गंगा में बाढ़ आने का राज है उसके आँसू

28 फरवरी 2025 

 

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट, सीएसई के एक कार्यकम में कल खुलासे से यह बताया गया कि राजधानी दिल्ली में यमुना के पानी में गंदगी मिलने के पीछे कौन सी वजहें हैं। इसका वैज्ञानिक अध्ययन और विश्लेषण देखकर यह हैरानी होती है कि जिन मामलों को दिल्ली में बैठी हुई राज्य और केंद्र सरकारें दोनों देखती हैं, स्थानीय म्युनिसिपलें भी जिसके लिए जिम्मेदार हैं, जहाँ का हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल लगातार जिसे देखता है, उस यमुना का यह हाल कर रखा है। यह विश्लेषण बताता है कि किस तरह गंदे पानी को साफ़ करने के लिए लगाए गए एसटीपी कितने नाकाफ़ी हैं, और बिना साफ़ किया हुआ पाख़ानों और कारख़ानों का पानी सीधे यमुना में जाता है। कमोबेश इसी तरह का हाल देश के अधिकांश शहरों में है जहाँ पर निकलने वाले गंदे पानी के मुक़ाबले एसटीपी की क्षमता बहुत ही कम है। फिर यह सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि किसी सरकारी प्लांट की घोषित क्षमता के मुक़ाबले उसका असली काम कितना कम होता होगा। दिल्ली जैसे शहर में यह भी हो रहा है कि इस तथाकथित साफ़ किए गए पानी को संयंत्र से निकालने के बाद फिर गंदे नालों से होते हुए यमुना में ले जाकर छोड़ दिया जाता है। साफ किया पानी फिर गंदे नालों में ! देश की सबसे बड़ी आँखें जिस शहर-राज्य और उसकी नदी पर टिकी हुई है जब उसका यह हाल है, तो छत्तीसगढ़ में अगर गंदे पानी को साफ़ करने की घोषित सरकारी क्षमता भी ज़रूरत से बहुत कम है तो इससे किसी को सदमा नहीं लगना चाहिए।

यह भी समझने की ज़रूरत है कि देश की आजादी के 75 साल का अमृत महोत्सव चल रहा है, और ऐसे में देश के शहरीकरण को शुरू हुए और आगे बढ़े भी पौन सदी हो चुकी है। ऐसे में अगर अब तक शहर की साफ़ पानी की ज़रूरत, और उसी अनुपात में गंदे पानी की निकासी का अंदाज़ लगाकर पानी को साफ़ करने की क्षमता विकसित नहीं की गई है तो यह महज कल्पनाशीलता और योजना की कमी नहीं कहीं जा सकती, यह परले दर्जे की नालायकी भी है। यह उन नदियों के प्रति हिंदुस्तानियों की घटिया दर्जे की लापरवाही भी है जो कहने के लिए नदियों को माँ मानते हैं, नदियों की पूजा करते हैं, और नदियों में डुबकी लगाकर अनगिनत त्योहार मनाते हैं। एक तरफ़ माँ कहना और दूसरी तरफ़ उसे गंदगी और जहर से पाट देना यह काम सबसे ग़ैर ज़िम्मेदार और अहसानफ़रामोश औलादें ही कर सकती हैं।

छत्तीसगढ़ में भी नदियों का प्रदूषण सिर चढ़कर बोलता है, कारखानों का प्रदूषण तो नदियों में मिल ही रहा है, शहर और गांव भी अपनी तमाम गंदगी तक़रीबन बिना साफ़ किए नदियों में छोड़ रहे हैं, जबकि सबसे आसान तरीका यह होता कि जिस दिन शहर-कस्बे की पानी की ज़रूरत का अंदाज़ लगाया जाता, उसके लिए योजना बनाई जाती, तो उसी योजना के एक दूसरे हिस्से की तरह गंदे पानी को साफ़ करने की क्षमता भी विकसित की जाती।

हिंदुस्तानियों ने निजी रूप से, और सार्वजनिक रूप से गंदगी में जीने की एक आदत डाल ली है। गंदगी के लिए जितना बर्दाश्त हमारे मिजाज में पनप चुका है, वह दुनिया के सभ्य देशों के लोगों को हैरान कर सकता है। जब गंदगी में रहने की नीयत हो, तब नियति भी वैसी हो जाना तय रहता है। हिंदुस्तान सड़कों पर, सरकारी इमारतों में, बाक़ी तमाम सार्वजनिक जगहों पर जितनी गंदगी करता है और उसमें जीता है, वह नदियों के साथ हमारे बर्ताव को भी तय करता है। इस देश में जिसको माँ माना जाता है उसको जिस तरह घूरों पर खाने के लिए छोड़ दिया जाता है, उससे गंगा-यमुना माँ सरीखी नदियों के साथ हमारा बर्ताव भी तय होता है। हाल ही में हुए कुंभ में सबसे पवित्र समझी जाने वाली गंगा, और उसके सबसे अधिक पवित्र समझे जाने वाले त्रिवेणी संगम में श्रद्धालुओं ने जिस दर्जे की गंदगी की है वह स्तब्ध कर देती है। लेकिन लोगों को अपनी श्रद्धा से अधिक महत्व किसी और चीज का नहीं लगता, श्रद्धा के केंद्र को साफ़ रखना भी महत्वपूर्ण नहीं लगता। बात सिर्फ़ जनता के सफ़ाई रखने की नहीं है क्योंकि शहरीकरण से जुड़ी गंदगी का इलाज निकालना सरकारों के ही बस का है, और जनता व्यक्तिगत हैसियत से इस बड़े काम को अपने स्तर पर पूरा नहीं कर सकती। शहरों में पानी की सरकारी सप्लाई से परे भी पानी की बहुत बड़ी तादात निजी ट्यूबवेल से निकले हुए पानी की रहती है जिसका अंदाज भी सरकार के पास नहीं रहता। इसलिए सरकार को गंदे पानी के निपटारे की अपनी क्षमता, पानी सप्लाई की अपनी क्षमता से बहुत अधिक आंकनी चाहिए, और एसटीपी का इंतज़ाम उस हिसाब से करना चाहिए।

जो देश, और पूर्वोत्तर भारत के जो प्रदेश नदियों को माँ नहीं मानते हैं महज़ नदी मानते हैं, वहाँ के पारदर्शी और साफ़ पानी को देखकर गंगा मैया की आँखों में आँसू आते होंगे, और उन्हीं आँसुओं से गंगा सहित दूसरी नदियों में बाढ़ आती है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 28 फरवरी 2025



 

जंगल के हिरण सी छलाँगें लगाते सायबर-मुजरिम, और केचुएं सी सरकारी रफ़्तार

27 फरवरी 2025 

 

छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ बरसों में लगातार सायबर मुजरिमों ने जिस बड़े पैमाने पर संगठित जालसाजी और धोखाधड़ी की है, उसके शिकार आम लोग तो हैं ही दूसरी तरफ़ दर्जन भर से अधिक बैंक और हर मोबाइल कंपनी का भी ऐसे जुर्म का शिकार होना यह सवाल करता है कि यह संस्थाएं जुर्म की शिकार है या जुर्म में भागीदार है। चिटफंड कंपनियों से लेकर महादेव सट्टे तक और अब तरह-तरह की शेयर ट्रेडिंग के फ्रॉड और क्रिप्टोकरेंसी के नाम पर धोखाधड़ी के पैसों के लिए जिस तरह इस राज्य में राष्ट्रीयकृत और निजी बैंकों में दसियों हज़ार खाते खोले गए हैं और उनसे हजारों करोड़ रुपए बाहर भेजे गए हैं उससे हिंदुस्तान की बैंकिंग की साख बुरी तरह ख़त्म होती है। दूसरी तरफ़ मोबाइल कंपनियों से जिस तरह दसियों हज़ार सिम कार्ड जाली कागजातों या दूसरे बेक़सूर लोगों के कागजातों से हासिल किए गए उससे यह सवाल उठता है कि सिम कार्ड के लिए जिस तरह के पहचान पत्र जरूरी होने का दावा मोबाइल कंपनियों और सरकार की तरफ़ से किया जाता है क्या वह सिर्फ़ एक ढकोसला है?

देश में पिछले दस बरस में मोदी सरकार ने जिस बहुत बड़े पैमाने पर तमाम चीजों को डिजिटल और ऑनलाइन किया है उसके बाद इस तरह के सायबर फ्रॉड और जुर्म से लोगों को बचाने की जिम्मेदारी तो सरकार की ही होनी चाहिए थी। लेकिन झारखंड के एक छोटे से जामताड़ा में पूरी तरह से अनपढ़ नौजवान भी जिस बड़े पैमाने पर देश भर में ठगी और धोखाधड़ी करते हैं, जिसे लेकर नेटफ़्लिक्स को एक सीरिज बनाने का मौक़ा मिलता है, उससे यहाँ सवाल उठता है कि क्या कोई हिफ़ाज़त असरदार भी है?

देश में अलग-अलग किस्म के जुर्म का जो पैसा बैंकों के खच्चर-खातों में जमा किया जा रहा है, और जिसे क्रिप्टो करेंसी या हवाला नेटवर्क की शक्ल में देश के बाहर भेज दिया जा रहा है उसे बरसों तक जारी देखना सरकार की क्षमता पर सवाल उठाता है। आज जब पूरी की पूरी बैंकिंग सरकार एयर आरबीआई के पूरे नियंत्रण में है, जब दूरसंचार कंपनियों का दिया हुआ हर कनेक्शन पूरी तरह सरकार के नियमों के तहत होता है, तो फिर यह कैसे हो जाता है कि फर्जी नाम से सिम कार्ड लेकर गरीबों के बैंक खाते किराए पर लेकर उनके पहली नजर में ही संदिग्ध दिखने वाले करोड़ों रुपए की आवाजाही होने लगती है और न तो बैंकिंग की कोई सुरक्षा जांच इस पर अलर्ट खड़ा करतीं, और न ही कोई भी सरकारी एजेंसी समय रहते ऐसे खच्चर-खातों पर कोई कार्रवाई करती। यह आम जनता की ज़िंदगी में सबकुछ डिजिटल और सबकुछ ऑनलाइन कर देने के बाद उसे बिना हिफ़ाज़त खुले आसमान तले बेसहारा छोड़ देने सरीखा काम है। अब तो यह भी साफ़ होते चल रहा है कि सायबर जुर्म से परे भी दूसरे कई किस्म के बैंकिंग फ्रॉड में बैंकों के अफसर खुलकर शामिल मिले हैं, और इससे समझ पड़ता है कि बैंकों का अपना काम किस हद तक खोखला है? देश में अनपढ़ मजदूरों और ग़रीब लोगों के दसियों करोड़ बैंक खाते हैं और ऐसे खातों को भाड़े पर लेकर संगठित सायबर-मुजरिम जिस तरह जुर्म का पैसा इनमें इकट्ठा करते हैं वह बैंकों की मामूली सावधानी से भी पकड़ में आ जाना चाहिए था, लेकिन धीरे-धीरे अब यह समझ पड़ रहा है कि बैंक महज लापरवाह नहीं थे बल्कि जुर्म में भागीदार थे। भारत सरकार को अनाथ और बेसहारा से पड़े हुए दसियों करोड़ बैंक खातों की हिफ़ाज़त के बारे में सोचना चाहिए कि ये खच्चर-खातों की तरह भाड़े पर मुजरिमों का औजार बनने का ख़तरा उठा रहे हैं। इसके पहले कि एक-एक करके ऐसे दसियों लाख और बैंक खाते खच्चर-खातों में तब्दील हो जायें सरकार को जुर्म का यह सिलसिला रोकना चाहिए। कुछ दिन पहले ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने यह कहा था कि देश में 19 लाख खच्चर-खातों की शिनाख्त की जा चुकी है। अब छत्तीसगढ़ जैसे छोटे से राज्य में जिस बड़े पैमाने पर ऐसे म्यूल-अकाउंट पकड़ा रहे हैं, उससे यही समझ पड़ता है कि देश में आर्थिक अपराधों की हालत देखते हुए आर्थिक अपराधों पर निगरानी रखने के लिए एक अलग से एजेंसी बनाई जाए ताकि करोड़ों लोगों के हजारों रुपए लुट जाने के पहले ही इन्हें रोका जा सके। देश में डिजिटलीकरण और ऑनलाइन काम को जिस बड़े पैमाने पर बढ़ाया गया है उसी के अनुपात में हिफाजत बढ़ाने की भी जरूरत है वरना ग़रीब इसी तरह लुटते रहेंगे, मुजरिम दूसरे देशों में करोड़ों-अरबों रुपए भेजते रहेंगे। छत्तीसगढ़ का ही सौरभ चंद्राकर नाम का एक मामूली नौजवान जिस तरह महादेव सट्टा कारोबार खड़ा करके दसियों हज़ार करोड़ रुपए कमा चुका है, वह केंद्र सरकार को एक बहुत बड़ी चुनौती है। अभी तक कुछ मामूली लोगों को ही इसमें पकड़ा गया है और लूट का एक जरा सा हिस्सा ही बरामद हो पाया है। केंद्र सरकार को एक क्रांतिकारी कार्रवाई करने की जरूरत है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 फरवरी 2025



 

ट्रम्प 1960 में गेहूं की मदद का बिल देकर भारत से ताजमहल माँग सकता है !

26 फरवरी 2025 

 

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से कल हुई मुलाक़ात में जो मतभेद सामने आए वे वैचारिक नहीं थे, तथ्यों को लेकर थे। यूक्रेन के मुद्दे पर ट्रंप उसी तरह आदतन झूठ बोलते रहे जिस तरह वे अमरीका के भीतर के अनगिनत मुद्दों पर बोलते रहे हैं, और बाक़ी दुनिया के बारे में भी झूठ बोलने का उनका लंबा इतिहास है। ट्रंप ने जब यह कहा कि यूरोपीय देशों ने यूक्रेन को फ़ौजी मदद दी थी और इसके बदले में वे यूक्रेन से अब पैसे वसूल रहे हैं तो मैक्रों ने मीडिया की मौजूदगी में ही ट्रम्प को दुरुस्त किया और कहा कि  यूरोप यूक्रेन से उसे दी गई फौजी मदद को वापिस नहीं ले रहा है बल्कि उसने जो हिस्सा यूक्रेन को कर्ज की शक्ल में दिया था उसे ही वापस लेगा। यह सुनकर ट्रम्प चुप रहे और हामी भरते रहे। मतलब यह कि उनके पास मैक्रों के कहे हुए का कोई जवाब नहीं था। ट्रंप योरप से यूक्रेन-रूस मुद्दे पर और टैरिफ जैसे दूसरे कई मुद्दे पर भी ठीक उसी तरह दूर होते चले जा रहे हैं जिस तरह आज धरती के ध्रुवों पर बड़े-बड़े हिमखंड अलग होकर बह जा रहे हैं। योरप के एक सबसे बड़े देश फ्रांस के राष्ट्रपति की ट्रंप से मुलाकात योरप के साथ उनका पहला बड़ा औपचारिक संपर्क था और इसमें जिस तरह मीडिया के कैमरों के सामने यूक्रेन की खदानों पर कब्जे की अमरीकी खूनी नीयत उजागर हुई है उससे भी ट्रम्प जैसे बेशर्म को कोई फर्क पड़ता हो ऐसा नहीं लगता। ट्रम्प दशकों बाद एक बहुत ही प्यासे साम्राज्यवादी देश की तरह खुलकर सामने आए हैं और पूरी दुनिया में लोकतंत्र को बढ़ावा देने का अमरीका का पुराना नारा उन्होंने पैरों तले रौंद दिया है।

ट्रंप की शक्ल में अमरीकी वोटरों ने अपने ख़ुद के लिए चार बरसों की एक बहुत ही घटिया दर्जे की मुसीबत चुनी है, और दुनिया के लिए एक ऐसा तानाशाह चुना है जो एक ऐतिहासिक देश फ़िलिस्तीन की दसियों लाख जनता को उठाकर उसके पड़ोसी देशों में फेंक देने पर आमादा है, और जो फ़िलिस्तीन को एक रियल एस्टेट प्रोजेक्ट बनाना चाहता है, किसी भी दूसरे ट्रम्प टावर को तरह। दुनिया ने ऐसा कोई देश देखा नहीं था जो कि इस बेशर्मी के साथ किसी देश को मलबे का ढेर बताते हुए उसे वहाँ के नागरिकों के बिना, सैलानियों के लिए एक शानदार सैरगाह बनाने की बात इस बेशर्मी से करता हो जिस बेशर्मी से किसी देश के सबसे बड़े बाहुबलि दूसरों की जमीन पर अवैध कब्जा करके इमारत बनाते हैं। ट्रंप ने पिछले अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन के कार्यकाल में अमरीका से रूस को भेजी गई सैनिक मदद का बिल बनाकर यूक्रेन को थमा दिया है, और हिंदुस्तान को कोई हैरानी होनी नहीं चाहिए कि 1960 के दशक में अमरीका से भारत को मिले हुए अनाज की मदद के एवज में ट्रंप भारत के ताजमहल पर कब्जे का एक नोटिस भेज दें। भारत में उस वक्त भुखमरी की नौबत थी और अमरीका ने उसके पास का जरूरत से अधिक गेहूं भारत को रियायती दाम पर दिया था, ट्रंप हो सकता है कि पिछली एक सदी में अमरीका से जिस देश को जो मदद मिली हो उसके खाता बही देखकर बिल बनाने में रातों की नींद ख़राब कर रहा हो।

ट्रंप इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी मिसाल है, कि कोई एक देश अपना नेता चुनते हुए किस तरह बाक़ी दुनिया पर एक तानाशाह थोप सकते हैं। अमरीकियों ने पूरी दुनिया के लिए बर्बादी लाने वाला यह जो चुनाव किया है इसके लिए अगले चार बरस वे ख़ुद भी अफ़सोस करेंगे ऐसा लगता है क्योंकि अमरीका के भीतर ट्रंप के फ़ैसले लोगों को जिस बड़े पैमाने पर बेरोज़गार कर रहे हैं वह भयानक है, इसके अलावा अमरीका का जो तबका लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करता है वह गहरे सदमे का शिकार है कि उनका देश आज देश के भीतर और देश के बाहर किस हद तक अलोकतांत्रिक, हमलावर, और दूसरे के खून का प्यासा फौजी तानाशाह बन चुका है।

ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दुनिया की तस्वीर को ऊन के बहुत उलझे हुए लच्छे के तरह करके रख दिया है जिसमें भविष्य का कोई सिरा किसी को न दिखायी पड़ रहा है, न समझ आ रहा है। ट्रंप की चुनावी जीत के बाद भी दुनिया में कौन यह सोच सकते थे कि महीने भर के भीतर ही ट्रंप अमरीका के परंपरागत और लंबे समय के साथियों, नाटो के सदस्यों को कचरे की टोकरी में फेंककर रूस के साथ हो जाएगा और चीन अमरीका के इस रुख की तारीफ़ करने लगेगा। यूक्रेन एक हैरतअंगेज मिसाल बन गया है कि दुनिया की तीनों महाशक्तियां किस तरह एक साथ आ गई है, और दुनिया में अब शक्ति संतुलन के पुराने तमाम गणित फेल हो गए हैं। यह कुछ वैसा ही हुआ है कि धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के चुंबक के दो सिरे मिलकर एक हो जाएं और दुनिया के अंतरराष्ट्रीय संबंध गाजा के मलबे में तब्दील हो जाएं। ट्रंप की मनमानी, बेदिमागी, और तानाशाही ने दुनिया को आज विश्व इतिहास के सबसे बड़े असमंजस के सामने खड़ा कर दिया है, दुनिया के कोई भी महत्वपूर्ण देश ऐसी नौबत की कल्पना भी नहीं कर पाए होंगे। ख़ुद इजराइल ने भी आज तक अपने सबसे सुखद सपने में भी यह नहीं सोचा था कि फ़िलिस्तीनियों को उनके गाजा से बाहर कर वहाँ पर कोई सैरगाह बनायी जा सकती है। ट्रंप अपने दोस्तों के सुखद सपनों से अधिक, और उनके दुःस्वप्नों से अधिक, दोनों किस्म की नौबत दुनिया पर उसी अंदाज़ में थोप रहा है जिस तरह उत्तर भारत में एक आम हिन्दुस्तानी सड़क पर तंबाकू की पीक उगल देता है। इस सनकी, बदजुबान वाले तानाशाह ने धरती को अपनी सनक का पीकदान बना छोड़ा है और वह धरती के ग्लोब को अपनी मेज पर घुमा-घुमाकर देख रहा है कि वह अगली पेशाब किस देश पर करे।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 फरवरी 2025



 

धान की खेती से परे भी संभावनाएँ हैं छत्तीसगढ़ में

 25 फरवरी 2025 

 

छत्तीसगढ़ में इन दिनों सब्जी उगाने वाले किसानों की एक मुसीबत आई हुई है कि टमाटर की फसल खेतों से तोडऩे में जो पैसा लगता है और बाजार तक पहुंचाने में उतना खर्च भी नहीं निकल पा रहा है। टमाटर इतने सस्ते हो गए हैं कि उनके खरीदार नहीं रह गए, और किसान उन्हें तोडक़र बाजार लाकर बेच नहीं पा रहे। यह नौबत हर बरस कुछ महीनों के लिए सुनाई देती है जब छत्तीसगढ़ के कई इलाक़े परंपरागत रूप से टमाटर की फसल सडऩे के लिए खेतों में छोड़ देते हैं, कई जगह विरोध करने के लिए और अपना तेवर दिखाने के लिए उन्हें सडक़ों पर फेंक देते हैं। हमारी पूरी जिंदगी यह देखते हुए गुजर गई कि फल-सब्जियों के लिए, प्रदेश की दूसरी वनोपज के लिए, ऐसी फूड इंडस्ट्री लगाई जाए जो कि लोगों को रोजगार भी दे सके और छत्तीसगढ़ में होने वाली, खेतों या जंगलों की फसल का बेहतर इस्तेमाल भी कर सके अभी जैसे बस्तर इमली के लिए जाना जाता है। इस प्रदेश के बहुत से इलाकों में महुआ बहुत अधिक होता है लेकिन इन सबका इस्तेमाल यहां से बाहर जाकर होता है। ग्रामीण स्तर पर महिलाओं के कुछ स्वसहायता समूह कुछ छोटे-मोटे सामान बनाते ज़रूर हैं, लेकिन उनकी मार्केटिंग का इंतज़ाम ठीक से नहीं होता और उनके ब्रांड की साख नहीं बन पाई है इसलिए भी उनके सामान को ग्राहक नहीं मिल पाते। अभी आईएस प्रदेश को अपनी सीमाएं मालूम हैं कि खेत क्या उगा सकते हैं और वनोपज से क्या-क्या मिल सकता है। लेकिन इन सीमाओं का अपार विस्तार हो सकता है, अगर प्रदेश में जगह-जगह अलग-अलग इलाक़ों में ऐसी फूड इंडस्ट्री लगे जो कि इमली के तरह-तरह के सामान बना सके मशरूम के सामान बना सके जो टमाटर के कैचअप बना सके या टमाटर प्यूरी बनाकर टमाटर केचप और सॉस बनाने वाले करखानों को बेच सके। महुआ में कई तरह का वैल्यू एडिशन किया जा सकता है। यह भी कुछ साल पहले पता लगा कि छत्तीसगढ़ का महुआ दूसरे कुछ देशों में जाकर वहाँ पर उससे शराब बनाई जा रही है जो कि महंगे दामों पर बिकती है। अभी सवाल यह भी उठता है कि महुआ के पेड़ के नीचे एक जाली लगा दी जाती है जिससे कि महुआ मिट्टी और कंकड़ से टकराकर खराब नहीं होता। तो इसमें कौन सी ऐसी हाईटेक की बात है या कौन सा बड़ा पूंजी निवेश इसमें लगता है कि यह काम नहीं किया जा सकता सरकार को यह बात सोचना चाहिए की प्रदेश की उपज जो है उसमें क्या-क्या वैल्यू एडिशन किया जा सकता है और ऐसा भी नहीं है कि इनसे जो सामान बनाया जा सकता है उनकी स्थानीय खपत नहीं है आज भी प्रदेश के बाहर से इमली की चटनी, टमाटर का सॉस कई तरह की चीजें मशरूम का पाउडर कई तरह की चीजें प्रदेश के बाहर से यहां आती ही है और इनकी यहां उपज भी बढऩे लगेगी अगर छत्तीसगढ़ में इन चीजों की प्रोसेसिंग इकाईयां लगने लगेंगी और हो सकता है कि यह प्रोसेसिंग इकाइयां अपने खुद के ब्रांड विकसित न कर सके, लेकिन देश के जो स्थापित ब्रांड हैं वे भी कच्चा माल अलग-अलग प्रदेशों से इसी तरह खरीदते हैं।

इन दिनों ना सिर्फ हिंदुस्तान में बल्कि पूरी दुनिया में मिलेट्स का चलन बहुत बढ़ा हुआ है और ऐसा माना जा रहा है की यह आम अनाज के मुक़ाबले अधिक सेहतमंद है। छत्तीसगढ़ में मिलेट्स की ढेरों संभावनाएं हैं, यहां पर कांकेर जैसी कुछ जगहों पर मिलेट्स की प्रोसेसिंग यूनिट लगी हैं। इसका स्थानीय बाजार है, ऑनलाइन बाजार भी बहुत विकसित हो चुका है। अब यह सरकार के ऊपर निर्भर करता है कि वह मिलेट्स की फसल को, उसकी प्रोसेसिंग को पैकिंग और मार्केटिंग को कामयाब कैसे करें। इससे असंगठित कृषक वर्ग जो है उसका रोजगार बढ़ेगा उसकी कमाई बढ़ेगी, वरना आज छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में पूरी की पूरी कृषि, सिर्फ धान की फसल पर टिक गई है क्योंकि सरकार बहुत महंगा दाम देकर उस धान को खरीद लेती है। अभी इसके साथ-साथ एक एक दो और बातों पर चर्चा जरूरी है। छत्तीसगढ़ से कोसे के कपड़ों का पूरी दुनिया में बाजार बना हुआ है। छत्तीसगढ़ में तो यह विख्यात है ही, यहां इसका घरेलू बाजार भी बहुत है, लेकिन महानगरों में जाकर भी यहाँ का कोसा बिकता है और दुनिया के बाकी देशों में भी इसके दाम बहुत अच्छे मिलते हैं। यह पूरा का पूरा काम बिना किसी हाईटेक के, बिना अधिक बिजली या रसायन के इस्तेमाल के, कोसे के, रेशम के, ककून पेड़ों पर कीड़ों को पालकर तैयार किए जाते हैं। रेशम के कीड़ों से और घरों में महिला, बच्चे, बूढ़े सब लोग मिलकर इन ककून से कोसा बनाने का काम करते हैं। बुनकर गांव गांव में हैं। प्रदेश के कुछ इलाक़े इसके लिए विख्यात हैं और परंपरागत, पारिवारिक बुनकरों की बहुत बस्तियाँ भी हैं। छत्तीसगढ़ के बने हुए कोसा टसर का बाजार बहुत बड़ा है पहनाने के कपड़ों के अलावा जो बहुत रईस तबका जिस तरह से सोफे के कपड़े, परदे के कपड़े, सिल्क, टसर, कोसे के लेने लगे हैं, उसका भी बाजार बहुत बड़ा है छत्तीसगढ़ को एक टेक्सटाइल प्रोड्यूसिंग स्टेट की तरह हैंडलूम के कपड़ों को बनाने वाले राज्य की तरह विकसित करने की अपार संभावना है यहां लोगों के पास परंपरागत रूप से यह होना रहे यहां का बाजार बाहर बना हुआ है यहां का ब्रांड भी बाहर छत्तीसगढ़ का कोसा चला हुआ है अभी यह सरकार पर निर्भर करता है और इन सबसे चाहे जो बात से हमने शुरू की है, वनोपज हो या सब्जियों की प्रोसेसिंग हो, वाहन से लेकर सिल्क और कोसे के कपड़ों तक, इन सबसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक मदद मिलेगी और इन दिनों दुनिया भर में लगातार यह चलन बढ़ते चल रहा है कि किस तरह से रसायन फ्री कपड़ों का उत्पादन हो, किस तरह से लोग अभी ऑर्गेनिक सब्जिय़ाँ या ऑर्गेनिक फल खाने लगे हैं। छत्तीसगढ़ में धान से परे भी, सरकारी मदद से अनुदान से परे भी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ाने की बहुत जरूरत है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 फरवरी 2025



 

चुनावी साल स्कूली पढ़ाई की बर्बादी का, इलाज क्या?

  24 फरवरी 2025 

 

छत्तीसगढ़ उन राज्यों में से एक है जहां सवा साल में चार चुनाव होते हैं। पहले विधानसभा का चुनाव, फिर लोकसभा का चुनाव, फिर नगरीय निकाय, यानी म्युनिसिपलों का चुनाव, और आखिर में पंचायतों का चुनाव। सरकार के बहुत से जरूरी फैसले नई सरकार आने, नए मंत्रियों में विभाग बंटने, फिर सरकार की पसंद के सचिव और दूसरे अफसर बदलने, नीतियों और कार्यक्रमों के बदलने से सरकारी कामकाज को लेट करते हैं। लेकिन जो काम सबसे अधिक प्रभावित होता है, वह है स्कूली शिक्षा का। मतदाता सूची नवीकरण से लेकर मतदान करवाने तक स्कूली शिक्षक भी झोंक दिए जाते हैं, और प्रदेश की हर सरकारी स्कूल मतदान केन्द्र तो बन ही जाती है। सरकारी शिक्षक किसी भी जिम्मेदारी से मना नहीं कर सकते, और नतीजा यह होता है कि हर पांच बरस में चुनावी साल एक ऐसा आता है जब सबसे कम पढ़ाई होती है, और बच्चों से उसी तरह इम्तिहान देने की उम्मीद की जाती है। इसमें तब दिक्कत और अधिक बढ़ जाती है जब किसी दूसरी पार्टी की सरकार आती है, और वह पाठ्यक्रम बदलने लगती है, या स्कूली इम्तिहान के तरीकों में फेरबदल करती है। यह आखिरी खतरा भी पांच साल में एक बार रहता है, और अगर सत्तारूढ़ पार्टी की निरंतरता बनी रहती है, तो ये तमाम दिक्कतें कुछ कम हो जाती हैं।

अब इस समस्या का क्या समाधान हो सकता है? मतदातासूचियों से लेकर मतदान केन्द्र और मतदान तक, मतगणना तक, प्रदेश में शिक्षक ही सबसे अधिक संख्या में सरकारी कर्मचारी हैं, और स्कूली शिक्षा को एक ऐसा काम मान लिया जाता है जिसे जब चाहे तब रोक दिया जाए। कुछेक अदालती आदेशों के बावजूद स्कूली बच्चों को किसी जागरूकता रैली के बैनर थमाकर जब चाहे तब सडक़ों पर निकाल दिया जाता है। स्कूलों में इंतजाम, और स्कूली शिक्षा, यह किसी को ऐसी प्राथमिकता नहीं लगती कि उसमें बाधा रोकी जाए। सरकार के किसी भी काम के लिए जब जरूरत रहती है शिक्षकों से लेकर शाला भवनों तक, पढ़ाई के सारे इंतजाम को झोंक दिया जाता है। अभी म्युनिसिपल और पंचायत चुनावों में कई जगह हालत यह हो गई कि शाला भवनों में जहां मतदान केन्द्र बने थे, वहां पर एक-एक कमरे के बाहर पिछले तीन-तीन चुनावों के मतदान केन्द्रों के नंबर डले थे, और बोर्ड परीक्षा या किसी और इम्तिहान के लिए डाले गए कमरे के नंबर भी लिखे हुए थे। इन नंबरों से यह समझ नहीं पड़ रहा था कि इस चुनाव का बूथ क्रमांक कौन सा है। लेकिन यह नजारा यह भी बताता था कि इस चुनावी वर्ष में प्रदेश की स्कूलों में गैरशिक्षा कामों की कितनी दखल रही। हमेशा से शिक्षकों की यह शिकायत रही कि राज्य या केन्द्र सरकार के जितने तरह के सर्वे जैसे काम रहते हैं, उनमें शिक्षकों को गैरशिक्षकीय कामों में झोंक दिया जाता है, जिससे पढ़ाई प्रभावित होती है, और शिक्षकों का मनोबल भी टूटता है।

स्कूलों में पढ़ाई ठीक से हुए बिना अब इम्तिहान शुरू हो रहे हैं, और हालत यह है कि स्कूलों में 9वीं से 12वीं तक जो व्यवसायिक पाठ्यक्रम शुरू किए गए हैं, उनके शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए बाहरी लोगों को अनुबंध पर नियुक्त किया जाना ही अभी तक नहीं हो पाया है, और बच्चे बिना किसी शिक्षण-प्रशिक्षण के इस कोर्स का इम्तिहान देने जा रहे हैं। इसके अलावा इसी बरस नई सरकार ने 5वीं और 8वीं के इम्तिहान बोर्ड से लेना तय किया है। निजी स्कूलें इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट गई हुई हैं, और वहां पर अभी सुनवाई चल रही है। इसके पीछे एक तर्क यह दिया जा रहा है कि शिक्षण सत्र के बीच में यह फैसला लिया गया, और स्कूलों में पढ़ाई बोर्ड परीक्षा के हिसाब से हुई ही नहीं है। इस बार चूंकि सरकार भी नई पार्टी की है, इसलिए परीक्षा प्रणाली और स्कूलों से जुड़ी दूसरी चीजों में कई फेरबदल भी हुए हैं, और इसलिए चुनावी वर्ष का असर बड़ा अधिक देखने मिल रहा है।

दुनिया में जो विकसित देश हैं, वहां पर जिन दो चीजों को समाज में सबसे अधिक महत्व दिया जाता है, उनमें से एक स्कूली शिक्षा है, और दूसरी चिकित्सा व्यवस्था रहती है। राज्य सरकार को ऐसे दीर्घकालीन नीति बनानी चाहिए जिसमें स्कूलों की पढ़ाई-लिखाई को लेकर न तो कोई बाधा आए, न उनमें तरह-तरह के प्रयोग किए जाएं, और न ही पढ़ाई के दिनों में किसी तरह की कटौती की जाए। राज्य सरकार को यह भी तय करना चाहिए कि छुट्टियों की अंतहीन लंबी लिस्ट को किस तरह स्कूली शिक्षा के लिए कम किया जा सकता है। कॉलेजों में तो पढ़ाई का बुरा हाल रहता है, और वहां माना जाता है कि झंडे से झंडे तक पढ़ाई होती है, यानी 15 अगस्त से 26 जनवरी के बीच। इसके आगे-पीछे का वक्त इम्तिहान, छुट्टियों, रिजल्ट, और दाखिले में निकल जाता है।

न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि देश के हर प्रदेश में स्कूली शिक्षा को अधिक गंभीरता से लेने की जरूरत है, और दक्षिण के राज्य या महाराष्ट्र अपनी स्कूली शिक्षा को बेहतर बनाकर ही अपनी अगली पीढ़ी को अधिक काबिल बना पाए हैं। जिन राज्यों में नौजवान पीढ़ी की यह बुनियाद ही कमजोर रह जाती है, वहां पर आगे की पढ़ाई में भी उन राज्यों के लोग बेहतर राज्यों की नई पीढ़ी का मुकाबला नहीं कर पाते। स्कूली शिक्षा नीति को राजनीतिक फैसलों से परे, और बड़े जानकार शिक्षाविदों के हिसाब से लिया जाना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 फरवरी 2025



 

स्कूल में जानलेवा विस्फोट, छात्र-छात्राओं का क्या?

 23 फरवरी 2025 

 

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में एक ईसाई स्कूल, सेंट विसेंट पलोटी स्कूल के बाथरूम में बुरी तरह धमाका हुआ। इसमें चौथी कक्षा की एक छात्रा गंभीर रूप से घायल हो गई। जैसे ही एक छोटी बच्ची वहां गई और उसने फ्लैश किया तो उसके साथ ही एक रासायनिक विस्फोट हुआ और धमाके के साथ बच्ची के घायल होने के साथ-साथ आसपास नुकसान भी हुआ। खबरें बताती हैं कि इस स्कूल में पहले भी छात्राएं ऐसी हरकत कर चुकी हैं और चार बार फटाकों से धमाके किए गए हैं। अब घटना बड़ी होने की वजह से मामला पुलिस तक पहुंचा, और जांच हुई, तो जिम्मेदार लड़कियों की शिनाख्त हुई है। इससे जुड़ी दो सनसनीखेज बातें सामने आई हंै, एक तो यह कि ऑनलाइन ऑर्डर करके रसायन बुलाए गए थे। और दूसरी बात यह कि शायद किसी टीचर को सबक सिखाने के लिए विस्फोट की यह साजिश की गई थी। अब बाकी बच्चों के मां-बाप स्कूल पहुंचे हुए हैं कि वहां यह कैसी हिफाजत है।

स्कूली बच्चों का एक हाल अभी छत्तीसगढ़ के ही सरगुजा में सामने आया था जहां सरकार की सबसे अच्छी समझी जाने वाली आत्मानंद स्कूल के छात्र-छात्राओं ने फेयरवेल पार्टी में शराब पी, और शराब की बोतलें लेकर कारों के काफिले में जुलूस निकाला, गाडिय़ों के बाहर टंगे रहकर हंगामा किया, और शहर के टै्रफिक जाम के साथ जब ऐसे वीडियो सामने आए तो कुछ छात्र-छात्राओं को निलंबित किया गया है।

इसके पहले भी छत्तीसगढ़ की सरकारी स्कूलों में जगह-जगह शिक्षकों के शराब पीकर पहुंचने, स्कूल पहुंचकर सबके सामने शराब पीने, शिक्षा विभाग की महिला अधिकारी से मारपीट करने, शिक्षकों के छात्राओं के यौन शोषण करने जैसे तरह-तरह के दर्जनों मामले सामने आ चुके हैं। अभी चार दिन पहले स्कूल की एक फेयरवेल पार्टी में छात्राओं के साथ किसी अश्लील भोजपुरी गाने पर नाचते हुए प्राचार्य को निलंबित किया गया है। छत्तीसगढ़ का बहुत बड़ा हिस्सा आदिवासी इलाका है, और बहुत सा हिस्सा ग्रामीण स्कूलों का है। यहां पर सरकारी निगरानी बहुत ही कम रहती है, और ऐसे में इस तरह की सामने आने वाली घटनाओं को पूरा नहीं माना जा सकता, और इनकी असल गिनती इनके मुकाबले कई गुना होना तय है।

लेकिन हम बिलासपुर की इस घटना पर लौटें तो आज छात्र-छात्राओं के लिए ऑनलाइन ऑर्डर करके ऐसे रसायन बुलाना आसान है जिससे वे विस्फोट कर सकते हैं। घायल बच्ची के पैर जिस तरह से रसायन से जख्मी हुए हैं, वह भयानक नौबत है। यहां पर दो अलग-अलग सवाल उठ खड़े होते हैं, एक तो यह कि ऐसे रसायनों की बिक्री कैसे रोकी जा सकती है, और दूसरा यह कि स्कूलों में ऐसे सहज खतरों को कैसे रोका जाए? अभी तक तो हम शहरा-कस्बों में चाकू लेकर घुमते मवालियों के हमलों को ही अधिक फिक्र का मानते आए थे, अब यह एक बिल्कुल ही नए दर्जे का बहुत बड़ा खतरा दिख रहा है। ईसाई मिशनरी स्कूलों में अनुशासन बेहतर माना जाता है, लेकिन वहां पर छात्राओं ने किसी टीचर को सबक सिखाने के लिए स्कूल में बार-बार ऐसी हरकत की है, तो उससे स्कूली बच्चों में अराजकता का अंदाज लगाया जा सकता है। दूसरी बात यह कि जब लडक़ों में ऐसी ही अराजकता बढ़ती है तो हम नाबालिगों के मिलकर किसी नाबालिग लडक़ी से गैंगरेप भी देखते हैं। जुर्म अलग-अलग किस्म के हो सकते हैं, लेकिन जुर्म करने का हौसला एक ही किस्म का रहता है। स्कूलों के भीतर इतनी निगरानी और नियम-कायदे के बाद अलग लड़कियां ऐसी हिंसक वारदात कर रही हैं, या सरगुजा में सडक़ों पर दारू पीकर दारू की बोतलों के साथ कारों से बाहर लटके हुए जुलूस निकाल रही हैं, तो ऐसे ही लडक़े-लड़कियां साल-दो-साल बाद नशे की हालत में सडक़ पर लोगों का कुचलते भी हैं।

ये गिनी-चुनी चर्चित घटनाएं उतनी अधिक फिक्र की बात नहीं है, जितनी फिक्र की बात इस पीढ़ी में पनप रही अराजकता है। यह आपराधिक हौसला और रूख इन किशोर-किशोरियों से कहीं-कहीं पर परिवार के लोगों का कत्ल भी करवा रहा है क्योंकि घरवाले उनको मनमानी करने से रोकते हैं। ऐसे सारे मामले तुरंत ही कड़ी कार्रवाई के लायक हैं, और ऐसे लडक़े-लड़कियों के माँ-बाप की भी जवाबदेही तय होना चाहिए। अगर यह पीढ़ी गाडिय़ों पर सडक़ों पर गुंडागर्दी करती हैं, तो उन्हें गाडिय़ां देने वाले माँ-बाप पर भी कार्रवाई होनी चाहिए, और ऐसी घटना एक से अधिक बार होने पर इन गाडिय़ों का रजिस्ट्रेशन साल-दो-साल के निलंबित करने का कानून भी बनाना चाहिए, या राज्य सरकार अपने अधिकार क्षेत्र में कोई और कानून ऐसे माँ-बाप को सजा देने के लिए, और अगर वे संपन्न हों तो उन पर मोटा जुर्माना लगाने के लिए बनाए। कम उम्र की अराजकता, गुंडागर्दी और जुर्म, इन सब पर अगर तुरंत लगाम नहीं लगाई गई, तो ये बेकाबू होकर और अधिक संगीन जुर्म में तब्दील होने लगेंगे। सरकार को बिना देर किए स्कूली बच्चों में पनप रही हिंसा, और मनमानी को रोकने के ठोस इंतजाम करने चाहिए।  

(Daily Chhattisgarh)

दुनिया पर बुलडोजर चलाते ट्रम्पस्क, चार साल में क्या-क्या बचेगा?

23 फरवरी 2025 

अमरीका ने यूएस-एड नाम का एक बहुत बड़ा फंड ऐसा है जिससे पूरी दुनिया के देशों में कई तरह के कामों के लिए मदद दी जाती थी। कई देशों में एड्स की जांच, और उसके इलाज का काम इसी से हो रहा था, और ट्रम्प सरकार ने आते ही अपने प्रमुख सलाहकार-सहयोगी एलन मस्क की सलाह पर यूएस-एड को खत्म ही कर दिया है, नतीजा यह निकला है कि अफ्रीका के कई देशों में मरीजों को दवाई की अगली खुराक भी नहीं मिल पाएगी। लेकिन इससे परे इस फंड से दुनिया के कई देशों में लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए आर्थिक मदद की जाती थी, जो कि अमरीकी सरकार का एक अंतरराष्ट्रीय सरोकार भी बताया जाता है। जब कोई सरकार संपन्न रहती है, तो उससे यह उम्मीद की जाती है कि वह दुनिया में धार्मिक स्वतंत्रता, न्याय, लोकतंत्र, मानवाधिकार, महिला अधिकार जैसे बहुत से मूल्यों को आगे बढ़ाने का काम भी करे। अमरीका अपनी वैश्विक जिम्मेदारी के तहत यह सब काम करते आया है, और वहां राष्ट्रपति रिपब्लिकन रहें, या डेमोक्रेट, यह सिलसिला कभी बंद नहीं हुआ। लेकिन अब ट्रम्प और मस्क की यह जोड़ी, ट्रम्पस्क यह तय कर चुकी है कि अमरीका का एक डॉलर भी फिजूलखर्च नहीं किया जाएगा, और तमाम वैश्विक सरोकारों को फिजूलखर्ची करार देकर उसकी जांच करने की घोषणा भी की गई है। इस बीच ट्रम्प की कही इस बात की भी जांच हो रही है कि पिछले राष्ट्रपति जो बाइडन की सरकार ने भारत में मतदाता-जागरण के लिए पौने दो सौ करोड़ रूपए से ज्यादा की रकम भेजी थी। अब इंडियन एक्सप्रेस ने एक जांच करके यह बताया है कि यह रकम भारत नहीं आई थी, और इसे बांग्लादेश भेजा गया था ताकि वहां की सरकार को पलटा जा सके। जहां तक ट्रम्पस्क की कही हुई बात है, उसका सच से अनिवार्य रूप से कोई रिश्ता हो यह जरूरी नहीं है। अभी मीडिया के कैमरों के सामने ही एलन मस्क ने यह बताए जाने पर कि उन्होंने बिल्कुल ही गलत और झूठी जानकारी दी थी, यह कहा कि यह जरूरी नहीं है कि उनकी कही हर जानकारी सही हो। खुद राष्ट्रपति ट्रम्प की कही बातों में से अनगिनत बातों को अमरीकी मीडिया उजागर करते रहा है कि उनमें से कौन-कौन सी बात झूठी थी। लेकिन ट्रम्प ने कल फिर यह बात दोहराई है कि अमरीका से 21 मिलियन डॉलर भारत भेजे गए और उन्होंने मोदी का नाम लेते हुए यह कहा कि मेरे दोस्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारत को 21 मिलियन डॉलर भेजे गए ताकि अधिक मतदान करवाया जा सके। ट्रम्प यह बयान ऐसे हिसाब-किताब का एक पन्ना देखते हुए कैमरों के सामने दे रहे थे, और उन्होंने भारत में अब तक चल रही बहस को एक नया मोड़ दे दिया है जब उन्होंने यूएस-एड के ऐसे अनुदान के साथ मोदी का नाम जोड़ दिया। अब आदतन, पेशेवारना अंदाज में झूठ बोलने वाले ट्रम्पस्क के कोई क्या पूछ सकते हैं कि उनके बयान में सच क्या है?

फिर भी हम इस पर नहीं जा रहे कि यूएस-एड से भारत में कोई पैसा आया या नहीं आया, और आया तो किस संस्था के पास किस काम से आया। यह बात तो जाहिर है कि भारत जांच एजेंसियों के मजबूत ढांचे वाला एक देश है, और विदेशी दान-अनुदान पाने वाली हर संस्था अपने एक-एक रूपए के हिसाब के लिए भारत की कई जांच एजेंसियों के प्रति जवाबदेह रहती है। ऐसे में 182 करोड़ रूपए छोटी रकम नहीं होती जिसका हिसाब केन्द्र सरकार मांग न सके। इसी तरह का एक पूरा मंत्रालय ही ब्रिटिश सरकार में है जो कि दूसरे देशों में मदद का काम देखता है। खुद भारत सरकार दुनिया के कई देशों की अलग-अलग मदद करती है। भारत में केन्द्र और राज्य सरकारें, इन दोनों की ही बहुत सी एजेंसियां हैं, जो कि विदेशी दान पाने के लिए मिला हुआ रजिस्ट्रेशन खत्म करने लायक तथ्य सामने रखती हैं। और अमरीकी सरकार घोषित रूप से दुनिया के दूसरे देशों के कई किस्म के घरेलू मामलों पर अपने विचार सार्वजनिक रूप से रखते आई है जिनमें भारत में धार्मिक स्वतंत्रता में कथित कमी भी एक मुद्दा रहा है।

अमरीका जितना संपन्न और ताकतवर देश जिस तरह एक पल में दुनिया के सरोकारों से हाथ खींच बैठा है, वह मरीजों के नीचे से एकदम से पलंग खींच देने जैसा है। जरूरतमंद देशों के बहुत सारे काम अमरीकी मदद से ही होते थे, और अब खुद अमरीका के भीतर मदद के अधिकतर कामों को खत्म कर दिया गया है। एक-दो राज्यों की अदालतों ने ऐसे मनमाने फैसले के कुछ पहलुओं पर कुछ वक्त के लिए रोक लगाई है, और वहां पर यह बहस भी चल रही है कि क्या ट्रम्प के फैसले अमरीकी संविधान के खिलाफ हैं, और क्या इन फैसलों को अमरीकी अदालतें रोक भी सकती हैं? ऐसे माहौल में दुनिया की बहुत सी जरूरतें एकदम से अनाथ हो गई हैं, और विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर पेरिस जलवायु समझौते तक, और यूएस-एड तक, नए अमरीकी राष्ट्रपति ने एक सरोकारविहीन कारोबारी के जल्लादी रवैये से अपनी हर मानवीय और सामाजिक जिम्मेदारी खत्म कर ली है। सच तो यह है कि संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्थाओं से लेकर जलवायु परिवर्तन से जूझने, मानवाधिकार बचाने, लोकतंत्र मजबूत करने जैसे बहुत से काम करने वाली संस्थाएं अब जिंदगी खो बैठी हैं। किसी ने कल्पना नहीं की थी कि कोई अमरीकी राष्ट्रपति इस तरह मनमानी कर सकता है, और जरूरतमंदों को बेसहारा छोड़ सकता है।

दिक्कत यह भी है कि ट्रम्पस्क नाम की यह जोड़ी दौलत की ताकत, और कारोबारी-मनमानी से इतनी लैस है कि इसके सामने बाकी सबकी बोलती बंद है। कोई भी देश मुंह नहीं खोल सकते, खुद अमरीका के भीतर न सिर्फ विपक्ष की बोलती बंद है, बल्कि ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी ने भी होंठ सिल रखे हैं, और एलन मस्क एक संविधानेत्तर सत्ता की तरह बर्ताव कर रहा है। दूसरे देशों के घरेलू मामलों में टांग अड़ाने वाले, और अंडरवल्र्ड के अंदाज में जुल्मनुमा फतवे देने वाले ट्रम्प और मस्क बुलडोजर की तरह अमरीकी लोकतंत्र और इंसानियत दोनों को कुचले चले जा रहे हैं, और दुनिया को बस यही सोचने का हक रह गया है कि इस जोड़ी को चार बरस पूरे करने में कितना वक्त रह गया है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अभी कुल एक महीना गुजरा है, और तीन साल ग्यारह महीने और गुजरते हुए हो सकता है कि यह दुनिया ही गुजर जाए। इस जोड़ी के रहते हुए अगर सब कुछ खत्म हो जाएगा, तो भी हैरानी की बात नहीं है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 फरवरी 2025



 

भारत-अमरीका रिश्तों में दुधारू गाय की उम्मीद थी, यह बिफरा सांड आ गया..

22 फरवरी 2025 

 

नए अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प की अंतरराष्ट्रीय नीतियों से जो भूचाल आया है, उससे हिन्दुस्तान की जमीन भी हिली हुई है। मोदी सरकार के सामने अपने पहले दस बरसों में विदेश नीति, आर्थिक नीति, और सैन्य नीति की इतनी बड़ी कोई चुनौती नहीं थी जितनी कि इस ग्यारहवें बरस में सामने आई है। ट्रम्प ने दुनिया के अलग-अलग इतने मोर्चों पर एक साथ जंग छेड़ दी है कि हिन्दुस्तान जैसे दूर बसे हुए देश को भी यह समझने में दिक्कत हो रही होगी कि ट्रम्प की किस सनक का भारत पर क्या असर पड़ेगा। अब तक दुनिया में चीन और रूस ये दो अमरीका के अलग-अलग मोर्चों पर दुश्मन माने जाते थे। पिछले अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने अमरीका की पूरी ताकत यूक्रेन के साथ लगाकर रूस को खोखला करने की एक जंग छेड़ रखी थी। जंग हालांकि शुरू रूस ने यूक्रेन पर हमले से की थी, और खुद यूक्रेन ने अपने आखिरी नागरिक तक को झोंककर भी इस जंग में टिके रहने का पुख्ता इरादा दिखाया था, इसलिए यूक्रेन को अमरीका, और योरप के देशों के साथ उसके फौजी संगठन, नैटो का प्रॉक्सी वॉर कहना ठीक नहीं होगा। फिर भी अमरीका और योरप की नीयत यही दिखती थी कि यूक्रेनी लहू की कीमत पर फौजी रसद दे-देकर रूस को खोखला किया जाए। ऐसे तीन बरस गुजर चुके थे कि अमरीकी जनता ने एक बार फिर ट्रम्प को चुन लिया, और अब दुनिया का सबसे बिफरा हुआ सांड परंपरागत बहुत नाजुक विदेश नीति के फैसलों को एक-एक फतवे में तय कर रहा है।

कौन ऐसी कल्पना कर सकते थे कि बाइडन के रहने तक जो अमरीका रूस के खिलाफ सैकड़ों बिलियन डॉलर झोंक चुका था, अब ट्रम्प आकर उसे शून्य तो कर ही देगा, साथ ही यूक्रेन के खनिजों का आधा हिस्सा मांगने लगेगा ताकि अमरीका से उसे मिली फौजी मदद का भुगतान हो सके! यह एक ऐसी अजीब नौबत आ गई है कि अमरीका के सबसे बड़े परमाणु-शत्रु देश रूस का आज अमरीका सबसे बड़ा हिमायती हो गया है, और चीन चूंकि रूस के साथ तालमेल करते हुए चल रहा था, उसे अमरीका के इस फैसले और हमलावर तेवर का साथ देने में कोई दिक्कत नहीं हो रही है। ऐसी नौबत की किसने कल्पना की थी कि अमरीका आज पूरे योरप और यूक्रेन की तरफ देखे बिना भी खुद रूस के साथ मिलकर यूक्रेन का भविष्य तय कर रहा है। उसका यह रूख फिलीस्तीन में भी दिखता है जहां वह फिलीस्तीनियों से बात किए बिना सिर्फ इजराइल के साथ मिलकर यह तय कर रहा है कि गाजा को फिलीस्तीनियों से, उसके मूल निवासियों से खाली करा दिया जाए, और उसे एक कारोबारी निर्माण की तरह विकसित किया जाए। हमलावरों को उनके कब्जे में आई जमीन दे देने की यह नई अंतरराष्ट्रीय गुंडागर्दी संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय तक, सभी के फैसलों के खिलाफ है, लेकिन ट्रम्प आज जिस बिफरे अंदाज में चल रहा है, उससे यह जाहिर है कि वह धरती का ही नहीं, ब्रम्हांड का भी निर्णायक अपने आपको मान रहा है। कल तक योरप के जिन देशों के साथ मिलकर अमरीका की वैश्विक सैनिक रणनीति चल रही थी, आज उसने एक पल में पूरे योरप को खारिज कर दिया है, बल्कि यूरोपीय समुदाय के एक सबसे बड़े देश, जर्मनी के घरेलू चुनावों में पूरी तरह खुलकर दखल दे रहा है, ब्रिटेन के घरेलू मामलों में बयानबाजी कर रहा है, इन सबसे योरप के साथ उसके रिश्ते और सारा शक्ति संतुलन पूरी तरह गड़बड़ा गया है। अमरीका इसके नतीजों से बेफिक्र दिख रहा है, और ऐसा लगता है कि ट्रम्प को अपने कार्यकाल के साथ ही धरती भी खत्म होते दिख रही है कि उसे चार बरस के बाद के अमरीका की कोई फिक्र नहीं है।

भारत को ट्रम्प ने कुछ फैसलों से इतने बेरहम तरीके से उसकी जगह दिखाई है कि भारत और उसके हिमायती देश हक्का-बक्का हैं। उसने जिस अंदाज में भारत के लोगों को वहां से निकालकर सौ-सौ के खेप में फौजी बंधकों की तरह लाकर हिन्दुस्तान में पटक दिया है, वह भयानक है। और अब तो खबर यह है कि वह अमरीका से दूसरे देशों में लोगों को भेजते हुए अमरीकी जमीन से उन्हें जल्द से जल्द हटा देने के लिए पड़ोसी देशों को वेटिंग हॉल की तरह इस्तेमाल कर रहा है, और पनामा की कैद में अपने-अपने देश लौटाए जा रहे वे लोग रहम और हिफाजत मांग रहे हैं। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ट्रम्प से मिलने वाले शुरूआती तीन-चार विदेशी नेताओं में से रहे, लेकिन उनकी इस बातचीत से न तो भारत लौटाए जा रहे लोगों की हथकड़ी-बेड़ी हटी, और न ही भारत को किसी भी किस्म की टैक्स-छूट मिली। ट्रम्प ने बार-बार साफ-साफ शब्दों में कहा कि भारत को जवाबी टैरिफ से कोई रियायत नहीं मिलेगी। और उसका रूख महज भारत के लिए शत्रुता का नहीं है, उसका रूख हर किसी के लिए ऐसा ही है, दिक्कत यह है कि भारत के लोग मोदी और ट्रम्प की चर्चित गलबहियों से बड़ी उम्मीद लगाए हुए थे, लेकिन मोदी अमरीका से बिना कुछ पाए सिर्फ ग्राहक की तरह खरीददारी करके लौटे हैं, वहां के सबसे महंगे फौजी विमान की खरीददारी जो कि कई लोगों के मुताबिक बड़ी महंगी है, और जिन विमानों को अभी कुछ अरसा पहले एलन मस्क ने कबाड़ कहा था।

अमरीका की प्राथमिकता में फिलहाल भारत कहीं नहीं दिख रहा है, और उसने मोदी के अमरीका पहुंचने के पहले ही सबसे महंगी अमरीकी मोटरसाइकिलों, और अमरीकी दारू पर से भारत में लगने वाला टैरिफ घटवा दिया था। भारत सरकार का यह फैसला ट्रम्प-मोदी बातचीत के पहले एक नजराने की तरह था, लेकिन दुनिया भर के देशों से जबराना वसूलने के मूड में बैठे ट्रम्प से मोदी को इस नजराने के एवज में कोई शुकराना नहीं मिला। अब जब रूस-अमरीका, और चीन कम से कम एक बड़े मुद्दे, यूक्रेन पर एक साथ दिख रहे हैं, तो फिर इस साथ का असर कई और जगहों पर भी हो सकता है, और तीन महाशक्तियों का यह नया अघोषित गठबंधन ताइवान और भारत जैसे देशों के लिए फिक्र की बात भी हो सकता है, जिनका कि चीन से टकराव है। इस तरह ट्रम्प ने दुनिया में सारे समीकरण चौपट कर दिए हैं, तमाम गठबंधन प्रसंगहीन बनाकर हाशिए पर धकेल दिए हैं, और अपने आधी-पौन सदी पुराने साथियों को चिलचिलाती धूप में खुला छोडक़र अमरीकी छाता हटा लिया है। भारत के इतिहास में विदेश नीति के सामने भूचाल सरीखी इतनी बड़ी कोई चुनौती कभी नहीं आई थी, और आज बाकी दुनिया की हलचल के साथ-साथ भारत की सोच, पहल, और उसके फैसलों का अध्ययन बड़ा दिलचस्प होगा। अंतरराष्ट्रीय संबंध और विदेश नीति पढ़ाने वाले कामचोरी करने वाले प्राध्यापकों की चर्बी छंटेगी, और उन्हें नए सिरे से सब कुछ समझना, समझाना पड़ेगा।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 फरवरी 2025



 

सरकार और कारोबार पर कब्जे के मुकाबलों में एक बात देखने लायक एक जैसी

 21 फरवरी 2025 

 

सरकार और कारोबार के मुकाबले देखने लायक रहते हैं, एक-दूसरे से नहीं, आपस में, अपने ही भीतर। सरकार बनाने के लिए राजनीतिक दल जिस किस्म के गठबंधन बनाते हैं, वह देखने लायक रहते हैं। सांप और नेवले मिलकर बच्चे पैदा करने लगते हैं, और उनका रूप-रंग कैसा रहेगा, उम्र कितनी लंबी रहेगी, खूबियां और खामियां क्या रहेंगी, इसकी कोई परवाह नहीं की जाती। फिर भारतीय राजनीति में एक नीतीश कुमार हुए हैं जो जिंदगी में कई बार जिंदगी का आखिरी दलबदल कर चुके हैं, और जिनकी सेहत और आदतें ऐसी हैं कि उनकी जिंदगी अभी भी खासी लंबी बची हुई है। वे कई बार और जिंदगी का आखिरी दलबदल कर सकते हैं। सरकार बनाने के लिए, सरकार में बने रहने के लिए, और खासकर मुख्यमंत्री बने रहने के लिए भारतीय राजनीति के बाजार में जो मुकाबला करना पड़ता है, उसमें नीतीश का मुकाबला वहीं बिहार के रामविलास पासवान से रहा है। पासवान की हालत मौसम विभाग के टांगे गए पजामे सरीखी रही जो कि हवा का रूख बताता है, और पासवान जाने कितनी ही सरकारों में लगातार शामिल रहे। राजनीति में कामयाबी या उसके हाशिए पर चले जाना, यह एक बड़ा कड़ा मुकाबला रहता है। और आज जिस दूसरे मुद्दे पर हमने यह चर्चा शुरू की है, वह है कारोबार का, कारोबार में भी कब लोग किनारे लग जाते हैं, इसका कोई ठिकाना नहीं रहता। एक वक्त मोबाइल बाजार पर नोकिया का तकरीबन आधा कब्जा था, और अब वह एक फीसदी भी नहीं रह गया। एक वक्त ब्लैकबेरी मोबाइल बाजार का सबसे प्रतिष्ठित ब्राँड था, आज उसके फोन पेपरवेट की तरह पुरानी यादों को ताजा रखने के काम आते हैं। राजनीति और बाजार, इन दोनों में टिके रहने के लिए रात-दिन की न सिर्फ मेहनत लगती है, बल्कि बड़ी कल्पनाशीलता भी लगती है, और मुकाबले में टिके और डटे रहने के लिए एक हौसला भी लगता है।

वैसे तो राजनीति एक कारोबार भी है, और कारोबार मोटेतौर पर राजनीति से आगे बढऩे वाला धंधा है। आज दुनिया के सबसे बड़े कारोबार अपने देश, या किसी दूसरे देश की सरकार की मेहरबानी से ऐसा एकाधिकार पाते हैं, कि दूसरे कारोबारी उनके मुकाबले टिक नहीं पाते। खुद हिन्दुस्तान में देखें तो एयरपोर्ट और स्टेशनों जैसी सार्वजनिक संपत्तियां, या खदानों जैसे अंधाधुंध कमाई के प्राकृतिक स्रोत सरकार की मेहरबानी से ही मिल और चल पाते हैं। अब अमरीका में दुनिया के इतिहास का ऐसे घालमेल का सबसे बड़ा उदाहरण सामने आया है जब सरकार के साथ सबसे बड़ा कारोबार करने वाला एलन मस्क आज अघोषित रूप से अमरीका की सरकार चला रहा है। भारत में इंदिरा गांधी के वक्त उनके बेटे संजय गांधी की संविधानेत्तर सत्ता की मिसाल को छोड़ दें, तो कहीं और ऐसा नहीं हुआ था कि शासन प्रमुख की कुर्सी के बगल में खड़ा हुआ व्यक्ति, संसद और सरकार के प्रति किसी भी जवाबदेही के बिना सरकार चला रहा हो, और बाकी दुनिया को भी चलाने की भी हर कोशिश कर रहा हो। इसलिए एलन मस्क ने इस मुकाम पर पहुंचने के पहले कारोबार में जितने किस्म के मुकाबले किए हैं, और जीते हैं, उन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के चुनाव पर हर दिन एक मिलियन डॉलर का ईनाम रखने वाले मस्क के पास उतना पैसा पहले से था, तभी ट्रंप की नजरों में भी उसकी कीमत थी। लोग कारोबारी मुकाबले से सरकार तक पहुंच रहे हैं, और सरकार अपने दोस्तों के मार्फत कारोबार तक विस्तार करती है। कुछ लोग इसे क्रोनी कैपिटलिज्म कहते हैं, लेकिन राजनीति और कारोबार इन दोनों के गलाकाट मुकाबले का मिजाज ही ऐसा है कि वहां जंगलराज की तरह सबसे कामयाब, सबसे ताकतवर का अस्तित्व ही बचे रहता है।

भारत की राजनीति पर लौटें तो यह दिखता है कि एक वक्त उत्तर भारत में चुनावी बाजार में नोकिया की तरह कामयाब रही हुईं मायावती का आज का हाल नोकिया के आज के मार्केट शेयर जैसा ही रह गया है। एक वक्त देश के तीन राज्यों में फौलादी पकड़ रखने वाले वामपंथियों के पास आज न हँसिया बचा है, और न हथौड़ा, धान की बाली इतनी ही बच गई है कि उसके कुछ नेता बची जिंदगी दो वक्त की रोटी शायद खा लें, और चूंकि इन नेताओं ने जीवनशैली खर्चीली नहीं रखी है, इसलिए जिंदा भी रह पा रहे हैं। किस तरह कम्युनिस्ट सोवियत संघ टुकड़ा-टुकड़ा हो गया, और किस तरह कम्युनिस्ट चीन आज दुनिया का सबसे बड़ा कारोबारी हो गया, यह देखते ही बनता है। इसलिए दुनिया के दूसरे देशों की हवा का झोंका हिन्दुस्तानी राजनीति में कई झंडे-डंडे उखाडक़र फेंक देता है। इसी तरह आज पूरी दुनिया के देशों में अप्रवासी लोग एक सबसे बड़ा मुद्दा बने हुए हैं, और भारत में भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से यह मुद्दा भाजपा को संसद की दो सीटों से उठाकर पूरी संसद पर काबिज कर चुका है। भाजपा की अपनी राजनीति उसे देश में जितनी भी काम आई हो, आज एक-एक करके दुनिया के बहुत से देश धर्म और अप्रवासियों को लेकर उसी किस्म की विचारधारा की तरफ बढ़ चुके हैं जैसी कि भारत में भाजपा की है। शायद सीधे-सीधे न सही, लेकिन हवा के रूख की तरह तो एक देश दूसरे देश को प्रभावित करता ही है, और इटली से लेकर फ्रांस तक, जर्मनी से लेकर हिन्दुस्तान तक धर्म और राजनीति का हर तरह का गठजोड़, और हर तरह का टकराव सरहदों के पार जाकर असर डालता ही है।

भाजपा की जो आज की कामयाबी है, वह भारत में 2014 के पहले पूरी तरह अकल्पनीय थी। राजनीति के गलाकाट मुकाबले में भाजपा ने जिस हिसाब से अपने आपको अधिक, और अधिक मजबूत बनाना जारी रखा है, वह देखने लायक है। उसकी कामयाबी के पीछे लोकतांत्रिक या अलोकतांत्रिक कई किस्म की बातों के तर्क दिए जा सकते हैं, लेकिन यह बात अपनी जगह अच्छी तरह स्थापित है कि देश और इसके प्रदेशों में इतनी बड़ी और इतनी मजबूत कोई पार्टी कभी आई नहीं। आजादी के वक्त से कांग्रेस को एक किस्म से स्वतंत्रता संग्राम की विरासत और उसके मुआवजे के रूप में देश भर में सत्ता मिली थी, लेकिन आज की भाजपा ने जो कुछ पाया है, वह ऐसी किसी विरासत के बिना अपने दम पर पाया हुआ है, और इसके पीछे की वजहों और कोशिशों को समझने की कोशिश वैसी ही करनी चाहिए जैसे कि बाजार के किसी सबसे कामयाब ब्राँड की कामयाबी को समझा जाता है। 

(Daily Chhattisgarh)

दर्शक पर जबरिया इश्तहार थोपने वाले मल्टीप्लेक्स पर जुर्माना, समय की कीमत...

20 फरवरी 2025 

 

कर्नाटक के एक जिला उपभोक्ता अदालत ने देश के सैकड़ों मॉल्स में सिनेमाघर चलाने वाली कंपनी, पीवीआर-आइनॉक्स पर बहुत देर तक विज्ञापन दिखाने की वजह से एक लाख रूपए का जुर्माना लगाया है। पिछले बरस राजधानी बेंगलुरू में एक परिवार शाम 4.05 बजे की फिल्म देखने पहुंचा, और फिल्म 4.30 बजे शुरू हुई। इस दौरान केवल विज्ञापन दिखाए जाते रहे। इस पर इस दर्शक ने उपभोक्ता अदालत में शिकायत की, वहां से शिकायतकर्ता के पक्ष में फैसला देते हुए उसे मानसिक परेशानी के लिए 20 हजार रूपए, और मुकदमे की लागत के लिए 8 हजार रूपए देने का आदेश हुआ। उपभोक्ता अदालत ने कहा कि लोगों का समय बहुत कीमती है, और किसी को भी दूसरे वक्त और पैसों का अनुचित लाभ उठाने का अधिकार नहीं है। फिल्म को निर्धारित समय से 30 मिनट देर से शुरू करना, और समय का जबर्दस्ती व्यापारिक इस्तेमाल करना गलत है, खासकर ऐसे लोगों के लिए जो व्यस्त रहते हैं। अदालत ने कहा कि लोग तनावमुक्त होने के लिए मनोरंजन चाहते हैं लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उनकी और कोई जिम्मेदारियां नहीं हैं।

आम लोगों को यह बात पता नहीं होगी कि एक समय भारत सरकार के विज्ञापन जारी करने वाले विभाग, डीएवीपी के नियम रहते थे कि किसी अखबार में विज्ञापनों, और संपादकीय सामग्री का अनुपात क्या रहना चाहिए। शायद 40 फीसदी विज्ञापनों की अधिकतम सीमा थी। अब तो सब कुछ इतना बाजारू हो गया है कि महानगरों के बड़े अखबारों में शुरू के कई पेज तो सिर्फ विज्ञापन निकल जाते हैं, तब लोग खबरों तक पहुंच पाते हैं। लेकिन फिर भी अखबारों में इश्तहारों के पन्ने पलटना आसान है, टीवी पर भी लोग चैनल बदल सकते हैं, लेकिन सिनेमाघरों में जाने के बाद लोगों के हाथ सिवाय बर्दाश्त करने के और कुछ नहीं रह जाता। और आजकल के महंगे सिनेमाघरों में इंटरवेल का वक्त खानपान के अंधाधुंध महंगे सामान बेचने में लगाया जाता है जो कि एक अलग मुद्दा है। बाहर से न खानपान सामान ले जाने की इजाजत मिलती, और न ही पानी की बोतल ले जाई जा सकती। मानो कोई विस्फोटक ले जाया जा रहा हो उस अंदाज में मल्टीप्लेक्स के गार्ड तलाशी लेते हैं। किसी जागरूक उपभोक्ता संगठन को ऐसी कारोबारी गुंडागर्दी के खिलाफ भी उपभोक्ता अदालत जाना चाहिए। आज मध्यमवर्गीय परिवार अगर किसी तरह हिम्मत जुटाकर परिवार सहित सिनेमाघर जाए, तो वहां पर वहीं का महंगा सामान खरीदकर खाना-पीना मजबूरी रहती है। यह पहली नजर में एक एकाधिकार के बेजा इस्तेमाल का धंधा दिखता है, और इसका विरोध कई स्तरों पर किया जा सकता है। कोई जागरूक राज्य सरकार भी इसके खिलाफ नियम बना सकती है, और ऐसे एकाधिकारी धंधे को सुधार सकती है।

ग्राहकों में जागरूकता न होने से, और संगठित कारोबार के खिलाफ अदालत तक न जाने से देश के लोगों का बड़ा नुकसान हो रहा है। भारत में खानपान की चीजों पर उनमें मिलाए गए शक्कर और नमक, फैट या दूसरे रसायनों की जानकारी पैकिंग पर साफ-साफ नहीं दी जाती, नतीजा यह होता है कि लोग उसी कंपनी का वही सामान हिन्दुस्तान में कई गुना अधिक शक्कर वाला पाते हैं, और वही सामान पश्चिमी देशों में वहीं कंपनियां कम शक्कर का बेचती हैं। यहां तक कि एक बहुराष्ट्रीय कंपनी भारत में बहुत छोटे दुधमुंहे बच्चों के खाने के लिए बनाए गए डिब्बाबंद बेबी-फूड में कई गुना अधिक शक्कर मिलाकर बेचती आई है, जो कि अभी भारत के कुछ संगठनों ने पकड़ी है। देश में सरकारों से तो ग्राहकों के हक की अधिक हिफाजत की उम्मीद इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि कारोबारी संगठनों की ताकत बहुत अधिक रहती है, और सरकार के भीतर उनकी आर्थिक घुसपैठ भी गहरी और मजबूत रहती है। यही वजह है कि सिगरेट और शराब जैसे सामानों के ब्राँड वाले दूसरे मासूम दिखते सामानों की बिक्री अभी कुछ अरसा पहले तक धड़ल्ले से चलती थी, और ऐसे सरोगेट-इश्तहार पर कोई रोक नहीं लगाई जाती थी। कई दारू कंपनियां अपने ब्राँड की ताश की गड्डियां बनाकर बेचने का दिखावा करती थीं, और सालाना उनका ताश का जो कारोबार रहता था उससे हजारों-लाखों गुना अधिक का वे इश्तहार करती थीं। यह सीधे-सीधे कानून, सरकार, और जनता-ग्राहक से धोखाधड़ी का मामला था, लेकिन हिन्दुस्तान में जिसके पास मोटा पैसा, जिनके धंधे की वकालत करने के लिए कोई कारोबारी संगठन हैं, वे गुटखा और पान मसाला बेचने के भी जरिए निकाल लेते हैं। यह वह देश है जहां सरकार की बार-बार की चेतावनी के बाद भी देश के कुछ सबसे बड़े अखबार लगातार ऑनलाइन सट्टे के इश्तहार छाप लेते हैं, और उन पर कोई कार्रवाई भी नहीं होती है।

हमारा तो यह मानना है कि जो अखबार या टीवी चैनल सोच-समझकर और योजनाबद्ध तरीके से झूठ और नफरत फैलाने का काम करते हैं, उनके खिलाफ भी उपभोक्ता अदालत से लेकर कानून की दूसरी नियमित अदालतों तक जाने का पर्याप्त कानूनी अधिकार रहता है कि लोग अखबार भी खरीदकर पढ़ते हैं, और टीवी चैनलों के लिए भी वे भुगतान करते हैं। एक ग्राहक का यह हक रहता है कि वह उसे मिले सामान में अगर झूठ दिया जा रहा है, तो उसके खिलाफ उपभोक्ता अदालत तक जाए, या कानून की अदालत तक जाए। जिन देशों में ग्राहकों के संगठन मजबूत रहते हैं, या ग्राहकों के हितों के लिए कोई जनसंगठन काम करते हैं, जहां बड़ी कंपनियों और बाजार की साजिशों पर नजर रखने, और प्रयोगशालाओं में उनके जांच करने की जागरूकता रहती है, वहां पर बाजार की गुंडागर्दी और जुर्म कम भी होते हैं। आज हिन्दुस्तान जैसे देश में बाजार के खानपान और फास्टफूड के लिए पैमाने नहीं बनाए गए हैं, जबकि दुनिया भर के सर्वे और शोधकार्य बताते हैं कि ये लोगों की सेहत को बिगाडऩे के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। यह सिलसिला थमना चाहिए। लोकतंत्र में पांच बरस में एक बार जनप्रतिनिधि को चुनना ही जनता की जिम्मेदारी नहीं है, जनता की जिम्मेदारी संविधान और कानून के तहत मिले हर किस्म के हक को लागू करवाने की जिद से ही पूरी हो सकती है। बात सिनेमाघर में लोगों पर इश्तहारों को जबरिया थोपने से शुरू हुई, और दूर तक चली गई। सच भी यही है कि हिन्दुस्तान में सामान या सेवा खरीदने पर कई किस्म का शोषण कदम-कदम पर होता है, और उसके खिलाफ आवाज उठाने की जरूरत है। स्कूल हो, अस्पताल हो, कपड़े-जूते हों, या खानपान हो, या जैसा कि हमने ऊपर जिक्र किया है, टीवी या अखबार हों, हर किसी पर ग्राहक को नजर रखनी चाहिए, और अपने हक के लिए उठ खड़ा होना चाहिए। वकीलों के भी एक तबके को चाहिए कि ग्राहक की जागरूकता से होने वाले फायदे की कुछ मिसालें उपभोक्ता अदालत, और दूसरी अदालतों तक में पेश करें, और इससे हो सकता है कि आगे उनको दूसरे भी कई मामले मिलें। 

(Daily Chhattisgarh)

चौबीसों घंटे बाजार खुलने की छूट से साय सरकार ने दिखाया एक दोस्ताना रूख

19 फरवरी 2025 

 

छत्तीसगढ़ सरकार ने बाजार, कारोबार, और जनता के लिए एक बड़ा दोस्ताना फैसला लिया है। उसने दुकानों पर लागू होने वाले कानूनों को शहरी इलाकों के साथ-साथ अब बाकी प्रदेश पर भी लागू किया है, लेकिन यह नया कानून दस या अधिक कर्मचारियों वाली दुकानों और व्यापार पर ही लागू होगा, इससे छोटे कारोबार इससे मुक्त रहेंगे। कर्मचारियों के काम के दिनों को लेकर पहले से श्रम कानूनों में जो व्यवस्था है वह जारी रहेगी, लेकिन जो सबसे बड़ी चीज इस ताजा आदेश में हुई है वह दुकानों को सातों दिन चौबीसों घंटे खोलने की छूट है। कोई होटल, रेस्त्रां, खानपान की जगह, या मॉल और दुकान अब पूरे वक्त काम कर सकेंगे, शर्त बस यह रहेगी कि कर्मचारियों को साप्ताहिक अवकाश दिया जाए। इसके साथ-साथ कुछ सुरक्षा शर्तों के तहत महिला कर्मचारियों को भी रात में काम करने की छूट रहेगी।

हम अपने इस अखबार में इस कॉलम में, और संपादक के साप्ताहिक कॉलम आजकल में दस-बीस बरस में दर्जन भर से अधिक बार यह बात उठा चुके थे कि सरकार को बाजार बंद करने के धंधे में नहीं पडऩा चाहिए। रात 10 बजे पुलिस घूम-घूमकर लाठी बजाकर पानठेले तक बंद करवाती है, और रेस्त्रां भी इसी वक्त नए ग्राहकों का भीतर आना बंद करते हैं। हमने अजीत जोगी, और रमन सिंह सरकार के समय भी उनके करीबी महत्वपूर्ण अफसरों को लिखकर भी यह सुझाव दिया था, और अखबार में भी कई बार लिखा था कि सरकार को सुरक्षा और मजदूर कानून लागू करने चाहिए, बाजार को अपनी मर्जी से रात-दिन चलने देना चाहिए। आज हालत यह है कि बड़े-बड़े मॉल में करोड़पतियों के पब और बार तो देर रात तक चलते हैं, राजधानी में दर्जनों ऐसे दूसरे ठिकाने देर रात तक दारू और दूसरा नशा परोसते हैं, लेकिन चाय दुकानों को दस-ग्यारह बजे बंद करने का हुक्म दे दिया जाता है। दूसरी तरफ जो पांच सितारा होटल हैं, उन्हें सितारा दर्जा मिलने की शर्त यह रहती है कि वहां चौबीस घंटे कॉफी शॉप चलना चाहिए। गरीब और अमीर की जरूरतों के बीच सरकार की तरफ से यह इतना बड़ा फासला है कि दो-चार सौ रूपए की कॉफी चौबीसों घंटे मिलती है, और दस रूपए की चाय रात दस-ग्यारह बजे बंद हो जाती है। कारखाने, स्टेशन, या कहीं और से लौटते मजदूर या कर्मचारी सडक़ किनारे कुछ खा-पी भी नहीं सकते। हमने यह भी लिखा था कि रात-दिन बाजार खुला रखने की छूट किसी कारोबारी पर रात भर दुकान खोलने की बंदिश नहीं रहेगी, जिसे मर्जी होगी वे रात में कारोबार करेंगे। इससे बाहर से आने वाले सैलानियों और मुसाफिरों को भी सहूलियत मिलेगी, और शहर की सडक़ों पर दिन में पडऩे वाला ट्रैफिक का दबाव भी खत्म होगा, कई लोगों को रात में खानपान और खरीददारी अधिक माकूल रहेगी, और उससे दिन में उतनी गाडिय़ां सडक़ों पर कम रहेंगी। हमने यह बात भी लिखी थी कि खुद कारोबारी रात नौ-दस बजे तक घर पहुंचते हैं, और फिर परिवार को लेकर बाहर निकलने का वक्त मिलता है, तो उस वक्त तक बाजार बंद होने लगता है। चौबीसों घंटे दुकान खुली रखने की छूट होने से वे व्यापारी इसका फायदा उठा सकेंगे जिनके ग्राहक देर रात भी आना चाहते हैं। पहले भी कई शहरों में पेट्रोल पंपों में रात भर खुली रहने वाली छोटे-मोटे सामानों की दुकानें चलती ही थीं। हमारा यह भी मानना है कि रात में देर तक या पूरी रात बाजार में चहल-पहल रहने से गुंडागर्दी और जुर्म भी घटेंगे क्योंकि अंधेरी सूनी सडक़ों पर मुजरिमों का हौसला बढ़ता है।

देर आयद, दुरूस्त आयद। राज्य बनने के बाद से यह पहली सरकार है जिसे कारोबारी और जनता को यह बहुत जायज हक देना सूझा है, और इससे  कारोबार भी बढ़ेगा, और सरकार को टैक्स भी अधिक मिलेगा। कर्मचारियों को जरूर यह लग सकता है कि इससे उन्हें अधिक घंटे काम करना पड़ेगा, लेकिन असल में यह भी हो सकता है कि अब कारोबार दो शिफ्ट चलने लगें, और दोनों शिफ्ट के लिए अलग-अलग कर्मचारियों को रोजगार मिलने लगे। पुलिस के ऊपर जरूर इससे कुछ दबाव बढ़ेगा क्योंकि रात में भी सडक़ों की कुछ चौकसी रखनी पड़ेगी, और बाजार को भी चाहिए कि वह पुलिस के साथ तालमेल बिठाकर अपने सुरक्षा कर्मचारियों का कुछ इंतजाम करे। इसके साथ-साथ शहरों में सीसीटीवी कैमरों जैसे निगरानी नेटवर्क को बढ़ाना चाहिए ताकि जुर्म या ट्रैफिक गड़बड़ी पर तुरंत कार्रवाई हो सके। जहां तक बाजार की बिजली की खपत का सवाल है, तो रात के घंटों में बिजली मांग से अधिक पैदा होती है, और छत्तीसगढ़ को दूसरे राज्यों को यह कम रेट पर बेचनी भी पड़ती है।

सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार बाजार और जनता की जरूरतों को जरूरत से अधिक नियंत्रित कर रही थी, और इसी में कई किस्म का भ्रष्टाचार भी पनपता है। कुछ चुनिंदा कारोबार बहुत देर रात तक चलने देने के लिए एक भ्रष्टाचार पनप जाता है। विष्णुदेव साय सरकार का यह फैसला प्रदेश में पर्यटकों और प्रवासियों के लिए दोस्ताना भी रहेगा जो बाहर से आने पर यहां के बाजार में बारह घंटे का मरघटी सन्नाटा देखते हैं। सरकार के भीतर जिस किसी ने भी ऐसी पहल की है, वे तारीफ के हकदार हैं, और प्रदेश के व्यापारी संगठनों को भी इस छूट का फायदा उठाना चाहिए, और रात के बाजार विकसित करने चाहिए।

(हम इस विषय पर कई बरस पहले लिखे गए और छपे अपने पिछले कुछ संपादकीय सिर्फ ऑनलाईन पढऩे के लिए पोस्ट कर रहे हैं। वेबसाईट पर देख सकते हैं।)

कानून से परे जाकर किसी रिश्ते को बेशर्म कहने का जज को भला क्या हक है?

 19 फरवरी 2025 

 

उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू की गई है जिसमें राज्य के आदिवासियों को छोडक़र बाकी तमाम लोगों पर इसे धर्मों से परे एक सरीखा लागू किया गया है। इस कानून के मुताबिक शादी की उम्र 18 बरस की लडक़ी, और 21 बरस का लडक़ा है। हर शादी का रजिस्ट्रेशन जरूरी है, और तलाक कानून सम्मत आधार पर ही हो सकेगा। इसी तरह तलाक की हालत में गुजारा-भत्ता, और बाकी हिसाब-किताब सभी धर्मों से परे एक सरीखा होगा। संपत्ति और उत्तराधिकार एक सरीखा लागू होगा। लिव-इन-रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होगा ताकि इसके जोड़ीदारों की कानूनी सुरक्षा हो सके, और ऐसे रिश्तों से पैदा हुए बच्चों के अधिकार सुनिश्चित हो सकें। इस तरह के रिश्तों से अलग हुए लोगों की आर्थिक सुरक्षा के प्रावधान भी किए गए हैं। इस समान नागरिक संहिता में बहू विवाह पर रोक लगाई गई है, और दोनों जोड़ीदारों को लैंगिक समानता के अधिकार दिए गए हैं। बाल विवाहों पर प्रतिबंध लगाया गया है, और यूनीफॉर्म सिविल कोड के तहत फैसलों के लिए अदालतें तय की गई हैं। प्रदेश के आदिवासियों को उनकी परंपरा के हिसाब से रहने दिया गया है, और यह नया कानून उन पर लागू नहीं हो रहा है। 

लेकिन 2024 में लागू इस कानून पर आज चर्चा की जरूरत इसलिए आन पड़ी है कि नैनीताल हाईकोर्ट ने इसके तहत लिव-इन-संबंधों के अनिवार्य पंजीकरण को एक चुनौती दी गई है, और इस मौखिक टिप्पणी करते हुए मुख्य न्यायाधीश, जस्टिस जी.नरेन्द्र ने कहा है कि जब आप बिना शादी के निर्लज्जता के साथ रह रहे हैं, तो इसके पंजीकरण से किस निजता का हनन हो रहा है? उन्होंने कहा कि राज्य सरकार बालिग लोगों के साथ रहने के रिश्तों पर रोक नहीं लगा रही है, बल्कि उसके रजिस्ट्रेशन को जरूरी बना रही है।  रजिस्ट्रेशन के इस प्रावधान को निजता का हनन बताते हुए देहरादून निवासी 23 बरस के जय त्रिपाठी ने चुनौती दी थी। उनके वकील ने सुप्रीम कोर्ट के 2017 के एक फैसले का हवाला दिया, और कहा कि उनका मुवक्किल अपने साथी के नाम की घोषणा करना नहीं चाहता, और उसे इसके लिए मजबूर नहीं करना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने इस पर सवाल किया कि ऐसे रिश्ते में रहस्य क्या है? आप दोनों एक साथ रह रहे हैं, आपके पड़ोसी जानते हैं, समाज जानता है, दुनिया जानती है, फिर आप किस गोपनीयता की बात कर रहे हैं? क्या आप गुफा में रह रहे हैं? उन्होंने कहा आप बिना शादी किए बेशर्मी के साथ रह रहे हैं, रजिस्ट्रेशन से किस निजता का हनन होगा? याचिकाकर्ता के वकील ने राज्य की एक घटना का जिक्र किया जिसमें अलग-अलग धर्मों के दो जोड़ीदारों में से युवक की हत्या कर दी गई। ऐसे में रजिस्ट्रेशन से नाम उजागर होगा, और लोग खतरे में पड़ेंगे। 

ऐसा लगता है कि लोग हाईकोर्ट के जज रहते हुए भी अपनी निजी सोच से अपनी टिप्पणियों को प्रभावित होने से नहीं बचा पाते। हम लिव-इन-रिलेशनशिप पर सुप्रीम कोर्ट के दिए हुए फैसले को देखते हैं तो अदालत ने साफ-साफ यह कहा कि यह न तो जुर्म है, और न ही कोई पाप है, फिर चाहे देश का समाज इसे नामंजूर क्यों न करता हो। अदालत ने यह भी लिखा कि ऐसे रिश्तों में महिला को घरेलू हिंसा से बचाने के लिए, और ऐसे रिश्तों में पैदा होने वाले बच्चों को संपत्ति का हक देने के लिए यह फैसला दिया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर ऐसे जोड़े अपने आपको ऐसे रिश्ते में बताते हैं तो उनके बच्चों का संपत्ति पर कानूनी हक रहेगा। 

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह साफ है कि लिव-इन-रिलेशनशिप को न तो जुर्म माना गया है, न पाप माना गया है, और अदालत ने बड़े साफ-साफ शब्दों में यह बात कही है। ऐसे में हमें नैनीताल हाईकोर्ट की टिप्पणी खटकती है जिसमें मुख्य न्यायाधीश ने इसे निर्लज्जता और बेशर्मी करार दिया है। ये विशेषण ऐसे रिश्तों को जुर्म या पाप की तरह ही साबित करते हैं जो कि सुप्रीम कोर्ट के साफ-साफ फैसले के ठीक खिलाफ है। उत्तराखंड का यह कानून भी इसे न जुर्म कहता है, न पाप कहता है, ऐसे में जज का इसे नीची नजरों से देखना खटकता है, क्योंकि मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी को बहुत से लोग एक कानूनी नजरिया मानेंगे, और जिस समाज में इस तरह के रिश्तों में साथ रहने वाले लोगों के खिलाफ जगह-जगह हिंसा देखने में आती है, वहां इससे हिंसक लोगों को इससे एक बढ़ावा मिल सकता है। हमारा ख्याल है कि अदालतों में जजों को अपनी टिप्पणियों और अपने विशेषणों को, अपने विचार को फैसलों तक सीमित रखना चाहिए। बहुत से मामलों में यह देखा जाता है कि जज जुबानी जो बातें कहते हैं, वे बातें औपचारिक फैसले का हिस्सा भी नहीं बनतीं, लेकिन वे जुबानी बातचीत की खबरों से एक धारणा बनने लगती है कि अदालत, यानी जज का इस बारे में क्या कहना है, और जनता जरूरत पडऩे पर अपनी पसंद से उन टिप्पणियों का चुनिंदा इस्तेमाल करने लगती है। वैसे भी जब सुप्रीम कोर्ट ने इसे पूरी तरह से कानूनी मान्यता दी है तो फिर इसे बेशर्मी और निर्लज्जता कहना जायज नहीं है। इस कानून से निजता का हनन  होता है या नहीं, यह एक अलग मुद्दा है, और हाईकोर्ट के पास उस पर फैसला देने का पूरा हक है। इसके बाद जो पक्ष असंतुष्ट रहे, उसके पास सुप्रीम कोर्ट तक जाने का भी पूरा हक रहेगा। लेकिन जो समाज में लोगों का जीना या मरना मुश्किल करने वाली परंपराएं हैं, उस बारे में जजों को अपनी निजी पूर्वाग्रह अलग रखने चाहिए। हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उत्तराखंड सरकार के बनाए कानून में लिव-इन-रिलेशनशिप को किसी भी कोने से शर्म का सामान नहीं देखते।

(Daily Chhattisgarh)

भुनगे जैसे नेताओं का आसमान छूता अहंकार, और बाहुबल प्रदर्शन..

18 फरवरी 2025 

 

राजनीतिक ताकत से गुंडागर्दी आम बात है। जिन पार्टियों की कोई ताकत नहीं होती उनके लोग भी जमीन पर पांव रखना नहीं चाहते। पार्टियों के चिल्हर नेता भी सडक़ पर गाड़ी रोकने पर पुलिस को धौंसियाने लगते हैं कि वे जानते नहीं कि वे कौन हैं? अदना से नेता गाडिय़ों में काली फिल्म लगाए, सायरन और हूटर लगाए, ऊपर तरह-तरह की लाईटें लगवाए, और पदनाम की बड़ी सी तख्ती लगाकर घूमते हैं। इनका कुल जमा मकसद यही होता है कि पुलिस उन्हें न रोके। और पुलिस के रोकने की नौबत ही इसलिए आती है कि सडक़ों के नियम तोड़े जाते हैं। राजनीतिक बाहुबल का यह प्रदर्शन दारू न पीने वाले, नशा न करने वाले पौव्वा दर्जे के नेताओं को भी आत्ममुग्ध नशे में रखता है।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कल पुलिस को शहर युवक कांग्रेस अध्यक्ष को दस साथियों सहित गिरफ्तार करना पड़ा क्योंकि वे इस अध्यक्ष का जन्मदिन चौराहे पर मनाने पर आमादा थे। एक चौराहे से हटाया गया, तो दूसरे चौराहे पर जाकर केक काटा गया, और चारों तरफ अंधाधुंध आतिशबाजी की गई। जबकि अभी एक पखवाड़े पहले ही छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इसी शहर में इसी इलाके में मनाए गए इसी तरह के जन्मदिन पर मामूली कार्रवाई करने पर एक अफसर को सस्पेंड करने, विभागीय जांच करने का आदेश दिया था, और हाईकोर्ट के सख्त रूख को देखकर पुलिस को उस जन्मदिन पर कार्रवाई करनी पड़ी थी। इसी शहर में उसी इलाके में फिर वही हरकत सीधे-सीधे हाईकोर्ट को चुनौती है, और कांग्रेस पार्टी को भी यह देखना चाहिए उसके मवाली किस्म के पदाधिकारी जनता के बीच अब और क्या खोना चाहते हैं? हर चुनाव हारने के बाद भी इस पार्टी के अदना से पदाधिकारी का गुरूर किनारे होने को तैयार नहीं है, और चौराहे पर केक काटना, आतिशबाजी से ट्रैफिक रोकना उन्हें अपनी नेतागिरी की पराकाष्ठा दिख रही है। ऐसे राजनीतिक दलों को धिक्कार है जो अपने पदाधिकारियों और नेताओं के कुकर्मों पर मुंह बंद करके बैठे रहते हैं। और यह हाल सिर्फ कांग्रेस का हो ऐसा भी नहीं है, इसी प्रदेश में बस्तर में भाजपा के एक सांसद अफसरों को मां-बहन की गालियां देते हुए इतने सारे वीडियो में कैद हो चुके हैं कि तैनाती पर बस्तर जाने वाले अफसर परिवार को बाहर के इलाकों में ही छोडक़र जाने लगे हैं। इस सांसद की ताजा गालियों का शिकार एक ऐसा पुलिस अफसर हुआ है जो दो-दो बार राष्ट्रपति पदक से सम्मानित है। अब राष्ट्रपति को यह वीडियो भेजना चाहिए कि वे अपने पदक पर फिर से विचार करें क्योंकि सांसद इस अफसर को गंदी गालियों के लायक ही मानते हैं।

सत्ता की ताकत किसी के साथ हमेशा नहीं रहती। सत्ता बड़ी बदचलन रहती है, और वह घर और यार दोनों बदलते रहती है। लेकिन पारे की तरह अस्थिर सत्ता पर भी लोग अपने अहंकार की ऊंची इमारतें खड़ी कर लेते हैं, और ऐसे लोगों को मुम्बई ट्रैफिक पुलिस के लिए अक्षय कुमार के पुलिस-किरदार वाला एक इश्तहार दिखाना चाहिए जिसमें वह ट्रैफिक नियम तोडऩे वालों को सडक़ के नाम की तख्ती दिखाकर पूछता है कि क्या वे उसी महान व्यक्ति के बेटे हैं, क्योंकि उनकी हरकत तो ऐसी ही है कि सडक़ उनके बाप की हो। इन दिनों कम से कम छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहां हम लोगों को करीब से देखते हैं, राजनीतिक बाहुबल का शक्ति प्रदर्शन सार्वजनिक जगहों पर अंधाधुंध पैमाने पर चलता है। और इन छुटभैये नेताओं के और नीचे के चमचे अपने युवा हृदय सम्राटों से प्रेरणा पाते हुए ट्रैफिक नियमों को तोडऩा अपनी शान दिखाने का पहला कदम मानते हैं। अखबारों को चाहिए कि वे ऐसे नेताओं की हरकतें सामने आने पर उनके प्रदेश अध्यक्षों से पूछें कि क्या यह हरकत उनकी पार्टी की रीति-नीति के मुताबिक है?

वैसे तो राजनीति को पूरी दुनिया में सबसे घटिया लोगों का डेरा माना जाता है, और अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प जैसे लोग मानो डॉक्टरी सलाह पर दिन में चार बार इस घटियापन का प्रदर्शन करते हैं। इसलिए अब बाकी दुनिया में उनसे कम ताकतवर तमाम नेताओं के लिए वे कामयाबी और कमीनगी दोनों का एक बड़ा आदर्श हैं। कम से कम उत्तर भारत की राजनीति में हम नौजवानों को इसीलिए आते देखते हैं कि वे गुंडागर्दी कर सकें, पुलिस से उलझकर भी बच सकें, और अपना आतंक कायम करके सरकारी अफसरों से गलत काम करवा सकें।

आज मीडिया से परे भी सोशल मीडिया के जमाने में जनता को चाहिए कि राजनीतिक गुंडागर्दी खत्म करवाए। लोगों को ऐसी घटनाओं को खुलकर धिक्कारना चाहिए, ऐसे नेताओं की पार्टियों को कटघरे में खड़ा करना चाहिए, उनसे सार्वजनिक रूप से जवाब-तलब करना चाहिए। इसके साथ-साथ जब कभी चुनाव का मौका आए, या किसी पार्टी के नेता सार्वजनिक रूप से किसी कार्यक्रम में पहुंचें, तो उनसे इन घटनाओं को गिनाकर इन पर उनकी राय पूछनी चाहिए। वैसे तो यह काम अपने आपको लोकतंत्र का चौथा स्तंभ का दंभ भरने वाले मीडिया का होना चाहिए था, लेकिन छोटे-छोटे पॉकेट साईज के नेता भी बड़े-बड़े इश्तहार देकर मीडिया को पिछवाड़े तले दबाकर बैठते हैं। जब मीडिया का अपना पापी पेट ऐसे ही लोगों से चलता है, तो वे पार्टियों के नेताओं से कुछ नहीं पूछ सकते, जनता को ही आज सोशल मीडिया पर जवाब-तलब करना चाहिए, और ऐसी घटनाओं को वॉट्सऐप जैसी मैसेंजर सर्विसों से चारों तरफ बांटना चाहिए। सार्वजनिक धिक्कार ही किसी पार्टी या उसके नेताओं को सुधार सकती है, वरना पार्टियों में ओहदे तो आजकल उस अंदाज में बिकते हैं जिस अंदाज में राज्यसभा की सदस्यता, या चुनावी उम्मीदवारी बेचने के लिए एक बहनजी बदनाम हैं। लोग अपनी नागरिक जिम्मेदारी पूरी करें, और किसी प्रेरणा के लिए मीडिया की तरफ न देखें।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 17 फरवरी 2025



 

भारत की असमानता के लिए जनता किसे मानती है जिम्मेदार, चौंकाता है!

17 फरवरी 2025 

 

अमरीका के एक प्रतिष्ठित शोध संस्थान, प्यू रिसर्च सेंटर ने 2024 में 36 देशों में असमानता के ऊपर एक रिपोर्ट तैयार की जिसमें अलग-अलग देशों के अलग-अलग पहलू सामने आए। भारत में जो सर्वे किया गया उसमें 81 फीसदी लोगों ने आर्थिक असमानता पर फिक्र जाहिर की, और 64 फीसदी लोगों ने इसे बहुत बड़ी समस्या बताया। लोगों ने असमानता के कई तरह के कारण बताए। 79 फीसदी लोगों ने कहा कि संपन्न तबके के पास बहुत अधिक राजनीतिक ताकत है जिससे असमानता उपजती है। 72 फीसदी ने देश की शिक्षा व्यवस्था को नाकाफी बताया। 56 फीसदी लोगों ने धर्म, नस्ल, या संप्रदाय के भेदभाव को असमानता बढऩे के लिए जिम्मेदार ठहराया। सर्वे में हिस्सा लेने वाले आधे-पौन हिस्से ने मशीनीकरण और कम्प्यूटरीकरण को जिम्मेदार ठहराया, और समान अवसर न मिलने को भी। लेकिन दूसरी तरफ भारत में हुए इस सर्वे में तीन चौथाई लोगों का यह मानना है कि उनके बच्चों की स्थिति उनके मुकाबले बेहतर रहेगी। 44 फीसदी लोगों ने यह माना है कि लैंगिक (कुछ लोग इस शब्द को भी पुरूषवादी मानकर इसके इस्तेमाल के खिलाफ खड़े हो रहे हैं, फिर भी हम अभी प्रचलन में जारी इस शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं-संपादक) असमानता को बहुत बड़ी समस्या मान रहे हैं। 71 फीसदी भारतीयों ने यह माना है कि धार्मिक भेदभाव बड़ी समस्या है, और 57 फीसदी लोगों ने इसे बहुत बड़ी समस्या माना है। 69 फीसदी भारतीय मानते हैं कि जाति या समुदाय के आधार पर भेदभाव एक बड़ी समस्या है।

2024 में किया गया यह सर्वे अभी पांच हफ्ते पहले सामने आया था, और अलग-अलग देशों में इसका अलग-अलग विश्लेषण जारी है। भारत को लेकर बहुत सी विदेशी और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सर्वे या दीगर विश्लेषण भारत सरकार को पसंद नहीं आते हैं, और सरकार कई बार इन्हें ऐसे पैमानों पर किया गया बताती है जो कि भारत पर लागू नहीं होते हैं। सरकारों की अपनी कई तरह की मजबूरी रहती है क्योंकि निर्वाचित लोकतंत्र में सरकारें, जनता की राजनीतिक भावना से परे कम सोच पाती हैं। लेकिन भारत में आज जिस तरह का धार्मिक और सांप्रदायिक भावनाओं का माहौल बना हुआ है, उसमें प्यू रिसर्च सेंटर का यह सर्वे कुछ हैरान करता है। यह बताता है कि 70 फीसदी भारतीय धार्मिक और जातिगत भेदभाव को एक बड़ी समस्या मानते हैं। जबकि भारत में बहुसंख्यक हिन्दू तबका ही 80 फीसदी से अधिक आबादी है, और बची हुई 20 फीसदी आबादी में मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, जैन, सिक्ख, और दूसरे धर्मों के लोग हैं। ऐसे में 70 फीसदी हिन्दुस्तानी अगर धार्मिक और जातिगत भेदभाव को बड़ी समस्या मान रहे हैं, तो जाहिर है कि इनमें हिन्दुओं का भी बहुत बड़ा हिस्सा शामिल है। बाकी धर्मों के सारे के सारे  लोग भी इस सोच का समर्थन कर रहे हों, तब भी हिन्दुओं की आधी से अधिक आबादी इस सोच के साथ है। यह राहत की एक बात इसलिए है कि हिन्दू आबादी का बड़ा हिस्सा इसे समस्या मान रहा है। सर्वे का दूसरा एक नतीजा बताता है कि 80 फीसदी भारतीय संपन्न तबके के बढ़ते हुए राजनीतिक प्रभाव को आर्थिक असमानता बढ़ाने का सबसे बड़ा कारण मान रहे हैं। देश में पूंजीवादी व्यवस्था की वजह से असमानता बढऩा सभी जानते हैं, और काफी लोग मानते हैं। लेकिन सर्वे में अगर तकरीबन तमाम हिन्दुस्तानी इस बात को मान रहे हैं, तो उसका मतलब है कि वे जमीनी हकीकत जान रहे हैं। अब सवाल यह है कि ऐसे भेदभाव के लिए जिम्मेदार पार्टियां या गठबंधन अगर इसके बावजूद चुनावों में जीत हासिल करते हैं, तो उसका एक मतलब यह है कि मतदाता के सामने कोई विश्वसनीय-विकल्प मौजूद नहीं है, और उसे असमानता बढ़ाने वाली ताकतों को चुनने की मजबूरी दिखती है।

अब इस तरह के अंतरराष्ट्रीय सर्वे को खारिज कर देना तो बड़ा आसान है, लेकिन ऐसे सर्वे से सीख और नसीहत लेना अधिक काम की बात हो सकती है। यह एक अलग बात है कि भारत की चुनावी व्यवस्था कुछ ऐसी हो गई है कि जाति या धर्म की, संप्रदाय या क्षेत्र की भावनाएं जमीनी हकीकत के साथ मिलकर एक चुनावी विकल्प पेश करती हैं, और उनमें आर्थिक हकीकत पर धार्मिक हसरत हावी हो जाती है। इसलिए चुनावी नतीजों को सामाजिक स्थिति का सीधा-सीधा प्रतिबिंब मानना ठीक नहीं होगा। दुनिया के अलग-अलग बहुत से सर्वे ऐसे आंकड़े बीच-बीच में सामने रखते हैं कि भारत में आर्थिक असमानता कितनी अधिक है, और किस तरह अतिसंपन्न तबका और अधिक संपन्न हुए जा रहा है, और नीचे के सबसे गरीब लोग गरीब ही बने हुए हैं। हालांकि भारत सरकार के कुछ आंकड़े यह दिखाते हैं कि दसियों करोड़ लोग पिछले दस बरस में गरीबी की रेखा के ऊपर लाए जा चुके हैं, लेकिन भारत सरकार कुछ रहस्यमय वजहों से देश के भीतर के केन्द्र सरकार के कराए हुए कई आर्थिक सर्वेक्षणों के आंकड़े जारी नहीं करती है, और उसने कई पैमानों और परिभाषाओं को बदल भी दिया है, इसलिए उसकी पेश की हुई तस्वीर को लोग अधिक भरोसेमंद नहीं मानते हैं।

फिलहाल हम इस बात को लेकर राहत की सांस लेते हैं कि अगर प्यू रिसर्च सेंटर का सर्वे सही है, और आम हिन्दुस्तानियों का 70 फीसदी यह बात मानता है कि धर्म और जाति का भेदभाव देश में आर्थिक असमानता की बड़ी वजह है, और 80 फीसदी लोग अमीरों के राजनीतिक प्रभाव को इस असमानता का गुनहगार मानते हैं, तो ऐसा लगता है कि लोग चुनावों में वोट कई वजहों से किसी को देते होंगे, लेकिन ऐसे सर्वे में उन्होंने अपनी सही समझ उजागर की है। हम यह तो नहीं जानते कि भारत के राजनीतिक दल इन तथ्यों को अपने किसी चुनावी इस्तेमाल का मानेंगे या नहीं, लेकिन जनता के बीच ऐसे नतीजे पहुंचने से उसे चीजों को समझने में आसानी होगी, हालांकि ये नतीजे उसी से की गई बातचीत के आधार, उसी के जवाबों के आधार पर निकाले गए हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

सकारात्मक खबरों के लिए मीडिया का मोहताज रहना जरूरी तो नहीं...

16 फरवरी 2025 

दुनिया में अच्छी खबरें भी कम नहीं रहती हैं, लेकिन उनमें से चर्चा में वे ही खबरें आती हैं जिनमें बहुत सी नाटकीयता होती है, किसी फिल्म किस्म की कहानी रहती है, या जो बिल्कुल ही अविश्वसनीय दर्जे की रहती हैं। रोजाना की जिंदगी की छोटी-छोटी बुरी खबरें भी सतह पर तैरते दिखती हैं, लेकिन अच्छी खबरों का बहुत अधिक अच्छा रहना जरूरी रहता है। ऐसी ही एक अच्छी कहानी अभी योरप और अमरीका के बीच सामने आई है।

नीदरलैंड्स में रह रही एद्री पैंडलटन का अपने साथी से रिश्ता टूटा था, और उसे इसके बाद अपने बूढ़े पालतू कुत्ते को लेकर अमरीका के कैलिफोर्निया अपने घर लौटना था। उसने बहुत सी एयरलाईंस को देखा, लेकिन वे कुत्तों को पार्सल की तरह ढोती थीं, और अपने बूढ़े कुत्ते को एद्री उस तरह ले जाना नहीं चाहती थी। ऐसे में उसने लोगों से सलाह और मदद के लिए एक वीडियो बनाकर टिकटॉक पर डाला। उसमें कुत्ते का जिक्र था, फ्लाईट का जिक्र था, तो टिकटॉक पर मौजूद एक जर्मन पायलट, निकलस ने उसे देखा, और उसका जवाब लिखा। कुत्ते को लेकर कैलिफोर्निया जाने की बात तो शुरू हुई लेकिन वह जल्द ही इन दोनों के बीच दोस्ती में बदल गई, ऑनलाईन वीडियोकॉल बात होने लगीं, दोस्ती मोहब्बत में बदल गई, और दोनों ने शादी कर ली। अब कैलिफोर्निया जाना रह गया, और दोनों स्विटजरलैंड में बस गए हैं।

इस किस्म की बहुत सी दिलचस्प और सकारात्मक कहानियां जो असल जिंदगी से निकलीं असली भी हैं, वे बीच-बीच में सामने आती हैं, लेकिन बुरी और नकारात्मक खबरों के सैलाब के बीच वे किनारे बह जाती हैं। अभी कुछ ही दिन पहले भारत में सकारात्मक खबरों की एक वेबसाइट, बेटरइंडिया में एक कहानी आई कि किस तरह केरल में अपने घर में काली मिर्च तोड़ते हुए एक बुजुर्ग कुएं में गिर गया। 64 बरस के रमेशन को बचाने के लिए 56 बरस की उसकी पत्नी पद्मा रस्से से 40 फीट गहरे कुएं में तुरंत उतरी, और 20 मिनट बाद फायरब्रिगेड के पहुंचने तक उसने पति को पानी में उठाकर रखा था कि वह डूब न जाए। बाद में जाल डालकर इन्हें निकाला गया।

लोगों को चाहिए कि अपने बच्चों, परिवार के लोगों, और आसपास के दायरे में जिंदगी के प्रति एक सकारात्मक आस्था पैदा करने वाली ऐसी सच्ची घटनाओं को आगे बढ़ाएं, उन पर चर्चा करें। स्कूलों को भी चाहिए कि वे बच्चों का उत्साह बढ़ाएं कि वे बड़ों से पूछकर या कहीं ढूंढकर सकारात्मक खबरों की कतरनें लेकर आएं, और फिर उनमें से चुनिंदा कतरनों को स्कूल में बाकी लोगों के पढऩे के लिए किसी नोटिस बोर्ड पर लगाया जाए। इन दिनों सोशल मीडिया की मेहरबानी से यह आसान हो गया है कि लोग अपनी पसंद की बातों को, तस्वीर या वीडियो को भी मुफ्त में बहुत से लोगों तक पहुंचा सकते हैं, और जिंदगी और दुनिया के प्रति जमी हुई निराशा दूर हो सकती है।

मीडिया के अपने मिजाज के मुताबिक नकारात्मक खबरें अधिक जगह पाती हैं, और अधिक चर्चा में रहती हैं। लेकिन मुख्यधारा के मीडिया से परे सकारात्मक खबरों के अपने पेज और ग्रुप बने हुए हैं, बनते और बढ़ते भी जा रहे हैं, जिन्हें बड़ी संख्या में लोग देखते हैं। हमें भी कुत्ते और पायलट वाली यह खबर बीबीसी के एक साप्ताहिक पॉडकास्ट, हैप्पीपॉड पर सुनने मिली, और फिर मामूली सी तलाश पर इंटरनेट पर इनकी और जानकारी भी मिल गई।

आज तमाम लोगों को यह दिक्कत रहती है कि उनके बच्चे इंटरनेट और सोशल मीडिया का क्या इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें खबर नहीं रहती। ऐसे में लोगों को चाहिए कि सकारात्मक खबरों की जांच-पड़ताल करने के बाद उनके सही निकलने पर उनके लिंक अपने आसपास के लोगों को बढ़ाएं ताकि उनका देखना-पढऩा, सोचना, और आसपास बात करना सब कुछ में सकारात्मकता बढ़े।

अभी मैंने दो दिन पहले ही हमारे यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल के लिए छत्तीसगढ़ के एक आदिवासी पद्मश्री काष्ठशिल्पी और समाजसेवी अजय मंडावी से बातचीत की। वे बस्तर के कांकेर के पास दो गांवों में वहां के स्कूली बच्चों के साथ एक नया अभियान चला रहे हैं। जिन स्कूली बच्चों के घर पर कोई पेड़ लगाने की जगह है, वहां पर वे ऐसे बच्चे छांटकर स्कूल शिक्षक-शिक्षिका के साथ उनके घर जाते हैं, वहां पौधा लगाते हैं, और उन बच्चों को दस रूपए महीने देते हैं कि उन्हें पौधे का रखरखाव करना है। वे तीन बरस तक बच्चों को यह पैसा देने वाले हैं ताकि पौधा मजबूत हो जाए।

इस बातचीत में अजय मंडावी ने बताया कि ऐसे 45 बच्चों में से एक बच्चा टीचर के पास दस रूपए लेकर आया, और कहा कि पैसा वापिस ले लो, मेरा पौधा मर गया है। अब पौधा जिस किसी वजह से मर गया हो, बहुत मामूली कपड़ों में उस गरीब आदिवासी स्कूली बच्चे को यह जिम्मेदारी सूझ रही थी कि वह पैसा लौटाए क्योंकि अब पौधा ही नहीं रह गया है। एक गरीब बच्चे की यह नैतिकता और ईमानदारी, और उसकी जिम्मेदारी की भावना हिलाकर रख देती है, और अगर इसी एक सच्ची घटना को बाकी बच्चों के सामने रखा जाए, तो हो सकता है कि उनमें से बहुत से बच्चे भी किसी दुविधा में फंसने पर एक सही नैतिक फैसला ले सकें जो कि उनके तात्कालिक फायदे से परे का होगा, और समाज के सामने एक अच्छी मिसाल भी रहेगा।

अजय मंडावी अपने जेब के पैसों से अब तक 45 बच्चों को पौधा-परवरिश भत्ता दे रहे हैं, और अपनी क्षमता रहने तक इसे आगे भी बढ़ाने वाले हैं। अब नेक नीयत से उनके शुरू किए गए इस काम का भी शायद यह असर पड़ा होगा कि उनसे 10 रूपए पाने वाला बच्चा भी पौधा मर जाने पर रकम लौटाने आ गया। लोगों को असल जिंदगी की सच्ची कहानियां देखकर दूसरों तक बढ़ाना चाहिए ताकि यह समझ पड़े कि दुनिया में सिर्फ बलात्कारी और हत्यारे ही नहीं भरे हुए हैं, सिर्फ चोर और बेईमान ही नहीं भरे हुए हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 16 फरवरी 2025



 

कुंभ यात्रियों की ऐतिहासिक भीड़ बिना किसी इंतजाम थी, स्टेशन पर भगदड़, 18 मौतें..

 16 फरवरी 2025 

 

महाकुंभ के लिए प्रयागराज जाने वाले रेल मुसाफिरों की भीड़ में भगदड़ मचने से बीती रात नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर करीब डेढ़ दर्जन लोगों की मौत हो गई है। पहले तो रात घंटों तक मौतों को अफवाह बताया जाता रहा, ठीक उसी तरह जैसे कि कुंभ में जब आधी रात बाद और सुबह के पहले हुई भगदड़ में 30 लोग मारे गए थे, लेकिन राज्य सरकार ने 24 घंटे तक मौतों का कोई जिक्र ही नहीं किया, और चारों तरफ यही अपील की जाती रही कि लोग अफवाह न फैलाएं। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने भी अपने वीडियो बयान में अफवाहों का खूब जिक्र किया, लेकिन मौतों का नाम भी नहीं लिया। सरकारों के स्तर पर यह एक बड़ी अजीब बात है कि तथ्यों को जनता के सामने साफ-साफ रखने के बजाय सामने पड़ी लाशों को भी छुपाया जाए। खैर, कल नई दिल्ली स्टेशन पर जैसी भीड़ थी वैसी वहां के कुलियों ने छठ पूजा के लिए बिहार जाने वाली भीड़ के दौरान भी नहीं देखी थी। इस अभूतपूर्व और असाधारण भीड़ के नजारे सोशल मीडिया पर वीडियो में दिख रहे थे, और इसके बाद जब वहां कुछ गाडिय़ों के रद्द होने और कुछ के प्लेटफॉर्म बदलने की घोषणा हुई, तो सब कुछ तहस-नहस हो गया। जब दसियों हजार लोग किसी पैदल-पुल से प्लेटफॉर्म बदलते हों, और वहां पर ट्रेन तक पहुंचने की हड़बड़ी भी हो, तो बेकाबू भगदड़ में इतनी कम मौतें कैसे हुईं, यही हैरानी की बात है। यह एक अलग बात है कि मौतों के आंकड़े सीमित रहने के पीछे सरकार के किसी इंतजाम का हाथ नहीं है, दसियों हजार लोगों के बीच जब स्टेशन पर चलने-फिरने की जगह भी नहीं थी, तब वहां तकरीबन नामौजूद रेलवे या दीगर किस्म की पुलिस के रहने से भी बहुत फर्क नहीं पड़ सकता था, क्योंकि किसी भी कीमत पर ट्रेन में चढऩे पर आमादा ऐसी बेतहाशा भीड़ पर काबू पाना शायद फौज के लिए भी आसान नहीं रहता।

जब से कुंभ शुरू हुआ है तब से जिस तरह की भीड़ रेलगाडिय़ों में दिख रही है, वह हैरान करती है कि आस्थावान लोग क्या सोचकर इतना खतरा उठा रहे हैं। कई स्टेशनों के वीडियो देखने मिले हैं कि लोग बांस और बल्लियों से बंद डिब्बों के कांच फोड़-फोडक़र भीतर घुस रहे हैं, और भीतर-बाहर के मुसाफिरों के बीच खुला टकराव चल रहा है। यूपी सरकार हर दिन करोड़-दो करोड़ लोगों के पहुंचने के आंकड़े जारी कर रही है, रेलगाडिय़ां कहीं चल रही हैं, कहीं रद्द हो रही हैं, और सडक़ों का हाल यह है कि किसी-किसी तरफ तो ढाई-तीन सौ किलोमीटर तक सडक़ें जाम हैं। कारें दो-दो दिन अपनी जगह पर फंसी हुई हैं, और उनमें कई जगह बूढ़े लोग, बच्चे, और महिलाएं फंसे हुए हैं। यूपी से दूर मध्यप्रदेश के भीतर सैकड़ों किलोमीटर परे सरकार घोषणा कर रही है कि लोग आगे न जाएं, मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि सरकार और भाजपा के लोग, दूसरे सामाजिक कार्यकर्ता लोगों की मदद करें।

ऐसा भी नहीं कि कुंभ इसके पहले कभी हुआ नहीं है। इस बार के कुंभ को 144 बरस में आया हुआ बताकर जिस तरह से उसका प्रचार किया गया है, उससे बहुत से लोगों को लगा कि अगर यह मौका चूका तो उनकी जिंदगी में दुबारा यह बारी नहीं आएगी। अपनी धार्मिक आस्था के चलते जितने लोग वहां पहुंचे रहते, वे पहुंचे रहते, लेकिन इस बार कुंभ का रिकॉर्ड बनाने के लिए यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने हफ्तों या महीनों पहले से जिस तरह का विज्ञापन अभियान शुरू किया था, उससे लोगों के बीच आस्था की एक उत्तेजना बढ़ती चली गई, और लोगों न इंतजाम देखा, न खतरा देखा, और न अपनी ताकत देखी, वे बस उठे और कुंभ के लिए रवाना हो गए। नतीजा यह निकला कि जिस तरह भगदड़ के वक्त कुंभ में करोड़ों लोग इकट्ठा बताए जा रहे हैं, वे वहां किसी सुरक्षा इंतजाम के तहत नहीं थे, वे बस वहां पहुंचे हुए थे। इस किस्म की भीड़ को बढ़ावा देना किसी भी सरकार के लिए उसकी क्षमता से कई गुना बड़ी चुनौती थी, और कुंभ में अब तक यही चल भी रहा है। सिर्फ नई दिल्ली ही नहीं, देश के बहुत से रेलवे स्टेशनों पर कुंभ जाते लोगों की भीड़ और उसकी हिंसा के शिकार आरक्षित सीटों के दूसरे मुसाफिरों की कहानियां भयानक हैं।

अब 144 बरस में एक बार आया यह दुर्लभ मौका बताकर जितने अधिक तीर्थयात्री यूपी में जुटाए गए हैं, वे किसी तरह की हिफाजत का दावा नहीं कर सकते। वे असंभव किस्म की गिनती में वहां पहुंचे हुए हैं, और सरकारी सार्वजनिक न्यौतों के बावजूद उनकी अपनी अक्ल किनारे रखने की उम्मीद उनसे नहीं की जाती है। जो दो बड़े हादसे कुंभ और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर सामने आए हैं, उनसे कई गुना अधिक बड़ा खतरा मंडरा रहा था, और अभी भी मंडरा रहा है। किसी भी जिम्मेदार सरकार के लिए ऐसी बेकाबू और बेतहाशा भीड़ जुटाने की कोशिश, सार्वजनिक रूप से रात-दिन दुहराए जा रहे न्यौते किसी समझदारी का काम नहीं थे। केन्द्र सरकार और यूपी सरकार दोनों कुंभ को लेकर टक्कर के उत्साह में थीं, और सडक़ों से लेकर पटरियों तक किसी की भी क्षमता ऐसे उत्साह के लायक नहीं थी। महाकुंभ का यह डेढ़ महीने का आयोजन बहुत कुछ गुजर चुका है, इसलिए अब इसमें किसी तरह के पुनर्विचार की कोई चर्चा फिजूल है। लेकिन हम लोगों के लिए अपनी यह सलाह जरूर सामने रख रहे हैं कि ठोस इंतजाम रहते हुए भी उन्हें ऐसे मौके पर कुंभ जाने के पहले कई बार सोचना चाहिए क्योंकि वहां बिना इंतजाम पहुंचने वाली भीड़ के बीच उनका अपना इंतजाम जाने कितना कायम रह पाएगा। केन्द्र और राज्य सरकारों की मिलीजुली क्षमता और योजना शायद आस्थावानों की सामान्य भीड़ का इंतजाम कर पाती, लेकिन न्यौता देकर बढ़ाई गई भीड़ ने यह साबित कर दिया है कि सरकारों के इंतजाम निहायत नाकाफी रहे, और जनता अगर किसी बड़े हादसे से बची है, तो वह महज एक संयोग है, सरकारी इंतजाम किसी खतरे को टालने लायक बिल्कुल नहीं थे। 

(Daily Chhattisgarh)