26 नवंबर 2012
किसी अच्छे काम का भी क्या कोई बुरा नतीजा हो सकता है? आज की असल जिंदगी में ऐसे बहुत से मामले होते हैं जिनमें किसी अच्छी तकनीक से लेकर सरकार की किसी अच्छी योजना तक, बहुत सी बातों का बुरा नतीजा हो सकता है। और जब एक आम नजरिए से किसी जटिल या फैले हुए मुद्दे को टुकड़े-टुकड़े में देखा जाता है, तो कोई टुकड़ा अपने-आपमें बहुत भला लग सकता है, लेकिन उसके साथ के वैसे दूसरे टुकड़े उससे बिल्कुल ही अलग हकीकत बयां करने वाले हो सकते हैं।
कुछ मिसालों के साथ अगर बात करें, तो देश भर में जगह-जगह रियायती राशन, खेती के लिए मुफ्त या रियायती बिजली के चलते हुए बहुत से लोगों का यह मानना है कि मजदूरों का या देश की अर्थव्यवस्था का उससे एक नुकसान भी हो रहा है। खेती की रियायती बिजली से छत्तीसगढ़ जैसे धान उत्पादक राज्य धरती के जितने पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे होने वाला नुकसान अभी तुरंत नहीं दिख रहा है, और हो सकता है कि यह इस राज्य में कभी भी न दिखे, और धरती पर कुल मिलाकर इसका असर पड़े।
कुछ जानकारों का यह भी मानना है कि धान की फसल के लिए जरूरी पानी इतनी आसानी से मुफ्त की बिजली से मिल जाने की वजह से, और धान के हर दाने के वाजिब दाम पर, आनन-फानन खरीद लिए जाने पर यहां के किसान किसी दूसरी फसल के बारे में कम सोच पा रहे हैं। दूसरी तरफ एक तबके का यह मानना है कि धान का सिलसिला जब छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में इतना मजबूत हो गया है, तो उसका दूसरा नतीजा यह हो रहा है कि धान से परे की स्थानीय और असंगठित परंपरागत फसलें, कोदो या कुटकी, या इस तरह के दूसरे मोटे अनाज अब उगाना भी बंद हो गया है, और रियायती चावल के चलते अब गरीब-आदिवासियों के खाने में चावल से परे की विविधता भी खत्म हो रही है।
विविधता जहां भी खत्म होती है, उसके नुकसान इतनी पीढिय़ों के बाद पता लगते हैं कि तब तक इतिहास की किताबों को दीमक खा चुके रहते हैं और ऐसे नुकसान के लिए जिम्मेदार सोच भी चल बसी होती है। मोटे तौर पर यह समझने की जरूरत है कि कुदरत ने इतनी विविधता खड़ी ही न की होती अगर वह दुनिया की बेहतरी की न होती। लेकिन बात सिर्फ विविधता की नहीं है कि विविधता से परे की जाहिर तौर पर अच्छी दिखने वाली योजनाओं के कुछ बुरे नतीजे भी चार कदम पीछे चलकर आते हैं। दूसरी भी बहुत सी अच्छी बातें ऐसी होती हैं जिनके बुरे नतीजे होते हैं।
अब जैसे देह के धंधे को लें, तो दुनिया का सबसे पुराना पेशा कहे जाने वाला यह काम भारत जैसे देश में आम तौर पर लुके-छुपे चलता है। सरकार ने इस काम को गैरकानूनी और जुर्म बना रखा है, इसलिए लोगों की यह जरूरी जरूरत परदे के पीछे ही पूरी होती है। एक वक्त था जब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर जैसे छोटे शहर में भी एक संगठित और जाना-पहचाना रेडलाईट एरिया था। धंधा करने वाली महिलाएं वहीं बसी हुई थीं, उन सबकी पुलिस या सरकार को शिनाख्त भी थी, और उनसे अगर किसी को कोई बात करनी होती थी, तो जाकर बात की जा सकती थी। वह इलाका सरकार के उत्साही अफसरों ने खत्म कर दिया, क्योंकि वह कानून के खिलाफ था, लेकिन दुनिया का कोई कानून इस जरूरत को किसी भी देश में न तो खत्म कर पाया है और न ही इस धंधे को।
आज पूरे हिंदुस्तान में देह का धंधा टेलीफोन पर चलने लगा है, और जिन शहरों में भी चकलाघर थे, उनसे परे यह काम घर बैठे या राह चलते होने लगा है। नतीजा यह हुआ है कि मोबाइल नंबरों की सहूलियत के साथ अब ऐसा ध्ंाधा करने वाली महिलाएं (हालांकि बहुत छोटी गिनती में ऐसा धंधा करने वाले आदमी भी हैं, इसलिए महज औरतों को कोसना एक किस्म से बेइंसाफी भी होगी) कानून की पकड़ से लगभग हमेशा ही बाहर रहेंगी, और उसमें हमें कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि हम इस धंधे को कानूनी बनाने के हिमायती हैं, दिक्कत यह है कि वे किसी भी इलाज या जांच से भी परे रहेंगी।
दुनिया के जिन देशों में वेश्यावृत्ति कानूनी है, वहां पर वेश्याओं से संगठित गुंडों और पुलिस की उगाही खत्म सी हो जाती है। दूसरी तरफ वे दलालों को बड़ा हिस्सा दिए बिना खुद अपनी कमाई पाती हैं। अब यहां पर अच्छी बात के बुरे नतीजे वाली दो बातें हैं। एक तो वेश्यावृत्ति के खिलाफ जाहिर तौर पर अच्छा दिखने वाला कानून किस तरह इस धंधे में जुर्म को बढ़ावा दे रहा है, यह जाहिर है। दूसरी बात यह कि एक अच्छी तकनीक, मोबाइल फोन, की सहूलियत की वजह से अब वेश्याएं सेहत को बचाने के कार्यक्रमों की पहुंच से बाहर हो गई हैं। आज सरकार या कोई स्वास्थ्य संगठन चाहे कि वे पेशा करने वाली महिलाओं तक पहुंचकर उन्हें एड्स से बचाव के तौर-तरीके समझाएं, तो यह तबका अब हवा में घुल चुका है।
न्यूयॉर्क टाईम्स में मुंबई की एक रिपोर्ट छपी है कि किस तरह अब वहां के बड़े पुराने और बड़े-बड़े चकलाघर धंधा खो रहे हैं क्योंकि अब देह का धंधा करने वाली महिलाएं मोबाइल फोन पर ही कहीं भी ग्राहक जुटा लेती हैं, और चकलाघर नाम की इमारत में उनकी मौजूदगी घटती चली जा रही है।
इसका नतीजा यह हो रहा है कि ऐसी बिखरी हुई महिलाओं के बीच एड्स जैसी जानलेवा बीमारी का फैलाव अंदाज के बाहर हो गया है, बल्कि सरकारी आंकड़े भारत में एड्स को, एचआईवी को घटता हुआ भी बतलाने लगे हैं। अब सवाल यह उठता है कि संगठित चकलाघर के बिखर जाने के बाद चारों तरफ बिखरी यहां की महिलाओं में से, इस धंधे में आने वाली नई महिलाओं में से, कितनों तक सरकारी आंकड़ों की पहुंच हुई होगी? लेकिन आज का मुद्दा सिर्फ यह धंधा नहीं है, बल्कि कई अच्छी तकनीकों और योजनाओं का बुरा नतीजा भी है।
अब न नई तकनीक को रोका जा सकता, और न ही योजनाओं को उनके मामूली बुरे असर की वजह से टाला जा सकता। यह कुछ उसी तरह का है कि किसी दवा का भला असर होने के साथ-साथ उसका एक बुरा असर भी होता है, लेकिन भले असर के अधिक मायने रखने की वजह से उस बुरे असर को अनदेखा किया जाता है। मोबाइल फोन हो, या रियायती बिजली हो, या सरकार की बेहतर मजदूरी वाली योजनाएं हों, इन सबसे जो भी नुकसान हो रहे हैं, उनका अंदाज मान लें कि पहले लगा पाना मुमकिन भी नहीं था, तो भी अब इनके शुरू होने के बाद उनका अंदाज लगाना चाहिए और उनसे बचाव के रास्ते निकालने चाहिए।
अब जैसे छत्तीसगढ़ में सरकार ने करीब सौ रुपये में गरीबों को पैंतीस किलो चावल देने की योजना बनाई। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इसकी वजह से गरीब तबके में शराबखोरी बढ़ी है, यह तबका निकम्मा हो गया है, मजदूरों के बाजार में या तो मजदूर मिलते नहीं, या फिर उनकी मजदूरी बहुत बढ़ गई है। हो सकता है कि इसमें से तमाम बातें कुछ या अधिक हद तक सच भी हों, लेकिन सरकार की इतनी बड़ी योजना के साथ-साथ अगर इस तबके में जागरूकता का एक अभियान भी चलता कि रियायती चावल के अलावा भी परिवार की सेहत और पढ़ाई, इलाज और बेहतरी की बहुत सी जरूरतें हैं, और गरीबों को न कोई फिजूलखर्ची करनी चाहिए और न ही कामचोरी। तो ऐसी जागरूकता से हो सकता है कि सरकार की जनकल्याण की योजनाओं का फायदा लोगों को अधिक होता, और भले कार्यक्रमों के बुरे नतीजे घटते।
ऐसी मिसालें अनगिनत हैं। टीवी के बढ़ते हुए चैनलों के साथ-साथ हिंदी के मनोरंजक चैनलों में महिलाओं के नाम पर जैसे नुकसानदेह टीवी सीरियल एकता कपूर जैसे लोग बना रहे हैं, उससे देश की आबादी का एक हिस्सा तो दिमागी रूप से बीमार या विचलित हो ही चुका है। अब टीवी की तकनीक इसमें क्या कर सकती है? एक भली तकनीक का भी बुरा नतीजा ऐसा हो सकता है, और उससे बचाव के कुछ दूसरी रास्ते ही निकालने होंगे। किसी सरकार या समाज की दूरदर्शिता ऐसे में काम आती है कि बदलते वक्त और तकनीक के साथ-साथ खड़े होते जाते नुकसानों को कम करने की कोशिश रोजाना जारी रहे।