अदालत से सीधे राज्यसभा या राजभवन का सफर बंद हो...

31 मई, 2023 

  

वकीलों के एक संगठन, बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है कि किसी भी रिटायर्ड जज को कार्यकाल खत्म होने के दो साल बाद तक किसी तरह की राजनीतिक नियुक्ति नहीं मिलनी चाहिए। यह याचिका कुछ मिसालों के साथ लगाई गई है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे हुए मोहम्मद हिदायतुल्ला ने रिटायरमेंट के दस साल बाद उपराष्ट्रपति बनना मंजूर किया, इसके पहले तक वे तमाम प्रस्तावों को मना करते रहे। वकीलों के संगठन ने कहा है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए ऐसी रोक लगाना जरूरी है क्योंकि अगर कम से कम से दो साल का ऐसा प्रतिबंध नहीं रहेगा तो कोई भी जज सरकारी ओहदे की चाह में सरकार की पसंद के फैसले देने से नहीं हिचकेंगे। यह पिटीशन ऐसे वक्त आई है जब एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई राममंदिर के फैसले के चार महीने बाद ही राज्यसभा भेज दिए गए, और इसी बेंच के एक दूसरे जज को रिटायर होने के एक माह बाद ही आंध्र का राज्यपाल बना दिया गया। ये दूसरे जज, जस्टिस एस अब्दुल नजीर नोटबंदी के खिलाफ दायर तमाम याचिकाओं को खारिज करने वाली बेंच में भी थे। मोदी सरकार ने इनके अलावा भी रिटायर्ड जजों को राज्यपाल बनाया और दूसरी जगह भेजा।

हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से हितों के ऐसे टकराव के खिलाफ लिखते चले आ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों ने अपने स्तर पर भी ऐसे इंतजाम कर रखे हैं कि देश के बहुत से संवैधानिक पदों पर, और कानूनी जरूरतों वाले दूसरे पदों पर रिटायर्ड जजों को ही रखा जा सकता है। ऐसे दर्जनों ओहदे हैं, और अधिकतर जज रिटायर होने के बाद भी इन कुर्सियों पर कानूनी जानकारी वाले कामों पर रखे जाते हैं। लेकिन उपराष्ट्रपति बनाना, राज्यपाल या राज्यसभा सदस्य बनाना इसके लिए किसी का रिटायर्ड जज होना जरूरी नहीं रहता, और ऐसे में जजों को इन जगहों पर लेकर आना एक खतरनाक सिलसिला है।

यह बात सिर्फ रिटायर्ड जजों पर लागू नहीं होती है। रिटायर्ड अफसरों पर भी लागू होती है जो कि अपने राज्यों में सरकार को खुश रखते हैं, और कार्यकाल पूरा होने के बाद वृद्धावस्था पुनर्वास की तरह कोई न कोई ओहदा पा जाते हैं, और भारी महत्व, भारी मेहनताने, और भारी सहूलियतों के कई साल गुजारते हैं। ऐसे अफसर अपनी नौकरी के आखिरी बरसों में सत्ता को खुश करने में लगे रहते हैं ताकि उन्हें रिटायर होते ही कोई न कोई काम मिले। कई अफसर तो सत्ता के ऐसे चहेते बन जाते हैं कि वे वृद्धावस्था पुनर्वास भी एक के बाद एक कई तरह के पाते रहते हैं। यह एक सीधे-सीधे लेनदेन का मामला रहता है, और हम इसका विरोध लंबे समय से कर रहे हैं। अगर प्रदेश के कुछ संवैधानिक ओहदों पर कुछ खास किस्म के तजुर्बे वाले रिटायर्ड जजों और अफसरों को रखना ही है, तो उन्हें दूसरे प्रदेशों से लाना चाहिए, न कि ठकुरसुहाती के फैसले देने वाले, काम करने वाले उसी प्रदेश के जजों और अफसरों को रखना चाहिए। इसके लिए जरूरत हो तो पूरे देश में एक टेलेंटपूल बनाया जा सकता है, और राज्य उसमें से बाहरी लोगों को छांट सकते हैं। आज सत्ता की मेहरबानी इस तरह हावी रहती है कि ऐसे ओहदों पर आने के बाद भी ये लोग सत्ता की पसंद के खिलाफ का कोई काम नहीं करते। हितों के टकराव का यह मामला भ्रष्ट आचरण से कम कुछ नहीं है। इस पर तुरंत रोक लगनी चाहिए। हम लगातार यह मांग उठाते रहे हैं, और अब जजों तक सीमित ऐसी एक याचिका वकीलों के संगठन ने लगाई है, जिसे जनहित में मंजूर किया जाना चाहिए।

बहुत किस्म की ऐसी सरकारी नौकरियां रहती हैं जिनमें रिटायर होने के कुछ बरस बाद तक कोई दूसरी नौकरी नहीं की जा सकती। यह तो एक सामान्य समझबूझ की बात है कि रिटायर्ड फौजी अगले ही दिन से किसी हथियार कंपनी की नौकरी करने लगे, तो उसमें एक सीधा खतरा यह रहेगा कि फौज में रहते हुए उसने इस कंपनी के लिए कारोबार की जगह बनाकर छोड़ी होगी। चूंकि न्यायपालिका एक अलग किस्म का सम्मान चाहती है, और अपने-आपको अवमानना के सामंती कानूनों के घेरे में महफूज भी रखती है, इसलिए उसे तो संदेहों से और भी परे रहना चाहिए। पूरे देश में हितों के टकराव पर एक व्यापक फैसला आना चाहिए जो कि जजों और अफसरों पर बराबरी से लागू होता हो, और सार्वजनिक जीवन से भ्रष्ट आचरण और संदेह दोनों को खत्म कर सके।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 30 मई 2023


 (Daily Chhattisgarh)

प्रेम-संबंधों में लगभग हमेशा हिंसा की शिकार महिला ही क्यों होती है?

30 मई, 2023 

  

दिल्ली में अभी एक बस्ती की गली में लोगों की आवाजाही के बीच एक नौजवान ने नाबालिग दोस्त लडक़ी की जिस तरह चाकू भोंक-भोंककर हत्या कर दी, उसका सीसीटीवी वीडियो बहुत भयानक है। अपनी प्रेमिका को इस अंदाज में मारना, और मारते ही चले जाना, और चाकुओं के वार से परे बड़ा सा पत्थर उठाकर उसके सिर पर और पटक देना हिंसा के दर्जे को बताता है। लेकिन अपनी प्रेमिका के लिए यह नौजवान जितना हिंसक था, उतने ही बेअसर अगल-बगल खड़े हुए लोग, बगल से गुजर रहे लोग भी थे। इस तरह की हिंसा हो रही थी कि बदन से चाकू निकाल-निकालकर यह लडक़ा वापिस घोंप रहा था, और दो-चार फीट की दूरी से लोग गुजर रहे थे, खड़े होकर देख रहे थे, और दूर हट जा रहे थे। जाहिर है कि उस जगह पर बड़े-बड़े कई पत्थर पड़े थे, और नहीं तो कम से कम कोई पत्थर उठाकर इस हत्यारे को मार सकता था, जख्मी कर सकता था, लेकिन एक भी व्यक्ति ने यह जहमत नहीं उठाई। यह देश की राजधानी दिल्ली में दिनदहाड़े खुली सडक़ का हाल है तो दूरदराज देश में दूसरी जगहों पर कानून के राज और लोगों की सामाजिक जवाबदेही का क्या हाल होगा यह अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है। एक सिरफिरे और हिंसक नौजवान की प्रेम में निराशा से उपजी हिंसा तो समझ में आती है, लेकिन ऐसी हिंसा के गवाह बने हुए बाकी लोगों की उदासीनता समझ नहीं आती है। आबादी का ऐसा ही हिस्सा मोहब्बत के खिलाफ झंडे-डंडे लेकर वेलेंटाइन डे पर निकल पड़ता है, बाग-बगीचों में लडक़े-लड़कियों को पकडक़र पीटने लगता है, उन्हें धमकी देने लगता है, और राखी बंधवाने लगता है, लेकिन जब उनकी आंखों के सामने, कुछ फीट दूरी पर इतने भयानक तरीके से कत्ल होते रहता है, तो किसी की सामाजिक जागरूकता जागती नहीं रहती है, वह मौके से हट जाने में ही अपनी हिफाजत देखती है। समाज नाम की यह व्यवस्था एकदम से गायब हो जाती है, और एक कमउम्र लडक़ी को एक हिंसक हत्यारे के हाथ अकेले छोड़ देती है। 

अब इस घटना के कुछ दूसरे पहलुओं पर भी सोचना जरूरी है। हत्यारा लडक़ा 20 बरस का एक मुसलमान मैकेनिक है, और लडक़ी 16 बरस की एक हिन्दू राजमिस्त्री की बेटी है जो पढ़-लिखकर वकील बनना चाहती थी। लडक़ी के परिवार का कहना है कि उन्हें इस प्रेम-संबंध के बारे में कुछ नहीं मालूम था। लडक़े ने बयान दिया है कि लडक़ी दो साल से उसके साथ प्रेम में थी, और अब उसे छोडक़र अपने पुराने प्रेमी के पास लौटना चाहती थी, इसलिए उसने उसे मार डाला, और उसे इसका कोई अफसोस भी नहीं है। अब सोचने की बहुत सारी बातों में एक यह भी है कि अगर 14 बरस की उम्र के पहले भी इस लडक़ी का कोई प्रेमी था, तो परिवार और समाज ने लड़कियों को प्रेम-संबंधों में जिम्मेदारी रखने की सीख नहीं दी थी। दूसरी बात यह भी है कि इस उम्र के प्रेम-संबंध न धर्म देखते न जाति देखते, न खानपान देखते। लेकिन अगर प्रेम-संबंधों को आगे बढक़र शादी में तब्दील होना है, तो उस वक्त ये सारी बातें मायने रखती हैं। धर्म और जाति के साथ पारिवारिक रहन-सहन, रीति-रिवाज, और संस्कार जुड़े रहते हैं, खानपान जुड़े रहता है, उस धर्म या जाति से जुड़े हुए कानून जुड़े रहते हैं। बात सिर्फ हिन्दू और मुस्लिम धर्मों की नहीं है, हिन्दू धर्म के भीतर भी अलग-अलग जातियों के अलग-अलग कानूनी दर्जे हैं, और ऐसे प्रेम-संबंधों में कई बार उनसे जुड़े हुए कानूनों का भी इस्तेमाल होता है। लडक़े-लड़कियां इस देश में प्रेम और देह-संबंध की उम्र और हालत में पहुंच जाते हैं, लेकिन वे दिमागी रूप से इसके लिए तैयार नहीं किए जाते कि ऐसी नौबत में उन्हें कैसी समझ का इस्तेमाल करना चाहिए। न सिर्फ देह-संबंधों में, बल्कि भावनाओं के मामले में भी, और भविष्य के लिए फैसले लेने में भी उन्हें तैयार नहीं किया जाता। न मां-बाप कुछ सिखाते, और न ही स्कूल-कॉलेज में इसकी कोई गुंजाइश रहती। इन सबसे परे जो सीख बाजार में मौजूद रहती है, वह बहुत ही घटिया किस्म की रहती है। सेक्स शिक्षा के नाम पर पोर्नो, प्रेम के नाम पर सतही कहानियां, और भविष्य के नाम पर पूरी तरह अनजान नौबत रहती है। 

दूसरी तरफ ऐसी हिंसा में लडक़ों के दिमाग में अपने बचपन से छाई हुई एक मर्दानगी रहती है जो कि घर पर मां और बहन को दूसरे दर्जे की नागरिक की तरह देखते हुए पनपी रहती है। जब घर की महिलाओं को कभी बराबरी का दर्जा मिलते नहीं दिखता, तब मर्दानगी की यही सोच इन लडक़ों के दिमाग में गहरे पैठ जाती है, और हिंसा की तरफ ले जाती है। वे किसी लडक़ी या महिला से ना सुनने के आदी नहीं रहते, और ऐसी नौबत आने पर वे तेजी से हिंसक हो जाते हैं। उन्हें अपने तौर-तरीके कुछ नहीं लगते, लेकिन वे लडक़ी या महिला से वफादारी की हर उम्मीद रखते हैं, उनसे एक गुलाम की तरह रहने की उम्मीद भी करते हैं। इसलिए जगह-जगह होने वाली हिंसा में अधिकतर ऐसी रहती हैं जिनमें हिन्दुस्तानी मर्द या लडक़े ही औरत या लडक़ी पर ज्यादती करते दिखते हैं। 

हिन्दुस्तान में औरत-मर्द के बीच सामाजिक दर्जे में इतनी गहरी और चौड़ी खाई खुदी हुई है कि छोटे-छोटे लडक़े भी लड़कियों को बराबरी देने के बारे में नहीं सोच पाते, और संसद चलाने वाले बड़े-बड़े बुजुर्ग नेता तो कभी भी महिला आरक्षण के बारे में सोचना नहीं चाहते। देश की पूरी सोच मर्दानगी की शिकार है, मर्द इस सोच के शिकार हैं, और महिलाएं इसकी हिंसा की शिकार हैं। आज लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अधिकतर हिंसक जुर्म रोके जाने लायक इसलिए नहीं हैं कि देश की मानसिकता को रातों-रात बदलना मुमकिन नहीं है। और रातों-रात की बात क्यों करें, इसे बदलने के बारे में सोचा भी नहीं जा रहा है। कुछ महिला संगठन, और कुछ राजनीतिक चेतनासंपन्न लोग जरूर महिलाओं के हक की बात करते हैं, लेकिन असल जमीन पर इसका कोई असर नहीं दिखता है। यह हिंसा बर्ताव में तो बहुत बाद में आती है, लेकिन औरत-मर्द की गैरबराबरी की शक्ल में वह बचपन से ही दिमाग में बैठी रहती है, और इस हिंसा का खात्मा उस उम्र से ही सोच बदलने से ही हो सकता है। 

(Daily Chhattisgarh)

इस युग में भी बनाया गया काले गुलाम खरीद-बिक्री का वीडियो गेम! अब रोक

  29 मई, 2023 

  

ब्राजील में महीने भर से एक वीडियो गेम चल रहा था जो 17वीं सदी में वहां प्रचलित गुलाम प्रथा पर बना हुआ था। गूगल प्ले पर मौजूद यह गेम स्लेवरी-सिमुलेटर नाम का था जो खेलने वालों को यह छूट देता था कि वे खेल में गुलाम खरीदें, बेचें, उनको सजा दें, या उनके साथ सेक्स करें। यह खिलाडिय़ों को दो में से एक रास्ता चुनने का मौका देता था कि वे या तो गुलामी को खत्म करने वाले बनें, या फिर पैसे वाले, गुलामों के मालिक बनें। इसके खिलाफ चारों तरफ से शिकायतें हुई थीं और लोगों ने कहा था कि यह उस देश में अकल्पनीय है जहां पर कि रंगभेद एक जुर्म है, और जो देश गुलामी के जख्मों से गुजरा है वहां पर कोई डिजिटल प्लेटफार्म इस तरह का भयानक हिंसक और अमानवीय खेल बना सकता है! वहां की संसद में बहस के दौरान एक सांसद ने कहा कि नौजवान और किशोर ही आमतौर पर खेल खेलते हैं, और उनके बीच गुलामी की हिंसा पर आधारित ऐसे खेल को रखने की बात सोची भी कैसे गई होगी? गूगल के खिलाफ यह शिकायत भी हुई कि उसने ब्राजील के एक कानून को तोड़ा है जो कि किसी भी तरह के रंगभेद के खिलाफ है, और यह खेल काले गुलामों को खरीदने-बेचने और उन्हें सेक्स जैसी कई किस्म की सजा देने का खेल था। इस सांसद ने सरकारी एजेंसियों को इस बात की जांच करने के लिए भी कहा है कि गूगल प्ले पर जिन लोगों ने इस गेम के रिव्यू में लिखा है कि वे असल जिंदगी में भी ऐसा करना चाहेंगे, उन लोगों की जांच होनी चाहिए। एक व्यक्ति ने तो यह तक लिखा था कि यह वक्त गुजारने के लिए शानदार खेल है, लेकिन इसमें और अधिक प्रताडऩा देने के विकल्प जोडऩे चाहिए, जैसे किसी गुलाम को कोड़ों से मारना। ब्राजील की सरकार ने इस गेम की जांच शुरू कर दी है, लेकिन इसे हटाए जाने के पहले तक इसे हजारों लोग डाउनलोड कर चुके थे। यह खेल खिलाडिय़ों को सुरक्षा कर्मचारी रखकर गुलामों को भागने से रोकने का विकल्प भी देता था। इसमें गुलामों के मालिक गोरे दिखाए गए थे, और काले गुलामों को सलाखों के पीछे या जंजीरों में कैद दिखाया गया था। 

दुनिया की बड़ी-बड़ी डिजिटल कंपनियों पर विकसित देशों की सरकारें और संसद अपने कामकाज को सुधारने के लिए, उन पर से हिंसा और नफरत को दूर करने के लिए तरह-तरह के प्रतिबंध लगा रही हैं, फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग को अमरीकी संसद की सुनवाई में कई बार पेश होना पड़ा है, और सांसदों ने उनसे यह साफ कर दिया है कि फेसबुक से आपत्तिजनक सामग्री हटाने के लिए वो जो कर रहे हैं, वह काफी नहीं है। दुनिया के अलग-अलग देशों में अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जुर्माने लग रहे हैं, और गूगल या माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों को बहुत सी जगहों पर तरह-तरह के प्रतिबंध झेलने पड़ रहे हैं। लेकिन अधिक जागरूक सरकारों का यह मानना है कि ये कंपनियां मुनाफा कमाने में इतनी डूबी हुई हैं कि ये अपने प्लेटफॉर्म से नफरत और हिंसा, झूठ और धमकियों को हटाने के लिए पर्याप्त कोशिशें नहीं कर रही हैं। हिन्दुस्तान में तो हम रात-दिन यही देखते हैं कि फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर बेकाबू हिंसा बेकसूरों के खिलाफ अभियान चलाती रहती है, और ऐसे हिंसक लोगों पर कोई रोक-टोक नहीं है। हिन्दुस्तान का आईटी कानून वैसे तो जरूरत से अधिक मजबूत है, लेकिन सरकारें इसका इस्तेमाल अपनी राजनीतिक सोच के मुताबित करती हैं, और सरकार को नापसंद लोगों के खिलाफ हिंसा का सैलाब भी अनदेखा किया जाता है, और बेकसूर लोगों को किस तरह प्रताडि़त किया जाता है यह अभी-अभी ऑल्टन्यूज के मोहम्मद जुबैर के केस में दिल्ली हाईकोर्ट के जज ने साफ किया है। 

लेकिन आज 21वीं सदी में अगर दुनिया की कोई गेम कंपनी ऐसा गेम बनाने का सोचती भी है जो गुलामों को खरीदने-बेचने और उनसे हिंसा करने, उनसे सेक्स करने, उन्हें प्रताडि़त करने का खेल है, तो इस पर महज प्रतिबंध लगाना काफी नहीं है बल्कि ऐसी कंपनी पर अंतरराष्ट्रीय अदालतों में मुकदमा भी चलना चाहिए, और उनका दीवाला निकल जाने की हद तक उन पर जुर्माना भी लगना चाहिए। 20-25 बरस पहले तक दुनिया की सबसे मशहूर ईमेल वाली कंपनियों ने अपने प्लेटफॉर्म पर ऐसे चैटरूम को भी धड़ल्ले से छूट दे रखी थी जो बच्चों से सेक्स की चर्चा करते थे, उसे बढ़ावा देते थे, और एक-दूसरे के लिए उसका इंतजाम करते थे। यह अधिक पुरानी बात नहीं है, एक चौथाई सदी के भीतर की ही है, लेकिन दुनिया के लोगों ने तेजी से उसका विरोध किया, तो आज इस तरह की हिम्मत कोई कर नहीं सकते हैं। 

लेकिन इस बात को भी समझने की जरूरत है कि रंगभेद और जातिभेद जिन देशों और समाजों में जुर्म है, वहां भी वह मौजूद तो है ही। अभी अमरीका और कनाडा में एक-एक करके अलग-अलग शहरों में, शिक्षा-बोर्ड में ऐसे कानून बनते जा रहे हैं जो कि जातिभेद को जुर्म करार दे रहे हैं। इसकी शुरूआत अमरीका में बसे हुए दलितों को बचाने के लिए की गई जो कि वहां बसे हुए गैरदलित, सवर्ण हिन्दुओं के हाथों जातिभेद के शिकार हैं। अमरीका जाने के बाद भी लोगों को हिन्दुस्तान की जाति व्यवस्था भुलाए नहीं भूल रही है, और अब वहां दलित आंदोलनकारी जगह-जगह इसकी पहल कर रहे हैं, और जाति व्यवस्था की हिंसा को जानकर, समझकर अमरीका और कनाडा के लोग इसके खिलाफ कानून बनाते जा रहे हैं। जाति व्यवस्था एक किस्म से रंगभेद भी है, और एक किस्म से वह गुलामी प्रथा का विस्तार भी है। हिन्दुस्तान में जिन लोगों को यह लगता है कि जाति व्यवस्था खत्म हो गई है, उन्हें अमरीका में हिन्दुस्तानियों के बीच हकीकत देखनी चाहिए कि वे खुद तो गोरे अमरीकियों के बीच पूरे हक का दावा रखते हैं, लेकिन यहां से गए हुए नीची समझी जाने वाली जातियों के लोगों के साथ भेदभाव करते हैं। अब वहां का कड़ा कानून हिन्दुस्तानी जाति व्यवस्था को भी खत्म करेगा। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 मई 2023

(Daily Chhattisgarh)

 

बिना नशा किए क्या किसी को इस लोकतंत्र के बेहतर होने पर भरोसा हो सकता है?

 28 मई, 2023 

  

हिन्दुस्तान के सुप्रीम कोर्ट और अलग-अलग राज्यों के हाईकोर्ट में चल रहे मामलों को देखें तो उनका एक बड़ा हिस्सा सरकारों के ही खिलाफ है। बहुत से मामले तो ऐसे हैं जो इस लोकतंत्र में सरकारों को तानाशाह के अंदाज में काम करने वाला बताते हैं। कल ही इस अखबार के यूट्यब चैनल पर एक वीडियो में हमने यह सवाल उठाया था कि किस तरह एक फैक्टचेकर मोहम्मद जुबैर को दिल्ली की पुलिस एक फर्जी मामले में फंसाते रही, और दिल्ली हाईकोर्ट ने जब पुलिस को घेर लिया कि उसके पास जुबैर के खिलाफ कोई केस ही नहीं है, तो पुलिस ने यह मामला खत्म करने की अपील की। हाईकोर्ट ने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि नफरत की बातें करने वालों के खिलाफ खुद होकर केस दर्ज करना पुलिस का खुद का काम है, इसके लिए उसे किसी शिकायत का इंतजार नहीं करना है, और अगर ऐसे मामले दर्ज नहीं किए गए तो इसे सुप्रीम कोर्ट की अवमानना माना जाएगा। इसके बाद भी देश में कहीं पुलिस को नफरत के खिलाफ जुर्म दर्ज करने की कोई हड़बड़ी नहीं है। बल्कि कई प्रदेशों में, और केन्द्र सरकार के मातहत दिल्ली में पुलिस नफरत फैलाने वालों के साथ खड़ी दिख रही है, और नफरत के खिलाफ लड़ रहे लोगों को देशद्रोही बताकर जेल भेजने में उसकी हड़बड़ी देखने लायक है। जो लोकतंत्र सरकारों को तकरीबन बेहद हक देता है, वे सरकारें उन हकों का तकरीबन बेजा इस्तेमाल करने की हड़बड़ी में दिखती हैं। सरकारों के खिलाफ अदालतों में चल रहे मुकदमों को देखें तो यह समझ नहीं पड़ता कि वे जनता के लिए सरकार चला रहे हैं, या जनता के खिलाफ। 

ऐसा लोकतंत्र जिसके तीन हिस्सों में से सबसे अधिक असर और इस्तेमाल वाली सरकार गलत काम करने में जुटी हो, जनता का खजाना लूटने में जुटी हो, अपने ही ईमानदार कर्मचारियों के खिलाफ ज्यादती करने में लगी हो, अपने भ्रष्ट और दुष्ट लोगों को बचाने में लगी हो, वैसी सरकारों को लोकतंत्र के तहत मिले गए हक देने का क्या फायदा? एक तरफ तो ये सरकारें जनकल्याणकारी और धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और जवाबदेह होने का ढकोसला भी करती हैं, और दूसरी तरफ उनका बर्ताव इसके ठीक खिलाफ रहता है। अगर सरकारों के कुकर्मों से अदालतें लदी हुई न रहें, तो लोगों के बाकी मामले-मुकदमे जल्दी निपट सकेंगे। किसी भी लोकतंत्र में अदालती ढांचा इतना बड़ा और इतना मजबूत तो बनाया नहीं जा सकता कि वह सरकार के ही गलत कामों से निपटने में थककर चूर हो जाए। 

जिस तरह किसी मामूली जुर्म के मुकदमे में कटघरे में खड़े हुए छोटे से मुजरिम का छोटा सा वकील बड़े-बड़े तर्क देकर अपने मुवक्किल के खिलाफ मुकदमे को गलत साबित करने में लगे रहता है, यह साबित करता है कि उसके मुवक्किल की उंगलियों में खुजली हो रही थी, इसलिए उसने सामने वाले की जेब में उंगलियां डाल दी थीं, कुछ उसी तरह जब देश-प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी वकील अपनी सरकार के लिए बहस करते दिखते हैं तो दिल शर्म से भर जाता है कि क्या ऐसे ही लोकतंत्र के लिए इन सरकारों को चुना गया था? बड़ी-बड़ी सरकारें अपने नामी-गिरामी मुखिया के साथ जिस तरह कटघरे में खड़े होकर अपने जुर्म छुपाने के लिए तरह-तरह के खोखले तर्क सामने रखती हैं, वे शर्मनाक रहते हैं, लेकिन यह आए दिन की बात हो गई है। दरअसल संविधान बनाने वाले लोगों ने बहुत से प्रावधान बनाते समय यह सोचा भी नहीं था कि एक दिन सरकारें मुजरिम चलाएंगे। वे गौरवशाली लोकतंत्र के दिन थे जब संविधान सभा में भविष्य के संविधान पर चर्चा हुई थी। अब उसमें से कुछ भी बाकी नहीं रह गया है, न लोगों में गरिमा रह गई है, न परंपराओं का कोई सम्मान रह गया है, और न ही अगली पीढ़ी के लिए एक इज्जतदार लोकतंत्र छोडक़र जाने की जिम्मेदारी का अहसास रह गया है। 

दिक्कत यह भी है कि हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में एक बेहतर कल आने की गुंजाइश नहीं रह गई है, क्योंकि न तो पार्टियां बेहतर बनते दिख रहीं, न ही उन पार्टियों में बेहतर नेताओं के आने की संभावना दिख रही है। सैद्धांतिक रूप से जो पार्टियां ईमानदार दिखती हैं, वे निर्वाचित लोकतंत्र में हाशिए पर जा चुकी हैं। जो पार्टियां हर किस्म के साम्प्रदायिक और जाति आधारित समझौते करने पर आमादा हैं, जिनके पास चुनाव लडऩे के लिए भ्रष्टाचार की अपार दौलत है, उन्हीं पार्टियों का भविष्य दिख रहा है। कुल मिलाकर देश और प्रदेशों में राजनीति लोकतंत्र से पर्याप्त परे जा चुकी दिख रही है। कुछ लोग कमसमझ हैं, उन्हें यह लग सकता है कि हर पांच बरस में होने वाले चुनाव किसी किस्म का लोकतंत्र हैं। हिन्दुस्तानी चुनाव अब सबसे अधिक खर्च करने वाले, सबसे अधिक समझौते करने वाले, सबसे अधिक धार्मिक उन्माद बढ़ाने वाले दलों का खेल रह गया है, जिसकी चर्चा करने के लिए लोकतंत्र जैसे शब्द को बदनाम नहीं करना चाहिए। यह लोकतंत्र फिलहाल पटरी से इंजन और तमाम डिब्बों सहित उतरा हुआ दिख रहा है। अब यह कब वापिस पटरी पर आ सकेगा, कब पटरियों की उतनी मरम्मत हो सकेगी, यह कल्पना करना आज आसान नहीं है। बिना कोई नशा किए हुए जिन लोगों को आज इस लोकतंत्र के भविष्य को लेकर भरोसा है, उन्हें देखकर हमें रश्क भर होता है। 

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 28 मई 2023


 (Daily Chhattisgarh)

नौकरियां पाने में बड़ा भ्रष्टाचार तो है, लेकिन सब कुछ अंधेरा नहीं है..

 27 मई, 2023 

  

जिस वक्त अलग-अलग कई राज्यों में सरकारी नौकरियों के लिए इम्तिहान करने वाले राज्य के लोकसेवा आयोग या दूसरे संस्थान तरह-तरह के भ्रष्टाचार में उलझे हुए दिखते हैं, केन्द्र सरकार के मातहत काम करने वाली संस्था यूपीएससी ऐसे विवादों से परे दिखती है। सत्तारूढ़ पार्टी कोई भी रहे, देश के लिए सबसे ऊंचे अफसर छांटने वाली संघ लोकसेवा आयोग का काम ठीक चलते रहता है। इसलिए अभी जब यूपीएससी के नतीजों ने दिल्ली पुलिस के हवलदार रामभजन को चुना है, तो यह इस इम्तिहान की आम साख के मुताबिक ही बात है। रामभजन एक गरीब मजदूर परिवार से आए हैं, और खुद भी मजदूरी करते थे। राजस्थान से आकर दिल्ली पुलिस में नौकरी मिली, उन्होंने एक दूसरे पुलिस अफसर को देखा जो पहले दिल्ली पुलिस में सिपाही थे, और फिर यूपीएससी पास करके आईपीएस बने, तब से वे लगातार यूपीएससी की तैयारी कर रहे थे। उनकी जिंदगी की इस असल कहानी पे हम यहां इसलिए लिख रहे हैं कि अगर नौकरियां और कॉलेजों में दाखिला देने वाले इम्तिहानों में ईमानदारी हो, तो कुछ ऐसे गरीब लोगों को भी मौका मिल सकता है। रामभजन की कहानी गांव के सरकारी स्कूल से शुरू, और फिर 12वीं के बाद पुलिस सिपाही बनने की है। नौकरी करते हुए ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन, रोज ड्यूटी के बाद सात-आठ घंटे यूपीएससी की तैयारी, और इम्तिहान के एक महीने पहले छुट्टी लेकर पूरे वक्त तैयारी। कई बार की कोशिशों के बाद उन्हें यह कामयाबी मिली है। 

अब सरकारी नौकरी के लिए छांटने वाले संस्थानों की बात अलग है, हम लोगों के सपनों के बारे में भी लिखना चाहते हैं। भ्रष्ट व्यवस्था को तो लोग बदल नहीं सकते, लेकिन उनके बीच ही जहां-जहां गुंजाइश निकल सकती है, उसके लिए तैयारी और कोशिश जरूर कर सकते हैं। हर बरस यूपीएससी और कई राज्यों के इम्तिहानों की खबरें आती हैं कि किस तरह किसी ऑटोरिक्शा ड्राइवर की बेटी ने कामयाबी पाई, या किसी मजदूर के बेटे ने। जिन लोगों को यह लगता है कि सब कुछ भ्रष्ट है, सब कुछ बिका हुआ है, ईमानदार मेहनत से कुछ भी हासिल नहीं हो सकता, उन्हें यह भी देखना चाहिए कि भ्रष्ट व्यवस्था के भीतर भी छोटी-मोटी ऐसी संभावना शायद हर जगह बची ही रहती है। और इन संभावनाओं तक वही गरीब पहुंच पाते हैं जो जमकर मेहनत करते हैं। जिन लोगों को यह लगता है कि भ्रष्ट व्यवस्था में मेहनत बेकार है, उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि जब तक वोटों के बहुमत से ऐसी सरकार न आए जो कि भ्रष्टाचार को खत्म करे, तब तक अपनी मेहनत और अपनी कोशिश के अलावा और कोई रास्ता तो है नहीं। एक भ्रष्ट परीक्षा या प्रतियोगिता तंत्र के भीतर मेहनत करते हुए भी लोग चाहे वहां कामयाबी न पा सकें, लेकिन अपने आपको तो मांज ही सकते हैं, अपने को पहले से बेहतर बना सकते हैं, और जिंदगी के दूसरे गैरसरकारी मुकाबलों के लिए भी तैयार कर सकते हैं। पाया हुआ ज्ञान, सीखा हुआ हुनर, और हासिल की हुई समझ कहीं नहीं जाते, किसी न किसी वक्त वे काम आते हैं, और उसी को ध्यान में रखते हुए लोगों को अपनी तैयारी तो जारी रखनी ही चाहिए, फिर चाहे वे भ्रष्ट तंत्र के भीतर कुछ पा सकें या नहीं। 

दूसरी बात यह भी है कि सरकारी नौकरियां बहुत बुरी तरह से घटती चल रही हैं। केन्द्र सरकार हर सार्वजनिक प्रतिष्ठान को बेचने के फेर में हैं, और उसके बाद तो नौकरियां सिर्फ निजी कंपनियों के हाथ रह जाएंगी, सरकार का अपना आकार घट जाएगा। इसलिए घटती हुई नौकरियों और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से अधिक उम्मीद नहीं रखनी चाहिए, लोगों को अपने आपको अधिक काबिल, अधिक बेहतर बनाना चाहिए, और यह मानकर चलना चाहिए कि इम्तिहानों से परे ऐसे इंटरव्यू का सामना भी करना पड़ सकता है जहां पर उनका व्यक्तित्व भी काम आ सकता है, भाषा, बोलने का लहजा, सामान्य ज्ञान, और सहज-समझ सबकी कीमत हो सकती है। हिन्दुस्तान में आज दिक्कत यह लगती है कि बेरोजगार इतने हताश हैं, और सरकारी नौकरी के लिए रिश्वत का इंतजाम करते लगे रहते हैं कि वे सही तैयारी नहीं करते। लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि सरकारी नौकरियों से परे निजी क्षेत्र में न तो उस तरह की रिश्वत चलती, न ही सलेक्शन में वैसा भ्रष्टाचार रहता। इसलिए असल तैयारी रिश्वत के बाद भी सरकारी नौकरी पाने में मदद कर सकती है, और बिना रिश्वत के निजी नौकरी पाने में भी। 

जिस मिसाल से हमने आज की यह बात शुरू की है उस पर लौटें, तो एक तकरीबन अनपढ़ मजदूर परिवार से निकलकर रामभजन 12वीं के बाद से दिल्ली पुलिस की मुश्किल नौकरी भी कर रहा है, और इम्तिहान की तैयारी भी। अपने ही दम पर, बिना किसी महंगी कोचिंग के, वो यहां तक पहुंचा, साथ-साथ 8वीं के बाद पढ़ाई छोड़ चुकी पत्नी की भी पढ़ाई शुरू करवाई, और गांव के स्कूल में उसका जाना शुरू करवाया। यह पूरा मामला उन तमाम लोगों के लिए एक बहुत बड़ी मिसाल है जो लोग मेहनत न करने के हजार किस्म के बहाने तलाशकर बैठे रहते हैं। बहुत से लोगों को बेहतर सहूलियते हासिल रहती हैं, और उन्हें यह भी देखना चाहिए कि वंचित तबके का एक लडक़ा किस तरह की अभावग्रस्त जिंदगी में कामयाबी हासिल करता है। आज इस मुद्दे पर लिखना सिर्फ इसीलिए है कि चारों तरफ भ्रष्टाचार का अंधेरा दिखता है, लेकिन ऐसी ही अंधेरी सुरंग के आखिर में इस किस्म की एक रौशन मिसाल भी दिखती है जिसे देखकर हर किसी को मेहनत करनी चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

 

हजारों जोड़े, लाखों मेहमान ऐसी शादी सीखने लायक...

 26 मई, 2023 

  

राजस्थान में होने जा रहे एक सामूहिक विवाह की दावत के इंतजाम की खबर आई है, इसमें पांच लाख मेहमानों के आने का अंदाज है, और हजार रसोईये सात दिनों से पकवान बनाने में लगे हैं, समारोह स्थल पर ट्रैक्टरों से खाना सप्लाई होगा, और गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड्स वाले इस रिकॉर्ड को दर्ज करने के लिए डेरा डाले हुए हैं। इसमें 22 सौ जोड़ों की शादी होने जा रही है, जिनमें 111 जोड़े मुस्लिम हैं, और बाकी हिन्दू समाज की अलग-अलग जातियों के हैं। एक सामाजिक संस्था इसे करीब सौ करोड़ रूपये की लागत से करवा रही है। 

इस खबर पर आज लिखने की जरूरत कुछ अलग-अलग वजहों से लगती है, पहली बात तो यह कि न सिर्फ अलग-अलग जातियों के जोड़ों की शादी एक साथ हो रही है, बल्कि हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मों के लोग भी इसमें शामिल हैं। हर जोड़े पर औसत करीब डेढ़ लाख रूपये खर्च होने का अंदाज है जो कि आज किसी भी आम शादी के खर्च से कम ही है। इसलिए इसे बहुत खर्चीला आयोजन नहीं कहा जा सकता क्योंकि गरीबों में भी कुछ खर्च तो होता ही है। इसमें एक दिलचस्प बात यह भी है कि समाज से सौ करोड़ रूपये का यह खर्च निकल रहा है, और किसी धार्मिक आयोजन के बिना, एक सामाजिक मकसद से लोग पैसे दे रहे हैं। भारत में धर्म और आध्यात्म के नाम पर तो लोगों की जेब से पैसे निकल जाते हैं, लेकिन अन्य किसी किस्म की मदद के लिए कम निकलते हैं। इसलिए सामूहिक विवाह जो कि इस किस्म से धर्म और जातियों को एक साथ जगह दे रहा है, गरीबों को भी धूमधाम से शादी का एक मौका दे रहा है, और जिस तरह 22 सौ जोड़ों पर पांच लाख मेहमानों का अंदाज है, तो हर जोड़े के पीछे दो सौ मेहमानों को जगह मिलने वाली है, और यह धूमधाम से हो रही शादी दिखती है। फिर यह भी है कि बिना खर्च, बराबरी से, और विश्व रिकॉर्ड बनाने वाली ये शादियां मामूली या गरीब आय वर्ग के लोगों को हमेशा याद भी रहेंगी। 

यह मुद्दा केवल इसी एक वजह से लिखने के लिए काफी नहीं है इसलिए इसके कुछ दूसरे पहलुओं पर भी कुछ अलग बातें लिखनी हैं। एक तो यह कि अलग-अलग शादियों में साधन और सुविधाओं की इतनी बर्बादी होती है, फिजूलखर्ची होती है, हर किसी को असुविधा होती है, इसलिए भी सामूहिक विवाहों का चलन बढऩा चाहिए। यह एक अलग बात है कि शादियों में जिसे हम फिजूलखर्ची कह रहे हैं, वह करोड़ों लोगों के लिए रोजगार भी है, अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा भी है, लेकिन राजस्थान की इस मिसाल को देखकर, या हमारी सलाह को पढक़र रातों-रात तो शादियां खत्म होनी नहीं हैं, और न ही इससे जुड़े कारोबार खत्म होने हैं। अपने से अधिक संपन्नता वाले समाज की देखादेखी लोगों के बीच शादियों पर अपनी औकात से बाहर जाकर खर्च करने की परंपरा बनी हुई है, और उसका सामाजिक दबाव भी बना रहता है। ऐसे सामाजिक दबाव को खत्म करने के लिए सामूहिक विवाह एक अच्छा जरिया है, और इससे खासकर कमजोर तबकों और मध्यम वर्ग को बड़ी राहत मिल सकती है। ऐसे आयोजनों से समाज के कुछ सबसे रईस लोगों को भी जुडऩा चाहिए जो अपने परिवार की शादियां यहां पर करें, और उससे ऐसे आयोजनों को एक अधिक सामाजिक मान्यता मिल सके। अभी मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में सरकारी खर्च पर ऐसी शादियां होती हैं, लेकिन वे सरकारी मदद से होती हैं, इसलिए शायद उनमें समाज के संपन्न तबकों के लोग शामिल नहीं होते। इसकी बजाय, या इसके साथ-साथ अलग से अगर सामाजिक स्तर पर ऐसी पहल होगी, संपन्न और मशहूर लोग भी अपने परिवारों की शादियां सामूहिक विवाह में करेंगे, तो बाकी लोगों के बीच भी उसे एक अधिक प्रतिष्ठा मिलेगी, और गरीब-मध्यमवर्गीय परिवारों पर पडऩे वाला अंधाधुंध दबाव खत्म होगा। 

राजस्थान के इस आयोजन का जो बड़ा पैमाना है, वह भीड़भरे कार्यक्रमों के मैनेजमेंट के अध्ययन का एक दिलचस्प केस भी है। हमें भरोसा है कि कुछ बड़े मैनेजमेंट संस्थानों के छात्र और प्राध्यापक इसे देखने, और इससे सीखने को जरूर पहुंचे होंगे, लेकिन इनके साथ-साथ उन राज्यों को भी अपने अफसरों को भेजना चाहिए जहां पर छोटे पैमाने पर ही सही इस तरह के कार्यक्रम होते हैं। तमाम राज्य सरकारों और स्थानीय संस्थाओं को ऐसे बड़े आयोजनों का अनुभव अपने अमले को करवाना चाहिए। हो तो यह भी सकता था कि आईएएस जैसी नौकरी के प्रशिक्षण संस्थान भी अपने नए अफसरों को ऐसी जगह भेज सकें, और हो सकता है कि उन्होंने भेजा भी हो। हमें तो इतने बड़े पैमाने की और कोई दूसरी खबर याद नहीं पड़ रही है, इसलिए यह तो माना ही जा सकता है कि सीखने और सिखाने के ऐसे अधिक मौके बार-बार नहीं आते हैं। 

भारत जैसे परंपराओं वाले देश में राज्य सरकारों को अपनी सामाजिक जवाबदेही के तहत ऐसे आयोजनों को बढ़ावा देना चाहिए, और अपने खर्च का बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार में डुबाने के बजाय सामाजिक संस्थाओं को ऐसे आयोजन करने में मदद करनी चाहिए। भारत एक गरीब देश है, और यहां के कमजोर तबके भी बहुत सी परंपराओं को ढोते हैं, सामाजिक रीति-रिवाज उन पर लदे रहते हैं, इसलिए सरकारों को सामाजिक सरलता और किफायत को बढ़ावा देने की ऐसी सामूहिक कोशिशों को बढ़ावा देना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

 

झीरम को श्रद्धांजलि की नहीं, सोच-विचार की जरूरत...

 25 मई, 2023 

 

देश के इतिहास में नेताओं पर हुए सबसे बड़े नक्सल हमले, झीरम घाटी, में छत्तीसगढ़ के दो दर्जन से अधिक लोग मारे गए थे, जिनमें कांग्रेस के कुछ सबसे बड़े नेता थे, कुछ उनके साथ के लोग थे। आज उसके दस बरस पूरे हो रहे हैं, और इस पर जितनी जांच और अदालती कार्रवाई हुई है, उससे कहीं अधिक राजनीति चल रही है, वह जारी ही है। लोकतंत्र में नक्सलियों के इलाके में घुसकर राजनीतिक कार्यक्रम करना खतरे से खाली नहीं था, लेकिन उसमें उस वक्त के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, कांग्रेस के एक और सबसे बड़े नेता विद्याचरण शुक्ल, बस्तर के सबसे बड़े नक्सल-विरोधी नेता और कांग्रेस पार्टी के महेन्द्र कर्मा, विधायक उदय मुदलियार जैसे बड़े-बड़े नेता उस हमले में शहीद हुए। राज्य में भाजपा की सरकार थी, रमन सिंह मुख्यमंत्री थे, केन्द्र में यूपीए के मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, उस वक्त से जांच, जांच आयोग, सरकारों के बीच टकराव, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक तरह-तरह की पिटीशन का जो सिलसिला चल रहा है, वह आज भी थमा नहीं है, वह बस अदालती स्थगन से रोका गया है, वरना कार्रवाई जारी है। 

यह मामला भारत में अलग-अलग राजनीतिक दलों वाले संघीय ढांचे का है, जांच एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र के टकराव का भी है, और राज्य की सत्ता पर, केन्द्र की सत्ता पर अलग-अलग पार्टियों के आने-जाने से बदले हुए हालात, और अदालतों की दखल का भी है। छत्तीसगढ़ में घटना के समय भाजपा की सरकार थी, और मारे गए लोग कांग्रेस के थे। उस वक्त से ही झीरम को लेकर एक राजनीतिक टकराव ऐसा चले आ रहा है कि इस मामले की जांच और अदालती फैसला किसी किनारे नहीं पहुंच पा रहे। जांच आयोग के काम करने के तरीके से असहमति, आयोग में नई नियुक्ति, नए मुद्दे तो चल ही रहे हैं, वे खत्म होने का नाम नहीं ले रहे हैं, बल्कि मौजूदा कांग्रेस सरकार का कार्यकाल खत्म होने के करीब है, और अदालती स्थगन से उसके हाथ बंधे हुए हैं। दस बरस बाद भी देश की सबसे बड़े जांच एजेंसी एनआईए का मामला एनआईए कोर्ट में चल ही रहा है, और वह किसी किनारे पहुंचते नहीं दिख रहा है। यह हालत न्यायपालिका की भी है कि ऐसे खुले हमले के दस बरस बाद भी पहली अदालत से भी कोई फैसला अभी तक नहीं हो पाया है, जाहिर है कि इसके बाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का रास्ता सभी के लिए खुला रहेगा, और शायद अगले दस बरस भी आखिरी इंसाफ न हो सके। 

नक्सल संगठनों के भीतर इस हमले को लेकर असहमति भी सामने आई थी, और नक्सल नेताओं ने यह माना था कि स्थानीय नक्सलियों ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर यह अराजकता दिखाई थी, ऐसा हमला किया था, और इसमें नंदकुमार पटेल के बेटे दिनेश पटेल को भी मारा गया था जिनका कि किसी नक्सल-विरोधी अभियान से कोई लेना-देना नहीं था। लेना-देना तो विद्याचरण शुक्ल का भी नहीं था जिन्होंने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में कभी राज्य की राजनीति नहीं की थी, और आखिरी दौर में जब वे 2003 का विधानसभा चुनाव एनसीपी में जाकर लड़ रहे थे, तब भी किसी नक्सल मुद्दे से उनका कोई लेना-देना नहीं था। इस तरह नक्सलियों ने उस हमले में जिस तरह की मनमानी की थी, बेकसूर लोगों को छांट-छांटकर मारा था, उससे नक्सल आंदोलन भी बदनाम हुआ था, और उनके नेताओं को भी सार्वजनिक रूप से शर्मिंदगी जाहिर करनी पड़ी थी। 

अब आज इस बरसी पर जब हम झीरम में मरने वाले लोगों के परिवारों के साथ इंसाफ के बारे में सोचते हैं तो लगता है कि पार्टियों की राजनीति, केन्द्र और राज्य की एजेंसियों में टकराहट के चलते इंसाफ अभी दूर कहीं मृगतृष्णा बना हुआ बैठा है। हिन्दुस्तानी अदालती रिवाज के मुताबिक कभी न कभी इस पर फैसला जरूर आएगा, और अपीलों से गुजरते हुए यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक जरूर पहुंचेगा, लेकिन इस दौरान जितनी बयानबाजी और जितनी कड़वाहट सामने आ रही है, उससे लगता है कि हर कुछ महीनों में सामने आती ऐसी टकराहट से मृतकों के परिवारों की तकलीफ बढ़ती ही होगी। खैर, जब अधिकतर मृतक या शहीद कांग्रेस से जुड़े हुए थे, तो जाहिर है कि यह मामला राजनीति से परे का रह भी नहीं सकता। अब एक दिक्कत यह है कि कांग्रेस और भाजपा से जुड़े हुए नेता हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पिटीशनर बने हुए हैं, और अदालतें अपने मिजाज के मुताबिक बरसों तक सुनवाई कर रही हैं, हर किस्म की जांच पर स्थगन आया हुआ है, तो फिर इंसाफ का सिलसिला आगे बढ़े तो कैसे बढ़े? हम यहां किसी पार्टी को कुसूरवार ठहराने का काम नहीं कर रहे, लेकिन इतना जरूर सोच रहे हैं कि यह मामला जांच, राजनीति, और अदालती प्रक्रिया की उलझनों की एक इतनी बड़ी मिसाल है कि उसे कई किस्म के कोर्स में पढ़ाया जा सकता है। इसमें केन्द्र-राज्य संबंध भी हैं, नक्सली-लोकतांत्रिक टकराव भी है, राजनीतिक दलों के बीच की कटुता भी है, केन्द्र और राज्य की एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र की बहस भी इसमें है, और केन्द्र और राज्य में सत्तारूढ़ पार्टियां बदल जाने से जांच और अदालती कार्रवाई में आने वाला फर्क भी इसमें है। यह समझना मुश्किल है कि चुनावी लोकतंत्र में ऐसी उलझन को कम कैसे किया जा सकता है? झीरम की बरसी के इस मौके पर श्रद्धांजलि देकर फिर अगले बरस तक उसे अनदेखा करना बड़ी गैरजिम्मेदारी का काम होगा, लोकतंत्र में ऐसी जटिलताओं पर कुछ बेहतर सोच-विचार करना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 25 मई 2023



 

अपने-अपने टापुओं पर बैठे विपक्षी दलों में एकता उतनी आसान भी नहीं जितनी...

 23 मई, 2023 

  

मोदी सरकार को देश की जनता ने पांच बरस के लिए चुना है, उसमें अभी साल भर बाकी है, इसलिए मोदी को तो जनता ने एक किस्म से देश की सरकार लीज पर दे दी है, लेकिन जनता विपक्ष लीज पर नहीं देती, वह तो बिखरा हुआ रहता है, और उसे समेटना उसका अपना काम रहता है। आज हिन्दुस्तान में विपक्ष के सामने संभावनाएं मोदी सरकार के मुकाबले अधिक हैं। सत्तारूढ़ पार्टी अपने दसवें बरस में खोने का खतरा अधिक रखती है, लेकिन विपक्ष उसके खिलाफ अनगिनत मुद्दों पर आपसी तालमेल से, और एकजुट होकर सरकार को बड़ी चुनौती दे सकता है। और आज देश की जनता इसी का इंतजार कर रही है। देश भर में मोदी सरकार के खिलाफ मुद्दे इतने बिखरे हुए हैं, और इतने अधिक हैं कि उन पर देश की अलग-अलग गैरएनडीए पार्टियों में एकता हो सकती है, लेकिन इन पार्टियों की प्राथमिकताएं पहले अपने मतभेदों का हिसाब चुकता करना है, उसके बाद ही वे मोदी के बारे में कुछ सोचने की सोचेंगी। 

देश की राजनीति के जानकार बहुत से लोगों को मोदी के खिलाफ किसी विपक्षी एकता को लेकर अधिक उम्मीद नहीं है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो मानते हैं कि ऐसी उम्मीद तो इमरजेंसी के दौरान भी नहीं दिखती थी, लेकिन बाद में विपक्षी न सिर्फ एक हुए, बल्कि उन्होंने अपनी पार्टियों का अस्तित्व भी मिटा दिया, और सब मिलकर जनता पार्टी बनीं, और देश का इतिहास बदल डाला। अब इस तर्क पर सोचने की बहुत सारी बातें हैं, क्या इमरजेंसी के दौरान देश में लोकतंत्र की जो हालत थी, और जिसकी वजह से अस्तित्व पर खतरा झेल रहीं पार्टियां, और नेता एक हुए, क्या आज हालात उस तरह के दबाव वाले हैं? दूसरी बात यह कि उस वक्त बहुत से प्रदेशों में कांग्रेस की ही सरकार थी जो कि संजय गांधी की इमरजेंसी का विस्तार करने में उसी खूंखार उत्साह से लगी हुई थीं, और आज देश के प्रदेशों में हालात उस कदर खराब नहीं हैं कि लोकतंत्र में एक बगावत की नौबत आए। इमरजेंसी में नेताओं को जेलों में बंद रहते हुए एकता की मजबूरी भी समझ आई थी, और एकता के लिए बातचीत का मौका भी जुटा था। आज विपक्षी एकता के लिए मायने रखने वाले अधिकतर नेता अपने-अपने प्रदेशों में मुख्यमंत्री हैं, उनके सामने एकता न कोई बेबसी है, और न ही दूसरों के साथ बैठना उनकी मजबूरी है। ऐसे में अलग-अलग कोई पहल कहीं चल रही है, तो उनकी वजह से चल रही है जो कि ऐसे किसी संभावित विपक्षी गठबंधन के मुखिया बनने की हसरत रखते हैं। उससे परे एक साथ बैठकर आधा दर्जन नेता भी कोई बात कर रहे हों, ऐसा नहीं दिखता है। चीटियां भी जब एक साथ जुटती हैं, तो वे अपने बदन से सौ गुना वजनी पत्ते या कीड़े को ढोकर ले जाते दिखती हैं, लेकिन उसके लिए उनका एकजुट होना जरूरी रहता है, और तालमेल से चलना जरूरी रहता है। 

अब दिल्ली की ही खबर है कि वहां सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को अधिकारियों पर नियंत्रण के अधिकार देने का जो फैसला सुनाया है, उसे बेअसर करने के लिए केन्द्र सरकार एक अध्यादेश लाई है ताकि केजरीवाल के पंख बंधे ही रहें। अब इस मामले पर केजरीवाल सारी विपक्षी पार्टियों से अपील कर रहे हैं कि जब संसद में इसे पेश किया जाए, तब तमाम पार्टियां एक होकर इसका विरोध करें। इसे लेकर ऐसी खबर भी आ गई थी कि कांग्रेस इस मुद्दे पर अध्यादेश का विरोध करेगी। लेकिन अधिक देर नहीं लगी, कांग्रेस ने इन खबरों का खंडन किया, और कहा कि अभी इस पर पार्टी ने कोई फैसला नहीं लिया है, और पार्टी अपने राज्य संगठन, और दूसरे हमखयाल राजनीतिक दलों के साथ इस पर सलाह करेगी। जबकि कांग्रेस के साथ ठीकठाक तालमेल रख रहे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस मुद्दे पर केजरीवाल का साथ दिया है, और खुलकर कहा है कि निर्वाचित सरकार को दी गई ताकतें कैसे छीनीं जा सकती हैं, यह संविधान के खिलाफ है, और वे केजरीवाल के साथ हैं, और सभी विपक्षी दलों को एक साथ लाने की कोशिश कर रहे हैं। लोगों को याद होगा कि जिस वक्त राहुल गांधी के खिलाफ गुजरात की एक अदालत का फैसला आया, और उनकी संसद सदस्यता अगले दिन खत्म कर दी गई तब केजरीवाल ने खुलकर उसके खिलाफ बयान दिए थे। अगर विपक्ष में एकता की कोई संभावनाएं देखनी हैं, तो उसके लिए लोगों को एक-दूसरे की मुसीबत में साथ देने के बारे में सोचना पड़ता है। मतभेद तो विपक्षी पार्टियों में भी हमेशा ही बने रहेंगे, लेकिन चीटियों को कोई बड़ा सामान उठाकर ले जाना है, तो उन्हें जरूरत के वक्त एकजुट होकर कदमताल करनी पड़ती है, और अपने निजी अस्तित्व को कुछ वक्त के लिए भूलना भी पड़ता है। 

चूंकि हमने इमरजेंसी के दौर की विपक्षी एकता से आज की एक तुलना करने का खतरा उठाया है, तो यह भी समझना पड़ेगा कि नेहरू की बेटी को हराने के लिए पार्टियों ने अपने अस्तित्व को भी खत्म कर दिया था, आज की जो भाजपा देश की सरकार पर काबिज है, वह भाजपा भी जनसंघ की शक्ल में जनता पार्टी में विलीन हुई थी, और जनता पार्टी खत्म होने के बाद वह भाजपा बनकर फिर अस्तित्व में आई थी। नाजुक वक्त के ऐसे बहुत से तकाजे रहते हैं जब लोगों को निजी महत्वाकांक्षा, निजी अस्तित्व भूलकर भी एक-दूसरे के साथ हाथ में हाथ थामकर खड़े होना पड़ता है। इमरजेंसी और आज की दूसरी कई किस्म की अलग बातों से परे एक और बात अलग है कि उस वक्त प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा से पूरी तरह मुक्त जयप्रकाश नारायण अगुवाई करने को मौजूद थे, और आज बारात में चलने को तैयार हर कोई घोड़ी चढ़े दूल्हा बने दिख रहे हैं। अब ऐसे में बारात आगे बढ़े तो कैसे बढ़े? फिलहाल पूरी तरह निराश होने की जरूरत भी नहीं है क्योंकि कोई विपक्षी गठबंधन आखिरी के महीनों में भी हो सकता है, लेकिन एक बात गौर करने लायक यह है कि देश में ऐसी एक सुगबुगाहट चल रही है कि क्या मोदी सरकार संसद के कार्यकाल के पहले छह महीने बाद के कुछ विधानसभा चुनावों के साथ आम चुनाव भी करवा सकती है? अगर ऐसी नौबत आती है, तो अपने-अपने टापुओं पर राज कर रहे विपक्षी नेताओं के पैर सम्हल नहीं पाएंगे। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 मई 2023


 (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 मई 2023

 

(Daily Chhattisgarh)

 

धार्मिक परंपरा के नाम पर कट्टर रीति-रिवाज कब तक जिंदा रखे जाएं लोकतंत्र में?

 22 मई, 2023 

  

बिहार से बीबीसी की एक रिपोर्ट है कि वहां मुस्लिमों के शेरशाहबादी तबके में एक रिवाज के चलते लड़कियां बूढ़ी हो जाती हैं, लेकिन उनकी शादी नहीं हो पाती। छोटे-छोटे गांव-कस्बों में भी ऐसी दर्जनों लड़कियां हैं जिनकी शादी की उम्र निकलती चली गई, और अब उम्र बढ़ जाने से शादी की गुंजाइश नहीं सरीखी रह गई। यह रिपोर्ट इस समुदाय के एक रिवाज को बताती है कि शेरशाहबादी मुस्लिम अपनी लड़कियों का रिश्ता करने की पहल खुद नहीं करते, बल्कि लडक़ों की तरफ से शादी के लिए पैगाम आता है, या मध्यस्थता करने वाले अगुवा आते हैं। समाज में यह माना जाता है कि अगर लड़कियों के मां-बाप पहल कर रहे हैं, तो उनमें कोई खोट होगी। अब इस सामाजिक धारणा के तहत जीते हुए लड़कियों के परिवार अपनी लड़कियों को बूढ़ा होते देखते हैं, खुद मर जाते हैं, और लड़कियों को अकेले मरने के लिए छोड़ देते हैं। जैसे ही शादी की उम्र थोड़ी सी पार होती है, संभावनाएं तेजी से फिसलती चली जाती हैं। अब हाल यह है कि कमउम्र से ही बच्चियों पर यह डर मंडराते रहता है कि कहीं वे बिना शादी के न रह जाएं। एक और चलन यह है कि यह समाज सिर्फ गोरी लडक़ी ढूंढता है, इसलिए जो लड़कियां गोरी नहीं हैं, वे भी घर बैठे रह जाती हैं। ऐसे में परिवार किसी बूढ़े से भी अपनी जवान लडक़ी की शादी कर देते हैं, ताकि शादी हो तो सही। 

यह रिपोर्ट कई सवाल खड़े करती है। और बुनियादी तौर पर तो मुस्लिमों के इस समुदाय के लिए करती है, लेकिन मुस्लिमों के बाकी समुदायों में भी कमउम्र की नाबालिग गरीब लडक़ी को किसी बूढ़े पैसे वाले के साथ शादी करके भेज देने के मामले हैदराबाद से बहुत सुनाई देते थे। सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरें समाज का मखौल बनाते रहती हैं जिनमें किसी बहुत बूढ़े के साथ कोई कमउम्र लडक़ी दिखती है। एक तो गरीबी, दूसरी अशिक्षा, तीसरी बात किसी तरह की आत्मनिर्भरता की क्षमता न होना, और फिर समाज के तंगनजरिये का कैदी रहना, इन सब वजहों से न सिर्फ मुस्लिमों, बल्कि कई समाजों में लड़कियों की संभावनाएं शुरू होने के पहले ही खत्म हो जाती हैं। मुस्लिमों में खासकर इसलिए कि कमउम्र में शादी कानूनी है, इसलिए गरीब परिवार लडक़ी की पढ़ाई बिना, उसकी आर्थिक आत्मनिर्भरता के बिना कोई लडक़ा, आदमी, या बूढ़ा देखकर शादी कर देते हैं, और फिर उस लडक़ी की जिंदगी का रूख हमेशा के लिए एक खाई की तरफ तय हो जाता है। इसलिए जब हिन्दुस्तान के किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री अपनी सारी साम्प्रदायिकता के साथ भी एक से अधिक शादियों पर रोक लगाने की बात करता है, तो हम उसका समर्थन करते हैं। जब देश में ऐसा कानून बना कि तीन बार तलाक शब्द कहकर मुस्लिम पति पत्नी को छोड़ न सके, तो हमने उसका भी समर्थन किया। जब हिजाब पर कर्नाटक में रोक की बात आई, तो हमने व्यक्तिगत पसंद की वकालत करते हुए मुस्लिम लडक़ी के हिजाब के हक का तो समर्थन किया, लेकिन उसे हिजाब से मुक्ति दिलाने के समाज के भीतर माहौल बनाने की भी वकालत की। आज बुर्के और हिजाब की वजह से, और बहुत से गैरमुस्लिम समाजों में तरह-तरह के पर्दों की वजह से लड़कियों और महिलाओं के बराबरी से आगे बढऩे की संभावनाएं खत्म होती हैं। ये चीजें व्यक्तिगत पसंद की हद तक तो ठीक हैं, इन्हें कोई स्कूल-कॉलेज या सरकारी दफ्तर जबर्दस्ती रोके, हम उसके खिलाफ हैं, लेकिन हम ऐसी पोशाक के खिलाफ हैं जो कि महज महिलाओं पर लादी जाती है, चाहे वह मुस्लिम महिला का हिजाब-बुर्का हो, चाहे वह राजस्थानी महिला का घूंघट हो। 

बिहार के जिस मुस्लिम समुदाय में लड़कियों की हालत देखकर यह बात लिखी जा रही है, उसे सरकार के स्तर पर भी देखने की जरूरत है। सरकार को ऐसी सामाजिक जागरूकता की कोशिश भी करनी चाहिए कि अलग-अलग समुदाय अपने पुराने पड़ चुके रिवाजों से निकल सकें, वहां महिलाओं को बराबरी के हक मिल सकें, और बेइंसाफी खत्म हो सके। बहुत से समाजों में पर्दे से परे की भी कई तरह की पुरानी परंपराएं चली आ रही हैं, वे नई पीढ़ी की महत्वाकांक्षाओं को खत्म करती हैं, उनकी संभावनाओं का गला घोंटती हैं, और समाज के मठाधीश उन्हें जारी रखने में अपनी कामयाबी मानते हैं। धर्म और समाज के अधिकतर मुखियाओं का राज पाखंड के जारी रहने से आसानी से जिंदा रहता है, और आगे बढ़ता है। शहरीकरण तो खुद होकर कुछ हद तक इस सिलसिले को तोड़ता है, लेकिन कहीं कानून बनाकर, कहीं सामाजिक जागरूकता लाकर यह सिलसिला खत्म भी करना चाहिए। 

जब हम किसी धर्म की परंपराओं और उस धर्म में महिलाओं के हक के बीच टकराव देखते हैं, तो हम महिलाओं के हक के हिमायती रहते हैं। धर्म तो ताजा-ताजा है, लेकिन महिलाओं का अस्तित्व तो धरती पर इंसानों के अस्तित्व से चले आ रहा है, उनका हक धर्म के ऊपर रहना चाहिए। इसलिए किसी धर्म के रिवाज अगर महिलाओं के हक को छीनते हैं, कुचलते हैं, तो ऐसे रिवाज बदलने की जरूरत है। इसके लिए लोकतंत्र अगर कानून भी बदलना पड़े, तो वह भी करना चाहिए। धार्मिक कट्टरता से लादे जा रहे पाखंडी रीति-रिवाजों को लोकतंत्र और मानवाधिकार से ऊपर दर्जा नहीं देना चाहिए। एक वक्त हिन्दुस्तान में सती बनाने की भी सामाजिक मान्यता मिली हुई थी, बाल विवाह धड़ल्ले से होते थे, अब कानून बनाकर इनको रोका गया। कुछ लोग कह सकते हैं कि ये कानून किसी धर्म के रिवाज को खत्म कर रहे हैं, लेकिन धर्म को इंसान के बुनियादी हकों से ऊपर जगह देना नाजायज है। इसलिए जहां समाज खुद होकर सुधार नहीं ला पाता है, वहां लोकतांत्रिक सरकार को दखल देनी ही चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21मई 2023


 (Daily Chhattisgarh)

बलात्कार की रिपोर्ट पर बलात्कार की एक जवाबी रिपोर्ट, हकीकत क्या समझें?

21 मई, 2023 

  

अभी बलात्कार के आरोप का एक ऐसा मामला सामने आया है जो बहुत से उलझे हुए सवाल खड़े करता है। यह जांच एजेंसी पुलिस और अदालत के सामने तो एक जटिल मुद्दा रहेगा ही, यह अखबारों के लिए भी एक मुश्किल मामला है कि इसकी खबर कैसे बनाई जाए। क्या दो पक्षों की तरफ से पुलिस में लिखाई गई रिपोर्ट के तथ्यों को ज्यों का त्यों ले लिया जाए, या फिर अपनी अक्ल का भी इस्तेमाल किया जाए? रिपोर्टिंग करते हुए आमतौर पर यह बात आसान रहती है कि बिना जज बने हुए पुलिस या अदालत में दर्ज तथ्यों को ज्यों का त्यों पाठकों के सामने रख दिया जाए, लेकिन क्या इस तरह का मशीनी बर्ताव पाठकों या दर्शकों को सचमुच का सच बता पाता है? यह सवाल आसान नहीं है क्योंकि दर्ज तथ्यों का अधिक विश्लेषण करना, और फिर सोच-समझकर तथ्यों को सामने रखना एक किस्म से अदालत के पहले मीडिया की अदालत में, या रिपोर्टर की समझ में इंसाफ करने जैसा काम हो जाता है। कल से ऐसा ही एक मामला परेशान कर रहा है।

हम जानबूझकर इसमें हिन्दुस्तान के इस प्रदेश और उसके शहर का नाम नहीं दे रहे हैं क्योंकि यह मामला कहीं भी हो सकता है। एक गरीब परिवार की नाबालिग लडक़ी पुलिस को रोती-बिलखती मिली, और उससे पता लगा कि पिछले कुछ बरस से दूसरे धर्म का एक लडक़ा उससे प्यार की बातें करते हुए देह-संबंध बना रहा था। यह सिलसिला लगातार चलते रहा। जब यह लडक़ी मारपीट झेलकर पुलिस को मिली तो पुलिस ने इस लडक़े को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद लडक़े के परिवार के दस बरस के बच्चे की ओर से पुलिस में रिपोर्ट लिखाई गई कि बलात्कार की रिपोर्ट लिखाने वाली लडक़ी की विधवा मां उस बच्चे को लालच देकर अपने घर ले गई, और उसके निजी अंगों से छेडख़ानी की। इस रिपोर्ट के आधार पर पॉक्सो एक्ट के तहत केस दर्ज करके इस महिला को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया, और जेल भेज दिया गया। बलात्कार की रिपोर्ट लिखाने वाली नाबालिग लडक़ी का कहना है कि पुलिस बलात्कारी के साथ मिलकर समझौता करने, और शिकायत वापिस लेने के लिए धमका रही थी, पैसों का लालच दिया जा रहा था, और जब यह गरीब परिवार उसके लिए तैयार नहीं हुआ, तो उसकी मां के खिलाफ ऐसी रिपोर्ट लिखाकर उसे आनन-फानन गिरफ्तार करवाया गया। बलात्कार की शिकार लडक़ी हिन्दू है, और आरोपी गिरफ्तार युवक मुस्लिम है, और उसके परिवार के छोटे बच्चे की तरफ से हिन्दू लडक़ी की मां के खिलाफ यौन शोषण की रिपोर्ट दर्ज कराई गई है जिस पर गिरफ्तारी हुई है। इस मामले में एक और पेंच यह भी है कि मुस्लिम युवक को भाजपा से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है। अब कुछ हिन्दू संगठन इस मामले को लेकर पहली रिपोर्ट करने वाली लडक़ी के पक्ष में खड़े हो रहे हैं, आंदोलन की बात कर रहे हैं, दूसरी तरफ पहली रिपोर्ट पर गिरफ्तार मुस्लिम युवक भाजपा से जुड़ा होने के बाद भी भाजपा की तरफ से कोई बयान नहीं आया है।

अब सोचने की कई बातें उठती हैं। एक गरीब परिवार की लडक़ी जो कि विधवा मां के साथ रह रही है, वह बलात्कार की रिपोर्ट लिखाती है, और लडक़े की गिरफ्तारी के बाद उसके परिवार का एक बच्चा इस विधवा महिला के खिलाफ यौन शोषण की रिपोर्ट लिखाता है, और पुलिस उस महिला को भी तुरंत गिरफ्तार कर लेती है। बिना किसी की नीयत पर शक किए हुए पहली नजर में देखा जाए तो ऐसा लगता है कि पहली रिपोर्ट के मुकाबले यह दूसरी रिपोर्ट हुई है, और इन दोनों के बीच पुलिस पर यह आरोप भी लगा है कि वह दबाव डालकर लडक़ी से शिकायत वापिस करवाने की कोशिश कर रही थी। अब इस मामले में पुलिस चाहे जैसा मामला बनाए, अदालत जिसे चाहे उसे गुनहगार ठहराए, लेकिन हमारे सामने एक दुविधा और दिक्कत यह है कि इस पूरे मामले की रिपोर्ट कैसे की जाए? अखबार में तथ्यों को बिना जज बने हुए कैसे रखा जाए? इतनी दुविधा कम मामलों में सामने आती है। देश के कुछ हिस्सों में ऐसा जरूर हुआ है कि एक परिवार की बलात्कार की रिपोर्ट के मुकाबले दूसरे परिवार की महिलाओं ने भी बलात्कार की रिपोर्ट लिखा दी। लेकिन एक छोटे बच्चे की तरफ से ऐसी शिकायत का यह मामला बड़ा अजीब है। न तो हम उस लडक़ी की नीयत पर कोई शक कर रहे, न ही इस बच्चे की नीयत पर, लेकिन यह इतना नाजुक मामला हो गया है कि पुलिस को अपनी साख बचाने के लिए, और इंसाफ के लिए भी ईमानदारी और संवेदनशीलता से इसकी जांच करनी चाहिए।  

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 20 मई 2023


 (Daily Chhattisgarh)

देश का सर्वे बताता है कि कमउम्र में सेक्स के मामले में लड़कियां लडक़ों से आगे

20 मई, 2023 

  

भारत के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट बता रही है कि 18 साल की उम्र तक यौन संबंध बना लेने वाले लोगों में लड़कियों की संख्या लडक़ों से ज्यादा है। चूंकि यह भारत सरकार का किया हुआ सर्वे है, और आज की सरकार कमउम्र में सेक्स को बढ़ावा देने वाली तो है नहीं, इसलिए यह मानने की कोई वजह नहीं हो सकती कि यह सर्वे गलत होगा। दूसरी बात, इस सर्वे में ही यह लिखा गया है कि ये आंकड़े पूरी तरह से लोगों से बातचीत पर आधारित हैं, और भारत में महिलाएं और लड़कियां इस तरह के रिश्ते पर बात करने में हिचकिचाती हैं, इसलिए हो सकता है कि जितने आंकड़े बताए गए हैं, उनमें आधे छुपा लिए गए हों। रिपोर्ट यह भी कहती है कि गांव की लड़कियां शहर की लड़कियों के मुकाबले कमउम्र में सेक्स-संबंध बनाती हैं। यहां यह समझने की जरूरत है कि यह सर्वे शादीशुदा और बिना शादी वाली, सभी किस्म की लड़कियों और महिलाओं के बारे में हैं, और इसका एक तथ्य यह भी बताता है कि युवकों में 6 फीसदी ने सेक्स वर्कर से देह-संबंध की शुरुआत बताई है, लेकिन महिलाओं के एक हिस्से का कहना है कि उन्होंने अपने परिचितों के साथ सेक्स की शुरुआत की थी। यह राष्ट्रीय सर्वे कई किस्म के मकसद को लेकर किया गया है जिसमें सहमति से सेक्स की उम्र को घटाने की की जा रही मांग पर विचार करने के लिए भी एक जमीन तैयार होगी, और भी कई किस्म के कानूनों में इसके बाद सोचने-विचारने की जानकारी सामने आएगी। अभी माना जा रहा है कि परिवार की सोच, किशोरों और युवाओं के बदन की जरूरत, नौजवानों के आपसी रिश्ते, और कानून, इनके बीच कोई ठीक-ठाक तालमेल नहीं है। हो सकता है कि ऐसे सर्वे के बाद अगर इस पर कोई गंभीर विचार-विमर्श हो, तो कुछ कानून बदल सकते हैं जो कि नौजवान पीढ़ी की जिंदगी को कुछ आसान कर सकते हैं। 

इसके साथ-साथ हम यह भी कहना चाहते हैं कि जब लडक़े-लड़कियों का एक पर्याप्त बड़ा हिस्सा 15 बरस की उम्र में सेक्स-संबंध बनाने की बात खुद होकर मंजूर कर रहा है, तो इस पीढ़ी की सेक्स की जानकारी में इजाफा करने, उन्हें वैज्ञानिक बातों को समझाने, और पहले सेक्स के पहले उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से परिपक्व बनाने की जरूरत दिख रही है। भारत के स्कूलों और कॉलेजों में देह-शिक्षा या सेक्स-शिक्षा की बात आधी सदी से चल रही है, लेकिन लोगों का एक हिस्सा ऐसा है जो इसे पश्चिमी संस्कृति बताता है, और इसका विरोध करने के लिए झंडे-डंडे लेकर टूट पड़ता है। इसे भारतीय संस्कृति के खिलाफ, हिन्दू धर्म के खिलाफ बता दिया जाता है, जबकि भारतीय संस्कृति में सैकड़ों बरस पहले से खजुराहो जैसे अनगिनत मंदिरों की दीवारों पर सेक्स की प्रतिमाएं बनी हुई हैं जो बताती हैं कि इस देश में मुगलों और अंग्रेजों के आने के सैकड़ों बरस पहले से सेक्स पर खुलकर चर्चा होती थी। वात्सायन ने कामसूत्र जैसा विश्वविख्यात ग्रंथ तीसरी शताब्दी के बीच में किसी समय तैयार किया था जो कि सेक्स के आनंद के पहलू पर दुनिया का एक सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। इतिहास गवाह है कि हिन्दुस्तान ने अपने बेहतर वक्त में सेक्स को गंदा नहीं माना, और इसे जिंदगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना। हाल की सदियों में धर्म ने अपने पाखंड का प्रचार करते हुए सेक्स की भावना के लिए तरह-तरह के अपराधबोध वाले शब्द गढ़े, और लोगों के मन में इसके लिए वैराग्य और हिकारत पैदा करने की कोशिश की। ऐसे ही कुछ तथाकथित शुद्धतावादियों ने जिंदगी से सेक्स को बाहर करने की कोशिश की, और एक चर्चित तथाकथित आध्यात्मिक संगठन तो पति-पत्नी को भाई-बहन की तरह रहने को कहता है। जाहिर है कि ऐसे दाम्पत्य जीवन से पति-पत्नी कहीं न कहीं अलग-अलग सेक्स ढूंढने लगेंगे, और उससे समाज में बवाल बढ़ेगा ही, सेक्स कहीं कम नहीं होगा। 

कभी धर्म का नाम लेकर, कभी तथाकथित सांस्कृतिक मूल्यों का नाम लेकर हिन्दुस्तान में एक कट्टर तबका लोगों को, खासकर नौजवानों को सेक्स से दूर रहने की नसीहत देता है। नौजवान तन और मन अपनी जरूरतों को पूरा करने के रास्ते ठीक उसी तरह ढंूढ लेते हैं जिस तरह किसी पहाड़ी नदी का पानी अपने लिए रास्ता ढूंढ लेता है, इस रोक पाना मुमकिन नहीं होता, असल इंसानी जिंदगी में कांक्रीट के बांध तो बनाए नहीं जा सकते कि नौजवान तन-मन की जरूरतों को रोक दिया जाए। नतीजा यह होता है कि समाज नई पीढ़ी को सेक्स की जानकारी देना नहीं चाहता, और यह पीढ़ी बिना वैज्ञानिक समझ के, अपनी सामान्य समझबूझ से, या फिर हाल के दशकों में इंटरनेट की मेहरबानी से हासिल पोर्नोग्राफी को ही सेक्स-शिक्षा मानकर आगे बढ़ जाती है। नतीजा यह होता है कि बदन के प्राकृतिक और स्वाभाविक काम को यह पीढ़ी पोर्नोग्राफी के नजरिये से देखती है, और उसकी वजह से उसका बड़ा नुकसान भी होता है, उसमें एक अलग और अजीब किस्म की हिंसा भी आ जाती है, इस पीढ़ी को यह लगने लगता है कि पोर्नोग्राफी में दिखाए गए तरीके ही सेक्स के स्वाभाविक तरीके हैं। 

भारत सरकार के इस ताजा सर्वे की जानकारी से यह बात साफ होती है कि लड़कियों को घर में दबाकर रखना, और लडक़ों को बिना किसी जानकारी और समझ के खुला छोड़ देना कामयाब नहीं हो पा रहा है। इससे सेक्स रूक नहीं रहा है, यह एक अलग बात है कि ऐसे अपरिपक्व उम्र और दिमाग के, और परिपक्व बदन के सेक्स में कोई सावधानी शायद न बरती जा रही हो। इसके बहुत किस्म के खतरे हैं, लड़कियों के गर्भवती हो जाने से लेकर दोनों ही जोड़ीदार के किसी सेक्स-बीमारी को पा लेने तक कई चीजें हो सकती हैं। आज जब अदालतों में यह बहस चल रही है कि सहमति से सेक्स की उम्र घटानी चाहिए, तो यह बात जाहिर है कि ऐसी घटी हुई उम्र के साथ सेक्स की जानकारी भी देनी चाहिए, उसकी समझ भी देनी चाहिए, और खतरों से बचने की नसीहत भी इसी के साथ दी जा सकती है। अपने आपको ऐसा पाखंडी बनाए रखना कि इस देश में शादी के पहले कोई सेक्स नहीं होता, एक झूठे सांस्कृतिक-अहंकार को तो सहला सकता है, लेकिन नई पीढ़ी को वह शर्तिया खतरे में धकेलता है। किसी भी जिम्मेदार और समझदार समाज को एक ऐसे इतिहास में जीने की कोशिश नहीं करना चाहिए जो कि कभी हुआ ही नहीं है। ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बिना सत्तारूढ़ राजनीतिक दल अपनी पहल से किसी सेक्स-शिक्षा को शुरू कभी नहीं करेंगे, उन्हें उन वोटरों की नाराजगी की आशंका होगी, जिन्हें खुद राजनीतिक दलों ने पाखंडी बना रखा है। इसलिए जरूरत पड़े तो कोई जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में लगाना चाहिए, और बताना चाहिए कि वोटरों के मोहताज राजनीतिक दल कभी अपनी सरकार रहते यह काम नहीं करेंगे, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ही वैज्ञानिक समझ रखने वाले मनोचिकित्सकों और शिक्षाशास्त्रियों की एक विशेषज्ञ कमेटी बनाकर देश में देह या सेक्स-शिक्षा लागू करे।

(Daily Chhattisgarh)

तथाकथित इंसानियत महज किस्सों में होती है, असल जिंदगी में...

  19 मई, 2023 

  

अभी एक पश्चिमी देश से एक घटना सामने आई। आदमी-औरत का एक जोड़ा 18 महीने से साथ रह रहा था, और उनका रिश्ता ठीक-ठाक ही चल रहा था। अचानक महिला की नजर अपने जोड़ीदार के लैपटॉप पर पड़ी जो कि खुला हुआ था, और उस पर कुत्ते के एक खूबसूरत पिल्ले की तस्वीर देखकर उसने उसे क्लिक किया। वह देखकर सदमे में आ गई कि उसका 57 बरस का जोड़ीदार उसकी (महिला की) तस्वीरें छुपे हुए कैमरों से ले रहा था, और नहाते, कपड़े बदलते उसकी नग्न तस्वीरों को पोर्नो वेबसाइटों पर पोस्ट कर रहा था। इसके साथ-साथ वह इस महिला के फेसबुक की प्रोफाइल फोटो को भी डाल रहा था ताकि लोगों को पता लग जाए कि ये नग्न तस्वीरें किसकी हैं। यह बदला लेने के लिए किसी भूतपूर्व प्रेमी का किया हुआ काम नहीं था, बल्कि वर्तमान प्रेमी, लिव इन पार्टनर, 57 बरस के कारोबारी आदमी ने जगह-जगह कैमरे लगाकर अपनी साथी की ऐसी तस्वीरें खिंचीं थीं, और उनके नीचे गंदे कमेंट भी पोस्ट किए थे। 

बदला लेने के लिए तो दुनिया में प्रेम के वक्त के अंतरंग वीडियो का नाजायज इस्तेमाल बहुत मामलों में दिखता है, लेकिन साथ जीते हुए भी लोग ऐसा कर सकते हैं, यह हक्का-बक्का करने वाली बात है। परिवार के भीतर किस तरह जुर्म होते हैं, इस बारे में अभी हफ्ते भर पहले ही हमने इसी जगह पर लिखा था, लेकिन अभी दो दिन पहले एक और मामला सामने आया है कि हमारे ही इलाके में एक नौजवान ने मां-बाप और दादी को मारकर घर के आंगन में ही जला डाला, वह इनकी दौलत पर काबिज होना चाहता था, और पिता की जगह सरकारी नौकरी पाना चाहता था। अब लगता है कि लोग आखिर किस किस्म की औलादों की उम्मीद करते हुए उनके लिए अपनी जिंदगी भर की कमाई छोडक़र जाते हैं, उन्हें वारिस बनाकर जाते हैं। इसी महिला के मामले को देखें जो भरोसे के साथ अपने प्रेमी के साथ रह रही थी, और अब उसके खुफिया कैमरों से खिंची अपनी तस्वीरें पोर्नो वेबसाइटों को देखकर वह उसके खिलाफ अदालत तक पहुंची है। 

आज इस मामले पर लिखने का मकसद यही है कि लोग परिवार और प्रेम को लेकर जरूरत से अधिक भरोसे में जी रहे हों, तो वे जाग जाएं। कितना ही गहरा प्रेम हो, कितना ही करीबी रिश्ता हो, बहुत से मामलों में इंसान जिंदगी के तमाम मूल्यों और सिद्धांतों को खोकर, छोडक़र, महज अपने बदन की भूख पर उतर आते हैं, यह परले दर्जे के मतलबपरस्त होकर दूसरे सबको मारकर भी उनकी दौलत पर काबिज होना चाहते हैं। वे कुछ मिनटों के अपने देहसुख के लिए घर के बच्चों से बलात्कार पर उतारू हो जाते हैं, या आसपास के बच्चों को चॉकलेट का लालच देकर उनसे बलात्कार करते हैं। दिक्कत यही हो जाती है कि समाज में तथाकथित इंसानियत के साथ जितने किस्म के मूल्य जोड़ दिए गए हैं, उन मूल्यों को लोग समाज में आम इस्तेमाल हो रहे मान लेते हैं। होता यह है कि इंसान के भीतर वह हैवानियत भी बराबरी से काबिज रहती है जिसे लोग इंसान के बाहर की कोई चीज बताना चाहते हैं। वह इंसानियत का ही एक हिस्सा है, और बेहतर बन चुके इंसान उस हैवानियत पर काबू रखते हैं। यह काबू भी कब तक रह पाता है, इसका कोई ठिकाना नहीं रहता। इसलिए एक आदमी अपनी लिव इन पार्टनर, प्रेमिका की नग्न तस्वीरें खुफिया कैमरों से खींचकर उसे पोर्नो वेबसाइट पर पोस्ट करता है, और उसका मजा लेता है। कुछ लोग यह भी कह सकते हैं कि यह आदमी किसी मानसिक बीमारी का शिकार था, लेकिन हकीकत तो यह है कि अधिकतर लोगों के बीच किसी न किसी किस्म की कोई मानसिक खूबी या खामी रहती है, वह अक्सर छुपी रहती है, और कभी मौका मिलने पर बाहर निकलती है। 

आज का वक्त ऐसा है कि टेक्नालॉजी ने हर हाथ में एक कैमरा और रिकॉर्डर थमा दिया है, जो आपको बहुत पसंद हैं, वे अपने मन में आपके लिए कैसी भावना रखते हैं, उसका भी कोई अंदाज नहीं लग सकता। लोगों को याद होगा कि चाल्र्स शोभराज नाम का एक चर्चित हत्यारा बहुत सी लड़कियों को प्रेमिका बनाते रहता था, और उनके कत्ल भी करते रहता था। वह दिखने में आकर्षक था, और लड़कियों को लुभाता भी रहा होगा, तभी वह अनगिनत लड़कियों को प्रेम का झांसा देकर उन्हें कत्ल कर पाया। लोगों को अपनी जिंदगी में दिल पर भरोसे से अधिक अक्ल पर भरोसा करना चाहिए। अक्ल यही कहती है कि अपने बहुत करीबी लोगों से प्रेम रखते हुए भी इतनी सावधानी तो बरतनी ही चाहिए कि वे आपको तबाह न कर सकें। किसी के भी हाथ में इतनी ताकत नहीं देना चाहिए कि वह आपकी जीने की ताकत को पल भर में खत्म कर सकें। किसी को भी किसी दूसरे पर इतना भरोसा करने के पहले अपने तन-मन के प्रति, अपने जीवन के प्रति, अपनी जिम्मेदारी के बारे में पहले सोचना चाहिए। कोई भी जिंदगी हर दर्जे का धोखा खाकर जी नहीं सकती, छोटे धोखों से तो वह उबर सकती है, लेकिन बहुत बड़े धोखों से वह बाकी सांसों के खत्म हो जाने तक भी नहीं उबर पाती। किसी समझदार ने एक वक्त कहा था कि अपनी बहुत गोपनीय बात, अपने रहस्य, अपने सबसे करीबी इंसान को भी न बताएं, क्योंकि आप अगर इन बातों को बताए बिना नहीं रह पाए, तो वे करीबी लोग किसी और को बताए बिना कैसे रह लेंगे? और यह बात तो याद रखना ही चाहिए कि आज जो सबसे करीबी दोस्त हैं, वे किसी दिन दुश्मन भी बन सकते हैं, और आज उनसे बांटा गया अपने दिल का बोझ उस दिन उनके हाथ इतना बड़ा हथियार रहेगा जिससे कि वे आपको तबाह कर सकें। 

पश्चिम के इस ताजा मामले से तमाम लोगों को सबक लेना चाहिए, किसी भी और के प्रति भरोसे से पहले अपने प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने की कोशिश करें, क्योंकि आप अगर लापरवाह रहेंगे, तो दुनिया में किसी और पर उसके लिए सावधान रहने की जिम्मेदारी नहीं बनती। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 मई 2023


 (Daily Chhattisgarh)

सुप्रीम कोर्ट से नाजायज टकराव में ओवरटाइम करते कानून मंत्री बिदा

 18 मई, 2023 

  

केन्द्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू को चर्चित कानून मंत्रालय से हटाकर एक ऐसे मंत्रालय में भेजा गया है जिसका नाम और काम भी लोगों को ठीक से समझ नहीं आ रहा है। उन्हें अब पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय दिया गया है। दूसरी तरफ कानून मंत्रालय राज्यमंत्री अर्जुन राम मेघवाल को स्वतंत्र प्रभार के रूप में दे दिया गया है। आज केवल यही एक फेरबदल सामने आया है, और इसे लेकर देश के प्रमुख वकील, और भूतपूर्व कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने ट्वीट करके मजा लिया है। उन्होंने लिखा है- किरेन रिजिजू, कानून नहीं, अब पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, कानूनों के पीछे का विज्ञान समझना आसान नहीं होता, अब विज्ञान के कानूनों के साथ भिडऩा, गुड लक माई फ्रेंड। 

दरअसल किरेन रिजिजू पिछले एक-दो बरस से लगातार सुप्रीम कोर्ट के साथ टकराव के अंदाज में एंग्री यंग मैन बनकर खड़े हुए थे। कोई सार्वजनिक मंच ऐसा नहीं रहता था जहां से वे सुप्रीम कोर्ट को कोंचने से बाज आते हों। नतीजा यह था कि सार्वजनिक जीवन में, मीडिया और सोशल मीडिया पर केन्द्र सरकार लगातार सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ हमलावर दिख रही थी। किरेन रिजिजू का मंत्रालय सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों से जुड़े हुए मामलों को समय पर निपटा नहीं रहा था, और यह भी हो सकता है कि उन्हें समय पर निपटाना पूरी केन्द्र सरकार का एक फैसला ही रहा हो, जो भी हो, मामलों से लदी हुई अदालतों की खाली कुर्सियों पर फैसले के बजाय कानून मंत्रालय बड़ी-बड़ी बातें कर रहा था, और सुप्रीम कोर्ट से जुबान लड़ा रहा था। यह एक बहुत ही शर्मनाक नौबत चल रही थी, और जाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा संवेदनशील जज ऐसे सरकारी रूख को लेकर आहत भी थे, और नाराज तो रहे ही होंगे। ऐसे में जब पहले बाम्बे हाईकोर्ट, और फिर सुप्रीम कोर्ट में वकीलों की तरफ से उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और किरेन रिजिजू  के बयानों को लेकर एक जनहित याचिका लगाई गई कि इनके बयान अदालतों के लिए अपमानजनक हैं, और संविधान के खिलाफ भी हैं, तो पहले बाम्बे हाईकोर्ट ने उसे खारिज किया, और फिर उसके खिलाफ अपील को सुप्रीम कोर्ट ने भी खारिज किया। अदालत ने दरियादिली दिखाते हुए यह कहा कि हाईकोर्ट का नजरिया ठीक है, अगर किसी जिम्मेदार पद पर बैठे हुए लोग कोई नाजायज बयान देते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट उसे सही नजरिये से देखने में सक्षम है। अदालत ने इस याचिका को खारिज करते हुए कोई कड़ी टिप्पणी भी नहीं की। 

लोगों को याद होगा, और इस जगह पर हमने पहले कई बार लिखा भी है कि कानून मंत्री की हैसियत से किरेन रिजिजू एक निहायत ही गैरजरूरी और नाजायज टकराव खड़ा कर रहे थे। वे सुप्रीम कोर्ट को एक किस्म से उसकी औकात समझाने पर आमादा थे, जो भी औकात वे सुप्रीम कोर्ट की समझते थे। वे मौजूदा और रिटायर्ड जजों के खिलाफ अपनी बयानबाजी को दुहराते रहते थे, और कुछ रिटायर्ड जजों के बारे में उन्होंने कहा था कि वे एंटी इंडिया ग्रुप का हिस्सा बन गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम सिस्टम को लेकर भी उन्होंने अपमानजनक और हिकारत वाले बयान दिए थे, और जजों को नीचा दिखाने की उनकी नीयत बार-बार उनकी जुबान पर आती थी। यह बात सही है कि आज सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और कई दूसरे जज केन्द्र सरकार को उतनी सहूलियत के नहीं लग रहे होंगे जितने कि बाकी जज पिछले बरसों में लगते आए हैं। लेकिन एक ईमानदार अदालत किसी भी देश-प्रदेश में सत्ता के गलत कामों के खिलाफ जब ईमानदार फैसले देगी, तो वह सत्ताविरोधी तो लगने लगेगी। जब सत्ता बेइंसाफ हो जाए, और अदालत महज संवैधानिक इंसाफ करे, तो भी वह टकराव की मुद्रा में देखी जा सकती है। अभी सुप्रीम कोर्ट के साथ केन्द्र सरकार के रिश्ते कुछ इसी तरह के चल रहे थे। अदालत और सरकार के रिश्ते मधुर भी नहीं रहने चाहिए, लेकिन उनमें मुकाबले की कड़वाहट नहीं रहनी चाहिए। संविधान में इन दोनों की बिल्कुल अलग-अलग भूमिकाएं तय हैं, और जब सरकार वक्त पर अपना काम न करने के लिए बदनाम हो, और वह सुप्रीम कोर्ट पर हमले करती रहे, तो उससे लोगों की नजर में सरकार खलनायक की तरह दिख रही थी। अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री रहते हुए उनका कोई अदना सा मंत्री सुप्रीम कोर्ट से इतना बड़ा टकराव लेने का फैसला खुद करता हो। इसलिए हटाया चाहे किरेन रिजिजू को हो, यह नौबत सरकार पर भी झलकती है। 

इसी किस्म की बड़बोली बातें उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ लगातार कर रहे थे, और वे बिना किसी औपचारिक भूमिका के हर मंच और माइक से अवांछित बातें बोल रहे थे, जो कि न सिर्फ अदालत को नीचा दिखा रही थीं, बल्कि हिन्दुस्तान के संविधान के सबसे बड़े अदालती फैसले पर भी सवाल उठा रही थीं। केशवानंद भारती नाम से चर्चित देश के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे बड़ा अदालती फैसला देश के संविधान की अब तक की सबसे बड़ी व्याख्या माना जाता है, और धनखड़ लगातार उस फैसले के खिलाफ बोल रहे थे। मोदी सरकार चाहे जिस वजह से इस फेरबदल पर पहुंची हो, यह मानना ठीक होगा कि इससे देश की हवा में एक गंदगी घुलना बंद होगा, और उपराष्ट्रपति को भी शायद यह समझ आएगा कि नाजायज बातें करने का क्या नतीजा निकला है। जैसा कि कपिल सिब्बल ने कहा है किरेन रिजिजू अब विज्ञान के सिद्धांतों से टक्कर ले सकते हैं, और डार्विन के सिद्धांतों को स्कूली किताबों से खारिज करके केन्द्र सरकार ने उनके लिए एक संभावना खड़ी की हुई है। वे वहां जोर आजमाईश करें क्योंकि डार्विन की अदालत में केन्द्र सरकार के मुकदमे नहीं खड़े हैं। 

(Daily Chhattisgarh)