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मेटा जैसी कंपनी पर जरा सा दबाव काफी नहीं, भारत विकसित देशों से सीखे

16 सितंबर 2026  

 

दुनिया के दूसरे कई देशों की सख्ती के बाद अब भारत में भी सरकार ने दुनिया के सबसे बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म कारोबारी मेटा पर दबाव डाला है ताकि उससे भारत के लोगों के सामने परोसे जा रहे बच्चों के सेक्स कंटेंट की अधिक जानकारी मिल सके। दुनिया के कई विकसित देशों ने बीते एक बरस में फेसबुक, इंस्टाग्राम, और वॉट्सऐप चलाने वाली कंपनी मेटा से मोटा जुर्माना वसूला है, कई देशों में, जिनमें मेटा का खुद का देश अमरीका भी शामिल है, बच्चों के माँ-बाप ने इस कंपनी के खिलाफ मुकदमे कर रखे हैं। ऑस्ट्रेलिया जैसे देश ने एक उम्रसीमा के नीचे के बच्चों को सोशल मीडिया पर मेंबरशिप देने के खिलाफ बहुत मोटा जुर्माना लगा रखा है। यूरोपियन यूनियन ने भी सोशल मीडिया कंपनियों पर कई तरह की सख्ती लगाई है। भारत में अभी बीते कुछ महीनों से ही जरा सी सुगबुगाहट चालू हुई है, वह भी शायद बीबीसी की इस खोजी रिपोर्ट के बाद हुई है कि मेटा के इंस्टाग्राम पर भारत के बच्चों की यौन सामग्री बेची जा रही है, और ऐसे कारोबारी इंस्टाग्राम पर इश्तहार दे रहे हैं। एक के बाद एक बीबीसी की ऐसी दो बड़ी, और पुख्ता खोजी रिपोर्ट के बाद भारत में भी लोग हक्का-बक्का हैं कि किस तरह यहां की सरकार यह सब बर्दाश्त कर रही है। यहां कानून में विदेशी कंपनियों को यह छूट दी गई है कि उनके उपभोक्ता अगर उनके प्लेटफॉर्म पर किसी तरह का जुर्म करते हैं, तो उसके लिए ये प्लेटफॉर्म जिम्मेदार नहीं माने जाएंगे। इसका फायदा उठाकर तमाम बहुराष्ट्रीय सोशल मीडिया कंपनियां मनमानी कर रही हैं। जब कई विकसित देश मेटा पर इस बात के लिए मुकदमा चला रहे हैं, कि वह बच्चों को अपने प्लेटफॉर्म की आदत डालने की तरकीबें अपने कम्प्यूटरों के एल्गोरिद्म पर इस्तेमाल कर रहे हैं, और ऐसे में खुदकुशी करने वाले कई बच्चों के माँ-बाप ने अदालत में भी मुकदमे किए हैं, भारत मोटे तौर पर ऐसी तमाम फिक्र से अब तक आजाद है।

हम इस मुद्दे पर पहले भी कई बार लिख चुके हैं कि भारतीय बच्चों को ऐसी सोशल मीडिया कंपनियों की कारोबारी साजिशों से बचाना जरूरी है। इसके साथ-साथ भारतीय बच्चों को स्क्रीन की लत से बचाना भी जरूरी है। आज बहुत से माँ-बाप लापरवाह हैं जो कि बच्चों को टीवी का रिमोट देकर, उनके हाथ में मोबाइल फोन देकर उन्हें व्यस्त रखते हैं, और खुद भी अपने उपकरणों पर व्यस्त हो जाते हैं। बहुत से माँ-बाप ऐसे हैं जो मजबूरी में काम करने में लगे रहते हैं, और बच्चों को व्यस्त रखने के लिए उनके पास स्क्रीन ही अकेला तरीका है। नतीजा यह हो रहा है कि छोटे-छोटे बच्चे भी हर दिन आठ-दस घंटे तक फोन, कम्प्यूटर, या टीवी स्क्रीन पर लगे रहते हैं। हमने भारत सरकार को कई बार यह सुझाया है कि उसे फोन और टीवी जैसे उपकरण बनाने वाली कंपनियों से बात करके उस पर इस तरह के फीचर जुड़वाने चाहिए कि बच्चों की सामग्री किसी दिन में एक सीमित तक ही उस पर चल पाए। आज तो एआई की मेहरबानी से यह बहुत आसान हो गया है कि बच्चों की पसंद के चैनल, उस पर के कार्यक्रम, उनके चहेते वीडियो गेम की सीमा तय  की जा सकती है कि एक दिन में वे कुल मिलाकर 30 मिनट, या 60 मिनट से अधिक न चलें। भारत में सरकार को अभी इस बात का महत्व समझ नहीं आ रहा है कि बच्चों को स्क्रीन में डूबते चले जाने से कैसे बचाया जाए। आज ही सुबह किसी एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया पर यह रिपोर्ट थी कि छोटे बच्चे जो कि किताबें पढ़ते हैं, वे किस तरह मानसिक रूप से अधिक विकसित होते हैं, और आगे जाकर उनको मानसिक और बुढ़ापे की दूसरे किस्म की बीमारियां होने का खतरा घट जाता है। इस नई शोध के पहले से भी मनोवैज्ञानिक इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि बच्चों की कल्पनाओं में जब वे खुद रंग भरते हैं, तो उनके दिमाग का विकास होता है। लेकिन जब कल्पनाओं की जगह पर आकार, रंग, और विविध हलचल वाले वीडियो कब्जा कर लेते हैं, तो बच्चों की कल्पनाशीलता, और रचनात्मकता धरी रह जाती है, और उनका मानसिक विकास ठीक से नहीं हो पाता। भारत में सरकार को तमाम किस्म के स्क्रीन वाले उपकरण बनाने वाली कंपनियों पर ऐसे चाइल्ड-लॉक लगाने के लिए कहना चाहिए जो कि माँ-बाप के हाथ में उन उपकरणों का नियंत्रण दे सकें। भारत सरकार को चाहिए कि उपकरणों में ऐसा इंतजाम न करने पर उन पर एक पेनाल्टी लगाई जाए, और किसी भी कारोबारी के लिए पेट पर लात पडऩा ही सबसे अधिक मायने रखता है। 

बीबीसी की रिपोर्ट सचमुच भयानक है कि मेटा के प्लेटफॉर्म जानते-बूझते, समय पर खबर मिल जाने पर भी ऐसे लोगों के इश्तहार चला रहे हैं, जो कि भारत के बच्चों के नग्न और अश्लील फोटो-वीडियो ऑनलाईन बेच रहे हैं। हमारा तो ख्याल यह है कि जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऐसे जुर्म से कमाई पा रहे हैं, तो उन पर अरबों का जुर्माना भी लगाना चाहिए। उनके पास अपने प्लेटफॉर्म पर इश्तहार पर नजर रखने की हर तकनीक मौजूद है। फेसबुक खासकर सबसे अधिक बदनाम है कि उस पर आने वाले विज्ञापनों में से बड़ी संख्या धोखा देने वालों की रहती है, और धोखा खाने के बाद लोग जब ऐसे पेज पर जाकर कमेंट बॉक्स में यह लिखते भी हैं कि यह विज्ञापन फ्रॉड है, तब भी मेटा उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं करता। महीनों तक धोखाधड़ी के ऐसे विज्ञापन चलते रहते हैं। सोशल मीडिया कंपनियों को भारत में सरकार का वार तभी झेलना पड़ता है, जब सरकार को नापसंद कोई राजनीतिक बात पोस्ट की जाती है। इसके अलावा किसी और बात के लिए सरकार आक्रामक नहीं रहती, चौकन्ना भी नहीं रहती। 

देश में एक-दो प्रदेशों की सरकारों ने जरूर यह कोशिश की है कि सोशल मीडिया पर पहुंचने वाले बच्चों की एक न्यूनतम उम्रसीमा तय करवाई जाए। लेकिन भारत की संघीय व्यवस्था में अंतरराष्ट्रीय कंपनियों पर रोक-टोक लगाने का मुख्य अधिकार तो केन्द्र सरकार के पास ही है, राज्य सरकार भी हो सकता है अपने स्तर पर कुछ कर पाए। लेकिन केन्द्र को राज्यों के साथ बात करके सोशल मीडिया सुधार की पहल करनी चाहिए, आज इन्हीं प्लेटफॉम्र्स पर बच्चों को लत डाली जा रही है, वहां उन्हें कई गलत चीजों का आदी बनाया जा रहा है, और जो कंपनियां अपने खुद के देश में अरबों-खरबों का जुर्माना दे रही हैं, वे भी भारत में यहां के बच्चों के सेक्स वीडियो बेचने के बाद मजा कर रही है, यह नौबत बिल्कुल भी नहीं चलने देना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

मर्दों की शुभचिंता को महिलाएं जिम्मेदारी नहीं हक मानने लगती हैं!

15 सितंबर 2026  

 

छत्तीसगढ़ और उत्तर भारत में आज हरतालिका तीज मनाई जा रही है। महिलाएं अपने मायके जाती हैं, माँ या भाई-भाभी की तरफ से साड़ी मिलती है, कुछ उपवास होता है, कुछ पकवान होता है। हिन्दू धर्म के और बहुत से त्यौहारों और रिवाजों की तरह तीज या तीजा पर भी महिला का उपवास रहता है। सावन के महीने में लड़कियां सोलह सोमवार या ऐसे कोई व्रत रखती हैं ताकि अच्छा पति मिले। करवा चौथ पर महिलाएं पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं। कमरछठ पर महिलाएँ उपवास करती हैं कि उनके बच्चों को लंबी उम्र मिले। और तमाम त्यौहारों और रिवाजों से परे हर दिन वे ऐसा काम भी करती हैं कि परिवार में सबकी उम्र लंबी हो, परिवार में कई पीढिय़ों की देखभाल, और सेवा के काम में हिन्दुस्तानी महिला लगी ही रहती हैं। उसके त्याग, बलिदान, उसकी मेहनत, और उसकी सहनशक्ति को लेकर उसका इतना गौरवगान होता है कि महिलाओं की अगली पीढ़ी अपने को ऐसा ही गौरवशाली बनाने में अपनी पूरी जिंदगी खपा देती हैं। संयुक्त परिवार हो, तो जिम्मेदारियां और कई गुना हो जाती हैं। 

अभी दूसरे धर्मों और दूसरे देशों की बात अलग रखें, क्योंकि वहां के धार्मिक रीति-रिवाजों की उतनी जानकारी है नहीं जितनी कि भारत के हिन्दू और हिन्दीभाषी समाज की है। परिवार को स्वस्थ रखना, और उसे लंबी उम्र दिलवाना, इन दोनों की जिम्मेदारी का एकाधिकार महिलाओं को ही दे दिया गया है। इसके एवज में महिलाओं को भाई को राखी बांधकर यह आत्मविश्वास और भरोसा रखने मिलता है कि वे बहन की रक्षा करेंगे। ऐसी रक्षा कितनी हो पाती है, वह एक अलग बात है, आजकल तो अधिक मामले ऐसे ही सुनाई पड़ते हैं कि बहन को मायके से दूर रखने की कोशिश होती है, ताकि वह माँ-बाप की छोड़ी विरासत में कोई हिस्सा न मांग ले। इसके साथ-साथ जब बाप-भाई को यह लगता है कि घर की लडक़ी अपनी पसंद से, और परिवार की मर्जी के खिलाफ शादी कर रही है, तो कम से कम उस लडक़ी, और कई मामलों में उसकी पसंद, दोनों को मारने की कोशिश भी होती है, और इसे ऑनरकिलिंग कहा जाता है, मान लो इस कत्ल से खानदान की इज्जत बच रही हो, और बढ़ भी रही हो। 

हिन्दू धर्म की कहानियों को अगर देखेंगे, तो कहीं पति को बचाने के लिए सावित्री की कहानी सुनाई देगी, तो कहीं पति के साथ सती होने का गौरवगान होगा, हिन्दू धर्म की आरतियों को अगर सुनेंगे, तो इन दिनों गणेशोत्सव में सबसे अधिक प्रचलित एक आरती में बांझन को पुत्र देय, कोढिऩ को काया, सुनाई देता है। किसी महिला की संतान न होने पर उसके लिए वही अकेली बांझ कही जाती है, और उसे संतान हो, तो उसे पुत्र ही हो, ऐसी कामना गणपति से की जाती है। कल ही इस अखबार के यूट्यूब चैनल ‘इंडिया-आजकल’ पर तीज के उपवास की परंपरा को लेकर एक बातचीत हुई, और उसमें कई अनछुए पहलू भी सामने आए। लेकिन एक भी बात निकलकर ऐसी नहीं आ पाई कि हिन्दू और हिन्दुस्तान में पुरूष पर भी महिला के लिए कोई धार्मिक रीति-रिवाज, या कोई सामाजिक संस्कार लागू होता हो। हर किस्म की जिम्मेदारी सिर्फ महिला पर ही आती है। 

अब अगर औरत-मर्द के अधिकारों की बराबरी की बात करें, तो कई लोगों को लग सकता है कि यह हिन्दू धर्म के खिलाफ बात हो रही है। लेकिन जब तीन तलाक, या बाल विवाह के खिलाफ, या बहुपत्नी प्रथा के खिलाफ, या शाहबानो सरीखे गुजारा-भत्ते पर बातचीत होगी, तब हिन्दुओं पर नहीं होगी, तब सिर्फ मुस्लिमों पर होगी। इसलिए आज जब हिन्दू उपवास की बात हो रही है, तो वह तो हिन्दुओं तक ही सीमित रहेगी। किसी मुद्दे को किसी एक धर्म का विरोधी होने की तोहमत से बचाने के लिए उस धर्म की बारीकियों पर की जा रही चर्चा में हर धर्म को तो शामिल किया नहीं जा सकता। भारत के हिन्दुओं के भीतर अगर समाज सुधार की बात होनी है, तो वह तो हिन्दू-रीति-रिवाजों को लेकर ही होगी। आज 21वीं सदी के दूसरे चौथाई हिस्से में पहुंचकर भी यह चर्चा क्या नाजायज होगी कि हर किस्म के त्याग की उम्मीद सिर्फ महिलाओं से ही क्यों की जाती है, और पुरूषों की नैतिकता का भी कोई तकाजा रहना चाहिए या नहीं? 

जब कभी इस तरह की कोई चर्चा हो, तो महिलाओं का एक बड़ा तबका उसी पर पुरूष प्रधान व्यवस्था द्वारा थोपी गई जिम्मेदारी की वकालत करने पर आमादा हो जाता है। उन्हें ऐसे सारे उपवास अपने हक के लगते हैं, उन्हें जिम्मेदारी के बोझ का अहसास नहीं होता, उन्हें यह अहसास भी नहीं होता कि एक लडक़ी या महिला को भी बराबरी के हक का हक होता है। यह बात सिर्फ हिन्दू महिला के साथ नहीं होती, मुस्लिम महिलाओं के साथ यह कुछ और अधिक हद तक होती है जिन्हें बुर्का और हिजाब अपना हक लगने लगता है, उन्हें यह लगता ही नहीं कि मुस्लिम मर्दों ने उन पर यह थोप दिया है। हमने पहले भी इस बात की चर्चा की है कि कई समाजों में महिलाओं की सोच मनोविज्ञान की भाषा में, ‘स्टॉकहोम सिंड्रोम’ कहलाती है। दरअसल दशकों पहले एक अरबपति की बेटी का अपहरण हुआ था, और उसके छूटने में खासा वक्त लग गया था। अपहरणकर्ताओं के साथ जीते हुए वह उन्हीं को भला मानने लगी थी, और उसे लगने लगा था कि वे उसके शुभचिंतक हैं। इस तरह जब कोई शोषित अपने शोषक को ही अपना शुभचिंतक मानने लगे, ऐसी ही नौबत धर्म और सामाजिक रीति-रिवाजों को लेकर महिलाओं की हो जाती है, और वे परिवार के पुरूषों के लिए, बच्चों के लिए उपवास करने को अपनी जिम्मेदारी न मानकर हक मानने लगती हैं। ऐसे स्टॉकहोम सिंड्रोम के बीच औरत-मर्द की बराबरी की बात भी नहीं हो सकती। लेकिन धर्म और समाज के भीतर ऐसी बराबरी की संभावनाओं को हमेशा ही ढूंढना चाहिए, हमेशा ही उसकी कोशिश करनी चाहिए। हो सकता है कि हजार-दो हजार साल बाद पहली महिला शंकराचार्य बने, पहली महिला पोप बने! अमूमन हर धर्म में महिलाओं की स्थिति बहुत ही कमजोर करके रखी जाती है, और धार्मिक परंपराओं को इसके लिए हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। यह सिलसिला खत्म करने की कोशिश होनी चाहिए। अगले करवाचौथ पर, कमरछठ पर, और तीजा पर मर्दों को भी उपवास कराकर देखा जाए कि समाज में एक नई जागरूकता आती है या नहीं।

(Daily Chhattisgarh)   

शोर, पंडाल, गेट, और गाय, धर्म के नाम पर अराजकता..

14 सितंबर 2026  

 

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में शहर के पुराने सराफा बाजार से निकलती हुई एक गणेश झांकी के साथ के अंधाधुंध आवाज वाले डीजे के आसपास ही एक पुरानी कमजोर इमारत ढह गई। अब यह शोरगुल कुछ दूर था, या उसी वक्त इस इमारत के सामने था, इसे लेकर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन कई वीडियो में यह देखने मिल रहा है कि पुलिस उसी जगह पर हाथ में थामे लाउडस्पीकर पर डीजे तेज न बजाने की अपील कर रही है। इधर आज की खबर है कि इसी प्रदेश में कोई बड़ी गाड़ी एक दर्जन से अधिक मवेशियों को सडक़ पर कुचलकर चली गई, और चारों तरफ बिखरी लाशों की तस्वीरें देखते नहीं बनती हैं। दो दिन पहले ही एक दूसरे शहर में सडक़ पर इसी तरह कुचली पड़ी गायों को खा रहे कुत्तों की तस्वीरें छापने में भी दिक्कत लग रही थी। फिर हर शहर के हर गली-मोहल्ले में सडक़ों पर पंडाल तन रहे हैं, स्वागत द्वार लग रहे हैं, और त्यौहार के इस मौसम में सडक़ों पर बढऩे वाली भीड़ के वक्त सडक़ों को और संकरा कर दिया गया है। राजधानी रायपुर की कुछ बहुत व्यस्त सडक़ों पर तो लोहे के बड़े-बड़े ढांचे गणेशोत्सव के लिए ऐसे खड़े कर दिए गए हैं कि उनसे चार-छह फीट दूरी पर ही बिजली के नंगे तार जा रहे हैं। अगर किसी गाड़ी की एक ठोकर से यह ढांचा तारों पर गिरा, तो क्या होगा? लोहे के ढांचे में चारों तरफ करंट दौड़ जाएगा, और आसपास की भीड़ में क्या नौबत आएगी, इसकी कल्पना मुश्किल नहीं है। दूसरी तरफ यह सुनाई पड़ता है कि हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सडक़ों पर पंडाल और स्वागत द्वार को रोकने वाले म्युनिसिपल अधिकारियों को फटकार पड़ रही है। 

इन सारी बातों को अगर देखें, तो इनमें एक ही बात एक सरीखी है कि ये सब धर्म के नाम पर हो रहा है। धर्म के नाम पर अभी गणेशोत्सव में दस दिन, और फिर नवरात्रि में नौ दिन बेतहाशा शोरगुल रहेगा, इसी प्रदेश में बीते बरसों में लाउडस्पीकरों की वजह से मौत भी हो चुकी हैं, लेकिन कोई सुधार हो नहीं रहा। एक धर्म के देखादेखी दूसरे धर्म के लोग भी ऐसा ही शोर कर रहे हैं। फिर सडक़ों को घेर लेना, चोरी की बिजली से त्यौहार मनाना, खतरनाक अंदाज में लोहे के ढांचे खड़े कर देना, यह सब कुछ भी धार्मिक त्यौहारों के नाम पर चल रहा है। धर्म के ही नाम पर सडक़ों के किनारे भंडारे लगाए जाते हैं, और वहां खा-पीकर लोग आसपास चारों तरफ पत्तल-गिलास फेंक जाते हैं। जो आयोजक हैं उनकी दिलचस्पी खिलाने तक रहती है, धर्म के नाम पर खिलाने के लिए चंदा भी जुट जाता है, लेकिन धर्म का सफाई करवाने का कोई आव्हान नहीं रहता। सडक़ों पर से आवारा मवेशियों को न हटाने का काम भी धार्मिक भावना से जुड़ा हुआ है। अभी आवारा पशुओं को गाड़ी में भरकर ले जाया जा रहा था, तो उन्हें पकडऩे के लिए लाठियां चलाते लोगों का वीडियो पोस्ट करके कांग्रेस के एक बड़े नेता ने इसे गौमाता पर जुल्म कहा। अब अगर गौमाता को हाईवे से भी हटाना होगा, तो भी लाठियों से ही तो हटाना होगा, उसे माँ मानकर अनुरोध करके तो गाड़ी में चढ़ाया नहीं जा सकता। फिर भारत की पशु और कृषि अर्थव्यवस्था को गोवंश की सुरक्षा के नाम पर डांवाडोल कर दिया गया है, नतीजा यह है कि गांव-शहर के  आबादी इलाकों, खेतों, और हाईवे पर भी आवारा मवेशी बढ़ते चले जा रहे हैं, और अब एक-एक बड़ी गाड़ी से कुचलने पर दर्जन-दर्जन भर गोवंशीय जानवर मारे जा रहे हैं। किसी मवेशी को माँ मानना आसान है, उसे मवेशी कहने वाले को धर्म का झंडा लिए हुए लोग पीट भी सकते हैं, लेकिन उस मवेशी का आखिर क्या हो, इसका कोई जवाब अभी सरकार के पास नहीं है। हम इस पर कुछ हफ्ते पहले भी लिख चुके हैं कि दुधारू न रह जाने पर गाय इस समाज पर जिस तरह का बोझ रहती है, उस बोझ को उठाना क्या सरकार के लिए भी पूरी जिंदगी मुमकिन है? 

धर्म से जुड़े हुए अलग-अलग किस्म की अराजकता के कई सवाल खड़े हैं, ये लोगों की जिंदगी पर खतरा भी बने हुए हैं, और अराजकता घटती नहीं है, वह एक जगह की देखादेखी दूसरी जगह भी पनपती जाती है, फिर बढ़ती जाती है। अभी ऊपर जितने मुद्दों पर हमने लिखा है, इनमें से हर मुद्दे पर छत्तीसगढ़ का हाईकोर्ट राज्य सरकार को जाने कितनी बार फटकार लगा चुका है, कितनी बार बड़े अफसरों से हलफनामे ले चुका है, लेकिन अदालत के सारे निर्देशों को किनारे रखकर लोगों को अराजकता बढ़ाने-फैलाने की खुली छूट दी जाती है। ऐसे में अंधाधुंध तेज बजते हुए लाउडस्पीकर से पुरानी इमारतें भी गिर सकती है, और पुराने लोग भी इसकी वजह से दिल का दौरा पडऩे, या दिमाग की नस फटने से मर सकते हैं। ऐसा लगता है कि धर्म ने शांति से जीने के अधिकार को नागरिकों से छीन लिया है, यह सिलसिला और किस हद तक हिंसक और जानलेवा होगा, यह बताना कुछ मुश्किल है। लेकिन एक बात हर किसी को समझनी चाहिए कि बढ़ती हुई धर्मान्धता, और घटती हुई वैज्ञानिक चेतना सभ्य समाज की मोमबत्ती को दोनों सिरों से जला रही हैं। जब सरकारी अमला भी धर्म के नाम पर नियमों के खिलाफ हो रहे कामों को अनदेखा करने, उनका साथ देने, उनका स्वागत करने पर मजबूर किया जाता है, और फिर उसी में मगन होकर जुट जाता है, तो फिर जनता से तो किसी जिम्मेदारी के बर्ताव की उम्मीद नहीं की जा सकती। बढ़ती हुई धर्मान्धता को कानून पर कड़े अमल से ही काबू में किया जा सकता है, जब कानून पर अमल ही ढीला-ढाला और लाचार रहे, तो फिर गुंडों का बोलबाला हो जाता है। हम गाय को बचाने के नाम पर, धार्मिक त्यौहार के नाम पर, कानून की कई तरह की हेठी देख रहे हैं, और कानून को अपने हाथ में लेना भारत में एक नवसामान्य बात हो गई है।

(Daily Chhattisgarh)   

लड़कियों के धड़ल्ले से, और बरसों से शोषण का एक साधारण समाधान...

13 सितंबर 2026  

 

छत्तीसगढ़ के नक्सल हिंसा मुक्त पूरी तरह आदिवासी जिले बीजापुर की एक भयानक खबर है। वहां एक सरकारी आवासीय स्कूल में एक कम्प्यूटर शिक्षक आधा दर्जन से अधिक छात्राओं से दो साल से अश्लील हरकत करते आ रहा था, और विरोध करने पर परीक्षा में फेल करने और बदनाम करने की धमकी देता था। अब ऐसी सात छात्राओं ने परिवार के साथ जाकर कलेक्टर से इसकी शिकायत की है, और मामले की जांच शुरू हुई है। इससे भी गंभीर बात यह है कि छात्राओं का कहना है कि उन्होंने प्राचार्य से जब भी इसकी शिकायत की, प्राचार्य ने धमकाकर उन्हें चुप रहने कहा। एक तरफ तो छत्तीसगढ़ की पहचान एक आदिवासी प्रदेश की है, दूसरी तरफ एक पूरी तरह आदिवासी इलाके में पढऩे का उत्साह रखने वाली बच्चियों के साथ ऐसी हरकत न सिर्फ शिक्षक कर रहा है, बल्कि प्राचार्य इन बच्चियों को ही धमका रहा है। ऐसे मामले प्रदेश में दूसरी जगह भी आए हैं, और लड़कियां जगह-जगह देह-शोषण का शिकार होती ही रहती हैं। और तो और राजधानी रायपुर में राज्य सरकार के एक सबसे प्रमुख, नामी-गिरामी स्कूल में वहां का शिक्षक लगातार लड़कियों को अश्लील संदेश भेजता था, और इसकी शिकायत करने के बाद भी इस पर कार्रवाई करवाने के लिए उनके पालकों को प्रदर्शन करना पड़ा था। राज्य बनने के पहले से ही आदिवासी इलाके इस तरह की मनमानी के अधिक शिकार रहते हैं क्योंकि यह मान लिया जाता है कि गरीब, या अनपढ़ आदिवासियों की कोई आवाज तो रहती नहीं है, वे शिकायत लेकर कहीं जाकर सुनवाई की उम्मीद भी नहीं कर सकते। चौथाई सदी पहले यह राज्य बन गया, लेकिन आज भी जगह-जगह से छात्राओं के शोषण की बात उसी तरह सामने आती है, जिस तरह देश के दूसरे कई प्रदेशों से आती है। ऐसा लगता है कि भारत में छात्राओं के शोषण की एक मजबूत संस्कृति बन चुकी है, और पांच-दस बरस की कैद का डर भी किसी बलात्कारी के हौसले पस्त नहीं करता। 

अब अगर कोई ऐसे लोगों को सजा मिल जाने को काफी मान लें, तो वह देश की लड़कियों के साथ बड़ी ज्यादती होगी। एक बार यौन शोषण हो जाए, उसके बाद जाकर मुजरिम को सजा मिले, तो उससे ऐसे जुल्म की शिकार लडक़ी का व्यक्तित्व, और उसका आत्मविश्वास तो पहले सरीखे हो नहीं सकते। एक बार हिन्दुस्तानी समाज में किसी लडक़ी या महिला के दिल-दिमाग में जख्म आ जाएं, तो वे जाते नहीं हैं। इसलिए सरकारों को लड़कियों पर मंडराते ऐसे खतरे सिरे से ही दूर करने चाहिए। मामूली फेरबदल से कुछ बदलते दिख नहीं रहा है, इसलिए कुछ बुनियादी परिवर्तन जरूरी हैं। शोषण आमतौर पर लड़कियों का ही होता है, और आमतौर पर पुरूष अध्यापक, या प्राचार्य, खेल प्रशिक्षक, या स्कूल-हॉस्टल के कर्मचारी ही करते हैं। इसलिए क्या लड़कियों की स्कूल शिक्षा में महिला कर्मचारियों के अनुपात को बढ़ाना कोई समाधान हो सकता है? क्या नियुक्ति के समय ही शिक्षिकाओं का आरक्षण बढ़ाकर इतना कर दिया जाए कि पुरूष शिक्षक अनुपात में हर जगह कम रहें, महिला शिक्षकों तक शोषण की शिकार लड़कियां अधिक आसानी से जा सकें? इस संभावना पर जरूर ही विचार करना चाहिए, क्योंकि इससे यौन शोषण का खतरा तो कम होगा ही होगा। दूसरी बात यह कि लड़कियों की स्कूल-कॉलेज में शोषण की शिकायत करने की व्यवस्था पुख्ता की जानी चाहिए। इसके लिए दूसरी स्कूल की शिक्षिकाओं को भेजकर छात्राओं से बंद कमरे में एक-एक कर यह जानकारी लेनी चाहिए कि क्या उन्हें किसी शोषण का शिकार होना पड़ रहा है? और फिर इसकी रिपोर्ट पर सरकार को गौर करना चाहिए। अपनी ही स्कूल में एक साथ काम करने वाले पुरूष और महिला शिक्षक एक-दूसरे के लिए हमदर्दी रख सकते हैं, और कुछ बातों को छुपा सकते हैं। इसलिए दूसरे स्कूल की महिलाओं को, या किसी दूसरे विभाग की महिलाओं को भेजकर ऐसी पूछताछ करनी चाहिए। यह भी होना चाहिए कि बच्चों और महिलाओं के लिए सरकार की जो हेल्पलाइन है, उस पर फोन करने के लिए स्कूल-कॉलेज की लड़कियों का प्रशिक्षण होना चाहिए, उनका हौसला बढ़ाना चाहिए, और उन्हें इस बात की एडवांस गारंटी देनी चाहिए कि उनका नाम, या उनका नंबर उजागर नहीं होगा। छोटी कक्षाओं की लड़कियों को जहां-जहां गुड टच, और बैड टच का फर्क समझाया जाता है, वहां से लड़कियों की शिकायतें आने लगती हैं। लड़कियों को उनके तन-मन के बारे में बेहतर समझ देने का काम भी करना चाहिए, और उन्हें शिकायत करने के अपने अधिकार, और अपनी जिम्मेदारी, दोनों की समझ देनी चाहिए। एक जागरूक लडक़ी अपने या किसी सहपाठिनी के हो रहे शोषण की सूचना देने का हौसला जुटा सकेगी। स्कूल-कॉलेज, खेल के मैदान, या ऐसे दूसरे प्रशिक्षण संस्थानों के साथ एक दिक्कत यह भी रहती है कि अगर यौन शोषक के खिलाफ जल्द ही शिकायत न हो, तो वे एक सीरियल मुजरिम की तरह आगे बढ़ते ही चले जाते हैं, और शोषण का सिलसिला कई दूसरी लड़कियों तक भी पहुंच जाता है। 

हम एक दूसरा तर्क भी देना चाहते हैं जो कि हम बरसों से इस कॉलम में लिखते आ रहे हैं। समाज में ताकतवर तबके जब कमजोर तबकों पर जुर्म करने पर उतर आते हैं, तो बलात्कार जैसे जुर्म में बलात्कारी की सम्पत्ति का एक हिस्सा बलात्कार की शिकार लडक़ी या महिला को देने का कानून बनाना चाहिए। अब हमें यह लग रहा है कि बलात्कारी शिक्षक-प्रशिक्षक, या हेडमास्टर-प्राचार्य के सरकार के पास जमा किसी भी तरह के धन का एक हिस्सा भी बलात्कार या यौन शोषण की शिकार लडक़ी को मिलना चाहिए। ऐसा इसलिए कि शिक्षक-शिष्या के संबंध में शिक्षक ताकतवर होते हैं, और शिष्या कमजोर होती है। फिर शिक्षक किसी शिष्या की हिफाजत के लिए पूरी तरह जिम्मेदार होते हैं, और जब चौकीदार ही चोर हो जाएं, इलाज करते डॉक्टर ही कातिल हो जाएं, थानेदार ही डकैत हो जाए, तो उन्हें अतिरिक्त सजा, और अतिरिक्त जुर्माने का इंतजाम होना चाहिए। 

फिलहाल हम अपने पहले समाधान पर लौटते हैं, सरकार को इस पर गौर करना चाहिए कि जहां कहीं छात्राएं पढ़ती या रहती हैं, जहां वे खेलती हैं, या कोई प्रशिक्षण पाती हैं, वहां पर महिला कर्मचारियों का अनुपात बढ़ाया जाए। किसी भी प्रदेश में स्कूल शिक्षा विभाग के कर्मचारी सबसे अधिक संख्या में रहते हैं। ऐसे में दसियों हजार महिला कर्मचारियों के लिए काम के अवसर भी पैदा होंगे। नियुक्ति के समय महिलाओं को अधिक आरक्षण देने से छात्राओं के शोषण की यह समस्या धीरे-धीरे खत्म होने लगेगी। यह कोई आदर्श समाधान नहीं है, लेकिन देश की स्थितियां भी आदर्श नहीं हैं, और असाधारण स्थितियां असाधारण समाधान की हकदार होती हैं। भारत में लड़कियों को आगे बढ़ाने बिना अगली चौथाई सदी बिना पूरी संभावनाओं तक पहुंचे गुजर जाएगी। इसलिए लड़कियों की पूरी पीढ़ी को आत्मविश्वास से भरने, और उनका बेहतर व्यक्तित्व विकास करने की जरूरत है, उसी से यह देश आगे बढ़ सकेगा, उसी से आधी आबादी को उसके जायज हक मिल पाएंगे, और उसी से यह देश एक बेहतर संस्कृति पा सकेगा, जो कि आज बहुत शर्मनाक है।

(Daily Chhattisgarh)   

पहले वाले पर खरोंच भी नहीं आई, बाजार ने पेश कर दिया नया मोबाइल...

12 सितंबर 2026  

 

अभी सैमसंग को मोबाइल फोन दो-ढाई लाख रुपए तक के आए, तो हैरानी होने लगी कि अभी दो दशक पहले तक तो इतने में छोटी कार आ जाती थी, लेकिन महीना गुजरा न गुजरा, अब एप्पल ने अपने नए मोबाइल फोन दो से चार लाख रुपए तक दाम के उतार दिए हैं। कुछ 30 बरस पहले तक मोबाइल फोन का ठिकाना नहीं था, शुरू भी हुए, तो वे सिर्फ टेलिफोन कॉल और संदेशों के लिए रहते थे, दाम भी सीमित रहते थे। अब ये इस्तेमाल से अधिक शान-शौकत, और सामाजिक दिखावे के सामान बन गए हैं। यह बात समाज के एक छोटे तबके को हैरान-परेशान करती है कि अभी डेढ़ लाख का फोन लिए हुए एक साल नहीं गुजरा है, और वह फोन गरीब लगने लगा, उसे लेकर चलना शर्मिंदगी लगने लगी क्योंकि दो-ढाई लाख के दूसरे फोन बाजार में आ गए थे। फिर अब एक कंपनी ने 3-4 लाख रुपए तक के फोन उतार दिए हैं। जिंदगी में जरा से वक्त पहले तक जिस टेक्नॉलॉजी की ही जरूरत नहीं थी, वह आज ऐसी महत्वपूर्ण हो गई है कि उसके बिना काम नहीं चलता, और इसके साथ-साथ कई लोगों का काम एक झूठी शान-शौकत के दिखावे के बिना भी नहीं चलता। इस्तेमाल कम और दिखावा ज्यादा, ऐसे सामान एक नंबर के पैसों से कम, दो नंबर के पैसों से ज्यादा खरीदे जाते हैं। स्मार्टफोन बाजार में आईफोन का नया महंगा मॉडल दो फीसदी से अधिक नहीं बिकेगा, लेकिन उसे लेकर हंगामा इतना हो चुका है कि लोग अब चर्चा करने लगे हैं कि एक किडनी बेचकर दो नए फोन आ जाएंगे, और समाज में इज्जत बच जाएगी। एक किसी ने सोशल मीडिया पर यह भी पोस्ट किया है कि उसके पास तीन-चार लाख रूपए तो जुटने वाले हैं नहीं, ऐसे में समाज उसे स्वीकार कर सकेगा, या नहीं? 

लोगों की जरूरत तो बीस हजार रूपए के स्मार्टफोन से भी पूरी हो सकती है, रात-दिन लोगों के घरों में सामान डिलीवर करने वाले लोग मोबाइल फोन का सबसे अधिक इस्तेमाल करते हैं, उस पर नक्शा देख-देखकर पहुंचते हैं, लेकिन उनके फोन भी दस-बीस हजार रूपए के भीतर के रहते हैं। इसलिए काम तो मामूली फोन से चल जाता है, लेकिन इज्जत के अहंकार का पेट उससे नहीं भरता। नतीजा यह होता है कि कुछ ब्रांड का हल्ला इतना हो जाता है कि गरीब घरों के बच्चे उसके चक्कर में कहीं जुर्म का पैसा कमाने लगते हैं, कहीं-कहीं अपने परिवार के भीतर से चोरी या लूट करने लगते हैं, अभी कुछ ही हफ्ते पहले केरल में एक स्कूली छात्रा ने अपने सहपाठियों को सुपारी देकर अपने ही दादा का कत्ल करवा दिया था ताकि वह अपने लिए महंगा मोबाइल फोन, और अपने दोस्त के लिए महंगी मोटरसाइकिल खरीद सके। कुछ ऐसे भी मामले सामने आए हैं जिनमें महंगे ब्रांड के फोन के लिए मजदूरों के बच्चों ने खुदकुशी कर ली। 

यह बहुत ही हमलावर और हिंसक बाजार व्यवस्था है जो कि लोगों के भीतर एक स्थाई बेचैनी बनाकर चलती है। लोगों को जो हासिल है उससे हिकारत, और जो हसरतें हैं, उन्हें हमेशा ही लोगों के काबू के कुछ बाहर रखना ताकि वे दूसरे लोगों की देखादेखी उन हसरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष करते रहें, फिजूलखर्ची करते रहें। यह बाजारवाद ऐसा है जिसमें हजार रूपए के सामान पर किसी सबसे बड़े ब्रांड का ठप्पा लग जाए तो वह दस-बीस हजार रूपए में बिकने लगता है। कुछ लोगों को नकली सामानों की तलाश रहती है ताकि वे अपनी मामूली सी रकम से अपने असाधारण सपनों को पूरा कर सकें। चीन जैसे देश दुनिया के करोड़ों लोगों के ऐसे सपनों को पूरा करते हैं, और दस-बीस लाख रूपए की घड़ी वहां दो-तीन हजार रूपए में नकली बनाकर पेश कर दी जाती है। 

लेकिन एप्पल ने दुनिया में कई अलग किस्म की मिसालें पेश की हैं। उसने अपने कम्प्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल फोन की क्वालिटी को लेकर दुनिया के सामने एक नया ही ऊंचा पैमाना पेश कर दिया है। इसके अलावा उसने अमरीकी सरकार जैसी हमलावर संस्था के सामने भी अपने ग्राहकों की गोपनीयता बनाए रखने की मिसाल पेश की है। फिर अपने प्रोडक्ट अनोखे बनाना, उसे हमेशा ही दूसरे मुकाबले से बहुत ऊपर रखना, ऐसी तमाम बातों से भी इस कंपनी ने एक ऐसी साख बनाई कि वह बहुत से लोगों का सपना बन गई। लेकिन भारत में लोगों को याद रखना चाहिए कि आज वे जितने का कोई फोन खरीदते हैं, उसके बाद उसे सस्ते फोन को रखना उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा के खिलाफ हो जाता है, और फोन तो हर बरस नए आ जाते हैं। फोन के एक मॉडल का ठीक से इस्तेमाल किए बिना, उसके सारे फीचर्स को समझे बिना भी लोग अगले मॉडल पर जाने के एक दबाव में रहते हैं, क्योंकि उनके आसपास के लोग उनके पास पुराना मॉडल देखकर हैरान होते हैं, यह समझ लेते हैं कि उनके दिन ठीक नहीं चल रहे हैं। 

समझदारी इसी में है कि टेक्नॉलॉजी अपनी जरूरत के लायक, और अपनी क्षमता के भीतर की ही छांटी जाए। दुनिया में बहुत से ऐसे अरबपति भी हैं जो बरस-दर-बरस अपने पुराने ही मोबाइल फोन ही इस्तेमाल किए जाते हैं क्योंकि उससे उनकी जरूरत पूरी हो जाती है। आज समाज में दिखावे के लिए ऐसे महंगे सामान सबसे पहले, और सबसे अधिक उन्हीं लोगों के पास आते हैं जो इन्हें तोहफे या रिश्वत में पाते हैं, इसके अलावा जिनके पास बहुत सारा काला धन है, वे लोग भी ऐसी हर चीज को सबसे पहले लेते हैं। लोगों को अपने बच्चों के सामने भी अपनी क्षमता की एक सीमा साफ-साफ रख देनी चाहिए। वे कौन सी चीजें खरीद सकते हैं, और कौन सी नहीं, इसे भी बता देना चाहिए, और इसके साथ-साथ यह भी बता देना चाहिए कि परिवार में किसे किस चीज की जरूरत है, और किसे सिर्फ लेने का शौक है। 

दो लाख से चार लाख तक के मोबाइल लोगों के बीच दिल जलाने का काम तो करेंगे, लेकिन असली दिलवाले वे हैं जिनका दिल ऐसे गैजेट्स देखकर नहीं जलेगा।

(Daily Chhattisgarh)   

ट्रम्प के अमरीका को देखें, तो कुछ जाना-पहचाना नहीं लगता?

11 सितंबर 2026  

 

डॉनल्ड ट्रम्प ने कल अमरीका में मध्यावधि चुनाव के पहले अपनी पार्टी के एक बड़े कार्यक्रम में यह घोषणा की है कि ये मध्यावधि चुनाव अमरीका के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण चुनाव होंगे, और इनसे देश के अगले ढाई सौ बरस का भविष्य तय होगा। वहां पर मध्यावधि चुनाव से सरकारें नहीं बदलतीं, फिर भी ट्रम्प इस चुनाव को लेकर इस अंदाज में भाषण दे रहा है कि मानो यह राष्ट्रपति का चुनाव हो रहा हो। लेकिन इससे भी बड़ी दिलचस्प बात यह रही कि उसने कहा कि अगर चुनावी नतीजों में अमरीकी संसद के दोनों सदनों में रिपब्लिकन पार्टी को बहुमत मिलेगा, तो हर वयस्क अमरीकी नागरिक को पांच हजार डॉलर दिए जाएंगे। यह रकम कुल मिलाकर खरबों में जाने वाली है, और अमरीकी विश्लेषक दो बातों पर गौर कर रहे हैं, कि यह पैसा आएगा कहां से? और दूसरा यह कि क्या वोट पाने के लिए ऐसी कोई घोषणा कानूनी भी है? 

यह आखिरी वाली बात अमरीका और भारत के बीच एक तुलना करने पर मजबूर कर रही है। भारत में अब धीरे-धीरे करके अधिकतर पार्टियां चुनावों में महिला मतदाताओं को डायरेक्ट कैश ट्रांसफर का लालच देने लगी हैं। अलग-अलग प्रदेशों में ऐसी योजना के नाम अलग-अलग रहते हैं। लेकिन इससे भी कुछ और पहले जाएं तो तीन हफ्ते पहले ट्रम्प ने भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का नाम लेकर भारत की चुनाव व्यवस्था और वोटर आईडी की तारीफ की थी। उन्होंने मतदाता परिचय पत्र की तरह, अमरीका के सेव अमेरिका एक्ट के तहत नागरिकता सुबूत, और फोटो परिचय पत्र पर जोर दिया था। अब दिलचस्प बात यह है कि इसी वक्त भारत में विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण, एसआईआर चल रहा है। और ट्रम्प ने अभी ताजा घोषणा की है कि अमरीकी जनगणना से एच-1बी वीजा धारकों को बाहर रखा जाए, और भारतवंशी छात्र भी ऐसी अमरीकी जनगणना से बाहर रहेंगे। भारत और अमरीका दोनों जगह आबादी के अलग-अलग हिस्सों को नागरिकता से बाहर करने की ये कोशिशें हैं तो अलग-अलग पैमानों की, लेकिन ये एक राजनीतिक समानांतर काम चल रहा है कि सत्ता का नापसंद लोगों को अलग कैसे किया जाए। अमरीका में एच-1बी वीजाधारकों में सबसे अधिक भारत के लोग हैं, और वे अमरीकी जनगणना में बाहर होने जा रहे हैं। कल के दिन लोगों को हैरानी नहीं होनी चाहिए कि अगर ट्रम्प के कुछ अघोषित रहस्यमय सलाहकार भारत आकर ज्ञानेश कुमार से ट्रेनिंग लेकर जा रहे हों। 

आज ही एक अखबार में यह रिपोर्ट है कि भारत के एक बंगाली परिवार को किस तरह देश से निकालकर बांग्लादेश धकेल दिया गया था, और वहां एक बरस जेल में काटकर जब यह हिन्दुस्तानी बंगाली लौटा है, तो वह यह सवाल कर रहा है कि उसका कुसूर क्या था। जिस वक्त इस भारतीय नागरिक को गर्भवती पत्नी और बाकी परिवार के साथ अवैध करार देकर जून 2025 में बांग्लादेश में धकेल दिया गया था, तो दानिश नाम के इस मुस्लिम को बांग्लादेश ने साल भर जेल में बंद रखा, बाद में जब उसका मामला हिन्दुस्तानी सुप्रीम कोर्ट में गया, तो सुप्रीम कोर्ट की दखल के बाद अब उसे भारत वापिस लाया गया है। लोगों को याद होगा कि ट्रम्प ने भी वहां कानूनी रूप से बसे हुए लोगों को इसी अंदाज से देश के बाहर भेज दिया था, और फिर अमरीकी अदालतों ने उन्हें वापिस लाने का हुक्म दिया था। जिस तरह भारत में एक राष्ट्रवाद का मुद्दा बनाकर दूसरे देश का होने का आरोप लगाकर इसे चुनावी मुद्दा बनाया गया था, ठीक उसी तरह ट्रम्प अमरीका में प्रवासियों के खिलाफ मुहिम चला रहा है, और उसका सबसे बड़ा और बुरा निशाना हिन्दुस्तानी बन रहे हैं। 

भारत में मेक इन इंडिया नाम का एक बड़ा अभियान चल रहा है, और इस देश में अधिक से अधिक चीजों को खुद बनाने की एक मुहिम चल रही है। लेकिन दूसरी तरफ चीन के साथ सरहदी मुठभेड़ के बाद चीनी सामानों के बहिष्कार का जो अभियान चला था, वह किसी किनारे नहीं पहुंच पाया। 2020 में गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों पर चीनी हमले के बाद से चीन से भारत का आयात लगातार बढ़ते चल रहा है। 2020-21 से 2024-25 के बीच भारत से चीन को निर्यात 33 फीसदी गिर गया, और चीन से भारत में आयात 74 फीसदी बढ़ गया। व्यापार का घाटा 125 फीसदी बढ़ गया, और आर्थिक आंकड़े बताते हैं कि इन पांच बरसों में भारत के चीन के साथ कारोबार में भारत की करीब 384 बिलियन डॉलर की कमी आई है। दूसरी तरफ अमरीका ट्रम्प के वर्तमान कार्यकाल में जिस तरह दुनिया भर के सामानों पर टैरिफ लगाते जा रहा है, उससे खुद अमरीका में बाहर से आने वाले सामान अंधाधुंध महंगे हो रहे हैं, और ट्रम्प का मेक अमेरिका ग्रेट अगेन नाम का राष्ट्रवादी अभियान किसी किनारे नहीं पहुंच रहा, क्योंकि दूसरे देशों से आने वाला कच्चा माल इतना महंगा हो रहा है कि अमरीका में मैन्युफैक्चरिंग बढऩे के कोई आसार नहीं दिख रहे हैं। 

अब जब दोनों देशों की कई तरह की स्थितियों की तुलना की जा रही है, तो भारत इस मायने में बेहतर है कि इसने अपने आपको किसी भी जंग में उलझाकर नहीं रखा है। दोनों देशों में कई बातें राजनीतिक समानता की जरूर चल रही हैं, लेकिन भारत कुछ मामलों में ट्रम्प के अमरीका के मुकाबले अधिक समझदारी से चलते दिख रहा है। अब हम तो इस चर्चा को शुरू भर कर सकते थे, लोग चाहें तो अपनी-अपनी जानकारी, और समझ के मुताबिक इस तुलना को आगे बढ़ा सकते हैं।

(Daily Chhattisgarh)   

अपना घर छोड़ 22 सौ किमी दूर ओडिशा के जंगलों में कहां से पहुंचे ओरांग-गुटान बच्चे!

10 सितंबर 2026  

 

ओडिशा में अभी हैरान करने वाली बात। वहां बालासोर के इलाके में एक जंगल में पेड़ों पर पांच ओरांग-गुटान मिले। ये भारत के निवासी ही नहीं है, और सुमात्रा के जंगलों में पाए जाते हैं। वहां से वे ओडिशा कैसे पहुंचे, यह भी हैरानी की बात है। बंदर और चिम्पांजी जैसी एक नस्ल के ओरांग-गुटान के ये पांच बच्चे छह महीने से एक साल उम्र के हैं, इनमें भी सबसे छोटा बच्चा तो बहुत ही कम उम्र का है। ये दो हजार किलोमीटर से अधिक दूर इंडोनेशिया के सुमात्रा के टापू से पूरा समंदर पार करके ओडिशा के जंगल में कैसे आ गए, यह एक रहस्यमय पहेली है। स्थानीय सूचना बताती है कि इसी जंगल के आसपास रहस्यमय तरीके से एक काली थार गाड़ी देखी गई थी, और अब उसकी तलाश चल रही है। इनके आने की एक संभावना जिंदा वन्य जीवन तस्करी करने वाले लोग हो सकते हैं जो कि इस समंदर के रास्ते इन्हें ओडिशा लाए हों, और फिर जमीन के रास्ते भारत के किसी दूसरे हिस्से में ले जा रहे हों। भारत के अड़ोस-पड़ोस के कोई देश इतने संपन्न नहीं हैं कि जहां इस तरह के दुर्लभ जानवरों का भुगतान करने वाले लोग हों। भारत के जमीनी रास्ते से अगर कोई इन जानवरों को चीन ले जाने की बात सोचे, तो चीन का समुद्री रास्ता इंडोनेशिया, यानी सुमात्रा से करीब है, उसे इतने लंबे रास्ते की जरूरत नहीं है। लेकिन एक दूसरी खबर जो अभी-अभी आई है वह एक और चोरी की घटना बताती है। बांग्लादेश के गाजीपुर सफारी पार्क से मार्च 2025 में तीन रिंग-टेल्ड लेम्यूर चोरी हुए थे। बांग्लादेश की सीआईडी जांच के मुताबिक ये जानवर कई हाथों से गुजरने के बाद भारत लाए गए, और गुजरात के वनतारा वन्य प्राणी केन्द्र से जुड़े एक संस्थान को 48 लाख रूपए में बेचे गए। इस मामले में बांग्लादेश की अदालत में आठ आरोपियों से छह ने जुर्म मानते हुए बयान दिए हैं। बांग्लादेश की यह खबर वहां के सरकारी रिकॉर्ड में अच्छी तरह दर्ज है, और आज जब ओडिशा में इंडोनेशिया के ओरांग-गुटान इस तरह मिल रहे हैं, तो यह खबर याद पड़ती है। 

भारत से वैसे भी बहुत सारे प्राणी दुनिया के दूसरे देशों में भेजे जाते हैं, और वहां से भी दुर्लभ वन्य प्राणी भारत आते हैं। बहुत बड़े-बड़े, कई रंगों वाले तोते सरीखे काकातुआ भारत के संपन्न लोगों के घरों में दिखते हैं, वे तस्करी से ही आए हुए रहते हैं। इसी तरह कई अलग-अलग दुर्लभ नस्लों के छोटे कछुए लोग अपने घरों के मछलीघर में पालते हैं। भारत में प्रतिबंधित कुत्तों की कुछ नस्ल भी जगह-जगह लोगों पर हमला करते दिखती है, और उन्हें पालने वाले लोग बहुत संपन्न बददिमाग रहते हैं जिन्हें दूसरों की जिंदगी की कोई परवाह नहीं रहती। भारत के समुद्रतटों पर, हवाई अड्डों पर, कभी इस देश से बाहर ले जाते, तो कभी दूसरे देश से यहां लाते हुए तरह-तरह के प्राणी पकड़ाते हैं। इनके बारे में यह भी समझने की जरूरत है कि जब कानूनी रूप से इन्हें लाया, या ले जाया जाता है, उनकी तरह-तरह की चिकित्सकीय जांच होती है, जो कि भारत के लिए भी जरूरी होती है, और दूसरे देश के लिए भी। लेकिन गैरकानूनी कारोबार में ऐसी कोई जांच नहीं की जाती, और इन प्राणियों के साथ कई तरह के रोग पहली बार भारत पहुंच सकते हैं, या भारत से उन देशों में जा सकते हैं। लोगों को याद होगा कि दूसरे देश से किसी भी तरह के बीज या पौधे लाने पर भी दुनिया के अधिकांश जिम्मेदार देशों में बड़ी रोक लगी रहती है। ऐसे बीजों, या पौधों के साथ में कई तरह के नए रोग आ सकते हैं, जिसमें देश में पहले से मौजूद वनस्पतियों को खतरा हो सकता है। इसी तरह तस्करी से लाए गए जानवरों से भारत में पहले से मौजूद जानवरों को भी खतरा हो सकता है, और भारत के इंसानों को भी। 

इसके अलावा यह भी समझने की जरूरत है कि भारत में वन्य जीवन की तस्करी पर नजर रखने वाली केन्द्र सरकार की संस्था डीआरआई ने अभी कल ही पिछले दस दिनों की कार्रवाई की जानकारी जारी की है, जिसमें तेंदुए की दो खालें, 180 जिंदा इंडियन स्टार कछुए, एक दुर्लभ किस्म की एक दर्जन बड़ी छिपकलियां (टोके गेको), और पेंगोलिन के करीब 24 किलो छिलके, बाघ की आधा किलो हड्डियां जब्त की गई हैं, और करीब 13 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इसमें ओडिशा से लेकर मेघालय और असम तक कई जगह यह कार्रवाई हुई है। अभी कुछ हफ्ते पहले ही छत्तीसगढ़ के बस्तर और लगे हुए महाराष्ट्र के जंगलों में भी अवैध शिकार, और उससे हासिल जानवर की खाल जब्त हुई थीं, और इनमें तो वन विभाग के कर्मचारी भी शामिल मिले हैं। 

आज जब भारत जैसे देश में हर किस्म के जुर्म में शामिल मुजरिम बढ़ते चले जा रहे हैं, साइबर क्राइम से लेकर वाइल्ड लाईफ तस्करी तक बढ़ते चल रही है। ऐसे में इन्हें पकडऩे वाली एजेंसियों में भी जब कुछ भ्रष्ट लोग घुस जाते हैं, तो बाहर के मुजरिमों की ताकत कई गुना बढ़ जाती है। भारत कैसे चारों तरफ की सरहद से होने वाली तस्करी को रोक सकता है, यह उसके सामने एक बड़ी चुनौती है। जब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार के खरीददार अच्छे दाम लेकर मौजूद रहेंगे, तब तक हिन्दुस्तान में अवैध शिकार, और तस्करी को खत्म कर पाना नामुमकिन है। आज तो हम हर दिन किसी न किसी प्रदेश में ऐसा कत्ल देखते हैं जिसमें जमीन-जायदाद की विरासत पाने के लिए आल-औलाद ही माँ-बाप को कत्ल कर देती है, ऐसे में जंगली जानवरों से भला किसको मोहब्बत हो सकती है? फिर आज तो गांव-गांव तक इंसानों, और फसलों पर जानवरों का जो खतरा मंडराता रहता है, वह भी भयानक है, उससे भी बहुत से इंसानों को एक बहाना मिलता है कि उन्हें अपने आपको बचाने के लिए जंगली जानवरों को मारना ही है, यह उनकी मजबूरी है। फिर भी आसमान से गिरे, और ओडिशा के जंगल के पेड़ों पर टंगे ओरांग-गुटान के बच्चे कई तरह के सवाल खड़े करते हैं। भारत में वन्य प्राणियों को रखने वाले निजी चिडिय़ाघरों, और दूसरे वैसे केन्द्रों को भी जांच-पड़ताल की जरूरत है।

(Daily Chhattisgarh)   

एआई से होने वाली किफायत मौलिकता की कीमत पर है...

09 सितंबर 2026  

 

कुछ मुद्दे ऐसे रहते हैं जिस पर न लिखने का इरादा रहे, तो भी आसपास कुछ न कुछ ऐसा होता है कि लिखना पड़ जाता है। जैसे ट्रम्प, या एआई, या धर्मान्धता। आज लिखने के लिए पेरिस के एफिल टावर पर स्वामिनारायण सम्प्रदाय के संन्यासियों का खड़ा किया गया बवाल एक बड़ा मुद्दा है, लेकिन इस पर बहुत से दूसरे विश्लेषकों ने लिख दिया है, बहुत से लोगों के बयान आ गए हैं, और उस पर लिखने की जरूरत कुछ कम रह गई है। लेकिन एआई पर लिखने की जरूरत खत्म हो ही नहीं रही है। हर दिन दुनिया में कहीं न कहीं से एआई को लेकर ऐसी खबरें आती हैं कि नए खतरे दिखते हैं, और नई चुनौतियां भी दिखती हैं कि एआई की वजह से लोगों का सोचना कितना कम हो रहा है, दिमाग में कल्पना करने वाला हिस्सा, मौलिक सोचने वाला हिस्सा काम कम पा रहा है, चुनौतियां बिल्कुल नहीं पा रहा है, और धीरे-धीरे लोग अपने बहुत किस्म के काम एआई को ठीक उसी अंदाज में देते चले जा रहे हैं, जिस अंदाज में कोई बड़े नेता अपने भाषण लिखने का जिम्मा भाड़े, या तनख्वाह के लेखकों को देते चले जाते हैं। असल जिंदगी में यह देखने मिलता है कि नेताओं की अपनी सोच की मौलिकता, और कल्पनाशीलता उनके लिए रखे गए भाषण-लेखकों की वजह से घटती चलती है। अब जिन्हें लीडरशिप करनी है, चाहे वह किसी सरकार की हो, संगठन की, या कि किसी कंपनी की, अगर उनका सोचना कम होते चलेगा, तो धीरे-धीरे लीडरशिप की उत्कृष्टता भी घटने लगेगी। एक दूसरा खतरा यह भी रहता है कि मदद करने वाला एआई हो, या भाषण लिखने वाले पेशेवर लेखक हों, उनकी सोच के दायरे में लीडरों की सोच कैद होने लगती है। लेकिन लोगों को इसमें कुछ अटपटा इसलिए नहीं लगता है कि जिनकी रोजी-रोटी ही भाषण लिखने से चलती है, वे शब्दों के खिलवाड़ तो लीडर से बेहतर कर ही सकते हैं, और जब लोगों की वाहवाही  पेशेवर की लिखी लफ्फाजी से हासिल होने लगती है, तो फिर लीडर को मौलिक सोच की जरूरत और भी कम लगती है। एआई के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है।

यह एक ऐसा मददगार औजार साबित हो रहा है जिससे लोगों का काम हल्का होते चल रहा है, गैस के गुब्बारे जैसा। एआई ऐसी आदत बिगाडऩे वाला रहता है कि अगर हम अपने अखबार के लिए उससे इसी जगह छपने वाला संपादकीय लिखवाना चालू करें, तो वह शायद हमसे ज्यादा सधी हुई भाषा में लिख देगा। जब किसी विषय पर रिसर्च करते हुए एआई से तथ्य तलाशने को कहा जाता है, तो वह बार-बार उकसाता भी है कि अगर आप चाहें तो मैं इस पर संपादकीय लिख दूं। फिर उसे बड़ी मुश्किल से रोकना पड़ता है कि लिखने के लिए विचार हमारे पास जरूरत से अधिक हैं, सिर्फ पुराने तथ्यों को ढूंढने के लिए एआई की जरूरत है, इसलिए हमारी रोजी-रोटी पर डकैती न डालें, और सिर्फ तथ्य ढूंढकर बताएं। इससे परे बहुत से ऐसे काम एआई अपनी तरफ से नए सुझाने लगता है जो कि मानवीय सीमाओं से परे के रहते हैं। कल ही कोई एक तथ्य ढूंढते हुए एआई से लंबी बातचीत हुई, तो उसने उन आंकड़ों को पिछले सवा सौ साल के रिकॉर्ड देखकर, उनका विश्लेषण करके सामने रखने का प्रस्ताव रखा। फिर उसके साथ विचार-विमर्श करते-करते कई तरह के पैमाने तय किए गए, कुछ अपवादों पर विचार किया गया, और फिर उससे विश्लेषण करवाया गया। किसी मानवीय क्षमता में इतना विश्लेषण आता नहीं है। नतीजा यह होता है कि असाधारण और तकरीबन नामुमकिन किस्म के काम जब एआई से होने लगते हैं, तो दिमाग उसी तरफ अधिक चलने लगता है कि ऐसा असाधारण विश्लेषण करना कितना अनोखा होगा। दिमाग की मौलिक सोच कम होने लगती है, और हमारी तमाम कोशिशों के बावजूद एआई के इस्तेमाल से हमारी मेहनत पर भी असर पडऩे लगा है। यह तो कुछ मौलिक काम खुद करने की आदत अभी बनी हुई है, वरना एआई ने दिमाग पर पूरी तरह चर्बी चढ़ाने का प्रस्ताव रखना जारी रखा था। 

कई बरस पहले देश के संपादकों के एक सरकारी जमावड़े में, उत्तर-पूर्व के एक राज्य में कमजोर इंटरनेट के बीच संपादकीय लिखकर भेजना बड़ी चुनौती का काम था। वहां पर कुछ कल्पनाशील संपादकों ने यह तरीका निकाला था कि इंटरनेट पर कई ऐसी वेबसाइटें थीं जो हर दिन कई विषयों पर संपादकीय टिप्पणी लिखकर डालती थीं। बहुत से संपादक अपने दफ्तरों में इन्हीं में से किसी वेबसाइट से टिप्पणी लेकर संपादकीय छापने का जिम्मा किसी को दे आए थे। मतलब यह कि आज एआई जिस तरह लोगों को अलाल बनाने पर आमादा है, उस तरह का काम तो एआई के आने के दो दशक पहले से इंटरनेट पर मौजूद सामग्री ने करना शुरू कर दिया था। नामी-गिरामी संपादकों को भी यह अपमानजनक नहीं लगता था कि उनके अखबार के संपादकीय कॉलम में इंटरनेट से उठाकर सामग्री छाप दी जाए। अब एआई ने तो यह सहूलियत दे रखी है कि एक विषय पर किसी एक एआई से एक लाख अलग-अलग लोग अपनी थोड़ी सी सोच बताकर, उसे एक रूख या रूझान सुझाकर, भाषा शैली बताकर एक लाख किस्म के संपादकीय लिखवा सकते हैं। 

हमारी बातचीत अपने खुद के पेशे तक सीमित हुई चली जा रही है, जबकि लिखना तो एआई का एक बड़ा छोटा सा हिस्सा है, शायद उसकी क्षमता का सबसे आसान वाला एक-लाखवां हिस्सा। एआई का असली काम तो वैज्ञानिक, और कारोबारी विश्लेषण, और जरूरत पडऩे पर, मांगने पर निष्कर्ष सुझाने जैसा काम है। अब अगर दुनिया की कई कंपनियों में मैनेजमेंट ही लोगों पर यह बंदिश लगा रहा है कि वे अपने काम में एआई का भरपूर इस्तेमाल करें, एआई का इस्तेमाल न करने पर लोगों को नोटिस जारी हो रहे हैं, या उनकी नौकरियां ली जा रही हैं, तो फिर ऐसे में किसी भी क्षेत्र के मुखिया या लीडर अपने आपको एआई की आदत से कैसे बचा सकते हैं? एक तरफ तो उससे कई सहायकों की जरूरत खत्म हो रही है, काम जल्दी हो रहा है, पहले जो काम अकल्पनीय थे, अब कुछ पलों में हो जा रहे हैं, और फिर कंपनियां हैं कि एआई के अधिक से अधिक इस्तेमाल पर जोर दे रही हैं। तो ऐसे में किसी भी संगठन या कारोबार के नेता, या मीडिया में समाचार-विचार लिखने वाले लोग अपनी मौलिकता कब तक कायम रख सकते हैं? फिर आज आधी सदी से जो केलकुलेटर इस्तेमाल हो रहे हैं, जिनकी वजह से लोगों के दिमाग से पहाड़ा निकल ही चुका है, उसी तरह अब जिस रफ्तार से एआई का इस्तेमाल बढ़ रहा है, लोगों की कल्पनाशीलता, और रचनात्मकता दोनों की छुट्टी होने का खतरा आ गया है। अभी न्यूयार्क के मेयर जोहरान ममदानी ने वहां की स्कूलों में आठवीं क्लास तक के बच्चों के लिए जनरेटिव एआई औजार इस्तेमाल करने पर एक साल के लिए रोक लगा दी है। आज कंपनियां खर्च में कटौती करने के लिए जिस तरह एआई को बढ़ावा दे रही हैं, उससे उन कंपनियों में काम आसान, और सस्ता तो हो रहा है, लेकिन कल्पनाशीलता, और मौलिकता का विसर्जन भी हो रहा है। इसके खतरे दिखते-दिखते दिखेंगे।

(Daily Chhattisgarh)   

माफिया-धमकियों के बाद छोटे जज का हौसला, और बड़े जजों में वह गायब क्यों?

08 सितंबर 2026  

 

उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर के एक जिला जज ने पिछले पांच महीनों में दस चर्चित मामलों में 23 मुजरिमों को फांसी की सजा सुनाई है। उनका कहना है कि ऐसे फैसलों के बाद पश्चिम यूपी के माफिया-गैंगस्टरों ने उनसे संपर्क कर यह संदेश भिजवाया है कि वे उनके पीछे पड़े, तो वे कोर्ट बदलवा देंगे, या जिले के बाहर तबादला करवा देंगे। जज रविकुमार दिवाकर ने ऐसे एक मामले में जिंदा जलाई गई एक मुस्लिम महिला के पति को फांसी सुनाते हुए अपने ऊपर उठ रहे सवालों के जवाब भी लिखे हैं। उन्होंने लिखा- मेरे माता-पिता ने भगवान के सिवाय किसी अन्य से नहीं डरने की सीख दी है। अगर जज बाहुबलियों, माफिया, या मुजरिमों के दबाव में काम करने लगें, तो जनता का अदालत पर से भरोसा कमजोर हो जाएगा। यदि मैं ऐसी ताकतों से डर जाऊंगा, तो मेरे लिए अदालत से इस्तीफा देना ही बेहतर होगा। फैसले में उन्होंने लिखा है कि उन्हें यह संदेश भिजवाया गया है कि अभी उनके पास से सिर्फ फाइलें हटवाई गई हैं, और यदि वे उनके पीछे पड़े, या टिप्पणी की, तो वे अपनी ताकत का इस्तेमाल करके उनका कोर्ट बदलवा देंगे, या जिले के बाहर ट्रांसफर करा देंगे। 

अभी कुछ ही दिन हुए हैं कि उत्तर भारत में एक सिविल जज, शबीना खान ने अपने जिले की एक चर्चित आईएएस, दुर्गा शक्ति नागपाल पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने उनकी अदालत में चल रहे एक मुकदमे को लेकर उन्हें फोन करके उन पर दबाव डाला। जज का कहना है कि नागपाल ने अपने पद का हवाला देते हुए अपनी वरिष्ठता गिनाई, और अदालत में चल रहे एक मामले की चर्चा की, हाईकोर्ट में उनकी शिकायत करने, और केस ट्रांसफर करने की बात कही, और उनके संस्कार या आचरण पर टिप्पणी की। इस पर इस महिला जज ने खुली अदालत में इसकी चर्चा करके इसे अनुचित दबाव, और डराने की कोशिश बताया, और मुकदमा दूसरी अदालत में भेजने की मांग की। जिला जज ने केस को इसके बाद दूसरी अदालत में ट्रांसफर कर दिया। इस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी नाराजगी जताई है, और इसे पहली नजर में अदालत की आजादी पर हमला करार देते हुए इसे आपराधिक अवमानना वाली पीठ के पास भेज दिया है। दिलचस्प बात यह है कि अवमानना की सुनवाई वाली अदालत के जज, जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव ने बिना कोई कारण बताए अपने को इस मामले से अलग कर लिया। अब यह किसी और अदालत में चलेगा। 

जो लोग जिला स्तर की अदालतों के कामकाज से वाकिफ रहते हैं, उन्हें इस तरह के कई अनैतिक दबावों की कहानियां याद रहती हैं। कुछ मामलों में जज भी खुद होकर कई अलग-अलग, कानून से परे की वजहों से मामलों को प्रभावित करते हैं, कई मामलों में जजों के गलत या खराब आचरण की भी चर्चा रहती है, और कई मामलों में उन पर राजनीतिक या अदालती दबाव भी आता है क्योंकि उनकी आगे की तैनाती सरकार और हाईकोर्ट दोनों पर निर्भर करती है। फिर यह भी है कि लोकतंत्र में हर तरह की बड़ी-बड़ी ताकतों से जुड़े मामले निचली अदालतों में आते-जाते रहते हैं, और वहां से किसी फैसले के बाद ही हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट की बारी आती है। इसलिए छोटी अदालतों के जजों पर तरह-तरह के अनैतिक दबाव आते रहते हैं, इनमें अभी उत्तरप्रदेश का ताजा मामला सबसे ही भयानक दिख रहा है जिसमें माफिया-गैंगस्टर अपने लोगों को फांसी की सजा देने पर जज को तबादला करवा देने की धमकी दे रहे हैं। इससे न सिर्फ उनकी धमकी देने की ताकत दिखती है, बल्कि जैसा कि इस जज ने लिखा है, उनसे कुछ फाइलें या केस ले भी लिए गए, उससे ऐसा लगता है कि माफिया के हाथ ऊपर तक पहुंचे हुए हैं, या तो सरकार में ऊपर तक, या फिर न्यायिक प्रशासन में जिला जज के ऊपर कहीं तक। 

भारतीय लोकतंत्र में अब ऐसा भी नहीं रह गया है कि लोगों का भरोसा आखिर में आकर अकेली न्यायपालिका पर टिक गया है। बहुत से मामलों में देश की बड़ी-बड़ी अदालतों के फैसलों को लेकर भी जनता में बेचैनी और अविश्वास की नौबत आती है, और लोगों को लगता है कि जिनके साथ बड़ी बेइंसाफी हो रही है, बड़ा जुल्म हो रहा है, उन्हें सुप्रीम कोर्ट से भी इंसाफ नहीं मिल रहा है। इसलिए लोकतंत्र में जिस तरह बाकी स्तंभों पर से लोगों का भरोसा कम हुआ है, उसी तरह अदालतों पर से भी भरोसा घटा है। बीते कुछ महीनों से सुप्रीम कोर्ट अपने मुख्य न्यायाधीश के स्तर पर ही जिस तरह की अविश्वास की फजीहत से घिरा हुआ है, वह देखने लायक है। वह सब कुछ तो एक पूरी तरह से अवांछित जुबानी टिप्पणी की वजह से शुरू हुआ मामला है, लेकिन हमारे जैसे लोग जो बारीकी से सुप्रीम कोर्ट, और देश के हालात देखते हैं, उन्हें यह दिखता है कि देश की सबसे खतरनाक नौबतों को भी सुप्रीम कोर्ट अनदेखा कर रहा है। 

यह नौबत बहुत निराशाजनक है। हिन्दुस्तान का अदालती इतिहास लोकतांत्रिक मूल्यों पर अड़े रहने वाले बहुत से जजों से भरा हुआ है। कई जजों ने समाज या सरकार की प्रचलित सोच के खिलाफ जाकर भी फैसले दिए थे। बहुत से जज ऐसे हुए जिन्होंने खुद होकर ऐसे मामलों की सुनवाई शुरू की, जिन्हें लेकर ताकतवर तबके बहुत खफा भी हुए। लेकिन आज तो हम यह देखकर हक्का-बक्का हैं कि अभी साल-दो साल के भीतर ही सुप्रीम कोर्ट ने नफरती-बयानों को लेकर हेट-स्पीच नाम से चर्चित जो आदेश दिया था, उसे देश भर में पांवोंतले कुचला जा रहा है, और सुप्रीम कोर्ट इसकी अनदेखी करने को ही सहूलियत की बात पा रहा है। अब ऐसे में किसी जिले के किसी जज को मिल रही धमकी के बाद भी अगर वह जिम्मेदारी और ईमानदारी से अपना काम करे, तो वह तारीफ की ही बात रहेगी, क्योंकि जिन सुप्रीम जजों के पास खोने को कुछ नहीं है, वे भी हौसले के काम नहीं कर पा रहे हैं।

(Daily Chhattisgarh)   

ऊपर कई अवैध मंजिलें, नीचे बन रहा अवैध तलघर, दिल्ली में छात्रों की मौत...

  07 सितंबर 2026  

 

दिल्ली में छात्रों के रहने वाली एक पांच मंजिला इमारत ढह गई जिसमें 5-6 छात्रों की मौत हो चुकी है, और मलबेतले दो दर्जन छात्रों के दबे होने की आशंका है। तीस साल से अधिक पुरानी इस इमारत की तीन मंजिलें अवैध थीं। उतना वजन तो पुरानी इमारत के ढांचे पर था ही। इसके अलावा इसमें तलघर और खोदा जा रहा था। इमारत का नाम सत्य निकेतन था, मालिक का नाम हरिराम, और यहां कॉलेज-विश्वविद्यालय के लडक़े रहते थे। तंग गली की इस इमारत तक बचाव की मशीनें जाने में भी दिक्कत थी। पूरे इलाके में किराया कमाने का यही हाल बताया जा रहा है। देश की राजधानी में जहां केन्द्र सरकार के मातहत राज्य सरकार चलती है, जहां सुप्रीम कोर्ट बैठता है, और जहां कि म्युनिसिपल का बजट किसी छोटे राज्य के बजट जैसा रहता है, वहां पर अवैध निर्माण इतने धड़ल्ले से होता है कि हर बाल्कनी, और हर छत पर कई किराएदार रख लिए जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने एक-दो दशक पहले दिल्ली के तलघरों में चलने वाले कारोबार बंद करवाए थे, और उन्हें सील करवाया था, लेकिन जिस तरह का हाल अवैध निर्माण को लेकर बाकी देश का है, उसी तरह का दिल्ली में भी है, दिल्ली में शायद कुछ अधिक ही है। 

आज दुनिया में जहां-जहां भूकम्प आता है, वहां कुछ देशों में नुकसान अधिक होता है, और कुछ में कम। इसके पीछे की एक ही वजह बताई जाती है कि जहां सरकारें निर्माण नियम अधिक कड़ाई से लागू करती हैं, वहां पर मौतें कम होती हैं। अब हिन्दुस्तान में भी कई हिस्सों में भूकम्प का खतरा बना हुआ है, कई प्रदेशों में भूकम्प आया हुआ है। भूकम्प से परे नदियों, और समंदर के किनारे नियम-कानून के खिलाफ जाकर निर्माण किए गए हैं, जो कि बाढ़ या तूफान की, सुनामी की नौबत में बहुत बड़ी तबाही कर सकते हैं। देश में सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे, और हर किस्म की जमीन पर अवैध निर्माण लोगों की आदत हो गई है, और सत्तारूढ़ नेताओं का, सरकारी दफ्तरों में बैठे अफसरों का पूरा समर्थन इनको रहता है। देश में कुछ प्रदेशों में नियमों का पालन अधिक होता होगा तो उसके बारे में हमें अलग से जानकारी नहीं है, लेकिन जहां-जहां की जानकारी है, ऐसा लगता है कि भूमाफिया और कंस्ट्रक्शनमाफिया सरकार पर हावी रहते हैं। हम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही देखते हैं कि शहर से लगी हुई चारों तरफ की खेती की जमीन को राजनीतिक संरक्षण पाए हुए जमीन-माफिया प्लाट काटकर उसकी अवैध बिक्री करते रहते हैं, किसानों की जमीन की रजिस्ट्री उन्हीं के दस्तखत से हो जाती है, और मध्यमवर्गीय लोग खरीददार रहते हैं। इस बीच में भूमाफिया का नाम भी कागजों पर नहीं आता, और उनके नाम की बड़ी-बड़ी कॉलोनियां बन जाती हैं। धीरे-धीरे इतने अधिक पैसों के कारोबार से इतनी ताकत जुट जाती है कि ऐसे लोग चुनाव लडऩे की भी सोचने लगते हैं, या अधिक सहूलियत की बात रहती है कि निर्वाचित नेताओं को ही खरीद लेते हैं। नए और पुराने सभी तरह के अवैध निर्माण इतनी बड़ी कमाई का जरिया होते हैं कि अवैध कमाई का कद्दू कटता है, तो सबमें बंटता है। मीडिया भी ऐसे  धंधों से बड़े-बड़े इश्तहार पाकर काले कारनामों को अनदेखा करते रहता है। 

लेकिन किसी भी देश-प्रदेश में राजधानी बाकी इलाके के लिए एक मिसाल रहती है। नियमों की जितनी हेठी राजधानी में होती है, बाकी इलाकों में उससे कुछ अधिक ही होती है। इसलिए दिल्ली में इतने बड़े-बड़े अवैध कारोबार चलना, लोगों की जिंदगी को खतरे में डालने वाली अवैध इमारतें बनने देना, यह सब रातों-रात तो नहीं हो जाता। किसी इमारत में कई अवैध मंजिलें अगर जुड़ गई हैं, तो उसे तो म्युनिसिपल अपने दफ्तर में बैठे हुए सेटेलाइट मैप पर भी देख सकता है। इन्हें अनदेखा करना एक साजिश का हिस्सा रहता है। जहां देश की सबसे बड़ी अदालत भी बैठी हुई है, हाईकोर्ट भी वहां पर है, और केन्द्र सरकार भी है जिसकी दिलचस्पी इतने छोटे अवैध निर्माणों से कमाई में नहीं हो सकती। उसके बाद भी अगर दिल्ली धड़ल्ले से अवैध निर्माणों से भरी हुई है, तो उसे अनदेखा करने के पीछे सरकारी और राजनीतिक नीयत बिल्कुल ही रहती है। आज चूंकि दिल्ली में दो-तीन इंजनों वाली सरकार है, इसलिए कोई किसी और को तोहमत नहीं दे सकते। 

पुरानी इमारतों का खतरा देश के तमाम शहरों में है। उन्हें गिराने के खिलाफ कई तरह की ताकतें काम करती हैं। दशकों से जो किराएदार वहां बसे रहते हैं, वे नहीं चाहते कि इमारत गिरे, और नई बने, क्योंकि नई इमारत में मकान मालिक उन्हें जगह दे या न दे, इसका कोई ठिकाना तो है नहीं। इसलिए कुछ जगहों पर मकान मालिक इमारत को गिरवाना चाहते हैं, किराएदार बचाना चाहते हैं। कई जगहों पर मकान मालिक ही जर्जर निर्माण को बचाए रखना चाहते हैं। फिर इसके बाद ऐसे जर्जर भवनों में ऊपर अवैध मंजिलें जोड़ी जाती हैं, और नीचे अवैध तलघर बनाया जाता है। इनका गिरना तय सरीखा रहता है। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि सरकार को इसकी जानकारी नहीं रहती है। देश के हर हिस्से में निर्वाचित पार्षद, या पंच रहते हैं, अब तो म्युनिसिपलों का ढांचा इतना बड़ा हो गया है कि चारों तरफ उसके कर्मचारी-अधिकारी रहते हैं। अब एक मामूली से फोन से वीडियो रिकॉर्डिंग की जा सकती है कि कहां-कहां अवैध निर्माण हुआ है, या हो रहा है। सरकारें उपग्रह तकनीक का इस्तेमाल करती ही हैं ताकि टैक्स निकाला जा सके। ऐसे में अगर म्युनिसिपलें शहरी जिंदगी को सुरक्षित रखने के बजाय इतनी बुरी तरह खतरे में डालती हैं, तो इसके पीछे एक संगठित मोटी कमाई रहती है। कई लोगों को यह भी लगता है कि ऐसे हादसों के जिम्मेदार अफसरों के लिए भी कैद का इंतजाम होना चाहिए, लेकिन हिन्दुस्तान का एक बुरा तजुर्बा यह रहा है कि सिर्फ कानून कड़ा करते चले जाने से, सजा बढ़ाते चले जाने से कुछ होता नहीं है। असर तो तभी हो सकता है जब तेज रफ्तार से इंसाफ हो। लेकिन हिन्दुस्तान की अदालतों का हाल यह है कि मामले-मुकदमों के बोझ से उसका अपना ढांचा जर्जर हो गया है, और लोगों को इस खतरनाक भवन के नीचे सुनवाई के बजाय सडक़ों पर इंसाफ करने की भी सूझने लगी है। 

शहरीकरण और शहरी विकास के मुद्दे बहुत जटिल हैं, हम यहां बहुत सीमित जगह में इससे अधिक कुछ कह नहीं सकते, लेकिन अलग-अलग पार्टियां, अलग-अलग समय पर अलग-अलग सत्ता पर काबिज रहती हैं, और जब तक भ्रष्टाचार से इन सबको परहेज नहीं होगा, जब तक अदालतें कड़ा रूख अख्तियार नहीं करेंगी, जब तक आज का स्वतंत्र मीडिया माफिया कारोबार का भांडाफोड़ नहीं करेगा, तब तक अवैध निर्माण के बंद होने की कोई अधिक उम्मीद नहीं की जा सकती।

(Daily Chhattisgarh)   

क्या असफल साबित हो चुका है सरकारी ढांचा?

 06 सितंबर 2026  

 

भारत की शासन व्यवस्था में एक बड़ा, और मजबूत हिस्सा नौकरशाही का रहता है। मोटेतौर पर आईएएस अफसरों को ही नौकरशाही कह दिया जाता है, लेकिन उनके अलावा आईपीएस, आईएफएस, आईआरएस जैसी कुछ और सेवाएं भी रहती हैं जो इस ढांचे में शामिल रहती हैं। फिर सरकार और कारोबार के बीच एक पुल बैंकों का रहता है जो कि अलग-अलग कारोबारों के बीच भी रहता है, और जिनके बिना न तो कोई बड़ा वित्तीय लेन-देन हो सकता, और न ही अब देश की आबादी के एक बड़े हिस्से तक सीधे खाते में पहुंचने वाली योजनाओं पर अमल हो सकता है। सरकारी अफसरों, और बैंकों को मिला लें, तो सरकार और कारोबार, जनता, इन सबका लगातार लेना-देना बने रहता है, चलते रहता है। ऐसे में जब अफसरों, और बैंकों की गिरोहबंदी से बड़े-बड़े आर्थिक अपराध होने लगते हैं, तो उससे देश का ढांचा एकदम से खोखला हो जाने का बहुत बड़ा खतरा खड़ा हो जाता है। अभी ऐसे मामले कुल मिलाकर इतने विकराल नहीं हुए हैं कि उनसे देश खोखला हो जाए, वे गिने जाने लायक संख्याओं में हैं, और सरकारी पैसों का एक हिस्सा ही लूटना अब तक सामने आया है। दूसरी तरफ सरकार के बजट का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार में बर्बाद होता है, लेकिन वह कहानी फिर कभी।  

आज इस मुद्दे पर लिखने की जरूरत इसलिए लग रही है कि हरियाणा सरकार के कुछ विभागों, और केन्द्रशासित प्रदेश चंडीगढ़ में सरकारी पैसों में बड़ी साजिश से भारी हेराफेरी का ऐसा मामला उजागर हुआ है जो हक्का-बक्का करता है। इसमें हरियाणा का पांच सौ करोड़ रूपए से अधिक जालसाजी से गायब हुआ, और चंडीगढ़ का भी शायद डेढ़ सौ करोड़ से अधिक। ये अभी किसी आरोप की बात नहीं रह गई है, सीबीआई ने अदालत में हरियाणा के 8 सरकारी विभागों, और चंडीगढ़ प्रशासन के अफसरों के साथ-साथ दो बैंकों के अफसरों के खिलाफ भी चार्जशीट पेश की है। इसमें आधा दर्जन तो आईएएस अफसर ही हैं, और इसीलिए यह सवाल उठ खड़ा होता है कि क्या भारत में सरकार का कामकाज चलाने के लिए जो सबसे बड़ी नौकरी, आईएएस बनाई गई थी, क्या आज वह अपने मकसद से भटक चुकी है? इस पर चर्चा इसलिए भी जरूरी लगती है कि छत्तीसगढ़ में कई आईएएस अफसरों को जेल में बरसों काटने के बाद जमानत मिली है, लेकिन वे हजारों करोड़ रूपए के भ्रष्टाचार, और रंगदारी-उगाही के जुर्म में कटघरे में हैं। हर कुछ हफ्तों में देश के किसी न किसी प्रदेश से किसी बड़े आईएएस अफसर की गिरफ्तारी की खबर आती है, और भ्रष्टाचार सैकड़ों करोड़ का रहता है। इसी तरह का हाल आईपीएस का है, और अभी छत्तीसगढ़ में तो एक आईपीएस प्रशिक्षु के खिलाफ सीबीआई कोर्ट में एक करोड़ रिश्वत लेने का मामला पहुंचा हुआ है। 

एक बार फिर चंडीगढ़ चलें, तो वहां सीबीआई कोर्ट में जांच एजेंसी ने इस मामले का खुलासा किया है कि सरकार के सख्त दिशा-निर्देशों और प्रक्रियाओं को अनदेखा करके अलग-अलग बैंकों में जमा एफडी को तोडक़र आईडीएफसी, एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक में खाते खोले गए। एक मामले में तो दो दिनों के भीतर ही 80 करोड़ रूपए का एफडी ट्रांसफर कर दिया गया। इसके बाद इन बैंकों के अफसरों ने फर्जी कागजात, जाली चेक, और जाली पे-ऑर्डर बनाकर कागजी कंपनियों में सरकारी पैसों को भेज दिया। इस रकम से सरकार और बैंक के अफसरों ने दो सौ करोड़ का सोना खरीदा, दो सौ करोड़ से अधिक एक फर्जी कागजी कंपनी के जरिए एक सराफा कारोबारी को भेजा, और उससे नगदी ले ली। इन अफसरों ने एक-दो साल में ही दुबई में महंगी प्रॉपर्टी खरीद ली, और महंगी गाडिय़ां ले लीं। सीबीआई ने अदालत को बताया है कि सरकारी नियमों के खिलाफ इन बैंकों में ऐसे सैकड़ों करोड़ रूपए डालने के एवज में इन आईएएस अफसरों के लिए विदेशी डॉंसरों की मुजरा पार्टियां की गईं, उन्हें लड़कियां मुहैया कराई गईं, करोड़ों रूपए नगद दिए गए, और सोने के बिस्किट भी दिए गए। सरकार या बैंक के किसी आंतरिक ऑडिट में यह जालसाजी पकड़ में नहीं आई। पहली बार इस साल फरवरी में जब एक सरकारी अधिकारी ने विभागीय खाता बंद करने की कोशिश की तो पता लगा कि विभाग के कागजी रिकॉर्ड, और बैंक के वास्तविक बैलेंस में भारी फर्क है। यह घोटाला उजागर होने के बाद आईडीएफसी फस्र्ट बैंक ने 578 करोड़ रूपए राज्य सरकार को यह कहते हुए वापिस कर दिए कि यह मध्यम स्तर के कर्मचारियों की धोखाधड़ी थी। लेकिन सीबीआई जांच से यह साबित हुआ कि इसमें चार बैंक मैनेजर भी शामिल थे, जिन्हें 6 आईएएस अफसरों के साथ कटघरे में लाया गया है। सीबीआई ने 37 लोगों के खिलाफ चार्जशीट पेश की है, 26 को गिरफ्तार किया है, और 20 करोड़ से अधिक का सोना जब्त किया है। 

अभी कुछ ही दिन पहले हमने बैंकों की धोखाधड़ी के बारे में लिखा था कि किस तरह पीएनबी की नगदी-तिजोरी में असली की जगह करोड़ों के नकली नोट रख दिए गए थे। कल की ही खबर है कि जी-न्यूज के मालिक सुभाष चन्द्र के हजार करोड़ से अधिक के कर्ज में प्रॉपर्टी के दाम को बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया था। जाहिर है कि प्रॉपर्टी का मूल्यांकन बैंक अपने स्तर पर करता है, और बैंक के बड़े लोगों की भागीदारी के बिना कोई बड़ा कर्ज डूब नहीं सकता। अब ऐसे में कारोबारी, बैंक अधिकारी, और सरकारी अधिकारी सभी मिलकर अगर लूटने में लगे हैं, तो देश की अर्थव्यवस्था को कौन बचा सकते हैं? चंडीगढ़ के इस मामले में भी फर्जी कंपनियों के नाम दो सौ करोड़ रूपए डालकर, किसी सराफा व्यापारी से नगदी ले लेना, कारोबार का जुर्म में भागीदार रहने के अलावा और कुछ नहीं है।

इस पूरे सिलसिले में जो बात समझ से परे है, वह यह कि क्या कागजों पर की जा रही इतनी बड़ी जालसाजी पूरी जिंदगी छुपी रहनी थी? क्या इतने बड़े-बड़े अफसर बन चुके लोगों को यह नहीं मालूम था कि सैकड़ों करोड़ गायब होने की बात किसी न किसी दिन तो खुलेगी, उस दिन क्या होगा? और क्या देश अपनी सबसे बड़ी नौकरी, आईएएस पर ऐसे लोगों को पा रहा है जो कि विदेशी डॉंसरों के मुजरे, और धंधेवाली लड़कियों का साथ पाने के लिए ऐसा जुर्म करने पर आमादा हो जाते हैं जिसका रास्ता आगे-पीछे जेल तक ही जाना है? तो क्या देश की सबसे बड़ी नौकरियों पर लोगों को रखने के साथ-साथ उनके अनिवार्य रूप से पॉलीग्राफ टेस्ट, और नार्को टेस्ट की शर्त जोड़ देनी चाहिए? छत्तीसगढ़ में ही यह सामने आ रहा है कि किस तरह जिला खनिज निधि, डीएमएफ के तहत होने वाले कामों पर 35-40 फीसदी का कमीशन वसूला जाता था, पुरूष अधिकारी भी वसूलते थे, और महिला अधिकारी भी कंधे से कंधा भिड़ाकर वसूली करती थीं। तो क्या भारत में सरकार चलाने की नौकरशाही की व्यवस्था असफल साबित हो चुकी है? या फिर इन अफसरों की नीयत पर ताला डालकर उसकी चाबी उसी तरह सुरक्षित रखनी होगी, जिस तरह एक वक्त जंग पर जाने वाले कुछ राजा रानियों पर ताले डालकर चाबियां अपने साथ ले जाते थे? 

देश में जिस नौकरी को पाने के लिए एक-एक कुर्सी के लिए दसियों हजार लोग मुकाबला करते हैं, उस कुर्सी पर पहुंचकर लाखों रूपए महीने की तनख्वाह, और लाखों रूपए महीने की सहूलियतें पाकर भी लोगों का जी नहीं भरता, बिना मांगे खुद चलकर आने वाली कुर्सी की कमाई से भी जी नहीं भरता, कमीशन भी काफी नहीं बैठता, और लोग सरकारी खजाने को कागजी जालसाजी की हद तक जाकर लूटते हैं! ऐसे योजनाबद्ध भ्रष्टाचार के लिए सरकार में बैठे हुए लोगों के लिए ऐसी उम्रकैद होनी चाहिए जिसमें कोई पैरोल न मिले, और जिसमें जीते-जी जेल से निकलना न हो सके। जब लोगों को यह समझ आएगा कि ऐसी काली कमाई जब्त अलग होगी, और वे खुद बाकी पूरी जिंदगी जेल में काटेंगे, तो ही जाकर भ्रष्टाचार का हौसला थोड़ा सा पस्त हो सकता है, वरना आज तो यह देश के गरीबों के मुंह का कौर छीनकर अपने महल बना रहा है।

(Daily Chhattisgarh)   

तालिबानी बंदूकों से छुपकर पढ़ती अफगान लड़कियों से शुरू बात हिन्दुस्तान तक...

 05 सितंबर 2026  

 

अफगान विदेश मंत्री से अभी एक इंटरव्यू बीबीसी पर आ रहा था जिसमें उनसे सवाल किया गया कि वहां लड़कियों को पढऩे नहीं दिया जा रहा है, तो मंत्री का जवाब था कि स्कूली लड़कियों को धार्मिक शिक्षा वाले मदरसे में कुछ साल पढऩे की छूट है। जब उनसे पूछा गया कि आगे की किसी क्लास में, कॉलेज या यूनिवर्सिटी में लड़कियों को पढऩे की छूट नहीं है, जिसका मतलब यह है कि अफगानिस्तान में कभी महिला डॉक्टर नहीं हो पाएंगी, तो उसका जवाब था कि हाँ यह समस्या तो है, और इस पर विचार किया जा रहा है। तालिबान को इस बार अफगानिस्तान की सत्ता में आए पांच साल तीन हफ्ते हुए हैं, जिस 15 अगस्त को भारत स्वतंत्रता दिवस मनाता है, उसी 15 अगस्त 2021 को अफगान तालिबान दुबारा काबिज हुए थे। और इन पांच बरसों में अफगान शासक यही तय नहीं कर पाए कि लड़कियों की पढ़ाई खत्म कर देने से उनके देश में आगे आने वाली समस्या का क्या होगा? पुरूष चिकित्सक तो महिला की चिकित्सा कर नहीं पाएंगे। बीते दिनों अफगानिस्तान में भूकम्प से बहुत से मकान गिर गए, बचावकर्मी पुरूष थे, और मलबे में दबी हुई तो महिलाएं भी थीं। लेकिन महिलाओं को छूने की इजाजत नहीं है इसलिए बचावकर्मी मलबे में से महिलाओं को नहीं निकाल रहे थे। 

आज की एक रिपोर्ट है कि तालिबान शासकों की नजरों से बचकर अलग-अलग छुपकर, कहीं किसी घर में, तो कहीं जगह को घेरकर कुछ शिक्षिकाएं जान पर खेलकर लड़कियों को पढ़ा रही हैं। लड़कियां वहां अलग-अलग पहुंचती हैं ताकि तालिबानों की नजरों में न आएं, और बंदूकधारी तालिबान वहां जांच करने पहुंच जाते हैं, तो वे भागकर इधर-उधर छुपती हैं। लोगों को याद होगा कि पाकिस्तान में एक स्कूली लडक़ी, मलाला स्वात घाटी के इलाके में पढ़ रही थी कि वहां पर तालिबानों का असर बढ़ा, और उन्होंने लड़कियों के स्कूल जाने पर रोक लगानी शुरू कर दी। 11-12 बरस की उम्र में मलाला ने इसका विरोध किया तो 2012 में स्कूल से वापिसी के समय उसकी बस रोककर तालिबान ने उसे गोली मार दी, और बहुत बुरी तरह जख्मी हालत में उसे पहले पाकिस्तान में, और फिर ब्रिटेन में भर्ती कराया गया, और लंबे इलाज के बाद किसी तरह उसकी जिंदगी बची। सत्रह बरस की उम्र में उसे नोबल शांति पुरस्कार मिला। 

इस विषय पर लिखने की बात आज इसलिए सूझी कि आज एक वीडियो देखने मिला है कि किस तरह एक बांध पर बहते पानी पर चलते हुए स्कूली लड़कियां जान पर खेलकर आ-जा रही हैं। यह देश भर के कई प्रदेशों का हाल है। लेकिन बारिश के महीनों की इस दिक्कत से परे भी बाकी सालभर कई प्रदेशों में सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय नहीं है, और देश की आधी आबादी की एक सबसे बुनियादी जरूरत को पूरा करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट को लाठी लेकर सरकारों के पीछे पडऩा पड़ता है। लड़कियों की अपनी खास जरूरत रहती है, माहवारी के दिनों में उन्हें पानी वाले शौचालय भी लगते हैं, कचरे के डिब्बे भी लगते हैं, और इसके लिए सरकारों के पीछे पडऩे को एक सुप्रीम कोर्ट भी लगता है! यह गजब का हाल इस देश में आम बात है। इस मुद्दे पर लिखने के लिए हमने अभी भारत में स्कूल छोडऩे वाले बच्चों के आंकड़ों को देखने की कोशिश की, तो पता लगा कि प्राथमिक शालाओं में लडक़ों का स्कूल छोडऩा लड़कियों के मुकाबले कुछ अधिक है। यही हाल मिडिल स्कूल में जारी रहता है, और हाईस्कूल या हायर सेकेंडरी में भी। कुछ लोग इसका सामाजिक कारण यह मानते हैं कि मिडिल स्कूल पार करने के बाद कुछ लडक़ों को पारिवारिक काम में लगना पड़ता है, लेकिन दूसरी तरफ सामाजिक कारण ऐसे भी हैं जो लड़कियों के स्कूल छोडऩे की अधिक वजहें पैदा करते हैं। इनमें से एक तो शौचालयों की कमी है, और माहवारी की दिक्कत के वक्त, उस वजह से कई लड़कियां पढ़ाई छोडऩे को मजबूर हो जाती हैं। इसके अलावा लड़कियों पर घर में माँ के काम में हाथ बंटाना अधिक आता है, छोटे भाई-बहनों या घर की देखरेख उन्हें करनी पड़ती है, और ऐसे में भी उनकी पढ़ाई छूटती है। बाल विवाह से भी कई स्कूली लड़कियों की पढ़ाई छूटती है, उनके ससुराल जाने के बाद आगे की स्कूली पढ़ाई तकरीबन नामुमकिन रहती है। फिर यह भी है कि स्कूल में शिक्षकों, या राह में आते-जाते किसी और की छेडख़ानी की वजह से थककर, और डरकर भी लड़कियां पढ़ाई छोड़ देती हैं। किसी एक लडक़ी के साथ बलात्कार जैसी घटना होने पर बहुत सारी और लड़कियों से माँ-बाप पढ़ाई छुड़वा देते हैं। इन सारे तथ्यों के बाद भी अगर भारत में प्रायमरी से लेकर 12वीं क्लास तक लड़कियों का स्कूल छोडऩा लडक़ों के मुकाबले फिर भी कम है, तो इसमें लड़कियों की पढऩे की अपार इच्छा है। इस एक मामले में हिन्दुस्तान की लड़कियां, पाकिस्तान की मलाला, और अफगानिस्तान की लड़कियां सब एक सरीखी हैं। इन सबको मालूम है कि वे पढ़-लिख लेने के बाद ही समाज में इंसान का दर्जा पा सकती हैं, आगे बढ़ सकती हैं, एक बेहतर जिंदगी पा सकती हैं, और अपने होने वाले बच्चों को वे बेहतर जिंदगी तभी दे पाएंगी जब वे पढ़ी-लिखी रहेंगी। यह पूरा सिलसिला सामाजिक प्रथाओं, और अन्याय के खिलाफ लगातार संघर्ष का एक दस्तावेज है, जो हिन्दी या हिन्दुस्तानी भाषाओं में लिखा जाए, उर्दू में लिखा जाए, या अफगानी जुबान में लिखा जाए, उनमें दर्द की दास्तान एक सरीखी है। 

आज जिस तरह देश भर में जगह-जगह स्कूली बच्चे नदी-नालों को पार करके पढऩे के लिए आते-जाते हैं, उनमें भीगे हुए स्कूल पहुंचने पर लड़कियों के लिए अधिक शर्मिंदगी की नौबत रहती है। साथ के लडक़ों, और कई मामलों में शिक्षकों की बुरी नजरों से बचकर रहने की चुनौती भी उन्हीं पर अधिक रहती है। स्कूली बरसों में माहवारी शुरू होने के बाद करीब दस फीसदी दिन उनके तकलीफ में गुजरते हैं, उनकी पढ़ाई पर भी असर होता है, लेकिन देश भर के इम्तिहानों को देखें तो लड़कियां ही हर लिस्ट में लडक़ों से आगे रहती हैं। हम पूरी तरह वैज्ञानिक बात नहीं कर रहे हैं, लेकिन डॉक्टरों की बताई हुई बात यह है कि गर्भपात कराए जाने की नौबत में जब महिला की कोख में कन्या भ्रूण रहती है, तो वह अपनी जिंदगी को बचाने के लिए अधिक संघर्ष करती है। कुछ वैज्ञानिक तथ्य यह बताते हैं कि भ्रूण स्तर पर भी कन्या भ्रूण की प्रतिरोधक क्षमता अधिक रहती है। और यह सिलसिला बुढ़ापे तक जारी रहता है, भारत में महिलाओं की औसत उम्र आदमियों की औसत उम्र से कई बरस अधिक रहती है, जबकि उनका खानपान मर्दों के मुकाबले कमजोर रहता है, वे गर्भावस्था से लेकर प्रसूति तक की तकलीफों को झेलती हैं, माहवारी से लेकर गर्भाशय निकलवाने तक की तमाम तकलीफें सिर्फ महिलाओं की रहती हैं, फिर भी वे मर्दों से कई बरस अधिक जिंदा रहती हैं! यही जुझारूपन लड़कियों को स्कूल में अधिक वक्त तक बनाए रखता है, वह हिन्दुस्तान हो, पाकिस्तान हो, या बंदूकों से बच-बचकर, छुप-छुपकर लड़कियों के पढऩे वाला अफगानिस्तान हो।

(Daily Chhattisgarh)   

चिट्ठी को तार समझना, वरना बीमार पार समझना

04 सितंबर 2026  

 

अमरीका के कैलिफोर्निया के सानफ्रांसिस्को में अभी एक चर्चित अमरत्ववादी ब्रायन जॉनसन ने सौ-डेढ़ सौ लोगों के बीच एक कार्यक्रम किया जिसमें उन्होंने लंबी जिंदगी जीने के बारे में अपने तजुर्बे बांटे। तीन हजार से अधिक लोगों ने इस कार्यक्रम में मौजूद रहने के लिए आवेदन किया था, जिसमें अमरीका की बड़ी-बड़ी टेक कंपनियों के मुखिया भी थे। कार्यक्रम जब चल रहा था, तो बाहर दर्जनों लोग भीतर जाने के लिए गिड़गिड़ा रहे थे, लेकिन यह सीमित लोगों के लिए ही था। ब्रायन जॉनसन 50 बरस से कम के एक अमरीकी कारोबारी हैं, और उन्होंने ब्रेन ट्री नाम की अपनी कंपनी को पे पाल नाम की कंपनी को 80 करोड़ डॉलर में बेचा था। इसके बाद से वे अपनी खुद की जिंदगी को अधिक से अधिक सेहतमंद, और अधिक से अधिक लंबी बनाने की मुहिम में जुटे हुए हैं। वे अपने तन-मन को एक प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, और एक किस्म से वे बुढ़ापे को अधिक से अधिक धीमा, और अधिक से अधिक स्वस्थ बनाने में लगे हुए हैं। कुछ महीने पहले की बात है कि वे भारत आए थे, और एक पांच-सात सितारा होटल के कमरे में एक इंटरव्यू देने वाले थे, कि उन्हें वहां की हवा प्रदूषित लगी और वे छोडक़र तुरंत निकल गए। वे अपनी जिंदगी का फलसफा बस दो शब्दों में सबके सामने रखते हैं, डोंट डाई (मरो मत)। कई लोग इस खरबपति को एक सनकी मान सकते हैं, और जब दुनिया का एक सबसे मशहूर गायक, माइकल जैक्सन अपने वक्त में दर्जनों प्लास्टिक सर्जरी कराकर अपने चेहरे को अधिक से अधिक आकर्षक बनाने में लगे रह सकता था, तो यह नया खरबपति तो सिर्फ सेहतमंद तरीकों की बात कर रहा है। 

अब इस व्यक्ति से अलग हटकर कुछ बात करें, तो जिंदगी जीने के कई तरीके समझ पड़ते हैं। कई लोग जापानियों की तरह अधिक से अधिक लंबी जिंदगी जीना चाहेंगे, और उस देश में शायद दुनिया के सबसे अधिक शतायु लोग रहते हैं। हिन्दुस्तान में भी किसी को दुआ देना हो, तो कहा जाता है कि शतायु होओ। लेकिन क्या सौ बरस की उम्र सबके लिए अच्छी हो सकती है? आज तो साठ-पैंसठ बरस की उम्र में भी कई लोगों के हाथ-पांव चलना धीमा हो जाता है, बहुत से लोग इससे भी कम उम्र से तरह-तरह की दवाइयों पर आ जाते हैं। 70-75 के बाद तो शायद ही कोई ऐसे होंगे जो बिना मदद और सहारे के रह सकें। हिन्दुस्तान की अधिकतर आबादी ऐसी है जो कि इस उम्र की कमजोरी और बीमारी के खर्चें नहीं उठा सकती। परिवार भी बहुत लंबे जीने वाले बुजुर्गों से आमतौर पर थक जाते हैं, अगर वे परिवार को बहुत बड़ी विरासत दे नहीं चुके हैं, या फिर उनके बाद विरासत मिलने वाली न हो। एक सीमा के बाद किसी भी परिवार में बुजुर्ग धीरे-धीरे पारदर्शी सरीखे होने लगते हैं, उनकी आवाज अनसुनी होने लगती है, लोग उनके सामने से निकल जाते हैं, और बस यही मनाते रहते हैं कि वे आवाज न दे दें। कुछ लोगों को यह बात नाजायज लग सकती है, लेकिन जिन लोगों को जापानियों की तरह सौ बरस पार करने तक जिंदा रहना है, उन्हें ऐसी वजहों के बारे में सोच लेना चाहिए कि जिनसे उनके परिवार उन्हें पूछते रहें, पूजते रहें। आज शहरीकरण के साथ-साथ परिवार बुजुर्गों को बोझ चाहे न मानें, वे जिम्मेदारी तो बहुत बड़ी रहते ही हैं। अभी ही पिछले दस-बीस दिनों में कई ऐसे अदालती मामले सामने आए हैं जिनमें बूढ़े माँ-बाप का साथ न छोडऩे वाले बेटे को छोडक़र जाने वाली बहू से अदालत ने तलाक मंजूर कर लिया। इसलिए अमर होना तो एक सोच तक सीमित है, उससे परे भी लंबा बुढ़ापा कितना तकलीफदेह हो सकता है इसे देखना हो तो उन खबरों को देखें जिनमें अभी भारत में ही तीन बेटियों के गुजरे एक पिता के अंतिम संस्कार के लिए उन्होंने पैसे ही भेज दिए, और भारत में रहते हुए वीडियो कॉल पर पिता का अंतिम संस्कार देख लिया। मध्यप्रदेश में अभी पिछले ही साल पति-पत्नी, और बच्चे, बूढ़ी और बीमार माँ को घर में ताले में बंद करके महाकाल के दर्शन के लिए उज्जैन चले गए थे, और उधर कई दिन बंद रहने के बाद माँ गुजर गई, लाश की बदबू से पड़ोसियों ने पुलिस को खबर की। कई मामलों में दूसरे देशों में बसी हुई आल-औलाद हिन्दुस्तान आती हैं, तो बंद घर में माँ-बाप मरे पड़े मिलते हैं, जाने कब से। अभी चार दिन पहले ही छत्तीसगढ़ में एक बुजुर्ग महिला ने अपनी सौतेली बहू की प्रताडऩा से थककर दीवार पर आत्महत्या का नोट लिखकर वीडियो बनाकर खुदकुशी कर ली। इसलिए बुढ़ापा हर मायने में बहुत अच्छा नहीं होता है। लोगों को वृंदावन जाकर देखना चाहिए कि बूढ़ी महिलाओं को घर से रवाना करने के लिए कृष्णभक्ति के नाम पर किस तरह विधवाश्रम भेज दिया जाता है। 

फिर भी हम अपनी सेहत का ख्याल रखने को बड़ा ही जरूरी काम मानते हैं, अगर आपके घर के लोग आपके प्रति बहुत अच्छे हों, तो भी। लोगों की पहली जिम्मेदारी अपनी सेहत ठीक रखने की होती है क्योंकि यह शरीर आस्थावानों के ईश्वर ने, और आस्थाहीन लोगों के माँ-बाप या प्रकृति ने दिया हुआ है। जब तक खुद फिट न रहें, किसी दूसरे की मदद तो की भी नहीं जा सकती, दूसरों पर बोझ ही बना जा सकता है। इसलिए हम अमरत्व की किसी सोच से परे हर दिन बेहतर जीने के हिसाब से ही यह सोचते हैं कि लोगों को अपने तन, मन, और अपने धन की भी फिक्र करनी चाहिए। बुढ़ापे में जाकर बहुत से काम सिर्फ पैसों से हो सकते हैं। लगातार महंगे इलाज महानगरों से उपमहानगरों तक होते हुए अब मामूली शहरों तक भी पहुंचने लगे हैं, लेकिन हर किसी की आल-औलाद के पास माँ-बाप के अंतहीन इलाज की सहूलियत नहीं होती। लंबे इलाज में अच्छे-खासे लोग भी चुक जाते हैं। इसलिए हर किसी की जिम्मेदारी है कि अपने बच्चों पर एक सीमा से अधिक बोझ न डालें, अपने तन-मन को स्वस्थ रखें, और अपने बुढ़ापे के लिए धन का भी इंतजाम करके रखें। 

हमको मालूम है कि जिस देश में लोगों को खाने-पीने के भी लाले पड़े रहते हैं, सरकारी राशन से जिनके चूल्हे जलते हैं, उन्हें बचत की नसीहत एक बकवास के अलावा कुछ नहीं है, लेकिन जिंदगी के आखिरी बरसों में एकदम बेसहारा हो जाने से तो बेहतर यही होगा कि पूरी जिंदगी थोड़ा-थोड़ा इंतजाम करते चलें, अगर ताकत हो तो इलाज का बीमा भी करवा लें, सरकारी इलाज-बीमा भी इस्तेमाल करें, और यह मानकर चलें कि वे पूरी जिंदगी अपना जितना ख्याल रखेंगे, उतना ही वे आसपास के लोगों पर बोझ बनने से भी बचेंगे। अमरीकी खरबपति के अमरत्व की सोच कुछ और लोगों के काम की हो सकती है, लेकिन पूरी दुनिया के बहुत ही आम लोग भी अपने आपको तम्बाकू से, दारू और दूसरे नशे से बचाकर तो रख ही सकते हैं। ऐसी ही दो-चार चीजों को अगर जिंदगी से अलग रखा जाए, तो शायद दुनिया की एक चौथाई आबादी का बुढ़ापा बेहतर हो सकता है। यह बात सुनने में कुछ हैरान कर सकती है, लेकिन सच तो यह है कि रोज दारू या तम्बाकू पर लोग जितना खर्च करते हैं, उसे बचाकर ही अगर परिवार के इलाज का बीमा खरीदा जाए, तो शायद हर बरस 25-50 लाख तक के अस्पताल बिल का इंतजाम हो सकता है। ये आंकड़े काल्पनिक नहीं हैं, दारू और तम्बाकू इन दो चीजों से होने वाली बचत से ऐसी बीमा पॉलिसी ली जा सकती है। इलाज की नौबत से परे भी इन चीजों के बिना सेहत बहुत अच्छी रह सकती है। फिर हमने मन को सेहतमंद रखने की बात भी कही है, मन को नफरत से दूर रखकर देखें, कई किस्म की मानसिक बीमारियों, और बेचैनी या ब्लडप्रेशर जैसी शारीरिक बीमारियों से भी बच सकेंगे। हमारी इस चिट्ठी को तार समझना, वरना बीमार को पार समझना। (जिन्हें तार का मतलब नहीं मालूम है, एक वक्त चलने वाले टेलीग्राम को तार कहा जाता था, और तार पहुंचता था, तो लोग रोना पहले शुरू करते थे, उसे पढऩे को खोलते बाद में थे)। 

(Daily Chhattisgarh)   

क्या गैरराजनीतिक आधार पर तय होते हैं अमरीकी चुनाव?

03 सितंबर 2026  

 

अमरीका के 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में महिला वोटरों की सोच को लेकर अभी एक अध्ययन किया गया जिससे बड़े दिलचस्प नतीजे सामने आए हैं। दो तिहाई महिला वोटरों ने डॉनल्ड ट्रम्प के लिए वोट दिया था। इनमें से 68 फीसदी खुद को ईसाई मानती हैं। ईसाईयों के एक तबके, गोरे इवेंजेलिकल तबके की महिलाओं में से 80 फीसदी से अधिक ने ट्रम्प को वोट दिया था। दूसरी तरफ जो किसी धर्म से अपने को नहीं जोड़ती हैं ऐसी महिलाओं में से 80 फीसदी ने कमला हैरिस को वोट दिया था। अभी इस विश्लेषण में यह भी बताया गया है कि रिपब्लिकन पार्टी महिलाओं को राजनीतिक भाषणों से नहीं, बल्कि संस्कृति और जीवनशैली के माध्यम से जोड़ती है। अमरीकी संकीर्णतावादी, यानी दक्षिणपंथी रणनीति यह है कि महिलाओं से सीधे राजनीति की बात करने की जरूरत नहीं होती, बल्कि उन्हें सांस्कृतिक रूप से रूढि़वादी, परिवार समर्थक, राष्ट्रवादी, और पश्चिमी (स्थानीय) सभ्यता का समर्थक बनाया जाए। इन तमाम सांस्कृतिक मूल्यों के प्रतीकों, जैसे बाइबिल, इसी सोच के कुछ लोकप्रिय उपन्यास, इसी संस्कृति से जुड़े हुए कुछ ब्राँड, महिलाओं को यह सिखाते हैं कि उन्हें क्या मानना चाहिए, घर में कैसे सामान रखने चाहिए, इंटरनेट पर क्या देखना चाहिए, और कैसे मतदान करना चाहिए। लोगों को याद होगा कि ट्रम्प, और उनकी रिपब्लिकन पार्टी लगातार गर्भपात के अधिकार के खिलाफ रहते आई है, चर्च गर्भपात के ही खिलाफ रहता है, और इस तरह धर्म, पुराने सामाजिक मूल्य, और अब ट्रम्प के चुनिंदा जजों के बहुमत वाली सुप्रीम कोर्ट, इन सबने गर्भपात पर पूरे देश में जिस तरह प्रतिबंध लगा दिया है, उससे भी धर्मालु महिलाएं बहुत प्रभावित हुई हैं। यह रिपोर्ट एक दिलचस्प तथ्य सामने रखती है कि राजनीति में कोई दिलचस्पी न रखने वाली महिलाएं किसी तरह अमरीकी राजनीति के इस सबसे बड़े चुनाव को प्रभावित करती हैं। एक किस्म से अतिसरलीकरण किया जाए तो यह समझ आता है कि धर्म को मानने वाले लोगों का बहुतायत ट्रम्प के साथ रहा, और नास्तिकों का बहुमत उसकी विरोधी प्रत्याशी कमला हैरिस के साथ। 

अब किसी लोकतंत्र में होने वाले चुनाव को देखने के बहुत से अलग-अलग पहलू हो सकते हैं। एक पहलू राजनीतिक सोच के आधार पर चुनाव हो सकता है, लेकिन दूसरा पहलू बिना किसी राजनीतिक सोच के सिर्फ धर्म और संस्कृति के आधार पर तय होने वाली चुनावी प्राथमिकता, यानी वोट रहता है। जिस चुनाव को पूरी तरह से राजनीतिक चुनाव, राजनीतिक रणभूमि, राजनीतिक अखाड़ा कहा जाता है, उसमें मुकाबले का फैसला अगर पूरी तरह से गैरराजनीतिक होता है, तो यह अपने-आपमें बहुत दिलचस्प बात नहीं है! अमरीका, जो कि आज दुनिया का एक सबसे आधुनिक, सबसे विकसित, और संपन्न देश है, जहां औसत पढ़ाई-लिखाई खासी अधिक है, जहां सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता के सभी तरह के औजार, समाचार-विचार माध्यम खूब विकसित हैं, वहां पर चुनावी फैसले अगर गैरराजनीतिक आधार पर हो रहे हैं, तो फिर पार्टियों की राजनीतिक सोच का कम से कम ऐसे और इस देश में चुनाव जीतने के लिए बड़ा सीमित इस्तेमाल है। धर्म और संस्कृति, सामाजिक मूल्य और मेक अमेरिका ग्रेट अगेन जैसे राष्ट्रवादी नारे चुनाव के लिए काफी हैं! अमरीका का यह मॉडल ऐसा भी नहीं कि कोई विस्फोटक रहस्य सामने ला रहा है। दुनिया भर में जगह-जगह यह बात देखने मिल रही है कि राजनीतिक दलों, या अमरीका जैसी राष्ट्रपतीय प्रणाली में लोकतंत्र, राजनीति, अंतरराष्ट्रीय सोच से परे के मूल्य चुनाव में काम आ रहे हैं! 

न सिर्फ अमरीका, बल्कि पूरी लोकतांत्रिक दुनिया को अपनी-अपनी सरहदों के भीतर चलने वाली राजनीति, और होने वाले चुनावों को लेकर यह फिक्र करनी चाहिए कि परंपरागत रूप से सैकड़ों बरस से जिस राजनीतिक विचारधारा और दर्शन को सब कुछ मान लिया जाता था, वह बहुत कुछ नहीं है। बहुत कुछ तो वोटरों की वह सोच है जो कि पार्टी के राजनीतिक घोषणापत्र के आधार पर तय नहीं होती है, बल्कि किसी पार्टी के लोगों की धार्मिक, सांस्कृतिक, और राष्ट्रवादी सोच से तय होती है। क्या अमरीकी चुनाव में महिला वोटरों के रूझान के विश्लेषण के मॉडल को भारत पर भी लागू किया जा सकता है? अमरीका और भारत इन दोनों के चुनाव सौ अलग-अलग पैमानों पर एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हो सकते हैं, लेकिन यह भी हो सकता है कि दर्जनभर पैमानों पर ये दोनों चुनाव एक-दूसरे से कुछ या अधिक हद तक मिलते-जुलते भी लगें। भारत में जिस तरह ऐतिहासिक कामयाबी पाने वाली भारतीय जनता पार्टी ठोस राजनीतिक सोच से परे के कई धार्मिक, सामाजिक, और राष्ट्रवादी मूल्यों पर जनता का असाधारण समर्थन पाते आई है, और भारत में तो महिला वोटरों का अलग से कोई ऐसा विश्लेषण होता नहीं है, फिर भी ऐसा दिखता है कि महिला वोटरों का एक बड़ा बहुमत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा के साथ रहता है। तो क्या प्रधानमंत्री के राजनीतिक भाषणों से जुड़े बिना भी, उनकी व्याख्या किए बिना भी महिला वोटरों का एक बड़ा बहुमत धर्म, राष्ट्रीयता, और इस तरह के दूसरे मुद्दों पर तय होता है? सीधे-सीधे ऐसे कोई तुलना अतिसरलीकरण होगी, लेकिन इन दो मॉडलों में एक साम्य देखने की कोशिश एक दिलचस्प राजनीतिक अध्ययन का मुद्दा तो है ही। 

हमारा मानना है कि दुनिया के सारे लोकतंत्रों को, शासन व्यवस्थाओं को एक-दूसरे के तजुर्बों से बहुत कुछ सीखने मिलता है। कई राजनीतिक दल तो ऐसे रहते हैं जो अपने राष्ट्रीय सम्मेलनों में दुनिया के बहुत से दूसरे देशों के प्रतिनिधियों को भी पर्यवेक्षकों की तरह आमंत्रित करते हैं। राष्ट्रीय सम्मेलनों के मंच पर कोई गोपनीय चर्चाएं तो होती नहीं हैं, इसलिए विपक्षियों, और राजनीतिक विरोधियों को भी वहां आमंत्रित करने में कोई नुकसान नहीं रहता, किसी-किसी देश में कोई-कोई पार्टी ऐसी उदारता दिखाती भी है। हम ऐसे ही राजनीतिक विश्लेषण के लिए अमरीकी महिला मतदाताओं पर किए गए इस अध्ययन के मॉडल पर भारत को भी रखकर देखना चाहते हैं, हो सकता है कि यहां के कुछ राजनीति शास्त्र के जानकार, विशेषज्ञ, या विश्लेषक ऐसा कर सकें। और दुनिया के कुछ दूसरे अलग-अलग लोकतांत्रिक देशों को लेकर भी यह चर्चा हो सकती है कि वहां पर चुनाव क्या पूरी तरह राजनीतिक मुद्दों पर होते हैं, या उन पर कोई और गैरराजनीतिक असर भी होता है? 

(Daily Chhattisgarh)   

पीएनबी की नगदी-तिजोरी 17 करोड़ के नकली नोटों से लबालब, कई सस्पेंड..

02 सितंबर 2026  

 

उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में पंजाब नेशनल बैंक के करेंसी चेस्ट में असली नोटों की जगह नकली नोट रख देने के आरोप में बैंक के ही कई वरिष्ठ अफसरों को निलंबित किया गया है, और उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है। यह मामला इतना बड़ा है कि इसकी जांच के लिए पुलिस के बड़े अफसरों की एक टीम बनाई गई है। अब तक जो बात निर्विवाद रूप से सामने आई है उसके मुताबिक सहारनपुर में इस राष्ट्रीयकृत बैंक के करेंसी चेस्ट (तिजोरी) से जयपुर रिजर्व बैंक में भेजे गए नोट कम निकले, तो आंतरिक जांच शुरू हुई। 9 अगस्त को पूरी जांच-पड़ताल में यह पता लगा कि इस तिजोरी में 7 करोड़ 40 लाख रूपए के नकली नोट थे। इन नोटों को गड्डियों में ऊपर-नीचे एक-एक असली नोट लगाकर रख दिया गया था। इसकी जगह के असली नोट गायब हो गए। जांच के दौरान ही यह पता लगा कि असली की जगह नकली नोटों की यह जालसाजी करीब 17 करोड़ रूपए की है। अब जांच इस बात की भी हो रही है कि पांच-पांच सौ रूपए के इतने नकली नोट लाए कहां से गए, और उन्हें किस तरह इतनी बड़ी मात्रा में तिजोरी तक लाया ले जाया गया? इसे लेकर हरियाणा, उत्तराखंड, और यूपी के जिलों में छापे पड़ रहे हैं कि असली नगदी कहां खपाई गई। 

एक राष्ट्रीयकृत बैंक में इतनी बड़ी संगठित जालसाजी हैरान करती है। पंजाब नेशनल बैंक देश के सबसे बड़े सरकारी बैंकों में से एक है, यह अलग बात है कि यह बैंक बीते बरसों में लगातार तरह-तरह की जालसाजी और धोखाधड़ी की खबरों से घिरा रहा है। फिर भी इस पैमाने पर, इतने संगठित रूप से, बैंक की तिजोरी में नकली नोटों का इतना कारोबार सुनना भरोसेमंद नहीं लगता है। लेकिन अब जब सब कुछ जब्त हो चुका है, पुलिस की जांच अब आगे तक पहुंच गई है, तो इस पर भरोसा करने के अलावा और कोई जरिया नहीं है। हम अपने बहुत आसपास छत्तीसगढ़ में ही देखते हैं तो कोई ऐसा हफ्ता नहीं गुजरता जब नामी-गिरामी बैंक किसी न किसी जुर्म में फंसे हुए सामने नहीं आते हैं। जाने कितने ही बैंकों के अफसर गिरफ्तार हो चुके हैं, जिन्होंने सरकारी खातों का पैसा खा लिया था, लोगों का पैसा खा लिया था, लोगों के नकली खाते खोलकर उन्हें मुजरिमों को किराए पर दे दिया था, यहां तक कि कुछ ऐसी शिकायतें भी हैं कि बैंकों के लॉकरों से गहने गायब कर दिए। कुछ बरस पहले छत्तीसगढ़ के एक आईएएस अफसर के भाई के कारखाने की कंपनी में एक गांव के लोगों का पूंजीनिवेश दिखा दिया गया था, इसके लिए उन सबके नकली आधार कार्ड बनवा लिए गए थे, एक ही ब्रांच ने पूरे गांव के लोगों के बैंक खाते खोल दिए थे, हर खाते में लाखों रूपए नगद डाल दिया गया था, और हर खाते से पैसा उस कंपनी में ट्रांसफर कर दिया गया था। एक छोटी सी बैंक ब्रांच ने करोड़ों या दसियों करोड़ रूपए के कालेधन को सफेद कर दिया था। 

बैंकों और बाजार के जानकार लोगों के बीच नोटबंदी के दौर में यह चर्चा थी कि किसी भी बैंक में आने वाली नगदी में बैंक के कर्मचारी नकली नोट मिला-मिलाकर उसे जमा करते जा रहे थे, क्योंकि उन्हें यह मालूम था कि इन बंडलों की दुबारा जांच नहीं होनी है। इस तरह से बाजार में जितने नकली नोट चलन में थे, वे भी असली बनकर किसी न किसी खाते में जमा हो गए थे। इसमें बैंक कर्मचारियों, और कारोबारियों ने मिलकर काम किया था। आज भी बैंकों के जितने बड़े कर्ज डूबते हैं, उनके फोरेंसिक ऑडिट हो जाएं, तो यह बात साफ हो जाएगी कि कोई भी धोखाधड़ी या जालसाजी बैंक अफसरों की भागीदारी के बिना नहीं हो सकती। और बाद में एक-एक बड़ा बैंक किस तरह दसियों हजार करोड़ रूपए के कर्ज माफ करता है, इसकी जानकारी भी बैंक कर्मचारी एसोसिएशन सामने रखते आए हैं। 

लेकिन बैंकों तक पहुंचने वाले साधारण, और गरीब, कम पढ़े-लिखे, या बूढ़े लोगों को बैंक जिस हद तक धोखा दे रहे हैं, क्या उस पर अधिक बड़ी सजा का इंतजाम नहीं करना चाहिए? ये लोग अगर चीन में रहते तो साल भर की सुनवाई में ही उन्हें फांसी हो जाती। हम मौत की सजा की वकालत तो नहीं करते, हम उसके खिलाफ हैं, लेकिन इनकी हरकतें उसी के लायक है। पूरी की पूरी बैंकिंग व्यवस्था एक भरोसे पर चलती है, लोग अपनी पूरी जमा पूंजी ले जाकर बैंकों को देकर कागज पर सील-ठप्पा लगा हुआ एक टुकड़ा पाकर भरोसे में रहते हैं कि उनका पैसा सुरक्षित है। अब चारों तरफ बैंकों के बाहर के मुजरिम बैंक कर्मचारियों, और अधिकारियों को रिश्वत देकर वहां पर थोक में खाते खुलवाते हैं, उनमें जुर्म का पैसा जमा करते हैं, और निकालते हैं। अभी कुछ ही दिन पहले एक बड़े अखबार ने एक खोजी रिपोर्ट के लिए स्टिंग ऑपरेशन किया था जिसमें अलग-अलग बैंकों के कर्मचारियों ने रिश्वत के एवज में सट्टेबाजी के पैसे के लिए फर्जी खाते खोलने का पूरा सौदा किया था, और यह भी बता दिया था कि अगर बहुत अधिक रकम की आवाजाही होने से ऊपर से जांच होगी तो भी वे पहले बता देंगे ताकि सट्टेबाज रकम निकाल सकें। जितने भरोसे के साथ एक-एक करके कई नामी-गिरामी बैंकों के कर्मचारी-अधिकारी ने ये सौदे किए थे, वह सुनना भी भयानक था। जब बाड़ ही खेत खाने लगे, तो उसमें खड़ा किया गया बिजूका फसल को क्या बचा लेगा? 

हम तो जालसाजी के इन मामलों के बिना भी हैरान होते रहते हैं, और अपने इस कॉलम में कई बार लिखते रहते हैं कि जब किसी बैंक खाते में पैसे जमा होने की सुनामी आती है, और हर दिन हजारों बार जमा होकर हर दिन शाम-रात को पूरी रकम निकाल ली जाती है, तो क्या बैंक के कंप्यूटर इस असामान्य आवाजाही को नहीं पकड़ सकते हैं? जो शरीफ और ईमानदार लोग हैं, उनसे तो बैंक एक-एक कागज इतनी बारीकी से लेता है कि जिसकी कोई हद नहीं, और जालसाजों का इतना संगठित कारोबार चलते रहता है कि जिसकी हद नहीं। यह सब बैंक अफसरों की मिलीभगत (या मौलाना-पादरी जो भी कहना हो) के बिना थोड़े ही हो जाता है। 

बैंक चूंकि सरकार और जनता दोनों के पैसों के रखवाले रहते हैं, कारोबार उन्हीं के मार्फत चलाने के सरकारी नियम भी हैं, इसलिए बैंकों का कोई विकल्प नहीं है। आज हालत यह है कि साइबर ठगी, जालसाजी, और ब्लैकमेलिंग करने वालों को भी बैंकों की जरूरत पड़ती ही है। ऐसे में सरकार को बैंक कर्मचारियों के किए हुए जुर्म के लिए अलग से सजा का इंतजाम करना चाहिए, क्योंकि चौकीदार ही अगर चोर हो जाए, तो उसकी निगरानी में रखी गई चीजों को कोई नहीं बचा सकते। बैंक अगर जनता का भरोसा खोते जा रहे हैं, तो लोग बैंकों में अपनी रकम रखने के बजाय उसे शेयर मार्केट में लगाना पसंद करेंगे, या उससे सोना या जमीन खरीदना चाहेंगे। अगर जमाकर्ताओं का भरोसा खोने से बैंक कारोबार खोने लगेंगे, तो ऐसे बैंकों में नौकरियां भी खत्म होने लगेंगी। खुद बैंक कर्मचारियों, और अधिकारियों के संगठनों को इस बारे में इसलिए गौर करना पड़ेगा कि दो-चार फीसदी मुजरिम कर्मचारी-अधिकारी बाकी सारे लोगों की इज्जत खत्म करते हैं, और बैंकों का ढांचा भी कमजोर करते हैं। जिन लोगों की अपनी पूरी जिंदगी बैंकों की तनख्वाह पर चलती है, उन्हें भी कुछ अतिरिक्त फिक्र करनी चाहिए कि बैंकिंग में जुर्म इस हद तक न बढ़ जाए कि बैंक जुर्म के पैसों के लिए एक रेडिमेड प्लेटफॉर्म की तरह काम करने लगे, और खुद भी हर किस्म के जुर्म करने लगे। पंजाब नेशनल बैंक का नकली नोटों का यह ताजा मामला दिल दहलाने वाला है, 17 करोड़ रूपए के ये नकली नोट अगर चलन में आ जाते, तो शायद लाखों लोग नकली नोट चलाते रहते, और शायद सैकड़ों या हजारों बेकसूर घेरे में आ जाते।

(Daily Chhattisgarh)   

नशे पर सवार दौलत का अहंकार, इस हिंसा पर अतिरिक्त सजा जरूरी..

01 सितंबर 2026  

 

अभी दिल्ली से लगे हुए यूपी के नोएडा के एक महंगे रिहायशी कॉम्पलेक्स का एक वीडियो सामने आया जिसमें देर रात दो बजे नशे में धुत्त वहां रहने वाली एक महिला ने इमारत के एक-एक गार्ड को माँ-बहन की गालियां बकते हुए उन्हें अखिलेश यादव का कुत्ता कहा, भंगी कहा, पुलिस बुलाने पर पुलिस अफसर से चप्पलें खिलवाने की धमकी दी। ऐसा कम से कम चार-पांच मिनट का यह वीडियो अपने को ताकतवर, रूतबे वाली करार देती हुई इस महिला का लोगों के बीच सुनने लायक भी नहीं है क्योंकि उसने माँ-बहन की गालियों की विविधता भी पेश की है। लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह थी कि वह हर चौथे वाक्य में गार्डों को गरीब कह-कहकर गाली दे रही थी। उसके हिसाब से गरीब होना एक बड़ी गाली के लायक जुर्म था। बाद में पुलिस को बुलाने पर उसने इस महिला का चालान किया, और बॉंड भरवाकर छोड़ दिया। 

दिल्ली के आसपास के संपन्न इलाकों से हर कुछ हफ्तों में पैसे वाले तबके की किसी न किसी महिला का ऐसा वीडियो सामने आता है जो नशे में धुत्त रहती है, और कॉलोनी के सुरक्षा गार्डों को धमकाती रहती हैं, मारती रहती हैं, और ऐसी अश्लील गालियां देती रहती हैं, जिन्हें आमतौर पर सडक़ के लोगों का सडक़छाप विशेषाधिकार माना जाता है। इनमें से हर किसी को पता रहता है कि उनकी रिकॉर्डिंग कैमरों पर हो रही है, सीसीटीवी कैमरों पर भी, और सामने से मोबाइल कैमरों पर भी। इसके बावजूद उन्हें ऐसी हरकतों से परहेज नहीं रहता। इनकी बातचीत में अपनी हस्ती, और सामने वाले की औकात की बातें तरह-तरह की गालियों के साथ गूंजती रहती हैं। सबसे बड़ा गुमान उन्हें अपने पैसों का रहता है। तैश का अंदाज यह रहता है कि गरीब गार्ड, टैक्सी ड्राइवर, किसी रेस्त्रां के वेटर को गालियां देते बार-बार यह कहते हैं कि वे जानते नहीं कि वे कौन हैं? ऐसा ही सडक़ों पर गाडिय़ों के भिड़ जाने पर, किसी के सामने आ जाने पर भी किया जाता है। मतलब यह कि संपन्नता नशे के सिर पर सवार होकर एक अलग सुपरनागरिकता दिला देती है। 

यह देश अपने गौरवशाली इतिहास पर चाहे कितना ही दंभ भरे, आज का सच तो यह है कि पैसों की ताकत, सत्ता या किसी और किस्म के ओहदे की ताकत जिस तरह यहां सिर चढक़र बोलती है, उससे लगता है कि देश के एक हिस्से को ऐसे संपन्न लोगों की नागरिकता के लिए अलग से रिजर्व कर देना चाहिए, ताकि वे बाकी गरीब लोगों की छाया से भी दूर रह सकें। एक वक्त था जब नीची कही जाने वाली कुछ जातियों के लोगों को गले में हंडी टांगकर चलना पड़ता था, ताकि उनकी शिनाख्त अलग से हो सके, और उन्हें थूकना हो तो हंडी में ही थूकें, जमीन पर नहीं। आज भी गरीब से हिकारत आम बात है। शहरी भीड़ में जाति तो उतनी आसानी से नहीं पहचानी जाती, लेकिन गरीबी तो हुलिए से दिख जाती है। ऐसे गरीबों से हिकारत उसी तरह की रहती है जिस तरह कुछ तबकों को अछूत मानते हुए उनसे सदियों से हिकारत चली आ रही है। 

अगले दिन जब एक बड़े अखबार ने नोएडा की इस महिला से बात की, तो उसे अपने किए हुए पर जरा भी मलाल नहीं था। उसने खुद होकर कहा कि उस रात उसने पी रखी थी, और उसने बाहर से खाना मंगाया था, लेकर आए हुए लडक़े को गार्डों ने गेट पर रोक दिया था क्योंकि रात के दो बजे थे। इस महिला को फोन लगाया गया, लेकिन जवाब न मिलने पर डिलिवरी ब्वॉय को भीतर नहीं जाने दिया गया। इस बात को लेकर उसने नशे की हालत में नीचे आकर गार्डों को पीटने की भी कोशिश की, उन्हें सबसे गंदी गालियां दीं, जाति की गालियां दीं, धमकियां दीं, और जाने क्या नहीं किया। भारत कहने के लिए अपने को बड़ी महान संस्कृति वाला देश कहता है, लेकिन यहां आज ऊंची समझी जाने वाली जातियों का अहंकार, नीची समझी जाने वाली जातियों से भेदभाव, बहुसंख्यक, और अल्पसंख्यक धर्म के लोगों के अधिकारों के बीच भेदभाव, अफसरों और जनता के बीच भेदभाव, अमीर और गरीब के बीच भेदभाव सिर चढक़र बोलता है। इस सिलसिले का कोई अंत नहीं है। लोग जितनी बड़ी और जितनी महंगी गाडिय़ों पर चलते हैं, उनका अहंकार भी उतना ही बड़ा हो जाता है, वे सडक़ों पर भी एक अलग, खास दर्जे के बनकर चलते हैं, मानो उन्हें सडक़ पर अपनी बड़ी गाड़ी की वजह से, अपनी अहंकारी औकात की वजह से एक अलग दर्जा मिलना चाहिए। भारत में गैरबराबरी इस हद तक सिर चढक़र बोलती है, और यह गैरबराबरी का प्रदर्शन इतना बढ़ते चल रहा है कि देश की सभ्यता मानो रिवर्स गियर में चल रही है, पीछे की तरफ जा रही है। 

दुनिया के सभ्य देशों में कोई आम और खास नहीं होते, सबके सार्वजनिक अधिकार बराबर होते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान में वीआईपी, और वीवीआईपी दर्जे ऐसे खड़े कर दिए गए हैं कि अंग्रेज चले गए, अपनी काली औलादें छोड़ गए। इन तबकों के लोग उसी हवा में साँस कैसे ले पाते हैं जिस हवा में आम लोग भी साँस लेते हैं, यह समझना मुश्किल रहता है। क्यों ये लोग अपने लिए एक अलग से बुलबुले की शक्ल का, कांच के डोम वाला शहर नहीं बना लेते, जहां आम लोगों की छोड़ी हुई साँस भी हवा में न मिल सके? क्यों ये लोग अपने लिए सीधे गंगोत्री से पाईप लाईन नहीं बिछवाते ताकि नीची कही जाने वाली जातियों, गरीबों, और गैरवीआईपी लोगों की छुई हुई नदी का पानी इन्हें न लेना पड़े? क्यों ये लोग गरीबों के साथ एक मेट्रो में, एक प्लेन में, या एक ट्रेन में चाहे अलग डिब्बे में ही क्यों न सही सफर करते हैं? ऐसी कई बातें आज भी परेशान करती हैं कि ताकतवर तबके क्यों इतने कमजोर तबकों के लोगों के साथ एक ही धरती पर जीते हैं, क्यों इन लोगों को छोडक़र वे ऊपर स्वर्ग नहीं चले जाते?  

हम बीते कुछ दशकों से यह बात लिख रहे हैं कि जब संपन्न या ताकतवर तबके किसी विपन्न या कमजोर तबके के खिलाफ कोई जुर्म करते हैं, तो उसके लिए अलग से सजा का इंतजाम होना चाहिए। हो सकता है कि दो साधारण, या आम लोगों के बीच जुर्म पर जितनी सजा हो, दौलतमंद के गरीब के खिलाफ जुर्म पर उसी सजा को दुगुना कर दिया जाए, या बड़े नेता या अफसर के किसी छोटे कर्मचारी, या कमजोर जनता पर किए गए जुल्म पर आम जुर्म के मुकाबले दोगुनी सजा कर दी जाए? इस देश में न्याय व्यवस्था में ऐसे फेरबदल की जरूरत है ताकि गरीबों पर होने वाले जुल्म को रोकने के लिए अधिक और अतिरिक्त सजा का इंतजाम किया जाए, उसके बिना नशे में धुत्त पैसे वाले गरीबों को इसी तरह माँ-बहन की गालियां देते रहेंगे। 

(Daily Chhattisgarh)