आज भी गर जिंदा रखने के लिए किसी बच्चे को बेचा जा रहा है, तो चुल्लू भर पानी...

31 मार्च 2025 

 

ओडिशा की एक दिल दहलाने वाली खबर है कि 65 बरस की एक विधवा दादी ने अपने 7 बरस के पोते को भुखमरी से बचाने के लिए दो सौ रूपए में बेच दिया। बरसों पहले ओडिशा का कालाहांडी का इलाका बहुत सी भूख-मौतों को देखता था, और वह भुखमरी की रिपोर्टिंग करने वाले देश-विदेश के अखबारों के लिए पसंदीदा जगह रहती थी। अब हाल के बरसों में सरकारी राशन के इंतजाम की वजह से देश में भुखमरी खत्म सरीखी हो चुकी है, और ऐसी कोई घटनाएं सामने आती नहीं हैं, लेकिन कई भरोसेमंद समाचार माध्यमों में इस घटना की जानकारी बड़े खुलासे से आई है, और उन्हें सच मानकर ही हम यह बात लिख रहे हैं। ओडिशा के बल्दिया में 65 बरस की महिला, मांद सोरेन के पति का निधन हो गया था, बेटा लापता हो गया था, और बहू की कोरोना-मौत हो गई थी। ऐसे में 7 बरस का पोता इस बुजुर्ग महिला की जिम्मेदारी हो गया, और वह भीख मांगकर इस बच्चे को बड़ा कर रही थी। लेकिन अब बुढ़ापा और कमजोर सेहत परेशान करने लगे, बच्चे की देखभाल मुश्किल होने लगी, तो उसने एक व्यक्ति को दो सौ रूपए में उस बच्चे को बेच दिया, यह सोचकर कि वह कम से कम उसे ठीक से खिलाएगा, और पढ़ाएगा। इस बारे में जब अफसरों को पता लगा, तो पुलिस तुरंत हरकत में आई, और बाल संरक्षण विभाग में दखल दी, और दादी और बच्चे दोनों को लाकर सरकारी हिफाजत और इंतजाम में रखा गया है।

आज ओडिशा में भाजपा की डबल इंजन की सरकार है, और पिछले कुछ बरसों से अगले कई बरस तक केन्द्र सरकार की तरफ से देश के 80 करोड़ लोगों को पांच किलो राशन हर महीने दिया जा रहा है, जिससे भुखमरी की गुंजाइश बच नहीं जाती है। फिर भी इतने बड़े सरकारी इंतजाम में कई जगहों पर कमजोरियां रह जाती हैं, और हमारे ही नंबरों पर पड़ोसी राज्य एमपी के राशन या खाद के संदेश आते रहते हैं। जाहिर है कि कहीं कोई नंबर गलत चढ़ गया है। और आज तो सरकार की किसी भी योजना का फायदा लेने के लिए आधार कार्ड से लेकर दूसरी कुछ औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं, और देश में बुजुर्गों के बीच अशिक्षा इतनी अधिक है कि वे कई तरह के काम कर नहीं पाते हैं। लोगों को याद होगा कि इसी ओडिशा की एक रिपोर्ट कुछ अरसा पहले ऐसी आई थी कि एक विकलांग महिला 70 बरस की उम्र में वृद्धावस्था पेंशन के कुछ सौ रूपए महीने लेने के लिए हाथ-पैर चारों से चलते हुए दो किलोमीटर दूर पंचायत तक जाती-आती थी। ऐसे दूसरे भी बहुत से मामले देश भर में बिखरे हुए रहते हैं जहां सरकारी योजनाओं के लागू होने पर भी लोग उनका फायदा पाने की हालत में नहीं रहते, इनमें से अधिकतर लोगों के कागजात पूरे नहीं रहते, और वे कागजी कार्रवाई नहीं कर पाते। दूसरी तरफ सरकार की बहुत सी ऐसी योजनाएं रहती हैं जिनमें अपात्र और संपन्न लोग भी अपनी चतुराई से कम कमाई के कागजात बनवाकर फायदा पाने लगते हैं, और उनकी रोक-टोक करने का भी सरकार के पास कोई इंतजाम नहीं रहता।

हम इसे सरकार के हिस्से की बहुत बड़ी कमजोरी इसलिए नहीं मानते कि जब आबादी के आधे से अधिक लोगों को राशन का फायदा मिलना है, दसियों करोड़ लोगों को सरकार की दर्जनों और योजनाओं का फायदा मिलना है, इनमें केन्द्र और राज्य सरकारों की कई औपचारिकताएं पूरी करनी रहती हैं, कई जगहों पर आजकल चोरी को रोकने के लिए कई तरह की जांच ऑनलाईन होने लगी है, और नेटवर्क की दिक्कत रहती है। इन सबके बीच अगर जरूरतमंद लोगों का एक बहुत बड़ा तबका फायदा पाता है, तो वह भी समाज के लिए छोटी बात नहीं है। अब जरूरत दो बातों की बराबरी से है, पहली तो यह कि छूट गए जरूरतमंद लोगों को सरकार और समाज सब मिलकर फायदे तक पहुंचाने का काम करें, और दूसरी बात यह कि जो सक्षम और अपात्र लोग सरकार की रियायत और मदद की योजनाओं का नाजायज फायदा उठा रहे हैं, उन्हें पकड़ा जाए, और उनसे वसूली की जाए। हम शहरों में देखते हैं कि सडक़ किनारे खुलेआम ठेले-खोमचे वाले रियायती-घरेलू गैस सिलेंडर का इस्तेमाल करते हैं, न उन्हें किसी कार्रवाई का खौफ रहता, और न ही कोई कार्रवाई होती ही है। दरअसल यह रियायत केन्द्र सरकार के पैसों से मिलती है, और राज्य सरकार पर न उसका बोझ रहता, और न ही राज्य सरकार को उसकी कोई परवाह रहती। रियायतों की ऐसी ही चोरी कहीं बिजली को लेकर होती है, तो कहीं किसी और सरकारी योजना की। भारत के लोगों में नाजायज फायदा पाने की सोच इतनी मजबूत हो चुकी है कि अधिकतर लोग इस ताक में रहते हैं कि नियमों के बीच कोई छेद ढूंढकर उसमें से हाथ डाला जाए, और फायदा निकाल लिया जाए।

सक्षम लोगों की ऐसी चोरी के बीच हर शहर में सडक़ों, और फुटपाथों पर कई ऐसे गरीब, विकलांग, बीमार, बेघर, और विक्षिप्त लोग दिखते हैं, जिनका कोई सहारा नहीं रहता, जिनके पास कोई कागज नहीं रहता, और जो किसी सरकारी दफ्तर में पहुंचकर कोई भी औपचारिकता पूरी करने की हालत में नहीं रहते। इनमें से जो बच्चे रहते हैं, वे कचरा उठाने जैसा काम करने लगते हैं, और नशा करने लगते हैं। बूढ़े और बीमार, विक्षिप्त और विकलांग भीख मांगने लगते हैं, और थोड़ा-बहुत काम करने में सक्षम जवान लोग इस ताक में रहते हैं कि कब किसी धर्म का कोई भंडारा लगे, और वहां पर मुफ्त में खाना पाया जा सके, और बाकी वक्त वे भी भीख मांगने पर भरोसा रखते हैं।

सरकार को इन तबकों के तमाम लोगों के लिए निराश्रित गृह बनाने चाहिए, और एक बार ढांचा खड़ा होने के बाद उसे किसी भरोसेमंद सामाजिक संगठन के साथ मिलकर चलाना चाहिए। सडक़ों पर से ऐसे तमाम लोगों को हटाकर इन निराश्रित गृहों में रखा जाना चाहिए, क्योंकि कई जगह विकलांग और विचलित लड़कियों और महिलाओं से बलात्कार के मामले तब आते हैं, जब वे गर्भवती हो जाती हैं, उसके बाद फिर बलात्कारियों की तलाश शुरू होती है। सरकार को ऐसे बेजुबान तबकों को अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकता मानना चाहिए क्योंकि अब तो सरकारें एक सीमा से कम कमाई वाले परिवारों को वैसे भी कई तरह से सीधी नगद मदद देती है, या बिना भुगतान अनाज देती है। सडक़-फुटपाथ के ये लोग अपनी शारीरिक और मानसिक वजहों से ऐसी योजनाओं तक नहीं पहुंच पाते, और किसी भी जनकल्याणकारी सरकार को इन्हें संस्थागत हिफाजत मुहैया करानी चाहिए। इससे देश में कम से कम कुछ करोड़ लोगों का भला होगा, और वे इंसान की तरह रह सकेंगे, खा और सो सकेंगे। ऐसे संस्थागत इंतजाम में इन पर सरकार का बहुत बड़ा खर्च भी नहीं होगा, और इलाज के जरूरतमंद इन लोगों का योजनाबद्ध इलाज भी हो सकेगा। सरकारों को ऐसे कमजोर तबकों पर अधिक ध्यान देना चाहिए जो संगठित होकर आवाज नहीं उठा सकते, जो कोई वोटर-समूह नहीं हैं, लेकिन इस देश के सबसे जरूरतमंद लोग हैं। शायद केन्द्र सरकार ही पहल करके पूरे देश के हर छोटे-बड़े शहर में ऐसा ढांचा विकसित कर सके, और फिर राज्य सरकारें समाज के सहयोग से उन्हें चला सकें।

(Daily Chhattisgarh)

भीतर वही पुरानी हिंसा भरी हो तो नई ‘संवेदनशील’ शब्दावली किस काम की?

30 मार्च 2025 

 

एक विकलांग-अधिकार कार्यकर्ता, सम्यक ललित, ने अभी विकलांगताडॉटकॉम नाम की अपनी वेबसाइट पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव का एक बयान पोस्ट किया है जो उन्होंने न्यूज-18 टीवी चैनल पर लिए जा रहे एक इंटरव्यू के साथ दिया था। उन्होंने कांग्रेस के चुनाव चिन्ह, हाथ को कटा हुआ पंजा बताया, और कहा- देखो माफ करना, हमारे यहां ये कटे-फटे शरीर वाले को अच्छा मानते ही नहीं हैं, अब क्या करें, हमारी भी दिक्कत है। हमारे यहां तो पूरे शरीर के साथ हो तो राजा बनेगा, नहीं तो नीचे ही कर देते हैं कि चल जा यहां से। भगवान की कोई मूर्ति खंडित हो जाए, तो भगवान की दया से उसका विसर्जन करना पड़ता है। यह पोस्ट करने वाले सम्यक ललित खुद भी एक विकलांग हैं, और उन्होंने इस बयान से खुद को पहुंची तकलीफ के साथ ये तमाम बातें लिखी हैं। 

भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2015 में मन की बात के प्रसारण में यह सुझाव दिया था कि विकलांग शब्द की जगह दिव्यांग शब्द का इस्तेमाल करना चाहिए। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय विकलांग व्यक्ति दिवस, 3 दिसंबर के कार्यक्रम में इस पर अमल की अपील की थी, और कहा था कि उनके मन में विचार आया कि क्यों न हम देश में विकलांग की जगह दिव्यांग शब्द का प्रयोग करें। उन्होंने कहा ऐसे अंगों में दिव्यता है। इसके बाद से केन्द्र सरकार और शायद अधिकतर राज्य सरकारों के कामकाज में विकलांग की जगह दिव्यांग शब्द इस्तेमाल होने लगा, और केन्द्र ने दीनदयाल विकलांगजन पुनर्वास योजना जैसी कुछ योजनाएं भी लागू की, और धीरे-धीरे विकलांग शब्द के इस्तेमाल को ही आपत्तिजनक मान लिया गया। 

अब मन की भावनाएं चाहे जैसी हों, हिकारत चाहे कितनी भरी हो, विकलांग कहने के बजाय दिव्यांग कहकर लोग यह जाहिर करते हैं कि वे बहुत संवेदनशील हैं। लेकिन नाम बदल देने से सोच बदल जाती तो सब कुछ कितना आसान रहता, धर्मान्ध और साम्प्रदायिक लोग, नफरतजीवी लोग अपने आपका नाम इंसान रख लेते, और इंसान जैसे लगने लगते, किसी और अतिरिक्त तथाकथित इंसानियत की जरूरत नहीं रहती। लेकिन ऐसा होता नहीं है। आमतौर पर तो यह होता है कि किसी किस्म के प्रतीकात्मक सम्मान को लागू करके, या प्रचलित अपमान को प्रतीकात्मक रूप से बंद करके लोग अपराधबोध से उबर जाते हैं। उसके बाद उन्हें लगता है कि वे जब दिव्यांग कह रहे हैं, तो विकलांग लोगों को किसी और अतिरिक्त सम्मान की, बराबरी का दर्जा देने की जरूरत नहीं है। शब्दों का मनोवैज्ञानिक उपयोग लोगों को अपने ही कुकर्मों से उबरने में मदद करता है, और उन्हें अपनी हिंसक सोच को छुपाने के लिए यह खाल मिल जाती है। 

अभी भी ब्रिटेन जैसे देश में बीबीसी जैसे एक सावधान रेडियो और टीवी पर विकलांग शब्द का अंग्रेजी विकल्प डिसएबल ही पूरे वक्त सुनाई देता है। कुछ और पश्चिमी जगहों पर विशेष जरूरतों वाले लोग, पीपल विद स्पेशल नीड्स कहा जाता है। लेकिन किसी भी तरह की विकलांगता को दिव्यता का दर्जा देना यह बड़ी ही अटपटी बात रही, लेकिन प्रधानमंत्री के कहे हुए पूरे देश ने उसका इस्तेमाल शुरू कर दिया। अब 2015 की इस नई शब्दावली से पहले जिन लोगों ने अपने बच्चों का नाम दिव्यांग रखा होगा, वे इस शब्द के इस नए सरकारी और कानूनी इस्तेमाल के बाद एकदम से अटपटा महसूस कर रहे होंगे कि उनका बच्चा उन्हें जिंदगी भर कोसेगा कि यह उसका कैसा नाम रखा। किसी की आंखें खराब हो, कान से सुनाई न देता हो, हाथ या पैर खराब हों, रीढ़ की हड्डी मुड़ी हुई हो, या किसी और तरह की शारीरिक विकृति हो, उसे दिव्यांग कहना बहुत ही अटपटा इसलिए है कि यह ईश्वर की किस तरह की खास नेमत कही जा सकती है? इसे भला किस तरह से कुछ खास कहा जा सकता है, इसे दिव्यता कैसे माना जा सकता है? संवेदनशील भाषा तो ऐसे लोगों को विशेष जरूरतों वाले लोग कहते आई थी, और वही इसकी सही व्याख्या भी थी। अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ही पार्टी के एक सबसे बड़े राज्य मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जिस तरह विकलांग लोगों की खिल्ली उड़ा रहे हैं, उसी से यह जाहिर है कि सामाजिक जागरूकता के बिना नई शब्दावली से कुछ नहीं होता। भारत में वैसे भी नए-नए नाम धरकर राजनीतिक मकसद पूरा करने का सिलसिला इतना चला हुआ है कि सोशल मीडिया पर यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ के बहुत से पोस्टर गढक़र डाले जाते हैं कि वे किसका नाम क्या कर दे रहे हैं? एक तथाकथित टीवी समाचार चैनल के मुखिया की एक वीडियो क्लिप के साथ किसी ने एक व्यंग्य-वीडियो बनाकर डाला है। इसकी शुरुआत में यह चैनल-मालिक कहता है कि क्या इजराइल के यहूदी एक वक्त यादव लोग थे? वहां से लेकर इस वीडियो में तरह-तरह की राष्ट्रीयता और धर्म या जाति का मूल भारत की अलग-अलग जातियों को बताकर तंज कसा गया है। नए नामकरण से कुछ हल नहीं होता। राजनीतिक मकसद पूरा करने के लिए शहरों और जगहों के नाम बदल दिए गए हैं, और उनमें वही पुराना ढर्रा जारी है। इससे बेहतर तो यह होता कि नाम पुराना रहता, और हालात नए हो जाते। 

नाम दिव्यांग रखने से इस देश के लोग मानो अपराधबोध से मुक्त हो गए कि वे विकलांगों के प्रति हिकारत नहीं रखते हैं, सम्मान रखते हैं, और उन्हें दिव्यकृपा मानते हैं। यह बात अपने आपमें विकलांगता की तकलीफ पाने वाले लोगों के लिए जले हुए पर नया जख्म लग जाने सरीखी अतिरिक्त तकलीफ की बात है, जैसी कि अभी मोहन यादव ने की है। लोगों के मन में संवेदनशीलता किसी शब्दावली से पैदा नहीं होती, यह तो उनके भीतर सामाजिक सरोकार रहने, और बेहतर मानवीय मूल्य रहने से पैदा होने वाली बात है। विकलांग को दिव्यांग कहकर उनके साथ बदसलूकी जारी रखना तो उनके पुराने नाम के इस्तेमाल के मुकाबले अधिक हिंसक बात है। शब्दों के खिलवाड़ के मुकाबले संवेदनशीलता, और सरोकार अधिक जरूरी रहते हैं, वरना बीच-बीच में भीतर की हिंसा जुबान की लगाम हटाकर अपना चेहरा दिखाती रहती है।

(Daily Chhattisgarh)

छह बरस से ही बच्चों को झूठ पकडऩा सिखाने वाला देश!

 30  मार्च 2025 

भारत के सोशल मीडिया पर बदनीयत झूठ का सैलाब हर कुछ मिनटों में भिगाता रहता है। फेसबुक और एक्स पर, या वॉट्सऐप जैसे मैसेंजरों पर हजार किस्म के झूठ गढक़र लोग इतने समर्पित भाव से उसे फैलाते हैं कि यह समर्पण अगर समाज के भले के किसी काम में दिखाया गया होता, तो समाज सचमुच ही बहुत भला हो गया रहता। एक दिक्कत यह भी देखने में आती है कि जिन लोगों को आमतौर पर पढ़ा-लिखा, और समझदार भी माना जाता है, वे भी बिना बदनीयत के भी गढ़े हुए झूठ को आगे बढ़ाने के काम को बहुत समर्पित भाव से करते हैं। इसके पीछे उनका तर्क रहता है कि यह तो कई लोग सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे हैं, इसलिए उन्होंने भी कर दिया, या उन्होंने भी इसे किसी ग्रुप में डाल दिया, या दोस्तों को अलग-अलग भेज दिया। चूंकि कई लोग कर रहे हैं इसलिए वैसा करने में बाकी लोगों को भी कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए, यह समझ का सुबूत कम रहता है, गैरजिम्मेदारी का अधिक रहता है। आज जब इंटरनेट पर झूठ को पकडऩे के हजार किस्म के मुफ्त तरीके मौजूद हैं, तब बदनीयत झूठ को कथित मासूमियत के साथ आगे बढ़ाते चलना अगर बदनीयत होने का सुबूत नहीं है, तो उसे मासूमियत का संदेह का लाभ भी नहीं दिया जा सकता। 

भारत के सोशल मीडिया का यही हाल देखकर अभी कुछ हफ्ते पहले की फिनलैंड की एक खबर याद पड़ती है जिसमें वहां की स्कूलों में छह बरस के बच्चों को स्कूली शिक्षा के तहत ही यह पढ़ाया और सिखाया जा रहा है कि ऑनलाईन झूठी खबरों को कैसे पहचानें और पकड़ें। फिनलैंड को योरप का सबसे अधिक मीडिया-जागरूकता वाला देश माना जाता है। 2013 से इस देश में मीडिया की शिक्षा को राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है, जिससे कि बच्चे कमउम्र से ही झूठी खबरों को पहचानना सीख जाएं, किसी जानकारी या सामग्री के स्रोत का विश्लेषण करना सीख जाएं, और ऑनलाईन सामग्री को आलोचक की नजर से परख सकें। वहां की खबरें बताती हैं कि स्कूली बच्चे यह परख लेते हैं कि सोशल मीडिया पर कौन लोग झूठ फैलाते हैं। वहां के शिक्षामंत्री का कहना है कि चूंकि अब परंपरागत मीडिया पर लोग कम निर्भर करते हैं, इसलिए बाकी मीडिया में सच्चाई को परखने के लिए नई पीढ़ी को ही काबिल बनाना जरूरी है। यही खबर बताती है कि किस तरह फिनलैंड में सच की जांच करने वाली एजेंसियां लोगों की मदद के लिए मौजूद रहती हैं। अब वहां छोटे-छोटे स्कूली बच्चे भी सोशल मीडिया की सामग्री को देखकर सवाल करते हैं कि यह कहां से आई है, इसमें कितनी सच्चाई है? 

सच तो यह है कि अंधभक्ति दर्जे का अंधविश्वास अगर लोगों में न रहे, तो उनके मन में यह स्वाभाविक जिज्ञासा रह सकती है कि कोई जानकारी कहां से आई, क्यों आई, किस मौके पर आई, और उसके पीछे कौन सी बदनीयत हो सकती है। लेकिन जब किसी धर्म, जाति, विचारधारा, व्यक्ति, या संगठन के प्रति अंधविश्वास हो, तो फिर उन्हें सुहाने वाली बातों को भला कौन परखे? मैं सुबह से यह देखकर थक जाता हूं कि कुछ लोग शायद अलार्म लगाकर उठते हैं, और नफरत को इस समर्पण से आगे बढ़ाने लगते हैं कि मानो उन्हें परिवार से इसी सूर्यनमस्कार की सीख मिली है। सूरज उगा नहीं रहता कि वे सोते हुए लोगों तक नफरत को फैलाने लगते हैं, जो कि तीन चौथाई से अधिक बार झूठी होती है, और बाकी एक चौथाई भी रंग-बिरंगे झूठ की आइसिंग से सजाए गए केक सरीखी होती है। इनमें अपने आपको खासा पढ़ा-लिखा मानने और कहने वाले लोग भी रहते हंै, और बहुत से लोग यह जहर फैलाते हुए भी अपने किसी प्रतिष्ठित पेशे का जिक्र भी अपने नाम के साथ करते हैं। शायद प्रतिष्ठित पेशे का जिक्र नफरत के जहर को एक अलग प्रतिष्ठा दिला देता है। 

हिन्दुस्तान को फिनलैंड बनाना मुमकिन नहीं है क्योंकि बहुत से दशकों में धीरे-धीरे मिली सभ्यता हाल के बरसों में एकाएक साथ छोड़ गई है, और लोग अब फैक्ट-चेक जैसी बातों को अर्बन-बागी हरकत मानने लगे हैं। ऐसी जरा सी भी कोशिश दिखने पर लोग जागरूक लोगों को हमेशा के लिए सुला देने को भी तैयार रहते हैं, और पुणे से लेकर बेंगलुरू तक सामाजिक कार्यकर्ताओं को इस तरह सुलाया भी गया है। 

आज हिन्दुस्तान में आम लोगों की सोच पर जिस किस्म के मुद्दे हावी हो गए हैं, उनके बीच से कोई छेद तलाशकर तथ्य और तर्क को भीतर घुसने का कोई रास्ता नहीं मिल सकता। इतिहास, विज्ञान, और जिंदगी के बाकी बहुत से दायरों की जानकारी को तोड़-मरोडक़र एक अलग शक्ल दे दी गई है, और हिन्दुस्तान कोई फिनलैंड तो है नहीं कि जहां बच्चे छह बरस की उम्र से ही स्कूल से फैक्ट-चेक सीखना शुरू कर चुके हैं। इसलिए यहां पर लोग दिमाग की चर्बी पर जोर डाले बिना पूरी बदनीयत से गढ़े हुए झूठ को खालिस सच की तरह आगे बढ़ाने में लगे रहते हैं, फिर चाहे उनके बीच आखिर में बची हुई थोड़ी-बहुत सहज बुद्धि खुद के लिए उसे मानने से इंकार भी करती हो। 

लेकिन हिन्दुस्तान में भी जो मां-बाप अपने बच्चों का एक बेहतर भविष्य चाहते हैं, उन्हें चाहिए कि वे बच्चों को सच और झूठ में फर्क करना सिखाएं, किसी मुहिम के पीछे की बदनीयत की शिनाख्त करना सिखाएं। इसके बिना उनके बच्चे वैश्विक मुकाबलों में पीछे रह जाएंगे, क्योंकि झूठ गढऩे और फैलाने के पेशे तो कम रहेंगे, और जितने किस्म के बेहतर काम एआई के हमले के बाद भी बचे रहेंगे, उनमें झूठ की बुनियाद पर खड़ी हुई नौजवान पीढ़ी की गुंजाइश कम रहेगी। आने वाला वक्त ऐसे जिम्मेदार लोगों का हो सकता है जो सुबह से अपने मोबाइल फोन पर आए हुए जहरीले नफरती सामान को दूसरों को सुबह-सुबह के प्रसाद की तरह बांटने वाले न हों। अब एआई की मेहरबानी से नफरतजीवी लोगों की शिनाख्त भी आसान हो चली है, और आज किसी प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में दाखिले, या किसी अच्छी अंतरराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी के पहले अर्जी देने वालों की इंटरनेट-प्रोफाइल परख ली जाती है कि वे किस किस्म के हैं। नफरत और झूठ आपको किसी किनारे नहीं पहुंचा सकेंगे। 

यह भी समझने की जरूरत है कि हिन्दुस्तान की आज की नई पीढ़ी की जिंदगी में धर्म के ओवरडोज के नुकसान हो रहे हैं। बच्चों को लग रहा है कि जिंदगी में यही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। और देश में जो राजनीतिक-सामाजिक माहौल बना हुआ है, वह कब धर्म को धर्मान्धता की सीमा के भीतर ले जाता है, और कब वहां से आगे बढ़ाकर साम्प्रदायिकता के इलाके में, यह अहसास नहीं हो पाता, क्योंकि इनके बीच कोई नक्शे सरीखी सीमा रेखा नहीं है। दुनिया के जो देश धर्मान्धता और उस पर आधारित नफरत के साथ जी रहे हैं, उनका हाल कैसा बर्बाद है यह भी दिखाई दे रहा है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 मार्च 2025



 

नक्सल मोर्चे पर सुरक्षाबलों को लगातार थोक में मिलती कामयाबी के बाद जरूरत है...

29 मार्च 2025 

 

छत्तीसगढ़ में आज सुबह बस्तर में एक बड़े नक्सल ऑपरेशन में 16 या उससे अधिक नक्सली मारे गए हैं, और सुरक्षाबलों की जिंदगी को कोई नुकसान नहीं हुआ है जो कि ऐसे मोर्चे पर एक बड़ी सुरक्षा-कामयाबी है। आज के इन आंकड़ों के साथ करीब साढ़े तीन सौ नक्सली प्रदेश में भाजपा सरकार आने के बाद मारे गए हैं, और इससे कुछ गुना अधिक का आत्मसमर्पण पुलिस ने बताया है। यह भी याद रखने की जरूरत है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने मार्च 2026 तक देश से नक्सलियों को खत्म कर देने का इरादा जाहिर किया है, और ऐसे बिखरे हुए खतरे को लेकर ऐसी भविष्यवाणी चाहे बहुत आसान न हो, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार उस तरफ तेजी से बढ़ती दिख रही है। आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए राज्य सरकार ने एक पुनर्वास नीति भी बनाई है, हालांकि उस पर अभी तक अलग-अलग तबकों से कोई विश्लेषण सामने नहीं आया है, लेकिन सरकार मुठभेड़ के मोर्चे से परे भी समर्पण और पुनर्वास पर काम कर रही है। छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सल मौजूदगी सन् 2000 में राज्य बनने के पहले से चली आ रही है, और अभी पिछले करीब सवा साल का यह पहला दौर ऐसा है जब सुरक्षाबलों को इतनी बड़ी कामयाबी मिली है। इसे जब पिछली कांग्रेस सरकार के पांच बरस के साथ रखकर देखा जाए, तो साफ समझ आता है कि उस दौर में नक्सल हिंसा को खत्म करना राज्य सरकार की प्राथमिकता में नहीं था। मौतों के आंकड़ों को हम लोकतंत्र में बहुत बड़ी कामयाबी नहीं मानते, लेकिन जब देश-प्रदेश के सबसे सीधे-सरल आदिवासियों की जिंदगी पर दशकों से मंडराती हुई हिंसा की बात करें, तो नक्सल हिंसा को खत्म करने  के दो ही तरीके हो सकते थे, बातचीत से उसे सुलझाना, और सुरक्षाबलों के हाथों नक्सलियों को ही खत्म करना। छत्तीसगढ़ में आज की भाजपा सरकार ने शुरुआत से ही नक्सलियों से शांतिवार्ता की पेशकश की थी, लेकिन वह किन्हीं वजहों से शुरू नहीं हो पाई, या अगर किसी स्तर पर बातचीत शुरू भी हुई, तो उसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं हुई है। 

बस्तर में पिछले सवा साल में सुरक्षा मोर्चे पर बहुत बड़ा बदलाव नहीं आया है। केन्द्रीय गृहमंत्री की घोषणा के बाद शायद कुछ हजार सुरक्षाकर्मी वहां बढ़े हैं, लेकिन कमोबेश वहां की स्थिति वैसी ही है जैसी कि पिछली कांग्रेस सरकार के पांच बरस में थी। और तो और, आज बस्तर के दो सबसे बड़े पुलिस अफसर, एडीजी और आईजी, दोनों ही कांग्रेस सरकार के समय से वहां पर काम कर रहे हैं, और ऐसा लगता है कि उन्हें बस्तर से जोड़तोड़ करके निकल भागने की कोई हड़बड़ी भी नहीं है। बहुत से पुलिस अफसर बस्तर की तैनाती से बचने के लिए अपना दायां हाथ भी कुर्बान करने को तैयार रहते हैं, ऐसे में आज अगर बड़े-बड़े ये दो अफसर वहां लगातार बने हुए हैं, दोनों की साख बहुत अच्छी है, न बेईमानी उनके साथ चस्पा है, न ही वे मानवाधिकार हनन के लिए जाने जाते हैं, तो उनकी मौजूदगी और लीडरशिप का भी असर पिछले सवा साल में दिख रहा है। अब अगर भाजपा सरकार आने के पहले तक यही अफसर इस तरह काम नहीं कर पा रहे थे, तो यह एक सहज-अटकल लगाई जा सकती है कि सरकार की तरफ से उन्हें इसकी खुली छूट नहीं मिली थी। 

हम देश के भीतर के हथियारबंद समूहों को भी बंदूकों के मोर्चे पर मारने के बजाय उनसे बातचीत करके मतभेद सुलझाने, और हिंसा खत्म करने के हिमायती हैं। लेकिन जब बस्तर में दशकों से यही चले आ रहा है, और नक्सल प्रभावित इलाकों में वहां के मूल निवासियों को बुनियादी संवैधानिक हक भी नहीं मिल पा रहे हैं, तो हमारे सरीखे लोग भी शांतिवार्ता के अलावा और किसी भी रास्ते पर न चलने की बात नहीं कर सकते। हर सरकार की यह जिम्मेदारी भी होती है कि वह अपने देश-प्रदेश में किसी भी तरह की हथियारबंद हिंसा को रोकने के लिए जरूरी तमाम कार्रवाई करे। छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के आने के बाद अब तक साढ़े तीन सौ के करीब नक्सली मारे गए हैं, और इनमें से शायद आधा दर्जन लोगों के बारे में ही ऐसा कहा गया कि वे नक्सली नहीं थे, और पुलिस और दूसरे केन्द्रीय सुरक्षाबलों ने बेकसूरों को मार डाला। अगर हम इसी राज्य के पिछले आंकड़ों को देखें तो नक्सल इलाकों में मानवाधिकार हनन की अनगिनत शिकायतें सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंचती थीं, और बड़ी-बड़ी ऐसी मुठभेड़ें जांच में फर्जी साबित हुई थीं जिनमें से किसी एक में ही डेढ़ दर्जन बेकसूरों को सुरक्षाबलों ने मार डाला था। बस्तर से अभी आने वाली खबरों में ऐसा मानवाधिकार हनन सुनाई नहीं पड़ता है, और गिने-चुने ही लोगों के बेकसूर मारे जाने के आरोप लगे हैं। नौबत में ऐसी सुधार के लिए बस्तर में तैनात बड़े अफसरों के साथ-साथ राज्य की राजनीतिक लीडरशिप को भी श्रेय दिया जाना चाहिए कि मुठभेड़ों की कामयाबी के चलते बेकसूरों के प्रति लापरवाही नहीं दिखाई गई है। 

हम अभी भी शांतिवार्ता की अपनी वकालत पर कायम हैं, लेकिन किसी भी बातचीत के लिए दो पक्षों का तैयार होना तो जरूरी रहता ही है। नक्सली इस सवा साल में बड़े कमजोर हुए हैं, और यह मौका किसी लोकतांत्रिक-निर्वाचित सरकार के लिए ऐसे किसी हथियारबंद आंदोलन को बातचीत की मेज पर लाने का रहता है। हो सकता है सरकार अघोषित रूप से इसकी कोशिश कर रही हो, और उसकी सार्वजनिक घोषणा इस वक्त मुनासिब न हो। लेकिन इसके साथ-साथ नक्सल आंदोलन को कमजोर करने की राज्य सरकार की कोशिशें, और उनमें केन्द्रीय सुरक्षाबलों की भागीदारी की कामयाबी दिख रही है। लोकतंत्र में अंतहीन हिंसा की कोई गुंजाइश नहीं हो सकती। दुनिया के बहुत से देशों में सरकारी बंदूकों की कार्रवाई, और शांतिवार्ता, समझौतों से हथियारबंद आंदोलन खत्म हुए हैं। खुद हिन्दुस्तान में पंजाब से लेकर उत्तर-पूर्व तक इसकी कई मिसालें रही हैं। छत्तीसगढ़ सरकार नक्सलियों के खात्मे में बड़ी सुरक्षा-कामयाबी पा चुकी है, उसे बातचीत के कोई रास्ते तलाशकर शांतिवार्ता भी शुरू करनी चाहिए, ताकि दोनों तरफ की मौतों को रोका जा सके, आम आदिवासियों का बीच में पिसना खत्म हो, और सुरक्षाबलों पर असीमित बड़ा खर्च भी थमे। फिलहाल तो राज्य का राजनीतिक नेतृत्व, और बस्तर में तैनात पुलिस और सुरक्षाबलों के लोग मुठभेड़ों में इतनी बड़ी कामयाबी के लिए छत्तीसगढ़ के विपक्ष से भी तारीफ पा चुके हैं। अमित शाह की तय की हुई समय सीमा तक सारी नक्सल हिंसा चाहे खत्म न हो, लेकिन छत्तीसगढ़ बड़ी तेजी से उस तरफ बढ़ रहा है। ऐसे में देश की उन लोकतांत्रिक ताकतों को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए जिनकी बात नक्सली सुन सकते हैं, और उन्हें शांतिवार्ता के लिए तैयार करना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 मार्च 2025



 

दीवारों पर लिक्खा है, 28 मार्च 2025



 

हमास जिंदा रहे, या बाकी की फिलीस्तीनी आबादी, यह एक मुश्किल सवाल..

 28 मार्च 2025 

 

पिछले डेढ़ बरस में इजराइल और हथियारबंद फिलीस्तीनी संगठन, हमास के बीच चल रही जंग में फिलीस्तीन का गाजा शहर दुनिया का सबसे बड़ा मलबा बन चुका है, और हाल के बरसों में सबसे तेज रफ्तार से बना हुआ इतना बड़ा कब्रिस्तान भी। इस दौर में गाजा में करीब 40 हजार जिंदगियां खत्म हुई हैं, और उस शहर का हाल ऐसा हो गया है कि अब अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प उस पर कब्जा करके उसकी पूरी तरह पुनर्निर्माण करके उसे एक सैरगाह बनाना चाहता है, गाजा के 20 लाख से अधिक फिलीस्तीनियों को दुनिया के दूसरे देशों में धकेलकर। अब जब पिछले महीनों से चले आ रहा युद्धविराम खत्म हो गया है, और एक बार फिर गाजा पर इजराइली हमले तेज हो गए हैं, पिछले 8-10 दिनों में ही हजार से अधिक लोग और मार दिए गए हैं, तो गाजा के मूल निवासी फिलीस्तीनियों के बीच से हमास के खिलाफ भी एक आवाज उठी है। 

अभी गाजा में एक ऐसे प्रदर्शन की खबर आई है, तस्वीरें और वीडियो आए हैं जो चाहते हैं कि हमास इस शहर पर कब्जा छोड़ दे। आज वहां पर उसी का राज है, और अभी प्रदर्शन करने वाले लोगों का यह कहना है कि उन्होंने बहुत तबाही देखी है, और दुनिया में उनका साथ देने वाले लोग नहीं दिख रहे हैं, अपने दम पर फिलीस्तीनी अमरीका और इजराइल का मुकाबला नहीं कर सकते हैं, इसलिए हमास को यह हथियारबंद संघर्ष खत्म करके गाजा के प्रशासन से हट जाना चाहिए ताकि लोग कम से कम जिंदा रह सकें। डेढ़ बरस में 23 लाख आबादी में से 40 हजार से अधिक बेकसूर लोगों की मौतें कम नहीं होती हैं, आज इस शहर के अधिकतर लोगों के सिर पर कोई छत नहीं है, पांवतले को फर्श नहीं है, जख्मों के लिए मरहम नहीं है, कोई वर्तमान नहीं है, और कोई भविष्य नहीं है। ऐसे में आज एकध्रुवीय हो चुकी दुनिया में अमरीका और इजराइल की गिरोहबंदी का कोई मुकाबला मुमकिन नहीं है, दुनिया के बाकी कोई देश, यहां तक कि मुस्लिम अरब देश भी फिलीस्तीन का साथ देते नहीं दिख रहे हैं, किसी की औकात नहीं रह गई है कि अमरीकी गुंडागर्दी का मुकाबला कर सके, ऐसे में जिंदा रहना जरूरी है। और गाजा में अगर वहां की आजादी के लिए लड़ रहे हमास के खिलाफ लोग प्रदर्शन कर रहे हैं, तो इस पर गौर करना जरूरी है। 

यह भी हो सकता है कि वहां मौजूद अमरीकी और इजराइली ताकतें इस तरह का कोई प्रदर्शन प्रायोजित करवा रही हों जिनसे कि हमास की पकड़ ढीली होती साबित हो। लेकिन कुछ पर्यवेक्षकों का यह भी मानना है कि ये प्रदर्शन जनता की तरफ से खुद की मर्जी से हो रहे हैं क्योंकि वे लगातार हमलों से थक गए हैं, और सब कुछ खो बैठे हैं। आज जब संयुक्त राष्ट्र संघ, अंतरराष्ट्रीय अदालतें, मुस्लिम देशों के संगठन, यूरोपीय समुदाय, इनमें से किसी का भी कोई बस अमरीका-इजराइल गिरोह पर नहीं चल रहा है, और आज दुनिया जिसकी लाठी, उसकी भैंस दर्जे के लोकतंत्र पर उतर आई है, तो फिलीस्तीनी जनता को अपने जिंदा रहने की फिक्र करने का हक है। और जब अमरीका गाजा को फिलीस्तीनियों को हटाकर एक कारोबारी प्रोजेक्ट बनाने पर आमादा है, तो भूखे-प्यासे, निहत्थे फिलीस्तीनी कब तक अपने बच्चों की जिंदगी गंवा सकते हैं? इसलिए आज अगर वे हमास के शासन को खत्म करना चाहते हैं, तो वह उनके जिंदा रहने की एक जरूरत सरीखी है। इजराइल के भीतर यह सोच बहुत मजबूत है कि फिलीस्तीन में जो भी अगला शासन-प्रशासन हो, उसमें हमास की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। अब हमास को भी यह तय करना होगा कि क्या आबादी का एक इतना बड़ा हिस्सा खोकर, और आगे का हर दिन दर्जनों या सैकड़ों मौतों वाला वह कब तक जारी रखना चाहता है? जब किसी एक संगठन की जिंदगी वहां के नागरिकों की हर दिन सैकड़ों मौतों से जुड़ जाए, तो इस पर सोचना तो जरूरी है कि उस संगठन को कब तक जारी रखा जाए। और दुनिया की इस ताजा हकीकत को अनदेखा करना भी ठीक नहीं होगा कि ईरान पिछले साल भर में बहुत कमजोर हो गया है, मुस्लिम देशों के संगठन गाजा के पुनर्निर्माण पर तब तक खर्च करना नहीं चाहेंगे जब तक आगे जंग का खतरा टल न जाए, और हमास के रहते हुए इजराइल के साथ यह खतरा खत्म नहीं हो सकता।

हमास का फिलीस्तीनियों के हक के लिए चाहे कितना ही बड़ा योगदान क्यों न हों, आज हमास के लड़ाई के तौर-तरीकों ने 40 हजार से ज्यादा फिलीस्तीनियों की मौत को न्यौता दिया है। यह लड़ाई हिन्दी फिल्म के एक गाने की तरह, दिये और तूफान की है, इसमें कोई बराबरी नहीं है, हमास ने अक्टूबर 2023 में इजराइल पर एक हथियारबंद हमला करने भर में कामयाबी पाई, और उसका नतीजा यह हुआ कि जवाबी हमले और जंग में गाजा शहर खत्म हो गया। आज की इस हकीकत को देखना जरूरी है कि फिलीस्तीन दुनिया में एक अनाथ बच्चे की तरह रह गया है, और वह किसी से जंग के लायक नहीं रह गया है। दुनिया इतनी बेइंसाफ हो गई है कि यहां किसी देश, किसी नस्ल के जायज हकों की कोई कीमत नहीं रह गई है। ऐसी बेइंसाफ दुनिया में हमास जैसी अंतहीन हथियारबंद लड़ाई किसी किनारे नहीं पहुंचा सकती। इसलिए आज फिलीस्तीन के हिमायती लोगों को भी उसकी मदद करने के साथ-साथ इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि गाजा और बाकी फिलीस्तीन के भविष्य को किस तरह हमास, या उस किस्म के हथियारबंद आंदोलन से मुक्त रखा जा सकता है। एक पूरी नस्ल, और एक पूरे देश को एक हथियारबंद समूह की मर्जी पर कुर्बान करना ठीक नहीं है, फिर चाहे वह समूह उस नस्ल और देश के हक की लड़ाई ही क्यों न लड़ रहा हो। असल जिंदगी में कई बड़ी जंग जीतने के लिए लड़ाई के छोटे-छोटे मोर्चों पर पीछे भी हटना पड़ता है, और आज की दुनिया इंसानियत और लोकतंत्र की रह भी नहीं गई है कि जायज और नाजायज के सवाल को उठाया जाए। अमरीकी गुंडागर्दी से आज तो उसके सहयोगी देश अपने ही एक हिस्से ग्रीनलैंड को नहीं बचा पा रहे हैं, पड़ोसी और पुराने साथी कनाडा के अस्तित्व को ही खत्म करने पर ट्रम्प आमादा है, ऐसे मवाली के सामने बेघर, भूखे-प्यासे, जख्मी और बीमार, बेरोजगार फिलीस्तीनियों को कम से कम कुछ अरसे के लिए एक समझौता करना होगा, जो कि पूरी तरह बेबसी और मजबूरी का रहेगा, लेकिन जिंदा रहने के लिए इसके अलावा कोई रास्ता दिख नहीं रहा है। हमास अपने अस्तित्व को बचाने के लिए बाकी तमाम निहत्थे और शांत फिलीस्तीनियों के अस्तित्व को खत्म हो जाने दे, यह भी जायज नहीं होगा। फिलीस्तीन के हमदर्दों के एक पुनर्विचार करने की जरूरत है। 

(Daily Chhattisgarh)

असल जिंदगी और आभासी दुनिया के बीच की रस्साकसी में जिंदा रहने की चुनौती...

 27 मार्च 2025 

 

गुजरात के अमरेली में एक स्कूल के पांचवीं से सातवीं के दो दर्जन बच्चों ने अपने को एक डेयर-गेम के तहत खुद को ब्लेड से घायल कर लिया। इन छात्रों ने एक-दूसरे को चुनौती दी कि या तो वो खुद को जख्मी करें, या दस रूपए जुर्माना दें, इसके बाद करीब दो दर्जन छात्रों ने ब्लेड से अपने हाथ जख्मी कर लिए। फिर मां-बाप ने स्कूल और पुलिस के साथ मिलकर बैठक की, और यह विचार किया कि बच्चों के दिमाग से इस तरह की बातें कैसे हटाई जाएं। लोगों को याद होगा कि समय-समय पर अलग-अलग जगहों पर बच्चे किसी खतरनाक ऑनलाईन गेम की ऐसी ही चुनौती मंजूर करके कई खतरनाक काम करते हैं, और उनमें से कुछ की जान भी चली जाती है। कुछ खेल रहते ही ऐसे हैं जो लोगों को जान पर खेलने के लिए उकसाते हैं। भारत में ऐसा एक खेल सरकार ने कुछ अरसा पहले बंद भी करवाया था, पबजी नाम के इस खेल को खेलते हुए कई लोगों की जान भी गई थी। इसके अलावा दुनिया में कई तरह की चुनौतियां सोशल मीडिया पर दी जाती हैं, और जो किशोर-किशोरियां या नौजवान सोशल मीडिया पर खासा वक्त गुजारते हैं, या जो वहां एक-दूसरे से आगे बढऩा चाहते हैं, या जो किसी और से पीछे न छूट जाने के तनाव में रहते हैं, वैसे लोग इन चुनौतियों को धार्मिक भावना सरीखी गंभीरता से लेते हैं, और अपने को कुछ साबित कर दिखाना चाहते हैं।

सोशल मीडिया ने लोगों के बीच संबंधों का, एक ऐसा अजीब सा ऑनलाईन समाज खड़ा कर दिया है जो कि अभी दो-तीन दशक पहले कहीं नहीं था। अब स्मार्टफोन, इंटरनेट, और सोशल मीडिया ने मिलकर लोगों की जिंदगी के हर दिन के बहुत से घंटे एक ऐसी आभासी दुनिया में लगवाना शुरू कर दिया है जिसके सामने, जिसके मुकाबले असल दुनिया भी फीकी लगती है। फेसबुक और इंस्टाग्राम सरीखे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के खास एल्गोरिद्म लोगों की पसंद को भांपकर उन्हें उसी तरह के लोग दिखाते हैं, उसी तरह की सामग्री दिखाते हैं, और उन्हें रेशम के ककून की तरह की एक सीमित दुनिया में कैद कर देते हैं, इंसान रेशम की कीड़ों की तरह अपने ही उस ककून के भीतर कैद रह जाते हैं। गुजरात की जिस स्कूल से हमने चर्चा शुरू की है, वह तो सिर्फ चर्चा शुरू करने के लिए है, असलियत तो चारों तरफ इतनी बिखरी हुई है कि उसने दसियों हजार साल पुराने मानव समाज के सारे तौर-तरीकों, रीति-रिवाजों को पलटकर रख दिया है। लोग धरती के दूसरे तरफ जी रहे लोगों से ऑनलाईन मोहब्बत करने लगते हैं, और अपने आसपास के लोग उन्हें उतने अच्छे नहीं लगते, क्योंकि आभासी दुनिया में हर कोई अपनी एक ऐसी चमकदार तस्वीर पेश करते हैं, जिसका कि हकीकत से अनिवार्य रूप से कुछ लेना-देना नहीं रहता।

आज पुलिस की खबरों से पता लगता है कि हर दिन चाकू-पिस्तौल के साथ जाने कितने ही बालिग-नाबालिग नौजवान गिरफ्तार हो रहे हैं, और पुलिस को उनका सुराग उनके इंस्टाग्राम अकाऊंट से मिलता है, जहां पर वे चाकू-पिस्तौल के साथ अपने वीडियो पोस्ट करते हैं। अभी हफ्ते भर पहले ही एक नौजवान ने दिनदहाड़े, खुली सडक़ पर, लोगों की आवाजाही के बीच चाकू के दर्जनों वार से एक किसी को मार डाला, और फिर खून से सने चाकू के साथ अपना वीडियो पोस्ट किया, और यह चुनौती दी कि वह जेल में जाकर भी वहां राज करेगा। आज अगर लॉरेंस बिश्नोई जैसे देश के एक सबसे खतरनाक समझे जाने वाले अंतरराष्ट्रीय हत्यारे के गिरोह के लोग अपने वीडियो पोस्ट करते हैं, वीडियो पर धमकियां पोस्ट करते हैं, तो यही फैशन चल निकला है। हिंसा का शौक रखने वाले, या दूसरे किस्म के जुर्म करने वाले, या कि सिर्फ अपना दबदबा बनाने के लिए आतंक फैलाने वाले लोग हथियारों के साथ अपने फोटो-वीडियो इसी तरह पोस्ट कर रहे हैं। और दूसरे कई किस्म के लोग दूसरे किस्म के वीडियो से अपनी हसरतें पूरी कर रहे हैं।

अभी चौथाई सदी पहले तक लोगों को ऐसी सहूलियत हासिल नहीं थी कि वे अपनी जैसी चाहे वैसी फोटो खींच लें, पल भर में उसे पोस्ट कर दें, और कुछ मिनटों में जान-पहचान के लोगों की उन पर प्रतिक्रिया आना शुरू हो जाए। अब नौजवान पीढ़ी के बहुत से लोग तो ऐसे हैं जिनके लिए उनकी असल दुनिया, मोबाइल में कैद उनकी आभासी दुनिया के मुकाबले छोटी रह गई है। असल दुनिया में दोस्त कम हैं, वहां के लिए वक्त कम हैं, उसकी जरूरत कम हैं, उसे लेकर हसरत कम हैं, और असल और आभासी दुनिया के बीच की ऐसी खींचतान ने लोगों की सोच में ऐंठी हुई रस्सी की तरह बल डाल दिया है। सदियों से मनोविज्ञान के जानकार लोगों ने जितने किस्म के विश्लेषण पेश किए थे, उनमें से बहुत से ठीक वैसे ही धराशायी हो गए हैं जैसे कि सोवियत संघ के विघटन के बाद विश्व इतिहास की किताबों की जानकारी धराशायी हो गई थी।

अब सब कुछ एकदम बदल गया है। परिवार के भीतर लोगों के एक-दूसरे से रिश्ते अब मोबाइल फोन के अलग-अलग एप्लीकेशनों पर तय होने लगे हैं। एक-दूसरे से बातचीत कम हो गई है, और बहुत से लोग अधिकतर बातें वॉट्सऐप जैसे संदेशों पर कर लेते हैं। अब परिवार के ढांचे पर, प्रेमी-प्रेमिका के संबंधों पर, एक दफ्तर के भीतर काम करने वाले लोगों के बीच टेक्नॉलॉजी से जो फर्क आया है, उस पर तो अभी सारा अध्ययन भी नहीं हो पाया है। इस बदले हुए माहौल में पढ़ाई की किताबों में इन विषयों पर नए सिरे से चर्चा करनी होगी। आज वक्त ऐसा आ गया है कि स्मार्टफोन के लिए, वह भी महंगे स्मार्टफोन के लिए, उन पर हर दिन अधिक घंटे गुजारने के लिए बच्चे खुदकुशी कर रहे हैं, शादीशुदा लोग विवाहेत्तर संबंधों में पड़ रहे हैं, कहीं कोई महिला पति को छोड़ चार बच्चों संग पाकिस्तान से प्रेमी के पास हिन्दुस्तान पहुंच जा रही है, जिसे कभी देखा भी न था, और सिर्फ ऑनलाईन दोस्ती हुई थी। हर दिन ऑनलाईन दोस्ती प्रेम में बदल रही है, और प्रेम बलात्कार में या हत्या में। आज की स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई, और समाज पर लिखी गई किताबों में इस बदले हुए माहौल पर बहुत कुछ मौजूद नहीं है। कुछ लिखकर छपने तक तो लोगों की आभासी दुनिया बदल भी चुकी होगी। इसलिए लोगों को बातचीत लगातार जारी रखनी होगी, और न सिर्फ अपने बच्चों को, बल्कि अपने आपको भी आभासी दुनिया से उपजी हिंसा से बचाना होगा क्योंकि फेसबुक की दोस्ती में माताएं कई बच्चों को लेकर, या छोडक़र नाबालिग प्रेमी के साथ भाग निकल ले रही हैं, और समाज के कोई रीति-रिवाज ऐसी नौबत की कल्पना अब तक नहीं कर पाए थे। समाज को आपसी चर्चा से ही बदलते हुए हालात से जूझने के तरीके ढूंढने होंगे।  

(Daily Chhattisgarh)

मातहत अफसर छांटने बैठे हैं अपने बॉस को! गजब हाल है छत्तीसगढ़ का...

 26 मार्च 2025 

 

छत्तीसगढ़ में मुख्य सूचना आयुक्त की तीन बरस से खाली पड़ी कुर्सी को छांटने के लिए आज राज्य में बैठक होने जा रही है, जिसमें प्रदेश के मुख्य सचिव और डीजीपी रह चुके लोगों के नाम तो हैं ही, मौजूदा मुख्य सचिव अमिताभ जैन भी बड़ी सहूलियतों और मोटी तनख्वाह वाली इस कुर्सी के लिए बाकी लोगों के साथ कतार में हैं। और दिलचस्प बात यह है कि आज इन तमाम लोगों से इंटरव्यू लेकर जो पैनल बनाकर सरकार को दिया जाएगा, उसके चारों सदस्य अमिताभ जैन के मातहत काम कर रहे हैं, उनकी सीआर अमिताभ जैन को ही लिखनी है, आज अपने कामकाज के लिए वे अमिताभ जैन के लिए ही जवाबदेह हैं। हमारी नजर में यह एक विचित्र स्थिति इसलिए है कि इंटरव्यू बोर्ड के सारे ही सदस्य मुख्य सचिव के मातहत हैं। अब बोलचाल की जुबान में कहा जाए, तो उनको अपनी अगली सीआर भी अमिताभ जैन से लिखवानी है, और हितों का यह टकराव छोटा नहीं है। इसके पहले भी कई ऐसे मौके आए हैं जिसमें इसी राज्य के भूतपूर्व नौकरशाह, या भूतपूर्व जज अलग-अलग संवैधानिक पदों के लिए दिलचस्पी दिखाते मिले हैं, और उन्हीं में से सरकार ने छांटकर चुनिंदा लोगों को उपकृत किया है। लेकिन अर्जी देने वाले, या मनोनीत होने वाले ऐसे लोग कुर्सियों पर बैठे-बैठे मनोनीत नहीं हुए थे। हम मौजूदा सीएस अमिताभ जैन के नाम के खिलाफ नहीं हैं, वे कुछ दूसरे लोगों के मुकाबले बेहतर भी हैं, लेकिन इस मौके पर हम हितों के टकराव के एक व्यापक मुद्दे को एक बार फिर लिख रहे हैं।

इसके पहले भी हम कई बार यह बात उठा चुके हैं कि जज या अफसर, ये जिस राज्य में काम कर चुके हैं, वहां के किसी भी संवैधानिक, या दूसरे किस्म के पद के लिए उनके नाम पर विचार नहीं होना चाहिए। और तो और कुछ पत्रकारों के नाम भी सूचना आयोग सहित दूसरी जगह के लिए चलते हैं, उन्हें बीच-बीच में नियुक्त भी किया जाता है, और वह भी इसी तरह के हितों के टकराव का एक मामला है जिसे बारीकी से समझना जरूरी है। जब किसी राज्य में रिटायर होने के बाद संवैधानिक या दूसरी सरकारी कुर्सियों पर मनोनीत होने की एक संभावना रहती है, और वृद्धावस्था पुनर्वास बड़े महत्व, और मोटी तनख्वाह, भत्ते, और ओहदे से जुड़ी ढेरों सहूलियतों से जुड़ा रहता है, तो फिर बड़े-बड़े जजों और अफसरों की लार टपकने लगती है। ऐसे में अपने कार्यकाल के आखिरी बरसों में उनका रूख उस सरकार के मुखिया, या सत्तारूढ़ पार्टी को खुश करने का भी हो सकता है, या कि आमतौर पर रहता है, जो कि उन्हें वृद्धावस्था पुनर्वास दे सकते हैं। उनके आखिरी बरसों के फैसले, कामकाज, रूख और रूझान अपने इस निजी स्वार्थ से प्रभावित हो सकते हैं, इसलिए हम बार-बार उसी राज्य में किसी के भी मनोनयन के खिलाफ लगातार लिखते आ रहे हैं, और यह बात आज हम एक बार फिर उठा रहे हैं क्योंकि इस बार की राज्य सरकार की चयन समिति तो हितों के एक बहुत ही बेहूदा टकराव की मिसाल है। यह भी समझना कुछ मुश्किल है कि बड़े-बड़े आईएएस अफसरों की इस कमेटी में ऐसे व्यक्ति के आवेदन पर विचार करने की जिम्मेदारी कैसे ली है जो कि उनसे वरिष्ठ है, और उनकी अगली सीआर भी लिखने वाला है? 

ऐसे मामलों में हमारा सुझाव यह है कि देश में राष्ट्रीय स्तर पर एक टेलेंट-पूल बनाना चाहिए जिसमें रिटायर्ड जज और अफसर, और बाकी लोग भी अपनी अर्जियां भेज सकें, और जब किसी राज्य को, या केन्द्र सरकार को इनमें से किसी योग्यता वाले लोगों की जरूरत हो, तो राज्यों को उन लोगों के नामों के पैनल सुझाए जाएं जिन्होंने उन राज्यों में कभी काम नहीं किया है, और केन्द्र सरकार के स्तर पर मनोनयन के लिए उनके नाम सुझाए जाएं जिन्होंने कभी केन्द्र सरकार में काम नहीं किया है, सिर्फ राज्यों में काम किया है। ऐसे और भी कुछ पैमाने तय किए जा सकते हैं, और हम उसकी अधिक बारीकी में जाना नहीं चाहते हैं, लेकिन एक बात बिल्कुल साफ रहनी चाहिए कि राज्यों में काम कर चुके जज, अफसर, पत्रकार उसी राज्य में सरकार की ओर से रिटायरमेंट के बाद मनोनीत नहीं होने चाहिए। इसमें एक बड़ी दिक्कत यह भी रहती है कि रिटायर्ड आईपीएस को उसी राज्य में मानवाधिकार आयोग में बिठा दिया जाता है, और वहां पर बहुत सारे मानवाधिकार-हनन के ऐसे मामले आते हैं जो कि या तो उनके खुद के कार्यकाल के रहते हैं, या कि उनके पसंदीदा, या उनको नापसंद अफसरों के खिलाफ रहते हैं। अब अगर राज्य में रिटायर्ड आईएएस और आईपीएस को मुख्य सूचना आयुक्त बनाया जाएगा, तो सूचना के अधिकार के तहत वहां पहुंचने वाली अधिकतर अपीलें सरकार के खिलाफ ही रहेंगी, उन पर कोई भी फैसला देते हुए इन्हीं राज्यों से रिटायर होने वाले आईएएस और आईपीएस अफसरों के सामने यह हितों के टकराव का मामला रहेगा कि अपने ही कार्यकाल में आरटीआई में जो जानकारी नहीं दी गई थी, जिस जानकारी को वे कुर्सी पर रहते हुए दबाकर बैठे थे, अब उसके खिलाफ लगी अपील पर वे क्या खाकर ईमानदारी से फैसला दे सकते हैं? 

हो सकता है कि हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में कोई पीआईएल लगने पर भी हमारे इस तर्क को जायज नहीं माना जाए, क्योंकि इस देश में रिटायर्ड जजों के लिए भी ढेर सारी कुर्सियों पर संवैधानिक रूमाल रखा गया है, जिन पर वे ही बैठ सकते हैं। जब किसी पीआईएल में हितों के टकराव की बात उठेगी, तो फिर उन राज्यों के हाईकोर्ट के जजों के लिए भी दिक्कत और दुविधा खड़ी होगी कि ऐसे में तो रिटायर होने के बाद वे भी उस राज्य में लोकायुक्त नहीं बन सकेंगे, या आधा दर्जन दूसरी कुर्सियों पर नहीं जा सकेंगे। यह एक व्यापक संवैधानिक मुद्दा है जो कि इस लोकतंत्र में बनाई गई बहुत सारी संवैधानिक कुर्सियों की प्रासंगिकता को ही खत्म करता है। इस पर खुली चर्चा होनी चाहिए, और अगर पीआईएल में दिलचस्पी रखने वाले कोई बड़े वकील हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में इसे लेकर जाएं, तो इसे खारिज करते हुए जजों को भी कुछ मुश्किल तो होगी, वे बहुत आसानी से हितों के टकराव को अनदेखा नहीं कर सकेेंगे। लोकतंत्र के हित में यह पारदर्शिता जरूरी है, और छत्तीसगढ़ के आईएएस अफसरों से भी यह पूछा जाना चाहिए कि वे अपने मौजूदा बॉस को छांटने या खारिज करने की कौन सी अलौकिक ताकत रखते हैं?

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 मार्च 2025


 

कुणाल कामरा पर हमले से लोकतंत्र पर उठे सवाल

25 मार्च 2025 

 

कुछ महीनों के बाद स्टैंडअप कॉमेडियन कुणाल कामरा एक बार फिर खबरों में है। उनके तेजाबी हास्य-व्यंग्य से घायल होने वाले सत्तारूढ़ लोग अपने-अपने प्रदेशों में उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करते रहते हैं, और कुणाल कामरा उससे एक किस्म से बेपरवाह रहकर उसी तल्ख जुबान में तंज कसते हैं। अब ताजा मामला मुम्बई में उनके एक कार्यक्रम का है जिसकी रिकॉर्डिंग यूट्यूब पर पोस्ट की गई है। इसमें कहा जाता है कि उन्होंने इशारों में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री, और शिवसेना के एकनाथ शिंदे पर कुछ तंज कसे थे। इसे लेकर शिवसैनिकों ने जिस रिकॉर्डिंग स्टूडियो में जाकर खूब तोडफ़ोड़ की, और मुम्बई म्युनिसिपल कार्पोरेशन ने बुलडोजर भेजकर बड़े होटल के इस स्टूडियो को ध्वस्त कर दिया। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने कहा कि कुणाल कामरा ने महाराष्ट्र की जनता के चुने हुए लोगों का अपमान किया है, और शिवसेना अब कुणाल कामरा से माफी मांगने की मांग कर रही है, वरना सडक़ पर उससे निपटने की खुली धमकी दी है। शिवसेना के सांसद नरेश म्हस्के ने कहा है कि कुणाल कामरा को महाराष्ट्र ही नहीं हिन्दुस्तान में भी नहीं घूमने देंगे, शिवसैनिक पीछे लगेंगे, तो भारत छोडक़र भागना पड़ेगा, जहां भी वह दिखेगा, उसके मुंह पर कालिख पोती जाएगी। 

दो दिनों से सोशल मीडिया पर कुणाल कामरा छाए हुए हैं। उन्होंने अपनी रिकॉर्डिंग में शायद कुछ और नेताओं के बारे में भी टिप्पणी की है। वे पेशेवर कॉमेडियन हैं, और हास्य-व्यंग्य का उनका अपना एक अलग स्तर है जो बहुत से लोगों को कुछ अधिक चुभ सकता है, चुभता है। इसके पहले भी भारत में कुछ और स्टैंडअप कॉमेडियन तरह-तरह से हमले झेल चुके हैं, और उनके कार्यक्रम हो पाना अब मुमकिन नहीं रह गया है। कुछ कॉमेडियन देश के कई प्रदेशों में एफआईआर झेल रहे हैं, जो कि सत्ता की नापसंदगी के किसी भी निशाने के खिलाफ आसानी से दर्ज हो जाती है। पुलिस चूंकि राज्य का मामला रहता है, इसलिए राज्य सरकार के मातहत उसकी मर्जी पर पुलिस तेजी से ऐसी कार्रवाई करती है। मुम्बई में जिस रफ्तार से इस रिकॉर्डिंग स्टूडियो पर बुलडोजर चलाया गया है, वह भी बताता है कि भारतीय लोकतंत्र में राज्य सरकार को नाराज करना, या सत्तारूढ़ ताकतों और विचारधारा के खिलाफ कुछ बोलना या लिखना कितना भारी पड़ सकता है। अभी नागपुर के दंगों को लेकर, और कुछ दूसरे मामलों में आरोपियों पर बुलडोजर चलाने को लेकर महाराष्ट्र हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के खिलाफ नाराजगी दिखाई ही है, और उस पर रोक लगाई है, इस बीच कल शायद जिस वक्त हाईकोर्ट यह रोक लगा रहा था, उसी वक्त मुम्बई का यह रिकॉर्डिंग स्टूडियो गिराया जा रहा था। 

अब एक बुनियादी सवाल यह खड़ा होता है कि भारत जैसे लोकतंत्र में अगर जिंदा और सक्रिय नेताओं पर तंज कसना इतना खतरनाक हो चुका है, तो क्या यह लोकतंत्र की बुनियादी समझ और जरूरत के ठीक खिलाफ नहीं हैं? हम स्टैंडअप कॉमेडियनों की कई बातों से सहमत नहीं रहते। अभी कुणाल कामरा ने भी अपनी इस रिकॉर्डिंग में महिलाओं पर केन्द्रित गालियां दी हैं, किसी महिला पर निशाना भी साधा है, और उनके उस हिस्से को लेकर लोग आलोचना भी कर रहे हैं। लेकिन पेशेवर राजनेताओं को लेकर, उनका नाम लेकर या नाम लिए बिना अगर कोई व्यंग्य किया जाता है, तो उसे भी बर्दाश्त न करना लोकतंत्र के अंत की शुरूआत सरीखी है। महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे ने शिवसेना के साथ, खासकर उसके उस वक्त के मुखिया उद्धव ठाकरे के साथ जो किया था, उसे लेकर उन्हें महाराष्ट्र की राजनीति के बाहर भी गद्दार कहा गया था। यह एक अलग बात है कि विधायकों का बहुमत सत्ता में भागीदार होने के लिए उनके साथ चले गया, और आखिर में उन्हें ही असली शिवसेना होने की मान्यता मिल गई, लेकिन उन्हें गद्दार तो माना ही गया था। अब अगर उनका नाम लिए बिना एक व्यंग्यात्मक गाने में गद्दार शब्द का इस्तेमाल किया गया है, तो इसे लेकर उनकी पार्टी शिवसेना अगर कुणाल कामरा को मुम्बई में रहने न देने की बात कह रही है, जहां दिखें वहां मुंह काला करने की बात कह रही है, और ऐसी हिंसा कर रही है जो कि किसी सत्तारूढ़ पार्टी को शोभा नहीं देती, तो क्या यह लोकतंत्र रह गया है? 

लोकतंत्र में राज्य सरकार हांकने वाली पार्टी या गठबंधन को पुलिस के स्तर पर असाधारण अधिकार मिले रहते हैं। इनका सबसे बेजा इस्तेमाल भी अदालत में जवाबदेह ठहराए जाने के पहले नापसंद लोगों की जिंदगी को तबाह कर ही सकता है, और भारत के कई राज्यों में जिस तरह सत्ता के अहंकार, और उसके गुंडागर्दी में बुलडोजर-इंसाफ जारी रखा हुआ है, वह सुप्रीम कोर्ट के मुंह पर एक तमाचा भी है। सुप्रीम कोर्ट को अपनी औकात के बारे में एक बार सोचना चाहिए कि उसकी बार-बार की चेतावनियां, और बार-बार के फैसले-आदेश इसी महाराष्ट्र में पिछले दो-तीन दिनों में लगतार किस तरह बुलडोजर से नेस्तनाबूत किए जा रहे हैं, इसमें उसके सामने अब क्या विकल्प बचते हैं? क्या वह धमकाने वाले नेताओं को कटघरे में ला सकता है, क्या वह बुलडोजर भेजने वाले अफसरों को जेल भेज सकता है? क्या वह सरकार या म्युनिसिपल पर मोटा जुर्माना लगा सकता है, या फिर वह महज अपनी हेठी देखकर चुप बैठे रह सकता है? और हमारे सामने आज का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट की बेइज्जती का नहीं है, लोकतंत्र की बेइज्जती का है। कुणाल कामरा की कही बातें अगर किसी की मानहानि हैं, तो उसके लिए देश में मानहानि का कानून है। अगर उससे कोई धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं, तो उसके लिए भी अलग कानून है। लेकिन किसी भी नापसंद बात के लिए बुलडोजर भेज देना, किसी इमारत को गिरा देना, किसी भी तरह से लोकतांत्रिक नहीं है। महाराष्ट्र जैसी ताकतवर सरकार के पास, और उसके नेताओं के पास कानून की बहुत बड़ी ताकत है, ऐसे में अपनी पार्टी के हिंसक और अराजक कार्यकर्ताओं को भेजकर सडक़ की लड़ाई लडऩा सत्तारूढ़ पार्टी का काम नहीं लगता, यह विपक्ष का तेवर अधिक लगता है। कहने के लिए महाराष्ट्र पुलिस ने तोडफ़ोड़ करने वाले कुछ शिवसैनिकों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की है, लेकिन मानो उन्हीं की मदद करने के लिए उनके निशाने को गिराने के लिए बुलडोजर भी भेजा था। एक कॉमेडियन लोकतंत्र में बहुत बड़ी बहस का सामान नहीं होना चाहिए था, लोकतंत्र एक बड़ी लचीली व्यवस्था है, और उसमें व्यंग्य की पर्याप्त जगह रहनी चाहिए। यह वह हिन्दुस्तान है, जहां हिन्दू धर्म के भीतर नास्तिकों के लिए भी पर्याप्त मान्यता है। लोकतंत्र में असहमति और आलोचना का जवाब देने के लोकतांत्रिक तरीके होने चाहिए, जब यह जवाब हिंसा से, और बुलडोजर से दिए जाते हैं, तो यह समझ पड़ता है कि सत्ता के पास इनके खिलाफ कोई तर्क नहीं हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 मार्च 2025



 

आर्थिक कामयाबी का मॉडल बांग्लादेश अब खाई की ओर

 24 मार्च 2025 

 

पिछले बरस सत्तापलट के बाद बांग्लादेश की नई अंतरिम सरकार वहां की अर्थव्यवस्था को संभाल नहीं पा रही है, जबकि एक अर्थशास्त्री मो.युनूस सरकार के मुखिया हैं, और बिना ओहदे के वे प्रधानमंत्री की तरह सब कुछ देख रहे हैं। जो टेक्सटाइल उद्योग बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी बना हुआ था, वह एकदम से चरमरा गया है, पूरी दुनिया की दर्जनों बड़े-बड़े ब्रांड के कपड़ों, जूतों, और खेल के सामानों की सिलाई बांग्लादेश में होती थी, और अब वह सिलसिला खतरे में पड़ गया है। यह उद्योग अकेला इस छोटे से देश में 40 लाख से अधिक कामगारों को रोजगार दे रहा था, और करीब 2 करोड़ लोग इससे जुड़े हुए दूसरे रोजगारों में लगे हुए थे। अब हालत यह है कि वहां लाखों लोगों का काम छूट रहा है, क्योंकि शेख हसीना सरकार के हटा दिए जाने के बाद 7 महीने में ही करीब डेढ़ सौ सिलाई कारखाने बंद हो चुके हैं, और मजदूर रमजान और ईद के इस मौके पर भी बिना मजदूरी पाए हुए बेरोजगार हो चुका हैं, या बेरोजगारी का खतरा झेल रहे हैं। देश बड़ी आर्थिक मंदी से गुजर रहा है, राजनीतिक अस्थिरता का शिकार है, धर्मान्ध और साम्प्रदायिक संगठन देश के राज-काज पर हावी हैं, और राजनीतिक ब दले की भावना इतनी अधिक है कि शेख हसीना के समर्थकों और सहयोगियों के कारखानों को घोषित-अघोषित रूप से बंद करवा दिया गया है। बांग्लादेश का सिलाई उद्योग ऐसा था जिसमें काम सीखी हुई महिलाओं का अनुपात सबसे बड़ा था, लेकिन झंझावात से गुजर रहे इस देश में आज सब कुछ चौपट हो गया दिख रहा है। प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार को हटाते समय लोगों को बड़े सुनहरे सपने दिख रहे थे, वो तमाम अब धूल-मिट्टी में मिल गए हैं। 

एक तो पूरी दुनिया ट्रम्प नाम के बवंडर को झेल रही है, लोगों की आंखों में धूल भर गई है, और किसी को भविष्य दिखाई नहीं पड़ रहा है। ऐसे में कोई देश अगर इस वैश्विक अस्थिरता से परे अपनी घरेलू अस्थिरता को भी झेल रहा है, तो उस पर दोहरी मार पड़ रही है। दुनिया का दर्जी बना हुआ बांग्लादेश अभी दो-चार बरस पहले ही प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत से आगे निकल गया था, उसे सर्विस सेक्टर की कामयाबी की एक बड़ी शानदार मिसाल माना जा रहा था, और आज सब कुछ चौपट हो गया है। इस नौबत से न सिर्फ वहां की सरकार को, बल्कि पूरी दुनिया को बहुत कुछ सीखने का एक मौका मिल रहा है। 

शेख हसीना की सरकार एक निर्वाचित सरकार थी, उसमें चाहे दर्जनों खामियां रही हों, वह एक चुनाव प्रक्रिया से गुजरकर सत्ता पर पहुंची थी। लेकिन उन्हें हटाना सडक़ के एक आंदोलन के रास्ते हुआ, बांग्लादेश की बहुत सी ताकतें मिल गई थीं, जो कि किसी भी कीमत पर हसीना को हटाना चाहती थीं, और उन्हें जान बचाकर फौजी हेलीकॉप्टर में भारत आकर शरण लेनी पड़ी थी। किसी भी देश के लिए वे नजारे अच्छे नहीं थे जब वहां के आंदोलनकारी प्रधानमंत्री आवास में घुसकर उनके अंत:वस्त्र हवा में लहराते हुए घूम रहे थे। बांग्लादेश शेख हसीना के पहले भी फौजी हुकूमत भी झेल चुका है, और नेताओं पर तरह-तरह के मुकदमे भी झेल चुका है। इसलिए शेख हसीना को अगर किसी चुनाव में हटाया जाता, या किसी अदालती फैसले से उनके खिलाफ कोई कार्रवाई होती, तो भी ठीक था। उन्हें सडक़ के एक आंदोलन के रास्ते हटाया गया, और वहां न किसी विकल्प का कोई इंतजाम था, और न ही किसी और तरह के शासनतंत्र की तैयारी थी। ऐसे में नोबल शांति पुरस्कार प्राप्त मो.युनूस एक बड़ी अप्रिय स्थिति और कड़ी चुनौती में फंस गए हैं। 

फिर इस मुसीबत में मानो और इजाफा करने के लिए बांग्लादेश में आज सत्तापलट के दिन से ही जो भारतविरोधी और हिन्दूविरोधी भावनाएं हिंसा कर रही हैं, वह बांग्लादेश के लिए आत्मघाती है। वहां तो हिन्दू और भारतीय मूल के लोग लाखों में होंगे, लेकिन भारत में बांग्लादेशी लोग करोड़ों में हैं। यह तो भारत में अभी तनाव काबू में है, वरना बांग्लादेश के जवाब में अगर भारत में हिंसा होने लगती, तो क्या होता? आज की वहां की सत्ता अनुभवहीन है, और उसे यह समझ भी नहीं पड़ रहा है कि मददगार बनकर खड़े हुए चीन, और बांग्लादेश का राष्ट्र निर्माण करने वाले हिन्दुस्तान के बीच किस तरह से फर्क किया जाए। आज हालत यह है कि बांग्लादेश पाकिस्तान के करीब जा रहा है, जिससे अलग होकर 1971 में वह बना था, और भारत की मदद से बना था। आज बांग्लादेश की घरेलू राजनीति में भारत को लेकर जो तनातनी चल रही है, वह भी उसके खुद के लिए नुकसानदेह है। उसका सबसे बड़ा पड़ोसी, और मददगार-दोस्त आज उसकी घरेलू राजनीति को लेकर कई तरह की तोहमतें झेल रहा है, जबकि इस आधी सदी में भारत ने अपने सीने पर बड़ा बोझ झेलते हुए भी करोड़ों बांग्लादेशियों को अपने देश में जगह दी, और कई करोड़ तो नागरिकता भी पा चुके हैं, या कम से कम काम-धंधे से लगे हुए हैं। 

खैर, दूसरे देशों के साथ रिश्तों की बातों को पल भर के लिए किनारे भी कर दें, तो बांग्लादेश आज घरेलू मोर्चे पर एक कामयाब अर्थव्यवस्था से एक चौपट अर्थव्यवस्था तक कुछ महीनों में ही पहुंच गया है, जो कि उसके लिए एक राजनीतिक खतरे की बात भी है। कब वहां की जनता बाहुबल से एक और सत्तापलट सोचने लगे, इसका कोई ठिकाना नहीं है, और वहां की हवा में ऐसी तोहमतें भी तैर रही हैं कि वहां की फौज इस मौजूदा अंतरिम सरकार को पलटाना चाहती है। हम राजनीतिक नफरत और साम्प्रदायिकता से देश की हवा में जहर घोलने का जो नुकसान बांग्लादेश में देख रहे हैं, उससे वह देश आसानी से नहीं उबर पाएगा। पिछली सरकार के करीबी या पसंदीदा कहे जाने वाले लोग अगर बांग्लादेश में कारखानेदार हैं, तो सत्तापलट होने के बाद उन कारखानों को बंद करवा देना अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने सरीखा काम है। हमने अभी-अभी पाकिस्तान को कंगाल होते देखा है, श्रीलंका को कंगाल होते देखा है, म्यांमार खत्म हो चुका है, और अब लगता है कि बांग्लादेश की बारी है। अभी हम बांग्लादेश से भारत पर पडऩे वाले फर्क की चर्चा करना नहीं चाहते, खुद बांग्लादेश की फिक्र पहले कर रहे हैं। इस देश को यह समझना होगा कि अल्पसंख्यकों के साथ हिंसा करके, भारतीय मूल के लोगों को भगाने की बातें करके, राजनीतिक कटुता से कारखाने बंद करवाकर बांग्लादेश की सरकार देश को गहरी खाई में ही ले जा रही है। हर देश को ऐसी नौबत के सबक समझने चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 मार्च 2025



 

हाईकोर्ट का एक के बाद दूसरा जज फजीहत पैदा करने इतना आमादा क्यों?

23 मार्च 2025 

 

दिल्ली हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के बंगले में लगी आग, और वहां से बोरियां भर-भरकर मिले अधजले नोटों से न सिर्फ देश की न्यायपालिका हिल गई है, बल्कि लोकतंत्र के ढांचे में दरारें नजर आ रही हैं। अब कहने के लिए जस्टिस वर्मा कई तरह की सफाई दे रहे हैं कि ये नोट उनके नहीं हैं, लेकिन हाल के बरसों का उनका इतिहास भी इन नोटों को लेकर कई तरह के सवाल खड़े कर रहा है। वे जिस तरह के मामलों में उलझे हुए थे, उनसे सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने उन्हें बचाया था, लेकिन अब अधजले नोटों के ढेर के बाद वह विवाद फिर से खड़ा हो रहा है। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस नोटकांड की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के बाद दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से कहा है कि जस्टिस वर्मा को कोई काम न दिया जाए, और तीन अलग-अलग हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों की एक जांच कमेटी इस मामले में बनाई है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा है कि जस्टिस वर्मा अपना मोबाइल फोन इधर-उधर न करें, उसमें कुछ डिलिट न करें, और कोई न्यायिक काम न करें। 

इस मौके पर एक पुराना विवाद कफन फाडक़र आ खड़ा हुआ है कि किस तरह यह जज सीबीआई के एक दूसरे मामले में जांच के घेरे में था, और उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने दखल देकर यशवंत वर्मा को बचाया था। यह मामला एक शक्कर कारखाने की बैंक जालसाजी को लेकर था, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश दिया था, और यशवंत वर्मा उस समय उस शक्कर कारखाने के एक गैरकार्यकारी डायरेक्टर थे, और एफआईआर में उनका भी नाम था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को पलटा, और सीबीआई जांच बंद कर दी गई। इस डिफाल्टर कंपनी को बैंक लोन क्यों देते रहे, इसकी जांच होनी थी, लेकिन वह भी नहीं हो पाई थी। जस्टिस वर्मा दिल्ली हाईकोर्ट में दिल्ली सरकार के शराब घोटाले जैसे कई नाजुक मामलों की सुनवाई कर रहे थे, और अब सुप्रीम कोर्ट उनके पिछले फैसलों को भी देखने जा रहा है। पहले यह खबर आई थी कि नोट जलने के इस कांड के बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया है, जहां से वे दिल्ली हाईकोर्ट आए थे, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ किया कि इलाहाबाद भेजने के फैसले का इस नोटकांड से लेना-देना नहीं है, और वह फैसला पहले लिया गया था। उधर इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकीलों के संगठन जस्टिस वर्मा को दागी मानते हुए उन्हें इलाहाबाद भेजने का सार्वजनिक तौर पर विरोध कर रहे हैं। 

इलाहाबाद हाईकोर्ट से जुड़ा हुआ यह तीसरा विवाद पिछले तीन महीनों में सामने आया है। दिसंबर के महीने में हाईकोर्ट परिसर में ही विश्व हिन्दू परिषद के एक कार्यक्रम में वहां के जस्टिस यादव ने मंच और माईक से यह कहा था कि यह देश बहुसंख्यक समुदाय के मुताबिक चलेगा, और इसी भाषण में उन्होंने मुस्लिमों को गंदी और नफरती गालियां दी थीं। बाद में यह कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उन्हें बुलाकर समझाईश दी थी, और अपना बयान वापिस लेने को कहा था। दूसरा मामला अभी तीन दिन पहले ही सामने आया जब सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों के खिलाफ जाकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज, जस्टिस मिश्रा ने यह फैसला दिया कि दो बालिग लोग एक नाबालिग बच्ची को पुल के नीचे घसीटकर ले गए, उसका सीना भींचते रहे, और उसके पजामे का नाड़ा तोड़ दिया, लेकिन उसे बलात्कार का प्रयास नहीं माना जा सकता। इस फैसले के खिलाफ हमने अगले ही दिन अपने अखबार के यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल, पर जमकर कहा था, और देश में कई बड़े वकीलों ने, केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री ने, और भी बहुत से तबकों ने इस फैसले के खिलाफ आवाज उठाई है, और सुप्रीम कोर्ट से इसे तुरंत खारिज करने को कहा है। 

अदालतों के जज अपनी साम्प्रदायिकता से, धर्मान्धता और नफरत से, संवेदनशून्यता से, या कि भ्रष्टाचार से, जब-जब विवादों में फंसते हैं, लोगों का भरोसा अदालतों पर से कुछ और हद तक घट जाता है। आज भी अदालतों के जो तौर-तरीके रहते हैं, वहां जो वक्त लगता है, सब कुछ जितना खर्चीला हो गया है, बड़े जजों के जो तेवर रहते हैं, उन सबको देखकर आम जनता के बीच बड़ी अदालतों के लिए अधिक सम्मान नहीं बच जाता। फिर इसके साथ-साथ जब कभी कोई जज सत्ता को खुश करने वाले फैसले देते हैं, और रिटायर होते ही तुरंत राजभवन, राज्यसभा, या मोटी सुख-सुविधाओं वाले किसी ओहदे पर चले जाते हैं, तो भी जनता उसे देखती ही है। जब सुप्रीम कोर्ट के एक मुख्य न्यायाधीश उनके खिलाफ मातहत कर्मचारी द्वारा की गई यौन शोषण की शिकायत की सुनवाई करने खुद ही बेंच के मुखिया बनकर बैठ जाते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट की इज्जत मिट्टी में मिल जाती है, और उसकी साख पर किसी का भरोसा नहीं बचता। फिर यही जज रिटायर होते ही, सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा राज्यसभा भेज दिए जाते हैं, तो लोग उनके राम मंदिर के फैसले को भी उससे जोडक़र देखते हैं, और लोगों को यह याद पड़ता है कि ऊंचे ओहदों पर बैठे हुए लोगों के चाल-चलन के लिए रामराज्य से किस तरह के पैमाने चले आ रहे हैं। फिर बिना किसी जरूरत के जब देश का एक मुख्य न्यायाधीश अपने घर की गणपति पूजा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अकेले आमंत्रित करता है, और फिर जज और उनकी पत्नी के साथ पीएम का आरती का वीडियो जारी होता है, तो लोगों को लगता है कि महाराष्ट्र चुनाव के ठीक पहले महाराष्ट्रियन टोपी लगाए मोदी एक महाराष्ट्रियन जज के घर पर गणपति पूजा कर रहे हैं, तो वह एक किस्म से चुनावी फायदा भी है, तो भी जज सवालों के घेरे में आ जाते  हैं। 

यह तो इस ताजा नोटकांड की प्रारंभिक जांच के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सख्त तेवर दिखाए हैं, और जांच रिपोर्ट को भी तुरंत अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक कर दिया है, इसलिए जनता के मन में बेचैनी अभी सीमित है। लेकिन यह बात साफ है कि भारत की न्यायपालिका को अपने चाल-चलन और तौर-तरीकों को अधिक सुरक्षित बनाना होगा। वह बात बहुत पुरानी नहीं है जब देश के एक भूतपूर्व कानून मंत्री, और सुप्रीम कोर्ट के बड़े वकील शांतिभूषण, और उनके चर्चित वकील बेटे प्रशांत भूषण को सुप्रीम कोर्ट में अवमानना के आरोप में कटघरे में बुलाया गया था, क्योंकि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आधा दर्जन जजों के भ्रष्ट होने का आरोप लगाया था। उस पर कई चेतावनियां देने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट उन्हें कोई सजा नहीं दे पाया था, और उस मामले को सहूलियत के साथ भुला दिया गया। अब अदालत को सावधान रहना चाहिए कि जजों को अपनी साख भी बचाकर रखनी चाहिए, ताकि लोकतंत्र के तीन में से इस एक स्तंभ पर जनता का भरोसा बना रहे, बाकी दो स्तंभों पर तो वह डांवाडोल हो ही चुका है।  

(Daily Chhattisgarh)

घरेलू बलात्कारियों को बचाने परिवार लेते हैं इज्जत की आड़

 23  मार्च 2025 

राजस्थान के नागौर जिले से आई एक ताजा खबर बताती है कि इस देश में लड़कियों और महिलाओं की क्या हालत है। वहां घर के एक नशेड़ी नौजवान ने अपनी सगी छोटी नाबालिग बहन से बलात्कार किया, और कई दिन तक करते रहा। लडक़ी ने मां को यह बताया तो परिवार के बेटे की बदनामी का हवाला देकर उसे चुप करा दिया गया। बाद में उस लडक़ी को अहसास हुआ कि बदनामी की ऐसी बात सोचकर परिवार उसके कत्ल की साजिश कर रहा है। तब उसने अपने बहन-जीजा को फोन पर पूरी जानकारी दी, और उन्होंने आकर पुलिस में पाक्सो एक्ट के तहत लडक़ी के भाई पर मामला दर्ज करवाया। हिन्दुस्तान में हर परिवार बेटी की हत्या तक चले जाए, यह तो जरूरी नहीं है, लेकिन इतना तो है कि बलात्कारी बेटे से परिवार अपनी इज्जत जोड़ लेता है, और ऐसे बहुत से दूसरे मामलों में परिवार घर की लड़कियों को चुप करने पर पिल पड़ते हैं। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, यूपी जैसे कई प्रदेश हैं जहां समय-समय पर परिवार द्वारा प्रेमविवाह करने वाली लडक़ी का कत्ल करवा दिया जाता है, और कई मामलों में उसके प्रेमी को भी खत्म कर दिया जाता है। जात-बिरादरी का, और मर्दाना अहंकार इतना भयानक और हिंसक रहता है कि वह अपनी जवान बेटी को खत्म करने के लिए बाप-भाई का जेल जाना भी बुरा नहीं समझता। ऐसे हत्यारे परिवार सीना ताने अदालत और जेल चले जाते हैं। 

परिवार की इज्जत, ये तीन शब्द जुल्म और जुर्म बनकर आमतौर पर लड़कियों और महिलाओं पर ही टूट पड़ते हैं। लडक़ी या महिला से कोई बलात्कार करे तो इसमें बलात्कारी की इज्जत खराब होना नहीं माना जाता, लडक़ी की इज्जत लुट जाना कहा जाता है, मानो उसने अपने खुद पर कोई जुर्म कर दिया हो। यह सोच भारत में लड़कियों के आगे बढऩे की संभावनाओं को कमजोर करती है, क्योंकि उसकी ‘इज्जत लुट जाने की आशंका में उसके आगे बढऩे के मौकों को किनारे कर दिया जाता है, उसे रोक-टोक दिया जाता है। खुद लड़कियां परिवार के भीतर से लेकर पड़ोसियों, और शिक्षक-प्रशिक्षक के हाथों तक नुचती हुईं आत्मविश्वास खोने लगती हैं, और सहमी सी किनारे रह जाती हैं। हर लडक़ी विपरीत परिस्थितियों से इतना जूझकर, घर-बाहर की मर्दाना हिंसा का सामना करते हुए आगे बढऩे का हौसला नहीं जुटा पातीं। अभी हाथरस के एक प्रोफेसर का मामला लगातार खबरों में बना हुआ है कि किस तरह उसने अपने दर्जनों छात्राओं का यौन-शोषण किया, उनके वीडियो बनाए, ब्लैकमेल किया, और उनके मार्फत उनकी सहेलियों तक को बुलवाया। लोगों को याद होना चाहिए कि दशकों पहले अजमेर में भी इसी तरह का एक बहुत बड़ा सेक्स-कांड हुआ था जिसमें सैकड़ों लड़कियों का शोषण अजमेर की विख्यात दरगाह के खादिम परिवार से जुड़े हुए लोगें ने किया था। अब हाथरस में एक अकेला प्रोफेसर अपने दम पर यह करते मिला है। यह बात आसानी से सोची जा सकती है कि ऐसी एक-एक घटना के बाद जाने कितने ऐसे परिवार होंगे जो अपनी लड़कियों के आगे बढऩे की संभावनाओं को खुद ही रोकना बेहतर समझेंगे। 

हिन्दुस्तान में लडक़े और लडक़ी के बीच का यह फर्क परिवार से ही शुरू होता है, और बड़ों के बर्ताव देख-देखकर परिवार ने लडक़े मर्द बनने पर जुल्म करना, और लड़कियां महिला बनने पर जुल्म सहना सीख जाते हैं। अपने परिवार के बड़े लोगों का बर्ताव उनके लिए सबसे बड़ी सीख बन जाता है। यह सिलसिला घर से शुरू होता है, तो कामकाज की जगहों पर भी चले जाता है, और वहां पर ऐसे घरों से निकले हुए मर्द सहकर्मी महिलाओं से बदसलूकी, और उनके शोषण को अपना हक मान लेते हैं। और समाज में यह व्यवस्था पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहती है। 

राजस्थान के नागौर का यह ताजा मामला खबर में आने की वजह से तो चौंकाता है, लेकिन जो लोग असल जिंदगी में अप्रिय बातों को देखने से परहेज नहीं करते हैं, उन्हें मालूम है कि घर की लडक़ी या बच्चों का यौन-शोषण कोई बहुत अनहोनी या अनोखी बात नहीं है, लोगों की कल्पना से अधिक मामलों में ऐसा होता है, यह एक अलग बात है कि अधिकतर मामले घर के भीतर दबा दिए जाते हैं, और यौन-शोषण के शिकार बच्चों, आमतौर पर लड़कियों, को समझा दिया जाता है कि परिवार की इज्जत का ध्यान रखना है। बिना सजा बच जाने वाले ऐसे यौन-शोषक लोगों का हौसला बढ़ते चलता है, और फिर वे घर-दफ्तर, बाजार-रोजगार, जहां-जहां मौका मिले, वहां-वहां हाथ साफ करने लगते हैं। 

एक बात जो कि ऐसे मामलों से अनिवार्य रूप से तो जुड़ी हुई नहीं है, लेकिन ऐसे बहुत से मामलों में उसका जिक्र आता ही है, वह नशे की आदत है। नशे में डूबे हुए लोग अपनी बहन से, बेटी से बलात्कार करते हुए पकड़ाते हैं। घर के भीतर यौन-शोषण बिना नशे के भी हो सकता है, लेकिन नशा लोगों को एक अलग किस्म की नैतिक अराजकता, और हिंसा दे देता है जिसकी वजह से वे वर्जित संबंधों की सीमाओं को आसानी से पार कर जाते हैं। 

ऐसे मामलों में पड़ोस के लोग, रिश्तेदार, सहकर्मी, समय रहते लोगों को सावधान कर सकते हैं, या ऐसे मामलों को दबने से भी रोक सकते हैं। यौन-शोषण का एक मामला उजागर होने के बाद ऐसी हिंसक हसरत रखने वाले कई दूसरे लोगों का हौसला पस्त कर सकता है, दूसरी तरफ ऐसे एक हमले के बाद बच गए लोग आगे सिलसिलेवार बलात्कारी बन सकते हैं। इसलिए परिवार की इज्जत वगैरह की ऐसी परवाह नहीं करना चाहिए कि एक बलात्कार को छुपाकर बलात्कारी को बाकी दुनिया में खुला छोड़ दिया जाए। इस बारे में समाज के लोगों को सोचना चाहिए कि वे तमाम लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए इन मुद्दों पर किन मंचों पर चर्चा करें। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 मार्च 2025



 

गाजा के मलबे से अधिक बड़ा मलबा बन चुका है अमरीकी लोकतंत्र...

  22 मार्च 2025 

 

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प को काम संभाले दो महीने हुए हैं, लेकिन इस बीच ज्वालामुखी से निकलते पिघले और जलते लावे की तरह उनके बयान उनके मुंह से निकलते हैं, जो कि धरती के अधिकतर हिस्से को भूकम्प की तरह हिला रहे हैं। न सिर्फ अमरीका, बल्कि दुनिया के इतिहास में किसी और निर्वाचित नेता या तानाशाह ने दो महीनों में ऐसी उथल-पुथल नहीं मचाई थी। दुनिया के शेयर बाजार उन घंटों का इंतजार करते हैं जिन घंटों में आमतौर पर ट्रम्प मीनार पर चढक़र फतवे जारी करते हैं। ट्रम्प के उठने के वक्त के साथ ही दुनिया की बेचैनी शुरू हो जाती है, जो कि ट्रम्प के सोने के बाद कुछ घंटों के लिए थमती है। अभी ऐसा कोई सर्वे तो सामने नहीं आया है, लेकिन हमारा ऐसा मानना है कि ट्रम्प को चुनने वाली अमरीकी जनता कुछ उसी तरह हक्का-बक्का होगी जिस तरह ब्रेक्जिट के पक्ष में वोट देने के बाद अगले ही दिन से ब्रिटिश जनता हो गई थी कि उसने यह क्या कर दिया। अमरीका, और बाकी दुनिया के लिए इस मवाली के राष्ट्रपति बनने के बाद राहत की एक ही बात है कि अब उसका कार्यकाल दो महीने कम बचा है, लेकिन तीन साल दस महीने तो बचा ही है।

डोनल्ड ट्रम्प वैसे तो पहले भी अमरीका का राष्ट्रपति रह चुका है, लेकिन उस कार्यकाल में उसने तानाशाही का यह मिजाज नहीं दिखाया था, जो वह इस दूसरे, और आखिरी कार्यकाल में दिखा रहा है। उसमें एक लोकतांत्रिक होने का दंभ भरने वाले देश का राष्ट्रपति होने का कोई शऊर तो है नहीं, उसमें गुंडागर्दी इस तरह कूट-कूटकर भरी है कि दुनिया इस मिसाल को आसानी से नहीं भूलेगी। बाकी दुनिया से अलग-थलग रहने वाले किसी देश में तानाशाह का ऐसा मिजाज रहा होगा, लेकिन पूरी दुनिया को प्रभावित करने वाली ऐसी तानाशाही हिटलर के बाद पहली बार सामने आई है जिसने पूरी दुनिया को अपनी-अपनी हिफाजत के बारे में सोचने को मजबूर कर दिया है। इस अमरीका के सबसे करीबी फौजी और कारोबारी साथी, नाटो के दूसरे सदस्य, और तमाम यूरोपीय देश इस बात को लेकर हक्का-बक्का हैं कि उनकी पीठ में इतने गहरे छुरा भोंकने वाले ट्रम्प की खड़ी की हुई नौबत से वे कैसे उबरेंगे? योरप के सबसे बड़े दुश्मन रूस से अमरीका की परंपरागत दुश्मनी को ट्रम्प ने जिस तरह पल भर में यारी में बदल दिया है, और पीढिय़ों के यार योरप को जिस तरह खड्ड में धक्का दे दिया है, उससे एक असाधारण और अभूतपूर्व स्थिति पैदा हुई है। इससे उबरना आसान नहीं है, और शायद अगले कई बरस तक मुमकिन भी नहीं है। योरप जिसे अपनी हिफाजत मानकर चल रहा था, वह अब योरप के ही एक देश ग्रीनलैंड पर फौजी कब्जे की खुली धमकी दे रहा है। नाटो के नियमों के मुताबिक उसके किसी भी सदस्य देश पर कोई हमला होने पर सारे नाटो देश एक साथ मिलकर उसका मुकाबला करेंगे, ग्रीनलैंड पर फौजी कब्जा करने की ट्रम्प की घोषणा के बाद यह समझना मुश्किल है कि जब अमरीकी फौजें ग्रीनलैंड पर कब्जा करेंगी, तो नाटो की सामूहिक जिम्मेदारी के चलते क्या अमरीकी फौजें वहां ग्रीनलैंड को बचाने का काम भी करेंगी? क्या ग्रीनलैंड को लेकर अमरीका मोर्चे के दोनों तरफ अपनी फौजें भेजेगा?

लेकिन हम एक ताजा बात को लेकर आज ट्रम्प जैसे घटिया इंसान पर एक बार फिर लिख रहे हैं। उसने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि वह रूस और यूक्रेन की जंग 24 घंटों में रूकवा देगा। अब कई तरह के तेवर दिखाने के बाद, और यूक्रेन को लगातार धमकाने के बाद, उससे उसके दुर्लभ खनिजों की खदानें बंदूक की नोंक पर मांगने के बाद अब ट्रम्प ने यूक्रेन से कहा है कि अगर उसे अपने बिजलीघरों को रूसी हमलों से बचाना है, तो उसे ये बिजलीघर अमरीका को दे देना चाहिए! एक तरफ अमरीका बिना यूक्रेन के सीधे रूस से युद्धविराम की बात कर रहा है कि इस जंग को कैसे रोका जाए, और इस तानाशाही के बीच वह यूक्रेन को तरह-तरह से धमका रहा है। अब तक अमरीका से उसे मिली फौजी और दूसरी मदद के एवज में वह यूक्रेन के खनिजों के भंडार अमरीका को देने के लिए उसकी बांह मरोड़ रहा है। अब यह कहना कि उसे रूसी हमलों से अपने बिजलीघरों को बचाने के लिए उन्हें अमरीका को दे देना चाहिए, और इससे उसे बेहतर सुरक्षा मिल सकेगी, यह बात एक गुंडे की जुबान ही है जो कि पहले किसी जमीन पर अवैध कब्जा करता है, और फिर उसके मालिक को कहता है कि जमीन उसे बेच दे। 

ट्रम्प ने ठीक यही मिजाज फिलीस्तीन को लेकर दिखाया है। गाजा में इजराइली हमलों में 40 हजार के करीब फिलीस्तीनियों के मारे जाने के बाद ट्रम्प ने राष्ट्रपति बनने के कुछ दिनों के भीतर ही यह मुनादी की कि इजराइल गाजा को अमरीका को दे देगा, और अमरीका वहां पर अरब दुनिया की एक बड़ी सैरगाह बनाएगा। किसी देश को लेकर गुंडे का सरदार-यार यह जुबान कहे कि उस देश के लोगों को दूसरे देशों में बसाया जाएगा, और वहां पर सैरगाह बनाई जाएगी, तो इससे समझ पड़ता है कि जिस तरह गाजा शहर दुनिया के सबसे बड़े मलबे में तब्दील हो चुका है, उसी तरह अमरीका के लोकतांत्रिक मूल्य उससे बड़ा मलबा बन चुके हैं। देश के भीतर, और बाकी दुनिया में ट्रम्प की जो हमलावर सोच चल रही है, उसमें अब कोई भी महफूज नहीं है। दुनिया के किसी भी देश, कारोबार, या इलाके पर अमरीका का हमला अब महज वक्त और जरूरत की बात है, ऐसे हमले की उसे जरूरत कितनी है, और उसके पास पहले किस पर हमला करने के लिए वक्त निकलता है। ट्रम्प एक मवाली भूमाफिया के अंदाज में बार-बार यह फतवा दे रहा है कि कनाडा अमरीका का राज्य बन जाए। कल तक जो कनाडा अमरीका का एक सहयोगी दोस्त देश था, उसे आज ट्रम्प ने एक ऐसा दुश्मन बना दिया है, कि वहां का नया प्रधानमंत्री परंपरा को छोडक़र पहले दूसरे किसी देश जा रहा है, जबकि इसके पहले वहां का हर पीएम अमरीका प्रवास से ही विदेश यात्रा शुरू करता था। 

ट्रम्प अपनी रीढ़ की हड्डी के भीतर के बोन-मैरो की गहराई तक एक मवाली है, भूमाफिया है, बदचलन पूंजीवादी है, इंसानियत उसे छू भी नहीं गई है, लोकतंत्र को लेकर उसकी गहरी हिकारत है, वह दुनिया में जलवायु परिवर्तन को सबसे बड़ी हरी-धोखाधड़ी कहता है। इस ट्रम्प के तीन बरस दस महीने के बकाया कार्यकाल में इंसानियत से लेकर लोकतंत्र तक, आधुनिक सभ्यता के तमाम बेहतर मूल्यों को अपनी चमड़ी बचाकर छुपकर रहना चाहिए। उसके बाद अमरीका में लोकतंत्र लौट पाता है या नहीं, यह अगले चुनाव से तय होगा। इस मवाली की नजरों से वे ही लोग बचे रह सकते हैं जिनके पास लूटने के लायक कोई बड़ी दौलत या जागीर नहीं है। लोग कहते हैं कि बुरा करने का नतीजा बुरा ही निकलता है। अमरीका ने इजराइलियों को बम दे-देकर बेकसूर फिलीस्तीनियों को जिस हद तक मौत दी है, उसका कुछ तो बुरा नतीजा निकलना ही था, लेकिन ट्रम्प की शक्ल में अमरीकी लोकतंत्र को, और उसके साथी देशों को हो रहे नुकसान ने तो एक नया ही अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड कायम किया है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 मार्च 2025



 

कर्नाटक के पानी में ऐसा क्या है कि वहां हर पार्टी के नेता हनी ट्रैप में फंसे?

 21 मार्च 2025 

 

कर्नाटक विधानसभा में कल यह मामला उठा कि कई दलों के नेताओं को हनी ट्रैप में फंसाया गया है। अंग्रेजी के इस शब्द का मतलब हिन्दी में रूपजाल हो सकता है जिसमें कोई सुंदरी साजिश के तहत किसी मर्द को फंसाए, और उसके साथ सेक्स का वीडियो बना ले। ऐसा काम कोई एक अकेली महिला भी कर सकती है, या उसके पीछे कोई एक गिरोह भी हो सकता है। यह भी हो सकता है कि इन औरत-मर्द को ऐसे किसी जाल की खबर न हो, और कोई खुफिया कैमरा लगाकर ऐसी रिकॉर्डिंग कर ली जाए। फिलहाल कर्नाटक में राजनीति उबल रही है कि तरह-तरह से नेताओं को फंसाया गया है, जिसमें राज्य के मंत्रियों से लेकर केन्द्र सरकार में कर्नाटक से गए मंत्रियों तक, दर्जनों के नाम हैं। लोगों को याद होगा कि लोकसभा चुनाव के पहले भी कर्नाटक में सेक्स-पेनड्राइव का मामला सामने आया था जिसमें देश के एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री एच.डी.देवेगौड़ा के विधायक बेटे, और सांसद पोते की सेक्स फिल्में थीं। सैकड़ों महिलाओं के साथ ऐसे वीडियो क्लिप वाले पेनड्राइव राजधानी बेंगलुरू में जगह-जगह सार्वजनिक रूप से छोड़ दिए गए थे, और इनमें से बहुत से सेक्स वीडियो ऐसे थे जिनमें महिलाएं उनके साथ जबर्दस्ती सेक्स न करने के लिए गिड़गिड़ा रही हैं, और उन पर बलपूर्वक यौन हमला किया गया। उस वक्त यह बात भी सामने आई थी कि देवेगौड़ा की जानकारी में महीनों पहले से उनके बेटे और पोते की करतूतें पार्टी के नेता लाते जा रहे थे, लेकिन देश का भूतपूर्व प्रधानमंत्री इस मामले में बेपरवाह था, बेशर्म था, और पुत्रमोह और पोतामोह में उसे दिखाई देना बंद हो चुका था। अभी उस मामले की जांच चल ही रही है, लेकिन जैसा कि राजनीति में होता है, जांच एजेंसियां यह देखकर काम करती हैं कि कौन सी पार्टी और नेता सत्ता के कितने काम के हैं, कर्नाटक में भी सैकड़ों महिलाओं की इज्जत मटियामेट करने वाले बाप-बेटे का अभी तक कुछ बिगड़ा हुआ तो नहीं दिख रहा है।

एक बार फिर हम ताजा घटना पर लौटें, तो कर्नाटक में तमाम पार्टियों के नेता इस बात को लेकर विचलित हैं कि उन्हें तरह-तरह से हनी ट्रैप में फंसाया गया है, और शायद 48 नेताओं के सेक्स-वीडियो बाजार में आ चुके हैं। विधानसभा में सहकारिता मंत्री ने यह कहा कि उनके पास सुबूत है कि उनके साथ भी ऐसा हुआ है, और वे शिकायत दर्ज कराने वाले हैं ताकि पता लग सके कि ऐसे वीडियो के निर्माता-निर्देशक कौन हैं। सरकार के एक मंत्री रहते हुए भी उन्होंने यह दावा किया कि कर्नाटक में सेक्स-सीडी और पेनड्राइव की फैक्ट्री चल रही है जिसमें 48 लोगों के अश्लील वीडियो मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि ये अलग-अलग पार्टियों के हैं, और कुछ ने कोर्ट से ऐसे वीडियो प्रचारित करने के खिलाफ स्टे भी लिया हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि विधानसभा के भीतर यह कहा गया कि केन्द्रीय मंत्रियों सहित कई जजों को भी इसका शिकार बनाया गया है। कुछ दूसरे नेताओं ने यह कहा कि राज्य में बीस साल से यही चल रहा है, और कुछ लोग इसे धंधा बना चुके हैं।

सार्वजनिक जीवन में सेक्स-फिल्मों से लोगों पर दबाव डालने का काम नया नहीं है। जब वीडियो-कैमरे आसान नहीं थे, उस वक्त भी आपातकाल के दौर में इंदिरा गांधी की बहू, और संजय गांधी की बीवी मेनका गांधी की पत्रिका, सूर्या में बाबू जगजीवनराम के बेटे सुरेश राम की बहुत सी नग्न सेक्स-तस्वीरें प्रकाशित की गई थीं। एक प्रमुख महिला पत्रकार नीरजा चौधरी ने हाल ही में प्रकाशित अपनी एक किताब में इस घटना का जिक्र किया है कि किस तरह जगजीवनराम को इंदिरा गांधी से परे जाने से रोकने के लिए इन तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया था जिनमें जगजीवनराम के बेटे सुरेश राम को अपनी एक महिला मित्र के साथ बिना कपड़ों के सेक्स-मुद्राओं में कैमरे में कैद किया गया था। सूर्या पत्रिका का एक पूरा अंक इन्हीं तस्वीरों को समर्पित कर दिया गया था, और इनका साफ-साफ मकसद देश के सबसे प्रमुख दलित राजनेता जगजीवनराम को ब्लैकमेल करना था। यह एक अलग बात है कि राजनीति में कोई स्थाई शत्रु होते, और न ही स्थाई मित्र, इसलिए जगजीवनराम की बेटी मीरा कुमार तमाम कड़वाहट को छोडक़र कांग्रेस पार्टी की बड़ी नेता बनीं, और बाद में वे लोकसभा अध्यक्ष तक हुईं। लेकिन इस देश में सेक्स-तस्वीरों से ब्लैकमेल करने का सबसे ऊंचे स्तर का (या सबसे नीचा स्तर कहा जाए?) मामला इंदिरा गांधी के नाम लिखाएगा जिनके कपूत संजय गांधी ने लोकतंत्र की और कई किस्म की हत्याओं के साथ-साथ सेक्स-तस्वीरों से ब्लैकमेलिंग भी की थी।

फिर एक बार कर्नाटक पर लौटें, तो लोगों को याद होगा कि वहां विधानसभा में कुछ बरस पहले मोबाइल फोन पर पोर्नो देखते हुए कुछ विधायकों को विधानसभा के कैमरों ने ही कैद किया था, उसके बाद याद नहीं पड़ता कि उस मामले में क्या हुआ था। लेकिन कर्नाटक की राजनीति में सेक्स-सक्रियता बड़ी आम बात कही जाती है, और दर्जनों मंत्रियों, नेताओं, और जजों के सेक्स-सीडी मौजूद रहने से अब पता नहीं वहां इन लोगों की सार्वजनिक, सरकारी, और अदालती जिम्मेदारियों पर कैसा फर्क पड़ता होगा। बहुत से मामलों में तो ब्लैकमेल करने की जरूरत भी नहीं पड़ती होगी, और एक मामूली सा संदेश भेज देना भी असरदार होता होगा कि उनका कोई सेक्स-वीडियो फलाने के पास मौजूद है। उतने में ही सरकारी या अदालती फैसले उसके पक्ष में होने की एक संभावना खड़ी हो जाती है। लेकिन हम फिर भी छोटे-छोटे हनी ट्रैप से देवेगौड़ा कुनबे के बाप-बेटे के मामले की तुलना करना नहीं चाहते जिन्होंने अपने घर पर ही अनगिनत महिलाओं के साथ हरम जैसा चला रखा था, और खुद ही वीडियो भी बनाते थे। इस कुनबे की करतूतों को हिन्दुस्तान के इतिहास का सबसे बड़ा सेक्स-वीडियो कांड कहा गया है। राजनीतिक बेशर्मी का हाल यह है कि इसके भांडाफोड़ के बाद भी इस देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री को इतनी भी शर्मिंदगी नहीं हुई कि अपने बेटे-पोते, और अपनी पार्टी के दो नेता बनाए गए खानदानी चिरागों के जुर्म देखकर देवेगौड़ा सार्वजनिक जीवन से बाहर हो जाते। वह तो गनीमत कि वीडियो-सुबूत मौजूद हैं, इस वजह से इन कुकर्मियों की गिरफ्तारी भी हुई, लेकिन उसके बाद भी देवेगौड़ा पूरी बेशर्मी से राजनीति में बने हुए हैं।

हम कर्नाटक जैसी नौबत को लोकतंत्र के लिए बहुत ही खतरनाक मानते हैं, क्योंकि किसी कारोबारी के सेक्स-स्कैंडल में फंसने से परे, जब सरकार या अदालत के किसी बड़े ओहदे पर बैठे हुए लोग हनी ट्रैप में फंसते हैं, तो वे अपनी शपथ के खिलाफ जाकर गलत काम करने को मजबूर भी हो सकते हैं। हमारा तो ख्याल यह है कि सार्वजनिक जीवन के लोगों को उनका ऐसा स्कैंडल सामने आने के बाद किसी भी सरकारी, राजकीय, या संवैधानिक ओहदे से हट जाना चाहिए। लोगों को याद होगा कि एक वक्त अविभाजित आन्ध्र के राज्यपाल रहे नारायण दत्त तिवारी का राजभवन का जीवन ऐसे ही कुछ सेक्स-वीडियो बाहर आने की वजह से खत्म हुआ था। जिन पार्टियों के नेता भी इस किस्म के सुबूतों के साथ पकड़ाते हैं, उन्हें पार्टियों को कम से कम सार्वजनिक पदों से अलग कर देना चाहिए, फिर चाहे वे अपने संगठन में ऐसे लोगों को सिर पर बिठाकर रखें। सार्वजनिक जीवन के लोगों को हनी ट्रैप से बचना भी आना चाहिए क्योंकि सेक्स की अपनी जरूरत को वो दुनिया के कुछ सेक्स-पर्यटन केन्द्रों पर जाकर भी पूरा कर सकते हैं, कम से कम देश में अपनी पार्टी को शर्मिंदगी से बचाएं। एक दूसरी बात यह भी है कि जिस पार्टी के नेता ऐसी हरकतों में फंसते हैं, उनके आसपास की महिलाओं का सम्मान भी खतरे में पड़ता है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 मार्च 2025