दीवारों पर लिक्खा है, 31 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

एक मुसलमान आतंकी का मस्जिद पर हमला, 83 मौतें, और इससे निकले सबक...

31 जनवरी 2023


पाकिस्तान के पेशावर में एक मस्जिद पर कल आत्मघाती हमला हुआ, और हमलावर ने अपनी विस्फोटक जैकेट के धमाके से मस्जिद की इमारत का एक हिस्सा भी गिरा दिया, और 83 लोगों की मौत की खबर है। पुलिस लाईन की इस मस्जिद में दोपहर को नमाज पढऩे इक_ा हुए अधिकतर लोग पुलिस के थे, और मारे जाने वाले लोग भी वही हैं। यह इलाका पेशावर का सबसे अधिक हिफाजत वाला इलाका माना जाता है। वहां के धार्मिक-आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है। पाकिस्तान का यह संगठन पड़ोस के अफगानिस्तान के तालिबानियों के साथ तालमेल से काम करता है, और अफगान सरकार से पाकिस्तान की कुछ सरहदी मुद्दों को लेकर तनातनी भी चल रही है। टीटीपी नाम का यह संगठन पाकिस्तान में अधिक कट्टर इस्लामी कानूनों को लागू करने के लिए हथियारबंद आंदोलन चलाता है। 

पाकिस्तान लगातार धार्मिक कट्टरता वाले आतंकी हमलों का शिकार होते रहता है। हर बरस ऐसे कई बड़े हमले होते हैं जिनमें सैकड़ों लोग मारे जाते हैं। दो-चार मौतों की तो खबर भी मुल्क से बाहर नहीं जाती। यह पाकिस्तान अभी पौन सदी पहले तक आज के हिन्दुस्तान का एक हिस्सा था, और अंग्रेजों ने जाते-जाते इसे दो मुल्कों में बांट दिया था। तब से लेकर अब तक पाकिस्तान धर्म के आधार पर चलने वाला एक देश रहा, और आतंकी हमलों से परे भी पाकिस्तान की आम जिंदगी में धार्मिक कट्टरता हर दिन अपना दखल रखती है। वहां पर न सिर्फ गैरमुस्लिम लोग, बल्कि मुस्लिम समुदाय के भीतर के कुछ ऐसे सम्प्रदायों के लोग जो कि कट्टर इस्लामियों को पसंद नहीं आते हैं, वे भी आए दिन मारे जाते हैं। यह तो बात हुई मौतों के आंकड़ों की, लेकिन इससे परे भी रोजाना की सामाजिक जिंदगी में धार्मिक कट्टरता हिंसा पैदा करती ही रहती है। आए दिन वहां से खबरें आती हैं कि किसी ईसाई को मारा गया, तो किसी हिन्दू लडक़ी का अपहरण करके उसे मुस्लिम बनाकर उससे शादी कर ली गई। 

यह धर्म का एक आम मिजाज है कि वह कट्टरता की तरफ बढ़ते ही चलता है। जिस तरह किसी धार्मिक कार्यक्रम या धर्मस्थल के लाउडस्पीकर लगातार तेज होते जाते हैं, क्योंकि उनके आम हल्ले से लोगों पर असर होना बंद सा होने लगता है, इसलिए वे अधिक तेज होकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहना चाहते हैं। पाकिस्तान में इस धार्मिक कट्टरता ने पहले तो देश में सभी धर्मों की बराबरी खत्म की, बहुसंख्यक धर्म ने देश पर अपना एकाधिकार जमाया, आसपास के देशों में भी बढ़ती चली गई धार्मिक कट्टरता का असर हुआ, और पड़ोस के हिन्दुस्तान की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी के खिलाफ पाकिस्तान में जैसे मजहबी फतवे तैरते रहे, उनसे भी वहां की जनता का दिमाग हिन्दू विरोधी होते गया, और नतीजतन वह मुस्लिम कट्टरपंथी भी होते गया। 

यह कहानी सिर्फ पाकिस्तान की नहीं है, दूसरी जगहों पर भी धार्मिक कट्टरता और हिंसा साथ-साथ आगे बढ़ते हैं। हिन्दुस्तान में आज हिन्दू बहुसंख्यक हैं, और वे एक साम्प्रदायिक सोच की आग में झोंक भी दिए जा रहे हैं। उन्हें एक रंग को हिन्दू रंग मान लेने और देश में साम्प्रदायिक नफरत फैलाने के फिजूल के काम में झोंक दिया गया। फिर बाद में लोगों ने सैकड़ों वीडियो निकालकर याद दिलाया कि एक हिन्दू अभिनेत्री ने अपने हिन्दू बदन पर जो भगवा-केसरिया बिकिनी पहनी थी, वैसी भगवा-केसरिया बिकिनी और दूसरे उत्तेजक कपड़े पहनी हुई अभिनेत्रियों के साथ निहायत ही फूहड़ और अश्लील डांस करते हुए भाजपा के बड़े-बड़े सांसद फिल्में करते आए हैं। बेशरम रंग का यह मुद्दा छेडऩा खुद भाजपा को भारी पड़ा क्योंकि उसके अपने लोगों के इसी बेशरम रंग के भुलाए जा चुके सैकड़ों वीडियो फिर ताजा हो गए, लोगों को समझ आ गया कि धार्मिक रंग के नाम पर एक फिजूल की नफरत फैलाई जा रही थी, और एक मुस्लिम अभिनेता शाहरूख खान की पठान नाम की फिल्म हिन्दुस्तान के हिन्दू बहुसंख्यक दर्शकों के बीच इतिहास की सबसे बड़ी हिट भी हो गई। पाकिस्तान को देखकर भी हिन्दुस्तान में धर्मान्धता फैलाने पर आमादा लोगों को अगर कोई सबक नहीं मिल रहा है, तो किसी दिन उन्हें कोई धमाका मिल सकता है। हिंसा को लगातार बढ़ाते जाने से वह किसी समस्या का समाधान नहीं होती, वह और बड़ा खतरा बन जाती है, हिन्दुस्तान में आज यही होते हुए दिख रहा है। देश के लोग इतने खाली और बेकार बैठे हैं, उनमें मनोबल और महत्वाकांक्षा की इतनी कमी है कि वे धर्म के नाम पर अपने पीढिय़ों के पड़ोसी का सिर तोड़ देने के लिए तैयार हो रहे हैं। आज अगर हिन्दुस्तान में चुनाव जीतने के लिए कोई हिन्दू वोटों का इस तरह से ध्रुवीकरण करना चाहते हैं कि मुस्लिमों से नफरत करवाकर हिन्दू वोट पा लिए जाएं, तो वोट तो मिल सकते हैं, लेकिन शांति की गारंटी नहीं मिल सकती। और यह मानना सिवाय बेवकूफी और क्या होगा कि 140 करोड़ आबादी में 20 करोड़ मुस्लिम, दसियों करोड़ दलित, दसियों करोड़ आदिवासी, इन सबको प्रताडि़त करके, सबको कुचलकर, सब पर एक आक्रामक हिन्दुत्ववादी जीवनशैली लादकर इस देश को चैन से रखा जा सकता है। लोगों को पाकिस्तान के आज के मजहबी आतंक के साथ हिन्दुस्तान की तुलना कुछ नाजायज लग सकती है, लेकिन लोगों को अगर भविष्य के लिए, आने वाली पीढिय़ों के लिए कोई सबक लेना है, तो वह अपने से अधिक खतरा झेल रहे देशों को देखकर ही लिया जा सकता है। आज हिन्दुस्तान का रूख जिस तरफ है, वह रूख बहुत खतरनाक है, और वह रूख पाकिस्तान जैसे ही किसी भविष्य की ओर इशारा करता है। यह भी समझने की जरूरत है कि आतंकी हमलों के लिए बराबरी की आबादी जरूरी नहीं होती है, दर्जन भर लोग भी दसियों लाख की आबादी पर आतंकी हमले कर सकते हैं, लोगों को थोक में मार सकते हैं। इससे बचने और बचाने का अकेला तरीका यही है कि देश के लोगों में धार्मिक कट्टरता खत्म की जाए, धर्मान्धता खत्म की जाए, धर्म के नाम पर हिंसा को मंजूरी देना खत्म किया जाए, और कानून के राज को सबसे ऊपर माना जाए। हिन्दुस्तान आज ऐसी कुछ बुनियादी जरूरतों से खिलवाड़ करते दिख रहा है, इसके नतीजे में आज तो धार्मिक ध्रुवीकरण से धार्मिक जनगणना की तरह के चुनावी नतीजे मिल रहे हैं, लेकिन चुनावों से परे रोज की जिंदगी एक खतरनाक मंजिल की तरफ बढ़ भी रही है। यह भी नहीं समझना चाहिए कि हिन्दुस्तान जैसे देश में धार्मिक आतंक हिन्दू-मुस्लिम होकर खत्म हो जाएगा, जैसा कि पाकिस्तान में देखने मिल रहा है, एक धर्म के भीतर भी दो समुदाय एक-दूसरे को थोक में मार सकते हैं।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 30 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

इस ऐतिहासिक पदयात्रा के बाद राहुल क्या करें?

30 जनवरी 2023


कांग्रेस सांसद और पार्टी के सबसे महत्वपूर्ण नेता राहुल गांधी की कन्याकुमारी से शुरू हुई पदयात्रा 136 दिनों में 12 राज्यों, 2 केन्द्र प्रशासित प्रदेशों के 75 जिलों से होती हुई कश्मीर के श्रीनगर में तिरंगा फरहाने के साथ खत्म हुई। 3500 किलोमीटर से अधिक की यह पदयात्रा 116 दिन रोजाना 23-24 किलोमीटर चली। जब यह शुरू हुई तो इसके नारे, नफरत छोड़ो, भारत जोड़ो, को लेकर राहुल गांधी का मखौल उड़ाया गया, और बहुत से लोगों को इसकी कामयाबी पर शक था। लेकिन सफर जैसे-जैसे आगे बढ़ा, राहुल को मिलने वाला जनसमर्थन एक सैलाब की तरह बढ़ते चले गया। कांग्रेस पार्टी तो इसके साथ थी ही, लेकिन दूसरी पार्टियों के भी दर्जनों नेता अलग-अलग दिनों पर इसमें शामिल हुए, रास्ते के गांव-कस्बे और शहर के लोग सडक़ों पर उमड़ पड़े, और राहुल गांधी इतने महीनों तक सिर्फ मोहब्बत और दिल जोडऩे, नफरत छोडऩे की बात दुहराने वाले हाल के हिन्दुस्तान के अकेले नेता बने। इस पदयात्रा का किसी चुनाव से कोई रिश्ता नहीं था, और वही मानो सबसे अच्छी बात थी। इसके बीच दो राज्यों में चुनाव हुए, लेकिन राहुल तकरीबन वहां से दूर ही रहे, और अपनी पदयात्रा में लगे रहे। 

हिन्दुस्तान के आज के मुख्यधारा के कहे जाने वाले तथाकथित मीडिया ने इससे एक दूरी बना रखी थी, लेकिन सोशल मीडिया की मेहरबानी से बिना किसी आडंबर के एक आम इंसान की तरह राहुल हर दिन दर्जनों तस्वीरों में लोगों के सामने आते रहे, लोगों से जुड़ते रहे, और लोग उनसे जुड़ते रहे। राहुल को इस पदयात्रा में मिले अपार जनसमर्थन की वजह से जो लोग उन्हें आज विपक्ष का सबसे बड़ा या सर्वमान्य नेता मानने और बताने की चूक कर रहे हैं, वे इस पदयात्रा की अहमियत को घटा भी रहे हैं। जहां तक हमें समझ पड़ता है, यह पदयात्रा ठीक अपने नारे को पूरा करते हुए आज टुकड़े-टुकड़े किए जा रहे हिन्दुस्तान को बचाने के लिए, सहेजने और जोडऩे के लिए निकाली गई थी, और उसने अपना वह मकसद हैरानी की हद तक पूरा किया है। जिस तरह आम तबकों के लोग, हर धर्म के लोग, हर उम्र के आदमी-औरत, और बच्चे राहुल के साथ कुछ दूर चलने के लिए होड़ करते रहे, उनसे लिपटकर पिघलते रहे, वह देखना अद्भुत रहा। आज के वक्त जब इस देश में पोशाक से जाति और धर्म पहचानने का फतवा दिया जा रहा है, तब राहुल एक सम्पूर्ण हिन्दुस्तानी की तरह, हर हिन्दुस्तानी के गले मिलते रहे, अनगिनत लोगों के हाथ थामकर उन्हें साथ चलाते रहे, और इसके बदले देश के लोगों के लिए मोहब्बत के अलावा उन्होंने कुछ नहीं मांगा। 

आज जब देश के बड़े-बड़े नेता मुंह खोलते हैं, और तेजाबी, साम्प्रदायिक नफरत की लपट निकलती है, वैसे में तकरीबन पांच महीने हर दिन 10-12 घंटे लोगों के बीच रहना, हर दिन अनगिनत लोगों से बात करना, पदयात्रा में जाने कितनी बार प्रेस से बात करना सब होते रहा, लेकिन न तो राहुल ने अपनी लोकप्रियता को लेकर कोई दावे किए, न ही अपनी अहमियत बखान करने की कोशिश की, और न ही उन्होंने भविष्य को लेकर इस यात्रा के योगदान का कोई दावा किया। हर मायने में वे एक आम इंसान की तरह रहते और चलते दिखे, और दाढ़ी और टी-शर्ट का उनका यह नया अवतार आज देश का सबसे चर्चित चेहरा बना हुआ है। जब उनके अगल-बगल के तमाम नेता, और दर्जनों सुरक्षा कर्मचारी ऊनी कपड़ों से लदे हुए थे, तब भी राहुल गांधी जिस तरह महज एक टी-शर्ट में चल रहे थे, उसने भी उन्हें लोगों की हैरानी का सबब बना दिया। उन्होंने इसकी जो वजह बताई, वह भी दिल छू लेने वाली थी कि उन्होंने ठंड में तीन गरीब बच्चियों को फटे कपड़़ों में देखा जिनके पास पहनने को गर्म कपड़े नहीं थे, तब उन्होंने तय किया कि जब तक वे कंपकंपाने नहीं लगेंगे, तब तक एक टी-शर्ट ही पहनेंगे, और वे पूरी ही पदयात्रा में वैसे ही रहे। 

राहुल की पदयात्रा को गांधी की किसी पदयात्रा से जोडक़र देखना राहुल के साथ ज्यादती होगी। कल उन्होंने श्रीनगर में पदयात्रा पूरी की है, और आज गांधी पुण्यतिथि है। लेकिन गांधी से तुलना के लिए एक लंबे इतिहास और बहुत ऊंची महानता की जरूरत पड़ती है, और राहुल की किसी बात से ऐसा नहीं लगता है कि वे खुद अपनी इस पदयात्रा का महिमामंडन चाहते हैं। उनकी पार्टी के लोगों को भी चाहिए कि राहुल को महान दिखाने के फेर में कोई ऐसे दावे न करें जिनसे कि उनकी कामयाबी को शिकस्त मिले। देश के लोगों ने महीनों तक राहुल गांधी को आम लोगों के बीच बिना किसी आडंबर के, और बिना फैशन परेड के, बिना नफरत की कोई बात किए, और बिना कोई दावे किए देखा है, और इस अभूतपूर्व स्थिति को बिना कुछ कहे एक अहसास की तरह बने रहने देना चाहिए, बजाय फिजूल की बातें करके उसके असर को खत्म करने के। कांग्रेस के कुछ लोगों ने राहुल को विपक्ष का प्रधानमंत्री का चेहरा बताने का अतिउत्साह भी इसी दौरान दिखाया है, और ऐसी बातों ने राहुल का नुकसान करने के अलावा कुछ नहीं किया है। ऐसा कहने वाले लोगों ने हिन्दुस्तान में प्रचलित एक पुरानी कहावत नहीं सुनी है कि सूत न कपास, जुलाहों में ल_मल_ा। इस यात्रा को किसी भी चुनावी मकसद और संभावना से जोडक़र देखना अपने मन के भीतर तो लोग कर सकते हैं, लेकिन बयानों में इसे लेकर कुछ भी कहना न सिर्फ राहुल और कांग्रेस के खिलाफ जाएगा, बल्कि लोकतंत्र के भी खिलाफ जाएगा। एक लोकतांत्रिक देश में उसके सबसे नाजुक दौर में सिर्फ चुनावों को ध्यान में रखकर बयानबाजी किसी के लिए अच्छी नहीं है। 

राहुल गांधी को लोगों से मिलने का यह सिलसिला जारी रखना चाहिए। इस हौसलेमंद नौजवान से अब यह उम्मीद करना कुछ ज्यादती होगी कि वह गुजरात से उत्तर-पूर्व तक एक और पदयात्रा निकाल ले, हालांकि देश को आज इसकी जरूरत है, भारत को जोडऩे की जरूरत गुजरात से असम तक भी है। लेकिन ऐसा नहीं हो सकता है तो भी राहुल गांधी को उन प्रदेशों का दौरा करना चाहिए जो कि भारत जोड़ो पदयात्रा के रास्ते में नहीं आए थे। जितने राज्यों में वे गए हैं, उससे डेढ़ गुना राज्य अभी बाकी हैं, और कांग्रेस का संगठन तो हर राज्य में है। इसलिए राहुल गांधी इनमें से हर राज्य में जाकर वहां पार्टी के बैनर से परे भी आम लोगों से बात कर सकते हैं, अपना संस्मरण सुना सकते हैं, और लोगों की बात सुन सकते हैं। हो सकता है कि ऐसे हर प्रदेश में वे एक-एक दिन पैदल चल लें, और उसके पहले और बाद लोगों से बात कर लें। उन्हें अगले कुछ वक्त कांग्रेस के घरेलू पचड़ों से परे रहना चाहिए, और देश के माहौल को बेहतर बनाने के लिए शुरू की गई अपनी कोशिश को जारी रखना चाहिए। इस सर्द पदयात्रा में हजारों किलोमीटर का यह टी-शर्ट में पैदल सफर राहुल को तपाकर अधिक मजबूत कर गया है, और अगला काफी वक्त राहुल को चुनावी राजनीति से परे रहकर देश के लोगों में नफरत खत्म करने, और मोहब्बत जगाने में लगाना चाहिए। आज भारतीय राजनीति में ऐसे किरदार की जगह खाली थी, उसे बीते इन महीनों में राहुल ने बखूबी भरा है, और उन्हें यही सिलसिला कुछ और वक्त जारी रखना चाहिए। लोगों को इससे चुनावी हासिल का हिसाब नहीं लगाना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में इंसानियत और मोहब्बत चुनावी फतह से ऊपर की बातें हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

काले को मारा काले पुलिस अफसरों ने ही, सब पर चढ़ गया सत्ता की ताकत का रंग

 29 जनवरी 2023


अमरीका के टेनेसी राज्य में पुलिस ने अपनी एक स्पेशल यूनिट को भंग कर दिया है। इस यूनिट की एक टीम के पांच अफसरों को पिछले हफ्ते एक काले नौजवान को बुरी तरह पीटने के आरोप में, उसकी मौत हो जाने के बाद, नौकरी से निकाल दिया गया है। यह पूरी हिंसक पिटाई एक सार्वजनिक जगह पर वीडियो में दर्ज हुई है, और यह वीडियो सामने आने के बाद इस पुलिस के नाम पर थूका जा रहा था। इस मामले को लेकर अमरीका में कई शहरों में विरोध-प्रदर्शन हो रहे थे, और लोग पुलिस के आतंक की कुछ पुरानी कुख्यात वारदातों को भी इस सिलसिले में याद कर रहे थे। अश्वेत की मार-मारकर हत्या के इस मामले में तकनीकी रूप से कोई नस्लभेद नहीं है, क्योंकि मारने वाले तमाम पुलिस-अफसर अश्वेत ही थे। अमरीका में नस्लभेद के माहौल में काले लोग अपने को काला कहलाना पसंद करते हैं, क्योंकि उनका यह मानना है कि उनकी पहचान श्वेत लोगों से तुलना करते हुए अश्वेत के रूप में नहीं होनी चाहिए, काले के रूप में होनी चाहिए। अमरीका बुरी तरह से नस्लभेद का शिकार देश है, फर्क सिर्फ यही है कि वहां का कानून इसके खिलाफ तेजी से काम करता है। 

अब एक काले नौजवान को सडक़ पर ट्रैफिक जांच करते हुए पांच काले पुलिस वालों ने मार-मारकर मार डाला, तो क्या यह पूरी तरह नस्लभेद से परे का मामला है? इस मामले को हिन्दुस्तान से लेकर अमरीका तक सत्ता की ताकत के साथ जुड़े हुए लोगों के मिजाज को देखकर समझने की जरूरत है। खुद अमरीका का एक सर्वे यह कहता है कि जब किसी काले पर जुल्म की वारदात होती है, तो पुलिसवर्दी के काले लोग भी पीछे नहीं रहते। हिन्दुस्तान की राजनीति और सत्ता में ऊपर आए हुए लोगों को देखें, तो उनके बीच भी यही बात दिखती है कि वे चाहे दलित-आदिवासी तबकों की रिजर्व सीटों से लडक़र आ जाएं, चाहे उन तबकों के वोटों को पाकर आ जाएं, जब वे सत्ता पर आ जाते हैं, तो उनका मिजाज सत्ता का हो जाता है। कोई दलित या आदिवासी अफसर किसी दलित या आदिवासी का जायज काम भी नाजायज रिश्वत लिए बिना करते हों, ऐसा सुनने में नहीं आता। सत्ता तक पहुंचने के लिए जाति की जिस सीढ़ी का इस्तेमाल किया जाता है, लोग सबसे पहले उसी सीढ़ी को लात मारकर गिराते हैं, ताकि उनकी बिरादरी के दूसरे लोग उन सीढिय़ों से उनकी बराबरी तक न पहुंच जाएं। 

सत्ता का मिजाज ऐसा होता है कि जो महिलाएं सत्ता पर पहुंचती हैं, वे भी सत्ता पर बैठे हुए मर्दों की तरह ही सोचने लग जाती हैं, और हिन्दुस्तान के संदर्भ में देखें तो बलात्कार की शिकार महिलाओं के खिलाफ जितने बयान मर्दों के आते हैं, उनसे कुछ ही कम बयान औरतों के भी आते हैं। अगर महिलाओं को दूसरी महिलाओं की, उनके हकों की फिक्र होती, तो फिर सोनिया गांधी, ममता बैनर्जी, जयललिता, मायावती, और महबूबा की पार्टियां मिलकर महिला आरक्षण विधेयक को कब का कानून बनवा चुकी रहतीं, लेकिन ऐसा हुआ नहीं क्योंकि भारतीय संसदीय राजनीति पर हावी मर्दों का दिल औरतों की बराबरी मानने के खिलाफ हमेशा अड़े रहा, और महिलाएं पार्टी की अध्यक्ष रहते हुए भी, उन पर मालिकाना हक रखते हुए भी कोई कोशिश करते नहीं दिखीं। 

अमरीका में काले पुलिस अफसरों के हाथों एक गरीब काले नौजवान की इस तरह हत्या से उस देश और बाकी दुनिया में यही सवाल उठ खड़े होते हैं कि सत्ता की ताकत, ओहदे की ताकत, क्या लोगों को अपनी जाति, अपने धर्म, और अपने रंग के प्रति भी संवेदनशील नहीं छोड़ती है? सत्ता लोगों की बुनियादी सोच को ही बदल देती है, और वह औरत-मर्द का फर्क भी खत्म कर देती है। अभी साल भर के भीतर की बात है, बंगाल में एक नाबालिग लडक़ी से बलात्कार के मामले में मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने ऐसी गैरजिम्मेदारी का बयान दिया था कि जिसे लोगों ने जमकर धिक्कारा। ममता ने इस बलात्कार पर सवाल उठाया और कहा- ‘यह खबर बताती है कि एक नाबालिग की बलात्कार की वजह से मौत हो गई है, क्या आप इसे बलात्कार कहेंगे? क्या वह गर्भवती थी, या उसका किसी से कोई प्रेम-प्रसंग था? क्या इसकी जांच हुई है? मैंने पुलिस से जांचने कहा है। मुझे बताया गया है कि इस लडक़ी का किसी लडक़े के साथ कोई चक्कर था, और परिवार को इसके बारे में मालूम था। अगर एक जोड़े में कोई संबंध है, तो क्या मैं उसे रोक सकती हूं?’ एक मुख्यमंत्री की हैसियत से, और एक महिला होते हुए लोगों ने इस बयान को जमकर धिक्कारा था। लेकिन अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग महिला लीडर, या उनकी पार्टी के पुरूष लीडर ऐसे बयान देते हैं, और इनसे यही साबित होता है कि महिलाएं भी अपनी पार्टी की लीडर बनने के बाद महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता कुछ या बहुत हद तक खो बैठती हैं। ताकत एक नशा होता है, और इसके असर से बचना मुश्किल होता है। अगर सरकारों में बैठे दलित या आदिवासी अफसर और कर्मचारी ही दलित और आदिवासी जनता के काम बिना रिश्वत लिए करने लगते, उनके काम करवाने के लिए कुछ मेहनत करते होते, तो आज इन दबे-कुचले तबकों की हालत इतनी खराब नहीं होती। किसी समाज से आकर ताकत के ओहदे तक पहुंचने वाले लोगों को उनके समाज का प्रतिनिधि मानना ठीक नहीं है, वे सिर्फ सत्ता के प्रतिनिधि होकर रह जाते हैं।

(Daily Chhattisgarh)

एक बार असम सीएम से सहमत होने का मौका...

29 जनवरी 2023

 

असम के भाजपा मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा देश भर में घूम-घूमकर साम्प्रदायिकता की बातें करने के लिए जाने जाते हैं, और वे भाजपा के मुख्यमंत्रियों के बीच भी हिन्दुत्व के सबसे आक्रामक नेताओं में से एक हैं। इसलिए अभी उन्होंने दो अलग-अलग बयानों में जो कहा उन्हें जोडक़र देखने की जरूरत है। पहले उन्होंने एक बयान में मुस्लिम लड़कियों के कमउम्र में शादी कर दिए जाने के खिलाफ कहा था, और कहा था कि जो आदमी 14 बरस से कम की लड़कियों से शादी करते हैं उन पर बच्चों के सेक्स शोषण के कानून, पॉक्सो एक्ट, के तहत कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा था कि जो 14 से 18 बरस की उम्र की लड़कियों से शादी करेंगे उन पर बाल विवाह कानून के तहत कार्रवाई की जाएगी। और अब उन्होंने मानो उसी बात का विस्तार करते हुए कहा है महिलाओं के लिए मां बनने की सही उम्र 22 से 30 साल के बीच हो सकती है, और 30 के आसपास पहुंच रही महिलाओं को जल्द शादी कर लेनी चाहिए। 

कोई भी बात उसे कहने वाले की साख और नीयत से जोड़े बिना देख पाना मुमकिन नहीं होता। असम मुख्यमंत्री सरमा लगातार मुस्लिमों के खिलाफ अभियान चलाते रहते हैं इसलिए उनकी बात को समझना आसान है कि मुस्लिम विवाह कानून के तहत कम उम्र में लड़कियों की शादी की छूट को खत्म करने की वकालत वे कर रहे हैं। लेकिन मुस्लिमों से अपने परहेज के चलते वे जो भी कह रहे हैं, उनसे परे सुप्रीम कोर्ट भी कुछ महीने पहले सरकार से राष्ट्रीय महिला आयोग की एक पिटीशन पर जवाब मांग चुका है कि मुस्लिम लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र भी बाकी धर्मों की लड़कियों की तरह की जानी चाहिए। इस्लाम के प्रावधानों और मुस्लिम समाज के प्रचलित रीति-रिवाजों के चलते बहुत कम उम्र की मुस्लिम लड़कियों की शादी कर दी जाती है, और बहुत से मामलों में तो गरीब नाबालिग मुस्लिम लडक़ी की शादी किसी पैसे वाले बहुत बूढ़े से भी कर दी जाती है। 

अब हम कुछ देर के लिए इन दो मुद्दों से हिमंत बिस्वा सरमा को अलग कर देते हैं, और इन मुद्दों पर सोचते हैं। क्या हिन्दुस्तान के भीतर मुस्लिम समाज के रीति-रिवाजों को जारी रखने के लिए, या उसके नाम पर औरतों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाना जायज है? क्या बालिग होने के पहले ही उनकी शादी कर दी जानी चाहिए? असम में 31 फीसदी से अधिक लड़कियों की कम उम्र में ही शादी हो जाती है, और करीब 12 फीसदी लड़कियां बालिग होने के पहले ही मां बन जाती हैं। ये दोनों ही आंकड़े राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक हैं, और यह मानने में अधिक दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि असम की मुस्लिम आबादी की वजह से वहां पर ये आंकड़े इतने अधिक हैं। 

अब असम, मुख्यमंत्री, और भाजपा या हिन्दू-मुस्लिम की बात को छोड़ दें, और मुस्लिम लडक़ी को एक इंसान अगर मानें, तो यह सोचना जरूरी है कि क्या 13-14 बरस की उम्र में, या उससे भी कम उम्र में किसी लडक़ी की शादी कर देनी चाहिए? तब तक तो न उसकी स्कूल की पढ़ाई पूरी होती है, न ही वह घर की एक गुलाम से अधिक कोई और काम करने लायक तैयार हो पाती है। ऐसी लडक़ी कभी भी आत्मनिर्भर नहीं हो पाती है, और वह लगातार अपने से उम्र में खासे बड़े या दुगुनी-तिगुनी, चारगुनी उम्र के पति की गुलाम बनकर रहने, और जिंदगी के आखिरी के कई बरस विधवा रहकर मरने के लायक ही बन पाती है। ऐसे में एक भाजपा मुख्यमंत्री कहे, या कोई हिन्दुत्ववादी कहे, जो भी कहे, क्या इस बात को नाजायज कहा जा सकता है कि देश में हर धर्म की लडक़ी की शादी की न्यूनतम उम्र 18 बरस होनी चाहिए? और इस मामले में अलग-अलग धर्मों की लड़कियों के हक एक सरीखे माने जाने चाहिए? 18 बरस के उम्र में भी किसी लडक़ी के आत्मनिर्भर होने की संभावना बहुत कम रहती है, आज की दुनिया में कॉलेज की पढ़ाई पूरी करके किसी काम के लायक बनने में और अधिक उम्र गुजर जाती है, लेकिन 18 बरस की उम्र तो लडक़ी की मां बनने लायक भी नहीं रहती। कम उम्र में मां बनने पर ऐसी मां और उसके बच्चों के बचने की संभावना भी कम रहती है। इस मेडिकल तथ्य को अनदेखा करके आज अगर किसी अल्पसंख्यक समुदाय के रिवाजों का सम्मान करने के लिए उसे 10-12 बरस की लडक़ी की शादी की छूट दी जाती है, तो ऐसी संभावित मां और उसके संभावित बच्चों की जिंदगी और सेहत दोनों को खतरे में डाला जाता है। 

सामाजिक रीति-रिवाज अलग-अलग धर्मों में अलग-अलग कई किस्म के रहते हैं। हिन्दुओं में ही एक वक्त सतीप्रथा को मान्यता थी, बालविवाह होते ही थे, लेकिन इनके खिलाफ कानून बनाकर इनको रोका गया, और लड़कियों और महिलाओं के अधिकार की हिफाजत की गई। समाज की प्रचलित धारणाओं में अगर सुधार करने को किसी समाज की धार्मिक मान्यताओं में दखल मान लिया जाएगा, और उससे मुंह चुराया जाएगा, तो सुधार तो कभी हो ही नहीं सकेगा। आज हिन्दुस्तान में अलग-अलग धर्मों में कई किस्म की बातों को लेकर कानून के रास्ते सुधार आए हैं। मुस्लिम समाज में ही हमेशा से प्रचलित तीन तलाक की प्रथा को मोदी सरकार ने एक कानून बनाकर खत्म किया। लडक़े-लड़कियों के बिना शादी किए साथ रहने के आधुनिक चाल-चलन को सुप्रीम कोर्ट ने मान्यता दी। समलैंगिकता को हिन्दुस्तान में सामाजिक कलंक ठहरा दिया गया था, और अंग्रेजों के वक्त के कानून ने उसे जुर्म भी करार दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे जुर्म के दायरे से बाहर किया। 

लोगों को याद रखना चाहिए कि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, और इंदिरा की हत्या के बाद के चुनाव में उन्हें अभूतपूर्व, और ऐतिहासिक संसदीय बाहुबल दिया था, तब उन्होंने कांग्रेस के अल्पसंख्यकपरस्त नेताओं के दबाव में सुप्रीम कोर्ट का शाहबानो का फैसला पलट दिया था, और संसद में कानून बनाकर मुस्लिम मर्दों के सामने समर्पण कर दिया था। इसलिए धार्मिक रीति-रिवाजों को लेकर कभी सरकार, कभी अदालत, और कभी समाज, इनकी अलग-अलग या मिलीजुली कोशिशों से सुधार आते हैं, और अगर आज असम की भाजपा सरकार की कोशिशों से मुस्लिम लड़कियों को इंसान की तरह जिंदा रहने का एक हक मिल सकता है, तो इसमें भाजपा के राजनीतिक हितों को देखने के पहले मुस्लिम आबादी के आधे हिस्से, तमाम मुस्लिम लड़कियों और महिलाओं के हित देखने की जरूरत है। 

असम मुख्यमंत्री ने लड़कियों के मां बनने की जो उम्र सुझाई है, वह चिकित्सा विज्ञान की सुझाई हुई उम्र है। अब एक कट्टर मुस्लिमविरोधी अगर कोई वैज्ञानिक बात करे, तो उसका विरोध करने के लिए विज्ञान को खारिज कर देना जायज नहीं है। जच्चा-बच्चा की मौत घटाने के लिए, दोनों की सेहत बचाने के लिए अगर चिकित्सा विज्ञान कोई उम्र बता रहा है, तो उस उम्र को धर्मों के भीतर प्रचलित रिवाज से परे भी देखने की जरूरत है। यह बात तो है ही कि अगर लडक़ी की शादी कम उम्र में होगी, तो उसके बच्चे भी कम उम्र में होंगे, और सबकी जिंदगी को अधिक बड़ा खतरा रहेगा। इसके साथ इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बने बिना किसी लडक़ी को शादी नाम की एक गुलामी में झोंक देना उसके खिलाफ सबसे बड़ी नाइंसाफी है। 

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 29 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

कृत्रिम बुद्धि इतनी सहज हासिल होने के कई खतरे

 28 जनवरी 2023


आज चाहे हॅंसी-मजाक में सही, कई डॉक्टरों के ऐसे असली या मजाकिया नोटिस देखने में आते हैं कि गूगल पर पढक़र आए लोगों के सवालों के लिए अलग से फीस ली जाएगी। दरअसल इंटरनेट पर सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले सर्च इंजन गूगल पर किसी जानकारी को ढूंढने को ही अब ढूंढना मान लिया गया है। गूगल अब ब्रांड नहीं रह गया, वह अब एक क्रिया बन गया है, तलाशने का समानार्थी शब्द बन गया है। लोगों को स्कूल-कॉलेज के प्रोजेक्ट पूरे करने हो, या किसी इंटरव्यू की तैयारी करनी हो, उन्हें सबसे आसान और आम सलाह यही मिलती है कि गूगल कर लो। ऐसा माना जाता है कि लोगों की अधिकतर जरूरतों की जानकारी इस सर्च इंजन पर निकल आती है। इसके बाद इंटरनेट पर एक दूसरी वेबसाइट विकिपीडिया है जो कि विश्व ज्ञानकोश है, और उस पर मिली अधिकतर जानकारी आमतौर पर सही मानी जाती है। लोगों की आम जरूरतें इस पर पूरी हो जाती हैं, और खास जरूरतों के लिए दूसरी वेबसाइटें भी इंटरनेट पर हैं। 

सहूलियत के ऐसे माहौल के बीच अचानक एक नई वेबसाइट आई है जो कि इंटरनेट पर काम करने वाला एक एआई एप्लीकेशन है, एआई का मतलब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस। चैटजीपीटी नाम की यह वेबसाइट 2021 तक की जानकारी से लैस है, और इस पर जाकर लोग मनचाही फरमाइश कर सकते हैं। कोई उस पर नासा या इसरो के लिए एक निबंध लिखने कह सकते हैं, कोई भूपेश बघेल पर कविता लिखने की फरमाइश कर सकते हैं, और कोई रमन सिंह पर कविता लिखवाकर यह पा सकते हैं कि इस एप्लीकेशन में सिर्फ नाम बदलकर दोनों की तारीफ में एक ही कविता खपा दी है। लेकिन अभी कुछ महीनों के भीतर इस वेबसाइट या एप्लीकेशन की शोहरत ऐसी हो गई है कि अमरीकी विश्वविद्यालयों में इम्तिहान में पूछे जाने वाले सवालों के जवाब इस पर बनाए जा रहे हैं, और इसका आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस जानकारी ढूंढकर, अपनी खुद की भाषा में तकरीबन सही जवाब बनाकर कुछ सेकेंड में ही पेश कर दे रहा है। लोग जिस रफ्तार से पढ़ सकते हैं उससे कई गुना रफ्तार से यह जवाब गढक़र पेश करता है। अभी कुछ प्रमुख विश्वविद्यालयों ने चैटजीपीटी के जवाबों को आंकने की कोशिश की, तो उन्होंने पाया कि बिजनेस मैनेजमेंट जैसे कई कोर्स के इम्तिहानों के जवाब अगर इस वेबसाइट से बनवाए जाएं, तो भी लोग बी या बी माइनस (शायद सेकेंड डिवीजन) से पास हो जाएंगे। और चैटजीपीटी अपने इस्तेमाल करने वाले के सवालों से, इंटरनेट पर रोज जुडऩे वाली जानकारियों से अपने आपको लैस करते चलता है, सीखते चलता है, और हर दिन उसके जवाब पहले से बेहतर हो सकते हैं। 

आज मीडिया में भी ऐसा माना जा रहा है कि आम रिपोर्टिंग आने वाले दिनों में हो सकता है कि ऐसे ही किसी सॉफ्टवेयर से होने लगे, और उसमें बुनियादी जानकारी डाल देने से कम्प्यूटर तुरंत ही समाचार बनाकर पेश कर देगा। आज भी चैटजीपीटी पर जानकारियां डालने से वह तुरंत रिपोर्ट बनाकर दे देता है। आने वाला वक्त बिजली की रफ्तार से किसी भी विषय पर लिख देने वाले ऐसे आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से लैस रहेगा, और दुनिया में मौलिक लेखन के लिए यह एक बड़ा खतरा रहेगा। आज ही पश्चिम के विकसित विश्वविद्यालयों में यह चर्चा छिड़ी हुई है कि चैटजीपीटी जैसे औजारों को देखते हुए अब इम्तिहान लेने के तरीकों में तुरंत बदलाव करना पड़ेगा, क्योंकि अब सवालों के लंबे जवाब लिखने, या निबंध लिखने के ढंग से इम्तिहान बेकार हो जाएंगे क्योंकि कुछ पल में ही लोग दुनिया के किसी भी विषय पर ऐसा निबंध पा सकते हैं। ऐसा ही हाल पत्र-पत्रिकाओं या मीडिया की दूसरी जगहों पर लिखने वालों का भी होगा, क्योंकि उनसे बेहतर लिखा हुआ पल भर में पेश हो जाएगा, तो उनकी जरूरत क्या रह जाएगी? 

आज डिजिटल टेक्नालॉजी पर टिकी हुई पढ़ाई वैसे भी सीखने और जवाब देने की मौलिकता खोती चल रही है। लोग गूगल पर एक किस्म के जवाब ढूंढते हैं, और मशीनी अंदाज में जवाब लिखते हैं। और अब तो हर किसी के लिए अलग-अलग किस्म से लिखे हुए जवाब चैटजीपीटी जैसी वेबसाइटों पर बढ़ते ही चलेंगे, और इससे सीखने का सिलसिला भी बहुत बुरी तरह प्रभावित होगा। मूल्यांकन करने वाले लोगों को यह समझ ही नहीं आएगा कि जवाब या इम्तिहान देने वाले लोगों ने क्या खुद लिखा है, और क्या उनके लिए चैटजीपीटी जैसे सॉफ्टवेयर ने लिखा है। 

हजारों बरस में दुनिया ने भाषा सीखी, दुनिया भर के विषयों पर जानकारी हासिल की, उनका विश्लेषण किया, और ज्ञान को समझ में तब्दील किया। अब रातों-रात एक ऐसी मुफ्त की सहूलियत लोगों के फोन और कम्प्यूटर पर पहुंच गई है कि उसने हजारों बरस के विकास की बराबरी कुछ सेकेंड में करने की कोशिश की है। अभी बस उसने भाषा और ज्ञान को सीखा है, लिखना सीखा है, लेकिन फिर भी वह है तो कृत्रिम ही। उसे दो बिल्कुल अलग-अलग सोच के नेताओं पर कविता लिखते हुए नाम बदलने के अलावा कुछ और बदलना नहीं सूझता। यहां पर आकर वह बेवकूफ है। लेकिन दुनिया में मूल्यांकन के अधिकतर तरीके भी इसी तरह के या इसी दर्जे के बेवकूफ हैं। इसलिए कृत्रिम बुद्धि का बनाया हुआ माल भी बाजार में तकरीबन तमाम जगहों पर काम कर जाएगा, खप जाएगा। बहुत ही कम ऐसी जगहें रहेंगी जहां पर मौलिकता का सम्मान होगा, उसकी जरूरत होगी, और उसे परखा जा सकेगा। फिलहाल एक जानकार ने नसीहत यह दी है कि लोग अपने जिन मोबाइल फोन से लेन-देन का काम करते हैं उन पर आर्टिफिशियल इंटेलीजेेंस के कोई भी एप्लीकेशन डाउनलोड न करें क्योंकि वे फोन पर आपके तमाम काम से लगातार सीखते चलते हैं, और हो सकता है कि वे आपके बैंकों के पासवर्ड भी सीख जाएं, जो कि आगे जाकर हैकरों के हाथ लग जाएं। इसलिए यह कृत्रिम बुद्धि लोगों को इस एप्लीकेशन की शक्ल में मुफ्त में हासिल तो है, लेकिन दुनिया में जैसा कहा जाता है कि कुछ भी मुफ्त नहीं होता, इसे भी सावधानी से इस्तेमाल करना चाहिए। और स्कूल-कॉलेज, विश्वविद्यालय को भी ऐसी तकनीक को अपनी परंपरागत परीक्षा प्रणाली के लिए एक बड़ी चुनौती मानना चाहिए कि इसके बाद अब उनके दिए जा रहे ज्ञान और लिए जा रहे इम्तिहान की शक्ल क्या होनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 28 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

अफसरी बंगलों पर मातहत कर्मचारियों की बेहिसाब तैनाती के खिलाफ जंग छिड़े

 27 जनवरी 2023


मध्यप्रदेश में डीआईजी स्तर की एक आईपीएस और उसके आईएएस पति के सरकारी बंगले पर तैनात सिपाहियों को लेकर एक प्रमुख अखबार भास्कर ने एक रिपोर्ट की तो यह पता लगा वहां 44 सिपाही सेवा में लगे हुए हैं। ये सिपाही वहां खाना पकाते, झाड़ू-पोंछा करते हैं, कपड़े धोते हैं, माली का काम करते हैं, और चौकीदारी करते हैं। अखबार का हिसाब है कि इन सिपाहियों को हर महीने 27 लाख रूपए से ज्यादा का भुगतान किया जा रहा है। सिर्फ खाना बनाने के लिए यहां 12 सिपाही तैनात हैं। यह हाल मध्यप्रदेश में तब है जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने बंगलों पर सिपाहियों की ड्यूटी के खिलाफ नाराजगी दिखाई थी। इस अफसर जोड़े के बंगले पर आईएएस पति के विभाग के 12 कर्मचारी भी तैनात हैं। 

इन दो अफसरों को कुल मिलाकर पांच लाख रूपए महीने के आसपास तनख्वाह मिलती होगी, लेकिन इनके बंगलों पर तैनात सरकारी कर्मचारियों पर 30 लाख रूपए महीने खर्च हो रहे हैं। यह नौबत अकेले मध्यप्रदेश में नहीं है, उसका हिस्सा रह चुके छत्तीसगढ़ में यही हाल है। एक-एक अफसर के बंगले पर दर्जनों कर्मचारी तैनात हैं, और वे अमानवीय स्थितियों में काम कर रहे हैं। अभी कुछ समय पहले ही ऐसे एक बंगले पर तैनात एक बटालियन के सिपाही ने अफसर के लगातार चल रहे जुल्मों से थककर उसे एक थप्पड़ मारी, और बताया कि वह किस आरक्षित जाति का है, और वह अफसर उसका जो बिगाड़ सकता है बिगाड़ ले, वह खुद ही थाने जाकर एसटी-एससी एक्ट में उसके खिलाफ रिपोर्ट लिखा रहा है। इसके बाद किसी तरह कई अफसरों ने मिलकर दौड़-भाग करके उस जवान को मनाया, और उसे बस्तर में तैनात उसकी बटालियन वापिस भेजा गया। एक दूसरे बहुत बड़े सवर्ण रिटायर्ड अफसर के बंगले पर दर्जनों कर्मचारी तैनात हैं, और उनमें से जो बंगले के भीतर काम करते हैं, उन्हें आकर नहाकर भीतर जाना पड़ता है। खाना पकाने वाले कर्मचारियों को नहाकर बंगले के धोती-कुर्ते में किचन में जाना पड़ता है, और खाना बनाना पड़ता है। अब एक सवर्ण अफसर को एक एसटी-एससी सिपाही के थप्पड़ के बाद भी अगर बाकी लोगों को खतरा समझ नहीं आ रहा है, तो छोटे कर्मचारियों के साथ ऐसा अमानवीय बर्ताव पुलिस कर्मचारियों के परिवारों के आंदोलन के लिए एक पर्याप्त वजह होनी चाहिए। 

जब लोग पुलिस में भर्ती होते हैं, तो वे ऐसे अमानवीय बर्ताव के लिए नहीं आते हैं। सिपाहियों के साथ जब ऐसा बर्ताव होता है, तो मुजरिमों पर कार्रवाई करने का उनका मनोबल भी टूट जाता है, और वे अपने परिवार के बीच भी सिर उठाकर नहीं जी पाते हैं। विभाग के दूसरे कर्मचारियों के बीच भी वे मखौल का सामान बन जाते हैं, और काम के इस तरह के हालात उनके बुनियादी मानवाधिकार के भी खिलाफ हैं। न सिर्फ सरकार को अपने अमले की ऐसी बर्बादी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए, बल्कि मानवाधिकार आयोग जैसी संस्था को भी खुद होकर हर अफसर से हलफनामा लेना चाहिए कि उनके बंगले पर कौन-कौन लोग काम कर रहे हैं, वे किस-किस विभाग से आए हुए हैं। अब ऐसा तभी हो सकेगा जब मानवाधिकार आयोग जैसी संस्था के अध्यक्ष या सदस्यों के घरों पर इसी तरह से सिपाही या दूसरे कर्मचारी तैनात नहीं होंगे। अगर जजों के बंगलों पर भी यही हाल रहेगा, तो फिर कर्मचारियों के ऐसे बेजा इस्तेमाल के खिलाफ कोई पिटीशन लगाने का भी कोई फायदा नहीं होगा। 

यह पूरा सिलसिला बहुत ही अलोकतांत्रिक और अमानवीय है। यह इंसानों को गुलामों की तरह इस्तेमाल करने का है, और अपनी तनख्वाह से दस-बीस गुना बर्बादी कर्मचारियों की तैनाती की शक्ल में करने का भी है। अब सवाल यह उठता है कि जब तमाम अफसर, रिटायर्ड अफसर, मंत्री, और दूसरे नेता, सभी लोग ऐसी गुलामी-प्रथा का मजा ले रहे हैं, तो कार्रवाई कौन करे? यहां पर पुलिस कर्मचारियों के परिवारों को चाहिए कि इसी एक मुद्दे को लेकर वे जमकर आंदोलन छेड़ें, मीडिया में जाएं, अदालतों में जाएं, तरह-तरह की वीडियो रिकॉर्डिंग जुटाएं, और नेता-अफसर सबका भांडाफोड़ करें। ऐसा लगता है कि अंग्रेज अफसरों के घर पर भी कर्मचारियों की इतनी बड़ी भीड़ नहीं रहती होगी। भोपाल में जिस अखबार के भांडाफोड़ से यह गिनती सामने आई है, वैसे तमाम कर्मचारियों से हलफनामे लेने चाहिए कि वे कहां काम कर रहे थे। उन्हें तैनात करने वाले अफसरों से भी हलफनामे लेने चाहिए कि उन्होंने किस आधार पर कर्मचारियों को किसी बंगले पर भेजा था। हिन्दुस्तान एक गरीब देश है, लेकिन आजादी की पौन सदी बाद भी आज के अफसर अंग्रेज बहादुर की तरह राज कर रहे हैं, और यह सिलसिला सामाजिक दखल से भी खत्म करना चाहिए। जनसंगठनों और राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे छोटे-छोटे बेजुबान कर्मचारियों को गुलामी से आजाद कराने के लिए एक सामाजिक आंदोलन छेड़ें, और ऐसे बंगलों के सामने खड़े रहकर आने-जाने वाले कर्मचारियों की रिकॉर्डिंग करें, और बंगलों पर काबिज लोगों का जीना हराम करें। 

बहुत से अफसरों के परिवार कर्मचारियों के साथ तरह-तरह की बदसलूकी करते हैं। कई जगहों पर वर्दीधारी कर्मचारियों को साहबों के बच्चों का पखाना धोना पड़ता है, और उनके जानवरों को नहलाना भी पड़ता है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और एक लोकतांत्रिक समाज में ऐसे सामंती सिलसिले की कोई जगह नहीं हो सकती। छत्तीसगढ़ में भी लोगों को आरटीआई के माध्यम से, या बंगलों की निगरानी करके कर्मचारियों के नाम जुटाने चाहिए। विधानसभा के सदस्य अगर खुद इस तरह का बेजा इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, तो उन्हें वहां ये सवाल उठाने चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

 

अदालतें बेअसर होने से अलोकतांत्रिक कानून भी अब खटकना बंद हो गए

  25 जनवरी 2023


छत्तीसगढ़ के कोरबा में कल एक आदतन मुजरिम को जिलाबदर किया गया। उसे एक साल के लिए कोरबा जिले से बाहर रहने को कहा गया है। गोपू पांडेय नाम के इस नौजवान के खिलाफ बहुत से हिंसक मामले दर्ज थे, और पुलिस की कार्रवाई का कोई असर न देखते हुए उसे चौबीस घंटे के भीतर जिला छोड़ देने को कहा गया। इसके साथ ही उसे कोरबा से लगे हुए जिलों, बिलासपुर, जांजगीर-चाम्पा, सक्ती, रायगढ़, सरगुजा, सूरजपुर, कोरिया, मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर, और गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही जिलों से भी एक साल के लिए बाहर चले जाने के लिए कहा गया। ऐसे जिलाबदर के मामले जिला पुलिस की बनाई गई फाईल के आधार पर जिला मजिस्ट्रेट के हुक्म से पूरे होते हैं। जिलाबदर के मामले कम होते हैं, और ऐसे ही आदतन गुंडे-बदमाश, मुजरिम के खिलाफ होते हैं जो कि पुलिस की आम कार्रवाई से काबू में नहीं आ रहे हैं। 

अंग्रेजों के वक्त का बना हुआ जिलाबदर कानून आजाद हिन्दुस्तान के मानवाधिकार के किसी पैमाने को देखते हुए नहीं बना था। किसी को पूरे एक बरस के लिए उसके जिले, और आसपास के तमाम जिलों के बाहर भेज देने का मतलब उसके लिए जिंदा रहने की एक चुनौती भी खड़ी कर देना है, क्योंकि अगर वह ऐसा ही आदतन मुजरिम या गुंडा-बदमाश है, तो उसके लिए बाहर जाकर कोई काम करना आसान नहीं होगा। दूसरी बात यह कि जो एक जिले के लिए खतरनाक साबित हो रहा है, उस खतरे को उठाकर बाकी जिलों पर डाल दिया जाए, यह उनके साथ बेइंसाफी है कि ऐसे गुंडे का जिला अपनी बला दूसरों पर डाल रहा है, और उन दूसरे जिलों में इस अपराधी की कोई शिनाख्त भी नहीं है, वहां पर वह अपने आदतन जुर्म और आसानी से कर सकता है, वहां वह लोगों के लिए एक अधिक बड़ा खतरा बन सकता है क्योंकि उसे आते-जाते देखकर उस पराये जिले की पुलिस मुजरिम की तरह पहचान भी नहीं पाएगी। 

इस बारे में बात करने पर कुछ पुलिस अफसरों का यह कहना है कि यह बहुत ही दुर्लभ मामलों में होने वाली कार्रवाई है, और ऐसे मामले गिने-चुने रहते हैं, इसलिए इन्हें किसी मानवाधिकार से जोडक़र देखना जायज नहीं है। पुलिस का यह भी तर्क रहता है कि ऐसे लोग स्थानीय स्तर पर अपने बाहुबल, और अपने गिरोह के चलते बाकी तमाम लोगों के मानवाधिकार कुचलने की हालत में रहते हैं, कुचलते ही रहते हैं, और ऐसे लोगों को अगर एक साल बाहर रहकर जिंदा रहने को कहा जाए, तो यह उन्हें उनके गिरोह की ताकत से दूर रखना भी होता है, और आज के वक्त हर किसी के पास किसी न किसी तरह की मजदूरी करने का विकल्प रहता है, इसलिए ऐसे कोई गुंडे दूसरे जिलों में भी जाकर भूखे नहीं मर सकते। अपने खुद के जिलों में ये इतने बड़े दबंग गुंडे रहते हैं कि वहां जुर्म करना उनके लिए आम बात रहती है, और इलाके के लोगों के लिए उनके खिलाफ शिकायत करना खतरे की बात हो जाती है। पुलिस का यह भी कहना रहता है कि यह किसी को भूखे मारने का काम नहीं है, और खुले समाज में मेहनत-मजदूरी करके या अपने हुनर का और कोई काम करके लोग आसानी से जिंदा रह सकते हैं। 

अब मानवाधिाकर के नजरिए से देखें तो ऐसे गुंडे-बदमाश या मुजरिम जुर्म के अलावा भी हो सकता है कि कोई और काम करके अपने परिवार को भी चला रहे हों। जिन्हें कोई अदालती सजा मिले, उनका तो जेल जाना, और परिवार को बेसहारा छोड़ देना एक कानूनी नौबत है, लेकिन बिना सजा मिले जिलाबदर कर देना एक बड़ी सजा है, जो कि पुलिस की कार्रवाई नहीं कही जा सकती, यह कार्रवाई से अधिक है, और सजा है। यह अपने आपमें एक अलोकतांत्रिक बात है कि अदालती कार्रवाई का विकल्प मौजूद रहते हुए पुलिस और प्रशासन मिलकर किसी को जिलाबदर की ऐसी सजा दें, जिसे वे सजा में नहीं गिनते। लेकिन पुलिस का एक तर्क देखने-समझने लायक है कि ऐसे आदतन या पेशेवर गुंडे-बदमाश या मुजरिम आए दिन करने वाले जुर्म के लिए अदालतों से हाथों-हाथ जमानत पा जाते हैं। कायदे से तो होना यह चाहिए कि हर जुर्म के साथ पिछले जुर्मों के रिकॉर्ड भी अदालत में पेश होने चाहिए जिससे न तो ताजा जुर्म पर जमानत मिल सके, और न ही पिछले जुर्म में मिली जमानत जारी रह सके, लेकिन ऐसा होता नहीं है। पुलिस और अदालत का सिलसिला इतना बेअसर और शायद भ्रष्ट भी रहता है कि लोग दस-दस अलग-अलग जुर्मों पर जमानत लिए हुए घूमते रहते हैं, और उनके मामलों की सुनवाई की बारी नहीं आती, सजा की बात तो दूर रही। 

जिलाबदर के ऐसे मामलों को देखें तो यह साफ दिखाई पड़ता है कि दर्जन-दर्जनभर जुर्म जिन पर दर्ज है, वे हर मामले में जमानत लिए घूम रहे हैं, और हर नए मामले में पुराने तमाम जुर्म का जिक्र भी हो रहा है, और पहले की कोई भी जमानत रद्द भी नहीं हो रही है। मतलब यह कि आज जिलाबदर की नौबत इस बात का सुबूत है कि जुर्म के खिलाफ अदालती कार्रवाई इतनी बेअसर हो गई है कि पुलिस फैसलों और सजा का इंतजार करते-करते जिलाबदर को मजबूर हो रही है। भारत की न्याय व्यवस्था में सुधार की बात करने वालों को यह आसानी से समझ में आएगा कि अदालत की नियमित प्रक्रिया के बेअसर हो जाने से अंग्रेजों के वक्त के ऐसे अलोकतांत्रिक कानूनों का इस्तेमाल जरूरी हो रहा है, या जायज लग रहा है। कायदे की बात यह है कि जिलाबदर की कार्रवाई से होने वाले मानवाधिकार उल्लंघन पर फिक्र होनी चाहिए, लेकिन अदालती रफ्तार ने उस फिक्र की गुंजाइश को खत्म कर दिया है। जब मौजूदा कानून के तहत, जुर्म के सीधे-सीधे मुकदमों में सजा नहीं हो पाती है, उसमें बरसों लग जाते हैं, तब पुलिस को असाधारण ताकत का इस्तेमाल करना पड़ता है, और लोगों को उसके अलोकतांत्रिक होने का अहसास भी नहीं होता। यह भारत की न्याय व्यवस्था के बेअसर होने के हजार किस्म के नुकसानों में से एक है, और यह इस बात का पुख्ता सुबूत है कि इस व्यवस्था में सुधार की कितनी जरूरत है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 जनवरी 2023


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धर्म के नाम पर चमत्कारी और पाखंडी मेले कब तक?

24 जनवरी 2023


पिछले कुछ दिनों से पहले नागपुर और अब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर बागेश्वर धाम के एक स्वघोषित चमत्कारी धीरेन्द्र शास्त्री नाम के नौजवान को लेकर खबरों में उबल रहे हैं। यह नौजवान कहने के लिए प्रवचनकर्ता या कुछ और है, लेकिन उसकी शोहरत धर्मालुओं के बीच मंच पर चमत्कार दिखाने की है। बहुत से लोगों का कहना है कि ये गढ़े गए चमत्कार रहते हैं, और यह एक पाखंड है, धोखा है। यह नौजवान अपने आपको अलौकिक शक्तियों वाला बताता है, मंच और माइक से धर्म के कपड़े ओढ़े हुए घोर साम्प्रदायिकता की बात करता है, तरह-तरह की धमकी देता है, और नागपुर में जब अंधविश्वास विरोधियों ने इसे चमत्कार साबित करने की चुनौती दी, तो यह वहां से भाग निकला। अब छत्तीसगढ़ में राजधानी के एक कांग्रेस विधायक विकास उपाध्याय ने अपनी धार्मिक गतिविधियों की कड़ी में इस धीरेन्द्र शास्त्री का एक और कार्यक्रम कराया जिसे कि टीवी समाचार चैनलों की मेहरबानी से एक बार फिर चमत्कार साबित करने की कोशिश की गई। अब यह तो वक्त बताएगा कि इस ‘चमत्कारी’ की साख बची या टीवी चैनलों की साख गई। 

लोगों के मन की बात बताने, उनका भूतकाल बताने, या भविष्य बताने, उनकी समस्याओं के समाधान बताने वाले ढेर सारे फर्जी और पाखंडी बाबाओं का हिन्दुस्तान में बोलबाला है। ये सिर्फ हिन्दू धर्म में नहीं हैं, ईसाईयों की चंगाई सभाएं होती थीं, जिनमें पोस्टर यही लगते थे कि अंधे देखने लगेंगे, लंगड़े चलने लगेंगे, बहरे सुनने लगेंगे। इसके बाद ईसाई धर्म प्रचारक मंच पर तैयार किरदारों को लाकर पहले उनके विकलांग होने का नाटक पेश करते थे, और फिर उन्हें ठीक करने का। अभी भी इंटरनेट पर ऐसे अनगिनत वीडियो तैर रहे हैं जिनमें मानसिक रूप से परेशान दिखती हुई महिलाएं ऐसे ईसाई धर्म प्रचारकों के छूते ही स्टेज पर झटके से गिरकर लोटपोट होने लगती हैं। हिन्दुस्तान में समाजसेवा का बहुत बड़ा काम करने वाली मदर टेरेसा को भी वैटिकन ने संत की उपाधि तभी दी थी जब वैटिकन की टीम ने किसी एक मरीज का यह बयान दर्ज किया कि मदर टेरेसा के चमत्कार से उसकी बीमारी ठीक हुई। बिना चमत्कार किसी को संत का दर्जा वैटिकन नहीं देता। यह एक अलग बात है कि आज हिन्दुस्तान में कई राज्यों में ऐसे कानून हैं जो चमत्कार से किसी बीमारी को ठीक करने के दावे को जुर्म करार देते हैं, और उन पर सजा है। अब मदर टेरेसा के मामले में तो ऐसे चमत्कार पर ही उनकी संत की उपाधि टिकी हुई है, यह एक अलग बात है कि ऐसा कोई दावा उन्होंने खुद ने नहीं किया था। 

एक ऐसे मुस्लिम बाबा का वीडियो भी कुछ समय से सोशल मीडिया पर चल रहा है जो कि विचलित और बीमार महिलाओं के दरबार में बच्चों की खेल की बंदूकों को उनकी तरफ तानकर, चलाकर उनका इलाज कर रहा है। हिन्दुस्तान में प्रचलित अन्य धर्मों में इस तरह के पाखंड की बात याद नहीं पड़ रही है। जैन, सिक्ख, बौद्ध धर्मों की नसीहत हो सकता है कि पाखंडों से परे ले जाती हो। लेकिन हिन्दुस्तान की हिन्दू आबादी ऐसे पाखंड की सबसे बुरी जकड़ में है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि जब समाज में डॉक्टरी इलाज ठीक से हासिल नहीं रहता, मनोचिकित्सा हिन्दुस्तान में नहीं के बराबर मौजूद है, और हजार मनोरोगियों में से शायद वह सौ-पचास को भी हासिल नहीं है, तब ऐसे चमत्कारी पाखंडियों की दुकान चल निकलती है। कहीं कोई दरबार लगता है, कहीं प्रवचन के बीच इलाज होता है, तो कहीं पर निर्मल बाबा नाम का एक प्राणी इंटरनेट पर एडवांस बुकिंग से लोगों को टिकटें बेचता है, और हॉल में इक_ा लोगों को दुनिया के सबसे अनोखे समाधान सुझाता है। शुक्रवार को काले कुत्ते को पीले कपड़ों में जाकर लाल समोसा खिलाने से कृपा बरसेगी, जैसा समाधान बतलाने वाला निर्मल बाबा अभी पता नहीं कुछ समय से टीवी से गायब क्यों है, वरना कुछ टीवी चैनल उसी को समर्पित रहते थे। कई और बाबाओं की कई तरह की शोहरत रही, उन्होंने समाजसेवा के कुछ बड़े काम भी किए, लेकिन उनकी महिमा भी चमत्कार के रास्ते स्थापित हुई। पुट्टपर्थी के सत्य सांई बाबा हवा में हाथ उठाकर कई तरह की चीजें पैदा कर देते थे। किसी भक्त को घड़ी, किसी को गहने, और किसी को कुछ और मिल जाता था। उनके भक्त पिछले एक प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंहराव से लेकर बड़े-बड़े जज भी रहे, और ऐसी भक्त मंडली के चलते सत्य सांई बाबा का धार्मिक-आध्यात्मिक कारोबार बहुत फैला। उन्होंने हार्ट के ऑपरेशन के लिए अस्पताल बनाए जिनका गरीबों की जिंदगी में बहुत बड़ा योगदान है, और छत्तीसगढ़ में उनके अस्पताल के कम्प्यूटरों पर बिल बनाने और भुगतान लेने का कॉलम ही नहीं है। यहां सौ फीसदी इलाज मुफ्त होता है। अलौकिक चमत्कारों से जुटाए गए दान का आधुनिक मेडिकल चिकित्सा पर खर्च समझ आता है। लेकिन आज के कई बाबा जिस तरह नफरत फैलाते हुए घूम रहे हैं, साम्प्रदायिकता की बातें कर रहे हैं, वह हिन्दुस्तान को तोडऩे वाली बातें हैं। 

अब ऐसे अंधविश्वास और साम्प्रदायिकता को और ताकत तब मिल जाती है जब स्वघोषित धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस पार्टी के मंत्री-मुख्यमंत्री, या विधायक-सांसद ऐसे बाबाओं के आयोजन करवाते हैं, उनके पांवों में पड़े रहते हैं। लोगों को याद होगा कि बलात्कारी आसाराम के अनगिनत वीडियो आज मौजूद हैं जिनमें गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी आसाराम की स्तुति करते दिखते हैं। लेकिन उन्हीं वीडियो के साथ-साथ कुछ ऐसे वीडियो भी मौजूद हैं जिनमें कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह भी अपने मुख्यमंत्री होने के वक्त आसाराम के पैरों पर पड़े हैं। जिस देश में नेहरू ने एक वैज्ञानिक सोच विकसित की थी, जहां उन्होंने धर्म को निजी आस्था तक सीमित रखा था, हर किस्म के अंधविश्वास और पाखंड का विरोध किया था, हिन्दुस्तान की संस्कृति को धर्मान्धता से अलग करने का बहुत बड़ा काम किया था, आज उन्हीं की पार्टी के नेता पाखंडियों के आयोजन कर रहे हैं जो कि धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता दोनों को फैला रहे हैं। यह बात बहुत हैरान नहीं करती क्योंकि नेहरू की कांग्रेस में उनकी धर्मनिरपेक्ष सोच, और पाखंड का उनका विरोध उन्हीं की बेटी इंदिरा ने खत्म कर दिया था जब वे मचान पर बैठे देवरहा बाबा के लटके हुए पांव के नीचे अपना सिर टिकाने जाकर खड़ी हुई थीं। उसके बाद तो कांग्रेस में धर्मान्धता को औपचारिक मंजूरी ही मिल गई थी, जो आज भी जारी है। कांग्रेस में धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता से पूरी तरह बचे हुए सोनिया परिवार के बावजूद पार्टी मोटेतौर पर धर्म के नाम पर धर्मान्धता को बढ़ा रही है। और भाजपा की तो पूरी बुनियाद ही धर्म पर टिकी हुई है। पूरे देश में फैली हुई महज दो ही पार्टियां हैं, और जब ये दोनों हिन्दुत्व की ए और बी टीम की तरह काम कर रही हैं, तो फिर वैज्ञानिक सोच की गुंजाइश कहां है? 

हम देश में फैल रही धर्मान्धता को लेकर महज भाजपा को कोसना इसलिए नहीं चाहते क्योंकि कांग्रेस उसी के पदचिन्हों पर चलते हुए उससे आगे निकलने की हड़बड़ी में दिख रही है। यह एक अलग बात है कि धर्मान्ध और साम्प्रदायिक लोगों को कांग्रेस के मुकाबले भाजपा अधिक माकूल बैठती है, और वे किसी बी टीम पर दांव क्यों लगाएंगे, जब खालिस और असली ए टीम अभी बाजार में मौजूद भी है, और अधिक कामयाब भी है। धर्मान्ध आयोजन करवाने वाले कांग्रेस नेताओं को यह समझ लेना चाहिए कि वे इस पाखंड में सडक़ों पर कितना ही नाचें, वोट के दिन धर्मान्ध लोगों को कांग्रेस सबसे बेहतर पार्टी नहीं लगने वाली है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस एक मामले में समझदारी दिखाई कि उन्होंने अपने ही विधायक और संसदीय सचिव के इस पाखंडी आयोजन में जाने से इंकार कर दिया, और नर्म शब्दों में सही, इसकी आलोचना भी की। धर्म पर आधारित नफरत की लड़ाई में कांग्रेस कभी भी भाजपा से नहीं जीत पाएगी, और उसे ऐसी कोशिश बंद कर देना चाहिए, क्योंकि ऐसी कोशिश के चलते हुए वह अपना चरित्र खो बैठ रही है, और उसके परंपरागत मतदाताओं को यह अब उनकी पसंदीदा पार्टी नहीं दिख रही है। (Daily Chhattisgarh)

दुनिया पर मंडराता आर्थिक खतरा समझने की जरूरत

 23 जनवरी 2023


दुनिया की सबसे बड़ी, कामयाब और मुनाफा कमा रही टेक्नालॉजी कंपनियों ने पिछले एक बरस में 70 हजार से अधिक कर्मचारियों को नौकरी से निकाला है। इन कंपनियों में तनख्वाह की जो हालत रहती है, उसके मुताबिक बाकी कंपनियों के कर्मचारियों से वे काफी अधिक पाते हैं, और ऐसे लोगों की नौकरी जाने का एक मतलब यह भी है कि बाजार में उनका खर्च कम या बंद हो जाएगा, और अर्थव्यवस्था का चक्का घूमना कुछ धीमा हो जाएगा। इसे इस तरह देखना भी ठीक होगा कि इन कंपनियों में जो हिन्दुस्तानी काम करते थे, वे अब भारत में बसे अपने परिवारों तक पैसे नहीं भेज पाएंगे, इससे यहां के परिवार अपना खर्च घटाएंगे, कोई नई खरीदी करने की तैयारी रही होगी, तो वह भी घट जाएगी। इसलिए दुनिया में कहीं भी बड़े पैमाने पर रोजगार जाते हैं, तो दूसरे कई देशों तक भी उसका असर होता है। और रोजगार जाने का यह सिलसिला सिर्फ टेक्नालॉजी कंपनियों या अमरीकी कंपनियों तक सीमित नहीं है, यह दुनिया में तरह-तरह के देशों में तरह-तरह से हो रहा है। रूस के यूक्रेन पर हमले, और उसके बाद की जंग के चलते दुनिया की अर्थव्यवस्था बहुत बुरी तरह चौपट हुई है, और उससे भी कामकाजी देशों के सामने रोजगार की दिक्कत आ गई है, खाते-कमाते लोगों पर महंगाई की मार दिख रही है, और भुखमरी के शिकार देशों में इंसानों के कुपोषण और भूख से मरने का सिलसिला बढ़ गया है। 

कल ही पाकिस्तान की एक रिपोर्ट है कि वहां से कपड़े के निर्यात में आई गिरावट की वजह से करीब 70 लाख लोगों को नौकरी से निकाल दिया गया है, और वहां का कपड़ा उद्योग गर्त में चले गया है। एक वक्त यह पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में बड़ा कारोबार था, लेकिन अब न तो घरेलू ग्राहक रह गए, न ही निर्यात रह गया, और न ही उस कपास की फसल बची जिससे बना सूती कपड़ा दूसरे देशों में जाता था। पिछले बरस आई बाढ़ में पाकिस्तान का एक बड़ा हिस्सा ऐसा डूबा कि वहां सडक़, पुल, इमारतें, गांव-कस्बे सभी कुछ बह गए या डूब गए। इस बाढ़ से साढ़े 3 करोड़ लोग प्रभावित हुए थे, कपास की फसल का बड़ा हिस्सा बर्बाद हो गया था, किसान तो बर्बाद हुए ही, ग्रामीण अर्थव्यवस्था बर्बाद हुई, और अब नतीजा यह दिख रहा है कि कारखानेदार भी डूब रहे हैं, और मजदूर तो नौकरी खो ही बैठे हैं। पाकिस्तान के निर्यात का आधा हिस्सा कपड़े का निर्यात था, जो ठप्प पड़ा है। नतीजा यह होगा कि देश में आने वाली विदेशी मुद्रा नहीं आएगी, स्थानीय कारखानेदारों, कारोबारियों, और मजदूरों के पास खर्च का पैसा नहीं रहेगा, और स्थानीय अर्थव्यवस्था का चक्का घूमना धीमा हो जाएगा। 

हिन्दुस्तान में कुछ दिन पहले ही आई ऑक्सफेम की एक रिपोर्ट को गौर से देखने की जरूरत है। इस रिपोर्ट में बताया है कि देश की 40 फीसदी दौलत सिर्फ एक फीसदी अमीर लोगों के पास है, और नीचे की आधी आबादी के पास सिर्फ तीन फीसदी दौलत है। यह रिपोर्ट बताती है कि हिन्दुस्तान के 10 सबसे अमीर लोगों की दौलत में 2021 के मुकाबले एक बरस में 32.8 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। भारत में अरबपतियों की संख्या 2020 में 102 थी, जो बढक़र 2021 में 142, और 2022 में 166 हो गई। इसके साथ यह जोडक़र देखने की जरूरत है कि देश में करीब 23 करोड़ लोग गरीबी में जी रहे हैं, जो कि दुनिया के किसी भी एक देश में गरीबों की सबसे बड़ी संख्या है। अब अडानियों और अंबानियों के साथ इन 23 करोड़ लोगों की दौलत को जब मिलाकर देश की अर्थव्यवस्था के आंकड़े तैयार किए जाते हैं, तो वे सुहाने लगने लगते हैं, यह लगने लगता है कि हिन्दुस्तान दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, और तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की तरफ बढ़ रहा है। लेकिन देश के भीतर संपत्ति और साधनों के बंटवारे की हालत क्या है, इस बदहाली को न देखकर, न समझकर, महज जश्न मनाने वाले लोग ही इसे तीसरी-चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनते देख रहे हैं। आठ बरस पहले मोदी सरकार ने देश में हर बरस दो करोड़ रोजगार या नौकरियों की बात कही थी, और उसके बाद के आंकड़े बताते हैं ऐसे अच्छे दिन का वायदा अभी तक सिर्फ एक मृगतृष्णा बना हुआ है। 

हिन्दुस्तान में असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों की हालत खराब है। सरकारी या गैरसरकारी आंकड़े आमतौर पर संगठित क्षेत्र तक सीमित रह जाते हैं, असंगठित क्षेत्र को लेकर लोग भी कम फिक्रमंद रहते हैं, और वहां के आंकड़े भी मौजूद नहीं रहते हैं। कोरोना और लॉकडाउन के चलते हुए पिछले दो बरस से अधिक का वक्त ऐसा रहा है जिसमें असंगठित क्षेत्र के भूखों रहने की नौबत आ गई है। अब कामकाज शुरू हुआ है, लेकिन कारोबार और रोजगार में अनिश्चितता बनी हुई है। सरकार अपना कामकाज किस हद तक टैक्स की कमाई से चला रही है, और किस हद तक सार्वजनिक कंपनियों को बेचकर चला रही है, इसका आर्थिक विश्लेषण देखने और समझने की जरूरत है। हिन्दुस्तान में आज कई किस्म के आर्थिक आंकड़े लोगों के सामने रखना बंद कर दिया गया है, और बहुत किस्म के विश्लेषण अब हो नहीं पा रहे हैं। 

लेकिन हम इस बात को दुहराना चाहते हैं कि दुनिया का सबसे बुरा वक्त आना अभी बाकी है। अभी बहुत से विशेषज्ञों की यह भविष्यवाणी है कि दुनिया में मंदी का दौर आने वाला है। जिस रूस-यूक्रेन जंग से दुनिया की अर्थव्यवस्था गड़बड़ाई है, उस नौबत के और बुरे होने की एक आशंका बनी हुई है। यह जंग कहीं से कम होते नहीं दिख रही है, और इसके चलते बाकी दुनिया में अंतरराष्ट्रीय राहत संस्थानों के काम में कमी आई है क्योंकि लोगों की सामाजिक-आर्थिक मदद यूक्रेन की तरफ मुड़ गई है। इन तमाम बातों के साथ कुदरत की मार को जोडक़र भी देखना चाहिए कि किस तरह एक बाढ़ ने पाकिस्तान का वर्तमान और भविष्य तबाह कर दिया है, योरप और अमरीका मौसम की मार से इतिहास का सबसे बड़ा नुकसान झेल रहे हैं। भारत जैसे देशों को भी यह सोचना चाहिए कि बदलते मौसम की मार और तबाह पर्यावरण के असर से आने वाला वक्त और तबाही देख सकता है। ऐसे में उन लोगों को अधिक सावधान रहना चाहिए जो अपनी आज की कमाई के आधार पर कर्ज लेकर किस्तें पटाने का बोझ पाल रहे हैं। कल को रोजगार और कारोबार ही नहीं रहा तो वे किस्तें आएँगी कहां से? यह वक्त बहुत सावधान रहने का है, अपना काम-धंधा बचाकर रखने का है, रोज की जिंदगी में किफायत पर अधिक से अधिक अमल करने का है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 जनवरी 2023


 

सरकार और अदालत के टकराव को अनदेखा करने का नुकसान लोकतंत्र को..

  22 जनवरी 2023


भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ बंगाल के राज्यपाल के रूप में ममता बैनर्जी सरकार के खिलाफ अभियान चलाने वाले एक आंदोलनकारी की तरह बरसों जुटे रहे। अब वे उपराष्ट्रपति हो गए हैं, तो इस हैसियत से वे राज्यसभा के उपसभापति रहते हैं, और वहां उन्हें बोलने का मौका कोलकाता के राजभवन के मुकाबले काफी अधिक मिल रहा है। लेकिन राज्यसभा से परे भी वे सार्वजनिक रूप से बहुत से मुद्दों पर अपनी राय रखते रहते हैं। अभी उन्होंने संसद और विधानसभाओं के पीठासीन अधिकारियों के एक सम्मेलन में कहा कि संसद के बनाए कानून को किसी आधार पर अगर अदालत खारिज करती है तो यह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं होगा। उन्होंने बहुत खुलासे से सुप्रीम कोर्ट की आलोचना करते हुए कहा कि संसद सबसे ऊपर है, और किसी भी लोकतांत्रिक समाज में जनमत की प्रधानता ही उसके मूल ढांचे का आधार है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका या कार्यपालिका संसद में कानून बनाने, या संविधान संशोधन करने की ताकत को नामंजूर नहीं कर सकतीं। उन्होंने 1973 के सुप्रीम कोर्ट के एक बहुत ही चर्चित केशवानंद भारती मामले की चर्चा करते हुए कहा कि इस फैसले ने गलत मिसाल पेश की है, और अगर कोई भी संस्था संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति पर सवाल उठाती है, तो यह कहना मुश्किल होगा कि हम एक लोकतांत्रिक राष्ट्र हैं। सुप्रीम कोर्ट का इतिहास बताता है कि केरल सरकार के खिलाफ केशवानंद भारती के मामले में 13 जजों की बेंच के सामने देश के एक सबसे बड़े वकील नानी पालखीवाला ने जिरह की थी, और सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया था कि संविधान में संशोधन तो किया जा सकता है, लेकिन संविधान की प्रस्तावना के मूल ढांचे को नहीं बदला जा सकता। केशवानंद भारती केस पर इस फैसले की वजह से इस मामले को संविधान का रक्षक कहा जाता है।

अब इस पर लिखने की अधिक जरूरत इसलिए है कि उपराष्ट्रपति के न्यायपालिका पर हमले के एक पखवाड़े के भीतर ही, मानो उन्हें जवाब देते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चन्द्रचूड़ ने इसी फैसले को अभूतपूर्व बताया, और कहा कि संविधान को समझने और उसे लागू करने के मामले में यह फैसला एक ध्रुव-तारे की तरह जजों को रास्ता दिखाता है। उन्होंने बॉम्बे बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित पालखीवाला स्मृति व्याख्यान माला में कहा कि बदलते वक्त में जज संविधान में लिखी बातों की व्याख्या करते हैं, और केशवानंद भारती मामले में दिया गया फैसला भारतीय संविधान की आत्मा को बनाए रखने में मदद करता है। उन्होंने कहा कि 1973 की फैसला सफलता की ऐसी दुलर्भ कहानी है जिसका भारत के पड़ोसी देशों, नेपाल, बांग्लादेश, और पाकिस्तान ने भी अनुकरण किया। उन्होंने कहा कि जब जजों के सामने एक जटिल रास्ता होता है उस वक्त हमारे संविधान की मूल संरचना एक तारे की तरह इसकी व्याख्या करने वालों, और इस पर अमल करने वालों को एक दिशा देती है, और उनका मार्गदर्शन करती है। 

यह मामला हिन्दुस्तान के संविधान के तहत सरकारों की कानून बनाने और संविधान संशोधन करने की ताकत को सबसे बड़ी चुनौती था। मामला केरल से जुड़ा था लेकिन जब इस मामले पर फैसला आया तो इसने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी विचलित किया था। और 13 जजों की बेंच में से असहमति रखने वाले एक जज अजीतनाथ रे को फैसले से सहमति रखने वाले तीन सीनियर जजों के ऊपर ले जाकर भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया था। यह अपने आपमें एक अनोखा मामला था जब न्यायपालिका में इस तरह मनमानी से किसी को मुख्य न्यायाधीश बनाया गया था। केशवानंद भारती का यह मामला इस मामले में भी अनोखा था कि 13 जजों में से 9 जजों ने तो फैसले पर दस्तखत किए थे, लेकिन 4 जजों ने इस पर दस्तखत भी नहीं किया था।

लेकिन आज इस मुद्दे पर यहां लिखने का मकसद 1973 के उस ऐतिहासिक मामले और फैसले की चर्चा करना नहीं है। हमने उसकी चर्चा सिर्फ एक प्रसंग के रूप में की है जिसे लेकर आज सरकार के मनोनीत उपराष्ट्रपति, और देश के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई.चन्द्रचूड़़ के बीच एक अघोषित बहस छिड़ी है। सुप्रीम कोर्ट में 13 जजों से बड़ी कोई बेंच आज तक बनी नहीं है। ऐसे में यह कल्पना नहीं की जा सकती कि केन्द्र सरकार की तमाम हसरत के बावजूद संविधान की मूल संरचना को बदलना आसानी से मुमकिन होगा। बार-बार ऐसा लगता है कि मोदी सरकार संविधान की कुछ बुनियादी बातों को बदलना चाहती है, लेकिन संसद में अपार बहुमत होते हुए भी, अधिकतर राज्यों में बहुमत होते हुए भी ऐसा कोई संशोधन उसके लिए आज मुमकिन नहीं दिख रहा है क्योंकि 14 जजों की संविधानपीठ के 1973 के फैसले को पार पाना आसान नहीं है। सिर्फ संसद और विधानसभाओं से यह बुनियादी फेरबदल शायद नहीं किया जा सकेगा। 

हिन्दुस्तानी लोकतंत्र की यह एक खूबी है कि लोकसभा और राज्यसभा में अलग-अलग पार्टियों या गठबंधनों के बहुमत होने का एक इतिहास रहा है। केन्द्र और राज्यों में ऐसी ही अलग-अलग सरकारों का इतिहास रहा है। न्यायपालिका में कार्यपालिका या विधायिका से असहमति का एक इतिहास रहा है। यही वजह थी कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा के चुनाव को अवैध ठहराया था, बाद में आपातकाल से जुड़े हुए कुछ संविधान संशोधनों को खारिज किया गया था, और सुप्रीम कोर्ट और संसद के बीच असहमत होने पर सहमति का एक रिश्ता बना हुआ था। लोगों को याद होगा कि एक अभूतपूर्व संसदीय बाहुबल के चलते प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के दिए फैसले को संविधान संशोधन करके खारिज कर दिया था। लेकिन पिछले कुछ महीनों से केन्द्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच जो तनातनी सार्वजनिक रूप से बढ़ती जा रही है, उसे देखते हुए यह सोचने की जरूरत लग रही है कि अगर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा छांटे गए जजों के नामों को मंजूरी देने के अधिकार को केन्द्र सरकार एक रणनीति की तरह इस्तेमाल करेगी, तो हो सकता है कि धीरे-धीरे करके सुप्रीम कोर्ट में वह अपनी सोच से सहमति रखने वाले जजों का बहुमत बनाने में कामयाब हो जाए। ऐसा दिन देश के लिए अच्छा नहीं होगा क्योंकि आपातकाल में इंदिरा गांधी की ओर से प्रतिबद्ध न्यायपालिका का एक नारा दिया गया था, और वह अगर कामयाब हो जाता, तो देश में संसदीय लोकतंत्र के बजाय महज सरकारी लोकतंत्र रह जाता। 

देश के कानूनी समझ रखने वाले तबके को इन बातों को गौर से देखना चाहिए, और देश की आज की नाजुक जरूरतों पर, आगे खड़े हुए खतरों पर भी गौर करना चाहिए। ऐसी संवैधानिक जटिलताएं कोई लुभावना चुनावी नारा तो नहीं बन सकतीं, लेकिन विचार गढऩे वाले तबकों में से कुछ लोग तो इस मुद्दे को समझ सकते हैं, और देश के व्यापक लोकतंत्र के हित में बाकी जनता के लिए इस रहस्य को सुलझाने की कोशिश कर सकते हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

बाल संन्यासियों से कितना समृद्ध हो सकता है धर्म?

  21 जनवरी 2023

 

हिंदुस्तान की हीरा राजधानी सूरत के एक कारोबारी जौहरी की आठ बरस की बेटी ने अभी सांसारिकता छोडक़र संन्यास लिया तो पहले हीरो से लदी हुई उसकी तस्वीर आई, और फिर सिर मुंडाए हुए जैन साध्वी के सफेद सूती कपड़ों में। उसके आसपास के लोगों का कहना है कि उसकी शुरू से धर्म में दिलचस्पी थी, और उसने कभी टीवी, मोबाइल या फिल्में नहीं देखीं, कभी वह मॉल या रेस्त्रां नहीं गई थी। उसके मां-बाप का कहना है कि वह साध्वी बनना चाहती थी, और अगर वह परिवार में रहती तो अपने करोड़पति-अरबपति पिता की वारिस रहती। जैन समाज में पहले भी बहुत से बच्चे दीक्षा लेकर घर छोडक़र जा चुके हैं, लेकिन आठ बरस की यह लडक़ी शायद उनमें भी कुछ कम उम्र की ही है। गुजरात में एक बड़े समारोह में देवांशी संघवी नाम की इस बच्ची की दीक्षा हुई, और वह बाकी साध्वी के साथ चली गई। 

जैन समाज में नाबालिग और नाबालिगों में भी बहुत कम उम्र के बच्चों के संन्यास ले लेने की खबरें हर कुछ महीनों में आती रहती हैं। इस समाज के भीतर के कुछ लोग, और बाहर के कुछ लोग यह मानते हंै कि यह कम उम्र बच्चों के साथ एक धार्मिक ज्यादती है जिन्होंने अभी दुनिया को ठीक समझा नहीं है। जैन समाज के धर्मालु लोग लगातार ऐसी दीक्षा के हिमायती बने रहते हैं, और उनका यह मानना है कि इसे बच्चों पर जुल्म करार देते हुए अदालत तक जाने वाले लोग गलत थे। यह मामला एक वक्त मुंबई हाईकोर्ट तक पहुंचा था, और उसका नतीजा अभी हमें ठीक से याद नहीं है। लेकिन अदालत ने सुनवाई के दौरान एक वक्त इतना जरूर कहा था कि बच्चों की दीक्षा को लेकर कुछ तय किए जाने की जरूरत है। और जजों ने यह माना था कि आठ बरस की बच्ची की दीक्षा को लेकर मां-बाप के इन तर्कों को नहीं माना जा सकता कि बच्ची ने खुदी ने यह फैसला लिया है। 2008 की उस सुनवाई में बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि अदालत इतनी छोटी बच्ची के संन्यास को चुप बैठकर देखते नहीं रह सकती। उसी वक्त मानो इसके जवाब में गुजराती की एक पत्रिका ने जैन धर्म गुरुओं के लेखों का एक विशेषांक निकाला था जिसमें बाल दीक्षा की वकालत की गई थी। बाल दीक्षा विशेषांक में कई अदालतों के ऐसे आदेश अपने तर्क के रूप में छापे गए थे जिनमें अदालतों ने इस रीति-रिवाज का समर्थन किया था। राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में यह कहा था कि दीक्षा को लेकर नियम बनाना धार्मिक मामलों में दखल देना होगा। इस अदालत ने बाल दीक्षा को हिंदुओं के जनेऊ संस्कार की तरह माना था। 

बच्चों को धार्मिक दीक्षा दिलाकर उन्हें अगर पारिवारिक जीवन से अलग कर दिया जाता है, और बाकी जिंदगी के लिए संन्यासी जीवन में डाल दिया जाता है, तो यह हमारे हिसाब से उन बच्चों के मानवीय अधिकारों का हनन है। किसी को भी बालिग होने के पहले ऐसे संन्यासी जीवन में डालना उन बच्चों के अपने हितों के खिलाफ है जिन्होंने अभी पूरी दुनिया नहीं देखी है, आगे की पूरी जिंदगी को लेकर जिनका कोई अंदाज नहीं है। अपने परिवार में धार्मिक वातावरण देखकर कई बच्चों का इस तरह का रूझान हो सकता है, लेकिन उससे उनका वह फैसला स्वाभाविक फैसला नहीं माना जा सकता। जिस तरह वोट देने की एक उम्र होती है, गाड़ी चलाने की एक उम्र होती है, सेक्स की सहमति देने की भी एक न्यूनतम उम्र सीमा तय की गई है, एक उम्र के पहले शादी पर कानूनी रोक है। इसी तरह किसी के संन्यास पर उसके बालिग होने तक रोक होनी चाहिए। हमारी सामान्य समझ यह कहती है कि किसी धर्म के लिए भी यह ठीक नहीं है कि वह इतने छोटे बच्चों को परिवारों से अलग करके संन्यासी बनाए। इंसान इसी तरह के सामाजिक प्राणी हैं कि उनका विकास परिवार और समाज के बीच कई तरह के अंतरसंबंधों के चलते होता है, और उन सबसे उन्हें काटकर सिर्फ संन्यास जीवन में रखना उनके अपने शारीरिक और मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास के लिए ठीक नहीं है। जिन बच्चों की धर्म में अधिक दिलचस्पी है, वे परिवार के भीतर रहते हुए भी धर्म को बेहतर हद तक समझ सकते हैं। इसके बाद जब वे बालिग हों, तो वे अपने परिपक्व विवेक का इस्तेमाल करके संन्यास ले सकते हैं।

जो लोग इसे एक धार्मिक रिवाज मानते हैं, और इसके लिए नियम बनाने को धर्म में दखल मानते हैं, उन लोगों को यह भी समझना चाहिए कि एक वक्त हिंदू समाज में, और शायद कुछ दूसरे समाजों में भी बालविवाह प्रचलित थे, और उसके खिलाफ कड़े कानून बनाने, सामाजिक जागरूकता फैलाने, और सरकारी रोकथाम करने के बावजूद आजतक दस-बीस फीसदी शादियां  बालविवाह हो रही हैं। इसी तरह एक वक्त हिंदू धर्म में पति खो चुकी महिला को सामाजिक दबाव में सती बनाने की अमानवीय परंपरा थी, जिसे कड़ा कानून बनाकर किसी तरह रोका गया। आज भी मुस्लिमों के बीच नाबालिग लडक़ी की शादी को सामाजिक, और मुस्लिम विवाह कानून के तहत मंजूरी हासिल है, और इसके खिलाफ भी एक जनमत तैयार किया जा रहा है। जैन समाज को भी यह सोचना चाहिए कि अपरिपक्व उम्र में बच्चों का लिया गया फैसला इस समाज को बेहतर साधू-साध्वी नहीं दे सकता। अगर समाज को अपने धर्म को परिपक्व बनाकर रखना है, तो उसे कम उम्र बच्चों को संन्यास में भेजने का काम बंद करना होगा। यह तर्क किसी काम का नहीं है कि ये छोटे बच्चे अपनी मर्जी से संन्यास लेते हैं। इतने छोटे बच्चे अपनी मर्जी से पिकनिक पर भी नहीं जा सकते, कोई फिल्म देखने भी नहीं जा सकते, किसी दोस्त या सहेली के घर की दावत में भी नहीं जा सकते, इसलिए यह मान लेना निहायत गलत बात होगी कि वे संन्यास में जाने का फैसला लेने के काबिल हैं। जब परिवारों का माहौल बहुत अधिक धार्मिक होता है, जब परिवार ऐसी ही सामाजिकता के बीच जीता है, जब ऐसे बच्चों के सामने बार-बार ऐसी कहानियां आती हैं कि किस शहर में जैन समाज के किस उम्र के बच्चे या बच्ची ने संन्यास ले लिया है, तो उनकी बचपन की सोच उसी के असर से प्रभावित होने लगती है। ऐसे असर के बीच लिया गया कोई फैसला उन बच्चों का परिपक्व फैसला नहीं माना जा सकता। हमारा यह भी मानना है कि कोई भी धर्म बाल संन्यासियों से समृद्ध नहीं हो सकता, उसके लिए कम से कम बालिग हो चुके, सांसारिकता को देख चुके, और उसके बाद उसे छोडऩे का फैसला ले चुके संन्यासियों की जरूरत होती है। हिंदुस्तान का अदालती कानून धार्मिक मामलों से बचते हुए चलता है, लेकिन जैन समाज को किसी अदालत का इंतजार नहीं करना चाहिए, उसे खुद होकर ऐसा सुधारवादी कदम उठाना चाहिए कि सिर्फ वयस्क लोग ही संन्यास का फैसला ले सकें।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 जनवरी 2023

 

(Daily Chhattisgarh)

केन्द्र और कोर्ट में अब आमने-सामने बातचीत

 20 जनवरी 2023

 

सुप्रीम कोर्ट और केन्द्र सरकार के बीच का टकराव कल एक नई ऊंचाई पर पहुंच गया जब मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने अपने छांटे गए जजों के नाम पर केन्द्र की आपत्ति को सार्वजनिक किया, और उसका सार्वजनिक रूप से जवाब भी दिया। केन्द्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू पिछले कुछ महीनों से लगातार एक या दूसरी वजह निकालकर सुप्रीम कोर्ट पर हमले कर रहे थे, और सुप्रीम कोर्ट ने उनसे जख्मी होने के बजाय सार्वजनिक रूप से उनका सामना करना तय किया। अदालत से मिली जानकारी के मुताबिक मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चन्द्रचूड़ ने जजों के नाम तय करने वाले सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के बाकी सदस्यों से चार दिनों तक चर्चा करने के बाद यह फैसला लिया कि उसके भेजे नामों पर केन्द्र की आपत्ति को सार्वजनिक कर दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार की आपत्ति में शामिल खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट को भी उजागर कर दिया। यह एक अभूतपूर्व कदम है, और मौजूदा सीजेआई के बाद जो सीजेआई बनेंगे, वे भी इस कॉलेजियम में शामिल थे, इसलिए इसे सुप्रीम कोर्ट जजों के बीच एक व्यापक सहमति से की गई आपत्ति माना जाना चाहिए। 

केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के भेजे गए नामों पर लंबे समय तक बैठने की आदी रही है, और जिन नामों से वह सहमत नहीं रहती है, उन्हें अंतहीन समय तक रोकते रही है। पिछले कुछ दिनों में कानून मंत्री ने सार्वजनिक रूप से यह कहा कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट जजों को लिखा है कि जज छांटने वाले कॉलेजियम में केन्द्र सरकार का प्रतिनिधि भी रहना चाहिए। एक दूसरी बात यहां पर यह भी प्रासंगिक है कि देश के अलग-अलग बहुत से तबकों के जानकार लोग भी यह मानते हैं कि संविधान निर्माताओं की ऐसी कोई सोच नहीं थी कि जजों को छांटने का काम जज ही करें। इस पर केन्द्र सरकार से परे भी कई लोग लिखते और बोलते आए हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने जज छांटने के लिए कॉलेजियम की जो व्यवस्था खुद तय कर ली है, वह संविधान की भावना के अनुकूल नहीं है, और इसके लिए कोई दूसरी व्यवस्था होनी चाहिए। इसलिए केन्द्रीय कानून मंत्री की यह ताजा मांग बहुत अटपटी, अनोखी, और अभूतपूर्व नहीं है। लेकिन पिछले काफी समय से केन्द्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच जो तनातनी चल रही है, उसे देखते हुए कल का सुप्रीम कोर्ट का जनता की अदालत में जाने का फैसला पूरी तरह से अनोखा और अभूतपूर्व है। खासकर दिल्ली हाईकोर्ट के लिए एक वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ कृपाल के नाम को कॉलेजियम ने डेढ़ बरस से भी पहले केन्द्र सरकार को भेजा था, और केन्द्र ने इस नाम पर इसलिए आपत्ति की थी कि सौरभ कृपाल एक स्वघोषित समलैंगिक हैं, और उनका साथी स्विस नागरिक है। केन्द्र की इस आपत्ति पर कॉलेजियम ने कल सार्वजनिक रूप से कहा कि यह मानने का कोई कारण नहीं है कि जज-उम्मीदवार का साथी जो स्विस नागरिक है, हमारे देश के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार करेगा क्योंकि उसका मूल देश भारत का एक मित्रराष्ट्र है। कॉलेजियम ने केन्द्र सरकार को यह भी याद दिलाया कि संवैधानिक पदों पर मौजूदा और पिछले कई ऐसे लोग रहे हैं जिनके पति-पत्नी विदेशी नागरिक थे, और हैं। 

हम इस बहस के सार्वजनिक होने के पहलू को लेकर खुश हैं। हम बार-बार इसी जगह जजों की नियुक्ति के लिए अमरीकी व्यवस्था का हवाला देते आए हैं जिसमें वहां के सुप्रीम कोर्ट के लिए अमरीकी राष्ट्रपति अपनी पसंद से जज छांटते हैं, लेकिन फिर ऐसे उम्मीदवारों को संसद की एक समिति के सामने लंबी खुली सुनवाई का सामना करना पड़ता है जिसमें उनकी पिछली जिंदगी, पिछले काम, पिछली और मौजूदा सोच, ऐसे हर पहलू पर सवालों का सामना करना पड़ता है, और जवाब देना पड़ता है। इसके बाद संसदीय कमेटी ही ऐसे उम्मीदवार को जज बनाना पसंद या नापसंद करती है। यह खुली सुनवाई अमरीकी टीवी पर भी आती है, और वहां की जनता को यह अच्छी तरह मालूम रहता है कि अगर इस व्यक्ति को जज बनाया गया तो उनकी सोच क्या रहेगी, उनके पहले के फैसले कैसे रहे हैं, वे गर्भपात से लेकर महिला अधिकारों और रंगभेद के मुद्दों पर क्या सोचते रहे हैं। जनता को जजों के इतिहास और उनकी सोच के बारे में सब पता रहे, यह एक अधिक पारदर्शी व्यवस्था है। इस हिसाब से हम सुप्रीम कोर्ट के इस अभूतपूर्व फैसले से सहमत हैं कि जजों के बारे में कॉलेजियम और केन्द्र के बीच जो कुछ चर्चा होती है, वह देश की जनता के सामने रखी जानी चाहिए। हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने कुछ हफ्ते पहले ही ठीक यही सिफारिश की थी कि इन बातों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। 

देश में सूचना का अधिकार लागू है। इसके तहत जनता सरकार और सार्वजनिक संस्थाओं से कई किस्म की जानकारी मांग सकती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने आपको इसकी पहुंच से भी बहुत हद तक बाहर रखा था, इसलिए जनता अदालतों के रहस्य से दूर ही रह जाती है। अब यह वक्त आ गया है कि देश में सूचना पाने के अधिकार को बदलकर सूचना देने की जिम्मेदारी बनाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को भी जनता को यह बताना चाहिए कि किन लोगों के नाम जज बनाने के लिए किस वजह से छांटे गए हैं, और सरकार को भी यह बताना चाहिए कि उसे इनमें से कौन से नाम किस वजह से नामंजूर हैं। इसे कॉलेजियम के एकाधिकार और केन्द्र सरकार के एकाधिकार के खोल से ढांककर नहीं रखना चाहिए। केन्द्र सरकार आज यह मांग कर रही है कि कॉलेजियम में उसका प्रतिनिधि भी होना चाहिए। हमारा मानना है कि जजों के नाम तय करने में सरकार के बजाय संसद का प्रतिनिधि होना बेहतर होगा, और जिस तरह सीबीआई के डायरेक्टर, और कुछ दूसरे लोगों को चुनने के लिए प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता एक कमेटी में होते हैं, उसी तरह संसद की एक कमेटी होनी चाहिए जिसकी कि जजों के चयन में हिस्सेदारी हो। अब हमारी यह भावना किस तरह अमल में आ सकती है, इसके लिए एक संवैधानिक व्यवस्था जरूरी होगी, और देखना होगा कि यह नौबत कैसे लाई जा सकती है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

सत्ता को छोडक़र यूं चले जाना तो हिन्दुस्तानियों की बड़ी बेइज्जती करना है...

  19 जनवरी 2023

 

हिन्दुस्तान का वैसे तो न्यूजीलैंड से कुछ अधिक लेना-देना नहीं है, लेकिन आज की वहां की एक खबर कुछ सोचने, और उस पर लिखने का मौका दे रही है जो कि हिन्दी और हिन्दुस्तानी पाठकों की दिलचस्पी का भी हो सकता है। वहां की प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न ने कहा है कि वे 7 फरवरी के पहले इस्तीफा दे देंगी। उनका कहना है कि वे 6 साल तक इस चुनौतीपूर्ण ओहदे को सम्हालने के बाद अब महसूस करती हैं कि उनके पास योगदान देने के लिए कुछ खास नहीं बचा है, इसलिए वे अगला चुनाव भी नहीं लड़ेंगीं। वे 2017 में ही 37 साल की उम्र में दुनिया की सबसे कम उम्र की महिला प्रधानमंत्री बनी थीं। और अब 42 बरस की उम्र में वे एक कार्यकाल खत्म करके सरकार से हट भी जा रही हैं। 

हिन्दुस्तान के लोगों को यह बात बड़ी अजीब लग सकती है। यहां पर 75 बरस की उम्र पार करने के बाद अगर किसी को संसद या विधानसभा का चुनाव लडऩे से रोका जाता है, तो वे हाथ में थमी छड़ी को उठाकर बगावत पर उतारू हो जाते हैं, खुद तो चुनाव लड़ ही लेते हैं, अपने कुनबे को भी बगावत में उतार देते हैं। पार्टियां भी सयान के ऐसे तेवरों से बचने के लिए उनके जीते जी ही उनके कुनबे को उनकी सीट पर टिकट देने का समझौता कर लेती हैं। कुल मिलाकर एक नेता एक सीट पर अपने कुनबे का पीढ़ी-दर-पीढ़ी कब्जा मानकर चलते हैं। फिर अगर राजनीति में कुनबापरस्ती है, तो फिर लालू, मुलायम, सोनिया, फारूख, मेहबूबा, बादल, चौटाला, पवार, ठाकरे, शुक्ल परिवारों के एक से अधिक लोग भी एक समय सांसद-विधायक हो सकते हैं, एक से अधिक सरकारों में हिस्सेदार हो सकते हैं, संसद, विधानसभा, और पार्टी संगठन सब पर काबिज हो सकते हैं। फिर यह भी है कि वे मरने तक सत्ता पर काबिज रहते हैं, और उनके बाद अगली पीढ़ी चिता की आग से तपी हुई ही शपथ ले लेती है। इसलिए न्यूजीलैंड की इस नौजवान प्रधानमंत्री की बात भारत के बहुत से लोगों को बेइज्जत करने वाले आईने की तरह लग सकती है जिसमें वे सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग से होते हुए कलियुग तक अपने कुनबे के लिए सीट की गारंटी कर लेते हैं। 

न्यूजीलैंड के इस ताजा फैसले से हिन्दुस्तान के बारे में यह भी सीखने और समझने मिलता है कि एक नौजवान प्रधानमंत्री कुल 6 बरस काम करने के बाद अगर यह पाती है कि उसके पास और अधिक योगदान देने को कुछ नहीं है, तो वह अपनी पार्टी के दूसरे नेता के लिए कुर्सी खाली करके हट जाती है। और यह महिला किसी कुनबापरस्ती के चलते इस जगह नहीं पहुंची थी, उसने योरप के समाजवादी आंदोलन में 17 बरस की उम्र से काम करना शुरू कर दिया था, और राजनीतिक आंदोलनों में हिस्सा लेने लगी थी। एक बहुत लंबे और बहुत सक्रिय राजनीतिक जीवन के बाद वह पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री के ओहदे के लिए चुनी गई थी। और उसने इराक पर हमले के फैसले को लेकर 2003 के ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर से रूबरू कड़े सवाल किए थे। ऐसे सक्रिय जीवन और सब कुछ अपने बूते हासिल करने के बाद एक महिला अपने देश के इस सबसे बड़े ओहदे को छोडक़र जिस आसानी से, जिस स्वाभाविक तरीके से चली जा रही है, वह सीखने लायक बात है। हिन्दुस्तान में लोग अपनी पार्टी को बेच खाते हैं, पार्टी के सांसदों और विधायकों की थोक पैकिंग बनाकर उसे दुश्मन पार्टी के हाथ बेच देते हैं, और कुर्सी पर बने रहते हैं, या पहुंच जाते हैं। कुर्सी ही हिन्दुस्तान में सब कुछ है, वह महज कामयाबी नहीं है, वही महानता भी है। जिसे कुर्सी हासिल नहीं हुई, उसे कभी महान का दर्जा नहीं मिल सकता, और जिसे कुर्सी हासिल हो गई, वह हजार जुर्म, और हजार नाकामयाबी के बाद भी महान गिनाते हैं। 

यह बात तो निर्वाचित नेताओं को लेकर है, लेकिन लोग अपने राजनीतिक संगठन के भीतर भी कोई कुर्सी छोडऩा नहीं चाहते। अपने चुनाव क्षेत्र को अपनी जागीर मानकर चलते हैं, अपने साथ-साथ धीरे-धीरे जीवनसाथी और आल-औलाद, और बहू-दामाद, सबको संसद-विधानसभा, और पार्टी में घुसाने में लगे रहते हैं। मरने के बाद भी वे अपने कुनबे से किसी को अनुकम्पा टिकट दिलाने में कामयाब हो जाते हैं। यह बात तो राजनीति के लोगों की हुई, लेकिन हिन्दुस्तान में गौशाला, अनाथाश्रम, शिक्षा समिति और दूसरे किस्म के ट्रस्ट या सभा समितियों में लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी काबिज रहते हैं, सरकारी अनुदान पर पलते हैं, और वह अनुदान मानो उनके डीएनए को मिला हो। वे संस्थाओं की ‘समाजसेवा’ में इतने समर्पित रहते हैं कि धरती पर कोई और काबिल इंसान उन्हें दिखते ही नहीं। ऐसे देश में मोटी कमाई वाली राजनीतिक और सरकारी कुर्सियों के लिए लोग पंचतत्व में विलीन हो जाने के बाद भी, कब्र में दफन हो जाने के बाद भी ‘सेवा’ करने पर आमादा रहते हैं। ऐसे तमाम लोगों को न्यूजीलैंड की 42 बरस की भूतपूर्व प्रधानमंत्री बेइज्जती का सामान ही लग सकती है। 

भारत में न सिर्फ राजनीति में, बल्कि अदालतों में जजों के बीच भी, वकालत और डॉक्टरी जैसे पेशों में भी, और कारखानों से लेकर कारोबार तक कुनबापरस्ती का जो बोलबाला है, और लोग जिस तरह पहले कब्जे के बाद अंतिम संस्कार तक काबिज रहते हैं, उसे देखते हुए यह सोचने की जरूरत है कि क्या वे सचमुच मरने तक योगदान देने की हालत में रहते हैं, और क्या उनका डीएनए ही सामाजिक संगठनों को चलाने के लिए सबसे हुनरमंद डीएनए है? हिन्दुस्तान के लोगों को अपने इर्द-गिर्द देखना और सोचना चाहिए, आज की यह चर्चा बस इसी मकसद से है।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 17 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

कड़े कानून कड़ी नीयत ही नहीं बताते, वे बचने की बड़ी कोशिश भी बताते हैं

  17 जनवरी 2023

 

सभ्य दुनिया वह होती है जो एक-दूसरे से कुछ सीखने को तैयार रहती है। अलग-अलग बहुत से देशों में किसी एक चर्चित जुर्म के बाद कानून बनाने वाली संसद या विधानसभा के सामने यह बड़ा तनाव खड़ा हो जाता है कि वोटरों से भरे समाज को संतुष्ट कैसे किया जाए। ऐसे में जुर्म को सुलझाने, मुजरिमों को पकडऩे, और अदालत में सजा दिलवाने में कामयाबी का काम आसान नहीं रहता है, और बहुत से मामलों में मुमकिन भी नहीं रहता है। ऐसे में निर्वाचन से संसद और विधानसभा तक पहुंचने वाले नेताओं के लिए सबसे सहूलियत का काम रहता है कि बेअसर कानून, बेअसर इंतजाम को छुपाने के लिए उसके सामने और कड़े कानून की एक दीवार खड़ी कर दी जाए। जिस तरह परदेसी मेहमानों की नजरों से छुपाने के लिए अहमदाबाद और इंदौर में गरीब बस्तियों के सामने दीवारें खड़ी कर दी गई थीं, ताकि संपन्न मेहमानों को यहां के गरीब न दिखें, ठीक उसी तरह एक नाकामयाब प्रशासन के सामने अधिक कड़े कानून की दीवार खड़ी कर दी जाती है। हिन्दुस्तान में निर्भया नाम से चर्चित बलात्कार और भयानक हिंसा के एक मामले के बाद देश भर में उठ खड़े हुए जनआक्रोश को देखते हुए अलग से कानून बनाया गया, और कई राज्यों में सामूहिक बलात्कार या बच्चों से बलात्कार पर मौत की सजा जोड़ दी। इससे नेताओं और राजनीतिक दलों को अपनी सरकारों की नाकामयाबी की तरफ से ध्यान मोडऩे की एक तरकीब मिली, और आम लोगों को ऐसा लगा कि इससे बलात्कार थम जाएंगे। सच तो यह है कि उसके बाद से बलात्कार के साथ हत्याएं अधिक होते दिख रही हैं क्योंकि जब बलात्कार पर भी सजा उतने ही मिलनी है जितनी कि कत्ल से मिलनी है, तो फिर एक गवाह और सुबूत को छुपा क्यों न दिया जाए? 

अभी धरती के दूसरे सिरे, अमरीका में एक मामला हुआ जिससे वहां के कानून की बेइंसाफी का इतिहास सामने आया। खुद अमरीका में तो यह कभी इतिहास बना ही नहीं था क्योंकि एक नाजायज कड़ा कानून बनाकर जुर्म रोकने की यह कोशिश वहां तो हमेशा चर्चा में थी, लेकिन हमारे सरीखे दूर बैठे हुए लोगों को इसके बारे में मालूम नहीं था। अभी वहां की जेल से 20 बरस कैद के बाद 55 बरस के एक आदमी को जब रिहा किया गया, तो वहां के एक कानून की बेइंसाफी फिर खबरों और चर्चा में आई। वैसे तो कैलिफोर्निया अमरीका का सबसे प्रगतिशील और उदार राज्य माना जाता है, लेकिन वहां 1990 के दशक में 12 बरस की एक बच्ची का अपहरण हुआ था, और उसका कत्ल कर दिया गया था। उस वारदात को लेकर न सिर्फ इस अमरीकी राज्य में, बल्कि पूरे देश में जुर्म की दहशत फैल गई थी, और कैलिफोर्निया में तीसरे जुर्म (थ्री स्ट्राइक्स) नाम का एक कुख्यात कानून बनाया था जिसके तहत किसी भी व्यक्ति को किसी अहिंसक तीन अपराधों पर भी उम्रकैद सुनाई जा सकती थी। अगर वे किसी दुकान में सामान चुराते पकड़ा गए, या उनके पास कोई नशा मिल गया, या उन्होंने कोई उठाईगीरी कर दी, तो ऐसा तीसरा जुर्म साबित होते ही उन्हें उम्रकैद की सजा देने का कानून बनाया गया। एक अपहरण और कत्ल से फैली दहशत से जूझती हुई राज्य और संघीय सरकारों के सामने जनता को संतुष्ट करने की एक चुनौती थी, और उस वक्त के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भी इस कानून को मंजूरी दे दी थी। करीब आधे अमरीकी राज्यों ने इस कानून को अपना लिया था। ऐसे ही कानून के तहत कैलिफोर्निया में एक बेघर, बेरोजगार नौजवान डेविड को जब एक घर के गैरेज से कुछ सिक्के चुराने पर गिरफ्तार किया गया, तो उसके पास से 14 डॉलर (हिन्दुस्तान के स्तर से 14 रूपये के बराबर) मिले थे, और पहले के दो अहिंसक जुर्म के साथ इस ताजा जुर्म को जोडक़र जज ने उसे 35 बरस या उम्रकैद की सजा सुनाई थी। दरअसल 1994 में जब यह थ्री स्ट्राइक्स कानून बना था, तब इस राज्य में दस बरस के भीतर छोटे-छोटे तीसरे जुर्म पर करीब 35 सौ लोगों को उम्रकैद सुना दी गई थी, और वे मरने के लिए जेल भेज दिए गए थे। डेविड को 14 डॉलर चुराने के जुर्म में उम्रकैद भी दी गई थी, और 10 हजार डॉलर का जुर्माना भी सुनाया गया था। वह अफ्रीकी मूल का एक बेघर बेरोजगार था, जिसने इतनी रकम अपनी पूरी जिंदगी में कभी नहीं देखी थी। वह बचपन से परिवार और जगह बदलते जाने का शिकार था, और गरीबी के चलते वह किसी काम के लायक भी नहीं बन पाया था, और राह से भटक गया था। बहुत बाद में जाकर 2012 में अमरीका ने यह पाया कि इस तरह की सजा नाजायज है, और फिर ऐसे कैदियों के मामलों को देखकर उनमें से कुछ को छोडऩा शुरू किया गया, और उसी के तहत 20 बरस की कैद के बाद डेविड रिहा किया गया, और उसका परिवार उसके स्वागत को बांहें फैलाए तैयार था।

अमरीका के इस कानून को लेकर सामाजिक इंसाफ और समानता पर भरोसा रखने वाले लोगों को कभी भरोसा नहीं रहा। उन्होंने यह माना कि इसकी सबसे बुरी मार उन लोगों पर पड़ी जो कि सामाजिक गैरबराबरी के शिकार थे। कैलिफोर्निया में इस कानून के तहत उम्रकैद पाने वाले लोगों में अधिकतर लोग गरीब थे, काले थे, दूसरे अश्वेत थे, और हालात के मारे हुए लोग थे। कानून ही ऐसा था कि बहुत मामूली से अहिंसक जुर्म के लिए भी गरीबों को पूरी जिंदगी के लिए जेल में डाल दिया जा रहा था। अमरीका के इन मामलों को देखकर हिन्दुस्तान के बारे में सोचें, तो यहां पर दलित-आदिवासी, गरीब, मुस्लिम अल्पसंख्यक तबकों के लोग ही जेलों को भरे हुए हैं। उनकी गरीबी और सामाजिक हालत उन्हें जुर्म की ओर मोड़ भी देती है, और हिन्दुस्तान की महंगी और मुश्किल अदालतें उन्हें इंसाफ पाने का अधिक मौका भी नहीं देती हैं। नतीजा यह होता है कि वे फैसले के इंतजार में ही संभावित सजा से अधिक वक्त जेल में गुजार देते हैं। और जैसा कि अमरीका के इस कानून का तजुर्बा रहा है कि इसकी वजह से कहीं जुर्म कम नहीं हुआ, जबकि इस कड़े कानून को बनाने का सबसे बड़ा मकसद ही जुर्म में कमी लाना था। इसी तरह हिन्दुस्तान में बलात्कार पर मौत की सजा से बलात्कार में कोई कमी हुई हो ऐसा नहीं दिख रहा है, बल्कि बलात्कार के बाद हत्या अधिक सुनाई दे रही है। अब अमरीका में लोग खुलकर यह मान रहे हैं कि एक अपहरण और कत्ल से फैली दहशत कम करने के लिए निर्वाचित सरकारों ने इस तरह का कड़ा कानून बनाया था, और यह कि निर्वाचित लोगों के बनाए सारे कानून जायज नहीं होते हैं।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 16 जनवरी 2023


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आईआईटी के मन में तुलसी के प्रति अपार सम्मान जारी है

  16 जनवरी 2023

 

गोस्वामी तुलसीदास की रामचरित मानस को लेकर छिड़ी ताजा बहस में दलितों का मुद्दा भी सामने आ रहा है कि किस तरह उन्होंने शूद्रों को प्रताडऩा (ताडऩ या पिटाई) का हकदार लिखा था। अब वह बहस तो बहुत से और लोग आगे बढ़ा रहे हैं, हम भी कल इसी पेज पर उस बारे में लिखा है, लेकिन आज हिन्दुस्तान के शूद्रों के बारे में। विख्यात अंतरराष्ट्रीय विज्ञान पत्रिका नेचर ने अभी दुनिया के कुछ देशों के बारे में रिपोर्ट छापी है कि किस तरह वहां पर विशेष दर्जे के लोग प्रमुख विश्वविद्यालयों में अधिकतर सीटों पर काबिज हो जाते हैं। दुनिया के कुछ और देशों के बारे में भी इसमें है, और साथ-साथ हिन्दुस्तान के बारे में भी इसमें एक रिपोर्ट है। भारत में दलित और आदिवासी सबसे ही पिछड़े हुए तबके हैं, और रिजर्वेशन के बावजूद उनकी हालत आज कैसी है, यह इन आंकड़ों से दिखाई पड़ता है। इस पत्रिका की रिपोर्ट बताती है कि देश भर के विश्वविद्यालयों में अगर ग्रेजुएशन तक की गिनती देखें, तो आदिवासी छात्र-छात्राओं की सीटें आधी भी नहीं भरी हैं। इसके बाद देश के आईआईटी में देखें, तो वहां आदिवासी कोटा पीएचडी छात्रों में शायद चौथाई के करीब भरा है, वहां असिस्टेंट प्रोफेसर इस तबके की आरक्षित कुर्सियों पर दो-चार फीसदी ही हैं, और प्रोफेसर हंै ही नहीं। इस पत्रिका में प्रकाशित चार्ट देखकर हम अंदाज से इन आंकड़ों को देख रहे हैं। देश भर में दलित छात्रों की आरक्षित सीटों से अधिक छात्र-छात्राएं ग्रेजुएशन तक हंै। आईआईटी में पीएचडी छात्रों में भी दलितों की संख्या आरक्षित कोटे से कुछ अधिक है। लेकिन असिस्टेंट प्रोफेसर आरक्षित कोटे से करीब एक तिहाई ही हैं, एसोसिएट प्रोफेसर और भी कम हैं, और प्रोफेसर गिनती के हैं। जब देश में हर तरह के छात्र-छात्राओं और प्राध्यापकों को मिला लिया जाए, तो दलित और आदिवासी अपने निर्धारित कोटे से बहुत ही कम हैं, ओबीसी में भी ग्रेजुएशन के छात्रों को छोडक़र बाकी की हालत यही है। लेकिन अनारक्षित वर्ग के प्राध्यापक लगभग सौ फीसदी सीटों पर काबिज हैं, एसोसिएट प्रोफेसर की 90-95 फीसदी सीटों पर अनारक्षित वर्ग के लोग हैं, और सहायक प्राध्यापक की कुर्सियों पर भी 90 फीसदी से अधिक सामान्य वर्ग के लोग हैं। ये सारे आंकड़े 2019-20 तक के हैं, और ये सरकार और आईआईटी जैसे संस्थानों से लिए गए हैं। इस रिपोर्ट के आंकड़े सब कुछ कह रहे हैं, इसलिए हम अपनी अधिक टिप्पणियों के बिना भी इन आंकड़ों को लिखते चले जा रहे हैं। भारत के सबसे प्रमुख शैक्षणिक संस्थान, आईआईटी में प्रोफेसरों की कुर्सियों पर दलित-आदिवासी तबकों के एक फीसदी से कम प्रोफेसर हैं। इस बारे में इस पत्रिका से एक रिटायर्ड दलित वरिष्ठ प्राध्यापक ने कहा कि यह सोची-समझी नौबत है, वे लोग हम लोगों को कामयाब नहीं होने देना चाहते। ये उच्च शिक्षा संस्थान आरक्षण के नियम नहीं मान रहे, और सरकारें इन पर कुछ नहीं कर रहीं। कुछ प्राध्यापकों का मानना है कि अगर आरक्षित तबकों को उनका जायज हक दिलाना है, तो ऐसे बड़े इंस्टीट्यूट के डायरेक्टरों को जब तक सजा नहीं दी जाएगी, तब तक वंचित तबकों को उनका हक नहीं मिलेगा। 

इस रिपोर्ट के आगे के आंकड़े भी दिलचस्प हैं कि देश भर के विश्वविद्यालयों में ग्रेजुएशन में दलित और आदिवासी छात्र-छात्राओं की गिनती उनके वर्गों के आरक्षण से कुछ अधिक दिखती है, लेकिन जब बारीकी से देखें तो यह दिखता है कि यह सिर्फ आर्टस् के विषयों में है, दूसरी तरफ इंजीनियरिंग, चिकित्सा, विज्ञान, और टेक्नालॉजी में आदिवासी सीटें खाली पड़ी हैं, और यही हाल दलितों में भी है। मतलब यह है कि गांवों से निकलकर आने वाले दलित-आदिवासी छात्र-छात्राओं को विज्ञान की अच्छी पढ़ाई नहीं मिलती है, इसलिए वे कॉलेज पहुंचकर भी आर्टस् के विषय लेकर पढ़ते हैं। इनके मुकाबले ओबीसी की हालत कुछ बेहतर है जो कि अपने आरक्षित कोटे से अधिक सीटों पर हैं, लेकिन उनकी आबादी शायद सीटों के इस अनुपात से और अधिक मानी जाती है। 

तुलसीदास का शूद्रों को लेकर जो लिखा हुआ है, वह आज भी हिन्दू धर्म और समाज के अधिकतर हिस्सों में चले आ रहा नजरिया बना हुआ है। वो जिन तबकों को पिटाई के लायक पाते हैं, उन तबकों की आज भी देश भर में जमकर पिटाई हो रही है। वीडियो-कैमरों के सामने महिलाएं भी पीटी जा रही हैं, दलित तो पीटे ही जा रहे हैं, इनके मुकाबले जानवरों की हालत बेहतर है क्योंकि पशु प्रताडऩा के खिलाफ कड़ा कानून बन गया है। तुलसीदास ने ऐसी बातें लिखते समय यह कल्पना भी नहीं की होगी कि अनपढ़ लोगों के बीच भी मशहूर उनकी रामचरितमानस की उनकी सोच 21वीं सदी में देश की दिग्गज आईआईटी में अमल में आती रहेगी। हिन्दुत्ववादी लोगों के साथ एक बड़ी दिक्कत यह है कि दूसरे धर्म के लोगों के मुकाबले अपनी अधिक आबादी गिनाने के लिए तो वे दलित और आदिवासी तबकों को हिन्दू समुदाय में गिन लेते हैं, लेकिन जैसे ही दूसरे धर्मों के साथ कोई तुलना बंद होती है, तो घर के भीतर वे दलित-आदिवासी तबकों को मारने के लिए अपने चमड़े के बेल्ट उतार लेते हैं, इन तबकों के खानपान से लेकर इनके कामकाज तक को कुचलने की कोशिश करते हैं, और उन्हें एक सवर्ण जीवनशैली का गुलाम बनाने में जुट जाते हैं। यह पाखंड ही लोगों को, दलितों और आदिवासियों को कभी बौद्ध धर्म की तरफ ले जाता है, तो कभी ईसाई धर्म की तरफ। और फिर ऐसे एक-एक मामले को लेकर वे धर्मांतरण का हल्ला बोलने लगते हैं, और जब ऐसा हल्ला बोलने का मौका नहीं मिलता, तो फिर वे अपने घर के भीतर वर्ण व्यवस्था में सबसे नीचे वाले दलित-आदिवासियों को कूटने में लग जाते हैं। लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि तुलसी की रामकथा के वानर कौन थे? क्या वे जंगलों में बसे हुए आदिवासी ही नहीं थे जो कि वहां से गुजरते हुए राम के साथ हो गए थे, और जिन्हें सवर्ण, शहरी कथाकारों की कल्पना में वनवासी आदिवासी की जगह बंदर का रूप दे दिया गया था? आज कम से कम यह तो अच्छा हुआ कि बिहार के एक मंत्री ने रामचरितमानस को नफरत फैलाने वाला ग्रंथ करार दिया, तो रामचरितमानस के बचाव में, और उसके खिलाफ लोग टूट पड़े हैं, और ‘वानरों’ से लेकर दलितों तक का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आया है। 

(Daily Chhattisgarh)