संपादकीय
31 जनवरी 2018

बलात्कार कोई ऐसा मुद्दा नहीं है जिस पर बार-बार लिखा जाए और अच्छा लगे, यह भी हम जानते हैं कि बार-बार इस मुद्दे पर लोग पढऩा भी नहीं चाहते। कुछ दिन पहले ही हमने यह लिखा था कि इस मुद्दे पर सिर्फ पुलिस से हर उम्मीद करना गलत होगा और समाज को अपने बारे में सोचना होगा, खुद भी कुछ करना होगा। और इसके बाद कल दिल्ली की एक भयानक खबर आई कि पड़ोस का एक लड़का आठ महीने की बच्ची को खिलाने के लिए ले गया, और उससे बलात्कार करते पकड़ाया। अब ऐसी किसी मामले को पुलिस या सरकार भला कैसे रोक सकते हैं? ऐसी रोकथाम तो परिवार के लोग, पड़ोस के लोग या समाज के लोग ही सावधानी बरतकर कर सकते हैं।
आज हम भारत में बलात्कार को लेकर एक छोटे पहलू पर बात करना चाहते है, बच्चों को लेकर। बच्चों से बलात्कार जैसी दिल दहलाने वाली, दिल बैठा देने वाली वारदातें सामने आई हैं, वे खबरों में छप रही हैं, उनके बारे में यहां पर जानकारी लिखने की जरूरत नहीं है, लेकिन इस बारे में देश को क्या करना चाहिए यह चर्चा बहुत जरूरी है। बच्चों से बलात्कार तो खबरों में आ जाते हैं, लेकिन हम लगातार जिस मामले को उठाते हैं, वे हैं बच्चों के देह शोषण के। बच्चों के साथ इतने किस्म के यौन अपराध उन्हीं के परिवार के लोग, परिवार के आस-पास के लोग, पड़ोस के लोग, स्कूलों के शिक्षक-प्रशिक्षक करते हैं कि उन पर भरोसा भी मुश्किल होता है। भारत का अनुभव यह है कि यह देश अपने भीतर की बुराईयों को अनदेखा करने पर भरोसा रखता है, और अपनी हर बुराई को पश्चिम पर थोपकर खुद हो लेता है कि इसकी अपनी संस्कृति बुराईयों से और विकृतियों से आजाद है। यह देश अपने लोगों की शारीरिक और मानसिक जरूरतों को भी मानने से इंकार कर देता है, अपने इतिहास को मानने से इंकार कर देता है। आज के भारत में संस्कृति के ठेकेदारों का तो तबका बात-बात पर डंडे-झंडे लेकर सड़कों पर रहता है, उसे इस देश के इतिहास और पुराण को लपेटकर अलग रख दिया है, और इंसानों की तन-मन की जरूरतों को नकारने को यह तबका भारतीय संस्कृति मानता है। इसलिए इस देश में बच्चों के यौन शोषण को लेकर कोई बात नहीं हो सकती, और जब ऐसा शोषण करने वाले लोग अपने जुर्म को दबा-छुपाकर ऐसी हरकतों को जारी रख पाते हैं, तो उनमें से कुछ लोग बलात्कारी होते हैं। छोटे बच्चों से बलात्कार, और उसके साथ-साथ उनसे दिल दहला देने वाली हिंसा, रातों-रात पैदा होने वाली नीयत नहीं है। यह धीरे-धीरे मौका पाकर बढ़कर इस हद तक पहुंचने वाली हिंसा और विकृति है। इसलिए अगर समाज जल्द इस पर रोक नहीं लगा सकता, तो इसका बढ़ते जाना तय भी रहता है। देश के बच्चों को सेक्स अपराधों से बचाना इसलिए जरूरी है कि एक तो यह हिफाजत उनका बुनियादी हक है, दूसरा यह कि ऐसे जख्म उनकी जिंदगी के आखिर तक भर नहीं पाते, और देश के भविष्य में उनका उतना योगदान नहीं हो पाता जितना कि इन जख्मों के बिना हुआ रहता। इसलिए एक बच्चे को तबाह करने से, उस समाज का भविष्य भी तबाह होता है।
भारतीय समाज को पुलिस और सरकार का मुंह देखने के बजाय अपने बच्चों की हिफाजत खुद करने की सारी कोशिशें पहले कर लेनी चाहिए, सारी सावधानी पहले खुद बरत लेनी चाहिए, और उसके बाद जाकर सरकार से, पुलिस से कोई उम्मीद जायज मानी जा सकती है। जब परिवार के पहचान के लोग घर के भीतर बलात्कार करें, तो इस हिंसा के शिकार बच्चों को बचाने के लिए पुलिस पहले तो पहुंच ही नहीं सकती। बाद में भी पुलिस का दखल तभी हो सकता है जब इन बच्चों की बातों पर भरोसा करके घर वाले पुलिस तक पहुंचें। इसलिए हर घर को, हर मोहल्ले और इमारत को, हर स्कूल और टीम को, अपने बच्चों की हिफाजत के बारे में पहले खुद सोचना होगा, बच्चों को समझदार बनाना होगा, और पाखंडी शुद्धतावादियों के झंडे-डंडों से डरे बिना बच्चों को स्कूलों में सावाधानी के लायक शारीरिक शिक्षा देनी होगी। छत्तीसगढ़ में पिछले बरसों में बहुत ही गरीब और बेजुबान आदिवासी बच्चियों के आश्रमों और हॉस्टलों में जिस तरह के सामूहिक बलात्कार हुए, जिस तरह के लगातार बलात्कार हुए, उससे सबक लेकर आगे की रोकथाम के लिए जिस तरह की बचाव-तैयारी की हम उम्मीद कर रहे थे, राज्य स्तर पर वैसी कोई तैयारी दिख नहीं रही, और जो मामले सामने आए, उन्हीं के मुजरिमों पर मुकदमे पर आकर बात थम गई है। राज्य स्तर पर समाज के भीतर जैसी हलचल होनी चाहिए थी, वैसा कुछ भी दिखाई नहीं पड़ा।
आखिर में एक बात और, वर्दी में मौजूद पुलिस अपनी कई किस्म की खामियों के चलते एक बहुत आसान, सहूलियत वाला, और हर मौके पर मौजूद निशाना बन जाती है। लेकिन दशहरे के रावण को जला देने से जितनी बुराईयां जलती हैं, उतने ही खतरे किसी एक खराब पुलिस को निशाना बनाने से टल सकते हैं। ऐसे लुभावने नारे लगाकर राजनीति और सामाजिक आंदोलन के लोग टीवी कैमरों पर जगह तो पा सकते हैं, लेकिन इससे समाज के भीतर का खतरा कम नहीं होगा। सिर्फ पुलिस को हर मर्ज की दवा मान लेना, और हर हादसे पर पुलिस को सजा दिलवा देने की जिद करना, असल मर्ज को अनदेखा करना होगा। भारत के आंदोलनकारियों को एक संतुलन और अनुपात भी समझना होगा कि किस बात के लिए समाज खुद जिम्मेदार है, और किस बात के लिए सरकार या पुलिस, और किस हद तक। एक मामूली बीमारी के लिए इन दिनों कई किस्म की जांच होती है, और तब जाकर इलाज तय होता है। बलात्कार जैसे विचलित कर देने वाली वारदातों के बाद बिना सोचे-समझे सिर्फ सत्ता पर, सिर्फ पुलिस पर हमलों से समाज अपने भीतर की खामियों को भी नहीं समझ पाएगा, और अपनी बीमारी का इलाज भी नहीं पा सकेगा। (Daily Chhattisgarh)




















