24 जून 2013
उत्तराखंड की तबाही में जिन लोगों को सरकार की छोटी-छोटी खामियां बड़ी-बड़ी दिख रही हैं, उनमें मीडिया के लोग अधिक हैं, और कांगे्रस विरोधी लोग अधिक हैं। इसी कांगे्रस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के मातहत आने वाली सेना ने जिस तरह से रोज पांच-पांच, दस-दस हजार लोगों को हेलिकॉप्टरों से वहां से निकाला है वह भी देखने लायक है। और जाहिर है कि इस काम में राज्य सरकार की भी कुछ न कुछ हिस्सेदारी रही होगी। लेकिन इन दोनों में से किसी सरकार के कामकाज को लेकर कोई सफाई देना या उनका बचाव करना हमारी दिलचस्पी का आखिरी काम होगा। आज इस बात का मुद्दा कुछ और ही है।
भारत की सेना के कामकाज को टीवी की खबरों में देख-देखकर लोग उसकी तारीफ करने में डूबे हुए हैं। रात-दिन फौजी वर्दियां दिख रही हैं, और कहीं सैनिक बूढ़ों को गोद में उठाकर नदी पा कर रहे हैं, तो कहीं बच्चों को कंधों पर चढ़ाए हुए। कुल मिलाकर आज का माहौल ऐसा है कि आस्थावानों का ईश्वर जिस तबाही को रोक नहीं पाया, उस तबाही से लोगों को भारत की सेना बचा रही है। यह एक अच्छी बात है कि आज देश में लोगों को कोई एक ऐसा तबका मिल रहा है जिस पर जनता का भरोसा बन रहा है, और जनता के मन में उसके लिए इज्जत बनी हुई है, बढ़ रही है।
यह देश पूजा पर भरोसा करने वाला है। यही वजह है कि केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे तीर्थों में, और वहां आते-जाते हुए पहाड़ी रास्तों पर दसियों हजार लोग इस तरह फंसे हैं। अगर सिर्फ सैलानी होते तो वे इतनी मुश्किल जगह पर गए ही क्यों होते, वे इससे कम मेहनत पर बद्री-केदार के मुकाबले किसी दूसरी जगह पहुंच जाते। ऐसे पूजावादी देश में लोगों की पूजा में भी जुट जाते हैं, एक वक्त वे गांधी-नेहरू, फिर जयप्रकाश नारायण, फिर वीपी सिंह, फिर अन्ना-बाबा, केजरीवाल, ऐसे कई लोगों की पूजा अलग-अलग वक्त पर, अलग-अलग वक्त के लिए, अलग-अलग श्रद्धा-भक्ति से लोग करते दिखते हैं। आज लोग भारतीय सेनाओं को एक राष्ट्रीय गौरव के लायक पा रहे हैं। यह एक अच्छी बात है कि चारों तरफ से बुरी खबरों वाले देश में लोगों को कुछ अच्छा भी मिले, कुछ अच्छा भी लगे।
मेरे दिमाग में कल से जो बात घूम रही है वह यह कि देश के आधा दर्जन राज्यों में नक्सल मोर्चों पर जो पुलिस और सीआरपीएफ जैसे अर्धसैनिक बलों के जवान लगे हुए हैं, और दस-दस बरसों से तैनात हैं, जो लगातार वहां पर थोक में जान खो रहे हैं, क्या उनके बारे में देश को कभी इस किस्म के गौरव की सूझी? ये सारे वर्दीधारी-बंदूकधारी लोग इन मोर्चों पर अपनी पसंद से नहीं गए हैं। अपने घरवालों को छोड़कर किसी को भी बारूदी-सुरंगों के धमाकों में अपने बदन के टुकड़े करवाना नहीं सुहाता, न ही लोगों को नक्सलियों की गोलियां अपनी छाती के भीतर गुदगुदी करते लगतीं, न ही पुलिस-सीआरपीएफ मानसिक बीमारी की शिकार हैं कि उनको जाकर नक्सलियों को मारने में मजा आता है, न ही ये लोग इस कल्पना का मजा लेते होंगे कि जब गले कटे हुए, आंखें बाहर निकली हुईं उनकी लाशें घर पहुंचेंगी तो घरवालों को कैसा लगेगा।
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| छत्तीसगढ़ |
एक बहुत ही मुश्किल मोर्चे पर लाख या लाखों जवानों की तैनाती के बरस-दर-बरस गुजरते जा रहे हैं, रात-दिन सिर पर जान का खतरा सवार रहता है, हर कदम धमाके की आशंका रहती है, और इनमें से कोई भी तभी खबरों में आता है जब वह या तो किसी को मार देने के आरोप से घिरा होता है, या फिर खुद मर चुका होता है। लेकिन इस पूरे मोर्चे पर डेढ़ दशक गुजर जाने के बाद भी इनमें से किसी को हीरो का वह दर्जा नहीं मिला जो कि पिछले एक हफ्ते में उत्तराखंड में फौजियों को मिला है। कुछ वर्दियों की की हुई ज्यादती जब खबरों में आती है तो देश ऐसी तमाम वर्दियों को हिकारत से देखता है। लेकिन जब इनकी जानें थोक में जाती हैं, तो कोई हमदर्दी हफ्ते भर बाद भी नहीं बची रहती।
अब चूंकि दोनों ही इसी देश के लोग हैं, दोनों ही वर्दीधारी हैं, इसलिए इन दोनों की तुलना यहां पर इस खास पहलू को लेकर की जानी चाहिए कि इनके योगदान क्या हैं और उनको लेकर इनको कैसी इज्जत मिलती है, मिल रही है।
सेना के जो लोग उत्तराखंड में बचाव में लगे हैं, उन पर मोटे तौर पर जान का कोई खतरा टंगा हुआ नहीं है। वे ऐसे मुश्किल काम को करने के आदी भी हैं, और दुश्मन मोर्चे पर लड़ाई की तैयारी करते हुए वे कई-कई दिनों तक ऐसे मुश्किल हालात में जीते भी हैं। देश की सरहदों पर वे बर्फीली पहाडिय़ों पर महीनों गुजारते हैं, और कारगिल जैसे इलाके में तैनाती के दौरान बहुत बार वे बर्फीले तूफानों मे दबकर शहीद भी हो जाते हैं। उन मोर्चों के मुकाबले आज का उनका बचाव का काम, बहुत आसान है। वे रात-दिन पूरे वक्त शायद काम कर रहे होंगे, लेकिन ऐसी मुसीबत के वक्त न सिर्फ सेना बल्कि पुलिस भी, बहुत सी जगहों पर डॉक्टर भी, अपने सहयोगियों के साथ ऐसे ही रात-दिन काम करते हैं। इसलिए सेना का यह काम आज उनको जो वाहवाही दिला रहा है, वह बचे हुए लोगों के दिल से निकलती दुआ और उसके उपग्रह प्रसारण की वजह से है।
लेकिन देश के नक्सल मोर्चों पर मच्छरों के काटे मलेरिया से, या नक्सलियों के धमाकों से, उनकी गोलियों से, उनके कुल्हाड़ों से कटते अपने गलों से, जो जवान जान खो रहे हैं, वे देश को कोई नायक नहीं लग रहे। वे हीरो नहीं गिने जा रहे। उनकी वजह से आज नक्सली जंगलों तक रूके हुए हैं, वे अपनी जान गंवाकर उनको रोकने के लिए तैनात न हों तो वे शहरों और राजधानियों में पहुंच जाएं, लेकिन ऐसे अनगिनत ताबूत भी इस देश में पुलिस-सीआरपीएफ को उत्तराखंड में तैनात सेना की तरह का सम्मान नहीं दिला पाते, आज तक नहीं दिला पाए।
दरअसल मीडिया का बनाया हुआ माहौल जब लोगों के सामने आंसुओं का सैलाब पेश करता है, तो कुछ लोग नायक दिखने लगते हैं, और कुछ लोग खलनायक। और फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के धंधे की एक यह आसान तरकीब है कि लोगों के सामने एक ऐसी तस्वीर पेश की जाए जिसमें एक खूब अच्छा दिखे और एक खूब बुरा। कभी अरविंद केजरीवाल और शीला दीक्षित, कभी सरकार और सेना, कभी पुलिस और आदिवासी, कभी मोदी और अडवानी। ऐसे एक बहुत ही विपरीत रंगों वाली तुलना के बिना टीवी के परदों पर वह नाटकीयता नहीं आ पाती, जो कि एक संतुलित हकीकत होनी चाहिए। दरअसल संतुलन की पूरी बात ही नाटकीयता को खत्म कर देती है, और उसके साथ-साथ टीवी की चौंकाने और बांधने वाली संभावना भी खत्म हो जाती है। इसलिए आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने अपने दर्शकों को बांधे रखने के लिए किसी एक को गब्बर और किसी एक को वीरू की तरह पेश करना जरूरी है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को गब्बर की तरह का दिखाना है तो वीरू फौजी वर्दी में मौजूद है। सरकार मानो कुछ भी नहीं कर रही है, और फौज सब कुछ कर रही है।
यह नाटकीयता, और सोची-समझी नाटकीयता बहुत अधिक लोगों को समझ नहीं आती। आज भी हिंदुस्तान की आबादी का एक बड़ा हिस्सा टीवी पर आई हुई हर बात को हकीकत इसलिए मान बैठता है क्योंकि वह तस्वीरों और आवाज के साथ रहती हैं। और जब यह टीवी नाटकीयता पर टिका होता है, तो नक्सल मोर्चों पर जान देते हुए पुलिस और बाकी जवान वह नाटकीयता पैदा नहीं कर पाते, और किसी को मार देने के आरोपों में फंसने पर मुजरिमों की तरह, या नक्सल मोर्चे पर मारे जाने पर शहीदों की तरह वे खबरों के एक दिन के बुलेटिन में कुछ मिनटों के लिए आते हैं, और हवा में खो जाते हैं।
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| उत्तराखंड |
आज उत्तराखंड में लोगों को बचाने का काम कर रही सेना ने खूब मेहनत की है, उसके सैनिक तारीफ के हकदार भी हैं, लेकिन उनके मुकाबले हजार गुना अधिक खतरा उठाकर जो लोग नक्सल इलाकों में सालों तक तैनात रहते हैं, उनको भी शायद यह देश, देश का वह हिस्सा किसी तारीफ का हकदार माने जो हिस्सा आज उत्तराखंड में वर्दियों पर फिदा है। अपने ही देश के भीतर इस तरह, और इस हद तक, अनदेखा रहकर नक्सल मोर्चों पर लोकतंत्र के लिए कुर्बान होते लोगों के मन में यह बात जरूर आ रही होगी कि क्या उनके ताबूत में पहुंच जाने के बाद ही उनको यह देश देश पाएगा?
इसी देश की कुछ वर्दियों के लिए लोगों के मन में हिकारत इस तरह से पनपती है, मानो वे निशानेबाजी के लिए नक्सल-जंगलों में पहुंचे हुए शौकिया शिकारी हों। और बिना ऐसे किसी खतरे को उठाए, बाढ़ में, पहाड़ों पर, फंसे हुए लोगों को बचाने वाले हीरो के लिए लोगों के मन में हमदर्दी है कि वे ही हैं कि इतनी जानें बच पाईं।
लोकतंत्र को बचाने के लिए कुर्बान होते वर्दीधारियों के एक तबके की राष्ट्रीय-अनदेखी की इस नौबत के लिए कुसूरवार कौन है? जनता या मीडिया?