संपादकीय
31 अक्टूबर 2017

महाराष्ट्र हाईकोर्ट में खारिज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में महाराष्ट्र के एक संगठन अभिनव भारत के एक सदस्य ने यह याचिका लगाई है कि गांधी हत्याकांड की सुनवाई दुबारा की जाए क्योंकि उस वक्त देशी-विदेशी जासूसी एजेंसियों की वजह से उसकी जांच और सुनवाई सही नहीं हुई थी। इसके खिलाफ महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं कि ऐसी कोई याचिका मंजूर नहीं होनी चाहिए।
यह पूरा सिलसिला इतना खतरनाक है, और बदनीयत से भरा हुआ है कि देश में इससे आज का कामकाज धरे रह जाएगा, और लोग इतिहास को बदलने में इस कदर लग जाएंगे कि स्कूल-कॉलेज की किताबें कागज कारखानों में भेज देनी पड़ेंगी, और नई किताबें एक नया मनपसंद इतिहास लेकर आएंगी जिसका कोई महत्व नहीं होगा। लोग पचास बरस पहले निपट चुके गांधी हत्याकांड की दुबारा जांच चाह रहे हैं, क्योंकि वे लोग गांधी के हत्यारों की पूजा करते हैं, और उनके महत्व को स्थापित करना चाहते हैं। फिर तो बहुत सारी और मौतों को, बहुत सी और हत्याओं को भी खोलने की जरूरत पड़ेगी जिनको सुप्रीम कोर्ट तक निपटा चुके हैं, या जिनको हत्या नहीं माना गया था, और प्राकृतिक मौत माना गया था। ऐसी मौतें कांग्रेस के नेताओं की भी हैं, और पहले की जनसंघ, और आज की भाजपा के नेताओं की भी है।
जो इतिहास पसंद न आए उसे बदलने के लिए अब सुप्रीम कोर्ट का ऐसा इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट को भी समझ में आना चाहिए, और उसे ऐसी याचिका के खिलाफ जुर्माना भी लगाना चाहिए, और हमारा मानना है कि इस केस में सुप्रीम कोर्ट ऐसा करेगा भी। लेकिन इससे परे एक दूसरी फिक्र यह है कि स्कूल और कॉलेज की किताबों में इतिहास को जिस तेजी से और जिस तेज पसंद और नापसंद से बदला जा रहा है, उसका आगे चलकर क्या होगा? भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में राजनीतिक दल हमेशा के लिए सत्ता में नहीं रहते, और वे आते-जाते रहते हैं। अगर इतिहास को अपनी पसंदगी या नापसंदगी के बिना पर इस तरह बदला जाएगा, तो हर पांच बरस में हो सकता है कि कोर्स भी बदले, किताबें भी बदलें, सड़कों और चौराहों के नाम भी बदलें, रेलवे स्टेशनों के नाम बदलें, बसों के रंग बदलें, और जाने क्या-क्या बदले। राजनीतिक अधिकार एक बात होते हैं, लेकिन देश में पहले से चली आ रही एक किस्म की व्यक्तिवादी पूजा को खत्म करके दूसरे किस्म की व्यक्तिवादी पूजा शुरू करने से क्या फर्क होगा?
गांधी को लेकर एक तरफ तो सोच यह है कि वे राष्ट्रपिता हैं, और उनको मंचों पर जगह-जगह टांगकर रख दिया जाता है, लेकिन दूसरी तरफ जब गांधी के हत्यारों का महिमामंडन करना होता है, तो गांधी के आज के ऐसे प्रशंसक उस पर मुंह भी नहीं खोलते। यह सिलसिला खतरनाक है, खासकर हत्यारों के महिमामंडन का। आज तो गांधी जा चुके हैं, लेकिन हत्यारी सोच और हत्यारों को बढ़ावा मिलने से और भी बहुत सी हत्याएं होंगी। हमने ऐसी हत्यारी सोच को पुणे और कर्नाटक में हत्या करते देखा भी है। भारत को अगर दुनिया में एक मजबूत देश की तरह उभरना है, तो उसे एक मजबूत कट्टरता के दम पर आगे बढऩे की सोच छोडऩी होगी। केन्द्र सरकार, भारतीय जनता पार्टी, और धर्म के आधार पर राजनीति करने वाली दूसरी ताकतों को यह समझना होगा कि 21वीं सदी में एक बार फिर गांधी हत्या के मुद्दे को इस तरह से उठाने पर चुप्पी रखना ठीक नहीं है। (Daily Chhattisgarh)
- सुनील कुमार

