संपादकीय
25 फरवरी 2012

खडगपुर में पुलिस ने एक लड़की और उसके प्रेमी की ऑनर किलिंग के आरोप में उसके माता-पिता, भाई और चाचा को गिरफ्तार किया। 18 बरस की यह लड़की अपने प्रेमी के साथ खेतों में मरी मिली, तब माना गया कि शायद प्रेमी जोड़े ने घरवालों से मंजूरी न मिलने के डर से आत्महत्या कर ली। लेकिन जांच से पता चला कि लड़के और लड़की की मौत के बीच 4-5 दिनों का अंतर था, और उन्हें मारने के बाद आत्महत्या की शक्ल देने के लिए उनकी लाशें खेतों में फेंक दी गई थी। दो दिन हुए गुजरात में शादी से एक दिन पहले एक लड़के ने अपनी प्रेमिका के साथ रेल के आगे कटकर जान दे दी। महाराष्ट्र में एक शहर सतारा में, एक महिला के अपनी जाति से बाहर के व्यक्ति से शादी करने के बाद उसकी ऑनर किलिंग के बाद, वहां के दर्जन भर संगठनों ने मौन मार्च निकालकर घरेलू हिंसा सहती महिलाओं के लिए हेल्प लाईन शुरू करने की मांग की। लेकिन सतारा में या किसी और जगह हेल्पलाईन शुरू हो ही जाने से क्या फर्क पड़ जाएगा? जो समाज दिन ब दिन इतना कट्टर होते जा रहा है कि झूठी शान की खातिर अपने घर आंगन में पली बड़ी हुई बेटी का बेरहमी से कत्ल करते हुए उसके हाथ भी नहीं कांपते, उसे किसी भी कानून से क्या फर्क पड़ेगा। ऑनर किलिंग अब केवल हरियाणा, राजस्थान, तमिलनाडु या झारखंड की बपौती नहीं बचा है, यह रोग पूरी दुनिया में फैल चुका है। खासकर उन देशों में, जहां एशियाई आबादी रहती है।
ब्रिटेन जैसे देशों की पुलिस अपनी ही औलादों को इस तरह मारने की ऐसी घटनाओं से हक्का बक्का है, क्योंकि उनके कानून की किसी धारा में ऑनर किलिंग जैसा जुर्म ही शामिल नहीं है। अपनी औलादों को अपनी मिल्कियत समझते दंभी माता-पिता और रिश्तेदारों का हौसला, लचर कानून व्यवस्था, वोटों की सौदेबाजी में बिक चुकी राजनीतिक इच्छाशक्ति, और एक दंभी समाज में दिन ब दिन बढ़ता ही जा रहा है। यह एक सामाजिक सोच की समस्या है, जिसका कानूनी हल निकाला नहीं जा सकता, क्योंकि हम देख रहे हंै कि सामाजिक सोच तो खादी के कुर्तों और खाकी वर्दी पर भी चढ़ी बैठी है। यह अपने से अलग राय रखने वाले को धमकी, और फिर मार कर चुप कर देने की एक वहशियत है। सोच, और रवैये में से उदारता की गुंजाईश पूरी तरह खत्म कर देने के लिए किया जा रहा मार्च है, जिसे कानून की कोई परवाह नहीं है। दुख की बात यह है, कि कब्र में पांव लटकाए बैठे बुज़ुर्गों ने अपनी विरासत सम्हालने के लिए नई पीढ़ी को भी राजी कर लिया है। इसलिए आए दिन भाई, बहनों, और उनके प्रेमियों की हत्या शान से करते दिखते हैं। देश की सबसे ऊंची अदालत उदारता की दुहाई दे देकर थक गई है, लेकिन कानून बनाने, और उसे अमल करने का फर्क दो दिन पहले ही सर्वोच्च न्यायालाय में तब दिखा, जब अदालत ने दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से समलैंगिक संबंध को सही ठहराया, कहा- अपराध के लिए किसी का शिकायत करना जरूरी है, जब शिकायत ही नहीं, तो अपराध कहां हुआ, तो केन्द्र सरकार ने सामाजिक परम्पराओं और सोच की दुहाई दी। इसके पहले भी दक्षिण भारतीय अभिनेत्री खुश्बू ने सालों तक समाज के ठेकेदारों का सामना कर के सर्वोच्च न्यायालय में जीत दर्ज की है, और सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी बात का समर्थन करते हुए कहा कि दो व्यक्तियों के बीच आपसी सहमति से हुए संबंध में कोई बुराई नहीं, उसने दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से हुए लिव इन संबंधों में भी कोई बुराई नहीं देखी। इतना ही नहीं, अदालत संबंधित पक्षों से समलैंगिकता संबंधी कानून पर व्यापक और उदार नजरिये से बहस करने को कह रही है।
लेकिन इसके उल्टे हम देखते यह हंै कि कानून पर अमल करने वाली एजेंसियां, देश की अदालतों के आदेशों की कोई परवाह नहीं करती, पार्कों में, होटलों में लड़के-लड़कियों को साथ देखकर उनके भीतर बैठा दम्भी समाज जाग उठता है, और वह ऐसे जोड़ों को कभी दौड़ा दौड़ाकर मारती है, कभी उनके मुंह पर कालिख पोतती है, तो कभी राखी बंधवा कर भाई-बहन का रिश्ता कायम करने पर मजबूर करती है। होटलों में लड़के-लड़कियां एक साथ अगर रुकंे, या एक कमरे में पाए जाएं ,तो उन्हे वेश्यावृत्ति के जुर्म में पकड़ लिया जाता है। जैसे नजरिये में उदारता और व्यापकता का जिम्मा केवल अदालतों का है, कानून लागू करने वाली एजेंसियां तो लकीर पीटने के लिए ही बनी है। ऐसा इसलिए है कि देश में आज कोई दमदार नेतृत्व नहीं है जो अपने स्वार्थ से परे उठकर समाज के लिए जो सही है, उसकी बात कर सके। आज यहां कोई राजाराम मोहन राय नहीं है जिन्होंने कभी विधवा विवाह की बात करने की हिम्मत की थी, आज तो यहां नवीन जिंदल, और ओम प्रकाश चौटाला हंै, जो संकीर्ण पुरातनपंथी नजरिये की हामी खाप पंचायतों के कदमों पर नतमस्तक है, क्योंकि उनके हाथ में इनके वोट बैंकों की चाभी है, जबकि जरूरत वोट के लिए मतदाता के तलवे चाटने की नहीं, उसके सामने कड़वा सच कहने की है। यह राजनीतिज्ञ ऐसे डॉक्टर हैं, जो अपने फायदे के लिए मलेरिया के मरीज को कुनैन खिलाकर चंगा करने की बजाए अपनी दूकानदारी चलाने के लिए उसे चाकलेट खिलाकर बीमार ही बनाए रखने में लगे हैं। सूचना क्रांति के इस जमाने में जब लड़के-लड़कियां पुराने दम्भ छोड़कर अपनी भावनाओं के लिए ईमानदार होना चाहते हंै, कभी कोई उनके पहनावे में बुराई ढूंढता है, तो कभी टी वी में,तो कभी मोबाईल को दोष दिया जाता है।
अपने गिरेबान में झांकना न तो यह कथित बुजुर्ग जरूरी समझते हंै, न ही उनकी चापलूसी में जुटे नेता, और न ही नेताओं को खुश करने में लगे पुलिस और प्रशासन। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय की उदार नजरिये के लिए बार-बार दुहाई देने से भी क्या फर्क पडऩा है? यह पीढिय़ों की सोच के बीच अंतर की नहीं, अपने अपने स्वार्थ की बातें हंै, जिनके चक्कर में देश के आजादी, उदारता और सच्चाई दम घोंट रही है। चूंकि माता-पिता के हाथ में पुश्तैनी जमीन जायदाद है, समाज का समर्थन है इसलिए वह बच्चों पर अपनी मनमानी थोपना चाहते हंै, अपनी जिंदगी जी लेने के बाद अपने बच्चों की जि़ंदगियां भी वह जी लेना चाहते हैं। ऐसे परजीवी माता-पिता के हाथ मजबूत करती है। वह पुलिस और प्रशासन जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश की चिंदिया फाड़कर उन्हें हवा में उड़ा देता है, और बेहद संकीर्णता दिखाते हुए वयस्क लड़के-लड़कियों से निपटता है। इन्हें शह मिलती है उन नेताओं से जो जाति विशेष के वोट पाने के लिए उसके ठेकेदारों की जी हुजूरी में लगे रहते हंै।
नजरिये का यह दोष, सोच की यह खामी, सिर्फ जीवन के इस एक पहलू तक ही सीमित नहीं रहेगी , इससे दूसरे पहलू भी प्रभावित होंगे, और हो रहे हैं नाइंसाफी, बेइमानी। झूठी शान फैल रही है जिसमें हर एक का नुकसान है। क्या इज्जत की खातिर अपने बच्चों की जान ले लेना माता-पिता के लिए जीवन की सबसे बड़ी हार नहीं है? उनके गलत काम की वाहवाही करने वाले, क्या कभी उनके जीवन में बच्चों की मौत के बाद पनपे खालीपन को भर सकते हैं? क्या ईमानदारी से सबके सामने बगीचे या होटल में मिलने वाले लड़के-लड़कियों को मारने पीटने से वह छिपकर मिलने और गंभीर खतरों में नहीं पड़ सकते हंै समाज के डर से किसी निर्जन स्थान मे मिलने वाले लड़के लड़कियों के साथ कितने ही हादसे होते हंै, तब पुलिस एक कथित सामाजिक बुराई को रोक कर दूसरे कई जुर्मों की गुंजाईश पैदा नहीं करती है? गलत सोच का अंजाम हर मामले में गलत निकलेगा। एक चाकू की धार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि उससे तरकारी कट रही है, या गला। देश की अदालतें इस गंदगी को रोकने में अपनी भूमिका पूरी तरह निभा रही है अब राजनीतिक नेतृत्व का जिम्मा है कि वह पहल करे, हिम्मत दिखाए और इस सच का सामना करे, कि देश को उसकी अवसरवादिता के नहीं समाज के झूठे दम्भ की नहीं, ईमानदारी और हिम्मत की जरूरत है।