सीमा से सौ-सौ गुना खर्च भी नहीं दिखता चुनाव आयोग को?

 31 अक्टूबर 2023 

   

हिन्दुस्तान का चुनाव आयोग एक वक्त टी.एन.शेषन की मेहरबानी से देश की एक सबसे ताकतवर संवैधानिक संस्था बना था, और ऐसा लगता है कि उस साख को बाद में लगातार खोते चले गया। अब तो नए चुनाव आयुक्त बनाने के लिए जो तरीका केन्द्र सरकार ने बनाया है उससे आयोग सरकार के ही एक विभाग की तरह होकर रह जाएगा। आज भी चुनाव आयोग के सामने अलग-अलग पार्टियों की तरफ से जो शिकायतें जा रही हैं, उन्हें मानो पार्टी का चेहरा देखकर सही या गलत ठहराया जा रहा है। जिस तरह आज देश और दुनिया में किसी लाश का मजहब जानने के बाद ही उस पर आंसू बहाए जाते हैं, या उसे अनदेखा किया जाता है, ठीक उसी तरह चुनाव आयोग अलग-अलग पार्टियों या नेताओं के चेहरे देखकर कार्रवाई करते दिखता है। लेकिन आज हमारा लिखने का मकसद आयोग की आलोचना से कुछ अधिक भी है। 

चुनावों में जिन सीटों पर सीमा से बहुत अधिक खर्च की आशंका रहती है, वहां पर आयोग निगरानी रखने के लिए अलग से ऑब्जर्वर तैनात करता है जो कि आमतौर पर भारतीय राजस्व सेवा, या कस्टम जैसे विभागों से आए रहते हैं, और जो खर्च का हिसाब बेहतर निकाल सकते हैं। लेकिन इसके बावजूद जो उम्मीदवार अंधाधुंध खर्च के लिए जाने जाते हैं, जहां सीमा से सौ-सौ गुना खर्च होता है, वैसी सीटें पहले से सबको पता रहती है, और यह भी पता रहता है कि कौन से उम्मीदवार ऐसा खर्च करेंगे। लेकिन ऐसा खर्च भी आयोग के इन खास पर्यवेक्षकों को या तो दिखता नहीं है, या वे उस पर हाथ नहीं डाल पाते। यह एक बड़ी वजह है कि भारतीय चुनाव लोकतांत्रिक क्यों नहीं रह पाते, और क्यों सबसे संपन्न उम्मीदवारों की जीत की संभावना सबसे अधिक रहती है। सच तो यह है कि पार्टियां भी अब किसी को उम्मीदवार बनाते हुए यह तौलती हैं कि वे चुनाव में खर्च कितना कर पाएंगे? और इस खर्च का मैनेजमेंट करने की उनकी क्षमता है या नहीं? इस तरह भारतीय संसद और विधानसभाओं में धीरे-धीरे अतिसंपन्न लोग भरते चले जा रहे हैं। यह एक अलग बात है कि अगर कुछ मामूली लोग भी वहां पहुंच जाते हैं, तो भी वे एक कार्यकाल खत्म होते-होते खासे संपन्न हो जाते हैं। 

जब चुनाव की उम्मीदवारी पाने में संपन्न की संभावना अधिक हो, और उस संपन्नता से वोट पाने की संभावना अधिक हो, तो फिर लोकतंत्र के जिंदा रहने की संभावना रह कहां जाती है। और अगर खर्च से परे की बातों को भी देखें, तो कई पार्टियां और उम्मीदवार, या उनके स्टार-प्रचारक जिस तरह की नफरती, हिंसक, साम्प्रदायिक बातें करते हैं, उससे भी जाहिर है कि लोगों को लोकतांत्रिक फैसला नहीं लेने दिया जा रहा है, और उनको ऐसे अलोकतांत्रिक और हिंसक असर का शिकार बनाकर उनके वोटों का ध्रुवीकरण किया जा रहा है। धर्म और जाति का जितना खुलकर इस्तेमाल हिन्दुस्तानी चुनाव में हो रहा है, वह अपने आपमें चुनावों के मकसद को खत्म कर रहा है। लोगों को चुनाव में भेड़ों की रेवड़ की तरह एक ही खड्ड में गिराने के लिए नेता और उनकी पार्टियां धर्म और जाति के आधार पर ध्रुवीकरण में लगी रहती हैं, और लोगों की लोकतांत्रिक समझ खत्म करने में भी। इसलिए कि जिनकी लोकतांत्रिक समझ रहेगी, वे अपने वोट बेचेंगे नहीं, या धर्म और जाति की नफरत के आधार पर नहीं देंगे। 

अपने आसपास हम देखते हैं तो लगता है कि कोई पार्टी या उम्मीदवार जितने वोटों से जीतते हैं, उससे कई गुना अधिक वोट कालेधन, या साम्प्रदायिकता की बदनीयत के झांसे में आए रहते हैं। ऐसा लगता है कि जीत हासिल नहीं की जाती, खरीदी जाती है, या हिंसक भडक़ावे से पाई जाती है। जब हार-जीत का फासला देखें तो लगता है कि उससे कई गुना अधिक बिके हुए वोट, और साम्प्रदायिक वोट रहते हैं, जो कि यह साबित करते हैं कि जीत और हार किसी भी कोने से लोकतांत्रिक नहीं है। ऐसा लगता है कि बिना हिंसा के एक मशीनी मतदान करवा देने को ही लोकतांत्रिक चुनाव मान लिया गया है, जबकि यह चुनाव न होकर सिर्फ मतदान है। चुनाव तो तब हो सकता है जब लोगों को खरीद-बिक्री करने न मिले, भडक़ाने न मिले, हिंसा और नफरत की बातें करने न मिले। लेकिन हिन्दुस्तानी चुनाव अब इन तमाम चीजों की गिरफ्त में आ गए हैं। पार्टियों के पास सैकड़ों करोड़ रूपए हैं, और अभी जब सुप्रीम कोर्ट में इस बारे में मामला पहुंचा, तो केन्द्र सरकार ने वहां कहा कि राजनीतिक दलों को चुनावी बॉंड से जो दान मिलता है, उसके बारे में कोई भी जानकारी पाने का जनता को हक नहीं है। यह किस किस्म की पारदर्शिता है? ऐसे लुके-छिपे काम में तो सरकार से अपना काम निकलवाने वाले लोग सत्तारूढ़ पार्टी को दलाली, कमीशन, या रिश्वत देने के लिए उस पार्टी के बॉंड खरीद लेंगे, और जनता को यह पता भी नहीं लगेगा कि यह रकम किस एवज में दी गई है। हम यह उम्मीद करते हैं कि सुप्रीम कोर्ट केन्द्र सरकार के इस रूख के पीछे की बेईमानी और खतरों को समझेगा, और राजनीतिक दान को सौ फीसदी पारदर्शी बनाएगा। कारोबारियों से लिए जाने वाले चंदे के बारे में जनता को जानने का हक क्यों नहीं होना चाहिए जबकि सत्ता या विपक्ष में बैठी पार्टियां ऐसे कारोबारियों के गलत धंधों को बचाने के लिए गिरोहबंदी भी कर लेती हैं। 

चुनावों में पार्टियों और उम्मीदवारों के अंधाधुंध खर्च पर रोक लगाने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति वाले चुनाव आयोग और पर्यवेक्षकों की जरूरत रहती है। इन लोगों को सत्तारूढ़ या सत्ता पर आने की संभावना वाली पार्टियों के आतंक से आजाद भी रहना चाहिए। आज पैसे वाले नेता, और पार्टियां जितने बेधडक़ होकर चुनाव कानून तोड़ते हैं, अंधाधुंध खर्च करते हैं, वह सिलसिला खत्म होना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 31 अक्टूबर 2023


 

धर्म के टकराव कहीं भी हों, उनके यहां भी असर का खतरा

 30 अक्टूबर 2023 

   

केरल में कल येहोवा विटनेस ईसाई समुदाय के एक सभा भवन में एक धमाका हुआ जिसमें तीन महिलाओं की मौत हो गई, और 50 से अधिक लोग जख्मी हुए हैं। इस बीच इतवार की सुबह प्रार्थना के वक्त धमाके करने वाले एक व्यक्ति ने सामने आकर उसकी जिम्मेदारी ली है, और कहा है कि इस समुदाय (या सम्प्रदाय) की शिक्षाएं देशविरोधी हैं, इसलिए उसने ऐसा किया है। उसने यह भी कहा कि 16 बरस पहले वह इस चर्चा से जुड़ा हुआ था, लेकिन 6 बरस पहले उसने चर्च को चेतावनी दी थी कि वह देशविरोधी काम करता है, और उसने ये हमले किए। इस चर्च के लोगों का कहना है कि वह किसी भी धार्मिक या राजनीतिक आंदोलन में नहीं रहता, न विरोध करता, न समर्थन करता, और इस हमले के एक दिन पहले शनिवार को इजराइल और गाजा के बीच चल रहे संघर्ष पर उसने एक प्रार्थना सभा आयोजित की थी, जिसके अगले दिन यह हमला हुआ। केरल के बहुत से परिवारों में कोई सदस्य किसी और चर्च में है, और कोई दूसरे सदस्य येहोवा विटनेस नाम के इस छोटे समूह से जुड़े हुए हैं। हमलावर ने एक वीडियो में कहा है कि यह चर्च बच्चों को राष्ट्रगान से रोकता है, उनके बड़े होने पर उन्हें वोट न देने, सेना में न जाने, या सरकारी नौकरी न करने की नसीहत उन्हें दी जाती है। उसका यह भी कहना है कि यह चर्च लोगों को अपने से परे रहने पर तबाह हो जाने की बात कहता है। 

इस चर्च से परे, और इस हमलावर से परे, जो बात परेशान करने वाली है, वह यह है कि हिन्दुस्तान में धर्म का एक और चेहरा इस तरह हिंसक और जानलेवा हो रहा है, और धर्म के हिमायती, या उसके विरोधी इस तरह आतंकी हमले कर रहे हैं। यह सिलसिला बहुत खतरनाक इसलिए है कि हिन्दुस्तान में धर्म की दखल बहुत अधिक है, और आज देश में किसी भी दूसरे राजनीतिक या सामाजिक मुद्दे से ऊपर धर्म हावी हो जाता है। धर्मों के बीच इस देश में टकराव भी खड़ा किया जा रहा है, एक-दूसरे के खिलाफ नफरत भी फैलाई जा रही है, और भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाएं, संवैधानिक संस्थाएं लोगों के बीच धर्म के आधार पर बड़ा भेदभाव कर रही है। एक तरफ इस देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने की बात हो रही है, दूसरी तरफ एक वक्त के अखंड भारत कहे जाने वाले नक्शे को फिर जिंदा करने की बात होती है, देश के हर चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिश होती है जो कि बढ़ते-बढ़ते साम्प्रदायिकता-आधारित ध्रुवीकरण में तब्दील हो जाती है। नतीजा यह है कि धर्म इस देश की कानून व्यवस्था को भी कुचलने जितना ताकतवर हो गया है, और हिन्दुस्तान के अंतरराष्ट्रीय संबंधों को भी नुकसान पहुंचाने लायक। इन सबके बीच यह भी है कि देश में कुछ ताकतें धर्म को चुनाव जीतने का एक सबसे बड़ा हथियार मान रही हैं, और इसका इस्तेमाल बढ़ते ही चल रहा है। कहने के लिए एक फर्जी लाईन गढ़ी और कही जाती है कि हर धर्म शांति सिखाता है, और आज धर्मों की जो शक्ल जमीन पर दिखती है, वह इसके ठीक खिलाफ है। 

केरल के ईसाईयों के बीच एक छोटे समुदाय पर जैसा हिंसक हमला हुआ है, वह एक अकेले हमलावर की ताकत भी बताता है कि किस तरह छोटी सी जगह पर जुटने वाले बहुत से धर्मालुओं पर कैसे आसानी से हमला किया जा सकता है। अगर यह केरल में हो रहा है, तो दूसरे प्रदेशों में भी हो सकता है, और अगर ईसाईयों पर हो रहा है तो दूसरे धर्मों के लोगों पर भी हो सकता है। फिर एक और बात यह भी है कि दुनिया के दूसरे देशों में अगर किसी धर्म पर हमला होता है, तो उसकी एक प्रतिक्रिया भी बाकी देशों में होती है, और केरल में यह जांच चल रही है कि शनिवार को इजराइल-गाजा संघर्ष पर चर्च में हुई सभा के अगले ही दिन हुए इस हमले से क्या ऐसे लोगों का लेना-देना हो सकता है जो कि इजराइल या फिलीस्तीन को लेकर विचलित हैं। ऐसी नौबतें और भी आ सकती हैं, और हिन्दुस्तान के कई लोग इस बात को लेकर भी विचलित हो सकते हैं कि दो दिन पहले संयुक्त राष्ट्र महासभा में जब गाजा पर हमले रोकने या युद्धविराम करने की बात आई, तो हिन्दुस्तान ने उस पर मतदान करने से मना कर दिया, और वहां से चले गया। इसके बाद फिलीस्तीनी संगठन हमास की निंदा का संशोधन जब जोड़ा गया, तो हिन्दुस्तान ने सिर्फ उस संशोधन पर समर्थन का वोट दिया। दुनिया भर के मुस्लिम फिलीस्तीन के मुद्दे से जुड़े हुए हैं, और हिन्दुस्तान गांधी और नेहरू के वक्त से लेकर अटल बिहारी बाजपेयी के विदेश मंत्री रहने तक भारत की फिलीस्तीन नीति को साफ-साफ कहते आए हैं कि फिलीस्तीन को एक मुल्क रहने का हक है। अब हिन्दुस्तानी प्रधानमंत्री ने देश की घोषित विदेश नीति से परे जाकर जिस तरह इजराइल के साथ एकजुटता दिखाई है, उसने हिन्दुस्तान के विपक्ष को, मीडिया के लोगों को, और इस देश के मुस्लिमों को हक्का-बक्का कर दिया है। केरल की इस ताजा वारदात के पीछे कोई साम्प्रदायिकता हो न हो, यह बात तो साफ है कि देश में किसी धर्म के लोगों का अधिक विचलित होना यहां की आंतरिक शांति और सुरक्षा के लिए खतरा हो सकता है, जैसा कि कल केरल में सामने आया है। इसलिए भारत की सरकार और बाकी तमाम ताकतों को भी दुनिया में हो रहे धार्मिक टकराव, या ऐसे टकराव जिनसे धार्मिक टकराव उपज रहा हो, उन सबको बारीकी से देखना होगा, और भारत की प्रतिक्रिया उन पर ऐसी रखनी होगी कि इस देश में नफरत और तनाव न फैले। यहां पर आकर देश और प्रदेश की सरकारों की धर्मनिरपेक्षता, या साम्प्रदायिकता, इनसे एक बड़ा फर्क पड़ेगा। केरल से हमने बात शुरू की है, लेकिन केरल पर बात खत्म नहीं हो रही है, इससे एक सबक शुरू हो रहा है, और उस सबक का एक तर्कपूर्ण नतीजे तक जाना जरूरी है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 अक्टूबर 2023


 

दीवारों पर लिक्खा है, 28 अक्टूबर 2023


 

इजराइली हमले थामने के प्रस्ताव पर भारत का अलग रहना हैरान करने वाला है

   28 अक्टूबर 2023  

  

संयुक्त राष्ट्र महासभा में इजराइल और गाजा के हमास नाम के संगठन के बीच गाजा की जमीन पर चल रही जंग को रोकने के लिए जॉर्डन ने एक प्रस्ताव रखा था, इस पर 120 देशों ने इसका समर्थन किया, 14 इसके खिलाफ थे, और 45 देशों ने मतदान नहीं किया। मतदान न करने वाले देशों में भारत भी एक था। भारत के अलावा पश्चिम के देश, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जर्मनी, जापान, यूक्रेन, और ब्रिटेन भी मतदान से गैरहाजिर रहे। लेकिन समर्थन करने वाले देशों में बांग्लादेश, मालदीव, पाकिस्तान, रूस, और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश थे। जंग को रोकने के इस प्रस्ताव में बाद में संशोधन भी सुझाया गया जिसमें यह कहा गया कि महासभा 7 अक्टूबर को इजराइल में हुए हमास के आतंकी हमलों और बंधक बनाने को साफ-साफ खारिज करती है, और उसकी निंदा करती है। बंधकों के साथ मानवीय व्यवहार हो, और उनकी तत्काल बिना शर्त रिहाई सुनिश्चित की जाए। इस संशोधन पर 87 लोगों ने मतदान किए, जिनमें भारत भी शामिल था, 55 देशों ने इसके खिलाफ वोट डाला, और 23 देश गैरहाजिर रहे। 

इस पूरे मामले को समझने की जरूरत है कि आज फिलीस्तीन के गाजा पर जिस अंदाज में इजराइली बमबारी चल रही है, और हमास के आतंकियों को मारने के नाम पर नागरिक इलाकों पर बमों और मिसाइलों से हमले किए जा रहे हैं, और तीन हजार से अधिक तो बच्चे ही मारे गए हैं, जिन्हें खुद इजराइल भी हमास के आतंकी नहीं कह सकता। आज इसे दुनिया का सबसे अमानवीय हमला करार दिया जा रहा है, और इजराइल के भीतर और बाकी दुनिया में जगह-जगह बसे हुए यहूदी और इजराइली भी तुरंत रोकने की मांग कर रहे हैं। लेकिन इजराइल का साथ देने वाले कुछ पश्चिमी देशों के साथ-साथ भारत भी खड़ा हो गया, और उसने जंग रोकने के मूल प्रस्ताव पर वोट नहीं डाला। सदस्य देशों के दो तिहाई से कम लोगों ने ही हमास का नाम जोडऩे के संशोधन का साथ दिया, इसलिए यह संशोधन मंजूर नहीं हुआ, लेकिन भारत इस संशोधन के साथ खड़े रहा। फिलीस्तीन पर गांधी और नेहरू के वक्त से लेकर मोरारजी सरकार के विदेश मंत्री अटल बिहारी बाजपेयी तक का जो साफ-साफ रूख था, आज भारत की मोदी सरकार उसके ठीक खिलाफ है। आज इजराइल के साथ भारत के कारोबारी रिश्ते इतने बड़े और इतने मजबूत हैं कि गरीब फिलीस्तीन बेइंसाफी झेल रहा है, लेकिन उसके जायज और ऐतिहासिक हक के लिए भारत मुंह खोलने को भी तैयार नहीं है। हालत यह है कि आज भारत के भीतर अगर कोई पार्टी या कोई पत्रकार फिलीस्तीन पर हो रहे जुल्म और मारे जा रहे हजारों लोगों को बचाने के लिए, और वहां फंसे हुए लाखों लोगों तक मानवीय राहत पहुंचाने के लिए बात करें, तो भी इस देश का एक तबका उसे देश का विरोध करार देने लगता है। लोकतंत्र में सरकार की नीति से असहमति का हक शामिल रहता है, और भारत सरकार की बहुत सी नीतियों से अलग-अलग समय पर देश के कई तबके असहमत रहे हैं, और उसे कभी देश के साथ गद्दारी नहीं माना गया था। 

आज फिलीस्तीन में जितने लोग मारे जा रहे हैं, और एक मुल्क का हक छीना जा रहा है, वह पूरा का पूरा एक मुस्लिम समाज है। आज हिन्दुस्तान के एक तबके को यह सुहा सकता है कि मुस्लिम दुनिया में कहीं भी मारे जाएं। लेकिन सवाल यह उठता है कि आज अगर किसी एक कमजोर मुल्क पर फौजी हमला करके दुनिया की एक बड़ी फौजी ताकत बेइंसाफी कर सकती है, तो फिर कल दुनिया के कुछ दूसरे देश भी अड़ोस-पड़ोस के देशों पर यही कर सकते हैं। इस बार इजराइल और फिलीस्तीन के बीच जंग का मामला फिलीस्तीन के एक हिस्से पर काबिज हमास नाम के एक संगठन के इजराइल पर किए हमले से शुरू हुआ है, लेकिन दुनिया में जंग के लिए जो नियम बने हुए हैं उनमें से हर नियम को कुचलते हुए इजराइल जिस तरह से गाजा पर अनुपातहीन हवाई हमले कर रहा है, नागरिक इलाकों पर बम बरसा रहा है, वह अभूतपूर्व है। इसे किसी आतंकी संगठन पर हमले से होने वाला कोलैटरल डैमेज कहने से काम नहीं चल सकता। कुछ हजार हमास-आतंकियों को मारने के लिए अगर दसियों हजार फिलीस्तीनी नागरिकों को मारने का काम किया जा रहा है, और 20-25 लाख नागरिकों को गाजा खाली करने पर मजबूर किया जा रहा है, तो यह जवाबी फौजी कार्रवाई नहीं है, और यह एक किस्म की गुंडागर्दी है, जिसके पीछे अमरीका की शह भी है। 

हिन्दुस्तान को आज अपने लंबे इतिहास को ध्यान में रखते हुए, और दुनिया में इंसाफ की वकालत करते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ में एक अधिक सक्रिय भूमिका निभानी थी, उससे भारत चूक गया, या सोच-समझकर दूर रहा। इन दिनों लगातार विदेश नीति के मोर्चे पर भारत को सदमे झेलने पड़ रहे हैं। मालदीव जैसे रणनीतिक महत्व के छोटे से देश ने नई सरकार बनते ही यह कह दिया है कि भारत वहां से अपने हर सैनिक को हटा दे। दूसरी तरफ श्रीलंका के साथ भारत की कुछ तनातनी चल रही है। और इन दोनों ही देशों के पीछे आज चीन की बड़ी मदद है, जाहिर है कि चीन एक किस्म से भारत की रणनीतिक घेरेबंदी कर रहा है। कुछ ऐसा ही भूटान के साथ हो रहा है, और अभी-अभी चीन और भूटान के बरसों से रूके हुए कुछ मामले अभी सुलझे हैं, और यह भी भारत के लिए एक फिक्र की बात हो सकती है। यह याद दिलाने की जरूरत नहीं है कि चीनी सरहद पर भारत किस तरह उस देश का अवैध कब्जा झेल रहा है, और एक बड़ा फौजी तनाव वहां पर लंबे समय से बना हुआ है। एक अलग ही मोर्चे पर मध्य-पूर्व के कतर में अभी-अभी भारत के 8 भूतपूर्व नौसेना-अफसरों को इजराइल के लिए जासूसी करने के लिए मौत की सजा सुनाई गई है। भारत में बहुत से लोगों ने यह याद दिलाया है कि वे भारत सरकार को इस बारे में कुछ अरसे से कहते आ रहे थे, लेकिन पता नहीं क्यों भारत सरकार कतर सरकार से बात करके इस नौबत को आने से रोक नहीं पाई। यह बात भी बड़ी अजीब है कि भारत के ये भूतपूर्व नौसेना अफसर कतर में इजराइल के लिए जासूसी कर रहे थे, ऐसी नौबत भारत की विदेश नीति की एक चूक या गलती ही साबित करती है। 

भारत में विदेश नीति की अपनी कामयाबी को साबित करने के लिए इस देश में पिछले दिनों बहुत बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय जलसे किए जिन पर हजारों करोड़ खर्च किया गया। लेकिन ऊपर जिन देशों के साथ खराब रिश्तों की बात हमने गिनाई है, उनसे बेहतर संबंध तो बिना किसी लागत के हो सकते थे, लेकिन वे बिगड़ते चल रहे हैं। आखिर में विदेश नीति की एक बड़ी नाकामयाबी को गिनाना जरूरी है कि किस तरह आजाद हिन्दुस्तान के इतिहास में पहली बार कनाडा के साथ भारत के रिश्ते इस हद तक खराब हो गए हैं कि दिल्ली से कनाडा के कूटनीतिक अफसरों की थोक में रवानगी करवा दी गई है। यह याद रखना चाहिए कि कनाडा में लाखों भारतवंशी कामयाब कारोबारी या कामगार हैं, वहां से वे अपनी ढेरों कमाई हिन्दुस्तान भेजते हैं, कनाडा भारत के छात्र-छात्राओं के लिए एक लोकप्रिय जगह है, और वहां पर हिन्दुस्तानियों को काम करने की छूट बड़ी उदारता से मिलती है। खालिस्तान के मुद्दे पर कनाडा सरकार के रूख को लेकर भारत से उसके संबंध अंधाधुंध बिगड़ गए हैं, और पश्चिम के अमरीका और ब्रिटेन सरीखे कुछ बड़े देश इस मुद्दे पर भारत के साथ नहीं दिख रहे हैं कि कनाडाई जमीन पर एक खालिस्तान-समर्थक नेता के कत्ल में भारत का नाम लिया जा रहा है। उन्होंने भारत को सलाह दी है कि वह जांच में कनाडा का सहयोग करे। ये तमाम बातें विदेश नीति के मोर्चे पर चकाचौंध जलसों से परे नाकामयाबी और जटिलता बता रही हैं, और इस बारे में मोदी सरकार को संसद या बाकी दलों को भी भरोसे में लेकर काम करना चाहिए क्योंकि देश की विदेश नीति किसी सरकार के कार्यकाल के बाद भी जारी रहती है, और उसमें बहुत तेज रफ्तार से महज सत्ता की मर्जी से फेरबदल नहीं होना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 अक्टूबर 2023


 

नारायण मूर्ति की आलोचना से परे भी सोचने की जरूरत

   27 अक्टूबर 2023  

  

देश के आईटी सेक्टर के एक बड़े कारोबारी नारायण मूर्ति ने अभी एक दूसरे कारोबारी मोहन दास पई से एक लंबे इंटरव्यू में इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि हिन्दुस्तान के नौजवान कामगार काम कम करते हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें हर हफ्ते 70 घंटे काम करना चाहिए। इसका मतलब हर दिन औसत 10 घंटे काम करना होता है। इस बात को लेकर सोशल मीडिया पर उनकी आलोचना भी शुरू हो गई है। कुछ लोगों का कहना है कि ऐसा करना शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह भी होगा, और भारत जैसे देश में जहां पर कि कामगारों को न तो ठीक तनख्वाह मिलती है, न मेहनताना, और न ही काम की जगहों पर कानूनी सहूलियतें मिलतीं। लोगों का यह भी कहना है कि नारायण मूर्ति के तर्क कारोबारियों की भलाई के हैं, और कामगारों का शोषण करने वाले हैं। कुछ और लोगों ने यह मुद्दा भी उठाया है कि हफ्ते में 70 घंटे काम की उम्मीद का मतलब महिलाओं को काम से हटा देना ही है क्योंकि आमतौर पर महिलाएं परिवार का काम करने के बाद नौकरी या रोजगार की जगह पर इतने घंटे काम नहीं कर सकतीं। नारायण मूर्ति का पूरा इंटरव्यू हमने अभी नहीं देखा है, और उन्होंने इसे देश के विकास के साथ जोडक़र कहा है कि नौजवानों को अपने देश के लिए हफ्ते में 70 घंटे काम करना चाहिए, और उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के जर्मनी और जापान की मिसालें दी हैं कि किस तरह कुछ बरस तक ये लोग हर दिन कुछ घंटे ज्यादा काम करते रहे। उन्होंने कहा कि जब तक लोग अतिरिक्त कोशिश नहीं करेंगे, तब तक सरकार अकेले कुछ नहीं कर सकती, क्योंकि कोई सरकार उतनी ही अच्छी हो सकती है जितनी कि जनता की कार्य-संस्कृति होती है। 

हो सकता है कि नारायण मूर्ति के पूरे इंटरव्यू से कुछ और बातें भी निकलकर आएं, लेकिन हम इसे उनकी कही बातों से परे भी देश की संस्कृति से जोडक़र आज कुछ चर्चा करना चाहते हैं। नारायण मूर्ति की यह बात अगर 70 घंटों को छोड़ दिया जाए, तो यह इस तरह से एक सही सलाह है कि आज हिन्दुस्तान के स्कूल-कॉलेज राजनीतिक नीयत से बढ़ती चली जा रही छुट्टियों के हमले के शिकार हैं। पढ़ाई के दिन साल में घटते चले जा रहे हैं, हर दिन पढ़ाई के घंटे घटते चले जा रहे हैं, और कुल मिलाकर पढ़ाई का माहौल भी खत्म होते चल रहा है, क्योंकि अब बच्चे अलग-अलग तरह के दाखिला-इम्तिहानों को पढ़ाई से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। उनकी दिलचस्पी ज्ञान प्राप्त करने में नहीं रहती है, दाखिला पाने में रहती है। इसलिए कम ज्ञान, और मुकाबले की अधिक तैयारी इन्होंने मिलाकर बच्चों के कुछ सीखने का माहौल खत्म कर दिया है। फिर दूसरी बात यह भी है कि स्कूल और कॉलेज से परे जो वक्त बच्चों के पास रहता है, उस वक्त का मनोरंजन, कुछ सीखने, या आत्मविकास करने जैसे किसी काम के लिए बेहतर इस्तेमाल की सोच हिन्दुस्तान में बहुत कम है। बच्चे हों या बड़े, टीवी के सामने बैठ जाते हैं, या मोबाइल फोन पर उलझे रहते हैं, और बाकी दुनिया की जानकारी तो दूर रही, अपने ही देश के असल सामाजिक सरोकारों को वे छू भी नहीं पाते। कॉलेज से निकलकर लोग बेरोजगार की तरह बरसों गुजार देते हैं, लेकिन अपने आपको अधिक हुनरमंद बनाने, या मौजूदा हुनर को बेहतर करने की सोच बहुत ही कम लोगों में रहती है, और खासकर उत्तर भारत तो ऐसी सोच से अछूता सा लगता है। एक तरफ उत्तर भारत, दूसरी तरफ हिन्दीभाषी बाकी राज्य भी किसी जिम्मेदार सोच से एकदम आजाद लगते हैं। यही वजह रहती है कि दक्षिण के राज्यों के लोग दुनिया के तमाम देशों में छोटे कामगारों से लेकर सबसे बड़ी कंपनी चलाने तक पहुंचे रहते हैं, और उनके मुकाबले अधिक आबादी वाले उत्तर भारत की कोई जगह नहीं रहती। 

हम पल भर के लिए नारायण मूर्ति की बात से असहमत होने को भी तैयार हैं कि इतना ज्यादा काम करके हिन्दुस्तानी कामगारों को कुछ हासिल नहीं होता है। लेकिन दूसरी तरफ यह देखा जाए कि हिन्दुस्तानी कामगार, खासकर नौजवान किस अंदाज में उन सरकारी नौकरियों के लिए मुकाबला करते हैं जिनमें नौकरी की गारंटी रहती है, और कामचोरी की भी, जिनमें रिश्वत की गुंजाइश रहती है, और जिन्हें पूरी जिंदगी तनख्वाह और पेंशन का जुगाड़ माना जाता है। इसके मुकाबले जब निजी नौकरियों की बात करें, तो बहुत से लोग कम तनख्वाह की, कम गारंटी वाली निजी नौकरी करने के बजाय ठलहा बैठना बेहतर समझते हैं। मतलब यह है कि अगर भरपूर तनख्वाह नहीं मिलती है, तो लोग खाली बैठ जाएंगे, लेकिन न कम तनख्वाह का काम करेंगे, और न ही अधिक घंटे काम करेंगे। मालिकों और कंपनियों की तरफ से कर्मचारी का शोषण एक हकीकत है, और यह भी सही है कि मजदूरों के हक बचाने के लिए जो कानून है वे हिन्दुस्तान में बेअसर हैं। लेकिन क्या इन कानूनों पर अमल के बेहतर हो जाने पर लोगों को अधिक मेहनत नहीं करनी चाहिए? और यह मेहनत न सिर्फ सरकारी और निजी नौकरियों की बात है, बल्कि बेरोजगारी के दिनों, उसके भी पहले कॉलेज के पढ़ाई के दिनों की बात है, जब कोई मालिक नहीं रहते, और लोग अपनी मर्जी के मालिक रहते हैं, तब भी हिन्दुस्तान के अधिकतर राज्यों में लोग मेहनत नहीं करते। 

नारायण मूर्ति की बात से देश में कार्य-संस्कृति को जोडक़र देखने की जरूरत है, उनके गिनाए घंटों को लेकर लाठी लेकर उन पर टूट पडऩे से कुछ हासिल नहीं होना है। अधिक और बेहतर काम करना न सिर्फ मालिक, सरकार, या देश के लिए अच्छी बात होगी, बल्कि लोगों को अपने-अपने स्वरोजगार में, अपने व्यक्तित्व विकास में, अपना ज्ञान और समझ बढ़ाने में अपने वक्त का बेहतर इस्तेमाल करना चाहिए, जो कि आज हिन्दुस्तान की संस्कृति नहीं है। यह बात जाहिर है कि दक्षिण के राज्यों में यह संस्कृति है, और वहां के लोग भारत के दाखिला-इम्तिहानों में भी अधिक कामयाब होते हैं, और पूरी दुनिया के खुले बाजार में जाकर वहां भी बेहतर प्रदर्शन करते हैं। उत्तर और दक्षिण का फर्क देखना हो, तो इन आंकड़ों को देखने की जरूरत है जिनमें कर्नाटक में प्रति व्यक्ति आय 2.36 लाख सालाना है, तमिलनाडु में 2.12, केरल में 2.05, आन्ध्र में 1.76, और छत्तीसगढ़-एमपी में 1.04, झारखंड में 0.71, यूपी में 0.61, और बिहार में 0.43 लाख प्रति वर्ष है। इसलिए अगर नारायण मूर्ति ने कुछ कहा है, तो वे देश के कमजोर मजदूर कानूनों के लिए या उन पर कमजोर अमल के लिए जिम्मेदार नहीं है, उसके लिए सरकारें, और उन्हें चुनने वाली जनता भी जिम्मेदार हैं। उनकी बात से यह समझने की जरूरत है कि जिस किसी के लिए यह मुमकिन हो, वे अपनी जवानी के बरसों में अगर अधिक काम करके उसका अधिक भुगतान पा सकते हैं, तो उन्हें उसकी कोशिश करनी चाहिए। नारायण मूर्ति उत्तर भारत में कोई कारखाना नहीं चलाते, बल्कि वे दक्षिण भारत में एक आईटी कंपनी चलाते रहे हैं, और वे मजूदरों के हक अपने कारोबार के हिसाब से ही मानकर यह बात कह रहे हैं। अगर लोगों को लगता है कि बिना काम किए सरकारी नौकरी का इंतजार उनके लिए बेहतर है, तो वे जरूर खाली बैठ सकते हैं, सरकार के पास उन्हें किसी हल में जोतने का कोई कानून तो है नहीं। जिन लोगों को लगता है कि वे अपने नौजवानी के अधिक ताकत के बरस अधिक काम कर सकते हैं, तो वे किसी नौकरी में अधिक कर लें, स्वरोजगार में अधिक कर लें, या कि अपने व्यक्तित्व विकास पर अधिक मेहनत कर लें। वरना ठलहा बैठकर वक्त बर्बाद करना हिन्दुस्तान की मौजूदा संस्कृति तो है ही, और लोकतंत्र में उस पर कोई रोक भी नहीं है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अक्टूबर 2023


 

अमरीका में थोक में कत्ल, बाकी दुनिया के लिए एक अलग किस्म की नसीहत

  26 अक्टूबर 2023  

   

अमरीका में आज फिर एक बंदूकबाज ने सार्वजनिक जगह पर गोलीबारी करके 22 लोगों को मार डाला है, और 60 से अधिक लोग घायल हो गए हैं। अभी जब यह लिखा जा रहा है तब तक तस्वीरों में कैद यह हमलावर पकड़ में नहीं आया है, और इस शहर में लोगों को घरों में रहने कहा गया है। हर कुछ दिनों में अमरीका में इसी तरह बंदूक की हिंसा होती है, लेकिन उस पैमाने पर भी एक हमलावर के हाथों इतनी मौतें कुछ बड़ा आंकड़ा है। कुल 38 हजार आबादी का ल्यूइस्टन नाम का शहर वहां के मेन नाम के राज्य में है, और संदिग्ध हमलावर की तस्वीरों से वह एक गोरा दिखाई पड़ रहा है। लेकिन इससे अधिक जानकारी अभी सामने नहीं आई है। हमलावर ने 10 मिनट की दूरी की तीन जगहों, एक रेस्त्रां, और एक मनोरंजक खेल स्थल, और एक वॉलमार्ट इन तीन जगहों पर हमला किया है। हमलावर को सेना से जुड़ा हुआ हथियार-प्रशिक्षक बताया जा रहा है, जो कि कुछ अरसा पहले एक मानसिक चिकित्सालय में भर्ती था। पिछली बड़ी घटना मई 2022 में हुई थी जिसमें एक बंदूकधारी ने एक स्कूल में घुसकर गोलियां चलाई थीं, जिनमें 19 बच्चों, और 2 शिक्षकों की मौत हो गई थीं। 2022 और 2023 में हर बरस साढ़े 6 सौ या अधिक ऐसे हमले हुए हैं। 

आज का यह हमला नस्लवादी है या नहीं यह अभी साफ नहीं है, लेकिन अमरीका में ऐसे कई हमले नस्लवादी होते हैं, आमतौर पर काले लोगों, या अल्पसंख्यकों के खिलाफ होते हैं, या किसी भड़ास से भरे हुए लोग अपनी ही पिछली स्कूल या कॉलेज पर हमला करते हैं। हमलों के पीछे की कई किस्म की वजहें हैं, लेकिन लगातार ऐसे हमले होते हैं जिसे लेकर अमरीका के आज के राष्ट्रपति जो बाइडन फिक्रमंद रहते हैं, लेकिन वहां विपक्ष की रिपब्लिकन पार्टी नागरिकों के निजी हथियारों में किसी भी तरह की कमी के खिलाफ रहती है। दरअसल अमरीका में हथियार कारोबारियों का दबाव-समूह इतना मजबूत है कि वह किसी भी सरकार को हथियारों पर रोकथाम, या कटौती करने ही नहीं देता। सच तो यह है कि जहां-जहां रिपब्लिकन पार्टी के कार्यक्रम होते हैं, वहां सम्मेलन स्थल के आसपास हथियारों की प्रदर्शनी और बिक्री रखी जाती है क्योंकि पार्टी के कार्यक्रमों में दूर-दूर से आने वाले लोग आमतौर पर हथियारों के शौकीन रहते हैं। बाकी दुनिया के लिए इस नौबत की कल्पना करना मुश्किल है कि अमरीका में एक-एक नागरिक फौजी दर्जे के दर्जनों हथियार घर पर रख सकते हैं, और वहां की फिल्मों से लेकर उपन्यासों तक में बंदूक की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाता है, और एक सबसे असरदार पुलिस के बावजूद अमरीकी नागरिक अपने को हमेशा खतरे में मानकर चलते हैं, और घरों में हथियार रखने को ही हिफाजत का अकेला तरीका मानते हैं। कुछ अमरीकियों का यह भी मानना रहता है कि हर नागरिक के पास हथियार रहने से देश में कभी भी कोई फौजी बगावत नहीं हो सकती क्योंकि फौजी बंदूकों से कई गुना अधिक नागरिक बंदूकें रहेंगी, और फौज ऐसा दुस्साहस नहीं कर सकेगी। 

अमरीका में बंदूक खरीदने वालों और रखने वालों की दिमागी हालत को जांचने का भी कोई चलन नहीं है, नतीजा यह होता है कि मानसिक रूप से कमजोर या बीमार लोग भी कई-कई हथियार रखते हैं, और किसी धर्म, जाति, रंग की नफरत के चलते, या किसी निजी भड़ास को निकालने के लिए लोगों को थोक में मारने से नहीं हिचकते। एक सर्वे बताता है कि अमरीका की आबादी 33 करोड़ है, और वहां 40 करोड़ पिस्तौल-बंदूक हैं। अमरीका में 60 हजार से अधिक पिस्तौल-बंदूक दुकानदार हैं, और वहां हर बरस दसियों हजार करोड़ रूपए के हथियार बिकते हैं। ऐसे ही कारोबार को बढ़ावा देने वाली गन-लॉबी राजनीतिक प्रभाव खरीदती है, और इसलिए डेमोक्रेटिक पार्टी की तमाम कोशिशों के बावजूद संसद से कभी हथियारों में कमी की बात मंजूर नहीं हो पाती। यह नौबत अकेले अमरीका के साथ है, क्योंकि दुनिया में शायद ही किसी और देश में आबादी से इतनी अधिक बंदूकें हों। 2017 के एक सर्वे के मुताबिक यह देखा गया कि प्रति सौ व्यक्तियों पर कितनी बंदूकें हैं, तो उनमें अमरीका में 120 से अधिक बंदूकें निकलीं। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में सौ लोगों पर 5.3 बंदूकों का औसत है। दुनिया में 110 देश ऐसे भी हैं जहां हिन्दुस्तान से भी कम अनुपात में बंदूकें हैं। पांच देश तो ऐसे हैं जहां नागरिकों के पास कोई बंदूक नहीं हैं, जिनमें इंडोनेशिया भी है। एक अनुमान यह भी है कि पूरी दुनिया में निजी हथियारों में से अधिकतर का इस्तेमाल खुद को या जीवनसाथी को मारने में होता है। ऐसे में दुनिया भर में बढ़ते चल रहे पारिवारिक तनाव देखें तो बंदूकों की मौजूदगी खतरे को कई गुना बढ़ाने वाली हो सकती है, शायद होती होगी। 

दुनिया की जिन देशों में अमरीका की तरह बंदूकें नहीं हैं, उन्हें अपने नागरिकों के बीच खतरे भी उतने अधिक नहीं हैं। लेकिन कुछ दूसरे किस्म के खतरे जरूर हैं जो कि भारत जैसे देश में भी लगातार सामने आते हैं। यहां पर शराब या किसी दूसरे नशे में लोग अपने परिवार के सबसे करीबी लोगों को मार डालते हैं, कई मामलों में गरीबी, कर्ज में डूबकर भी ऐसी नौबत आती है कि लोग पूरे के पूरे परिवार को हत्या और आत्महत्या से खत्म कर देते हैं। अमरीका के मामले के लेकर यहां सीधे-सीधे कुछ सीखने की जरूरत नहीं है, लेकिन निजी हिंसा का मामला जरूर सीखने लायक है कि किस तरह की मानसिक तनाव से गुजर रहे, धर्म, जाति, या रंग की नफरत से भरे हुए लोग किस तरह की हिंसा कर सकते हैं। अभी चार दिन पहले ही हमने इसी जगह लिखा था कि किस तरह महाराष्ट्र के विदर्भ में एक बहू ने ससुराल के लोगों के तानों से थककर धीमे असर करने वाले एक जहर का जुगाड़ किया, और पति सहित पांच-छह लोगों को मार डाला। शराब के लिए पैसे न देने वाले मां-बाप को मारने की खबर हमें आसपास से ही तकरीबन रोजाना सुनने मिलती है। हर समाज को यह सोचना चाहिए कि निजी हिंसा की वजहों को किस तरह घटाया जा सकता है, जिससे कि हत्या या आत्महत्या सबमें कमी आए। जो बात हिन्दुस्तान के काम की हो सकती है वह यह है कि समाज के भीतर किसी भी तरह की नफरत को, किसी धर्म या जाति से दहशत को बढ़ावा नहीं देना चाहिए, क्योंकि आज नहीं तो कल एक सामूहिक या सार्वजनिक हिंसा में भी तब्दील हो सकती है। और यह भी जरूरी नहीं है कि तनाव या नफरत से भरे हुए लोग कानूनी हथियारों से ही हिंसा करें, हिन्दुस्तान में धड़ल्ले से गैरकानूनी हथियार भी मौजूद हैं, और जब परिवार के भीतर ही कोई जहर से थोक में हत्याएं करने पर उतारू हो जाए, तो उसका क्या अंत हो सकता है? जहर से तो किसी भी सार्वजनिक या बड़े कार्यक्रम में भी एक साथ बड़ी संख्या में लोगों को मारा जा सकता है। कोई बुलेटप्रूफ जैकेट, या कितनी भी संख्या में पुलिस ऐसी निजी हिंसा को नहीं रोक सकती जिसमें लोग आत्मघाती अंदाज में कई लोगों को मारने पर उतारू हो जाते हैं, इससे बचाव का अकेला तरीका उन शांत देशों को देखकर कुछ सीखना है कि जनता को किस तरह खुशमिजाज रखा जाए, किस तरह सार्वजनिक तनाव खत्म किया जाए, और किस तरह परिवार के भीतर के तनाव घटाए जाएं। भारत जैसे चुनावी लोकतंत्र में ऐसी अमूर्त सलाह सत्ता और समाज का ध्यान नहीं खींच सकती, लेकिन समाज के जागरूक तबकों को इस पर चर्चा जरूर करनी चाहिए, और समाज की सोच को सकारात्मक बनाने का काम करना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

 

असाधारण वक्ता महुआ अब असाधारण खतरे में..

  25 अक्टूबर 2023  

  

लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस की धुआंधार और धांसू बोलने वाली सांसद महुआ मोइत्रा इन दिनों एक अजीब सी मुसीबत में फंसी हुई हैं। उनके एक भूतपूर्व प्रेमी ने सीबीआई को यह शिकायत की है कि महुआ लोकसभा में अडानी के खिलाफ जितने सवाल करती थीं, उनके पीछे कारोबारी दुनिया में अडानी एक प्रतिद्वंद्वी, हीरानंदानी था। अब जब तक एक भूतपूर्व प्रेमी की यह बात कमजोर पड़ पाती, दुबई में बसे हुए इस हीरानंदानी ने खुद होकर वहां भारतीय कांउसलेट जाकर एक हलफनामा दिया कि अडानी के खिलाफ महुआ मोइत्रा को जानकारी देने का एक बड़ा काम उन्होंने भी किया, और वे महुआ की तरफ से लोकसभा में सीधे सवाल लगा सकें इसलिए महुआ ने संसद के अपने ईमेल बॉक्स को हीरानंदानी के हवाले कर दिया था, और वे भी कुछ सवाल बनाकर सीधे लोकसभा सचिवालय भेज देते थे। भाजपा के लिए इतने आरोप दशहरे पर महुआ का पुतला जलाने के लिए भी काफी थे, और उससे अधिक के लिए भी। पहली बार सांसद बनी यह तृणमूल नेता अडानी को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर भी असाधारण हमले कर रही थीं, और ऐसे में तमाम मोदीविरोधी, और अडानीविरोधी लोग महुआ के साथ हो गए थे। अब अगर यह सांसद इस दर्जे की लापरवाही या गलत काम की कुसूरवार साबित होती है, तो वह बहुत बड़ी बात होगी। भूतपूर्व प्रेमी और एक अलग वर्तमान कारोबारी, इन दोनों की शिकायत और हलफनामे में यह भी कहा गया है कि महुआ ने इस कारोबारी हीरानंदानी से अपने पर बहुत बड़े-बड़े खर्च करवाए थे। इसे संसद की एक कमेटी को दे दिया गया है जो यह जांच कर रही है कि क्या इसे सवाल पूछने के एवज में लिए गए अहसान, या ली गई रिश्वत की तरह देखा जाना चाहिए। ये दोनों ही बातें दो करीबी रह चुके लोगों के बागी तेवरों के साथ इस सांसद को बहुत कमजोर हालत में लाकर खड़ा कर रही है। 

अब तक महुआ मोइत्रा ने उन पर लगे हुए आरोपों को एक भूतपूर्व प्रेमी के जले दिल की आह करार दिया है, और कारोबारी हीरानंदानी को अपना दोस्त माना है। लेकिन इन दोनों ही लोगों ने लिखकर जो आरोप लगाए हैं उनके बारे में महुआ ने कुछ भी नहीं कहा है। उन्होंने जवाबी हमले में अडानी और दूसरे लोगों के खिलाफ लगे आरोपों की जांच पहले करने, और उसके बाद उन पर लगे आरोपों की जांच करने की बात कही है। चूंकि अपने खिलाफ लगे बहुत ठोस आरोपों पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया है, कोई तथ्य पेश नहीं किए हैं, उनसे पहली नजर में ऐसा लगता है कि वे बहुत खोखली जमीन पर खड़ी हुई हैं, और अपने बचाव में कहने को उनके पास कुछ नहीं है, इसलिए वे हमलावर हो रही हैं। बहुत वक्त पहले किसी समझदार ने कहा था कि कई मौकों पर हमला ही सबसे असरदार बचाव होता है, महुआ आज वही कर रही है। खबरों पर अगर भरोसा करें, तो उनकी तृणमूल कांग्रेस ने भी उनके इस विवाद में उनके साथ खड़े होने से इंकार कर दिया है। धीरे-धीरे अगर ये आरोप सच साबित होते हैं, तो विपक्ष के मोडानी-विरोधी और मीडिया का मोडानी-विरोधी तबका भी महुआ का साथ छोडऩे को मजबूर हो जाएंगे। अडानी के अच्छे और बुरे काम देश की जांच एजेंसियों और अदालतों के प्रति जवाबदेह हैं, लेकिन संसद सदस्य संसद के प्रति जवाबदेह है। ऐसे में महुआ का जवाबी हमला खोखला है, और दूसरों की जांच के बाद उनकी जांच शुरू करने की उनकी मांग नाजायज है। 

देश की संसद देश की सबसे बड़ी पंचायत है, और इसके नीति-सिद्धांतों के खिलाफ अगर कोई सांसद सोच-समझकर काम करते हैं, तो उसे एक बड़ा जुर्म मानना चाहिए। लोगों के याद होगा कि कई बरस पहले कुछ सांसद सवाल पूछने के एवज में रिश्वत लेते स्टिंग ऑपरेशन में पकड़ाए थे। उन सबकी संसद सदस्यता खत्म कर दी गई थी, लेकिन उनके खिलाफ देश की अदालत कुछ नहीं कर पाई थी क्योंकि संसद को अदालती दखल से बाहर रखा गया है। अब कई बरस बाद उस मामले का भूत सुप्रीम कोर्ट में खड़ा हुआ है और अदालत में अभी यह बहस चल ही रही है। इस बीच महुआ का यह मामला सामने आने के पहले ही केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में अपना जवाब रखा है कि संसद और विधानसभा के सदस्यों को अदालती कार्रवाई से जिन संसदीय मामलों में हिफाजत हासिल है, उनमें भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत होने वाली कार्रवाई शामिल नहीं है। अभी इसी महीने पहले हफ्ते में सात जजों की एक संविधानपीठ के सामने केन्द्र सरकार ने कहा कि संसद और विधानसभा का विशेषाधिकार सांसदों और विधायकों को सदन के बाहर रिश्वत लेने पर कोई हिफाजत नहीं देता। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम लगातार सांसदों के रिश्वत लेने के खिलाफ लिखते आए हैं, और यह वकालत करते रहे हैं कि उन्हें आपराधिक अदालती कार्रवाई से कोई छूट नहीं मिलनी चाहिए। 2005 में लोकसभा की एक विशेष कमेटी ने सवाल पूछने के लिए रिश्वत लेने वाले सांसदों की सदस्यता खत्म कर दी थी, लेकिन उन पर कोई आपराधिक मुकदमा नहीं चल पाया था। हम उस समय से लगातार इस बात की मांग करते आ रहे थे, और अब जाकर सुप्रीम कोर्ट में केन्द्र सरकार यह रूख सामने रख रही है। 

महुआ मोइत्रा ने अपने असाधारण प्रभावशाली संसदीय प्रदर्शन के बावजूद अपने आपको एक ऐसी मुसीबत में डाल लिया है कि उसकी पुख्ता जांच के सिवाय उन्हें कोई रियायत नहीं मिल सकती। हमारा ख्याल है कि हर सांसद और विधायक को इस बात के लिए तैयार भी रहना चाहिए, क्योंकि यह लोकतंत्र उनके सवालों के लिए पूरे देश को जवाबदेह बनाकर रखता है। ऐसे सवालिया लोगों को खुद भी जवाबदेह होना चाहिए, कम से कम ऐसे आचरण के लिए जिसमें संसदीय विशेषाधिकार को तोहफों और उपकार के एवज में बेच देने के आरोप हों। यहां पर महुआ मोइत्रा का योगदान, या उनके लगाए गए आरोप महत्वहीन हो जाते हैं, और उनकी यह मांग बेतुकी है कि पहले उनके लगाए आरोपों की जांच हो, और फिर उनके खिलाफ आरोपों की जांच हो। जांच इस तरह रेलगाड़ी की डिब्बों की तरह आगे-पीछे नहीं चलती।

ऐसा लगता है कि महुआ मोइत्रा से या तो एक चूक हुई है, या उन्होंने गलत काम किया है, और इन दोनों ही किस्म की बातों के लिए वे संसद की कड़ी जांच की हकदार हैं। इससे बाकी तमाम लोगों को एक बात सीखने मिलती है कि जब देश के सबसे ताकतवर लोगों पर कोई हमला करना हो, तो अपने खुद के कामकाज साफ-सुथरे रखने चाहिए। दूसरी नसीहत यह मिलती है कि आज के दोस्त जब कल दुश्मन बनते हैं, तो वे नए दुश्मनों के मुकाबले कई गुना अधिक खतरनाक रहते हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

हिन्दुस्तान में पुलिस मजबूरी है, कोई भरोसेमंद अमला नहीं

  23 अक्टूबर 2023  

  

गुजरात हाईकोर्ट ने वहां के कुछ मुस्लिम आरोपियों को पकडऩे के बाद उन्हें एक खंभे से बांधकर लाठियों से पीटने के वीडियो सामने आने पर चार पुलिसवालों को 14-14 दिन की कैद सुनाई है। पिछले बरस गरबा पर पत्थर चलाने के आरोप में पांच मुस्लिमों को गिरफ्तार किया गया था, और अभी से साल भर पहले उन्हें खंभे से बांधकर लाठियों से बुरी तरह पीटा गया था। यह करने वाले पुलिसवाले सर्विस रिवाल्वर भी टांगे हुए दिख रहे थे, हालांकि सारे के सारे बिना वर्दी के थे। इन सबने मिलकर इन मुस्लिमों को बारी-बारी से खंभे में बांधा और उनके बदन पर लाठियां बरसाईं। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि इन आरोपी पुलिसवालों ने इस अंदाज में संदिग्ध लोगों के मानव अधिकार खत्म किए, उनकी गरिमा खत्म की, मानो कि पुलिस को ऐसा करने का विशेषाधिकार हासिल है। अदालत ने कहा कि गिरफ्तार किए गए लोगों को भी जीने का अधिकार रहता है जिसमें गरिमा से जीने का अधिकार शामिल है, और इसे गिरफ्तारी के बाद भी छीना नहीं जा सकता। जजों ने अपने फैसले में कहा है कि मानवाधिकार सरकार द्वारा दिया गया विशेषाधिकार नहीं है, वे हर इंसान का बुनियादी हक है। फैसले में मदर टेरेसा की कही एक बात का जिक्र किया गया कि किसी के जीने का हक किसी दूसरे की मर्जी पर टिका नहीं होना चाहिए, यहां तक कि मां-बाप की मर्जी पर भी नहीं। अदालत ने कहा कि पुलिस को कानून-व्यवस्था का रक्षक बनाया गया है, और अपना काम करते हुए उन्हें लोगों की नागरिक स्वतंत्रता के रक्षक रहना चाहिए, न कि उसके भक्षक। एक जज ने फैसले के साथ यह जुबानी कहा कि उन्होंने कभी यह सोचा भी नहीं था कि एक ऐसा दिन आएगा जब उन्हें पुलिस को कैद सुनानी होगी। हालांकि इन पुलिसवालों की वकील ने अदालत में यह अपील की थी कि उन्हें सजा देने से उनके रिकॉर्ड में भी यह बात आएगी और 10-15 बरस विभाग में काम कर चुके इन लोगों पर विपरीत असर पड़ेगा। एक खबर के मुताबिक इन पुलिसवालों में से एक ने अदालत को कहा था कि इन याचिकाकर्ताओं के नितम्बो पर तीन से छह लाठियां मारने को हिरासत प्रताडऩा नहीं कहा जा सकता। इस हिंसा का जो वीडियो सामने आया था उसमें सार्वजनिक जगह पर इस तरह से पीटा जा रहा था, और आसपास के लोग इस पर खुशी जाहिर कर रहे थे। 

हिन्दुस्तान में पुलिस की हिंसा, उसके भ्रष्टाचार, और उसकी अक्षमता का अंत ही नहीं होता। हर दिन कहीं न कहीं से ऐसी खबरें आती हैं जिनमें इन तीनों में से कोई एक बात, या ये तमाम बातें लागू होती हैं। अभी उत्तरप्रदेश हाईकोर्ट ने निठारी हत्याकांड के निचली अदालत से सजा पाए हुए लोगों को यह कहते हुए बरी कर दिया कि सीबीआई ने बहुत ही खराब और कमजोर जांच की थी, और वह संदेह से परे कुछ भी साबित नहीं कर सकी। ऐसे कितने ही मामले आते हैं जिनमें पुलिस का भ्रष्टाचार सिर चढक़र बोलता है, और हम छत्तीसगढ़ राज्य में ही देखते हैं कि सत्ता चाहे जिसकी हो, पुलिस के कुछ लोग सबसे भ्रष्ट और दुष्ट भी बने रहते हैं, और वे सत्ता के पसंदीदा भी रहते हैं। समय-समय पर ऐसी भी चर्चा होती है कि बोलियां लगाकर कुर्सियां पाते हैं, और बेचने वाले लोगों के मुंह और आंखें सब बंद रहते हैं। यह भी देखने में आता है कि पुलिस सत्ता की राजनीति की चापलूस बने काम करती है, और सत्ता की राजनीतिक पसंद और नापसंद से अपनी कार्रवाई तय करती है। पूरे देश में यह देखने में आता है कि रिपोर्ट दर्ज करने से लेकर जांच को मजबूत या ढीला करने तक, तेज या धीमा करने तक, सुबूत या गवाह जुटाने या मिटाने तक पुलिस बहुत ही अश्लील तरीके से पक्षपात करती है, और सत्ता की मर्जी के खिलाफ सजा तकरीबन नामुमकिन रहती है। 

गुजरात हो, यूपी, या एमपी, जब सत्ता का नजरिया साम्प्रदायिक रहता है, तो पुलिस बढ़-चढक़र नेताओं से अधिक साम्प्रदायिक होकर काम करती है, और गुजरात में मुस्लिमों को इस तरह से पीटना उसी रूख का एक हिस्सा था। यह तो एक वीडियो रिकॉर्डिंग सामने आ गई, वरना कोई गुंजाइश थोड़ी थी कि जख्मी मुस्लिम लोगों को आसपास कोई गवाह मिल जाते, अदालत तक कोई सुबूत पहुंच पाते, और सजा हो पाती। आज भी हाईकोर्ट से इन पुलिसवालों को जो सजा हुई उस पर उनके वकील ने इसी कोर्ट से तीन महीने का स्थगन ले लिया है ताकि इस फैसले के खिलाफ अपील की जा सके। प्रदेश की जिस सरकार को अपने पुलिसवालों की ऐसी हिंसा के खिलाफ खुद होकर कार्रवाई करनी थी, वह इन्हें बचाने में लगी थी, और उसने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी के खिलाफ काम किया था। 

अभी जब हम यह लिख रहे हैं उसी वक्त तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद से आया हुआ एक वीडियो ट्विटर पर देखने मिल रहा है जिसमें पुलिस एक मुस्लिम नौजवान को लाठियों से अंधाधुंध पीट रही है, और वहां के मुस्लिम विधायक ने पुलिस के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। आज पूरे देश में जगह-जगह मुस्लिमों को सरकारी हिंसा का सामना करना पड़ रहा है। साम्प्रदायिक ताकतें सार्वजनिक मुनादी करके उनके कारोबारी बहिष्कार की मांग कर रही हैं। उन्हें कई इलाकों में मकान न खरीदते मिलते न किराये पर। जाहिर है कि निजी संस्थानों में उन्हें नौकरी मिलने में भी भेदभाव हो ही रहा होगा। आसपास कोई भी जुर्म होने पर मुस्लिमों को सबसे पहले शक के घेरे में लिया जाता है, वे ट्रेन में सफर कर रहे हैं तो पुलिस का बंदूकधारी उन्हें भून दे रहा है, उनके बच्चों को स्कूलों में पीटा और पिटवाया जा रहा है। जिस देश में मुस्लिम होना दूसरे या दसवें दर्जे का नागरिक होना हो गया है, वहां पर मुस्लिमों से पल-पल देश के लिए वफादारी साबित करने की भी उम्मीद की जाती है। 

जब किसी समाज को धर्म के नाम पर इस तरह अलग-थलग किया जाता है, इतनी हिंसा उस पर की जाती है, उसके घर-दुकानों पर बात-बात पर बुलडोजर चला दिए जाते हैं, तो फिर उस समाज की सोच एक जख्मी की सोच सरीखी हो जाना तय है। हिन्दुस्तान में मुस्लिम आबादी 20 करोड़ के करीब है, जो कि देश के 15 फीसदी से कुछ कम है। यह मुस्लिम समुदाय एक हकीकत है, और वक्त की घड़ी को सैकड़ों बरस पीछे ले जाकर देश से इस्लाम और मुस्लिमों को मिटाया नहीं जा सकता। आज देश में धार्मिक और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने के लिए जिन लोगों को मुस्लिमों पर हमला एक आसान रास्ता दिखता है, उन्हें यह भी समझना चाहिए कि अगर ऐसी हिंसा की प्रतिक्रिया होने लगेगी, तो क्या होगा? किसी भी व्यक्ति या समाज के बर्दाश्त की एक सीमा होती है, और उसके बाद उन्हें लग सकता है कि जब इस मुल्क में गद्दार ही कहलाना है, पुलिस के हाथों हर कहीं पिटना ही है, तो फिर सचमुच ही बुरा बन जाने में क्या हर्ज है? ऐसे दिन की कल्पना करना भी मुश्किल है जब देश के किसी भी एक धर्म या समुदाय के लोगों में से एक तबके का देश के कानून से, लोकतंत्र से, और मुल्क के लोगों की इंसानियत पर से भरोसा पूरी तरह उठ जाए, और वे कानून अपने हाथ में ले लें। आज हिन्दुस्तान में कहीं अल्पसंख्यकों को, कहीं दलितों और आदिवासियों को, कहीं मांसाहारियों को इसी तरह नफरती हिंसा का शिकार बनाया जा रहा है, और इससे मुल्क की हिफाजत गहरे खतरे में पड़ रही है। जिस दिन यह खतरा समझ में आएगा उस दिन तक इसे काबू में करने का वक्त निकल चुका होगा।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अक्टूबर 2023


दीवारों पर लिक्खा है, 22 अक्टूबर, 2023



 

हॉस्टल में शाकाहारी-टेबिल पर धर्म-जाति का विवाद!

22 अक्टूबर 2023

 मुम्बई के आईआईटी में खानपान को लेकर एक विवाद चल रहा है। वहां हॉस्टल में रहने वाले और मेस में खाने वाले छात्र-छात्राओं में से शाकाहारियों को यह शिकायत थी कि मांसाहारियों के साथ बैठकर खाने में उन्हें असुविधा होती है। उनकी मांग को देखते हुए आईआईटी ने मेस में कुछ टेबिलों को सिर्फ शाकाहारियों के लिए आरक्षित कर दिया था कि जिन्हें मांसाहार देखने से दिक्कत होती है, वे वहां बैठकर खा सकते हैं, और बाकी टेबिलों पर सभी लोग बैठ सकते हैं। इसे लेकर वहां एक विवाद चल रहा है। लोगों का कहना है कि यह जाति व्यवस्था, और धर्म व्यवस्था से जुड़ी हुई दकियानूसी सोच है। और अभी वहां एक छात्र पर शाकाहारी टेबिल पर मांसाहार खाने पर 10 हजार रूपए जुर्माना लगाया गया है जिसके बाद वहां के प्राध्यापकों से लेकर दूसरे लोगों तक सभी लोग इस विवाद में कूद पड़े हैं। और जब बात निकलती है तो कुछ दूर तक जाती है। यह बहस बढ़ते-बढ़ते मुम्बई जैसे महानगर में उन रिहायशी इमारतों तक चली गई है जिनमें से कुछ में मांसाहारियों को फ्लैट खरीदने नहीं मिलते, या उन्हें किरायेदार बनकर आने भी नहीं मिलता। उनके खानपान को लेकर शाकाहारियों को दिक्कत होती है, और इसलिए वे रिहायशी इमारतों को सिर्फ शाकाहारियों के लिए जैसी शर्तें रखते हैं। 

भारत में पिछले 10-15 बरस में कई प्रदेशों से होते हुए अब तकरीबन पूरे देश में खानपान को धर्म और जाति से जोड़ दिया गया है। उत्तर भारत के बहुत से ऐसे शहर हैं जहां पर जब कांवडिय़ा निकलते हैं, तो उतने दिन रास्ते की सभी मांसाहार की दुकानों को, रेस्त्रां को बंद करवा दिया जाता है। कई शहर ऐसे हैं जहां हिन्दू त्यौहारों पर जानवरों का काटना बंद रहता है, और मांस-मछली बेचना भी। धीरे-धीरे हिन्दू, सवर्ण शाकाहारियों, जैन समुदाय के लोगों के दबाव में प्रदेशों में ऐसे दिन बढ़ रहे हैं, और एक-एक करके कई त्यौहारों पर मांसाहार को बंद कर दिया गया है। जबकि भारत के शाकाहार-मांसाहार के नक्शे को देखें तो 30 फीसदी से कम हिन्दुस्तानी ही शाकाहारी हैं। जिस उत्तरप्रदेश को लेकर घटनाएं सबसे अधिक सामने आती हैं वहां पर आधे से कम, 47 फीसदी शाकाहारी हैं। छत्तीसगढ़ में 18 फीसदी, झारखंड में 3 फीसदी, ओडिशा में 2.6 फीसदी, और तेलंगाना में 1.3 फीसदी लोग ही शाकाहारी हैं। 

खानपान में मांसाहार से और बड़ा मुद्दा गाय-भंैस के मांस, बीफ का है। देश के बहुत से राज्यों में बीफ पर रोक लगी हुई है, लेकिन कई राज्य ऐसे हैं जहां इसकी पूरी कानूनी इजाजत है। ऐसे में जहां इसे गैरकानूनी करार दिया गया है, वहां पर गाय को मारना इंसान को मारने से बड़ा मुद्दा रहता है, और बीफ के शक में भी इंसानों को मार डालना कई जगह हुआ है। ऐसे में खानपान को लेकर अगर आईआईटी के हॉस्टल में एक विवाद खड़ा हुआ है, तो उसे धार्मिक और सामाजिक पहलू से परे भी देखने की जरूरत है। आज आईआईटी के कुछ प्राध्यापकों सहित बहुत से लोग इसे एक सवर्ण पूर्वाग्रह का नतीजा बता रहे हैं, और इसे दलित-आदिवासी विरोधी करार दे रहे हैं, ओबीसी विरोधी करार दे रहे हैं जो कि मोटेतौर पर मांसाहारी समुदाय हैं। 

यह बात जरूर है कि देश में एक तिहाई से कम लोग ही शाकाहारी हैं। इनमें से अधिकतर लोग अपनी धार्मिक मान्यताओं और जातिगत रीति-रिवाजों की वजह से शाकाहारी होंगे, और धीरे-धीरे इनकी भी अगली पीढिय़ां हो सकता है मांसाहारी होती जाएं। लेकिन शाकाहार को सिर्फ धर्म और जाति से जोडऩा क्या सचमुच जायज होगा? क्या धर्म और जाति से परे खानपान की कोई दूसरी वजहें नहीं हो सकतीं? 

मैं अपने खुद के बारे में अगर लिखूं, तो मैं न धर्म को मानता हूं, न जाति को। पूरी जिंदगी में इन दोनों पर आधारित किसी संगठन का मेम्बर भी नहीं बना। इनमें से किसी के कार्यक्रम में भी नहीं गया। कोई रस्म-रिवाज नहीं मानी। पूरी तरह से नास्तिक हूं। लेकिन पूरी तरह से शाकाहारी भी हूं। हिन्दुस्तान से फिलीस्तीन तक सडक़ के लंबे सफर में महीने भर सिर्फ मुस्लिम देशों से गुजरते हुए भी किसी तरह हमारे शांति-कारवां में आधा दर्जन से अधिक लोग शाकाहारी थे, और किसी तरह हमारा गुजारा चल गया। दस फीसदी से कम लोग अपने खाने में मांसाहार से परे रहे, लेकिन किसी और के मांसाहार से कोई दिक्कत नहीं रही। मैं दुनिया के एक-दो दर्जन देशों में घूमा हूं, और सभी तरह के खानपान वाले लोगों के साथ बैठकर अपना शाकाहारी खाना खाया है। लेकिन दूसरों के खाने से कोई चिढ़ न रहते हुए भी मांसाहार को देखने में कभी-कभी असुविधा भी हुई। 

अब मेरी तरह के धर्म और जाति से परे के शाकाहारी लोगों में से भी कुछ लोगों को ऐसी टेबिल पसंद आ सकती है जिस पर कोई मांसाहार न करे। आज भी हर दिन फेसबुक और ट्विटर पर मेरे कई मिनट मांसाहार की तस्वीरों को सामने से हटाने में गुजरते हैं क्योंकि मुझे उनके साथ किसी प्राणी को मारने की बात दिखती है। किसी जानवर, या पशु-पक्षी को खाने के पहले उसे मारना तो पड़ता ही है, और मैं ऐसी हिंसा के खिलाफ हूं। लेकिन मेरा ऐसी हिंसा से परहेज किसी और का विरोध नहीं है, जिन्हें यह ठीक लगता है, वह ऐसा करते रहें, मैं किसी को रोकने भी नहीं जाता, जिस तरह मैं सिगरेट या तम्बाकू के खिलाफ मुहिम चलाता हूं, वैसा कुछ भी मांसाहार के खिलाफ नहीं करता। वह लोगों की अपनी मर्जी की बात है। लेकिन अगर मुझे किसी हॉस्टल में रहना पड़े, और किसी मेस में खाना पड़े, और वहां पर बिना किसी के लिए असुविधा पैदा किए शाकाहारियों के लिए अलग टेबिल तय की जा सके, तो मुझे इसमें कोई बुराई नहीं लगती है। शाकाहारियों की वजह से मांसाहारियों को टेबिल न मिले, वह तो गलत बात होगी। लेकिन शाकाहारियों के लिए तय की गई टेबिल के अलावा अगर दूसरी टेबिल खाली हो, और मांसाहारी यह जिद करे कि वे शाकाहारियों की टेबिल पर ही बैठेंगे, तो उनकी ऐसी जिद मुझे हिंसक लगेगी। 

खानपान को अगर धर्म और जाति के आधार पर ही मुद्दा बनाया जाता है, तो यह कुछ लोगों के हकों के खिलाफ बात हो सकती है, लेकिन अगर मेरी तरह के लोगों के खानपान के सिद्धांत की बात हो, तो किसी जगह संभावना होने पर अलग बैठने के इंतजाम में क्या दिक्कत है? क्या कोई किसी दूसरे को नापसंद खानपान लेकर उसके टेबिल पर बैठने की जिद करे, तो क्या यह कोई लोकतांत्रिक अधिकार है? अगर लोगों को अपने खानपान का हक पसंद है, तो उन्हें दूसरों की पसंद का भी ख्याल रखना चाहिए। 

यह बात जरूर है कि किसी भी त्यौहार या किसी दूसरे दिन पर मांसाहार की दुकानों का बंद करना फिजूल की बात है, और कुछ धर्मों के लोगों को, कुछ महान लोगों के अनुयायियों को मांसाहार से अपने परहेज को दूसरों पर नहीं थोपना चाहिए। 

जहां तक मुम्बई और गुजरात के कुछ शहरों में रिहायशी इमारतों में मांसाहारियों को मकान न बेचने, या किराये से न देने का मुद्दा एक अलग किस्म का मामला है जिसमें अलग किस्म के कानून जुड़े हुए हैं, और उस पर चर्चा हॉस्टल जैसे मामले से जोडक़र यहां नहीं हो सकती। फिलहाल जो लोग हॉस्टल की मेस में शाकाहारियों के लिए अलग तय की गई टेबिल के खिलाफ हैं, वे धर्म और जाति से परे खानपान की निजी पसंद के हक को भी खारिज कर रहे हैं, जैसी पसंद, और जैसे सिद्धांत पर मेरा शाकाहार टिका हुआ है। 


(Daily Chhattisgarh)


सिर्फ लड़कियों को दी गई सलाह को महिलाविरोधी मान लेना जायज नहीं है..

 22 अक्टूबर 2023  

  

कलकत्ता हाईकोर्ट ने अपने एक ताजा फैसले में की गई टिप्पणी को लेकर देश के महिला अधिकारवादियों के बीच विरोध खड़ा करवा दिया है। दो पुरूष जजों की बेंच ने पॉक्सो के एक मामले में एक नाबालिग लडक़ी के सहमति से बनाए गए देह-संबंधों पर लड़कियों के लिए एक किस्म से नैतिकता की नसीहत दे डाली है। बड़ी अदालतों के बहुत से जज जब फैसले लिखते हैं तो उनमें कानून की न्यूनतम जरूरतों से परे जाकर अपने विचार खुलासे से लिखते हैं। इसमें कोई बुराई भी नहीं है, लेकिन इसमें की गई व्याख्या फैसले की गुणवत्ता से परे कभी-कभी विवाद खड़ा करती है। कुछ जज धर्म और जाति को लेकर मनुस्मृति की तारीफ पर उतर आते हैं, तो कुछ भारतीय संस्कृति में लडक़ी या महिला पर अतिरिक्त नैतिक दबाव बनाने लगते हैं। कलकत्ता हाईकोर्ट के इस फैसले ने जजों ने नाबालिग लडक़ी से उसकी सहमति से संबंध बनाने वाले उसके ही करीबी रिश्तेदार और बाद में बने पति को बरी कर दिया है। निचली अदालत ने इस नाबालिग लडक़ी के मामा को सहमति के देह-संबंधों पर भी लागू होने वाले पॉक्सो कानून के तहत  20 बरस की कैद सुनाई थी। इन संबंधों के चलते लडक़ी गर्भवती हो गई थी, बाद में उसकी शादी भी उसी मामा से हो गई, लेकिन मामला अदालत में जा चुका था, और वहां से उसे सजा हो गई। अब इस लडक़ी ने ही हाईकोर्ट में बयान दिया था कि वह अपने पति के बिना बीमार सास और छोटे बच्चे को लेकर अकेले घर नहीं चला पा रही है, इसलिए कैद भुगत रहे उसके पति को रिहा किया जाए। इन दोनों के इस बयान को भी हाईकोर्ट ने ठीक माना कि ये दोनों गांव में रहते थे, और इन्हें यह नहीं मालूम था कि नाबालिग देह-संबंध कोई जुर्म है। 

इस मामले में दोनों जजों ने यह सलाह दी है कि हर नाबालिग लडक़ी को अपनी सेक्स-भावनाओं को काबू में रखना चाहिए, और अपनी साख और अपने शरीर की हिफाजत करनी चाहिए। जजों ने फैसले में लिखा है कि नाबालिग लड़कियों को अपने अधिकारों और अपनी शरीर की रक्षा करनी चाहिए, अपनी गरिमा और आत्मसम्मान का ख्याल रखना चाहिए, और जेंडर बाधाओं को पार करते हुए अपने संपूर्ण विकास की कोशिश करनी चाहिए। जजों ने लिखा है कि समाज की नजरों में किसी नाबालिग लडक़ी के सेक्स के मजे को उसकी गरिमा खो देना मान लिया जाता है, इसलिए उसे अपना अधिक ख्याल रखना चाहिए। इसके साथ-साथ पुरूष नाबालिगों के लिए भी जजों ने कहा है कि उन्हें भी किसी लडक़ी या महिला का सम्मान करना सीखना चाहिए, उसके महत्व, गरिमा, और नीजता का ख्याल रखना चाहिए, और उसके शरीर पर उसके हक को समझना चाहिए। 

बहुत से महिला आंदोलनकारियों को यह बात खटक रही है, और कई लोग सोशल मीडिया पर यह लिख रहे हैं कि लड़कियों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने के लिए अब जजों की ही जरूरत रह गई थी। 

हम इस फैसले को देखते हुए उनकी टिप्पणियों को सिर्फ आलोचना की नजर से नहीं देखेंगे, बल्कि भारतीय समाज में हकीकत के हिसाब से भी उन्हें तौलेंगे। यह सामाजिक हकीकत है कि लड़कियों के देह-संबंध उन्हीं के लिए अधिक खतरा रहते हैं। बराबरी का हक तो कानून की किताबों में लिखा गया है, लेकिन गर्भवती तो सिर्फ लड़कियां हो सकती हैं, बलात्कार अमूमन लड़कियों के साथ ही होता है, और देश में ब्लैकमेलिंग के मामले देखें तो उनमें से अधिकतर में लड़कियां ही अपनी तस्वीरों या वीडियो को लेकर ब्लैकमेल होती हैं। जब समाज का ढांचा ऐसा ही बना हुआ है, और जब कुदरत ने ही लड़कियों को गर्भवती होने की संभावना दी है जो कि किसी जबर्दस्ती के मामले में आशंका में भी तब्दील हो जाती है। इसलिए लडक़े और लड़कियों के शरीर और उन पर सामाजिक खतरों को अनदेखा करके सिर्फ इस बात को लेकर बागी नहीं होना चाहिए कि हाईकोर्ट जजों ने लड़कियों को ही यह नसीहत दी है। इस बात को कैसे अनदेखा किया जाए कि 21वीं सदी में भी समाज का नजरिया, उसके पैमाने लडक़ों और लड़कियों के लिए अलग-अलग हैं। 

कानून की किताबों में जेंडर की बराबरी जमीन पर नहीं उतरती है। आज भी हिन्दुस्तान में देह के धंधे में बिकने वाले बदनों में तकरीबन तमाम बदन लड़कियों और महिलाओं के ही हैं, तकरीबन तमाम बलात्कार उन्हीं से होते हैं, और सेक्स-अपराध के बाद गर्भवती होने का खतरा तो सौ फीसदी लड़कियों पर ही रहता है। इसलिए अगर लड़कियों को अधिक सावधान रहने की कोई सलाह दी जा रही है तो उसे लडक़ों को मनमानी करने के लाइसेंस सरीखा मान लेना ठीक नहीं है। हम इस तरह से चीजों को देखना नहीं चाहते कि किसी को दी गई सलाह उसका शोषण मान ली जाए, उस पर ज्यादती मान ली जाए। यह भारत के आज के समाज की सच्चाई को देखते हुए दी गई एक अच्छी सलाह है, और इसे शब्दों के साथ-साथ इसकी भावना और इसके पीछे की नीयत के साथ जोडक़र देखना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh) 

जुर्म की इस भयानक कहानी से सभी परिवारों को तनाव घटाना सीखने की जरूरत..

 21 अक्टूबर 2023  

  

पारिवारिक तनाव किस हद तक जानलेवा हो सकते हैं इसका एक मामला किसी अपराध कथा या क्राइम थ्रिलर फिल्म की तरह सामने आया है। छत्तीसगढ़ से लगे हुए महाराष्ट्र के विदर्भ में एक बहू ने ससुराल वालों से परेशान होकर ऐसा जहर ढूंढा जिसका असर एकदम से न दिखे, और फिर उसने पति सहित ससुराल के कुछ लोगों को रोजाना वह धीमा जहर देना शुरू किया, और पहले तो लोगों की तबियत बिगड़ी और फिर अस्पताल में उन्होंने कुछ दिनों के फासले में ही एक-एक करके दम तोड़ दिया। बच्चे-बड़े मिलाकर तीन हफ्तों में ऐसे पांच लोग गुजर गए, और अब पुलिस ने उस बहू को गिरफ्तार कर लिया है जो कि कृषि विज्ञान की डिग्री वाली है, और ससुराल के तानों से परेशान होकर उसने यह काम किया था। यह हाल उस बहू के प्रेम विवाह के बाद हुआ था जिससे निराश उसके पिता ने कुछ महीने पहले ही खुदकुशी कर ली थी। मौतों वाले इस परिवार की एक और बहू भी कत्ल के इस सिलसिले में साथ थी। 

परिवारों के भीतर हिंसा बहुत अनोखी बात भी नहीं है, लेकिन घर की बहू इस दर्जे की हिंसा करे, इतने सारे लोग मारे जाएं, ऐसी खबर रोज-रोज नहीं आती है। अब पहली नजर में जो जानकारी है उसके मुताबिक ससुराल वाले ताना देते थे, और बहू ने हिसाब चुकता कर दिया। ससुराल वालों का ताना देना कोई बहुत अनोखी बात नहीं है, और आमतौर पर हिन्दुस्तान में प्रताडि़त बहू ही खुदकुशी करती है, वह ऐसी हिंसा नहीं करती। लेकिन अब वक्त बदला हुआ दिख रहा है, वह खुदकुशी करने या ससुराल छोडक़र जाने के बजाय इस तरह की और इस दर्जे की हिंसा करे, यह बात चौंकाती है, लेकिन इस सामाजिक हकीकत को समझने की जरूरत है। अब लोग इस बात को अपना हक मानकर नहीं चल सकते कि दूसरे परिवार से आई, या लाई गई बहू के साथ वे जैसा चाहे वैसा बर्ताव कर सकते हैं। एक तो कानून की तरफ से नवविवाहिता को कुछ खास किस्म की हिफाजत हासिल है, और शादी कुछ बरस बाद तक अगर उसके साथ कोई हादसा होता है तो उसकी अलग से जांच होती है। दूसरी बात यह कि अब मोबाइल और इंटरनेट की मेहरबानी से परिवार की बहू भी बाकी दुनिया के संपर्क में रह सकती है, और वह भी अच्छे या बुरे कई तरह विकल्पों पर काम कर सकती हैं। महिला की शिक्षा, आर्थिक-आत्मनिर्भरता, उसका कामकाजी होना, सोशल मीडिया पर दुनिया के लोगों से उसके संपर्क होना, इन सबसे भी उसके विकल्प बढ़ते हैं, और वह कल तक की छुई-मुई, घूंघट वाली घरेलू महिला नहीं रह गई है, और यही वजह है कि कई ऐसे जुर्म सामने आ रहे हैं जिनमें वह पति के साथ मिलकर किसी परेशान कर रहे प्रेमी का कत्ल करती है, या प्रेमी के साथ मिलकर पति को मार डालती है, या भाड़े के कातिल ढूंढकर इनमें से किसी एक का कत्ल करवा देती है। अब भारतीय नारी को अबला समझकर तबला की तरह पीटना ठीक नहीं है, क्योंकि अब वह हिसाब चुकता भी कर सकती है। कल तक उसे गिनती नहीं आती थी, लेकिन अब वह किसी कत्ल की सुपारी देने का हिसाब भी जानती है। ऐसी ही ताकत से लैस महाराष्ट्र की इस बहू ने धीमे जहर का इंतजाम किया, और एक-एक करके पांच लोगों को मार डाला। 

इससे एक बात यह भी समझ आती है कि परिवार के भीतर तनाव ठीक बात नहीं है। अगर लोगों का सुख-चैन से साथ नहीं निभता, तो उन्हें अपने अलग-अलग घर बना लेने चाहिए। महाराष्ट्र में अलग घर बनाना आम बात है, पता नहीं इस मामले में तनाव इतना बढऩे तक भी परिवार क्यों इस बारे में नहीं सोच पाया। आज के वक्त किसी को भी न पारिवारिक संबंधों में, न प्रेम या यारी-दोस्ती में तनाव इस हद तक बढऩे देना चाहिए। अब हिन्दुस्तान में भाड़े के हत्यारे इतने सस्ते में मिलने लगे हैं, और लोगों को यह भरोसा रहता है कि वे पकड़ाएंगे नहीं, इसलिए ऐसे जुर्म आए दिन हो रहे हैं। इनकी खबरों के बाद भी जुर्म करने वालों को डर नहीं लगता, और खतरा उठाने वाले को बचना नहीं सूझता। और यह तो बात परिवार के भीतर इस असाधारण दर्जे की हिंसा की है, लेकिन इससे परे छोटे-छोटे तनाव किस तरह किसी परिवार के सुख-चैन को खत्म करते हैं, और बड़े होते बच्चों के मानसिक विकास को प्रभावित करते हैं, उसके बारे में भी सोचना चाहिए। मामले जब तक पुलिस या अदालत तक नहीं जाते, खबरों में नहीं आते, तब तक उनकी चर्चा नहीं होती। लेकिन हमारा मानना है कि कत्ल या खुदकुशी तक पहुंचे हर मामले की तुलना में कम से कम हजार मामले पारिवारिक और मानसिक तनाव के रहते हैं, और उन्हें किसी हिंसा तक पहुंचने के पहले सुलझा लेने में ही समझदारी है। कोई भी एक हिंसा परिवार के कई लोगों को कई बरस, या पूरी उम्र की कैद दिला सकती है, और ऐसी नौबत से बचना चाहिए। 

दुनिया के जिन पश्चिमी देशों को तथाकथित भारतीय संस्कृति के प्रशंसक खराब मानते हैं, वहां पर बच्चे जवान होने के बाद शादी के पहले भी मां-बाप से अलग रहने लगते हैं, और ससुराल के हाथों प्रताडि़त जैसी नौबत शायद वहां आती ही नहीं है। हिन्दुस्तान में बहू की शिकायत पर ससुराल के कई-कई लोगों की एक साथ गिरफ्तारी की खबर भी हर कुछ दिनों में आती है, लेकिन ससुराल के लोग हैं कि वे सुधरने का नाम नहीं लेते। अब देश के हर तनाव में तो परामर्शदाता हासिल नहीं हो सकते, लेकिन पारिवारिक तनाव घटाने की मामूली समझबूझ की बातें तो समाज के अलग-अलग मंचों पर हो ही सकती है। यह बात याद रखने की जरूरत है कि धर्म और जाति के आधार पर बने संगठन अमूमन दकियानूसी रहते हैं, और वहां पर पाखंडियों का राज रहता है, इसलिए धर्म और जाति के संगठन कभी बदलते हुए वक्त के मुताबिक बदलाव नहीं सुझा सकते। इसके लिए धर्म और जाति से परे के साधारण मंच अधिक कारगर हो सकते हैं जो कि ससुराल और बहू को बेहतर तरीके से साथ, या अलग-अलग रहने के तरीके सुझा सकें, या एक परिवार के भीतर भी दूसरे रिश्तों को भी साथ रहने का बेहतर रास्ता बता सकें। 

यह भी याद रखने की जरूरत है कि पारिवारिक तनाव से घिरे हुए लोगों की जिंदगी की उत्पादकता घट जाती है। वे बेहतर पढ़ नहीं पाते, और न ही बेहतर काम कर पाते। उनके दिल-दिमाग का एक हिस्सा तमाम वक्त परिवार के गैरजरूरी तनाव में उलझा रहता है। इसलिए पारिवारिक तनाव को घटाने और खत्म करने का हर मुमकिन रास्ता तलाशना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 अक्टूबर, 2023



 

बेटियों के मामले में इस देश में जारी है पत्थर युग

 20 अक्टूबर 2023  

  

हालांकि चुनावी राज्यों के लोग चुनाव से परे अभी शायद ही कुछ देखने-पढऩे में अधिक दिलचस्पी रखते हों। जिंदगी में राजनीति और चुनाव से परे भी बहुत सी बातों की अहमियत है। कुछ अलग-अलग खबरें मिलकर पिछले दो-तीन दिनों से हमें यह सोचने पर मजबूर कर रही हैं कि हिन्दुस्तान एक देश के भीतर अलग-अलग संस्कृतियों के कई योरप की तरह है, जहां प्रदेशों से कई गुना अधिक संस्कृतियां हैं। अब मुम्बई की एक खबर है कि वहां प्रेमविवाह करने वाले एक जोड़े का कत्ल कर दिया गया था। एक मुस्लिम लडक़ी ने हिन्दू लडक़े से शादी की थी। लडक़ी के मां-बाप अधिक खफा थे, और यह जोड़ा यूपी के बांदा जिले से आकर मुम्बई में रह रहा था। अब मुम्बई पुलिस ने इस लडक़ी के बाप-भाई, परिवार के दोस्त, और तीन और मुस्लिम नाबालिगों को गिरफ्तार किया है। बाप-भाई ने मुम्बई में एक रिश्तेदार के घर इस बेटी-दामाद को मिलने बुलाया, और उन्हें मारकर लाश ठिकाने लगा दी। दूसरी तरफ एक खबर यह है कि कर्नाटक से खबर है कि एक रोजी-मजदूर की बेटी ने बैंगलोर विश्वविद्यालय से आठ गोल्ड मैडल के साथ केमेस्ट्री में एम.एस.सी. किया है, और तीन नगद पुरस्कार भी जीते हैं। बाप ने हमेशा बेटी को आगे बढ़ाया, और बेटी आसमान पर पहुंच गई। वह बेंगलुरू से 50 किलोमीटर दूर रहती थी, और रोज बस से कॉलेज आती-जाती थी। बस का सफर वह पढऩे में लगाती थी, और पिता की इस हसरत को पूरा करना चाहती है कि उसे टीचर बनना है। एक दूसरी खबर है कि यूपी के प्रयागराज में एक बहुत व्यस्त न्यूरोसर्जन ने अपनी बेटी का नीट इम्तिहान के लिए हौसला बढ़ाने को खुद भी 30 साल बाद मेडिकल दाखिले का इम्तिहान दिया, और उन्हें 89 फीसदी और बेटी को 90 फीसदी नंबर मिले। लेकिन आज हम जिस मामले को लेकर यहां लिखना शुरू कर रहे हैं, वह बिल्कुल ही अलग मामला है। झारखंड में एक पिता ने बेटी की शादी धूमधाम से की थी, और जब उन्हें पता लगा कि दामाद पहले से दो-दो शादियां किया हुआ था, अपनी इस तीसरी बीवी के साथ रहता नहीं था, और उसके साथ बुरा सुलूक करता था, तो पिता बैंडबाजा बारात लेकर बेटी के ससुराल पहुंचे, और अपनी बेटी को धूमधाम से अपने घर लेकर आए। 

ये सारी ही खबरें पिछले तीन दिनों की हैं, और हिन्दुस्तान की ही हैं। इनसे पता लगता है कि यह देश किस तरह धर्म, जाति, और मां-बाप की निजी पसंद या परहेज से बंधा हुआ देश है, कहां तो एक मजदूर बाप अपनी बेटी को एम.एस.सी. तक पहुंचाता है, जिसका गला गोल्ड मैडलों से भर जाता है, और कहां दूसरा बूढ़ा बाप बेटी के दूसरे धर्म में शादी करने पर अपने कुनबे के साथ मिलकर उसका गला काट देता है, और बाकी पूरी जिंदगी जेल में गुजारने को तैयार रहता है। यह हैरानी होती है कि किसी लडक़ी के आगे बढऩे की संभावनाएं किस हद तक उसके परिवार से मिले हौसले पर टिकी रहती हैं, और खासकर भारतीय समाज में मुखिया माने जाने वाले बाप के रूख पर बेटी का भविष्य कुछ या अधिक हद तक निर्भर करता ही है। ऐसा लगता है कि आगे बढऩे वाली बहुत सी लड़कियां बाप की वजह से आगे बढ़ती हैं, या फिर बाप के बावजूद आगे बढ़ जाती हैं। हमने हॉलीवुड के कुछ सबसे मशहूर और कामयाब फिल्म अभिनेताओं की तस्वीरें देखी हैं कि किस तरह वे अपनी बेटियों को अपने चेहरों पर अंधाधुंध पेंटिंग करने देते हैं, नेलपॉलिश लगाने देते हैं। ऐसे भी पिता देखे हैं जो बच्चों को कैंसर हो जाने पर उनके गिर गए बालों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए खुद भी सिर मुंडाकर रखते हैं। हिन्दुस्तान में भी ऐसी कमी नहीं है, और बनिया समुदाय का एक बाप जिस तरह झारखंड में बारात ले जाकर बैंडबाजे के साथ अपनी बेटी को ससुराल की प्रताडऩा से निकालकर लाता है, वह देखने लायक बात है, उससे सीखने लायक बात है। 

सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसे लेकर भारत की एक प्रचलित बात को याद भी दिलाया है कि बेटी को बिदा करते हुए मां-बाप कहते हैं कि डोली तो मायके से उठ रही है, अब अर्थी ससुराल से उठनी चाहिए। इस दकियानूसी और पाखंडी सोच के चलते उस लडक़ी के भाई तो खुश हो सकते हैं कि उन्हें जायदाद में हिस्सा नहीं देना पड़ेगा, या लौटी हुई बहन को पूरी जिंदगी घर में नहीं रखना होगा। लेकिन यह अकेली बात एक लडक़ी को ससुराल नाम की एक हिंसक दुनिया में पूरी तरह अकेला बनाकर छोड़ती है, और बहुत से मामलों में तो वह जवानी में ही पति के घर से अर्थी चढ़ जाती है, हिंसा झेलती है, कभी मारी जाती है, और कभी खुद को मार डालती है। यह सिलसिला हिन्दुस्तानी समाज को हिंसक बनाते चलता है क्योंकि इसमें मान लिया जाता है कि एक बार शादी हो जाने के बाद कोई भी लडक़ी अपने पति और ससुराल के रहमोकरम पर रहती है, उसी के लायक रहती है। मां-बाप की जमीन-जायदाद से परे भी यह सिलसिला मानसिक रूप से एक शादीशुदा लडक़ी को तोड़ देता है, उसे गहरे अवसाद का शिकार बना देता है, और जीने की उसकी चाह खत्म हो जाती है। एक इंसान के रूप में उसकी संभावनाओं को किनारे भी रख दें, तो भी समाज के एक उत्पादक सदस्य के रूप में उसका योगदान शून्य हो जाता है, और वह कुछ मायनों में समाज पर बोझ भी बन सकती है, मानसिक रोगों की शिकार हो सकती है। 

इसलिए झारखंड के एक पिता की यह बहादुर पहल हमें आज खुलकर उसकी तारीफ के लायक लग रही है कि उसने अपनी बेटी की घरवापिसी को भी जश्न की शक्ल दे दी। अपनी बच्ची को प्रताडऩा में मरने के लिए छोड़ देना पारिवारिक जिम्मेदारी से दूर भागने के अलावा और कुछ नहीं होता, ऐसे में धूमधाम से लडक़ी को उसके घर वापिस लाकर इस पिता ने एक मिसाल पेश की है, और इस पर अलग-अलग समाजों में चर्चा भी होनी चाहिए। देश का कोई कानून किसी लडक़ी को मां-बाप की जायदाद में बरसों की अदालती कार्रवाई के बाद हक तो दिला सकता है, लेकिन कोई भी कानून मां-बाप को मजबूर नहीं कर सकता कि वे मुसीबतजदा अपनी बेटी को वापिस घर लेकर आएं। और आज तक प्रचलित सामाजिक व्यवस्था को कभी ऐसे हौसले की गवाह नहीं रही है कि बेटी को इस तरह वापिस लाया जाए। इसलिए हम इस पारंपरिक रीति-रिवाज के बिल्कुल नए और मौलिक किस्म के इस्तेमाल की तारीफ करते हैं कि इससे समाज के और लोगों को भी एक राह दिखेगी, एक हौसला दिखेगा। 

इस पिता की पहल, कर्नाटक के रोजी-मजदूर का बेटी को आसमान पर पहुंचाना, प्रयागराज के न्यूरोसर्जन पिता का बेटी के साथ इम्तिहान देना, जब इन बातों को हम यूपी से मुम्बई आकर बेटी-दामाद का कत्ल करने वाले कुनबे की खबर के साथ रखकर देखते हैं तो लगता है कि हिन्दुस्तान एक साथ कई सदियों को जी रहा है। कुछ लोग 21वीं सदी में पहुंच चुके हैं, और कुछ लोग 18वीं सदी में जी रहे हैं। शायद ही कभी इस देश में समाज में बराबरी की, इंसाफ की सोच एक सरीखी बिखर सकेगी। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 अक्टूबर 2023