24 जून 11
उत्तरप्रदेश में मायावती सरकार पुलिस के मुखिया और प्रशासन प्रमुख, इन दोनों को जिस बेरहमी से अपनी राजनीति में इस्तेमाल कर रही हैं वह देखने लायक है और इससे भी अधिक देखने लायक बात यह है कि अखिल भारतीय सेवा के ये बड़े-बड़े अफसर दिन में कई बार दो-दो बार मीडिया के सामने मायावती की राजनीति को बढ़ावा देते हुए राजनीतिक बयानबाजी करते दिखते हैं। यह वह दौर है जब लोकतंत्र में कोई सरकार या पार्टी चलाने के लिए मीडिया से रूबरू होना या तो सफल सरकार की राजनीति की रणनीति होती है या बुरी तरह नाकामयाब सरकार की बेबसी। जो भी नौबत हो हर सरकार को या पार्टी को मीडिया के मार्फत जनता तक अपनी बात रखनी ही होती है। इन दिनों जब कांगे्रस जैसी बड़ी पार्टी अपने घोषित प्रवक्ताओं से परे दिग्विजय सिंह जैसे अघोषित प्रवक्ताओं को रणनीति का एक बड़ा हिस्सा बनाकर चल रही है, जब यूपीए सरकार यह तय कर चुकी है कि उसके सरकारी मामलों की जानकारी मीडिया को देने के लिए केंद्र सरकार के नियमित अधिकारियों के बजाए उसके मंत्री यह काम करेंगे और वे मंत्री ही यह काम पिछले कुछ महीनों से कर रहे हैं, तब मायावती पहाड़ की चोटी पर बैठी हुई एक अकेली नेता की तरह दिखती है।
जिस अंदाज में मायावती उत्तरप्रदेश के सबसे बड़े अफसरों का बेजा इस्तेमाल कर रही है उससे उन अफसरों के किसी चुनाव लडऩे की गुंजाइश तो पैदा होती है लेकिन भारत के लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर नेताओं और अधिकारियों के बीच की सीमा रेखा इससे खत्म हो रही है। मायावती की यह बेबसी हो सकती है कि एक व्यक्ति की इस पार्टी के भीतर वे किसी दूसरे नेता को आगे बढऩे देना नहीं चाहतीं और वे खुद एक लिखे हुए बयान को पढऩे से अधिक कुछ नहीं कर पाती हैं इसलिए मीडिया के सवालों के जवाब देना उनके लिए भारी भी पड़ सकता है या नामुमकिन हो सकता है। ऐसे में चतुर अधिकारियों को सामने रखकर मायावती अपनी सरकार या पार्टी से जुड़ी कड़वी बातों को सीधे-सीधे अपने ऊपर आने देने से भी रोकती हैं और उत्तरप्रदेश की बुरी खबरों पर जब ये अफसर दमखम से सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी का बचाव करते हैं तो वे खुद भी अपने इन बयानों को सही साबित करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इसलिए सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी के अपराधों को मीडिया के सामने घटाकर या मिटाकर बता देने के बाद अपने दफ्तर लौटकर ये वैसा ही करने में जुट भी जाते होंगे ऐसा हमारा मानना है।
एक राजनीतिक दल के रूप में मायावती की पार्टी बसपा का यह बुरा हाल दिखता है। एक पार्टी का ढांचा अगर ठीक से विकसित नहीं होता तो उसमें सब कुछ कुल एक व्यक्ति के हाथ में केंद्रित हो जाता है और वह बाल ठाकरे, लालू यादव, मुलायम सिंह, ममता बैनर्जी, फारूख अब्दुल्ला, चन्द्रा बाबू की पार्टी जैसी स्थिति में आ जाती हैं। भारत में कई प्रदेशों में इस तरह का चलन है लेकिन हम छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल जैसे बहुत से राज्य देखते हैं जिनमें कि बड़ी पार्टियां सरकार या प्रमुख विपक्षी दल हैं और वहां पर एक नेता की सनक के मुकाबले अधिक अक्ल इस्तेमाल होते दिखती है। कांगे्रस के बारे में यह जरूर कहा जा सकता है कि उसकी अकेली मुखिया सोनिया गांधी हैं, लेकिन एक बात सोनिया गांधी की लीडरशिप के इस पूरे दौर में सामने आई है कि वे अपने आसपास के बहुत से लोगों से बातचीत करने के बाद ही कोई फैसला लेती हैं और उनकी पार्टी में सनक की एक भी मिसाल सामने नहीं आती। इसे हम एक पार्टी की ताकत ही मानते हैं कि वहां पर मुखिया आशंकाओं से घिरी हुई नहीं है और अपने बहुत से नेताओं को वह ताकत की अलग-अलग जगहों पर बिठाने के बाद भी बेफिक्र है। ऐसी बेफिक्री मायावती की जिंदगी में नहीं दिखती।
लेकिन लगे हाथों हम एक दूसरी बात पर भी आना चाहते हैं। भारत में न सिर्फ गठबंधन की राजनीति पिछले कुछ दशकों से हकीकत बन चुकी है बल्कि क्षेत्रीय दलों की ताकत भी पहले के मुकाबले बहुत अधिक बढ़ गई है। उत्तरप्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, बंगाल जैसे बड़े-बड़े कई राज्य बिना गठबंधन के सरकार बनाते नहीं दिख रहे, या तो गठबंधन या पूरी तरह क्षेत्रीय दल। और ऐसे गठबंधन भी देखें तो उनमें एक ही राज्य में जमीन वाले शिवसेना, एनसीपी, तेलुगू देशम, तृणमूल कांगे्रस जैसे बहुत से क्षेत्रीय दल शामिल रहते ही हैं। अब यहां पर एक पुरानी बहस पर कुछ और वक्त बर्बाद करने की नौबत आती है। क्षेत्रीय दलों के बारे में बार-बार यह कहा जाता है कि उनकी अपनी जरूरत और उनकी समझ, सोच सब कुछ अपने प्रदेश के लायक रहती है और वहीं तक सीमित भी रहती है। हम इसे कुछ हद तक सही मानते हैं और इसके थोड़े बहुत अपवाद भी देखने मिलते हैं। लेकिन क्या अमरीका की तरह पूरे भारत में दो पार्टियों की राजनीति के दिन कभी लौट सकते हैं? क्या कभी ऐसा होने पर वह आज के मुकाबले ज्यादा अच्छा होगा? इस बहस को हम महत्वपूर्ण इसलिए मानते हैं कि भारतीय लोकतंत्र एक लगातार चुनाव वाला देश है और लोगों के रूझान में कई नाजुक मौकों पर ऐतिहासिक फेरबदल भी देखने मिला है। ऐसे में देश और प्रदेश दोनों में सत्ता अगर दो राष्ट्रीय गठबंधनों के बीच किसी तरह केंद्रित हो जाए तो उससे लोकतंत्र का क्या भला होगा और क्या बुरा यह भी सोचने की जरूरत है। आज की यह चर्चा हम किसी राय पर ले जाकर छोडऩा नहीं चाहते लेकिन लोगों को इस पर चर्चा करते देखने की उम्मीद जरूर करते हैं।
मायावती से बात शुरू हुई थी और हम फिर वहीं पर लेकर जाना चाहते हैं। अफसरों का ऐसा इस्तेमाल ठीक नहीं है इससे सिर्फ एक बात साबित होती है कि जितने कमजोर ऐसे निर्वाचित और सत्तारूढ़ नेता हैं, उतने ही कमजोर अफसर भी हैं।