एडल्ट पोर्न अभिनेत्री ने ट्रंप को सजा दिला ही दी!

 31 मई 2024

 अमरीका की जनता ने अभी कुछ घंटे पहले एक इतिहास रचा है। न्यूयॉर्क की एक अदालत ने जनता के बीच से चुने गए एक दर्जन ज्यूरी सदस्यों ने पिछले राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप पर एक लंबी सुनवाई के बाद यह माना है कि उन पर लगे सभी 34 आरोप सही हैं। यह मामला एडल्ट फिल्मों की एक अभिनेत्री के साथ ट्रंप के एक पुराने सेक्सकांड का है जिसमें कुछ भी जुर्म नहीं था। नई-नई मुलाकात में ट्रंप ने इस अभिनेत्री, स्टॉर्मी डेनियल्स से 2006 में सेक्स किया था, और बाद में जब 2016 में वे जब राष्ट्रपति चुनाव लडऩे लगे, तो उन्होंने अपने वकील के मार्फत इस अभिनेत्री की चुप्पी खरीदी, और इसके लिए अपनी कंपनी की तरफ से कानूनी फीस के नाम पर इस वकील को एक लाख तीस हजार डॉलर दिए थे जो कि वकील ने इस अभिनेत्री को दिए। लेकिन बाद में जब यह मामला सुर्खियों में आ ही गया, और ट्रंप की तरफ से इस अभिनेत्री के खिलाफ उनके आम अंदाज में अपमानजनक बातें कही गईं, तो इस अभिनेत्री ने खुलकर सेक्स और चुप्पी के भुगतान का यह मामला उजागर किया। बाद में न्यूयॉर्क के सरकारी वकील ने ट्रंप के खिलाफ यह मुकदमा शुरू किया कि यह चुप्पी खरीदना चुनावी खर्च का हिस्सा था जिसे चुनावी खर्च में नहीं दिखाया गया, और मतदाताओं को अंधेरे में रखा गया। इस विवाद से जुड़ा हुआ एक पहलू यह भी था कि ट्रंप ने अपने इस चुनावी खर्च को अपनी कंपनी का कानूनी खर्च दिखाया, जो कि एक अलग बेईमानी थी। ऐसे बहुत से पहलू इस मुकदमे के 34 मुद्दे थे, और जनता के बीच से चुने गए ज्यूरी सदस्यों ने एकमत से इन सभी मुद्दों पर ट्रंप को गुनहगार माना है, और अब इस पर सजा का ऐलान अलग से होगा। जिस जनता ने 2016 में ट्रंप को राष्ट्रपति बनाया था, उसी जनता के बीच से चुने गए ज्यूरी सदस्यों ने आज उन्हें गुनहगार ठहराया है। अमरीका की तरह एक वक्त हिन्दुस्तान में भी कुछ जगहों पर अदालतों में जनता के चुनिंदा प्रतिनिधि ज्यूरी बनकर बैठते थे, और वे ही गुनहगारी तय करते थे। अमरीका में अब भी यह व्यवस्था जारी है, और इस तरह जिस अमरीकी जनता ने एक वक्त ट्रंप को चुना था, उसी ने अब ट्रंप को खारिज कर दिया है। हालांकि इसके बाद भी चुनाव में ट्रंप का हार जाना तय नहीं दिख रहा है। 

अमरीका बड़ा अजीब देश है, राष्ट्रपति चुनाव में दसियों लाख या करोड़ों डॉलर का खर्च होता है। हिन्दुस्तान में कई सीटों पर चुनाव आयोग की निर्धारित सीमा से सौ गुना खर्च होता है, लेकिन हिन्दुस्तान में हर खर्च कालेधन से हो जाता है, उसके लिए किसी बैंक खाते से भुगतान की जरूरत नहीं रहती। अब अगर ट्रंप हिन्दुस्तान में रहते, तो इतनी रकम एक छोटे से बंडल में बांधकर स्टॉर्मी डेनियल्स को दे दी जाती, और उसका कोई सुबूत भी नहीं रहता। लेकिन अमरीका में कालाधन उस तरह आम इस्तेमाल में नहीं रहता, और लोगों को चुनावी चंदे और खर्च के हिसाब में अधिक पारदर्शी रहना पड़ता है। अब इस मामले में सजा पाने के साथ ही ट्रंप अमरीका के पहले ऐसे भूतपूर्व राष्ट्रपति बन जाएंगे जिन पर आपराधिक मुकदमा चला, और जिन्हें सजा हुई। वे नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में अपनी रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से एक बार फिर खड़े हो रहे हैं, लेकिन इस अदालती सजा से उन्हें जेल जाना पड़े, या न जाना पड़े, मतदाताओं के बीच उनकी कुछ तो फजीहत होगी ही। खुद रिपब्लिकन पार्टी के बहुत से नेता ही ट्रंप की उम्मीदवारी के खिलाफ हैं, क्योंकि अभी अधिक गंभीर कुछ दूसरे आपराधिक मामले बचे ही हुए हैं, जिनमें ट्रंप को बड़ी कैद हो सकती है। जब वे 2020 का चुनाव हारे थे, तो उनके समर्थकों ने अमरीकी संसद पर बड़ा हिंसक हमला किया था, और बहुत से संसद सदस्यों की जिंदगी मुश्किल से बची थी। उस वक्त ट्रंप ने अपने हमलावर सदस्यों को रोका नहीं था, बल्कि उन्हें उकसाया था। उनके उस वक्त के कमरे में मौजूद कुछ सहयोगियों ने अमरीकी संसद की सुनवाई में यह बयान भी दिया है कि उन्होंने ट्रंप को समर्थकों को शांत करने कहा था, लेकिन ट्रंप ने उनकी बात नहीं सुनी। 

अमरीका भी बड़ा अजीब देश है जिस रिपब्लिकन पार्टी में बहुत से दूसरे अच्छे उम्मीदवार मौजूद हैं, वहां यह पार्टी दूसरी बार ट्रंप जैसे घटिया इंसान को उम्मीदवार बना रही है। किसी नेता की जीत की संभावनाओं से वे न तो महान हो जाते, और न ही भले। और यह बात ट्रंप पर पूरी तरह खरी उतरती है कि कामयाबी के अलावा उसकी और कोई खूबी नहीं है, और पिछले चुनाव के पहले तो उसने खुलेआम महिलाओं को दबोच लेने को लेकर इतनी घटिया बातें कही थीं कि उन्हें हिन्दी के पाठक बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे। ट्रंप का पूरा का पूरा राष्ट्रपति-कार्यकाल घटिया हरकतों से भरा रहा, लेकिन पार्टी को चार बरस के फासले से अब होने जा रहे अगले चुनाव में भी ट्रंप से परे कोई नहीं सूझा। डोनल्ड ट्रंप की पूरी जिंदगी कानून से लुकाछिपी में ही गुजरी है। एक बड़े खरबपति कारोबारी होने के नाते वे उस धंधे के उसूलों के मुताबिक तमाम तिकड़म करके टैक्स चोरी करते रहे, और उन पर उसके मुकदमे भी चल रहे हैं। उन पर एक दूसरा मुकदमा यह चल रहा है कि पिछले राष्ट्रपति चुनाव में जब उनकी हार घोषित हो चुकी थी, तब उन्होंने एक राज्य के अपनी पार्टी के गवर्नर पर बहुत दबाव डाला था कि वह गिनती में गड़बड़ी करके ट्रंप को जीता हुआ घोषित कर दे। उस गवर्नर ने ऐसा करने से मना कर दिया था। 

अब कुछ लोग रिपब्लिकन पार्टी को यह समझा रहे हैं कि वे ट्रंप की जगह किसी और को उम्मीदवार बनाएं क्योंकि ट्रंप को कई मामलों में कैद हो जाने का खतरा है, और वैसे में क्या जेल में रहते हुए ट्रंप राष्ट्रपति चुनाव लड़ सकेंगे, इस पर लोगों को बड़ा शक है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि अपनी पार्टी के भीतर भी ट्रंप प्रतिबद्ध वोटरों का समर्थन खोएंगे क्योंकि ऐसी शर्मिंदगी अब तक किसी भी नेता ने किसी भी पार्टी के लिए खड़ी नहीं की थी। लोगों का यह भी मानना है कि जो वोटर किसी पार्टी के लिए प्रतिबद्ध नहीं हैं, वे भी ट्रंप के खिलाफ रहेंगे, और असल चुनावी फैसला यही बीच के वोटर करते हैं। लेकिन ट्रंप दुनिया के सामने एक बेमिसाल नेता हैं जो कि इतने किस्म के कानूनी मामलों में फंसे होने पर भी अगला राष्ट्रपति बनने के लिए जान देने पर उतारू हैं। ट्रंप को किसी बात से शर्मिंदगी नहीं होती है, और यह अपने किस्म का अकेला मुजरिम नेता है, जिसके नए-नए मामले सामने आते भी रहते हैं। अमरीका में यह भी माना जा रहा है कि ट्रंप समर्पित समर्थकों में इस अदालती फैसले से कोई फर्क नहीं पडऩे वाला है, और वे लोग ट्रंप के भक्त किस्म के लोग हैं, जो कि हर कीमत पर उसे चाहते हैं।
 
ट्रंप को इस मामले में 11 जुलाई को सजा सुनाई जाएगी, और उसके बाद उनके सामने बड़ी अदालत तक जाकर इस फैसले के खिलाफ अपील करने की गुंजाइश भी रहेगी। ऐसा लगता है कि यह मामला नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव तक किसी अंतिम नतीजे तक नहीं पहुंच सकेगा, और ट्रंप के दीवाने भक्तों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उनका नेता कितना भ्रष्ट, या कितना दुष्ट है। इस बरस दुनिया के 60 देशों में चुनाव हो रहे हैं, और ऐसे में हर देश की मिसाल दूसरे देश में चर्चा तो बनती ही है। देखना है कि यह बरस पूरा होने तक दुनिया अधिक कट्टर और दकियानूसी बनती है, या उदारता की कोई जगह निकलती है।


बच्चों से बूढ़ों तक, हर पीढ़ी साइबर-जुर्म के निशाने पर..

30 मई 2024

 हिन्दुस्तान में हर दिन हजारों लोगों को क्रिप्टोकरेंसी, गोल्ड मार्केट, और शेयर बाजार में पूंजीनिवेश का झांसा देकर हजारों करोड़ की ठगी की जा रही है। और यह सिर्फ इसी देश का मामला नहीं है, आज ही यह खबर आई है कि नाइजीरिया के मुजरिमों का एक गिरोह पूरी दुनिया में कम उम्र बच्चों और किशोरों को इंटरनेट पर किसी तरह से फांस लेता है, और उसके बाद उनकी नंगी तस्वीरें या वीडियो जुटाकर उनको ब्लैकमेल करना शुरू करता है। ऐसे कई बच्चे खुदकुशी भी कर लेते हैं। हालत यह हो गई है कि अपनी नग्न तस्वीरें भेजने से लेकर किसी के कहे हुए अपना बैंक खाता किसी के हवाले कर देने, किसी भी संदिग्ध और रहस्यमय कारोबार में पूरा पैसा डाल देने जैसे काम खासे पढ़े-लिखे और अपने को होशियार समझने वाले लोग भी बिजली की रफ्तार से करते हैं। अभी-अभी छत्तीसगढ़ में भिलाई की एक मेडिकल प्रोफेसर क्रिप्टोकरेंसी झांसे में आ गई, और 58 लाख रूपए ठगों के अलग-अलग खातों में डाल दिए गए। दूसरी तरफ वहीं पर बीएसपी के एक दूसरे रिटायर्ड अफसर ने महीने भर में ऐसे ही ठगों को सवा करोड़ से अधिक दे दिए। अब पुलिस मामले की जांच जरूर कर रही है, लेकिन ऐसे मामलों में टेलीफोन नंबर बंद मिलने लगते हैं, और बैंक खातों से पैसा कई दूसरे खातों से होते हुए गायब हो चुका रहता है। वॉट्सऐप पर इस अखबार के संपादक सहित दूसरे लोगों को हर दिन किसी न किसी ऐसे पूंजीनिवेश समूह में जोड़ दिया जाता है, जिसमें ठगों का जत्था कीर्तन करने के अंदाज में भारी मुनाफा गिनाते रहता है, और नए लोगों को झांसा देते रहता है। 

हिन्दुस्तान में जिस रफ्तार से डिजिटलीकरण हुआ है, उस रफ्तार से डिजिटल-जागरूकता नहीं बढ़ी है। लोगों के बैंक खाते, और भुगतान के दूसरे तरीके तो उनके मोबाइल फोन पर आ गए हैं, और कुछ नंबर दबाते ही वे रकम ट्रांसफर कर सकते हैं, या किसी तरह का ओटीपी उनके खाते में आने पर लोग पूरा अकाऊंट ही खाली कर देते हैं। इससे परे सैकड़ों लोन ऐप ऐसे हैं जो कि लोगों को टेलीफोन पर ही कर्ज मंजूर कर देते हैं, और उनके मोबाइल फोन ऐप डाउनलोड करते ही फोन के तमाम फोटो-वीडियो, और फोनबुक पर साइबर-साहूकारों का कब्जा हो जाता है। इसके बाद वे कर्ज उगाही के लिए अंधाधुंध अंदाज में ब्लैकमेल करते हैं, धमकाते हैं, फोन पर से हासिल कर लिए गए फोटो-वीडियो फोनबुक के हर किसी को भेज देने की धमकी देते हैं, और नमूने के बतौर कुछ लोगों को भेजकर दबाव भी बनाते हैं। भारत सरकार लगातार ऐसे कई मोबाइल ऐप बंद करती है, और फिर यही कारोबारी कुछ दूसरे नामों से फिर नया ऐप लांच करते हैं, और जालसाजी जारी रखते हैं। 

अभी दुनिया में तकरीबन तमाम मोबाइल ऐप सिर्फ गूगल और एप्पल के मोबाइल सॉफ्टवेयर पर उपलब्ध रहते हैं, और यूरोपियन यूनियन सहित कई जगहों पर इन दो लोगों के एकाधिकार के खिलाफ कार्रवाई की बात चल रही है। लेकिन इन दोनों कंपनियों का तर्क यही है कि वे अपने प्लेटफॉर्म पर आने वाले हर मोबाइल ऐप की इतनी गहरी छानबीन करते हैं कि उनसे धोखाधड़ी का खतरा कम रहता है। खासकर एप्पल ने अभी हाल ही में यह दावा किया है कि उसके प्लेटफॉर्म की सुरक्षा तकनीक की वजह से जालसाज लोग वहां जगह नहीं पा सकते, और एप्पल के फोन इस्तेमाल करने वाले लोग बहुत अधिक सुरक्षित रहते हैं। अब एक दूसरा सवाल यह खड़ा होता है कि एक तरफ तो बड़ी कंपनियां अपने प्लेटफॉर्म पर मोबाइल ऐप को जगह देने के पहले उसकी जांच करती हैं, लेकिन दूसरी तरफ इन्हीं प्लेटफॉर्म से डाउनलोड किए गए मोबाइल ऐप के मार्फत हर तरह की धोखाधड़ी चल रही है। वॉट्सऐप पर जो पहली नजर में धोखाधड़ी के ग्रुप बनाए जाते हैं, उनकी शिनाख्त करना इतना मुश्किल भी नहीं होना चाहिए कि इस लोकप्रिय मैसेंजर सर्विस की मालिक मेटा नाम की कंपनी उसकी शिनाख्त न कर सके। लेकिन न सिर्फ वॉट्सऐप पर, जिस पर कि संदेशों के गोपनीय रखने का दावा किया जाता है, बल्कि फेसबुक जैसे खुले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर हर दिन लाखों ऐसे इश्तहार आते हैं जो जाहिर तौर पर धोखाधड़ी के हैं। इनके खिलाफ वहीं पर यह टिप्पणी की जाए कि ये फ्रॉड हैं, धोखाधड़ी हैं, तो भी फेसबुक उनको परखता नहीं है। दूसरी तरफ फेसबुक पर ऐसे इश्तहार हर दिन आते रहते हैं जिनमें कई किस्म के कपड़े और दूसरे सामान बहुत असंभव किस्म के सस्ते दाम पर दिखाए जाते हैं, और उनका एडवांस पेमेंट कर देने के बाद न सामान आता, न कोई जवाब आता। हमारा ख्याल है कि धोखेबाजी के ऐसे इश्तहार दिखाने पर फेसबुक के खिलाफ जुर्म दर्ज किया जाना चाहिए क्योंकि मामूली समझ रखने वाले लोगों को भी पहली नजर में यह दिख जाता है कि कौन-कौन से इश्तहार धोखा देने वाले हैं, तो वह फेसबुक के बड़े माहिर कम्प्यूटरों को कैसे समझ नहीं आएगा। 

कुल मिलाकर कम्प्यूटर, इंटरनेट, और मोबाइल फोन की दुनिया लोगों को बहुत बड़े खतरे में भी डाल रही है। लोग सोशल मीडिया पर बालिग किस्म के मामलों में भी हॅंस रहे हैं, और ब्लैकमेलिंग के शिकार हो रहे हैं, लोन देने वाले लोग इस कदर ब्लैकमेल कर रहे हैं कि आत्महत्याएं हो रही हैं। अब नाइजीरिया के लोगों का गिरोह पश्चिमी दुनिया में इस तरह ब्लैकमेल कर रहे हैं कि बच्चे आत्महत्या कर ले रहे हैं। जो रिटायर्ड लोग अपनी पूरी जिंदगी की बचत किसी पूंजीनिवेश के झांसे में डुबा दे रहे हैं, तो वे भी जीते जी मरने की हालत में पहुंच गए हैं। अलग-अलग देशों की सरकारों को अपने स्तर पर, और सामूहिक रूप से भी साइबर-जुर्म रोकने के लिए अधिक कोशिश करनी होगी, क्योंकि मुजरिम पकडऩे के लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल हो, या न हो, जुर्म करने के लिए तो आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल बढ़-चढक़र शुरू हो गया है, और मुजरिम अपने शिकार छांटने के लिए खासकर एआई-औजार का इस्तेमाल कर रहे हैं। भारत जैसे देश में डिजिटल तकनीक को जिंदगी के बहुत से दायरों में सरकार ने अनिवार्य सरीखा कर दिया है। लोगों की जानकारी सरकार के ही कई-कई विभागों और योजनाओं के कम्प्यूटरों पर चढ़ती है। इनमें से कौन सी जानकारी सरकार बाजार को इस्तेमाल के लिए दे रही है, और कौन सी जानकारी बाजार चुरा रहा है, यह जानना कुछ मुश्किल है, लेकिन अभी दुनिया भर में चल रहे अध्ययन बताते हैं कि साइबर-ठगी, जालसाजी के शिकार होने वाले बच्चों की उम्र अब घटती चल रही है। और बच्चे कम उम्र में ही ठगी के शिकार भी हो रहे हैं, और यौन शोषण जैसे गंभीर जुर्म भी उनके खिलाफ हो रहे हैं। ऐसा लगता है कि दुनिया भर की सरकारें मिलकर भी मुजरिमों से बहुत पीछे चल रही हैं, और यह सिलसिला बदलने की जरूरत है। 



 

मोहब्बत से बलात्कार और कत्ल तक पहुंचते रिश्ते...

 29 मई 2024

 मोबाइल फोन के कैमरों की मेहरबानी से सोशल मीडिया पर बनने वाले रिश्ते मरने और मारने तक पहुंच रहे हैं। कल एक महिला ने फांसी लगा ली क्योंकि उसकी नाबालिग बेटी का एक नग्न वीडियो एक नाबालिग लडक़े ने बना लिया था, और उसे चारों तरफ फैला दिया था। अपनी 13 बरस की बेटी का ऐसा वीडियो फैलने से तकलीफ पाती हुई मां ने खुदकुशी कर ली। कल की ही बिल्कुल आसपास की खबरें यह हैं कि एक नौजवान ने अपनी नाबालिग प्रेमिका को मिलने बुलाया था, और वहां पर उसकी सहमति से या उसकी मर्जी के खिलाफ उसके साथियों ने उस नाबालिग लडक़ी से बलात्कार किया। ऐसे 6 लोगों ने उससे बलात्कार करके वीडियो बनाया, बलात्कारियों में तीन नाबालिग भी हैं, और सभी पकड़े जा चुके हैं। पड़ोस के एक दूसरे शहर की खबर है कि एक ज्योतिषी मुकुंज त्रिपाठी ने पड़ोस की प्रेमिका के पति से छुटकारा पाने के लिए उसे मारा, लाश को पॉलीथीन की परतों में लपेटा, और अपने मकान की रसोई में पांच फीट गड्ढा खोदकर दफन कर दिया, अब पांच महीने बाद जाकर इस मामले का भांडाफोड़ हुआ है। इस प्रेमसंबंध की जानकारी पति को लग गई थी, और वह मिलने से मना करता था। चारों तरफ नाबालिगों के प्रेमसंबंध, देहसंबंध, शादीशुदा लोगों के तरह-तरह के जायज और नाजायज संबंध इतने खून-खराबे तक पहुंच रहे हैं कि हैरानी यह होती है कि अगर किसी के मन में सचमुच ही प्रेम है, तो क्या वे इतनी रफ्तार से ब्लैकमेलर और हत्यारे, या बलात्कारी हो सकते हैं? 

दरअसल समाज इन मामलों से पूरी तरह बेफिक्र है। लोग इसे पुलिस और अदालत का मामला मानकर अनदेखा कर देते हैं, कि बाकी लोगों को भला इससे क्या लेना-देना? लेकिन जब समाज में ऐसी घटनाएं बढ़ती चलती हैं, तो यह भी समझने की जरूरत रहती है कि बलात्कार, कत्ल, और खुदकुशी से नीचे भी कई ऐसे किस्म की हिंसा रहती है जो कि पुलिस रिकॉर्ड और खबरों में नहीं आ पातीं। जिन परिवारों में जायज और नाजायज संबंधों को लेकर तनाव चलते रहता है, वहां पर बच्चों पर इसका कैसा असर पड़ता है, जिन लोगों को इसकी जानकारी रहती है, उन पर कैसा असर पड़ता है? ये मामले पुलिस का सामान बनने के पहले ही समाजशास्त्रीय अध्ययन का मुद्दा रहना चाहिए, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। और आज मोबाइल फोन और सोशल मीडिया की मेहरबानी से किशोर-किशोरियां भी तरह-तरह के रिश्तों में उलझ रहे हैं, और तात्कालिक भरोसे के चलते कई तरह के फोटो-वीडियो में शामिल हो जाते हैं, जो कि बाद में ब्लैकमेलिंग या बदला लेने के लिए फैला दिए जाते हैं, और बहुत सी जिंदगियां खत्म करते हैं। 

हर दिन इस छोटे से राज्य छत्तीसगढ़ में दर्जन भर ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिनमें किसी नाबालिग को शादी का झांसा देकर उससे बलात्कार का जुर्म दर्ज हुआ है, या गिरफ्तारी हुई है। अब नाबालिग लड़कियों को शादी की उम्मीद में किसी से देहसंबंध बनाने की ऐसी कितनी जरूरत होनी चाहिए? शादी की ऐसी हड़बड़ी भी क्यों होनी चाहिए? बहुत से मामलों में ऐसा भी लगता है कि नाबालिग लडक़ी अपनी मर्जी से ऐसे संबंध बनाती है, लेकिन कानूनी रूप से उसकी सहमति की कोई कीमत नहीं रहती है, और बाद में शादी न होते दिखने पर बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई जाती है। सवाल यह भी उठता है कि एक नाबालिग लडक़ी की शादी हो कैसे सकती थी? लडक़े-लड़कियों को उनके बदन, सेक्स, वीडियो के खतरे, और शादी की उम्मीद के बहुत ही कमजोर होने की हकीकत का पता क्यों नहीं होता? सच तो यह है कि हिन्दुस्तान में मां-बाप, स्कूल-कॉलेज, या समाज लडक़े-लड़कियों के प्रेम और देहसंबंध की उम्र आ जाने के बाद भी उनसे जिंदगी की हकीकत की कोई चर्चा करना नहीं चाहते। नतीजा यह होता है कि वे सेक्स से होने वाली बीमारियों के खतरों से भी नावाकिफ रहते हैं, गर्भ का खतरा भी समझ नहीं पड़ता है, और अपने सेक्स-वीडियो बनवाते हुए उन्हें प्रेमी से अंतरंगता के अलावा कुछ नहीं दिखता है। नतीजा यह होता है कि अपनी कोई भी उम्मीद पूरी न होने पर शादी का वायदा करके बलात्कार करने की रिपोर्ट लिखा दी जाती है, जिसके तहत सामाजिक दबाव बनाना, या सजा दिलवाना कुछ आसान रहता है। 

हिन्दुस्तान में शादीशुदा लोगों के विवाहेत्तर संबंधों को कई बार हिंसा तक पहुंचते देखा जाता है। शादी को एक किस्म से पूरी जिंदगी का रिश्ता मान लिया जाता है, और तलाक को एक सामाजिक धब्बा। नतीजा यह होता है कि लोग अनचाहे या नापसंद हो चुके रिश्तों को ढोते हैं, और अपने तन-मन की तसल्ली के लिए कहीं और रिश्ता बना लेते हैं। इसके मुकाबले उन देशों में हिंसा कम होती है जहां पर लोग आसानी से बिना शादी साथ रहते हैं, बिना शादी बच्चे पैदा कर लेते हैं, शादी के बाद तलाक भी कोई बड़ा मुद्दा नहीं रहता है, और तलाकशुदा लोग दूसरी शादियां आसानी से कर लेते हैं। हिन्दुस्तान में इनमें से किसी भी चीज के लिए सामाजिक बर्दाश्त नहीं है, और लोग ऐसे घोषित विकल्पों के बजाय अघोषित नाजायज विकल्प ढूंढते रहते हैं, जिसकी वजह से हिंसा कुछ अधिक होती है। 

यह सिलसिला खत्म करने के लिए किशोरावस्था से पहले ही लडक़े-लड़कियों को प्रेम और देहसंबंधों के बारे में बतलाना होगा। कैसे रिश्ते कैसी जटिलता लेकर आते हैं, यह चर्चा भी करनी होगी। उन्हें दिमागी रूप से तैयार करना होगा कि वे किस सीमा से अधिक भरोसा किसी पर न करें। इसी तरह शादीशुदा जोड़ों के बीच अगर भरोसा खत्म हो चुका है, और बाहर रिश्ते बनाए जा रहे हैं, तो इसे या तो बर्दाश्त करना आना चाहिए, या फिर ऐसे रिश्ते से बाहर निकलना। किसी भी तरह का खून-खराबा रिश्तों को खत्म नहीं करता है, वह आजादी खत्म करता है जो कि जेल में रहते हुए नसीब नहीं रहती है। दुनिया में कोई भी रिश्ते इंसान की सामाजिक आजादी खत्म करके जेल जाने लायक नहीं होते हैं। जब किसी को मारकर जेल जाना जरूरी लगे, तो ऐसे इंसान से मौजूदा रिश्तों को मारकर खुली दुनिया में ही आजादी पा लेनी चाहिए, और अपनी-अपनी मर्जी के रास्तों पर निकल पडऩा चाहिए। लगता है कि हिन्दुस्तानी समाज के अधिकतर हिस्से में किशोरावस्था से लेकर शादीशुदा लोगों तक में समझदारी की बहुत कमी है, और हिंसा की बड़ी अधिकता है, चाहे अपने बारे में, चाहे दूसरों के बारे में। और इसके साथ-साथ एक बात और, यहां के लोग सबसे अधिक भरोसे के रिश्तों में सबसे अधिक दगाबाज भी हैं, यही वजह है कि धोखा देने के साथ-साथ बदला लेने के लिए अच्छे दिनों के वीडियो इस तरह फैलाते हैं कि लोगों को शर्मिंदगी में जान दे देनी पड़े। 


दीवारों पर लिक्खा है, 28 मई 2024



 

तेलंगाना की टैपिंग-हैकिंग से पूरा देश सबक ले...

28 मई 2024

 तेलंगाना में पिछली बीआरएस सरकार के दौरान जो लोग मुख्यमंत्री के.चन्द्रशेखर राव के विरोधी या आलोचक लगते थे उसकी भारी खुफिया जासूसी करवाई जाती थी। और यह काम किसी निजी एजेंसी से करवाने के बजाय राज्य सरकार की खुफिया पुलिस ने ही किया था। अभी तेलंगाना के एक भूतपूर्व पुलिस अफसर ने पिछली सरकार के दौरान काम करते हुए की गई इस तरह की जासूसी की बहुत सी जानकारी जांच करने वालों को बताई है। यह जांच तेलंगाना में नई कांग्रेस सरकार आने के बाद शुरू हुई है क्योंकि पिछली सरकार के बारे में यह माना जा रहा था कि वह विरोधियों और विपक्षियों की जासूसी करवाती थी। पिछले साल भाजपा के एक नेता ने भी यह बयान दिया था, और अब कांग्रेस सरकार इसकी व्यापक जांच करवा रही है। 

तेलंगाना के लोग जानते हैं कि मुख्यमंत्री केसीआर, और उनके मंत्री बेटे के.टी.रामाराव ने अपनी सत्ता के चलते हुए नेताओं, अफसरों के साथ-साथ उद्योगपतियों और फिल्मी सितारों तक के फोन टैप करवाए थे, या उनकी तरह-तरह से निगरानी करवाई थी। इन तमाम चीजों का राज्य की आंतरिक सुरक्षा से कोई लेना-देना नहीं था, और राजनीतिक हिसाब-किताब चुकता करने के साथ-साथ लोगों के कारोबारी राज जानकर उनसे वसूली और उगाही करने के लिए भी ऐसा किया गया था। यह भी चर्चा थी कि केसीआर ने जिन फिल्मी सितारों के फोन टैप करवाए थे, उनमें से कुछ के निजी जिंदगी के राज इस तत्कालीन मंत्री के हाथ लगे थे, और वहां से एक के जीवनसाथी तक यह बात पहुंची, और एक अभिनेत्री का तलाक भी इसी वजह से होने की चर्चा है। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बांदी संजय कुमार ने कल यह मांग की है कि केसीआर और उनके बेटे को फोन टैपिंग में गिरफ्तार किया जाए, और उनकी विधानसभा की सदस्यता को खत्म किया जाए। उन्होंने साथ-साथ यह भी मांग की कि राज्य की कांग्रेस सरकार इस मामले को जांच के लिए सीबीआई को दे दे। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार इसमें पर्याप्त तेजी नहीं दिखा रही है, जबकि गिरफ्तार किए गए एक भूतपूर्व पुलिस डीसीपी ने पर्याप्त सुबूतों वाली गवाही दी है। 

ऐसी शिकायत अलग-अलग कई राज्य सरकारों के कार्यकाल में उठती रही है। छत्तीसगढ़ में जोगी को तो कुल तीन साल का कार्यकाल मिला था, और उस वक्त राज्य में खुफिया विभाग का ढांचा भी बहुत अच्छी तरह नहीं बन पाया था। लेकिन रमन सिंह के समय से ऐसी चर्चाएं रहती थीं कि अवैध रूप से खरीदी गई करोड़ों की एक मोबाइल फोन टैपिंग मशीन का इस्तेमाल किया जाता है, और उसमें विरोधियों या विपक्षियों पर निगरानी रखी जाती है। यह बात कभी साबित नहीं हो पाई, लेकिन सत्ता के करीबी कुछ लोग ऐसी फोन टैपिंग से मिली जानकारी की ताकत का प्रदर्शन करते रहते थे। छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल की पिछली सरकार के समय तो हालत यह थी कि सत्ता में जो लोग जरा भी मायने रखते थे वे सिर्फ आईफोन के फेसटाईम पर बात करते थे, क्योंकि यह माना जाता था कि देश की खुफिया एजेंसियां भी उसमें घुसपैठ नहीं कर पाती हैं। जो लोग सैकड़ों-हजारों करोड़ रूपए के जुर्म में शामिल रहते थे, वे खुद, और अपने आसपास के लोगों के भी आईफोन हर महीने-दो महीने में बदलवाते चलते थे। अभी सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली के सीएम केजरीवाल की जमानत अर्जी के खिलाफ तर्क देते हुए ईडी ने बताया था कि शराब घोटाले के सुबूतों को छुपाने के लिए, नष्ट करने के लिए केजरीवाल और सत्ता के शराब से जुड़े 36 लोगों ने करीब 170 मोबाइल फोन नष्ट किए थे। छत्तीसगढ़ में भी भूपेश सरकार के किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति से सिर्फ आईफोन पर ही बात हो पाती थी। राज्य के सत्तारूढ़ लोगों को केन्द्र की एजेंसियों से हैकिंग का खतरा रहता था, और राज्य के विपक्षी लोगों को भूपेश सरकार द्वारा फोन टैपिंग का डर रहता था। कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि हिन्दुस्तान में केन्द्र और राज्य सरकारों को राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर फोन टैप करने के जो अधिकार मिले हैं, उनका बड़ा बेजा इस्तेमाल होता है, और लोगों की निजता और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता खत्म होती है। 

ऐसे में कोई हैरानी नहीं है कि भारत के लोगों को यह आशंका है कि केन्द्र की मोदी सरकार ने इजराइल के सबसे बदनाम, फौजी दर्जे के घुसपैठिया सॉफ्टवेयर पेगासस का इस्तेमाल अपने विपक्षी नेताओं, और चुनिंदा पत्रकारों पर कर रही है। यह अलग बात है कि सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के बाद जब एक अदालत ने एक कमेटी बनाई, और उसे जांच की, तो उसे जिन 29 लोगों ने अपने मोबाइल फोन जांच के लिए दिए थे, उनमें से किसी पर भी पेगासस स्पाईवेयर नहीं मिला था, लेकिन उनमें से पांच पर कुछ और संदिग्ध घुसपैठ मिली थी। आज देश भर में अपने आपको जो भी महत्वपूर्ण समझते हैं, वे लोग मोबाइल फोन के सिमकार्ड पर कोई संवेदनशील बात करना नहीं चाहते। वे अलग-अलग किस्म के इंटरनेट-आधारित फोनकॉल, और मैसेंजर एप्लीकेशनों का इस्तेमाल करते हैं, और मानकर चलते हैं कि सरकार उन पर आसानी से निगरानी नहीं रख पाएगी। लेकिन किसी गाड़ी की आवाजाही को ट्रैक करने के छोटे से, सिक्के सरीखे, उपकरण इतने आम हैं कि किसी के भी बैग में, कार या दूसरे सामान में उसे आसानी से सरकाया जा सकता है, और फिर अपने मोबाइल फोन के रास्ते उस पर निगरानी रखी जा सकती है। इसके अलावा किसी के घर, दफ्तर, या किसी और जगह पर खुफिया कैमरे या माइक्रोफोन बड़ी आसानी से लगाए जा सकते हैं, और लोगों की निजता अब तकरीबन खत्म सरीखी है। लोग किसी से मिलने के लिए जा सकते हैं, और वहां से निकलने के पहले उनकी टेबिल के नीचे माइक्रोफोन चिपकाकर निकल सकते हैं, जिसे कुछ दूसरी से मोबाइल फोन से सुना जा सकता है, रिकॉर्ड किया जा सकता है। 

सत्ता जब किसी की निगरानी पर उतारू हो जाती है, तो फिर उस देश के जज भी महफूज नहीं रह जाते। बहुत से देशों में यह माना जाता है कि सरकारें अपनी पसंद के फैसले पाने के लिए जजों पर निगरानी रखती हैं, और उनकी कमजोर नब्ज हाथ में आते ही उनसे मर्जी का काम करवाने लगती हैं। भारत के एक प्रदेश में सत्तारूढ़ पार्टी के बागी तेवरों वाले विधायकों पर नजर रखने के लिए उन्हें महंगे मोबाइल फोन का तोहफा दिया गया, और उसमें डाले गए स्पाईवेयर से उसकी बातचीत और उसके संदेश पहले से तय की गई किसी जगह पर पहुंचते रहे। चर्चा यह भी रहती है कि हिन्दुस्तान की कुछेक सरकारें जो खुद कई किस्म की हैकिंग नहीं कर पाती हैं, वे भी दुनिया के दूसरे बदनाम देशों के हैकरों को भाड़े पर लेकर उनसे अपने विरोधियों और आलोचकों की हैकिंग करवाती हैं, जो कि सरकार के काम तो आ जाती है, लेकिन उसकी तोहमत सरकार पर नहीं आती है। 

आज जैसे-जैसे लोगों का इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ रहा है, और इंटरनेट या सोशल मीडिया पर उनकी मौजूदगी बढ़ रही है, वैसे-वैसे वे नाजुक होते जा रहे हैं। डिजिटल उपकरण और इंटरनेट, ये दोनों मिलकर किसी का कुछ भी निजी नहीं रहने दे रहे हैं। ऐसे में भारत में सरकारों की निगरानी रखने की ताकत पर दुबारा गौर करने की जरूरत है। यह कानून बहुत पहले बना था, उस वक्त तारों से जुड़ा हुआ टेलीफोन ही रहता था। अब दुनिया बहुत बदल गई है, और अब लोग न चाहते हुए भी उपकरणों से घिरे रहते हैं। ऐसे में भारत में निगरानी रखने के कानून और उसके अमल को पारदर्शी बनाने की जरूरत है, ताकि विपक्ष, विरोधियों, और आलोचकों का शिकार करने के लिए इस कानून की बंदूक का इस्तेमाल न हो। 

अरबपति मुजरिम बचाने पूरी दुनिया ही जुट पड़ी

  27 मई 2024

 पुणे में एक अरबपति बिल्डर के नाबालिग बेटे ने नशे में धुत्त, करोड़ों की कार को देर रात अंधाधुंध रफ्तार से चलाते हुए दो लोगों को मौके पर ही मार डाला था, उसे बचाने के लिए पूरी दुनिया जुट गई है। मौके पर पहुंचे पुलिस कर्मचारियों ने किसी बड़े अफसर को इसकी खबर नहीं की। मौके पर भीड़ ने इस रईसजादे को पकड़ लिया था इसलिए उसे थाने तो ले जाना पड़ा लेकिन वहां उसकी पसंद का पीजा बुलाकर उसकी खातिरदारी की गई, दूसरी तरफ दूसरे प्रदेशों के जो दो लोग मारे गए थे उनकी तरफ से मौके के जो गवाह थाने पहुंचे थे, उनके साथ पुलिस ने बदसलूकी की थी। फिर जब किशोर न्यायालय में इस रईसजादे को पेश किया गया तो पल भर में जज ने जमानत दे दी, और सजा दी निबंध लिखने की। इसके अलावा इस लडक़े के नशे में होने की जांच के लिए पुणे के जिस मशहूर सरकारी अस्पताल में इसे ले जाया गया वहां इसके खून की जांच होनी थी, और उसमें यह नशे में नहीं पाया गया। अब पुलिस ने इस अस्पताल के फोरेंसिक विभाग के एचओडी सहित दो डॉक्टरों को गिरफ्तार किया है कि उन्होंने इस लडक़े को बचाने के लिए इसके खून का नमूना कचरे में फेंक दिया, और किसी दूसरे मरीज के खून को इस लडक़े के नाम से लगा दिया। पुलिस का यह बदला यह रूख इस बात के बाद में हुआ है कि इस एक्सीडेंट को लेकर देश भर में भारी हंगामा चल रहा है, और पुलिस कार्रवाई पर जमकर सवाल उठाए जा रहे हैं। यह इस बात के बाद भी हुआ है कि किशोर न्यायालय के जज की दी गई जमानत अगले दिन खारिज करके इस लडक़े को सुधारगृह भेजा गया है। फिर मानो यह सब काफी न हो, यह खबर फैलाई गई कि कार की मोटरसाइकिल सवारों को मारी गई टक्कर के वक्त कार ड्राइवर चला रहा था, और यह नाबालिग लडक़ा साथ बैठा हुआ था। बाद में इस ड्राइवर ने पुलिस को बताया कि किस तरह इस अरबपति परिवार में लडक़े का दादा ड्राइवर पर दबाव बना रहा था कि वह ऐसा झूठा बयान दे। नाबालिग बेटे को कार देने, दारू पीने के लिए क्रेडिट कार्ड देने, और बिना नंबर प्लेट की कार रखने पर इस लडक़े का बिल्डर-बाप भी गिरफ्तार हो चुका है। और अब ड्राइवर का अपहरण करके कैद करने, और उसे धमकाने और सुबूत नष्ट करने के आरोप में दादा भी गिरफ्तार हो गया है। यह तो मामला इतनी खबरों में आ गया है कि पुलिस को उन शराबखानों की वीडियो रिकॉर्डिंग भी जब्त करनी पड़ी जिनमें यह नाबालिग रईसजादा अपने दोस्तों के साथ शराब पीते घूमते दिख रहा है। 

इस पूरे सिलसिले को देखें तो साफ दिखता है कि एक पैसे वाले मुजरिम को बचाने के लिए हिन्दुस्तानी लोकतंत्र पूरे का पूरा टूट पड़ता है। अभी तो पर्दे के पीछे की कोशिशें सामने नहीं आई हैं, और हम तो सिर्फ जो कार्रवाई हो चुकी है उसके आधार पर यह फेहरिस्त सामने रख रहे हैं। अब देखा जाए तो पुलिस से लेकर अस्पताल के डॉक्टरों तक, और किशोर न्यायालय के जज तक जो रूख सामने आया है, उसमें मारे गए बेकसूर लोगों को कोई इंसाफ मिलने की गुंजाइश कहां दिखती है? यह तो मामला आगे चलेगा तो पता लगेगा कि जिन लोगों ने मौके पर इस लडक़े को गाड़ी चलाते पकड़ा था, उनमें से कुछ लोगों के बयान बदल जाएंगे, या फिर वे गायब भी हो जाएंगे, या कर दिए जाएंगे। हिन्दुस्तानी लोकतंत्र इस बुरी तरह भ्रष्ट है कि इस पर मुजरिमों को बच जाने का पूरा भरोसा हो सकता है, बेकसूरों के बचने की या इंसाफ पाने की गुंजाइश बड़ी कम रहती है। अभी तो सडक़ों पर इन मौतों को चार दिन ही गुजरे हैं, और इतने में ही इतने किस्म की साजिशें सामने आ गई हैं। अब जब आगे यह घटना खबरों से परे हो जाएगी, तब पता लगेगा कि एक-एक सुबूत को कैसे खरीदा जाएगा, डॉक्टर से पुलिस और अदालत तक की कार्रवाई में कौन-कौन से गड्ढे खड़े किए जाएंगे ताकि यह अरबपति मुजरिम निकल सके। और अभी तो एक-एक पेशी के दसियों लाख रूपए लेने वाले महंगे वकीलों का काम तो शुरू ही नहीं हुआ है, उनमें से तो इतने काबिल निकल सकते हैं कि वे अदालत में साबित कर दें कि महंगी कार को नुकसान पहुंचाने के एवज में, और इस नाबालिग लडक़े को बदनाम करने के जुर्म में दो मरने वाले लोगों के पंचतत्व को कैद सुनानी चाहिए। पता लगेगा कि महंगे वकील की मांग पर इन दोनों की अस्थियां विसर्जित करने के बजाय उन्हें दो घड़ों में उम्रकैद सुना दी जाएगी। शुरू से ही मुजरिम को बचाने की जो कोशिशें चालू हुई हैं, वे आगे चलकर उसे सजा से बचाने में कामयाब भी हो सकती हैं। इस मामले का आखिरी फैसला होने तक यह समझ पड़ेगा कि इसके रास्ते में कितने ईमानदार और कितने बेईमान लोग आए थे। देश में कानून की पढ़ाई करने वाले छात्र-छात्राओं को भी ऐसे मामले पढ़ाने चाहिए, और आईपीएस के लिए चुने गए लोगों को भी। और खोजी पत्रकारिता में अगर अब भी कुछ लोग दिलचस्पी रखते हैं जिनके अखबार या टीवी चैनल को ऐसे बिल्डरों के इश्तहारों की परवाह न हो, तो वे भी ऐसे मामलों से ये सीख सकते हैं कि रईसजादों की रिपोर्टिंग करने में कहां-कहां पर साजिश परखने का काम करना चाहिए। 

ऐसा लगता है कि किसी मामले का एकदम से खबरों में आ जाना ही उस मामले में कुछ हद तक इंसाफ की गुंजाइश पैदा करता है। जहां कहीं भी अखबारनवीसी थोड़ी सी बाकी हो, वहां पर इसे जिंदा रखने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि खबरों ने ही इस मामले को पटरी से उतारने की अनगिनत साजिशों को अब तक नाकामयाब किया है। इस मामले से परे भी जहां-जहां बड़े लोग शामिल होते हैं, मोटी रकम का खेल रहता है, वहां पर मुजरिमों को बेगुनाह साबित करने के लिए कई बार तो किसी बेकसूर को भी फंसा दिया जाता है, ताकि लोगों का ध्यान पैसे वाले असल मुजरिमों की तरफ से हट जाए।   

दीवारों पर लिक्खा है, 27 मई 2024





 

सडक़ों से जानवर हटाना इंसानों को बचाने जैसा..

   26 मई 2024

 
छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय की सरकार सडक़ों पर खुले घूमते गाय, सांड, और बछड़े-बछिया के लिए गौवंश अभ्यारण्य बनाने जा रही है। मुख्यमंत्री की तरफ से इसकी घोषणा हुई है, और कहा गया है कि इससे सडक़ों पर भूखे-प्यासे भटकते, और घूरों पर कचरा या प्लास्टिक खाते गौवंशी मवेशियों की हालत सुधर सकेगी। सरकार अगर तय कर लेगी, तो वह अपनी गाय-समर्थक राजनीतिक नीति के मुताबिक भी इस काम को अच्छे से कर सकती है। और यह काम आज की एक बहुत बड़ी जरूरत भी है। आज देश भर में बहुत से, या अधिकतर प्रदेशों में गौवंश को मारने पर कानूनी रोक लगी हुई है। भाजपा और उसके समर्थक हिन्दूवादी संगठनों के बीच गाय को बूचडख़ाने जाने से रोकना इतना बड़ा मुद्दा है कि इस चक्कर में देश भर में जगह-जगह पर बेकसूर मवेशी-व्यापारी भी मारे गए हैं कि वे गायों को बूचडख़ाने ले जा रहे हैं। बहुत से प्रदेशों ने मवेशियों को लाने ले जाने के खिलाफ कड़े कानून बना लिए हैं, और इन्हें लागू करने के नाम पर सडक़ों पर अराजकता और गुंडागर्दी करने वाले संगठन भी सत्ता की मेहरबानी से लैस रहते हैं। देश भर से कई इतनी हिंसक घटनाएं सामने आई हैं कि उनसे हिन्दुस्तान की एक बड़ी खराब तस्वीर दुनिया भर में बनी है। दूसरी तरफ गाय से जुड़ी हुई कोई भी बात देश के अधिकतर हिस्से में आनन-फानन हिन्दू-मुस्लिम तनाव का सामान भी बन जाती है, इसलिए गायों को संभालकर रखना अपने प्रदेश की शांति को संभालकर रखने सरीखा है। 

जब से देश भर में गायों और गौवंश के बाकी जानवरों को काटने पर कानूनी और गैरकानूनी दोनों किस्म की रोक बढ़ी है, तब से ये जानवर तरह-तरह की सामाजिक और आर्थिक समस्या भी बनते जा रहे हैं। भारत एक कृषि प्रधान देश है, और अधिकतर खेत बिना किसी बाढ़ के होते हैं, और ऐसे में अगर गांव-शहर में ये जानवर बढ़ते ही चले जाएंगे, तो कहीं न कहीं, कुछ न कुछ तो खाएंगे। नतीजा यह हो रहा है कि उत्तर भारत के बहुत से प्रदेशों में खेतों को चर जाने वाले जानवर एक बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान खड़ा कर रहे हैं, और इनकी वजह से बहुत किस्म के लड़ाई-झगड़े भी बढ़ते चल रहे हैं। उत्तरप्रदेश ऐसी घटनाओं को लगातार दर्ज कर रहा है। महाराष्ट्र की खबरें हैं कि वहां पर किसान पुराने बैलों को बेचकर उस दाम से एक नया बैल ले लेता था, लेकिन अब यह जुर्म हो चुका है, इसलिए बूढ़े बैल किसान पर बोझ बने बैठे हैं, और किसान न तो उन्हें भूखे मरने दे पा रहा है, न ही उसके पास उन्हें खिलाने को कुछ है। नतीजा यह हो रहा है कि परंपरागत कृषि अर्थव्यवस्था में बूढ़े जानवरों से मुक्ति पा लेने का जो तरीका था, वह नए जानवर पाने में भी काम आता था, लेकिन अब वह सब एक जुर्म में गिनाने लगा है, इसलिए किसान पर दिक्कत और खतरा दोनों बढ़ गए हैं। 

छत्तीसगढ़ में ऐसे अनगिनत मामले हुए हैं जब तेज रफ्तार हाईवे पर, या शहरों के भीतर भी सडक़ों पर जानवर रहते हैं, और बारिश में या रात-बिरात वे दिखते नहीं हैं, और उनसे टकराकर बहुत से इंसानों की भी मौत होती है। प्रदेश की पिछली भूपेश बघेल सरकार ने गांवों में गौठान खोलकर इन जानवरों को दिन भर वहां रखने की योजना बनाई थी, लेकिन उसका गांवों पर चाहे जो भी असर हुआ हो, उसका शहरों तक विस्तार नहीं हुआ था, और शहर ऐसे नामालिक जानवरों से बहुत बुरी तरह परेशान हैं। इसलिए अगर सडक़ों और शहरों से इन जानवरों को स्थाई रूप से हटाकर किसी छायादार, पानी वाले इलाके में इनके लिए कोई डेरा बनाया जा सके, तो उससे ही सरकार की गौरक्षा की नीयत पूरी हो पाएगी, और इन जानवरों के साथ-साथ इंसानों को भी राहत मिलेगी। आज जानवरों की वजह से ट्रैफिक में जितनी बाधा आती है, उससे भी कुल मिलाकर तो रफ्तार घटती है, प्रदूषण बढ़ता है, और लोगों का वक्त भी जाया होता है, हादसों में बहुत सी जिंदगियां भी जाती हैं। इसलिए यह फैसला जानवर और इंसान, सडक़ का ट्रैफिक, और शहरों में सुरक्षित जिंदगी सबके हित का है। लेकिन जैसा कि किसी भी सरकारी योजना में होता है, योजना की कामयाबी उसके अमल में होती है। देखते हैं इस पर अमल में कितनी कामयाबी मिलती है। 

कमउम्र ब्रिटिश यौन शिक्षा से लेकर हिन्दुस्तानी नाबालिग अनजानों तक

26 मई, 2024

ब्रिटिश सरकार ने स्कूली बच्चों को यौन शिक्षा देने की मौजूदा नीति को बदलते हुए 9 बरस उम्र तक के बच्चों को किसी भी तरह की यौन शिक्षा देने पर रोक लगा दी है। सरकार की नीति के बारे में ब्रिटिश मीडिया में बड़ी बहस छिड़ी हुई है, और अब तक स्कूलों में यह शिक्षा देने वाले शिक्षक इस नई सीमा के खिलाफ हैं। इस नीति में बच्चों को सेक्स और रिश्तों के बारे में पढ़ाया जाता है, अब तक 9 बरस से छोटे बच्चों को भी काफी कुछ बताया जाता था, लेकिन सरकार अब इस पर रोक लगा रही है। शिक्षकों का मानना है कि बच्चों के मन में जिस उम्र से जिज्ञासा आने लगती है, उस उम्र से अगर उन्हें उनके जवाब नहीं मिलेंगे, तो फिर वे गलत जगहों से वे जवाब तलाशने लगेंगे जो कि पोर्नोग्राफी की वेबसाइटें भी हो सकती हैं, और इसके अलावा वे आसपास गलत लोगों के शिकार भी हो सकते हैं। ब्रिटिश शिक्षकों का यह मानना है कि चार बरस की उम्र से ही बच्चों को अच्छे और बुरे स्पर्श की जानकारी समझाना शुरू हो जाना चाहिए ताकि वे अपने यौन शोषण से बच सकें। ऐसा न होने पर वे कुछ लोगों के नाजायज छूने का मतलब नहीं निकाल पाएंगे। इस शिक्षा के तहत स्कूली बच्चों को ट्रांसजेंडर और दूसरे एलजीबीटीक्यूआई समुदाय के लोगों के बारे में भी बताया जाता है, उनके अपने शरीर के बारे में बताया जाता है, और गर्भधारण जैसी चीजों को भी समझाया जाता है। ब्रिटेन कम उम्र में गर्भवती होने वाली स्कूली छात्राओं की समस्या भी झेल रहा है, और यह माना जाता है कि छात्राओं को यौन शिक्षा मिलने से वे गर्भवती होने से, या सेक्स-बीमारियों से बचेंगी। 

ब्रिटिश अखबार गॉर्डियन के एक इंटरव्यू में ऐसी एक जानकार शिक्षा शास्त्री ने यह कहा कि अब बच्चों के तन, मन, और उनकी समझ, ये सब कुछ पहले के मुकाबले कम उम्र में विकसित हो रहे हैं। इसलिए उनके मन में जिज्ञासाएं कम उम्र में पैदा हो रही हैं। ब्रिटेन में अभी सत्तारूढ़ संकीर्णतावादी कंजरवेटिव पार्टी का शासन है जिसके कई सांसद इस बात को लेकर नाखुश हैं कि बच्चों को स्कूलों में कम उम्र से ही शरीर, सेक्स, और यौन संबंधों के बारे में जरूरत से अधिक पढ़ाया जा रहा है। एक किस्म से मौजूदा सरकार जो कि चुनाव की घोषणा कर चुकी है, और दो महीने की भी मेहमान नहीं है, वह एक बड़ा फैसला ले रही है जिससे वहां के सारे लोग सहमत भी नहीं हैं। 

मैं ब्रिटेन के इस ताजा घटनाक्रम को हिन्दुस्तान के अपने इलाके से जोडक़र देखना चाहता हूं जहां पर हर दिन एक से अधिक पुलिस रिपोर्ट या गिरफ्तारी ऐसे मामले में हो रही है जिसमें नाबालिग को बहला-फुसलाकर किसी बालिग ने उससे सेक्स किया, ऐसा कहा जाता है कि शादी का झांसा दिया, और फिर शादी नहीं की तो इस सेक्स को बलात्कार कहकर उस आदमी को गिरफ्तार कर लिया गया। अदालत से ऐसे गिरफ्तार व्यक्ति को चाहे जो सजा हो जाए, यह बात समझने की जरूरत है कि ऐसे देहसंबंधों से, और बाद में मामले के अदालत तक पहुंचने से खुद लडक़ी का भी बड़ा नुकसान होता है। उसे नाबालिग रहते हुए ऐसे देहसंबंधों के तमाम खतरों से वाकिफ तो रहना चाहिए था। 

आज देश भर में हर दिन कई जगहों पर नवजात शिशु नालों या घूरों पर फेंके हुए मिलते हैं। हो सकता है इनमें से कुछ ऐसी कम उम्र नाबालिग लड़कियों के बच्चे भी हों जो कि भारत की क्रूर समाज व्यवस्था के चलते इन्हें जन्म देने का हौसला न कर पाती हों। अभी सुप्रीम कोर्ट तक ऐसे मामले पहुंचे हुए जिनमें बलात्कार या किसी दूसरे तरह से गर्भवती हुई नाबालिग लडक़ी की ओर से मेडिकल समय सीमा पार हो जाने के बाद भी गर्भपात की इजाजत मांगी जा रही है, और सुप्रीम कोर्ट ने अजन्मे बच्चे के अधिकार को अधिक बड़ा मानते हुए 7वेें-8वें महीने के ऐसे बच्चे के गर्भपात की इजाजत नहीं दी। अब नाबालिग बच्चे हिन्दुस्तान में जगह-जगह दूसरे नाबालिगों से बलात्कार करते पकड़ा रहे हैं, लड़कियां जगह-जगह गर्भवती हो रही हैं, और सेक्स से फैलने वाली बीमारियों के तो कोई पुलिस-आंकड़े होते नहीं हैं। इसलिए अपने बदन, सेक्स, और रिश्तों की जो पढ़ाई ब्रिटेन में होती है, और जिसकी उम्र अब बढ़ाकर 9 बरस की जा रही है, वैसी कोई पढ़ाई हिन्दुस्तान में किशोरावस्था में पहुंचने पर भी नहीं होती। नतीजा यह होता है कि लडक़े-लड़कियां मां-बाप बनने के लिए शारीरिक रूप से तैयार हो जाते हैं, सेक्स उनकी एक स्वाभाविक जरूरत बन जाता है, लेकिन उन्हें इसकी जानकारी जरा भी नहीं रहती। नतीजा यह होता है बहुत से लोग असुरक्षित सेक्स में फंस जाते हैं, बहुत से नाबालिग सेक्स-वीडियो में फंस जाते हैं, और फिर ब्लैकमेलिंग से लेकर तमाम दूसरे किस्म के जुर्म के शिकार हो जाते हैं। 

ऐसी हालत रहने पर भी हिन्दुस्तान में आज बच्चों और किशोरों को, छात्र-छात्राओं को, किसी को भी देह की शिक्षा देने पर समाज का एक दकियानूसी तबका झंडे-डंडे लेकर उठ खड़ा होता है। यह तबका हिन्दुस्तान की एक इतिहास में कभी न रही हुई ऐसी संस्कृति का हवाला देता है जिसमें मानो सेक्स रहा ही न हो। इनके तेवरों का नतीजा यह होता है कि नई पीढ़ी के बदन सेक्स के लायक हो जाते हैं, वे सेक्स में उलझ जाते हैं, लेकिन उन्हें इसके बारे में कोई वैज्ञानिक और सामाजिक समझ नहीं दी जाती। जिन नाबालिग बच्चों को सेक्स में नहीं उलझना चाहिए था, उनके सामने भी सीखने का अकेला जरिया पोर्नोग्राफी रह जाता है, आसपास के ऐसे मुजरिम रह जाते हैं जिनकी कि बच्चों से सेक्स में दिलचस्पी रहती है, आसपास के अपने से उम्र में कुछ बड़े लोग रह जाते हैं जो कि आसानी से बरगलाकर अपने से छोटे लोगों को सेक्स की तरफ धकेल देते हैं या खींच लेते हैं। 

किसी भी देश या समाज को पाखंड में जीना छोड़ देना चाहिए। लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि आज की पीढ़ी कौन से युग में जी रही है, उस पर कौन से प्रभाव हैं, प्रकृति ने नई पीढ़ी के बदन में किस उम्र से कैसी जरूरतें पैदा करना शुरू कर दिया है। इसके साथ-साथ आज इंटरनेट की मेहरबानी से पूरी दुनिया एक गांव की तरह होकर रह गई है, और सोशल मीडिया के तरह-तरह के प्लेटफॉर्म तमाम बच्चों को बाकी दुनिया से रूबरू करवा देते हैं। नतीजा यह होता है कि एक देश के टीनएजर्स दूसरे देश के किशोर-किशोरियों के सामने सांस्कृतिक चुनौतियां पेश करते हैं, और कहीं जवाबी रील बनने लगती हैं, तो कहीं जवाबी टिकटॉक। 

ऐसे में बच्चों को उनके बदन और दूसरे के साथ संबंधों की बुनियादी शिक्षा से बचाकर इस पीढ़ी को एक खतरे के अलावा और कुछ नहीं दिया जा रहा। बच्चों के तन और मन तो अपने वक्त पर जवान हो जाएंगे, लेकिन तब तक उनकी समझ अगर समाज की कोशिश से अनजान बनाकर रखी जाएगी, तो वे बदन और रिश्तों के खतरों को भी नहीं समझ पाएंगे, और हिन्दुस्तान में आज यह बात बहुत बड़े पैमाने पर नुकसान कर रही है। 

दकियानूसी राजनीतिक विचारधारा को जहां मौका लगता है, वह समाज से प्रगतिशील समझ की चीजों को पीछे धकेलने लगती है। ब्रिटिश सरकार की इस ताजा नीति की जमकर आलोचना भी हो रही है, और यह बात भी साफ है आज वहां जिस उम्र के बच्चों को इस शिक्षा की जरूरत है, उससे कम से कम 50 बरस अधिक बड़े सांसद अपनी सरकार पर दबाव डालकर यौन शिक्षा को 9 बरस की उम्र तक रोक रहे हैं। यह बात तय है कि आधी सदी पहले की तन-मन की सामाजिक जरूरतें अलग थीं, आज कम्प्यूटर-मोबाइल, और सोशल मीडिया के युग में ये जरूरतें एक अलग ही दर्जे की हो गई हैं। राजनेता हर मामले में फैसले लेने के लिए सबसे काबिल नहीं रहते हैं। खासकर शिक्षा नीति से तो नेताओं को अपने आपको दूर रखना चाहिए क्योंकि यह सिर्फ विशेषज्ञों की समझ की बात है, और उन्हीं के फैसलों पर इन्हें छोडऩा चाहिए। राजनेताओं को जिंदगी के हर दायरे के विशेषज्ञ मान लेने से ऐसे तमाम दायरों का कुछ या काफी हद तक नुकसान होगा, उससे बचना चाहिए, और आने वाली पीढ़ी को समझदार और सावधान बनने से रोकना नहीं चाहिए। 

झूठा मुकदमा, पुलिस से दिलाया 8 करोड़ हर्जाना

  26 मई 2024

 
अमरीका के कैलीफोर्निया में एक आदमी के गायब होने पर पुलिस ने उसके बेटे को पकड़ा, और उसे अपने पिता की हत्या की बात कबूल करने के लिए मजबूर किया। उससे लगातार 17 घंटे तक पूछताछ की गई थी जो तभी बंद हुई जब उसने बाप को मारना मान लिया। उसके बाद पता लगा कि बाप मरा ही नहीं था, वह अपनी गर्लफ्रेंड के घर जाकर रह रहा था, और पुलिस ने केस हल करने के नाम पर इस आदमी को पकडक़र मुजरिम साबित कर दिया था। अब कैलीफोर्निया की अदालत ने पुलिस पर 8 करोड़ रूपए का जुर्माना लगाया है कि उसने मानसिक प्रताडऩा से इस नौजवान से यह बयान हासिल कर लिया था, और इसके लिए पुलिस ने कई किस्म की प्रताडऩा-तकनीकें इस्तेमाल की थीं जिनमें उसके चहेते कुत्ते को नुकसान पहुंचाने की धमकी भी शामिल थी। अदालत में बेगुनाही साबित होने के बाद पुलिस ने उससे नगद हर्जाना देने का समझौता किया, और अमरीकी कानून के मुताबिक इस पर अदालती मुहर लगी। 

हिन्दुस्तान में इस तरह के मुआवजे की कोई व्यवस्था नहीं है, और बहुत गरीब, और बहुत बेसहारा लोग झूठे मामलों में फंसा दिए जाते हैं, लेकिन बरसों तक चले मुकदमे के बाद जब वे छूटते हैं, तो भी उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिल पाता है जबकि उनकी खासी जिंदगी का नुकसान हो चुका रहता है।  भारत में भी ऐसे मामलों में मुआवजे का प्रावधान करना चाहिए क्योंकि गरीबों की जिंदगी का खोया हुआ हिस्सा उनके परिवार को तोड़ देने वाला भी रहता है, और बहुत से परिवार ऐसे रहते हैं जो फर्जी मामलों में फंसाए गए उनके किसी सदस्य की कमाई पर ही जिंदा रहते हैं। भारत में पुलिस की गलती या गलत काम से अगर ऐसा होगा, तो उसके लिए मुआवजा कहां से आएगा, यह एक सवाल उठ खड़ा हो सकता है, लेकिन यह सरकार के सोचने की बात है कि वह अदालती दावों के निपटारे के लिए अपनी एजेंसियों को कोई बीमा मुहैया कराए, या किसी और तरीके से ऐसे मुआवजे का इंतजाम करे, लेकिन ऐसे प्रावधान के बिना सामाजिक न्याय नहीं हो पाएगा। दिक्कत यह है कि भारत में न्याय प्रक्रिया का बहुत सा हिस्सा इस कदर भ्रष्ट है कि जिन मामलों में बीमा कंपनियों को कोई निपटारा करना पड़ता है, उनमें भी अधिक बड़ा दावा न देना पड़े, इसके लिए कंपनियां कई तरह से रिश्वत भी देने लगती हैं। लेकिन एक विचार की तरह भारत के तमाम तबकों के सामने इस पर बात होनी चाहिए कि झूठी मुकदमेबाजी के शिकार गरीबों को कैसे इंसाफ और मुआवजा दिलाया जा सकता है। 

दीवारों पर लिक्खा है, 26 मई 2024

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 25 मई 2024


 

बच्चों में जुर्म और आत्मघाती हिंसा घटाने का क्या तरीका?

 25 मई 2024

 

इन दिनों नाबालिगों के बीच दूसरों के साथ हिंसा, और आत्मघाती हिंसा, इन दोनों ही मामलों में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। जुर्म करने के मामले में बहुत से नाबालिग बच्चे या किशोर बड़ी रफ्तार से आगे बढ़े हैं, और भारतीय समाज है कि इस रूख को अनदेखा कर रहा है। अब कल की ही घटना है, छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक गांव में रहने वाले 11 बरस के बच्चे ने नाना-नानी के घर से 21 सौ रूपए निकाल लिए थे, इस पर उसे डांटा गया, और उसने गांव की ही स्कूल में जाकर फांसी लगा ली। ऐसा कई मामलों में हुआ है, कहीं भाई-बहन का मोबाइल फोन को लेकर झगड़ा हुआ, और किसी एक ने फांसी लगा ली, या दूसरे का कत्ल कर दिया। कुछ ऐसे मामले पिछले महीनों में सामने आए हैं जिसमें घर के भीतर ही बच्चों ने कोई पोर्न फिल्म देखकर परिवार की ही लडक़ी से बलात्कार किया। पसंद का मोबाइल फोन न मिलने पर खुदकुशी करने वाले कुछ बच्चे भी दर्ज हुए हैं। अब इन मामलों में, परिवार, समाज, और सरकार क्या कर सकते हैं? या तो आज की तरह इसे अनदेखा कर सकते हैं, और इसे पुलिस, अदालत, जेल, या सुधारगृह का मामला मानकर भूल सकते हैं, या फिर आगे ऐसी वारदातों में कमी आए, उसके लिए भी कुछ कर सकते हैं। 

दुनिया में वही देश सभ्य और विकसित माने जा सकते हैं जो अपने बच्चों की फिक्र करते हैं। और जब बच्चे आत्मघाती हो रहे हैं, तो यह जाहिर है कि उनके भीतर तनाव, निराशा, कुंठा का स्तर बहुत बढ़ गया है। छोटे-छोटे बच्चे अगर अपनी किसी गलती, या गलत काम पर जरा सी डांट भी सुनने को तैयार नहीं हैं, तो यह उनके भीतर सहनशीलता की कमी है। हो सकता है कि परिवार के बुजुर्ग लोगों का बोलने का लहजा किसी मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं के पैमानों पर ठीक न बैठे, लेकिन सदियों से भारतीय समाज जिस तरह की व्यवस्था पर चलते आ रहा है, उसमें अभी एक-दो दशक पहले तक बच्चों के तनाव का यह हाल नहीं था। अब तो एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरता जब हत्या या आत्महत्या की खबरों में नाबालिगों का जिक्र न हो। और इस ताजा मामले में तो तीसरी कक्षा के बच्चे ने घर की ही डांट से खुदकुशी कर ली, तो फिर परिवार क्या बच्चों के पैसे चुराने पर भी उन्हें नहीं डांटेंगे? पिछली कई घटनाओं में बच्चों ने इम्तिहान के बीच भी मोबाइल पर खेल खेलने से रोकने पर खुदकुशी करना तय कर लिया, अब भला कौन से ऐसे मां-बाप होंगे जो कि इम्तिहान के दौरान भी बच्चों को पढऩे के लिए न बोलें? 

हम पहले भी इस तरह की आत्मघाती, या दूसरों के खिलाफ नाबालिग हिंसा के मामलों में, या परिवार के भीतर-भीतर दूसरे लोगों के भी एक-दूसरे को मार डालने के मामलों में यह कहते आए हैं कि भारत में अधिक मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं की जरूरत है। यहां पर दरअसल धार्मिक आस्था, और अंधविश्वास की वजह से मनोविज्ञान को कोई महत्व दिया नहीं जाता। लोग ताबीज को अधिक असरदार मानते हैं, झाड़-फूंक के वीडियो दिखते हैं, और कई किस्म के बाबा देश के अलग-अलग इलाकों में मनोरोगियों के साथ तरह-तरह की नाटकीय हरकतें करते हुए उन पर से भूत-प्रेत हटाने का पाखंड करते दिखते हैं। जब देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा ताबीज और झाड़-फूंक से या किसी बाबा के हाथों पिटकर ठीक होने को तैयार बैठा है, तो सरकार को भी मनोचिकित्सकों और परामर्शदाताओं की जरूरत नहीं लगती है। आज देश के शहरी इलाकों में जहां पर ये विशेषज्ञ मौजूद भी हैं, वहां भी लोग धड़ल्ले से पाखंडियों के पास जाते हैं, और अंधविश्वास से आस्था-चिकित्सा पाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया के ऐसे देशों के लिए आस्था-चिकित्सा को मान्यता दी है जहां पर डॉक्टरी सहूलियत हासिल नहीं है, लेकिन अपने आपको विकसित देश करार देने वाला हिन्दुस्तान भी आज 21वीं सदी में जादू-टोने और तांत्रिकों के सहारे मनोरोगियों का इलाज करते हुए शर्मिंदगी महसूस नहीं करता है। 

हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बहुत बार यह लिख चुके हैं कि देश में मनोवैज्ञानिक पढ़ाई के माध्यम से परामर्शदाता तैयार करने का काम करना चाहिए, और इसके लिए विश्वविद्यालयों में बड़े पैमाने पर कोर्स चलाने चाहिए, और जिस तरह स्कूली शिक्षकों के लिए बीएड जैसे कोर्स अनिवार्य किए गए हैं, उसी तरह उनके लिए मनोवैज्ञानिक परामर्श का कोर्स भी जरूरी करना चाहिए, और धीरे-धीरे सरकार हर स्कूल में ऐसे कम से कम एक-दो शिक्षक नियुक्त कर सकती है जिससे हिंसा के स्तर से नीचे की परेशानी वाले बच्चों को भी मदद मिल सके। जिन बच्चों का बचपन मानसिक जख्मों से गुजरा रहता है, वे बड़े होने पर भी मानसिक समस्याओं के शिकार रहते हैं। इसलिए अगर उन्हें बचपन में ही परेशानियों से मुक्ति मिल सके, तो उनका बचपन भी अधिक स्वस्थ रहेगा, और बड़े होने पर भी वे बेहतर दिल-दिमाग वाले होंगे। लेकिन पता नहीं क्यों सरकारों को मनोवैज्ञानिक परामर्श का महत्व नहीं आता, और न ही उसकी जरूरत लगती है। परामर्श की पढ़ाई को एक अतिरिक्त योग्यता मानकर ऐसे शिक्षकों को कोई अतिरिक्त भत्ता भी दिया जा सकता है, और स्कूली बच्चों के साथ-साथ उनके मां-बाप की उलझनें भी सुलझाई जा सकती हैं, क्योंकि परिवारों के तनाव सुलझे बिना बच्चों को पूरी तरह तनावमुक्त नहीं किया जा सकता। 

अभी तो समाज के अधिकतर बच्चों को हासिल सरकारी स्कूलों में बुनियादी पढ़ाई का भी हाल बहुत खराब है, खेलकूद की गुंजाइश नहीं सरीखी है, ऐसे में परामर्श की सुविधा की हमारी सलाह हो सकता है कि हकीकत से वाकिफ लोगों को एक बकवास लगे। लेकिन हमारा मानना है कि मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं को अलग से नियुक्त न भी करके अगर शिक्षकों में से ही लोगों को एक या दो साल के कोर्स करवाए जाएं, तो भी बिना किसी लंबे-चौड़े खर्च के बच्चों की मदद हो सकती है, और आम हिन्दुस्तानियों के लिए स्कूलों में ऐसी मदद मिलना ही उनकी जरूरत पूरी कर सकता है। जिस रफ्तार से बच्चों में जुर्म बढ़ रहे हैं, हिंसा और सेक्स में बढ़ोत्तरी हो रही है, उन सबको एक-एक घटना मानकर उस पर पुलिस कार्रवाई से बीमार समाज का कोई भी इलाज नहीं हो रहा, इसे एक बड़ी समस्या मानने के बाद ही उसके समाधान का सफर शुरू हो सकेगा। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 मई 2024


 

फिलीस्तीन का साथ देने वाले योरप के तीन, और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश

24 मई 2024

 

पश्चिम के तीन देशों ने अभी फिलीस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता दी है। इजराइल फिलीस्तीन पर जैसे भयानक हमले कर रहा है, और अब तक शायद उसने 35 हजार लोगों को मार डाला है, और दसियों लाख लोगों को भुखमरी की कगार पर पहुंचा दिया है, उसके खिलाफ दुनिया में जगह-जगह पर जनमत उठ खड़ा हो रहा है। दक्षिण अफ्रीका इसके खिलाफ इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस पहुंचा है, और उसने फिलीस्तीनियों को इस तरह से मार डालने को एक नस्ल का जनसंहार करार दिया है। इस तर्क के आधार पर इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की गिरफ्तारी के लिए वारंट की मांग भी की है। अभी यह मामला साफ नहीं है कि इस अदालत का आदेश इजराइल पर किस तरह से लागू होगा, लेकिन इस बीच स्पेन, आयरलैंड, और नॉर्वे, योरप के इन तीन देशों ने फिलीस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता दी है जो कि मोटेतौर पर एक प्रतीकात्मक कार्रवाई है। और जैसी कि उम्मीद की जा सकती थी, इजराइल ने इन तीनों देशों को कहा है कि उन्हें इसके गंभीर नतीजे भुगतने होंगे। उसने इन देशों से अपनी राजदूत भी बुला लिए हैं। इजराइल का तर्क है कि फिलीस्तीन पर काबिज आतंकी संगठन हमास ने जिस तरह इजराइल पर हमला किया था, बेकसूर नागरिकों को मारा, और महिलाओं सहित सैकड़ों नागरिकों का अपहरण किया, उसे देखते हुए फिलीस्तीन को मान्यता देने का मतलब आतंक का हौसला बुलंद करना है। जो भी हो, एक-एक करके दुनिया के बहुत से देश अमरीकी दादागिरी के खिलाफ खड़े हो रहे हैं, और फिलीस्तीन का साथ दे रहे हैं, इजराइल के खिलाफ अलग-अलग मंचों पर आवाज उठा रहे हैं। खबर बताती है कि कोलंबिया ने फिलीस्तीन में दूतावास खोलने का ऐलान किया है, और कई देश फिलीस्तीनियों की मानवीय मदद रोकने के लिए इजराइल के खिलाफ कई तरह की कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। सबसे बेईमान देश अमरीका साबित हो रहा है जो इजराइल को बीच-बीच में जुबानी नसीहत देता है, और फिर उसे हथियारों की खेप और भेज देता है ताकि वह बेकसूर फिलीस्तीनियों को थोक में मार सके। 

दुनिया की व्यवस्था में संयुक्त राष्ट्र संघ की जैसी भूमिका रखी गई थी, वह फिलीस्तीनियों पर जुर्म के मामले में पूरी तरह से बेअसर और बोगस साबित हुई है क्योंकि अवैध कब्जा करने वाला हमलावर और हत्यारा देश इजराइल जब कभी संयुक्त राष्ट्र में परेशानी में पडऩे वाला रहता है, अमरीका उसे बचाने के लिए वीटो नाम के विशेषाधिकार का इस्तेमाल करता है। अमरीकी शह पर ही इजराइल लगातार फिलीस्तीनी जमीन पर काबिज होते चल रहा है, और इस बार उसने हमास के आतंकी हमले का जवाब देते हुए फिलीस्तीन के गाजा शहर को दुनिया का सबसे बड़ा मलबे का ढेर बना दिया है, और फिलीस्तीनियों को बेघर, फिलीस्तीन को दुनिया का एक सबसे बड़ा कब्रिस्तान बना दिया है। हिटलर ने अपने वक्त जर्मनी में यहूदियों के साथ जो कुछ किया था, ठीक वही इजराइल फिलीस्तीनियों के साथ कर रहा है। जो नस्लवादी जनसंहार हिटलर ने यहूदियों के खिलाफ किया था, वही का वही इजराइल ने गाजा में कर दिखाया है, और अब वहां की बाकी जगह पर कैसे इजराइलियों को बसाया जा सकता है, कैसे फिलीस्तीनियों को उनके देश से बेदखल किया जा सकता है, यह गुंडागर्दी चल रही है। इसमें अमरीका एक तरफ फिलीस्तीनियों के लिए राहत की शक्ल में खाना भेजने का नाटक कर रहा है, और फिलीस्तीनियों पर बरसाने के लिए इजराइल को बमों का जखीरा भी भेज रहा है। अमरीका के इस पाखंड के खिलाफ खुद अमरीकी विश्वविद्यालयों में छात्रों का एक बड़ा आंदोलन चला है, और ऐसा माना जा रहा है कि नवंबर में होने वाले अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में फिलीस्तीन का मुद्दा नौजवान वोटरों को प्रभावित कर सकता है। 

जब दुनिया में बड़ी-बड़ी ताकतें इस हद तक खेमेबाजी में रहती हैं, तब छोटे-छोटे देश अपनी मिसाल पेश करके एक नैतिक दबाव तो खड़ा करते ही हैं। जिस योरप में अमरीकी पिट्ठू ब्रिटेन इजराइल को बचाने अपनी फौज भेजता है, उसी योरप में तीन देशों ने ब्रिटेन को आईना दिखाया है। यह एक ऐतिहासिक मौका है, और ऐसे वक्त दुनिया के किन देशों ने किसका साथ दिया, किसने आंखें फेर लीं, और किसने जनसंहार में मदद की, इन सबका नाम इतिहास में अच्छी तरह दर्ज होगा। हिटलर का इतिहास दर्ज होना अब तक खत्म नहीं हुआ है, जबकि उसके जनसंहार की पौन सदी हो चुकी है। आज भी जगह-जगह हिटलरी नस्लवादी सामूहिक हत्याओं के गवाह या उनसे बच निकले लोग कहीं-कहीं सामने आते हैं, और मरने के पहले उनके बयानों की शक्ल में हिटलर का इतिहास दर्ज होते चलता है। दुनिया इस बात की भी गवाह है कि हिटलर का अपना देश जर्मनी उसके खून-खराबे को लेकर इस किस्म की ऐतिहासिक शर्मिंदगी से डूबे रहता है कि वहां आज हिटलर का नाम एक कलंक है, और लोग अपने कुत्तों का नाम भी हिटलर नहीं रखते। इजराइल ने अपने इतिहास की आज तक की सबसे कट्टर सरकार देखी है, और वह सरकार भ्रष्टाचार के मामले भुगत रहे प्रधानमंत्री नेतन्याहू की अगुवाई में सबसे अधिक नस्लवादी जनसंहार कर रही है। फिलीस्तीनियों की नस्ल को ही खत्म कर देना आज के इजराइल का मकसद है, वह हिटलर के ही अंदाज में एक नस्ल को खत्म कर रहा है, लेकिन उससे आगे बढक़र वह एक देश को भी खत्म कर रहा है, और उस पर पूरी तरह कब्जा करके अपने नागरिकों को वहां बसा रहा है। आज दुनिया में बहुत से प्रगतिशील और उदारवादी यहूदी-इजराइली ऐसे हैं जो कि नेतन्याहू-सरकार के फैसलों के खिलाफ खड़े हैं, और अमरीका में जगह-जगह होने वाले प्रदर्शनों में वे इजराइल के खिलाफ और फिलीस्तीन के साथ खड़े रहते हैं। 

किसी देश का अपने आपमें महान लोकतंत्र बनना उसकी अपनी आर्थिक और फौजी ताकत पर निर्भर नहीं करता। उस देश में भीतर और बाकी दुनिया में मानवाधिकारों के लिए, इंसाफ के लिए उस देश का क्या रूख है, इसी से उस देश की साख बनती है, और उसके मुखिया की इज्जत। आज दुनिया के जो देश फिलीस्तीन को एक मुस्लिम देश मानकर इस बात पर खुश हो रहे हैं कि मुस्लिम मारे जा रहे हैं, तो उन्हें याद रखना चाहिए कि दुनिया के एक हिस्से में इतिहास की सबसे बड़ी बेइंसाफी चलती रहे, तो दुनिया के बाकी हिस्सों में भी अमन-चैन कायम नहीं रह सकता। आज दुनिया के बड़े देश अपनी सरहदों से परे भी धरती के अलग-अलग हिस्सों में अपने फौजी ताकत के अड्डे बनाने में लगे रहते हैं, और आज तो आर्थिक साम्राज्य भी एक किस्म की फौजी ताकत ही है। ऐसे में इजराइली हत्यारी-सरकार का साथ देने के लिए चुप रहने वाले देशों का भी नाम दर्ज हो रहा है।   

(Daily Chhattisgarh)

 

नक्सल-शांतिवार्ता के लिए छत्तीसगढ़ की एक अभूतपूर्व और असाधारण पहल!

23 मई 2024


छत्तीसगढ़ में नई भाजपा सरकार ने नक्सल मोर्चे पर जो पहल की है, वह देखने लायक है। उपमुख्यमंत्री और प्रदेश के गृहमंत्री विजय शर्मा पहली बार विधायक और मंत्री बने हैं, और उन्होंने अपने शुरूआती इंटरव्यू से ही नक्सलियों से शांतिवार्ता का इरादा जाहिर किया था। बाद में वे लगातार कुछ और मौकों पर भी इस बात को दुहराते रहे, और यह भी कहते रहे कि नक्सली अगर वीडियो कॉल पर भी बात करना चाहते हैं, तो वे इसके लिए भी तैयार हैं। लेकिन इसके साथ-साथ बस्तर के नक्सल मोर्चे पर लगातार सुरक्षा बलों की कार्रवाई भी जारी है, और इस सरकार ने पिछले कुछ महीनों में ही सौ से अधिक नक्सली मारने में कामयाबी पाई है। दूसरी उल्लेखनीय बात यह है कि इतनी मुठभेड़ों में सुरक्षा बलों को बहुत कम नुकसान पहुंचा है। यह बात जरूर है कि एक मुठभेड़ ऐसी हुई है जिसमें चार बेकसूर ग्रामीणों को मुठभेड़ के बीच गोलियां लगी और वे मारे गए, लेकिन पुलिस उन्हें नक्सली बता रही है। नक्सली अपने लोगों के मारे जाने पर खुलकर इस बात को मंजूर करते आए हैं कि मारे गए लोग उनके थे, लेकिन अभी 30 अप्रैल को हुई मुठभेड़ में मारे गए लोगों में चार को नक्सलियों ने अपना न होना बताया है, और अनगिनत मीडिया कैमरों के सामने इन चारों के परिवार ने भी यही बात कही है। अगर राज्य सरकार सचमुच ही नक्सल मोर्चे को शांत करना चाहती है, तो मुठभेड़ में नक्सलियों को खत्म करने के साथ-साथ उसे बेकसूर ग्रामीणों की मौत पर सच को मंजूर भी करना होगा, और इनके परिवारों को मुआवजा भी देना होगा। आज किसी बेकसूर आदिवासी को नक्सली करार दे देने से सरकार उनके परिवार को कोई भी मुआवजा देने से बच जाती है। ऐसी नौबत में लोगों का भरोसा सरकार पर नहीं रहेगा, और नक्सलियों से बातचीत में भी ऐसी मौतें एक रोड़ा रहेंगी। 

आज इस मुद्दे पर लिखने की जरूरत इसलिए लग रही है कि गृहमंत्री विजय शर्मा ने कहा है कि राज्य में नक्सल-पुनर्वास नीति फिर से बनाई जा रही है, और इसके लिए राज्य सरकार ने इंटरनेट पर तमाम लोगों से राय मांगी है कि पुनर्वास कैसा होना चाहिए। उन्होंने कहा कि नक्सली भी अपने सुझाव दे सकते हैं कि वे किन शर्तों पर आत्मसमर्पण करके लोकतंत्र की मूलधारा में आना चाहेंगे। इसके कुछ दिन पहले राज्य सरकार ने यह भी कहा था कि नक्सली प्रदेश के जिस शहर में पुनर्वास चाहेंगे, उन्हें वहां मकान दिया जाएगा। यह बात देश में पहली बार ही हो रही है कि नक्सलियों से भी यह पूछा जा रहा है कि वे किस तरह का पुनर्वास चाहते हैं। नए गृहमंत्री का यह रूख पिछली कई सरकारों के रूख से बिल्कुल ही अलग है। राज्य ने अब तक चार मुख्यमंत्री देखे हैं, और किसी भी सरकार का रूख नक्सल पुनर्वास को लेकर, शांतिवार्ता को लेकर इतना सकारात्मक नहीं रहा है। अब यह एक अलग बात है कि यह सरकार अपनी इन घोषणाओं को लेकर सचमुच ही इतनी ईमानदार है, या इसके पीछे कोई राजनीति भी है। चूंकि मुख्यमंत्री और गृहमंत्री लगातार एक सरीखी बात कर रहे हैं, और नक्सल मोर्चे पर सुरक्षा बलों की अभूतपूर्व और ऐतिहासिक कामयाबी के बाद भी शांतिवार्ता की बात पर कायम हैं, इसलिए हम पहली नजर में इसे सरकार का ईमानदार रूख ही मान रहे हैं। 

अब सवाल यह उठता है कि सरकार और नक्सलियों के बीच बातचीत की जमीन तैयार करने के लिए इन दोनों पक्षों से परे के लोग क्या कर सकते हैं? बस्तर का पिछले 25 बरस का इतिहास बताता है कि जब-जब वहां कोई अपहरण हुआ, या नक्सलियों और सरकार के बीच किसी भी तरह की अघोषित बातचीत की नौबत आई, ऐसे तमाम मौकों पर बस्तर में काम कर रहे पत्रकारों ने बड़ा योगदान दिया है। जब राज्य के एक आईएएस अफसर और नक्सल प्रभावित जिले सुकमा के कलेक्टर का अपहरण हुआ था, तब भी बातचीत का सिलसिला शुरू करवाने में और कलेक्टर की रिहाई में स्थानीय पत्रकार सक्रिय थे। राज्य में उस वक्त भाजपा की सरकार थी, और नक्सलियों और राज्य शासन दोनों की आम सहमति से कुछ अफसरों और कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक कमेटी बनी थी जिसकी कई बैठकें हुई थीं, और बहुत से बेकसूर आदिवासियों को छुड़वाने, उनके मुकदमे खत्म करवाने की शर्त पर इस आईएएस की रिहाई हुई थी। उस कमेटी का इस्तेमाल इस रिहाई के साथ ही खत्म कर दिया गया था, जबकि बातचीत जिस हद तक पहुंच गई थी, उसे नक्सल आंदोलन खत्म करने के लिए शांतिवार्ता में तब्दील किया जा सकता था। पता नहीं क्यों मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और उनके अफसरों ने, केन्द्र की मनमोहन सिंह सरकार ने, किसी ने भी उस बातचीत को शांतिवार्ता तक ले जाने की जहमत नहीं उठाई, वरना आज जिस तरह विष्णु देव साय की सरकार, और इसके गृहमंत्री विजय शर्मा लगातार शांतिवार्ता और नक्सल-पुनर्वास की बात जिस तरह से कर रहे हैं, वैसी बात अगर उस समय हुई होती तो हो सकता है कि उसके बाद से अब तक की हजारों नक्सलियों, सुरक्षा कर्मचारियों, और ग्रामीणों की मौत टल सकती थी। 

खैर, जब जागे, तभी सबेरा। राज्य सरकार को इसी सक्रियता और गंभीरता से नक्सलियों से बातचीत की पहल जारी रखना चाहिए। हमारा मानना है कि दोनों ही पक्षों को बातचीत के लिए किसी तरह की शर्त नहीं रखना चाहिए, वरना पहले कभी-कभी इस बुनियादी बात पर ही शांतिवार्ता की चर्चा खत्म हो गई कि पहले बस्तर से सुरक्षा बलों को हटाया जाए, या पहले नक्सली अपने हथियार डालें। अब यह जाहिर है कि ये दोनों ही पक्ष अपना-अपना एजेंडा लेकर काम कर रहे हैं, और यह सिलसिला जारी रह सकता है, लेकिन साथ-साथ बातचीत की पहल भी शुरू हो सकती है। इसके लिए ऐसी नामुमकिन या नामंजूर बातों को नहीं उठाना चाहिए जिससे कि बात न हो सके। गृहमंत्री विजय शर्मा का यह मानना ठीक है कि सिर्फ मुठभेड़ से नक्सल समस्या हल नहीं हो सकती, और वे बड़े मौलिक तरीकों से इसे सुलझाने में लगे हैं, जो कि अपने किस्म की पहली ऐसी कोशिश है। आज जिन लोगों की इन दोनों तबकों से किसी तरह की बात होती है, उन्हें भी अपने रिश्तों और असर का इस्तेमाल बातचीत शुरू करवाने में करना चाहिए। इसमें कुछ सामाजिक कार्यकर्ता, या पत्रकार हो सकते हैं। यही असली लोकतंत्र है जिसमें सरकार बंदूकों की अपनी तमाम ताकत, और अपने अधिकारों के बावजूद किसी हथियारबंद आंदोलन को खत्म करवाने के लिए बातचीत का सिलसिला भी शुरू करना चाहती है। आज नक्सलियों को भी चाहिए कि अपनी लोकतांत्रिक मांगों को लेकर वे सरकार के साथ बैठें, और हिंसा का रास्ता छोडऩे के लिए बातचीत शुरू करें। आज यह बात अच्छी तरह स्थापित और साबित हो चुकी है कि भारत की केन्द्र और राज्य की सरकारों की मिलीजुली ताकत के सामने किसी हथियारबंद आंदोलन के कामयाब होने की कोई संभावना नहीं है। इस हकीकत को समझते हुए नक्सलियों को आदिवासियों के हित में तमाम किस्म की लोकतांत्रिक मांगें सामने रखना चाहिए, और उन्हें लोकतंत्र की मूलधारा में जिस हद तक भी राजनीतिक भूमिका मंजूर हो, उसे करना चाहिए। हथियारबंद आंदोलनों का अब भारत जैसे देश के भीतर कोई भविष्य नहीं है। यह मौका देश की तमाम लोकतांत्रिक ताकतों की मध्यस्थता का भी है कि वे छत्तीसगढ़ सरकार और नक्सलियों के बीच बातचीत के लिए जमीन तैयार करें। 

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 23 मई 2024


 

अगली पीढ़ी की बुनियाद, स्कूली शिक्षा इतनी बर्बाद

22 मई 2024

 ‘छत्तीसगढ़’ अखबार के यूट्यूब चैनल ‘इंडिया-आजकल’ पर कल छत्तीसगढ़ के निजी स्कूलों के संचालक-एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गुप्ता ने शिक्षा के अधिकार के तहत गरीब बच्चों को निजी स्कूलों में मिलने वाले दाखिले के खिलाफ सामाजिक तनाव का जो जिक्र किया, वह स्तब्ध करने वाला था। अगर जिला अदालत के एक जज को यह मंजूर नहीं कि निजी स्कूल में उसके बच्चे के साथ उनकी काम वाली की बच्ची को भी दाखिला मिले, तो यह समाज में भेदभाव की एक गहरी और चौड़ी खाई बताता है। आमतौर पर लोग अपने मन की भेदभाव की भावनाओं को अपने तक सीमित रख लेते हैं, लेकिन जब लोग दूसरों के सामने खुलकर कहीं आरक्षण के खिलाफ, तो कहीं सरकारी योजनाओं में महिलाओं को मिलने वाली हिफाजत के खिलाफ बोलते हैं, तो लगता है कि 21वीं सदी में भी उनके भीतर पत्थरयुग की वह सोच जारी है जिसे लोकतंत्र छू भी नहीं गया था, क्योंकि लोकतंत्र उस वक्त आया ही नहीं था। इसी बातचीत में यह भी पता लगा कि छत्तीसगढ़ के कुछ नामी-गिरामी स्कूल फर्जी तरीके से अल्पसंख्यक स्कूल बन गए हैं ताकि उन्हें गरीब बच्चों को रियायती सरकारी फीस पर दाखिला न देना पड़े, और बिना नाम बताए उन्होंने एक ऐसी बड़ी स्कूल का जिक्र किया है जहां सरकारी योजना के तहत आरटीई में दाखिला पाने वाले गरीब बच्चों को अलग क्लास में बिठाकर अलग टीचर से पढ़वाया जाता है, और उनका यूनीफॉर्म भी अलग रखा जाता है। पैसेवालों के स्कूलों में इस तरह का भेदभाव बहुत हैरान तो नहीं करता, लेकिन कानून के खिलाफ जाकर वे ऐसा भेदभाव करेंगे, यह बात हैरान जरूर करती है। राजीव गुप्ता की कही ये बातें भी भयानक थी कि प्रदेश के कुछ सौ स्कूलों में से सैकड़ों स्कूल ऐसे हैं जो कोचिंग सेंटरों की मदद करने के लिए छात्र-छात्राओं का झूठा दाखिला दिखाते हैं, और उन्हें फर्जी हाजिरी देकर इम्तिहान में बैठने का रास्ता जुटा देते हैं। एक तरफ तो निजी स्कूलों में इतने बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा चल रहा है, और सरकार में बैठे लोगों को इन पर कार्रवाई शायद इसलिए नहीं सुहाती है कि सत्तारूढ़ लोगों के बच्चे महंगी कोचिंग पाने के लायक रहते हैं, पाते हैं, और इसलिए उनके मां-बाप के हित में यह नहीं रहता कि कोचिंग की व्यवस्था खत्म हो, और कोचिंगवंचित गरीब बच्चे भी सत्ता के संपन्न बच्चों की बराबरी से मुकाबले में आ जाए। 

आज ही छत्तीसगढ़ के अलग-अलग अखबारों में राज्य के स्कूलों का भयानक दर्जे का संगठित भ्रष्टाचार छपा है। एक प्रमुख अखबार ‘ दैनिक भास्कर’ की रिपोर्ट है कि प्रदेश के सरकारी स्कूलों में डेढ़ लाख डुप्लीकेट छात्रों का दाखिला दिखाया गया है, जिससे सरकार को हर बरस 730 करोड़ का चूना लगाया जा रहा है। अभी एक सरकारी वेबसाईट पर डेटा अपडेट होने पर यह फर्जीवाड़ा पकड़ाया है। इसके पीछे वजहें चाहे जो हों, लेकिन सरकारी विभागों में कहीं फर्जी राशन कार्ड रहते हैं, कहीं स्कूली बच्चों की गिनती ज्यादा बताकर यूनीफॉर्म, मिड-डे-मिल, साइकिल, और बाकी सहूलियतों का पैसा खा-पी लिया जाता है। प्रदेश के एक दूसरे प्रमुख अखबार ‘नवभारत’ में भी एक रिपोर्ट छपी है जिसमें बताया गया है कि निजी स्कूलों में आरटीई के तहत दाखिला पाने वाले गरीब बच्चे बीच में पढ़ाई छोड़ भी देते हैं, लेकिन स्कूल उनके न आने की जानकारी सरकार को नहीं देते, और उसकी फीस लेते रहते हैं। ये तमाम बातें निजी स्कूलों और सरकारी स्कूलों, इन दोनों में बड़े पैमाने पर चल रहे भ्रष्टाचार को बताती हैं। 

इनके अलावा छत्तीसगढ़ की स्कूल शिक्षा में सरकारी स्कूलों का हाल बहुत खराब बताया जाता है, और वहां गरीब बच्चे दोपहर के भोजन के अलावा कम दिलचस्पी लेते हैं, और शिक्षकों को भी इससे सहूलियत रहती है कि बच्चे न आने या चले जाने के चक्कर में रहें, बहुत से जगहों पर शिक्षक नशे में स्कूल पहुंचते हैं, कुछ जगहों पर स्कूल में बैठकर नशा करते हैं, और छात्राओं से छेड़छाड़ के बहुत से मामले प्रदेश भर में जगह-जगह सामने आए हैं जिनमें कहीं हेडमास्टर, कहीं शिक्षक, कहीं हॉस्टल प्रभारी गिरफ्तार भी हुए हैं। यह बात राज्य बनने के समय से लगातार सामने आ रही है कि किस तरह स्कूलों की फर्नीचर खरीदी में 35 फीसदी से अधिक कमीशन का संगठित भ्रष्टाचार चलता है, और इससे कुछ ज्यादा ही कमीशन किताब खरीदी में लिया जाता है। जब भविष्य की बुनियाद को ही भ्रष्टाचार से जर्जर किया जा रहा है, तो अगली पीढ़ी किस तरह की तैयार होगी यह बात साफ है।

लोगों को याद होगा कि एक वक्त इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज ने यह फैसला दिया था कि तमाम नेता और बड़े अफसर अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाएं ताकि स्कूलों की हालत सुधर सके। यह बात आई-गई हो गई, एक विचार के रूप में यह बात ठीक थी, लेकिन कानूनी रूप से यह फैसला कमजोर था क्योंकि किसी समाजवादी व्यवस्था में ही ऐसा करना मुमकिन था, न कि भारत जैसे पूंजीवादी-लोकतंत्र में। इसलिए हाईकोर्ट जज की इस जायज सोच पर भी कोई अमल नहीं हो पाया। लेकिन देश को अपनी शिक्षा नीति और शिक्षा व्यवस्था के बारे में यह सोचना चाहिए कि निजी और सरकारी स्कूलों के बीच एक लंबे फासले की वजह से इनके बच्चों के बीच आगे चलकर कोई बराबरी नहीं रह जाती। देश में वैसे भी एक दूसरी बहस चल रही है कि पढ़ाई को कुचल डालने वाली कोचिंग इंडस्ट्री के आतंक को कैसे घटाया जाए। यह इतना कमाई का कारोबार है कि इसने स्कूल शिक्षा के नाम पर परले दर्जे की बेईमानी कायम कर रखी है, और बड़े दाखिला इम्तिहानों की तैयारी करने वाले बच्चों को स्कूल की पढ़ाई से एक किस्म से बरी कर दिया गया है। स्कूल की जिंदगी सिर्फ इम्तिहान के लिए नहीं रहती है, जैसी कि कोचिंग सेंटरों की रहती है। स्कूल की जिंदगी बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए, उनकी सामाजिक समझ विकसित करने के लिए, उनमें टीम भावना लाने के लिए ही रहती है। देश की मौजूदा शिक्षा व्यवस्था ने इन सबको पूरी तरह से खत्म कर दिया है, और पढ़ाई के नाम पर कोचिंग को ही जरूरी साबित कर दिया है, जिसका खर्च देश का सबसे ऊपर का एक फीसदी तबका ही उठा पाता है। जब स्कूल शिक्षा से लेकर कोचिंग तक देश में गैरबराबरी इतना राज कर रही है, तो फिर गरीब बच्चों के लिए गुंजाइश ही कहां रह जाती है। और अब यह सिलसिला वापिस लौटते दिख भी नहीं रहा है।

(Daily Chhattisgarh)

 

 

दीवारों पर लिक्खा है, 22 मई 2024


 

दीवारों पर लिक्खा है, 21 मई 2024


 

डेढ़ दर्जन बिखरी लाशें, शोक, श्रद्धांजलि, मदद, सरकार का जिम्मा पूरा!

21 मई 2024

 

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में अभी कुछ ही दिन पहले केडिया के शराबखाने से काम करके लौटते कामगारों से भरी हुई एक बस रास्ते में मुरम खदान के गड्ढे में गिर गई थी, और उसमें 13 लोगों की मौत हो गई थी। इसके पहले इसी बरस इस प्रदेश में कहीं 5 तो कहीं 8 लोगों की सडक़-मौत होते ही रही है। लेकिन कल का कवर्धा का हादसा सबसे ही बुरा रहा जिसमें तेन्दूपत्ता तोडक़र लौट रहे बैगा आदिवासी मजदूरों को ढोकर ला रही गाड़ी खाई में गिर गई, और 19 लोग मारे गए। इनमें से 18 महिलाएं और नाबालिग लड़कियां हैं, और एक पुरूष है। ऐसा बताया जा रहा है कि छोटे आकार की एक मालवाहक गाड़ी 35-36 लोगों को ढोकर ला रही थी, और पहाड़ी ढलान पर ड्राइवर ब्रेक फेल हो जाने की बात कहते हुए कूद गया, और कुछ और लोग भी कूदकर जान बचाने में कामयाब रहे। लेकिन गाड़ी के साथ खाई में गिरे लोगों की बड़ी तकलीफदेह मौत हुई। इस बड़े पैमाने पर जब कोई हादसा होता है, तो जाहिर तौर पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री इन सभी की तरफ से शोक और श्रद्धांजलि संदेश जारी होते हैं, और राज्य सरकार की तरफ से मदद की घोषणा भी होती है। ये दोनों बातें भी कल हो गई हैं, और कई घायल अस्पताल में हैं जिनसे जाकर नेताओं के मिलने का सिलसिला चल रहा है। 

ऐसी हर बड़ी सडक़ दुर्घटना के बाद हम अपने थके-हारे मन से इस जगह पर लिखते हैं, और सत्ता के नाराज होने का खतरा उठाते हुए भी उसे उसकी जिम्मेदारी याद दिलाते हैं। कल पहले की तरह सरकार ने अपनी जिम्मेदारी शोक, श्रद्धांजलि, और मदद से पूरी कर ली है। लेकिन क्या इन तीनों चीजों से अगली एक भी सडक़-मौत थमने वाली है? क्या सरकार की जिम्मेदारी महज शोक, श्रद्धांजलि, और राहत जैसे किसी त्रिकोण से पूरी हो जाती है? क्या सडक़ों सहित पूरे प्रदेश में राज करने वाली सरकार कुछ घंटों के भीतर पूरी जिम्मेदारी से हाथ धोकर उन हाथों से बाकी काम करने में लग सकती है? कहने के लिए तो जिस संरक्षित बैगा आदिवासी समुदाय के जो लोग मारे गए हैं, उन्हें विशेष दर्जा प्राप्त कहा जाता है, और इनमें से कुछ जातियां तो राष्ट्रपति की गोद ली हुई बताई जाती हैं। लेकिन इस जाति की डेढ़ दर्जन महिला मजदूरों की इस मौत पर राष्ट्रपति की श्रद्धांजलि से अधिक कोई ड्यूटी बनती है? क्या राष्ट्रपति देश में अलग-अलग जगहों पर अपने बेकसूर दत्तक पुत्र-पुत्रियों की बेवक्त की मौतों पर कुछ और भी जानकारी हासिल करना चाहेंगी जिससे कि इन जातियों के लोगों, और देश के बाकी नागरिकों की थोक-मौतों का सिलसिला कुछ धीमा हो सके? और यही बात प्रधानमंत्री पर भी लागू होती है कि क्या उनकी श्रद्धांजलि से देश की यह हकीकत बदल जा रही है कि गरीब और मजदूर इस देश में भेड़-बकरियों, गाय-भैंसों, और बोरियों की तरह लादकर ले जाए जाते हैं? 

हिन्दुस्तान की दिक्कत यह हो गई है कि इतने बड़े हादसे के बाद भी सरकार की जिम्मेदारी बस शोक, श्रद्धांजलि, और मदद पर खत्म हो जा रही है। यह बात किसी पेड़ के पत्तों पर दवा छिडक़ने जैसी है जिसकी कि जड़ों में ही कोई बीमारी लगी हुई है। हिन्दुस्तान में ऐसे सडक़ हादसों के पीछे एक बुनियादी खामी चली आ रही है जिससे जूझे बिना अगली कोई मौत थमने वाली नहीं है। आज इस देश में गांव-गांव तक गरीब और मजदूर मालवाहक गाडिय़ों पर सफर करते हैं, और इतने सारे खड़े हुए हिलते-डुलते लोगों की वजह से गाड़ी का संतुलन भी बिगड़ता है, और गाडिय़ां अमूमन बदहाल तो रहती ही हैं। नतीजा यही होता है कि जिस तरह किसी दूसरे मालवाहक के पलटने पर बक्से या बोरियां बिखर जाते हैं, उसी तरह कल आदिवासी मजदूरों के बदन बिखर गए, और जिंदगियां खत्म हो गईं। जब तक मालवाहक गाडिय़ों पर थोक में गरीबों का ढोना बंद नहीं होगा, ऐसी मौतें कैसे बंद हो सकती हैं? कहने के लिए यह बहाना बड़ा लोकप्रिय है कि जंगल और गांव में मुसाफिर गाडिय़ां मिलेंगी कहां से? लेकिन जब वहां मालवाहक गाडिय़ां मिल सकती हैं, तो अगर नियमों को सख्ती से लागू कराया गया रहता तो अब तक मुसाफिर गाडिय़ां भी चलन में आ चुकी रहतीं। मालवाहक गाडिय़ां भी तो किसी वक्त चलन में आईं, और उसके बाद बैलगाडिय़ां घटीं। लेकिन जब तक भ्रष्ट सरकारी अमला इंसानी जिंदगियों के लिए संवेदनाशून्य बने रहेगा, जब तक इस अमले को भेड़-बकरियों और इंसानों में कोई फर्क नहीं लगेगा, तब तक गरीबों की मौतें होती रहेंगीं। कल होना तो यह चाहिए था कि शोक, श्रद्धांजलि, और मदद-राहत से परे भी राज्य सरकार यह घोषणा करती कि वह हर सडक़ हादसे का अध्ययन करके उस तजुर्बे का इस्तेमाल करके आगे ऐसी मौतों को घटाने की कोशिश करेगी। लेकिन सरकार ने अपनी रस्म राहत पर खत्म कर दी। सरकारी खजाने से राहत दे देना आसान है, पूरे प्रदेश में सडक़ों और गाडिय़ों की बदअमनी-अराजकता को सुधार पाना बड़ा मुश्किल है, और आज तो सरकारों का जो हाल दिखता है, उसमें वह नामुमकिन सरीखा है। 

अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से छत्तीसगढ़ का ट्रांसपोर्ट विभाग राजनीतिक उगाही और इंतजामों का अड्डा बना हुआ है। यह हाल देश के अधिक दूसरे शहरों का भी है, और केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी बहुत बार सार्वजनिक मंचों से देश में आरटीओ के भ्रष्टाचार की बात कह चुके हैं। आज छत्तीसगढ़ में आदिवासी मुख्यमंत्री ही ट्रांसपोर्ट विभाग के मंत्री हैं, और कल बिना अपनी गलती के जो 19 मेहनतकश मजदूर बेवक्त मारे गए हैं, वे भी तमाम आदिवासी हैं। इस हादसे के बाद सरकार की तरफ से जो हुआ है उससे बहुत अधिक होने की जरूरत है, और सरकार को राज्य की सडक़ों पर रोजाना होने वाली अनगिनत मौतों को टालने के लिए गैरसरकारी अध्ययन करवाना चाहिए। सरकार का अपना पूरा ढांचा इस बुरी तरह भ्रष्ट और बेअसर हो चुका है कि वह राजधानी रायपुर में भी म्युनिसिपल की बड़ी-बड़ी फौलादी मशीनों में कचरा और मलबा उठाने वाले फौलादी हिस्से पर मजदूर महिलाओं को ढोकर आते-जाते देखते रहता है। किसी चौराहे पर पुलिस को यह नहीं सूझता कि जेसीबी नाम से पहचानी जाने वाली ऐसी मशीनों पर मजदूरों को सामने बिठाकर दौड़ती फौलादी गाडिय़ों को रोके जिसमें कि किसी भी टक्कर में सबसे पहले इन महिलाओं के पैर कटेंगे। 

दरअसल सरकार और समाज का सारा इंतजाम तथाकथित वीआईपी तबके की सहूलियतों तक सीमित हो गया है। सरकारी गाडिय़ों के काफिले बिना जरूरत भी दौड़ते रहते हैं, और जिन इंसानों की सेवा करने के नाम पर संविधान की शपथ लेकर ये नेता सत्ता पर आते हैं, वे इंसान पलटी हुई गाडिय़ों से जानवरों की तरह कुचलकर मरते रहते हैं। इस मामले में किसी जनहित याचिका को लेकर हाईकोर्ट तक दौड़ लगाने का भी कोई फायदा हमें नहीं दिखता क्योंकि बड़े जज सरकार के छोटे-छोटे अमले को उनका रोज का काम तो सिखाने आ नहीं सकते। प्रदेश की जनता भी अजीब किस्म की मुर्दा है कि डेढ़ दर्जन से अधिक इन आदिवासी लाशों के अंतिम संस्कार के पहले ही सरकार ने हाथ धो लिए हैं, और जनता इन करकमलों से आज कहीं उद्घाटन करवानेे में भी लग गई होगी। जो समाज अपने सबसे भयानक हादसों से भी कोई सबक नहीं लेता है, वह अगले हादसे की तरफ तेज रफ्तार से बढ़ते रहता है। कुछ हफ्तों या महीनों के भीतर ऐसा कोई और हादसा होगा, और उस वक्त हम इस संपादकीय में से कुछ शब्द फेरबदल करके फिर इसे पूरे का पूरा छापने के लायक रहेंगे। जो देश-प्रदेश अपने इंसानों को बोरियों और मलबे की तरह मालवाहक पर नियमित रूप से, और लगातार ढोता है, उसे अपने को सभ्य कहलाने का कोई हक नहीं है। 

(Daily Chhattisgarh)

साइबर जालसाजी रोकने भारत सीखे एप्पल से...

20 मई 2024

 

दुनिया में मोबाइल फोन के मामले में सबसे महंगी कंपनी, एप्पल ने अभी यह दावा किया है कि उसके एप्लीकेशन स्टोर पर जो धोखेबाज लोग अपने एप्लीकेशन डालने की कोशिश करते हैं, उनमें से 17 लाख एप्लीकेशन उसने रोक दिए, और इसकी वजह से एप्पल उपभोक्ता ठगी का शिकार होने से बच गए, और करीब 7 बिलियन अमरीकी डॉलर, यानी करीब 584 अरब रूपए डूबने से बचे। किसी कारोबारी कंपनी के दावों पर बहुत अधिक भरोसा नहीं करना चाहिए, लेकिन हम एप्पल की सामने रखी गई जानकारी बता रहे हैं कि कंपनी का कहना है कि उसने चोरी गए एक करोड़ चालीस लाख क्रेडिट कार्ड ब्लॉक कर दिए, और 33 लाख ऐसे अकाऊंट को रोक दिया जो कि इन कार्ड का इस्तेमाल कर रहे थे। एप्पल का दावा है कि 2023 में उसने चोरी गए 35 लाख क्रेडिट कार्ड से खरीददारी रोकी, और उसके सुरक्षा पैमाने बहुत ऊंचे रहने से उसके प्रोडक्ट इस्तेमाल करने वाले लोगों का बड़ा नुकसान बचता है। 

हम किसी एक कंपनी के ऐसे दावे पर गए बिना हिन्दुस्तान जैसे देश में देख रहे हैं जहां पर कि पिछले कुछ बरसों में मोदी सरकार ने डिजिटल लेन-देन को खूब आगे बढ़ाया है, और छोटे-छोटे कामों के लिए भी लोग मोबाइल फोन से भुगतान करने लगे हैं, और हम किसी का मखौल उड़ाने के लिए यह बात नहीं कह रहे, लेकिन कहीं-कहीं से ऐसी तस्वीरें भी आती हैं कि कुछ भिखारी भी अपने पास क्यूआर कोड लेकर बैठते हैं, ताकि लोग उन्हें डिजिटल भुगतान कर सकें। कई मंदिरों में भी शायद ऐसा ही इंतजाम किया गया है। ऐसे डिजिटल भुगतान में तो धोखाधड़ी और जालसाजी सुनाई नहीं पड़ता है, लेकिन मोबाइल फोन पर तरह-तरह के एप्लीकेशन, और बैंकों के कामकाज, आधार कार्ड से लेकर कुरियर कंपनी के भेजे जाने वाले ओटीपी तक, इतने तरह के डिजिटल काम लोगों के सामने आते हैं कि वे कभी नासमझी में, कभी हड़बड़ी में, तो कभी धोखा खाकर टेलीफोन पर ओटीपी मांगने वालों को फोन देखकर बता देते हैं, और मिनटों में उनके बैंक खाते खाली हो जाते हैं। यह सिलसिला भयानक इसलिए है कि मोबाइल फोन इस्तेमाल करने वाले बहुत से लोग इतने चौकन्ने और जानकार नहीं रहते कि वे हर ओटीपी की गंभीरता को समझ सकें। लेकिन जिनको हम बहुत जानकार मानते हैं ऐसे सरकारी अफसर, बैंक कर्मचारी भी इन दिनों वॉट्सऐप पर धड़ल्ले से चलने वाले धोखेबाज गोल्ड-इन्वेस्टमेंट ग्रुप से लेकर फेसबुक पर धोखेबाजों के इश्तहार तक कई चीजों के शिकार हो रहे हैं। इन दो के अलावा तरह-तरह के एप्लीकेशन कर्ज देने के नाम पर लोगों को फंसाते हैं, उनके मोबाइल फोन पर कब्जा कर लेते हैं, और फिर उनकी राज की बातें निकालकर उन्हें ब्लैकमेल करते हैं, खुदकुशी तक के लिए मजबूर करते हैं। भारत सरकार ने ऐसे कई चीनी लोन एप्लीकेशन ब्लॉक भी किए हैं, लेकिन सरकार जितने एप्लीकेशन ब्लॉक करती है, उससे अधिक गूगल प्ले स्टोर जैसी जगहों पर फिर आ जाते हैं, और लोगों को बहुत आसान कर्ज का झांसा देकर अपने जाल में फंसा लेते हैं। 

हम दुनिया की दो सबसे बड़ी कंपनियों की बात करें, तो एप्पल का आईफोन कोई भी नया एप्लीकेशन या सॉफ्टवेयर आसानी से डाऊनलोड भी नहीं करने देता, वह कई तरह की इजाजत मांगता है, कई तरह के पासवर्ड मांगता है, सावधान करता है, तब कहीं जाकर उस पर कोई एप्लीकेशन डाऊनलोड किया जा सकता है। नतीजा यह होता है कि धोखेबाज एप्लीकेशन डाऊनलोड करने के पहले लोगों को कुछ मिनट का वक्त लगाना पड़ता है, और इतनी देर में हो सकता है कि उन्हें सावधानी सूझ जाए। दूसरी तरफ एप्पल जैसी ही बड़ी कंपनी मेटा अपने फेसबुक और वॉट्सऐप पर ऐसी-ऐसी धोखेबाजी को बढ़ावा देती है जिन्हें देखकर बच्चे भी समझ जाएं कि यह जालसाजी है। फेसबुक पर तो अलग-अलग अखबारों के नाम से हिन्दुस्तान के कुछ सबसे बड़े कारोबारियों के फर्जी और गढ़े हुए इंटरव्यू दिखाकर, लोगों को क्रिप्टोकरेंसी और दूसरे पूंजीनिवेश की तरफ खींचा जाता है, और हमने खुद ने ऐसी जालसाजी पर बार-बार लिखा है कि यह फ्रॉड है, लेकिन फेसबुक इस धोखाधड़ी को स्पॉंसर्ड पोस्ट दिखाते हुए बनाए रखता है। मतलब यह कि इसके लिए वह भुगतान ले रहा है। हमारा ख्याल है कि हिन्दुस्तान के आईटी कानून के मुताबिक इसे लेकर फेसबुक और वॉट्सऐप को कटघरे में लाया जा सकता है कि वे जानते-समझते यह धोखाधड़ी जारी रख रहे हैं। 

हिन्दुस्तान में हर दिन दसियों हजार लोग साइबर-फ्रॉड का शिकार हो रहे हैं, और इतनी तो शिकायतें पुलिस के पास पहुंचती हैं, असलियत में तो इससे कई गुना ऐसे लोग होंगे जिन्हें अपने ठग लिए जाने का अहसास भी नहीं हुआ होगा, और वे पुलिस तक पहुंचे भी नहीं होंगे। आज भारत सरकार अपनी सारी तकनीकी क्षमता, और एकाधिकार के साथ भी अगर बहुत संगठित साइबर जालसाजी पर रोक नहीं लगा पा रही है, अगर वह महादेव ऐप जैसी सट्टेबाजी पर रोक नहीं लगा पा रही है, अगर वह फेसबुक और वॉट्सऐप को संगठित अपराध पर कार्रवाई न करने के लिए कटघरे में नहीं ला पा रही है, तो यह सरकार की लापरवाही के अलावा कुछ नहीं है। अमरीका और यूरोपीय समुदाय तो मेटा जैसी कंपनी को बच्चों पर बुरे असर की जिम्मेदार ठहराते हुए उसकी संसदीय जांच भी कर रहे हैं, और मेटा पर बड़े लंबे-चौड़े जुर्माने की तैयारी भी चल रही है। 

एप्पल का दावा अगर सही है, तो भारत सरकार को यह भी देखना चाहिए कि ऐसे कौन-कौन से धोखेबाज और जालसाज एप्लीकेशन हैं जो गूगल प्ले स्टोर जैसे दूसरे प्लेटफॉर्म पर काम कर रहे हैं, और हर दिन लोगों को लूट रहे हैं। सरकार को जालसाज और धोखेबाज कंपनियों, उनके कर्मचारियों के नंबर, इंटरनेट कनेक्शन, बैंक खाते, आधार कार्ड या पैनकार्ड जैसी शिनाख्त, इन सब पर बहुत रफ्तार से रोक लगानी चाहिए ताकि उनसे चलने वाले दूसरे जालसाज एप्लीकेशन भी पकड़ में आ सकें। आज जितनी सरकारी कार्रवाई सुनाई पड़ती है, और जितनी जालसाजी सामने आती है, उन दोनों को देखें तो ऐसा लगता है कि सरकार जालसाजों के सौ-पचास मील पीछे चल रही है। साइबर-क्राईम की दुनिया में पुलिस की लाठी वाली रफ्तार से काम नहीं चलेगा, पुलिस को मुजरिमों की रफ्तार और उनके तौर-तरीके समझकर उनके आगे-आगे भी चलना पड़ेगा, तभी आम जनता लुटने से बच पाएगी। भारत सरकार चाहे तो एप्पल जैसी कंपनी से यह समझ सकती है कि वह किन एप्लीकेशनों को किस आधार पर रोकती है, और उनमें से जो भारत में कानूनसम्मत लगें, उन्हें यहां पर एंड्रॉयड फोन के लिए भी रोका जा सकता है जिससे कि जालसाजी कम होगी।

(Daily Chhattisgarh)