केंद्र की वैक्सीन-नीति पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख, फैसले तक कायम रहेगा ?
केंद्र सरकार की वैक्सीन पॉलिसी पर चल रही सुनवाई के दौरान आज सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के लिए असुविधाजनक कई सवाल खड़े किए और सरकार से पूछा कि अलग-अलग राज्यों को विदेशी वैक्सीन खरीदने के लिए अलग-अलग ग्लोबल टेंडर निकालने पड़ रहे हैं, क्या यह केंद्र सरकार की नीति है? और सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह भी पूछा कि जब केंद्र सरकार के पास मौजूदा कानून के तहत देश के भीतर बनने वाली वैक्सीन के रेट तय करने के लिए व्यापक शक्तियां हैं, तो अलग-अलग कीमत तय करने का काम वैक्सीन निर्माताओं पर क्यों छोड़ दिया गया? सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल इसलिए भी पूछा कि केंद्र सरकार ने 45 वर्ष से अधिक के लोगों के लिए वैक्सीन मुफ्त देने का कार्यक्रम चलाया हुआ है, और उससे नीचे उम्र के लोगों से इसकी कीमत वसूली जा रही है, यह कीमत या तो राज्य सरकार दे रही हैं, या निजी अस्पतालों में लोग खुद ही दे रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सवाल किया कि यदि केंद्र सरकार 45 वर्ष से अधिक के लोगों के लिए टीके खरीद रही है तो 45 वर्ष से कम के लोगों के लिए टीके क्यों नहीं खरीद रही क्यों राज्य सरकार के ऊपर यह जिम्मेदारी डाली जा रही है?
यह पूरा सिलसिला बड़ा दिलचस्प है इसलिए है कि हमारे पाठकों को याद होगा कि मोदी सरकार ने जब से 45 बरस से नीचे के लोगों के लिए वैक्सीन की अपनी नीति घोषित की है, तबसे हम लगातार इस पर सवाल उठाते आ रहे हैं। लेकिन हमारे सवाल सुप्रीम कोर्ट की अभी सुनवाई से आगे बढक़र भी रहे हैं, जिसमें उम्र की सीमा तय करना, राज्यों के हिस्से के फैसले खुद लेना, और राज्यों पर वैक्सीन खरीदने का जिम्मा छोडऩा, जैसे बहुत से पहलू हैं। सुप्रीम कोर्ट की आज की सुनवाई वैक्सीन के रेट को लेकर थी और केंद्र सरकार की जिम्मेदारियों को लेकर थी कि वैक्सीन के ग्लोबल टेंडर की जरूरत अलग-अलग राज्यों को क्यों पड़ रही है, और केंद्र सरकार ने यह काम क्यों नहीं किया ? देश की वैक्सीन कंपनियों के उत्पादन का दाम केंद्र सरकार ने क्यों तय नहीं किया जबकि उसके पास ऐसा करने के लिए पर्याप्त अधिकार हैं? सुप्रीम कोर्ट ने एक बुनियादी सवाल भी उठाया है जिसे हमने इसके पहले नहीं लिखा था कि जब वह 45 वर्ष से अधिक के लोगों को वैक्सीन मुफ्त दे रही है, तो 45 वर्ष से नीचे के लोगों के लिए वैक्सीन का खर्चा लोगों को या राज्य सरकारों को क्यों उठाना पड़ रहा है?
सुप्रीम कोर्ट के सवाल बहुत पीछे हैं और हमारा मानना यह है कि ये सारे सवाल जायज हैं. अब देखना यह है कि केंद्र सरकार इसका क्या जवाब दे सकती है क्योंकि केंद्र राज्य संबंधों में केंद्र सरकार को अगर कुछ फैसले लेने का अधिकार भी है, और मनमाने फैसले लेने का भी अधिकार है, तो भी उन मनमाने फैसलों को अदालत में कोई चुनौती मिलने पर अदालत के सामने सरकार को उन्हें न्यायोचित तो ठहराना ही होगा और आज सरकारी वकील से सुप्रीम कोर्ट के जजों ने जो सवाल किए हैं, वे जनहित के सवाल हैं और वे राज्यों के अधिकार के सवाल हैं। दिक्कत एक छोटी सी यह है कि राज्यों ने अपने अधिकारों को लेकर केंद्र सरकार से पर्याप्त सवाल नहीं किए उर्मिला इसके पीछे की वजह शायद यह भी हो सकती है कि कोई राज्य सरकार कोरोना के खतरे के बीच, गिरती हुई लाशों के बीच, ऐसी दिखना नहीं चाहती है कि वह केंद्र सरकार के लिए कोई असुविधा खड़ी कर रही है. शायद इसलिए देश के तकरीबन तमाम राज्यों ने केंद्र सरकार के मनमानी हुक्म और फैसले ज्यों के त्यों मान लिए और वैक्सीन को लेकर तमाम किस्म की दिक्कतें खुद झेली हैं और झेलते चले जा रहे हैं।
केंद्र सरकार की टीकाकरण नीति और राज्यों के ऊपर उसके मनमाने फैसलों को थोपने का सिलसिला शुरू से ही बड़ा नाजायज चले आ रहा था। हमने इसी जगह यह लिखा था कि जब केंद्र सरकार अपने और राज्य सरकारों की खरीदी के लिए देश के छोटे-छोटे से सामान, स्कूटर, मोटरसाइकिल, फ्रिज और पंखे-एसी तक के रेट पूरे देश की कंपनियों से तय करके उन्हें घोषित करती है, और राज्य सरकारें उन्हें दोबारा टेंडर बुलाए बिना उस रेट पर खरीद सकती हैं, तो वैक्सीन के लिए ऐसा क्यों नहीं किया गया जो कि एक जीवनरक्षक सामान भी है, और जिसके लिए पूरे देश की जनता जनता बेचैन भी है। यह सवाल पूरी तरह अनसुना रहा क्योंकि केंद्र सरकार ने देश में किसी के सवालों का जवाब देना अपना जिम्मा मानना छोड़ ही दिया है। हमने यह सवाल भी उठाया था कि केंद्र सरकार ने खुद तो कम रेट पर वैक्सीन खरीदी और इसके बाद वैक्सीन कंपनियों को यह खुली छूट दे दी कि वे राज्य सरकारों से मोलभाव करें और राज्य सरकारें अपने हिसाब से उन्हें लें। यह फैसला केंद्र सरकार ने उस दिन किया जिस दिन इस देश में कुल 2 वैक्सीन कंपनियां काम कर रही थीं, बाहर से कोई वैक्सीन आयी भी नहीं थी और राज्य सरकारों की यह मजबूरी थी कि इन दो कंपनियों के एकाधिकारवादी इंतजाम के बीच इन्हीं से मोलभाव करें और खरीदें।
लोगों को याद होगा कि दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री मनीष सिसोदिया ने कैमरे के सामने दिए एक बयान में इस बात को लेकर केंद्र सरकार को घेरा था कि उसने दुनिया की मंडी में भारत के राज्यों को धकेल दिया है कि वे वहां एक दूसरे से मुकाबला करके अधिक बोली लगाकर वैक्सीन हासिल करें, और अपने प्रदेश के लोगों को लगाएं। मनीष सिसोदिया ने केंद्र सरकार से यह मांग की थी कि वह देश की जनता से इस नौबत के लिए माफी मांगे क्योंकि आज भारत की राज्य सरकारें दुनिया के बाजार में खड़े होकर एक दूसरे से अधिक बोली लगाकर पहले वैक्सीन पाने की कोशिश कर रही है जबकि यह काम केंद्र सरकार को करना चाहिए था। और दुनिया की कंपनियों ने ही यह साफ कर दिया कि वह हिंदुस्तान के किसी राज्य के साथ कोई सौदा नहीं करेंगी और वह सिर्फ केंद्र सरकार के साथ सौदा करेंगी क्योंकि अंतरराष्ट्रीय सौदों में कई किस्म की राष्ट्रीय गारंटी की जरूरत पड़ती है जिसे देने का अधिकार किसी राज्य सरकार का नहीं है और सिर्फ केंद्र सरकार ही ऐसा कर सकती है। कुल मिलाकर यह एक बहुत ही बुरी नौबत देश के सामने है जब लोग वैक्सीन लगवाने के लिए तरस रहे हैं, जब देश के बड़े-बड़े होटल वैक्सीन पैकेज के इश्तहार छपवा रहे हैं कि कितने हजार रुपए देकर उनके होटल में आकर रुकें, तीन वक्त खाना खाएं, और वैक्सीन लगवाएं। ऐसे में देश के गरीब लोग कहां जाएं, जिनके लिए न केंद्र सरकार वैक्सीन भेज रही है ना उनकी राज्य सरकारों को बाजार में वैक्सीन मिल रही है ?उनकी राज्य सरकारें दुनिया से कहीं से आयात नहीं कर पा रही हैं और लोगों के सिर पर खतरा बना हुआ है.
भारत सरकार की वैक्सीन नीति से गरीब और अमीर के बीच इस जीवनरक्षक वैक्सीन को लेकर इतनी बड़ी खाई खोद दी गई है कि पैसे वाले तो बड़े अस्पतालों में जाकर, होटलों में जाकर, यह वैक्सीन लगवा सकते हैं, लेकिन गरीबों में जो तबका बहुत अधिक खतरा झेल रहा है, वह तबका भी इस वैक्सीन को पहले नहीं पा सकता, क्योंकि ना केंद्र भेज रही है, न उनका राज्य खरीद पा रहा है। अब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के बारे में इस किस्म का जुबानी कड़ा रुख पिछले वर्षों में कई बार, कई मामलों में दिखाया है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला जब आता है तब लोगों को लगता है कि वह रुख और अदालत की जुबानी टिप्पणी उनमें से नदारद रहती हैं। ऐसे में लोग इंतजार करेंगे कि सुप्रीम कोर्ट के जज आज इतनी कड़ी जुबान बोल रहे हैं, आज जितने इंसाफ की बात कर रहे हैं, जब केंद्र सरकार की टीकाकरण नीति और कार्यक्रम पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आएगा, तो उस फैसले में भी अदालत का यह रुख झलकेगा। अदालत का फैसला महज फैसला नहीं रहना चाहिए वह इंसाफ भी होना चाहिए और अगर यह इंसाफ होगा तो पिछले महीनों में हमारी लिखी हुई तमाम बातें सही साबित होंगी और केंद्र और राज्य सरकार के संबंधों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बहुत सारी नई परिभाषाएं गढ़ सकता है जो कि मौजूदा केंद्र सरकार के लिए दिक्कत की हो सकती हैं। अभी अदालत की सुनवाई की जितनी खबरें हम देख रहे हैं, उनमें राज्य सरकारों की कोई दखल नहीं दिख रही है, जबकि यह राज्यों को सीधे प्रभावित करने वाले मुद्दे पर चल रही सुनवाई है. आगे देखते हैं कि राज्य अपने अधिकारों के लिए सुप्रीम कोर्ट के इस मामले में दखल देते हैं या नहीं।
महिलाओं के मुद्दों पर उनको जुबान का ऐसा हक तो इसके पहले कभी हासिल न था !
जब लिखने को कोई महत्वपूर्ण मुद्दा ना सूझे तो महिलाओं के मुद्दों पर एक नजर डालने से एक से अधिक महत्वपूर्ण बातें लिखने लायक सामने आ जाती हैं। सोशल मीडिया पर बहुत सी ऐसी महिलाएं सक्रिय रहती हैं, जो उनकी जिंदगी के असल मुद्दों पर लिखती हैं, और मर्दों की भीड़ उन्हें खुलकर गालियां देने में जुटी रहती हैं। औरतों के खिलाफ गालियां बनाना आसान भी रहता है। उनके बदन के कुछ हिस्सों के नाम लेकर, मर्दों की कुछ अधूरी हसरतों को मिला दिया जाए, तो महिलाओं को देने के लिए गालियां ही गालियां बन जाती हैं। सोशल मीडिया पर महिलाओं के हक की, या किसी भी गंभीर मुद्दे पर समझदारी की, जरा सी बात करने वाली महिला को भी उसके बदन के ढंके हुए अंगों के लिए हजार-हजार गालियां आसानी से मिल जाती हैं। कुछ महिलाएं डरकर और/या थककर सोशल मीडिया पर लिखना छोड़ देती हैं और कुछ महिलाएं उन पर फेंके गए इन पत्थरों को चबूतरे की तरह जमाकर, उन पर खड़े रहकर, और जोरों से बोलती हैं। कुल मिलाकर सोशल मीडिया ने जिस तरह दुनिया के हर कमजोर तबके को बोलने का मौका दिया है, एक नई जुबान दी है, एक नया लोकतांत्रिक हक दिया है, उसी तरह का हक महिलाओं को भी यहां पर मिला है और वे बहुत से नए पहलुओं पर लिख रही हैं जिनके बारे में आदमियों ने शायद कभी सोचा नहीं होगा। मर्दों में जो लोग अपने को औरत-मर्द की बराबरी के बड़े हिमायती मानते हैं, उन्हें भी महिलाओं की लिखी बातों को पढक़र कई बार एक नई सोच का पता लगता है जिसे कि उन्होंने कभी खुद होकर सोचा नहीं था।
ऐसा ही मुद्दा अभी सामने आया कि किसी एक आदमी को किडनी की जरूरत पड़ी। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया कि अब मौजूदा किडनी और अधिक साथ नहीं देगी, और ट्रांसप्लांट तो करना ही पड़ेगा, अगर और जिंदा रहना है। जैसा कि आमतौर पर होता है, आदमी लौटकर घर पहुंचा, और बीवी को तैयार करने लगा कि वह उसे किडनी दे। यह बात बोलने की भी जरूरत नहीं रहती है क्योंकि हिंदुस्तान जैसे देश में कोई भी महिला अपने सुहाग के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती है, और अपने पति को जिंदा रखने के लिए महिलाएं जाने क्या-क्या करती हैं। और पति को जिंदा रखने की बात ही नहीं है, पति की जिंदगी में बने रहने के लिए भी बहुत सी महिलाएं पूरी-पूरी जिंदगी को एक बोझ की तरह ढोते चलती हैं, और कभी उफ नहीं करतीं। लेकिन यह महिला जानती थी कि उसके पति की जिंदगी में और भी बहुत सी महिलाएं हैं, और ऐसे नाजुक मौके पर जब वह लौटकर सिर्फ बीवी का मोहताज रह गया है, क्योंकि बाहर की कोई प्रेमिका तो किडनी देने से रही, तो इस महिला ने भी अकेले जाकर डॉक्टर से मिलकर यह साफ कर दिया कि वह किडनी देना नहीं चाहती है। डॉक्टर भी मददगार निकला और उसने जांच में ही कुछ इस तरह की जटिलता बता दी कि इस महिला की किडनी काम नहीं आएगी। यह कहानी सच भी हो सकती है और किसी की गढ़ी हुई भी हो सकती है, लेकिन सच तो यह है कि असल जिंदगी में ऐसे मामलों की गुंजाइश कम नहीं है।
इसी तरह एक दूसरी नौबत बहुत सारे मामलों में सामने आती है जिनमें हिंदुस्तान से लेकर पश्चिम के बड़े-बड़े देशों के आधुनिक परिवार भी एक सरीखे दिखते हैं। जब किसी आदमी पर बलात्कार या किसी के देह शोषण का आरोप लगता है, या कि बिल क्लिंटन की तरह, अपनी एक मातहत प्रशिक्षणार्थी के शोषण का आरोप लगता है तो ऐसे तमाम मामलों में ऐसे लोगों की बीवियां सार्वजनिक जगहों पर, अदालत के भीतर और अदालत की सीढिय़ों पर, उनके साथ चट्टान की तरह खड़ी दिखती हैं, क्योंकि ऐसे नाजुक मौके पर अगर वे अपने बदचलन पति का साथ छोड़ें तो वह पल भर में डूब ही जाएगा। इसलिए हिंदुस्तान की दुखी-हारी बीवियों से लेकर, अमेरिका और ब्रिटेन की बीवियां तक अधिकतर मामलों में अपने बलात्कारी पति के साथ खड़े रहकर उसे संदेह का कुछ लाभ दिलाने की कोशिश करती हैं। एक बार अदालती मामला पूरा हो जाये, तो फिर चाहे उसे छोड़ दें, लेकिन मुसीबत के बीच नहीं छोड़तीं।
सोशल मीडिया ने महिलाओं को बोलने और सोचने का जो हक दिया है वह अभूतपूर्व है। इसके पहले तक महिला आंदोलनों के कुछ सार्वजनिक मंचों पर ही कुछ प्रमुख महिलाओं को यह मौका मिलता था और कुछ पत्रिकाओं में लिखने की क्षमता रखने वाली अच्छी लेखिकाओं को अपनी बात कहने का मौका मिलता था। लेकिन आज सोशल मीडिया की मेहरबानी से ना तो भाषा पर किसी काबू की जरूरत है, न ही नामी-गिरामी होने की जरूरत है, और बहुत आम महिलाएं भी अपनी जिंदगी के कुछ बहुत जटिल मुद्दों पर खुलकर लिख रही हैं, जिन पर खुलकर चर्चा हो रही है, और उन महिलाओं को खुलकर, जमकर गालियां दी जा रही हैं। हमारा तो यह मानना है कि ऐसी गालियां देने वाले उन महिलाओं का कोई अपमान नहीं कर पाते हैं, बल्कि वे अपने-आपके चाल-चलन का, अपने संस्कारों का, भंडाफोड़ करते हैं, और खुद अपने-आपको बेइज्जत करके लोगों के बीच उजागर कर देते हैं। यह पूरा सिलसिला समाज के भीतर महिलाओं को बोलने का हक मिलने का एक बिल्कुल ही अभूतपूर्व नजारा है जो कि अभी 10.15 बरस पहले तक कहीं नजर नहीं आता था।
आज इससे एक दूसरा फायदा भी हो रहा है। आदमियों में से वे लोग जो कि सचमुच ही महिलाओं के मुद्दों को समझने के लिए एक खुला दिल-दिमाग रखते हैं, उनके सामने भी महिलाओं से जुड़े हुए मुद्दे इतनी बारीकी से खुलकर सामने आ रहे हैं, उन मुद्दों पर इतने किस्म के लोगों की प्रतिक्रिया भी पढऩे मिल रही है, बहस इतनी आगे भी बढ़ रही है कि सोचने को तैयार लोगों को सोचने का बहुत सा सामान भी मिल रहा है। इसके पहले तक महिलाओं के मुद्दे महिलाओं की पत्रिकाओं तक सीमित थे जिनमें आदमियों की दिलचस्पी लिखे और छपे शब्दों में नहीं रहती थी, महिलाओं की उघड़ी तस्वीरों में रहती थी। आज धीरे-धीरे आदमियों का एक तबका ऐसा बढ़ भी रहा है जो महिलाओं के मुद्दों को, उनकी देह में अपनी दिलचस्पी के अलावा, सोच के स्तर पर भी समझने की कोशिश कर रहा है। सोशल मीडिया को बहुत किस्म की गंदगी के लिए और बुरे असर के लिए रात-दिन कोसा जाता है, लेकिन यह हकीकत अपनी जगह कायम है कि इस सोशल मीडिया ने ही समाज के सबसे कमजोर तबकों को एक जुबान दी है, और उनकी बातों को दूसरों की नजरों के सामने रखने का एक मौका भी जुटा कर दिया है। सोशल मीडिया पर जो लोग हैं उन्हें महज त्योहारों की शुभकामनाएं और जन्मदिन की बधाई तक फंसकर नहीं रहना चाहिए, और अपने से असहमत लोगों की बात भी देखना चाहिए, जिसके बिना कोई भी विचारधारा न विकसित हो सकती न जिंदा रह सकती।
सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो, बात डरावनी है, पर जरूरी भी है
पिछले करीब 12 हजार बरस से इंसान पशुओं को पालतू बनाकर अपने साथ रखते आए हैं। इंसानों का इतिहास यही बताता है कि उसके पहले वे जंगली जानवरों का शिकार करते थे लेकिन धीरे-धीरे वे उनमें से कुछ काम के जानवरों को खेती के लिए या चौकीदारी के लिए, या शिकार में मदद करने के लिए, अपने साथ रखने लगे। इंसान इन पशुओं को गोश्त के लिए, दूध के लिए, और उनकी खाल से अपने लिए गर्म कपड़े बनाने के लिए भी, पालने लगे थे। अब आधुनिक दुनिया में ऐसी किसी जरूरत के बिना भी लोग अपने शौक से अधिकतर कुत्ते-बिल्लियां पालते हैं, बहुत से लोग तरह-तरह के पंछी और मछलियां पालते हैं, और जिन देशों में कुछ और नस्लों के जंगली जानवरों को पालने की इजाजत है वहां पर लोग और खतरनाक समझे जाने वाले जानवरों को भी पालते हैं। अब चीन से जब कोरोना फैलना शुरू हुआ तो ऐसा माना गया कि वहां के एक शहर का जो पशु बाजार है जहां बड़ी संख्या में अलग-अलग बहुत सी प्रजातियां के पशु-पक्षी बेचे जाते हैं वहां से यह बीमारी फैली और एक मान्यता यह है कि वह चमगादड़ों से इंसानों में आई। अब यह भी जांच का मुद्दा है, और यह बात पूरी तरह से साबित नहीं हुई है, लेकिन पशु-पक्षियों को लेकर इंसान थोड़े से चौकन्ने तो हुए हैं। ऐसे में जब एक खबर एक पुरानी जांच रिपोर्ट पर अभी आती है कि मलेशिया में बहुत से ऐसे इंसान ऐसे भी मिले थे जिन्हें कोरोना वायरस कुत्तों से मिला था, तो यह लोगों को चौंकाने और हड़बड़वाने वाली बात है। हालाँकि ये मामले तीन चार बरस पहले के हैं और उसके बाद से ऐसे मामले कहीं सामने नहीं आए और ना ही यह साबित हुआ कि इंसानों में कुत्तों से आने वाले कोरोना वायरस की वजह से ही किसी की मौत हुई। लेकिन आज जब चारों तरफ सावधानी बरतने की बात हो रही है, जब लोग यह देख रहे हैं कि कोरोना वायरस के कितने और दौर आ सकते हैं और उनके लिए क्या-क्या सावधानी बरती जानी चाहिए, तब यह बात महत्वपूर्ण हो जाती है कि क्या किसी दिन ऐसी नौबत आ सकती है कि पालतू या कारोबारी जानवरों से इंसानों में कोई दूसरा वायरस आने लगे, और वैसे में क्या होगा?
हर कुछ वर्षों में यह देखने मिलता है कि कहीं गायों में, तो कहीं मुर्गियों में, और कहीं पालतू सूअर में कोई संक्रामक बीमारी फैल जाती है, और किसी देश-प्रदेश में या किसी शहर में उन्हें बड़ी संख्या में मारना पड़ता है, और मारकर एक साथ जलाना भी पड़ता है ताकि उनसे संक्रमण दूसरे जानवरों तक ना पहुंचे, और इंसानों तक ना पहुंचे। अब ऐसी नौबत की कल्पना आज थोड़ी सी मुश्किल हो सकती है कि अगर हिंदुस्तान जैसे देश में करोड़ों गाय हैं, इसमें ऐसी कोई बीमारी फैल जाए तो क्या होगा? क्योंकि बहुत सी जगहों पर लोग घरों में ही 1-2 गाय भैंस पाल लेते हैं जिनसे उनकी रोजी-रोटी भी चलती है और बच्चों को दूध भी मिलता है। अब अगर इनके बीच कोई बड़ी बीमारी फैल जाए तो क्या होगा? हिंदुस्तान जैसे देश में आज मुर्गीपालन एक बड़ा संगठित कारोबार हो गया है और अगर बीच-बीच में जिस तरह के संक्रामक रोग पोल्ट्री उद्योग झेलता है वह अगर अधिक भयानक हो गया तो क्या होगा? सूअर और भेड़-बकरियां भी अलग-अलग इलाकों में पाले जाते हैं और इंसान इनके गोश्त का कारोबार के लिए भी इस्तेमाल करते हैं और अपने घर के लिए भी, इनके बारे में भी ऐसी सावधानी की बात तो सोचने की जरूरत है।
लेकिन इन सबसे परे जो सच में घरेलू जानवर माने जाते हैं, और कुत्ते-बिल्लियों को जिस तरह लोग अपने घर में, अपने कमरों के भीतर रखते हैं, उनके बारे में यह सोचने की जरूरत है कि अगर उनके बीच कोई बीमारी फैली और उनसे इंसानों तक बीमारी फैलने का खतरा हो, तो इंसान क्या करेंगे? और क्या ऐसी किसी नौबत के खतरे की तैयारी के हिसाब से लोगों को अब पालतू जानवर रखना कम कर देना चाहिए? हम यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि बहुत से लोगों के लिए यह सवाल भी बहुत तकलीफदेह रहेगा और लोग हैरान होंगे कि कोई ऐसा सोच भी कैसे सकते हैं। लेकिन जब कोरोना से संक्रामक रोग के चलते आज हिंदुस्तान में जगह-जगह यह नौबत आई है कि लोगों ने अपने परिवार के लोगों की लाशों को जलाने और दफनाने से मना कर दिया क्योंकि उन्हें खुद को संक्रमण का खतरा था, और समाज सेवकों या सरकारी कर्मचारियों ने बड़ी संख्या में अंतिम संस्कार किए हैं, जब अपने मां-बाप, अपने भाई-बहन के अंतिम संस्कार, उन्हें आखिरी बार देखने से भी लोग कतराने लगे हैं, तो ऐसे में किसी जानवर से संक्रमण होने पर उस जानवर का क्या किया जाएगा? और दुनिया में आज कोरोना कहां से आया, कैसे फैला, किस पशु-पक्षी से आया, इनमें से किसी बात के पुख्ता सुबूत वैज्ञानिकों को नहीं मिल पाए हैं, ऐसे में यह एक खुला खतरा है कि वायरस कहीं से भी आया हुआ हो सकता है। बहुत से लोगों का यह मानना है कि यह किसी प्रयोगशाला में वैज्ञानिकों का बनाया हुआ वायरस भी हो सकता है जो कि किसी प्रयोग की तरह या किसी हमले की शक्ल में, या दवाओं, चिकित्सा उपकरणों, और वैक्सीन के बाजार को दुहने के लिए फैलाया गया हो। अभी क्योंकि कोरोना वायरस की कुछ भी जानकारी नहीं है कि वह कहां से शुरू हुआ, इसलिए अगले ऐसे किसी खतरे के बारे में सोचना भी मुमकिन नहीं है जो कि कारोबारी या फालतू या घरेलू जानवरों के बीच फैल सकते हैं, फैलाये जा सकते हैं, और वहां से इंसानों के बीच आ सकते हैं। लेकिन कुछ विज्ञान कथाओं को पढक़र लोगों को भविष्य में झांकने का एक मौका मिलता है और आज वर्तमान की तमाम चीजें ऐसी हैं जिनको भूतकाल में किसी न किसी विज्ञान लेखक ने किसी शक्ल में सोचा हुआ था। इसलिए आज यह जरूरी है कि लोग जानवरों से इंसानों में ऐसी बीमारी फैलने के खतरे के बारे में सोचें और यह भी सोचें कि ऐसी नौबत आने पर वह क्या करेंगे?
आज जिन लोगों को पालतू जानवर परिवार के सदस्यों की तरह लगते हैं वह यह भी देख लें कि इंसानी परिवारों के सदस्यों को आखिरी के कई दिन केवल डॉक्टर-नर्स को देखते हुए गुजारने पड़े और उसके बाद सीधे पुलिस के कर्मचारियों ने या समाज सेवकों ने उनका अंतिम संस्कार किया, घरवाले बहुत से मामलों में तो आखरी के कई दिन भी अपने सदस्य को नहीं देख पाए, आखरी बार चेहरा भी नहीं देख पाए, और खुद अंतिम संस्कार भी नहीं कर पाए। ऐसी इंसानी बेबसी के बारे में सोचते हुए लोगों को पालतू जानवरों का भी सोचना चाहिए।
गाँधी ने सचेत किया उसके बाद ही हुई है दुनिया की इतनी बड़ी तबाही जो कभी नहीं सुधरेगी !
एक विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय संगठन की लिविंग प्लेनेट-2020 रिपोर्ट में यह कहा गया था कि दुनिया में 68 फीसदी जैव विविधता पिछले महज 50 वर्षों में खत्म हुई है। दुनिया ने ऐसी बर्बादी इतिहास में इसके पहले कभी नहीं देखी थी। जो जैव विविधता खत्म हुई है उसमें से 70 फीसदी, जमीन को खेती के लायक बनाने के चक्कर में हुई है, जहां से दूसरे पेड़-पौधे, वनस्पति, और जीव-जंतु खत्म दिए गए। जंगलों की पेड़ों वाली जमीनों को खेत बनाने के लिए जिस तरह से पेड़ गिराए गए उससे यह नुकसान हुआ है। और इस नुकसान में से 19 लाख वर्ग किलोमीटर जंगली और अविकसित भूमि ऐसी है जिसे वर्ष 2000 के बाद ही खेती की जमीन में तब्दील किया गया है। जैव विविधता को इंसान जिस रफ्तार से खत्म कर रहे हैं वह भयानक है। विश्व वन्य कोष ने लिविंग प्लैनेट-2020 रिपोर्ट में यह लिखा था कि 1970 से 2016 के बीच 68 फीसदी स्तनधारी, जानवर, पंछी, मछलियां, पौधे, और कीड़े मकोड़े खत्म हो चुके हैं। इंसान जिस रफ्तार से कुदरत को खत्म करने पर आमादा है, और उसमें कामयाब भी है, वह अभूतपूर्व है। इसके पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था इस रिपोर्ट में कहा गया है कि धरती का जो हिस्सा बर्फ से लदा हुआ नहीं है, उसके 75 फीसदी हिस्से में तब्दीली लाई जा चुकी है, और अधिकतर समंदर बुरी तरह से प्रदूषित किए जा चुके हैं, धरती की 85 फीसदी से अधिक गीली जमीन खत्म की जा चुकी है। और जिस रफ्तार से इंसान खाने और ईंधन की अपनी जरूरतों को पूरा करने में लगे हैं, उससे कुदरत पर पडऩे वाला तनाव अंधाधुंध बढ़ चुका है।
इस मुद्दे पर लिखना आज इसलिए जरूरी लग रहा है कि मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र से ऐसी खबर है कि वहां के जंगलों में 20-25 साल पुराने पेड़ों में रसायन के ऐसे इंजेक्शन लगाए जा रहे हैं जिनसे उन पेड़ों से मिलने वाले गोंद में बढ़ोत्तरी हो जाए। कुछ नस्लों के पेड़ों में गोंद पैदा होता है और उन इलाकों के आदिवासी उन्हें इक_ा करके, बेचकर कुछ कमाई करते आए हैं। लेकिन परंपरागत आदिवासी समुदाय ने कभी पेड़ों को ऐसा नुकसान नहीं पहुंचाया था, जैसा कि अभी शहरी कारोबारियों के झांसे में आकर वे भी कर रहे हैं। एक रिपोर्ट में अभी यह पता लगा है कि मध्यप्रदेश के जंगलों में एक समय 18 प्रजाति के पेड़ों से गोंद मिलता था जो अब घटकर कुल 7 प्रजाति के पेड़ों तक रह गया है क्योंकि बाकी प्रजातियों में रसायनों के इंजेक्शन लगा-लगा कर उन्हें दुहकर उन्हें खत्म कर दिया गया है और उन पेड़ों से अब कुछ नहीं मिलता।
लोगों को अच्छी तरह मालूम है कि किस तरह डेयरी के जानवरों में, गाय और भैंसों में, हार्मोन के इंजेक्शन लगाकर उनका दूध बढ़ाया जाता है। और इस दूध के चक्कर में गांव-गांव के अनपढ़ मवेशी पालक भी इनका इस्तेमाल सीख लेते हैं, और यह हार्मोन दूध के साथ लोगों के पेट तक भी पहुंच रहा है, उन्हें बर्बाद कर रहा है। मध्यप्रदेश की अभी की रिपोर्ट बताती है कि इस तरह के गोंद से लोगों को किस किस्म का नुकसान पहुंच रहा है क्योंकि रसायनों के इंजेक्शनों से गोंद तो दो-तीन गुना अधिक मिलने लगता है, लेकिन उस गोंद का इस्तेमाल गर्भवती महिलाओं के लड्डू में करने पर वह इसका नुकसान झेलती हैं। खेती में फसलों से लेकर सब्जियों तक लगातार जिस किस्म से कीटनाशकों का उपयोग बढ़ रहा है, फसल बढ़ाने वाली दूसरी दवाइयों का इस्तेमाल बढ़ रहा है, वह अपने आप में भयानक है, और वह पंजाब जैसे राज्य में कुछ इलाकों में कैंसर में कई गुना बढ़ोत्तरी की शक्ल में सामने आ भी चुका है। बहुत सी ऐसी रिपोर्ट आई हैं जिनमें पंजाब के एक इलाके से राजस्थान के किसी कैंसर अस्पताल में जाने वाले मरीजों की भीड़ की वजह से उस ट्रेन को ही कैंसर एक्सप्रेस कहा जाने लगा है।
अगर धरती के और मानव जाति के इतिहास को देखें तो हाल ही में बहुत चर्चा में आई कुछ बड़ी जानकार किताबें बतलाती हैं कि किस तरह पिछले 100 बरस में ही धरती की इतनी अधिक तबाही की गई है जितनी कि उसके पहले के 5-10 लाख बरस में भी नहीं हुई थी। और दुनिया की सरकारें आज इस पर बात भी करना नहीं चाहतीं, खासकर जो सबसे ताकतवर, सबसे विकसित, सबसे संपन्न, और सबसे अधिक भौतिक संसाधनों वाले देश हैं, वह तो इस बारे में बिल्कुल भी बात करना नहीं चाहते। पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने तो पेरिस क्लाइमेट समिट से अमेरिका को बाहर ही कर दिया था। मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति ने थोड़ा सा नरम रुख दिखाया है लेकिन सवाल यह उठता है कि दुनिया में सामानों की प्रति व्यक्ति खपत में जो अमरीका सबसे अधिक आगे है, क्या उस देश में कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति खपत को घटाकर एक गांधीवादी किफायत की बात भी कर सकता है? कैसी अजीब बात है कि गांधी को गांधी और महात्मा बने हुए अभी कोई सौ-डेढ़ सौ बरस ही हुए हैं। और इन्हीं सौ-डेढ़ सौ बरसों में गांधी की किफायत की, कमखर्च की, सादगी की, और स्थानीय तकनीक, ग्रामीण रोजगार, कुटीर उद्योग जैसी तमाम नसीहतों को अनसुना करके दुनिया जिस रफ्तार से शहरीकरण और चीजों की खपत की तरफ बढ़ी है उसने धरती को इस हद तक तबाह किया है। सच तो यह है कि गांधी ने जब से किफायत की बात शुरू की है उसके बाद की तबाही ही सबसे बड़ी तबाही है, गांधी को अनसुना करना ही तबाही की शुरुआत रही। अभी तक गांधी को सालाना जलसों में तो याद किया जाता है, लेकिन इन सालाना जलसों से परे गांधीवाद की कोई जगह नहीं रह गई है।
सरकारें और समाज, व्यक्ति और परिवार, इनमें से किसी में भी अपनी खपत को कम करने की कोई चाह नहीं है, खपत को कम करने की बात के लिए कोई बर्दाश्त भी नहीं है। लोग ऐसी हड़बड़ी में हैं कि जरा सी कमाई बढ़ाने के लिए वे धरती के उन पेड़ों को खत्म कर दे रहे हैं, जिन पेड़ों ने इंसानों को जिंदा रखा हुआ है। और अमेरिका से लेकर हिंदुस्तान तक, और हिंदुस्तान के प्रदेशों तक, अधिकतर सरकारों का हाल यह है कि उन्हें 5 साल के या 4 साल के अपने कार्यकाल से अधिक की कोई फिक्र नहीं है, उन्हें अगर यह लगता है कि जैव विविधता, धरती, पर्यावरण, या कुदरत की तबाही से अगले चुनाव के पहले कोई फर्क नहीं पडऩे वाला है तो भला उन्हें इसकी फिक्र क्यों करना? दूध का जहर अब पेड़ों तक चले गया, गोंद के साथ वह गर्भवती महिलाओं तक आ रहा है, और जैव विविधता इस रफ्तार से खत्म हो रही है कि वह धरती पर दोबारा लौटने वाली नहीं है। लोगों को अपने बच्चों को तरह-तरह के कीट पतंग भी दिखा देना चाहिए क्योंकि हो सकता है कि उनके बड़े होने तक वे नस्लें खत्म ही हो जाएं और महज तस्वीरों में रह जाएं।
राज्यों को बजट का एक चौथाई अप्रत्याशित मद में रखना चाहिए
अभी देश के कुछ राज्य चक्रवाती तूफान का सामना कर ही रहे हैं, और जिस वक्त हम यह लिख रहे हैं, उस वक्त भी बंगाल, उड़ीसा जैसी जगहों पर लोगों को बचाने का काम चल रहा है। लेकिन पिछले 2 बरस से तूफानों का सामना करने वाले बंगाल की त्रासदी यह भी है कि उसके इन 2 वर्षों के बजट का 25 फीसदी हिस्सा चक्रवाती तूफानों से हुए नुकसान में निकल गया। ऐसा भी नहीं कि इनका अंदाज लगाकर कोई राज्य इनके लिए पर्याप्त इंतजाम बजट में कर सकता है. बंगाल ने प्राकृतिक विपदाओं के लिए 12 सौ करोड़ से अधिक बजट में रखा भी था, लेकिन 2 वर्षों में इन तूफानों से बंगाल में 58 हजार करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ है जो कि बजट प्रावधान के करीब 50 गुना है। अब सवाल यह उठता है कि देश का कौन सा राज्य ऐसा है जो अपने एक चौथाई बजट को ऐसे तूफानों के लिए या ऐसी प्राकृतिक विपदाओं के लिए रख सके? और ऐसे ही मौकों पर यह केंद्र सरकार की जिम्मेदारी आती है कि वह प्राकृतिक विपदा से प्रभावित राज्यों को उबरने में मदद करें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अभी तूफान प्रभावित गुजरात के हवाई दौरे पर गए भी थे और उन्होंने गुजरात के लिए 1000 करोड़ रुपए मंजूर भी किए थे। इसी वक्त देश के कुछ और प्रदेश भी तूफानों का सामना कर रहे हैं, उसका नुकसान झेल रहे हैं और यह नुकसान इतना बड़ा है कि उसमें अगर केंद्र सरकार से गुजरात की तरह हजार करोड़ रुपए की कोई मदद मिलती भी है, तो भी वह मदद बिल्कुल ही नाकाफी रहेगी।
ना सिर्फ बंगाल और उड़ीसा, बल्कि कुछ और राज्य इस तूफान से प्रभावित हैं, और हर बरस कुछ राज्य बाढ़ से भी प्रभावित होते हैं। उनका नुकसान छोटा नहीं होता है। ऐसे में देश में केंद्र सरकार की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है क्योंकि अकाल, बाढ़, भूकंप, या तूफान, यह सब राष्ट्रीय स्तर की प्राकृतिक आपदाएं हैं, जिन पर किसी राज्य सरकार का कोई बस नहीं चलता और इनसे अगर बड़ा नुकसान होता है, तो किसी राज्य सरकार के हाथ में इतनी ताकत भी नहीं रहती कि वह अपने लोगों की भरपाई कर सकें। ऐसे में केंद्र सरकार को ही अपने बड़े संसाधनों में से ऐसे राज्य सरकारों को नुकसान से उबरने की मदद करनी चाहिए और भारत में या लंबी परंपरा रही भी है। अब आज केंद्र सरकार कोरोना के वैक्सीन को लेकर राज्य सरकारों के साथ जिस तरह का बर्ताव कर रही है उसे देखते हुए प्राकृतिक विपदा में उससे बड़ी मदद की उम्मीद करना पता नहीं सही होगा या नहीं। यह भी जरूरी नहीं है कि आने वाले वर्षों में मोदी सरकार या कोई और केंद्र सरकार राज्यों की मुसीबत के वक्त उनके साथ खड़े रहे। इसलिए जब तक भारत के संघीय ढांचे में केंद्र के ऊपर अधिक निर्भर रहने की गारंटी ना लगे, राज्यों को अपने साधनों को बचा कर रखना चाहिए। ना अकाल पर किसी का बस रहेगा, ना जरूरत से अधिक बारिश में फसल के डूब जाने पर, और ना ही बाढ़ या तूफान पर।
हम राज्यों को पहले भी यह सुझाव देते आये हैं कि उन्हें अपने खर्चे घटाने चाहिए और अधिक किफायत बरतनी चाहिए। अब पश्चिम बंगाल की है ताजा मिसाल सामने हैं कि किस तरह 2 बरस के बजट का एक चौथाई हिस्सा केवल तूफान के नुकसान में निकल गया। बाकी राज्यों को भी यह सोचना चाहिए कि कोई ऐसी प्राकृतिक विपदा आए तो क्या होगा? और प्राकृतिक विपदा की ही बात नहीं है, सेहत की जो मुसीबत आज आई हुई है और कोरोना ने जिस तरह राज्यों की कमर तोड़ी है, तो अभी तो राज्य सरकारें सिर्फ मौतों को रोकने में लगी हुई हैं, लाशों को जलाने के इंतजाम में लगी हुई हैं, वैक्सीन के इंतजाम में लगी हुई है। उनके पास अभी अपने राज्य के बजट में क्या बचा है, क्या डूबा है, यह देखने का समय भी नहीं है। लेकिन बंद कमरों में बैठकर जो फाइनेंस विभाग काम करते हैं, उनकी रातों की नींद हराम हुई होगी कि जब लॉकडाउन से कारोबार बंद है टेक्स आ नहीं रहा है और उसी वक्त इलाज, बचाव और दीगर चीजों पर जितना खर्च हो रहा है, वह आएगा कहां से?
इसलिए लोगों को सबक लेना चाहिए कि राज्य सरकारों के पास जो बजट है उसमें अप्रत्याशित खर्चों के लिए इंतजाम बढ़ाएं। आज कोरोना वायरस है, कल हो सकता है कोई कंप्यूटर वायरस आए, और फिर किसी और किस्म की संक्रामक बीमारी फैले, या फसलों में कोई बीमारी लग जाए, या सूखा पड़ जाए। बहुत किस्म से मुसीबत आ सकती हैं। बंगाल में तो पहले चुनाव की मुसीबत आई, उसके बाद कोरोनावायरस, और उस बीच ही आज तूफान की यह मुसीबत आई है। तमाम राज्य सरकारों को अपने बलबूते मुसीबतों को झेलने की तैयारी के हिसाब से अगला बजट बनाना चाहिए और उसमें शायद एक चौथाई हिस्सा अप्रत्याशित मद में रखना समझदारी होगी।
रामदेव के दावे शीघ्रपतन के मरीज हैं, और वह खुद इसका इलाज नहीं कर पाया है...
हिंदुस्तान की इन दिनों की खबरों में रामदेव अचानक धूमकेतु की तरह आया और छा गया। पिछले महीनों में कभी-कभी रामदेव के उटपटांग दावे, फर्जी बातें, और अपनी दवाओं के बाजार बढ़ाने की दिखती हुई हरकतें ऐसी थीं, जिन्होंने कई दिनों तक खबरों पर कब्जा करके रखा। लेकिन अब बात उससे आगे बढ़ गई। अब रामदेव ने आयुर्वेद और एलोपैथी के बीच बहस छिड़वा दी है। यह शास्त्रार्थ कुछ अधिक बड़ा हो गया है, और इसमें एलोपैथी डॉक्टरों का देश का सबसे बड़ा संगठन इंडियन मेडिकल एसोसिएशन भी सामने आया है जिसके डॉक्टर आए दिन देश में कहीं ना कहीं कोरोना मरीजों का इलाज करते हुए मारे जा रहे हैं।
खबरें जो कि ऑक्सीजन की कमी, वैक्सीन की कमी, इंजेक्शनों की कमी, तमाम चीजों की कालाबाजारी, दुनिया के छोटे-छोटे कमजोर और गरीब देशों से भारत को आ रही मदद से भरी हुई थीं, और गंगा तट पर रेत में दफनाए गए हजारों लोगों की तस्वीरें दिल दहला रही थीं। ऐसे में खबरों को एक रामदेव ने पूरी तरह अपनी तरफ मोड़ लिया और देश के लोगों के बीच हिंदूवादी, राष्ट्रवादी, भगवावादी लोग आयुर्वेद के रामदेव ब्रांड के साथ एकजुट हो गए हैं। रामदेव की कंपनी का मालिक बालकृष्ण इसे रामदेव की नहीं, बल्कि आयुर्वेद की आलोचना करार देते हुए देश में एलोपैथी के रास्ते ईसाईकरण का आरोप लगाने लगा। तो अब यह एक नया विवाद जुड़ गया है कि क्या एलोपैथी हिंदुस्तानियों को ईसाई बनाने का षडय़ंत्र है? इसके हिसाब से तो एलोपैथी के कैंसर सर्जन प्रवीण तोगडिय़ा को भी विश्व हिंदू परिषद का काम करने के बजाए किसी ईसाई मिशनरी का काम करना था क्योंकि वे तो पेशेवर एलोपैथिक सर्जन रहे, और उन्होंने भी कभी यह आरोप नहीं लगाया कि एलोपैथी लोगों को ईसाई बना रही है। फिर देश के तकरीबन हर बच्चे ने पोलियो ड्रॉप लिए हुए हैं जो कि एलोपैथी के मार्फत बनी हुई वैक्सीन है, और उस हिसाब से तो हिंदुस्तान में कोई हिंदू आबादी बचना ही नहीं था और हर बच्चे को ईसाई हो जाना था, लेकिन वह भी नहीं हुआ। अब सवाल यह है कि खबरों का सैलाब जिन मुद्दों को लेकर चल रहा था उन मुद्दों को एकदम से मटियामेट करते हुए जो नया एजेंडा मीडिया को थमा दिया गया है और टीवी की तमाम बहसों में पर्दे का आधा हिस्सा भगवा हो गया है और बाकी आधे हिस्से में दूसरे डॉक्टर आ गए हैं। हिंदुस्तान की हजारों बरस पहले की आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति आज रामदेव के हाथों में थमा दी गई है, कि मानो रामदेव ने ही पतंजलि के कारखाने में इस चिकित्सा पद्धति का आविष्कार किया है। चिकित्सा पद्धति को धर्म से जोड़ देना धर्म को राष्ट्रीयता से जोड़ देना राष्ट्रीयता को एक रंग दे देना और कुल मिलाकर यह साबित करने का एक सिलसिला चल रहा है कि जो-जो रामदेव को पसंद नहीं कर रहे हैं वह सब गद्दार देश को ईसाई बनाने पर आमादा हैं, वे हिंदुस्तान की संस्कृति, इतिहास, और गौरव का अपमान करने में लगे हुए लोग हैं।
सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने इस बात को लिखा है कि यह सब कुछ बहुत अनायास नहीं हो रहा है, इसे सोच-समझ कर किया जा रहा है और देश के बुनियादी मुद्दों की तरफ से ध्यान को भटकाने के लिए, चर्चा को दूसरी तरफ मोडऩे के लिए किया जा रहा है। अब अगर देखें तो हकीकत में कुछ ऐसा ही होते दिख रहा है, आज देश भर के टीकाकरण केंद्र सूख गए हैं, किसी के लिए कोई टीके बचे नहीं हैं, न सरकारों के पास, न बाजार में, न कारखानों में। और जिन विदेशी वैक्सीन कंपनियों की तरफ केंद्र सरकार ने हिंदुस्तानी प्रदेशों को धकेल दिया है, उन्होंने राज्य सरकारों से सौदा करने से मना कर दिया है। ऐसी भी बात नहीं कि केंद्र सरकार के जानकार अफसरों को पहले से इस बात की जानकारी नहीं थी, लेकिन ग्लोबल टेंडर बुलाकर, कंपनियों से बात करके, इस जानकारी को उन कंपनियों से पाने में राज्य सरकारों का एक-दो महीने का वक्त तो निकल ही गया, जो बात पहले से केंद्र सरकार की फाइलों में दर्ज थी । बात महज वक्त की रहती है, जब लोगों की भावनाएं भडक़ी हुई हैं, लोग उत्तेजित हैं, लोगों के मन में सरकार के खिलाफ आक्रोश है, उस वक्त लोगों को कभी कंगना थमा दिया जाए, तो कभी रामदेव की बूटी से राष्ट्रवाद का आत्मगौरव खड़ा कर दिया जाए, और अब तो सबसे चार कदम आगे बढक़र तथाकथित आचार्य बालकृष्ण ने एक नया आविष्कार किया है कि एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति हिंदुस्तानियों को ईसाई बनाने की साजिश है। अभी इतनी बड़ी साजिश को देखते हुए जो धर्मालु हिंदू लोग हैं, उनको तो इस महामारी के बीच भी एलोपैथी का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए, क्योंकि इससे तो उनका धर्म ही खतरे में पड़ जाएगा। और यह बात भी बड़ी अजीब है कि आजादी के बाद के इन 70-75 वर्षों में यह पहला ही मौका है जब हिंदू इतने अधिक खतरे में हैं। जब ईसाई महिला से शादी करने वाले राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, और ईसाई महिला को बहू मंजूर करने वाली इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं, तब भी देश के हिंदू इतने खतरे में नहीं थे कि तकरीबन पूरी आबादी के ईसाई हो जाने का एक खतरा रहा हो। लेकिन आज तो हालात बहुत भयानक हैं, आज तो देश की पूरी हिंदू आबादी खतरे में हैं क्योंकि पूरी हिंदू आबादी को कोरोना वैक्सीन लगाने की बात की जा रही है, जो कि एलोपैथी ने बनाई है, कोरोना का इलाज जो चल रहा है वह भी एलोपैथी से ही हो रहा है, केंद्र सरकार के तमाम अस्पताल, राज्य सरकारों के सारे अस्पताल केवल एलोपैथी का इस्तेमाल कर रहे हैं। तो बकौल तथाकथित आचार्य बालकृष्ण इस देश और इसके प्रदेशों की सारी सरकारें लोगों के ईसाईकरण की साजिशों में लग गई हैं ! इतने खतरे में तो हिंदू इसके पहले कभी नहीं थे।
आज इस किस्म की जो चर्चाएं खबरों और सोशल मीडिया के ऊपर खूब सारे भगवा पतंजलि गोबर की तरह फ़ैलकर बिखर गई हैं कि नीचे न वैक्सीन की कमी के आंकड़े दिख रहे, न रेत में दबी लाशें दिख रहीं। यह पूरा सिलसिला जनधारणा को बुनियादी मुद्दों से हटाकर पाखंडी मुद्दों की ओर ले जा रहा है, उन्हीं में उलझाकर रख रहा है और उसके अलावा किसी और को बात पर सोचने के लिए लोगों को मजबूर करना इसे बंद ही कर दिया है। अब यह लोगों को सोचना है कि सरकार की हर परेशानी के वक्त पर ऐसे मुद्दे निकलकर क्यों आते हैं? क्यों टूलकिट जैसा मुद्दा आता है? क्यों देश भर में यह संदेश फैलता है कि यह टूलकिट मोदी सरकार के खिलाफ कांग्रेस की बनाई हुई है, या कांग्रेस को बदनाम करने के लिए मोदी सरकार के मंत्रियों की यह साजिश है? हर दो-चार दिन के भीतर कोई ना कोई ऐसा एक मुद्दा आ रहा है जो दो-चार दिन छा रहा है. कल से सोशल मीडियाजीवी लोग दहशत में हैं कि क्या ट्विटर, फेसबुक हिंदुस्तान में बंद हो रहे हैं! अब यह लोगों को सोचना है कि उनकी बुनियादी जरूरत क्या है उन पर कौन से बुनियादी खतरे छाए हुए हैं, यह उन्हें सोचना है।
यह बात तय है कि रामदेव के खड़े किए हुए विवादों की और उसके खड़े किए हुए दावों की जिंदगी आसमान से गिरते धूमकेतु से अधिक नहीं होती। रामदेव के दावे शीघ्रपतन के शिकार रहते हैं, और इसका इलाज वह अपनी तमाम दवाओं से भी नहीं कर पाया है. यह वही आदमी है जो 35 रुपये लीटर में पेट्रोल दिलवाने वाला था, 35 रुपये में डॉलर दिलवाने वाला था, हर खाते में विदेश से लाए गए काले धन से 15 लाख रुपए दिलवाने वाला था, और यह तमाम बातें इसने रजत शर्मा की अदालत में हलफनामे पर कही थी, जिसके वीडियो अभी भी चारों तरफ फैले हुए हैं। तो ऐसा व्यक्ति आज आयुर्वेद को लेकर दावे कर रहा है, ऐसा व्यक्ति बिना किसी भी पद्धति का चिकित्सक रहे हुए हिंदुस्तान की सबसे अधिक प्रचलित, इस्तेमाल में आ रही, और जान बचाने वाली एलोपैथिक पद्धति के ऊपर सवाल खड़े कर रहा है। लोगों को यह सोचना है कि क्या एक पाखंडी कारोबारी अपने दम पर इतना कुछ कर रहा है या इस मौके पर उसकी इस बकवास के पीछे कोई और ताकतें हैं और इस बकवास से वह कुछ लोगों की मदद कर रहा है?
सबसे काबिल महिला स्वास्थ्य मंत्री को महामारी के बीच हटाकर सीपीएम ने दिखाई बड़ी बददिमागी
जिस केरल में सत्तारूढ़ वाम मोर्चे का चुनाव जीतकर वापस आना एक हैरान करने वाली बात थी, क्योंकि वहां 5 बरस बाद सत्ता पलट देने का मिजाज लोगों का रहा है। लोगों का नतीजों को देखकर यह अंदाजा था कि पिछले 1 बरस में वहां की स्वास्थ्य मंत्री शैलजा टीचर ने जिस खूबी और मेहनत के साथ कोरोना के मोर्चे पर इंतजाम किए थे और महामारी से निपटने में जुटी हुई थी, वह एक बड़ी वजह थी कि सत्तारूढ़ गठबंधन जीतकर, लौटकर आया। लेकिन नए मंत्रिमंडल के नाम आए तो लोग यह देखकर हैरान रह गए कि उसी स्वास्थ्य मंत्री शैलजा टीचर का नाम लिस्ट में नहीं था। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने इस मुद्दे से अपना हाथ धो लिया है और अधिकृत बयान जारी किया है कि मंत्रियों के नाम राज्य के पार्टी संगठन ने तय किए हैं, और उसे ही यह अधिकार था। राष्ट्रीय संगठन ने यह साफ कह दिया है कि इस बारे में जो सवाल करने हैं वे प्रदेश संगठन से किए जाएं। इस बयान के रुख से ऐसा लगता है कि सीपीएम का राष्ट्रीय संगठन भी प्रदेश के इस फैसले से इत्तेफाक नहीं रखता है कि दुनिया भर में जिस स्वास्थ्य मंत्री के काम को वाहवाही मिली, उसे महामारी के इस दौर में हटा दिया जाए या कि दोबारा न लिया जाए। दूसरी बात यह कि अगर तमाम मंत्रियों को हटा देने की बात थी, तो फिर मुख्यमंत्री बने क्यों रह गए? इस पैमाने पर तो मुख्यमंत्री को भी बदल दिया जाना चाहिए था। पार्टी ने अपने अखबार में यह लिखा था यह जीत किसी एक व्यक्ति की जीत नहीं है यह व्यक्तिगत और सामूहिक सभी किस्म की मेहनत की मिली जुली जीत है। ऐसा लगता है कि पार्टी के राष्ट्रीय संगठन और उसके केरल के स्थानीय संगठन के बीच तालमेल की कोई कमी है या कोई वैचारिक असहमति है।
लेकिन सीपीएम के आंतरिक फैसले को लेकर भी उसके मित्र संगठनों के बीच और हमख्याल पार्टियों के बीच एक नाराजगी खड़ी हुई है और आम लोगों के बीच भी एक निराशा पैदा हुई है कि आज 21वीं सदी में आकर भी अगर कोई पार्टी अपनी सरकार में सबसे अच्छा काम करने वाली महिला मंत्री को जारी नहीं रख सकती है, तो वह महिलाओं को क्या बढ़ावा दे सकेगी? और यह बात उस वक्त और बड़ी निराशा की हो जाती है जब मुख्यमंत्री अपने दामाद को मंत्रिमंडल में शामिल करते हैं और सीपीएम के राज्य सचिव अपनी बीवी को। इस किस्म की घरेलू कैबिनेट बनाकर और प्रदेश की एक सबसे काबिल साबित हुई मंत्री को हटाकर केरल की वाममोर्चा सरकार जाने कौन सा पैमाना साबित कर रही है। हमें केरल की अंदरूनी राजनीति से अधिक लेना-देना नहीं है, और न ही सीपीएम अपना घर कैसे चलाता है इससे हमें कोई फर्क पड़ता, लेकिन आज देश के सामने कोरोना के लेकर जो चुनौती है, उसके बीच में अगर किसी एक महिला मंत्री ने लाजवाब काम किया था, तो उसे हटाकर मुख्यमंत्री या वहां का सत्तारूढ़ संगठन एक अहंकार साबित कर रहा है, और एक ऐसे पैमाने को थोपने की कोशिश कर रहा है जो सिवाय एक बड़ी बेइंसाफी के और कुछ नहीं है। अगर केरल में मंत्रिमंडल के लिए कोई पैमाना बनना था तो पहला पैमाना तो यही बनना था कि वहां के बड़े नेताओं के घरों के लोग कैबिनेट में ना लिए जाएं।
यह चर्चा करते हुए छत्तीसगढ़ का पिछला लोकसभा चुनाव याद पड़ता है। विधानसभा चुनाव में जब छत्तीसगढ़ में भाजपा मटियामेट हो गई थी, और सत्तारूढ़ पार्टी के 15 बरस के बाद वह 15 सीटों पर सिमट गई थी, तब उस वक्त के भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भरी नाराजगी के साथ एक पैमाना तय किया था कि छत्तीसगढ़ की 11 लोकसभा सीटों में से किसी पर भी किसी पुराने व्यक्ति को दोबारा खड़ा नहीं किया जाएगा, न पहले के जीते हुए को, न पहले के हारे हुए को, और न ही किसी भी नेता के रिश्तेदार को टिकट दी जाएगी। और इसका नतीजा यह निकला था कि 11 में से 9 सीटें भाजपा ने जीती थी। तो पैमाने तो इस तरह के होते हैं, ना कि इस तरह के कि प्रदेश की सबसे काबिल मंत्री को निकाल दिया जाए, और दो रिश्तेदारों को मंत्री बना दिया जाए। केरल का यह मुद्दा है तो सीपीएम के अपने घर का मामला, लेकिन वामपंथियों के साथ एक बात है कि वे अपने साथी संगठनों के घरेलू मामलों पर भी सार्वजनिक रूप से अपनी राय रखते हैं। सीपीआईएमएल के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य और सीपीआईएमएल की पोलित ब्यूरो मेंबर कविता कृष्णन ने केरल के इस फैसले पर असहमति और हैरानी दोनों जाहिर की हैं, और सार्वजनिक रूप से इस पर लिखा है।
यह भी याद रखने की जरूरत है कि पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों में जब वाममोर्चा बंगाल के नक्शे से ही साफ हो गया, उस वक्त भी नतीजों के बाद दीपंकर और कविता कृष्णन ने बयान जारी करके बंगाल के चुनाव की स्थितियों का खुलासा किया था और यह लिखा था कि बहुत से प्रगतिशील संगठनों ने वहां पर मतदाताओं का यह आव्हान किया था कि जो कोई भी भाजपा को हराने की हालत में है उसे वोट देकर जिताएं। यह मामला वामपंथी पार्टियों का एक दूसरे के साथ साथ ना देने जैसा था, लेकिन वामपंथी विचारधारा के व्यापक हित में सीपीआईएमएल ने बंगाल में यह किया और उसने वहां के वाममोर्चा की बाकी पार्टियों की एक किस्म से आलोचना भी की। बंगाल में पूरी तरह खत्म हो जाने के बाद भी जो वाममोर्चा केरल की सत्ता में दोबारा जीत कर आया है उसकी ऐसी मनमानी बहुत निराश करने वाली है, और यह भारत की राजनीति में महिला के हक को मारने वाली भी है। एक सबसे काबिल महिला को इस महामारी के बीच में भी उसके काम से हटाकर मुख्यमंत्री ने या कि पार्टी संगठन ने एक बददिमागी दिखाई है। सीपीएम को यह समझ लेना चाहिए कि आज उसके पास सिर्फ एक ही राज्य की सत्ता में भागीदारी बची है, और नेता, या विचारधारा या संगठन का ऐसा अहंकार उसे यहां से भी खत्म कर देगा तो कोई हैरानी नहीं होगी। सीपीएम के राज्य संगठन की नजरों में शैलजा टीचर का कोई महत्व हो या ना हो, पूरी-पूरी दुनिया में उनके काम के महत्व को सराहा गया है, और सीपीएम अपनी बददिमागी के चलते एक नुकसान झेलेगी।
अब गाय खुद तो उसे लेकर किये जा रहे फर्जी दावों के खिलाफ केस कर नहीं सकती
इससे परे उनके केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री से लेकर केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री तक लगातार रामदेव की फर्जी दावों वाली दवाइयों के मॉडल बने घूम रहे हैं। अभी जब कल प्रतिरक्षा मंत्रालय के तहत डीआरडीओ ने कोरोना के मरीजों के लिए एक वैज्ञानिक दवाई पेश की, तो उस मौके पर प्रतिरक्षा मंत्री के अलावा स्वास्थ्य मंत्री की मौजूदगी ने उस दवाई की साख को घटा दिया, क्योंकि यही स्वास्थ्य मंत्री फर्जी दावों वाली रामदेवीय दवाइयों को भी इसी तरह मंच पर पेश करते आए हैं। बेहतर यही होता कि इसे प्रतिरक्षा मंत्रालय के मातहत संस्थान के वैज्ञानिकों की मौजूदगी में पेश किया जाता ताकि जनता के बीच इसका कोई भरोसा भी बैठता। अभी कल ही एक खबर आई है कि किस तरह केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल ने अपने चुनाव क्षेत्र के लोगों के बीच रामदेव की तथाकथित कोरोना दवा बांटने के लिए पतंजलि से अपील की है, और लोगों से कहा है कि वे जो दवा ले रहे हैं, उसके साथ-साथ इसे भी लें। जब भारत के चिकित्सा वैज्ञानिक रामदेव की दवाई का कोई परीक्षण नहीं कर पा रहे, कोई जांच नहीं कर पा रहे, तो उस वक्त इस ब्रांड को इस तरह सर्वोच्च स्तर पर बढ़ावा देने का क्या मतलब है?
आज हिंदुस्तान में जिस तरह गोबर और गोमूत्र से कोरोना के इलाज के दावे किए जा रहे हैं और उसके लिए कैंप या अस्पताल बनाकर लोगों की जिंदगी को वहां खतरे में डाला जा रहा है, क्या ऐसे लोगों पर महामारी एक्ट लागू नहीं होता कि वे पूरी की पूरी आबादी को कोरोना के बाद खतरे में डाल रहे हैं। भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति कहकर किसी भी बात को गैरवैज्ञानिक तरीके से इस महामारी के दौर में इस तरह से बढ़ावा देना न केवल उन कमअक्ल लोगों की जिंदगी को खतरे में डालना है जो इस झांसे में आ रहे हैं बल्कि बाकी तमाम लोगों की जिंदगी को भी खतरे में डालना है जिनके बीच में यह लोग लौटेंगे और जिन्हें मौत की तरफ धकेल लेंगे। हमारा ख्याल है कि बिना राजनीतिक प्रतिबद्धता की फिक्र किए हुए प्रधानमंत्री के स्तर से ही इस देश में वैज्ञानिक बातें करने की जरूरत है। यह जरूरत इसलिए भी है कि उनकी पार्टी के बड़े-बड़े नेता अवैज्ञानिक बातें कर रहे हैं तो ऐसे में उनके स्तर से वैज्ञानिक बातें करने के अलावा और दूसरी बातों का कोई असर होते दिखता नहीं है। आज इस देश में कोरोना के लिए या आने वाली किसी भी और महामारी से बचाव के लिए लोगों के बीच एक वैज्ञानिक समझ विकसित करने की जरूरत है, वरना प्रधानमंत्री के स्तर से मुख्यमंत्रियों से चाहे जितने बार वीडियो पर बात कर ली जाए, चाहे जितने बार जिलों के कलेक्टरों से बात कर ली जाए उसका कोई फायदा नहीं होना है।
जब देश में हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृति, भारतीय चिकित्सा पद्धति, प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेदिक चिकित्सा का नाम लेकर तमाम किस्म की फर्जी बातें प्रचलित की जा रही हैं, और आज की वैज्ञानिक जरूरत के खिलाफ लोगों को भडक़ाया जा रहा है, लोगों को उकसाया जा रहा है, तो उस वक्त महामारी एक्ट के तहत ऐसी बकवास करने वाले तमाम लोगों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने की जरूरत है और अगर राजनीतिक दलों की प्रतिबद्धता के चलते हुए ऐसा नहीं किया जा रहा है, तो कुछ राज्य जहां पर ऐसी प्रतिबद्धता से जुड़ी हुई सरकारें नहीं है वे राज्य अपने स्तर पर भी कार्रवाई कर सकते हैं क्योंकि महामारी एक्ट के तहत ऐसी कार्यवाही करना उनका अधिकार ही नहीं है उनकी जिम्मेदारी भी है। आज जब कोरोना के फैलाव को रोकने की सारी जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर डाल दी गई है, और देश भर में फैलाए गए अंधविश्वास के चलते बहुत से लोग टीके लगवाने से भी कतरा रहे हैं, ऐसे में अंधविश्वास फैलाने वालों के खिलाफ महामारी एक्ट के तहत कड़ी कार्यवाही की जानी चाहिए। अब गाय खुद तो उसे लेकर किये जा रहे फर्जी दावों के खिलाफ केस कर नहीं सकती।
केंद्र-राज्य संबंध बिगड़ते-बिगड़ते, केंद्र-राज्य संघर्ष
पश्चिम बंगाल में चुनाव के पहले से सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और सत्ता पर आने की महत्वाकांक्षी भाजपा के बीच हिंसक टकराव चल रहे थे। दस बरस से मुख्यमंत्री चली आ रहीं ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ जनता के बीच स्वाभाविक रूप से पनपने वाले असंतोष की शिकार भी हो सकती थीं, और सत्ता से बाहर जा सकती थीं, और ऐसी ही उम्मीद में भाजपा ने वहां पर सरकार बनाने के दावे भी किए थे। इन दावों के बीच वहां चुनाव के पहले से लगातार जो हिंसा चल रही थी वह चुनाव के बाद भी जारी रही। अब इस हिंसा के लिए कौन सा राजनीतिक दल कितना जिम्मेदार था, राज्य की सरकार कितनी जिम्मेदार थी, उस वक्त चुनाव आचार संहिता लागू थी, और राज्य का सारा प्रशासन चुनाव आयोग के हाथों में था, इसलिए यह एक धुंधली तस्वीर है कि उस वक्त हालात काबू में करने में कौन नाकामयाब रहे, और कौन सी पार्टी कितनी हिंसक रही। राज्यपाल ने जाहिर तौर पर ममता बनर्जी की सरकार की खासी आलोचना की और भाजपा पर हुए लोगों के हमले पर फिक्र जाहिर की। वे केंद्र सरकार के नुमाइंदे हैं और उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पूरी की। एक असामान्य बात मतगणना के बाद इस हिंसा के सिलसिले में यह हुई कि कोलकाता हाईकोर्ट ने खुद होकर हिंसा की सुनवाई शुरू की और पहले ही दिन से एक संविधान पीठ इसके लिए गठित कर दी। उसके सामने राज्य सरकार ने जब अपनी रिपोर्ट पेश की तो उसके बाद अदालत ने उसमें और कुछ करने जैसा शायद नहीं पाया है। लेकिन आज इस मुद्दे पर लिखने की एक जरूरत इसलिए हो रही है कि केंद्र सरकार ने यह तय किया है कि पश्चिम बंगाल के सभी 77 भाजपा विधायकों को केंद्रीय पैरामिलिट्री द्वारा सुरक्षा दी जाएगी। इन सबके साथ सीआईएसएफ की कमांडो यूनिट लगाई जाएगी और इस फैसले से यह जाहिर होता है कि राज्य के भाजपा विधायकों से कहीं अधिक केंद्र की भाजपा अगुवाई वाली मोदी सरकार का अविश्वास पश्चिम बंगाल सरकार पर है कि वह भाजपा विधायकों की सुरक्षा या तो कर नहीं पाएगी या उसकी ऐसी नीयत नहीं है। यह नौबत इस मायने में खराब है कि यह केंद्र और एक राज्य के संबंध में तनातनी का एक नया स्तर बताती है। आमतौर पर ऐसा कहीं भी देखा नहीं गया है कि केंद्र सरकार किसी एक राज्य की किसी एक पार्टी के सारे विधायकों को केंद्रीय सुरक्षा बल की सुरक्षा देना तय करे। शायद यह भारत के केंद्र-राज्य संबंधों में पहली ऐसी घटना है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के आलोचक इस मुद्दे को केंद्र और राज्य की तनातनी का एक बहुत बुरा पतन बतला रहे हैं और उनका मानना है कि केंद्र सरकार को कुछ और पहल करनी चाहिए थी, राज्य के ऊपर इतना अधिक अविश्वास ठीक नहीं है और भारत जैसे संघीय ढांचे में केंद्र और राज्य के संबंध इतने खराब होना ठीक नहीं है और जैसा कि किन्हीं भी दो पक्षों के बीच होता है, संबंधों में सुधार की अधिक जिम्मेदारी बड़े की होती है, जो कि इस मामले में केंद्र सरकार की होनी चाहिए थी। लेकिन एक दूसरा सवाल यह उठता है कि बंगाल में अगर लगातार हिंसा चल रही थी जिसमें भाजपा के लोगों पर अधिक हमले हुए उनकी अधिक मौतें हुई तो ऐसी नौबत में इन निर्वाचित विधायकों या दूसरे भाजपा नेताओं की सुरक्षा अधिक जरूरी है। फिर अगर राज्य सरकार पर केंद्र का भरोसा नहीं रह गया है तो केंद्र को यह अधिकार है कि वह ऐसे नेताओं की हिफाजत करवाएं। यह एक अलग बात है कि आगे इससे कई किस्म के टकराव की नौबत का खतरा बने रहेगा। लेकिन हम संबंधों में किसी टकराव के चलते हुए लोगों की जिंदगी खतरे में डालने के खिलाफ हैं, और जिस तरह भी हो सके लोगों की हिफाजत करनी चाहिए, और संबंधों में सुधार के लिए तो बंद कमरों में बाद में भी बातचीत हो सकती है। जो लोग मोदी के आलोचक हैं, और जिन्हें लग रहा है कि ममता सरकार के हक कुचले जा रहे हैं, उनकी याददाश्त को थोड़ा सा ताजा करना बेहतर होगा। जब ममता बनर्जी केंद्र में एनडीए सरकार के तहत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की रेल मंत्री थी तो उस पूरे दौर में जब भी बंगाल आती थीं, वे वाममोर्चा सरकार की पुलिस की हिफाजत नहीं लेती थीं, और वे आरपीएफ के जवानों के घेरे में चलती थी। रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स को पूरे देश में काम करने का एक विशेष अधिकार इसलिए दिया गया है कि रेलवे संपत्ति की चोरी या लूट होने पर उसके लिए राज्य कि पुलिस पर निर्भर रहने की जरूरत ना हो और आरपीएफ खुद भी जाकर कार्रवाई कर सके। पूरे देश में यही एक फ़ोर्स ऐसी है जो किसी भी राज्य में किसी भी जगह जाकर कार्रवाई कर सकती है और इसलिए ममता बनर्जी ने वाममोर्चा सरकार के राज्य में भी इसी फोर्स की हिफाजत पर भरोसा किया था. जबकि यह फ़ोर्स संपत्ति की सुरक्षा के लिए बनी थी और इसे वीआईपी सुरक्षा की कोई ट्रेनिंग नहीं थी। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती है इस बारे में जरा सी और तलाश की जाए तो बड़ी दिलचस्प खबरें निकलती हैं।
जब वाममोर्चा के 33 वर्षों की सरकार को हराकर ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनी थीं, तो उन्होंने एक असाधारण फैसला लिया था। उन्होंने अपनी यानी मुख्यमंत्री की सारी सुरक्षा व्यवस्था रेल मंत्री के दिनों की तरह आरपीएफ के ही हवाले रखी और यह बंगाल पुलिस की एक बहुत बड़ी बेइज्जती हुई थी कि उसकी अपनी मुख्यमंत्री अपनी हिफाजत के लिए उस पर भरोसा नहीं कर रही है. यह फैसला भी असाधारण था, देश के किसी मुख्यमंत्री ने ऐसा कभी नहीं किया था। ममता बनर्जी ने अपने कार्यकाल के 103 दिन के बाद जाकर आरपीएफ को वापस भेजा था और राज्य की पुलिस को मुख्यमंत्री की हिफाजत का जिम्मा लौटाया था। यह सिलसिला बहुत खराब था और यह एक मुख्यमंत्री का अपनी ही पुलिस पर अविश्वास का एक असाधारण सुबूत था। इसमें कहीं भी केंद्र और राज्य संबंधों की तनातनी नहीं थी, इसमें राज्य के मुख्यमंत्री और उसकी अपनी पुलिस के बीच की तनातनी थी. उस वक्त कुछ लोगों का यह भी कहना था कि 103 दिन के बाद ममता बनर्जी ने अनमने ढंग से आरपीएफ को लौटाया था क्योंकि आरपीएफ ने उन्हें लंबा चौड़ा बिल दे दिया था।
अब सवाल यह उठता है कि बंगाल में ऐसी तनातनी की एक परंपरा ममता बनर्जी ने ही शुरू की, मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने अपनी पुलिस पर भरोसा नहीं किया, इसलिए आज जब केंद्र सरकार भाजपा के विधायकों की हिफाजत को लेकर बंगाल की पुलिस पर भरोसा नहीं कर रही है तो ममता बनर्जी केंद्र राज्य संबंधों का कोई बड़ा हवाला देने का नैतिक अधिकार भी नहीं रखतीं। लेकिन एक दूसरा बड़ा सवाल जो यहां खड़ा होता है वह यह है कि चुनाव निकल जाने के बाद अगले 5 बरस तक इस राज्य में केंद्र और राज्य दोनों सरकारों की जरूरत है, राज्य इन दोनों की ही जिम्मेदारी है, और ऐसी तनातनी से इस राज्य का सबसे बड़ा नुकसान होगा। यह केंद्र के लिए भी अशोभनीय नौबत है कि एक राज्य के साथ उसके संबंध इतने खराब हो गए हैं कि बातचीत के भी संबंध नहीं बचे. अभी यह बात साफ नहीं है कि केंद्र सरकार ने भाजपा विधायकों की हिफाजत को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से कोई चर्चा की थी या नहीं, या उसने खुद ही यह तय कर लिया कि उसके विधायकों की सुरक्षा केंद्रीय सुरक्षा बल करेंगे। जो भी हो यह नौबत इस नाते खराब है कि आज भी भारत में न्यायपालिका भी है, और राज्यपाल नाम की संस्था भी है जो कि केंद्र सरकार के अधीन काम करती है। पश्चिम बंगाल में राज्यपाल पर्याप्त सक्रिय हैं, ममता के पर्याप्त आलोचक हैं, और वे भाजपा विधायकों के पर्याप्त हमदर्द भी हैं। इन सबके रहते हुए केंद्र सरकार का सुरक्षा का यह एकतरफा फैसला दिल्ली के बंगाल से रिश्तों के खराब होने का एक बिल्कुल ही नया स्तर है, जो कि निराशा की बात है। अब इसके बाद केंद्र और बंगाल की तनातनी, मोदी-शाह और ममता की तनातनी और किस निचले स्तर पर जा सकती है? इसके बाद क्या दिल्ली पश्चिम बंगाल में अपना राजदूत तैनात करेगी?
चलो, कोरोना की चर्चा बहुत हुई, कुछ जात-पात की चर्चा हो जाये
हिंदुस्तान में लोगों की सोच धर्म और जाति के दायरे में कैद रहती है। अधिकतर लोगों से बात करें तो धर्म और जाति के उनके पूर्वाग्रह, उनकी सोच और उनकी बातचीत पर, उनके फैसलों पर हावी रहते हैं। कहीं भी बैठकर लोग बातें करते रहते हैं तो अगर उस भीड़ में मौजूद किसी के हुलिए और उसके नाम से उसके धर्म, या खासकर उसकी जाति, का अंदाज ना लगे तो बहुत से लोग बड़ी असुविधा महसूस करते हैं कि उसे किस जाति का मान कर बात की जाए। और बातचीत इससे भी तय होती है कि वहां मौजूद लोगों में किन जातियों के लोग हैं और किन जातियों के लोग नहीं हैं। इसके अलावा धर्म तो है ही, कि अगर किसी धर्म के लोग मौजूद हैं, तो ही उसके खिलाफ ना बोला जाए और अगर किसी धर्म के लोग नहीं हैं तो उस धर्म की बुराइयां याद करके या गढक़र चर्चा में लाई जाए। ऐसे में अभी एक बड़ा दिलचस्प मामला सामने आया है। पहली पहली नजर में तो ऐसा लगा कि मानो किसी ने कुछ गलत जानकारियां जोड़-घटा कर व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की एक पोस्ट तैयार की है, लेकिन फिर एक-एक नाम को परखा गया तो यह समझ आया कि यह तो बहुत ही दुर्लभ केस मामला है।
हिंदुस्तान में आज जिस वैक्सीन की सबसे अधिक मांग है, और जो सबसे अधिक चर्चा है, उस वैक्सीन को बनाने वाले के नाम की चर्चा तो कुछ अधिक ही हो चुकी है और लोगों को यह मालूम है कि कोवीशील्ड नाम की वैक्सीन बनाने वाली सिरम इंस्टीट्यूट नाम की कंपनी का मालिक एक पारसी नौजवान अदर पूनावाला है। अब इस वैक्सीन के लिए एक खास किस्म के कांच की शीशी भी लगती है और इस शीशी को बनाने वाली कंपनी का मालिक एक और पारसी है, ऋषभ दादाचानजी। पूनावाला भी पारसी और दादाचानजी भी पारसी। अब इसके बाद इन वैक्सीन का ट्रांसपोर्ट करने के लिए जो खास ट्रकें बनाई गई जो कि एक फ्रिज की तरह वैक्सीन को बहुत ही कम टेंपरेचर पर लेकर एक शहर से दूसरे शहर जा सकें वे ट्रकें देश और दुनिया के सबसे मशहूर पारसी, टाटा की बनाई हुई हैं। इन्हें कोल्ड स्टोरेज की तरह का बना कर टाटा ने आनन-फानन देश में उतार दिया। अब यह देखें कि वैक्सीन एक बार पहुंच गईं तो उन्हें कैसे और कहां रखा जाए, तो इसकी तैयारी इस देश में एक और मशहूर पारसी परिवार, गोदरेज की कंपनी गोदरेज अप्लायंसेज के बनाए हुए मेडिकल फ्रीजर वैक्सीन रखने के काम आ रहे हैं। अब बात यहीं पर खत्म नहीं होती है, इन वैक्सीन को सूखी बर्फ के जिन बक्सों में रखा जाता है वे बक्से किसने बनाएं? ये बक्से एक और पारसी फारुख दादाभाई की कंपनी के बनाए हुए हैं। और फिर इन वैक्सीन को कारखाने से लेकर अलग-अलग शहरों तक कौन सी कंपनी मुफ्त में लेकर जा रही है, यह अगर देखें तो गो एयर नाम की कंपनी एक और पारसी की कंपनी है, इसके मालिक वाडिया ने वैक्सीन के मुफ्त ट्रांसपोर्टेशन का काम शुरू किया और जारी रखा है। अब पारसियों में बहुत से लोग अपना नाम मराठी लोगों की तरह शहर के नाम पर रख लेते हैं जैसे अदर पूनावाला। इसी तरह पारसियों में बहुत से लोग अपना नाम अपने पेशे के साथ जोड़ लेते हैं जैसे जरीवाला, बैटरीवाला, बॉटलीवाला, दारूवाला या कोई और काम वाला। पारसियों के सरनेम का मजाक करने वाले, एक सरनेम अपनी कल्पना से बनाकर बीच-बीच में लिखते थे सोडावाटरबॉटलओपनरवाला। लेकिन अगर देखें कि पेशे के हिसाब से सरनेम बनाना है तो अभी जितने सरनेम हमने गिनाए हैं जो कि वैक्सीन बनाने से लेकर पहुंचाने और रखने तक का काम कर रहे हैं, उनकी आने वाली पीढिय़ां अपना सरनेम वैक्सीनवाला भी रख सकती हैं।
यह तो हो गई एक अच्छी बात लेकिन धर्म और जाति को लेकर चर्चा करें तो जरूरी नहीं है कि तमाम चर्चाएं अच्छी बातों के इर्द-गिर्द ही रहें। पिछले दिनों लगातार इस देश में जीवनरक्षक इंजेक्शनों की कालाबाजारी करते हुए लोग गिरफ्तार हुए। दिलचस्प बात यह है कि इस देश में तमाम किस्म के जुर्म करने के लिए जिस जाति को सबसे बदनाम करार देने की कोशिश होती है, उस धर्म या जाति के शायद कोई भी व्यक्ति जिंदगी की इस कालाबाजारी में शामिल नहीं थे, क्योंकि गिरफ्तार होने वाले तमाम लोगों के नाम भी सामने आ रहे थे इसलिए यह बात भी हक्का-बक्का करने वाली थी कि एक सवर्ण कारोबारी जाति के इतने लोग इंजेक्शनों की कालाबाजारी में लगे हुए थे! लेकिन बात यहीं पर नहीं टिकती, जब यह बात निकली कि उत्तर प्रदेश की पुलिस ने एक ऐसे गिरोह को गिरफ्तार किया है जो कि कोरोना मृतकों के शव पर से कपड़े और कफन चोरी करके उनको बाजार में बेचता था, तो उसमें भी ऐसी ही सवर्ण उच्च समझी जाने वाली जातियों के लोगों की भीड़ थी और शायद नमूने के लिए उसमें एक अल्पसंख्यक धर्म का व्यक्ति भी था। इसके बाद देखें तो दिल्ली के जिस खान चाचा नाम के रेस्तरां में सैकड़ों ऑक्सीजन कंसंट्रेटर पकड़ाए, और जिसे खबर में देखते ही देश का एक बड़ा हमलावर तबका खान चाचा की गिरफ्तारी के लिए टूट पड़ा, उसको मुंह की खानी पड़ी, जब पता लगा कि यह नाम केवल रेस्तरां का है, इसका मालिक तो एक पंजाबी है, और पंजाबियों में भी उच्च जाति का माना जाने वाला है, तो फिर खान चाचा नाम को छोड़ देना ही लोगों को ठीक लगा। लेकिन सवाल यह उठता है कि देश भर में जगह-जगह न सिर्फ इंजेक्शनों की कालाबाजारी बल्कि जीवन रक्षक इंजेक्शन नकली तैयार करके उनको बेचने का धंधा जिन लोगों ने किया था उनमें से कोई भी किसी नीची कही जाने वाली जाति के नहीं थे, वे सब के सब ऊंची कही जाने वाली कारोबारी जाति के लोग थे, और गुजरात से लेकर मध्यप्रदेश के इंदौर तक और दिल्ली से लेकर जाने कहां-कहां तक इस कालाबाजारी में लगे हुए थे। नकली इंजेक्शन बनाकर बेचना तो जिंदगी बेचने से कम कुछ नहीं है। अब हैरानी यह है कि जो जातियां अपने आप में बहुत संगठित हैं, जो जातियां अपने आपमें बहुत धर्मालु हैं उन जातियों के लोग जब ऐसे तमाम धंधों में शामिल दिखते हैं, तो फिर वैक्सीन के कारोबार में कदम-कदम पर जुड़े हुए पारसी लोग भी दिखते हैं। दिलचस्प बात यह है कि हिंदुस्तान में पारसियों की कुल आबादी 70 हजार से भी कम है, जिन पर आज 133 करोड़ हिन्दुस्तानियों के टीके टिके हुए हैं!
डबरे के कीचड़ जितना पारदर्शी रखा है केंद्र ने वैक्सीन का मुद्दा, राज्य सरकारें करें तो क्या करें?
देश के बहुत से प्रदेशों में वैक्सीन को लेकर हंगामा चल रहा है कि टीकाकरण केंद्रों पर टीके बचे नहीं हैं और लोग नाराजगी जाहिर करके वापिस जा रहे हैं। अब यह जाहिर है कि उनकी नजरों के सामने केंद्र सरकार तो सीधे-सीधे है नहीं, इसलिए वे राज्य सरकारों को कोस रहे हैं, जो कि खुद पैसे लेकर बाजार में खड़ी हैं लेकिन जिन्हें टीके देने के लिए किसी कंपनी की ताकत, या नीयत नहीं बची है। दूसरी तरफ आज की एक अलग खबर है कि 13 राज्यों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैक्सीन खरीदी के लिए ग्लोबल टेंडर जारी किए हैं. एक अलग खबर यह भी है कि केंद्र सरकार ने यह भरोसा दिलाया है कि इस वर्ष दिसंबर तक हिंदुस्तान की 18 बरस से अधिक की तमाम आबादी को टीके लग चुके होंगे, और केंद्र सरकार ने आंकड़े जारी किए हैं कि अगस्त के महीने तक 50 करोड़ वैक्सीन भारत आ जाएंगी। अब इनसे परे वैक्सीन के मोर्चे पर कुछ और खबरें भी आ रही हैं कि रूसी वैक्सीन जिसे कि भारत में इजाजत मिली है, वह कितने की मिलने वाली है, और दूसरी कौन-कौन सी और वैक्सीन हिंदुस्तान आ सकती हैं, कब तक आ सकती हैं। कल ही राजस्थान के कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का यह बयान सामने आया था कि वैक्सीन की अंतरराष्ट्रीय स्तर की खरीदी का काम केंद्र सरकार को करना चाहिए था। अब जब मोदी सरकार ने यह तय कर ही लिया है कि 18 से 44 वर्ष उम्र के लोगों को टीके लगाने का खर्च राज्य सरकारों को करना है, तो राज्यों ने टीके खरीद कर लगाने भी शुरू कर दिए हैं, तो यह बात साफ है कि राज्य सरकारें अपनी जनता का खर्च खुद उठाने के लिए, चाहे कितनी ही मजबूरी में क्यों ना हो, तैयार हो चुकी हैं क्योंकि केंद्र सरकार ने ना सिर्फ राज्य सरकारों को बल्कि देश की जनता को भी एक ऐसी मँझधार में ले जाकर बिना चप्पू की नाँव में छोड़ दिया है, जहां कि धार में कोरोना का भँवर भी खतरनाक अंदाज में दिख रहा है।
तालाब जब गर्मियों में सूख जाते हैं तो उनके बीच में बच गई थोड़ी सी कीचड़ में बहुत से लोग उतरते हैं और हाथों से कीचड़ को टटोल-टटोलकर वे मछलियां पकडऩे की कोशिश करते हैं। उतने कीचड़ में मछलियां तैर कर भाग भी नहीं पाती हैं और पकडऩे वालों के हाथ आ जाती हैं। लेकिन इस कीचड़ में दिखता कुछ नहीं है, हाथ को हाथ नहीं सूझता, आंखों से तो कुछ भी नहीं दिखता, और जो होता है वह हाथों से टटोलकर होता है। हिंदुस्तान में आज वैक्सीन के मोर्चे पर हालत कुछ ऐसी ही है। केंद्र सरकार ने पूरे देश को रौंदे हुए कीचड़ में हाथों से मिला दिए गए मिट्टी-पानी की तरह का हाल बना दिया है जिसमें किसी को कुछ सूझ नहीं रहा है. राज्य सरकारें बिना कुछ दिखते हुए कीचड़ में हाथ धंसाए हुए वैक्सीन ढूंढ रही हैं कि कुछ मिल जाए तो अपने प्रदेश की जनता को लगा दिया जाए।
मीडिया के बहुत से लोग वैक्सीन के मोर्चे पर अंतहीन कतारों में लगे हुए लोगों की नाराजगी दिखा रहे हैं। यह नाराजगी जायज इसलिए है कि हर किसी के सिर पर कोरोना से मौत का खतरा मंडरा रहा है और लोगों को बेचैनी है कि उन्हें वैक्सीन कब लगेगी। लेकिन सवाल यह है कि हिंदुस्तान की राज्य सरकारें किसी सुपर बाजार में जाकर यह वैक्सीन नहीं खरीद सकतीं और न ही अमेजॉन जैसे किसी ऑनलाइन स्टोर पर इसे आर्डर कर सकती हैं। कुछ राज्यों ने और दर्जन भर से अधिक राज्यों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैक्सीन की खरीदी के लिए प्रक्रिया शुरू की है लेकिन वह कब कहां से कितने में मिलकर लोगों को लगना शुरू हो पाएगी यह अंदाज लगाना भी बड़ा मुश्किल है। दूसरी तरफ जब बाकी के राज्य इस तरह से विदेशों से वैक्सीन खरीदी की दौड़ में लगते, उसके पहले आज केंद्र सरकार के आज कहे गए आंकड़े यह बता रहे हैं कि अगस्त तक उसकी आर्डर की हुई 50 करोड़ वैक्सीन आ जाएंगी और दिसंबर तक पूरे देश की वयस्क आबादी को वैक्सीन लग जाएगी। उसने 95 करोड़ आबादी के लिए 216 करोड़ टीके खरीदने की अपनी तैयारी आज बताई है। केंद्र सरकार की पेश की गयी इस नई जानकारी के बाद राज्य सरकारें क्या करें? अगर वे महंगे दामों पर कहीं से वैक्सीन खरीद लें तो उन्हें इस तोहमत के लिए तैयार रहना होगा कि केंद्र सरकार की इस घोषणा के बाद भी उन्होंने इतनी वैक्सीन क्यों खरीदी? और भारत के दो वैक्सीन निर्माता कंपनियों में से एक ने आज यहां कहा है कि वह दूसरी दवा कंपनियों के साथ इस वैक्सीन का फार्मूला बांटने के लिए तैयार है ताकि वे भी इसे बना सकें। तो ऐसे में राज्य सरकारें क्या समझें ? जिस कंपनी ने यह घोषणा की है उसने यह वैक्सीन भारत सरकार के संगठन आईसीएमआर की मदद से विकसित की थी और जाहिर है कि सरकार की खर्च में भागीदारी थी और सरकार का इस पर कोई हक भी है। लेकिन यह सब केंद्र सरकार के रहस्य की बातें हैं जिस पर केंद्र सरकार आसमान से बिजली की तरह कडक़ कर अपनी बात कहती है लेकिन जिससे किसी राज्य को कुछ पूछने का हक हासिल नहीं है।
कुल मिलाकर पिछले 1 महीने में वैक्सीन को लेकर इस देश में जो धुंध छाई है वैसे तो सर्दियों में भी प्रदूषित दिल्ली में नहीं छाती। अब अपने-अपने प्रदेशों में जनता की नाराजगी झेलती हुई राज्य सरकारें क्या करें? केंद्र सरकार से वैक्सीन मांगने का कोई असर नहीं है, केंद्र सरकार को इंपोर्ट करने के लिए कहने का कोई हक नहीं है, और देश के भीतर कब और कंपनियां बनाने लगेंगी, किस रफ्तार से वैक्सीन मिलेगी, इसका कोई ठिकाना नहीं है. ऐसे में हजारों करोड़ खर्च के इस काम को राज्य सरकारें किस तरह आगे बढ़ाएं यह एक बहुत दुविधा का फैसला है। आज देश की जनता अपने को टीका लगने को लेकर जिस तरह अंधेरे में हैं, उसी तरह राज्य सरकारें भी अंधेरे में हैं कि केंद्र से क्या मिलेगा, बाजार से क्या मिलेगा. केंद्र जो घरेलू खरीद या इंपोर्ट करने की बात कह रहा है, क्या वह उसे राज्यों को बेचेगा या मुफ्त में मिलेगा? बारिश आने के पहले सूखते हुए तालाब, या डबरे में बच गए कीचड़ में मछली पकड़ते हुए लोगों की भीड़ जिस तरह मिट्टी और पानी को मता देती है, कुछ वैसा ही हाल आज देश में टीकाकरण को लेकर केंद्र सरकार ने कर रखा है। कीचड़ जितनी पारदर्शिता !
छवि बचाना छोडक़र जिंदगी बचाने में लगें प्रधानमंत्री मोदी
फ्रांस की एक विख्यात कार्टून और व्यंग्य की पत्रिका है चार्ली एब्दो, जिसने दुनिया के मुस्लिमों को नाराज करते हुए मोहम्मद पर कुछ कार्टून बनाए थे, और वह मामला बढ़ते -बढ़ते इतना बढ़ गया था कि फ्रांस में उस पत्रिका के दफ्तर पर आतंकी हमला हुआ और शायद दर्जन भर से अधिक लोग मारे गए थे। लेकिन उस वक्त फ्रांस की सरकार और इस पत्रिका के लोग इस बात पर डटे रहे कि वे अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को किसी आतंक के सामने कमजोर नहीं होने देंगे। हालत यह है कि उन्हीं कार्टूनों को लेकर अभी कुछ हफ्ते पहले पाकिस्तान से फ्रांस के राजदूत को निकाल देना के बारे में एक प्रस्ताव पाकिस्तान की संसद में लाया गया, और इस तनाव के पीछे भी चार्ली एब्दो के वे कार्टून ही थे। उस वक्त हिंदुस्तान सहित दुनिया के मुस्लिम विरोधी लोगों ने खूब जश्न मनाया था और इस पत्रिका की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हिमायत की थी। हिंदुस्तान में तो कई लोगों के बीच इस पत्रिका के लिए हमदर्दी देखकर लग रहा था कि वे बिना फ्रेंच सीखे भी इसे खरीदना शुरू कर देंग। आज उस पत्रिका का एक कार्टून सामने आया है जिसमें हिंदुस्तान में ऑक्सीजन की कमी से मरते हिंदुस्तानी दिख रहे हैं और यह सवाल किया गया है कि जिस देश में 33 करोड़ देवी देवता हैं क्या उनमें से एक भी ऑक्सीजन पैदा करने की ताकत नहीं रखते? कार्टूनिस्ट ने 33 करोड़ की जगह 33 मिलियन लिख दिया है लेकिन उससे मुद्दे की बात पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
इन दिनों हिंदुस्तान में कार्टूनिस्टों से लेकर कॉमेडियन तक केंद्र सरकार पर जिस तरह से बोल रहे हैं उससे लगता है कि लोगों की धडक़ थोड़ी खुल रही है। कुछ एक टीवी चैनल अपनी बहसों में सत्तारूढ़ गठबंधन के प्रवक्ताओं से कुछ सवाल करने का हौसला सा कुछ दिखा रहे हैं, और लोगों को यह समझ नहीं आ रहा है कि यह सचमुच वापिस आया हुआ हौसले का कोई टुकड़ा है या कि सरकार अपनी साख खत्म हो जाने के बाद कम से कम उस मीडिया की साख बचने देना चाहती है, जो मीडिया आगे चलकर सरकार की साख बचाने का असर बचाकर रख सके। सोशल मीडिया की मेहरबानी से देश के चर्चित और गिने-चुने राजनीतिक विश्लेषकों की बंधी-बंधाई सोच और राय तक सीमित नहीं रहना पड़ता और बहुत से नए नए लोग बिल्कुल ताजा तर्कों के साथ सोशल मीडिया पर नई राय सामने रखते हैं। जो कार्टूनिस्ट कहीं नहीं भी छपते हैं, वे भी दमदार काम करके सोशल मीडिया पर इन दिनों पोस्ट कर रहे हैं। ऐसे में जब एक घनघोर और कट्टर मोदीभक्त फिल्म कलाकार अनुपम खेर मोदी सरकार को देश की आज की नाकामी के लिए जिम्मेदार मानते हुए उससे सवाल करने को जायज मान रहे हैं, तो इससे उन्हीं का एक पुराना टीवी कार्यक्रम याद पड़ता है जिसमें वह बार-बार कहते हैं कि कुछ भी हो सकता है, कार्यक्रम का नाम भी शायद वही था। ऐसा लगता है कि वह ‘कुछ भी’ अभी हो गया है, क्योंकि अभी एक पखवाड़ा ही हुआ है जब एक पत्रकार शेखर गुप्ता के एक ट्वीट के जवाब में देश में गिरती लाशों की चर्चा में अनुपम खेर ने बेमौके की बेतुकी बात ट्विटर पर पोस्ट की थी कि जीतेगा तो मोदी ही। खैर उसके लिए सोशल मीडिया पर उन्हें इतनी धिक्कार मिली कि उन्होंने उसकी कल्पना भी नहीं की होगी। और जो लोग सोशल मीडिया पर हर नौबत में जीतेगा तो मोदी ही पोस्ट करने के लिए रखे गए हैं, वे लोग भी अनुपम खेर के कुछ काम नहीं आ सके थे। ऐसे में आज जब अनुपम खेर कड़े शब्दों में मोदी सरकार की आलोचना कर रहे हैं, और उसे जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, तो इस सरकार के लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि ऐसा समर्पित कार्यकर्ता भी आज साथ नहीं रह गया है।
दरअसल हिंदुस्तान में पिछले वर्षों में मोदी सरकार ने विपक्ष को सुनना, आलोचकों को सुनना, और मीडिया के जिम्मेदार तबके को सुनना, जिस हद तक बंद और खत्म कर दिया था, वही वजह थी कि देश में नौबत बिगड़ती चली गई, और सरकार के लोगों ने यह मान लिया था कि आलोचना का तेवर रखने वाले विपक्षी नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, मीडिया या दूसरे लेखक कलाकारों की कोई बात तो सुनना ही नहीं है, क्योंकि ये सारे ही लोग टुकड़ा-टुकड़ा गैंग हैं और देश के दुश्मन हैं, गद्दार हैं, पाकिस्तान भेज दिए जाने के लायक हैं। जब आप देश के इतने बड़े सोचने-विचारने वाले, जिम्मेदार, देशभक्त, और समाज में समरसता चाहने वाले तबके को गद्दार कहकर खारिज कर देते हैं और उसकी किसी भी बात को नहीं सुनते हैं, तो आपके सिर पर आसमान से जब बिजली गिरते रहती है तो भी इस तबके की कही गई सावधानी सुनाई नहीं पड़ती है।
दरअसल लोकतंत्र में तमाम लोगों को सुनना बंद कर देना अच्छी बात इसलिए नहीं है कि अगर संसदीय बाहुबल ऐसा करने की छूट भी देता है तो भी सरकार सबको अनसुना करके सिवाय गलतियां करने और सिवाय गड्ढे में गिरने के और कुछ नहीं कर पाती। इसी सरकार की यह बात नहीं है जो भी ऐसी सरकार हो जो कि आलोचना को बिल्कुल भी बर्दाश्त ना कर सके, वह अपनी मनमानी ताकत से मनमाने काम जरूर कर सकती है, लेकिन न मुसीबत से बच सकती है और न किसी खतरे से। भारत में आज नौबत यही है।
आज यही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि हिंदुस्तान में कोरोना के इस दूसरी लहर के पीछे इस देश में राजनीतिक और धार्मिक जमघट भी जिम्मेदार हैं जिनमें लोगों को बड़ी संख्या में संक्रमण फैला। अब देश का एक तबका ऐसा है जो कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की राय को भी एक विदेशी, भारत विरोधी संगठन करार देते हुए खारिज कर सकता है, लेकिन यह वही तबका होगा जो कल तक मोहम्मद पर बनाए गए कार्टूनों पर खुशी मना रहा था, और आज 33 करोड़ हिंदू देवी देवताओं की नाकामी पर बनाए गए इस कार्टून पर जिसके पास कहने को कुछ नहीं है। आज हम किसी एक मुद्दे पर बात नहीं कर रहे हैं बल्कि देश और दुनिया के अलग-अलग तबकों की कही हुई बातों को सुनने की सरकार की लोकतांत्रिक जिम्मेदारी पर बात करना चाहते हैं कि कितने भी बहुमत से चुनकर आई हुई कोई सरकार, लोगों के बहुत बड़े तबके की बातों को पूरी तरह अनसुना करके कहीं से लोकतांत्रिक काम नहीं कर सकती। उसे मनमाना सरकारी काम करने का जनादेश तो चुनाव में मिला है, लेकिन कोई चुनावी-जनादेश सरकार को लोकतंत्र के प्रति, जनता के प्रति, जवाबदेही खत्म करने का कोई अधिकार नहीं देता है। आज हिंदुस्तान में केंद्र सरकार को यह आत्ममंथन करना चाहिए कि आज जब उसके खुद के अनुपम खेर किस्म के घरेलू लोग हालात को इतना नकारात्मक बता रहे हैं, तो अब इस हालात को सकारात्मक दिखने की और कोशिश करना ठीक नहीं होगा। हम अनुपम खेर के शब्दों को ही दोहराना चाहेंगे जिसमें उन्होंने कहा है, सरकार के लिए अपनी छवि बचाने से ज्यादा जरूरी लोगों की जान बचाना होना चाहिए, उन्होंने कहा है कि इमेज बनाने के अलावा जिंदगी में और भी बहुत कुछ है, उन्होंने यह भी कहा है कि जिस काम के लिए चुना गया है वही काम करे सरकार। हम इन तीनों बातों को देश के तीन प्रमुख अखबारों की सुर्खियों से लेकर यहां लिख रहे हैं, भीतर की खबर में उन्होंने बहुत कुछ और कहा है, और क्योंकि यह एक टीवी इंटरव्यू में कहा है इसलिए इससे मुकरने का कोई खतरा हमें नहीं दिखता। अनुपम खेर की बात को सुनकर इस सरकार को अब वही करना चाहिए जो किसी एक घरेलू शुभचिंतक की कही हुई बात पर करना चाहिए। हमारे कम लिखे को सरकार अधिक पढ़े, और अनुपम खेर की कही बातों को बार-बार पढ़े।
यह वक्त दूसरों की मदद का है अपने-आप में सिमटने का नहीं
दुनिया के विकसित देशों के कुछ वीडियो बीच-बीच में सोशल मीडिया पर चलते हैं जिनमें किसी रेस्तरां, फूड कॉर्नर, कॉफी शॉप में लोग जाते हैं, काउंटर पर भुगतान करते हैं और कहते हैं, दो कॉफी, एक सस्पेंडेड। ऐसे वीडियो बतलाते हैं कि कुछ देर बाद कोई गरीब, बेघर या जरूरतमंद दिखते हुए लोग वहां पहुंचते हैं, और काउंटर पर पूछते हैं कि क्या कोई सस्पेंडेड कॉफी है ? और काउंटर से उन्हें या तो कुछ देर इंतजार करने कहा जाता है, या तुरंत उन्हें कॉफी या कोई दूसरा नाश्ता दिया जाता है। यह पूरा सिलसिला बड़ा दिलचस्प है और यह यूरोप के कुछ देशों से शुरू हुआ है। वहां पर कई लोग जब खाने पीने का सामान लेने जाते हैं तो जरूरतमंदों की मदद करने के लिए अपने खरीदे सामान से अधिक का भुगतान करके आते हैं, और वहां आर्डर देते समय ही बता देते हैं कि कितना सामान उन्हें ले जाना है और कितने सस्पेंडेड सामान का भी भुगतान करके जा रहे हैं। इन रेस्त्रां के कारोबारी भी ऐसी समाजसेवा को बढ़ावा देते हैं क्योंकि इससे उनकी खुद की एक सामाजिक जिम्मेदारी पूरी होती है, वे गरीब जरूरतमंद की मदद में एक जरिया बन जाते हैं और फिर उनका खुद का कारोबार तो इससे बढ़ता ही है। लेकिन यह वीडियो सिर्फ पश्चिमी देशों का हो ऐसा भी नहीं है। हिंदुस्तान में ही मुंबई में मुस्लिम बस्तियों में निकलें तो फुटपाथ पर रेस्तरां के सामने बहुत से गरीब लोग एक कतार में एक उकडू बैठे हुए दिखते हैं। इन्हें रेस्तरां के काउंटर पर बैठा आदमी गिनती बताकर बुलाता है और भीतर बिठाकर खिलाता है। इस बारे में पता लगता है कि कोई रहमदिल दानदाता अपनी मर्जी की गिनती के लोगों के लायक खाने के पैसे जमा कर जाते हैं, और फिर रेस्त्रां मालिक किस्तों में ऐसे लोगों को बुलाकर, बिठाकर खिला देते हैं।
लोगों की मदद करने के बहुत से तरीके होते हैं, हिंदुस्तान में बहुत बड़े हिस्से में यह भी प्रचलन में हैं कि खाना बनना शुरू हो तो पहली रोटी गाय की बनती है और आखिरी रोटी कुत्ते की। इसके बाद ऐसा भी कहा जाता है कि कामयाब रसोई वही होती है जिसमें घर के लोगों के खाने के बाद भी अचानक आ गए मेहमान, या भूखे के लायक भी खाने के लिए बचा रहना चाहिए। बहुत से लोग अभी लॉकडाउन के बीच में अपने दुपहिए पर या अपनी कार में जानवरों के खाने की तरह-तरह की चीजें लेकर निकलते हैं, कहीं गाय-कुत्ते को रोटी डालते हैं, तो कहीं किसी और जानवर को किसी तरह की सब्जी खिलाते हैं। ऐसा इसलिए भी कर रहे हैं कि इन दिनों सभी तरह के होटल, ढाबे, रेस्तरां बंद हैं और वहां से इन जानवरों को खाने जो मिल जाता था वह अभी बंद हो चुका है। इसलिए लोग जरूरतमंदों की मदद के बहुत से तरीके सोचते हैं और काम करते हैं।
आज कोरोना की बीमारी के इस खतरे के बीच भी बहुत से ऐसे सामाजिक संगठन है जो बीमारों को अस्पताल पहुंचाने से लेकर अस्पताल से लाश घर पहुंचाने तक के काम में जुटे हुए हैं, और अगर किसी के पास भुगतान करने की ताकत है तो वह भुगतान कर दें, और ताकत नहीं है तो उसे मुफ्त भी पहुंचा कर आते हैं। कल ही सोशल मीडिया पर एक ऐसे डॉक्टर की तस्वीर आई है जिसकी बीपी की मशीन और स्टेथोस्कोप टेबल पर है, और उसने नोटिस लगा रखा है कि जब तक लॉकडाउन चल रहा है, दवा के दाम अपने हिसाब से दें। मतलब यही है कि जिसके पास भुगतान की ताकत नहीं है, वह भुगतान न करें। बहुत से शहरों में मामूली ऑटो रिक्शा वाले ऐसा ही कर रहे हैं और उन्होंने नोटिस लगा रखा है कि मरीज को अस्पताल ले जाने का कोई किराया नहीं लिया जाएगा। कुछ ऑटो रिक्शा महिलाओं से किराया नहीं ले रहे हैं, कुछ बुजुर्गों से किराया नहीं ले रहे हैं। यह पूरा सिलसिला बताता है कि बहुत आम लोगों के मन में भी दूसरों के लिए बहुत कुछ करने का जज्बा है। और जाहिर है कि बहुत से ताकतवर लोग ऐसे हैं जो कि कुछ भी नहीं कर रहे हैं या इतना कर रहे हैं जो कि उनकी छोटी उंगली के कटे हुए नाखून से भी कम है। अभी एक भरोसेमंद खबर आई थी कि किस तरह देश के एक कारोबारी अजीम प्रेमजी ने पिछले एक बरस में करीब 8 हजार करोड़ रुपए का दान दिया है, यानी हर दिन 22 करोड़ ! यह रकम छोटी नहीं होती है, खासकर तब जब इसे मुकेश अंबानी के 100 करोड़ के दान के साथ रखकर देखा जाए। यह वक्त ऐसा है जिसमें बहुत अनपढ़ और मजदूर सरीखे काम करने वाले दानदाता भी अपनी आज की बदहाली के बीच भी किसी के काम आ रहे हैं, और जिनके पास दौलत के पहाड़ हैं वे किस तरह उसमें से पत्थर का एक छोटा सा टुकड़ा उठाकर दुनिया पर एहसान करने के अंदाज में दे रहे हैं।
आज यहां पर इस मुद्दे पर लिखने का एक मकसद यह भी है कि लोगों को अपने-अपने दायरे के भीतर भी दूसरों की मदद के बारे में सोचना चाहिए। और इसकी शुरुआत लोगों को अपने खुद के दायरे से करनी चाहिए कि उनके साथ में काम करने वाले जिन लोगों को उन्हें लॉकडाउन के कारण या बीमारी के डर के कारण, या सचमुच बीमार हो जाने पर छुट्टी देनी पड़ी है, उन्हें वह कम से कम पूरी तनख्वाह तो दे सकते हैं। आज लोगों को अपने निजी काम करने वाले घरेलू कर्मचारियों की तनख्वाह काटने के पहले यह भी सोचना चाहिए कि वे किस तरह जी सकेंगे? अगर उन्होंने खुद होकर छुट्टी नहीं ली है और लॉक डाउन की वजह से वे काम पर नहीं आ सके हैं, या मालिक के घर पर किसी के कोरोनाग्रस्त होने से उन्हें रोका गया या उनके खुद के घर पर किसी के कोरोनाग्रस्त होने से उन्होंने काम पर आना बेहतर नहीं समझा, तो ऐसे में उन्हें तो जिंदा रहने के लिए मदद करना हर सक्षम व्यक्ति की जिम्मेदारी होनी चाहिए। जब इस दायरे में जिम्मेदारी लोग निभा लें, तो उसके बाद उन्हें दूर के लोगों के बारे में भी सोचना चाहिए कि वह किसके लिए क्या कर सकते हैं. बहुत से घरों में बीमारी के दौरान बहुत से ऐसे मेडिकल सामान इकट्ठा हो जाते हैं जो बात में काम के नहीं रहते, ऐसे वक्त पर किसी सामाजिक संस्था के माध्यम से उन्हें जरूरतमंद लोगों तक तुरंत पहुंचा देना चाहिए। आज हजार-पांच सौ का ऑक्सीमीटर लेना हर किसी के बस की बात नहीं है, और हर कोई तो थर्मामीटर भी नहीं ले पाते। इसलिए आज खाने-पीने के सामान से लेकर दवा और मेडिकल उपकरण तक, अस्पताल पहुंचाने या अंतिम संस्कार में मदद तक, कई किस्म से आप लोगों के काम आ सकते हैं। लोगों को न केवल खुद ऐसा करना चाहिए बल्कि आसपास के दूसरे लोगों को भी मददगार बनने की प्रेरणा देना चाहिए। आज की यह बहुत बड़ी जरूरत है और अगले साल-दो साल तक बीमारी और बेरोजगारी से देश और दुनिया का जो हाल रहना है उसमें यह जरूरत बने रहेगी, लोगों को दूसरों के काम आना सीखना चाहिए।
हर्षवर्धन हैं ही ऐसे या फिर मसखरी की कोई लिखी हुई स्क्रिप्ट पढ़ रहे हैं?
इन दिनों हिंदुस्तान में पार्टियों को चुनाव लडऩे के लिए दूसरे देशों में जाकर प्रचार करना भी समझ आने लगा है। कर्नाटक के चुनाव के वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नेपाल के मंदिरों का दिनभर दौरा करके भारत के चुनाव आयोग के शिकंजे से बाहर भी थे, और हिंदुस्तान के हर टीवी चैनल पर भी दिनभर छाए हुए थे। अभी जब बंगाल में चुनाव चल रहा था तो मतदान के वक्त नरेंद्र मोदी बांग्लादेश के मंदिरों में घूम रहे थे और चुनाव आयोग का कोई शिकंजा उन पर नहीं था। नरेंद्र मोदी ने ही यह सिलसिला शुरू किया कि देश के बाहर बसे हुए प्रवासी भारतीयों के बीच चुनाव प्रचार या चंदा अभियान के लिए अमेरिका तक जाकर विशाल कार्यक्रम करना। जब देश में प्रशांत किशोर जैसे पेशेवर चुनावी रणनीतिकार लोकतांत्रिक चुनाव मैनेज करते हैं, और ममता बनर्जी को इतनी बड़ी जीत दिलाने में मददगार रहते हैं, पता नहीं चुनाव में क्या-क्या तरीके आजमाए जाने लगे हैं । ऐसे में चुनावों के बीच में भी कई किस्म के तरीकों का इस्तेमाल दिखता है, जो दिखता तो है लेकिन समझ में आसानी से नहीं आता है।
अब जब कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आलोचनाओं से कुछ अधिक घिरते दिखते हैं तो अचानक केंद्र सरकार के कोई मंत्री कोई ऐसा बयान जारी करते हैं कि हल्के-फुल्के मीडिया का खासा वक्त उसी की आलोचना में निकल जाए या उसकी चर्चा में निकल जाए। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन जो कि आज हिंदुस्तान पर छाए हुए सबसे बड़े खतरे और हिंदुस्तान को सबसे बड़ा नुकसान पहुंचा रहे कोरोना से जूझने के लिए अकेले जिम्मेदार मंत्री रहने चाहिए, आए दिन मसखरी की बातें करके खबरों को अपनी तरफ खींचते हैं, और कोरोना के असली खतरे की तरफ से, सरकार की असली नाकामयाबी की तरफ से ध्यान बंटवा लेते हैं। पिछली बार उन्होंने लॉकडाउन और कोरोना के बीच मटर छीलते हुए अपनी तस्वीर पोस्ट की थी, और तबसे लेकर अब तक बीमारी और बचाव को लेकर बहुत ऐसे गैरगंभीर बयान दिए हैं जिससे वह तो खबरों में बने रहे और लोगों का गुस्सा भी ऐसे स्वास्थ्य मंत्री पर निकलते रहा। कुछ ही हफ्ते हुए हैं कि उन्होंने देश के सबसे घाघ कारोबारी रामदेव के फज़ऱ्ी मेडिकल दावों के साथ लांच की गई फज़ऱ्ी दवाओं को सर्टिफिकेट देते हुए मंच से उनका प्रचार किया था। लेकिन क्या वह अनायास ऐसा करते हैं या यह किसी प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकार की सोची हुई हरकत रहती है कि प्रधानमंत्री को आलोचना से बचाने के लिए दूसरे लोगों को आलोचना के घेरे में लाया जाए और खबरों को उस तरफ मोड़ा जाए?
अभी इसी स्वास्थ्यमंत्री हर्षवर्धन का ताजा बयान है कि कोरोना संबंधित तनाव दूर करने के लिए लोगों को 70 फ़ीसदी कोको कंटेंट वाली डार्क चॉकलेट खाना चाहिए। आज जहां इस देश में लोगों के रोजगार छिन गए हैं, लोग बिना तनख्वाह, बिना मजदूरी घर पर बैठने को मजबूर हैं, जहां केंद्र और राज्य सरकार के दिए हुए बहुत सस्ते या मुफ्त अनाज की वजह से लोग भूखे मरने से बच रहे हैं, वैसे में इस देश का स्वास्थ्य मंत्री लोगों को डार्क चॉकलेट खाने के लिए कह रहा है, ताकि वे कोरोना के तनाव से बच जाएँ! इस देश की 90 फ़ीसदी आबादी ऐसी महंगी चीज खरीदने की ताकत से परे है, और इस देश की 99 फ़ीसदी आबादी ने कभी डार्क चॉकलेट का नाम भी नहीं सुना होगा। यह कुछ उसी किस्म की बात है कि लोगों को प्रदूषण से बचने के लिए घरों को एसी करवा लेने और महंगे एयर क्लीनर लगवा लेने, और एयरकंडीशंड कार में चलने की नसीहत दे दी जाए। कई बार यह भी लगता है कि क्या कोई केंद्रीय मंत्री सचमुच इतना बेवकूफ हो सकता है कि वह ऐसी संवेदनाशून्य बातें करे? या फिर उसे बेवकूफी की ऐसी स्क्रिप्ट तैयार करके दी जाती है कि लोगों का ध्यान उसी की तरफ चले जाए? यह समझ पाना हमारे लिए नामुमकिन है क्योंकि इन दिनों जिस तरह से कोई राजनीतिक दल लाखों लोगों को सोशल मीडिया पर अपने भाड़े के मजदूरों की तरह इस्तेमाल कर सकता है, कर रहा है, वैसी बातें 10 बरस पहले तक किसने सोची थीं ? इसलिए आज जब देश के मीडिया का अधिकतर हिस्सा सत्ता का गोदी मीडिया होने का सार्वजनिक का तमगा पाकर भी उस कामयाबी पर खुश है, गौरवान्वित है, तब फिर ऐसे मीडिया की मदद से किसी गढे हुए बयान को इस्तेमाल करके आलोचनाओं को दूसरी तरफ मोडऩा एक सोचा-समझा काम भी हो सकता है?
आज हम महज इसी एक मुद्दे पर शायद नहीं लिखते, लेकिन बिहार से एक दूसरा मामला सामने आया है जिसमें वहां के भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूडी खबरों के घेरे में हैं कि किस तरह उन्होंने अपनी सांसद निधि से खरीदी हुई दर्जनों एंबुलेंस बिना ड्राइवरों के खड़ी रखी हैं। बिहार के ही एक दूसरे बाहुबली यादव नेता पप्पू यादव ने इस मुद्दे को जोरों से उठाया, और आज बिहार सरकार ने कोरोना मरीजों के लिए दौड़-दौडक़र घूम-घूमकर काम करते हुए पप्पू यादव को गिरफ्तार कर लिया कि वे लॉकडाउन के नियम तोड़ रहे हैं। अब बिहार के कुछ लोगों का यह मानना है कि नीतीश कुमार ने ऐसा करके एक तरफ तो राज्य के सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए के एक भाजपाई नेता राजीव प्रताप रूडी को परेशानी में डाल दिया है क्योंकि पप्पू यादव का मामला जितना उठेगा उतना ही रूडी का निकम्मापन दिखेगा। दूसरी तरफ लालू यादव के जेल से बाहर आते ही उन्हें हीरो की तरह खड़े होने का मौका न देकर एक दूसरे यादव को गिरफ्तार करके उसे हीरो बनाया जा रहा है तो क्या यह भी नीतीश कुमार की एक और चाल है ? और क्या वे एक तीर से दो निशाने साध रहे हैं? बिहार के कुछ पत्रकारों ने इस किस्म की अटकल लिखी है जिसका कोई सुबूत तो हो नहीं सकता है लेकिन राजनीतिक अटकलें तो ऐसी ही लगती हैं। अब अगर नीतीश के इस काम को देखें जो कि जाहिर तौर पर अटपटा लग रहा है कि लॉकडाउन में रात-दिन लोगों की मदद करते पप्पू यादव को गिरफ्तार किया गया है, और दूसरी तरफ हर्षवर्धन इस बीमार देश की बेरोजगार और गरीब जनता को देश की सबसे महंगी आयातित डार्क चॉकलेट खाने का सुझाव देने की मसखरी कर रहे हैं । अब इसे क्या कहा जाए क्या नेता सचमुच इतने बेवकूफ हो सकते हैं कि घर में चावल ना हो तो बादाम खाकर पेट भरने की सलाह दे दे? यह देश की जनता पर भी है कि वह सोचे कि आज के हालात के जिम्मेदार कौन लोग हैं, कटघरे में किसे होना चाहिए, और उनकी तरफ नजरें ना जाएं इसलिए कुछ दूसरे लोग फुटपाथ पर खड़े होकर मदारी की तरह हरकतें कर रहे हैं, तिलिस्मी ताबीज बेचने जैसी हरकतें कर रहे हैं। यह सिलसिला मासूम लगता तो नहीं है, आगे प्रशांत किशोर जैसे किसी पेशेवर को हकीकत मालूम होगी।











