थी कि महिला का परिवार हिन्दू था, और फोटो खींचने वाला मुस्लिम था। यह अकेला मामला नहीं है, देश में जगह-जगह कई ऐसे दूसरे मामले भी हो रहे हैं, जिनमें हिन्दू लड़कियों या महिलाओं से मुस्लिम लडक़े या मर्द किसी तरह का गलत काम कर रहे हैं, और वे कहीं भोपाल में सुबूतों सहित पकड़ा रहे हैं, या छत्तीसगढ़ में कोई शादीशुदा अधेड़ मुस्लिम किसी कमउम्र हिन्दू लडक़ी से शादी कर रहा है, और उसे लेकर सामाजिक तनाव हो रहा है।

हिन्दू-मुस्लिम तनाव के देश के इस माहौल में कुछ लोगों को यह लिखना अटपटा लग सकता है कि हम आग में घी या पेट्रोल झोंक रहे हैं। लेकिन हमारा मानना है कि जिंदगी के असल मुद्दों को अनदेखा करने, या उन्हें कालीन के नीचे छुपा देने से, लपेटकर ताक पर धर देने से वे सुलझ नहीं जाते। भारत में हिन्दू-मुस्लिम तनाव चाहे कितना ही नाजायज क्यों न हो, वह एक हकीकत है। ऐसे में दोनों समुदायों के लोगों को इस बात के लिए तो सावधान रहना ही पड़ेगा कि अगर दूसरे समुदाय से कोई शिकायत आती है, तो क्या होगा? कानून तो बाद में अपना काम करेगा, भीड़ तब तक अपना काम कर चुकी रहेगी। इससे परे भी एक दूसरी चीज हमको लगती है कि प्रेमसंबंध हों या देहसंबंध, इन सबमें लोगों को इस सामाजिक हकीकत को याद रखना चाहिए कि ऐसी एक शादी किसी शहर में दंगा करवाने के लिए काफी हो सकती है। हो सकता है कि किसी हिन्दू को मुस्लिम से, या मुस्लिम को हिन्दू से मोहब्बत हो जाए, लेकिन उनका एक होना आज बहुत बड़े सामाजिक तनाव के साथ ही मुमकिन होगा। यह तनाव किस हद तक बढ़ेगा, इसका भी ठिकाना नहीं है, यह देश जगह-जगह भीड़त्या भी देखते आया है।

दूसरी बात यह कि आज जब इस देश में वैसे भी मुस्लिमों के आर्थिक बहिष्कार के फतवे चलते ही रहते हैं, तब यह भी देखने की जरूरत है कि एक हिन्दू-मुस्लिम तनाव ऐसे फतवों को और बढ़ावा देने की क्षमता रखता है। फिर यह भी है कि देश में कहीं लोग मुस्लिमों के लाए हुए खाने को लेने से इंकार कर रहे हैं, कहीं टैक्सी का मैसेज बताता है कि ड्राइवर मुस्लिम है, तो लोग बुकिंग कैंसल कर देते हैं, मुंबई जैसे महानगर में भी किसी मुस्लिम को किसी हिन्दू बहुल इमारत में फ्लैट किराए पर, या खरीदने के लिए नहीं मिलता। जब देश में एक अघोषित और घोषित सामाजिक बहिष्कार बड़े पैमाने पर चल रहा है, तो ऐसे में कम से कम मुस्लिमों को यह ध्यान रखने की जरूरत है कि किसी हिन्दू लडक़ी से उनकी मोहब्बत, या शादी, किस तरह उनके पूरे परिवार, उनके पूरे पेशे, और उनके पूरे समुदाय के लिए बहिष्कार का फतवा ला सकती है। हम न तो हिन्दू-मुस्लिम मोहब्बत के खिलाफ हैं, न ही हिन्दू-मुस्लिम शादी के, लेकिन आज देश में जो तनाव है उसे देखते हुए ही लोगों को ऐसी मोहब्बत या शादी में पडऩा चाहिए। कानून में तो बहुत सारी चीजों की इजाजत रहती हैं, लेकिन देश की सरकारें ऐसी हर हिफाजत को लागू नहीं कर पातीं, और कई बार तो कई सरकारें ऐसा लागू करना चाहती भी नहीं हैं। देश में कई प्रदेशों में सरकारें ही साम्प्रदायिकता को बढ़ा रही हैं, और देश का कानून भी उन सरकारों का कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा। सुप्रीम कोर्ट तक हेट-स्पीच के मामले में पूरे देश की सरकारों को नोटिस देकर चुप बैठ गया है। देश भर में हेट-स्पीच का सैलाब चलते ही रहता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के साफ-साफ नोटिस के बावजूद स्थानीय सरकारें, और उनकी मातहत पुलिस कोई जुर्म दर्ज नहीं करतीं। देश में जब माहौल ऐसा है, तो हिन्दू-मुस्लिम के बीच का रिश्ता बहुत सारे खतरे लेकर आता है, और ऐसी एक शादी भी अनगिनत मुस्लिमों की नौकरी की संभावनाएं छीन लेती है, क्योंकि इसके बाद लोग अपने घर-दफ्तर, या कारोबार की किसी और जगह पर किसी मुस्लिम को काम पर रखने से कतराते हैं। हम हिन्दू-मुस्लिम अलगाव की वकालत नहीं कर रहे हैं, लेकिन आज के माहौल में इनका किसी भी तरह का मिलन दोनों समुदायों के बीच की खाई को और गहरा, और चौड़ा करते चल रहा है।

भारत में दस-बीस बरस पहले तक हिन्दू-मुस्लिम रिश्ते थोड़े-बहुत मंजूर भी हो जाते थे, लेकिन अब वे किसी दंगे के लायक काफी सामान बन चुके हैं। जब तक हवा से जहर कम नहीं होता, जब तक समुदायों का एक-दूसरे पर भरोसा नहीं बैठता, तब तक लोगों को अपनी हसरतों और हरकतों दोनों पर काबू रखना चाहिए। एक मुस्लिम जिम-कोच किसी हिन्दू लडक़ी या महिला से रिश्ता बनाकर, बाकी मुस्लिम नौजवानों के लिए रोजगार की संभावना खत्म कर सकता है। एक समुदाय के रूप में भी आज इस देश में मुस्लिमों को सावधान रहने की जरूरत है। हम इसे बहुत खराब नौबत मानते हैं, देश के संविधान की भावना के खिलाफ भी मानते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि यह सावधान रहने का वक्त है, कोई ऐसी वजह खड़ी नहीं करनी चाहिए जो कि एक दंगा भडक़ा सके। देश का कानून, देश की सरकारें आज की इस हकीकत को न बदल सकते, और न ही शायद बदलना चाहते हैं। इसलिए लोगों को फिलहाल अपने दायरे में सीमित रहना चाहिए, और तनाव को और अधिक बढऩे नहीं देना चाहिए। लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि ऐसे माहौल में अल्पसंख्यक समुदाय को किसी भी किस्म के जुर्म से, किसी भी किस्म की गुंडागर्दी से बचकर रखने की जरूरत भी है, क्योंकि इसे उनके खिलाफ तुरंत ही इस्तेमाल किया जा सकता है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 जून 2025



 

दीवारों पर लिक्खा है, 25 जून 2025



 

प्रेम और विवाह संबंधों की हिंसा है तो डरावनी, पर घटाने के तरीके भी हैं

25 जून 2025 

 

कुछ लोग अखबारों की खबरों से घबराने लगे हैं कि रात-दिन पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका, इन सबकी हिंसक खबरों को पढक़र, या टीवी पर देखकर लोगों का प्रेम और परिवार के रिश्तों पर से भरोसा उठते जा रहा है। अब तो हिंसा की खबरों से परे उन पर आधारित हँसी-मजाक के ऐसे वीडियो बनने लगे हैं जो कि प्रेम, शादी, और हनीमून में मरने-मारने के तौर-तरीकों का मजाकिया जिक्र करते हैं, और कहीं कोई नीला ड्रम गिनाते हैं, तो कहीं हनीमून पर उत्तर-पूर्व जाने की बात करते हैं। हम इस मामले पर पहले भी लिख चुके हैं, लेकिन इस पर और लिखने की जरूरत इसलिए है कि ऐसी पारिवारिक, सामाजिक, और प्रेमसंबंधों की हिंसा पर फिक्र जरूरी है। अगर ऐसी हिंसा को कम करना है, तो फिर इसकी जड़़ों तक पहुंचना होगा। वैसे तो प्रेम और विवाह, इन दोनों ही किस्म के संबंधों में पुरूष की हिंसा हमेशा से सिर चढक़र बोलती रही है, और लहू तो महिला का ही बिखरते रहा है, हमने इसी जगह पर दो-चार दिन पहले ही पिछले पांच बरस के आंकड़े गिनाए थे कि किस तरह आज भी पत्नी की करवाई गई पति-हत्या साल भर में अधिकतम 271 हुई है, और पत्नी की हत्या कम से कम 6000 तो हुई ही है, और अधिकतम तो 6700 है। इस मुद्दे पर आज फिर से लिखने की जरूरत इसलिए लग रही है कि इस एक बड़ी सामाजिक समस्या, और खतरे के बहुत से पहलू हैं जिन पर एक बार में लिखना नहीं हो पाता, और आज हम उसी के कुछ दूसरे पहलुओं पर लिखना चाहते हैं। 

आज जब लड़कियां कॉलेज तक पढ़ रही हैं, कई किस्म के काम में लग रही हैं, शहरीकरण की वजह से शहरों में जाकर, वहां की आधुनिक जिंदगी में जीकर कामकाजी हो जाती हैं, तो फिर वे भी अपने आपको परंपरागत लडक़ी या महिला से अलग, एक इंसान समझने लगती हैं। उनके भीतर की भावनात्मक और मानवीय बातें उन्हें महत्वाकांक्षी बनाती हैं। एक-दूसरे से मेलजोल की वजह से लोगों में प्रेमसंबंध भी होते हैं, और आखिर में जाकर जब मां-बाप को पता लगता है कि बेटी अपनी मर्जी से शादी करना चाहती है, तो उनके भीतर का शहंशाह अकबर तलवार लेकर उठ खड़ा होता है, और बेटी की पसंद को दीवार में चुनवाने की कोशिश करने लगता है। दूसरा धर्म, दूसरी जाति न भी हो, तो भी कई मां-बाप अपनी लडक़ी की पसंद को सिर्फ इसलिए खारिज कर देते हैं कि अपनी जाति के भीतर भी लडक़े की जाति  कुछ नीची समझी जाती है। लोगों को याद होगा कि किस तरह हिन्दुस्तान का एक नेत्रहीन धर्मगुरू वीडियो-कैमरों के सामने ही यह गिनाता है कि ब्राम्हणों के भीतर कौन-कौन से ब्राम्हण नीचे माने जाते हैं, और उनसे रिश्ता नहीं किया जाता है। इस तरह मां-बाप, खासकर लडक़ी का परिवार बेटी की पसंद पर इसलिए भी विचलित हो जाता है कि भारतीय समाज में कन्या तो दान की वस्तु रहती है, और किसी वस्तु की भला क्या पसंद हो सकती है? 

इसलिए आज जब लड़कियां पढ़-लिखकर कामकाजी हो रही हैं, तो वे महत्वाकांक्षी भी हो रही हैं। और प्रेमसंबंधों में, विवाह संबंध में जब उनके साथ कोई धोखा होता है, उन्हें कोई निराशा होती है, तो वे भी ठीक उसी तरह बेवफाई की सोचने लगती हैं, जिस तरह मर्द हमेशा से ही सोचते आए हैं। अब तक होता यही था कि जानलेवा हिंसा हो, या पारिवारिक प्रताडऩा, पुरूष उसे करता था, और महिला उसे सहती थी। लेकिन अब पुरूष का यह एकाधिकार खत्म हो गया है। अब चाहे पांच फीसदी सही, उतनी प्रेमिकाएं या पत्नियां एक सीमा के बाद प्रताडि़त होने पर किसी प्रेमी की मदद से, या सुपारी-हत्यारा ढूंढकर अपने प्रेमी या पति को निपटाना भी जान रही हैं। यह बात गौरवशाली भारतीय परंपरा से कुछ अलग है, और नई और अटपटी है। पुरूषों को यह समझ ही नहीं पड़ता कि वे भी धोखा खा सकते हैं, क्योंकि अब तक तो वे धोखा देते ही आए थे। 

आज एकाएक चारों तरफ प्रताडि़त, विचलित, या किसी नए संबंध में बेवफा हो रही लडक़ी या महिला, पत्नी या प्रेमिका, के हथियारबंद होकर उठ खड़े रहने का वक्त आ गया है। चूंकि घर या प्रेमसंबंध में कोई महिला अब फूलन देवी सरीखी बागी होने लगी हैं, इसलिए पुरूष प्रधान समाज हड़बड़ा गया है। लोगों को इस सिलसिले के साथ जीना सीखना पड़ेगा कि जब पढ़ाई-लिखाई और कामकाज से कोई लडक़ी या महिला आत्मनिर्भर हो चले हैं, तो उन्हें किसी गाय की तरह माता-पिता के खूंटे से रस्सी खोलकर पति के खूंटे से नहीं बांधा जा सकता। अब वह सींग मारना भी सीख चुकी है, इसलिए अब उसे सींग मारने की कोई वजह देना ठीक नहीं है। जैसे-जैसे समाज में लड़कियों की आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ती जाएगी, वैसे-वैसे वे अपनी औकात पहचानने लगेंगी, और समाज को भी यह देखना होगा कि महिला की आर्थिक आत्मनिर्भरता उसकी आजादी के बिना नहीं आएगी। जिस दिन उसके बैंक खाते में रकम आने लगेगी, उस दिन उसे बंधुआ मजदूर की तरह नहीं रखा जा सकेगा। अब यह तो समाज के ऊपर है कि वह महिला को पढऩे-लिखने, और कामकाज के मौके कुछ और वक्त तक न देकर अपनी आखिरी कोशिश कर ले। लेकिन इससे भी कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं पडऩा है। दुनिया ने आज के फौलादी इस्लामिक ढांचे वाले ईरान को देख लिया है कि किस तरह वहां पर हिजाब के खिलाफ महिलाओं की एक बगावत हुई, और वहां औरत, जिंदगी, आजादी मुहिम शुरू हुई, जिसने सत्तारूढ़ मुल्लाओं को भी हिलाकर रख दिया। आज हालत यह है कि जिन महिलाओं को हिजाब लगाना है, वे लगाती हैं, और जिनको नहीं लगाना है वे नहीं लगाती हैं। ईरान की इस्लामिक सरकार की नैतिक पुलिस अब अपने दड़बों में घुस गई है, और महिलाओं ने अपने हक का बुलंद ऐलान किया है। ईरान से बाकी दुनिया को भी सबक लेना चाहिए, और अपनी लड़कियों और महिलाओं को कुचलना बंद करना चाहिए। 

प्रेम और विवाह संबंधों में होने वाली इतने किस्म की हिंसा को कम करने के लिए भी यह जरूरी है कि इन दोनों किस्म के संबंधों को तोडऩे को भी एक सामान्य सामाजिक व्यवस्था मानना होगा। जो विकसित और सभ्य देश हैं, वहां पर ऐसा ही चलन है, कि जब तक निभा, तब तक निभा, और जब नहीं निभा, तो लोग अपनी-अपनी राह निकल गए। भारत जैसे देश में भी भूतपूर्व प्रेमी-प्रेमिका, भूतपूर्व पति-पत्नी, को भूतकाल की तरह अनदेखा करके जीना सीखना पड़ेगा, वरना आज जगह-जगह अपनी पिछली प्रेमिका के वर्तमान प्रेमी को कत्ल करने की खबरें भी आ रही हैं, और इसके ठीक उल्टे, लड़कियां भी कहीं-कहीं ऐसा कर रही हैं। इन घटनाओं से इंसानों और समाज को एक बड़ा सबक लेने की जरूरत है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 जून 2025


 

...जली-भुनी प्रेमिका देती रही विमानों को धमकियां

24 जून 2025 

 

अभी अहमदाबाद विमान हादसे के बाद, और उसके पहले भी लगातार विमानतलों, और सरकारों को कई तरह की धमकियां मिल रही थीं, कि किसी प्लेन में बम रखा है, या किसी और तरह का खतरा है। ऐसी हर धमकी के बाद उड़ान को वापिस ले जाया जाता है, बारीकी से जांच होती है, और घंटों बर्बाद होते हैं। लोगों का निजी समय तो लगता ही है, देश की अर्थव्यवस्था भी इससे खराब होती है, और सुरक्षा एजेंसियों की अंधाधुंध दौड़-भाग होती है जिससे यह खतरा भी खड़ा हो जाता है कि उसी वक्त कहीं सचमुच का खतरा रहे, तो उसके लिए सुरक्षा साधन कम पड़ें। ऐसे में पूरी दुनिया में यह देखा गया है कि कई किस्म के लोग ऐसी झूठी धमकियां भेजने का शौक रखते हैं। आमतौर पर इनको किसी और से हिसाब चुकता करना रहता है, और अपनी भड़ास निकालने के लिए वे इसको एक जरिया बना लेते हैं। 

पिछले एक साल में गुजरात सहित 11 राज्यों को इसी तरह बमों की धमकी भेजने वाली एक कामकाजी महिला को अहमदाबाद पुलिस ने गिरफ्तार किया है जो कि चेन्नई की रहने वाली है, और एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में वरिष्ठ सलाहकार के पद पर काम कर रही है। यह किसी व्यक्ति से एकतरफा प्रेमसंबंध में थी, और उसकी शादी किसी और से हो जाने से वह बदला निकालने के लिए उसके नाम से एक फर्जी ईमेल आईडी बनाकर बमों की झूठी धमकी भेजती थी, ताकि वह व्यक्ति परेशानी में फंसे। चूंकि यह जानकार कामकाजी थी, उसने डार्कवेब, और इसी किस्म की कुछ दूसरी इंटरनेट ईमेल सुविधाओं का इस्तेमाल किया जिससे वह तो बच सके, और जिससे वह प्रेम करती थी, वह फंस जाए। साइबर पुलिस को भी इसकी पहचान करते हुए इसे पकडऩे में साल भर लग गया, वह भी वह एक गलती के चलते पकड़ में आई। 

अब अगर यह देखें कि इंटरनेट और साइबर औजारों की मामूली जानकार एक महिला भी असफल प्रेम का बदला लेने के लिए अगर इस हद तक जा सकती है, तो फिर जो लोग सचमुच ही हैकर दर्जे के साइबर विशेषज्ञ हैं, वे क्या नहीं कर सकते? और अब तो दिनोंदिन हालत यह हो रही है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के इस्तेमाल से लोगों की इस किस्म की ताकत बढ़ती चली जा रही है, और घुसपैठ आसान होती जा रही है। हमने दो ही दिन पहले यह लिखा था कि किस तरह 16 सौ करोड़ पासवर्ड चोरी कर लिए गए, और उन्हें इंटरनेट पर अपराधियों के डार्कवेब पर बेचा जा रहा है। इसके पहले भी कई हैकिंग इस किस्म की हो चुकी हैं, और अब कल्पना करें कि चुराए गए एक-एक पासवर्ड से अगर दुनिया भर में लोग इसी तरह की धमकियां भेजते रहें तो क्या होगा? आज वैसे भी दुनिया में रिवेंज पोर्न नाम से कल तक के प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे के अंतरंग पलों के फोटो-वीडियो पोस्ट करते रहते हैं, और अब जांच-पड़ताल एक किस्म से पुलिस की क्षमता को पार कर रही है। अब कुछ अधिक ऊंचे दर्जे के मुजरिम अगर चुराई गई शिनाख्त, या गढ़ी गई किसी शिनाख्त से ऐसी और धमकियां भेजने लगेंगे, तो क्या होगा? दुनिया भर में हर पल हजारों विमान उड़ान भरते रहते हैं, और अगर इंटरनेट लोगों को झूठी पहचान गढक़र धमकियां भेजने की छूट देगा, जो कि अभी चल भी रहा है, तो फिर धमकियों और बदहवासी का यह सिलसिला कहां तक नहीं पहुंचेगा? 

दरअसल आज जिस रफ्तार से साइबर-सहूलियतें बढ़ रही हैं, उस रफ्तार से साइबर-मुजरिमों को पकडऩे की ताकत नहीं बढ़ रही। हो सकता है कि आगे जाकर सरकारी एजेंसियां ऐसे एआई औजार पा जाएं, जो कि आम साइबर-मुजरिमों की ताकत से अधिक ताकतवर हों, लेकिन आज तो मुजरिम ही पुलिस से कई गुना आगे चलते दिख रहे हैं। इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि मुजरिम मोटरसाइकिलों पर भाग रहे हैं, और सीमित साधनों वाली पुलिस उनके पीछे लाठी लिए हुए साइकिल पर। यह सिलसिला पता नहीं जुर्म और उसे पकडऩे के बीच फासले को और कितना बढ़ाएगा, लेकिन फिलहाल तो यह शर्तिया ही बढ़ते चल रहा है। इंटरनेट पर कालेधंधों को अपने नाम के मुताबिक साधारण इंटरनेट सरीखा एक डार्कवेब भी काम करता है। इस डार्कवेब पर कत्ल के ठेके देने से लेकर, किसी बैंक को लूटने के लिए गिरोह तैयार करने तक, हर किस्म के जुर्म के काम होते हैं। भाड़े के हत्यारे यहां पर अपना इश्तहार भी करते हैं, और जांच एजेंसियों का काम यहां पर खासा मुश्किल भी रहता है। जिस ताजा मामले को लेकर हमने यह लिखना चालू किया है, वह तो किसी पेशेवर मुजरिम का भी नहीं है। एक असफल प्रेमिका ने अपने प्रेमी को मुसीबत में डालने के लिए उसके नाम से ईमेल बनाकर जिस अंदाज में चारों तरफ धमकियां भेजी हैं, वह बड़ी फिक्र की बात है। ऐसी धमकियां सुरक्षा, और जांच के इंतजाम को चौपट कर रही हैं, और धीरे-धीरे झूठी धमकियों की वजह से सभी एजेंसियों में एक लापरवाही आने लगेगी क्योंकि अधिकतर धमकियां झूठी निकलेंगी। इसके बाद फिर कौन सी धमकी असली रहेगी, कौन सा बताया गया खतरा असली रहेगा, यह फर्क जब तक पुलिस कर पाएगी, तब तक हमला हो चुका रहेगा। हमने ऐसे कई किस्म के हमले देखे हैं। दो बरस पहले इजराइल पर हमास ने जिस तरह से हमला किया, उसमें इजराइल की सारी बहुचर्चित सुरक्षा व्यवस्था धरी रह गई थी। इसके पहले 11 सितंबर को जिस तरह न्यूयॉर्क के वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर ओसामा के विमानों ने हमला किया था, उसने दुनिया के इस सबसे सतर्क और चौकन्ने देश को भी चौपट करके रख दिया था। 

इस मुद्दे पर कोई शॉर्टकट नहीं हो सकता। यही हो सकता है कि सरकार असली और नकली धमकियों को पकडऩे के अपने औजारों की रफ्तार बढ़ाए। यह भी हो सकता है कि ऐसी धमकियां देने वाले लोग पहले से शिनाख्त करके रखे जाएं, क्योंकि इनमें से अधिकतर लोग सोशल मीडिया पर ऐसा रूख बताते हैं कि वे समाज के लिए खतरा हो सकते हैं। यह कहते हुए हम जानते हैं कि यह लोगों की निजता में कुछ हद तक दखल भी होगा, लेकिन जब सार्वजनिक सुरक्षा का मुद्दा हो, तो जिस हद तक जरूरी हो, उस हद तक निजता पर रोक-टोक भी लगानी ही होगी। अब अगर किसी ने सचमुच ही अहमदाबाद के विमान में साजिश के तहत कोई तोडफ़ोड़ की होगी, तो ऐसी हरकत को आगे रोकने के लिए सरकार को इंतजाम तो करना होगा, चाहे विमान के लोग हों, चाहे ट्रेन के, उनके देश-प्रदेश की सरकारें उन्हें खतरे में तो छोड़ नहीं सकतीं।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 जून 2025



 

इराक पर हमले का विरोध करने वाले ट्रंप ने ईरान पर हमला कर देश को फंसाया

 23 जून 2025 

 

ईरान पर अमरीका के हवाई हमले से बातचीत का आखिरी रास्ता भी फिलहाल तो खत्म हो गया है। अमरीका का यह निर्वाचित बेदिमाग, और बददिमाग तानाशाह अपने दोस्तों और दुश्मनों, दोनों के साथ के सारे पुल गिराते चल रहा है। उसने पूरे के पूरे योरप, और नाटो को धोखा दिया, उसने भारत सहित दर्जनों देशों के साथ बदसलूकी की, नीचा दिखाया, उसने रूस के साथ एक अप्राकृतिक प्रेम दिखाते हुए, ईरान को लेकर उसे भी बुरा झटका दिया। राष्ट्रपति बनने के बाद से ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र की सारी संस्थाओं को खारिज कर दिया, जलवायु समझौते को खारिज कर दिया, अमरीकी विश्वविद्यालयों को नीचा दिखाया, और उनका दीवाला निकाल देने का काम किया, दुनिया भर में अमरीकी मदद करने वाले यूएस-एड को खत्म किया, और तो और उसने अभी पिछले पखवाड़े अपने जिगर के टुकड़े एलन मस्क से भी दुश्मनी कर ली। उसने दुनिया के सबसे बदनाम और घटिया देशों में से एक, इजराइल को बाप बनाकर सिर पर बिठाकर रखा है, और अमरीकी राजनीतिक-कार्टूनिस्ट कार्टून बना रहे हैं कि इजराइली प्रधानमंत्री ट्रंप के चेहरे वाले कुत्ते को चेन से बांधकर चल रहा है, और उससे ईरान के सुप्रीम नेता को कटवा रहा है। अमरीकी जनता के बीच यह बात उठ रही है कि उसने वोट ट्रंप को दिया था, और अब वह इजराइली प्रधानमंत्री की गुलाम बन गई है।  

ऐसी तमाम बातों के बीच यह भी देखने की जरूरत है कि जो ईरान लगातार अमरीका के साथ एक परमाणु समझौते के लिए मेज पर बैठकर बात कर रहा था, बातचीत जारी ही थी, कि ट्रंप की दी गई 60 दिनों की समय सीमा पूरी हुई, और 61वें दिन ट्रंप के आज के सबसे बड़े हमबिस्तर इजराइल ने ईरान पर हवाई हमला शुरू कर दिया। इसके बाद ईरान हमलों के बीच भी यूरोपीय देशों के साथ बातचीत कर रहा था, और उसके दो दिन के भीतर बिना किसी नए घटनाक्रम के ट्रंप ने ईरान पर दुनिया के इतिहास के सबसे बड़े बम गिराए, और इस पर गर्व करते हुए ट्रंप आने वाले दिनों के लिए भी ईरान को धमकियां दे रहा है। नतीजा यह हुआ है कि पूरी दुनिया में तेल का संकट आते दिख रहा है, और तेल के दाम लगातार बढ़ सकते हैं जिससे कि दुनिया की हर अर्थव्यवस्था पर चोट पहुंचेगी। फिर इस जंग के आगे बढऩे की आशंका में दुनिया भर के शेयर बाजार डूब रहे हैं। वैसे भी ट्रंप की तूफानी लहरों की तरह ऊपर-नीचे आती-जाती अप्रत्याशित टैरिफ-नीतियों के चलते खुद अमरीकी कारोबारी भयानक आशंकाओं से घिरे हुए हैं, और पूरी दुनिया का कारोबार अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में ईरान में एक निहायत नाजायज, और गैरजरूरी फौजी मोर्चा खोलकर ट्रंप ने खुद अमरीका को एक ऐसी नई मुसीबत में डाला है जिसे उसी की रिपब्लिकन पार्टी के सांसद पसंद नहीं कर रहे हैं, बाकी का अमरीका तो इस फिजूल के जंगी एडवेंचर के खिलाफ है ही। 

हम जरा सा पुराना देखें, तो अभी 2016 के राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार में ट्रंप ने अपने पिछले एक रिपब्लिकन राष्ट्रपति बुश के इराक पर हमले की कड़ी आलोचना की थी। सार्वजनिक रूप से बार-बार कहा था कि अमरीका को यह युद्ध लडऩा ही नहीं चाहिए था। उसने अपनी ही पार्टी की सरकार के बारे में साफ-साफ कहा था कि यह हमला इराक पर जनसंहार के हथियारों का जखीरा रखने का झूठा आरोप लगाकर किया गया था, और यह एक बहुत महंगा गलत फैसला था जिसने मध्य-पूर्व को अस्थिर भी कर दिया था। ट्रंप ने चुनाव प्रचार में खुलकर यह आलोचना की थी, और आज पश्चिमी रेडियो-टीवी स्टेशन उसकी वह रिकॉर्डिंग निकालकर याद दिला रहे हैं कि ट्रंप ने इस बार 2024 के चुनाव प्रचार में बार-बार यह कहा था कि अमरीका दुनिया की किसी भी जंग में हिस्सा नहीं लेगा। और कुछ महीनों के भीतर ही ट्रंप ने ईरान पर यह पूरी तरह बेबुनियाद तोहमत लगाकर असाधारण हमला किया है, जो कि अमरीका को एक लंबी जंग में खींच सकता है। इस तरह ट्रंप ने 2016 और 2024 की अपनी खुद की घोषणाओं, और वायदों के खिलाफ जाकर यह हमला बोला है। फिर यह भी है कि फिलीस्तीन पर अमानवीय युद्ध-अपराध लगातार करने वाले इजराइल को लेकर आज जब विश्व समुदाय उसके खिलाफ हो चुका है, उस वक्त अमरीका सिर्फ फिलीस्तीन पर बरसाने के लिए इजराइल को हथियार दे रहा है, बल्कि वह लेबनान से लेकर ईरान तक दूसरी कई जगहों पर इजराइली हमलों में उसके साथ सबसे बड़ा मददगार बनकर खड़ा हुआ है, और अमरीका के खरबों डॉलर डुबा भी रहा है। 

हम खर्च की बात करें, तो इराक पर हमला अमरीका को करीब तीन ट्रिलियन डॉलर से अधिक महंगा पड़ा था, उसके अलावा 45 सौ से अधिक अमरीकी फौजी मारे गए थे, पूरी दुनिया में तेल के दाम आसमान पर पहुंच गए थे, और उस वक्त बढ़ा हुआ आतंक आज तक खत्म नहीं हो पाया है। अब हमने आज यह अंदाज लगाने की कोशिश की कि ईरान पर हमला अगर आगे और फौजी टकराव में बदलता है, तो क्या होगा? एक अंदाज यह निकला कि यह टकराव जितना बढ़ेगा, उस हिसाब से दो से पांच ट्रिलियन डॉलर की फौजी लागत अमरीका को ईरान के मोर्चे पर सकती है, लेकिन इसके साथ-साथ जो परोक्ष लागत आएगी, वह तेल के दाम आसमान पर पहुंचने की होगी, दुनिया भर में महंगाई बढऩे की होगी, और रूस और चीन के साथ रिश्ते खराब होने की होगी। इन तमाम चीजों से अमरीका पर अंधाधुंध आर्थिक बोझ आएगा। इसलिए ट्रंप की खुद की अपनी चुनावी-भाषणों की नीतियों के खिलाफ जाकर उसने गैरजरूरी हमला ईरान पर बोला है, उसके दाम अमरीका के अलावा दुनिया के बाकी तमाम देशों को भी चुकाने होंगे, और अमरीका-इजराइल जैसे जंगखोर देशों की खून की प्यास भर इससे बुझेगी। 

लोगों को अगर याद हों, तो हम याद दिला दें कि राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने 22 बरस पहले इराक पर झूठे सुबूतों का सहारा लेकर फौजी हमला बोला था, और वहां के शासक सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाकर फांसी तक पहुंचाया था, वहां अपनी पिट्ठू सरकार बनाकर अमरीका खुद ही राज कर रहा था, और वहां एक लाख से अधिक स्थानीय लोग मारे गए थे। इसके बाद अमरीका इराक को पहले के मुकाबले अधिक खराब हालत में छोडक़र वहां से भागने को मजबूर हुआ था। बाद में अफगानिस्तान में ठीक इसी तरह का हुआ कि तालिबानों को हटाने के नाम पर अमरीका वहां घुसा, 20 बरस तक ्अफगानिस्तान को रौंदा, और फिर अफगानिस्तान को उन्हीं तालिबानों के हवाले करके, अफगान महिलाओं को पत्थर युग में पहुंचाकर अमरीका वहां से अपने सैनिकों को लेकर किसी तरह भाग निकला। अपने हथियार और हेलीकॉप्टर तक छोडक़र भागा, और तालिबानों से एक समझौता करके अपने सैनिकों के विमानों को किसी तरह वहां से रवाना करवाया था। जंगखोर अमरीका दुनिया के दर्जनों देशों में ऐसी ही हिंसा कर चुका है, और बिना दांत-नाखून, बिना हाथ-पैर वाला संयुक्त राष्ट्र अमरीकी खूनी-गुंडागर्दी के सामने महज बयानबाजी करने के लायक बच गया है। लेकिन दुनिया के लोगों को याद रखना चाहिए कि अमरीका के मुंह जो खून लगा हुआ है, उसके चलते आज दुनिया के बाकी देश तभी तक सुरक्षित हैं, जब तक अमरीका को उन पर हमला करने की जरूरत नहीं लग रही है, और फिर ट्रंप जैसे के रहते हुए तो दुनिया के किसी देश की हिफाजत का कोई बीमा नहीं हो सकता। एक अंडरवर्ल्ड डॉन, माफिया-गॉडफॉदर व्हाईट हाऊस में अभी पौने चार साल और रहेगा, बाकी देश अपनी-अपनी चमड़ी बचाकर रखें, जानें किसकी बारी कब आएगी।

(Daily Chhattisgarh)