31 दिसंबर 12
संपादकीय
दिल्ली में पिछले एक बरस में अन्ना हजारे, बाबा रामदेव और अरविंद केजरीवाल के आंदोलन जिन शहरी लोगों पर टिके हुए थे, उन्हीं लोगों ने इस बार बलात्कार के खिलाफ सड़कों से लेकर इंटरनेट तक एक मुहिम चलाई। थोड़ा और दूसरी जगहों को देखें, तो इजिप्ट और सीरिया जैसे देशों में, आसपास की कुछ और जगहों पर भी इंटरनेट से आंदोलनकारी आपस में जुड़े। अमरीका तो सोशल मीडिया के मामले में बहुत आगे रहने वाले देशों में है, इसलिए वहां पर न सिर्फ वित्तीय संस्थाओं के खिलाफ चले वालस्ट्रीट पर कब्जा करने का आंदोलन, बल्कि युद्ध-विरोधी आंदोलन, और कई तरह के आंदोलन सोशल मीडिया कहे जाने वाले इंटरनेट पर चलते हैं। भारत में शिक्षित-मध्यमवर्ग के बीच सोशल मीडिया महानगरों और शहरों से नीचे उतरकर कस्बों तक पहुंच चुका है, और यही एक ऐसी जगह है जहां पर लोग देश के सबसे बड़े नेताओं, उद्योगपतियों, खिलाडिय़ों और फिल्मी सितारों से सीधे संवाद कर सकते हैं। इसलिए रात-दिन इसकी अहमियत बढ़ते चल रही है।
भारत के राजनीतिक दलों और नेताओं के बीच इस माध्यम के इस्तेमाल को लेकर जागरूकता के कई दर्जे हैं। कुछ लोग रात-दिन इसका इस्तेमाल करते हैं, और कुछ लोग अब तक इससे पूरी तरह परे हैं। लेकिन एक बात तय है कि यह आसान और सस्ती तकनीक और सुविधा, नौजवान पीढ़ी के साथ-साथ हर पीढ़ी के पढ़े-लिखे और इंटरनेट तक पहुंच वाले तबके के बीच पकड़ बनाती चल रही है। इसे सिर्फ एक कुलीन या आभिजात्य तकनीक मानना गलत होगा, क्योंकि इसका मिजाज जरूरत से कुछ अधिक लोकतांत्रिक है। ऐसे में जो लोग इससे परे हैं, वे लोग कुछ न कुछ मौके खो रहे हैं। और यह बात सिर्फ राजनीति की नहीं है, आज देश के मीडिया के तमाम बड़े-बड़े सितारे ट्विटर और फेसबुक पर अपने लिखे हुए और अपने कार्यक्रमों को रात-दिन बढ़ावा देते दिखते हैं। ऐसे में आज की यूपीए सरकार सोशल मीडिया में पिछड़ते दिख रही है। अकेले दिग्विजय सिंह थे जो कि बीच-बीच में अन्ना-बाबा-केजरीवाल के खिलाफ, आरएसएस के खिलाफ कुछ-कुछ ट्वीट करते रहते थे, लेकिन इन दिनों बाकी यूपीए सरकार और कांगे्रस पार्टी के साथ-साथ उनकी भी बोलती बंद सरीखी है। ऐसे में बिना किसी राजनीतिक प्रतिबद्धता वाली नौजवान पीढ़ी भी मौजूदा हालात को लेकर मौजूदा सरकार पर पिली पड़ी है, और उसका सामना करने के लिए इस सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी की तरफ से कोई नहीं दिखता है। और यह नौबत न एक लोकतंत्र के हिसाब से ठीक है, और न ही चुनाव लडऩे वाली किसी पार्टी के हिसाब से ठीक है।
एक तरफ तो कांगे्रस पार्टी अपने सबसे नौजवान नेता राहुल गांधी को अगले प्रधानमंत्री की तरह देख रही है, और उसी तरह पेश भी कर रही है, दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी जैसे राहुल से एक पीढ़ी बूढ़े नेता हैं जो कि रात-दिन ट्विटर और ब्लॉग पर अपनी बात रखते चल रहे हैं। दूसरी तरफ मोदी की विचारधारा के लोग हैं जो कि इंटरनेट पर अतिसक्रिय हैं। तीसरी बात यह कि देश के बाहर गए हुए हिंदुस्तानियों का एक बड़ा तबका ऐसा है जो कि विचारधारा के स्तर पर हिंदुत्व और भाजपा को अपने करीब पाता है। और ऐसे लोगों की टेक्नालॉजी के मोर्चे पर एक बड़ी पकड़ है, और यह बात भी यूपीए के खिलाफ जाती है। कांगे्रस-यूपीए के खिलाफ यह भी जाता है कि उनकी विश्वसनीयता जमीन के नीचे जा चुकी है, और वे देश पर राज कर रहे हैं। ऐसे में हर बुरी बात के लिए लोग उनको जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। सत्ता के खिलाफ नाराजगी का एक बड़ा नुकसान सोशल मीडिया पर यूपीए-कांगे्रस को झेलना पड़ रहा है। यह नौबत सत्ता के घर बैठने की नहीं है। उनके मुसीबत से निपटने वाले लोगों को सोशल मीडिया पर आकर, बाकी मीडिया पर आकर मुद्दों का सामना करना पड़ेगा। आज एक पखवाड़ा हो रहा है, केंद्रीय गृहमंत्री और दिल्ली की मुख्यमंत्री, इन दोनों के अलावा देश का सामना करने यूपीए-कांगे्रस का कोई भी न सड़क पर दिख रहा, और न ही सोशल मीडिया पर। कांगे्रस को तुरंत ही इस नौबत में अपने-आपको बचाने की जरूरत है, बिगड़ी हुई साख वक्त के साथ अपने-आप लौटकर नहीं आ जाएगी।
हमारी फिक्र कांगे्रस पार्टी का भला या बुरा नहीं है, इस विशाल लोकतंत्र की सरकार अगर अपनी साख इस हद तक खोती है, तो यह नुकसान लोकतंत्र का बहुत बड़ा है।

















