उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें, चाकू की पसलियों से गुजारिश तो देखिए

31 मार्च, 2024 

 पश्चिमी मीडिया की खबरें इस बात से पटी हुई हैं कि किस तरह अमरीका इजराइली हमले के शिकार फिलीस्तीन के गाजा पर पैराशूट से खाना गिरा रहा है। अमरीकी एयरफोर्स की ली गई ऐसी तस्वीरें फैलाई जा रही हैं, और यह भी बताया जा रहा है कि गाजा के किनारे अस्थाई बंदरगाह बनाकर अमरीका वहां से भी मानवीय मदद भेजने की कोशिश कर रहा है। पिछले दो हफ्ते ऐसी खबरों से भरे हुए हैं कि अमरीका इजराइल से इस बात को लेकर खफा है कि वह फिलीस्तीन में मानवीय मदद जाने नहीं दे रहा है, और संयुक्त राष्ट्र संघ की एजेंसियों का कहना है कि फिलीस्तीन में लोग अब भूख से मरने की कगार पर हैं, और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का कहना है कि अनगिनत फिलीस्तीनी बच्चे गाजा में भूख से मर चुके हैं। ऐसे में इजराइल रफा नाम के उस सरहदी शहर पर फौजी कार्रवाई करने पर अड़ा हुआ है जहां पर गाजा के दस लाख से अधिक लोग शरणार्थी बनकर तम्बुओं में पड़े हुए हैं। 

अमरीका एक तरफ तो इजराइल के साथ अपनी नाराजगी दिखा रहा है, उससे असहमति दिखा रहा है, और ये खबरें आ रही हैं कि गाजा से हजार मील दूर कतार के एयरफोर्स अड्डे पर अमरीकी वायुसेना के मालवाहक विमानों में भूखे गाजा पर बरसाने के लिए खाने को लादा जा रहा है जिसके बक्से पैराशूट से वहां गिराए जा रहे हैं। इसे कुछ दूसरे पश्चिमी देशों के साथ मिलकर एक बहुराष्ट्रीय वायुसेना-अभियान की तरह चलाया जा रहा है, और अमरीका यह भी गिना रहा है कि वह गाजा के मलबे पर 40 हजार लोगों के लिए खाने को तैयार पैकेट गिरा रहा है। भूख का हाल यह है कि इसी हफ्ते पानी में गिर गए खाने के बक्सों को निकालते हुए गाजा में 12 लोग डूबकर मर गए, और 6 लोग खाने पर झपटती हुई भीड़ के पैरोंतले कुचलकर मारे गए। ऐसे में इजराइल रफा के शरणार्थी शिविर पर फौजी कार्रवाई के लिए अड़ा हुआ है, जबकि अमरीका इसे गलत करार दे रहा है। 

अब तक की इन बातों से लोगों को ऐसा धोखा हो सकता है कि अमरीका में एकाएक तथाकथित इंसानियत आ गई है, और अब वह समंदर के रास्ते, हवाई जहाजों से फिलीस्तीन में खाना भेज रहा है। लेकिन इस गलतफहमी या खुशफहमी को खत्म होने में अधिक वक्ता नहीं लगा। दो दिन पहले 29 मार्च को यह खबर आई कि अमरीका ने इजराइल को नई फौजी मदद मंजूर की है, और दो-दो हजार पौंड के 18 सौ बम, और पांच सौ पौंड के 5 सौ बम इजराइल के लिए और मंजूर किए हैं। इजराइल की सारी गुंडागर्दी सिर्फ अमरीकी मदद पर चलती है, और एक तरफ अमरीका भूख से मरते गाजा पर खाना बरसाने का नाटक कर रहा है, और दूसरी तरफ फिलीस्तीन पर बरसाने के लिए इजराइल को और बम दिए जा रहा है। मतलब यह कि दो-दो हजार पौंड के 18 सौ बम गाजा का जो हाल करेंगे, उसके बाद अमरीका को वहां खाना बरसाने की जरूरत भी नहीं रहेगी, क्योंकि वहां इंसान भी नहीं बचेंगे। 

दो-तीन हफ्ते पहले ही मैंने फेसबुक पर लिखा था कि अमरीका एक तरफ इजराइल को 10 लाख छुरे भेज रहा है, और फिलीस्तीन को मरहम की एक हजार ट्यूब। और पिछले हफ्ते-दस दिन में यह बात सही साबित हुई कि भूखों के लिए खाना पहुंचाने के नाटक से अपने लिए शोहरत और हमदर्दी, साख और वाहवाही जुटाने वाले अमरीका ने इजराइल के हाथ इतने मजबूत कर दिए हैं कि वह गाजा की बाकी बची तमाम इमारतों को जमीन से मिला सकता है। आज अमरीका की हालत यह है कि राष्ट्रपति जो बाइडन के इस फैसले का विरोध अमरीका के बहुत से इंसाफपसंद लोग कर रहे हैं, और तो और खुद बाइडन की डेमोक्रेटिक पार्टी के बहुत से नेता और सांसद इसके खिलाफ हैं कि अमरीका इस दर्जे की जारी इजराइली गुंडागर्दी में उसके हाथ मजबूत करने के लिए बम भेजे। दरअसल अमरीका के साथ-साथ बाकी दुनिया में भी अमनपसंद लोग इस बात पर हक्का-बक्का हैं कि पिछले बरस 7 अक्टूबर को एक फिलीस्तीनी आतंकी संगठन हमास के फौजी हमले में सैकड़ों इजराइलियों के कत्ल के बाद जवाब में इजराइल ने अब तक गाजा में 32 हजार से अधिक लोगों को मार डाला है, और पूरे गाजा शहर को मलबे में तब्दील कर दिया है। आधी से अधिक आबादी शरणार्थी शिविरों में पड़ी हुई है, और संयुक्त राष्ट्र संघ की युद्धविराम की दर्जन भर अपील भी इजराइल के खूनी हमलों को धीमा भी नहीं कर पा रही है। 

अमरीका इन दिनों दो अलग-अलग मोर्चों पर उजागर हो रहा है। फिलीस्तीन पर इजराइली फौजी हमले में वह इजराइल को बम और फिलीस्तीनियों को फूड पैकेट देकर दुनिया में जाने किसको बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रहा है। दूसरी तरफ रूस और यूक्रेन के मोर्चे को देखें, तो अमरीकी अगुवाई में पश्चिमी देशों के फौजी संगठन, नाटो की तरफ से जितनी फौजी और बाकी किस्म की रसद यूक्रेन को दी जा रही है, वह उसे रूस के हमलों के सामने डटाए रखने के ही काम आ रही है, बचाए रखने के काम नहीं आ रही। अमरीका और योरप के बाकी देश जिस अंदाज में यूक्रेन का साथ दे रहे हैं, उससे एक बात जाहिर है कि वे यूक्रेन को बचाना नहीं चाह रहे, वे रूस को खोखला करना चाह रहे हैं, और अपने इस मकसद के लिए वे कितने भी यूक्रेनी सैनिकों और नागरिकों की मौत देख रहे हैं, पूरे यूक्रेन को मलबे में तब्दील होते देख रहे हैं, और एक गैरबराबरी की जंग में नापतौल कर यूक्रेन की उतनी ही मदद कर रहे हैं जितने से वह मोर्चे पर डटे रहे। नतीजा यह है कि यूक्रेन के कंधों पर बंदूक रखकर पश्चिमी देश रूस पर हमला कर रहे हैं, और रूसी हमले को झेलने के लिए यूक्रेनी सीनों को सामने कर दे रहे हैं। 

इस खतरनाक खेल को समझना चाहिए। अमरीका जिस तरह जानलेवा जख्म देने के लिए छुरे सप्लाई कर रहा है, और उसके बाद दुनिया के दिखावे के लिए मरहम भी भेज रहा है, उससे दुनिया के इतिहास में अच्छी तरह दर्ज इजराइल-समर्थक अमरीकी-वीटो मिट नहीं जाएगा। यह भी लगता है कि अमरीका के पास कुछ ऐसा खाना बचा हुआ होगा, जो सडऩे वाला होगा, और उसे गाजा पर बरसाकर अमरीका अपने घूरों का बोझ बढ़ाने से बच रहा होगा। अमरीका की सारी हमदर्दी को, चाहे वह गाजा हो, चाहे यूक्रेन, इस हिसाब से ही समझने की जरूरत है। इजराइल की सारी गुंडागर्दी दुनिया के नक्शे पर बाकी देशों के बीच उसकी मौजूदगी की वजह से मिलने वाली अमरीकी मदद और उकसावे से चलती है, और उसमें ताजा इजाफा करने के लिए अमरीका ने बमों के साथ-साथ फाइटर जेट भी दिए हैं। अभी-अभी का यह ताजा फैसला बमों के साथ-साथ फाइटर जेट भी इजराइल भेज रहा है, और अमरीका को तो चाहिए कि बेघर हो चुके, मां-बाप खो चुके फिलीस्तीनी बच्चों के लिए वह खिलौने के फाइटर प्लेन भी भेज दे, ताकि वह दुनिया के इतिहास में गिना सके कि उसने इजराइल को कम, और फिलीस्तीन को अधिक फाइटर प्लेन दिए थे। इस पूंजीवादी, विस्तारवादी, फौजी-आतंकी साजिश को न समझने वाले अमरीका को मदर टेरेसा भी मान सकते हैं जो कि बिना मां-बाप के रह गए, हाथ-पैर खो चुके फिलीस्तीनी बच्चों की सेवा के लिए फूड पैकेट लेकर गाजा में है। 

(शीर्षक: दुष्यंत कुमार का लिखा हुआ)        

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 31 मार्च 2024


 

यौन शोषण पर शिक्षक को 20 बरस कैद से उठते हैं कई असुविधाजनक सवाल


 31  मार्च 2024

   छत्तीसगढ़ के कवर्धा में पिछले बरस अपने स्कूल की 13 बरस की बच्ची से यौन शोषण करने वाले शिक्षक कुंजबिहारी को जिला अदालत ने 20 साल की कैद सुनाई है। इस अधेड़ शिक्षक ने स्कूली छात्रा को ऑनलाईन पढ़ाने के नाम पर अश्लील वीडियो भेजना शुरू किया, और फिर उसे भावनात्मक कब्जे में लेकर, उसका यौन शोषण किया। हमारा ख्याल है कि देश में हर प्रदेश में हर दिन एक से अधिक ऐसी खबरें छपती हैं जिनमें नाबालिग के यौन शोषण में किसी की गिरफ्तारी दिखती है। दूसरी तरफ हर दिन ऐसी खबर भी दिखती है जिसमें स्कूली बच्चों के यौन शोषण से लेकर स्कूलों में नशे में पहुंचने वाले शिक्षकों पर कार्रवाई होती है, गिरफ्तारी भी होती है। हम यह मानकर चलते हैं कि हर शिक्षक पढ़े-लिखे रहते हैं, और घर या स्कूल में न सही, चायठेले या पानठेले पर तो उनकी पहुंच अखबारों तक रहती है, और वे यह जानते हैं कि किस तरह की हरकत करने पर पुलिस और अदालत की कैसी कार्रवाई होती है। अभी-अभी छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाके के एक ऐसे स्कूल के शिक्षक का वीडियो सामने आया है जिसमें वह शराब पिया हुआ स्कूल पहुंचता है, और वहां के बच्चे चप्पलें फेंक-फेंककर उस शिक्षक को मारते हैं, और उसे बचकर मोटरसाइकिल पर भागना पड़ता है। स्कूलों में नशे में पड़े हुए शिक्षकों की तस्वीरें और उनके वीडियो तो आम हैं। अब इस ताजा मामले से यह तरस भी आता है कि स्कूली शिक्षकों में सामान्य समझबूझ भी शून्य सरीखी है, और वह नाबालिग छात्रा के फोन पर अश्लील वीडियो भेजकर भी इस भरोसे में बैठा है कि न तो उसे कोई और देखेंगे, और न ही कोई कार्रवाई होगी। मूर्खता की यह पराकाष्ठा बताती है कि कैसे-कैसे बेअक्ल लोग शिक्षक तो बन गए हैं, लेकिन उनका ध्यान बच्चियों के शोषण पर है। हर महीने ही छत्तीसगढ़ में ऐसे शिक्षक और हेडमास्टर पकड़ा रहे हैं, जो कि बच्चियों का देहशोषण कर रहे हैं। और भारत की आम गरीब बच्चियों की हालत को ध्यान में रखते हुए सोचें तो यह समझ पड़ता है कि शोषण की शिकार दर्जनों बच्चियों में से कोई एक बच्ची ही शिकायत का हौसला कर पाती होगी। 

छत्तीसगढ़ के स्कूलों को कई तरह से सुधारने की जरूरत है। राज्य बना तब से अब तक यह देखने में आया है कि सरकार चाहे जो भी रहे, क्लासरूम का फर्नीचर खरीदने में परले दर्जे का भ्रष्टाचार रहता है, और हर स्कूल में एक-दो कमरे ऐसे टूटे हुए फर्नीचर से भरे रहते हैं, जो कि सप्लाई होते ही टूट जाते हैं। भ्रष्टाचार इस दर्जे का संगठित है कि अच्छा फर्नीचर बनाने वाले लोग सरकारी सप्लाई में कहीं टिक ही नहीं सकते। इसके अलावा खेल का सामान, लाइब्रेरी की किताबें, स्कूलों की हर किस्म की खरीदी भ्रष्टाचार से भरी हुई है। और अब तो जिस तरह पिछली भूपेश सरकार की एक सबसे प्रतिष्ठा वाली योजना, आत्मानंद स्कूल का भ्रष्टाचार सामने आ रहा है, वह बताता है कि जब कलेक्टरों के स्तर पर अंधाधुंध और मनमानी स्थानीय फैसले लिए जाते हैं, तो कैसी-कैसी और नई-नई गड़बडिय़ां होती हैं। अभी आत्मानंद स्कूलों की जांच शुरू भी नहीं हुई है जिन पर सरकार के अलग-अलग विभागों का, जिला खनिज निधि का, और उद्योगों के सीएसआर का मनमाना पैसा खर्च किया और करवाया गया है। 

दूसरी तरफ स्कूलों में पढ़ाई का हाल इतना बुरा है कि राष्ट्रीय स्तर के जो सर्वे हुए हैं, वे बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में 5वीं में पढ़ रहे बच्चे भी दूसरी कक्षा की पढ़ाई भी करने लायक नहीं हैं। यह तो गनीमत कि सरकारी स्कूलों में दोपहर का भोजन मिलता है, जिसकी वजह से बहुत से गरीब बच्चे स्कूल नहीं छोड़ते हैं, और स्कूलों में दर्ज संख्या अच्छी-खासी दिखती है। लेकिन बहुत सी जगहों पर शिक्षकों ने अपने आपको कहीं भी अटैच करवा लिया है, और अपनी मर्जी के शहरों में रहते हैं। नतीजा यह होता है कि हजारों ऐसी स्कूलें हैं जहां एक-एक शिक्षक पांच-पांच कक्षाएं पढ़ा रहे हैं, और बच्चों का भगवान ही मालिक है। किसी भी पार्टी की सरकार रहती हो, स्कूल शिक्षा विभाग सप्लायरों का पसंदीदा विभाग रहता है क्योंकि सरकारी सप्लाई का घटिया सामान इस्तेमाल करने वाले बच्चे किसी शिकायत करने की समझ भी नहीं रखते हैं। गरीब बच्चों के मां-बाप इसी बात पर खुश रहते हैं कि उनके बच्चों को फीस नहीं देनी पड़ रही, स्कूल का यूनिफॉर्म सरकार दे रही है, दोपहर का भोजन भी वहां मिल रहा है, और किताबों का भी पैसा नहीं देना पड़ता। इन सहूलियतों के बाद मां-बाप पढ़ाई-लिखाई की उत्कृष्टता के बारे में सोचने का तो मानो अधिकार ही खो बैठते हैं। अब ऐसा लगता है कि स्कूल शिक्षामंत्री बृजमोहन अग्रवाल लोकसभा चुनाव जीत सकते हैं, और इस विभाग की जिम्मेदारी किसी और मंत्री पर आ सकती है, तो ऐसे में सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी को यह भी सोचना चाहिए कि क्या स्कूल शिक्षा को भ्रष्टाचार से मुक्त विभाग बनाया जा सकता है? सरकारों से भ्रष्टाचार मुक्त होने की उम्मीद आज के वक्त में शायद देश में कहीं भी बहुत जायज नहीं है, लेकिन आने वाली पीढ़ी की बुनियाद ही भ्रष्टाचार की वजह से कमजोर न हो, ऐसी फिक्र जिन लोगों को हो, उन्हें जरूर इस बारे में सोचना चाहिए। 

जहां स्कूली शिक्षक छात्राओं से बलात्कार करते पकड़ाते हों, वहां न पकड़ाने वाले शिक्षकों के बारे में भी सरकार को सोचना चाहिए, और स्कूलों में ऐसी निगरानी समितियां बनानी चाहिए जो कि छात्र-छात्राओं से बात करके शिक्षकों के बारे में जानकारी ले। हो सकता है कि शिकायत बक्से लगाना कारगर हो, या हर स्कूल की दीवार पर ऐसे नंबर लिखे हों जहां फोन करके या संदेश भेजकर शिकायत दर्ज करवाई जा सके। इससे भी बेहतर विकल्प यह होगा कि उस इलाके में काम करने वाले कुछ प्रतिष्ठित और जिम्मेदार जनसंगठनों की मदद ली जाए, और बच्चों का हौसला बढ़ाया जाए कि वे अपने शोषण के खिलाफ शिकायत कर सकें। ऐसा हौसला बढऩे पर बच्चियों की शिकायत अभी कुछ हफ्ते पहले ही सामने आई है। भारत में अगर अगली नौजवान पीढ़ी को बेहतर बनाना है, तो उसकी शुरूआत स्कूलों में सुधार लाकर ही की जा सकती है।  

(Daily Chhattisgarh)

...पांव धोने का पोप के पाखंड से किसका भला?

 30  मार्च 2024

  

दुनिया के रोमन कैथोलिक समुदाय के सबसे बड़े धर्मगुरू पोप फ्रांसिस ने अभी वेटिकन के मुख्यालय वाले रोम की एक जेल में एक धार्मिक समारोह में 12 महिला कैदियों के पैर धोए, और चूमे। खबरों में कहा गया है कि ये महिलाएं पोप के इस काम से रो पड़ीं। हर बरस आज के दिन इस धार्मिक समारोह से ईसा मसीह द्वारा अपने 12 शिष्यों के पैर धोने की बाइबिल की कहानी को याद किया जाता है, और इसके बाद ईसा मसीह को सूली पर चढ़ा दिया गया था। उसी की याद में पोप हर बरस बीते कल के दिन इस तरह लोगों के पैर धोते हैं। पोप ने इस मौके पर कहा कि इस समारोह का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि इसमें ईसा मसीह ने अपने आपको औरों से नीचे दिखाया और साबित किया था, और सेवा की राह दिखाई थी। लोगों को याद होगा कि हिन्दुस्तान में भी हिन्दू धर्म के कई लोग इस तरह पैर धोने का काम करते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कई सफाई कर्मचारियों के पैर धोते दिखाए जाते हैं, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में हिन्दुत्ववादी नेता जब ईसाई बने हुए आदिवासियों को हिन्दू बनाते हैं तो पैर धोकर उनकी ऑपरेशन ‘घर वापिसी’ करवाई जाती है। हिन्दू धर्म की कई परंपराओं में लोगों के पैर धोने का रिवाज है, और कहीं दामाद के, तो कहीं लडक़ी के ससुर के पैर धुलते दिखते हैं। 

पैर धोने का एक महत्व यह दिखता है कि आमतौर पर लोगों के पैर उनके बदन के बाकी हिस्सों के मुकाबले कुछ गंदे रहते हैं, और अपने हाथों से जब कोई दूसरों के पैर धोते हैं, तो इसे एक किस्म का सम्मान देना माना जाता है। अब सवाल यह उठता है कि पैर धोने के इस दिखावे से किसको क्या हासिल होता है? क्या प्रधानमंत्री के हाथों पैर धुल जाने से सफाईकर्मियों की गटर और नाली में मौतें कम हो गई हैं? क्या ऐसे समारोह के बाद लोगों ने सफाई कर्मचारियों से भेदभाव बंद कर दिया? दुनिया में शायद ही कोई ऐसे धर्म होंगे जो कि जाति, आर्थिक संपन्नता, शिक्षित-अशिक्षित, औरत-मर्द का फर्क न करते हों। पोप जिस ईसाई धर्म के मुखिया हैं वह पश्चिम के विकसित लोकतंत्रों का सबसे प्रमुख धर्म है, लेकिन लोकतंत्र इस धर्म को छू भी नहीं गया है। कोई महिला पोप नहीं बन सकती, ऊपर से लेकर नीचे तक महिलाएं इस धर्म के ढांचे में कभी पुरूष की बराबरी नहीं कर सकतीं। यह धर्म दुनिया में सबसे बड़ी बेइंसाफी पर आंखें मूंदे रहता है, और जंगखोर देशों को कोई नसीहत नहीं देता। यह यूक्रेन पर हमला करने वाले रूस को हमले से नहीं रोकता, बल्कि अभी पोप ने एक सार्वजनिक बयान देकर फौजी हमले से जख्मी यूक्रेन को यह नसीहत दी है कि वह रूसी हमले पर जवाबी कार्रवाई बंद करे, और रूस के साथ समझौता करे। यह कुछ उसी किस्म की बात है कि मुम्बई के किसी कारोबारी को पोप सलाह दें कि वे दाऊद इब्राहिम के खिलाफ करवाई गई रिपोर्ट वापिस ले, और दाऊद को हफ्ता देना शुरू करे। इस पोप ने ईसाई देश अमरीका को नहीं रोका कि वह इजराइल को जो हथियार दे रहा है उससे बेकसूर और तकरीबन निहत्थे फिलीस्तीनी मारे जा रहे हैं। दुनिया में जहां-जहां बड़ी बेइंसाफी में ईसाई देश हमलावर होते हैं, वहां पोप का मुंह नहीं खुलता। और तो और दुनिया भर के अपने चर्चों में पादरियों द्वारा बच्चों के यौन शोषण को देखते हुए भी एक के बाद दूसरे पोप इसकी अनदेखी करते रहे। धर्म का मूल चरित्र शोषण का रहता है, और शायद ही कोई धर्म इससे परे रहता हो।

हमारा यह मानना है कि धर्म जिन लोगों के पांव धोने का दिखावा करता है, वह सिर्फ उन्हें धोखा देता है। अगर धर्म इस पाखंड के बजाय सामाजिक न्याय की बात करे, तो शोषित और दबे-कुचले लोग, अपने गंदे पैरों सहित अधिक खुश और सुखी रह सकते हैं। लेकिन सामाजिक न्याय बहुत मुश्किल काम होगा, और ईसाई धर्म मानने वाले लोग भी पोप की बात सुनकर फौजी हमले बंद नहीं करेंगे, इसलिए पोप भी वैसी कोई नसीहत देकर अपनी जुबान खराब नहीं करते। दूसरे धर्मों का भी यही हाल है। अलग-अलग कई किस्म के धर्मस्थानों में जिस तरह आतंकी पलते हैं, जिस तरह पुजारी बलात्कार करते हैं, महिलाओं को देवदासी बनाकर उनसे देह का धंधा करवाया जाता है, इन सबको देखें तो साफ दिखता है कि न तो किसी ईश्वर, और न ही उसके किसी एजेंट को हिंसा या शोषण से परहेज है। जिस ईश्वर को सर्वत्र, सर्वज्ञ, और सर्वशक्तिमान माना जाता है, उसकी आंखों के सामने बच्चों से बलात्कार होते हैं, और कण-कण में मौजूद ईश्वर उसे देखते रहते हैं। जिसे सर्वशक्तिमान मानकर लोग पूजा-उपासना करते हैं, उसकी शक्ति अपने बलात्कारी भक्तों को रोक नहीं पाती, और न ही बेकसूर बच्चों को बचा पाती है। धर्म का पूरा ढकोसला इसी तरह का है, और किस्से-कहानियों में ईश्वरों की जो अपार शक्ति बताई जाती है, वह असल जिंदगी में सबसे भयानक किस्म की हिंसा को रोकने के काम नहीं आती, और न ही वह दुनिया के खरबपतियों को इतनी समझ दे पाती कि वे दुनिया में भूख से मरते हुए लोगों की मदद करें। 

इसलिए चाहे जिस किस्म के रीति-रिवाज के लिए किसी धर्म के लोग जब गरीबों के पांव धोते हैं, पांव चूमते हैं, तो वे उन गरीबों को बेहतर इंसान साबित करने के बजाय अपने आपको अधिक महान इंसान साबित करने में लगे रहते हैं। लोगों को इस धार्मिक पाखंड को समझना चाहिए क्योंकि यह लोगों के शोषण का एक और जरिया रहता है। अधिक विनम्रता, और ओढ़ी हुई महानता शोषकों को और अधिक ताकत दिलाने के लिए इस्तेमाल होती हैं। जब दुनिया के सबसे जलते-सुलगते मुद्दों पर धर्मगुरूओं का मुंह न हिटलर के वक्त खुला, न अमरीका के खिलाफ कभी खुला, और न इजराइल के खिलाफ, वे धर्मगुरू अपने-अपने साम्राज्य में अन्याय और असमानता के शिकार लोगों के पांव धोने का प्रतीकात्मक काम करके शोषण के जाल को मजबूत ही करते हैं। इनकी इस अतिरिक्त विनम्रता में एक हिंसा छुपी होती है, और इस साजिश को समझने की जरूरत है। अगर धर्म ने इंसानों को बराबरा बनाने का काम किया होता, तो आज ताकतवर को कमजोर के पांव धोने का दिखावा नहीं करना पड़ा होता। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 मार्च 2024


 

दीवारों पर लिक्खा है, 29 मार्च 2024


 

सरकारें कड़वे फैसले लें, पढ़े-लिखे बेरोजगार नहीं हुनरमंद कामगार बढ़ाएं..

 29 मार्च 2024

 

छत्तीसगढ़ सरकार के आदिम जाति विकास विभाग में छात्रावास अधीक्षकों की भर्ती होनी है, और इसके तीन सौ पदों के लिए छह लाख से अधिक आवेदन मिलने की खबर है, और अभी आवेदन करने के तीन दिन बाकी हैं। एक-एक पद के लिए दो हजार से अधिक लोग कतार में लगे हैं। इससे बेरोजगारी का अंदाज भी लगता है। देश के अलग-अलग आर्थिक सर्वेक्षणों में कहीं गरीबी, तो कहीं बेरोजगारी के आंकड़े चौंकाने वाले निकलते हैं, पिछले बरसों में छत्तीसगढ़ में भी बेरोजगारी बहुत कम होने के आंकड़े सामने आए थे। लेकिन ऐसी एक-एक पोस्ट के लिए अगर दो-दो हजार लोग कतार में लगे हैं, तो यह जाहिर है कि बेरोजगार तो बहुत हैं, उनकी गिनती के आंकड़े, और उसके तरीके गड़बड़ हो सकते हैं। 

2021 का उत्तरप्रदेश का एनडीटीवी का एक समाचार वीडियो अब तक सोशल मीडिया पर चक्कर लगाता है जिसमें यूपी सरकार के चपरासियों के 62 पदों पर 50 हजार ग्रेजुएट, 28 हजार पोस्ट ग्रेजुएट, और 37 सौ पीएचडी लोगों ने आवेदन किया था। अब सरकारी नौकरी में जो सबसे निचला पद है उसके लिए भी अगर पीएचडी किए हुए लोग अर्जियां दे रहे हैं, तो पानी पिलाने और टेबिल साफ करने में लगे हुए डॉक्टरेट हासिल लोग कैसा नजारा पेश कर रहे होंगे? इस ओहदे के लिए कुल पांचवी पास होने की जरूरत थी। भारत में जब हुनरमंद और काबिल कामगारों की बात होती है, तो आबादी में नौजवानों के अनुपात को गिनाया जाता है कि यह दुनिया में सबसे अधिक नौजवानों वाला देश है। इसके साथ-साथ इसकी आबादी भी तकरीबन बनी हुई है जो कि चीन जैसे देश में गिरना शुरू हो चुकी है, और आने वाले दशकों में चीन कामगारों की बड़ी कमी झेलने वाला है। ऐसे में भारत के नौजवान आंकड़ों के हिसाब से तो उसकी ताकत साबित हो सकते हैं, यह एक अलग बात है कि हकीकत इससे काफी अलग है। देश में स्किल डेवलपमेंट के नाम पर चारों तरफ जो फर्जीवाड़ा चलता है, वह सरकारी योजनाओं का पैसा खाने तक सीमित है। न तो लोगों को ईमानदारी से हुनर सिखाए जाते हैं, और न ही उन्हें काम मिल पाते हैं। दूसरी तरफ जो कामगार सचमुच ही हुनर का काम कर रहे हैं, उनके प्रशिक्षण का कोई इंतजाम नहीं है। और तो और आईटीआई जैसे जो औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान हैं उनकी हालत भी इतनी खराब है कि वहां पढ़ाने और ट्रेनिंग के इंतजाम नाकाफी रहते हैं, और वहां से निकलने वाले लोग सरकारी नौकरियों के मोहताज रहते हैं, वे खुद होकर कोई काम शुरू नहीं कर पाते। 

इसलिए कोई देश अगर अपनी आबादी के नौजवान हिस्से पर गर्व कर रहा है, तो वह जायज उसी हालत में होगा जब ये नौजवान हुनर के काम के लायक होंगे, अगर एक-एक सरकारी ओहदे के लिए हजारों लोग कतार में लग जाएंगे, तो इससे दो बातें साबित होती हैं, एक तो यह कि सरकार से परे काम की गुंजाइश नहीं है, और दूसरी बात यह कि निजी क्षेत्रों में अगर काम है भी, तो सरकारी नौकरियों में हराम की कमाई की गुंजाइश बहुत ज्यादा है। ऐसी हकीकत वाला देश आबादी के आंकड़ों पर गर्व करते बैठा रहे, उसके बजाय देश में बचपन से जवानी के बीच पढ़ाई और प्रशिक्षण का एक ऐसा इंतजाम करना चाहिए जो बेरोजगारों की फौज खड़ी न करे, बल्कि लोगों को काम के लायक बनाएं। भारत में ही दक्षिण के कुछ राज्य ऐसे हैं जो पढ़ाई और ट्रेनिंग में अधिक ईमानदार हैं, और वहां के नौजवान अपने प्रदेशों से बाहर, और देश के भी बाहर जाकर काम के लायक हैं। दूसरी तरफ हिन्दी राज्यों और उत्तर भारत को देखें, तो यहां पर न पढ़ाई-लिखाई का कोई महत्व है, और न ही किसी ट्रेनिंग-हुनर का। 

भारत में किसी हुनर वाले कामकाज की क्वालिटी का कोई पैमाना नहीं है, कामगार कुछ जानते हैं, या नहीं, इसके मूल्यांकन का कोई जरिया नहीं है, ऐसे में ग्राहकों को किस दर्जे के कामगार मिल रहे हैं, इसका भी कोई ठिकाना नहीं रहता। दूसरी तरफ देश में छोटे-छोटे कामों में जो सामान या पुर्जे लगता हैं, उनकी क्वालिटी का भी कोई ठिकाना नहीं रहता। इन दोनों का मेल जब होता है, तो सब कुछ स्तरहीन और घटिया नजर आता है। देश में उत्कृष्टता की संस्कृति ही नहीं रह गई है, और लोग असंगठित क्षेत्र के हुनरहीन लोगों पर आश्रित रह गए हैं। शहरी इलाकों की कुछ संगठित सेवाओं को छोड़ दें, तो देश के अधिकतर कामगार बिना खूबियों वाले हैं, और देश में सेवाओं के नाम पर स्तरहीन काम अधिक हो रहा है। काम भी स्तरहीन, और सामान भी घटिया, कुल मिलाकर देश में सामानों और सेवाओं की जो उत्पादकता होनी चाहिए, वह बहुत ही नीचे दर्जे की है। लोगों का खर्च पूरा हो जाता है, लेकिन उन्हें सही क्वालिटी का काम नहीं मिलता। दक्षिण भारत के कुछ राज्यों से सीख लेकर बाकी के हिन्दुस्तान को शिक्षण-प्रशिक्षण की ईमानदारी बरतनी चाहिए, और सरकारों को घटिया सामानों का बनना बंद करना चाहिए, तभी जाकर देश को उसके दिए दाम की सही उत्पादकता मिल सकेगी। 

यहां पर एक दूसरी बात जरूरी यह है कि मिडिल स्कूल तक की पढ़ाई के बाद सरकारों को बड़ी रफ्तार से आगे की किताबी पढ़ाई, और किसी हुनर का प्रशिक्षण, इन दोनों के रास्ते अलग करने चाहिए। जो लोग किताबी पढ़ाई में बहुत अच्छे नहीं हैं, उन्हें प्राइमरी और मिडिल के बाद उनके नंबर देखकर किसी तकनीकी प्रशिक्षण, या रोजगार के लिए तैयार करने वाले दूसरे हुनर की तरफ मोडऩा चाहिए, और उनके बालिग हो जाने तक कुछ किस्म के हुनर के लायक उन्हें ढालना चाहिए। पांच-सात बरस की ऐसी ट्रेनिंग से बालिग होते ही ये लोग अपने खुद के रोजगार के लायक रहेंगे, या इतनी ट्रेनिंग पा लेने के बाद इन्हें कहीं नौकरी मिल भी जाएगी। लेकिन सरकारें अगर ऐसे अलोकप्रिय फैसलों से बची रहेंगी, तो फिर वे अगली पीढिय़ों को नहीं बचा पाएंगी। आज पढ़े-लिखे बेरोजगार बिना किसी हुनर के मां-बाप की छाती पर मूंग दलते बैठे रहते हैं, या फिर बेरोजगारी के लिए सरकारों को कोसते रहते हैं। नौजवान पीढ़ी के एक बड़े हिस्से को 8वीं की पढ़ाई के बाद अलग-अलग हुनर की ट्रेनिंग में डालना चाहिए, और उसी से भारत एक मैन्यूफेक्चरिंग केन्द्र बन सकेगा। महज किताबें पढ़े हुए ठलहा नौजवान इस देश में कामगार ताकत नहीं बनेंगे, बल्कि वे बेरोजगार की शक्ल में बोझ रहेंगे। केन्द्र और राज्य सरकारों को देश के अगले दस-बीस बरस की कामगारों की जरूरतों का अंदाज लगाकर नौजवान पीढ़ी को उसी हिसाब से ढालना चाहिए, इसके अलावा न तो बेरोजगारी घटाने का कोई जरिया है, और न ही अर्थव्यवस्था में नौजवान पीढ़ी की भूमिका बढ़ाने का। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 28 मार्च



रातों-रात दौलत के सपने लोगों को फंसा रहे जाल में

 28 मार्च 2024

 

देश भर से अलग-अलग आई बहुत सी खबरें यह बताती हैं कि लोगों के मन में तेजी से कमाई की हसरत इस रफ्तार से बढ़ी है, और इतनी मजबूत हो गई है कि वे इसके लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। छत्तीसगढ़ में पिछली भूपेश सरकार के कार्यकाल में पांच बरस जिस तरह कोयला-रंगदारी, नकली होलोग्राम से शराब बनवाकर बिक्री, और दूसरे कई किस्म के भ्रष्टाचार में जिस तरह से नेता, अफसर, और कारोबारी शामिल हुए, वह हैरान करता है कि क्या किसी अरबपति को साल भर से परिवार से दूर फरार जीने की कीमत पर भी ऐसी जुर्म की कमाई अच्छी लग रही थी? प्रदेश कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल उम्र के इस पड़ाव पर आकर, ऐसी सेहत के बाद, परिवार का सैकड़ों करोड़ का कारोबार रहने के बाद फरार हैं। बड़े-बड़े नेता और आईएएस अफसर या तो जेल में हैं, या कटघरे में हैं। पैसों की ऐसी कितनी जरूरत रहती है? 

कुछ दूसरी खबरों को देखें, तो बेंगलुरू की एक खबर है कि वहां सिंचाई विभाग के एक इंजीनियर को क्रिकेट पर सट्टे का शौक था, और कर्ज ले-लेकर सट्टे पर लगाते रहा, हारते रहा, और कर्ज इतना बढ़ गया कि देनदार घर पहुंचकर परेशान करने लगे, और 23 बरस की बीवी ने यह सब सिलसिला लिखकर, दो साल के बेटे को छोडक़र खुदकुशी कर ली कि वह कर्जदाताओं की प्रताडऩा और नहीं झेल पा रही है। कतरा-कतरा और भी बहुत सी खबरें हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में अभी होली के दिन एक लाश मिली, और पता लगा कि वहीं के एक नौजवान ने एक नाबालिग से यह कत्ल करवाया। नाबालिग ने चाकू के दस वार से यह कत्ल किया, और इसका ठेका देने वाले ने भरोसा दिलाया था कि वह 17 बरस का नाबालिग है, और उसकी जल्दी जमानत करवा देगा। इसी राज्य की एक दूसरी खबर है कि अभी साल भर पहले तक गांव में बढ़ई का काम करने वाले एक नौजवान, शिवा साहू ने लोगों को क्रिप्टोकरेंसी से रकम दुगुनी करवा देने का झांसा देकर करोड़ों रूपए लिए, और जब वह रकम नहीं लौटा पाया तो लोगों ने पुलिस रिपोर्ट की। उसके पास से सवा तीन करोड़ से अधिक की 16 कारें जब्त हुई हैं, और उसके बैंक खातों से साढ़े 5 करोड़ रूपए जब्त होने की खबर है। अब सवाल यह उठता है कि गांव का एक बढ़ई रातों-रात लोगों को क्रिप्टोकरेंसी की कमाई के सपने दिखाकर इस तरह करोड़ों रूपए कमा सकता है, तो गांव के लोग भी ऐसी धोखाधड़ी पर करोड़ों रूपए गंवाने के लिए तैयार खड़े दिखते हैं। यह नौबत भयानक इसलिए है कि जिन लोगों ने क्रिप्टोकरेंसी के बारे में कुछ जाना भी नहीं होगा, वे गंवाना मुनासिब समझ रहे हैं, तो कल के दिन किसी और किस्म का जालसाज आएगा, और लोगों की बची हुई रकम ले जाएगा। छत्तीसगढ़ के गांव-गांव से लोगों ने चिटफंड में अपना पैसा गंवाया है, और सहारा जैसी बड़ी कंपनी में हजारों करोड़ गंवाए हुए लोग पहले से भटक ही रहे हैं। लोग रातों-रात अंधाधुंध कमाई के लिए जुर्म कर भी रहे हैं, और मुजरिमों के जुर्म के शिकार भी हो रहे हैं। इन दोनों में एक ही बात एक सरीखी है कि लोगों में रातों-रात पैसेवाले बनने के सपने बड़ी आसानी से पनपते हैं।

लोग बच्चों को मेडिकल कॉलेज में भेजने के नाम पर जिंदगी भर की कमाई गंवा रहे हैं, सरकारी नौकरी पाने के लिए बहुत ही संगठित गिरोहों के हाथ सारी बचत लुटा दे रहे हैं। कहीं कोई मुआवजा दिलाने के नाम पर, तो कहीं किसी जमीन पर कब्जे के नाम पर लोगों को आसानी से ठगा जा सकता है, और ठगा जा रहा है। जिन लोगों ने चिटफंड कंपनियों में अपनी बचत गंवाई थी, उनके बारे में मुख्यमंत्री बनते ही भूपेश बघेल ने यह घोषणा की थी, और यह बात कांग्रेस के 2018 के घोषणापत्र में भी शामिल थी कि चिटफंड में लुटे हुए लोगों को सरकार अपनी तरफ से भुगतान करके भरपाई करेगी। उस बयान की बात आई-गई हो गई, और भाजपा ने न तो विधानसभा चुनाव में अच्छी तरह दर्ज इस बयान को उठाया, और न अभी लोकसभा चुनाव में। लेकिन हमने उसी वक्त इस बात को लिखा था कि सरकार किसी जुर्म के शिकार लोगों की रकम की भरपाई सरकारी खजाने से कैसे कर सकती है? और इन लोगों ने तो अधिक कमाई की उम्मीद में यह रकम लगाई थी, इनसे परे लोगों के घरों में चोरी और डकैती से जिस रकम का नुकसान होता है, उसकी भी सरकारी खजाने से भरपाई का कोई प्रावधान नहीं है, और महादेव सट्टा जैसे कई और दूसरे किस्म के लूटने वाले धंधे इस प्रदेश में चल रहे हैं जिनको कोई सरकार रोक नहीं पा रही है। 

हम काफी अरसे से यह बात सुझाते आ रहे हैं कि केन्द्र और राज्य सरकार को आर्थिक अपराधों की रोकथाम के लिए ऐसी खुफिया निगरानी एजेंसी बनानी चाहिए जो कि बाजार की चर्चा से ही संभावित जुर्म को भांपकर उसे समय रहते पकड़ सके। लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है, और केन्द्र और राज्य दोनों जगह ठगी और जालसाजी से होने वाले जुर्म जब हो जाते हैं, रकम गायब हो जाती है, तब जाकर इनकी जांच एजेंसियां जागती हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। ऐसा कहीं भी नहीं हो सकता कि किसी गांव-कस्बे में रकम दुगुनी करने का कोई धंधा चला रहा हो, और वह वहां की पुलिस की नजरों में न आए। जब तक पुलिस का हफ्ता-महीना नहीं बांधा जाए, तब तक किसी इलाके में कोई संगठित जुर्म चलना मुमकिन नहीं रहता। इसलिए सरकार को अपनी मशीनरी सुधारनी चाहिए, और पुलिस से परे एक खुफिया एजेंसी ऐसी बनानी चाहिए जो कि बाजार की चर्चा, अफवाह, और मीडिया की खबरों को देखकर ही जुर्म के पनपने के पहले उसकी जड़ों पर वार कर सके।  

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 27 मार्च 2024



 

लड़ते पड़ोसियों से जुड़ते पड़ोसी भले

  27 मार्च 2024

 पाकिस्तान में अभी-अभी नई सरकार बनी, और विदेश मंत्री बने इसहाक डार ने ब्रिटेन में प्रेस कांफ्रेंस में यह कहा कि पाकिस्तान अपने पड़ोसी देश भारत के साथ व्यापारिक संबंधों की बहाली पर गंभीरता से सोच रहा है। दोनों देशों में साढ़े चार साल से आपसी कारोबार बंद पड़ा है। भारत में जम्मू-कश्मीर से 370 खत्म करने के विरोध में पाकिस्तान ने 2019 में कारोबार बंद कर दिया था, और इसके पहले भी दोनों देशों में तनातनी चल रही थी। भारत और पाकिस्तान का आपसी इतिहास बताता है कि सरहद और राजधानियों के विवाद सबसे पहले कारोबार पर वार करते हैं, और दोनों ही देश नुकसान झेलते हुए इस कारोबार के महंगे विकल्पों का इस्तेमाल कर रहे हैं। पाक विदेश मंत्री का यह बयान वहां सरकार बनने के कुछ हफ्तों के भीतर आया है, और कुछ हफ्तों के बाद हिन्दुस्तान में नई सरकार बननी है, और तब तक हिन्दुस्तान के चुनावी माहौल में पाकिस्तान के इस नए बदले हुए रूख पर शायद कोई सरकारी फैसला न हो पाए। वैसे भी किसी सरकार को अपने आखिरी के हफ्तों में विदेश नीति पर महत्वपूर्ण फैसले लेने नहीं चाहिए। इसलिए भारत और पाकिस्तान के कूटनीतिक संबंधों को जानने वाले लोगों का कहना है कि पाक विदेश मंत्री ने यह बेमौके पर बेतुका बयान दिया है जिस पर भारत में अभी कोई फैसला होना नहीं है। दूसरी तरफ कारोबारी संगठनों ने इस पर खुशी जाहिर की है क्योंकि अगल-बगल के देशों के बीच कारोबार सस्ता पड़ता है, और मुनाफा आपस में बंट जाता है, बजाय किसी तीसरे देश में उस मुनाफे के जाने के।

लेकिन हम भारत और पाकिस्तान के बीच तनातनी के दाम याद दिलाना चाहते हैं। दोनों ही देश सरहद पर अंधाधुंध फौजी खर्च करते हैं, और दोनों ही देशों में गरीबों का हाल बहुत बुरा है। पाकिस्तान में यह हालत और अधिक बुरी है, और वहां पर फौजी खर्च अनुपात से बहुत अधिक है। जाहिर फौजी खर्च के अलावा पाकिस्तान में फौज लोकतंत्र, चुनाव, सरकार, और कारोबार पर बहुत बुरी तरह अपनी फौलादी पकड़ रखती है। ऐसे में आपसी कारोबार दोनों ही देशों के भले की बात है, और सिर्फ सियासी टकराव के चलते, नेताओं के अहंकार को पूरा करने के लिए जनता का इतना अधिक नुकसान करना ठीक नहीं है। चाहे यह बात बेमौके की हो, चाहे यह बेतुकी हो, लेकिन बात है तो पते की, और कुछ अरसा बाद जब भारत में नई सरकार काम संभालेगी, तब दोनों तरफ के कारोबारी संगठनों को अपनी-अपनी सरकार को कारोबार-बहाली के लिए नई कोशिशें करनी चाहिए।  


राजनीति की बुनियादी बहस पटरी से उतारने की हरकत..

 27 मार्च 2024

 

हर कुछ दिनों में कांग्रेस पार्टी के कोई न कोई नेता अपनी लापरवाह जुबान से एक ऐसा बखेड़ा खड़ा कर देते हैं जिससे पूरी पार्टी को अगले कई दिनों तक शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है। जब देश में कोई मुद्दे बहुत जलते-सुलगते रहते हैं, और जिन पर चर्चा से कांग्रेस की विरोधी पार्टियों को बड़ी असुविधा होती रहती है, उसी वक्त कांग्रेस के नेता अपनी पार्टी की फजीहत करते हैं। कांग्रेस की एक प्रमुख प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने अभी अपने सोशल मीडिया पेज पर हिमाचल की मंडी लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाई गई अभिनेत्री कंगना रनौत को लेकर एक बहुत ओछी और भद्दी बात लिखी, जिसे कि मंडी में भाव के शब्दों में पोस्ट किया गया। इसके तुरंत बाद इस कांग्रेस प्रवक्ता ने यह पोस्ट हटा दी, कंगना से माफी मांगी, और यह सफाई दी कि उनके सोशल मीडिया पेज कई अलग-अलग लोग देखते हैं, और उनमें से किसी ने इसे पोस्ट किया होगा, और उन्हें इस बात की बड़ी शर्मिंदगी है। 

ऐसे किसी बखेड़े का खात्मा गंदगी फैलाने वाले के हाथ नहीं रहता है, बल्कि जिस पर हमला किया गया है वे इसे तय करते हैं कि किस माफी के बाद विवाद खत्म किया जाए, या न किया जाए। चुनाव के इतने करीब भाजपा के हाथ भी यह एक असल मुद्दा लगा है जो कि उसकी एक चर्चित अभिनेत्री-नेत्री के खिलाफ गंदा हमला था, और भाजपा इसे जल्द खत्म करे ऐसी कोई उसकी मजबूरी तो है नहीं। आज जब देश में चुनावी बॉंड को लेकर भाजपा और केन्द्र सरकार के खिलाफ लगातार ठोस खबरें आ रही थीं, जब न सिर्फ विपक्षी पार्टियां, बल्कि देश के मीडिया, और सोशल मीडिया का भी एक तबका केन्द्र सरकार और भाजपा को बुरी तरह घेर रहा था, उस वक्त कांग्रेस की प्रवक्ता ने एक घटिया टिप्पणी करके देश में चल रही बहस को पटरी से उतारने का जुर्म किया है। और यह प्रवक्ता पैदाइशी राजनेता होने के बजाय लंबे समय तक अखबारनवीसी में सीनियर और अहमियत के ओहदों पर रही हैं, इसलिए किसी नाजुक मौके पर बकवास का नुकसान वे अच्छी तरह जानती हैं। फिर यह भी है कि देश के टीवी चैनलों पर, और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सुप्रिया श्रीनेत लगातार रोज मौजूद रहती हैं, और उनकी एक घटिया टिप्पणी से उनके चेहरे की साख कुछ वक्त के लिए तो चौपट हो ही गई है। लेकिन कांग्रेस को इस किस्म की आत्मघाती हरकतों में महारथ हासिल है। 

कंगना रनौत कोई बहुत अच्छी जुबान नहीं बोलतीं, वे फिल्म उद्योग के दूसरे लोगों का घटिया दर्जे का अपमान करने में लगी ही रहती हैं, लेकिन आज वह मुद्दा नहीं है। उनके फिल्मों से जुड़े बयानों का जवाब लोग उसी वक्त दे सकते हैं, और देते हैं। आज उनके उम्मीदवार बनने पर हिमाचल की मंडी नाम की जगह का घटिया और अश्लील किस्म से इस्तेमाल पूरी तरह नाजायज है, और खारिज करने के लायक है। राजनीति में कंगना की पार्टी के भी बहुत से नेता इस दर्जे के बयान देते रहते हैं, लेकिन उनकी भी इसी तरह निंदा तो होती ही रहती है। बिना यह देखे कि बयान किसने दिया है, घटिया बयान को घटिया साबित करने का कोई मौका छोडऩा नहीं चाहिए। लगातार ऐसा होने पर ही लोगों की बदजुबानी पर कुछ लगाम लग सकती है। राजनीति दरियादिली का कारोबार नहीं है, और सुप्रिया श्रीनेत सस्ते में नहीं छूट सकतीं, उनके सोशल मीडिया पेज पर जो पोस्ट होता है उसके लिए वे खुद जिम्मेदार हैं, कानूनी रूप से भी, और नैतिक रूप से भी। लोगों को सार्वजनिक जीवन में अधिक जिम्मेदारी से काम लेना चाहिए, वरना जनता की अदालत से लेकर कानून की अदालत तक, कई किस्म के कटघरों में उन्हें जवाब देना पड़ सकता है। 

(Daily Chhattisgarh) 

ये कहां...., आ गए हम...

 24 मार्च, 2024 

 

पिछले कुछ हफ्तों के सुप्रीम कोर्ट को देखें तो लगता है कि केन्द्र और कई राज्य सरकारें अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में संविधान और कानून से लगातार टकरा रही हैं। राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार के जाने कितने ही फैसलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट को इन सरकारों को याद दिलाना पड़ रहा है कि वे कानून के खिलाफ काम कर रही हैं। ऐसा भी नहीं कि इन्हें अपने दायरे मालूम न हों, क्योंकि निर्वाचित नेता तो नासमझ और बदनीयत हो सकते हैं, लेकिन लगातार काम करने वाले नौकरशाह और बड़े-बड़े सरकारी वकील तो कानून को जानते हैं, और वे पहले से बता सकते हैं कि कौन से फैसले अदालती कटघरे में खड़े नहीं हो सकेंगे। इसके बावजूद अगर सरकारें ऐसे फैसले लेती हैं, ऐसे काम करती हैं, तो यह जाहिर है कि वे अदालत से इन कामों के रद्द या खारिज होने के पहले तक के वक्त का इस्तेमाल करती हैं। चुनावी बॉंड का मामला ऐसा ही रहा, और कई राज्यों की सरकारों के बहुत से फैसले ऐसे ही रहे जिनके बारे में अदालत से खारिज होना तय था, लेकिन उसके पहले तक उनका बेजा इस्तेमाल ही पूरा मकसद था।

अब ऐसा लगता है कि भारतीय लोकतंत्र में कार्यपालिका, विधायिका, और न्यायपालिका नाम के जो तीन स्तंभ अलग-अलग बनाए गए थे, उनमें से कार्यपालिका किसी बिफरे हुए सांड की तरह नथुनों से फुंफकारते हुए, सींगों से हमला करते हुए जनहित को कुचल देने के लिए टूटी पड़ी है, और सुप्रीम कोर्ट है कि अपने काम के बाकी बोझ को किनारे रखकर इस सांड को सींगों से थामकर काबू में करने में लगा हुआ है। और तो और, चुनाव आयोग से लेकर राष्ट्रपति तक, राज्यपालों से लेकर विधानसभाध्यक्षों तक जो स्वतंत्र और स्वायत्त संस्थाएं होनी चाहिए, वे सारी की सारी सरकार के मातहत विभागों की तरह काम कर रही हैं। नौबत इतनी खराब हो गई है कि जनता को अब सिर्फ एक संस्था, अदालत की तरफ देखना पड़ रहा है, लेकिन यह लोकतंत्र इस नौबत के लिए बनाया नहीं गया था कि बाकी तमाम संस्थाएं गैरजिम्मेदारी करें, गलत करें, और सिर्फ अदालत उसे सुधारने का काम करे। 

देश और प्रदेशों को देखें तो यह साफ है कि सरकारें ऐसे बहुत से फैसले ले रही हैं जिनके बारे में हम उसी वक्त से यह लिखते आए हैं कि वे अदालती सवालों को नहीं झेल पाएंगे, लेकिन सरकारें हैं कि बेझिझक और बेधडक़ होकर ऐसा ही काम करती जा रही है। कहीं आतंक के कानून का ऐसा इस्तेमाल किसी खास तबके की गिरफ्तारी के लिए किया जा रहा है, तो कहीं केन्द्र और राज्य सरकारों की जांच एजेंसियों का काम सत्ता को नापसंद लोगों की गिरफ्तारी तक सीमित रह गया है। राज्यों में भी छांट-छांटकर राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ मामले-मुकदमे दर्ज करने का काम चल रहा है। और सरकारें इस बेशर्मी के साथ ऐसे काम कर रही हैं कि यह भी लगता है कि क्या सरकारों को सचमुच ही कोई अधिकार होना चाहिए? 

देश के कानून एकदम साफ हैं, और सरकारों को उनकी सीमाएं मालूम हैं, लेकिन सौ फीसदी गलत तरीके से काम करना जारी है, और सिर्फ निर्वाचित सरकारें नहीं, राज्यपाल और विधानसभाध्यक्ष भी ऐसे खराब और घटिया फैसले ले रहे हैं, कि उन्हें मालूम है कि अदालत उन्हें पलट देगी। लेकिन इसमें कुछ हफ्तों या महीनों का समय लगेगा, और उस वक्त का इस्तेमाल तोडफ़ोड़ करने, सत्ता पलटाने, दलबदल करवाने में किया जाता है। अदालती फैसलों से सरकारें कुछ भी नहीं सीख रही हैं, वे इस बात पर पूरी तरह अड़ी हुई हैं कि उन्हें अदालतों से टकराव लेना है, और मनमानी करनी है। सरकारें तो सरकारें, स्टेट बैंक जैसे सार्वजनिक संस्थान भी सुप्रीम कोर्ट के सामने बेशर्मी से हुक्मउदूली कर रहे हैं, और इसके चेयरमैन तक को अदालत का कोई डर नहीं है। 

चुनावी बॉंड से लेकर पीएम केयर्स तक बहुत से ऐसे फंड हैं जिन्हें सरकार जनता की नजरों से दूर रखने पर अड़ी हुई है। छत्तीसगढ़ में तो सरकार ने एक जाति सर्वे करवाया, और उस रिपोर्ट को दो-दो राज्यपाल मानते रह गए, लेकिन किसी को दिया नहीं गया। जनता के पैसों और उन पैसों से किए गए काम का हिसाब भी देना नेता और पार्टियां नहीं चाहते। लोकतंत्र में जनता एकदम ही खारिज कर दी गई है, और जनहित, जनभावना, जनसरोकार जैसे शब्द मानो 21वीं सदी के भारत के इस तथाकथित अमृतकाल के शब्दकोश से निकाल ही दिए गए हैं। ये तमाम बातें लोगों के मन में सवाल खड़े करती, लेकिन ये मन धर्म और जाति की भावनाओं में घिरे हुए हैं, और उनकी बाकी समझ धीमी पड़ चुकी हैं। 

जिस रफ्तार से दलबदल चल रहे हैं, और लोग थोक में दलबदल करके सदस्यता खोने से भी बच जा रहे हैं, इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अभी चार दिन पहले ही बड़ी हैरानी जाहिर की थी, देखना है कि अदालती जुबानी जमाखर्च किसी फैसले की शक्ल में पहुंच पाएगा या नहीं। इन दिनों देश में जो कुछ अच्छा होते दिख रहा है, वह सुप्रीम कोर्ट की मेहरबानी से चल रहा है, क्योंकि कई हाईकोर्ट तो पत्थरयुग और गुफाकाल के अंदाज में काम कर रहे हैं। 

भारतीय लोकतंत्र को कुछ थमकर इस पर सोचने की जरूरत है जो कि एक फिल्म के गाने में पूछा गया था- ये कहां...., आ गए हम... 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 मार्च 2024


 

सरकारों को सडक़-सुरक्षा अनदेखी करने का हक है?

 24 मार्च 2024

 

देश भर में लोगों के बीच इतने तरह की हिंसा दिखाई पड़ रही है कि हैरानी होती है। दूसरी तरफ सडक़ों पर अंधाधुंध रफ्तार से गाडिय़ां चलती हैं, और चारों तरफ एक्सीडेंट हो रहे हैं, मौतें हो रही हैं। सडक़ों पर सबसे अधिक समय तक चलने वाली कारोबारी गाडिय़ों का हाल सबसे खराब रहता है, वे नियम-कानून सबसे अधिक तोड़ती हैं, और हर दिन सैकड़ों किलोमीटर चलती हैं, और एक्सीडेंट में सबसे अधिक जिम्मेदार रहती हैं, लेकिन इन पर किसी प्रदेश में सरकार का काबू नहीं दिखता, क्योंकि कारोबारी गाडिय़ां देश में अवैध वसूली का सबसे बड़ा जरिया है। लेकिन इन गाडिय़ों से सिर्फ सडक़ हादसों का नुकसान देखें, या टैक्स चोरी का नुकसान देखें तो वह जायज नहीं होता। इनसे एक दूसरा बहुत बड़ा नुकसान यह है कि सरकार के नियम-कायदे को अनदेखा करना यहां से शुरू होता है। जिस तरह लोग सडक़ों पर थूकना, सार्वजनिक जगहों पर सिगरेट पीना करते हैं, उसी तरह सडक़ों पर ट्रैफिक के नियम तोड़ते हैं, और वहीं से देश के नियम-कायदे के खिलाफ एक हिकारत शुरू होती है जो कि कभी खत्म नहीं होती। इसलिए ट्रैफिक को बेकाबू होने देना, लोगों को अराजक बनने देना, इससे अलग-अलग कई किस्म के जुर्म के मिजाज शुरू होते हैं, और वे आगे बढक़र हर तरह के नियम तोडऩे में लोगों को हौसला देते हैं। कुछ लोगों को यह मिसाल कुछ अटपटी लग सकती है कि लोगों के बाकी जुर्मों का ट्रैफिक का भला क्या लेना-देना हो सकता है, लेकिन जुर्म के मिजाज की शुरूआत वहां से होती है, और बाद में धीरे-धीरे लोग अधिक बड़े जुर्म करने लगते हैं। सडक़ पर अगर नियम तोड़ते हुए पुलिस से एक बार वास्ता पड़ता है, जुर्माना देना पड़ता है, या सजा भुगतनी होती है, गाड़ी जब्त होती है, वकील और अदालत से साबका पड़ता है, तो लोग आगे के लिए हिचकते हैं। इसलिए सरकारों को अगर कानून लागू करना है, तो उसकी शुरूआत सडक़ों से, और ट्रैफिक से करनी चाहिए। 

दरअसल हिन्दुस्तानी सडक़ों को देखें, तो किसी भी किस्म की ताकत से लैस लोगों की बदमिजाजी उनकी गाडिय़ों के हॉर्सपावर से और अधिक बढ़ जाती है, लोगों को अपने ओहदे, अपने पैसे, अपनी राजनीतिक पहुंच का खूब अहंकार रहता है, और जब पुलिस उन्हें इस अहंकार के प्रदर्शन की छूट देती है, तो वह और बदतमीज होते चलता है। लोगों को उनकी औकात दिखाने का एक सबसे आसान जरिया सडक़ों पर उनकी बददिमागी को काबू में रखने का हो सकता है, वरना यह बददिमागी उनसे और भी कई किस्म के जुर्म करवाती रहती है। सरकारें इस चक्कर में ट्रैफिक नियमों पर कड़ाई से अमल नहीं करवाती हैं कि उससे लोग नाराज हो जाएंगे। यह सत्ता की बहुत बड़ी गलतफहमी रहती है क्योंकि आम लोग तो किसी भी चालान और जुर्माने से बचकर रहना चाहते हैं, उनकी ताकत ही नहीं रहती कि यह नुकसान झेल सकें। ट्रैफिक पुलिस की कार्रवाई से असर तो उन बददिमाग लोगों पर होता है जो कि ट्रैफिक सिपाही को धमकाते हैं कि जानते नहीं वे कौन हैं। ऐसे में हमारा ख्याल है कि जो सरकार सडक़ों पर नियम जितनी कड़ाई से लागू करवाएगी, वहां पर बाकी नियम-कानून भी अपने आप बेहतर अमल में आने लगेंगे। लोग ट्रैफिक जुर्माने को सिर्फ ट्रैफिक की तरह नहीं देखते, उनका मिजाज ही कानून के सम्मान का होने लगता है। 

हम अपने अखबार और यूट्यूब चैनल पर लगातार ट्रैफिक सुधारने के बारे में लिखते और बोलते हैं। आज यहां पर फिर उन्हीं बातों को दुहरा रहे हैं क्योंकि हमारे इर्द-गिर्द हर दिन कई दुपहिया सवार सडक़ों पर मारे जा रहे हैं, और राज्य सरकार का हाल ऐसा नर्ममिजाजी का है कि वह लोगों के सिर पर हेलमेट रखना नहीं चाहती, दुपहिया चलाते मोबाइल पर बातचीत का चालान करना नहीं चाहती, बड़ी कारोबारी गाडिय़ों पर तो संगठित भ्रष्टाचार की वजह से वैसे भी कोई कार्रवाई नहीं हो सकती है। हर दिन हर राज्य की सडक़ों पर बहुत सी ऐसी मौतें होती हैं जिन्हें कि पूरी तरह रोका जा सकता था, लेकिन रोकते हुए कुछ दिनों के लिए जनता की नाराजगी का खतरा भी सरकार उठाना नहीं चाहती। सच तो यह है कि जिन शहरों या प्रदेशों में सरकार सडक़ों को सुरक्षित बनाती है वहां उसे लोगों की वाहवाही भी मिलती है। इसलिए सरकार को वोटरों से डरे बिना, और बददिमाग-ताकतवर लोगों की परवाह किए बिना सख्ती से नियम लागू करना चाहिए। इसी से सडक़ों पर बेकसूर लोगों की जिंदगी बचेगी, जो कि या तो अराजक गाडिय़ों का शिकार होकर मरते हैं, या सरकारी लापरवाही की वजह से खुद भी लापरवाह होकर जान खो बैठते हैं। सच तो यह है कि संविधान की शपथ लेकर काम करने वाली किसी सरकार को सडक़ सुरक्षा में ढील देने का कोई हक ही नहीं है, उसे जनजीवन और जनसुरक्षा के हित में नियमों को कड़ाई से लागू करना ही है, और इसमें ढील उसके अधिकार क्षेत्र के बाहर है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 मार्च 2024


 

नीच बात कहने का एक नया रिकॉर्ड बना बिहार में

  23 मार्च 2024

 

भारत की राजनीति में अनगिनत किस्म की ओछी और गंदी बातें कही जाती हैं। लेकिन बिहार में अभी-अभी भाजपा के कोटे से डिप्टी सीएम बने सम्राट चौधरी ने जो कहा है, वह तो एकदम ही अनोखा घटिया मामला है। इतनी नीच बात बोलने वाले नेता कम ही होंगे। सम्राट चौधरी ने कहा कि टिकट बेचने में लालू यादव ने बेटी को भी नहीं छोड़ा, पहले बेटी से किडनी ली, और उसके बाद चुनाव का टिकट दिया। इस चौधरी के इस बयान की निंदा खुद भाजपा के नेता कर रहे हैं, और इसे शर्मनाक बता रहे हैं। भारत में अलग-अलग मौकों पर अलग-अलग पार्टियों के नेता घटिया बातें कहने के रिकॉर्ड बनाते चलते हैं, और आज के बाद जब कभी घटिया बातों की मिसाल दी जाएगी, उनमें यह बयान ऊपर के कुछ बयानों में गिनाएगा। 

लेकिन हम राजनीति से परे हिन्दुस्तान की एक हकीकत पर बात करना चाहते हैं, भारत कीएक प्रतिष्ठित प्रत्यारोपण-पत्रिका ने 1995 से लेकर 2021 के बीच के भारत के अंग प्रत्यारोपण के आंकड़े प्रकाशित किए थे। इनके मुताबिक इस दौर में 18.9 फीसदी अंग ही महिलाओं को मिले, यानी 80 फीसदी से अधिक अंग प्रत्यारोपण पाने वाले मरीज पुरूष थे। एक दूसरा आंकड़ा बताता है कि किडनी जैसा सबसे बड़ा जीवनरक्षक अंग देने के मामले में महिलाएं सबसे आगे हैं। पत्नी, मां, बहन, बेटी, और भाभी तक से लोगों को अंग मिलते हैं, और जब महिलाओं को अंग प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है, तो हिन्दुस्तानी परिवार महिलाओं की जान बचाने में पीछे हटने लगते हैं, और ऑपरेशन का महंगा खर्च नहीं उठाते। एक अध्ययन बताता है कि जब एक महिला को किडनी लगती है तो देने वालों में बहन, मां या बेटी ही होते हैं। जबकि दूसरी तरफ अधिकतर महिलाएं परिवार के पुरूषों के लिए किडनी देने को तैयार रहती हैं। सामाजिक हकीकत यह है कि भारत में मर्द ही अधिक दारू पीते हैं, और लीवर ट्रांसप्लांट की जरूरत पडऩे पर महिलाओं को ही अंगदान करना होता है। महिलाओं पर अंगदान करने के लिए, चाहे वह परिवार के लोगों के लिए हो, चाहे वह ब्लैक मार्केट में बेचने के लिए हो, उन पर भारी पारिवारिक दबाव रहता है। एक विशेषज्ञ डॉक्टर का कहना है कि अगर सौ आदमियों और सौ औरतों को किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत हो, तो ऐसी पूरी संभावना रहती है कि सौ में से सौ मर्द इसके लिए नाम रजिस्टर करा लें, और कुल 50 से 60 महिलाएं नाम दर्ज कराएं।

महिलाओं के जिम्मे परिवार के पुरूषों को अंग देना भी लिखा है, और पिता को किडनी देने वाली बेटी को राजनीति के चलते गाली भी खानी है। बिहार के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी ने जिस अंदाज में लालू यादव को बेटी को टिकट किडनी के एवज में देने की बात कही है, वह पता नहीं कौन सी भारतीय संस्कृति, और कौन से हिन्दुत्व की गौरवशाली सोच, और गरिमामय भाषा है। लालू यादव की बेटी ने पिता को किडनी देने का काम जिस हौसले से किया, और इस बारे में सोशल मीडिया पर पूरे समय तस्वीरें भी पोस्ट करती रहीं, उस साहस के बाद यह घटिया राजनीतिक हमला और अधिक घटिया लगता है। वैसे भी भाजपा लालू यादव पर परिवारवाद का आरोप लगाती है, और अगर लालू ने परिवारवाद के फेर में बेटी को टिकट दिया है, तो उसे किडनी के एवज में बेचने की बात कहना तर्कहीन भी है, घटिया तो है ही। 

हमारा ख्याल है कि भारतीय समाज में महिलाओं की जो स्थिति है, उसे लेकर कई किस्म के अध्ययन सामने आने चाहिए, और जनता के बीच उन पर चर्चा होनी चाहिए। लोगों को इस बात का अहसास भी नहीं होगा कि भारत के बच्चों में जब कैंसर की पहचान होती है, तो तकरीबन तमाम लडक़ों को तो इलाज के लिए अस्पताल लाया जाता है, लेकिन लड़कियों को जांच में कैंसर मिलने के बाद भी अमूमन इलाज से परे रखा जाता है। शायद यह मान लिया जाता है कि लड़कियां शादी के बाद दूसरे के घर जाएंगी, तो वे अपने परिवार की आय बढ़ाने वाली नहीं रह जाएंगी। भारत के अधिकतर परिवारों की आर्थिक स्थिति ऐसी रहती है कि कमाऊ और गैरकमाऊ सदस्यों के बीच कई किस्म के फर्क होने लगते हैं। इसीलिए लडक़ी की पढ़ाई से लेकर लडक़ी के इलाज तक कई किस्म का भेदभाव होता है, और यह बढ़ते-बढ़ते अंग प्रत्यारोपण तक पहुंच जाता है, जिसमें शायद यह भी मान लिया जाता है कि अगर पुरूष कमाऊ है, तो उसे अंग पाने का अधिक हक होना चाहिए, और उसके अंग नहीं लिए जाने चाहिए। दूसरी तरफ घर और बाहर कहीं भी, या दोनों जगह काम करने वाली महिला के लिए भी यह मान लिया जाता है कि वह कम कमाने वाली है, परिवार की मुखिया नहीं है, इसलिए वह किसी अंग के बिना भी काम चला सकती है। यह सोच बचपन से ही लडक़ी का इलाज न कराने वाली सोच का एक किस्म का विस्तार ही है। 

भारतीय गरीब परिवारों के भीतर महिला और लडक़ी के पोषण आहार के आंकड़े ही अलग रहते हैं। वे परिवार के पुरूष और लडक़ों के खानपान से काफी नीचे भी रह सकते हैं। देश की उत्पादकता बढ़ाने के लिए लड़कियों और महिलाओं का बराबरी का योगदान हो सकता है, अगर उन्हें बराबरी से खानपान, पढ़ाई और इलाज मिले, और काम के समान अवसर मिलें, समान मजदूरी, और तनख्वाह मिले। आज हालत यह है कि दुनिया के कई देशों में सुअर जैसे जानवरों में जेनेटिक फेरबदल करके उसके कुछ अंग इंसानों में प्रत्यारोपित किए जा रहे हैं। जाहिर है कि ऐसे सुअर को अधिक महत्व के साथ रखा जाएगा, जिसे ट्रांसप्लांट के मकसद से ही किसी खास इंसान के जींस डालकर रखा गया है। बात सुनने में बहुत बुरी लग सकती है, लेकिन हिन्दुस्तान में महिलाओं को बच्चे पैदा करने, उन्हें पालकर बड़ा करने, परिवार का रोज का कामकाज करने, बुजुर्गों की सेवा करने के साथ-साथ जरूरत पडऩे पर अंग देने के लिए भी रखा जाता है। फिर भी उनमें से बहुतों की कोई इज्जत नहीं की जाती। ऐसे भारतीय परिवार पश्चिमी देशों में इंसानों के अंग प्रत्यारोपण के लिए रखे जाने वाले जानवरों की बेहतर देखरेख से कुछ सीख सकते हैं।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 मार्च 2024


 

भारतीय लोकतंत्र एकदम से इतनी बुरी तरह फ्लॉप कैसे दिखने लगा है?

  22 मार्च 2024

 

भारत में पिछले दो-तीन हफ्तों से खासकर सुप्रीम कोर्ट, और चुनाव आयोग, राजभवनों को लेकर जिस तरह की खबरें आ रही हैं, जिस तरह से केन्द्र सरकार की जांच एजेंसियां काम कर रही हैं, जिस तरह से बंगाल जैसे राज्य में वहां की पुलिस काम कर रही है, या जिस तरह छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में पिछली सरकार के कामकाज का ब्यौरा सामने आ रहा है, उन सबसे कुल मिलाकर यह लग रहा है कि भारतीय लोकतंत्र का एक बड़ा हिस्सा फ्लॉप शो साबित हो चुका है। सरकारें अदालतों से लड़ रही हैं, सत्तारूढ़ पार्टियां जगह-जगह मुजरिमों की तरह काम कर रही हैं, और राज्यपाल मानो देश में अंग्रेज सरकार के राजनीतिक एजेंट बनकर रियासतों में काम कर रहे हैं। पिछले दो-चार हफ्तों का सुप्रीम कोर्ट का एकदम से असरदार रूख अगर देखें, तो भारतीय लोकतंत्र में बस वही काम करते दिख रहा है। संसद और विधानसभाओं में सत्तारूढ़ पार्टियों की मनमानी चल रही है, वहां संविधान की कोई जगह नहीं रह गई है, महाराष्ट्र विधानसभा और राजभवन जैसी जगहें सुप्रीम कोर्ट से खुला टकराव ले रही हैं, अभी कल ही सुप्रीम कोर्ट इस बात पर हक्का-बक्का था कि तमिलनाडु के राज्यपाल किस तरह सुप्रीम कोर्ट के हुक्म को मानने से इंकार कर रहे हैं, किस तरह केन्द्र सरकार मीडिया के तथ्यों की जांच के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाम लगाने के लिए फैक्टचेक यूनिट बना रही थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने रोका है, और सुप्रीम कोर्ट ने कल ही इस बात पर भी हैरानी और अफसोस जताया है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में केन्द्र सरकार ने किस तरह दो सौ नामों में से दो घंटे में दो नाम छांट लिए, अदालत ने इसे चुनाव आयुक्त नियुक्ति कमेटी में सदस्य नेता-प्रतिपक्ष के अधिकारों के खिलाफ माना है। 

इन दिनों चर्चित सबसे बड़े मामले को देखें, तो चुनावी बॉंड के नाम पर जितना बड़ा वसूली-उगाही का फर्जीवाड़ा सामने आया है, उसने अगर देश को अब तक हक्का-बक्का नहीं किया है, तो आने वाले दिनों में जब मीडिया और सोशल मीडिया पर इसका साफ-साफ खुलासा होगा, बार-बार होगा, तो जनता को शायद कुछ हद तक यह समझ आएगा कि किस राजनीतिक दल को किस कारोबारी ने किस वजह से, किस तारीख को कितने करोड़ दिए थे।  इस मामले में स्टेट बैंक ने जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के बहुत साफ-साफ फैसले की बार-बार खिल्ली उड़ाई है, उससे लगता है कि देश का सबसे बड़ा सरकारी क्षेत्र का बैंक केन्द्र सरकार के चपरासी की तरह काम कर रहा था, और उसे सुप्रीम कोर्ट को भी उसकी औकात दिखाने में कोई हिचक नहीं हो रही थी। चुनावी बॉंड से जुड़ी हुई जानकारियां बैंक से निकलवाने में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और पूरी की पूरी बेंच मानो बैंक चेयरमैन की बांह मरोड़ते खड़ी थी, फिर भी बैंक टस से मस नहीं हो रहा था। जब यह समझ आया कि आखिरी चेतावनी पर जानकारी उजागर न करने का मतलब जेल जाना होगा, उस दिन बैंक चेयरमैन ने जानकारी दी, और हलफनामा दिया। 

इससे परे अभी कुछ हफ्ते पहले सुप्रीम कोर्ट में ही सात जजों की संविधानपीठ ने सर्वसम्मति से यह तय किया कि संसद या विधानसभा के भीतर सवाल पूछने या भाषण देने के लिए बाहर रिश्वत लेने वाले सांसदों और विधायकों पर मुकदमे चलेंगे। इससे सुप्रीम कोर्ट की ही पांच जजों की एक संविधानपीठ का तीन-दो के बहुमत से दिया गया 1998 का वह फैसला खारिज हुआ जिसमें सदन के भीतर के कामकाज के लिए बाहर रिश्वत लेने को भी जुर्म नहीं माना गया था। इसी के आधार पर देश में दर्जनों सांसद और विधायक जेल में रहने के बजाय अब तक मजा कर रहे थे। आगे भी देखना होगा कि केन्द्र और राज्य सरकारें अपने पसंदीदा मुजरिम नेताओं को बचाने के लिए और कितने रास्ते निकालती हैं, और क्या हम अपने जीते-जी ऐसे रिश्वतखोर सांसद-विधायक जेल जाते देख पाएंगे। इस तरह पिछले कुछ हफ्तों में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा साफ-साफ जनहिमायती रूख दिखाया है, और सरकार की नाखुशी की परवाह किए बिना लगातार फैसले दिए हैं, जो कि सारे के सारे न्यायसंगत और तर्कसंगत लगते हैं। 

अब सबसे ताजा मामला कल रात दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ईडी द्वारा एक शराब घोटाले के आरोप में गिरफ्तार करने का है। दिल्ली के कुछ दूसरे मंत्री इसी मामले में लंबे समय से जेल में चल रहे हैं, और ऐसा लग रहा है कि ईडी जिस कानून के तहत कार्रवाई करती है, उस कानून में जमानत से रोकना ही सजा है। ईडी के मामलों में सजा तो बहुत ही कम लोगों को होती है, लेकिन अधिकतर लोग महीनों और बरसों तक बिना जमानत पड़े रह जाते हैं, और यही इस कानून के तहत एक ऐसी सजा है जो कि अदालती फैसले के बिना ही हो जाती है। देश भर में यह आम चर्चा है और अधिकतर राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि केन्द्र सरकार की जांच एजेंसियों का निशाना सिर्फ विपक्षी पार्टियों और उनके नेताओं पर रहता है। देश भर में केन्द्र के सत्तारूढ़ गठबंधन के लोगों पर शायद ही कभी कोई कार्रवाई होती है, और लोगों का यह भी कहना है कि विपक्षी पार्टियों में रहते अजीत पवार जैसे जिन लोगों पर कई-कई जुर्म दर्ज हो चुके रहते हैं, वे सत्तारूढ़ गठबंधन में जाते ही खत्म हो जाते हैं। केन्द्र की जांच एजेंसियों को लेकर देश भर में अगर ऐसी साख बन रही है, तो वह भी लोकतंत्र के भीतर एक बहुत बड़ा खतरा है। 

लेकिन हमने पश्चिम बंगाल से लेकर छत्तीसगढ़ तक, बहुत से राज्यों में गैरभाजपा-गैरएनडीए पार्टियों की सरकारों में देखा है कि किस तरह राज्यों की जांच एजेंसियां भी राज्यों में सत्तारूढ़ पार्टियों को नापसंद, उनके विपक्षी नेताओं पर कार्रवाई करती हैं, और जिस तरह इन राज्यों में सत्तारूढ़ नेताओं, और उनको पसंद आला अफसरों के खिलाफ पहले से चल रही गंभीर कार्रवाईयों को भी खत्म कर दिया जाता है। कई राज्य इस तरह राज्यों की जांच एजेंसियों की मनमानी देख रहे हैं। हमने आज की बात की शुरूआत भारतीय लोकतंत्र के एक बड़े हिस्से की नाकामयाबी को लेकर भी की है कि जिन बातों को लेकर मोदी सरकार पर तोहमतें लगातार लगती हैं, अपनी जांच एजेंसियों का ठीक वैसा ही इस्तेमाल कई दूसरी राज्य सरकारें अपने-अपने इलाकों में करती हैं। जिस तरह चुनावी बॉंड को लेकर मोटेतौर पर भाजपा पर वसूली का आरोप लग रहा है, उस तरह की वसूली छोटे पैमाने पर, कम हद तक, टीएमसी, कांग्रेस, और टीआरएस जैसी पार्टियों ने भी की है, और छत्तीसगढ़ तो इस बात की एक बड़ी जलती-सुलगती मिसाल है कि कोई राज्य सरकार किस तरह माफिया अंदाज में उगाही कर सकती है। 

इस तरह अब यह लगता है कि सुप्रीम कोर्ट आज देश में अकेला रह गया है जो कभी चुनाव आयोग पर काबू करता है, तो कभी चुनाव आयुक्त बनाने वाली केन्द्र सरकार पर, कभी वह राजभवनों को पटरी पर लाता है, तो कभी ईडी जैसी जांच एजेंसी को फटकारता है कि वह किस तरह बिना मुकदमे गिरफ्तार लोगों को बिना जमानत जेल में अधिक से अधिक समय तक रखने का काम कर रही है। बहुत सी राज्य सरकारों को भी दूसरे मामलों में सुप्रीम कोर्ट की फटकार पड़ रही है कि वे गलत तरीके से जुर्म दर्ज कर रही हैं, गलत कार्रवाई कर रही हैं। सवाल यह उठता है कि क्या भारतीय लोकतंत्र ऐसी किसी नौबत के हिसाब से बना है कि यहां पर संसद और विधानसभाओं में अपने रिश्वतखोर सदस्यों को बचाने का काम हो, उनके खिलाफ मुकदमे न चलने दिए जाएं, सरकारें पूरी तरह से नाजायज काम करें, राज्यपाल जो कि संविधान की शपथ दिलाते थकते नहीं हैं, वे संविधान के ठीक खिलाफ काम करें, और खुद न्यायपालिका में सुप्रीम कोर्ट के नीचे के कई हाईकोर्ट बहुत ही खराब फैसले देते रहें। क्या भारतीय लोकतंत्र इस तरह चल सकता है? यह बहुत बड़ा सवाल है, और हर पांच बरस में हो रहे मतदान को ही एक कामयाब लोकतंत्र मान लेना बहुत बड़ी गलती होगी क्योंकि यह मतदान भी दर्जनों किस्म के नाजायज और गैरकानूनी प्रभावों के घेरे में रहता है। भारतीय लोकतंत्र पर एक बार फिर सोच-विचार की जरूरत है कि यह चुइंगगम जैसा  हो गया है जिसे हर ताकतवर दांत तरह-तरह से चबाकर थूक सकते हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 मार्च 2024


 

धरती नाम के इस गोले पर लाशों के ढेर पर खुश देश!

 21 मार्च 2024

 

कल अंतरराष्ट्रीय डे ऑफ हैप्पीनेस के मौके पर कुछ शोध संस्थानों की एक मिली हुई सालाना रिपोर्ट जारी की गई जिसमें अलग-अलग देशों में लोगों के खुश रहने, या न रहने के आंकड़े बताए गए हैं। यह इन देशों में किए गए सर्वे के आधार पर है जिनमें अलग-अलग तबकों के लोगों से बात की जाती है, और उन्हें 143 देशों के इस वैश्विक प्रसन्नता सूचकांक में जगह मिलती है। 2012 से आने वाली इस रिपोर्ट में फिनलैंड लगातार सातवीं बार दुनिया का सबसे खुशहाल देश पाया गया है। और भारत 125 देशों के नीचे, 126वीं स्थान पर है, और भारत से कम खुशहाल दुनिया में 20 देश भी नहीं है। तालिबानों के कब्जे वाले अफगानिस्तान में लोग सबसे अधिक नाखुश हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि पाकिस्तान 108वीं जगह पर, जो कि भारत से काफी अधिक खुशहाल आबादी बताता है। भारत के बारे में अलग से जो आंकड़े आए हैं उनके मुताबिक यहां नौजवान सबसे अधिक खुश हैं, और निम्न-मध्यमवर्ग के लोग सबसे कम खुश हैं। भारत में बुजुर्ग मर्द बुजुर्ग औरतों के मुकाबले अधिक संतुष्ट हैं, लेकिन कुछ दूसरे पैमानों पर यह मामला उल्टा भी है। भारत में पढ़े-लिखे, उच्च जातियों के लोग अनपढ़ एसटी-एससी के मुकाबले अधिक संतुष्ट हैं। 

हम आंकड़ों में बहुत अधिक उलझे बिना एक व्यापक मुद्दे पर बात करना चाहते हैं कि जिस वक्त दुनिया के लोगों के खुश रहने या न रहने के बारे में ऐसी रिपोर्ट आ रही है, उस वक्त दुनिया के अलग-अलग देशों का क्या हाल है? फिलीस्तीन पर लगातार हमले करके दसियों हजार लोगों को मार डालने वाला इजराइल इस हैप्पीनेस इंडेक्स में पांचवें नंबर का सबसे खुश बताया जा रहा है। एक हत्यारे देश के लोग अगर सबसे खुश हैं, और उनके ठीक पड़ोस में मलबा बन चुके गाजा में लाशों के बीच लोग भूख से मर रहे हैं, और कुछ किलोमीटर दूर इजराइली अगर दुनिया में ऐसे पांच महीनों के बाद भी दुनिया में पांचवे सबसे खुश व्यक्ति हैं, तो हत्यारे देश के नागरिकों की इस खुशी को क्या माना जाए? अमरीका के लोग अगर दुनिया में 23वें नंबर के सबसे खुश लोग हैं, और अमरीकी मदद से, और उसके वीटो की मेहरबानी से अगर इजराइल यह सामूहिक जनसंहार कर रहा है, तो अमरीकियों की ऐसी खुशी बताती है कि उनके सामाजिक सरोकार क्या हैं? जिस हिन्दुस्तान में आर्थिक कामयाबी का जलसा मनाया जा रहा है, वहां गरीबों और अमीरों के बीच फासला कैसा भयानक है, यह भी देखने की जरूरत है। कल ही वल्र्ड इन इक्विटी लैब की दुनिया में आर्थिक असमानता की रिपोर्ट आई है जिसके मुताबिक हिन्दुस्तान की सबसे अमीर एक फीसदी आबादी की राष्ट्रीय कमाई में हिस्सेदारी बढ़ गई है, और देश की संपत्ति में भी। यह रिपोर्ट बताती है कि पिछले सौ साल में पहली बार ऐसा हुआ है। रिपोर्ट का नाम ही 1922-2023 : अरबपति राज का उदय रखा गया है। इसमें बताया गया है कि पिछले एक दशक में देश में यह फासला बहुत तेजी से बढ़ा है। 

लेकिन हम आंकड़ों में अधिक उलझना नहीं चाहते हैं, और यह देखना चाहते हैं कि देश की एक व्यापक तस्वीर क्या बन रही है? दुनिया में आज यूक्रेन के लोग एक तरफ रूसी हमले से मारे जा रहे हैं, दूसरी तरफ अमरीका और योरप के फौजी संगठन नाटो की तरफ से यूक्रेन को लगातार दी जा रही फौजी मदद की वजह से रूस के मोर्चे पर बड़ी संख्या में यूक्रेनी मारे जा रहे हैं, और कुछ लोगों का यह भी मानना है कि नाटो और पश्चिमी देश यूक्रेन में एक प्रॉक्सी वॉर लड़ रहे हैं, और वे यूक्रेन के कंधों पर बंदूक रखकर रूस को खोखला कर रहे हैं, अपने किन्हीं सैनिकों का लहू बहाए बिना। अब रूस के साथ यह लड़ाई नाटो देशों की परदे के पीछे की लड़ाई ही क्यों न हों, हर दिन यूक्रेन और अधिक खोखला हो रहा है, और पश्चिम की फौजी रणनीति के मुताबिक रूसी सेनाएं भी हर दिन नुकसान उठा रही हैं। क्या यह नाटो की रूस को खोखला करने की एक योजना है जिसमें कई किस्म की मदद देकर यूक्रेन की कुर्बानी दी जा रही है?

इससे परे अगर देखें तो 20 बरस राज के बाद अमरीका जिस तरह से अफगानिस्तान को बेसहारा छोडक़र निकला है, तो वहां पर तालिबानी राज में महिलाओं की हालत 20 बरस पहले के मुकाबले अधिक खराब है, और अमरीका अपनी फौजी नाकामयाबी के बाद वहां से मुंह चुराकर भाग निकला है। दूसरी तरफ सीरिया, इराक, जैसे बहुत से देश हैं जो लगातार अमरीकी हमलों के शिकार रहे, और ऐसे देशों के लोग योरप में शरण पाने के लिए लाखों की संख्या में इन बरसों में निकले हैं, और उनमें से दसियों हजार लोग समंदर में डूबकर मारे गए हैं। किसी देश पर जंग या हमले को थोप देना, और फिर वहां के लोगों को भूखों मरने के लिए छोड़ देना, या कि आतंकियों के रहमोकरम पर छोड़ देना, अगर ऐसे मुजरिम देशों के लोग भी अपने देशों में खुश हैं, और हैप्पीनेस इंडेक्स में ऊपर हैं, तो जाहिर है कि उनकी खुशियों में तथाकथित इंसानियत का कोई योगदान नहीं है। 

हम दुनिया की आर्थिक असमानता की रिपोर्ट, और हैप्पीनेस इंडेक्स को मिलाकर देखते हैं तो लगता है कि तथाकथित इंसानियत का जमाना खत्म हो चुका है, और अब लोग अपने देश के भीतर एक अलग किस्म के मूल्यों को लेकर खुशहाल हैं, और बाकी दुनिया से उनके सरोकार नहीं दिखते हैं। आज की ही रिपोर्ट है कि सूडान बहुत बुरी तरह भुखमरी से घिर गया है, और जिस तरह फिलीस्तान के गाजा में खाने को कुछ नहीं रह गया है, और दसियों लाख लोग भुखमरी की कगार पर है, उसी तरह सूडान में भी चल रहे घरेलू संघर्ष की वजह से वहां दुनिया की सबसे बड़ी भुखमरी की नौबत है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि हाल के बरसों में सूडान दुनिया में भुखमरी का सबसे बड़ा उदाहरण बन रहा है, और वहां पर पौने दो करोड़ से अधिक लोग खाने की कमी से गुजर रहे हैं क्योंकि साल भर से वहां गृहयुद्ध चल रहा है। इसके अलावा अफगानिस्तान, कांगो, इथियोपिया, पाकिस्तान, सोमालिया, सीरिया, और यमन में भुखमरी की नौबत है। 

जहां लोगों के पास अगला खाना नहीं, बल्कि पिछले कई खाने नहीं रह गए हैं, भूख की थप्पी बनती चली जा रही है, वहां का हाल देखते हुए यह अंदाज लगाना मुश्किल पड़ता है कि दुनिया के दूसरे हिस्सों में लोग खुशहाली के इंडेक्स पर लगातार बने रहने की खुशियां मना रहे हैं। यहां पर हम सबसे खुशहाल देशों के लोगों की खुशी के पीछे की एक वजह पर चर्चा करना चाहते हैं, कि वहां के कम से कम एक देश के लोग अपनी खुशियों को बांटने में अधिक खुशी पा रहे हैं। दुनिया को यह समझना चाहिए कि धरती के इस गोले की सतह पर अलग-अलग हिस्सों में बसे हुए एक ही किस्म के इंसान अगर भूख से मर रहे हैं, फौजी हमलों में बदनों के टुकड़े हो रहे हैं, पूरे के पूरे देश को खत्म कर दिया जा रहा है, तो ऐसे गोले पर दूसरे हिस्सों में कुछ देश अगर खुशियों और संपन्नता का जलसा मनाते हैं, तो फिर धरती नाम का यह गोला दूसरे ग्रह के लोगों के हमलों के लायक है, दूसरे ग्रह के उन प्राणियों में हो सकता है कि धरती के इंसानों के मुकाबले इंसानियत कुछ अधिक हो। दसियों हजार फिलीस्तीनी लाशों के बगल में अगर इजराइली जनता दुनिया में पांचवें नंबर की सबसे खुश है, तो फिर एक वक्त इन्हीं यहूदियों की नस्ल को खत्म करने के लिए दसियों लाख कत्ल करने वाले हिटलर की खुशी को भी इतिहास में देखना चाहिए, हालांकि उसके वक्त हैप्पीनेस इंडेक्स बना नहीं था। 

(Daily Chhattisgarh)

पुलिस को जज-जल्लाद भी बना देना लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक...

  20 मार्च 2024

 

मुम्बई पुलिस के एक चर्चित और विवादास्पद मुठभेड़ विशेषज्ञ प्रदीप शर्मा को बाम्बे हाईकोर्ट ने एक बेकसूर के कत्ल के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाई है। इस मामले में प्रदीप शर्मा के साथ-साथ अदालत ने 12 अन्य पुलिसवालों को भी उम्रकैद दी है। यह फैसला 2006 में हुए एक कत्ल का है जिसमें छोटा राजन गिरोह के एक गुंडे को प्रदीप शर्मा और उनकी टीम ने मुठभेड़ के नाम पर साजिशन मार गिराया था। उस वक्त मुम्बई में अंडरवल्र्ड के बीच ऐसी लड़ाईयां चलती रहती थीं, और यह चर्चा भी रहती थी कि किस तरह मुम्बई पुलिस के कुछ मुठभेड़ विशेषज्ञ अफसर एक गिरोह के लिए भाड़े पर काम करते हुए दूसरे गिरोह के लोगों को मार गिराते थे। बाद में जब ऐसे एनकाउंटर स्पेशलिस्ट कहे जाने वाले अफसर बहुत अधिक चर्चित हो गए, तो उनमें से कई लोग जमीन-जायदाद खाली करवाने का ठेका लेने लगे, और मुम्बई के करोड़पतियों-अरबपतियों से कई और तरह की वसूली-उगाही करने लगे। निचली अदालत ने प्रदीप शर्मा को पूरी तरह छोड़ दिया था, लेकिन हाईकोर्ट की दो महिला जजों की बेंच ने इस जुर्म को पूरी तरह सही पाया, और यह सजा सुनाई है। इस एक फैसले से यह साफ होता है कि किस तरह जब पुलिस को मनमानी करने की आजादी मिलती है तो उसके खतरनाक नतीजे होते हैं। 

हमने बात शुरू तो मुम्बई पुलिस से की है लेकिन यह हिन्दुस्तान जैसे लोकतंत्र में बहुत सी जगहों पर दूसरे हालात में भी देखने मिलता है कि जब सरकारी वर्दी को मानवाधिकार खत्म करने की छूट मिलती है, तो वह किस खतरनाक नौबत तक पहुंच जाती है। हमने कश्मीर, उत्तर-पूर्व, पंजाब जैसे बहुत से आतंक और उग्रवाद प्रभावित इलाकों को देखा है कि वहां पर राज्य की पुलिस या वहां तैनात अर्धसुरक्षा बल किस तरह मनमानी करने लगते हैं, और आतंकग्रस्त इलाकों में हिंसा पर काबू पाने के लिए सरकारी ताकतें अपनी बंदूकों को इस तरह की छूट भी दे देती हैं जिससे किसी तरह हालात पर काबू पाया जा सके। इन सरहदी राज्यों से परे छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में भी हमने देखा है कि जहां नक्सल प्रभावित बस्तर में पुलिस और दूसरे सुरक्षाबलों की लगातार, लंबी, और बहुत बड़ी मौजूदगी कई किस्म के मानवाधिकार खत्म करती है। दुनिया में जहां कहीं हिंसक और हथियारबंद टकराव लंबा चलता है, उन तमाम जगहों पर सरकारी बंदूकें भी लोगों के बुनियादी हकों को कुचलने की आदी होने लगती हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर में तो हुए एक बड़े  सारकेगुड़ा हत्याकांड की 2012 में की न्यायिक जांच से यह भी साबित हुआ है कि वहां मौजूद पुलिस ने 17 बेकसूर और निहत्थे आदिवासियों को बैठकर एक त्यौहार की तैयारी करते हुए घेरा, और मार डाला। पिछली भूपेश सरकार के वक्त यह जांच रिपोर्ट आ गई थी, लेकिन अफसोस यह है कि उसके बाद भी इस रिपोर्ट पर सरकार ने आगे कोई कार्रवाई नहीं की है। न्यायिक जांच रिपोर्ट में यह लिखा गया कि इन 17 लोगों को नक्सली बताने का पुलिस का दवा बिल्कुल फर्जी था। बस्तर में आदिवासियों की मदद करने के लिए काम कर रही कुछ महिला वकीलों ने इस मामले में आदिवासियों की मदद की थी, और अदालत में उनका केस लड़ा था, बाद में न्यायिक जांच की रिपोर्ट आने पर भी सरकार ने आगे कोई कार्रवाई नहीं की। 

इसलिए मुम्बई जैसे महानगर से लेकर बस्तर के जंगलों में बसे हुए गांवों तक, जहां कहीं सरकारी वर्दियों को मनमानी की छूट मिलती है, वे कातिल हो जाती हैं। यह बात समझने की जरूरत है कि लोकतंत्र में पुलिस और सुरक्षाबलों के ऊपर आने वाली जिम्मेदारी छोटी नहीं रहती है, इसी तरह अदालतों में किसी हथियारबंद आंदोलन के खिलाफ कुछ साबित करना भी आसान नहीं रहता है। लेकिन इतना जरूर रहता है कि अदालत के लंबे और थका देने वाले सिलसिले के बाद इंसाफ की कुछ उम्मीद बनती है। खासकर जिन मामलों में लोगों को सजा होती है, वे सचमुच ही गुनहगार रहने की संभावना रखते हैं। भारतीय न्याय व्यवस्था में कई गुनहगार छूट सकते हैं, लेकिन बेगुनाह के फंसने की गुंजाइश कम रहती है। ऐसे ही अदालती हाल को देखकर देश के बहुत से लोगों को लगता है कि पहली नजर में जो मुजरिम दिख रहे हैं उन लोगों को मुठभेड़ में मार दिया जाना चाहिए। उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में हम इस बात को देख रहे हैं जहां भाजपा के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पुलिस बात-बात में मुठभेड़ कर रही है, और उसे मुठभेड़ में मारा जाना बता रही है। लोगों का अंदाज है कि पुलिस बेरहमी से और सोच-समझकर लोगों को मारती है जिसे मुठभेड़ में मौत की तरह दर्ज किया जाता है। 

जब लोगों के सामने मुठभेड़-हत्या जैसे आसान और तुरत-फुरत दिए जाने वाले फैसले और सजा का एक विकल्प पेश किया जाता है, तो धीरे-धीरे लोगों को यही तरीका ठीक लगने लगता है। अदालतों में दस-बीस बरस फैसले का इंतजार करने के बजाय लोगों को लगने लगता है कि बुलडोजर लेकर किसी आरोपी के घर-दुकान को तुरंत गिरा देना चाहिए, और आरोपी को भी भागने की कोशिश में बताते हुए मार डालना चाहिए। लोगों के बीच ऐसी आदिम हिंसा दसियों हजार बरस पुरानी है, और लोकतंत्र का बोझ उनकी समझ पर पिछली पौन सदी का ही है। इसलिए पहला मौका मिलते ही लोग फिर पत्थरयुग की सोच पर पहुंचने को आसान समझते हैं। उन्हें लोकतंत्र की लचीली न्याय व्यवस्था पसंद आना तेजी से बंद हो जाता है, और जब तक वे उसके निशाने पर नहीं आ जाते, तब तक वे मुठभेड़-हत्याओं की तारीफ में डूबे रहते हैं। 

मुठभेड़-हत्याओं और सुरक्षाबलों की हिंसा, मानवाधिकारों को कुचले जाने के खिलाफ लोगों की जागरूकता और समझ के लिए लोकतंत्र की एक बुनियादी समझ जरूरी है जो कि कुछ मुश्किल बात है। अदालत से दस-बीस बरस बाद सजा होने के बजाय लोगों को यह बेहतर लगता है कि जिस पर शक हो उसे चौराहे पर घेरकर पत्थरों से मार डाला जाए। इस किस्म का तालिबानी इंसाफ लोगों को तब तक सुहाता है जब तक कि वे पत्थरों के निशाने पर न रहें। जिस तरह तालिबानी राज में औरतों और मर्दों को चौराहों पर कोड़े लगाए जाते हैं, हिन्दुस्तान में भी अगर जनमत संग्रह कराया जाए, तो बहुत से लोग इसी किस्म का इंसाफ पसंद करेंगे, क्योंकि इन मामलों में सजा पाने वाली पीठ उनकी अपनी नहीं रहती है। जब पुलिस को हिंसक और गैरकानूनी काम करने की छूट दी जाती है, तो वे महाराष्ट्र के कई चर्चित एनकाउंटर स्पेशलिस्ट की तरह हो जाते हैं। यह सिलसिला लोकतंत्र में बहुत खतरनाक है, और फिल्मों की तरह जब असल जिंदगी में भी जनता मौके पर किए गए ऐसे इंस्टेंट नूडल्स सरीखे इंसाफ की प्रशंसक हो जाती है, तो लोकतंत्र बहुत कमजोर हो जाता है। ऐसी नौबत से बचने की जरूरत है। 

(Daily Chhattisgarh)