14 जनवरी 2013

'छत्तीसगढ़Ó अखबार की आज सालगिरह है। कई दशक पहले इसे उस वक्त के एक वरिष्ठ पत्रकार रावलमल जैन ने शुरू किया था और सात बरस पहले उन्होंने इस अखबार को एक नई पीढ़ी के हवाले किया, आगे बढ़ाने के लिए। तब से लेकर अब तक हम इसी कोशिश में लगे रहते हैं कि अखबार के पन्नों पर अखबारनवीसी की साख बनी रहे। हो सकता है कि कभी-कभी हम इसमें कामयाब भी न रहते हों, लेकिन ऐसी किसी भी नाकामयाबी से, चूक से सीखना न हुआ हो, ऐसा नहीं होता। जब जनता से, जमीन से, और कुदरत से जुड़े हुए मुद्दों को लेकर ईमानदारी और गंभीरता से लिखने की कोशिश होती है, तो वह कई बार कुछ तबकों को खासी हमलावर भी लगती है। भारत के मौजूदा लोकतंत्र में ऐसे हमलावर तेवर से किसी का बहुत नुकसान होता हो, ऐसा भी नहीं है, क्योंकि इस लोकतंत्र में सच की ताकत के मुकाबले ताकत की ताकत बहुत अधिक है। और फिर यह भी होता है कि खरी बातें, खटखने वाली बातें भी हो जाती हैं। लेकिन ऐसे में भी ये बरस अफसोस के नहीं रहे। बहुत से लोगों का यह सोचना रहता है कि सच कहना बहुत भारी पड़ता है। लेकिन हमारा अनुभव यह रहा है कि बोझ को ढोने की थोड़ी सी हिम्मत रहे, तैयारी रहे, तो सच उतना भारी भी नहीं होता। लेकिन जो लोग रीढ़ की हड्डी को, कमर और बांहों को, कंधों को जरा भी तकलीफ देना नहीं चाहते, उनके लिए बोझ का बहाना बड़ी सहूलियत से करीब ही खड़ा मिलता है।
लेकिन आज इस मौके पर कुछ दूसरी जो बातें लगती हैं, उनमें एक यह कि हिन्दी अखबार को पढऩे वाले उसके अच्छे और बुरे पर उस तरह से खुलकर बात और बहस नहीं करते, जिस तरह अंगे्रजी, या हो सकता है हमारी नजरों से परे भी कुछ दूसरी भाषाओं के अखबारों के पाठक करते हों। और इस बात को काटने के लिए कुछ लोग ऐसे गिनाए जा सकते हैं जो कि अखबारों में कई बार लिखकर भेजते हैं, और उनके वैसे खत छप भी जाते हैं। लेकिन इन नामों की गिनती अगर देखें, इनके तबके को अगर देखें, इनकी फिक्र के दायरे को अगर देखें, तो यह साफ लगता है कि अखबार की पहुंच, और उसके समाचार-विचार के दायरे का एक बड़ा छोटा सा हिस्सा ही ऐसे लोगों की फिक्र का सामान होता है। बचे हुए सारे मुद्दे, सारे सामान, किसी थाने के अहाते में पड़ी जब्त साइकिलों के ढेर की तरह धूल और धूप खाते रह जाते हैं। इसलिए जब इंसान और बाकी कुदरत से जुड़े मामलों की बात आती है, तो हिन्दी में सोचने वाले लोग भी बहुत कम गिनती में ही मुंह खोलते हैं, और उनमें से भी बहुत कम लोग ही कलम उठाते हैं या टाईप करते हैं। नतीजा यह होता है कि हिन्दी के अखबार कई बार एकतरफा रह जाते हैं, वे सिर्फ बोलते हैं, सुनते नहीं, क्योंकि उनको बोलने वाले लोग चुप हैं।
दुनिया के जो सबसे अच्छे अखबार होते हैं, वे तभी अच्छे हो पाते हैं जब उनको पढऩे वाले लोग खुलकर कहने वाले लोग भी रहते हैं। सच तो यह है कि अखबारनवीसी से परे भी, दुनिया के किसी भी काम में अगर लोगों की प्रतिक्रिया न मिले, तो अच्छा काम करने वालों का हौसला भी चुकने लगता है। कुछ बरस पहले छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एड्स नियंत्रण के प्रचार के लिए केंद्र सरकार से आए पैसों की बंदरबांट के दौर में दुनिया के मशहूर गज़ल गायक गुलाम अली का कार्यक्रम यहां करवा दिया गया था, जिसमें न परख रखने वाले सुनने वाले थे, और न किसी को सम पर सिर हिलाना आ रहा था। नतीजा यह था कि गुलाम अली को गाने में मुश्किल हो रही थी। अखबारों के मामलों में सम पर सिर हिलाने के बजाय उनको एक बेरहम कसौटी पर कसने वाले लोग होने चाहिए ताकि उनके अपने अखबार बेहतर हो सकें।
कुछ कहने वाले लोग इंटरनेट पर एक बेहतर और बंधनमुक्त मंच पाने की वजह से अपनी बात को वहां कहकर अपनी बेचैनी को निकाल लेते हैं, और इससे भी छपे हुए अखबारों का कुछ नुकसान होता ही है। और अखबारों के अस्तित्व को इंटरनेट पर समाचार-विचार के चलते नुकसान बढ़ते चल रहा है। जो अखबार चौबीस घंटे बाद रद्दी हुआ करते थे, वे एक छोटे तबके के लिए अब अपने छपने के पहले ही रद्दी हो चुके रहते हैं, क्योंकि लोग अपनी दिलचस्पी की बात इंटरनेट तक पहुंच रहने पर पल-पल पाते रहते हैं, और ऐसा जो तबका है वह तबका अखबार को खरीदने वाला तबका तो है ही, यह तबका अखबार के इश्तहार के कारोबार को चलाने वाला तबका भी है। इसलिए जब तक कोई अखबार इंटरनेट के सैलाब के बीच अलग-थलग खड़े रहने की पहचान नहीं रखेगा, तब तक वह लंबे समय तक शायद नहीं रहेगा। इसलिए हम एक तरफ तो वक्त से मुकाबला करने की कोशिश में लगे रहते हैं, दूसरी तरफ एक अलग पहचान की कोशिश भी चलती रहती है। इन दोनों के बिना छपे हुए मीडिया की बहुत लंबी गुंजाइश नहीं है, और जैसे-जैसे दुनिया के देश आर्थिक और तकनीकी मोर्चों पर आगे बढ़ रहे हैं, वे अखबार खोते भी जा रहे हैं।
जहां तक अखबार के अच्छे होने और अच्छे बने रहने की बात है, तो वह बहुत हद तक हमारी समझ से भी परे की बात है। लोग चाहते हैं कि वे अखबार रियायत पर रद्दी के मोल पाएं, और अखबार ईमानदार बने रहें। कुछ हद तक यह नौबत रॉबिनहुड सरीखी लगती है कि अखबार अपने बाहुबल से, अपने जोड़-तोड़ से, अपने समझौतों से ऐसी रियायत जुटाकर पाठकों को रस्ते का माल सस्ते में देते चलें। और बाजार में अखबारी मुकाबलों के इसी अंदाज के घर कर जाने के बाद अब इस अंदाज पर हैरानी भी होती है। यह नौबत कुछ उसी किस्म की लगती है कि मानो आग बुझाने जाती दमकल, या किसी जख्मी को लेने जाती एंबुलेंस, आते-जाते इश्तहार भी जुटाते जाती, ताकि उसका डीजल का, ड्राइवर का खर्च निकलते रहता। और जिस तरह अब भारत के लोकतंत्र में लोग यह सवाल नहीं करते कि लाखों के खर्च की चुनाव सीमा रहते हुए भी लोग करोड़ों खर्च कैसे करते हैं, कहां से करते हैं, कुछ वैसी ही अनदेखी हिन्दुस्तान के अखबारों के पाठक उसके दाम की करते हैं। यह नौबत कुछ वैसी है कि डॉक्टर मरीज को देखने की फीस न ले, और अपने खर्च को सिर्फ दवा कंपनियों के भरोसे चलाए। तो फिर उसके बाद ऐसे डॉक्टर जो लिखेंगे, और क्यों लिखेंगे, यह उन्हीं के समझने की बात होगी।
अखबार के कारोबार की यह नौबत ऐसी है कि हम बरस-दर-बरस बिना किसी जलसे के, बिना धूमधाम के, और संभावित प्रायोजकों को महानता का दर्जा देने का समझौता किए बिना, ठीक उसी तरह रोज अखबार का काम करते हैं, जैसा कि कुदरत अपना रोज का काम करती है, बिना किसी धूमधाम के।
जिस तरह किसी ने लंबे अर्से पहले सरकार के बारे में कहा था कि लोगों को वही सरकार नसीब होती है, जिसके कि वे हकदार होते हैं, हमारा ख्याल है कि लोगों को वैसे ही अखबार नसीब होते हैं, जिसके कि वे हकदार होते हैं। इसलिए यह नियमित पाठकों की जिम्मेदारी होती है कि वे अपने अखबार को खबरदार करते चलें, खबरदार बनाए रखें। इसी तरह किसी देश या प्रदेश का लोकतंत्र, जो कि सरकार से परे का भी बहुत बड़ा हिस्सा होता है, वह लोकतंत्र भी उतने ही अच्छे अखबारों का हकदार होता है जितना कि वह अच्छे अखबारों को बढ़ावा देता है।
लेकिन कुल मिलाकर हम खुश हैं, कि इस काम में हैं।
एक आदमी जो एक व्यवस्थित तरीके से नियमित काम करता है, उसे न कभी काम का बोझ लगता, न वह थकता। वह अपनी सीमाएं जानता है, और अपने पर लिए हुए सारे काम को एक उचित समयसीमा में पूरा करता है। किसी आदमी को कड़ी मेहनत नहीं मारती, उसे व्यवस्थित तरीके की कमी मारती है, या फिर नियमित काम न करने की आदत। -मोहनदास करमचंद गांधी
(गांधी की लिखी इस बात को हम ज्यों का त्यों यहां लिख रहे हैं। हालांकि हम उनकी इस भाषा से पूरी तरह असहमत हैं जिसमें वे आदमी लिखकर उसमें शायद औरत को शामिल मान लेते हैं, या फिर औरत के बारे में अलग से लिखने की जरूरत ही महसूस नहीं करते। काम के बारे में उनकी ऊपर की बात ठीक है, लेकिन औरत की अनदेखी की उनकी जुबान बहुत निराश करती है, क्योंकि सौ बरस पहले भी कम से कम उनसे तो यह उम्मीद की जाती थी कि वे मन, वचन और कर्म तीनों से औरत को न सिर्फ बराबरी का दर्जा देते, बल्कि आगे भी बढ़ाते। गांधी इस मोर्चे पर कम से कम भाषा के मामले में तो कमजोर साबित हुए ही हैं। उनके वक्त में भी औरतें सती बनाई जाती थीं, और उन्हें बचाने के लिए भाषा की राजनीति में भी बेइंसाफी खत्म करने की जरूरत थी। बहरहाल उनकी यहां कि बात को हम काम के सिलसिले में भी यहां रख रहे हैं। -सुनील कुमार)