सुनील कुमार
रायपुर, 16 मार्च (छत्तीसगढ़)। बस्तर से सोनी सोढ़ी के आम आदमी पार्टी की उम्मीदवार बनने के साथ ही यह आदिवासी सीट एक अलग मायने वाली हो गई है। यहां पर कांग्रेस और भाजपा तो आधी सदी से चुनाव लड़ते आई हैं, लेकिन इस बार हो सकता है कि यह महिला एक नए किस्म का त्रिकोण खड़ा कर सके।
कुछ लोगों को यह लग सकता है कि आम आदमी पार्टी का तो अस्तित्व ही महानगरों में है, और बस्तर लोकसभा सीट का उस असर से क्या लेना-देना? लेकिन नक्सल आरोपों में गिरफ्तार विचाराधीन कैदी, और फिलहाल जमानत पर रिहा बस्तर की इस आदिवासी महिला सोनी सोढ़ी का मामला शहरी आम आदमी पार्टी से अलग जरूर है, लेकिन वह कांग्रेस और भाजपा के उम्मीदवारों से भी अलग है, और एक बहुत नए किस्म की चुनौती खड़ी करने की ताकत रखता है।
वैसे तो आने वाले दो महीनों के भीतर यह तस्वीर साफ हो जाएगी कि बस्तर की इस आदिवासी स्कूल शिक्षिका की वजह से छत्तीसगढ़ में चले आ रहे दो पार्टी वाले राजनीतिक ढांचे में कोई खराश पड़ सकती है, या नहीं, लेकिन जमे-जमाए पथरीले ढांचे में गहरी दरार खड़ी करने की एक संभावना इस महिला की उम्मीदवारी से बनती है।
लोगों को याद होगा कि पिछले तीन बरसों में इस महिला के बारे में लगातार जो खबरें छपीं, उनके मुताबिक वह या तो नक्सलियों की हिमायती थी, या उस पर लगाए गए आरोप झूठे थे। लेकिन इन दोनों में से चाहे जो नौबत हो, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उसकी जो मेडिकल जांच हुई थी, उनमें पाया गया था कि उसके गुप्तांगों में पत्थर या वैसी दूसरी चीजें डाली गई थीं। उस पर जुल्म हुए थे।
इस बारे में बीबीसी की एक रिपोर्ट में कुछ बुनियादी बातें इस तरह थीं- '...छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर के एक प्राइमरी स्कूल में अध्यापिका, सोनी सोरी को पांच अक्तूबर 2011 को क्राइम ब्रांच और छत्तीसगढ़ पुलिस के संयुक्त अभियान में दिल्ली से गिरफ़्तार किया गया था। सोनी सोरी के खिलाफ राज्य सरकार ने नक्सल गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया था और उनके खि़लाफ आठ अलग-अलग मुक़दमे दर्ज किए गए थे। इनमें से पांच मामलों में सोनी सोढ़ी को पहले ही निर्दोष कऱार दे दिया गया है। इसके अलावा एक मामला बंद हो चुका है और एक मामले में उन्हें पहले ही ज़मानत मिल चुकी है।
सात फरवरी 2014 को उसे सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में जमानत दी, जिसमें उस पर कथित तौर पर एस्सार समूह से माओवादियों की तरफ से पैसा लेने का आरोप है। सोनी सोढ़ी का मामला तब चर्चा में आया, जब अक्तूबर 2011 में कोलकाता के एक अस्पताल के डॉक्टरों की टीम ने सर्वोच्च अदालत को एक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें सोढ़ी के शरीर में कुछ बाहरी चीज़ें पाई गईं, लेकिन यह टीम यह नहीं तय कर पाई कि ये चीज़ें कैसे उनके जननांगों में डाली गईं। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह को एक खत लिखकर सोनी सोढ़ी के उन आरोपों की जांच की मांग की थी जिनमें उन्होंने हिरासत के दौरान यौन शोषण और हिंसा का आरोप लगाया था। एमनेस्टी के अनुसार 8 और 9 अक्टूबर, 2011 को पुलिस हिरासत में सोनी सोढ़ी को पीटा गया, उनसे यौन हिंसा की गई और बिजली के झटके दिए गए।...Ó
इन तथ्यों के साथ-साथ जब यह देखें कि सोनी सोढ़ी की गिरफ्तारी के वक्त बस्तर के दंतेवाड़ा जिले का एसपी कौन था, तो एक नौजवान आईपीएस अंकित गर्ग का नाम सामने आता है, जो कि शहरी, सवर्ण, शिक्षित, और सरकार की ऊंची सर्विस वाला अफसर था। उस पर इस महिला से ज्यादती करवाने, उसे प्रताडि़त करने के आरोप लगे थे। अंकित गर्ग पर लगे आरोप, और सरकारी जुल्म की शिकार की प्रतीक बनी सोनी सोढ़ी का यह मामला ग्रामीण-गरीब-कमजोर-आदिवासी और शहरी-संपन्न-ताकतवर-सवर्ण के बीच के वर्गभेद का एक प्रतीक भी बन सकता है। यह बात पढऩे में कुछ अधिक कठिन लग सकती है, लेकिन भारत में बहुत से इलाकों में मतदाताओं ने ऐसी जटिल सामाजिक स्थितियों पर अपनी बहुत साफ-साफ राय चुनावों में सामने रखी हैं।
अभी अदालतों में सोनी सोढ़ी पर प्रताडऩा और ज्यादती किए जाने के आरोप साबित होने बाकी हैं, लेकिन हमारा यह मानना है कि मतदाता अदालती फैसलों के बाद अपना रूख दिखाने के लिए नहीं जाने जाते, वे जनधारणा के आधार पर भी अपना रूख दिखाते हैं। आपातकाल के बाद शाह जांच आयोग की रिपोर्ट आने में तो बरसों लग गए थे, लेकिन 1977 में टीवी और मीडिया से दूर बस्तर के मतदाताओं ने आजाद हिन्दुस्तान की इतिहास में पहली बार नेहरू की बेटी को खारिज कर दिया था। पूरे के पूरे बस्तर में कांग्रेस को हरा दिया था। इसलिए बस्तर के आदिवासी मतदाताओं को शहरी प्रचार से दूर रहने की वजह से कम जागरूक या कम समझदार मानना परले दर्जे की बेवकूफी होगी। उसका फैसला शहरी लोगों के फैसलों के मुकाबले अधिक सही और तर्कसंगत होता है।
इस बार यह एक असल खतरा कांग्रेस और भाजपा दोनों के ऊपर एक साथ खड़ा हो सकता है कि इन दोनों से नाराज लोगों के सामने सोनी सोढ़ी की शक्ल में एक ऐसी महिला, एक ऐसी आदिवासी महिला, एक ऐसी आम महिला का विकल्प मौजूद है, जो कि बस्तर के प्रताडि़त आदिवासियों का प्रतीक भी है।
कल बस्तर में आम आदमी पार्टी की एक भीड़ भरी सभा में सोनी सोढ़ी ने यह कहा है- गांधीजी के आदर्शों पर चलकर बस्तर का माहौल बदलूंगी। यहां कलम की जगह बंदूक थमाई जा रही है, बस्तर के महिलाओं के साथ अत्याचार हो रहा है, बस्तर के महिलाओं को अत्याचार के खिलाफ लडऩा होगा।
लोगों को यह याद रखना चाहिए कि नक्सली और गांधीवादी दो बिल्कुल अलग-अलग विचारधाराओं के तो हैं, लेकिन आज नक्सलियों के उठाए गए बहुत से मुद्दों के साथ देश के गांधीवादी भी खड़े हुए हैं। वे हिंसा के तो खिलाफ हैं, लेकिन वे नक्सलियों के कई मुद्दों के साथ हैं। सोनी सोढ़ी में गांधीवादियों से लेकर नक्सलियों तक को, ऐसे आदिवासी मुद्दों को संसद में उठाने की एक संभावना दिख सकती है।
अब बस्तर लोकसभा सीट की आज की तस्वीर देखें तो कांग्रेस ने वहां पर सलवा-जुड़ूम के सबसे बड़े नेता, और नक्सलियों से मोर्चा लेने वाले, उसी अभियान के दौरान जान गंवाने वाले महेन्द्र कर्मा के बेटे को उम्मीदवार बनाया है। आदिवासी मतदाताओं के सामने यह बात साफ रहेगी कि दीपक कर्मा किस तबके के प्रतिनिधि हैं, उनकी सोच क्या है, और उनको कांग्रेस उम्मीदवारी मिलने की वजह क्या है। इस तरह वे बस्तर लोकसभा सीट के वोटरों और उस सीट पर खासी पकड़ रखने वाले नक्सलियों, दोनों के सामने एक खुली किताब की तरह हैं, कि सलवा-जुड़ूम की विरासत पर इस लोकसभा चुनाव में मतदाता और नक्सलियों की क्या सोच रहेगी।
दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में पिछले दस बरसों से सरकार चला रही भाजपा के उम्मीदवार दिनेश कश्यप हैं, जो कि अपने पिता बलीराम कश्यप के गुजरने के बाद उनके राजनीतिक वारिस के रूप में बस्तर सीट से सांसद बने, और अब फिर वहीं से भाजपा उम्मीदवार हैं। दिनेश कश्यप के छोटे भाई केदार कश्यप दस बरसों से राज्य में मंत्री हैं, और इस तरह उनका परिवार भाजपा और छत्तीसगढ़ सरकार, इन दोनों का प्रतिनिधि है, और यह मिलाजुला तथ्य बस्तर सीट के मतदाताओं, और नक्सलियों, दोनों के सामने है।
इस बार जो तीसरी उम्मीदवार सामने आई है, वह बस्तर की एक आम आदिवासी की प्रतीक है, आदिवासी महिला की प्रतीक है, और उसने अदालतों में हलफनामे पर जो बयान दिए हैं, उनके मुताबिक वह राज्य सरकार की पुलिस की जुल्म की एक शिकार रही है, और उस नाते वह नक्सल प्रभावित बस्तर के ऐसे आदिवासियों की प्रतिनिधि, और प्रतीक भी है, जो कि वहां पर मौजूद दोनों तरफ की बंदूकों के साये में अपनी जिंदगी और जीने के तौर-तरीकों को खो बैठे हैं।
आप पार्टी तो किसी को खबरों में ला सकती हैं, लेकिन सोनी सोढ़ी का मामला आप से ऊपर है, और बस्तर में पहली बार यह महिला एक ऐसा प्रतीक बनकर उभर सकती है, जो कि सलवा-जुड़ूम जैसे आक्रामक नक्सल-विरोधी अभियान के खिलाफ खड़ी हुई भी है, और दस बरसों में जिन ज्यादतियों की आरोपी राज्य की भाजपा सरकार है, उसके खिलाफ भी एक प्रतीक के रूप में अदना सी दिखती यह आम औरत तस्वीर बदल देने की संभावना रखती है। तीसरी बात यह कि बस्तर में लगातार सत्तारूढ़ जिस परिवार के दबदबे और कब्जे को कांग्रेस पार्टी तोड़ नहीं पाई है, उस कश्यप परिवार के खिलाफ भी मतदाताओं को एक मौका देने की संभावना सोनी सोढ़ी रखती हैं।
अब देखना यह है कि लोकसभा चुनाव में बस्तर संसदीय सीट की इस उम्मीदवार में वहां के मतदाता ये संभावनाएं टटोलते हैं या नहीं, और पहली बार उन्हें सलवा-जुड़़ूम के दो भागीदारों, कांग्रेस और छत्तीसगढ़ सरकार के खिलाफ वोट देने का जो एक मौका मिला है, उस मौके को वे इस नजर से देखते हैं या नहीं।
टुकड़ा-टुकड़ा जो कुछ बातें यहां पर दिखती हैं, उनमें से एक यह है कि नक्सल अपने दबदबे का इस्तेमाल मतदाताओं पर सोनी सोढ़ी के लिए कर सकते हैं, चाहे वह खुद नक्सलियों की हिमायती हों, या पुलिस के किसी फर्जी केस की शिकार हों। दोनों ही नौबतों में कांग्रेस और भाजपा के मुकाबले नक्सली इस महिला का साथ दे सकते हैं।
दूसरी बात जो यहां पर लगती है, वह है देश भर के आदिवासी-समर्थकों, महिला समर्थकों, मानवाधिकारवादियों, और मीडिया के एक खासे बड़े तबके की हमदर्दी की। इन तबकों के बहुत से लोग इस महिला को देश-विदेश में एक चर्चित प्रतीक के रूप में खड़ा कर सकते हैं, और उसके मामूली से दिखते कद से कई गुना बड़ा कर सकते हैं। बस्तर की इस सीट पर बहुत मामूली लगती इस महिला की संभावना अगर आसमान तक पहुंचे, तो भी हमें हैरानी नहीं होगी।
आपातकाल के बाद हुए चुनाव में अविभाजित मध्यप्रदेश की जिस एक सीट पर पूरी दुनिया के मीडिया की निगाह थी, वह थी सेंसरशिप के खलनायक विद्याचरण शुक्ल की महासमुंद सीट की। देश-विदेश के आला अखबारनवीस आते थे और सिर्फ महासमुंद का दौरा करके लौट जाते थे। आज इंटरनेट और आंदोलनकारियों की वजह से सोनी सोढ़ी की सीट उसी तरह की चर्चित सीट हो सकती है। इस तरह उसे उतना चुनावी खर्च भी जुट सकता है जितना कि चुनाव आयोग ने बढ़ाकर अभी कर दिया है। और इसके साथ-साथ उसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समर्थन भी जुट सकता है। आपातकाल के बाद के दिनों से आज एक फर्क यह भी हो गया है कि अब बस्तर में भी गांव-गांव तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पहुंच गया है, और उसके लिए सोनी सोढ़ी का दर्जा एक स्टार-उम्मीदवार का रहेगा। ऐसे में अगर सचमुच यह महिला इतनी खबरों में आ जाती हैं, तो नक्सल और पुलिस बंदूकों से लहूलुहान आदिवासियों को वह संसद में अपनी आवाज बनाने के लायक लग सकती है।
छत्तीसगढ़ की ग्यारह लोकसभा सीटों में से यह एक सीट सबसे अधिक दिलचस्प चुनाव वाली हो सकती है, सबसे अधिक दिलचस्प त्रिकोण, और सबसे अधिक हैरान करने वाले नतीजे की संभावना वाली सीट भी यह हो सकती है।