31 जनवरी 2014
संपादकीय
दो-तीन अलग-अलग बातें मिलकर एक मुद्दे पर सोचने को मजबूर कर रही हैं। दो-तीन दिन पहले महाराष्ट्र के महिला आयोग की एक सदस्य ने अपने एक लापरवाह और गैरजिम्मेदार बयान से, बलात्कार की शिकार लड़कियों को उन पर हुए जुर्म के लिए, उन्हीं के तौर-तरीकों को एक किस्म से जिम्मेदार ठहरा दिया था, और उस पर बाद में माफी भी मांगनी पड़ी। एक दूसरी घटना यह है कि दिल्ली में जब राज्य महिला आयोग आम आदमी पार्टी के एक मंत्री सोमनाथ भारती को विदेशी महिलाओं के साथ बदसलूकी के मामले में नोटिस दिया, तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने महिला आयोग की सदस्य को ही हटाने के लिए मुहिम छेड़ दी।
एक अलग मामला यह है कि भारतीय सांसद अभी सरकारी एयरलाईंस में जिस तरह की खातिरदारी पाते हैं, वैसी ही खातिरदारी निजी एयरलाईंस में पाने के लिए उन्होंने सरकार से हुक्म जारी करवाया है। और तीसरा मामला यह है कि देश के मुख्य न्यायाधीश रह चुके, और अब गुजर चुके जस्टिस जे.एस. वर्मा को घोषित पद्मभूषण सम्मान उनके परिवार ने लेने से मना कर दिया है, और इस सम्मान को जस्टिस वर्मा का अपमान कहते हुए जस्टिस राजेन्दर सच्चर ने लिखा है कि वे इससे बड़े सम्मान के हकदार थे, और उनके लिए यह सम्मान एक तुच्छ फैसला है।
इन तीनों बातों को मिलाकर हमको लगता है कि देश में आज खास और आम इंसानों के बीच फासले को लेकर जनता के बीच जो नाराजगी और नफरत है, उसे समझने की कोशिश भी सरकारें नहीं कर रही हैं, और न ही राजनीतिक दल कर रहे हैं। इन तीनों बातों में जो रिश्ता दिखता है, वह यह है कि महाराष्ट्र और दिल्ली, और देश के बाकी राज्यों के भी महिला आयोग राजनीतिक मनोनयन से भरे हुए हैं, उनमें सत्तारूढ़ पार्टी की पसंद से सदस्य बनाए गए हैं। यह जाहिर है कि ऐसे सदस्य, न सिर्फ महिला आयोग में, बल्कि किसी भी आयोग में रहते हुए अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने के बजाय अपने को कुर्सी पर बिठाने वाली सरकार के राजनीतिक हितों की फिक्र करते हैं। पूरे देश में हमारा यह देखा हुआ है कि संवैधानिक आयोगों पर बैठे लोग उन आयोगों पार्टी के एक प्रकोष्ठ की तरह बनाकर रख देते हैं। ऐसे में एक तरफ तो केजरीवाल का यह आरोप सही है कि आयोग से ऐसे लोगों को हटाया जाए, लेकिन दूसरी तरफ अपने आपको आम आदमी की टोपी पहनाने वाले केजरीवाल अपने कुसूरवार मंत्री को बचाने के लिए देश की संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ एक आपराधिक गैरजिम्मेदारी वाला धरना देते हैं, अपने मंत्री के बचाव में घटिया बातें करते हैं। इस तरह आम आदमी का नाम लेकर सत्ता में आने वाले केजरीवाल अपने खुद के लोगों को खास बनाकर रख छोड़ते हैं।
आज की इस चर्चा का तीसरा मुद्दा राष्ट्रीय सम्मानों का है जिनमें फिर से बार-बार यह बात सामने आती है कि देश की सत्ता हांक रही पार्टी अपनी पसंद से लोगों को ऐसे राष्ट्रीय सम्मान देती है, और बहुत से ऐसे लोग सम्मान पाते हैं जिनसे ऐसे तथाकथित राष्ट्रीय सम्मानों का अपमान ही होता है। बहुत से जिम्मेदार लोग लंबे वक्त से यह मांग करते आ रहे हैं कि राष्ट्रीय सम्मानों को देने का सरकारी धंधा बंद होना चाहिए। हम भी बहुत बार इसके खिलाफ लिख चुके हैं, और कम वजनदार लोगों को अधिक वजनदार राष्ट्रीय सम्मान देकर सरकार समाज के मुंह में एक कड़वा स्वाद ही छोड़ती है, जिसकी कि कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए।
देश में आज आम और खास के बीच फर्क खत्म करने की जनभावना बहुत मजबूत हो चुकी है। इसी तरह संवैधानिक कुर्सियों पर राजनीतिक मनोनयन इस तरह सीमित और काबू किया जाना चाहिए कि आयोगों के काम के दायरे में लंबे समय से जो सामाजिक कार्यकर्ता काम करते आए हैं, उन्हीं का मनोनयन होना चाहिए, न कि राजनीतिक लोगों का, बिना किसी पिछले अनुभव और काम के। देश के सांसदों के बारे में हमारा यही कहना है कि अगर उन्होंने सार्वजनिक जगहों पर, सार्वजनिक सेवाओं के भीतर इस तरह से अपने खास दर्जे का इस्तेमाल जारी रखा, तो आम नफरत और आम हिकारत उनको बहुत भारी पड़ेगी। अभी भी हिन्दुस्तानी सांसद, विधायक, और सत्ता पर बैठे बाकी लोग जनता की नफरत को समझ नहीं पा रहे हैं, और आने वाले कोई भी चुनाव, आम आदमी पार्टी ही नहीं, किसी भी पार्टी या उम्मीदवार के एक झाड़ू से बदल सकते हैं।



























