संजय गांधी से लेकर जोगी तक राजनीति में अनैतिक कामों का बड़ा लंबा इतिहास

30 अप्रैल 2024

  

पहले गुजरात के सूरत में कांग्रेस उम्मीदवार पार्टी को दगा देकर बैठ गया, और फिर मध्यप्रदेश के इंदौर में तो भाजपा के वहां के सबसे बड़े नेता कैलाश विजयवर्गीय ने खुद गाड़ी में ले जाकर कांग्रेस उम्मीदवार का नाम वापिस करवा दिया। इसके बाद इन दो सीटों पर तो कोई चुनाव बचा ही नहीं। इनके अलावा मध्यप्रदेश की खजुराहो सीट पर इंडिया गठबंधन की समाजवादी पार्टी की प्रत्याशी मीरा यादव का पर्चा खारिज हो गया था क्योंकि उस पर दस्तखत नहीं था। उसे भी सोचा-समझा काम माना जा रहा है। अभी हो सकता है कि देश में कुछ और जगहों पर भी ऐसा हो जाए। लोकतंत्र में कानून के तहत जिस तरह की साजिशों की गुंजाइश रहती है, यह उनमें से कुछ नमूने हैं। न तो ऐसा पहली बार हो रहा है, और न ही भाजपा पहली पार्टी है जो कि ऐसा करवा रही है। लेकिन हैरान यह बात करती है कि जो पार्टी चार सौ से अधिक सीटों का दावा कर रही है, उसे ऐसा करवाने की जरूरत क्या पड़ रही है? क्या भाजपा का आत्मविश्वास (या अतिआत्मविश्वास?) कुछ कमजोर पड़ रहा है कि वह मोदी सरकार और अपनी राज्य सरकारों की सफलता के दावे छोडक़र मंगलसूत्र को मुद्दा बना रही है? 

लेकिन इससे परे यह भी याद रखने की जरूरत है कि जब जिस पार्टी की हवा चलती है, वह इसी तरह के काम करने में लग जाती है। छत्तीसगढ़ में 2000 में मध्यप्रदेश से अलग होकर पहली बार कांग्रेस की सरकार बनी, तो एक गैरविधायक अजीत जोगी मुख्यमंत्री बने। उनके पास कांग्रेस विधायकों का पर्याप्त बहुमत था, लेकिन उन्होंने विधानसभा में आने के लिए एक भाजपा विधायक से इस्तीफा दिलवाकर वहां से उपचुनाव लड़ा जो कि भाजपा का राजनीतिक मखौल उड़ाने जैसा काम था। इसके बाद उन्होंने भाजपा के दर्जन भर विधायक खरीदे, क्योंकि विधानसभा के भीतर तो कांग्रेस का स्पष्ट बहुमत था, लेकिन कांग्रेस विधायक दल के भीतर बहुत कम लोग जोगी के नामलेवा थे। इसलिए भाजपा से इतने विधायकों को तोडक़र जोगी ने कांग्रेस विधायक दल में अपनी निष्ठावान सदस्य बढ़ाए थे, और अपनी ताकत का अनुपात बेहतर किया था। इसके तुरंत बाद 2003 का चुनाव हुआ, तो कांग्रेस की बुरी शिकस्त हुई, जोगी सरकार को जनता ने खारिज किया, लेकिन जोगी को यह बर्दाश्त नहीं हुआ, और उन्होंने बस्तर के उस वक्त के भाजपा सांसद बलीराम कश्यप के साथ मिलकर भाजपा से परे एक सरकार बनाने की कोशिश की, इसके लिए नगद रकम भी खर्च की गई, और कांग्रेस विधायक दल की तरफ से जोगी ने राज्यपाल के नाम एक समर्थन पत्र भी दिया जिसमें सोनिया गांधी की सहमति-अनुमति होने का झूठा दावा किया गया था। वह पूरा मामला भांडाफोड़ होने से वह छत्तीसगढ़ की इतिहास का सबसे बड़ा, और देश के इतिहास का एक सबसे बड़ा विधायक खरीद-बिक्री कांड हुआ था। 

लोगों को याद होगा इसके बाद प्रदेश में तीन बार राज करने वाली भाजपा की रमन सिंह सरकार के चलते हुए बस्तर के अंतागढ़ उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार को बेचते हुए अजीत जोगी और उनका बेटा अमित जोगी टेलीफोन रिकॉर्डिंग में पकड़ाए, और खरीदते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह, और उनका दामाद कॉल रिकॉर्डिंग में फंसे। जोगी प्रदेश कांग्रेस में कोई और नेता बर्दाश्त नहीं कर पाते थे, और पार्टी को नीचा दिखाने के लिए, उन्होंने अपने प्रभाव वाले उम्मीदवार को सत्तारूढ़ भाजपा के हाथ बेच दिया था, और इस खरीद-बिक्री की टेलीफोन रिकॉर्डिंग्स बताती थी कि अजीत जोगी ने उस वक्त के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल को नीचा दिखाने के लिए क्या-क्या नहीं किया था। इस अंतागढ़ टेपकांड के सारे सुबूत सामने आने के बाद अमित जोगी को पार्टी से निलंबित किया गया था, और इसके साथ ही जोगी का कांग्रेस से नाता भी खत्म हुआ था। आज जिस तरह गुजरात के सूरत में कांग्रेस उम्मीदवार ने आखिरी पल में जाकर अपना नामांकन वापिस लिया है, और उसके साथ-साथ सत्तारूढ़ भाजपा की तमाम मशीनरी ने सूरत के बाकी सारे उम्मीदवारों को शाम-दाम-दंड-भेद से बिठा दिया था, और भाजपा उम्मीदवार की देश में सबसे पहली जीत घोषित हो पाई, ठीक वैसा ही काम छत्तीसगढ़ की अंतागढ़ सीट पर भी किया गया था। अंतागढ़ विधानसभा उपचुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा प्रत्याशी को छोडक़र बाकी हर उम्मीदवार को बिठा दिया गया था, और सिर्फ एक उम्मीदवार सत्ता की पकड़ में नहीं आया था, इसलिए चुनाव की नौबत आई थी, वरना सूरत की तरह वहां भी बिना चुनाव सत्तारूढ़ पार्टी के उम्मीदवार को निर्वाचित घोषित कर दिया गया होता। 

देश में वामपंथी दलों को छोडक़र अधिकतर पार्टियां ऐसी रही हैं जिन्हें किसी भी तरह की खरीद-बिक्री से परहेज नहीं रहा। नेता निजी स्तर पर बिकते हैं, और पार्टियां संगठन के स्तर पर खरीददारी करती हैं, भारतीय संसदीय व्यवस्था दुनिया की एक सबसे अश्लील और बेशर्म मंडी बनी हुई है। दिक्कत यह है कि चुनाव कानूनों के तहत इनमें से कोई भी बात जुर्म नहीं है, और लोग अपनी काया या आत्मा जो भी बेचें, उसमें कुछ गैरकानूनी नहीं रहता। इतना जरूर है कि इस देश में देह बेचने वाली महिलाओं को तो जेल भेजने का पूरा इंतजाम है, लेकिन आत्मा बेचने वाले उम्मीदवारों, निर्वाचित नेताओं, और बाकी राजनेताओं के सम्मान के लिए मालाएं हैं, कानून की अदालत में रियायत है, जांच एजेंसियों से छूट है। अभी इंदौर में जिस कांग्रेस उम्मीदवार ने आखिरी पल में अपना नाम वापिस लिया और भाजपा में शामिल हुआ, उसके बारे में बताया जा रहा है कि राज्य पुलिस ने उसके खिलाफ कोई पुराना मामला ढूंढकर उसमें कोई नई गंभीर दफा जोड़ी थी, और रातों-रात कांग्रेस से गद्दारी करने के पीछे शायद वह भी एक वजह थी। 

आज देश भर में मोदी सरकार की जांच एजेंसियों के घेर में आए हुए लोगों के भाजपा में जाने के बहुत से मामले गिनाए जाते हैं। लेकिन यह याद रखने की जरूरत है कि इमरजेंसी के वक्त जगजीवन राम को कांग्रेस छोडक़र विपक्ष में जाने से रोकने के लिए किस तरह की कोशिशें की गई थीं, और फिर मानो उन्हें सजा देने के लिए उनके बेटे सुरेश राम की 21 बरस की छात्रा-मित्र के साथ नग्न तस्वीरों से मेनका गांधी की पत्रिका, सूर्या, का पूरा एक अंक ही भर दिया गया था। इस पूरे स्कैंडल से जगजीवन राम के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने की हसरतें धरी रह गई थीं। इसलिए किसी को पार्टी छोडऩे से रोकने के लिए, या पार्टी छोडऩे की सजा देने के लिए तरह-तरह के अनैतिक कामों का इस देश में लंबा इतिहास रहा है। आज भाजपा लोगों को घेरकर जांच और मुकदमे की नोंक पर अपनी पार्टी में ला रही है, लेकिन यह नया सिलसिला नहीं है, इन दिनों बहुत अधिक बढ़ा हुआ जरूर है। ऐसा लगता है कि न तो भारत का चुनाव कानून, और न ही किसी दूसरे तरह के कानून ऐसी साजिशों को रोक पा रहे हैं, हमारा यह मानना है कि दलबदल करने वाले लोगों के खिलाफ कानून कड़ा करने की जरूरत है। लोग अगर थोक में भी दलबदल करें, तो भी इसे नए दल के रूप में मान्यता देने के बजाय सभी का बचा हुआ कार्यकाल खत्म करने के बारे में भी सोचना चाहिए कि क्या वह प्रावधान अधिक न्यायसंगत होगा? इसके अलावा नई पार्टी में किसी के जाने पर कुछ बरस तक उसके चुनाव लडऩे पर रोक रहनी चाहिए, ऐसा इसलिए भी होना चाहिए कि रातों-रात इम्पोर्ट करके अगली सुबह उम्मीदवार बनाने की बेइंसाफी खत्म हो सके। आज भाजपा ने दूसरी पार्टियों से इतने अधिक लोगों को लाकर उम्मीदवार बनाया है कि एक मजाक चल रहा है कि जो लोग बचपन से शाखा जाते थे, और जनसंघ के वक्त से पार्टी में लगातार बने हुए हैं, उन्हें भाजपा टिकटों में आरक्षण मिलना चाहिए। लेकिन मजाक से परे हकीकत यह है कि अपनी पार्टी को धोखा देकर दूसरी पार्टी से चुनाव लडऩे के सिलसिले को कुछ खत्म किया जाना चाहिए, इसे कैसे किया जा सकता है, उस पर चर्चा होनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 अप्रैल 2024



 

दुश्मन तो बस राजधानियों में बसा करते हैं, बाकियों के दिल साथ-साथ धडक़ते हैं..

 29 अप्रैल 2024

  

हिन्दुस्तान-पाकिस्तान सरहद के दोनों ओर गिने-चुने ताकतवर लोगों की सरकारी और फौजी नफरत या रणनीति के बीच पाकिस्तान की 19 बरस की आयशा के सीने में हिन्दुस्तानी दिल धडक़ता है। उसके दिल के ट्रांसप्लांट के बिना उसका अधिक वक्त जिंदा रहना मुमकिन नहीं था, और हिन्दुस्तान के चेन्नई के अस्पताल और डॉक्टरों ने यह ट्रांसप्लांट किया, और इस ऑपरेशन के लिए पाकिस्तान में रकम भी इकट्ठा नहीं हो पाई थी, हिन्दुस्तानी डॉक्टरों और अस्पताल में एक ट्रस्ट की मदद से आयशा को नई जिंदगी देने की यह पहल और कोशिश की है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक ऐश्वर्यम ट्रस्ट अब तक 175 हार्ट ट्रांसप्लांट में मदद कर चुका है, और दूसरे बहुत से इलाज और ऑपरेशन में भी। 

हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच जो सरहदी तनातनी चल रही है, उसके पहले तक लोगों की सीधी आवाजाही थी, ट्रेन और बस से लोग आते-जाते थे, और अनगिनत पाकिस्तानियों को हिन्दुस्तान की बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं से नई जिंदगी मिलती थी। जब तक सरकारों के बीच तनातनी नहीं हुई, तब तक हिन्दुस्तान में जनता को यह कभी नहीं लगा कि पाकिस्तानियों को हिन्दुस्तान में इलाज क्यों मिले। लेकिन जब सरकारों, फौजों, और राजनीतिक दलों को खाई खोदना सुहाने लगा, तो फिर जनता के बीच भी नफरत के फतवे तैरने लगे। इलाज की बात तो अलग रही, जो रोजाना के हर किस्म के कारोबार की बात थी, और दोनों देशों के बीच आपसी मुनाफे का जो हाल था, उसे भी राजधानियों में बैठे लोगों की राजनीति और रणनीति ने खराब कर दिया। दोनों मुल्कों के बीच करोड़ों लोगों की सरहद पार रिश्तेदारी है, उनका भी आना-जाना बंद सरीखा हो गया। अब किसी और मुल्क से होते हुए भारत और पाकिस्तान के बीच आवाजाही हो पाती है, और वह भी बड़ी सिमट गई है। दोनों देश सरहद पर फौजी खर्च बर्बाद किए जा रहे हैं, बर्फ लदी सरहद पर हर बरस जाने कितने ही जवान शहीद या कुर्बान हो जाते हैं, लेकिन राजधानियों को रिश्ते सुधारना नहीं सुहा रहा है। तनाव को इस दर्जे पर ले जाया गया है कि फिल्म और टीवी के कारोबार में भी सरहद पार के लोगों का आकर काम करना रोक दिया गया है, और जो जनता दोनों तरफ के फिल्म, संगीत को पसंद करती है, उसे भी मन मारकर चुप रहना पड़ता है। 

लोगों को याद होगा कि जब सुषमा स्वराज हिन्दुस्तान में विदेश मंत्री थीं, तब पाकिस्तान में भारत की एक गीता नाम की लडक़ी जाने किस तरह वहां गुम हो गई थी, और वहां के एक बहुत बड़े समाजसेवक, अब्दुल सत्तार ईधी परिवार की देखरेख में थी, और वहां पर वह हिन्दू धर्म का पालन भी करती थी, और उस परिवार ने उसे बेटी की तरह अपनाया हुआ था। सरहद के दोनों तरफ इंसानियत की खूबी कही जाने वाली ऐसी बहुत सी कहानियां बिखरी हुई हैं, और इनसे दोनों तरफ इंसानों का एक-दूसरे पर भरोसा बना हुआ है। दिक्कत सिर्फ राजधानियों में बसे हुए नेताओं और फौजी अफसरों को है जिनको अपने घरेलू दिक्कतों से उबरने के लिए भी सरहद पर तनातनी और पड़ोसी से रिश्ते बिगाडऩे में सहूलियत लगती है। नतीजा यह है कि दोनों देशों के गरीबों की रोटी के हक बेचकर फौजों पर खर्च किया जा रहा है, और हवा में दुश्मन पेश करके अपने-अपने लोगों को हवा में लाठी चलाने की खुशी मुहैया कराई जा रही है। 

हम फिर आयशा की बात पर लौटें, तो इन दोनों मुल्कों की हकीकत यही है। किस तरफ के डॉक्टर, किस तरफ के मरीज, किस तरफ किसी मरीज से मिला हुआ दिल, किस तरफ जमा की गई रकम, इनमें से कुछ भी आड़े नहीं आता, और भले लोग बिना किसी भेदभाव के, किसी धर्म या मजहब का ख्याल किए बिना एक-दूसरे के काम आते हैं। हम यहां पर इस बात और बहस में भी जाना नहीं चाहते कि कौन किसके अधिक काम आते हैं, और कौन किसके कम। लेकिन सच तो यह है कि एक फिल्म, बजरंगी भाईजान, की कहानी की तरह दोनों तरफ के लोग एक-दूसरे की मदद करने को अपनी जान देने पर भी उतारू रहते हैं, और असल जिंदगी की ढेरों कहानियां इस फिल्म की तरह हैं। सरहद के दोनों तरफ और दोनों धर्मों के लोगों में से गिनती में ऐसे लोग कम ही हैं जो कि नफरत के फतवों पर जिंदा रहते हैं, ऐसे लोग खबरों में सुर्खियां अधिक पाते हैं, और नफरती टीवी चैनल इन्हीं की हेट-स्पीच पर सवार होकर गलाकाट मुकाबला करते हैं, लेकिन इससे दोनों मुल्कों  के कारोबार की बचत नहीं हो पा रही, और गरीबों की बड़ी रकम तनातनी में बर्बाद भी हो रही है। आज जब दुनिया के कुछ देशों के बीच की सरहद मिटाकर उन्हें एक किया जा रहा है, उस वक्त हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच की दीवार ऊंची की जा रही है। इस नौबत को अगर समझदारी से खत्म किया जाए, तो शायद दोनों तरफ हर गरीब बच्चे को रोजाना एक गिलास दूध मिल पाएगा। 

तमिलनाडु के जिस ट्रस्ट, जिस अस्पताल, और जिन डॉक्टरों ने यह ऑपरेशन किया है, और जिस मरीज से यह दिल मिला होगा, इन सबका योगदान दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधारने में बहुत बड़ा है। ये लोग न तो सरहद पर हैं, न मुल्कों की राजधानियों में हैं, लेकिन इनकी रहमदिली और दरियादिली से एक नौजवान लडक़ी को नई जिंदगी मिली है, और दोनों तरफ के अमन-पसंद लोगों को अपनी बात आगे बढ़ाने की एक वजह भी मिली है। हम इस एक हार्ट ट्रांसप्लांट को महज एक जिंदगी देने वाला नहीं मानते, हम इसे सरहद के आरपार सद्भावना बढ़ाने का एक मौका भी मानते हैं, और जिन लोगों का इंसानियत के बेहतर पहलुओं पर भरोसा हो, उन्हें ऐसे मामले बढ़ाते भी रहना चाहिए। जिस तरह फिल्म बजरंगी भाईजान देखने वालों को यह समझ पड़ता है कि सीमा के कंटीले तार दोस्ती और मोहब्बत को नहीं रोक पाते हैं, भला काम करने की नीयत को नहीं रोक पाते हैं, ठीक वैसी ही भावना और मदद अभी के इस ट्रांसप्लांट में सामने आई है। हमारी दोनों ही मुल्कों से यह गुजारिश है कि फौजी तनातनी से परे आम जनता की आवाजाही, कारोबार, खेल, फिल्म, टीवी, और साहित्य सरीखे मामलों को सरकारी दखल से अलग रखें, और इंसानों के बीच बेहतर आपसी रिश्ते एक दिन सरकारों को भी साथ बैठकर सुलह करने को मजबूर कर सकते हैं। यह एक अलग बात है कि कोई सुलह न होना इन सरकारों को अधिक सुहा रहा होगा, लेकिन हम इसी बात पर आज की चर्चा खत्म करना चाहेंगे कि चेन्नई के अस्पताल में हिन्दुस्तानी दिल पाने वाली पाकिस्तानी युवती इन दोनों मुल्कों के बीच एक किस्म का पुल बनी है, और इस पर चलकर बेहतर रिश्तों की आवाजाही होनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 अप्रैल 2024


 

कानून अंधा कानून न बने, प्राकृतिक न्याय को भी देखे

28 अप्रैल, 2024 

मेरे एक पुराने अखबारनवीस सहयोगी ने हमारे बड़े लंबे साथ की वजह से सम्मान जताते हुए एक बार एक बात कही थी। उन्होंने कहा था कि जब किसी खबर को लेकर मन में बहुत बड़ी दुविधा रहती है कि क्या किया जाए, क्या करना चाहिए, तो वे यह कल्पना करते हैं कि वैसी दुविधा अगर मेरे सामने होती, तो मैंने क्या किया होता? और कुछ पल में उन्हें सही राह दिख जाती है। अब यह बात एक बहुत ऊंचे दर्जे के सम्मान की है, जिसे पचाना भी मेरे लिए आसान नहीं है। और वैसे तो आज इस जिक्र का भी कोई खास मकसद नहीं है, सिवाय एक बात के कि जब मेरे सामने लिखने को किसी मुद्दे की कमी रहती है, और पिछले एक बरस से यूट्यूब के लिए कैमरे के सामने बोलने को जब कोई मुद्दा नहीं सूझता है, तो मैं सुप्रीम कोर्ट की तरफ देखता हूं। सुप्रीम कोर्ट से जजों के किसी फैसले से ही मुद्दा नहीं सूझता, बल्कि वहां पहुंचे हुए मामलों से, दोनों तरफ के वकीलों के तर्कों से, कई चीजों से कोई विषय सूझता है। आज इस कॉलम को लिखने के लिए कुछ ऐसा ही हुआ है। बीच में कई हफ्ते यह कॉलम लिखना नहीं हो पाता, क्योंकि सोचने-विचारने की कोई बात नहीं सूझती। 

सुप्रीम कोर्ट में अभी एक मामला पहुंचा है जिसमें निचली अदालत, और हाईकोर्ट, दोनों का फैसला एक सरीखा था, और उसके खिलाफ मुकदमा हारने वाले ने सुप्रीम कोर्ट का रूख किया। पति-पत्नी के बीच झगड़े और घरेलू हिंसा की बात है, और पत्नी ने पुलिस में शिकायत की, निचली अदालत में मामला चला, वहां से पति को एक बड़ा जुर्माना सुनाया गया, और यह जुर्माना हर्जाने-मुआवजे की शक्ल में पत्नी को मिलना था। लेकिन पति के वकीलों का तर्क था कि यह जुर्माना पति की आर्थिक हैसियत के आधार पर नहीं लगना चाहिए, यह घरेलू हिंसा किस दर्जे की थी, उस आधार पर लगना चाहिए। न तो निचली अदालत ने यह तर्क माना, और न हाईकोर्ट ने, अब सुप्रीम कोर्ट के दो जज इस मामले को सुन रहे हैं, और यह तय होगा कि शादीशुदा जोड़े में जो हिंसक साथी है, उसकी आर्थिक क्षमता के आधार पर फैसला दिया जाए, या हिंसा की शिकार साथी को हुए नुकसान के आधार पर? 

मैं बरसों से इस बात को लिखते चले आ रहा हूं कि किसी भी जुर्म में सजा या जुर्माना तय करते हुए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि मुजरिम, और जुर्म के शिकार के बीच दर्जे का क्या फर्क है। हिन्दुस्तान जैसी स्थितियों में देखें तो यह दर्जा औरत और मर्द के फर्क का सबसे पहले होता है जो कि इस मामले में भी दिख रहा है। शादीशुदा जोड़ों में आमतौर पर महिला हिंसा की शिकार होती है, और समाज और परिवार में अपनी कमजोर स्थिति की वजह से, शारीरिक रूप से पुरूष से कमजोर होने की वजह से वह मार खाती ही है, महिला पुरूष को मारे, ऐसा कम ही होता है। इसलिए औरत और मर्द एक पैमाना है दर्जे के फर्क का। दर्जे के फर्क का दूसरा पैमाना भारत में जाति व्यवस्था है, सवर्ण कही जाने वाली जातियां, दलित-आदिवासी समुदायों पर जुल्म करने की अधिक ताकत रखती हैं, और इसीलिए देश में एक बड़ा जायज कानून बनाया गया है जिससे एससी-एसटी समुदाय पर गैर एससी-एसटी के जुल्म होने पर अधिक कड़ी सजा का प्रावधान है। आज के भारत को देखें तो धार्मिक अल्पसंख्यक लोग भी धार्मिक बहुसंख्यक लोगों की हिंसा के शिकार होने का खतरा उठाते हैं, और जगह-जगह जहां भी भीड़त्या होती है, उनमें दलित-आदिवासी, या अल्पसंख्यक ही आमतौर पर शिकार होते हैं। अब भेदभाव के एक और बड़े पैमाने की चर्चा कर ली जाए, संपन्न और विपन्न के बीच ताकत का बहुत बड़ा फासला रहता है। एक दौलतमंद जब किसी गरीब पर जुल्म करते हैं, तो गरीब को इंसाफ मिलने की गुंजाइश बड़ी कम रहती है।

हमने बार-बार इस बात को लिखा है, और इस कॉलम में भी मैंने कई बार यह लिखा है कि पैसेवाले किसी गरीब के खिलाफ कोई जुर्म करें, जुल्म करें, या ऊंचे ओहदे पर बैठे हुए लोग किसी कमजोर के खिलाफ कुछ करें, तो उसके लिए अलग से कड़ी सजा का इंतजाम होना चाहिए, अलग से मोटे जुर्माने का भी। अभी इसी हफ्ते हमने अपने अखबार या यूट्यूब चैनल पर इस बात को दोहराया भी है कि बलात्कार की शिकार अगर कोई गरीब लडक़ी या महिला रहती है, तो उसमें बलात्कारी की दौलत का एक हिस्सा उसे मिलना चाहिए, जो कि बलात्कारी की बीवी, या उसके बच्चों के हिस्से के बराबर का रहे। ऐसा होने पर ही उस बलात्कारी को अपने परिवार के भीतर भी सजा मिलेगी, जब पारिवारिक सदस्यों के संभावित हिस्से से कुछ दौलत कम हो जाएगी। और ऐसा पर्याप्त मुआवजा बलात्कार की शिकार को मिलने से उसकी कुछ हद तक आर्थिक भरपाई हो सकेगी। 

हमारा यह ख्याल है कि विदेश में बसा हुआ यह पति अपनी बड़ी दौलत के दम पर सुप्रीम कोर्ट गया जरूर है, लेकिन वहां भी उसकी हार होगी। घरेलू हिंसा में हिंसा कितनी हुई है, इसके साथ-साथ यह बात अनिवार्य रूप से मायने रखती है कि हिंसा करने वाले व्यक्ति की मुआवजा देने और भरपाई करने की ताकत कितनी है। ऐसे में किसी व्यक्ति पर लगाए जाने वाले जुर्माने की रकम अगर कानून में तय कर ली जाएगी, तो वह बड़ा ही नाजायज होगा। किसी के ओहदे, उसकी ताकत, और उसकी आर्थिक संपन्नता, इन सभी चीजों को देखकर इसके हिसाब से ही उस पर जुर्माना लगाया जा सकता है। एक मजदूर अपनी बीवी को पीटने पर शायद कुछ हजार रूपए जुर्माने को भुगते, लेकिन एक करोड़पति अपनी बीवी को पीटने पर कुछ हजार देने लायक नहीं रहता, उस पर जुर्माना उसकी संपन्नता के अनुपात में रहना चाहिए। इसी तरह हमने पहले भी कई बार इस बात पर लिखा है कि अगर कोई अरबपति भूमाफिया किसी गरीब दलित की जमीन पर कब्जा करे, तो भारत की जाति व्यवस्था के हिसाब से भी जुर्माना तय होना चाहिए, और संपन्नता के फासले के आधार पर भी। बहुत संपन्न के खिलाफ तो किसी मामले के खड़े होने की गुंजाइश भी भारतीय लोकतंत्र में कम रहती है, इसलिए किसी तरह अगर मामला अदालती फैसले तक पहुंचे, तो उस पर जुर्माना तगड़ा लगना चाहिए, करोड़पति-अरबपति को सस्ते में छोडऩा उनकी शान के भी खिलाफ होगा, इसलिए गरीब को इंसाफ दिलाने के लिए न सही, दौलतमंद की सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए जुर्माना तो मोटा ही लगना चाहिए। 

देखते हैं अदालत में इस मामले पर क्या फैसला होता है, प्राकृतिक न्याय की हमारी साधारण समझ हिंसा के दर्जे से ऊपर, संपन्नता के आधार पर जुर्माने की वकालत करती है।


महज एक मशीनी-चुुनाव से अधिक होता है लोकतंत्र

28 अप्रैल 2024

  

उत्तरप्रदेश के पूर्वांचल विश्वविद्यालय में फार्मेसी के चार छात्रों ने इम्तिहान की उत्तर पुस्तिका में बस जय श्रीराम लिख दिया था, और उन्हें 56 फीसदी अंक देकर पास किया गया। जब सूचना के अधिकार के तहत किसी और ने ये उत्तरपुस्तिकाएं मांगीं, तो इसका भांडाफोड़ हुआ। इसके बाद विश्वविद्यालय ने जांच कमेटी बनाई, और इन उत्तर पुस्तिकाओं का पुर्नमूल्यांकन करवाया, तो उन्हें शून्य नंबर मिले। विश्वविद्यालय की जांच में दो शिक्षकों को इस काम के लिए दोषी ठहराया है। एक पूर्व छात्र ने आरटीआई से कॉपियां निकलवाईं, और राजभवन शिकायत की तब जाकर पिछली दिसंबर में जांच का आदेश हुआ था। इस मामले में रिश्वत भी एक वजह हो सकती है, लेकिन जिस तरह से धर्म के नाम का इस्तेमाल किया गया है, उससे तो पक्के धर्मालुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचनी चाहिए थी, लेकिन जिस तरह छत्तीसगढ़ के महादेव सट्टेबाजी ऐप के नाम से किसी की धार्मिक भावना को आज तक ठेस नहीं पहुंची है, उसी तरह जय श्रीराम लिखकर फेल को पास करवाने के कारोबार से भी भक्तों पर असर पड़ा नहीं दिखता है। 

हिन्दुस्तान में ऐसा लगता है कि धार्मिक भावनाएं अब सहूलियत का सामान हो गई हैं, जब किसी से हिसाब चुकता करना हो तब इन भावनाओं को भडक़ाया जाता है, पुलिस या अदालत तक रिपोर्ट लिखाई जाती है, गले काटने के फतवे दिए जाते हैं, और बाकी वक्त लोगों का भक्तिभाव अन्ना हजारे के अंदाज में सोए रहता है। जिस तरह महाराष्ट्र के तथाकथित खादीधारी-गांधीवादी अन्ना हजारे कुछ चुनिंदा और नापसंद नेताओं के भ्रष्टाचार के खिलाफ छांट-छांटकर आंदोलन करते हैं, और बाकी भ्रष्ट लोगों के हाथ मजबूत करते हैं, आज हिन्दुस्तान में धार्मिक भावनाओं का हाल कुछ वैसा ही हो गया है। देश की तीन चौथाई से अधिक आबादी मांसाहारी है, लेकिन कौन कब मांस खाए, और कब न खाए, यह एक बड़ा मुद्दा बना दिया गया है, तेजस्वी यादव के मछली खाने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सार्वजनिक मंच से चुनावी सभा में इस पर हमला किया। दूसरी तरफ गोवा और केरल से लेकर उत्तर-पूर्व तक के भाजपा नेता गोमांस की खुली वकालत करते हैं, लेकिन उनसे देश के हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं आहत नहीं होने दी जातीं, ऐसे राज्यों में वोटरों को साधने के लिए गोमांस की गारंटी दी जाती है, और देश में बाकी जगह सरकारें तय करती हैं कि कब किसे क्या खाना चाहिए। 

हिन्दुस्तान में जिंदगी के असल मुद्दों को हाशिए पर धकेल दिया गया है, और पन्नों के बीच में इतनी गैरजरूरी बातें लिख दी गई हैं कि असल मुद्दों के लिए कुछ शब्दों की जगह भी न बचें। और हैरानी यह है कि देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा सतही और गैरजरूरी मुद्दों में इस कदर मगन हो गया है कि उसे अपनी खुद की असली दिक्कतों से लेना-देना नहीं रह गया है। पौराणिक कहानियों में जिस तरह से त्यागियों को बताया जाता है, हिन्दुस्तान में आज वोटरों का एक बड़ा हिस्सा वैसा ही त्यागी हो गया है, और वह शेर पालने का खर्च उठाने के लिए पांच सौ लीटर भी पेट्रोल-डीजल लेने की अपनी हिम्मत बताता है। असल जिंदगी में शेर पाने से क्या हासिल होगा इसकी कोई चर्चा नहीं होती है। लोगों की आर्थिक स्थिति अपने बच्चों के दूध के लिए गाय-बकरी पालने की भी नहीं है, लेकिन उनका उन्माद उन्हें शेर पालने का हौसला देता है। यह एक अभूतपूर्व और असाधारण दर्जे की समझ है, जिसकी पूरी दुनिया में शायद ही कोई मिसाल मिले। अपनी राजनीतिक पसंद के लिए लोग अगर हर तकलीफ को अनदेखा करने के लिए, हर तकलीफ को उठाने के लिए तैयार हैं, तो फिर लोकतंत्र के लिए तकलीफ के अलावा इसमें और क्या है? और जब वोटर-आबादी का एक तिहाई हिस्सा ऐसा समर्पित हो जाए, तो इस समर्पण से चुनावी मुकाबला भला क्या हो सकता है? 

लोगों के मन में राजनीतिक प्रतिबद्धता रहे यह तो अच्छी बात है, लेकिन यह प्रतिबद्धता उनसे सही और गलत में फर्क करने की ताकत अगर छीन ले, तो यह प्रतिबद्धता आत्मघाती होती है। भारतीय लोकतंत्र आज ऐसे ही दौर से गुजर रहा है। आज तकनीकी रूप से चुनाव कराना कामयाब होने को लोकतंत्र मान लिया गया है, और थोक में दल-बदल को संवैधानिक। इन दोनों मकसदों को पाने के लिए कितना जायज, और कितना नाजायज किया जा रहा है, यह बात अगर लोगों के लिए मायने नहीं रखती है, तो फिर ऐसा चुनाव लोकतंत्र के लिए भला क्या मायने रख सकता है? यह नौबत भयानक है। हिन्दुस्तान सहित बहुत से देश ऐसे रहे हैं जहां पर कुछ बड़े नेताओं का व्यक्तिवाद बड़ा लोकप्रिय रहा है। उन्हें तर्कों से परे समर्थन मिलते रहा है, लेकिन जब इसके साथ-साथ धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता का एक घोल बन जाता है, तो फिर उसके नशे का न तो कोई जवाब हो सकता, न ही कोई तोड़ हो सकता। भारत आज ऐसे ही दौर से गुजर रहा है। इसके साथ-साथ जब न सिर्फ चुनावी राजनीति, बल्कि तमाम पांच बरसों की राजनीति, और जनधारणा प्रबंधन जैसे काम एक बहुत ही अनोखे पेशेवर अंदाज में किए जाने लगे हैं, तो हिन्दुस्तान के अधिकतर राजनीतिक दलों को इस बदले हुए माहौल में टिके रहने की तरकीब समझ नहीं आ रही है। और लोकतंत्र को कानून के दायरे में कई किस्म की राजनीतिक और चुनावी तरकीबों की इजाजत देता है, और देश में आज वही हो रहा है। 

यह बात शुरू हुई थी फार्मेसी के इम्तिहान में विज्ञान की बातें लिखने के बजाय जय श्रीराम लिखकर आने वालों को पास करने से। जब खालिस विज्ञान की जगह खालिस धर्म ले ले, तो आज के वक्त को कुछ हजार साल पहले चले जाना चाहिए, और इन बरसों के विज्ञान को अछूत मानकर उसकी सहूलियतों से परहेज करना चाहिए। छत्तीसगढ़ में भाजपा के एक विधायक रिकेश सेन ने एक हिन्दू धार्मिक कार्यक्रम में कल भाषण देते हुए कहा कि देश के अंदर धर्म परिवर्तन कराने की कोई कोशिश करे तो उसकी गर्दन काटकर रख देना। एक तरफ जब सुप्रीम कोर्ट देश में नफरती-जहरीली बातों पर रोक लगा रहा है, कड़ाई बरत रहा है, तब गला या सिर काट देने की बातें पचाने की ताकत इस देश का चुनाव आयोग ही रखता है। और चुनाव आयोग की असाधारण पाचन क्षमता की डॉक्टरी जांच सुप्रीम कोर्ट को भी करवाना चाहिए क्योंकि आयोग की यह पाचन शक्ति लोकतंत्र को ही पचाकर खत्म कर रही है, और चुनाव को उसने महज एक मशीनी काम बनाकर रख दिया है। आज यहां पर हमने कुछ कतरा-कतरा बातों को जोडऩे की कोशिश की है, इसे पढऩे वाले लोग भी इससे जुड़ी हुई कुछ और बातों को जोडक़र देख सकते हैं। 

(daily chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 अप्रैल 2024


 

वॉट्सऐप की गोपनीयता खत्म हुई तो सरकार के सामने जनता निरीह होगी

 27 अप्रैल 2024

  

अभी यह मामला अदालत में है, और न इस पर कोई फैसला हुआ है, और न ही वॉट्सऐप चलाने वाली कंपनी मेटा ने इसे हिन्दुस्तान में बंद किया है, लेकिन भारत सरकार के सूचना तकनीक कानून के मुताबिक अगर इस मैसेंजर सर्विस को सरकार के मांगे संदेश की जानकारी देनी होगी, तो उसके बजाय मेटा इस सर्विस को बंद कर देने के लिए तैयार है। कल इस कंपनी ने साफ-साफ कहा है कि वॉट्सऐप-संदेशों की गोपनीयता भंग करने के बजाय वह हिन्दुस्तान से इस सर्विस को हटा ही लेगी। वैसे तो यह शुरूआती टकराव सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है, लेकिन फिर भी सरकार के कानून और कंपनी के तेवरों में यह एक सवाल खड़ा तो कर ही दिया है कि लोकतंत्र में निजता का कितना महत्व होना चाहिए, और सरकार जिसे कानून के खिलाफ माने, उसे उजागर करने की जिम्मेदारी कितनी होनी चाहिए। भारत में टेक्नॉलॉजी तो मोटेतौर पर दुनिया के किसी भी सबसे विकसित देश जितनी है, लेकिन निजता के अधिकारों का महत्व यहां पर विकसित लोकतंत्रों के आसपास भी नहीं है। अब सवाल यह उठता है कि बिना लोकतंत्र के टेक्नॉलॉजी कितनी खतरनाक हो सकती है, जनता के हक के लिए भी, और सरकार की जिम्मेदारी के लिए भी, यह समझने की जरूरत है। 

आज भारत में देश की सरकार, और प्रदेशों की सरकारों से लोगों के मन में इतनी दहशत है कि वे लोगों के कॉल डिटेल्स और संदेशों में ताक-झांक करती हैं। जब इजराइल का बना हुआ, फौजी लाइसेंस पर मिलने वाला, पेगासस नाम का घुसपैठिया सॉफ्टवेयर भारत में इस्तेमाल करने की बात आई, तो केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर कुछ भी कहने से इंकार कर दिया, और यह कहा कि वह यह भी टिप्पणी नहीं करेगी कि उसने यह सॉफ्टवेयर खरीदा है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट की बनाई एक तकनीकी विशेषज्ञ कमेटी भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई, और यह मुद्दा वक्त की मौत खत्म हो गया कि क्या देश के प्रमुख विपक्षी नेताओं, और प्रमुख पत्रकारों के मोबाइल फोन पर केन्द्र सरकार की एजेंसियों ने पेगासस से घुसपैठ की थी, या नहीं। लेकिन लोगों के मन में इस बात को लेकर न सिर्फ सरकारी एजेंसियों पर शक है, बल्कि लोग जिनसे फोन पर बात करते हैं उन पर भी शक रहता है कि वे लोग बातचीत को रिकॉर्ड कर रहे हैं, या वॉट्सऐप जैसे मैसेंजरों की वीडियो कॉल को भी किसी दूसरे फोन को सामने रखकर उस पर तो रिकॉर्ड नहीं कर रहे हैं? दरअसल वक्त ऐसा ही आ गया है कि न सिर्फ सरकार चलाने के लिए, बल्कि राजनीति चलाने के लिए भी, और कारोबारी मुकाबलों के लिए भी लोग प्रतिद्वंद्वियों की जासूसी करते हैं, और ऐसे वक्त में लोगों को यह मानकर चलना गलत नहीं है कि वे अगर जरा भी महत्वपूर्ण हैं, तो निशाने पर हैं। 

फिर सरकारी अफसर, खासकर खुफिया एजेंसियों के लोग, आने वाली हर सरकार के राजनेताओं को ऐसी कई तरकीबें बताते हैं कि कानूनी-गैरकानूनी तरीकों से कैसे मुकाबले में आगे रहा जा सकता है, और दूसरे लोगों को पीछे छोड़ा जा सकता है। ऐसे आसान औजारों को हथियार की तरह इस्तेमाल करने की सहूलियत हर ताकतवर के मन में लालच पैदा कर देती है, और फिर यह इंसानी मिजाज तो रहता ही है कि दूसरों की बंद जिंदगी में कैसे ताक-झांक की जाए। लोग तुरंत ही कानूनी और गैरकानूनी जासूसी के नफे देखने लगते हैं, और हिन्दुस्तान में शायद ही किसी को यह याद रहता है कि दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमरीका के राष्ट्रपति रहे रिचर्ड निक्सन को किस तरह विपक्ष की जासूसी करने के आरोप में राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देना पड़ा था। जिस किसी नेता को दूसरों की जासूसी करवाने में मजा आता हो, उन्हें यह देखना चाहिए कि अमरीकी राष्ट्रपति का इस हरकत के बाद क्या हाल हुआ था, और महाभियोग से बचने के लिए इस्तीफा देने वाले निक्सन पहले राष्ट्रपति हुए थे जिन पर विपक्षियों की जासूसी की तोहमत पूरी तरह साबित भी हुई थी। 

भारत में आज सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली सिरे से सिरे तक सुरक्षित मैसेंजर सर्विस वॉट्सऐप सबसे अधिक लोकप्रिय है, और छोटे-छोटे कारीगर, और कामगार भी इसका इस्तेमाल करते हैं, और निजी संदेशों से परे कारोबारी संदेशों को देखें तो भी हिन्दुस्तान में हर दिन दसियों करोड़ ऐसे संदेश आते-ृजाते हैं जिन पर इस देश की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा टिका हुआ है। हम केन्द्र सरकार की राष्ट्रीय सुरक्षा की जिम्मेदारी और फिक्र की बात नहीं करते, वह तो प्राथमिकता रहनी ही चाहिए, लेकिन उससे संबंधित संदेशों का महत्व इस मैसेंजर सर्विस से देश की अर्थव्यवस्था के साथ तौलकर भी देखना चाहिए कि अगर यह सेवा खत्म हो गई, तो कोई दूसरी सेवा क्या इस जरूरत को पूरा कर सकेगी? क्या भारत सरकार खुद ऐसी कोई मैसेंजर सर्विस शुरू कर सकेगी जिस पर लोगों को भरोसा भी होगा। आज तो पूरी दुनिया में सोशल मीडिया से लेकर ईमेल, और मैसेंजर सर्विसों तक हर चीज निजी हाथों में हैं क्योंकि सरकारी औजारों पर किसी को गोपनीयता का भरोसा नहीं हो सकता। आज से करीब 25 बरस पहले बनी एक अमरीकी फिल्म, एनेमी ऑफ द स्टेट, लोगों को जरूर देखनी चाहिए कि निगरानी रखने की टेक्नॉलॉजी और सरकारी एजेंसियों के बेजा इस्तेमाल से कोई लोकतांत्रिक सरकार भी अपने विरोधियों को किस तरह खत्म कर सकती है। यह फिल्म 25 बरस पहले की अमरीकी सरकार की ताकत का एक नजारा पेश करती है, और तब से अब तक तो टेक्नॉलॉजी ने कई पीढिय़ां तय कर ली हैं, अब निगरानी और नुकसान की सरकारी ताकत कई गुना बढ़ गई है। इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरत के लिए भी आज दुनिया की किसी सरकार के हाथ में नागरिकों की हर गोपनीयता देने का मतलब लोकतंत्र को पूरी तरह खत्म कर देना होगा। जहां तक जनता की निजता की बात है, कोई सरकारों पर जरा भी भरोसा नहीं किया जा सकता, यह बात हमने हिन्दुस्तान और इसके प्रदेशों में लंबे समय से देखी हुई है, और जब निगरानी और जांच एजेंसियां सत्तारूढ़ नेताओं के साथ मिलकर मुजरिम गिरोह की तरह काम करने लगती है, तो जनता की निजता की चौकीदारी का, और उसमें ताक-झांक का हक इन लोगों को नहीं दिया जा सकता। आज हिन्दुस्तान में लोगों की निजी जिंदगी से लेकर हजार किस्म के काम-धंधों के बारे में सोचना चाहिए कि वॉट्सऐप जैसी मैसेंजर सर्विसों के बिना इस देश के लोगों का काम कैसे चलेगा? और यह बात तो जाहिर है ही कि जब लोगों की निजी जिंदगी में ताक-झांक के लिए कोई कंपनी सरकार को दरवाजे में एक सुराग बनाकर देगी, तो सरकार उस छेद को अपना सिर भीतर डालने जितना तो बना ही लेगी। अच्छा है कि यह मामला अदालत में पहुंचा हुआ है, और इस पर सरकारी रूख से परे कानूनी नजरिया भी सामने आ जाएगा।  

(Daily Chhattisgarh)

घर में नहीं दाने, और अम्मा चली भुनाने...

 26 अप्रैल 2024

  

छत्तीसगढ़ के जिन निजी अस्पतालों में सरकारी योजनाओं के तहत गरीबों का बिना भुगतान इलाज होता है, और जिसका भुगतान बाद में सरकार करती है, उनका काम ठप्प हो गया है। अस्पतालों का कहना है कि राज्य में आयुष्मान योजना का भुगतान ही हजार करोड़ से अधिक बकाया हो गया है, और ऐसे में उनके लिए यह मुमकिन नहीं है कि इस योजना के तहत इलाज और ऑपरेशन करें, और अस्पताल भी चलाएं। इस योजना में 40 फीसदी योगदान राज्य सरकार का रहता है, और 60 फीसदी रकम केन्द्र सरकार से आती है। छत्तीसगढ़ में पिछली भूपेश सरकार के समय से सैकड़ों करोड़ का यह बकाया चले आ रहा था, जो अब बढ़ते-बढ़ते शायद 13 सौ करोड़ तक पहुंच गया है। यह हालत भी तब है जब 6 महीने के फासले में दो-दो चुनाव हो रहे हैं, और 6 महीने बाद पंचायत-म्युनिसिपल चुनाव भी हैं, और वैसे में अगर गरीब जनता का इलाज बंद हो रहा है, तो उसके चुनावी-राजनीतिक नतीजे तो होंगे ही। पिछले विधानसभा चुनाव के समय केन्द्र सरकार से ग्रामीण रोजगार की योजना मनरेगा के भी 6-7 सौ करोड़ रूपए आने बाकी थे, और मजदूरी का भुगतान कई महीनों से नहीं हुआ था। एक और विभाग की बात करें तो जिन निजी स्कूलों में शिक्षा के अधिकार योजना के तहत गरीब बच्चों का दाखिला होता है, वहां पर सरकार से उनकी फीस न पहुंचने की वजह से उन स्कूलों को भी परेशानी हो रही है। कुल मिलाकर कोई भी सरकार हो, उसकी जनकल्याण की योजनाओं का हाल इसलिए बदहाल है कि चुनावी नजरिए से इनकी घोषणाएं तो हो जाती हैं, लेकिन राज्य के बजट में इनका ठीक से इंतजाम नहीं रहता, और साथ-साथ बजट में दिखाई गई कमाई कभी पूरी नहीं आती। इन सबसे परे केन्द्र और राज्य सरकारों पर कोरोना-लॉकडाउन के दौर में जो भारी-भरकम बोझ पड़ा, उसमें भी हर राज्य कर्ज में दब गए, अर्थव्यवस्था चौपट हो गई। 

अभी चल रहे लोकसभा चुनाव के दौरान ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बुजुर्गों के इलाज की एक नई योजना भी घोषित की है, और चुनाव प्रचार के रूप में उसके फॉर्म भी भरवाए जा रहे हैं। अब आज अगर पुरानी योजनाओं का यह हाल है कि न तो पिछली कांग्रेस सरकार, और न ही वर्तमान भाजपा सरकार सरकार की मौजूदा योजनाओं के तहत इलाज का खर्च उठा पा रही हैं, निजी अस्पताल अपने बिल लिए हुए बंद होने की कगार पर हैं, तो ऐसे में किसी भी तरह की नई योजना की घोषणा के पहले यह तौलना जरूरी है कि इनका भुगतान कहां से होगा। चुनावी घोषणाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी मामला चल रहा है कि जनता को मुफ्त में देने के वायदों की सीमा कैसे तय की जाए, सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी करके उनकी राय पूछी भी है, लेकिन ऐसा लगता है कि किसी भी तरह, किसी भी कीमत पर एक बार सरकार बना लेने के लिए राजनीतिक दल कोई भी वायदा करने के लिए तैयार हैं, और फिर चाहे उसे पूरा न कर सकें। छत्तीसगढ़ में यह बहुत भयानक नौबत है कि निजी अस्पताल सरकार की योजनाओं के तहत इलाज करने से मना कर रहे हैं, क्योंकि उधारी की उनकी क्षमता खत्म हो चुकी है। 

चुनाव जीतने के गलाकाट मुकाबले से परे यह समझने की जरूरत है कि राज्यों को अंधाधुंध कर्ज लेकर रेवड़ी बांटने के अंदाज में सहूलियतें नहीं बांटनी चाहिए। छत्तीसगढ़ की पिछली कांग्रेस सरकार ने अपनी राजनीतिक घोषणा के तहत हर आय वर्ग के लोगों का मुफ्त सरकारी इलाज करवाने का वायदा किया था, और उसे लागू भी कर दिया था। नतीजा यह था कि महंगी कारों में अस्पताल पहुंचने वाले लोग भी मुफ्त में इलाज पा रहे थेे, और सरकार वादाखिलाफी की तोहमतों से बचने के लिए गरीब-अमीर सभी को मुफ्त इलाज दे रही थी, निजी अस्पतालों में भी। इस सिलसिले ने न सिर्फ सरकार के इस विभाग की कमर तोड़ दी, बल्कि राज्य का पूरा विकास भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुआ। जनकल्याण की कोई भी योजना जरूरतमंद तबके के लिए ही होनी चाहिए। बहुत बड़े संपन्न किसानों की कर्जमाफी से लेकर, पैसेवालों के मुफ्त इलाज तक, राजनीतिक दल लापरवाही से कही हुई अपनी बातों पर अड़े रहने के लिए जनता के बजट का कितना भी हिस्सा खर्च करने को तैयार हो जाते हैं। बिजली की रियायत देने के लिए गरीब-अमीर हर किसी को एक सीमा तक छूट देना भी इसी किस्म का बेदिमागी का फैसला है, क्योंकि जिनके घर एसी चलते हैं, हजारों रूपए का बिल आता है, उन्हें दो सौ यूनिट की छूट क्यों देनी चाहिए? 

सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामले के दौरान ही यह बात साफ होनी चाहिए कि राजनीतिक दल जब कभी ऐसी कोई घोषणा करें, तो उसके साथ यह शर्त जुड़ी रहे कि लाभ पाने वाले लोगों के बारे में नियम और शर्त भी घोषित की जाए, और अनुमानित खर्च भी बताया जाए। इसके बिना किसी तरह के जनकल्याण की कोई योजना, या कोई रेवड़ीनुमा योजना घोषित नहीं होनी चाहिए। इसे राजनीतिक दलों की मान्यता के चुनाव आयोग के नियमों से भी जोड़ा जा सकता है, या सुप्रीम कोर्ट जैसा कि कुछ दूसरे मामलों में करता है, संसद को भी सुझा सकता है कि वह इस बारे में कोई व्यापक कानून बनाए। आज देश के कई प्रदेशों की हालत मुफ्त की योजनाओं की वजह से खराब है। पंजाब मुफ्त की बिजली देकर दीवालिया होने की कगार पर है, गुजरात और हरियाणा में आयुष्मान योजना बंद ही कर दी है, बंगाल की हालत सरकारी कर्मचारियों को तनख्वाह देने की नहीं है। यह सिलसिला चुनावी जीतने के लिए किए जाने वाले वायदों की वजह से इस नौबत तक पहुंचा है। यह बंद होना चाहिए। देश में वित्तीय अनुशासन बने रहने के लिए यह भी होना चाहिए कि जनता के समझ आने वाली जुबान में केन्द्र और राज्य हर सरकार को अपनी योजनाओं की लागत समझाना चाहिए, और राजनीतिक दलों को अपने घोषणा पत्र की लागत साथ लिखनी चाहिए। आज कहने के लिए हर गरीब को अनाज, मकान, बेरोजगारी भत्ता, मुफ्त इलाज, मुफ्त पढ़ाई जैसी हजार बातें कही जाती हैं, लेकिन हकीकत यह है कि मनरेगा के मजदूरों को भी महीनों तक मजदूरी नहीं मिलती। देश में यह राजनीतिक पाखंड खत्म होना चाहिए, और सुप्रीम कोर्ट को इस मामले की सुनवाई के दौरान ही ऐसा इंतजाम करना चाहिए कि राजनीतिक दल, और केन्द्र या राज्य सरकारें जनता के सामने पारदर्शी हिसाब रखने को मजबूर हों। फिलहाल देश के राज्यों को इस बात से जूझना है कि जो इलाज जनता को चाहिए, उसका भुगतान कैसे होगा, और अभी इस चुनाव में जिन और लोगों को मुफ्त इलाज से जोडऩे की घोषणा हुई है, उनका खर्च कहां से आएगा? 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अप्रैल 2024


 

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अप्रैल 2024


 

मुजरिमों के बेवफा साथी बुरे कहे जाएं, या अच्छे?

 25 अप्रैल 2024

 

राजस्थान के पिछले कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के एक सबसे भरोसेमंद ओएसडी रहे लोकेश शर्मा ने लोकसभा चुनाव मतदान के बीच गहलोत पर उनके कार्यकाल के दौरान गंभीर गलत काम करने के आरोप लगाए हैं। उन्होंने यह तक कहा है कि गहलोत ने पार्टी के भीतर अपने प्रतिद्वंद्वी सचिन पायलट के फोन टेप कराए थे। उन्होंने यह भी कहा कि किस तरह से मुख्यमंत्री सचिवालय, और पुलिस-प्रमुख जैसे लोग फोन टैप करने में शामिल थे। लोकेश शर्मा ने यह भी कहा कि पेपर लीक कराने के मामले में भी गहलोत सरकार शामिल थी। यह तो राजस्थान का ताजा मामला हुआ, छत्तीसगढ़ में कल तक कांग्रेस पार्टी में रहे एक मंझले नेता ने आज पिछले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर उद्योगपतियों से हजारों करोड़ रूपए रिश्वत लेकर उन्हें टैक्समाफी देने का आरोप लगाया है। इसी तरह दूसरे प्रदेशों में भी देखें तो जहां-जहां कोई सत्तारूढ़ पार्टी जब गर्दिश में पड़ती है, तो उसमें सत्ता के कई भरोसेमंद लोग तरह-तरह के भांडाफोड़ करते हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस छोडक़र निकलने वाले बहुत से नेताओं ने भाजपा में जाने के बाद सरकार के भ्रष्टाचार का भांडाफोड़ किया है। 

अब सवाल यह उठता है कि सत्ता जब कोई भी गलत काम बिना कई लोगों के शामिल हुए नहीं कर सकती है, तो फिर वह, या उसके बड़े लोग किस तरह के हौसले के साथ अंधाधुंध, उगाही करने लगते हैं, जुर्म के दर्जे की साजिशें करने लगते हैं, और खतरा भी उठाते हैं? छत्तीसगढ़ के पिछले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इस मायने में अब तक खुशकिस्मत बने हुए हैं कि उनके चारों तरफ के लोग ईडी के शिकंजे में आ चुके हैं, उनकी सरकार हांकने वाले अविश्वसनीय ताकतवर अफसर आज जेल में हैं, लेकिन किसी ने भूपेश बघेल के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया है, कम से कम अब तक तो ऐसा सामने नहीं आया है। अब सवाल यह उठता है कि मुख्यमंत्री के दाएं हाथ से लेकर बाएं हाथ तक, उनके कानों से लेकर उनकी आंखों तक, तमाम लोग जब जेल में पहुंचे हुए हैं, या अदालत के कटघरे में हैं, तो नौबत इतनी खराब होने क्यों दी गई थी? देश के दूसरे प्रदेशों के मुकाबले छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी आज भी कुछ जाहिर और कुछ रहस्यमय वजहों से एक बनी हुई है, लेकिन राजस्थान के पिछले सीएम गहलोत के ओएसडी सरीखे एक-दो लोग भी अगर इस प्रदेश में निकल आएंगे, तो क्या होगा? लेकिन सत्ता से मिलने वाली बददिमागी बड़ी भयानक होती है। एक किसी शायर ने लिखा था- तुमसे पहले ओ जो इक शख्स यहां तख्त-नशीं था, उसको भी अपने खुदा होने पे इतना ही यकीं था। 

न सिर्फ सरकारी भ्रष्टाचार के मामले में बल्कि सरकारी बददिमागी और राजनीतिक रंजिशों के मामले में भी लोगों को अक्ल नहीं आती है कि किसी दिन उनकी सत्ता नहीं भी रहने वाली है। ऐसा इमरजेंसी के दौरान भी हुआ था जब इंदिरा और उनके तानाशाह बेटे ने यह मान लिया था कि आपातकाल की ताकत जिंदगी भर रहने वाली है। जिन लोगों ने छत्तीसगढ़ के पिछले पांच बरस देखे हैं, उन्हें भी सत्ता के कुछ ऐसे ही यकीं देखने मिले थे। और आज देश के कई नेताओं के बयान सुनें तो भी यही लगता है कि उन्हें कभी सत्ता खत्म होने की कोई आशंका है ही नहीं। जबकि दुनिया में बहुत बड़े-बड़े राजा-महाराजा आए-गए हो गए हैं, जिनके आज कोई नामलेवा भी नहीं बचे हैं। कुछ इसी अंदाज में लोग भ्रष्टाचार में भी लगे रहते हैं। कई पार्टियां तो ऐसी रहती हैं कि सत्ता में आते ही पिछली सरकार के भ्रष्ट तंत्र का इस्तेमाल तुरंत शुरू कर देती हैं, और वहां से आगे फिर अपनी कल्पनाशीलता दिखाती हैं, नए-नए रास्ते और निकालती हैं। सरकार बनती नहीं हैं कि उसके भ्रष्ट होने की पुख्ता कहानियां हवा में तैरने लगती हैं। उन लोगों को देखकर लगता है कि या तो ये तमाम बदनामी के साथ सारे राजनीतिक पूंजीनिवेश का मुनाफा पांच बरस में निकाल लेना चाहते हैं। और ऐसा करने के लिए जाहिर है कि उन्हें आसपास के बहुत से लोगों को राजदार बनाना पड़ता है, और ऐसे ही राजदार आगे जाकर किसी दूसरी पार्टी में दाखिल होकर, या अदालत में वायदा माफ गवाह बनकर जुर्मों का जिक्र करने लगते हैं, सुबूत देने लगते हैं। हमको इसमें नुकसान का कुछ नहीं दिखता। जो नेता और अफसर जुर्म करते हैं उनके खिलाफ बेवफाई करने वालों को हम गद्दार कहना नहीं चाहेंगे क्योंकि उससे देश का और कानून का तो भला ही हो रहा है। और किसी एक व्यक्ति के जुर्म के साथ वफादार रहने के बजाय देश के कानून के साथ वफादारी बेहतर है। ऐसा जितना अधिक से अधिक हो, जनता के हित में उतना ही अच्छा है। और जब सौ-पचास लोग अपने पुराने साथियों के भांडाफोड़ की वजह से जेल जाएंगे, तभी लोगों का हौसला गिरोहबंदी करके जुर्म करने पर से कम होगा। इंसानी रिश्तों में नेक काम के लिए अगर वफादारी निभती है, तो वह काम की है, जब नेता, पार्टियां, और सरकारें संगठित मुजरिम गिरोहों की तरह काम करने लगते हैं, तब तो उनके बीच के बेवफा लोग ही लोकतंत्र के प्रति वफादार कहे जा सकते हैं। इसलिए हम ऐसी किसी निजी वफादारी की कमी गहलोत के ओएसडी के भांडाफोड़ में नहीं देखते। चारों तरफ इसी तरह का भांडाफोड़ होते रहना चाहिए, और उसी से सत्ता के जुर्म घट सकते हैं।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अप्रैल 2024



 

सैम पित्रोदा के नाम से परे सिर्फ इस अमरीकी टैक्स पर सोचकर देखें, बुरा क्या है?

 24 अप्रैल 2024

 

यूपीए के प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह की न कही हुई बातों को लेकर भी जिस तरह आज चुनावी बयानबाजी में उन पर तोहमतें लगाई जा रही हैं, उनको देखना भी भयानक है। किसी की बातों को तोडऩा-मरोडऩा तक तो ठीक है, लेकिन किसी की बातों के गोले का चूरा बनाकर, उसे मिट्टी की तरह सानकर उससे क्यूब की तरह चौकोन ढांचा बना देना तो कुछ ज्यादती ही है। गनीमत यह है कि मनमोहन सिंह की कही बातें वीडियो पर दर्ज हैं, ये एक अलग बात है कि आज के चुनावी माहौल के बिना भी जिन लोगों को झूठ फैलाना है, उन्हें कोई वीडियो सूबूत रोक नहीं पाता। मनमोहन सिंह ने देश के साधनों पर दलित, आदिवासियों, पिछड़े लोगों, और मुस्लिमों के पहले हक होने की जो बात कही थी, उसमें से पहले के तीनों तबकों को हटाकर सिर्फ मुस्लिम का नाम लेकर यह दहशत पैदा करना कि कांग्रेस आएगी तो हिंदू महिलाओं का मंगलसूत्र छीनकर उसे घुसपैठियों में बांट देगी, बयानबाजी के अब तक के स्तर को भी एकदम से पीछे छोडऩे वाली बात रही। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अभी हाल ही में तो देश की आर्थिक स्थिति अच्छी रहने के लिए मनमोहन सिंह की तारीफ कर रहे थे, लेकिन फिर वे पहले दौर के मतदान के बाद एकदम से जाने क्यों हिंदू-मुस्लिम, और घुसपैठिया-आबादी पर उतर आए हैं।

खैर, इस हड़बड़ी की जो भी वजह हो हम उसे चुनावी रूझान से जोडक़र देखना नहीं चाहते, लेकिन कल से कांग्रेस के एक दूसरे नेता के एक बयान को लेकर भाजपा के नेता टूट पड़े हैं। विदेश में बसे इंडिया ओवरसीज कांग्रेस के चेयरमैन सैम पित्रोदा ने अभी अमरीका के उत्तराधिकार टैक्स की तारीफ की है, और कहा है कि यह एक दिलचस्प कानून है जिसमें किसी दौलतमंद के मरने पर उसके बच्चों को सिर्फ 45 फीसदी संपत्ति मिलती है, और 55 फीसदी संपत्ति सरकार ले लेती है। उन्होंने कहा कि यह बड़ा दिलचस्प कानून है कि आप जीते-जी संपत्ति जुटाओं लेकिन जब आप जा रहे हैं तो संपत्ति का एक हिस्सा जनता के लिए छोडऩा होगा, पूरी संपत्ति नहीं, आधा हिस्सा। उन्होंने कहा कि भारत में ऐसा नहीं है, किसी अरबपति के जाने पर सब कुछ उसके बच्चों को ही मिलता है, देश या समाज को कुछ नहीं मिलता। सैम पित्रोदा की बात पर हमने अमरीका के इस कानून को पढ़ा तो यह वहां के कुछ राज्यों में ही लागू दिख रहा है, और मृतक के जीवनसाथी कोई टैक्स नहीं देना पड़ता, करीबी रिश्तेदारों को बहुत कम टैक्स देना पड़ता है। यह टैक्स अधिक पैसेवालों पर ही लागू है।

अमरीका के इस उत्तराधिकार कानून पर अधिक चर्चा आज का मकसद नहीं है, लेकिन चूंकि सैम पित्रोदा इस बात पर भाजपा ने कांग्रेस की जमकर निंदा की है, और खुद कांग्रेस ने इसे सैम की निजी राय बताया है, और कहा है कि वे स्वतंत्र विचारक भी हैं, और हर बार वे कांग्रेस का रूख नहीं बोलते हैं। कांग्रेस के  संचार प्रमुख जयराम रमेश ने कहा है कि  उनके बयान को बिना किसी संदर्भ के भारत के बारे में यह कहकर पेश करना कि कांग्रेस की सरकार बनने पर लोगों की आधी संपत्ति चली जाएगी, एक बहुत ही झूठा चुनाव प्रचार है। खुद सैम पित्रोदा ने भाजपा के खड़े किए हुए विवाद पर कहा कि उन्होंने निजी तौर पर अमरीका के उत्तराधिकारी टैक्स के बारे में जो कहा उसे तोड़-मरोडक़र गोदी मीडिया इस तरह पेश कर रही है। उन्होंने कहा कि यह बात तो किसी ने नहीं कही है कि भारत में लोगों की 55 फीसदी संपत्ति छीन ली जाएगी। उन्होंने कहा कि क्या बातचीत में अमरीका की मिसाल देना गलत है?

इस विवाद को हम यही पर छोड़ते हैं, और इसके साथ-साथ अमरीका के इस टैक्स के बारे में बात करते हैं क्या सचमुच ही यह टैक्स बहुत खराब है? आज भी भारत में मां-बाप की छोड़ी हुई जमीन को बेचने पर लोगों को एक कैपिटेशन टैक्स देना पड़ता है जो कि उस जमीन की खरीदी कीमत, और उसके बाद कीमत में बढ़ोतरी का हिसाब लगाकर बिक्री के वक्त होने वाले मुनाफे पर लगने वाला टैक्स है। इसी तरह अगर भरत में संपन्नता के एक स्तर के ऊपर अगर उत्तराधिकार टैक्स किसी शक्ल में लगता भी है, तो उसमें क्या बुराई है? देश के आर्थिक आंकड़े बताते हैं कि सबसे अमीर लोग और अधिक अमीर होते चल रहे हैं, और गरीबों की हालत और अधिक खराब होते चल रही है। यह फासला बढ़ते जा रहा है। ऐसे में अगर एक सीमा से अधिक अमीर लोगों के गुजरने पर इस देश में उनकी की गई कमाई पर अगर उत्तराधिकार टैक्स लगता है, तो उसका इस्तेमाल देश के उस ढांचे पर किया जा सकता है जिस ढांचे की वजह से देश में उद्योग-कारोबार चल रहे हैं, और कमा रहे हैं। हमारा ख्याल है कि किसी की संपत्ति छीने बिना संपन्नता के एक दर्जे के ऊपर अगर ऐसा टैक्स लगाकर देश को मजबूत किया जा सकता है, तो उस पर बात तो होनी चाहिए। यह वह देश है जहां पर 25 करोड़ लोगों को बिना भुगतान के अनाज मिलने पर ही वे भुखमरी से बचते हैं। ऐसे में देश के सबसे संपन्न दो-चार फीसदी लोगों की संपत्ति को अगली पीढ़ी तक जाते हुए कुछ कम कर दिया जाए, तो उससे क्या अमीरों का हौसला एकदम ही पस्त हो जाएगा? इस बात को सैम पित्रोदा के नाम से जोडक़र न देखें, इसे डोनल्ड ट्रम्प के नाम से जोडक़र देख लें, जो कि अभी पिछली बार तक अमरीका के राष्ट्रपति थे, अभी फिर राष्ट्रपति बनने की दौड़ में हैं, और नरेन्द्र मोदी के दोस्त भी हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

लाउडस्पीकरों के बीच होते कत्ल देखकर भी हाईकोर्ट कुछ सोचेगा?

 23 अप्रैल 2024

 

छत्तीसगढ़ के धमतरी में कल एक शादी समारोह में म्यूजिक डीजे पर नाचने के दौरान झगड़ा हुआ, और दो नौजवानों की चाकू के वार से मौत हो गई, और एक गंभीर जख्मी है। डीजे के शोरगुल को लेकर और उसके साथ जुड़ी हुई बाकी तमाम किस्म की अराजकता पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पिछले एक-दो बरस से बड़े कड़े तेवर दिखा रहा है, और राज्य के मुख्य सचिव से एक से अधिक बार इस पर निजी हलफनामा ले चुका है कि लोगों का जीना हराम करने वाला यह शोरगुल कैसे थमेगा? अदालत ने कई किस्म की सख्ती दिखाई है और यह भी कहा है कि इस राज्य के अफसर संगीत के नाम पर इस शोरगुल को रोकना भी नहीं चाहते। अदालत का सरकारी अफसरों के साथ संघर्ष देखें, तो लगता है कि अदालत का कोई बस चल नहीं रहा है, जिस तरह घर में किसी बुजुर्ग की कही हुई बात को बाकी लोग अनसुना करते हों, उसी तरह छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट बोले चले जा रहा है, और अफसरों पर उसका धेले का असर नहीं हो रहा है। शादियों के इस मौसम में पूरे प्रदेश में जगह-जगह न सिर्फ लाउडस्पीकरों को लेकर हाईकोर्ट के हुक्म पैरोंतले रौंदे जा रहे हैं, बल्कि शहर की जिंदगी भी ट्रैफिक जाम में बर्बाद की जा रही है, और शायद ही किसी जगह पुलिस और प्रशासन ने शादी के नाम पर ऐसी अराजकता रोकने की कोशिश भी की हो। 

अब सवाल यह उठता है कि अगर बुनियादी कानूनों को लागू करने के लिए पुलिस और प्रशासन के पीछे हाईकोर्ट के जज लाठी लेकर लगे रहें, तो यह अधिक बड़ा अपमान किसका माना जाए? जजों का, या कि अफसरों का? क्या आईएएस-आईपीएस जैसी बड़ी-बड़ी राष्ट्रीय सेवाओं से आने वाले अफसरों को इतने में तसल्ली हो जाती है कि वे मुख्यमंत्री, राज्यपाल, और हाईकोर्ट जजों के बंगलों को लाउडस्पीकरों की पहुंच से परे रख लेते हैं, अपने घरों में चैन से सो जाते हैं, और बाकी पूरे प्रदेश को अराजक गुंडों के रहमोकरम पर छोड़ देते हैं? हमने इसी प्रदेश में, राज्य बनने के दशकों पहले यह देखा हुआ है कि एक डिप्टी कलेक्टर, और एक डीएसपी रैंक के अफसर पूरे शहर के अवैध कब्जे हटवा देते थे, ट्रैफिक सुधार देते थे, डिप्टी कलेक्टर म्युनिसिपल कमिश्नर अवैध कब्जे तोड़वा देता था। आज छोटी-छोटी कुर्सियों पर आईएएस-आईपीएस बैठे हुए हैं, एक-एक जिले के पांच जिले बन गए हैं, और जहां दो बड़े अफसर रहते थे, वहां अब दर्जन भर से अधिक अफसर अखिल भारतीय सेवाओं के हैं, लेकिन उनका असर खत्म हो गया है। या तो राजनीति इतनी हावी हो गई है कि उसने अफसरों के हाथ बांध दिए हैं, या फिर अफसर ही अपनी महत्व मानी जाने वाली कुर्सियों पर खुद को महफूज बनाकर चलते हैं, और किसी को भी नाराज करना नहीं चाहते। नतीजा यह है कि जनता पीढ़ी-दर-पीढ़ी अराजक होते चल रही है, और उसके मन में नियम-कानून के लिए परले दर्जे की हिकारत मजबूत पैर जमाते जा रही है। अफसरों के दर्जन भर बार चेतावनी जारी करने के बाद भी सडक़ किनारे धंधा करने वाले छोटे-छोटे लाउडस्पीकरों वाले लोग भी जब उनकी बात नहीं सुनते, हाईकोर्ट की चेतावनियों की परवाह नहीं करते, तो यह जाहिर है कि जनता के मन में नियम-कानून का सम्मान पूरी तरह खत्म हो गया है। 

यह नौबत देश में ऐसे नियम-कानून होने के मुकाबले अधिक खतरनाक है। अगर नियम-कानून ही न रहे, तो कम से कम जनता उनको तोडऩे की कुसूरवार नहीं रहती है, लेकिन जब छोटी-छोटी बातों को लेकर बड़े-बड़े नियम अदालती फैसलों से लागू होते हैं, और कानून देश को एक अधिक सभ्य जगह बनाने की कोशिश करता है, उस वक्त भी अगर बड़े-बड़े अफसर अपनी छोटी-छोटी रह गई रियासतों में कड़े रूख वाले अदालती फैसलों को भी लागू नहीं करवा पाते, तो यह कानून-व्यवस्था ध्वस्त हो जाने का एक बड़ा सुबूत है। जब जनता कुछ नियम तोडऩे के लिए आजाद रहती है, तो फिर वह चाकू-छुरी लेकर चलने, गाडिय़ों के साइलेंसर फाडक़र चलने को भी अपना हक मान लेती है, और छत्तीसगढ़ के जनजीवन में यह नौबत सिर चढक़र बोल रही है। नमूने के लिए हर जिले की पुलिस ऐसे कुछ लोगों को पकड़ लेती है, लेकिन हकीकत यह है कि उसका अनुपात असल बदअमनी के मुकाबले कुछ भी नहीं है। और दिक्कत यह है कि कानून मानने वाले, शरीफ लोग अधिक तकलीफ पाते हैं क्योंकि उनके मन में यह रंज भी रहता है कि वे हर कानून का पालन करते हैं, लेकिन कानून तोडऩे वालों से तकलीफ झेलते हैं, और सरकार उनकी मदद के लिए मौजूद नहीं हैं, क्योंकि वह तो हाईकोर्ट के सख्त फैसलों को लागू करने के लिए भी मौजूद नहीं है। 

हम अगर फिर से तरह-तरह के लाउडस्पीकरों के हल्ले की बात पर लौटें, तो शादियों के इस मौसम में चारों तरफ लोगों ने मनमानी की है, और कई किलोमीटर तक जाने वाले शोरगुल को भी पुलिस-प्रशासन ने नहीं रोका है। अब तो दूर-दूर तक तरह-तरह की रौशनी फेंकने वाले लैम्प बाजारों में खुले बिक रहे हैं, और न इनके इस्तेमाल पर कोई रोक लगाई जा रही, न ही इनकी बिक्री पर। बहुत जाहिर तौर पर ऐसी लाईटें एक गंभीर प्रदूषण पैदा करती हैं, और ट्रैफिक के लिए खतरा खड़ा करती हैं, लेकिन जब तक ये सत्ता पर काबिज कुछ बड़े लोगों के लिए परेशानी का सबब नहीं बनेंगी, तब तक इनको रोकने की जहमत कोई नहीं उठाएंगे। आज तो हालत यह है कि बाजारों में दुकानदार इतने किस्म के लैम्प बाहर लगाकर रखते हैं कि वे चौराहों की ट्रैफिक लाईट का धोखा भी देते हैं, फिर भी इनको रोकने की कोई कोशिश नहीं होती है। 

ये तमाम बातें नियमों को इस तरह तोडऩा नहीं है कि कहीं कोई एक ट्रक प्रतिबंधित समय में कहीं घुस गई हो। यह तो नियम-कानून तोडऩे का पूरा का पूरा हाईवे चल रहा है, और कोई रोकथाम नहीं है। अब तो हाईकोर्ट पर भी दया आती है कि उसे कितनी बार कितने लोग जाकर बताएं कि उसकी अवमानना हो रही है। अदालत भी शायद यह समझ चुकी है कि उसके बस में बस अपनी अवमानना कराना ही रह गया है, और वह दूसरे लोगों का आ-आकर यह याद दिलाना नहीं चाहती है। वैसे भी हम अखबार का जिम्मा सार्वजनिक मुद्दों पर खुलकर लिखने जितना मानते हैं, और किसी जर्नलिस्ट के एक्टिविस्ट की तरह अदालत जाने के खिलाफ हैं, इसलिए हम खुद होकर तो अदालत के सामने इस बात को नहीं रखते, लेकिन जिन लोगों ने इन मुद्दों पर जनहित याचिकाएं लगाई थीं, उन्हें जरूर लाउडस्पीकरों और उससे जुड़ी कल की हत्याओं के बारे में अदालत को बताना चाहिए, और यह भी बताना चाहिए कि हाईकोर्ट के जांच कमिश्नर नियुक्त हुए बिना प्रदेश में जनता को जहन्नुम की जिंदगी से कोई नहीं बचा सकते। छोटे-छोटे बच्चों, बीमार लोगों, बूढ़ों, दूसरे प्राणियों, और रात-दिन की शिफ्ट में काम करते हुए आराम की जरूरत वालों की जिंदगी नर्क बनी हुई है, और कानून तोडऩे वालों के लिए यह प्रदेश स्वर्ग बना हुआ है। हाईकोर्ट जजों के रिहायशी इलाके, और अदालत का इलाका लाउडस्पीकरों से मुक्त रखा गया होगा, लेकिन अदालत को प्रदेश भर से इसकी रिपोर्ट जरूर बुलवाना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अप्रैल 2024


 

पुलिस का माफिया राज हाईकोर्ट ने उजागर किया

 22 अप्रैल 2024

 

छत्तीसगढ़ पुलिस का एक नया कारनामा हाईकोर्ट की मेहरबानी से उजागर हुआ है। अपने पड़ोसी द्वारा सडक़ पर अपना अहाता बनाने की शिकायत करने के लिए एक रिटायर्ड शिक्षिका और उनकी इंजीनियर बेटी पुलिस थाने पहुंचे थे, पुलिस ने उन्हें ही गिरफ्तार कर लिया, शाम को अदालत में पेश किया, और कानूनी मदद नहीं लेने दी, और बॉंड भरकर जमानत पर रिहा होने का मौका भी नहीं दिया। पुलिस ने इस रिटायर्ड शिक्षिका को थाने में थप्पड़ भी मारे। अब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली बेंच ने इसे स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन माना है, और इन्हें तीन लाख रूपए मुआवजा देने का आदेश राज्य सरकार को दिया है। जमानत पर रिहाई के पहले मां-बेटी तीस घंटे जेल में रखे गए थे, और उसका यह मुआवजा अब सरकार की जेब से जाने वाला है। यह तो शहर का मामला है, और शिकायकर्ता हाईकोर्ट तक जाने की ताकत रखते थे, लेकिन छत्तीसगढ़ के गांव-देहात और जंगलों में बसे हुए लोग इतने कमजोर रहते हैं कि उनके लिए थाने तक जाना भी मुश्किल रहता है, और अगर किसी कानूनी मदद से वे अदालत तक पहुंच भी पाते हैं, तो कई बार तो उनके मामले खारिज ही हो जाते हैं। हम हाईकोर्ट का यह ताजा फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण मानते हैं कि इसके बाद छत्तीसगढ़ पुलिस को कुछ सबक मिलने के आसार बन सकते हैं। हमारा यह भी ख्याल है कि जो पुलिसवाले इस मामले में जिम्मेदार पाए जाते हैं, उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी होनी चाहिए, और पुलिस को यह अक्ल भी मिलनी चाहिए कि शिकायतकर्ता महिलाओं की ऐसी गिरफ्तारी जैसी अराजकता इस प्रदेश में अभी नहीं है। अभी ऐसी कोई इमरजेंसी लगी हुई नहीं है कि पुलिस इतनी मनमानी कर सके, और न ही ये शिकायतकर्ता मां-बेटी पेशेवर मुजरिम हैं जिन्हें कि जेल भेजने की नीयत से इस तरह का इंतजाम किया गया। एक अवैध कब्जा और अवैध निर्माण करने वाले की हिमायती बनकर अगर पुलिस ने शिकायतकर्ता को चुप करवाने की सुपारी उठाई थी, तो इसकी सजा भी उन सबको मिलनी चाहिए जो इसके लिए जिम्मेदार थे। हम हाईकोर्ट के इस कड़े फैसले को किसी संदेह के लायक नहीं मान रहे हैं, और यह फैसला न सिर्फ पुलिस बल्कि दूसरे सरकारी विभागों के लिए भी एक मिसाल बननी चाहिए। हमें सरकारी नियमों की बारीकियां नहीं मालूम हैं लेकिन अगर इन पुलिसवालों की बददिमागी से सरकार को जुर्माना देना है, तो उसकी वसूली भी इन लोगों से होनी चाहिए। 

आज हिन्दुस्तान के बहुत से राज्यों में गलत काम करने वालों का ही राज चलता है। जैसा कि इस मामले में हुआ है, अवैध कब्जा और अवैध निर्माण करने वाले को पुलिस से इस दर्जे की गैरकानूनी मदद भी मिली है। अवैध कामों में ही कमाई मोटी रहती है, और ऐसे माफिया का भागीदार बनने के लिए पुलिस और दूसरे सरकारी विभाग सभी उतावले बने रहते हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही एक सबसे महंगी रिहायशी कॉलोनी ऐसी है जिसके मालिक ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ कोटवार की जमीन अपने घेरे में लेकर कॉलोनी का नक्शा भी पास करा लिया है, और शहर की सबसे महंगे प्लाट भी वहां बेच दिए हैं। जिस-जिस विभाग में इसकी शिकायत हुई, वहां के अफसरों ने भी इस कॉलोनी में जमीनें ले ली, मंत्रियों और नेताओं ने पहले से बहती गंगा में हाथ धो लिए थे। नतीजा यह है कि हर तरह के अवैध काम करने के बाद भी, हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ ऐसी कॉलोनी पनप रही है, और उपकृत आला अफसरों की मेहरबानी से वह अपनी दूसरी कॉलोनियों में भी तरह-तरह के अवैध काम कर रही है। यह किसी एक कारोबारी का हाल नहीं है, और न ही किसी एक कारोबार का, जिनका सरकारी नियमों से कोई भी वास्ता पड़ता है, उन सबके कामों के अवैध दर्जे का यही हाल है। इसलिए ऐसे ताकतवर लोगों के खिलाफ जब कोई शिकायत आती है, तो शिकायतकर्ता को निपटाने के लिए इनकी कॉलोनियों के प्लाट और मकान मालिक बने नेता और अफसर टूट पड़ते हैं। सरकार और कारोबार का यह माफियाई-रिश्ता इतना मजबूत है कि फेविकोल को इसी को अपने इश्तहार में इस्तेमाल करना चाहिए। 

फिर पुलिस की बात पर लौटें, तो पुलिस की कोई भी कार्रवाई यह तौल लेने के साथ शुरू होती है कि जिसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, उससे कमाई की कोई उम्मीद है, या नहीं, उसकी कोई राजनीतिक पहुंच है या नहीं, और अगर राजनीति पहुंच है तो वह सत्तारूढ़ पार्टी में है, या विपक्ष में। जिस तरह हंसों के बारे में कहा जाता है कि वे मोती चुन लेते हैं, उसी तरह हिन्दुस्तानी पुलिस बिना राजनीतिक खतरे वाले मामलों को चुन लेती है, और फिर जिससे कमाई नहीं होने वाली है, उसके खिलाफ कार्रवाई शुरू कर देती है। जिस जांच एजेंसी को बिना पूर्वाग्रह के सच को परखना चाहिए, उसके काम की शुरूआत ही फायदे के एक फैसले पर पहुंच जाने से होती है, और फिर उस फैसले के मुताबिक सुबूत जुटाने का सिलसिला चलता है। यह बात बस्तर जैसे इलाके में, नक्सल प्रभावित जंगल और गांव में आदिवासियों के खिलाफ अक्सर ही इस्तेमाल होती है, और उनके तो मामले भी हाईकोर्ट में जाकर दर्जनों के हिसाब से थोक में खारिज हो जाते हैं। वह एक अलग और लंबा सिलसिला है, इसलिए उसकी चर्चा यहां मुमकिन नहीं है। लेकिन बिलासपुर में एक मां-बेटी को जिस तरह उनकी शिकायत शांत करवाने के लिए, और एक अवैध कब्जा-निर्माण करने वाले का साथ देने के लिए पुलिस ने जिस तरह मां-बेटी को जेल भेजा, वह शहरी छत्तीसगढ़ के लिए भी थोड़ी सी अटपटी बात है, और प्रदेश की भाजपा सरकार के राजनीतिक, और दूसरे संगठनों के लोगों को इस पर ध्यान देना चाहिए कि उनकी सरकार की पुलिस अगर इस तरह मुजरिम-दर्जे का काम कर रही है, तो उसे सुधारा जाना चाहिए। ऐसा न होने पर पुलिस सत्ता को कितने गहरे गड्ढे में गिरा सकती है, यह राज्य में पिछले पांच बरस में अच्छी तरह साबित हो चुका है। प्रदेश की भाजपा सरकार को ऐसे अफसरों से सावधान रहना चाहिए जो कि सत्तारूढ़ नेताओं को तुरंत तो खुश करके रखें, लेकिन पांचवें बरस तक इतने गहरे गड्ढे में डाल दें कि संघ के तमाम लोग मिलकर भी भाजपा को नुकसान से न निकाल सकें। हम इस चर्चा को किसी के राजनीतिक नफे-नुकसान के लिए नहीं कर रहे हैं, हम सिर्फ बेकसूर जनता के लोकतांत्रिक हक के लिए यह बात कर रहे हैं, लेकिन इस मिसाल को देना जरूरी इसलिए है कि सत्तारूढ़ नेता इस एक खतरे को कुछ जल्दी समझ पाते हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 अप्रैल 2024


 

ऋषि सुनक से भारतीयों को लगा जोर का झटका

  21 अप्रैल 2024

  

ब्रिटेन की खबर है कि प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने दूसरे देशों से आकर ब्रिटेन में काम या कारोबार करने वाले लोगों को उनके अपने देश की कमाई पर मिलने वाली टैक्स छूट को 15 साल से घटाकर 4 साल कर दिया है। उल्लेखनीय है कि ऋषि सुनक की भारतवंशी पत्नी की भारत से होने वाली कमाई पर ब्रिटेन में टैक्स न देने को लेकर पिछले बरस यह परिवार बड़े अप्रिय विवादों में घिरा था, और उसके तुरंत बाद टैक्स कानूनों को चुनौती दिए बिना अक्षता मूर्ति ने नियमों से अधिक टैक्स देने की घोषणा की थी। वे भारत में अपने पिता, नारायण मूर्ति से मिली जायदाद, और अपने खुद के काम की कमाई पर ब्रिटेन में बहुत कम टैक्स दे रही थीं, या टैक्स नहीं दे रही थीं। अब तक वहां के कानून में ऐसा ही प्रावधान था, लेकिन अब इस नए कानून के आने से ब्रिटिश पीएम परिवार पर लगी यह तोहमत भी हट सकेगी। वर्तमान प्रधानमंत्री ऋषि सुनक पहले वित्तमंत्री थे, और वित्तमंत्री रहते हुए उनकी पत्नी टैक्स छूट का जिस तरह फायदा उठा रही थी, उसे ब्रिटिश खजाने के साथ नाइंसाफी बताया गया था। उस शर्मिंदगी से उबरने के लिए ऐसा लगता है कि ऋषि सुनक ने इस नए कानून को बनाने में अधिक दिलचस्पी ली है। अभी तक भारत से जाकर ब्रिटेन में काम या कारोबार करने वाले लोगों को वहां अपनी भारतीय आय पर 15 साल तक टैक्स नहीं देना पड़ता था, और सिर्फ ब्रिटिश कमाई पर टैक्स लगता था। एक खबर बताती है कि पिछले पांच बरस में 83 हजार से अधिक भारतीयों ने ब्रिटिश नागरिकता ली थी, यह एक ऐसी योजना के तहत हुआ था जिसमें अतिसंपन्न लोगों को ब्रिटेन में मोटे पूंजीनिवेश के एवज में तुरंत ही वहां नागरिकता मिल जाती थी। अब इन नए टैक्स नियमों की वजह से ऐसा लगता है कि हिन्दुस्तानियों में ‘अंग्रेज’ बनने का आकर्षण कुछ कम होगा। 

ऋषि सुनक की इस पहल को इस संदर्भ में भी देखना चाहिए कि भारत से किसी तरह का रिश्ता रखने वाले दूसरे देशों के बड़े कारोबारियों या सत्तारूढ़ नेताओं को लेकर भारत में जो एक बावलापन अक्सर ही सतह पर दिखता है, वह किसी काम का नहीं रहता, उसकी कोई जमीन नहीं रहती। भारतीय मूल की मां वाली अमरीकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस को लेकर भारत में यह सनसनी फैली थी कि मानो अब अमरीकी रूख भारत के लिए बदल जाएगा। सच तो यह है कि दुनिया के किसी भी देश से दूसरे देश में पहुंचने वाले लोग जहां रहते हैं, काम करते हैं, राजनीति में आकर सत्ता तक पहुंचते हैं, वे उसी देश के होकर रह जाते हैं। सोनिया गांधी इटली से भारत आकर यहां राजनीति की ऊंचाईयों पर पहुंचीं, लेकिन क्या यूपीए सरकार के दस बरसों में वे इटली के साथ किसी तरह की रियायत कर पाईं? ऐसी ही नौबत कमला हैरिस या ऋषि सुनक की रहती है, या कनाडा में मंत्री बनने वाले बहुत से भारतवंशियों की भी रहती है। उनकी जड़ें, उनके डीएनए जरूर भारत से जुड़े रहते हैं, लेकिन वे अपने वर्तमान देश के ही रहते हैं, वहीं के लिए वफादार रहते हैं। सच तो यह है कि जब अपने जन्म या पुरखों के देश के साथ किसी रियायत का मौका आता है तो ऐसे नेता इसलिए हिचक जाते हैं कि उनके जरा भी नर्म बर्ताव उन पर यह तोहमत लगवा सकता है कि वे अपने पुरखों की जमीन के प्रति पूर्वाग्रह दिखा रहे हैं। इसलिए ईमानदार दिखने के लिए उन्हें कड़ाई कुछ अधिक बरतनी पड़ती है, जैसी कि आज ऋषि सुनक के फैसले से दिखाई पड़ रही है। 

आज के वक्त जब दुनिया भर के लोग दूसरे देशों में जाकर वहां बहुत कुछ हासिल करते हैं, उस वक्त उनकी कामयाबी के बाद यह सोच लेना कि उनकी पहली वफादारी अपने जन्म के देश से होगी, बहुत बड़ी खुशफहमी है, और बेईमानी की उम्मीद है। हर किसी को अपने मौजूदा काम, मौजूदा देश, और मौजूदा विचारधारा के प्रति वफादार रहना चाहिए। अपने डीएनए से वफादारी किसी वैज्ञानिक शोध के लिए तो ठीक हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र में इसकी कोई जगह नहीं हो सकती। आज अंतरराष्ट्रीय संबंधों में हर किसी को अपने वर्तमान के साथ ईमानदार रहना चाहिए, और तमाम लोग ऐसे रहते भी हैं, तभी वे कामयाब हो पाते हैं। हिन्दुस्तान के लोगों की एक दिक्कत यह भी है कि वे दुनिया भर में बसे हुए भारतवंशियों की कामयाबी को भारत की कामयाबी मान बैठते हैं। ये सारे लोग जो भारत से जाकर अपनी पीढ़ी में या अगली पीढ़ी में कामयाब हुए हैं, वे उन देशों के माहौल की वजह से, और अपनी मेहनत की वजह से कामयाब हुए हैं। हिन्दुस्तान में अगर सफलता की इतनी ही संभावनाएं रहतीं, तो सुंदर पिचई अमरीका जाकर गूगल के मुखिया बनने के बजाय भारत में किसी कंपनी के मुखिया बने होते, या उन्होंने यहां वैसी कोई कंपनी खड़ी कर दी होती। लेकिन चुनावी बॉंड का यह ताजा मामला बताता है कि भारत में कंपनियों को किस तरह के माहौल में काम करना पड़ता है, और उनके आगे बढऩे की संभावनाएं किस तरह कदम-कदम पर घटती जाती हैं। भारत को तो दूसरे देशों में सफल भारतवंशियों को देखकर यह आत्ममंथन करना चाहिए कि उसकी अपनी जमीन पर कारोबार या राजनीति में इतनी खरपतवार क्यों है कि यहां प्रतिभा की फसल ठीक से फल-फूल नहीं पाती। अमरीका या ब्रिटेन जैसे देश में कारोबारी अपनी राजनीतिक विचारधारा को लेकर भी खुलकर सक्रिय रहते हैं, और उन्हें उसका कोई नुकसान भी शायद नहीं उठाना पड़ता। भारत को हर दिन कुछ घंटे आईने के सामने बैठकर यह देखना चाहिए कि इतनी प्रतिभाशाली लोग देश के बाहर जाकर ही प्रतिभा को इस तरह साबित क्यों कर पाते हैं? साथ-साथ दूसरे देशों में भारतवंशियों की कामयाबी का जश्न हिन्दुस्तान की कामयाबी की तरह मनाना बंद भी करना चाहिए, ऐसे झूठे गौरव, और ऐसी असली खुशी के बीच कोई तालमेल नहीं रहता।      

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 अप्रैल 2024



 

दीवारों पर लिक्खा है, 20 अप्रैल 2024


 

तारीफ बदल देती है जिंदगी, करने, और पाने वालों की भी

 20 अप्रैल 2024

  

अमरीका के एक प्रमुख विश्वविद्यालय, स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक ताजा रिसर्च बताती है कि किस तरह किसी की तारीफ करने पर उन पर एक सकारात्मक असर पड़ता है, और ऐसा ही असर उन लोगों पर भी पड़ता है जो दूसरों की अच्छे कामों की तारीफ करते हैं। इस विश्वविद्यालय ने मनोविज्ञान विभाग की एक रिसर्च से पता लगता है कि तारीफ दोनों तरफ के लोगों का भला करती है। यह शोध करने वाली एक प्रोफेसर का कहना है कि तारीफ लोगों का दिन बना देती है, और करने वाले को कोई लागत भी नहीं आती है। कुछ दूसरे विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं का भी कुछ ऐसा ही सोचना है जिन्होंने तारीफ के मनोविज्ञान पर गंभीर काम किया है। उनका कहना है कि जिनके काम को दूसरे लोग भी अच्छा समझते हैं, उन्हें और अच्छा करने की प्रेरणा मिलती है। इससे लोगों के मन की यह जिज्ञासा भी शांत होती है जिससे कि वे यह जानना चाहते हैं कि और लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं। हिन्दी जुबान में एक बात कई बार कही जाती है- सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग? 

यह सचमुच ही लोगों के लिए परेशानी का एक सबब होता है कि उनके किसी काम या उनकी किसी बात पर लोग क्या कहेंगे? जब लोग किसी बात की तारीफ करते हैं, तो यह एक कामयाबी रहती है, और बेहतर करने की प्रेरणा भी इससे मिलती है। घर पर अगर खाना बनाने के लिए तनख्वाह पर किसी को रखा गया है, तो उनकी तारीफ करना जरूरी नहीं रहता, लेकिन कभी उनके पकाए और खिलाए हुए की तारीफ करके देखें तो समझ आएगा कि अगली बार वे ऐसी तारीफ पाने के लिए और क्या-क्या मेहनत करेंगे। यह भी जरूरी नहीं रहता कि लोग दूर के लोगों की, और महज औपचारिकता के लिए तारीफ करें। हम पहले भी कई बार इस बात को लिख चुके हैं कि लोगों को किसी भी व्यक्ति से उनकी दिन की पहली बातचीत नकारात्मक नहीं करना चाहिए। किसी बात के लिए आलोचना भी करनी हो, तो भी पहले तारीफ के लायक कोई बात ढूंढकर चाहे मामूली ही क्यों नहीं, तारीफ करनी चाहिए, और फिर बाद में आलोचना के लायक बात छेडऩी चाहिए। अगर पहले तारीफ की बात कर ली जाए, तो लोग आलोचना को भी बेहतर तरीके से बर्दाश्त कर पाते हैं। 

तारीफ कितनी मायने रखती है, यह उन लोगों से बेहतर कोई नहीं जानते जिनकी जिंदगी में कोई अक्सर ही तारीफ करने वाले थे, और किसी वजह से अब नहीं रह गए। उनकी जिंदगी एकाएक वीरान हो जाती है, और जिंदगी से तारीफ एकाएक गायब हो जाने से, उनके काम पर बड़ा बुरा असर पड़ता है। इसलिए समझदारी इसमें है कि जिन लोगों के मन में आपके काम के लिए, आपके लिए सचमुच ही तारीफ है, उन लोगों की कद्र की जाए, उन्हें पास रखा जाए, उनके पास रहा जाए। ऐसा भी नहीं कि इस बात को समझने के लिए मनोवैज्ञानिक या शोधकर्ता ही लगेंगे। आम लोग भी मामूली समझबूझ से इस बात को समझ सकते हैं कि इर्द-गिर्द के लोगों के अच्छे कामकाज के लिए उनकी तारीफ करके किस तरह उनसे बेहतर काम करवाया जा सकता है। दरअसल अधिकतर काम ऐसा रहता है जिसमें आम प्रदर्शन और खास प्रदर्शन दोनों ही एक ही किस्म के लोगों से हासिल किया जा सकता है। अगर एक ही व्यक्ति बेदिली से, अनमने ढंग से कोई काम करे, तो वह बहुत आम दर्जे का हो जाता है, और अगर उसी काम को करते हुए उसके दिमाग में यह रहे कि इसकी वजह से उसे तारीफ भी मिल सकती है, तो उसकी जरा सी अतिरिक्त दिलचस्पी उस आम काम को खास काम में तब्दील भी कर सकती है। जब आप आसपास के किसी के बेहतर काम की तारीफ करते हैं, तो भविष्य में भी उनसे वैसे ही बेहतर प्रदर्शन की एक किस्म से गारंटी भी कर लेते हैं। 

हमने पहले भी अलग-अलग कई जगहों पर इस बात को लिखा है कि लोगों को ऐसे लोगों की संगत से बचना चाहिए जिनके दिल-दिमाग में दूसरों के लिए सिर्फ नापसंदगी और आलोचना भरी हुई है, जिन्हें आसपास कुछ भी अच्छा नहीं लगता है, हर कोई बुरे लगते हैं। ऐसे लोगों के इर्द-गिर्द बने रहने से आपको भी पूरी दुनिया बुरी लगने लगती है, और किसी के अच्छे काम भी कभी तारीफ के लायक नहीं लगते हैं। जिंदगी और दुनिया तो वही रहते हैं, सिर्फ आप अपने रूख और नजरिए की वजह से इर्द-गिर्द की हकीकत की इतनी बुरी तस्वीर मन में बना लेते हैं कि पूरे वक्त आपका का बर्ताव एक निंदक का होकर रह जाता है। कबीर ने भी जब यह कहा था कि निंदक नियरे राखिए, तो यह उन लोगों के लिए कहा था जो अपने आसपास आलोचकों को बर्दाश्त करते हैं, और वे लोग अपनी गलतियां तुरंत जान जाते हैं। लेकिन कबीर ने यह बात निंदकों के भले के लिए नहीं कही थी जिन्हें पूरे वक्त किसी न किसी की निंदा सूझती है। कई लोगों का तो हाल यह रहता है कि जब तक दूसरों की निंदा न कर लें, तब तक खाना हजम नहीं होता, यह लगते रहता है कि आज का दिन बेकार गुजर रहा है कि काम की कोई बात ही नहीं हो पाई। 

कुल मिलाकर बात यह है कि जिंदगी में अगर जायज जरूरत रहने पर लोगों की आलोचना करनी है, तो वह एक सकारात्मक सुझाव की तरह अधिक रहनी चाहिए, न कि निंदा और भर्त्सना की तरह। और आसपास जाने-पहचाने, या अनजाने, जैसे भी लोग हों, उनकी कोई बात अगर अच्छी लगे, उनका कोई काम अच्छा लगे, तो उनकी तारीफ का कोई मौका नहीं छोडऩा चाहिए। हमने आज की इस चर्चा की शुरूआत तो स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के एक शोध के नतीजे से की है कि किस तरह तारीफ उसके दोनों सिरे के लोगों का भला करती है, लेकिन आगे के निष्कर्ष हमारे खुद के हैं कि लोगों को कम से कम कुछ ऐसे लोग इर्द-गिर्द जरूर रखना चाहिए जिनके मन में उनके लिए, उनके काम के लिए तारीफ है, क्योंकि ऐसे लोग जिंदगी से एकदम से चले जाने पर जिंदगी से एक प्रेरणा ही चली जाती है, और फिर उसकी जगह वैसी कोई दूसरी सकारात्मक चीज नहीं आ पाती है। ऐसे लोगों से बचकर रहें जिनकी जिंदगी का बड़ा हिस्सा ढूंढ-ढूंढकर लोगों की आलोचना करने में गुजर जाता है, तमाम वक्त ऐसी नकारात्मक बातों को सुनने के बाद आपकी अपनी जिंदगी से भी उत्साह जाने लगता है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 अप्रैल 2024


 

धोखा खाने के लिए तैयार बैठे हिन्दुस्तानी

19 अप्रैल 2024

 

हिन्दी फिल्मों की एक लोकप्रिय अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के पति, राज कुन्द्रा की करीब सौ करोड़ रूपए की संपत्ति ईडी ने जब्त कर ली है। उन पर एक कंपनी के नाम पर लोगों को एक क्रिप्टोकरेंसी, बिटक्वॉइन, का धोखा देने, और हजारों करोड़ की धोखाधड़ी में शामिल होने का आरोप है। इसके पहले भी इस आदमी का नाम पोर्नोग्राफी के मामले में आ चुका है, और उसे जेल जाना पड़ा था। इस बिटक्वॉइन जुर्म में पूंजीनिवेशकों को अंधाधुंध कमाई का झांसा दिया गया था। अब हम हिन्दुस्तान में कई किस्म के ऑनलाईन जुए, सट्टे जैसे धंधों को देखें, तो देश के कुछ सबसे मशहूर फिल्मी सितारे, और क्रिकेट खिलाड़ी उनका इश्तहार करते दिखते हैं। फेसबुक जैसे सोशल मीडिया को देखें तो उस पर देश के बड़े-बड़े उद्योगपतियों, बड़े-बड़े पत्रकारों के झूठे इंटरव्यू बड़े-बड़े अखबारों के झूठे वेबसाइट बनाकर डाले जाते हैं, और फेसबुक ऐसे धोखाधड़ी के इश्तहारों को रोकने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाता। यह संपादकीय लिख रहे संपादक ने ही फेसबुक पर ऐसे दर्जनों झूठे इश्तहारों के खिलाफ टिप्पणी की, लेकिन जिनसे कमाई हो रही है उन जालसाजों को भी बढ़ावा देने में फेसबुक की पूरी दिलचस्पी दिखती है। आधी सदी पहले इस देश में बहुत घटिया किस्म की कई पत्रिकाओं में तांत्रिक अंगूठी जैसे इश्तहार आते थे, जो कि जो मांगोगे वही मिलेगा का दावा करते थे, लेकिन सब जानते-समझते भी इन पत्रिकाओं ने कभी ऐसे इश्तहार नहीं रोके। अभी भारत सरकार ने ऑनलाईन सट्टेबाजी के इश्तहारों पर कानूनी रोक लगाई, उसके बाद भी देश के सबसे बड़े अखबार उस इश्तहार को छापते रहे, उनका कुछ बिगड़ा भी नहीं। आज लोगों के वॉट्सऐप नंबर अचानक क्रिप्टोकरेंसी बाजार में पूंजीनिवेश के नाम पर बनाए गए जालसाज समूहों में जोड़ दिए जाते हैं, और वहां पर दस-बीस नंबरों से यह वाहवाही पोस्ट होते रहती है कि इस समूह में उन्होंने किस रफ्तार से कमाई की है, और वे इस समूह के सलाहकार के कितने अहसानमंद हैं।

 
लोग सागौन का पेड़ लगाते हैं, और उसे बांस से अधिक रफ्तार से बढ़ते हुए देखना चाहते हैं, वे चाहते हैं कि साल पूरे होते न होते वे इस सागौन का फर्नीचर भी बना लें। लोगों को अपने पंूजीनिवेश पर अंतरिक्ष छूती कमाई की हसरत रहती है, और वे सामान्य समझबूझ को ताक पर धरकर एक सपने को पूरा होते देखने के लिए जुट जाते हैं। और वह सपना एक दु:स्वप्न साबित होता है, और लोगों का पूंजीनिवेश मिट्टी में मिल जाता है, नाली में बह जाता है। छत्तीसगढ़ इन दिनों दसियों हजार करोड़ रूपए के महादेव सट्टेबाजी ऐप की चर्चा से लदा हुआ है, और हिन्दुस्तान का डिजिटल विकास हर किस्म की साइबर-जालसाजी के लिए सबसे अधिक सहूलियत का साबित हो रहा है। हैरानी की बात यह है कि भारत सरकार के पास किसी साइबर-जुर्म को रोकने के लिए जितने किस्म के औजार हैं, वे इस्तेमाल होते नहीं दिखते, और झारखंड के एक गांव जामताड़ा में तो हर नौजवान ऑनलाईन मुजरिम बन चुके हैं। जगह की इतनी शिनाख्त होने के बावजूद सरकार वहां से रोजाना होने वाली दसियों हजार टेलीफोन कॉल पर कुछ नहीं कर पा रही जो कि सारी की सारी जालसाजी और धोखाधड़ी के लिए होती हैं। 
हम अपने आसपास भी लोगों को जालसाजी का शिकार होते देखकर हैरान होते हैं। अभी एक बैंक अफसर को किसी तांत्रिक ने यह झांसा दिया कि वह रात में श्मशान में नोटों की बारिश करवा देगा। और इसके झांसे में बैंक अफसर ने बहुत सा पैसा भी डुबा दिया। अब अगर बैंक अफसर को आसमान से नोटों की बारिश पर भरोसा हो रहा है, तो फिर कम पढ़े-लिखे लोगों को मोबाइल फोन और इंटरनेट के दूसरे औजारों और हथियारों से धोखा देना तो और अधिक आसान ही रहता होगा। यही हो भी रहा है। हैरानी की एक बात यह भी है कि सुब्रत राय सहारा सरीखे धोखेबाज देश भर के करोड़ों लोगों से  हजारों करोड़ रूपए इकट्ठे कर लेते हैं, और फिर जेल पहुंच जाने पर भी सुप्रीम कोर्ट से सीधे सौदेबाजी करते हैं कि उन्हें जेल में कारोबारी दर्जे की सहूलियत दी जाए ताकि वे अपनी कंपनी की संपत्ति बेचकर देनदारी चुका सके। देश का सबसे बड़ा धोखेबाज किस तरह देश की सबसे बड़ी अदालत के साथ सौदेबाजी कर सकता है, यह कानून के विश्वविद्यालयों में पढ़ाने के लिए एक शानदार मामला है। अगर आप बहुत ही बड़े धोखेबाज हैं, तो सुप्रीम कोर्ट आपको रियायतें देने के लिए सौदेबाजी में किसी भी हद तक नर्म पड़ सकता है। 

हिन्दुस्तान बड़ा ही अजीब देश है। यहां किसी को एक अनजाने कॉल पर यह कहकर धोखा दिया जा सकता है कि वे अगर वीडियो कॉल पर अपने कपड़े उतार दें तो सामने कोई लडक़ी भी अपने कपड़े उतार देगी। हर दिन देश भर में ऐसी कम से कम हजार रिपोर्ट दर्ज हो रही हैं, हर दिन कहीं न कहीं ऐसी खबर छप रही है, लेकिन अच्छे-खासे पढ़े-लिखे, शहरी लोग भी खुशी-खुशी इस झांसे में पड़ते दिखते हैं, और उसके बाद उनके पास के एक-एक पैसे को चूस लेने के लिए ब्लैकमेलर जुट जाते हैं। यह सिलसिला लोगों में तकनीकी और कानूनी जानकारी की कमी का हो न हो, यह लोगों में देह की भूख को आंखों से पूरा करने की अपूरित इच्छाओं का जरूर है। किसी की बदन को देख लेने की हसरत इतनी बड़ी है कि लोग उसके लिए खुद नंगे हो जाने पर आमादा रहते हैं। ऐसे लोगों को भला कौन बचा सकते हैं? और ब्लैकमेलरों के हाथों लुट जाने वाले भी ऐसे लोग आमतौर पर पुलिस के पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। 

भारत सरकार और प्रदेशों की सरकारों की नजरों के सामने धोखाधड़ी का यह सिलसिला लगातार जोर-शोर से जारी है, और देश की डिजिटल जागरूकता, जालसाजों के दिनदहाड़े, बीच सडक़ पर खोदे हुए गड्ढे में कूदने पर उतारू रहती है। बहुत से लोग ऐसी धोखाधड़ी में दो नंबर का पैसा भी लगाते होंगे, और इसलिए वे शिकायत करने नहीं जाते। देश की सभी सरकारों और एजेंसियों को कई किस्म की साइबर-जुर्म, और क्रिप्टोकरेंसी जैसे धोखे के खिलाफ बचाव और लोगों की जागरूकता की योजना बनानी चाहिए, वरना सौ मुजरिमों में से एक-दो पकड़ा जाएंगे, और इतना फीसदी ही पैसा भी वापिस मिल सकेगा। 

(Daily Chhattisgarh)