भूख की खबर पर पत्रकार गिरफ्तार, देश पर धिक्कार

31 मार्च, 2023

  

बांग्लादेश में एक अखबार के रिपोर्टर को एक झूठी खबर प्रकाशित करने की तोहमत लगाकर सरकार ने जेल भेज दिया है। यह रिपोर्ट स्वतंत्रता दिवस पर 26 मार्च को प्रकाशित हुई थी जिसमें कई आम नागरिकों की जिंदगी के बारे में उनका कहा हुआ छापा गया था। एक मजदूर की यह बात इसमें छपी थी जिसका कहना था- इस आजादी का क्या मतलब है अगर हम चावल तक भी नहीं खरीद सकते। और इस मजदूर की बात बांग्लादेश में खाने-पीने के सामानों की महंगाई की एक सही तस्वीर थी। लेकिन यह अखबार एक विपक्षी दल का समर्थक है, और इसलिए सरकार ने इसे जनता के बीच असंतोष पैदा करने के लिए दुर्भावनापूर्ण इरादे से तथ्यों को पेश करना बताया है। और यह कार्रवाई एक नागरिक की तरफ से दर्ज करवाई गई शिकायत पर की गई है। अखबार के संपादक और प्रकाशक के खिलाफ भी इस खबर को लेकर कार्रवाई करने की बात बांग्लादेश के कानून मंत्री ने कही है। 

सरकारों का अगर बस चले तो वे सबसे पहले अखबारों से छुटकारा पाएं। देश-प्रदेश में विपक्ष के अलावा मुद्दों को उठाने का काम अखबार करता है, और उससे छुटकारा पाने के कई अलग-अलग तरीके अलग-अलग सरकारें ईजाद कर लेती हैं। इनमें यह बांग्लादेशी तरीका सबसे ही रद्दी तरीका है। बेहतर तरीका तो यह होता है कि आलोचक या असहमत अखबार की किसी कमजोर नब्ज को जकडक़र रखा जाए, और उसकी बोलती बंद रखी जाए। हिन्दुस्तान में ऐसी कई मिसालें हैं जिनमें अधिक आक्रामक या कटुआलोचक ईमानदार अखबार के सामने ऐसी स्थितियां पैदा कर दी गईं कि प्रकाशक को वह कारोबार बेचना पड़ा, और उसके बाद नए मालिकान सरकार के हिमायती आए। ऐसा सिर्फ देश में होता है यह जरूरी नहीं है, बहुत से प्रदेशों में ऐसा ही होता है। बांग्लादेश का यह ताजा मामला तो विपक्षी समर्थक अखबार में भी एक बड़ा मासूम मामला दिखता है। आज तो तकरीबन तमाम दुनिया में खाने-पीने की चीजों तक लोगों की पहुंच घटती जा रही है। महंगाई बढ़ रही है, लोग रोजगार खो रहे हैं, गुजारा मुश्किल से हो रहा है। ऐसे में अगर बांग्लादेश जैसे दिक्कत झेल रहे देश में किसी गरीब ने अपनी तकलीफ बताई है, और उस पर अखबार ने रिपोर्ट बनाई है, तो इस पर कार्रवाई शर्मनाक है। इससे बांग्लादेश की एक लोकतंत्र के रूप में इज्जत गिरती है, और आज दुनिया के बहुत से देश ऐसे हैं जो किसी देश के साथ कारोबारी या दूसरे किस्म के रिश्ते बनाते हुए यह भी देखते हैं कि वहां लोकतंत्र का क्या हाल है? लोगों को याद होगा कि भारत के कालीन उद्योग में बड़े पैमाने पर बाल मजदूर होने की वजह से बहुत से सभ्य और विकसित लोकतंत्रों ने हिन्दुस्तानी कालीन खरीदने से मना कर दिया था। आज बांग्लादेश में जितनी कम मजदूरी पर अंतरराष्ट्रीय ब्रांड के कपड़े-जूते बनते हैं, उस मजदूरी को लेकर भी योरप के देशों में बड़ी फिक्र जाहिर की जा रही है, और ऐसे ब्रांड के बहिष्कार की बात भी उठती है। 

हम आज की दुनिया में किसी एक देश में अलोकतांत्रिक बातों को उसका घरेलू मामला नहीं मानते, हमारा मानना है कि बाकी दुनिया को भी उस पर बोलने का हक है, जिस तरह बांग्लादेश के इस घरेलू मामले पर बोल रहे हैं, या जिस तरह एक जर्मन मंत्री ने राहुल गांधी के लोकसभा से निष्कासन पर कुछ कहा है, या जिस तरह संयुक्त राष्ट्र और अमरीका भारत के कुछ दूसरे साम्प्रदायिक मामलों पर बोल चुके हैं। दुनिया के देश ऐसे स्वायत्तशासी टापू नहीं हैं कि उन्हें एक-दूसरे को देखने की मनाही हो। लोगों की आवाजाही से लेकर कारोबार तक, और आर्थिक मदद से लेकर कर्ज तक, अनगिनत ऐसे मामले हैं जिनमें तमाम देश एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। इसलिए कोई देश अपनी प्रेस पर, अपनी जनता पर जुल्म करते हुए बाकी दुनिया को आंखें बंद रखने को नहीं कह सकते। लोग एक-दूसरे के मामलों पर बोलेंगे, और यही एक विश्व समुदाय की पहचान है। जिस तरह एक वक्त गांवों में लोगों का एक-दूसरे पर सामाजिक दबाव होता था, और लोग दूसरों का लिहाज करते हुए, गलत काम करने से झिझकते थे कि लोग टोकेंगे। आज भी हालत वैसी ही है। आज हिन्दुस्तानी अखबारों के संगठनों को भारतीय मामलों के साथ-साथ बांग्लादेश के इस ताजा मामले पर भी बोलना चाहिए। हिन्दुस्तान की सरकार तो शायद ही मुंह खोलेगी, लेकिन हिन्दुस्तान सरकार से परे एक देश भी है, लोकतंत्र भी है, समाज भी है, और एक जुबान भी है। हिन्दुस्तानी लोगों को दूसरे देशों के घरेलू मामलों पर अपनी राय जाहिर करना बंद नहीं करना चाहिए। दुनिया में जहां बेइंसाफी होते दिखे, वहां उसका विरोध करना चाहिए। आज संचार के साधनों और सोशल मीडिया के चलते अमरीकी राष्ट्रपति की किसी घोषणा के अगले ही पल हिन्दुस्तान के गांव में बैठे लोग भी उस पर अपनी राय जाहिर कर सकते हैं, और उसे कोई रोकते भी नहीं हैं। लगातार अंतरराष्ट्रीय मामलों पर बोलने से हो सकता है कि हिन्दुस्तानियों के भीतर अपने ही देश के अखबार को बचाने का हौसला भी जुट जाए। आज तो ईमानदार और मुखर अखबार सरकारों के निशाने पर रहते हैं, और देश की सरकारों की आलोचना में आम जनता को भी खतरा दिखता है। इसलिए बाहर की सरकारों के जुल्म पर बोलने की आदत जारी रखना चाहिए, जिससे धीरे-धीरे अपनी सरकार पर कुछ बोलने की हिम्मत भी किसी दिन आ जाए। 

जिस देश-प्रदेश की सरकार जनता की बुनियादी दिक्कतों, और उसकी जायज नाराजगी को भी अखबारों से दूर रखना चाहती है, या अखबारों को उनसे दूर रखना चाहती है, वे उसी तरह चुनाव हार सकती हैं जिस तरह इमरजेंसी में अखबारों को चापलूस बनाकर, उनकी आवाज खत्म करके इंदिरा गांधी हकीकत से दूर रहीं, और चुनाव हार बैठीं। जनता अगर चावल खरीदने की हालत में नहीं हैं, और सरकार यह भी सुनना नहीं चाहती हैं, तो फिर ऐसी भूख को बगावत में बदलने में अधिक वक्त नहीं लगता। हर सरकार को अखबारों को कुचलते हुए ऐसे खतरों को याद रखना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 31 मार्च 2023


 (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 मार्च 2023


 (Daily Chhattisgarh)

सैकड़ों वकीलों ने कानून मंत्री को दिखाया एक जरूरी आईना

30 मार्च, 2023

  

देश के तीन सौ वकीलों ने कानून मंत्री किरण रिजिजू के उस बयान के खिलाफ एक साझा बयान दिया है जिसमें मंत्री ने यह कहा था कि कुछ रिटायर्ड जज एंटी-इंडिया गैंग का हिस्सा बन गए हैं। इन वकीलों ने लिखा है कि सरकार की आलोचना किसी भी शक्ल में न देश की आलोचना होती है, न ही देशविरोधी होती है। उन्होंने लिखा है कि कानून मंत्री रिटायर्ड जजों को धमकी देकर बाकी नागरिकों को यह संदेश देना चाहते हैं कि आलोचना की किसी भी आवाज को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने लिखा- हम कानून मंत्री के बयान की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं, एक मंत्री से इस तरह के दादागिरी भरे बयान की उम्मीद नहीं थी। वकीलों ने लिखा कि पूर्व जजों और जिम्मेदार लोगों की अपने अनुभव पर आधारित राय चाहे सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी को पसंद न आए, लेकिन कानून मंत्री को ये अधिकार नहीं है कि वो इस पर अपमानजनक टिप्पणी करें। उल्लेखनीय है कि कानून मंत्री ने कुछ पूर्व जजों को एंटी-इंडिया गैंग का हिस्सा बताने के साथ-साथ यह भी कहा था कि इसके खिलाफ एजेंसियां कानून के दायरे में रहकर कदम उठाएंगी, और जो लोग देश के खिलाफ काम करेंगे उन्हें इसकी कीमत चुकानी होगी। 

वैसे तो वकीलों ने अपने बयान में वह काफी कुछ लिख दिया है जो हम अपनी राय के रूप में यहां लिखते, लेकिन फिर भी इस मुद्दे पर लिखने की जरूरत इसलिए है कि कानून मंत्री से परे भी बहुत से मंत्री और एनडीए-भाजपा के बहुत से नेता लगातार इस तरह की जुबान में बोलते हैं। लोकतंत्र में जनता और बाकी लोगों को अपनी राय रखने की जो आजादी मिली हुई है, वह बहुत से लोगों को बुरी तरह खटकती है। जब किसी धर्म, राजनीतिक विचारधारा, या व्यक्ति के प्रति अंधभक्ति से काम किया जा रहा हो, तो वहां कोई न्यायसंगत और तर्कसंगत बात भी पुलाव में कंकड़ की तरह खटकने लगती है। जो लोग इस भक्ति से परे की सोच रखते हैं, वे सत्ता और उसके भागीदारों की आंखों में किरकिरी की तरह चूभते हैं। इसलिए अलग-अलग विचारधाराओं के बहुत से प्रमुख वकीलों ने मिलकर यह साझा बयान बनाया है, और इसका कानूनी वजन चाहे कुछ भी न हो, इसका लोकतांत्रिक वजन बहुत होता है। और यह बयान में ठीक ही याद दिलाया गया है कि सरकार के आलोचक उतने ही देशभक्त होते हैं जितने कि सरकार में बैठे हुए लोग। 

लोकतंत्र सिर्फ एक शासनतंत्र नहीं होता, वह एक जीवनतंत्र भी होता है, और वह तानाशाही के मुकाबले सभ्यता का एक बहुत बड़ा विकास भी होता है। जब सभ्यता की फिक्र नहीं रह जाती, तब फिर बहुत सी अलोकतांत्रिक बातें भी कही जाती हैं। हिन्दुस्तान में आज यही हो रहा है। और जब राष्ट्रवादी उन्माद देश के लोगों का एक बड़ा ध्रुवीकरण करने में कामयाब हो गया है, तो फिर उसी को बढ़ाते चलना आसान नुस्खा बन जाता है। जिस तरह खबरों की वेबसाइटों पर जिन खबरों को अधिक हिट्स मिलने लगती हैं, वैसी खबरों को बढ़ावा देते चलना एक कारोबारी समझदारी मानी जाती है, ठीक उसी तरह जब धार्मिक और राष्ट्रवादी उन्माद की हांडी बार-बार चढ़ाना कामयाब होते जा रहा है, तो फिर असहमति के बयान देने वालों को पाकिस्तान भेज देने, टुकड़ा-टुकड़ा गिरोह करार देने, और राष्ट्रविरोधी गैंग कहने का बड़ा आसान हथियार सत्ता-समर्थक लोगों के हाथ लग गया है। इसी सिलसिले के चलते कभी जेएनयू को बदनाम करने की साजिश होती है, और पुलिस की कार्रवाई लोगों को बरसों तक बिना किसी मुकदमे के फैसले के, जेलों में बंद रखती है। दिक्कत यह है कि जब लोगों के दिमाग पर उन्माद हावी रहता है, तब फिर उन्हें लोकतांत्रिक मूल्यों का महत्व समझ नहीं आता। फिर आज जिस बहुसंख्यक तबके को एक नए किस्म की उन्मादी-आजादी मिली हुई है, उसे यही सबसे बेहतर लोकतंत्र लग रहा है। 

कानून मंत्री आज किसी एजेंडा के तहत लगातार सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ कुछ न कुछ बोले जा रहे हैं। यह अदालत को उसकी औकात दिखाने का एक रूख है, और शायद इसके पीछे एनडीए का वह ऐतिहासिक संसदीय बाहुबल भी है जिसके भरोसे वह कई किस्म के संविधान संशोधन करने, या नया कानून बनाने की उम्मीद रखता है। आज राहत की एक बात यही है कि सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सहित कुछ और न्यायाधीश भी रीढ़ की हड्डी वाले दिख रहे हैं, उनका रूख और उनके फैसले सरकार के किसी विभाग के अफसर की तरह के नहीं हैं, और वे एक स्वतंत्र न्यायपालिका की तरह काम कर रहे हैं। ऐसे में लगता है कि केन्द्र सरकार और कानून मंत्री का तनाव बढ़ते चल रहा है, और इस तनाव के चलते कानून मंत्री लगातार नाजायज बातें कह रहे हैं। देश के वकीलों ने जिम्मेदारी का एक काम किया है, और बाकी तबकों के जागरूक लोगों को भी किसी न किसी तरह जनता के बीच लोकतांत्रिक मूल्यों को गिनाना जारी रखना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

जानवरों के हक के पैसों से राष्ट्रपति की मेजबानी

29 मार्च, 2023

  

आरटीआई ने हिन्दुस्तान के लोकतंत्र को कुछ हद तक तो झकझोर कर रख दिया है। सरकारें जिस सामंती अंदाज में चला करती थीं, उनके वे अंदाज अब उनकी लाख कोशिशों के बावजूद उजागर होने लगे हैं। सरकारों के भ्रष्टाचार, सरकारों की मनमानी के बारे में आरटीआई से जो जानकारी निकलती है उसे पहले नौकरशाह अपनी जागीर के स्टाम्प पेपर की तरह कुर्सी की गद्दी के नीचे दबाकर उस पर सवार बैठते थे। लेकिन अब कम से कम कुछ मामलों में आरटीआई काम आने लगी है, और कई मामलों में सरकारें सुप्रीम कोर्ट तक चली जाती हैं कि वे आरटीआई में जानकारी नहीं देंगी। ऐसी ही एक जानकारी असम के वन्यप्राणी विभाग से एक सामाजिक कार्यकर्ता ने निकलवाने में कामयाबी पाई है जिससे पता लगता है कि पिछले राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के काजीरंगा नेशनल पार्क जाने पर उनके इंतजाम में शेर-संरक्षण के मद से एक करोड़ दस लाख रूपये खर्च किए गए थे। यह रकम खर्च करके राष्ट्रपति के लिए रंगरोगन करवाया गया, तम्बू लगाए गए, हवा साफ करने वाले एयर-प्यूरीफायर खरीदे गए, और राष्ट्रपति के लावलश्कर के खाने-पीने का इंतजाम किया गया। यह बात सरकार के अपने रिकॉर्ड से साबित हुई कि टाइगर फाउंडेशन से खर्च इस एक करोड़ दस लाख के अलावा 51 लाख रूपये वन्यप्राणी फंड से भी खर्च किए गए। अब देश में कौन शेर है कौन नहीं, यह तो पता नहीं, लेकिन राष्ट्रपति की खातिरदारी असम सरकार ने शेरों और दूसरे जानवरों को बचाने के फंड से की। असम के शेर-संरक्षण के नियम कहते हैं कि इस फंड का 90 फीसदी हिस्सा पर्यावरण को शेर के अनुकूल रखने, और इस इलाके की ग्रामीण स्तर की कमेटियों को मजबूत करने पर खर्च किया जाएगा ताकि इंसानों का जानवरों से टकराव कम हो। इसके अलावा बचा 10 फीसदी पैसा सोसायटी के एफडी में रखा जाना चाहिए।

अब सवाल यह उठता है कि क्या देश के सबसे बड़े ओहदे पर बैठे हुए मेहमान के लिए असम सरकार के पास खातिरदारी को और कोई पैसा नहीं था? पूरे देश में जगह-जगह नेताओं और अफसरों पर होने वाला खर्च किसी न किसी दूसरे के हक का होता है। कहीं वृक्षारोपण के पैसे से मंत्री और अफसरों, और उनके कुनबों की खातिरदारी का इंतजाम होता है, तो कहीं सुप्रीम कोर्ट की निगरानी वाले कैम्पा मद के सैकड़ों करोड़ रूपये नेताओं और अफसरों की मनमानी के कामों पर खर्च होते हैं। कुछ ऐसा ही जिला खनिज निधि के सैकड़ों करोड़ का होता है, और कलेक्टर अपनी मर्जी से ऐसे काम मंजूर करते हैं जिसमें सबसे मोटी रिश्वत मिल सके। अगर संवैधानिक कुर्सियों पर बैठे हुए बड़े-बड़े लोग देश के किसी हिस्से में जाते हुए महज एक चि_ी लिख दें कि उनके प्रवास के इंतजाम में सौ फीसदी सादगी बरती जाए, कोई रंगरोगन न किया जाए, कोई सडक़ न बनाई जाए, सोफा-पलंग, पर्दे कुछ भी न बदले जाएं, और उन पर किए गए खर्च किस मद से हुए, इसका हिसाब उन्हें दिया जाए, तो ही देश में हर दिन दस-बीस करोड़ रूपये बचने लगेंगे क्योंकि राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक, और सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट के जजों तक, सबके इंतजाम में अंधाधुंध, और गैरजरूरी खर्च किया जाता है। यह सिलसिला पूरी तरह अलोकतांत्रिक है, और खत्म होना चाहिए। लोगों को याद होगा कि अभी जब गुजरात के मोरवी में एक झूलता हुआ पूल टूटा और बहुत से लोगों की मौतें हुईं, तो वहां प्रधानमंत्री के पहुंचने के पहले पूरे अस्पताल का रंगरोगन हुआ, रातोंरात सडक़ें बनाई गईं। अगर कोई खर्च होना था तो वह अस्पताल पर होना था, और वह खर्च प्रधानमंत्री प्रवास पर हुआ। यह सिलसिला सामंती भी है, और अमानवीय भी है। देश में गरीबी बहुत है, और आधी आबादी शायद इसलिए जिंदा है कि उसे मुफ्त या लगभग मुफ्त सरकारी राशन मिलता है। स्कूलों में जाने वाले बच्चे इसलिए कुपोषण में गहरे डूबने से बचे हैं कि उन्हें स्कूलों में दोपहर का भोजन मिलता है। मिड-डे-मील की वजह से देश कुपोषण से कुछ हद तक उबर पाया है। ऐसे देश में रेलवे के बड़े अफसरों के दौरे के लिए अंग्रेजों के वक्त से चले आ रहे, सैलून कहे जाने वाले खास डिब्बे जोड़े जाते हैं, जिनका और कोई इस्तेमाल नहीं होता। राष्ट्रपति भवन से लेकर प्रधानमंत्री के नए बन रहे आवास तक, और सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट की इमारतों से लेकर भीतर के ढांचों तक हिन्दुस्तान में अलोकतांत्रिक सामंती सिलसिला दिखता है। राज्यों के राजभवनों में पुलिस बैंड और पुलिस की सलामी गारद तैनात रहते हैं, जिनमें दर्जनों पुलिसवाले बर्बाद होते हैं। यह बैंड राज्यपाल के किसी भी कार्यक्रम में पहले और बाद में राष्ट्रगान बजाने के लिए बस में सवार होकर आता-जाता है, और यह मान लिया जाता है कि देश की जनता खुद तो राष्ट्रगान गा ही नहीं सकती। राष्ट्रगान की याद दिलाने के लिए ऐसे सामंती इंतजाम की क्या जरूरत है? और झंडा फहराने और उतारने के लिए एक पूरी सलामी गारद क्यों तैनात की जाती है? राष्ट्रपति के अंगरक्षकों के नाम पर घुड़सवार लोगों का एक पूरा दस्ता क्यों चले आ रहा है? इन पर लाखों रूपये रोज का खर्च होता है, और क्या आज हिन्दुस्तान के राष्ट्रपति इस हिफाजत पर जिंदा हैं? 

यह पूरा सिलसिला खत्म करवाने के लिए किसी अदालत जाने का भी कोई फायदा नहीं है क्योंकि बड़ी अदालतों के जज खुद भी एक सामंती जिंदगी जीना पसंद करते हैं। हाईकोर्ट के जज सडक़ से सफर करते हैं, तो उनके सामने सायरन बजाती पुलिस पायलट गाड़ी चलती है, और उनके पीछे भी सुरक्षा गाड़ी या दूसरी गाडिय़ां रहती हैं। अब अपने ही देश-प्रदेश की जनता को सडक़ों पर से धकियाकर अलग करके जो जज सायरन के साये में रफ्तार से कहीं पहुंच जाते हैं, क्या वे किसी की मौत की सजा रोकने की हड़बड़ी में रहते हैं? अगर उनके वक्त की इतनी कीमत है, तो फिर सडक़ों पर से गुजर रहे किसी मजदूर या कारीगर का वक्त भी उनसे अधिक कीमती है क्योंकि उससे उसकी रोज की जिंदा रहने की ताकत जुड़ी हुई है। दूसरों को किनारे धकियाकर मंत्री-मुख्यमंत्री, या कई मामलों में बड़े अफसर भी चलते हैं, और रास्ता देने को मजबूर हुए लोग उन्हें गालियां देते हुए लोकतंत्र पर भरोसा खोते जाते हैं। 

असम में राष्ट्रपति की खातिरदारी के इस हिसाब-किताब को देखकर यह समझ पड़ता है कि हर प्रदेश के आरटीआई कार्यकर्ताओं को तैयार रहना चाहिए कि कब किस खास व्यक्ति के आने पर क्या-क्या खर्च किया गया, वह किस मद से आया। सार्वजनिक जगहों पर होने वाले दूसरे किस्म के खर्च का हिसाब-किताब भी निकलवाते रहना चाहिए, और यह भांडा फोड़ते रहना चाहिए कि कितने बरस के भीतर ही फुटपाथ दुबारा बन रहे हैं, दीवारें नई खड़ी हो रही हैं, या सडक़ों को बार-बार बनाया जा रहा है। सत्ता के सामंती मिजाज के साथ जनता के हकों की यह लड़ाई चलती ही रहेगी, और इसमें जनता को थकना नहीं चाहिए, सत्ता को छेकना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh) 

 

दीवारों पर लिक्खा है, 29 मार्च 2023


 (Daily Chhattisgrh)

हर 24 घंटे में अमरीका में गन से सवा सौ मौतें, कारोबार-माफिया हावी

28 मार्च, 2023

   

अमरीका में अब अंधाधुंध गोलीबारी से लोगों को मारना औसतन हर महीने होने वाली वारदात है। आज भी एक छोटी स्कूल में एक महिला हमलावर ने पहुंचकर अंधाधुंध गोलियां चलाईं, उनमें बच्चे-बड़े सात लोग मारे गए। अभी दो दिन पहले इतवार को ही कैलिफोर्निया के गुरुद्वारे में वहीं के दो लोगों के बीच आपस में गोलियां चलीं जिनमें दो लोग बुरी तरह जख्मी हुए। अब अगर अमरीका में होने वाली ऐसी गोलीबारी की खबरें ढूंढें तो इनका कोई अंत नहीं है, और न ही ऐसे हमलों का कोई अंत है। दरअसल वहां पर हथियारों की खरीदी इतनी आसान है कि कोई भी नागरिक दर्जनों हथियार खरीदकर अपने घर पर एक नुमाइश सी लगा सकते हैं, और ऐसे ही लोग कानूनी खरीदे गए हथियारों से सार्वजनिक जगहों पर लोगों को थोक में मार रहे हैं। अमरीका में हथियार बनाने वाले कारखानेदारों की लॉबी इतनी मजबूत है, और वहां की दो में से एक प्रमुख पार्टी, रिपब्लिकन, हथियार खरीदने और रखने की आजादी की इतनी बड़ी वकील है कि वह संसद में निजी हथियारों में कटौती की किसी बात को मंजूरी ही नहीं पाने देती। मौजूदा डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति जो बाइडन लगातार ऐसी हर गोलीबारी के बाद संसद और देश से अपील कर रहे हैं कि हथियारों में कटौती के संविधान संशोधन का साथ दें, लेकिन कारोबारी माफिया इस बात को आगे ही नहीं बढऩे देता। यह पूंजीवादी दुनिया के लिए एक मिसाल है कि कोई कारोबार किस हद तक मतलबपरस्त और जनविरोधी हो सकता है, कि उसके चेहरे पर हर बरस ऐसी हजारों मौतों  से भी कोई शिकन न पड़ती हो। 

जब तक अमरीका में निजी हथियारों की आजादी की कुछ तस्वीरें न देखें, बाहर के लोगों को यह भरोसा ही नहीं हो सकता कि एक-एक अमरीकी नागरिक किस तरह अपने घर को फौजी बंदूकखाना बनाकर रख सकते हैं। वे ऐसे फौजी दर्जे के हथियार खरीद सकते हैं जो कि निजी सुरक्षा के लिए तभी जरूरी हो सकते हैं, जब किसी दूसरे देश की फौज किसी अमरीकी के घर में घुस जाएं। उससे कम किसी नौबत में ऐसे घातक ऑटोमेटिक हथियारों की जरूरत किसी को नहीं पड़ सकती जो एक मिनट में सैकड़ों गोलियां दागते हों। अमरीका की पूंजीवादी व्यवस्था को लेकर यह बात भी बार-बार लिखी जाती है कि वहां हथियारों के कारखानेदार अमरीकी फिल्मों के मार्फत एक ऐसी हथियार-संस्कृति को बढ़ावा देते हैं जिसे कि आम अमरीकी अपने स्वाभिमान से जोडक़र देखने लगते हैं। हालत यह है कि अमरीका में एक बड़े तबके की सोच को इस तर ढाल दिया गया है कि अधिक से अधिक नागरिकों के पास जब हथियार रहेंगे, तब अमरीका में कोई सत्तापलट नहीं हो सकेगा क्योंकि फौज नागरिकों के हथियारों के सामने टिक नहीं सकेगी। अमरीका जैसे बड़े देश में जब लोगों को देशभक्ति के नाम पर, आजादी को बचाने के नाम पर हथियार बेचने में कामयाबी मिल रही है, तो यह कारोबार इससे अधिक और क्या उम्मीद कर सकता है। दुनिया भर में जहां-जहां लोग अमरीकी फिल्में देखते हैं, उन्हें मालूम है कि वहां की बहुत सारी एक्शन फिल्मों में हथियारों का कैसा ग्लैमर स्थापित किया जाता है, और जब उन्हें खरीदने की पूरी तरह आजादी होती है, तो फिर हॉलीवुड और हथियार, ये दोनों कारोबार एक-दूसरे को बढ़ाते चलते हैं।

यह भी समझने की जरूरत है कि अमरीका में धार्मिक आजादी, विचारों की आजादी, दुनिया भर से आए हुए अलग-अलग नस्लों के लोगों के लिए जितनी जगह है, उसमें स्वाभाविक रूप से कई किस्म का तनाव बने रहता है। ऐसे सामाजिक तनाव से परे एक तनाव यह भी रहता है कि अमरीकी लोग, खासकर नौजवान, परिवार और समाज के खिलाफ कई किस्म की नफरत से भी घिरे रहते हैं, और स्कूल-कॉलेज में होने वाले अधिकतर हमलों के पीछे नस्लवादी, या फिर निजी नफरत का हाथ मिलता है। एक तरफ तो देश के लोग इतने तनावग्रस्त हैं, देश का हाल इतने किस्म के नस्लभेदी और अंतरराष्ट्रीय समुदायों के तनाव से घिरा हुआ है, और फिर घर-घर में अंधाधुंध संख्या में बंदूक-पिस्तौल हैं। 2020 में अमरीका में 45 हजार से अधिक लोग गन की गोलियों से मरे हैं। इनमें 54 फीसदी खुदकुशी में, और 43 फीसदी हत्याओं में मरे हैं। हर दिन अमरीका में गन की गोलियों से औसतन 123 से अधिक लोग मारे गए हैं। इसके बावजूद सरकार कारोबार-माफिया के सामने बेबस है जिसने कि संसद में एक बहुत बड़ा समर्थन जुटा रखा है। हालत यह है कि रिपब्लिकन पार्टी के सम्मेलन देश में जहां कहीं होते हैं, वहां पर हथियारों की प्रदर्शनी लगती है, और उनकी बिक्री होती है। पिछले राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की यह पार्टी हथियार के सौदागर सरीखे काम करती है। 

अमरीका की इस घरेलू हिंसा से हिन्दुस्तान का कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि जिस दिन अमरीकी फौजों से किसी भी तरह की प्रत्यक्ष या परोक्ष लड़ाई की नौबत आएगी, आम अमरीकी नागरिक अपने निजी हथियारों को लेकर मोर्चे पर नहीं रहेंगे, लेकिन इससे हिन्दुस्तान समेत तमाम देशों को यह सबक लेने की जरूरत जरूर है कि कोई कारोबार किस तरह राष्ट्रीय हितों को बंधक बनाकर रख सकते हैं। देश के हित एक तरफ धरे रह गए, और नागरिकों को हथियारों का ग्राहक बनाकर यह कारोबार हर दिन करीब सवा सौ मौतें देश में पेश कर रहा है। हर लोकतंत्र को यह देखना चाहिए कि उसके कौन से कारोबार संसद और सरकार को प्रभावित करके, अदालतों में जजों को प्रभावित करके, और मीडिया को खरीदकर जनता की सोच बदल सकते हैं? अगर लोग ठंडे दिल से बैठकर बारीकी से देखेंगे, तो उन्हें हर लोकतंत्र में ऐसे कुछ धंधे दिखाई पड़ेंगे जो कि जनहित के खिलाफ हैं, लेकिन जिनका कोई विरोध नहीं हो सकता है। ऐसे धंधे हर राजनीतिक दल की सरकार को प्रभावित करके चलते हैं, संवैधानिक संस्थाओं को जेब में रखकर चलते हैं, और मीडिया तो अब ऐसे कई धंधे सीधे-सीधे खरीद चुके हैं। बात महज अमरीका की गन लॉबी की नहीं है, बात माफिया अंदाज में काम करने वाले कारोबार की है, और सभी को इसके खतरे समझना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 28 मार्च 2023


(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 27 मार्च 2023


 (Daily Chhattisgarh)

ब्रिटिश अखबार इराक जाकर ब्रिटिश फौजों के बेकसूर शिकार ढूंढ लाया

27 मार्च, 2023

   

इराक में दुनिया के एक सबसे खतरनाक माने जाने वाले आतंकी संगठन, इस्लामिक स्टेट, को खत्म करने के लिए 2014-17 में अमरीका की अगुवाई में कुछ देशों की एक फौजी टीम ने जंग लड़ा था, और वहां बड़े पैमाने पर हमले किए थे। अमरीका ने तो बाद में यह मंजूर कर लिया था कि शहरी इलाकों में उसके हवाई हमलों से आतंकियों के साथ-साथ सैकड़ों नागरिक भी मारे गए थे, लेकिन ब्रिटेन इस बात पर अड़ा हुआ था कि उसने एक बिल्कुल परफेक्ट जंग लड़ी थी, और उसमें एक भी नागरिक की मौत नहीं हुई थी। अब एक एनजीओ, एयरवॉर्स, के साथ मिलकर प्रतिष्ठित ब्रिटिश अखबार गार्डियन ने एक जांच रिपोर्ट तैयार की है जो बताती है कि ब्रिटिश हमलों में भी नागरिक मारे गए थे। गार्डियन की रिपोर्टर इराक के मोसुल शहर जाकर वहां ऐसे हमलों में मरे हुए लोगों के परिवारों के बचे हुए लोगों से बात करके लौटी, और सारा खुलासा छापा है। इस रिपोर्ट के बाद अब ऐसे लोगों के परिवारों को ब्रिटेन से एक मुआवजा लेने का हक मिलेगा।

इस बात पर आज लिखा जाना जरूरी इसलिए है कि इस अखबार ने और ब्रिटेन के एक एनजीओ ने अपनी ही फौज के छुपाए गए तथ्यों का भांडाफोड़ करना तय किया, और बेकसूर इराकी जनता के हकों के लिए यह रिपोर्ट तैयार करना अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी माना है। अब इस बात को हिन्दुस्तान में पिछले बरसों में पाकिस्तान पर हुई एयर स्ट्राईक और भारत में पाकिस्तान के करवाए गए कहे जाने वाले आतंकी हमलों के बारे में जो भी जानकारी मांगते हैं उन्हें देश का गद्दार करार देकर पाकिस्तान भेजे जाने का फतवा दिया जाता है, उनके बारे में कहा जाता है कि वे टुकड़ा-टुकड़ा गैंग हैं जो भारत को तबाह करना चाहते हैं। अब ब्रिटेन में यह कोई नई बात नहीं है कि वहां दूसरे देशों में भी की गई फौजी कार्रवाई को लेकर अपनी सरकार से सवाल किए जाएं ताकि सरकार की जवाबदेही रहे, और फौज भी बेकाबू कार्रवाई न करती रहे। लोकतंत्र न तो सस्ती व्यवस्था है, और न ही वह बहुत सहूलियत की व्यवस्था है। फिर एक जिम्मेदार लोकतंत्र महज अपनी सरहदों के भीतर लोकतांत्रिक रहकर खुश नहीं हो लेता, जिम्मेदार लोकतंत्र दुनिया के दूसरे हिस्सों को लेकर भी बात करता है। आज ब्रिटिश पार्लियामेंट में लगातार इस बात पर बहस चल रही है कि दूसरे देशों से वहां बोट से पहुंचने वाले शरणार्थियों के साथ क्या सुलूक किया जाए। यह बहस उन दूसरे देशों से आने वाले लोगों के साथ एक बेहतर और अधिक मानवीय बर्ताव करने के लिए की जा रही है, जबकि ऐसे लोग ब्रिटेन पर पहली नजर में तो बोझ ही बनते हैं। इसके साथ जोडक़र हिन्दुस्तान की इस बात को देखना चाहिए कि यहां पर पड़ोस के लगे हुए म्यांमार से आने वाले, भयानक हिंसा के शिकार रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर देश का क्या रूख है। यह बात भी समझनी चाहिए कि दुनिया में शरणार्थियों के लिए जो अंतरराष्ट्रीय सहमति दर्ज है उस पर भारत के भी दस्तखत हैं, लेकिन पड़ोस के शरणार्थियों के लिए आज यहां कोई जगह और हमदर्दी नहीं हैं। 

चूंकि हिन्दुस्तान लगातार यह कहते रहता है कि उसने संसदीय व्यवस्था ब्रिटेन से ली है, इसलिए ब्रिटेन के इन दो उदाहरणों से भी कुछ सीखने की जरूरत है। पहली बात तो यह कि अगर ब्रिटिश फौजें किसी दूसरे देश में जाकर वहां किसी बेकसूर को मारकर आई हैं, तो भी ब्रिटिश मीडिया इंसाफ के लिए उस बात की भी जांच कर रहा है, और यह कोशिश कर रहा है कि ऐसे बेकसूर परिवारों को ब्रिटिश सरकार से मुआवजा मिल सके। दूसरी बात यह भी कि ब्रिटिश फौजों की जवाबदेही तय हो सके, ताकि अगली बार उनसे ऐसी गलती न हो, या वे ऐसा गलत काम न करें। एक उन्मादी राष्ट्रवाद के नाम पर देश की फौज को पवित्र और पूजनीय बनाकर सवालों से परे कर देना उस फौज के भले का भी नहीं रहता, क्योंकि उससे गलतियां और गलत काम होने का खतरा बढ़ते जाता है। 

गार्डियन ब्रिटेन का सबसे जिम्मेदार अखबार माना जाता है, और इसने उस वक्त भी सवाल उठाए थे जब देश कोरोना से जूझ रहा था, लॉकडाउन लगा हुआ था, और ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के सरकारी आवास पर उनके साथ काम कर रहे लोगों ने दारू पार्टी की थी। यह दारू पार्टी लॉकडाउन के नियमों के खिलाफ थी, इसलिए जब इसके शुरुआती सुबूत सामने आए, तो लंदन की पुलिस को इसकी जांच दी गई। पुलिस ने प्रधानमंत्री पर जांच के बाद जुर्माना लगाया, और अभी संसद की एक जांच समिति इस नतीजे पर पहुंची है कि इस बारे में संसद में सवाल होने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने झूठ कहा था। एक ऐसा भी खतरा वहां मंडरा रहा है कि अगर संसद की समिति इस पर कड़ी कार्रवाई करती है तो बोरिस जॉनसन का संसदीय-राजनीतिक जीवन खत्म हो सकता है। 

लोकतंत्र एक-दूसरे से बेहतर चीजों को सीखने की व्यवस्था है। संसदीय व्यवस्था किसी धर्मग्रंथ की तरह लिखे हुए शब्दों को अंतिम सत्य मान लेने की नहीं रहती, वह तजुर्बों से परंपराओं को कायम करने का नाम रहती है। आज ब्रिटेन या दूसरे लोकतांत्रिक देश जिस पारदर्शिता की तरफ लगातार बढ़ रहे हैं, जिस तरह वहां नेताओं की, सरकार और फौज की, जजों और अफसरों की जवाबदेही रहती है, और बढ़ती चल रही है, उससे हिन्दुस्तान जैसे देश को बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। लंदन पुलिस का छोटा सा अफसर प्रधानमंत्री निवास जाकर इस बात की जांच कर चुका है कि वहां किन तारीखों पर पार्टियां हुईं, उनमें सामाजिक दूरी का पालन हुआ या नहीं हुआ, और प्रधानमंत्री निवास को कुसूरवार पाने पर प्रधानमंत्री को जुर्माना भी सुना दिया। कितने लोकतंत्र ऐसे हैं जो कि ऐसी पारदर्शिता से काम कर सकते हैं? 

पूरी दुनिया में फौजों का इतिहास गलतियों, और गलत कामों से भरा हुआ है। जंग और फौजी कार्रवाई के हालात ही ऐसे रहते हैं कि कई बार ऐसा हो जाता है, और कई बार दुश्मन को निपटाने के इरादे से ऐसा कर दिया जाता है। लेकिन अगर इन बातों की जांच न हो, तो उस मुल्क की फौज बेकाबू और अराजक हो जाने का एक खतरा रहता है। इसलिए लोकतांत्रिक देशों को अपने किसी भी संस्थान को ऐसा पवित्र और पूजनीय नहीं बनाना चाहिए कि वहां कोई सवाल करना गद्दारी मान लिया जाए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 मार्च 2023


 

सीलबंद लिफाफे से परहेज का अब क्या हुआ जज साहब?

25 मार्च, 2023

   

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई.चन्द्रचूड़ पिछले कुछ मुख्य न्यायाधीशों के मुकाबले अधिक मुखर हैं, और अपनी सोच को खुलकर सामने रखते हैं। उन्होंने अभी सार्वजनिक रूप से यह कहा कि अदालतों को सीलबंद लिफाफों का सिलसिला खत्म करना चाहिए। आमतौर पर जब सरकार किसी मुकदमे में एक हिस्सा होती है, तो वह कई किस्म की जानकारी संवेदनशील बताते हुए उसे सीलबंद लिफाफे में अदालत को पेश करती है। अभी ऐसा ताजा मामला अडानी के खिलाफ जांच को लेकर था, जिसमें सरकार ने अपनी तरफ से जांच टीम के लिए सदस्यों के नाम सुझाए थे लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने उस लिफाफे को खोलने से ही इंकार कर दिया था, और साफ किया था कि जनता के बीच पारदर्शिता के लिए यह जरूरी है कि सीलबंद लिफाफों का सिलसिला खत्म किया जाए। उन्होंने यह भी कहा था कि वे सरकार के सुझाए नाम देखना भी नहीं चाहते, क्योंकि उसके बाद वे अगर दूसरे लोगों को भी जांच कमेटी में रखेंगे, तो भी जनता के बीच उसकी विश्वसनीयता नहीं रहेगी। देश की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी गोपनीय जानकारी को लेकर भी कभी-कभी सरकार अदालत से बंद कमरे में सुनवाई की मांग करती है ताकि सुनवाई की जानकारी मीडिया के मार्फत जनता तक न पहुंचे। 

मुख्य न्यायाधीश का यह रूख बड़ा पारदर्शी और लोकतांत्रिक है। लेकिन इसे एक पखवाड़ा भी नहीं हुआ है कि एक ताजा मामले में अदालत का रूख बदला हुआ नजर आता है। सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व जज पर उनकी एक सहयोगी कर्मचारी ने यौन उत्पीडऩ का आरोप लगाया था। इस पर जब जज ने इसके खिलाफ मानहानि का केस किया, तो इस महिला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की कि केस को दिल्ली हाईकोर्ट के बजाय किसी और अदालत भेजा जाए क्योंकि दिल्ली हाईकोर्ट के अधिकतर जज इस सुप्रीम कोर्ट जज के साथ काम किए हुए हैं, और वहां उसे इंसाफ की उम्मीद नहीं है। खैर, इसके बाद हुआ यह कि इस जज (अब भूतपूर्व) और इस सहयोगी महिला के बीच किसी तरह का कोई समझौता हुआ, और सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के.एम.जोसेफ और जस्टिस बीवी नागरत्ना की बेंच ने मामले की पूरी कार्रवाई को सीलबंद करके रिकॉर्ड रूम में रखने का आदेश दिया, और केस को खत्म कर दिया। ऐसे में इस पूर्व जज के वकील ने मांग की कि जब समझौता हो गया है तो सोशल मीडिया को यह आदेश दिया जाए कि वे इस मामले का सारा रिकॉर्ड हटा दें। इस पर जजों ने हैरानी के साथ कहा कि ऐसा आदेश वे कैसे दे सकते हैं क्योंकि मीडिया ने तो वही लिखा है जो खुली अदालत में कहा गया था। हटाने का ऐसा आदेश करना जायज नहीं होगा। 

अब यहां पर एक सवाल उठता है कि अगर यह मामला खुली अदालत में ही चल रहा था, और उसकी रिपोर्टिंग मीडिया में हो रही थी, उसमें दिल्ली हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का वक्त लग रहा था, तो क्या आज दोनों पक्षों के बीच अदालत के बाहर होने वाले किसी समझौते की वजह से केस को बंद करके रिकॉर्ड को सील कर देना ठीक है? यह मामला किसी घर के भीतर शोषण का नहीं है, यह मामला यह सुप्रीम कोर्ट के एक जज का अपनी एक इंटर्न के साथ किए गए बर्ताव का है जिस पर महिला इंटर्न ने यौन उत्पीडऩ की रिपोर्ट लिखाई थी। हम हिन्दुस्तानी कानून के मुताबिक यौन उत्पीडऩ की शिकार महिला की पहचान छुपाए रखने के हिमायती हैं। लेकिन जनता के पैसों से तनख्वाह पाने वाला सुप्रीम कोर्ट के जज सरीखे बड़े ओहदे पर बैठा हुआ आदमी अगर अपनी मातहत के यौन उत्पीडऩ का आरोपी है, तो क्या इस मामले में हुए समझौते की जानकारी उस महिला के नाम बिना जनता के सामने नहीं आनी चाहिए? यह बात हम इसलिए लिख रहे हैं कि यह सुप्रीम कोर्ट जज के अदालती कामकाज से जुड़ी हुई व्यवस्था का मामला है, और इस बारे में जब ऐसी शिकायत हुई थी, तो समझौते का बाद भी जनता को यह मालूम होना चाहिए कि समझौता हुआ क्या है? यह मामला एक आपराधिक बर्ताव का मामला है, और इसे निजी कहकर खत्म कर देना जायज नहीं होगा। इस मामले में अदालत को अगर यह लगता है कि एक समझौता हो गया है, और मामला आगे चलने की जरूरत नहीं है, तो भी जनता को सुप्रीम कोर्ट के अपने जज के खिलाफ दायर किए गए इस मामले में तथ्य जानने का हक है। हमारा ख्याल है कि यौन उत्पीडऩ के मामलों में महिला को तो अपनी शिनाख्त छुपाए रखने का हक है, और यह कानून और मीडिया की जिम्मेदारी भी है। लेकिन जिसके खिलाफ ऐसी शिकायत हुई है, उसे मामले के सीलबंद कर दिए जाने की रियायत क्यों मिलनी चाहिए? क्या सुप्रीम कोर्ट जज की जगह कोई आम आदमी होता, तो भी क्या उसे ऐसी रियायत मिली होती? 

एक तरफ तो सीजेआई का रूख सीलबंद लिफाफों के खिलाफ दिखता है, दूसरी तरफ अपने आचरण के लिए संविधान और जनता दोनों के प्रति जवाबदेह, सुप्रीम कोर्ट के एक जज पर लगी इतनी बड़ी तोहमत अदालत के बाहर के किसी रहस्यमय और गोपनीय सौदे या समझौते से अगर हट भी रही है, तो भी वह जनता के सामने आनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के जज को अपने आचरण के लिए संदेह से परे रहना चाहिए। दुनिया में बड़े लोगों को अपना आचरण संदेह से परे रखने के लिए कहा जाता है। लोकतंत्र के पहले भी राजाओं के लिए यह एक आदर्श गिनाया जाता था, और हिन्दुस्तान में राम की कहानियों में जगह-जगह इसकी मिसाल मिलती है। हम सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा या रिटायर्ड किसी भी तरह के जज के कामकाज से जुड़े, ओहदे और दफ्तर से जुड़े ऐसी किसी विवाद को निजी नहीं मानते जिसे लेकर अदालत में एक केस दायर किया जा चुका था। ऐसी अदालती लड़ाई किसी बाहरी, निजी, और गोपनीय समझौते के तहत जजों के सामने तो खत्म हो सकती है, लेकिन इससे जनता के प्रति अदालत और जजों की जवाबदेही खत्म नहीं हो जाती। उस महिला की पहचान गोपनीय बनाए रखने के साथ-साथ इस समझौते को उजागर करना चाहिए, इसे ठीक उसी तरह अदालती कागजात का हिस्सा बनाना चाहिए जिस तरह कोई भी दूसरे मामले रहते हैं, वरना यह अदालतों का अपने आपको पारदर्शिता से परे रखने का काम कहलाएगा जिससे उसकी साख खत्म होगी। यौन उत्पीडऩ का मामला ऐसा नहीं है कि जिसे दफन कर देना किसी जज का हक हो। यहां पर बात हक की नहीं जवाबदेही की है। 

सुप्रीम कोर्ट वैसे भी अपनी साख पिछले एक मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर एक मातहत महिला कर्मचारी द्वारा लगाए गए यौन शोषण के आरोपों में बुरी तरह खो चुका है, क्योंकि उसने बंगले पर यौन शोषण के खिलाफ शिकायत की थी, और उसकी सुनवाई करने के लिए खुद रंजन गोगोई जज बनकर बैठे थे। हमारा ख्याल है कि इस किस्म की इससे बुरी मिसाल और कुछ नहीं हो सकती थी। और बाद में यह आरोप भी सामने आए थे कि जिस महिला ने यह आरोप लगाया था, उसके मोबाइल फोन पर पेगासस से घुसपैठ की गई थी। मौजूदा मुख्य न्यायाधीश चन्द्रचूड़ को पारदर्शिता के अपने पैमाने पर खरा उतरना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

जात न पूछो मुजरिम की (अगर वह ऊंची जात..)

 26 मार्च 2023

 

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में दो दिन पहले एक ब्राम्हण पुलिस इंस्पेक्टर शराब के नशे में एक आदिवासी महिला के चलाए जा रहे महिला छात्रावास में पहुंचा, वहां उसने सीसीटीवी कैमरों के सामने आदिवासी लडक़ी को पीटा, उसे गंदी गालियां देते हुए उसके साथ सेक्स की धमकी दी, और भी कई किस्म की धमकी की बात इस आदिवासी महिला ने रिपोर्ट में लिखाई है। चूंकि वीडियो-कैमरों की रिकॉर्डिंग मौजूद थी, इसलिए पुलिस अफसरों को भी, चाहे मजबूरी में, कार्रवाई करनी पड़ी, और इस इंस्पेक्टर को निलंबित किया गया। इस महिला की पूरी शिकायत भयानक है, और जब उसे नशे में झूमते और हिंसा करते दिख रहे इंस्पेक्टर के साथ जोडक़र देखा जाए, तो यह हैरानी भी होती है कि आदिवासी कहे जा रहे इस राज्य की राजधानी में ऐसी हिम्मत किसी की हो सकती है। फिर यह भी है कि अगर किसी महिला हॉस्टल में ऐसी हरकत हो रही है, तो वहां रह रहीं महिलाओं की हिफाजत का क्या होगा? उन्हें सरकार पर क्या भरोसा रहेगा? अभी यह बात भी साफ नहीं है कि इस इंस्पेक्टर की जगह अगर किसी आम सवर्ण आदमी के बारे में ऐसी सुबूतों सहित शिकायत हुई रहती, तो भी पुलिस क्या उसमें गिरफ्तारी नहीं करती? 

अब कल शाम मैंने इस घटना के बार में ट्विटर पर लिखा, नशे में एक वर्दीधारी ब्राम्हण पुलिस इंस्पेक्टर ने छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर शहर में एक महिला हॉस्टल की प्रभारी आदिवासी महिला को सीसीटीवी कैमरों के सामने पीटा, सेक्स की मांग रखी, और यह भी कहा कि उसे उसके (इंस्पेक्टर के) साहबों की भी सेवा करनी होगी। इसकी लिखित शिकायत पर भी पुलिस ने उसे महज निलंबित किया है, उसे गिरफ्तार क्यों नहीं किया? 

मैंने इस महिला की शिकायत के पन्ने भी साथ में पोस्ट किए थे, और मुझे अंदाज था कि इस पर महिलाओं के हक की बात करने वाले लोगों की तरफ से जरूर कुछ लिखा हुआ आएगा। लेकिन कुछ निराशा के साथ हैरानी यह हुई कि मुझसे अच्छी तरह वाकिफ कुछ लोगों ने तुरंत इस पर नाराजगी के साथ लिखा कि मैंने इस इंस्पेक्टर को ब्राम्हण क्यों लिखा है? इनका कहना था कि सजा तो होनी चाहिए, लेकिन इसमें ब्राम्हण का जिक्र क्यों किया गया है? मेरे इनमें से एक करीबी ने दो कदम और आगे बढक़र मेरे जन्म और परिवार की जाति भी गिना दी कि अगर उस जाति का इंस्पेक्टर होता, तो भी क्या मैं जाति का जिक्र करता? हालांकि इस नौजवान दोस्त को यह अच्छी तरह मालूम है कि मैं अपनी जन्म की जाति या किसी भी जाति और धर्म का इस्तेमाल नहीं करता। फिर भी एक ब्राम्हण होने के नाते मेरे एक सेक्स-मुजरिम को ब्राम्हण लिखने पर उनकी नाराजगी जायज थी, और उन्होंने मुझे यह जिक्र करने पर मजबूर किया कि मैंने अपनी तमाम जिंदगी में, और अब वह खासी हो चुकी है, कभी किसी धर्म या जाति के संगठन की सदस्यता नहीं ली, उनके किसी कार्यक्रम में नहीं गया। लेकिन इस ट्वीट में साफ-साफ मुजरिम दिख रहे, जुर्म कर रहे, एक महिला को पीट रहे इस इंस्पेक्टर की जाति को लिखना मेरे इन परिचित लोगों को नागवार गुजरा। अपराधी की कोई जाति नहीं होती यह लाईन बार-बार लिखी गई, ठीक उसी तरह जिस तरह बार-बार यह लिखा जाता है कि आतंकी का कोई धर्म नहीं होता। 

अब मेरे सामने आज मजबूरी यह है कि कल मेरे ट्वीट पर मेरे जातिवादी होने, नस्लवादी होने, साम्प्रदायिक होने की जो बातें मेरे परिचित लोगों ने लिखी हैं, और उनमें से कुछ तो मेरे बहुत करीबी भी हैं, तो उस बारे में मुझे आज यहां लिखना ही लिखना है। अगर तौल-तौलकर लिखे गए अपने एक-एक शब्द को मैं जायज न ठहरा सकूं, तो फिर लिखना ही बेकार होगा। 

जब मैंने यह लिखा कि एक ब्राम्हण इंस्पेक्टर ने नशे में, वर्दी में ऐसा किया, और एक महिला हॉस्टल में आदिवासी महिला प्रभारी के साथ किया, राजधानी में किया, तो मैं बिल्कुल ही अलग किस्म की प्रतिक्रियाओं की उम्मीद कर रहा था। मुझे लग रहा था कि चारों तरफ फैल चुके ऐसे वीडियो, और उस वीडियो के साथ महिला की लिखित शिकायत और उस शिकायत के बाद जिले के एसपी द्वारा इस इंस्पेक्टर को निलंबित करते हुए यह लिखा गया कि वह वीडियो में महिला छात्रावास के महिला स्टॉफ के साथ गाली-गलौज और मारपीट करते दिखाई पड़ रहा है, तो लोगों का इस बात पर आक्रोश होगा कि एक आदिवासी महिला के साथ ऐसा हुआ है, एक महिला छात्रावास में ऐसा हुआ है, और एक वर्दीधारी इंस्पेक्टर ने ऐसा किया है, उसने नशे में ऐसा किया है, और उसने ब्राम्हण होते हुए एक आदिवासी महिला के साथ ऐसा किया है। लेकिन ब्राम्हण के जिक्र ने तमाम लोगों की तमाम सहानुभूति खत्म कर दी, और मेरे ही करीबी लोग मुझ पर ब्राम्हणविरोधी होने, मामले को साम्प्रदायिक रंग देने की तोहमत लगाने लगे। 

हिन्दुस्तान के कानून में जब एक ब्राम्हण एक आदिवासी पर कोई जुल्म करे, तो उसके लिए अलग से एक कानून है। लेकिन इसके साथ-साथ सामाजिक हकीकत यह भी है कि इस देश में हजारों बरस से चली आ रही हिंसक जाति व्यवस्था के तहत ब्राम्हणों को सबसे ऊंचा दर्जा मिला हुआ है, और दलित-आदिवासी जाति व्यवस्था के पांवों में जगह पाते हैं। दलित-आदिवासी के खिलाफ जुल्म पर समाज व्यवस्था में उनसे ठीक ऊपर आने वाले ओबीसी तबके के खिलाफ भी विशेष एसटी-एससी एक्ट के तहत जुर्म दर्ज होता है, लेकिन जाति व्यवस्था के मुताबिक किस जाति के लोग किस जाति पर जुल्म कर रहे हैं, इसका एक अलग सामाजिक महत्व है। वर्दी और नशे की बात को छोड़ दें, सिर्फ जाति की बात करें, तो इस ताजा मामले में मुजरिम दिखते आदमी की जाति जाति व्यवस्था में सबसे ऊपर है, और उसके जुल्म और जुर्म की शिकार महिला की जाति इस व्यवस्था में सबसे नीचे के हिस्से की है। 

हिन्दुस्तान में होने वाले तमाम किस्म के सेक्स-अपराधों को देखें, तो उसमें से तकरीबन तमाम में बलात्कारी की जाति बलात्कार की शिकार महिला या बच्ची की जाति से ऊपर की होती है, वह ओबीसी भी हो सकती है, वह वैश्य या क्षत्रिय भी हो सकती है, और ब्राम्हण भी हो सकती है। हिन्दुस्तान में होने वाले व्यक्तिगत अपराधों में जाति की ताकत को अनदेखा करने का काम ऊंची जातियों के लोग तो कर सकते हैं, लेकिन जो लोग जाति व्यवस्था और ऐसे जुल्म-जुर्म के शिकार हैं, वे नहीं कर सकते। जिन लोगों को यह लगता है कि हिन्दुस्तान में जाति व्यवस्था खत्म हो चुकी है, और अब आरक्षण भी खत्म कर देना चाहिए, और जाति व्यवस्था के जिक्र का इस्तेमाल सिर्फ ब्राम्हणों पर हमले के लिए किया जाता है, उन्हें दलित-आदिवासी लोगों की जिंदगी का कोई अहसास नहीं है। हिन्दुस्तानी समाज की एक बड़ी दिक्कत यह है कि धर्म और जाति के संगठनों में अपना अधिकतर वक्त गुजार देने वाले लोगों ने वर्ण व्यवस्था में अपने से नीचे के लोगों के पांवों की बिवाई कभी देखी नहीं है, इसलिए उन्हें यह समझ नहीं पड़ेगा कि ऊंची जात के मुजरिम की जात का क्या महत्व है। यह एक अलग बात है कि अदालत इस जाति के आधार पर ही फैसला करती है कि दलित-आदिवासी पर जुल्म करने वाले उनके अपने समाज के हैं, या कि गैरदलित-आदिवासी हैं। 

हिन्दुस्तान की पुलिस में देखें तो उत्तर भारत के तकरीबन तमाम थानों में जिस तरह हिन्दू धर्म प्रतीकों के मंदिर बने दिखते हैं, क्या किसी थाने में किसी आदिवासी बुढ़ादेव, या बुद्ध का कोई मंदिर भी देखा जा सकता है? जाति व्यवस्था पुलिस से लेकर मुजरिमों तक फैली हुई है, और उत्तरप्रदेश के पिछले दो-चार बरस के दो-चार सबसे चर्चित मामलों में ऊंची जात की क्या ताकत होती है, यह बात खुलासे से सामने आ चुकी है। 

फिलहाल इस ताजा वारदात पर लौटें तो व्यक्तिगत जुर्म के हर मामले में धर्म और जाति दोनों के जिक्र की जरूरत है क्योंकि उससे ही सामाजिक संदर्भ जुड़ता है। और मैंने सोच-समझकर इस बात का जिक्र किया था, जिसके साथ मुझे यह उम्मीद थी कि लोगों को एक आदिवासी, एक महिला के साथ हो रहे ऐसे जुर्म पर उसके साथ हमदर्दी होगी, लेकिन वह हमदर्दी मेरे उन परिचितों के ट्वीट में नहीं दिखी जिन्होंने मुझे ब्राम्हणविरोधी करार देते हुए नस्लवादी और साम्प्रदायिक भी करार दे दिया। इस पर मुझे ट्विटर पर ही एक से यह पूछना पड़ा कि क्या ब्राम्हण और आदिवासी के बीच के ऐसे जुर्म को साम्प्रदायिक कहने के पहले उन्होंने अपने वैचारिक-परिवार के बड़ों से पूछ तो लिया है कि क्या वे आदिवासी को हिन्दू से परे किसी सम्प्रदाय का मान रहे हैं? क्योंकि ऐसे में तो हिन्दुओं की गिनती ही कम हो जाएगी। यह एक अलग बात है कि हिन्दू समाज के भीतर के ऐसे ऊंची कही जाने वाली जात वालों के जुल्म और जुर्म से जख्मी नीची कही जाने वाली जात के लोगों ने थोक में बौद्ध, ईसाई, और मुस्लिम धर्म मंजूर किया। आदिवासियों के ईसाई बनने को तो चर्च की विदेशी साजिश करार देना आसान है, लेकिन अंबेडकर की अगुवाई में जब लाखों लोगों ने हिन्दू धर्म छोडक़र बौद्ध धर्म मंजूर किया, तो उसमें तो कोई विदेशी साजिश नहीं थी। हिन्दुस्तान की जाति व्यवस्था की क्रूरता के चलते ही दलित और आदिवासी करोड़ों की संख्या में दूसरे धर्मों में गए हैं। सेक्स-हिंसा के इस ताजा मामले में लोगों को मुजरिम दिखते इस आदमी की जात को लेकर शर्मिंदगी होनी चाहिए थी कि उनकी जात के किसी आदमी ने ऐसी हरकत की है, वह तो नहीं हुआ, मुजरिम की जात के जिक्र के खिलाफ लोग टूट पड़े, और सेक्स-हिंसा की शिकार आदिवासी महिला का मुद्दा किनारे धरे रह गया। ऊंची कही जाने वाली जातियों की इंसाफ की यही समझ हिन्दू समाज के पांवों में रखी गई जातियों को इस समाज से दूर करती है। 

करीब 30 बरस पहले जब वीपी सिंह भूतपूर्व प्रधानमंत्री की हैसियत से मेरे शहर आए थे, तो एक सवाल के जवाब में उन्होंने काफी उत्तेजना के साथ कहा था- जाति व्यवस्था के पीछे जो हिंसा है, बेइंसाफी है, वह हजारों बरस से है, लेकिन जूता पहने हुए कभी याद नहीं आता कि जूता पहना हुआ है, जिसका अंगूठा दबता है उसे याद आता है कि अंगूठा भी है, उसे ही जूता दिखता है। अब जाति व्यवस्था से जो लोग कभी दबे नहीं हैं उनको लगता है कि जाति व्यवस्था है ही नहीं। तो जो जाति व्यवस्था के तले दबे हैं उन्हें रोज याद आता है कि वे दबे हैं, लेकिन वे मुखर नहीं हैं, इसलिए ऐसा लगता है कि जाति व्यवस्था खत्म हो चुकी है। 

हिन्दुस्तान में व्यक्तिगत अपराधों का जातिगत विश्लेषण पूरी तरह से जायज और जरूरी है। आज भी दिक्कत यह है कि ऊंची समझी जाने वाली जातियों के लोग लिखने और बोलने की जगहों पर हैं। वे अखबारों और टीवी चैनलों के समाचार-विचार पर लगभग एकाधिकार रखते हैं, वे मीडिया की मिल्कियत पर तकरीबन पूरा ही हक रखते हैं। उन्हीं की आवाज है, उन्हीं के सामने माइक है, उन्हीं के सामने कैमरा है, उन्हीं के लिखे हुए को छापने के लिए प्रेस है, और दलित-आदिवासी आज के सोशल मीडिया पर अपने लिए एक जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। 

आज का यह लिखना खासा लंबा हो गया है, लेकिन इससे बिल्कुल ही जुड़ा हुआ एक मुद्दा कल ही सामने आया है जिसमें छत्तीसगढ़ के एक आदिवासी मंत्री कवासी लखमा ने कहा है कि आदिवासी हिन्दू नहीं हैं, जनगणना में उन्हें अलग से गिना जाए। मैं चाह तो रहा था कि कल के ब्राम्हण-आदिवासी ट्वीट से उपजे मुद्दे से मैं इसे जोडक़र लिखता, लेकिन यहां उसके लिए जगह पूरी नहीं पड़ेगी, इसलिए उस बारे में किसी और दिन, किसी और पन्ने पर, या किसी दिन कैमरे के सामने। फिलहाल सारे के सारे ब्राम्हण परिचित, और दोस्तों ने आज के इस साप्ताहिक कॉलम को लिखने के लिए मुद्दे की तलाश आसान कर दी, इसके लिए उनका शुक्रिया।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 मार्च 2023

 

(Daily Chhattisgarh)

अब गांधी को फर्जी डिग्री वालों की कतार में खड़ा करने की बेहूदी कोशिश

 25 मार्च, 2023


जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा का एक वीडियो तैर रहा है जिसमें ग्वालियर की एक निजी यूनिवर्सिटी के कार्यक्रम में भाषण देते हुए उन्होंने कहा कि गांधी के पास कानून की कोई डिग्री नहीं थी, उन्होंने सिर्फ हाईस्कूल डिप्लोमा किया था। उन्होंने यह दावा किया कि वे यह बात सुबूतों के साथ कह रहे हैं। इस बयान पर देश और गांधी के इतिहास के जानकार लोग हॅंस भी रहे हैं, और रो भी रहे हैं। उस वक्त के इंग्लैंड से बैरिस्टर बने मोहनदास करमचंद गांधी दक्षिण अफ्रीका जाकर वकालत करने लगे थे, और वहां पर रंगभेदी, नस्लभेदी भेदभाव से आहत होकर उन्होंने एक आंदोलन छेड़ा था, और हिन्दुस्तान लौटकर स्वतंत्रता की लड़ाई शुरू की थी। गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी का कहना है कि गांधी ने लॉ की डिग्री पाई थी, और यह बात उन्होंने अपनी आत्मकथा में भी लिखी है। तुषार ने मोदी सरकार के बनाए हुए इस राज्यपाल पर तंज कसते हुए कहा कि जाहिलों को राज्यपाल बना देने का यही नतीजा होता है। गांधी के पास लॉ की डिग्री थी, लेकिन उनके पास एंटायर लॉ डिग्री नहीं थी जैसी कि मोदी के पास एंटायर पोलिटिकल साईंस की डिग्री है। उल्लेखनीय है कि मोदी की डिग्री को लेकर बरसों से यह विवाद चल रहा है कि विश्वविद्यालय उसकी जानकारी क्यों नहीं दे रहा है, और मोदी जिस कोर्स में डिग्री बताते हैं, वह कोर्स तो विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में दिखता भी नहीं है। खैर, वह विवाद एक अलग विवाद है, और मोदी से लेकर स्मृति ईरानी तक बहुत से लोग अपनी डिग्रियों को लेकर खुद जवाबदेह हैं, इसलिए उनके लिए हमें कुछ नहीं कहना है। लेकिन आज जो गांधी नहीं रह गए हैं, और जिनके बारे में इतिहास में दर्ज तथ्यों को भी तोड़-मरोडक़र, या झूठ गढक़र जो अभियान चलाया जा रहा है, उस पर जरूर बात होनी चाहिए। 

हाल के बरसों में देश में जिस रफ्तार से भाजपा और संघ परिवार के बड़े-बड़े नेताओं ने गांधी और नेहरू के खिलाफ एक अभियान छेड़ा है, वह बहुत भयानक है। देश के इतिहास में, स्वतंत्रता संग्राम में, आधुनिक भारत के निर्माण में जिन लोगों का अपार योगदान रहा है, उन्हें भाड़े के भोंपुओं के मार्फत रात-दिन कोसना, हिन्दुस्तान में एक अभूतपूर्व घटना है। और यह सिलसिला देश को एक खरे इतिहास से दूर ले जा रहा है, और एक झूठे इतिहास के गौरव में जीने का मौका दे रहा है। आज सोशल मीडिया पर झूठ फैलाने की आजादी के चलते उस ग्वालियर से गांधी की पढ़ाई के बारे में संवैधानिक कुर्सी पर बैठे एक आदमी ने यह नया झूठ शुरू किया है, जिस ग्वालियर से गांधी की हत्या के लिए हथियार निकला था, और जिसके जंगलों में गांधी के हत्यारों ने गोली चलाने का अभ्यास किया था। इसी ग्वालियर के शासक घराने सिंधिया के बारे में सुभद्रा कुमारी चौहान ने देशप्रेम की एक सबसे महान कविता में लिखा है कि किस तरह सिंधिया घराने ने अंग्रेजों का साथ दिया था। अब जहां से गई पिस्तौल ने गांधी की हत्या की थी, आज उसी जगह गांधी पर एक नई गोली दागी जा रही है, ताकि फर्जी डिग्री, या डिग्री के झूठे दावे वाले लोगों की फेहरिस्त में गांधी का भी नाम जोड़ा जा सके, और इस पूरी लिस्ट को एक अलग विश्वसनीयता दिलाई जा सके। 

लोकतंत्र में जब मूर्तिभंजन होता है, तो वह मासूम नहीं होता, उसे सोच-समझकर किया जाता है। नेहरू के खिलाफ चल रहा अभियान अपने दम पर एक सीमा तक ही चल सकता था, उसके बाद अब उसे गांधी विरोधी एक अभियान की जरूरत और पड़ेगी, क्योंकि गांधी को बदनाम करने से भी नेहरू की बदनामी कुछ और हद तक बढ़ाई जा सकेगी। इस देश में गोडसे की विचारधारा से उपजी नस्लें लगातार इस अभियान में लगी रहती हैं कि गोडसे को भारत-पाक विभाजन से विचलित एक देशभक्त साबित किया जा सके, और ये लोग गांधी की तस्वीर पर गोलियां दागते हुए अपनी तस्वीर और वीडियो पोस्ट करते रहते हैं। भाजपा की सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर सार्वजनिक रूप से खुलेआम गांधी को कोसती हैं, और गोडसे की स्तुति करती हैं, और संसद में बनी रहती हैं, भाजपा में भी। इसलिए भाजपा के नेताओं के कुछ खास मौकों पर राजघाट जाने को इसी संदर्भ में देखना चाहिए कि अपनी पार्टी के भीतर गांधी के हत्यारों के पूजकों के लिए उसके मन में कितना सम्मान है, और कैसे ओहदे उसने इन्हें दे रखे हैं। ऐसे ही एक बहुत बड़े ओहदे पर बैठे हुए मनोज सिन्हा ने बेमौके पर एक बेतुकी बात छेडक़र गांधी पर जो हमला किया है, उसे इस पूरे अभियान के एक हिस्से के रूप में देखना चाहिए। हिन्दुस्तान की आज की जिस पीढ़ी ने गांधी को न देखा है, न आजादी की लड़ाई को भुगता है, उस पीढ़ी को नेहरू और गांधी के खिलाफ बरगलाना कुछ मुश्किल नहीं है। यह पीढ़ी भाड़े के झूठे भोंपुओं की सोशल मीडिया पर कही गई बातों को ज्यों की त्यों मान लेने का सहूलियत का काम करने की आदी है, और इसके बीच देश के इतिहास के सबसे महान लोगों का मूर्तिभंजन करना, और सबसे खराब लोगों को महिमामंडित करना बहुत ही आसान बात है। मनोज सिन्हा गए तो एक निजी यूनिवर्सिटी के कार्यक्रम में थे, लेकिन वहां उन्होंने वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी के दर्जे का भाषण दिया। कोई हैरानी नहीं है कि वे उस जंगल में भी श्रद्धासुमन अर्पित करने गए हों जहां पर गांधी पर गोली चलाने के पहले अभ्यास किया गया था। 

देश में नफरत के लिए एक बड़ा बर्दाश्त पैदा किया जा चुका है। और जिस तरह एक धीमा जहर देकर एक वक्त विषकन्याएं तैयार करने की कहानी रहती थी, आज उसी तरह ये नफरतपुरूष तैयार किए गए हैं। नई पीढ़ी नफरतजीवी हो जाए, तो गांधी-नेहरू की विचारधारा के खिलाफ लोगों का चुनाव जीतना एक आसान काम हो जाएगा, और आज उसी इरादे से लगातार तरह-तरह की कोशिशें चल रही हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 मार्च 2023


 (Daily Chhattisgarh)

एक राजनीतिक बयान पर कैद, इसकी प्रतिक्रिया तो रोज हो सकती है

  24 मार्च, 2023


राहुल गांधी के बयान पर अदालत का फैसला अच्छा है या बुरा, सही है या गलत, यह बहस तो ऊपरी अदालत से इसके खिलाफ होने जा रही अपील के आने तक चल सकती है। लेकिन उसका कोई मतलब नहीं है। हिन्दुस्तानी राजनीति में राहुल का यह बयान अगर दो बरस कैद के लायक है, तो राष्ट्रीय स्तर के दर्जनों नेताओं को बाकी तमाम जिंदगी जेल में ही काटनी होगी। यह अलग बात है कि अधिक पार्टियां या नेता राजनीतिक और चुनावी बयानों को लेकर इस हद तक नहीं जाते हैं कि वे विपक्षी या विरोधी को कैद दिलवा दी जाए। लेकिन भाजपा और उसके नेता आज जिस आक्रामकता के साथ काम कर रहे हैं, और कांग्रेस और राहुल गांधी से उनके रिश्ते जितने खराब चल रहे हैं, उसके चलते हुए एक चुनावी बयान को यहां तक पहुंचाया गया है। हालत यह है कि जिस आम आदमी पार्टी की सरकार के दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की सीबीआई और ईडी की गिरफ्तारी पर भी कांग्रेस ने मुंह नहीं खोला था, उसके नेता और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल खुलकर राहुल गांधी के समर्थन में आए हैं, और विपक्षी नेताओं को इस तरह अदालतों में घसीटने के खिलाफ उन्होंने कुछ घंटों के भीतर ही बयान दिया है। और यह बात जाहिर है कि किसी भी राज्य की सरकार, वहां के नेता स्थानीय छोटी अदालतों में ऐसे मामले लगाकर विरोधी को कैद दिलवाने की उम्मीद कर सकते हैं क्योंकि छोटी अदालत का नजरिया किसी मुकदमे में संवैधानिक व्याख्या का नहीं रहता, वे आमतौर पर बहुत सीमित दायरे में सोचती हैं, और बात-बात में सजा देती हैं। छोटी अदालतों से सुनाई गई अधिकतर सजा हाईकोर्ट तक जाकर खारिज भी हो जाती हैं। राहुल के मामले में भी यही होने की उम्मीद है, और इस बीच यह भी सोचने की जरूरत है कि अगर हर नेता को इस तरह अदालत में घसीटा गया, तो कितने लोग बाहर रह जाएंगे? 

अभी-अभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कुछ बरस पहले का एक वीडियो दिख रहा है जिसमें वे संसद में रेणुका चौधरी की हॅंसी की तुलना रामायण की एक हॅंसी से करते हैं कि रामायण के बाद वैसी हॅंसी अभी सुनाई पड़ी है। यह बात सबको मालूम है कि रामायण में शूर्पनखा की राक्षसी हॅंसी का ही उल्लेख है। इसके अलावा भी नरेन्द्र मोदी कभी शशि थरूर के संदर्भ में सौ करोड़ की गर्लफ्रेंड कहते आए हैं, कभी सोनिया गांधी के संदर्भ में जर्सी गाय, और राहुल के संदर्भ में हाईब्रीड बछड़ा, राजीव गांधी के संदर्भ में करप्ट नंबर-1, जैसी बहुत सी सार्वजनिक टिप्पणियां उनके नाम के साथ जुड़ी हुई हैं, और यह हाल कई पार्टियों के बहुत से नेताओं का रहते ही आया है। अभी-अभी महाराष्ट्र में विधानसभा में एक निर्दलीय विधायक बच्चू कड़ू ने यह प्रस्ताव रखा था कि प्रदेश में आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी पर काबू करने के लिए इन्हें असम भेजा जाए क्योंकि इस पूर्वोत्तर राज्य में स्थानीय लोग कुत्ते खा जाते हैं। इस बात को लेकर असम के मुख्यमंत्री भारी खफा हैं, और उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर यह बयान वापिस लेने और माफी मांगने को कहा है। असम की विधानसभा में इसे लेकर खूब हंगामा हुआ, और यह मांग की गई कि महाराष्ट्र के इस विधायक को सदन में बुलाया जाए, और माफी मंगवाई जाए। लोगों को याद होगा कि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तो उनके बारे में विपक्ष ने लगातार-गली-गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है, का नारा लगाया था, जो पूरे चुनाव में चलते रहा। राहुल गांधी के कर्नाटक चुनाव में कहे गए एक वाक्य पर उन्हें गुजरात की एक अदालत से यह सजा हुई है, और उसमें राहुल ने कहा था कि सभी चोरों का सरनेम मोदी क्यों होता है। जाहिर है कि वे नीरव मोदी, ललित मोदी के साथ-साथ नरेन्द्र मोदी की तरफ भी इशारा कर रहे थे, क्योंकि सार्वजनिक राजनीति में इतनी मासूमियत की छूट तो दी नहीं जा सकती कि वे सिर्फ नीरव और ललित की बात कर रहे थे। ऐसे अनगिनत बयान हैं। केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर का एक बयान जिसमें उन्होंने सार्वजनिक सभा के मंच से गोली मारो सालों को किस्म का नारा लगाकर एक समुदाय की तरफ इशारा किया था, और जब मामला अदालत पहुंचा तो जज का विश्लेषण था कि चूंकि उन्होंने हॅंसते-हॅंसते यह बात कही थी, तो इसे हिंसा के लिए उकसावा नहीं माना जा सकता। हिन्दुस्तान में पिछले बरसों में दर्जनों सांसदों और सैकड़ों विधायकों ने, मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों सहित अंधाधुंध हिंसक बयान दिए हैं जिनमें साम्प्रदायिक नफरत और हिंसा के फतवे रहे हैं। लेकिन किसी अदालत से उन्हें कोई सजा नहीं हुई क्योंकि राजनीतिक बयानों की राजनीतिक प्रतिक्रिया को काफी मान लिया गया था। किसी धर्म या समुदाय के सफाए के बयानों पर अगर अदालत का रूख किया जाता, तो उनके मुकाबले तो राहुल का बयान कुछ भी नहीं है। लेकिन जिस अदालत में जो मामला जाता है, वह अदालत तो उसी की सुनवाई करती है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जरूर कई मामलों को जोड़ सकते हैं, लेकिन छोटी अदालतें एक व्यापक नजरिया नहीं अपना सकतीं।

राजनीति में ओछी बातें भी बंद होना चाहिए, और बिना बात के बतंगड़ भी। आज अगर भाजपा विरोधी दूसरी पार्टियां चाहें तो अलग-अलग लोगों से और अलग-अलग समुदायों से बहुत से भाजपा नेताओं के खिलाफ अदालतों में उनके बयानों को लेकर मुकदमे दर्ज करवाए जा सकते हैं, इनसे हो सकता है कि लोग कुछ और सम्हलकर बोलने लगें, लेकिन लोकतंत्र में हर बात के लिए अदालत का रूख ठीक नहीं है। हो सके तो सार्वजनिक जीवन की बातों को जवाबी बातों से ही निपटाना चाहिए। फिर भी अगर कुछ लोग अधिक ही हिंसा और नफरत की बात करते हैं तो उनके खिलाफ जरूर अदालत जाना चाहिए। कांग्रेस के नेता भाजपा के नेताओं के खिलाफ अब अधिक चौकन्ने रह सकते हैं कि अदालत तक जाने का हक सिर्फ गुजरात के एक मोदी सरनेम वाले विधायक का नहीं है, कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं का भी है। और ऐसे मुकदमों का सैलाब लाने के लिए रोज ही खबरों की कतरनें, और वीडियो मौजूद हो रहे हैं।

(Daily Chhattisgarh)

सरकार-अदालत से निराश देश ही इस रफ्तार से घिरता है अंधविश्वास के जाल में

 23 मार्च, 2023


उत्तरप्रदेश के कानपुर के किसी करौली सरकार नाम के बाबा की खबरें बताती हैं कि वह आश्रम में पहुंचने वाली एक युवती को कद बढ़ाने की उसकी इच्छा पूरी करने के लिए कोई मंत्र सा पढ़ता है, और कहता है कि छह महीने में उसकी ऊंचाई तीन इंच बढ़ जाएगी। यह वीडियो चारों तरफ फैला हुआ ही है कि इस बीच एक डॉक्टर ने पुलिस में रिपोर्ट लिखाई कि इस बाबा के आश्रम में उससे सवाल पूछने पर बाबा ने अपने गुंडों से उसे पिटवाया। सवालों के जवाब में अपने बाहुबलियों से पिटवाना कोई बहुत अनोखा काम बाबाओं के लिए नहीं है। कहीं वे लोगों की पतलून उतरवाने की धमकी देते हैं, कहीं वे श्राप से भस्म कर देने की धमकी देते हैं, बाबा ने इसे सनातन धर्म को नीचा दिखाने की साजिश करार दिया है। शिकायत करने वाला वकील डॉ. सिद्धार्थ चौधरी है, और नाम से समझ पड़ता है कि वह हिन्दू है। दूसरी तरफ कानपुर के एक वकील ने इस बाबा को चुनौती दी है कि उनके बच्चों की बीमारी बाबा अपने चमत्कारों के दावे से ठीक कर दे तो वह अपनी पूरी दौलत बाबा को दान दे देगा। इन खबरों के बीच ऐसे वीडियो आते जा रहे हैं जिनमें यह बाबा कोई मंतर पढक़र चमत्कार से लोगों की बीमारी ठीक करने का नाटक करते दिखता है। 

अब छत्तीसगढ़ भी मध्यप्रदेश के ऐसे एक-दो बाबाओं का शिकार पिछले महीनों में हो चुका है। और ऐसे पाखंडी चमत्कारी दावे करने वाले लोगों के खिलाफ कानून बने हुए हैं, लेकिन किसी भी पार्टी की सरकार हो वह इनके भक्तों की नाराजगी से बचने के लिए ऐसे दावों की अनदेखी करती है। दूसरी तरफ धर्म का ही चोला पहने हुए बहुत से तथाकथित साधू-संत अभी-अभी छत्तीसगढ़ में बड़ा डेरा डाल गए हैं, और देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने की मांग कर गए हैं। इनके साथ भी उसी तरह कांग्रेस के बड़े नेता जुड़े हुए थे जिस तरह डेढ़-दो बरस पहले छत्तीसगढ़ में एक ऐसे ही भगवा आयोजन में गांधी को गंदी गालियां बकी गई थीं, उससे भी कांग्रेस के नेता जुड़े हुए थे। अब पुलिस में रिपोर्ट होने पर कांग्रेस की सरकार कोई कार्रवाई कर दे तो कर दे, कांग्रेस के निर्वाचित नेता भी पूरी तरह से ऐसे पाखंडियों के पीछे लगे रहते हैं। मध्यप्रदेश के ही एक ऐसे ‘सरकार’ को छत्तीसगढ़ के ही उस वक्त के सबसे बड़े कांग्रेस नेता, और अविभाजित मध्यप्रदेश के मंत्री ने लाकर यहां बसाया था, तब से उनका कारोबार यहां चल ही रहा है। इसलिए हर किस्म के पाखंड और चमत्कार के साथ, धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता के फतवे देने वाले प्रवचनकर्ताओं के चरणों में कांग्रेसी भी पड़े दिखते हैं। लोगों को याद होगा कि आसाराम नाम के बलात्कारी मुजरिम के एक पैर पर नरेन्द्र मोदी, तो दूसरे पैर पर दिग्विजय सिंह पड़े दिखते थे। अभी भी महीनों से चल रहे विवाद के बाद भी मध्यप्रदेश के एक नौजवान बाबा के पैरों पर वानप्रस्थ की उम्र वाले कांग्रेस नेता कमलनाथ दिखे हैं। 

वोटों के चक्कर में अगर अधिक हिन्दू बनने को बेचैन कांग्रेस पार्टी अगर ऐसे बाबाओं को जगह-जगह साख दिलाती रहेगी, तो वह हिन्दुत्व की असली वारिस भाजपा की बी टीम भी नहीं बन पाएगी, सी, डी, या ई टीम शायद बन जाए तो बन जाए। जिनको हिन्दुत्व के नाम पर वोट देना है, वे भला भाजपा को क्यों छोड़ेंगे जिसने कभी हिन्दुत्व नहीं छोड़ा। अब देश भर में अलग-अलग पार्टियों के राज वाले प्रदेशों में ऐसे बाबा कारोबार चला रहे हैं। राजनीतिक दल तो बलात्कारी कैदी राम-रहीम को भी जेल से बार-बार बाहर आने का रास्ता बनाने में लगे रहते हैं। राजनीतिक दलों को ऐसे बाबाओं को अंधभक्तों को अपने वोटर बनाने की हसरत रहती है। कांग्रेस का इतिहास जवाहरलाल नेहरू रहा हुआ है, उसके बाद भी अगर आज वह पाखंडों पर सवार होकर भाजपा को पीटना चाहती है, तो भाजपा के पास ऐसे पाखंडों के अंधभक्तों के अलावा अपने खुद के भक्त भी हैं। इस हथियार से भाजपा का कुछ नहीं बिगाड़ा जा सकता। 

देश के कानून को भी इस पर गौर करना चाहिए कि किस तरह लोगों की वैज्ञानिकता को खत्म करके, चमत्कारों का झांसा देकर पेशेवर पाखंडी लोग झांसों की दुकान चला रहे हैं, और उनके खिलाफ मौजूदा कानून के तहत कोई भी कार्रवाई राज्य की सरकारें नहीं कर रही हैं। अब तो वीडियो-सुबूत लोगों के जुर्म साबित करने के लिए आसानी से मौजूद रहते हैं, और देश की किसी न किसी बड़ी अदालत को एक कड़ा रूख दिखाना होगा। जिस देश में जनता तरह-तरह की तकलीफों से घिरी रहती है, जहां उसे सरकार और अदालतों से अधिक उम्मीद नहीं रह जाती, जहां देश का भ्रष्टाचार लोगों को अपनी काबिलीयत से आगे नहीं बढऩे देता, वहां पर लोग अंधविश्वासों में फंस जाते हैं। हिन्दुस्तान ऐसा ही एक देश है। यह सिलसिला खत्म करने के लिए बेंगलुरू से लेकर पुणे तक जिन अंधविश्वास-विरोधियों ने अभियान चलाए, उन्हें मार डाला गया, क्योंकि अंधविश्वास से घिरी जनता से वोट दुहना आसान रहता है। फिर भी छत्तीसगढ़ के डॉ. दिनेश मिश्र की तरह और लोगों को भी आगे आना होगा, जनसंगठनों को मजबूती से पाखंड का विरोध करना होगा, और सरकारों और अदालतों को कार्रवाई के लिए घेरना होगा, तब जाकर देश में वैज्ञानिक सोच को बचा पाना मुमकिन होगा। जहां एक पाखंडी अपने मंतर से पढ़ी-लिखी युवती का कद तीन इंच बढ़ा देने का दावा करे, वहां विज्ञान और वैज्ञानिक सोच की जरूरत किसे रह जाती है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 मार्च 2023


दीवारों पर लिक्खा है, 22 मार्च 2023


 (Daily Chhattisgarh)

अब दिल्ली में केजरीवाल का नया पोस्टर शिगूफा...

 22 मार्च, 2023


दिल्ली पुलिस ने 6 लोगों को शहर की दीवारों पर पोस्टर चिपकाने के एक मामले में गिरफ्तार किया है। ये पोस्टर जाहिर तौर पर आम आदमी पार्टी के छपवाए हुए दिखते हैं। पोस्टरों पर कहीं आप का नाम नहीं है, लेकिन अब तक की पुलिस जांच में जो सामने आया है उसके मुताबिक ऐसे पोस्टरों से भरी हुई एक वैन जब्त हुई है जो कि आप मुख्यालय से निकली थी, और गिरफ्तार किए गए लोगों से यह पता लगा है कि दो दिन से ऐसे पोस्टर छापकर आप मुख्यालय में पहुंचाए जा रहे थे। इस पोस्टर की जिम्मेदारी लिए बिना इस पार्टी ने ट्विटर पर इस पोस्टर की फोटो के साथ लिखा है कि मोदी सरकार की तानाशाही चरम पर है, इस पोस्टर में ऐसा क्या आपत्तिजनक है जो इसे लगाने पर मोदीजी ने सौ एफआईआर कर दी, प्रधानमंत्री मोदी, आपको शायद पता नहीं पर भारत के एक लोकतांत्रिक देश है, एक पोस्टर से इतना डर क्यों? 

अब यह पोस्टर चार शब्दों के हैं, मोदी हटाओ देश बचाओ। दो प्रिटिंग प्रेस को ऐसे 50-50 हजार पोस्टर छापने का ऑर्डर दिया गया था, और इन प्रेस से जुड़े हुए लोगों ने इतवार रात से सोमवार सुबह तक दिल्ली की दीवारों पर ये पोस्टर चिपकाए हैं। ये मामला प्रिटिंग प्रेस के नाम के बिना पोस्टर छापने की वजह से दर्ज किया गया है क्योंकि देश के कानून के मुताबिक किसी भी छपाई पर उसे छपवाने वाले और छापने वाले के नाम होने चाहिए। लोगों को याद होगा कि छोटे-छोटे से पर्चे भी प्रिटिंग प्रेस के नाम सहित ही छपते हैं। ऐसे में एक राजनीतिक मांग या नारे वाले ऐसे पोस्टर छपवाना और उन्हें सार्वजनिक दीवारों पर चिपकाना, यह काम बिना नाम क्यों होना चाहिए था? अरविन्द केजरीवाल की पार्टी को चुनाव लड़ते कई बरस हो गए हैं, और यह पार्टी रात-दिन दिल्ली के लेफ्टिनेंट जनरल से कानूनी लड़ाई में लगी रहती है। अभी इसके दो बड़े नेता जेलों में हैं, और पार्टी रात-दिन वकीलों के साथ जुटी हुई है। ऐसे में एक रजिस्टर्ड राजनीतिक दल को इस मासूमियत का लाभ नहीं दिया जा सकता कि वह पोस्टर छपवाते हुए एक न्यूनतम कानूनी जरूरत को पूरा करना भूल गई थी। वह तो अभी भी जब इस मामले में सौ एफआईआर हो चुकी हैं, और 6 लोग गिरफ्तार हो चुके हैं, तब भी इस पोस्टर की जिम्मेदारी लेने से कन्नी काट रही है। वह प्रधानमंत्री की आलोचना तो कर रही है, उन्हें लोकतंत्र याद दिला रही है, बेनाम पोस्टरों के खिलाफ जुर्म दर्ज होने पर उसे तानाशाही करार दे रही है, लेकिन अपनी खुद की इस हरकत पर बेकसूर लोगों की गिरफ्तारी के बाद भी वह इन पोस्टरों को छपवाने और लगवाने की जिम्मेदारी के मुद्दे पर चुप है। यह तो पुलिस जांच से साबित हो गया है कि इन पोस्टरों के पीछे आम आदमी पार्टी ही है, तो फिर सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता के आंदोलन की उपज यह पार्टी साफ-साफ अपने काम कुबूल क्यों नहीं कर रही है? मोदी से लोकतंत्र की उम्मीद करना, और खुद बेनाम पोस्टर छपवाकर लगवाने का कानूनविरोधी काम करना, इन दोनों को एक साथ करना आम आदमी पार्टी के बस की ही बात दिखती है। 

हिन्दुस्तान में राजनीतिक दल चुनावों के वक्त, चुनाव आचार संहिता के चलते चुनाव आयोग के सीधे नियंत्रण में रहते हैं, या कम से कम उनके प्रति हर हद तक जवाबदेह तो रहते ही हैं। लेकिन आचार संहिता से परे भी उनका काम तो एक मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल की हैसियत से ही चलता है, और यह मान्यता उन्हें चुनाव आयोग से ही मिली हुई है, इसलिए अपनी गैरकानूनी हरकतों के लिए उन्हें देश के बाकी कानून के साथ-साथ चुनाव आयोग के प्रति भी जवाबदेह रहना चाहिए, और गैरकानूनी हरकतों की वजह से पार्टियों की मान्यता खत्म करने का इंतजाम भी रहना चाहिए। और यह बात हम सिर्फ आम आदमी पार्टी के इस मासूम नारे वाले गैरकानूनी पोस्टरों के बारे में नहीं कह रहे हैं, बल्कि किसी भी पार्टी के नेता की गैरकानूनी और अलोकतांत्रिक बातों के बारे में भी कह रहे हैं। बहुत से नेता लगातार हिंसा और साम्प्रदायिक नफरत भडक़ाने वाले बयान देते हैं। इनमें से बहुत से लोग राजनीतिक दलों के सांसद और विधायक भी रहते हैं, या मान्यता प्राप्त राजनीतिक संगठन के पदाधिकारी रहते हैं। चूंकि संसद और विधानसभाएं सदन के बाहर अपने सदस्यों के किसी भी आचरण पर कोई कार्रवाई करते नहीं दिखती हैं, न ही उनकी कोई दिलचस्पी दिखती है, ऐसे में चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों से जवाब-तलब करने, उनकी मान्यता निलंबित या खत्म करने का काम करना चाहिए। आज बहुत से लोगों को यह बात इसलिए अलोकतांत्रिक लग सकती है क्योंकि आज देश में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता धेले की नहीं रह गई है। ऐसा माना जाता है कि मोदी सरकार ने चुनाव आयोग को सरकार का ही एक विभाग या मंत्रालय बना रखा है। लेकिन हम राजनीतिक दलों के जुर्म, उनकी गुंडागर्दी, और उनके अलोकतांत्रिक कामों को लेकर चुनाव आयोग के प्रति उनकी एक जवाबदेही के हिमायती हैं। अब अगर संवैधानिक संस्थाएं पूरी तरह से पक्षपाती हो जाएं, तो एक अलग बात है, उस हालत में तो बिना ऐसे अधिकार के भी चुनाव आयोग किसी पार्टी को परेशान कर सकता है, लेकिन सामान्य स्थितियों में राजनीतिक दलों की जवाबदेही बढ़ानी चाहिए, और उन्हें सिर्फ देश के आम कानून के भरोसे नहीं छोडऩा चाहिए। वे एक विशेष कानूनी दर्जा प्राप्त मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल हैं, और इस मान्यता के साथ यह बात जुड़ी रहनी चाहिए कि अगर वे सार्वजनिक जगहों पर कोई तोडफ़ोड़ करते हैं, तो चुनाव आयोग भी उनसे जवाब-तलब कर सके, नुकसान की वसूली कर सके। कई लोगों को लग सकता है कि इस काम के लिए तो देश के दूसरे कानून काफी हैं, और चुनाव आयोग को और अधिक अधिकार क्यों दिए जाएं, लेकिन देश के बाकी कानून राजनीतिक दलों की मान्यता से जुड़े हुए नहीं हैं। इसलिए देश में कई तरह के सार्वजनिक जुर्म करने पर कार्रवाई का अधिकार चुनाव आयोग को भी होना चाहिए। 

आखिर में इस मुद्दे पर यही लिखना रह गया है कि आम आदमी पार्टी इस तरह के कई शिगूफों, और लोगों से एकतरफा टकराव करने की रणनीति पर चलती आई है। वह कोई आरोप उछालती है, और खिसक लेती है, किसी बात को मुद्दा बनाती है, और उसे सहूलियत के साथ भूल जाती है, वह भ्रष्टाचार विरोध के आंदोलन के साथ अस्तित्व में आई थी, लेकिन आज उसके बड़े-बड़े नेता बड़े-बड़े भ्रष्टाचार के मामलों में गिरफ्तार हैं, और लोगों की हमदर्दी इस पार्टी के साथ घटती दिख रही है। अब यह पार्टी मोदी हटाने का ऐसा नारा तो दीवारों पर लगवा रही है जो देश के बाकी विपक्षी दलों को भी ठीक लगे, लेकिन मोदी के खिलाफ किसी मजबूत विपक्ष की नौबत से वह कतरा भी रही है। इसलिए आज उसका मोदी विरोध का यह महत्वहीन नाटक गैरकानूनी छपाई करवाने का नाटक भी है, ताकि ये पोस्टर और खबरों में आ जाएं। दिल्ली की जनता कई वजहों से केजरीवाल को दुबारा चुन चुकी है, लेकिन धीरे-धीरे करके ऐसे नाटक उजागर होते चलेंगे, और इस पार्टी के लिए मामला आसान नहीं रह जाएगा।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 मार्च 2023


 (Daily Chhattisgarh)

2024 में मोदी का विकल्प न प्रशांत किशोर को मुमकिन दिख रहा है, और न ही हमें..

  21 मार्च, 2023


हिन्दुस्तान के सबसे चर्चित चुनाव-रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने अभी किसी एक टीवी चैनल से बातचीत में अगले आम चुनाव को लेकर अपना जो अंदाज सामने रखा है, वह पूरी तरह से अनोखा तो नहीं है, क्योंकि बहुत से लोग यह मानते हैं कि डॉन को ढूंढने की तरह, मोदी को हराना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। ये शब्द किसी और के कहे हुए नहीं है, और यह हमारी अपनी एक मिसाल है, जो कि अलग-अलग तथ्यों और तर्कों से माकूल साबित होती है। हिन्दुस्तानी चुनावी राजनीति की हकीकत को देखें, तो मोदी को हराने की हसरत एक बड़ी दूर की कौड़ी दिखती है, और वह कौड़ी शायद फूटी हुई भी है। खैर, हम अपनी बात से यह चर्चा शुरू करने के बजाय प्रशांत किशोर की कही बातों पर आएं तो उन्होंने कहा कि विचारधारा के स्तर पर अलग-अलग बंटे होने के कारण विपक्षी एकता 2024 में काम नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि विपक्षी एकता केवल दिखावा है, और पार्टियों और नेताओं को एक साथ लाने से ही यह साकार नहीं होगी। प्रशांत किशोर ने कहा अगर भाजपा को चुनौती देना चाहते हैं तो उसकी तीन ताकतों, हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद, और कल्याणवाद को समझना होगा, और इनमें से कम से कम दो का मुकाबला किए बिना भाजपा को चुनौती नहीं दे सकते। प्रशांत किशोर ने अपने अब तक की आखिरी राजनीतिक पहल का भी खुलासा किया, और कहा कि कांग्रेस से उनके संपर्क का मकसद कांग्रेस को दुबारा खड़ा करना था, जबकि उनका मकसद चुनाव जीतना था, इसलिए सहमति नहीं हुई। 

अब प्रशांत किशोर की बातों को कुछ पल के लिए छोड़ भी दें, तो भी हिन्दुस्तान की हकीकत तो देश के नक्शे पर साफ-साफ लिखी हुई है। शुरूआत देश के उन दो बड़े राज्यों से करें जहां से लोकसभा की सबसे अधिक सीटें आती हैं। उत्तरप्रदेश और बिहार इन दोनों की राजनीति यह कहती है कि इन दोनों जगहों पर कांग्रेस अधिक सीटें जीतने की हालत में नहीं है। बिहार में कांग्रेस कुल एक सीट पर जीती थी, और उसका यही हाल उत्तरप्रदेश में भी था। इन नतीजों के चलते हुए वह बिहार में किसी गठबंधन में भी एक से अधिक सीट शायद ही पाए, और यूपी में तो न सपा न बसपा, कांग्रेस से गठबंधन को कोई भी तैयार नहीं है। ऐसे में कांग्रेस देश भर में अपनी मौजूदगी के दावे पर तो खरी है, लेकिन उसके हाथ में सीटें बहुत कम हैं, और अब से लेकर 2024 के चुनाव तक अगर धरती और आसमान में कुछ उलट-पुलट न हो जाए, तो आज ऐसी कोई वजह नहीं दिखती है कि कांग्रेस की सीटें बढ़ सकें। लेकिन दूसरी तरफ राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा से कांग्रेस पार्टी एक बड़ी खुशफहमी में जरूर पड़ गई है कि राहुल विपक्ष के इतने बड़े नेता हैं कि विपक्षी एकता का कोई भी गणित राहुल को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर ही सुलझाया जा सकेगा। कांग्रेस की यह घरेलू दिक्कत जरूर है कि राहुल से परे किसी और के नाम पर सोचने की कोई गुंजाइश नहीं है, और यह बात हकीकत भी है कि डेढ़ सौ दिनों के इस सफर ने राहुल को अपने ही पदयात्रा के पहले के कद से बहुत बड़ा कर दिया है। इससे एक दिक्कत भी हुई है, राहुल, और उनसे बढक़र उनकी पार्टी को भारत जोड़ो से जो आत्मविश्वास मिला है, उससे कांग्रेस पार्टी अपने आपको विपक्षी मोर्चे का स्वाभाविक मुखिया मानने लगी है, और राहुल को इस मोर्चे का नेता। यह कांग्रेस की पसंद हो सकती है, लेकिन विपक्षी मोर्चे में शामिल होने वाले दलों के लिए यह अगुवाई मंजूर करना आसान भी नहीं है, शायद बिल्कुल भी मुमकिन नहीं है।

देश के एक-एक करके हर राज्य को देखें, तो वहां क्षेत्रीय पार्टियां एक-दूसरे के मुकाबले इस तरह डटी हुई हैं कि भाजपा के अगुवाई वाले गठबंधन, और कांग्रेस के अगुवाई वाले गठबंधन में से किसी भी एक में ऐसी दो क्षेत्रीय पार्टियां जाने की नहीं सोच सकती हैं। यूपी में सपा और बसपा, बंगाल में ममता और वामपंथी, पंजाब में अकाली, कश्मीर में अब्दुल्ला और महबूबा, आंध्र में चंद्राबाबू नायडू और जगन मोहन, तेलंगाना में सत्तारूढ़ टीआरएस पहले ही कांग्रेस और भाजपा दोनों से परे रहने की मुनादी कर चुकी है। अधिकतर जगहों पर क्षेत्रीय पार्टियां आपसी टकराहट की वजह से किसी एक गठबंधन में नहीं जाएंगी, और ऐसे में केन्द्र की ताकत, और एक-एक करके अधिकतर प्रदेशों में सत्ता पर पहुंच चुकी एनडीए के मुकाबले लोगों को जोडऩा तकरीबन नामुमकिन लगता है। अब ऐसे में लोगों को जोडऩे की एक तरकीब हो सकती थी कि कांग्रेस सबसे फैली हुई, सबसे बड़ी और सबसे पुरानी पार्टी होने के बावजूद अगर प्रधानमंत्री पद पर दावा नहीं करती, तो कुछ पार्टियां उसके साथ जुड़ सकती थीं, लेकिन जिस देश में गुजराल और देवेगौड़ा जैसे नेता भी प्रधानमंत्री बन चुके हैं, वहां पर देश के कम से कम आधा दर्जन नेताओं का ऐसा सपना देखने का तो बड़ा जायज हक बनता है। हालात कब किसे ले जाकर प्रधानमंत्री बना दें, इसका ठिकाना नहीं रहता, इसलिए आज ममता से लेकर अखिलेश तक, और नीतीश से लेकर पवार तक, बहुत से लोगों को ऐसा गठबंधन नागवार गुजर सकता है जिसका पीएम-प्रत्याशी अभी से राहुल गांधी को बना दिया जाए। 

हमने कुछ अरसा पहले भी इसी जगह पर यह बात लिखी थी कि राहुल और कांग्रेस के सामने आज बड़ी चुनौती कांग्रेस को एक रखना नहीं है, बल्कि विपक्षी एकता की कोशिश करना है। लेकिन यह कोशिश शुरू भी हो, उसके पहले कांग्रेस के कुछ बड़बोले नेता शुरू हो जाते हैं कि कोई भी गठबंधन तभी मुमकिन है, जब राहुल उसके नेता, और पीएम-प्रत्याशी हों। आज जब लोग एक-दूसरे से मिलकर किसी गठबंधन की संभावनाएं टटोल ही रहे हैं, उस वक्त कांग्रेस पार्टी एक पार्टी के रूप में, या उसके नेता राहुल की तरफ से अगर ऐसी बातें करेंगे कि लूडो के खेल में छह आने पर ही गोटी बाहर निकलने जैसी शर्त गठबंधन में राहुल को मुखिया बनाने की रहेगी, तो फिर यह बातचीत का माहौल भी नहीं रहेगा। गठबंधन के मुखिया की बात तो उस वक्त होनी चाहिए जब गठबंधन की पार्टियों की जीती हुई सीटों की लिस्ट सामने रहे। यह बात सही है कि कांग्रेस के लिए यह नौबत बहुत आसान नहीं है, कि वह पार्टी के रूप में अपने को सबसे ऊपर रखे, और राहुल गांधी को नेता बनाने को पहली शर्त रखे, या फिर वह विपक्षी एकता की कोशिश करे। ये दोनों बातें साथ चलते नहीं दिख रही हैं। प्रशांत किशोर के तर्क अलग हो सकते हैं, और हमारे आज के यहां गिनाए गए तर्क कुछ अलग, लेकिन इन दोनों से अंदाज यही बैठता है कि 2024 के चुनाव में मोदी जैसा कोई नहीं के हालात दिख रहे हंै। पार्टियां अपने को बचाने, अपने नेता को बचाने, विपक्ष को बचाने, और भारतीय लोकतंत्र को बचाने के बीच प्राथमिकताएं तय करने में बहुत तंगदिली, और तंगनजरिए का शिकार दिख रही हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 20 मार्च 2023


 (Daily Chhattisgarh)

एक देश की सोच से वैज्ञानिकता और तर्क खत्म हो जाने के खतरे

  20 मार्च, 2023


हिन्दुस्तान में एक बार फिर कोरोना की सुगबुगाहट सुनाई दे रही है। एक दिन में देश में 5 सौ से अधिक कोरोना पॉजिटिव मिलने से सरकारें चौकन्नी हो गई हैं। सडक़ों पर कुछ लोग, चाहे वे गिनती के ही क्यों न हों, मास्क लगाए दिखने लगे हैं। लेकिन ऐसी कोई वजह नहीं दिखती है कि देश में इसे लेकर किसी दहशत या हड़बड़ी की नौबत हो। कोरोना के पिछले दो अलग-अलग दौर में जिस तरह लाखों लोग मारे गए, और विश्व स्वास्थ्य संगठन का अंदाज दसियों लाख का है, उसके बाद कोरोना के तीसरे दौर में तकरीबन कुछ भी नहीं हुआ। इसकी दो वजहें बताई गईं, एक तो यह कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा टीके ले चुका है, और दूसरी वजह यह कि आबादी के एक बड़े हिस्से को कोरोना हो चुका था, और उसकी वजह से इस वायरस के खिलाफ शरीर में प्रतिरोधक शक्ति विकसित हो चुकी थी, और इस वजह से वायरस का नया हमला उस पर असर नहीं कर रहा था। अब अगर नौबत जरा भी फिक्र की नहीं है, तो फिर इस मुद्दे पर आज लिखा क्यों जा रहा है? आज कोरोना पर लिखने की जरा भी नीयत नहीं है, लेकिन कोरोना के सबक से जिंदगी के दूसरे दायरों में भी कुछ-कुछ सीखा जा सकता है। 

हिन्दुस्तान में आज धार्मिक कट्टरता, और साम्प्रदायिकता के वायरस ने तकरीबन तमाम आबादी को संक्रमित कर दिया है। इस तरह से प्रभावित हो चुकी आबादी पर अब और अधिक भडक़ाऊ बातों का असर होते ही नहीं दिखता है। साम्प्रदायिक नफरत लोगों को ध्यान भी नहीं खींचती, वह हिन्दुस्तानी जिंदगी में एक नवसामान्य बात हो गई दिखती है। जब लोग ऐसे चिकने घड़े सरीखे हो जाएं जिन पर साम्प्रदायिक नफरत की फिक्र की बूंद भी न टिक पाए, तो वह एक अलग किस्म की, बड़ी फिक्र की बात रहती है, और आज हिन्दुस्तान उसी से गुजर रहा है। फिर दूसरी बात यह भी है कि जब लोगों की सोच जिंदगी के किसी एक दायरे में तर्कहीन, कुतर्क पर आधारित, अवैज्ञानिक होने लगती है, तो फिर वे जिंदगी के बाकी दायरों में भी उसी दर्जे की सोच रखने लगते हैं। अगर कोई अंधविश्वासी बिना महूरत देखे घर से नहीं निकलते हैं, तो फिर वे किसी ताबीज के झांसे में भी जल्दी आ जाते हैं, वे घर-दुकान का वास्तु सुधरवाने लगते हैं, किसी मंत्र का जाप करना उन्हें ठीक लगने लगता है, और वे निर्मल बाबा सरीखे किसी इंसान के बताए शुक्रवार को काले कुत्ते को पीली रोटी खिलाने के लिए भी घूमते रहते हैं। अंधविश्वास अकेले नहीं आता, वह दोस्तों और सहेलियों के साथ आता है। उसी तरह जिस देश की सोच झूठ पर जिंदा रहने लगती है, वह देश कई किस्म के झूठों पर भरोसा करने लगता है, और उसका कोई अंत नहीं होता। वह पीलिया उतारने के लिए थाली के पानी में खड़ा करके किसी से मंत्र भी पढ़वाने पर भरोसा करने लगता है। वह किसी दरगाह या मंदिर पर होने वाली आत्मा आने की नौटंकी पर भी भरोसा करने लगता है। और इस किस्म के अवैज्ञानिक और अंधविश्वासी संक्रमण की मार से लोगों पर वैज्ञानिकता का असर खत्म हो जाता है। जिन लोगों ने एक पूरी पीढ़ी की जिंदगी विज्ञान पर भरोसा करके एक वैज्ञानिक सोच पाई थी, उन्हें अंधविश्वासी सोच साल भर में अंधविश्वासी बना सकती है। हिन्दुस्तान में आज यही हो रहा है, जिस तरह कोरोना के संक्रमण के बाद अब कोरोना का खतरा ऐसे लोगों पर घट गया है, उसी तरह अंधविश्वास के संक्रमण के बाद अब लोगों पर वैज्ञानिकता का ‘खतरा’ घट चुका है, और लोग तेजी से धार्मिक, जातीय, या सामुदायिक नफरत में घिरने लगे हैं, उन्हें यह समझ ही नहीं पड़ रहा है कि भीड़ की मानसिकता से परे देश की बेहतरी एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में है। 

देश की जनता वैज्ञानिक सोच के खिलाफ, लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ एक प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर चुकी है। ऐसे में उसे सार्वजनिक और व्यापक हित की बातें समझाना मुश्किल हो गया है। पहले वह एक धर्म को एक ईकाई मानकर, उसके भीतर के लोगों के भले की ही बात सोच रही है, फिर इस धर्म के भीतर भी अलग-अलग किस्म की आस्था पद्धतियों के भीतर उसकी सोच सिमट रही है। और यह सिलसिला धीरे-धीरे करके एक बहुत ही छोटे और बहुत ही कट्टर दायरे में लोगों को कैद करते जा रहा है। लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक सोच कतरों में नहीं आ पाती, उसके लिए लोगों को निर्विवाद रूप से अपनी तमाम सोच को विकसित करना होता है। जिस तरह सडक़ पर चलते किसी इंसान के सिर से लेकर पैर तक, तमाम धड़ को ही एक साथ आगे या पीछे ले जाया जा सकता है, टुकड़ों में नहीं ले जाया जा सकता, उसी तरह लोगों की सोच है, या तो वह पूरी तरह वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक होगी, न्यायसंगत और सरोकारी होगी, या फिर वह अंधविश्वासी और अलोकतांत्रिक होगी, उसे सामाजिक समानता से कुछ भी लेना-देना नहीं होगा। 

यह तमाम बात लोगों को कुछ अमूर्त लग सकती है, क्योंकि इसे एक चेहरा देना मुश्किल है, इसे महज समझा जा सकता है। और आज इस बात को समझने की जरूरत जितनी अधिक है, उसके खिलाफ उतनी ही अधिक संगठित साजिश चल रही है कि लोग कहीं वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक सोच की ओर लौट तो नहीं जाएंगे? यह वक्त हिन्दुस्तान में एक बहुत खतरनाक दौर है, और इससे भी अधिक खतरनाक यह है कि लोगों को इस खतरे का अहसास होना खत्म हो चुका है। यह सिलसिला पता नहीं कब थमेगा, थमेगा भी या नहीं, या फिर यह बढ़ते ही चलेगा, दुनिया के उन कुछ देशों की तरह जहां पर कि धर्मान्धता ने लोकतंत्र को भी खत्म कर दिया है। इस हिन्दुस्तान को आज हिन्दू राष्ट्र बनाने के नारे बढ़ते चल रहे हैं, वे फतवों की शक्ल ले रहे हैं, और इससे भी बड़ा खतरा यह है कि बहुत से लोगों को यह बात स्वाभाविक और सही लग रही है, और इसमें उनकी बची-खुची लोकतांत्रिक सोच आड़े भी नहीं आ रही है। सोच का इस हद तक खत्म हो जाना एक बड़ा खतरा है।

(Daily Chhattisgarh)

बयान के 45 दिन बाद राहुल के घर पहुंची दिल्ली पुलिस असहमति पर एक हमला...

 19 मार्च, 2023


आज किस मुद्दे पर लिखा जाए इसे लेकर तलाश जारी थी कि कुछ हैरान करने वाली एक खबर आ गई, और यह तलाश खत्म हुई। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के घर पर दिल्ली पुलिस के एक बड़े अफसर की अगुवाई में एक टीम पहुंची है जो उनसे उनके एक बयान पर पूछताछ करना चाहती है। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने श्रीनगर में यह कहा था कि कुछ महिलाओं ने उनसे यौन उत्पीडऩ की शिकायत लेकर संपर्क किया था, और उन्होंने यह सुना है कि उन महिलाओं पर अभी भी यौन हमले किए जा रहे हैं। अभी पूछताछ करने पहुंचे अफसरों का कहना है कि पुलिस ने उनसे उन पीडि़त महिलाओं के बारे में जानकारी मांगी है ताकि उन्हें सुरक्षा मुहैया कराई जा सके। 

पूछताछ का यह अंदाज कुछ हैरान करता है। किसी एक सांसद ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में अगर यह कहा है कि यौन शोषण की शिकार महिलाओं ने उनसे मिलकर शिकायत की है, तो क्या यह बयान किसी सांसद के घर पुलिस टीम के पहुंचकर बयान लेने के लायक है? या पुलिस महज एक चि_ी लिखकर भी अपने लोगों का वक्त बचा सकती थी? कांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश ने यह कहा है कि भारत जोड़ो यात्रा को खत्म हुए ही 45 दिन हो चुके हैं। अगर दिल्ली पुलिस को राहुल गांधी के बयान से महिलाओं की सुरक्षा की इतनी फिक्र उपजी थी, तो उसे इतने दिनों में यह पूछताछ कर लेनी थी। यह बात अटपटी है, और इसीलिए आज कांग्रेस और केन्द्र सरकार के बीच, खासकर राहुल गांधी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच चल रही एक अभूतपूर्व तनातनी को लेकर पूछताछ का यह तरीका अधिक फिक्र के लायक हो जा रहा है। क्या यह ब्रिटेन प्रवास के दौरान राहुल गांधी द्वारा की गई मोदी सरकार की आलोचना की एक प्रतिक्रिया है? क्या यह कांग्रेस पार्टी की ओर से अडानी को लेकर मोदी से हर दिन सोशल मीडिया पर किए जा रहे सवालों की प्रतिक्रिया है? आज जब तनातनी इतनी अधिक है, तो क्या सरकार चला रहे लोगों को सरकार के तौर-तरीकों को लेकर कुछ अधिक सावधान नहीं रहना था, या फिर तौर-तरीकों का यह प्रदर्शन सोच-समझकर किया जा रहा है, ताकि खिलाफ बयान देने वाले लोगों को सरकार की ताकत का अहसास हो सके? 

एक नेता के एक सामान्य बयान का जवाब प्रभावित पार्टी या नेता की ओर से एक सामान्य बयान से भी हो सकता था। लेकिन राहुल के बयान के खिलाफ जिस तरह से संसद को ही कई दिनों से ठप्प कर दिया गया है, जिस तरह से राहुल से माफी मंगवाने पर भाजपा और सत्ता आमादा हैं, वह भी हैरान करता है। अडानी से तो हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था, जनता के हक की सार्वजनिक संपत्तियां जुड़ी हुई हैं, इसलिए अडानी को लेकर तो अमरीका की संस्था हिंडनबर्ग से लेकर भारतीय अदालतों तक कई जगहों पर सवाल हो रहे हैं, इसलिए किसी को उसका बुरा नहीं मानना चाहिए। लेकिन भारतीय लोकतंत्र की आज की हालत की राहुल की व्याख्या अगर किसी बहाने पुलिस को उनके घर पहुंचा दे रही है, तो यह तरीका अभूतपूर्व और बड़ा ही अटपटा है, और यह निराश करता है कि इस लोकतंत्र में विपक्ष और असहमति अवांछित हो चुके हैं। 

फिर यह बात भी हैरान करती है कि सत्ता के साथ-साथ मीडिया का एक बहुत बड़ा हिस्सा देश की हर दिक्कत के लिए जिस अंदाज में राहुल से सवाल कर रहा है, उससे ऐसा लगता है कि राहुल ही देश के प्रधानमंत्री हैं, और सौ रूपये लीटर डीजल-पेट्रोल से लेकर 11 सौ रूपये के गैस सिलेंडर तक के लिए राहुल ही जिम्मेदार हैं। देश की दिक्कतों और सरकार की नाकामी को लेकर जितने सवाल सरकार से होने चाहिए, उतने सवाल राहुल से किए जा रहे हैं। लोकतंत्र में मीडिया ने हिन्दुस्तान में बहुत पहले से अपने को चौथा खम्भा बना रखा था। अब यह चौथा खम्भा पहले खम्भे के तलुओं को गुदगुदाने में जिस अंदाज में जुटा हुआ है, उससे हैरानी होती है कि क्या असल जिंदगी के कोई स्तंभ एक-दूसरे के पैरों पर पड़े रहकर भी स्तंभ का दर्जा पाने का दावा करते रह सकते हैं? इस मीडिया में जब कभी हिन्दुस्तानी जिंदगी के कुछ असल मुद्दों के सतह पर आ जाने, और छा जाने का खतरा दिखता है, तब-तब योजनाबद्ध तरीके से कुछ ऐसी निहायत गैरजरूरी बातों से गढ़ी हुई खबरों के सैलाब मीडिया में दिखने लगते हैं कि जनता, दिमाग पर जोर डालने से बचने की आदी जनता, उसी में भीग जाती है। यह सिलसिला गैरमुद्दों को असल मुद्दों की तरह पेश करने का है, और ऐसा भी लगता है कि राहुल के घर पुलिस भेजने का यह फैसला खबरों से कुछ दूसरी बातों को पीछे धकेलने का है, और बयान देने वाले नेताओं को चुप रहने की, कम बोलने की नसीहत देने वाला तो है ही। यह लिखते-लिखते ही दिल्ली से राहुल के घर के बाहर पुलिस के पहुंचने और दाखिल होने के जो वीडियो आए हैं, वे और हक्का-बक्का करते हैं। डेढ़-दो दर्जन पुलिसवाले, जिनमें से बहुत से लोग वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे हैं, मानो हरियाणा के संत रामपाल के आश्रम में पुलिस कार्रवाई होने जा रही है, और भीतर से हथियारबंद संघर्ष की आशंका है। एक अहिंसक, सभ्य और विनम्र सांसद से पूछताछ के लिए दिल्ली पुलिस का एक अफसर काफी नहीं होता?

हिन्दुस्तान में आज केन्द्र सरकार, भाजपा, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से किसी भी किस्म की असहमति, उनमें से किसी की भी आलोचना को देशविरोधी, राष्ट्रविरोधी, और राष्ट्रद्रोही साबित करने की एक दौड़ चल रही है। कल ही केन्द्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू ने एक बयान दिया है कि देश के कुछ ऐसे भूतपूर्व जज हैं जो भारतविरोधी गिरोह का हिस्सा हैं, जो न्यायपालिका को विपक्षी दलों की तरह सरकार के खिलाफ करने की कोशिश कर रहे हैं, और जो कोई देश के खिलाफ काम करेंगे उन्हें इसके दाम चुकाने होंगे। उनके इस बयान पर देश के एक प्रमुख वकील प्रशांत भूषण ने इसे जजों को धमकी देना कहा है। तो बात सिर्फ राहुल गांधी तक सीमित नहीं है, इस देश में देश की सबसे बड़ी अदालत के रिटायर्ड जज भी अब भारतविरोधी गिरोह का हिस्सा करार दिए जा रहे हैं, क्योंकि वे सरकार के कुछ फैसलों से असहमत हैं। जिस लोकतंत्र में असहमति नाली में फेंक दिए गए अवांछित नवजात शिशु से भी अधिक अवांछित मान ली जाए, वहां नाली में सिर्फ नवजात शिशु की लाश नहीं रहती, वहां वानप्रस्थ आश्रम जाने की उम्र वाले लोकतंत्र की लाश भी रहती है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 मार्च 2023


 (Daily Chhattisgarh)

एक-एक शब्द का इतना विश्लेषण सोचने-लिखने को कहां पहुंचाएगा?

 19 मार्च 2023

 

जिन लोगों ने ब्लैक एंड व्हाईट टीवी के जमाने से क्रिकेट देखा है, उनके लिए अब 21वीं सदी का क्रिकेट टेलीकास्ट एक अलग ही दुनिया है। दर्जनों या सैकड़ों कैमरे बड़े असंभव किस्म के एंगल से मैच की वीडियो रिकॉर्डिंग करते हैं, विकेट से लेकर मैदान में जगह-जगह लगे हुए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से न सिर्फ वीडियो रिकॉर्डिंग होती है, बल्कि तरह-तरह का नाप लेकर एक-एक गेंद की लंबाई, रफ्तार, टप्पे की जगह, और विकेट तक उसके पहुंचने की संभावना पल भर में कम्प्यूटर बता देते हैं। किसने सोचा था कि एम्पायर के मानवीय फैसले से परे इतना कुछ हो सकता है जिसकी मदद दुविधा होने पर खुद एम्पायर ले सकते हैं। अब किसी एक गेंदबाज या बल्लेबाज के खेल का विश्लेषण भी पल भर में कम्प्यूटर की मेहरबानी से स्क्रीन पर देखने मिल जाता है, और एक-एक गेंद, एक-एक शॉर्ट का विश्लेषण हो जाता है, जो कि इंसानी आंखों से मुमकिन नहीं था। 

लेकिन बात सिर्फ क्रिकेट की नहीं है, जिंदगी के और भी तमाम दायरों में टेक्नालॉजी ने कुछ ऐसा ही करिश्मा कर दिखाया है। अब पिछले हफ्ते-दस दिन से मैं अपने यूट्यूब चैनल के लिए कुछ वीडियो तैयार करके पोस्ट कर रहा हूं। यह एकदम शुरुआत है, लेकिन उत्कृष्टता की तैयारी में बहुत से काम कभी हो ही नहीं पाते हैं, इसलिए मैंने बिना किसी तैयारी के यह काम शुरू कर दिया, और अगर उसमें सुधार और मरम्मत की ताकत होगी, तो धीरे-धीरे वह सुधर जाएगा। इसे शुरू करने के बाद यूट्यूब और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की आंतरिक तकनीक का वह हिस्सा जो कि लोग कम्प्यूटर पर देख सकते हैं, वह मेरे लिए किसी ब्रम्हांड की सैर करने की तरह का था। और टेक्नालॉजी का इंसान के काम में इतना बारीक दखल कुछ दहशत पैदा करने वाला भी था। 

मेरे कुछ पुराने साथी मेरे इस नए शौक में मदद करने के लिए अनायास ही जुट गए। कुछ मौजूदा सहकर्मी, और कई पुराने साथी, अखबार के दफ्तर के मेरे छोटे से कमरे में इतने लोग एक साथ कैमरा, लाईट, माइक्रोफोन, कुर्सी-टेबिल की जगह तय करते काम कर रहे थे कि मैं एक कोने में बैठकर सब देखते रह गया। फिर धीरे से सबके बीच कहा कि ऐसा लग रहा है कि परिवार के किसी कुंवारे बुढ़ऊ ने शादी के लिए हां कह दी है, तो हर कोई उसे दूल्हा बनाने और घोड़ी चढ़ाने की तैयारी में जुट गया है। बिना किसी मतलबपरस्ती आधा दर्जन चाहने वाले अपने घंटों लगाकर अगर मेरे इस नए शगल को कामयाब बनाने में लगे हुए हैं, तो कामयाबी को और लगता क्या है? 

इसी चक्कर में मेरे एक करीबी ने जब यूट्यूब पर डाले गए करीब दर्जन भर नए वीडियो का विश्लेषण करना शुरू किया, तो मुझे ही समझ ही नहीं पड़ा कि क्या सहज और सुलभ टेक्नालॉजी लोगों को अपने काम में इस गहराई तक झांकने का मौका देने लगी है! और यह भी बिना एक धेला खर्च किए। एक-एक वीडियो को कितने लोगों ने देखा, कितनों ने पसंद किया, कितनों ने नापसंद किया, यह बात तो किसी भी यूट्यूब चैनल पर जाने वाले दर्शक को ही दिख जाती है। लेकिन यह चैनल जिन्होंने बनाया है, जो इस पर वीडियो पोस्ट करने का हक रखते हैं, वे इसके हर वीडियो के विश्लेषण को जानने का हक भी रखते हैं। और उन्हें एक-एक क्लिक पर यह देखने मिल सकता है कि किस वीडियो को, दुनिया के किस हिस्से से, किस उम्र के, औरत या मर्द ने, किस वक्त देखा, कितनी मिनट देखा, कितने सेकेंड देखकर छोड़ दिया। ऐसी दर्जनों और जानकारियां यूट्यूब पेज के संचालक देख सकते हैं। 

अब टेक्नालॉजी क्या-क्या दिखा सकती है, यह तो हक्का-बक्का कर ही देता है, लेकिन इससे बढक़र यह लगता है कि कारोबारी या गैरकारोबारी, जैसा भी यूट्यूब चैनल हो, उसे चलाने वालों को यह समझ पड़ता है कि उसके किस इंटरव्यू, या किस विश्लेषण को कितने लोग कितने मिनट या सेकेंड के बाद छोड़ दे रहे हैं। इससे यह भी हिसाब निकल सकता है कि किस वाक्य को सुनकर लोगों ने उस वीडियो को बंद कर दिया। किस तर्क को सुनकर, किस बात को सुनकर लोग ऊब गए, खफा हो गए, लोगों के कानों का स्वाद खराब हो गया, और लोग आगे बढ़ गए, यह सब जानने के बाद क्या यूट्यूब वीडियो पर बोलने वाले लोग अपने विषय, अपने तर्क, अपनी भाषा, अपने लहजे, अपनी मिसालों के बारे में फिर से नहीं सोचेंगे? और अगर ऐसा चैनल चलाने वाले मालक-चालक हैं, तब तो फिर भी बेफिक्री से मनमर्जी जारी रखी जा सकती है, लेकिन अगर यह कारोबारी चैनल है, तो मालिक की तरफ से विश्लेषण करने वाले लोग सुबूत निकालकर पल भर में सामने धर देंगे कि किस विश्लेषक या किस पत्रकार की किस विषय पर कही गई किस बात के बाद कितने फीसदी लोगों ने वह वीडियो छोड़ दिया। यह कुछ उसी किस्म का रहेगा कि जिस तरह आज क्रिकेट के कम्प्यूटर हर गेंद का विश्लेषण करके बता देते हैं कि उसके विकेट तक पहुंचने की कितनी संभावना थी, वह किस विकेट पर किस ऊंचाई पर लगने वाली थी। एक गेंदबाज अपने काम को इस विश्लेषण के आधार पर लगातार सुधार सकता है, या उस पर लगातार यह दबाव रहता है कि वह कम्प्यूटर की बताई बारीकियों के मुताबिक फेरबदल करके काम सुधारे। 

अब अगर मुझे यह समझ पड़ता है कि किस विषय पर मेरी कही किस बात के बाद कितने लोगों ने आगे सुनना जरूरी नहीं समझा, तो बहुत बारीकी से समझने पर मुझ पर यह दबाव आ सकता है कि मैं ऐसे विषय पर ऐसी बातें कहूं कि लोग वीडियो के अंत तक उस पर टिके रहें। या इंटरव्यू में ऐसे सवाल करूं, और जवाब उतना ही लंबा चलने दूं कि जिससे लोग ऊबकर वीडियो बंद न कर दें। तो टेक्नालॉजी की यह सहूलियत दर्शक के हाथों हर लगाम दे रही है, और घोड़ा-गाड़ी पर बैठे लोग टेक्नालॉजी की तरफ देख रहे हैं कि किस रफ्तार से, किस तरफ, कितना आगे बढऩा है, कहां थम जाना है, कहां राह बदल देना है ताकि दर्शक कहीं और न निकल जाए। 

फिर मानो टेक्नालॉजी का इतना काबू काफी न हो, यह भी पता लगा कि यूट्यूब के कम्प्यूटर इसके परे भी सैकड़ों और पैमानों पर विश्लेषण करते रहते हैं कि किस व्यक्ति के किस वीडियो को बढ़ावा दिया जाए, और किसे ताक पर धर दिया जाए। छत्तीसगढ़ के कुछ छोटे-छोटे कस्बों और गांवों के ऐसे यूट्यूबर का भी पता लगा जिनके आधा-एक करोड़ सब्सक्राइबर हैं, और जिनके एक-एक वीडियो को आधा-एक करोड़ लोग देख चुके हैं। एक छोटे से कस्बे के एक अकेले शौकिया यूट्यूबर के वीडियो चीन में करोड़ों लोग देख रहे हैं। अब यूट्यूब के कम्प्यूटरों के कौन से पैमाने किसे कहां पहुंचा देते हैं, यह अब भी रहस्यमय बना हुआ है। पिछले एक हफ्ते में सोशल मीडिया के एक प्लेटफॉर्म की अंदरुनी टेक्नालॉजी की एक जरा सी झलक ने मानो संभावनाओं और आशंकाओं के ब्रम्हांड दिखा दिए हैं। इन संभावनाओं और इन आशंकाओं के चलते हुए क्या अब लिखते और बोलते हुए शब्द-शब्द पर दिल-दिमाग दबाव में नहीं रहेंगे? सरोकार और रचनात्मकता, मौलिकता, और कल्पनाशीलता, क्या इन सब पर सोशल मीडिया के कम्प्यूटरों का दबाव इतना नहीं बढ़ते जाएगा कि लोग मुद्दों पर सोचने के बजाय इनके आंतरिक विश्लेषणों के ग्राफ देखते रह जाएंगे? एक हफ्ते का यह तनाव छोटा नहीं है, देखते हैं कि यह काम को आगे किस हद तक प्रभावित करता है। (Daily Chhattisgarh)