दीवारों पर लिक्खा है, 31 दिसंबर 2023


 

पार्टियों से अलग दिख रही नेताओं की बयानबाजी अनायास, या सोची-समझी?

31 दिसंबर 2023  

  

अगले लोकसभा चुनाव को लेकर उद्धव ठाकरे की लीडरशिप वाली शिवसेना के प्रवक्ता और बड़े नेता संजय राउत ने अभी कहा था कि सीटों के बंटवारे पर कांग्रेस के साथ उनकी बातचीत शून्य से शुरू होगी, क्योंकि राज्य में उसके पास कोई भी लोकसभा सीट नहीं है। उन्होंने यह भी याद दिलाया था कि कांग्रेस को यह बात याद रखना चाहिए कि अभी-अभी वह तीन राज्यों में चुनाव हारी है। संजय राउत ने यह भी कहा था कि शिवसेना महाराष्ट्र में 23 सीटों पर लड़ेगी। इसके पहले महाराष्ट्र के कांग्रेस नेताओं ने शिवसेना के विभाजित होने पर तंज कसा था, और इसके जवाब में संजय राउत ने कहा था कि कांग्रेस विभाजित तो नहीं है, लेकिन वह तीन राज्य हार गई है। मानो इन सबके जवाब में, और कांग्रेस की स्वाभाविक नाराजगी को घटाने के लिए उद्धव ठाकरे ने कहा है कि वे ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे जिससे महाराष्ट्र के गठबंधन को नुकसान पहुंचे। उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र में उद्धव-शिवसेना का एनसीपी और कांग्रेस के साथ गठबंधन राज्य शासन में भी था, और विपक्ष में आने के बाद भी वह जारी है। उद्धव ने कहा कि वे इस तरह के बयान देने वाले लोगों पर ध्यान नहीं देंगे, और जब तक कांग्रेस अध्यक्ष सीट बंटवारे पर नहीं बोलेंगे, तब तक न तो मैं, और न ही मेरी तरफ से कोई और टिप्पणी करेंगे। 

अभी दो-चार दिन पहले ही कांग्रेस के ओवरसीज संगठन के मुखिया, सैम पित्रोदा ने एक समाचार एजेंसी को अयोध्या की प्राण-प्रतिष्ठा को लेकर यह कहा था कि भारत के लोगों को तय करना होगा कि क्या वे देश को एक हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते हैं, या फिर वे एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं जो वास्तव में धर्मनिरपेक्ष हो, और जिसमें तमाम विविधताओं की जगह हो। उन्होंने कहा था कि मंदिर देश का मुख्य मुद्दा नहीं बन सकता है, और लोगों को तय करना है कि बेरोजगारी, महंगाई या राम मंदिर, असली मुद्दे क्या हैं। इसके तुरंत बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता जयराम रमेश ने इस बयान को पार्टी का नजरिया मानने से इंकार कर दिया था, और कहा था कि यह सैम का निजी विचार होगा, यह पार्टी की सोच नहीं है। उल्लेखनीय है कि अयोध्या में 22 जनवरी को प्राण-प्रतिष्ठा में शामिल होने या न होने पर अलग-अलग पार्टियों के अलग-अलग रूख सामने आ रहे हैं, और कुछ पार्टियों ने जाने से इंकार कर दिया है, कुछ को न्यौता नहीं मिला है, और कुछ का फैसला अभी सामने नहीं आया है। इस बीच में विदेश में बसे हुए सैम पित्रोदा को कांग्रेस के एक जिम्मेदार ओहदे पर रहते हुए, और राहुल गांधी के तमाम विदेशी कार्यक्रमों के इंचार्ज भी रहते हुए क्या कहना चाहिए था, और क्या नहीं, इस पर उनकी खुद की समझ जमीन से कटी हुई, और कमजोर दिखती है।

हम पहले भी इस मुद्दे पर कई बार कह चुके हैं कि राजनीतिक दलों के अनगिनत नेता और प्रवक्ता जटिल और नाजुक मुद्दों पर अपनी निजी राय धड़ल्ले से पेश करते रहते हैं, और शायद खबरों में जगह पाने के लिए उन्हें ऐसा जरूरी लगता है। सवाल यह है कि राजनीतिक दल अपने लोगों की जुबान पर लगाम क्यों नहीं लगा सकते? कम से कम जो जलते-सुलगते मुद्दे हैं, जिनसे सहयोगी दलों का लेना-देना है, या जिनसे देश की जनभावनाएं जुड़ी हुई हैं, उन पर पार्टी के औपचारिक सार्वजनिक रूख से परे अलग-अलग बातें लोग क्यों करते हैं? इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि हम कुछ अधिक तर्कसंगत होकर सोच रहे हैं, और राजनीतिक दल सोच-समझकर ऐसी धुंध फैलाकर रखते हैं ताकि वोटरों का रूख भांपा जा सके। ऐसा तो हो नहीं सकता कि पार्टी अपने लोगों को कुछ मुद्दों पर बयानबाजी न करने को कहे, उसके बाद भी लोग बयान देते ही रहें। भाजपा के कई नेताओं ने अलग-अलग मौकों पर बहुत ही साम्प्रदायिक और हिंसक बयान भी दिए हैं, जिनमें से कुछ गिने-चुने बयानों से पार्टी ने अपने को अलग भी किया है, लेकिन उनमें से अधिकतर बयानों का कोई खंडन नहीं होता। तो यह समझने की जरूरत है कि क्या यह वोटरों के बर्दाश्त को तौलने का एक तरीका रहता है कि और कितनी हिंसक बात कही जा सकती है? यह तो होता ही है कि लोकतंत्र में हर हिंसक और नफरती बयान धीरे-धीरे पहले के कम हिंसक और कम नफरती बयान को बेअसर करते चलते हैं, और नफरत-हिंसा की नई ऊंचाई एक नई सामान्य भाषा बनकर स्थापित हो जाती है। 

किसी गठबंधन की जमीन अभी तैयार हो ही रही है, और उसके बीच अगर लगातार हर साथी दल की तरफ से बयानबाजी चलती रहेगी, तो उसका नतीजा क्या होगा? किसी गठबंधन पर पार्टी का बयान देने के लिए हर पार्टी को अपने किसी एक नेता को अधिकृत करना चाहिए कि उनसे परे कोई और गठबंधन के मामलों में कुछ भी नहीं कहेंगे। उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस के कुछ नेताओं, और संजय राउत के बीच की बयानबाजी को लेकर उसका जिक्र किए बिना जो कहा है कि वे कांग्रेस अध्यक्ष के बयान पर ही प्रतिक्रिया देंगे, वह एक बहुत समझदारी का रूख है। बड़बोले लोगों के आए दिन के बयानों से गठबंधन का तो नुकसान होगा ही, खुद ऐसे लोगों की पार्टियों का भी नुकसान होगा। यह सिलसिला शुरू नहीं होने देना चाहिए। पार्टियों को यह तय करना चाहिए कि किस तरह के आम मुद्दों पर पार्टी के नेता क्या कहें, और किन खास मुद्दों पर कुछ पूछे जाने पर भी वे अपनी पार्टी के अधिकृत नेता का नाम बता दें कि इस बारे में वे ही कुछ कह सकेंगे। 

दूसरी बात यह भी है कि कुछ जरूरी मुद्दों पर पार्टी के सबसे अधिकृत व्यक्ति को समय रहते साफ-साफ बयान देना चाहिए, और उसे निजी राय के रूप में पेश भी नहीं करना चाहिए। जब पार्टी के प्रवक्ता यह कहते हैं कि उनका ऐसा सोचना है, या वे ऐसा मानते हैं, तो ऐसे प्रवक्ता एक गलतफहमी पैदा करते हैं। प्रवक्ता को निजी राय का इस्तेमाल ही नहीं करना चाहिए, उसे सीधे-सीधे पार्टी का रूख ही बताना चाहिए। और जब दूसरे नेता कुछ कहें तो उन्हें साफ कर देना चाहिए कि यह उनका निजी विचार है, और इसे पार्टी की ओर से कोई मंजूरी मिली हुई नहीं है। भारत के राजनीतिक दल बहुत अनुभवी हैं, और उन्हें ऐसी किसी नसीहत की जरूरत होनी नहीं चाहिए, लेकिन तरह-तरह की बकवास से लोकतंत्र का भी खासा समय खराब होता है, इसलिए सार्वजनिक जीवन के लोगों को, राजनीति से परे भी, अवांछित बातें कहने से बचना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

बाजार की साजिश ने इंसानों को बना दिया वफादार ग्राहक

31 दिसंबर 2023 

 

इन दिनों सार्वजनिक जगहों पर बहुत से लोग इत्र की दुकान की तरह महकते हुए दिखते हैं। नौजवानों में मामूली आर्थिक हैसियत के बहुत से लडक़े-लड़कियां भी कुछ न कुछ सुगंध लगाए दिखते हैं। पसीने और बदन की बदबू को दबाने के नाम पर बहुत सी कंपनियां अपने डियो (डियोडोरेंट) की ऐसी आक्रामक मार्केटिंग करती हैं, और अनगिनत फिल्मी सितारे, या खिलाड़ी ऐसे स्प्रे के बाद ही अपने आत्मविश्वास के जागने का दावा करते हैं। ऐसी मॉडलिंग और ब्रांड प्रमोशन के बाद यह जाहिर है कि लोग अपने बदन की स्वाभाविक गंध को बदबू मान लेते होंगे, और किसी स्प्रे के सहारे के बिना वे अपने आपको आत्मविश्वास की बैसाखी के बिना चलने वाले महसूस करते होंगे।

दरअसल बाजार लोगों में हीनभावना और बेचैनी भरकर अपना कारोबार करता है। फैशन और मेकअप का बहुत बड़ा कारोबार अमरीकी सितारों से लेकर अमरीकी छरहरी गुडिय़ा, बार्बी डॉल के बदन के आकार के असर से चलता है। अभी अधिक वक्त नहीं हुआ जब दुनिया के सिगरेट और शराब के सबसे बड़े ब्रांड चर्चित चेहरों के कंधों पर सवार होकर ग्राहकों को लुभाने निकलते थे। हिन्दुस्तान में भी सिगरेट का एक बड़ा ब्रांड देश भर के जोड़ों को एक मुकाबले में बुलाता था, जिनमें सबसे अच्छा जोड़ा दिखने वाले पति-पत्नी को सिगरेट की मॉडलिंग के लिए छांटा जाता था। इस तरह नए कानून बनने के पहले तक बाजार लगातार बुरी आदतों को बढ़ाने के लिए भी हर किस्म के हथियारों वाले हमले इस्तेमाल करता था। आज भी हिन्दुस्तान में सिगरेट और शराब के इश्तहारों पर रोक रहने पर भी, उन्हीं नामों के दूसरे सामान बनाकर, उसी ब्रांड से बाजार में बेचने की धोखाधड़ी धड़ल्ले से चलती है, और कारोबार के दबाव में रहने वाली सरकारें इसे अनदेखा भी करते रहती हैं।

बाजार की तकनीक कुछ-कुछ राजनीतिक दलों सरीखी रहती है जो कि लोगों के मन में किसी तरह की दहशत, किसी तरह की नफरत, किसी तरह की धर्मान्धता, कट्टरता भरते हैं, फिर किसी काल्पनिक दुश्मन की गढ़ी गई तस्वीर दिखाकर खतरे बताते हैं, और वोटरों को यह सोचने को मजबूर करते हैं कि फलां नेता या राजनीतिक दल को वोट दिए बिना हिफाजत नहीं है। 

बाजार ऐसा ही करता है। लोगों को उनके बदन के आकार से हीनभावना का शिकार बना देता है, उन्हें अपने रंग को लेकर इतना बेचैन कर देता है कि माइकल जैक्सन जैसे लोग दर्जनों बार की प्लास्टिक सर्जरी से अपना रंग बदलवाते रहे, नाक को धार लगवाते रहे, और बेचैनी में ही मर भी गए। हिन्दुस्तान में भी फेयरनेस क्रीम का कारोबार आसमान चीरकर आगे बढ़ते रॉकेट की तरह बढ़ते रहा, और वह पूरी तरह से हीनभावना पर जिंदा बाजार था, जिसे देश के सबसे चर्चित, शाहरूख खान सरीखे फिल्म अभिनेता बढ़ावा देते रहे। 

देश के सबसे बड़े फिल्मी सितारे, सबसे बड़े क्रिकेट खिलाड़ी जब गैरजरूरी चीजों को बेचकर खुद अरबपति होते हैं, और वैसे ब्रांड के मालिकों को खरबपति बनाते चलते हैं, तो उस हमले के सामने साधारण सोच के जिंदा रह पाने की गुंजाइश नहीं रहती। देश के तीन-तीन, चार-चार सबसे बड़े सितारे जब कोई गुटखा बेचते हैं, तो नौजवानों को कैसे उसके इस्तेमाल से बचाया जा सकता है? जब देश की कुछ सबसे सुंदर चर्चित लड़कियां और महिलाएं हर कुछ महीनों में बदले जा रहे फैशन का बाजार खड़ा करने के लिए न सिर्फ इश्तहारों में, बल्कि मीडिया की दूसरी मासूम दिखती, लेकिन खरीदी गई जगहों पर भी छाई रहती हैं, तो देश की लड़कियां और महिलाएं उनके बिना अपने आपको समाज और अपने दायरे की दौड़ से बाहर पाती हैं। 

बाजार के हमले का सामना कर पाना आसान नहीं है, क्योंकि इन हमलों और इसके हथियारों को, इनकी फौजी रणनीति को दुनिया के कुछ सबसे शातिर दिमाग तय करते हैं। ये दिमाग माताओं के दिमाग में यह भरने में कामयाब हो जाते हैं कि बच्चों को अगर जिराफ की तरह ऊंचा बनाना है, उनके बदन और दिमाग को तेजी से बढ़ाना है, तो उन्हें दूध में कौन सा पाउडर घोलकर पिलाना होगा। हालत यह है कि बच्चों के खानपान को लेकर उनकी माताओं के दिमाग में इतना कुछ भर दिया गया है कि वे बच्चों के डॉक्टरों का जीना हराम किए रहती हैं। 

लोगों के मन में बेचैनी भरकर, उन्हें हीनभावना में डुबाकर, उन्हें बेहतरी के सपने दिखाकर इतना कुछ किया जाता है कि लोग बाजार की रणनीति के हिसाब से ही सोचने लगते हैं, और इंसान के बजाय ग्राहक बनकर वे अपने को अधिक महफूज महसूस करते हैं। जो सामान न हेलमेट हैं, न बुलेटप्रूफ जैकेट हैं, वे भी लोगों को हिफाजत का अहसास कराने लगते हैं। कुछ खास ब्रांड के टूथपेस्ट लोगों को यह बतलाने लगते हैं कि उनकी सांस से निकली हुई सनसनीखेज ताजगी किस तरह आसपास से गुजरती लड़कियों और महिलाओं को भी उनकी तरफ खींच देगी। लोगों के सेहतमंद खाने-पीने की एक मामूली सी समझ किनारे धरी रह जाती है, और वे ढेर-ढेर शक्कर वाले कोल्ड ड्रिंक, या एनर्जी ड्रिंक के बिना, किसी प्रोटीन ड्रिंक के बिना अपने को अधूरा पाते हैं। 

जिस तरह अखबार और टीवी चैनल, या यूट्यूब और फेसबुक के रास्ते लोगों तक पहुंचने वाली सोच उन्हें बदल दे रही है, उसी तरह हमलावर मार्केटिंग से लोगों का खानपान, रहन-सहन, सब कुछ बदल जा रहा है। लोग हजारों बरस से सामाजिक प्राणी थे, लेकिन अब बाजार की रणनीति लोगों के अलग-अलग समाज बांट दे रही हैं, और लोग ग्राहकों की अलग-अलग किस्मों के समुदाय बनते जा रहे हैं। अधिकतर लोगों को यह समझ भी नहीं पड़ रहा है कि वे किस तरह बाजार के हाथों एक कठपुतली की तरह काम कर रहे हैं, और वे अपनी जरूरत से बिल्कुल ही परे जाकर ग्राहक बनते जा रहे हैं। लोगों के पास आज किसी मोबाइल या कार का एक मॉडल अपनी पूरी क्षमता से इस्तेमाल नहीं हो पाता है कि कुछ और क्षमताओं वाले नए मॉडल लोगों के भीतर बेचैनी भरने लगते हैं। आज लोगों को अपने दोस्तों और परिवार के दायरे में यह सोचना चाहिए कि क्या उन्हें सचमुच और अधिक की जरूरत है, और नए की जरूरत है, या मौजूदा काफी है? बाजार शायद लोगों को इतना तर्कसंगत रहने नहीं देगा, और लोग एक वफादार ग्राहक की तरह अपने ब्रांड से बंधे रह जाते हैं, काल्पनिक जरूरतों को जरूरी सच मानकर उन्हें हासिल करने में जुट जाते हैं। पता नहीं बाजार की यह साजिश इंसानों को गुलाम ग्राहकों से परे भी कुछ रहने देगी या नहीं। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 दिसंबर 2023


 

पिछली सरकार की जांच भी नई सरकार की जिम्मेदारी...

30 दिसंबर 2023  

  

छत्तीसगढ़ सरकार ने कल आकार ले लिया। तीन हफ्ते पहले चुनावी नतीजे आ चुके थे, एक पखवाड़े पहले मंत्री तय हो चुके थे, लेकिन उनके विभाग तय नहीं हुए थे। एक मुख्यमंत्री, दो उपमुख्यमंत्री, कुछ 15 साल और अधिक मंत्री रह चुके मंत्री, इनके बीच हो सकता है कि विभागों का बंटवारा आसान न रहा हो, और यह भी हो सकता है कि तीन राज्यों में साथ-साथ, समानांतर चल रहे सरकार-गठन में कुछ चीजों को साथ रखकर देखा जा रहा हो, कुछ चीजों को लोकसभा चुनाव के मद्देनजर तय किया जा रहा हो। जो भी वजहें रही हों, किसी सरकार के गठन को बहुत तेज या बहुत धीमा कहना गलत होगा क्योंकि मामला पांच साल का रहता है। ये बातें हम लिख तो छत्तीसगढ़ के सिलसिले में रहे हैं, लेकिन ये बाकी राज्यों पर भी लागू होती हैं जहां पर अभी सरकार बन ही रही है। छत्तीसगढ़ में मंत्रियों के विभागों के बाद हो सकता है कि अब सरकार की मर्जी के, या मंत्रियों की पसंद के बड़े अफसर भी बदले जाएं, और यह भी हो सकता है कि कुछ हफ्ते बाद के बजट को देखते हुए सरकार तब तक मौजूदा अफसरों को उनकी जगह पर बनाए भी रखे। इस बारे में हमारी कोई राय नहीं है जिसकी वजह से हम आज यहां लिख रहे हों। 

लेकिन पांच बरस के लिए बनने वाली सरकार को लेकर प्रदेशों के तमाम सोचने वाले लोगों को कुछ फिक्र भी करनी चाहिए। फिक्र का मतलब सरकार को फिक्र में डालना नहीं है, क्योंकि लोकतंत्र में यह भी माना जाता है कि किसी सरकार को हंड्रेड-डे-हनीमून का मौका मिलना चाहिए। वह सौ दिन अपने हिसाब से काम कर सके, उसके बाद उसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए। लोगों को याद होगा कि जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने थे, तो उन्होंने अपने तमाम मंत्रियों को सौ दिनों का लक्ष्य तय करने को कहा था, और उसे पूरा करने के लिए वे हर मंत्री के साथ अलग-अलग भी बैठते थे। लोकतंत्र में मीडिया और विपक्ष को भी अपना रोज का काम भी करना चाहिए, और सरकार को अपना कामकाज साबित करने के लिए सौ दिन का वक्त भी देना चाहिए। सरकार की रोजाना की निगरानी जरूरी है ताकि उसकी गलती या गलत काम को रोजाना सुधारा जा सके, लेकिन मूल्यांकन की हड़बड़ी सौ दिन के पहले नहीं करनी चाहिए, जिसमें से करीब तीस दिन तो छत्तीसगढ़ सरकार के निकल चुके हैं। आज के लोकतंत्र में विपक्ष और परंपरागत मीडिया से परे सोशल मीडिया पर जनता के चौकन्नेपन, और उसकी जागरूकता को भी एक नई लोकतांत्रिक ताकत मानना चाहिए जो कि कई बार विपक्ष से अधिक धारदार रहती है, और विपक्ष की तरह समझौतापरस्त नहीं रहती, मीडिया की तरह दबाव या प्रभाव में नहीं रहती। जनता आज सोशल मीडिया पर उसे मुफ्त में हासिल एक तकरीबन बेकाबू आजादी के चलते सत्ता या विपक्ष दोनों का पल-पल मूल्यांकन कर सकती है, करती है। 

हम फिर से नई सरकार के गठन पर लौटें, तो हमारे पास किसी ब्रांड वाली कोई सिफारिश नहीं है, डॉक्टरी में इस्तेमाल होने वाली जेनेरिक दवाओं सरीखी सलाह जरूर है जो कि किसी भी सरकार के काम की हो सकती है, किसी भी प्रदेश में काम आ सकती है, या रद्दी की टोकरी में भी डाली जा सकती है। किसी भी नई सरकार को अपने चुनावी वायदों के प्रति ईमानदार रहते हुए पिछली विपक्षी सरकार के गलत कामों की अनिवार्य रूप से जांच करवानी चाहिए, क्योंकि विपक्ष में रहते हुए पार्टी कई तरह के आरोप लगाती है, और छत्तीसगढ़ में हमारा देखा हुआ है कि भाजपा ने बहुत से सुबूतों और दस्तावेजों के साथ कभी राज्यपाल को, तो कभी चुनाव आयोग को सिफारिशें की थीं, कभी ईडी को कागजात दिए थे। अब वक्त आ गया है कि भाजपा की सरकार बनने पर उसे ऐसे सभी मामलों की जांच करवानी चाहिए क्योंकि उसे जानकारी रहते हुए वह जांच न करवाए, ऐसा कोई विकल्प संवैधानिक शपथ उसे नहीं देती है। 

जब सत्तारूढ़ पार्टी बदलती है, तो कुछ बुनियादी फर्क भी आता है। एक बार फिर छत्तीसगढ़ की मिसाल दें, तो पिछली कांग्रेस सरकार ने देश की भाजपा लीडरशिप वाली मोदी सरकार से सीबीआई की जांच शुरू करवाने का अधिकार वापिस ले लिया था। ऐसा कुछ दूसरी कांग्रेस सरकारों ने भी किया था, और गैरभाजपा सरकारों ने भी। अब छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसी नई भाजपा सरकारों से यह स्वाभाविक उम्मीद की जाती है कि वे देश की पुरानी परंपरा के मुताबिक केन्द्र सरकार को, मतलब सीबीआई को अपने राज्य में खुद होकर जांच शुरू करने की एक सामान्य इजाजत दे। छत्तीसगढ़ में यह काम मंत्रियों को विभाग बंटने के पहले भी हो सकता था, लेकिन अब तो यह हो ही जाना चाहिए। फिर कुछ दूसरे और टकराव भूपेश सरकार और मोदी सरकार के बीच चले आ रहे थे, वे मुद्दे सुप्रीम कोर्ट के रास्ते होते हुए अभी नई सरकार के सामने सवाल बनकर खड़े हैं। इनमें सबसे बड़ा मुद्दा बस्तर की झीरम घाटी के नक्सल हमले का है जिसकी एनआईए जांच से असहमत होते हुए भूपेश सरकार ने एक नई एफआईआर दर्ज की थी, और उसने सुप्रीम कोर्ट तक से अपने पक्ष में यह आदेश पाया था कि वह इस एफआईआर पर जांच कर सकती है। अब यह तो मोदी सरकार के मातहत काम करने वाली एनआईए के खिलाफ भूपेश सरकार की पहल थी, आज कोई वजह तो है नहीं कि छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार एनआईए से असहमत होकर वैसी कोई जांच जारी रखे। इस पर भी फैसला कानूनी और राजनीतिक दोनों पहलुओं से होगा क्योंकि झीरम की राज्य पुलिस से जांच बंद करवाने पर कांग्रेस इसे एक मुद्दा बना सकती है कि पिछली भाजपा सरकार के वक्त हुआ वह हमला एक साजिश थी, और इसलिए आज की सरकार उसे बंद कर रही है। लोकतंत्र में फैसले कानूनी, राजनीतिक, और प्रशासनिक, कई पहलुओं से लिए जाते हैं, और झीरम का फैसला वैसा ही रहेगा। 

छत्तीसगढ़ में पिछले पांच बरस में ईडी और इंकम टैक्स ने राज्य सरकार, इसके कई अफसर, इसके कई नेताओं के खिलाफ कई किस्म के नोटिस निकाले हैं, गिरफ्तारियां की हैं, संपत्ति जब्त की है, और भूपेश सरकार के खिलाफ बहुत ही गंभीर अपराधों के आरोप अदालत में पेश किए हैं। अब विष्णुदेव साय की सरकार को यह भी तय करना होगा कि सरकार और राज्य के जो लोग ऐसे कथित जुर्म से जुड़े हुए थे, उनमें शामिल थे, जिनके खिलाफ केन्द्र से राज्य को कार्रवाई के लिए लिखा जा चुका था, उन मामलों में क्या किया जाए? क्योंकि ईडी और आईटी की कार्रवाई कुछ धाराओं के तहत ही होती है, इन दोनों एजेंसियों के लगाए गए आरोपों में बहुत किस्म के जुर्म ऐसे दिखाई पड़ते हैं जो कि इनके अपने अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। अपने अधिकार के दायरे को तो इन्होंने अदालत में पेश किया है, राज्य सरकार को लिखा है, लेकिन उन्हीं सुबूतों से भारत के कानून के तहत कई और जुर्म हैं जिनकी जांच राज्य अपनी एजेंसी से भी करवा सकता है, और चाहे तो उन्हें सीबीआई को भी दे सकता है। हमारा ख्याल है कि नए मंत्रिमंडल को ऐसे कानूनी पहलुओं पर प्राथमिकता के आधार पर गौर करना होगा क्योंकि कुछ ही महीनों में लोकसभा चुनाव का माहौल बनने लगेगा, और उसके करीब आने पर लिए गए ऐसे फैसले चुनावी-राजनीतिक असुविधा भी पैदा कर सकते हैं, और बदनीयत के आरोपों को भी न्यौता दे सकते हैं। 

हम सैद्धांतिक रूप से इस बात के हिमायती हैं कि किसी भी सरकार को पिछली किसी सरकार या किसी नेता पर लगे आरोपों को अनदेखा करने का हक नहीं होना चाहिए। संविधान की जो शपथ लेकर सरकार बनती है, तो वह ऐसी हर जांच के लिए जवाबदेह भी होती है। अगर पिछली सरकार के जुर्म भूलकर सिर्फ आगे काम करने की बात होगी, तो फिर लोकतंत्र में किसी गलत काम पर कार्रवाई हो ही नहीं पाएगी। इसलिए सत्तारूढ़ पार्टी को अपने पिछले आरोपों के साथ भी खड़े रहना चाहिए, और मौजूदा सरकार को बिना किसी बदनीयत के पिछले सारे संदिग्ध मामलों की ईमानदार जांच करवाना चाहिए। जब बहुत से राजनीतिक और सरकारी मुजरिम जेल जाएंगे, तो राजनीति धीरे-धीरे साफ-सुथरी भी होगी।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 दिसंबर 2023

(Daily Chhattisgarh)

 

किसी देश की आपदा बन सकती है किसी का अवसर

 29 दिसंबर 2023  

   

दुनिया के एक सबसे आधुनिक और विकसित देश जापान में ट्रक ड्राइवरों की कमी से एक अजीब सी नौबत आ खड़ी हुई है, जिसकी कल्पना करना भी बाकी दुनिया के लिए कुछ मुश्किल होगा। वहां पर बुजुर्ग आबादी बढ़ते चल रही है, कामकाज की उम्र वाले कामगारों का अनुपात घटते चल रहा है, कुल जमा आबादी भी गिर रही है, और घरों पर आराम की जिंदगी जीने वाले बुजुर्गों को हर सामान घर पहुंच लगता है। ऐसे में सामानों को शहरों और फिर घरों तक पहुंचाने के लिए ट्रक ड्राइवर भी बहुत कम पडऩे लगे हैं। द न्यूयॉर्क टाईम्स की एक खबर को देखें तो वहां पर सामानों की डिलिवरी में हफ्तों देर हो रही है, और इसे आने वाले बरस की सबसे बड़ी समस्या करार दिया गया है। सरकार का मानना है कि यह कमी 2030 तक दूर नहीं हो सकेगी, और बनने वाले सामानों में से एक तिहाई की डिलिवरी कभी भी नहीं हो पाएगी। यह बात जापान में कई दूसरे किस्म की चर्चाओं में लंबे समय से सामने आ रही थी कि कामकाजी लोगों का अनुपात घटते जाने, बुजुर्गों का अनुपात बढ़ते जाने, और आबादी लगातार गिरते जाने से कई किस्म की दिक्कतें और खतरे सामने दिखेंगे। और वह होना शुरू हो गया है। दुनिया के इस एक सबसे विकसित, औद्योगिक देश में साधारण से ड्राइवरों की ऐसी भयानक कमी से पूरी सप्लाई चेन ऐसी गड़बड़ा गई है कि अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पडऩा शुरू हो गया है, और लोगों की जिंदगी पर भी इसका असर पड़ रहा है।  

हम बीच-बीच में कभी आर्थिक मंदी की वजह से होने वाली छंटनी के कारण, तो कभी ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से होने वाली बेरोजगारी को लेकर यह बात कहते आए हैं कि दुनिया के जिन देशों में मानव कामगारों की जरूरत बनी रहेगी, वहां के लायक कामगार तैयार करके गरीब देश अपने लोगों का भला कर सकते हैं, और देश की अर्थव्यवस्था में इजाफा भी कर सकते हैं। भारत जैसे देश जहां पर बेरोजगारों की बड़ी आबादी सरकारों के लिए बड़ी चुनौती रहती है, और लोग अपने देश-प्रदेश के भीतर ही काम तलाशते रह जाते हैं। दक्षिण भारत के कुछ राज्य, और उत्तर का पंजाब जरूर कामगारों को दुनिया भर में भेजते आए हैं, और यहां से बाहर गए हुए शायद करोड़ों लोग देश के भीतर कामकाज के मुकाबले बेहतर रोजगार पाए हुए हैं, या कारोबार भी कर रहे हैं। अभी तक हिन्दुस्तान के बाहर जाकर काम करने वाले लोग अंग्रेजीभाषी देशों और खाड़ी के देशों में अधिक जाते हैं, लेकिन जापान जैसे दुनिया के बहुत से ऐसे देश हैं जहां पर हिन्दुस्तानियों के काम करने की अधिक मिसालें नहीं हैं। हम इस बात को पहले भी सुझाते आए हैं कि कुछ चुनिंदा कामों के लिए लोगों को अधिक हुनरमंद बनाने के साथ-साथ अगर उन्हें दुनिया के जरूरतमंद संपन्न देशों की भाषा और संस्कृति की ट्रेनिंग भी दी जाए, तो वे वहां जाकर कई किस्म के काम पा सकते हैं। अब जापान अगर ट्रक ड्राइवरों की कमी झेल रहा है, और वहां आज ड्राइवरों को 18-18 घंटे काम करना पड़ रहा है, तो इस तरह के काम करने में हिन्दुस्तानी माहिर हैं, और आज भी अमरीका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा सरीखे बहुत से विकसित देशों में लाखों हिन्दुस्तानी ट्रक ड्राइवर काम कर ही रहे हैं। 

किसी एक जगह की आपदा किसी दूसरी जगह के लिए अवसर भी बन सकती है। जापान में गिरती आबादी, और कामगारों की बढ़ती जरूरत अगले दस-बीस बरस तक किसी भी तरह बदलने वाली नहीं है, और वह ऐसे देशों में शुमार हो सकता है जो कि दूसरे देशों से आने वाले कामगारों के भरोसे चल सके। ऐसे में वहां की भाषा, संस्कृति, तहजीब के साथ-साथ अपने हुनर में माहिर कामगार हो सकता है कि सरकार की पहल से भी जापान में काम पा सके। और यह तो एक खबर की आने की वजह से हम जापान की चर्चा कर रहे हैं। देशों की ऐसी लिस्ट देखें तो उनमें बल्गारिया, लिथुआनिया, लातविया, यूक्रेन, सर्बिया, बोस्निया, क्रोएशिया, मालदोवा, अल्बानिया, रोमानिया, ग्रीस, स्तोनिया, हंगरी, पोलैंड, जॉर्जिया, पुर्तगाल, क्यूबा, और इटली सरीखे देश हैं। इनमें एक ही चीज एक सरीखी है कि ये सब गैरअंग्रेजीभाषी देश हैं। लेकिन भारत सरकार अगर चाहे तो इन देशों के साथ अभी से तालमेल करके कई बरस के बाद के हिसाब से भी कामगार तैयार कर सकती है, और वहां की सरकारें भी सरकारों के स्तर पर बेहतर कामगार पाने को पसंद कर सकती हैं। यह भी जरूरी नहीं है कि इन देशों में सिर्फ ड्राइवरी जैसे काम ही पैदा हों, दुनिया इस बात की गवाह है कि वहां पहुंचे हुए मजदूरों के बच्चे भी उन देशों में राष्ट्रपति तक बनते आए हैं। इसलिए अपने देश के नागरिकों, खासकर बेरोजगार नौजवानों को बेहतर हुनरमंद बनाकर किसी विदेशी भाषा से लैस करके उन्हें किसी विकसित और संपन्न देश में भारत सरकार अगर काम दिलवा सकती है, तो इससे देश में बेरोजगारी भी घटेगी, और अंतरराष्ट्रीय पैमानों पर शिक्षण-प्रशिक्षण से देश के भीतर भी काम की उत्कृष्टता बढ़ेगी। 

इस बीच भारत के अलग-अलग प्रदेश भी अपनी नौजवान पीढ़ी को बिना किसी पूर्वाग्रह और परहेज के, अंग्रेजी सिखा-पढ़ा सकते हैं, ताकि वे न सिर्फ दूसरे देशों के लायक तैयार हो सके, बल्कि देश के भीतर भी अंग्रेजी से जुड़े रोजगारों में उनकी संभावना पैदा हो सके। दुनिया के दर्जनों देशों में अगले कई दशक तक स्थानीय कामगार अनुपात घटते जाना है, इनको ध्यान में रखकर बेरोजगारों वाले देशों को अपने लोगों के लिए योजना बनानी चाहिए, ताकि एक अंतरराष्ट्रीय शून्य को भरा जा सके। भारत में जहां चार-चार बरस के लिए फौज में अग्निवीर बनाए जा रहे हैं, और चार साल बाद के लिए उनके पास कोई पुख्ता भविष्य नहीं रहेगा, ऐसे लोगों को भी बाकी दुनिया के लिए तैयार किया जा सकता है, और भारत सरकार के अलावा देश की राज्य सरकारें भी अपने स्तर पर ऐसा कर सकती हैं। यह बात अधिक लोगों को शायद नहीं पता होगी कि ब्रिटेन जैसे देश दूसरे देशों से अपने यहां नर्सें भर्ती करते हुए अलग-अलग देशों के लिए अधिकतम सीमा भी तय करते हैं, ताकि वहां काबिल नर्सों की कमी न हो जाए। ऐसे में जाहिर है कि अच्छी तरह शिक्षित-प्रशिक्षित हिन्दुस्तानी कामगारों के लिए संभावनाओं का आसमान बहुत बड़ा है, और रहेगा।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 28 दिसंबर 2023


 


तुमसे पहले वो जो इक शख्स यहां तख्त नशीं था, उसको भी अपने खुदा होने पे इतना ही यकीं था

 28 दिसंबर 2023  

  

तेलंगाना में अभी कांग्रेस की सरकार बनी ही है कि नए मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने यह आरोप लगाया है कि विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बीआरएस के पिछले मुख्यमंत्री के.चन्द्रशेखर राव ने किसी को बताए बिना गुपचुप तरीके से 22 महंगी, बुलेटप्रूफ कारों की सरकारी खरीद की थी। उनका इरादा दुबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद इनको अपने काफिले में इस्तेमाल करने का था। इन कारों को विजयवाड़ा में एक जगह छुपाकर रख दिया गया था। कांग्रेस को अंधाधुंध शानदार जीत दिलाने वाले रेवंत रेड्डी ने कल एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि उन्हें भी मुख्यमंत्री बनने के बाद दस दिनों तक इन कारों के बारे में नहीं बताया गया था। उन्होंने जब अपने लिए पुरानी सरकारी कारों की मरम्मत की बात कही, तो उन्हें कुछ अफसरों ने कहा कि तीन-तीन करोड़ दाम वाली 22 कारें पिछले मुख्यमंत्री खरीदकर गए हैं, और उनका इस्तेमाल दुबारा शपथ ग्रहण के बाद करने की उनकी योजना थी। यह लोकतंत्र में एक बहुत बड़ा दुस्साहस दिखता है कि कोई नेता चुनाव में जाने के ठीक पहले जीतने की उम्मीद के साथ इतनी बड़ी फिजूलखर्ची करे। किसी और राज्य से किसी मुख्यमंत्री के अपने लिए नए विमान खरीदने की चर्चा है, कहीं कोई मुख्यमंत्री अपने लिए नया हेलीकॉप्टर भी लेते हैं, लेकिन इन सबके बीच कारों के अपने काफिले पर 66 करोड़ रूपए खर्च करने का तेलंगाना का यह मामला बहुत ही भयानक है। तेलंगाना के जानकार अखबारनवीस बताते हैं कि राज्य का सचिवालय भी साढ़े 6 सौ करोड़ रूपए (जमीन के दाम शामिल नहीं) की लागत से केसीआर ने बनवाया, इस महलनुमा इमारत के उद्घाटन के बाद से वे खुद इसमें एक दिन के लिए भी नहीं गए, और अब कांग्रेस के रेवंत रेड्डी इसके मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठेंगे। सचिवालय की यह इमारत एक महल की तरह दर्शनीय बनी हुई है, और पर्यटक इसके सामने आकर सेल्फी लेने को एक जरूरी रिवाज मानने लगे हैं। 

तेलंगाना में पिछले मुख्यमंत्री के मंत्री बेटे, केटीआर प्रदेश में सबसे अधिक मंत्रालयों वाले मंत्री थे, और अभी वे कांग्रेस सरकार पर नजर रखने के लिए अपने नेताओं को, एक शैडो टीम (छाया मंत्रिमंडल) खुला आव्हान कर चुके हैं। इसके जवाब में रेवंत रेड्डी ने कहा है कि शैडो टीम की क्या जरूरत है, उनके नेता तो यहां मंत्री रहे हुए हैं, और उन्हीं को अब सरकार पर नजर रखने के लिए लगा देना चाहिए, वे एक छाया मंत्रिमंडल की तरह काम कर सकते हैं, क्योंकि उन्होंने सरकार में रहते तो काम किया नहीं था। दरअसल तेलंगाना में पिछली सरकार के गलत कामों को उजागर करने का सिलसिला नई सरकार चला रही है, और इसी को लेकर वहां टकराव चल रहा है, जिससे कई तरह के मामले उजागर हो रहे हैं। इसी सिलसिले में यह बात उजागर हुई कि सादे सफेद कपड़ों में आम इंसान सरीखे दिखने वाले पिछले मुख्यमंत्री केसीआर के काफिले के लिए 22 बुलेटप्रूफ गाडिय़ां खरीदी गई थीं। यह बात अकल्पनीय है कि कोई मुख्यमंत्री अपने काफिले की हर गाड़ी को बुलेटप्रूफ बनाने के लिए तीन-तीन करोड़ रूपए खर्च करे। 

मुख्यमंत्री हों, या प्रधानमंत्री, अपने घर, दफ्तर, काफिले की कारों, अपने विमान और इन सबकी साज-सज्जा पर इस तरह खर्च करते हैं कि मानो वे पूरी जिंदगी वहीं बने रहने की लीज लिखाकर लाए हैं। देश की आबादी इतनी गरीब है कि केन्द्र सरकार, या अलग-अलग राज्य सरकारों को मुफ्त में राशन देना पड़ता है, तो लोग भुखमरी से बच पाते हैं। बच्चे तो फिर भी अन्न से परे कुछ भी न मिल पाने की वजह से कुपोषण के शिकार रहते ही हैं। ऐसे देश में जब जनता का पैसा नेताओं के शाही निजी आराम पर खर्च होता है, तो लगता है कि लोकतंत्र कहां है? सरकारी इमारतों को महलों की शक्ल में बनयाा जाता है, और फिर वहां रहने वालों का मिजाज सामंती हो जाए, तो इसमें हैरानी कैसी? हम जनता के पैसों पर बनने वाले सरकारी दफ्तरों को महलों की शक्ल में देख-देखकर थक गए हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जो म्युनिसिपल ठीक से कचरा साफ नहीं करवा सकता, उसने अपना दफ्तर महलनुमा बनाया है, नाम व्हाईट हाऊस रखा है कि मानो वह अमरीकी राष्ट्रपति का दफ्तर है। सत्ता अपने छोटे-छोटे अहंकार सहलाने के लिए जनता का बड़ा-बड़ा पैसा खर्च करती है, और हिन्दुस्तान में ऐसी सरकारी आपराधिक फिजूलखर्ची पर कोई अदालती रोक भी नहीं है क्योंकि इसे सरकार का विवेकाधिकार मान लिया जाता है। यह एक अलग बात है कि यह गरीब जनता के प्रति हिकारत दिखाने वाला विवेकहीन अधिकार अधिक है क्योंकि यह जनता का खून निचोडऩे के साथ-साथ उसे यह गौरव दिलाने की कोशिश भी करता है कि यह लोकतंत्र की ताकत है। 

जब संसद या विधानसभा में विपक्ष की आवाज या तो निकले ही नहीं, या उसे सुना नहीं जाए, तो फिर जनता के पैसों की फिजूलखर्ची पर कोई रोक नहीं लग पाती। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कई एकड़ जमीन पर 65 करोड़ रूपए से मुख्यमंत्री निवास बना है, इसे डॉ.रमन सिंह के कार्यकाल में मंजूरी दी गई थी, भूपेश बघेल ने पांच बरस ईंट-गारा ढोकर इसे पूरा किया, और अब विष्णुदेव साय इसमें रहने जा रहे हैं। हमने कुछ दिन पहले अपने यूट्यूब चैनल पर मंत्री-मुख्यमंत्री, और अफसरों के लिए बहुत अंधाधुंध बड़े बंगले बनवाने के बारे में कहा था जिस पर लोगों की तीखी प्रतिक्रिया भी आई थी। लोकतंत्र में जो जनसेवा के नाम पर सत्ता पर आते हैं, उन्हें एक सेवक सरीखी जिंदगी जीने की भी आदत रखनी चाहिए। सरकारी इमारतों को न सिर्फ बनाना खर्चीला रहता है, बल्कि उनके रख-रखाव पर भी जनता का ही पैसा लगता है। इसलिए किसी भी जनकल्याणकारी सरकार को ऐसा नया खर्च शुरू करने के पहले यह भी सोचना चाहिए कि उसे देश-प्रदेश की जनता को मुफ्त में अनाज क्यों देना पड़ रहा है? और ऐसी जनता के खजाने से खुद पर इतना खर्च क्यों करना चाहिए कि मुख्यमंत्री निवास 8 एकड़ पर बने, और प्रधानमंत्री निवास 15 एकड़ पर! 

हमारा ख्याल है कि लोकतंत्र में हर सरकार को अपने से पहले वाली सरकार के गलत कामों, फिजूलखर्चियों, और अपराधों पर श्वेत पत्र जारी करना ही चाहिए जैसा कि आज तेलंगाना में हो रहा है। श्वेत पत्र एक किस्म का तथ्य पत्र होता है जिसमें जानकारी लोगों के सामने रख दी जाती है। सत्ता में आने के पहले हर पार्टी अपने चुनाव अभियान में कई तरह के आरोप लगाती है, और सत्ता में आने पर ऐसी पार्टी को पूरे पारदर्शी तरीके से तथ्य जनता के सामने रख देने चाहिए। देश में आज सूचना के अधिकार का जो कानून लागू है, वह सूचना मांगने का अधिकार है। जबकि लोकतंत्र और संविधान की भावना यह होनी चाहिए कि सरकार खुद होकर जनता के सामने तमाम चीजों को रखती चले। यह सबका तजुर्बा है कि जहां-जहां चीजों को छुपाया जाता है, वहां-वहां जुर्म अधिक होते हैं, जैसे कि गरीब जनता के पैसों से 66 करोड़ का कार काफिला! 

(Daily Chhattisgarh)

बदनीयत पुलिस के हिस्से का जुर्माना सरकार क्यों दे?

 27 दिसंबर 2023  

  

असम के गुवाहाटी हाईकोर्ट ने अभी राज्य की पुलिस को कहा है कि एक मामले में गिरफ्तार किए गए एक वकील को हथकड़ी लगाकर अदालत लाने, जेल ले जाने की नुमाइश करने वाले पुलिसवालों पर 5 लाख रूपए का जुर्माना लगाया जाए, और यह रकम अदालत से रिहा किए जा चुके इस वकील को हर्जाने के रूप में दी जाए। हाईकोर्ट ने यह पाया है कि असम पुलिस के एक होमगार्ड से एक मामूली से पार्किंग के झगड़े में इस वकील को गिरफ्तार किया गया था, उसके साथ बुरा सुलूक किया गया। अदालत ने इस बात को सुप्रीम कोर्ट के बड़े स्पष्ट आदेश-निर्देश के खिलाफ पाया कि अभियुक्त को हथकड़ी लगाकर अदालत में पेश किया गया, और अदालत से मेडिकल जांच के लिए, और जेल तक हथकड़ी लगाकर ही ले जाया गया। हाईकोर्ट ने यह माना है कि ऐसा बर्ताव इस अभियुक्त के बुनियादी मानवाधिकारों और गरिमा से जीने के हक के खिलाफ था। निचली अदालत से इस मामले में बरी हो जाने के बाद वकील ने मानवाधिकार आयोग में शिकायत की थी, लेकिन इस शिकायत को आयोग ने इस आधार पर बंद कर दिया था कि जिस अफसर के खिलाफ शिकायत है, वह गुजर चुका है। इसके बाद वकील ने हाईकोर्ट में इस आदेश के खिलाफ अपील की, और हथकड़ी लगाने से उसकी साख और गरिमा को हुए नुकसान का हर्जाना मांगा। अदालत ने माना कि जांच अधिकारी ने सोच-समझकर हथकड़ी लगाई थी जबकि सारे आरोप जमानतीय थे। अदालत ने राज्य शासन को आदेश दिया है कि दो महीने के भीतर इस वकील को पांच लाख रूपए हर्जाना दिया जाए, साथ ही असम पुलिस को हथकडिय़ों के बारे में सुप्रीम कोर्ट की दी गई व्यवस्था को लेकर संवेदनशील भी बनाया जाए। 

अदालत ने इस मामले में जुर्माने की रकम पुलिस विभाग से वसूलने का निर्देश दिया है। यहीं पर हम अदालत से कुछ असहमत होना चाहेंगे। किसी अभियुक्त को हथकड़ी लगाई जाए या नहीं, इस बारे में पुलिस को बरसों से पर्याप्त जानकारी है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 1980 के एक फैसले में बहुत विस्तार से ये निर्देश दिए थे कि किस तरह के मामलों में किस इजाजत के बाद ही हथकड़ी लगाई जाए। इस बात को 40 साल हो चुके थे, जब असम पुलिस ने अपने होमगार्ड के साथ हुए झगड़े पर एक वकील के साथ यह सुलूक किया था। इसे पूरी तरह, या किसी तरह भी मासूम कार्रवाई नहीं कहा जा सकता था। एक मामूली से झगड़े की शिकायत पर स्थानीय अदालत में वकालत करने वाले वकील के फरार हो जाने या हिंसक हमला करने का ऐसा कोई खतरा नहीं था कि उसे हथकड़ी लगाई जाती। यह बात साफ-साफ है कि अपने ही विभाग के एक कर्मचारी के साथ हुए इस झगड़े के बाद पुलिस ने अतिउत्साह में, और बदले की भावना से यह कार्रवाई की थी, जिसकी नीयत किसी इंसाफ की न होकर वकील को बेइज्जत करने की थी। इसलिए इस मामले में हाईकोर्ट का यह दखल तो ठीक है कि पुलिस को इस ज्यादती के लिए जिम्मेदार मानते हुए उस पर जुर्माना लगाया जाए, लेकिन बदनीयत के ऐसे मामलों में जुर्माने का कम से कम एक हिस्सा जिम्मेदार अफसर और कर्मचारी के मत्थे भी मढ़ा जाना चाहिए क्योंकि यह किसी नियमित और मासूम कार्रवाई का हिस्सा नहीं था, यह बदनीयत से की गई कार्रवाई थी। लोगों को सरकारी कामकाज के दौरान रियायत सिर्फ अच्छी नीयत से की गई कार्रवाई के लिए ही मिलनी चाहिए, निजी दुश्मनी भंजाने के लिए ऐसी छूट नहीं दी जानी चाहिए।

अभी-अभी एक हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई का एक वीडियो सामने आया है जिसमें एक मकान को तुड़वाने पर आमादा वकील को जज याद दिलाते हैं कि लोग बड़ी मुश्किल से एक मकान बना पाते हैं, और अगर किसी व्यक्ति ने अपनी जमीन के भीतर ही ऐसा मकान बनाया है, तो फिर उसे तुड़वाते हुए यह भी याद रखना चाहिए कि वकील ने खुद ने, या उनके मुवक्किल ने अपना मकान पूरी तरह नियमों के मुताबिक बनाया है क्या? अदालत ने इस प्रसारण में काफी सख्त रूख बताते हुए शिकायकर्ता के मकान का नक्शा और निर्माण की इजाजत भी मांगी है ताकि देखा जा सके कि शिकायत करने वाले लोगों का अपना खुद का क्या हाल है। इन दो मामलों का एक-दूसरे से कुछ भी लेना-देना नहीं है लेकिन दोनों ही मामले अदालत के इस रूख को बताते हैं कि सरकारी, पुलिसिया, या कानूनी ताकत हाथ में रहने पर किसी को परेशान करने या नीचा दिखाने का हक नहीं मिल जाता। हम गुवाहाटी हाईकोर्ट के इस ताजा आदेश पर लौटें, तो यह बाकी राज्यों के लिए भी एक सबक और चेतावनी हो सकती है कि पुलिस को मनमानी से किस तरह बचना चाहिए। मनमानी पर सरकार अपने अधिकारियों और कर्मचारियों की तरफ से जुर्माना जमा करे, यह हर मामले में ठीक नहीं है। जब व्यक्तियों की बदनीयत हो, तब उन पर भी जुर्माने का कुछ बोझ तो आना ही चाहिए। 

देश में पुलिस सुधार पर बहुत सी बड़ी-बड़ी रिपोर्ट बन चुकी हैं, जो धूल खा रही हैं। देश भर के राज्यों में पुलिस राजनीतिक ताकतों के हाथ एक औजार की तरह काम करती है, और उसकी असल हसरत तो यह रहती है कि उसे हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाए। पुलिसवर्दी के बड़े-बड़े लोग अपने आपको सत्ता के हाथों हथियार की तरह पेश करने के लिए बेचैन रहते हैं ताकि उन्हें मोटी कमाई करने वाली कुर्सियां मिल जाएं। देश की ऐसी पुलिस व्यवस्था को सुधारने के लिए, और उसके कामकाज में राजनीतिक दखलंदाजी को कम करने के लिए दशकों से बात ही बात हो रही है, बात किसी किनारे नहीं पहुंच रही है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। यह मामला तो एक वकील का था, और यह बात अदालत में अच्छी तरह साबित पाई थी कि उसे पूरे वक्त हथकड़ी लगाकर रखा गया था, लेकिन जो कमजोर लोग पुलिस के जाल में फंसते हैं वे तो ऐसी कानूनी लड़ाई लडऩे की हालत में भी नहीं रहते हैं, और उनकी कोई भी मदद तभी हो सकती है जब पुलिस को संवेदनशील बनाया जा सके, वरना पुलिस ताकत को सलाम करते हुए, कमजोरों को अपने बूटतले कुचलने का काम करती रहेगी।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 दिसंबर 2023


 

नसीहत लेनी हो तो उसके लिए एक ट्रैफिक जाम भी है काफी

  26 दिसंबर 2023  

  क्रिसमस मनाने हिमाचल के शिमला और कुल्लू मनाली जा रहे लोगों की दसियों हजार गाडिय़ां सडक़ों पर ऐसे जाम रहीं कि उसके वीडियो देख हैरानी होती रही कि इनमें से किसी की तबियत बहुत खराब हो जाने पर क्या होगा? कैसे कोई एम्बुलेंस वहां तक पहुंच सकेगी? हिमाचल की बहुत सी सडक़ों पर जाम का यह हाल था कि पूरे 24-24 घंटे गाडिय़ां हिल नहीं सकीं। एक जगह तो 55 हजार गाडिय़ां फंसने की खबर थी। अब इससे पहाड़ की सडक़ों की क्षमता का भी अंदाज लग रहा है, और लोगों की कार लेकर जाने की दीवानगी भी समझ आ रही है। जहां पर तापमान शून्य से नीचे चले जाता है, जहां पर बर्फबारी होती है, वहां 24-24 घंटे का ट्रैफिक जाम किसे जिंदा रखेगा, किसे मारेगा इसका कोई ठिकाना तो है नहीं। खबरें बताती हैं कि इसी मानसून की बाढ़ में कई रास्ते तबाह हुए थे, जिनकी पूरी मरम्मत अभी तक नहीं हो पाई है, और अब उन जगहों पर भी ट्रैफिक जाम लगा हुआ है। जिन सैलानी शहर-कस्बों तक पहुंचने के लिए ये लोग कारों से सपरिवार, या दोस्तों सहित जा रहे हैं, वहां पर भी होटलों का इंतजाम दम तोड़ देता है, और अभी कुछ बरस पहले वहां पानी की कमी से यह अपील जारी करनी पड़ी थी कि और सैलानी वहां पर न आएं। पड़ोस के उत्तराखंड का हाल तीर्थयात्राओं की वजह से इससे भी अधिक बुरा रहता है, और वहां भी सडक़ और तीर्थों की क्षमता ध्वस्त हो जाती है, लेकिन लोगों का आना रूकता ही नहीं है।  लोगों की दीवानगी, और भक्ति के चलते हुए एक आसान और तुरत इलाज यह हो सकता है कि निजी गाडिय़ों का वहां जाना अंधाधुंध महंगा कर दिया जाए, और सिर्फ बसों को छूट दी जाए ताकि कम ईंधन और कम सडक़ घेरकर अधिक मुसाफिर सफर कर सकें। पब्लिक ट्रांसपोर्ट हमेशा ही पर्यावरण के लिए कम नुकसानदेह होता है, और पहाड़ी इलाकों में ट्रैफिक जाम भी इससे बचता है। 

आज हिन्दुस्तान के गिने-चुने पहाड़ी तीर्थों, और पर्यटन केन्द्रों पर देश की बहुत बड़ी आबादी का हमला सरीखा चलते रहता है। देश में समुद्र तट तो बहुत से हैं, और वहां पर अधिक लोगों के पहुंचने पर भी वैसी दिक्कत नहीं होती जैसी पहाड़ पर होती है। समंदर तक जाने के रास्तों पर ट्रैफिक जाम नहीं होता, आसपास के इलाकों में होटलों की कमी नहीं रहती, और वहां की पर्यटक-क्षमता काफी होती हैं। हिन्दुस्तान समुद्रतटों से घिरा हुआ देश है, इसलिए सैलानियों की वजह से समंदर किनारे भीड़ नहीं होती। लेकिन कश्मीर, उत्तराखंड, और हिमाचल, सैलानियों और तीर्थयात्रियों के लिए पहाड़ तो बस इतने ही हैं, इसलिए इनकी क्षमता को ध्यान में रखना चाहिए। आज जिस तरह निजी कारों पर सवार होकर लोग पहाड़ों के लिए निकल पड़ते हैं, पहाड़ी राज्यों को यह भी देखना चाहिए कि किसी मुसीबत से जूझने की उनकी ताकत कितनी है? अगर किसी सडक़ पर भूस्खलन हो गया, या कहीं पर बाढ़ से पुल बह गए, तो क्या होगा? दसियों हजार फंसे हुए सैलानियों को किस तरह बचाया जा सकेगा? और अभी तो हम किसी किस्म की साजिश और आतंकी हमले की बात भी नहीं कर रहे हैं। अगर किसी आतंकी हमले में दो तरफ के पुल उड़ा दिए जाएं, तो बीच में फंसे हुए मुसाफिरों और सैलानियों का क्या होगा? कई बार स्थानीय शासन और प्रदेश शासन पर कारोबारी दबाव इतना अधिक रहता है कि साल में कुछ महीने आने वाले सैलानियों को न रोका जाए क्योंकि उन्हीं की वजह से पहाड़ी कारोबार चलता है, लेकिन ऐसे कारोबार को पर्यावरण और प्रशासन दोनों की क्षमता को देखते हुए ही इजाजत दी जानी चाहिए। 

पर्यावरण के लिए, और प्रशासन की दृष्टि से भी सबसे आसान तरीका पहाड़ों पर जाने वाली गाडिय़ों पर एक मोटा टैक्स लगाना हो सकता है। निजी कारों या टैक्सियों का यह सफर इतना महंगा कर दिया जाए कि लोग बसों से जाने को मजबूर हों। इससे जो प्रदूषण घटेगा, उससे ही पहाड़ भी बचेंगे, वरना प्रदूषण से जो जलवायु परिवर्तन हो रहा है, वह पहाड़ों को खतरे में डालते चल रहा है। चूंकि पहाड़ी इलाकों की अर्थव्यवस्था तीर्थ या पर्यटन पर टिकी रहती हैं, इसलिए ऐसी जगहों पर टैक्स बढ़ाकर भीड़ को कम करना ही अकेला जरिया हो सकता है। अभी जब यह अभूतपूर्व ट्रैफिक जाम लगा है, और इसके पहले जब बाढ़ से तबाही आई, तब यह बात भी सामने आई कि पहाड़ी इलाकों में भ्रष्टाचार और रिश्वत के चलते चारों तरफ अवैध निर्माण हो रहे हैं, इससे भी वहां पर्यटकों की क्षमता बढ़ रही है, और स्थानीय पर्यावरण बर्बाद हो रहा है। देश के बाकी मैदानी इलाकों में अवैध निर्माण से उस तरह का फर्क नहीं पड़ता जिस तरह का फर्क पहाड़ी इलाकों पर इससे पड़ता है। इसलिए इन राज्य सरकारों को अधिक ईमानदार रहना चाहिए, वरना वहां पर सब अवैध ही अवैध रह जाएगा, और जब जख्मी की गई कुदरत की मार पड़ेगी, तो किसी सरकार के हाथ कोई बचाव नहीं रह जाएगा। यह भी हो सकता है कि इन प्रदेशों की किसी गलती के बिना भी दूसरे इलाकों के प्रदूषण से जलवायु परिवर्तन हो रहा हो, लेकिन पहाड़ों पर होने वाले कुदरती नुकसान को तो इन्हीं प्रदेशों को झेलना पड़ेगा। 

हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में जो शासन व्यवस्था है उसमें राज्यों को बहुत दूर तक उनके ही हाल पर छोड़ दिया जाता है। किसी समझदार सरकार को कुदरत के रखरखाव वाले प्रदेशों को उनके नुकसान की भरपाई करनी चाहिए। भारत में भी केन्द्र सरकार को चाहिए कि जिन प्रदेशों में पहाड़, जंगल, नदी, और कुदरत को बचाने का जिम्मा दिया जाता है, उन्हें उसकी भरपाई भी दी जाए। पूरे बदन में फेंफड़ा तो एक ही जगह होता है, लेकिन उसकी वजह से बाकी का बदन भी चलता है। इसलिए देश के जिन हिस्सों को अछूता रखने की मजबूरी रहती है, उन्हें उनके नुकसान की भरपाई भी करनी चाहिए। राज्यों को उनके रहमोकरम पर छोड़ देना ठीक नहीं है। पहाड़ी इलाकों के रोजगार और कारोबार को किस तरह पर्यावरण-दोस्ताना बनाया जा सकता है, इस बारे में केन्द्र और राज्य सरकारों को सोचना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 दिसंबर 2023


 

संवेदनशील भाषा तो ठीक, लेकिन चुनाव आयोग का गठन क्या ठीक है?


 25 दिसंबर 2023  

   चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों से कहा है कि वे शारीरिक और मानसिक दिक्कतें झेल रहे लोगों के साथ रहम बरतें। आयोग ने भाषणों और बयानों में ऐसे लोगों के बारे में उनकी विकलांगता को गिनाने वाले शब्द इस्तेमाल न करने को कहा है। ऐसे शब्दों की एक लिस्ट भी आयोग ने गिनाई है जिनमें गूंगा, बहरा, अंधा, काना, लंगड़ा, लूला, अपाहिज, पागल, सिरफिरा जैसे बहुत से शब्द बताए गए हैं, और कहा गया है कि चुनाव प्रचार में इनका इस्तेमाल चुनाव कानून के खिलाफ होगा, और ऐसा करने पर दिव्यांगजन अधिकार कानून-2016 के तहत पांच साल की कैद हो सकती है। देश में राजनीतिक दल और नेता लापरवाह जुबान इस्तेमाल करने के लिए जाने जाते हैं, और ऐसे में शारीरिक-मानसिक विकलांगता के अलावा महिलाओं के बारे में भी बहुत अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल एक आम बात है। हमारा ख्याल है कि चुनाव आयोग को किसी कानून के तहत महिलाओं के अपमान पर भी चेतावनी जारी करनी चाहिए जो कि राजनीति और सार्वजनिक जीवन में मर्दों की सोच से उपजी रहती है। 

लेकिन भारत के सुप्रीम कोर्ट के बार-बार के तल्ख हुक्म के बाद भी चुनावों में नफरती बातों का कोई अंत नहीं दिख रहा है, और बहुत साम्प्रदायिक और नफरती बातों का इस्तेमाल बड़ा आम है। चुनाव आयोग इस बात को अच्छी तरह देख रहा है कि चुनाव या उससे परे किसी भी वक्त, किसी भी जगह नफरती बातों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट कितना कड़ा है, लेकिन चुनाव आयोग ऐसे बयानों और भाषणों पर कोई कार्रवाई करते नहीं दिखता है। नतीजा यह है कि हर चुनाव में नफरत कुछ बढ़ा दी जाती है, क्योंकि नफरत के पिछले बयान अब लोगों का ध्यान उतना नहीं खींचते हैं, लोगों की वाहवाही पाने के लिए कुछ अधिक की जरूरत पड़ती है। यह तो ठीक है कि चुनाव आयोग ने विकलांगों या दिव्यांगजनों के बारे में यह संवेदनशील आदेश निकाला है, और इस देश में सैकड़ों बरस से भाषाओं और बोलियों में इन लोगों के बारे में हिकारत एक आम बात रहते आई है। लेकिन इससे परे देश में साम्प्रदायिक नफरत, धार्मिक उन्माद, और कट्टरता के खतरे बहुत अधिक हैं, और उनके बारे में चुनाव आयोग तकरीबन चुप्पी साधे रखता है। बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें चुनाव आयोग की सीधी-सीधी दखल की उम्मीद रहती है, लेकिन आयोग शिकायत मिलने पर भी उसकी अनदेखी ही करते रहता है। 

हम राजनीति और चुनाव की भाषा से परे अगर देखें, तो चुनाव आयोग अब महज ईवीएम के रास्ते चुनाव करवाने की विकसित हो चुकी एक तकनीक पर चलते जा रहा है, लेकिन उसने चुनावों को प्रभावित करने वाले दूसरे नाजायज तरीकों को रोकने के लिए कुछ नहीं किया है। आज हर तरफ चुनाव में कालेधन का अंधाधुंध इस्तेमाल के खिलाफ आयोग पूरी तरह बेअसर दिखता है। अभी जिन पांच राज्यों में चुनाव हुए उनमें अकेले तेलंगाना में ही सात सौ करोड़ रूपए नगद जब्त हुए। किसी राजनीतिक दल और नेता ने इस पर दावा नहीं किया। पांच राज्यों में कुल मिलाकर 1760 करोड़ रूपए की नगदी जब्त हुई थी, जिसे कि 2018 के विधानसभा चुनावों के बाद के इन पांच बरसों में सात गुना बताया गया है। इस जब्ती में कुछ हिस्सा शराब और दूसरे नशे के सामानों का भी था जो कि नगदी के मुकाबले कम खतरनाक नहीं थे। एक तरफ तो चुनाव आयोग के अधिकार अंधाधुंध हैं, और वे राज्यों के पुलिस और प्रशासन को भी अपनी मर्जी से बदल सकते हैं। दूसरी तरफ जो नगदी पकड़ा रही है उससे दर्जनों या सैकड़ों गुना अधिक नगदी चुनाव में इस्तेमाल होती है, ऐसा आम जानकारी से पता लगता है। ऐसे में पैसों का इतना बड़ा इस्तेमाल चुनावी नतीजों को किस हद तक प्रभावित करता होगा यह अंदाज लगाना बहुत मुश्किल नहीं होना चाहिए। 

शारीरिक-मानसिक विकलांगता को लेकर चुनाव आयोग की पहल ठीक है, लेकिन वह देश में चुनावों में होने वाली नाजायज बातों का एक बहुत छोटा सा हिस्सा है। आयोग को अधिक असरदार होना चाहिए जैसा कि एक वक्त के मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन.शेषन ने साबित किया था। यह एक अलग बात है कि अब चुनाव आयुक्त नियुक्त करने की प्रक्रिया से सुप्रीम कोर्ट जजों को जिस तरह अलग किया गया है, और अब प्रधानमंत्री और उनके मनोनीत मंत्री ही चुनाव आयुक्त नियुक्त करेंगे। इसके लिए अभी संसद में एक विधेयक लाया गया है जो कि राज्यसभा में पास हो गया है, और लोकसभा में पास होना शायद बाकी है। सरकार का यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले की रोशनी में आया है जिसमें इसी बरस मार्च में अदालत में कहा था कि चुनाव आयुक्त नियुक्त करने के बारे में संसद ने पिछले 73 बरसों में कोई कानून नहीं बनाया है, और इसलिए इस पर एक स्पष्ट कानून होना चाहिए। इसके पहले देश में चुनाव सुधार के लिए तैयार कुछ रिपोर्ट में यह सुझाया गया था कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रधानमंत्री, देश के मुख्य न्यायाधीश, और लोकसभा के सबसे बड़े दल के मुखिया की एक कमेटी करे। सुप्रीम कोर्ट में भी ऐसी ही सिफारिश की वकालत की थी, और कहा था कि जब तक संसद कोई कानून नहीं बनाती है तब तक ऐसी कमेटी चुनाव आयुक्त बनाए। अब नया कानून जो तरीका लागू करने जा रहा है उसके मुताबिक प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता, और एक केन्द्रीय मंत्री मिलकर चुनाव आयुक्त नियुक्त करेंगे, और इस कमेटी से देश के मुख्य न्यायाधीश को बाहर कर दिया गया है। मतलब यह कि कमेटी के तीन सदस्यों में खुद प्रधानमंत्री और उनके मनोनीत मंत्री का हमेशा ही एक बहुमत रहेगा, और प्रधानमंत्री की मर्जी से परे इसमें कुछ नहीं हो सकेगा। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में अपना रूख साफ किया था। 

दिव्यांगजनों या विकलांगों के बारे में चुनाव आयोग की पहल उसके सरोकार को दिखाती है, लेकिन यह बात भी है कि इससे चुनाव के बुनियादी मकसद में निष्पक्षता और ईमानदारी पर कुछ फर्क नहीं पड़ता। ये दोनों बुनियादी जरूरतें अभी खतरे में ही हैं, और आने वाले दिनों में जिन शर्तों पर जिन लोगों के द्वारा ये नियुक्तियां, निष्पक्षता और खतरे में ही पड़ेगी। इसलिए चुनाव आयोग जैसी एक संवैधानिक संस्था को लेकर जिस तरह की पारदर्शिता होनी चाहिए थी, वही जब नहीं हो रही है, तो उसकी साख भी खतरे में ही रहेगी। ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग सरकार के ही एक विभाग की तरह काम करेगा, और सरकार के पसंदीदा और वफादार लोगों को वहां बिठाया जाएगा। दुनिया के विकसित लोकतंत्रों में संवैधानिक संस्थाओं के लिए ऐसा कमजोर इंतजाम नहीं रहता है, लेकिन भारत में यह लगातार चल रहे एक सिलसिले की कड़ी है कि किस तरह संवैधानिक संस्थाओं को सरकार के मातहत रखा जाए। 

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 25 दिसंबर 2023


 

दीवारों पर लिक्खा है, 23 दिसंबर, 2023


पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत में दी जाती पुरूष-हिंसा

 23 दिसंबर 2023  

   

दिल्ली से लगे यूपी के नोएडा की खबर है कि देश के एक चर्चित मोटिवेशनल स्पीकर विवेक बिन्द्रा के खिलाफ पत्नी से मारपीट की पुलिस रिपोर्ट दर्ज कराई गई है। यह शादी इसी 6 दिसंबर को होना बताया गया है, और पत्नी के भाई का कहना है कि उनकी बहन से इस बुरी तरह मारपीट की गई है कि एक कान का पर्दा फट गया, और बदन पर पिटाई के निशान हैं, उसका इलाज एक अस्पताल में चल रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि शादी के अगले ही दिन विवेक बिन्द्रा अपनी मां से बहस कर रहे थे, और बीच-बचाव करने के लिए नवविवाहिता पत्नी ने बीच-बचाव की कोशिश की, उस पर बहुत बुरी तरह पिटाई की गई। पुलिस को एक वीडियो भी दिया गया जिसमें विवेक बिन्द्रा अपनी रिहायशी सोसायटी के मेनगेट पर पत्नी से जबर्दस्ती कर रहे हैं। अब जिस व्यक्ति को बहुत बड़ा मोटिवेशनल स्पीकर कहा जाता है, उसका यह हाल है कि शादी के दस दिन के भीतर ही पत्नी पर हिंसा का यह मामला दर्ज हुआ है। दूसरों को जिंदगी जीने के और कामयाबी के तरीके सिखाने का दावा करने वाले आदमी ने यह कैसी मिसाल पेश की है? 

आज ही सुबह इस खबर को देखे बिना यह संपादकीय लिख रहे संपादक ने फेसबुक पर कुछ बातें लिखी थीं कि ऐसे परिवार जो कि बेटे और बेटी में फर्क करते हैं, वे एक को हिंसक बनने के लिए, और दूसरे को हिंसा का शिकार बनने के लिए तैयार करते हैं। यह भी लिखा था कि बेटे सबसे तेजी से सीखते हैं, अपनी मां-बहन से घर पर होती हिंसा से, फिर वे अपनी बीवी-बेटी तक वही ले जाते हैं। एक और बात लिखी थी कि जाति का अहंकार दूसरी जातियों पर ही नहीं उतरता, अपने घर की महिलाओं और लड़कियों पर भी उतरता है। अब अनजाने में लिखी गई इन बातों को आज अगर इस तथाकथित मोटिवेशनल स्पीकर विवेक बिन्द्रा से जोडक़र देखें, तो वह शादी के अगले ही दिन बीवी को इस तरह पीट रहा है, और इसकी वजह मां से की जा रही बदसलूकी में बीवी का बीच-बचाव करना है। यानी यह आदमी मां से भी बदसलूकी कर रहा था, और बीवी से भी! यह कुछ उसी किस्म की बात है जैसी कि इस संपादक ने सुबह फेसबुक पर लिखी थी। 

भारत में जिन जातियों को अपने बेहतर होने का घमंड रहता है, उसके लोग न सिर्फ बाहर की दुनिया में दूसरी जातियों से बदसलूकी करते हैं, बल्कि वे घर के भीतर भी लड़कियों और महिलाओं को मर्दों से नीचा मानते हैं, और उनके साथ हिंसा करते हैं। जाति व्यवस्था और धर्म व्यवस्था मिलकर ऐसा माहौल बनाते हैं कि महिलाएं नीचे दर्जे वाली हैं, और उनके साथ हिंसा एक जायज बात है। यह मनुस्मृति से लेकर दूसरे कई धर्मों तक की सोच है, और धीरे-धीरे धार्मिक कहानियों से शुरू होकर लोगों की सोच में यह हिंसा आने लगती है। मर्दों को लगने लगता है कि वे बेहतर इंसान होते हैं, और औरतें गुलामी के लायक होती हैं। यही सोच परिवार के भीतर पिछली पीढ़ी, अपनी पीढ़ी, और अगली पीढ़ी, सबकी महिलाओं और लड़कियों से हिंसा का माहौल खड़ा करती हैं। जिस परिवार में एक पुरूष लड़कियों और महिलाओं से हिंसा करता है, उसकी अगली पीढ़ी के पुरूष भी ऐसे ही खतरनाक होने की गुंजाइश रखते हैं। दुनिया भर में शोहरत पाने वाला मोटिवेशनल स्पीकर या तो खुद परिवार की किसी ऐसी मिसाल से प्रभवित है, या कम से कम वह आसपास के और लोगों को धीरे-धीरे ऐसी ही हिंसा की प्रेरणा देते रहेगा। 

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि बाप-भाई की हिंसा से प्रभावित परिवार की लड़कियां और महिलाएं भी अपनी अगली पीढ़ी की बेटी-बहू के साथ हो रही हिंसा को प्राकृतिक, स्वाभाविक, और जायज मानने लगती हैं, और परिवार के पुरूषों की ऐसी हिंसा में साथ भी देने लगती हैं। इन दिनों तो दहेज-हत्याएं कड़े कानून की वजह से कम हुई हैं, वरना परिवार में महिला के रहते हुए बाहर से आई बहू की हत्या हो जाए, और उसकी सास-ननद-जेठानी की उसमें सहमति न हो, ऐसा हो नहीं सकता। जबरिया गर्भपात से लेकर गुलाम सरीखी जिंदगी देने में परिवार की महिलाएं भी पुरूषों के साथ हो जाती हैं क्योंकि उन्होंने भी अपने वक्त पर ऐसे जुल्म सहे हुए रहते हैं, और शायद उन्हें उनका बदला निकालने के लिए भी ऐसा जायज लगता है। इस तरह परिवार के भीतर का हिंसक माहौल अगली कई पीढिय़ों को प्रभावित कर सकता है, और ऐसी हिंसक सोच से उबरने के लिए अगली पीढ़ी को एक सचमुच की सामाजिक न्याय की सोच की जरूरत रहती है, जो कि भारत जैसे समाज में बहुत आसान भी नहीं रहती।

औरत और मर्द के हकों में फर्क करने वाली लैंगिक-असमानता से उबरना न तो सिर्फ कानून के बस का रहता है, और न ही समाज अकेले इसे कर सकता है। इन दोनों की साथ-साथ जरूरत रहती है। भारत की ही मिसाल को लें, तो यहां पर सतीप्रथा से लेकर बालविवाह तक को खत्म करने के लिए, देवदासीप्रथा को खत्म करने के लिए कानून की भी जरूरत पड़ी, और सामाजिक आंदोलन की भी। कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए भी इन दोनों की साथ-साथ जरूरत पड़ी। इन सबके लिए महिलाओं की पढ़ाई-लिखाई और आर्थिक आत्मनिर्भरता की जरूरत पड़ी जो कि एक दीर्घकालीन सामाजिक सुधार की बात रही। लेकिन धीरे-धीरे जैसे-जैसे महिलाएं आत्मनिर्भर हो रही हैं, वे हिंसा का प्रतिकार भी करने लगी हैं, और उससे उबरना भी जानती हैं। पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ शहरीकरण ने भी नौबत सुधारने का काम किया है, और संयुक्त परिवार टूटने से भी महिलाओं को बेहतर हक मिल पाए हैं। संयुक्त परिवारों में जो सबसे पुरानी पीढ़ी रहती है, उसके दकियानूसी खयालों से उबर पाना परिवार की किसी भी पीढ़ी के बस का नहीं रह जाता। इसलिए परिवार के भीतर पुरूषवादी हिंसक सोच को खत्म करने के जो-जो तरीके हो सकते हैं, उन सबके बारे में कोशिश करने की जरूरत है। इसमें धर्म और जाति, इन दोनों के बेइंसाफ ढांचों में औरत को गुलाम की तरह माना गया है, और धर्म और जाति की कट्टरता से लैस लोग परिवार के भीतर भी औरत को गुलाम बनाकर चलने की सोच रखते हैं। इसलिए धर्म और जाति के ढांचों के रहते हुए भी उनके भीतर से लैंगिक-हिंसा खत्म करने की जरूरत है। दुनिया के अलग-अलग देशों, धर्मों, और संस्कृतियों में महिलाओं के सामने चुनौतियां अलग-अलग हैं। हिन्दुस्तान एक बहुत बड़ा मुल्क है, और यहां की अलग किस्म की सामाजिक बेइंसाफी से निपटने के तरीके अपने आपमें बहुत अलग-अलग किस्म के रहेंगे। देश के कई महिला-अधिकार संगठन इस तरफ काम कर रहे हैं, लेकिन उनकी रफ्तार और क्षमता दोनों ही जरूरत के मुकाबले बहुत कम है। कानून, उस पर अमल, अदालती निपटारे, और समाज सुधार, इन सब मोर्चों पर कोशिश करने के साथ-साथ महिला की आर्थिक आत्मनिर्भरता पर सबसे अधिक जोर देना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 22 दिसंबर, 2023


 

थोक में होती हत्याओं को रोकने बंदूकें काफी नहीं..

  22 दिसंबर 2023  

   

चेक गणराज्य की राजधानी प्राग में एक विश्वविद्यालय में वहीं के एक छात्र ने किसी किस्म की बंदूक से गोलियां चलाईं जिसमें 15 लोगों की मारे जाने की खबर है, और दो दर्जन के करीब लोग जख्मी हुए हैं। वहां से आई इस सरकारी खबर के मुताबिक इसके पीछे कोई अंतरराष्ट्रीय उग्रवादी हाथ नहीं है, और विदेश में हुए इसी किस्म के किसी जनसंहार से प्रभावित होकर इस छात्र ने ऐसा किया है। चेक गणराज्य में ऐसी घटनाएं आम नहीं हैं, और इस हमले के पहले इस संदिग्ध हमलावर के पिता का भी शव मिला था, जिससे ऐसा लगता है कि उसकी हिंसा की शुरूआत परिवार से हुई। जो भी हो, यह वारदात दो बातों को साफ करती है, पहली तो यह कि थोक में मारने की ताकत रखने वाले हथियारों की आसान उपलब्धता, और बड़ी संख्या में मौजूदगी से ऐसे खतरे बने ही रहेंगे। दूसरी बात यह कि किसी दूसरे देश के किसी हमले से दुनिया में दूसरी जगहों पर भी लोगों को ऐसी हिंसा की प्रेरणा मिल सकती है, मिलती है। 

इस किस्म की सामूहिक हत्याओं की सबसे अधिक खबरें अमरीका से आती हैं जहां पर लोग नस्लीय नफरत से परे भी सिर्फ अपनी भड़ास निकालने को इस तरह लोगों को थोक में मार डालते हैं। खुद अमरीका का एक बड़ा तबका इस किस्म की हिंसा को लेकर परेशान है, और लगातार यह कोशिश कर रहा है कि किसी तरह अमरीकियों की दिमाग पर से हथियारों की दीवानगी घटाई जाए, ताकि बच्चे-बच्चे के हाथ अनगिनत हथियारों तक न पहुंच सकें। लेकिन वहां की एक सबसे बड़ी पार्टी, ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी हथियारों के कारोबार और शौक को बढ़ावा देते चलती है, और हथियार किसी तरह कम हो नहीें रहे हैं। दूसरी तरफ पूरी दुनिया में अमरीका की खबरें सबसे तेजी से पहुंचती हैं, और ऐसी हिंसा की मिसालें दूसरी जगहों पर भी किसी तनाव या नफरत से गुजरते हुए दिमागों को वैसा ही करने का हौसला देती होंगी, और रास्ता दिखाती होंगी। 

दुनिया के बाकी देशों को भी यह याद रखना चाहिए कि किसी भी तरह की नफरत और हिंसा की मिसालें बाकी दुनिया को भी प्रभावित करती हैं। और आज तो दुनिया के अधिकतर देशों में अधिकतर धर्मों और नस्लों के लोग मौजूद हैं, और कब, कौन, कहां का बदला कहां निकालने लगे, इसका कोई ठिकाना तो है नहीं। लोगों को याद रखना चाहिए कि जब वे अपने देश में किसी नस्ल या धर्म के लोगों के खिलाफ नफरत और हिंसा खड़ी करते हैं, तो उसकी प्रतिक्रिया दुनिया के किसी दूसरे देश में, हमलावर नस्ल या धर्म के लोगों के खिलाफ हो सकती है। यह भी हो सकता है कि ऐसी प्रतिक्रिया किसी बड़ी हिंसा की शक्ल में सामने न आए, बल्कि सामाजिक नफरत की शक्ल में निकले। आज भी पश्चिम के बहुत से देशों में इस्लाम और मुस्लिमों के खिलाफ कुछ तबकों में एक सोच है, और ऐसी सोच इन देशों में मुस्लिम शरणार्थियों के खिलाफ माहौल खड़ा करती है, और इस्लामिक रीति-रिवाजों की साख खराब करती है। भारत जैसे दूसरे देशों को भी यह समझने की जरूरत है कि भारत के जातिवाद के खिलाफ अमरीका जैसे देश में कई शहरों की स्थानीय सरकारें नियम बना रही हैं, और भारत में मुस्लिमों के खिलाफ जितने किस्म की कार्रवाई चलती है, उसकी प्रतिक्रिया मुस्लिम देशों में भारत के लोगों के खिलाफ होती है। यह एक अलग बात है कि बड़ी हिंसक घटना के बिना ऐसी प्रतिक्रिया खबरों में नहीं आती हैं, लेकिन जो लोग वहां काम करते हैं, कारोबार करते हैं, उन्हें भेदभाव झेलना पड़ता है। 

यह भी समझने की जरूरत है कि हिंसा से प्रभावित होकर कोई अकेले व्यक्ति भी बड़े पैमाने पर हिंसा कर सकते हैं जैसा कि कल चेक गणराज्य की राजधानी प्राग में सामने आया है। दुनिया को हिंसक मिसालों से भी बचने की जरूरत है क्योंकि जब किसी व्यक्ति में कोई हत्यारी सोच आ जाती है, तो उनके नुकसान करने की ताकत कई गुना बढ़ जाती है। आज हिंसा को बढ़ाने वाले वीडियो गेम भी इतने लोकप्रिय हो गए हैं कि बच्चे भी उन्हें खेलते हुए हत्या या आत्महत्या के बारे में सोचने लगे हैं, और ऐसे हिंसक खेलों से प्रभावित हिंसा की बहुत सी घटनाएं सामने आई हैं। हॉलीवुड की फिल्में हथियारों की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए लंबे समय से बदनाम हैं, और फिल्मों से परे टीवी के कार्यक्रमों से लेकर चुनौतियां देने वाले वीडियो गेम तक हिंसा को बढ़ाते चल रहे हैं। इन सबसे प्रभावित लोगों की सोच को जब दुनिया की किसी एक जगह पर थोक में कत्ल करने की मिसालें मिलती हैं, तो वह पेट्रोल को आग मिल जाने सरीखा होता है। खुद अमरीका के भीतर हर कुछ दिनों में कहीं न कहीं बेकसूरों पर गोलीबारी होती है, और इनमें से बहुत सी घटनाएं नस्लीय-हिंसा से भी प्रभावित होती हैं। 

दुनिया को अगर रंग, धर्म, जाति, नस्ल, और राष्ट्रीयता की नफरत से बचाना है, तो आज उसे किसी एक देश की सरहद के भीतर कैद करके नहीं बचाया जा सकता। भूमंडलीयकरण एक हकीकत है, और हर देश में बहुत से किस्म के लोग मौजूद हैं। ऐसे में अपनी-अपनी किस्मों के भीतर लोगों को कट्टरता घटानी होगी, तभी उनके खिलाफ बाकी दुनिया में नफरत घट सकेगी। लोग कट्टर बने रहें, और उनके खिलाफ दुनिया में कोई प्रतिक्रिया न हो, ऐसा नहीं हो सकता। इसलिए जो लोग खुद को, अपने परिवार और समाज को सुरक्षित रखना चाहते हैं, उन्हें अपने इलाकों में अपनी कट्टरता को घटाना होगा, और दूसरों के साथ हिंसा को खत्म भी करना होगा। ऐसा न करने पर हो सकता है कि कई धर्मान्ध और साम्प्रदायिक, नस्लीय हिंसा करने वाले लोग खुद तो अपने इलाकों में महफूज बैठे रहें, लेकिन उनके समाज के लोग दूसरे देशों में हिंसा के शिकार हों। पश्चिम के बहुत से देशों में धार्मिक शिनाख्त की बिना पर कई लोगों पर हमले होते हैं, क्योंकि उनके जैसी शिनाख्त वाले लोग दुनिया में किसी और जगह पर कट्टरता फैलाते बदनाम रहते हैं। इसलिए आज कोई भी व्यक्ति तभी सुरक्षित हो सकते हैं, जब सब लोग सुरक्षित हों। अमरीका जैसे दुनिया के सबसे हथियारबंद देश में भी लोगों के हथियार धरे रह जाते हैं जब एक स्कूल, एक मॉल, या एक यूनिवर्सिटी में एक अकेला बंदूकबाज जाकर दर्जनों लोगों को मार डालता है। इससे यही साबित होता है कि हथियारों की अधिक मौजूदगी हिफाजत की गारंटी नहीं होती। दूसरी तरफ लोगों का किसी भी किस्म के तनाव से, किसी भी तरह की नफरत से मुक्त होना, अहिंसक होना, सहनशील होना, लोकतांत्रिक होना ही सुरक्षा का सामान हो सकता है। 

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 21 दिसंबर 2023


 

खडग़े ने धनखड़ को दिखाया सही आईना

21 दिसंबर 2023  

   

राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने सदन के बाहर तृणमूल कांग्रेस के लोकसभा सदस्य कल्याण बैनर्जी द्वारा की गई उनकी मिमिक्री (नकल का अभिनय) को जिस तरह अपनी जात से जोड़ लिया है, और इसे जाट समुदाय का अपमान बताया है, उस पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने आपत्ति की है। उन्होंने कहा है कि हर चीज को जाति से जोड़ लेना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि उन्हें भी राज्यसभा में कई बार बोलने का मौका नहीं मिलता है तो क्या वे यह दावा करें कि संसद में दलितों को बोलने का अवसर नहीं दिया जाता? उन्होंने सभापति को सलाह दी है कि उन्हें सदन में जाति का मुद्दा उठाकर लोगों को नहीं भडक़ाना चाहिए। धनखड़ ने उनकी मिमिक्री को जाट समुदाय का अपमान करार दिया था, और किसानों का भी। पाठकों को याद होगा कि हमने कल ही इस बारे में लिखा, और यूट्यूब पर कहा है कि इसका जाति से क्या लेना-देना है? और मानो धनखड़ की बात को इशारा समझकर एक जाट संगठन ने अगले चुनाव में विपक्ष को सबक सिखाने का सार्वजनिक बयान भी जारी कर दिया है। 

हिन्दुस्तान में जाति की एक भूमिका तो रहती है, लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि जाति हर जगह हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं होती है। जगदीप धनखड़ का परिचय देखें, तो वे राजस्थान के गांव में पैदा होकर सैनिक स्कूल में पढ़े, कानून की पढ़ाई की, राजस्थान हाईकोर्ट में वे सीनियर वकील रहे, और वे सुप्रीम कोर्ट में भी एक सीनियर वकील का दर्जा पाए हुए थे, और कई हाईकोर्ट में भी वे संवैधानिक मामलों में वकालत करते आए हैं, वे जनता दल और कांग्रेस के भी सदस्य रहे, लोकसभा का चुनाव जीतकर आए, विधायक भी रहे, और 2003 से भाजपा में हैं। वे 2019 से 2022 तक पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहे, और वहां रहते हुए वे सार्वजनिक रूप से और सोशल मीडिया पर ममता सरकार से लगातार टकराते भी रहे। 2022 में वे उपराष्ट्रपति चुने गए, और उसी नाते वे राज्यसभा के सभापति भी हैं। अब जिन्हें अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग राजनीतिक दलों ने इतना महत्व दिया, और जो खुद अपनी पढ़ाई और अपनी वकालत की वजह से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे हुए हैं, उन्हें एक मिमिक्री को अपनी जात पर नहीं ले लेना  था। उन्होंने दर्जनों सांसदों को निलंबित किया है, और लोकसभा से भी ऐसे ही निलंबित सांसद बाहर प्रदर्शन कर रहे थे, जिसमें धनखड़ के सदन-संचालन की नकल की गई। किसी ने भी उनकी जाति का कोई जिक्र नहीं किया, और इतने ऊंचे ओहदे पर पहुंचने के बाद उन्हें खुद भी अपनी जाति को ढाल की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए था। वैसे भी भारत के संदर्भ में देखा जाए तो जाट एसटी-एससी जैसे किसी सामाजिक उपेक्षा और शोषण की शिकार जाति नहीं है। जाट एक मजबूत बिरादरी है, और यह संपन्न तबका भी है। जाटों को लेकर किसी तरह की सामाजिक हिकारत कहीं नहीं रहती, इसलिए धनखड़ का जाति को जगाना एक किस्म की राजनीति है, जिससे राज्यसभा की कुर्सी पर बैठे हुए व्यक्ति को, उपराष्ट्रपति को बचना चाहिए था। 

यह संपादकीय लिखने वाले संपादक को अच्छी तरह याद है कि जब दो दशक पहले, भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ी मोहम्मद अजहरुद्दीन के बारे में दक्षिण अफ्रीकी टीम के कप्तान ने यह बयान दिया था कि अजहर ने उन्हें सट्टेबाजों से मैच फिक्सिंग के लिए मिलवाया था, इसके बाद इस मामले की सीबीआई जांच हुई थी, और अजहर को इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल और बीसीसीआई ने जिंदगी भर के लिए प्रतिबंधित कर दिया था। यह एक अलग बात है कि 2012 में आंध्रप्रदेश हाईकोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया था। अजहर ने प्रतिबंध के खिलाफ एक बयान में यह कहा था कि वे मुस्लिम हैं इसलिए उनके साथ यह भेदभाव किया जा रहा है। उस वक्त इस संपादक के साप्ताहिक कॉलम (आजकल) में इस मुद्दे पर लिखते हुए यह अफसोस जाहिर किया गया था कि जिस देश ने अजहर को राष्ट्रीय टीम का कप्तान बनाया था, और जिसने 47 टेस्ट मैच और 174 वनडे इंटरनेशनल में टीम की अगुवाई की थी, 14 टेस्ट और 90 वनडे में टीम को जीत दिलाई थी, उसे इतना महत्व मिलने के बाद मैच फिक्सिंग के आरोप पर मुस्लिम होने की आड़ नहीं लेनी थी। उस वक्त इस संपादक ने कॉलम में लिखा था कि देश से इतना सब पाने के बाद जब अजहर पर एक आरोप साबित हुआ, तो उसने पतलून उतार दी। 

लोगों को अपनी जाति का इस्तेमाल सोच-समझकर, और न्यायसंगत, तर्कसंगत तरीके से ही करना चाहिए। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि सार्वजनिक जीवन में जाति का महत्व नहीं रहता, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि जाति के आधार पर अगर शोषण नहीं होता है, हमला नहीं होता है, तो उसे नाजायज तरीके से ढाल बनाना सबको समझ भी आ जाता है। अभी धनखड़ ने कुछ वैसा ही किया है। दूसरी एक बात और निराश करती है कि जब देश की संसद में दर्जनों जलते-सुलगते जनहित के मुद्दे उठ रहे हैं, विपक्ष और सत्ता के बीच टकराव चल रहा है, सत्ता अपने अंधाधुंध बाहुबल के साथ विपक्ष को कुचलकर धर दे रही है, प्रस्तावित कानूनों पर चर्चा भी नहीं हो पा रही है, तब राज्यसभा का सभापति अपना मजाक उड़ाने को ही तीन दिन से देश का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा मान बैठे, तो यह आत्ममुग्धता की एक बड़ी मिसाल है। जब दमकलकर्मी आग बुझाने कहीं जाते हैं, तो बचाव मेें लगे किसी व्यक्ति का पांव अपने पांव पर पड़ जाने को अपनी जाति से जोडक़र नहीं देखते। उपराष्ट्रपति और राज्यसभा सभापति का यह बर्ताव उनके पद की गरिमा के अनुकूल नहीं है, और उन्हें अपने आपको देश से अधिक महत्वपूर्ण साबित करने से बचना चाहिए था, अपनी जाति को ढाल बनाने से बचना चाहिए था, क्योंकि देश में जाटों को लेकर किसी तरह का जाति भेदभाव है भी नहीं। राजनीति में यह सिलसिला बहुत घटिया रहता है जब लोग दूसरों पर हमला करने के लिए उनकी किसी भी बात को अपनी जाति पर हमला करार देने लगते हैं। लोकतंत्र के सार्वजनिक बयानों के इतिहास में ऐसे खोखले काम अलग से दर्ज होते हैं, हो सकता है कि कुछ बरस के शासन काल में सत्ता पर काबिज लोगों के खिलाफ अधिक न लिखा जाए, लेकिन जब कभी राजनीति या किसी दूसरे सार्वजनिक जीवन के व्यक्ति का पूरा मूल्यांकन होता है, तो कहे और लिखे गए एक-एक शब्द कटघरे में खड़े रहते हैं। 

हमारा मानना है कि मल्लिकार्जुन खडग़े ने धनखड़ को सही आईना दिखाया है। उन्होंने धनखड़ को यह भी कहा है कि अगर उनकी मिमिक्री सदन के बाहर हुई है तो सदन में प्रस्ताव क्यों लाया जा रहा है? उनकी बात इस हिसाब से भी सही है कि मिमिक्री करने वाले सांसद लोकसभा के निलंबित सदस्य हैं, और उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग करने के लिए जिस राहुल गांधी को घेरा जा रहा है, वे भी लोकसभा के सदस्य हैं। क्या यह मुद्दा संसद में पेश किए जा रहे कानूनों के मुकाबले अधिक अहमियत का हो गया है? और धनखड़ के बयान को देखें तो हैरानी होती है कि वे अपने सम्मान की रक्षा के लिए किसी भी आहुति देने के लिए तैयार होने जैसी बातें कह रहे हैं। देश से अपने आपको अधिक महत्वपूर्ण समझना, और साबित करना देश के किसी भी इंसान को उसके अपने व्यक्तित्व से छोटा ही साबित करता है। खडग़े ने उन्हें इस मुद्दे पर जाति को न भडक़ाने की जो सलाह दी है, वह भी एकदम सही है। लोकतंत्र में संसदीय परंपराएं ओछी नहीं, गरिमामय होनी चाहिए, और जो व्यक्ति जितनी ऊंची कुर्सी पर पहुंचे, उसे उतना ही अधिक विनम्र और न्यायप्रिय भी होना चाहिए। किसी को भी अपने सम्मान को इतना नाजुक नहीं मान लेना चाहिए कि वह एक मजाक से जख्मी हो जाएगा। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 दिसंबर 2023


 

उपराष्ट्रपति की मिमिक्री, बदमजा और अपमानजनक तो हो सकती है, जुर्म नहीं

20 दिसंबर 2023  

  

भारतीय संसद के दोनों सदनों में लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति दोनों की कड़ी कार्रवाई से विपक्ष का एक बड़ा हिस्सा सदन के बाहर हो गया है। दस से अधिक दिन हो गए हैं, और विपक्ष और सत्ता के चल रहे टकराव के बीच हालत यह है कि संसद विपक्षमुक्त होने की तरफ बढ़ रही है। 18 दिसंबर को एक दिन में 78 सांसदों को निलंबित किया गया। लगातार टकराव, और आसंदी द्वारा लगातार निलंबन और निष्कासन के चलते हुए विपक्ष अपने को प्रताडि़त महसूस कर रहा है, और उसे ऐसा लग रहा है कि अध्यक्ष और सभापति विपक्ष के खिलाफ आमादा हैं। हम अभी निलंबन सही या गलत होने पर जाना नहीं चाहते, क्योंकि जिस तरह थोक में संसद खाली करवाई जा रही है, उससे देश का संसदीय लोकतंत्र कमजोर हो रहा है। यह पूरा सिलसिला अभूतपूर्व है। ऐसे में जब निलंबित सांसदों की भीड़ संसद परिसर में जुटी हुई थी, तो तृणमूल कांग्रेस के एक सांसद कल्याण बैनर्जी ने बाकी सांसदों के सामने उपराष्ट्रपति जो कि राज्यसभा के सभापति भी होते हैं, जगदीप धनखड़ के सदन चलाने के तरीके की नकल करना शुरू किया, और वहां मौजूद सभी पार्टियों के सांसदों ने उसका मजा लिया। राहुल गांधी अपने मोबाइल पर उसका वीडियो बनाते दिखे। सांसदों के इस बर्ताव पर प्रधानमंत्री सहित बहुत से सत्तारूढ़ नेताओं ने अफसोस जाहिर किया, और उपराष्ट्रपति ने इस घटना को शर्मनाक बताया है कि एक सांसद मजाक उड़ा रहा है, और दूसरा सांसद उसका वीडियो बना रहा है। धनखड़ ने कहा कि यह एक किसान और एक समुदाय का अपमान मात्र नहीं है, यह राज्यसभा के सभापति के पद का भी अपमान है। उन्होंने कहा कि यह सबसे गिरा हुआ स्तर है, और उन्हें इससे बहुत कष्ट हुआ है। उन्होंने इसे अपने जाट होने से भी जोड़ा, और सदन के बाहर कल ही किसी जाट संगठन ने इस पर सार्वजनिक आपत्ति भी की थी। एक दूसरी खबर बताती है कि दिल्ली के किसी वकील ने वहां थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई है कि यह उपराष्ट्रपति का अपमान है। अभी तक इस रिपोर्ट के बारे में और जानकारी तो नहीं मिली है, लेकिन पुलिस ने रिपोर्ट ले ली है। 

इस मामले के इतिहास को भी थोड़ा सा समझना जरूरी है कि जगदीप धनखड़ इससे पहले पश्चिम बंगाल के राज्यपाल थे, और वहां तृणमूल सरकार के साथ उनका नियमित और लगातार टकराव चलते ही रहता था। अभी तृणमूल सांसद ने निलंबन के बाद उनकी जो नकल की इसके पीछे धनखड़ के बंगाल राजभवन के कार्यकाल का टकराव भी रहा है। राज्यसभा में अलग-अलग पार्टियों के साथ उनका टकराव अलग-अलग मुद्दों पर चल रहा है, जो कि गंभीर संवैधानिक मुद्दे भी हैं। ऐसे में सदन से निलंबित सदस्यों के बीच उनकी मिमिक्री करके उनकी खिल्ली उड़ाना कितना बड़ा अपमान है, और कितना बड़ा जुर्म है इसकी साफ मिसालें अभी नहीं हैं, और पुलिस रिपोर्ट के बावजूद इस पर कोई कानून लागू होगा ऐसा लगता नहीं है। हालांकि दिल्ली पुलिस केन्द्र सरकार के मातहत काम करती है, और वह अगर कोई जुर्म दर्ज करके तृणमूल सांसद की गिरफ्तारी भी कर लेती है, तो भी उन्हें अपने आपको बेकसूर साबित करने में बरसों लग सकते हैं। इसलिए यह बात साफ है कि बहुत से दूसरे मामलों की तरह किसी भी राज्य या केन्द्र के मातहत काम करने वाली पुलिस के रिपोर्ट दर्ज कर लेने से उस काम के जुर्म होने का अधिक लेना-देना नहीं रहता। इसलिए हम कानूनी बारीकियों से परे अपनी सामान्य समझबूझ से इसकी चर्चा कर रहे हैं। 

लोकसभा, राज्यसभा, या राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों के कुछ विशेषाधिकार रहते हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह कि अदालती जजों को हम बात-बात पर अदालत की अवमानना मानकर किसी को कटघरे में खड़ा करते देखते हैं। हो सकता है कि संसद के विशेषाधिकार में यह आता हो कि सदनों के मुखिया, या कि किसी आम सदस्य भी, की अवमानना पर सदन की विशेषाधिकार कमेटी को मामला दिया जा सके। और ऐसी कमेटियां चूंकि सत्ता के बहुमत वाली होती हैं, इसलिए सत्ता के साफ रूख को देखते हुए उनके रुझान का अंदाज भी लगाया जा सकता है, जैसा कि लोकसभा से तृणमूल की ही सांसद महुआ मोइत्रा को आनन-फानन बर्खास्त करने के मामले में दिखा है। यह एक अलग बात है कि इसी संसद में एक मुस्लिम सांसद को नफरती और साम्प्रदायिक गंदी गालियां देने वाले भाजपा सांसद को अगली बार ऐसा न करने की चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। जबकि सदन के बाहर अगर ये गालियां दी गई होतीं, तो सुप्रीम कोर्ट के दर्जन भर बार के आदेशों के मुताबिक उस पर हेट-स्पीच का जुर्म दर्ज होता ही, और हमारा अंदाज है कि उस पर कैद भी हुई होती। लेकिन संसद के भीतर की हिंसक बात पर भी अदालती दखल नहीं हो सकता, और लोकसभा ने इसे अपने रूख और रुझान के मुताबिक नरमी से निपटा दिया, भाजपा सांसद को एक असाधारण रियायत मिली, जो कि देश के कानून के तहत संसद के बाहर नहीं मिल सकती थी। इसलिए आज अलग-अलग पार्टियों के सांसद कई वजहों को लेकर लोकसभा, राज्यसभा, और सरकार के रूख से बहुत ही हक्का-बक्का हैं, और ऐसे में बंगाल के एक राज्यसभा सदस्य ने राज्यसभा के उपसभापति की खिल्ली उड़ाई, और बाकी लोगों ने उसका मजा लिया। 

लोकतंत्र में कानून दो किस्म के हैं, एक संसद और विधानसभाओं के भीतर के लिए, और एक इन सदनों के बाहर के लिए। सदन के बाहर किसी की खिल्ली उड़ाने को हम लोगों का लोकतांत्रिक अधिकार मानते हैं। वह सही या गलत हो सकता है, उसकी तारीफ या निंदा की जा सकती है, लेकिन वह जुर्म नहीं होता। लोकतंत्र बहुत किस्म के व्यंग्य और हास्य की आजादी देता है। लेकिन जब सदन और अदालतें कुछ खास कानूनों हिफाजत में काम करती हैं, तो किसी जज या किसी संसद सदस्य की ऐसी खिल्ली उड़ाना, अदालत या सदन के भीतर एक अलग परेशान का सामान बन सकता है। अदालतों और सदनों के अवमानना और विशेषाधिकार भंग होने के ये अधिकार अपने आपमें अलोकतांत्रिक रहते हैं, लेकिन ये ताकतवर तबके के अपने आपको अधिक हिफाजत देने की मनमानी रहते हुए भी भारत जैसे लोकतंत्र में कानूनी हैं। अब आज तो देश का कानून ऐसा है कि सांसद की किसी भी बात को सदन के अध्यक्ष या सभापति अनदेखा कर सकते हैं, या किसी की भी किसी दूसरी बात को जुर्म ठहरा सकते हैं। संसदीय परंपरा में सदन के मुखिया को कल्याणकारी-तानाशाह (बेनेवलेंट-डिक्टेटर) कहा जाता है, जबकि ये दो शब्द अपने आपमें विरोधाभासी हैं। न कोई तानाशाह जनकल्याणकारी हो सकते, और न किसी जनकल्याणकारी व्यक्ति को तानाशाही की छूट दी जा सकती। अब आज के संसद के विशेषाधिकार के चलते तृणमूल सांसद की व्यंग्य की मिमिक्री पर संसद की विशेषाधिकार कमेटी, या सांसदों की आचार कमेटी जो चाहे वह सजा सुना सकती हैं, लेकिन लोकतंत्र की भावना व्यंग्य को छूट देती है, और वह तीखा, हमलावर, और अपमानजनक, या बदमजा होने के बावजूद लोकतांत्रिक ही कहलाता है। हमारा ख्याल है कि सभ्य और विकसित लोकतंत्रों के इतिहास में इस मिमिक्री को सजा के लायक ठहराना, न तो देश के आम कानून के तहत मुमकिन होगा, और न ही संसद के विशेषाधिकार से महफूज लोगों को इस पर सजा दिलवाना ठीक लगेगा। इतिहास ऐसी कार्रवाई को लोकतंत्र की परिपक्वता से परे ही दर्ज करेगा। लोकतंत्र का एक मतलब मखौल उड़ाने की आजादी भी होता है। सत्ता चाहे वह अदालत की हो, संसद की, या सरकार की, उसे लोगों के पीछे लगातार लाठी लेकर नहीं दौडऩा चाहिए। अभिव्यक्ति की आजादी किसी की खिल्ली उड़ाने की हद तक जा सकती है, और उस पर कार्रवाई लोकतंत्र का गौरव नहीं बढ़ाएगी।

(Daily Chhattisgarh)