30 जुलाई 2012
दूसरे कुछ राज्यों के बाद छत्तीसगढ़ ने भी तंबाकू और पान-मसाला के मिले-जुले गुटखा पर रोक लगा दी। पूरे देश में कदम-कदम पर बिकने वाले इस जहर की वजह से देश में दसियों लाख लोगों को मुंह का कैंसर हो रहा है और दूसरे कई किस्म के कैंसर का खतरा इसकी वजह से बढ़ रहा है। दरअसल जितनी आसानी से इसे बेचा जाता है, इसे खरीदकर रखा जा सकता है, और पल भर में खाया जा सकता है, उससे देश में तंबाकू खाने वाले लोगों का तबका तेजी से बड़ा हो गया। अब स्कूलों के बच्चे तक इसके आदी हो चले हैं और इससे सरकार को मिलने वाले बहुत मामूली टैक्स के मुकाबले सरकार का कैंसर के इलाज पर खर्च हजारों गुना है, और इस बीमारी से लोगों की होने वाली अकाल मौत का नुकसान रूपयों में गिना नहीं जा सकता।
लेकिन इसके बाद गुटखा व्यापारी जब सरकार से अपने मौजूद स्टॉक के निपटारे के लिए पहुंचे तो उन्होंने तर्क दिया कि उनके पास सौ करोड़ का स्टॉक पड़ा है, जिसे बेचने की इजाजत दी जाए। यह कहते हुए गुटखा व्यापारी इस बात को शायद भूल गए कि तकरीबन दो नंबर में ही होने वाले इस कारोबार के पास आज सौ करोड़ का स्टॉक अगर है, तो साल भर में इस धंधे से सरकार को टैक्स कुछ सिक्कों का ही क्यों मिलता है? इस व्यापार में टैक्स चोरी इतने संगठित तरीके से सरकारी मेहरबानी से चलते आई है कि स्टॉक का यह आंकड़ा हंसी का सामान बन गया।
लेकिन कारोबार के तरीके इसी तरह के रहते हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी से लगे हुए कारखाने जिस तरह का जहर हवा में घोल रहे हैं, धरती पर जहरीले पानी की शक्ल में छोड़ रहे हैं, मीलों दूर तक जल, जन, जमीन और जलवायु सबका जीना हराम कर चुके हैं, वे बार-बार सरकार से टैक्स की रियायत, बिजली के रेट में रियायत मांगते दिखते हैं। इन्हीं कारखानों से, जब अफसरों की नींद खुलती है तब, रियायती घरेलू गैस सिलेंडर बरामद होते हैं, प्रदूषण रोकने वाले उपकरण बंद मिलते हैं, और प्रदेश के राज्यपाल इस इलाके से गुजरते हुए हर बार फिक्र करते हैं, लेकिन ये कारखाने बेकाबू हैं।
और किस्म के कारोबार भी कई किस्म की रियायतें सरकार से चाहती हैं। जैसे इस राज्य में अभी कोई दो बरस पहले एक नर्सिंग होम एक्ट बना जिसके तहत अस्पतालों में हंगामा या तोडफ़ोड़ करने वाले मरीजों के रिश्तेदारों को बहुत कड़ी सजा देने का इंतजाम किया गया है। लेकिन दो बरस के भीतर छत्तीसगढ़ के ऐसे निजी अस्पताल जिस अंदाज में कमजोर तबके की सेहतमंद महिलाओं के अच्छे-भले गर्भाशय को निकालकर उनके बीमा कार्ड की रकम को खा रहे हैं, वह देखना भी भयानक है। इसमें अब तक कुल पौन दर्जन डॉक्टरों के पै्रक्टिस के लाइसेंस निलंबित हुए हैं, लेकिन जुर्म का अंदाज यह है कि राज्य में सौ से अधिक डॉक्टरों को कई-कई बरस की कैद होनी चाहिए। अब एक तरफ ऐसे डॉक्टरों और ऐसे निजी अस्पतालों को बचाने के लिए इस राज्य ने एक कानून बनाया, दूसरी तरफ इंसानियत के खिलाफ इतना बड़ा जुर्म करने वाले लोग अभी तक टकसाल की तरह अस्पताल चला रहे हैं।
कुछ लोगों ने गर्भाशय कांड के बाद कहा कि डॉक्टर कसाई की तरह काम कर रहे हैं। कसाई होना एक पेशा है, शाकाहारी लोगों को यह पेशा खराब और खूंखार लग सकता है, लगता ही होगा। लेकिन यह कानूनी है और समाज का एक बड़ा तबका मांसाहारी है, इसलिए यह काम इस तबके की मान्यताओं के मुताबिक, और सरकार के कारोबार के मुताबिक जायज है। इसलिए ऐसे डॉक्टरों को कसाई कहना, कसाई की बेइज्जती है क्योंकि वह अपने पेशे के उसूलों और मुल्क के कानून के खिलाफ जाकर भली-चंगी औरतों के गर्भाशय निकालने जैसा काम नहीं करता।
कल ही इसी अखबार के संपादकीय में लिखा गया था कि मीडिया का जो हिस्सा अपराधों के शिकार लोगों की शिनाख्त उजागर करता है, उस पर कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। जो लोग बेकसूर होते हैं, और दूसरों की हिंसा का शिकार होते हैं, उनके साथ हमदर्दी के बजाय उन पर कैमरों से हमले करने वाले मीडिया के बारे में खुद मीडिया के कारोबारियों को सोचना चाहिए। यही बात हमने कुछ बरस पहले इसी अखबार के संपादकीय में तब लिखी थी जब छत्तीसगढ़ में एक लापरवाह अफसर ने शायद अपनी बीवी के साथ कुछ निजी वीडियो रिकॉर्डिंग की, और फिर मीडिया के एक हिस्से ने उसे टीवी पर दिखाकर उस अफसर को ब्लैकमेल करने की चल रही साजिश में शायद भागीदारी कर ली। उस समय भी हमारा यही मानना था कि ऐसे मीडिया पर कार्रवाई होनी चाहिए जो अपने पेशे के उसूलों के खिलाफ जाकर, अपने दर्शकों-पाठकों की उम्मीदों के खिलाफ जाकर, और किसी व्यक्ति के निजी जिंदगी के अपने हक के खिलाफ जाकर अपने औजारों को हथियारों की तरह इस्तेमाल करता है।
गुवाहाटी से लेकर मंगलौर तक मीडिया ने जितनी हिंसक अश्लीलता दिखाई है, उससे वह पहली नजर में ही सजा का हकदार दिखता है, और लोकतंत्र को अपने इस हिस्से की मरम्मत करने की जरूरत है जो कि गलाकाट मुकाबले के इस दौर में कैमरे के बंदूक की तरह इस्तेमाल कर रहा है।
लेकिन मीडिया से परे, जब लोग इस बात को समझ नहीं पाते कि किसी की निजी जिंदगी के, पूरी तरह निजी, और पूरी तरह गैर-सार्वजनिक लम्हों को देखकर मजा लेने और उसे आगे बांटने में हैवानियत क्या है, तो फिर ऐसे लोग न सिर्फ ऐसे ही मीडिया के हकदार होते हैं, बल्कि वे अपने और अपने कुनबे के लिए भी आगे किसी वक्त ऐसे ही खतरे के हकदार भी होते हैं।
जब तक जुबानदार लोग ऐसी बातों पर बोलेंगे नहीं, ऐसे कारोबारी, ऐसे कारखानेदार, ऐसे डॉक्टर-अस्पताल और ऐसे मीडिया को धिक्कारेंगे नहीं, उसका बहिष्कार नहीं करेंगे, जब तक उसे बाजार से बाहर नहीं करेंगे तब तक हिंसा और अश्लीलता के साथ इस तरह का गलाकाट मुकाबला कारोबारियों के बीच चलता ही रहेगा। लोग अपने आसपास के लोगों की वीडियो रिकॉर्डिंग बाजार में फैलाते रहेंगे, और किसी की भी निजी जिंदगी महफूज नहीं रहेगी। यह तो जाना-पहचाना मीडिया है इसलिए हम उसकी बात भी कर रहे हैं, समंदर में पानी की बूंदों की तरह जो बेशिनाख्त इंटरनेट है, उस पर तो पल भर में किसी का भी बिस्तर चौराहे पर रखा जा सकता है। जब तक ऐसी हिंसक सोच के खिलाफ इंसानों की सोच खुलकर खड़े नहीं होगी, तब तक सबसे घटिया किस्म के इंसान, मुजरिम इंसान, इसी तरह राज करते रहेंगे।
























