समाज के सबसे अंधेरे हिस्से में भी रौशनी लाने से होगी असली दीवाली

30 अक्टूबर 2024

 

आज जब उत्तर भारत पूरा का पूरा दीवाली मनाने की तैयारी कर रहा है, तब कुछ घर ऐसे होंगे जहां अंधेरा छाया होगा। परिवार के भीतर तरह-तरह की हिंसा और जुर्म के शिकार होने वाले लोग भला क्या त्यौहार मनाएंगे। लेकिन ऐसे में ही यह सोचने की जरूरत है कि बाकी जगहों पर दियों और दीगर किस्म की रौशनी पहुंच रही है, तो कई जगहों पर छाए अंधेरे को दूर करने की क्या कोशिश हो सकती है? और फिर जिन परिवारों में एक बार हिंसा का अंधेरा छा चुका है, उन्हें तो रंग-बिरंगी चीनी लडिय़ों से भी रौशन नहीं किया जा सकता। सरकार और समाज को सोचना यही है कि अंधेरा होने से कैसे रोका जा सकता है। आज की ही दो खबरें हमारे बिल्कुल आसपास की हैं जिनमें से एक में रायपुर रेलवे स्टेशन पर नशे में धुत्त सौतेले बेटे ने नशे में धुत्त बाप को चाकू से मार डाला। शाम को भीड़भरे रेलवे स्टेशन पर लाश पड़ी हुई थी, और अब ऐसे परिवार में भला क्या दीवाली हो सकती है? एक दूसरी वारदात छत्तीसगढ़ के ही कोरबा जिले की है जहां पर रोज शराब पीकर घर आकर मारपीट करने वाले बेटे से थककर बाप ने धुत्त बेटे को मार डाला। अब ये बूढ़े मां-बाप कमाने-खाने के लिए छत्तीसगढ़ से हर बरस जम्मू-कश्मीर चले जाते हैं, और अभी दीवाली मनाने के लिए वहां से लौटे ही थे कि नशेड़ी बेटे ने इतना प्रताडि़त किया, इतनी हिंसा करने लगा कि हजारों किलोमीटर के सफर से आए बूढ़े बाप ने उसे मार डालना ठीक समझा।

यह कोई आम नौबत नहीं रहती है कि औलाद बाप को मार दे, या मां-बाप औलाद को मार दें। लोगों को याद होगा कि कुछ हफ्ते पहले की ही बात है कि एक नशेड़ी बेटे की हिंसा से थककर बूढ़े मां-बाप ने मिलकर उसे पकड़ा, और मार डाला था। हर हफ्ते परिवार के भीतर नशे की हालत में कत्ल के एक से अधिक मामले आते हैं। अब छत्तीसगढ़ जैसे राज्य को यह समझने की जरूरत है कि सरकार की अलग-अलग योजनाओं से आम जनता को जितने पैसे मिलते हैं, उनकी मेहरबानी से बहुत से लोगों में शराब की खपत खासी बढ़ गई है। शराब से सरकार को टैक्स की कमाई तो होती है, लेकिन शराब की वजह से सेहत की जितनी बर्बादी होती है उसके इलाज का खर्च तो कुल मिलाकर सरकारी स्वास्थ्य-बीमा योजनाओं पर ही आता है। इसके साथ-साथ दो बातें और जुड़ी रहती हैं, एक तो जितने किस्म की हिंसा होती है, उसके निपटारे का जिम्मा सरकार की पुलिस, सरकारी खर्च पर चलने वाली अदालतों, और जेलों पर आता है। परिवार के भीतर के हिंसा का आर्थिक बोझ सरकार पर भी भारी पड़ता है। तीसरी बात, हिंसा के शिकार परिवारों की आर्थिक उत्पादकता बहुत बुरी तरह प्रभावित होती है, और देश को उसकी भरपाई किसी तरह नहीं हो पाती। ऐसे परिवार हिंसा का शिकार होकर अपने बच्चों को इसके असर से नहीं बचा पाते, और उनके बड़े होने पर उनके भी हिंसक हो जाने का एक खतरा बढ़ जाता है, और उनके बेहतर नागरिक बनने की संभावना घट जाती है। शराब या किसी दूसरे किस्म के नशे से शुरू होने वाली हिंसा का सिलसिला बहुत दूर तक नुकसान पहुंचाता है, और इसे सिर्फ नशेड़ी की सेहत तक सीमित मान लेना नासमझी होगी।

हम इस बारे में जरूरत से कुछ अधिक बार लिखते और बोलते हैं क्योंकि कानूनी शराब से परे गैरकानूनी शराब का चलन भी बढ़ते चल रहा है, जिसके कोई आंकड़े न सेहत के हिसाब से, और न ही टैक्स के हिसाब से सामने आते। फिर केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह छत्तीसगढ़ आकर यह बोल गए हैं कि इस राज्य में गांजे की खपत पूरे देश के औसत से बहुत अधिक है। और छत्तीसगढ़ की पुलिस हर दिन दर्जन भर से अधिक जिलों में गैरकानूनी दर्जे के नशे का कारोबार पकड़ती है, लोगों को गिरफ्तार करती है। आम तजुर्बा यह रहता है कि किसी अवैध कारोबार का बहुत छोटा सा हिस्सा ही सरकार पकड़ पाती है क्योंकि पूरे देश में कदम-कदम पर फौजी दर्जे की चौकसी तो हो नहीं सकती। नशे की यह बढ़ती हुई नौबत एक खतरनाक तस्वीर पेश कर रही है, और जब हम इसे परले दर्जे की पारिवारिक हिंसा से जोडक़र देखते हैं तो लगता है कि घर के भीतर की एक-एक हिंसा के पीछे शायद नशे में बर्बाद होते लाखों परिवार रहते होंगे। नशे में डूबे लोग सडक़ों पर चाकूबाजी कर रहे हैं, अपने ही बच्चों को पटककर मार डाल रहे हैं, अपने बच्चों से बलात्कार कर रहे हैं।

यह नौबत मामूली मानना गलत होगा। सरकार को पुलिस के आंकड़ों से परे इस बात का गंभीर सामाजिक अध्ययन करवाना चाहिए कि नशे के पीछे की कौन सी वजहें हैं, और नशे के बाद किस-किस किस्म की हिंसा कहां तक पहुंच रही है। यह भी सोचना चाहिए कि सरकार को नशे से कमाई कितनी होती है, और उस पर नशे से होने वाली बर्बादी का प्रत्यक्ष और परोक्ष बोझ कितना पड़ता है। हम नशे की समस्या और खतरे का कोई आसान इलाज नहीं देखते, लेकिन किसी भी जनकल्याणकारी सरकार को ऐसा गंभीर सामाजिक अध्ययन करवाना चाहिए कि नशे को घटाने का क्या कोई रास्ता निकल सकता है? या जनता में ऐसी जागरूकता लाई जा सकती है कि वे नशे के बजाय जिम्मेदार मां-बाप बनकर अपने बच्चों पर अधिक खर्च करें? सामाजिक अध्ययन को चुनावी फतवों, और सरकारी योजनाओं से परे रखना चाहिए, उसे एक स्वतंत्र रिपोर्ट की तरह हासिल करना चाहिए, फिर चाहे सरकार उसके किसी हिस्से पर अमल करे या न करे। इसके लिए सरकार को देश के विख्यात संस्थानों का इस्तेमाल करना चाहिए जिनके लिए खुद भी ऐसा अध्ययन अकादमिक महत्व का होगा।

ऐसा नहीं है कि दुनिया के किसी देश में समाज भारत से अधिक जिम्मेदार न हों। बहुत से देश हैं जहां शराबी भी अधिक जिम्मेदारी से पीते हैं, और जहां परिवार के भीतर पीने की एक परंपरा है, लेकिन जहां लोग नशे में इस तरह धुत्त नहीं होते हैं। भारत में सामाजिक बदलाव लाने, और परिवारों को अधिक सेहतमंद माहौल वाला बनाने का काम सरकार की किसी योजना से रातों-रात नहीं हो सकता, लेकिन ऐसी किसी कोशिश में समाजशास्त्रियों की भूमिका को कम नहीं आंकना चाहिए, और सरकार को लीक से हटकर काम करने का हौसला भी दिखाना चाहिए। पिछली सरकारों ने जो काम नहीं किया है, या दूसरे प्रदेशों की सरकारें जो काम नहीं कर रही हैं, उसे क्यों किया जाए,  यह सोच कल्पनाशीलता की कमी बताती है। हमारा मानना है कि लोकतांत्रिक ढांचे में समाज के अलग-अलग किस्म के विशेषज्ञों का योगदान कुछ अधिक होना चाहिए। हमने आबादी के हर तबके को सामाजिक और मनोवैज्ञानिक परामर्श देने के लिए बड़े पैमाने पर परामर्शदाताओं के शिक्षण-प्रशिक्षण की बात भी बार-बार सुझाई है। हमारा मानना है कि जिस तरह स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षकों को बीएड जैसे कोर्स अनिवार्य किए गए हैं, वैसे ही, शिक्षकों के लिए एक अतिरिक्त योग्यता वाले पारिवारिक-परामर्श या मनोवैज्ञानिक परामर्श के कोर्स शुरू करने चाहिए, और जब हर गांव-कस्बे तक ऐसे परामर्शदाता मौजूद रहेंगे, तो वे समाज में एक बदलाव ला भी सकते हैं। और ऐसा ही कोई बदलाव समाज में वह रौशनी फैला सकता है जैसी रौशनी आज दीवाली के दियों से फैल रही है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 अक्टूबर 2024



 

क्या बुलडोजरी-इंसाफ को सुप्रीम कोर्ट से छूट जारी है?

29 अक्टूबर 2024

 

छत्तीसगढ़ के सरगुजा में कल एक हत्याकांड के मुख्य आरोपी और उसके परिवार के अवैध निर्माण को बुलडोजर से गिरा दिया गया। अफसरों ने बताया है कि यह सरकारी जमीन पर किया गया अवैध कब्जा और अवैध निर्माण था, और चार अलग-अलग जगहों पर बड़ी कड़ी चौकसी के बीच यह तोडफ़ोड़ की गई है। जिस नौजवान मुजरिम ने पुलिस कार्रवाई से नाराज होकर एक प्रधान आरक्षक के घर घुसकर उसकी पत्नी और बेटी का कत्ल किया था, उसके ठिकानों पर बुलडोजर चलाने की मांग जनता कर रही थी। स्थानीय म्युनिसिपल ने पुराने नोटिस का हवाला देते हुए अवैध कब्जे और अवैध निर्माण को नया नोटिस दिया, और कुछ दिनों की मियाद पूरी होने पर उसे कल गिरा दिया।

कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई से जुड़े हुए, और पेशेवर मुजरिम इस नौजवान के साथ किसी की हमदर्दी नहीं है क्योंकि अपनी ड्यूटी करने के एवज में एक पुलिस कर्मचारी की बीवी और बेटी का कत्ल इसने जितने वीभत्स तरीके से किया, उसकी कल्पना करना भी मुश्किल था। इसी सरगुजा के सबसे बड़े कांग्रेस नेता टी.एस.सिंहदेव ने इसे फांसी देने की मांग की थी। इसके साथ-साथ कत्ल में मददगार, सुबूत खत्म करने में भागीदार, और फरार होने में साथ देने वाले एनएसयूआई से जुड़े कुछ और नौजवान भी गिरफ्तार हुए हैं, इसलिए कांग्रेस का कुछ अधिक कहने का मुंह नहीं बचा है। लेकिन इन्हें फांसी की मांग करने वाले सिंहदेव ने भी इस अंदाज में आरोपी के परिवार के ठिकानों पर बुलडोजर चलाने का विरोध किया है। कहने के लिए स्थानीय अफसर यह कह रहे हैं कि इसका कत्ल की वारदात से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन यह तो पहली ही नजर में जाहिर तौर पर दिख रहा है कि किसी एक व्यक्ति के अवैध कब्जों, और अवैध निर्माणों पर अगर अचानक कार्रवाई हो रही है, तो उसके पीछे वही एक वजह है।

हमने खुद ने ऐसे भयानक मुजरिम के खिलाफ पिछले दिनों बहुत कुछ कहा और लिखा था, लेकिन हम बुलडोजरी-इंसाफ के खिलाफ हैं। हम उस वक्त से इसके खिलाफ हैं जब सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर सोया हुआ था, और उसने सुनवाई भी शुरू नहीं की थी। यूपी में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने इंसाफ का यह नया तरीका ईजाद किया था, और बरसों बाद जाकर अब सुप्रीम कोर्ट में कुछ जज जागे हैं, और उन्होंने देश के किसी भी राज्य में आरोपियों के परिवारों की संपत्ति पर बुलडोजर चलाने पर कुछ किस्म की रोक लगाई है। सुप्रीम कोर्ट के शब्द और उसकी भावना दोनों को समझने की जरूरत है। उसकी भावना को समझने से तो देश की राज्य सरकारें नासमझी जाहिर कर सकती हैं, लेकिन उसके शब्द बड़े साफ-साफ हैं जिन्हें बड़े छोटे से सरकारी वकील भी समझ सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में आदेश दिया है कि केवल इसीलिए कि कोई व्यक्ति आरोपी है या दोषी है, यह उसकी संपत्ति को ध्वस्त करने का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी तोडफ़ोड़ की वीडियोग्राफी कराई जानी चाहिए ताकि बाद में अदालत को पता चल सके कि क्या यह कार्रवाई अवैध कब्जे या निर्माण के अनुपात में थी? उन्होंने यह भी कहा कि अदालत के इस आदेश के खिलाफ की गई कार्रवाई उसकी अवमानना होगी, और अवमानना की कार्रवाई के बाद इस पर मुआवजा भी दिलवाया जाएगा। अदालत पहुंचे हुए एक वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने जजों से कहा था कि जिस तरह बंदूक की नली से शक्ति प्रदर्शन किया जाता है, उसी तरह यह बुलडोजर के जरिए शक्ति प्रदर्शन है, और इस तमाशे में जाने-माने टीवी एंकर बुलडोजर के केबिन से कैमरे पर बोलते हैं। उन्होंने कहा था कि इस तरह के प्रतिशोध की बात कानून में नहीं है। एक दूसरे वकील ने कहा था कि अपराधों से निपटने के लिए म्युनिसिपल के कानूनों का बेजा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। ऐसा करना आज एक चुनावी प्रचार का हथियार बना लिया गया है। उन्होंने अदालत में यह भी कहा था कि म्युनिसिपल के कानून स्थानीय उद्देश्यों के लिए हैं, अपराधों से लडऩे के लिए नहीं। अदालत ने अफसरों को यह एक छूट दी है कि वह सार्वजनिक भूमि, गलियों, सडक़ों, फुटपाथों पर किए गए अवैध कब्जों को बचाने का काम नहीं करेगी। लेकिन अदालत ने यह कहा कि अनाधिकृत निर्माण में भी रहने वालों को वैकल्पिक घर खोजने के लिए दस-पन्द्रह दिन का समय दिया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी साफ किया था कि अगर दो अवैध इमारतें हैं, लेकिन उनमें से किसी आरोपी के इमारत को ही गिराया जाता है, तो भेदभाव का मुद्दा उठेगा। अदालत ने एक अक्टूबर को ही यह कहा था कि राज्य बुलडोजर से इस तरह किसी निर्माण को ध्वस्त करने के स्थानीय अधिकार को सजा की तरह इस्तेमाल करने के खिलाफ दिशा-निर्देश तैयार करें।

हमारा ख्याल है कि सरगुजा में हत्या के जुर्म में गिरफ्तार, एक पुराने और पेशेवर मुजरिम के अवैध निर्माण भी जिस तरह कुछ दिनों के भीतर छांटकर गिराए गए हैं, वह अदालत की सोच के खिलाफ है, और कम से कम हमारी सोच के खिलाफ तो है ही कि किसी आरोपी, या साबित मुजरिम के अवैध कब्जे या अवैध निर्माण को भी बाकी को छोडक़र अकेले तोडऩा गलत है। न्याय की भावना बड़ी साफ है कि एक ही किस्म के गलत काम करने वाले कई लोगों में से किसी एक को छांटकर सिर्फ उसके खिलाफ कार्रवाई करना भेदभावपूर्ण होगा क्योंकि ये दो अलग-अलग किस्म के जुर्म हैं, एक आपराधिक मामला है, और दूसरा अवैध कब्जे या अवैध निर्माण का। अदालत ने जितने खुलासे से अपनी भावना जाहिर की है, उसे देखते हुए सरगुजा में अफसरों की कार्रवाई पहली नजर में गलत लगती है क्योंकि उसने उस शहर में और तो अवैध कब्जों पर ऐसी कार्रवाई की नहीं है। जनता के बीच से किसी आरोपी के खिलाफ होने वाली फरमाईश पर कार्रवाई करना जायज नहीं लगता। अदालती कार्रवाई के बाद ऐसे आरोपियों को फांसी हो जाए वह भी ठीक है, लेकिन बड़े खुलासे से अपनी बात कहने वाले सुप्रीम कोर्ट जजों की चेतावनी को ऐसा लगता है कि सरगुजा में अनदेखा किया गया है। जैसा कि अदालती कार्रवाई में ही बहस में सामने आया था कि बुलडोजरों को चुनाव प्रचार का एक हथियार बना लिया गया है, तो क्या सूरजपुर में हत्या के आरोपी, उसके पिता, और उसके चाचा के अलग-अलग अवैध कब्जे या अवैध निर्माण को म्युनिसिपल ने गिरा दिया है। सरकार को बड़ी कानूनी राय हमेशा ही हासिल रहती है, और अभी तो प्रदेश के म्युनिसिपल-मंत्री पहले प्रदेश के डिप्टी एडवोकेट जनरल भी रह चुके हैं, इसलिए यह बुलडोजरी-कार्रवाई पूरी कानूनी व्याख्या के साथ हुई होगी। अब इस व्याख्या में कोई चूक है या नहीं, यह आने वाले दिनों में अदालत में साबित होगा।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 अक्टूबर 2024



 

दीवारों पर लिक्खा है, 28 अक्टूबर 2024



 

मौजूदा सरकारी इलाज बदहाल, नए अस्पताल का क्या हाल होगा?

 28 अक्टूबर 2024

 

हिन्दुस्तान में राज्य सरकारों के कई तरह की योजनाओं के ढांचे खड़े हो जाते हैं जिन्हें बनाने में नेता, अफसर, और ठेकेदार तीनों की अपार दिलचस्पी रहती है। लेकिन इसके बाद उन्हें चलाने में कमाई रहने के बावजूद भी दिलचस्पी खत्म होने लगती है, और ये ढांचे कई जगह सरकारी भ्रष्टाचार के स्मारक बने सरकारों का ही मुंह चिढ़ाते रहते हैं। शहरों में जगह-जगह स्मार्ट सिटी के नाम पर अंधाधुंध खर्च होता है, कम से कम छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में यह साफ देखने मिलता है कि तकनीकी विशेषज्ञता की कोई जगह नहीं रहती है, स्थानीय जरूरतों की परवाह नहीं रहती, और एक बार फिर नेता-अफसर, और ठेकेदार-सप्लायर मिलकर यह तय कर लेते हैं कि पैसा कैसे डुबोया जाए, और अगर वह डीएमएफ, कैम्पा, या सीएसआर जैसे किसी मद का है, तो फिर उसे अधिक तेजी से डुबाया जाता है। 

छत्तीसगढ़ के दूसरे सबसे बड़े शहर, बिलासपुर में दो सौ करोड़ की लागत से एक सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल बनकर तैयार हुआ है जिसमें बहुत किस्म की आधुनिक चिकित्सा का इंतजाम होने की बात सरकार ने की है। प्रधानमंत्री इस अस्पताल का ऑनलाईन लोकार्पण करने जा रहे हैं। ऐन इसी समय पिछले कई महीनों से लगातार छत्तीसगढ़ के अखबार इन खबरों से पटे हुए हैं कि किस तरह राज्य के सरकारी अस्पतालों की हजारों मशीनों पर मरीजों की जांच इसलिए नहीं हो रही है कि इन मशीनों में लगने वाले रसायन नहीं खरीदे गए हैं। कई जगहों पर मशीनें बक्सों में बंद हैं, और करोड़ों की लागत आ जाने के बाद भी उन्हें शुरू नहीं किया गया है। कहीं मशीन है तो चलाने वाले तकनीकी कर्मचारी नहीं है, कहीं कर्मचारी हैं तो डॉक्टर नहीं है। अखबारी खबरों में अफसरों के बयान छपते हैं कि दवाई खरीदने की प्रक्रिया शुरू की गई है, रसायन के लिए टेंडर किया गया है, मशीनों के रख-रखाव के लिए कंपनियों से अनुबंध किया जाएगा। सरकार का पूरा का पूरा सिलसिला ऐसा लगता है कि जैसे किसी पुल के निर्माण को छह महीने रोकने से कोई फर्क नहीं पड़ता, मरीज की जांच, इलाज, उसकी दवा छह महीने बाद आने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। सरकार की नजर में मरीज और ईंट की जिंदगी में कोई अधिक फर्क नहीं दिखता। सरकारी अस्पतालों की हर मशीन में रसायनों की खपत के आंकड़े विभाग के पास रहते हैं, और खत्म होने के पहले ही अगली सप्लाई का इंतजाम आसानी से किया जा सकता है, लेकिन तड़पते और भटकते मरीजों की तकलीफ से सरकार के माथे पर कोई शिकन नहीं दिखती। 

सरकारी मेडिकल कॉलेजों में चिकित्सा-शिक्षकों की कुर्सियां खाली हैं, और इन्हें भरने का कोई ठिकाना नहीं है। फॉर्मेसी और नर्सिंग कॉलेजों की गड़बडिय़ां खबरों में बनी हुई हैं, जाहिर है कि राज्य का स्वास्थ्य का ढांचा कमजोर पड़ा हुआ है, और अधिक कमजोर होने जा रहा है। सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रेक्टिस पर लगी रोक का कोई असर नहीं है, और डॉक्टरों के संगठन अपने सदस्यों की मोटी कमाई के इस धंधे को बचाने के लिए सरकार के खिलाफ खड़े हो रहे हैं। चिकित्सा-शिक्षा चाहे वह सरकारी मेडिकल कॉलेजों की हो, चाहे निजी चिकित्सा महाविद्यालयों की, विवादों से घिरी हुई हैं, और अभी निजी कॉलेजों में एनआरआई कोटे से फर्जी दाखिले देने का एक बहुत बड़ा भ्रष्टाचार सामने आया है जिसमें सरकार के कुछ लोगों की भागीदारी भी जाहिर तौर पर दिख रही है। सरकार के अपने स्वास्थ्य ढांचे के चरमराने के अलावा दूसरी दिक्कत यह है कि निजी अस्पतालों को सरकारी बीमा योजना के तहत होने वाला भुगतान बढक़र सैकड़ों करोड़ पार कर चुका है, और अब बहुत से निजी अस्पताल इस सरकारी योजना के तहत पहुंचने वाले गरीब मरीजों को वापिस भेजने लगे हैं। मरीजों के बदन की सांसों को स्कूलों में छात्राओं में बंटने वाली साइकिलों की तरह कबाड़ में धर दिया गया है, और इन साइकिलों की तरह ही गरीब मरीजों के बदन में टूट-फूट चल ही रही है। 

हमारा ख्याल है कि किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी के दुबारा जीतकर आने में सबसे बड़ा योगदान, या इसमें सबसे बड़ा अड़ंगा पटवारी-तहसील के स्तर पर जनता को होने वाली दिक्कत का रहता है, और सरकारी इलाज का रहता है। जब गरीब बीमार होकर सरकारी इंतजाम तक पहुंचते हैं, या सरकारी बीमा कार्ड लेकर निजी अस्पताल पहुंचते हैं, और उन्हें वहां इलाज नहीं मिलता, तो अगले चुनाव का उनका वोट तय हो जाता है। उसके हाथ में और तो कुछ नहीं रहता, अगला चुनाव ही रहता है। यही वजह है कि हम एक के बाद दूसरे स्वास्थ्य मंत्री को चुनाव हारते देखते हैं। जोगी सरकार के समय स्वास्थ्य मंत्री रहे के.के.गुप्ता चुनाव हारे, कृष्णमूर्ति बांधी चुनाव हारे, अमर अग्रवाल, टी.एस.सिंहदेव जैसे कई लोग स्वास्थ्य मंत्री रहने के बाद चुनाव हारे। इसकी एक वजह हमें यह लगती है कि इनमें से कोई भी इस विभाग को ठीक से नहीं चला पाए, गरीब मरीजों की आह के असर पर चुनाव हार जाने तक इन नेताओं को भी भरोसा नहीं रहा होगा। हो सकता है कुछ स्वास्थ्य मंत्री इस मंत्रालय को संभालने के बाद जीत गए हों, और गरीब-कमजोर मरीजों की आह ने हिसाब कुछ देर से चुकता किया हो। 

छत्तीसगढ़ में जिस दंतेवाड़ा जिले को डीएमएफ में प्रदेश का सबसे अधिक पैसा मिलता है, उन सैकड़ों करोड़ रूपए सालाना से बनाए, सुधारे, और संवारे गए सरकारी अस्पतालों का हाल यह है कि कल से यह अस्पताल खबरों में है कि वहां ऑपरेशन थियेटर की सफाई किए बिना आपराधिक लापरवाही से गरीब आदिवासी मरीजों की आंखों का थोक में ऑपरेशन कर दिया गया, और संक्रमण से दस लोगों की आंखें खतरे में आ गई हैं। अब मुख्यमंत्री के कहने पर स्वास्थ्य मंत्री राजधानी के अस्पताल जाकर इन मरीजों को देख जरूर आए हैं, और डॉक्टर को निलंबित कर दिया है, लेकिन सवाल यह उठता है कि जिन अस्पतालों को करोड़ों रूपए अतिरिक्त पाने की डीएमएफ-सहूलियत हासिल है, वहां भी अगर इस दर्जे की लापरवाही है, तो फिर प्रधानमंत्री के हाथों दो सौ करोड़ के अस्पताल का उद्घाटन हो, या चार सौ करोड़ के अस्पताल का, उसे चलाना तो इसी सरकार के लोगों को है। लोगों को याद होगा कि जिस बिलासपुर में इस अस्पताल का उद्घाटन कल होगा, उसी बिलासपुर में एक सरकारी नसबंदी शिविर में दर्जन भर गरीब महिलाओं की एक साथ मौत हुई थीं, और उन मरीज महिलाओं के बीच खड़े हँसते हुए स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल की तस्वीरों ने लोगों को स्तब्ध कर दिया था। नए चिकित्सा ढांचे की शुरूआत अच्छी बात है, लेकिन राज्य में मौजूद हजारों चिकित्सा ढांचों को सरकार जिस तरह चला रही है, उन्हीं हाथों में एक और नई गाड़ी का स्टीयरिंग दे देने से मरीजों की जिंदगी का सफर सुहाना नहीं होने जा रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार को अगर प्रदेश में कानून-व्यवस्था के बाद किसी एक मामले में युद्धस्तर पर सुधार और मरम्मत करने की जरूरत है, तो वह सरकारी चिकित्सा व्यवस्था है।  

(Daily Chhattisgarh)

जिंदगी कितनी ऑटोमैटिक हो, जानलेवा हद तक?

 27 अक्टूबर 2024

 

कनाडा से दो ही दिन पहले खबर आई थी कि वहां चार भारतवंशी एक कार हादसे में मारे गए। वे बैटरी से चलने वाली सबसे मशहूर कार, टेस्ला, से जा रहे थे, गाड़ी फुटपाथ से टकराई, और उसमें आग लग गई। इस कार के दरवाजे इस हादसे के बाद लॉक हो गए जिन्हें भीतर बैठे लोग खोल नहीं पाए, और किसी तरह पास से गुजरते एक दूसरे कार वाले ने इस कार से एक लडक़ी को खींचकर निकाला, और बचाया। यह तो जख्मी हालत में अस्पताल में है लेकिन बाकी चार लोग बंद कार में जलकर मर गए। डिवाइडर से टक्कर के तुरंत बाद कार की बैटरी ने आग पकड़ ली थी, जिसकी आग को बुझाना कुछ मुश्किल होता है। मरने वाले चारों गुजरात के थे, और इनमें दो भाई-बहन भी थे। ऐसा कई जगह पर होता है कि जहां कारों में कोई ऑटोमेटिक लॉक रहते हैं, या सेंट्रल लॉक रहते हैं, तो वे किसी दुर्घटना के बाद नहीं खुल पाते, और पानी में गिरी हुई गाड़ी हो, या आग की लपटों में घिरी हुई, भीतर बैठे लोग संघर्ष करते हुए खत्म हो जाते हैं। इस मुद्दे पर लिखने की जरूरत नहीं लगी होती, अगर कल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में इलेक्ट्रॉनिक ऑटोमेशन करने वाली एक शॉप में एसी फटने से भरे धुएं में दो लोग मारे नहीं जाते, और ऐसा इसलिए हुआ कि इस धमाके से इस दुकान के दरवाजे में लगे ऑटोमेटिक लॉक बंद हो गए, और फिर खुल ही नहीं पाए। लोगों को बचाने के लिए पुलिस को भीतर जाने को ये दरवाजे तोडऩे पड़े जिसके पीछे दुकान का मालिक भी धुएं में मर चुका था। यह कारोबार लोगों के घरों में ऑटोमेटिक लॉक वाले खिडक़ी-दरवाजे लगाने का ही था, और उसका एक बड़ा खतरा खुद इसके मालिक की मौत की शक्ल में सामने आया। 

आज दुनिया का बाजार अपने प्रोडक्ट को दूसरों से बेहतर बताने के लिए, मुकाबले में आगे रहने के लिए उनमें बहुत सारी गैरजरूरी खूबियां जोड़ते चलता है। जिस तरह ऑटोमेटिक तालों से ये दो हादसे हुए, ऐसा ही कोई हादसा तब भी हो सकता है जब स्क्रीन लॉक लगा हुआ फोन हो, और उसके साथ किसी का एक्सीडेंट हो जाए। वैसे में लोगों को यह भी नहीं दिखेगा कि फोन किसका है, आखिर में कौन से नंबर लगाए गए थे, या इन केस ऑफ इमरजेंसी नाम से कोई फोन नंबर दर्ज हैं क्या। स्क्रीन लॉक के सौ अलग फायदे हो सकते हैं, लेकिन यह एक बड़ा नुकसान भी है कि किसी जख्मी के फोन से एम्बुलेंस को भी नहीं बुलाया जा सकता। स्क्रीन लॉक बनाने वालों को इमरजेंसी के लिए कुछ नंबरों और जानकारी को ताले के बाहर भी रखने का इंतजाम करना चाहिए था। आज घर और बाहर इस्तेमाल होने वाले छोटे-बड़े सभी किस्म के उपकरणों में बहुत सारी गैरजरूरी बातें जोड़ दी जाती हैं, जो कि उनके इस्तेमाल को जटिल बना देती हैं, और उससे कई बार तो सहूलियत कम और नुकसान अधिक होने लगता है। फिर ऐसी गैरजरूरी ‘खूबियों’ की वजह से सामानों के दाम भी बढ़ते हैं, और उनकी मरम्मत भी मुश्किल और महंगी हो जाती है। आज हालत यह है कि बहुत सी जटिल खूबियों वाले स्मार्टफोन की उलझनों से अपने बुजुर्ग मां-बाप को बचाने के लिए लोग बाजार में बहुत साधारण किस्म से बनाए गए ऐसे फोन लेने लगे हैं जो कि सिर्फ बात करा सकते हैं। 

आज नई-नई कारों को देखें, तो उनमें खूबियों के नाम पर इस तरह का ऑटोमेशन जोड़ा गया है जो कि निहायत गैरजरूरी भी लगता है, और अगर उसमें गड़बड़ी आए तो उस कार को शुरू करना भी मुमकिन नहीं रहता। किसी मुसीबत के वक्त आई ऐसी गड़बड़ी जानलेवा हो सकती है। ऐसे में कभी-कभी लगता है कि पुराने वक्त की कारें जिनमें हर दरवाजे अलग-अलग लॉक होते थे, और खुलते थे, खिड़कियों के शीशे हैंडल से चढ़ाने पड़ते थे, और कार तक पहुंचने के पहले उसका इंजन शुरू करके एसी चालू करने की सहूलियत नहीं होती थी, उनमें क्या कमी थी? हम किसी टीवी या कम्प्यूटर की जटिलता की बात नहीं करते, लेकिन सडक़ पर अपने मुसाफिरों, और दूसरे लोगों की जिंदगी को खतरे में डालने का खतरा रखने वाली कारों की जटिलता की बात जरूर करना चाहते हैं कि क्या छोटी-छोटी सी खूबियां इस लायक होनी चाहिए कि किसी हादसे की हालत में वे जानलेवा खामी में तब्दील हो जाएं? 

जिन दो घटनाओं से हमने यह बात शुरू की है वो दोनों ही बिल्कुल ही गैरजरूरी जटिलता की वजह से जानलेवा साबित हुईं। हादसे में अपने आप दरवाजों को लॉक कर देने वाली कारों के मामले बहुत बड़ी संख्या में हो चुके हैं, और यह सिलसिला खत्म किया जाना चाहिए। अगर तकनीक में सुधार नहीं हो सकता, तो ऐसी मामूली खूबी को हटा देना चाहिए। और घर-दफ्तर के खिडक़ी-दरवाजों को ऑटोमेटिक लॉक करने के कारोबार के लिए इससे अधिक बदनामी का प्रचार क्या हो सकता है कि हादसे की नौबत में इसके मालिक के दफ्तर का दरवाजा ऐसा लॉक हुआ कि लाश ही बाहर निकल पाई! 

गैरजरूरी ऑटोमेशन के कई किस्म के खतरे होते हैं। लोग अपने घर पर ऐसे उपकरण रखने लगे हैं जिन्हें जुबानी हुक्म देकर वो कई किस्म के काम करवाते हैं, कोई फोन नंबर लगवा लेते हैं, कोई सामान ऑर्डर कर देते हैं, या टीवी का चैनल बदलवा लेते हैं। लेकिन हुक्म मानने वाले ऐसे ही एक उपकरण ने अमरीका में कुछ अरसा पहले पति-पत्नी के बीच किसी बहस को सुनकर खुद ही पुलिस को बुला लिया था। लोगों का यह भी मानना है कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की ऐसी लगातार जिंदा मौजूदगी लोगों की जिंदगी की निजता खत्म करती है। लोग यह आशंका भी रखते हैं कि उनके फोन, लैपटॉप, या इन दिनों कैमरे और माइक्रोफोन वाले टीवी लोगों की बातों को रिकॉर्ड करने लायक हैक किए जा सकते हैं। सडक़ हादसे से लेकर निजता खत्म होने तक, लोगों को यह सोच-विचार करना चाहिए कि उन्हें रोज की जिंदगी में कितने ऑटोमेशन की जरूरत है? और आज के वक्त में यह बात एक बड़ी समस्या भी हो सकती है कि बिना भयानक ऑटोमेशन वाले उपकरण बाजार में ढूंढे जाएं। आज बहुत से सामान तो ऐसी खूबियों/खामियों के बिना बाजार में हैं ही नहीं। फिर भी ये दो हादसे हमें कम से कम रोजमर्रा के इस्तेमाल के सामानों के बारे में सोचने-विचारने का मौका तो दे रहे हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

...तुम इतना जो झुकते जा रहे हो, क्या हसरत है जिसे दिखा रहे हो?

27 अक्टूबर 2024 

राजस्थान के एक जिले, बाड़मेर पहुंचे सत्तारूढ़ पार्टी के नेता सतीश पूनिया के स्वागत में खड़ी वहां की कलेक्टर टीना डाबी ने नेताजी के साथ जैसा शिष्टाचार निभाया, वह एकदम खबरों में आ गया है। इसका वीडियो देखकर लोगों ने हिसाब लगाया कि सात सेकेंड में किस तरह इस कलेक्टर ने  नेताजी के सामने पांच बार सिर झुकाया, और आठ बार हाथ जोड़े। सतीश पूनिया अभी किसी सरकारी ओहदे पर नहीं है, और उनके स्वागत में इस तरह की असाधारण विनम्रता सोशल मीडिया पर लोगों की आलोचना पा रही है। जिन लोगों को याद नहीं होगा उन्हें यह बता देना ठीक है कि टीना डाबी 2016 में आईएएस के इम्तिहान में पहली कोशिश में ही कुल 22 बरस की उम्र में देश में अव्वल आकर खबरों में आई थीं, और उसके बाद वे तब खबरों में आईं जब उन्होंने यूपीएससी में उनके ठीक बाद की जगह पाने वाले कश्मीर के एक मुस्लिम नौजवान से शादी की थी। तीसरी बार वे तब खबर में आईं जब उन्होंने इस मुस्लिम पति को तलाक दे दिया। इसके बाद शायद उन्होंने एक शादी और की, लेकिन वह हमारी दिलचस्पी का सामान नहीं है। अब बाड़मेर का कलेक्टर रहते हुए वे जिस अंदाज में वहां बड़े दबदबे से शहर सुधारने का अभियान चला रही है, वह वैसे भी खबरों में बना हुआ था। माईक लेकर दुकानदारों को चेतावनी देते हुए उनके वीडियो हवा में तैर ही रहे थे, और उनके बीच एक नेता के सामने ‘बिछ जाने’ का यह वीडियो लोगों की आलोचना झेल रहा है। 

हमने कई किस्म के अफसर देखे हैं। भारत में, जहां पर आईएएस बनना तकरीबन तमाम लोगों की हसरतों की पराकाष्ठा रहती है, वहां पर इस सोच को यह प्रचलित लाईन और मजबूत करती है कि देश में असली ताकत तीन ही लोगों के हाथ में रहती है, पीएम, सीएम, और डीएम (डीएम यानी आईएएस डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट/कलेक्टर)। हमने छत्तीसगढ़ के पहले सीएम अजीत जोगी को डीएम भी देखा हुआ है, और फिर सीएम भी देखा हुआ है, और सीएम बनते ही उन्होंने छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में अपने लिए जो बंगला छांटा था, वह अपने डीएम (कलेक्टर) रहते हुए इस्तेमाल किया हुआ बंगला ही था। मजे की बात यह है कि उस वक्त जो कलेक्टर थे, उन्हें मुख्यमंत्री सचिवालय में बुलाकर जब बताया गया कि उन्हें बंगला बदलना पड़ेगा क्योंकि अजीत जोगी उस बंगले में रहना चाहते हैं, तो उस कलेक्टर ने यह कहते हुए विरोध किया था कि यह बंगला तो कलेक्टर के लिए निर्धारित है। बंगले में रहते हुए दिमाग ऐसा हो गया था कि मुख्यमंत्री की पसंद को भी एक पल को चुनौती दे दी थी, लेकिन फिर उस वक्त मुख्यमंत्री के सचिव रहे अफसर बहुत व्यवहारिक थे, और उन्होंने कलेक्टर को उसकी सीमाएं समझा दी थीं, और बाद में अनमने ढंग से कलेक्टर ने बंगला खाली किया था, और जोगी अपनी कलेक्टरी की यादों में जीते हुए मुख्यमंत्री रहने तक उसी बंगले में रहे। 

अखबारनवीसी के इन बरसों में मेरा वास्ता सौ-पचास आईएएस अफसरों से पड़ा होगा, और उनमें से शायद ही कोई ऐसे रहे हों जो कि अपनी कलेक्टरी की यादों के साये में न जी रहे हों। हर किसी के पास कलेक्टरी के किस्से रहते हैं, और यह आसानी से समझ आ जाता है कि उनकी तब तक की नौकरी का सबसे गौरवशाली हिस्सा जिलों में कलेक्टर रहने का ही था। यह ओहदा बहुत से लोगों को बददिमाग बना देता है, और वे राह चलते लोगों को पीटने का काम भी करने लगते हैं, जो नापसंद हो, उसे बेदखल करना भी उन्हें आसान लगता है, और मातहतों पर भरी बैठकों में फाईल फेंकना, धमकी देना भी बहुत बड़ी बात नहीं रहती है। लेकिन दूसरी तरफ सत्ता की चापलूसी को भी इस कुर्सी के लिए बुरा नहीं माना जाता, और ऐसा समझा जाता है कि खुशामद से इस कुर्सी पर अपनी पकड़ मजबूत करना प्रशासन का एक आम और जायज तरीका है। कुल मिलाकर देखें तो पीएम, सीएम, के बाद की तीसरे नंबर की यह सबसे ताकतवर कुर्सी अपने नीचे के लोगों को कुचलने के लिए, और अपने से ऊपर के लोगों को खुश रखने के लिए जानी जाती है। अब इस पर बैठे हुए कुछ लोग अपने पांव जमीन पर रखने में कामयाब हो जाते हैं, और उनकी विनम्रता भी कई तरह की प्रचलित कहानियों का सामान बन जाती है।

मेरा ख्याल है कि भारत जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नौकरशाही कही जाने वाली बड़े अफसरों की इस जमात के नाम में ही कुछ बुनियादी दिक्कत है। जाने कहां से यह शब्द निकला जो अपने आपमें बहुत बड़ी विसंगति और विरोधाभास से भरा हुआ है। यह शब्द, नौकरशाह, नौकर को शाह बताता है, या शाह को नौकर, यह समझना बड़ा मुश्किल है। कलेक्टरी के दिनों में कई अफसर सचमुच ही विनम्र रहते हैं, जो कि राजा से लेकर प्रजा तक सबके बीच में विनम्रता जारी रखते हैं। लेकिन बहुत से अफसर ऐसे रहते हैं जो कि सारी की सारी विनम्रता राजाओं पर खर्चते हैं, और जनता के लिए उनके पास फिर बूट ही बच जाते हैं। टीना डाबी को लेकर पिछले दिनों से बाड़मेर की जो खबरें आ रही हैं, वे कुछ इसी किस्म की दिख रही हैं, बाजार में दुकानदारों को लाउडस्पीकर पर धमकाते हुए वे जिस तेवर के साथ राज करती हैं, सत्ता से परे के, लेकिन सत्तारूढ़ नेता के साथ उनका तेवर एकदम अलग दिखता है। अब मैंने तो इतने बरसों में पहली बार यह देखा है कि किसी अफसर के शुरू के कई विनम्र, और झुके हुए अभिवादन तो सत्तारूढ़ पार्टी के नेताजी मोबाइल पर अपनी व्यस्तता की वजह से देख भी नहीं पाते हैं, और फिर इस अफसर को वह झुकना जारी रखना पड़ता है, और मीडिया को उनके झुकने की गिनती गिननी पड़ती है कि वे कितने सेकेंड में कितनी बार इस अतिविनम्रता की नुमाइश कर रही थीं।

देश में ऐसे ही अफसरी सिलसिले को तोडऩे के लिए मैं दस-बीस बरस से एक सलाह दुहराते आया हूं। नौकरशाह, जिन्हें जनता के प्रति रहना तो नौकर सरीखा चाहिए, लेकिन जो जनता के प्रति शाह रहते हैं, और सत्तारूढ़ नेताओं के प्रति नौकर बने रहते हैं, उनके पदनाम को बदलना चाहिए। अब कलेक्टर जितना कलेक्ट करते हैं उससे अधिक तो सरकारी खजाने से जनता पर खर्च करते हैं। और अंग्रेजों के वक्त के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट वाली भूमिका भी अब खत्म हो गई है। ऐसे में कलेक्टर या डीएम का नाम बदलकर जिला जनसेवक रखना चाहिए, ताकि अपना पदनाम उन्हें बार-बार, पूरे वक्त यह याद दिला सके कि उनकी जिम्मेदारी क्या है। टीना डाबी, या ऐसे दूसरे कलेक्टर दिन भर में चार बार भी जनता के साथ विनम्र हो जाएं, वह अधिक जरूरी है बजाय सत्तारूढ़ पार्टी के एक नेता के सामने हाथ जोडऩे, और सिर झुकाने की कसरत दुहराने के। अफसरों का इस कदर झुकना नेता के प्रति सम्मान कम, और अपनी हसरत अधिक होने का सुबूत होता है।   

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 अक्टूबर 2024



 

महिला उम्मीदवार बनाने से परहेज, हिन्दुस्तानी पाखंड

 26 अक्टूबर 2024

 

झारखंड और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों को लेकर एक बार फिर राजनीतिक दलों की लिस्टें आ रही हैं। दोनों ही राज्यों में कांग्रेस और भाजपा के अलावा क्षेत्रीय पार्टियां भी मैदान में हैं, और कहीं सीटों का बंटवारा है, तो कहीं गठबंधन। इसलिए उम्मीदवारों के नाम किस पार्टी के कितने हैं, यह थोड़ा जटिल मुद्दा है। लेकिन जो मुद्दा एकदम साफ है वह यह कि किसी पार्टी को महिलाओं को उनका हक देने की कोई फिक्र नहीं है। अलग-अलग खबरें बताती हैं कि किसने महिलाओं को कितनी टिकटें दी है। झारखंड में अब तक घोषित डेढ़ सौ नामों में से कुल 17 फीसदी महिलाएं हैं, और इनमें ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) के झारखंड में अब तक कुल 8 उम्मीदवार हैं, और इनमें एक चौथाई महिलाएं हैं। बड़ी पार्टियों में 66 नामों वाली भाजपा ने कुल 18 फीसदी महिलाओं को टिकट दी है। झारखंड मुक्ति मोर्चा ने 12 फीसदी, और कांग्रेस ने सीटें कम रहते हुए भी करीब एक चौथाई, 24 फीसदी महिलाओं को टिकटें दी हैं। लेकिन तमाम महिला उम्मीदवारों को देखें तो आधे से अधिक ऐसी हैं जो कि किसी न किसी नेता के परिवार की हैं, यानी उन्हें अपने दम पर, महज अपनी वजह से टिकट का हकदार नहीं माना गया है, और परिवार के पुरूषों का दम-खम लगने के बाद उन्हें टिकट मिली है। अब महाराष्ट्र पर एक नजर डालें तो वहां विदर्भ के इलाके का चुनावी रिकॉर्ड बताता है कि 1962 के चुनाव से लेकर अब तक वहां कुल चार फीसदी महिला उम्मीदवार रही हैं। ये आंकड़े विदर्भ की 13 विधानसभा सीटों के हैं। दूसरी जगहों पर भी कमोबेश इसी तरह का हाल है।

लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले जब 2022 में उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए तब कांग्रेस पार्टी ने वहां की चुनाव प्रभारी प्रियंका गांधी की अगुवाई में 40 फीसदी सीटों पर महिलाओं को टिकटें देने की घोषणा की थीं, और दी भी थीं। लेकिन बाद के चुनावों में किसी भी राज्य में इस आंकड़े को नहीं दोहराया गया, मानो उन प्रदेशों में लडक़ी हूं, लड़ सकती हूं, का नारा लागू नहीं होता था। उत्तरप्रदेश, जहां पर कि यह जाहिर था कि कांग्रेस का कोई भविष्य नहीं है, वहां पर तो कांग्रेस ने महिलाओं को बड़ी संख्या में टिकटें दे दीं। उसे अंदाज था कि वह आधा दर्जन का आंकड़ा पार नहीं कर सकेगी, और ऐसे में उसने महिलाओं के लिए दरियादिली दिखाई थी। लेकिन हम अलग-अलग राज्यों के आंकड़ों पर बात न करें, तो भी एक बात साफ है कि लोकसभा के आम चुनावों के पहले पिछली संसद में ही मोदी सरकार ने लंबे समय से पड़ा हुआ महिला आरक्षण विधेयक पास करवाया था। उसके साथ दिक्कत यह थी कि उस पर अमल के पहले जनगणना, और सीटों के डी-लिमिटेशन की शर्तें जोड़ दी गई थीं। इसलिए यह माना जा रहा था कि यह जल्द से जल्द भी 2029 के आम चुनाव में लागू हो पाएगा। हालांकि इस विधेयक पर चर्चा करते हुए कांग्रेस के राहुल गांधी ने सरकार से अपील की थी कि इसे अगले ही दिन से लागू कर दिया जाए, ताकि आने वाले आम चुनाव में महिलाओं को उनका हक मिल सके। लेकिन सरकार ने वह राय नहीं सुनी, और अब महिला आरक्षण लागू भी है, लेकिन उस पर बरसों तक अमल नहीं हो सकता।

हम इसी जगह बार-बार लिखते आ रहे थे कि राजनीतिक दलों के सामने बिना महिला आरक्षण कानून के भी यह विकल्प तो मौजूद था ही कि वे अपनी मर्जी से एक तिहाई या उससे अधिक सीटों पर महिला उम्मीदवार खड़ी करें। लेकिन किसी पार्टी ने यह नहीं किया। और जो पार्टियां इस पर कुछ हद तक अमल कर भी रही हैं, वे भी नेताओं के परिवारों की महिलाओं को आगे बढ़ाकर उसी को महिलाओं को आगे बढ़ाना साबित कर रही हैं। यह बात याद रखने की है कि छत्तीसगढ़ में पंचायतों में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण  दिया जा रहा है, और यह 33 फीसदी शुरू होकर 50 फीसदी किया जा चुका है। जब पंचायत स्तर पर भी अलग-अलग जातियों की महिला उम्मीदवार मिल जाती हैं, तब यह बात अटपटी है कि विधानसभा और लोकसभा के स्तर पर पार्टियां महिला उम्मीदवार न मिलने का रोना रोया जाए। जब ओबीसी, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, जैसे तबकों की महिला उम्मीदवार मिल जाती हैं, तो विधायक और सांसद बनने के लिए तो महिलाएं इनके बीच से भी मिल सकती हैं। लेकिन राजनीतिक दलों पर ठीक भारतीय समाज की तरह मर्दों का दबदबा इतना अधिक है कि वे महिलाओं को आगे बढऩे नहीं देते, बराबरी का हक नहीं देते, न संगठन के पदों पर, और न ही चुनाव-उम्मीदवारी में।

लेकिन इसी माहौल के बीच अब यह एक बड़ी अजीब सी नौबत है कि पंजाब, दिल्ली, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, जैसे तकरीबन तमाम राज्यों में जहां-जहां अब चुनाव हो रहे हैं, वहां-वहां महिलाओं के खातों में पैसे सीधे भेजने की योजनाएं अनिवार्य रूप से लागू हो रही हैं, और हर पार्टी के घोषणा पत्र में यह सबसे बड़ा मुद्दा भी है। महिला एक वोटर की शक्ल में राजनीतिक दलों को अच्छी लगती है, लेकिन एक सांसद और विधायक के रूप में उसे इज्जत देना पार्टियों को नहीं सुहाता है। यह नौबत देखकर भारतीय समाज की एक दूसरी स्थिति याद पड़ती है कि महिला पत्थर या मिट्टी की मूरत के रूप में तो पूजा के लायक मानी जाती है, साल में दो-दो बार नौ-नौ दिन उसकी पूजा होती है, लेकिन असल जिंदगी में वह लात-घूंसे, प्रताडऩा, और टोनही करार देकर मार डालने के लायक मानी जाती है, कदम-कदम पर तीन-चार बरस की बच्चियों से लेकर 60-70 बरस की बुजुर्ग महिलाओं को बलात्कार का सामान मान लिया जाता है। जो समाज देवी की पूजा का पाखंड करता है, वह जीती-जागती देवियों के साथ सबसे परले दर्जे का जुल्म करता है, हर किस्म की हिंसा करता है। मिजाज का यह पाखंड चुनावों में भी काम आता है जहां राजनीतिक दलों को महिला, वोटर की शक्ल में नोट देने लायक लगती है, लेकिन उम्मीदवार की शक्ल में वह टिकट देने लायक नहीं लगतीं।

भारतीय समाज के पुरूषों, और खासकर राजनीतिक दलों से यह पूछा जाना चाहिए कि वे महिला आरक्षण विधेयक पास हो जाने के बाद भी खुद होकर उस पैमाने पर महिलाओं को टिकट क्यों नहीं देते हैं? क्यों वे इंतजार करते हैं कि जिस दिन यह कानून लागू होगा उसी दिन से महिला को उसका हक दिया जाएगा?

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अक्टूबर 2024



 

नौसिखिये छात्र बन गए नशे के कारखानेदार!

25 अक्टूबर 2024

 

तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में अभी पुलिस ने केमिस्ट्री और इंजीनियरिंग के सात ऐसे छात्रों को गिरफ्तार किया है जो बाजार से रसायन खरीदकर घर पर प्रयोगशाला बनाकर दुनिया का एक घातक रासायनिक नशा तैयार कर रहे थे। उन्होंने मेथ कहा जाने वाला (मेथाम्फेटामाईन) 250 ग्राम तैयार भी कर लिया था। 20-22 बरस के ये सात छात्र इनमें से जिसके घर पर यह काम कर रहे थे वहां उन्होंने घर के लोगों को बताया था कि वे कॉलेज का प्रयोग कर रहे हैं। इसकी खबरों में इस घटना को एक वेबसिरीज, ब्रेकिंग बैड, को याद दिलाने वाली कहा गया है जिसमें इसी तरह से नशा तैयार किया जाता है। अब पुलिस यह पता लगा रही है कि क्या इन नौजवान छात्रों ने कुछ और जगहों पर इसकी मार्केटिंग भी की है? इन्होंने ये रसायन और इसके लिए जरूरी उपकरण आसानी से जुटा लिए थे। अब अगर दुनिया के सबसे खतरनाक नशों में से एक, मेथ, साधारण छात्र इतनी आसानी से बना रहे हैं, तो सीधे दिमाग पर असर करने वाले ऐसे नशे के भविष्य के बारे में आसानी से सोचा जा सकता है। 

इसके साथ-साथ हम दो और घटनाओं को जोडक़र देखना चाहते हैं कि किस तरह कल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक नाबालिग लडक़े से दस किलो गांजा पकड़ाया है, और यह अपने आपमें कोई नई घटना नहीं है क्योंकि गांजे का गलियारा बन गए इस प्रदेश में लगातार नाबालिगों को इसकी तस्करी में शामिल पाया जा रहा है। एक तरफ तो शराब, गांजे, और दूसरे हर किस्म के नशे के कारोबार में, तस्करी में, नाबालिगों को जोड़ा जा रहा है क्योंकि कानून में नाबालिगों के लिए अधिक कड़ी सजा नहीं है। दूसरी तरफ नाबालिगों को बड़े पैमाने पर नशा करते देखा जा रहा है। और शायद इस नशे का भी कुछ असर है कि नाबालिगों का भयानक हिंसक दर्जे के जुर्मों में शामिल होना भी लगातार बढ़ते चल रहा है। वे कत्ल कर रहे हैं, गैंगरेप कर रहे हैं, और सडक़ों पर चाकू तो चला ही रहे हैं। इसके साथ-साथ एक दूसरी चीज को जोडक़र देखना भी जरूरी है कि जिस तरह रेलवे स्टेशनों से लेकर ट्रेनों तक, और फुटपाथों तक बेघर हो चुके छोटे बच्चे बढ़ते चल रहे हैं, और वे बहुत लंबे समय से पंक्चर बनाने में काम आने वाले एक रासायनिक गोंद को सूंघने का नशा करते हैं, उनके हाथ अब नशे से कमाई का एक नया जरिया भी अगर लग रहा है, तो उस नशे का खुद इस्तेमाल तो उनके लिए एक आसान और स्वाभाविक बात रहेगी। नशे के आदी लोगों का दायरा रफ्तार से बढ़ते चलता है, और खासकर ऐसे समाज में जहां पर कि उन पीढिय़ों के लोगों के पास कोई प्रेरणा नहीं रहती है। जिनको अपना कोई भविष्य नहीं दिखता है, जिनके लिए आज की जिंदगी में कोई खुशी नहीं है, घर-परिवार या मोहब्बत करने वाले नहीं हैं, वे लोग आने वाले कल की फिक्र से बेफिक्र रहकर नशे में आसानी से डूब जाते हैं। 

भारत में प्रदेशों की सरकारें शराब के कारोबार को काबू में रखने में ही अपनी पूरी ताकत झोंक देती हैं क्योंकि इसी से सरकार को सबसे बड़ी कमाई होती है, और राजनीतिक दलों को भी इसी धंधे से मोटी उगाही होती है। लेकिन ऐसा लगता है कि नशे के धंधे पर से शराब का एकाधिकार खासा पहले खत्म हो गया है, और उसका शुरूआती सुबूत पंजाब जैसे राज्य में सामने आया जहां पर शराबेतर नशों में पूरी नौजवान पीढ़ी डूब जाने की भयानक तस्वीर दिखने लगी। अब जिस तरह से शराबेतर नशे गली-गली पकड़ा रहे हैं, उससे साफ है कि मुंह से शराब की बदबू छोड़ते हुए बदनाम होने के बजाय अब अधिक सहूलियत वाले नशे लोकप्रिय होते चल रहे हैं। इनकी तस्करी भी शराब के मुकाबले आसान है क्योंकि पैदल चलता हुआ व्यक्ति भी हजारों लोगों के लायक महीने भर का नशा जेबों में भरकर ले जा सकता है। छत्तीसगढ़ में पुलिस सरकारी शराब से परे के नशों को पकडऩे में जुटी हुई है, और कोई ऐसा दिन नहीं जाता जब दवा कारखानों में बनने वाली और बहुत प्रतिबंधित इस्तेमाल वाली नशे के असर की दवाईयां न पकड़ाती हों। 

किसी भी दूसरे नशे के मुकाबले रसायनों से बनने वाले नशे अधिक खतरनाक माने जाते हैं। दुनिया की सबसे बड़ी ताकत अमरीका भी रासायनिक-नशों से हर बरस सैकड़ों मौतें झेल रहा है, और इसका चलन बढ़ते चल रहा है, अमरीकी सरहदों में घुसपैठ करके चारों तरफ से ड्रग-माफिया तरह-तरह की घातक गोलियों को अमरीकी नशेडिय़ों तक पहुंचा रहे हैं। अपनी परले दर्जे की निगरानी के बावजूद अमरीका इस धंधे पर काबू नहीं पा सक रहा है। भारत में कम से कम दो पड़ोसी देशों, पाकिस्तान, और म्यांमार से तो बड़े पैमाने पर नशे की तस्करी हो रही है, और इन दोनों देशों में आर्थिक स्थिति बहुत खराब है, लोकतंत्र बहुत कमजोर है या नहीं है, और इन वजहों से वहां पर नशे का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है। इनके अलावा जिस अफगानिस्तान में अफीम की खेती अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा है, उस अफगानिस्तान की एक सरहद सीधे भारत से भी जुड़ी हुई है, जो कि सौ किलोमीटर से अधिक लंबी है। तस्करों के लिए इतनी लंबाई घुसपैठ को कम नहीं होती है। फिर भारत को इस खतरे को भी समझना चाहिए कि जिस तरह पाकिस्तान की तरफ से भारत में लगातार नशे की तस्करी होते हुए पकड़ाती भी है, उसी तरह चीन की तरफ से भी भारत में नशा आ सकता है क्योंकि दुश्मन देश को कमजोर करने में नशा एक बड़ा हथियार माना जाता है। भारत के बाकी पड़ोसी देश भी किसी अच्छी आर्थिक हालत में नहीं हैं, और अस्थिर लोकतंत्र, और फटेहाली मिलकर कब किस देश को नशे के धंधे में धकेल दे, इसका कोई ठिकाना नहीं रहता। 

लेकिन चेन्नई का यह ताजा मामला एक बिल्कुल नया खतरा सामने रखता है कि बाजार में मौजूद रसायन और उपकरण से नौजवान विज्ञान-छात्र घर पर खतरनाक रासायनिक नशा बना सकते हैं। हो सकता है कि इस नशे की क्वालिटी अंतरराष्ट्रीय बाजार की उम्मीदों पर खरी न उतरे, लेकिन यह घरेलू नशेडिय़ों के लिए सस्ते में मिलने वाला अधकचरा नशा तो बन ही सकता है। फिर छात्रों के इस मेन्युफेक्चरिंग में उतर आने से यह भी है कि उनके आसपास छात्रों के दायरों में उन्हें सीधे-सीधे ग्राहक मिल सकते हैं। अब बाजार के रसायन, उपकरण, जब यूट्यूब पर मौजूद हर किस्म के वीडियो के साथ जोड़े जाएं, तो बहुत से उत्साही और लापरवाह-गैरजिम्मेदार नौजवान छात्र ड्रग माफिया बन सकते हंै। पता नहीं केन्द्र और राज्य सरकारें इस भयानक खतरे से कैसे निपट सकती हैं, लेकिन यह हर किसी के लिए जागने का वक्त तो हो ही गया है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अक्टूबर 2024



 

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अक्टूबर 2024



 

राज्य की नफरत का लावा संसद तक फैला

 24 अक्टूबर 2024

 

देश के मौजूदा वक्फ कानून में संशोधन के लिए जो नया विधेयक लाया गया है, उस पर चर्चा के लिए सांसदों की एक संयुक्त समिति बनी है। दो दिन पहले जब इसकी सुनवाई चल रही थी, और वर्तमान और प्रस्तावित कानूनों की बारीकियों पर एक गंभीर बातचीत या बहस होनी थी तभी समिति के एक सदस्य तृणमूल कांग्रेस के सांसद कल्याण बैनर्जी ने कांच की एक बोतल तोड़ दी, और उसे समिति के अध्यक्ष जगदम्बिका पाल पर फेंक दिया। अध्यक्ष तो बच गए लेकिन यह हरकत करने वाले कल्याण बैनर्जी का ही हाथ कुछ जगह नुकीले कांच से कट गया जिसकी मलहम पट्टी करनी पड़ी। इस बर्ताव के लिए इस सांसद को इस समिति की सुनवाई से एक दिन के लिए निलंबित कर दिया गया है जो कि तृणमूल सांसदों के लिए कोई नई बात नहीं है। वे लोकसभा और राज्यसभा की कार्रवाई से भी कई बार निलंबित होते रहते हैं, और अगर लोगों को कल्याण बैनर्जी नाम से याद न पड़ता हो, तो हम संसद भवन के अहाते में इस सांसद की एक मिमिक्री याद दिलाना चाहेंगे जिसमें वे मौजूदा सांसदों के बीच उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की सदन की कार्रवाई की नकल करके दिखा रहे थे। बाद में जब इस पर बड़ा बवाल हुआ तो उन्होंने सफाई दी कि मिमिक्री एक किस्म की कला है, और वे मिमिक्री ही कर रहे थे। साथ ही कल्याण बैनर्जी और उनके समर्थकों ने संसद के भीतर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के किसी भाषण का कुछ हिस्सा निकालकर उसका वीडियो जारी किया था कि मोदी ने तो सदन के भीतर मिमिक्री की थी। मोदी इस वीडियो में राहुल गांधी की मिमिक्री कर रहे थे। हालांकि मोदी ने कल्याण बैनर्जी की इस ‘कला’ पर बड़ी आपत्ति की थी, और भाजपा ने संसद-परिसर की इस मिमिक्री का वीडियो अपने फोन पर बनाने के लिए राहुल गांधी को भी घेरा था। इस मिमिक्री पर देश की राष्ट्रपति ने भी उपराष्ट्रपति के साथ हमदर्दी जताते हुए टीएमसी सांसद के इस बर्ताव पर अफसोस जाहिर किया था, और ट्विटर पर अपने उपराष्ट्रपति का साथ दिया था। 

खैर, उस पुरानी घटना पर अभी बहुत अधिक समय बर्बाद करने की जरूरत नहीं है, लेकिन यह याद रखने की जरूरत है कि तृणमूल कांग्रेस सांसद कल्याण बैनर्जी का नाटक का पुराना इतिहास रहा है, जो कि अब बढ़ते-बढ़ते संसदीय समिति की बैठक में कांच की बोतल फोडक़र अध्यक्ष पर फेंकने तक पहुंच गया, यह अलग बात है कि अध्यक्ष बच गए, और हमलावर बैनर्जी जख्मी हो गए। इस ताजा घटना के एक और पहलू पर चर्चा की जरूरत है। वक्फ बोर्ड संशोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान यह बहस मोटेतौर पर कल्याण बैनर्जी और भाजपा सांसद अभिजीत गंगोपाध्याय के बीच हुई थी। अब जिन लोगों को इस नए सांसद के नाम से कुछ याद नहीं पड़ता है, उन्हें यह बताना जरूरी है कि वे कलकत्ता हाईकोर्ट से रिटायरमेंट लेने वाले एक ऐसे जज हैं जिन्होंने तुरंत ही भाजपा में दाखिल होकर लोकसभा चुनाव लड़ा, और कोर्ट की अपनी कुर्सी के कुछ महीनों के भीतर ही वे लोकसभा की कुर्सी पर नजर आने लगे। जब तक अभिजीत गंगोपाध्याय जज रहे, उनके बहुत से फैसले और आदेश ऐसे रहे जो कि राज्य की तृणमूल सरकार के हितों के खिलाफ रहे, उसे परेशान और नुकसान करने वाले रहे। एक वक्त तो ऐसा भी आया था जब कलकत्ता हाईकोर्ट के बार एसोसिएशन ने गंगोपाध्याय की अदालत के बहिष्कार का प्रस्ताव पारित किया था, और तृणमूल समर्थक वकीलों के एक संगठन ने उनकी अदालत के बाहर प्रदर्शन किया था। कलकत्ता का यह टकराव दिल्ली पहुंचकर संसदीय समिति में कांच की टूटी बोतल के टुकड़ों की शक्ल में सामने आया है। तृणमूल सांसद के लिए यह भूलना आसान नहीं था कि जस्टिस गंगोपाध्याय ने इस्तीफे के दो दिन बाद ही भाजपा की सदस्यता ले ली थी, और फिर कुछ महीनों के भीतर ही लोकसभा का चुनाव भाजपा टिकट पर लड़ा। इस अभियान के दौरान गंगोपाध्याय ने ममता बैनर्जी के खिलाफ कुछ अपमानजनक बातें भी कही थीं, और हालत यह थी कि चार दिन पहले के हाईकोर्ट जज को चुनाव आयोग का नोटिस मिला, आयोग ने उनके बयान रोके, और घटिया-निजी आरोप लगाने की वजह से चौबीस घंटे चुनाव प्रचार पर रोक लगाई। गंगोपाध्याय की इसी बयान की वजह से चुनाव आयोग ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी.नड्डा को यह सलाह जारी की थी कि वे चुनाव प्रचार में इस तरह की हरकत से बचने के लिए अपने नेताओं को कहें। हाईकोर्ट जज रहे गंगोपाध्याय के बयान पर चुनाव आयोग को यह लिखना पड़ा था कि यह गरिमा की किसी भी परिभाषा के खिलाफ बयान था, और बहुत ही निचले दर्जे का निजी हमला था। चुनाव आयोग ने अफसोस भी जाहिर किया था कि गंगोपाध्याय के हाईकोर्ट के पिछले ओहदे को देखते हुए वे किसी संदेह के लाभ के हकदार भी नहीं है। 

बंगाल की राजनीति इन दो सांसदों की संसदीय समिति की बहस से परे भी लगातार हमलावर रहती है। देश में दो ऐसे राज्य हैं जहां राजनीतिक हमले बड़ी आसानी से हत्या में तब्दील हो जाते हैं। बंगाल, और केरल, इन दोनों जगह राजनीतिक-हिंसा का कोई अंत नहीं दिखता है। और जहां पर हथियारों की हिंसा आम बात हो, विरोधी होने पर मार डालना बहुत बड़ा मुद्दा न हो, वहां से आए दो सांसदों के बीच राज्य की कड़वाहट संसद और उसकी समिति तक पहुंच जाना बड़ी बात नहीं है। हमारा मानना है कि पार्टियों का टकराव, या व्यक्तियों का टकराव इतना धारदार नहीं होना चाहिए कि वह संसद को बनाने के कुल जमा मकसद को ही हरा दे। वक्फ कानून में फेरबदल एक गंभीर मसला था, और उसमें इस तरह के टकराव की गुंजाइश होनी नहीं चाहिए थी, लेकिन राज्य की स्थानीय राजनीति बाकी तमाम चीजों पर बुरी तरह हावी हो जाती है। बंगाल के संदर्भ में तो हम इस बात को कुछ अधिक ही देखते हैं। देश की बहुत सी पार्टियों का एक-दूसरे के प्रति हिकारत और नफरत का ऐसा नजरिया है कि वे एक नाव पर सवार रहते हुए भी दूसरे के डूब मरने की कामना कर सकते हैं। ऐसी नौबत देश में संसदीय जरूरत और महत्व को हरा दे रही है। एक बार संसद में कानूनों में खामियां रह जाती हैं, या बेइंसाफी को बढ़ाने वाले कानून बन जाते हैं, तो फिर देश कभी-कभी तो पीढिय़ों तक उनके नुकसान झेलता है। संसदीय प्रक्रिया और संसदीय प्रणाली ओछे टकरावों में उलझे, और पूर्वाग्रहों से लदे हुए लोगों के भरोसे नहीं चल सकती। लोकतंत्र का एक बड़ा नुकसान करते हुए ही पार्टियां और सांसद एक-दूसरे से नफरत की ऐसी नुमाइश कर सकती हैं। हमारा मानना है कि जनता के बीच से ऐसा दबाव सामने आना चाहिए कि वह पार्टियों और नेताओं को अपने आपको काबू में रखने पर मजबूर करे।

(Daily Chhattisgarh)

नकली नोट के बाद अब गुजरात में नकली कोर्ट! सिलसिला कहां तक...

23 अक्टूबर 2024

 

देश में कई तरह की नकली चीजें चलती हैं, लेकिन गुजरात के इस ताजा मामले में सबको पीछे छोड़ दिया है। राजधानी गांधीनगर में एक व्यक्ति ने एक फर्जी अदालत खोल ली, और वह लोगों के कानूनी मामले निपटाने लगा, पूरा अदालत का ढांचा खड़ा कर लिया, उसके अपने गिरोह के लोग वकील बनकर बहस करने लगते थे ताकि लोगों को भरोसा हो जाए, और वह लोगों के मामलों को निपटाने का यह कानूनी ट्रिब्यूनल पांच बरस से चलाते हुए अब तक अरबों की दौलत बना चुका था। जज के पोशाक में बैठकर वह फैसले देता था, और दूसरी अदालतों में चल रहे जमीनों के मामलों को निपटाने के ट्रिब्यूनल का जज बनकर वह हजारों लोगों को धोखा देते रहा, और दिलचस्प बात यह है कि यह नकली अदालत अहमदाबाद की अदालत के ठीक सामने एक वकील ही चला रहा था। यह पकड़ में तब आया जब इसका एक मामला असली अदालत तक पहुंचा। 

यह समाचार चौंकाता है कि देश किस हद तक धोखा खाने पर आमादा है। अभी कुछ हफ्ते पहले ही छत्तीसगढ़ में स्टेट बैंक की एक नकली ब्रांच खोलकर उसे चलाया जा रहा था, लेकिन कुछ लोगों को शक होने से वह पकड़ में आ गई। बाद में पता लगा कि इसके पहले भी तमिलनाडु और दूसरी जगहों पर स्टेट बैंक की नकली शाखाएं खुल चुकी हैं। खुद गुजरात की बात करें तो वहां पर अभी कुछ हफ्ते पहले ही गांधी की जगह अनुपम खेर की तस्वीर छपे हुए नोट देकर किसी ने सोना खरीदी की थी। यह मामला भी राजधानी अहमदाबाद का ही था, और सोना खरीदकर एक व्यक्ति ने एक करोड़ साठ लाख रूपए के नोट देकर नकली नोट दे दिए थे। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग चीजों की नकल बनाने के इतने मौलिक और अनोखे तरीके हिन्दुस्तान में इस्तेमाल हो रहे हैं कि नकल बनाने के लिए बदनाम चीन को भी शर्म आ जाए, वह भी हीनभावना में पहुंच जाए। यहां लोग अलग-अलग कंपनियों के फर्जी कस्टमर केयर वेबसाइट बनाकर शिकायत करने वाले ग्राहकों को वहां से फंसा रहे हैं, तो कहीं नकली सीबीआई अफसर बनकर कोई अदना सा आदमी असली पासपोर्ट ऑफिस जाकर गिरफ्तारी का डर दिखाकर लाखों रूपए वसूल कर निकल जाता है। यह नौबत देश के लिए बहुत भयानक है कि नकल का कारोबार इतनी दूर तक चले जाता है, और जिन निगरानी या जांच एजेंसियों से इनको रोकने की उम्मीद की जाती है, उन्हें हवा भी नहीं लगती। हम इस सिलसिले में कामयाब कारोबारी ब्रांड की नकल के बारे में नहीं कह रहे जो कि दुनिया के कई देशों में एक समस्या है, लेकिन जब किसी देश के लोग किसी टेलीफोन कॉल पर अपने को नार्कोटिक्स ब्यूरो का बताकर धमकाते हैं, और उसके बाद वीडियो कॉल शुरू करवाकर थाने का नकली नजारा पेश करते हैं, तो जालसाजों की कल्पनाशीलता, और जनता की झांसा खाने की क्षमता इन दोनों के बीच एक कड़ा मुकाबला चलता है। 

अब साइबर-धोखाधड़ी या जालसाजी के बारे में तो जांच एजेंसियां लोगों को सावधान करने का अभियान चला रही हैं लेकिन जब पूरा का पूरा बैंक, या पूरा का पूरा कोर्ट नकली बना दिया जाए, तो उस इलाके की पुलिस पर भी यह सवाल उठता है कि क्या उसे अपने आसपास की इतनी बड़ी जालसाजी की भी हवा नहीं लगती? इसी अहमदाबाद की एक दूसरी खबर कल की ही है कि एक रिटायर्ड बैंक अधिकारी ने किसी महिला की नकली बलात्कार की रिपोर्ट लिखाने की धमकी में जिंदगी के आखिरी तीस बरस में उसे एक करोड़ रूपए दिए, और आखिर में ब्लैकमेलिंग से थककर एक चिट्ठी में इस महिला और उसके परिवार के पांच लोगों के बारे में सब लिखा, और जहर पीकर खुदकुशी कर ली। अब नकली बलात्कार की असली धमकी देकर किसी को इस तरह लूटा जा सकता है, दशकों तक लूटा जा सकता है, और खुदकुशी पर मजबूर किया जा सकता है, तो इस तरकीब को आजमाने में कई और लोगों की लार टपक सकती है, आखिर तीस बरस तक तो यह औरत और उसके परिवार के लोग किसी मुसीबत में नहीं फंसे थे। 

नकली का कारोबार देश को अभी कुछ समय पहले ही दहला चुका है जब यह सामने आया कि देश के एक सबसे प्रमुख हिन्दू मंदिर, तिरुपति में प्रसाद के विख्यात लड्डुओं को बनाने के लिए जानवरों की, गाय और सुअर की चर्बी से बना हुआ घी इस्तेमाल हो रहा था। यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट के रास्ते जांच एजेंसियों तक पहुंचा हुआ है, और नकली सामान से लोगों की आस्था को चोट पहुंचाने का यह देश का सबसे भयानक मामला इसलिए है कि इस मंदिर में रोजाना छह सौ लोग लड्डू बनाने में जुटते हैं, और करीब तीन लाख लड्डू रोज प्रसाद में बांटे या बेचे जाते हैं। अब अगर इसमें राज्य सरकार के बताए मुताबिक चर्बी वाला नकली घी इस्तेमाल होता था, तो घर जाकर दर्जनों लोगों में बंटने वाले एक-एक लड्डू के मार्फत कितने लोगों तक क्या-क्या नहीं पहुंचा होगा? 

ऐसा लगता है कि हिन्दुस्तान में नकली के खिलाफ समाज में बर्दाश्त बहुत हो गया है। ऑटोमोबाइल पुर्जों के बाजार में जाएं तो वहां किसी भी बड़ी कंपनी के किसी भी पुर्जे की अलग-अलग तीन-चार नकली क्वालिटी मौजूद रहती है। और देश की राजधानी दिल्ली का ऑटोपाटर््स का बाजार इसी भाषा से भरा रहता है कि किस क्वालिटी का डुप्लीकेट चाहिए? यह नौबत बताती है कि सरकार और अदालतें मिलकर नकली पर लगाम लगाने के लिए काफी नहीं हैं, और लोग हैं कि वे नकली को उतना बुरा भी नहीं मानते। भारत से चीन जाने-आने वाले लोग, या चीन से बनकर भारत आने वाला सामान दुनिया के तमाम बड़े ब्रांड के महंगे फैशनेबुल की नकल रहता है, और बड़े ब्रांड की मिट्टी के मोल मिलने वाली नकल से गरीब हिन्दुस्तानियों की हसरतें भी पूरी होती हैं। दिल्ली का किताबों का बाजार पाइरेटेड किताबों से पटा हुआ है, और जिस महंगी किताब की कॉपी चाहिए वह घंटे भर में तैयार कर दी जाती है। इस देश के नेताओं की राजनीतिक प्रतिबद्धता जितनी नकली है, उसी के अनुपात में यहां पर नकली काम भी बर्दाश्त होता है, बल्कि उसका स्वागत होता है। इम्तिहानों में मुन्नाभाई बनकर नकली लोग पर्चे लिखने जाते हैं, और अब तक लोगों ने मेहरबानी यह की है कि नकली यूपीएससी रिजल्ट निकालकर लोगों को कलेक्टर-एसपी नहीं बनाया है। 

फिलहाल जिस राज्य में जिस तरह का नकली धंधा पकड़ा रहा है, वहां की सरकार और पुलिस को अपने कामकाज के बारे में आत्ममंथन करना चाहिए कि यह नौबत कैसे आई है, और इसमें सरकार की क्या जवाबदेही बनती है। दूसरी बात, भारत जैसा संघीय गणराज्य है, उसमें केन्द्र और राज्यों के बीच जुर्म के तौर-तरीकों की जानकारी पलक झपकते फैलनी चाहिए ताकि ठोकर किसी एक को लगे, तो संभल सभी सकें।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अक्टूबर 2024



 

रवानगी के ठीक पहले स्वाद बिगाड़ते चन्द्रचूड़

  22 अक्टूबर 2024

 

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई.चन्द्रचूड़ कई लोगों को चौंका रहे हैं, और कई लोग उनके ताजा बयानों, और कुछ हरकतों को देखकर मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं। सिलसिले की शुरूआत शायद गणेश पूजा के वक्त से हुई जब चन्द्रचूड़ के सरकारी घर पर उनके अपने गृहप्रवेश की परंपरा के मुताबिक गणेश स्थापित थे, और ऐसे में घर पर आने वाले संबंधियों और मित्रों के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी महाराष्ट्रीयन गांधी टोपी लगाकर पूजा करने पहुंचे थे, और उनकी चन्द्रचूड़ दम्पत्ति के बीच खड़े होकर गणेशजी की आरती करने के वीडियो चारों तरफ फैले थे। महाराष्ट्र चुनाव की हवा चलने के ठीक पहले का यह प्रधानमंत्री-प्रवास खूब चर्चा में रहा क्योंकि यह पिछले एक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की इफ्तार-दावत सरीखा नहीं था जिसमें आमंत्रित बहुत से लोगों के बीच उस वक्त के सीजेआई भी पहुंचे थे। हमने उस वक्त भी इसी जगह पर लिखा था कि ऊंचे ओहदों पर बैठे लोगों को संदेह से परे रहना चाहिए। भारत में कार्यपालिका, यानी सरकार, और न्यायपालिका, यानी अदालत के बीच एक सुरक्षित फासला रहना चाहिए। सुरक्षित इस हिसाब से भी कि दूर से देखती जनता को भी यह भरोसा हो कि ये दोनों एक-दूसरे के किसी असर में काम नहीं कर रहे हैं, और यह भरोसा भी हो कि ये गिरोहबंदी करके काम नहीं कर रहे हैं। लोकतंत्र की तिपाई में अगर उसके तीन पायों में से दो पाये एक-दूसरे से गलबहियां करने लगें, तो उसका संतुलन ही खत्म हो जाएगा। तिपाई के तीनों पायों का एक-दूसरे से भी अलग रहना जरूरी रहता है, और अपने टॉप को ढोने के लिए तीनों को अपने-अपने हिस्से का जिम्मा निभाना पड़ता है, बिना गलबहियों के। 

जस्टिस चन्द्रचूड़ ने गणेशोत्सव के दौरान देश, और भारतीय न्यायपालिका को देखने वाली बाकी दुनिया को भी चौंकाया, और अब उन्होंने एक अनोखी बात कही। वे अपने पैतृक गांव में एक सम्मान समारोह में गए थे, वहां उन्होंने गांव के लोगों से बात करते हुए बताया कि जब रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर केस चल रहा था, और महीनों तक चला, वह बेहद नाजुक मामला था, उन्होंने कहा कि वे भगवान के सामने बैठे, और उनसे प्रार्थना की कि वे इस विवाद का कोई समाधान खोजे, उन्होंने कहा कि यदि आपमें आस्था है तो भगवान हमेशा कोई रास्ता निकालेंगे। लोगों को याद होगा कि रामजन्म भूमि मामले में गिराई गई मस्जिद वाले जगह हिन्दू समाज को मंदिर के लिए फैसला देने वाले पांच जजों के मुखिया, उस वक्त के सीजेआई रंजन गोगोई रिटायर होते ही तुरंत भाजपा की तरफ से राज्यसभा भेजे गए थे, दो और जज अपनी बारी आने पर मुख्य न्यायाधीश बने, और एक जज को गवर्नर बनाया गया, और एक को एनसीएलटी का मुखिया। 

अब सवाल यह उठता है कि सीजेआई हो, या कोई और, उनकी निजी आस्था अपनी जगह बड़ी अच्छी बात है, लेकिन रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद का तो पूरा मामला ही निजी आस्था के विवाद का था। यह मामला हिन्दू और मुस्लिम तबकों के बीच का विवाद था, और इसमें अगर इस बेंच के जज अपने ईश्वर (चन्द्रचूड़ के मामले में जैसा कि उन्होंने गांव में कहा, भगवान) के सामने बैठकर समाधान देने, या सही रास्ता सुझाने की प्रार्थना करें, तो क्या भारत का संविधान निजी आस्था पर आधारित प्रार्थना से मिले समाधान की वकालत करता है? या फिर किसी भी निजी आस्था, और किसी भी धार्मिक प्रतिबद्धता से परे पूरी तरह से कानूनी और संवैधानिक फैसले की बात सुझाता है? जब देश की सबसे बड़ी अदालत की संविधानपीठ देश का एक सबसे नाजुक फैसला सुना रही है, तब क्या जजों का अपनी आस्था के मुताबिक अपने ईश्वर से प्रार्थना करना, और समाधान मांगना जायज है? होना तो यह चाहिए था कि इस फैसले के लिख दिए जाने तक लोग, कम से कम हिन्दू और मुस्लिम जज, अपनी आस्था को अलग रखते। और अगर अलग रखना मुमकिन नहीं होता, तो उसे अपने मन के भीतर रखते। लोगों के बीच इस बात की नुमाइश करना, और खासकर रिटायरमेंट के कुछ दिन पहले इस खास चर्चा को छेडऩा जो कि कई लोगों को ठकुरसुहाती लग सकती है, बड़ी ही अटपटी बात है। अब बाकी वक्त में तो जस्टिस चन्द्रचूड़ पता नहीं केन्द्र सरकार को प्रभावित करने वाले और कोई फैसले देने की हालत में है या नहीं, कम से कम अपने गांव का उनका यह ताजा भाषण ठीक उसी तरह टालने लायक था, जिस तरह प्रधानमंत्री को अपने घर की गणपति पूजा में बुलाना टालने लायक था। लोकतंत्र में जनता के सामने उसकी भावनाओं की संतुष्टि के लिए भी निष्पक्षता का एक मुखौटा बनाए रखना जरूरी होता है, लेकिन जस्टिस चन्द्रचूड़ ने उसकी परवाह नहीं की। 

लोकतंत्र एक बहुत ही लचीली व्यवस्था है। इसमें हर बात का इलाज कानून में नहीं है। कार्यपालिका और न्यायपालिका के एक-दूसरे से संबंध कैसे रहे, इस पर हजार पेज की किताब भी लिखी जा सकती है, और उससे बच निकलने की दो हजार पेज की कुंजी भी लिखी जा सकती है। लोकतंत्र नियमों से परे की भी गौरवशाली परंपराओं से चलता है। प्रधानमंत्री और सीजेआई का सार्वजनिक समारोहों में जहां पर उनके ओहदों के हिसाब से साथ रहना जरूरी होता है, वहां तो साथ रहना होता ही है, लेकिन इससे परे इन दोनों के बीच इतना सुरक्षित फासला भी होना चाहिए कि ये शिष्टाचार में न उलझें, एक-दूसरे के प्रभाव में न आएं। इसी तरह किसी एक धर्म को अधिक पसंद आने वाला दो धर्मों के बीच का मुकदमा जब तय हो चुका है, तो जीतने वाले धर्म के ईश्वर को इस समाधान का श्रेय देना निष्पक्षता से परे जाने की बात है। हम जिस आदर्श की बात कर रहे हैं, वह बिल्कुल असंभव भी नहीं है। भारत की किसी भी संवैधानिक कुर्सी पर बैठे हुए व्यक्ति से आस्थाहीन होने की उम्मीद कोई नहीं करते, उनमें से कुछ लोग आस्था का प्रदर्शन भी करते रहे हैं, जैसे कि मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टी.एन.शेषन सार्वजनिक रूप से मंदिरों में आते-जाते रहे। लेकिन अपने विवेक के किसी फैसले को अपने ईश्वर के सहयोग से सुलझाने की बात कहना उनके संवैधानिक विवेक के इस्तेमाल से परे की बात है। हमारा ख्याल है कि जस्टिस चन्द्रचूड़ इतने समझदार हैं कि वे अपनी निजी आस्था के ऐसे अदालती इस्तेमाल की नुमाइश से बचने की बात सोच सकते थे, और अगर उन्होंने यह प्रदर्शन किया ही है, तो हमारा मानना है कि उन्होंने सोच-समझकर यह कहा होगा। वे रिटायर होने के बाद प्रवचन के पेशे में आए हुए व्यक्ति नहीं है जो कि इस तरह की बात कहें। यह सिलसिला कुछ बदमजा रहा, यह जाते-जाते लोगों के मुंह का स्वाद खराब करके जाने जैसा रहा। उन्होंने अपने निजी जीवन के सार्वजनिक तथ्यों की वजह से कुछ बातों के लिए समाज की वाहवाही भी पाई है, लेकिन अब आखिरी वक्त में उनकी बातें, और उनके काम उनके अदालती इतिहास पर हावी हो रहे हैं। गणेशोत्सव से शुरू सिलसिला गांव में भगवान से समाधान तक पहुंचा, जस्टिस चन्द्रचूड़ को नौकरी के बकाया गिने-चुने दिनों चुप रहने की सलाह उनके कोई दोस्त दे सकते हैं? 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 अक्टूबर 2024


(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 21 अक्टूबर 2024



 

चंद्रबाबू की अनोखी सोच, आबादी बढ़ाओ अभियान

 21 अक्टूबर 2024

 

आंध्र के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू का कल का एक बयान बहुत से लोगों को हैरान कर सकता है और कई लोगों को निराश कर सकता है। आम हिंदुस्तानी देश में बढ़ती हुई आबादी को लेकर फिक्र में डूबे हुए दिखते हैं। आपातकाल के संजय गांधी आबादी पर काबू के नाम पर देश में खलनायक बन गए थे, लेकिन बाद में कई लोगों ने उनके बाकी जुर्म अलग रखकर सिर्फ जनसंख्या नियंत्रण वाले हिस्से की तारीफ भी की थी। अभी चंद्रबाबू नायडू का ये बयान इस तर्क के साथ है कि आंध्र के कई जिलों में गांवों में सिर्फ बुजुर्ग बचे हैं क्योंकि नौजवान पीढ़ी विदेश में, या दूसरे राज्यों में काम करने चली गई है। उनका तर्क यह है कि दो से कम बच्चे होने से युवा आबादी तेजी से घटी है, इसलिए दो से अधिक बच्चे होने पर नौजवान कामकाजी आबादी बढ़ेगी। 

जिन लोगों को नायडू की यह बात अटपटी लगती है उन्हें दक्षिण और उत्तर भारत के फर्क को समझना होगा। आज हालत यह है कि देश में प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े अगर राज्यवार देखें तो दक्षिण के सारे राज्य ऊपर के पंद्रह राज्यों में आ जाते हैं, और सारे ही हिंदी भाषी राज्य नीचे के पंद्रह राज्यों में। जब प्रति व्यक्ति उत्पादकता और आय में उत्तर और दक्षिण में इतना बड़ा फर्क है, तो यह बात जाहिर है कि दक्षिण के राज्यों में आबादी बोझ नहीं है, वह उत्पादक संपत्ति है। दूसरी तरफ अशिक्षा, बेरोजगारी और गरीबी से भरे हुए उत्तर भारत और हिंदी राज्यों में बढ़ती आबादी बहुत बड़ा बोझ है। हम जब देश के राज्यों की फेहरिस्त देखते हैं तो यूपी और बिहार 32वें और 33वें, सबसे आखिर में हैं। आंध्र और तेलंगाना का हाल यह है कि वहां के अधिकतर परिवारों के लोग प्रदेश या देश के बाहर जाकर कामयाबी से काम कर रहे हैं। देश के बाहर से जिन राज्यों को कमाई आती है, उनमें आंध्र और तेलंगाना सहित दक्षिण के सारे ही राज्य हैं बल्कि केंद्र सरकार को अलग-अलग राज्यों से मिलने वाले केंद्रीय टैक्स के आंकड़े देखें तो दक्षिण से प्रति व्यक्ति टैक्स अधिक मिलता है, और केंद्र सरकार से उत्तर भारत को मदद अधिक मिलती है क्योंकि उत्तर के राज्य पिछड़े हुए हैं, उनकी आर्थिक स्थिति खराब है। 

हालत यह है कि भारत के राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने दक्षिण के राज्यों पर यह रोक लगा दी है कि वे मेडिकल कॉलेजों में सीटें नहीं बढ़ा सकते। इसके पीछे तर्क यह दिया गया है कि दक्षिण में वैसे भी आबादी के अनुपात में मेडिकल सीटें राष्ट्रीय औसत से बहुत अधिक है और यूपी-बिहार जैसे उत्तर के राज्यों में मेडिकल कॉलेज और मेडिकल सीटें आबादी के अनुपात में बहुत कम हैं। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग का यह तर्क इतना खोखला और बेहूदा है कि यह दक्षिण के राज्यों से अधिक डॉक्टर निकलने की संभावनाओं को खत्म करता है जबकि हिंदुस्तान में आज रूस, यूक्रेन, चीन, और बांग्लादेश से भी मेडिकल पढ़ाई करके आए हुए डॉक्टरों को काम करने की इजाजत मिल रही है। यह हैरानी की बात है कि भारत के चिकित्सा छात्रों को दूसरे देशों में पढऩे की छूट है लेकिन दक्षिण भारत को मेडिकल सीटें बढ़ाने की इजाजत नहीं दी जा रही है। ख़ुद उत्तर भारत में अगर मेडिकल सीटें बढ़ाना है, तो उसके लिए भी मेडिकल-शिक्षक दक्षिण से ही मिल सकेंगे। उत्तर भारत के हिंदी राज्यों की नालायकी का दाम दक्षिण चुका रहा है। यह सिलसिला देश में उत्तर-दक्षिण के बीच विभाजन की खाई को और गहरा, और चौड़ा करते चले जाएगा। इस सिलसिले में यह भी याद दिलाना जरूरी है कि दक्षिण ने आबादी को घटाकर देश की जनसंख्या नियंत्रण की नीति में बड़ा योगदान दिया था और इसके बदले उसे डिलिमिटेशन में कम संख्या में लोकसभा सीटें मिलने जा रही हैं यानी जिन राज्यों ने देश की जनसंख्या-नीति में अधिक योगदान दिया, उन्हें सजा दी जा रही है। 

हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हमने देश के अलग-अलग राज्यों के संदर्भ में यह बात कई बार लिखी है कि आबादी को बोझ समझने की नौबत देश और प्रदेश की सरकारों की नालायकी के अलावा और कुछ नहीं रहती। जब सरकारें जनता को काम मुहैया नहीं करा पाती हैं तभी आबादी बोझ लगती है। दुनिया के बहुत से विकसित देश आज अधिक आबादी की तरफ बढ़ रहे हैं क्योंकि उन्हें कामगारों की कमी पड़ रही है। भारत जैसा देश और इसके अधिकतर प्रदेश अगर अपने लोगों को उत्पादक काम दे पाएंगे, तो यहां पर आबादी कमाई का बहुत बड़ा जरिया हो सकती है। दुनिया की कंपनियां चीन से परे भारत को भी एक बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब मानकर चल रही हैं, और चीन प्लस वन अंतरराष्ट्रीय कारोबार में भारत के ही संदर्भ में अधिक इस्तेमाल हो रहा है। चंद्रबाबू नायडू ने जो कहा है उसे आंध्र-तेलंगाना के लोगों की पढ़ाई-लिखाई, उनके हुनर, और प्रदेश और देश के बाहर जाकर काम करने की उनकी भाषा के आधार पर कहा है। कोई काबिल प्रदेश और जिम्मेदार नेता ही भारत में ऐसी बात कहने का हौसला दिखा सकता था। हम पूरी तरह से चंद्रबाबू नायडू की बात के हिमायती हैं कि आंध्र में पंचायत और म्युनिसिपल चुनाव लडऩे के लिए दो या इससे ज्यादा बच्चे होना जरूरी किया जा रहा है। जब आंध्र के इस कानून की तैयारी को देखें तो छत्तीसगढ़ जैसे कई राज्यों के कानून वहां की हालत बताते हैं कि दो से अधिक बच्चे होने पर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के चुनाव भी रद्द हो जाएंगे। 

हमने राज्यों के बारे में यह बार-बार कहा है कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य की खनिज संपदा की वजह से उसकी जो प्रति व्यक्ति आय है उससे संतुष्ट होकर बैठ जाना सरकार के लिए समझदारी की बात नहीं है। राज्यों को अपने लोगों के हुनर, उनकी शिक्षा, और दुनिया भर में जाकर काम करने की उनकी क्षमता-महत्वाकांक्षा को इस हद तक बढ़ा देना चाहिए कि राज्य अधिक से अधिक आबादी पर अधिक से अधिक कमाई कर सके। जो प्रदेश अपने लोगों को धर्म के आयोजनों जैसे अनुत्पादक कामों में झोंककर रखते हैं, पढ़ाई-लिखाई, महत्वाकांक्षा और संभावना से दूर रखते हैं, उन प्रदेशों में बड़ी आबादी बड़ी समस्या हो सकती है। उत्तर भारत को देश के अधिक प्रधानमंत्री बनाने के अहंकार से मुक्ति पानी चाहिए, और उसे अपने आम लोगों की क्षमता बढ़ाने की ठोस कोशिशें करनी चाहिए। आज दक्षिण के टैक्स से उत्तर में राशन बंटता है तो यह अच्छी नौबत नहीं है। राज्यों को अपने लोगों को पूरी दुनिया के प्रतियोगी माहौल में जाकर काम करने के लायक तैयार करने को अपनी जिम्मेदारी मानना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

बढ़ते हुए साइबर-जुर्म से बचाव के लिए बीमा हो..

20 अक्टूबर 2024

 

इन दिनों लगातार बढ़ते चले जा रहे साइबर और डिजिटल जुर्म एक तरफ तो यह साबित करते हैं कि मुजरिम जांच एजेंसियों के मुकाबले बहुत अधिक रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं। पुलिस और दूसरी जांच एजेंसियां जब तक मुजरिमों के किसी एक तौर-तरीके को पकड़ पाती हैं, तब तक वे कई दूसरे तौर-तरीके तलाश लेते हैं, और उन पर अमल करने लगते हैं। बहुत मामूली पढ़े-लिखे या कि अनपढ़ सरीखे मुजरिमों को देखकर एक बात की हैरानी जरूर होती है कि बिना किसी विशेषज्ञता के जिस तरह वे न सिर्फ मानव स्वभाव को जान-समझकर लोगों को ठगने लगते हैं, बल्कि लोगों के डिजिटल उपकरणों और ऑनलाईन एप्लीकेशनों में घुसपैठ की नई-नई संभावनाएं भी रोज ढूंढते रहते हैं। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी हैरानी इस बात पर होती है कि ऐसे होशियार मुजरिम भी यह अंदाज नहीं लगा पाते कि जुर्म के कुछ दिनों के बाद पुलिस उन तक पहुंच ही जाएगी। दरअसल डिजिटल और इंटरनेट टेक्नॉलॉजी में जुर्म की संभावनाओं के साथ-साथ उनके पकड़े जाने की संभावनाएं भी जुड़ी रहती हैं, और अधिकतर साइबर-अपराधी जांच एजेंसियों की गिरफ्त में आ ही जाते हैं। पूरी दुनिया में जो सबसे बड़े साइबर मुजरिम इंटरनेट के एक सबसे बदनाम हिस्से, डार्क वेब, पर काम करते हैं, उनके अंतरराष्ट्रीय गिरोह भी आगे-पीछे पकड़ में आ जाते हैं। अब कई देशों की जांच एजेंसियां मिलकर काम करती हैं, और पिछले कुछ बड़े भांडाफोड़ कई देशों में एक साथ छापे मारकर किए गए थे। 

अब जिस तरह हिन्दुस्तान में कुछ कानूनों का असर लोगों को सजा दिलवाने में बहुत ही कम होता है, और उन्हें बिना जमानत बरसों तक जेल में रखने में अधिक होता है, इसी तरह साइबर-जुर्म, और मुजरिमों की गिरफ्तारी के बीच कुछ महीनों का ही एक औसत फासला होता है, और ऐसे मुजरिम पकड़ में आ जाते हैं, यह एक अलग बात है कि उनके जुर्म की कमाई तक एजेंसियां हर बार नहीं पहुंच पातीं, लोगों से ठगा और लूटा गया पैसा हर बार वापिस नहीं मिलता। ऐसे में सरकार और कारोबार को मिलकर लोगों को एक ऐसा साइबर-बीमा मुहैया कराना चाहिए जो कि लोगों की डूबी गई रकम की भरपाई कर सके। लोगों के जिंदगी के कामकाज सरकार के नियमों की वजह से, और बाजार की सहूलियत की वजह से अधिक से अधिक डिजिटल और ऑनलाईन होते चल रहे हैं। आज हालत यह है कि अगर आपके पास एक स्मार्टफोन नहीं है, तो आप भारत जैसे देश में जिंदगी के बहुत सारे काम नहीं कर सकते। सच तो यह है कि अगर आपके पास स्मार्टफोन नहीं है, तो आप अपने आपको शायद जिंदा भी साबित न कर सकें। ऐसे में साइबर-जुर्म और फ्रॉड से लोगों को हिफाजत दिलाना, उनके घाटे की भरपाई कर पाना सरकार और कारोबार की मिलीजुली जिम्मेदारी होनी चाहिए। सरकार को बैंकों के साथ मिलकर, या जिस मोबाइल एप्लीकेशन के माध्यम से जालसाजी हुई है उन्हें जोडक़र एक बीमा योजना सामने रखनी चाहिए। इसमें फोन और कम्प्यूटर जैसे उपकरण बनाने वाली कंपनियों का भी हौसला बढ़ाया जा सकता है कि वे बिक्री के साथ ही जालसाजी के खिलाफ बीमा पॉलिसी भी उपलब्ध कराएं। इसके अलावा इंटरनेट और मोबाइल सेवा उपलब्ध कराने वाली कंपनियों को भी फ्रॉड के खिलाफ बीमे से जोड़ा जा सकता है। आज जब आगजनी, बाढ़, भूकम्प, चोरी, और बीमारी जैसी चीजों से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए बीमा मौजूद है, तब साइबर-फ्रॉड के खिलाफ बीमा भी रहना चाहिए। 

दुनिया के बहुत से विकसित देशों में बीमे का चलन इतना आम है कि लोग उसके बिना अपने खर्च से तो दांतों का इलाज भी नहीं करा सकते। अब जलवायु परिवर्तन से मौसम की जो मार इलाकों पर पड़ रही है, उसने लोगों और बीमा कंपनियों, सबके सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। जिस तरह बाढ़, और सूखे का खतरा बढ़ रहा है, उससे फसल से परे भी शहर और पूरे-पूरे इलाके डूब जा रहे हैं। अब समुद्री तूफान और बाढ़ के नुकसान के लिए अलग से बीमा योजनाएं बन रही हैं। कुछ दशक पहले तक हिन्दुस्तान में भी फसल-बीमा नहीं होता था, लेकिन अब फसल बीमा एक आम बात है क्योंकि खेती का पूरा कारोबार कर्ज पर टिका हुआ है, और साहूकार-बैंकों को अपने कर्ज की रिकवरी की फिक्र रहती है, जो कि फसल खराब होने पर फसल-बीमा से पूरी हो पाती है। 

वक्त के साथ-साथ सरकार और बाजार दोनों को लोगों के लिए साइबर-सुरक्षा का बीमा मुहैया कराना चाहिए। अगर देश की सरकार अपने स्तर पर इसे पूरे देश के लिए लागू करेगी, तो उसका प्रीमियम भी बहुत कम आएगा। अभी इस बारे में कोई चर्चा सुनाई नहीं दी है, लेकिन लोगों को अपने सांसदों को यह लिखना चाहिए कि साइबर-बीमा के बारे में संसद में चर्चा की जाए।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 अक्टूबर 2024



 

दीवारों पर लिक्खा है, 19 अक्टूबर 2024



 

बाल विवाह पर हमारी बात पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर...

  19 अक्टूबर 2024

 

सुप्रीम कोर्ट ने बाल विवाह के मामले में यह फैसला दिया है कि अलग-अलग धर्मों के लोगों के लिए बनाए गए कोई भी पर्सनल कानून बाल विवाह जारी नहीं रख सकते। अदालत ने साफ किया कि पर्सनल कानून जो कि शादी, तलाक, विरासत जैसे मुद्दों के लिए अलग-अलग धर्मों में अलग-अलग हैं, वे किसी भी तरह बाल विवाह का बचाव करने के लिए इस्तेमाल नहीं किए जा सकते। अदालत ने केन्द्र और राज्य सरकारों के लिए कई किस्म की सलाह भी दी है कि बाल विवाह रोकने के लिए उन्हें क्या-क्या करना चाहिए, और जरूरी हो तो एक कानून बनाकर बाल विवाह को गैरकानूनी करार देना चाहिए। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हमने पिछले महीनों में लगातार इस बारे में अखबार या हमारे अखबार के यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल, पर लगातार इस बात को उठाया था, और लिखा था कि बच्चों के मानवाधिकार किसी भी धर्म के लिए बनाए गए कानून से ऊपर हैं। अब सुप्रीम कोर्ट ने कल यही फैसला दिया है, और हमारी लिखी और कही गई बात सही साबित हुई है। अभी एक बिल्कुल ताजा खबर यह थी कि भारत में 14 लाख से अधिक बच्चों पर बाल विवाह का खतरा मंडरा रहा है। यह आंकड़ा ऐसे समाजों के सर्वे पर आधारित था जो कि बाल विवाह के लिए जाने जाते हैं। देश भर में जगह-जगह सरकार के लोग बाल विवाह की खबर मिलते ही जाकर उसे रोकने की कोशिश करते हैं, और परिवारों के सहमत न होने पर पुलिस कार्रवाई भी होती है। दो दिन पहले ही हमने यूट्यूब पर इस मुद्दे को उठाया था कि किस तरह पश्चिमी यूपी के बागपत में बड़ी संख्या में बाल विवाह होते हैं, और वहां पर दो अलग-अलग मामलों में 15-15 बरस की बच्चियों ने सहायता केन्द्र फोन करके अफसरों को बुलाया, और अपनी शादी रूकवाई। एक लडक़ी के घर तो बारात भी पहुंच गई थी, और उसके बाद भी वह अड़ी रही। ये दोनों ही लड़कियां पढ़ाई करना चाहती थीं, और इसीलिए वे वक्त के पहले शादी के खिलाफ थीं। 

सुप्रीम कोर्ट का इस मामले पर क्या रूख रहेगा, इसका अंदाज लगाना हमारे लिए अधिक मुश्किल नहीं था। सबसे बड़ी अदालत का रूख आमतौर पर प्राकृतिक न्याय के अनुकूल ही रहता है। समाज में प्राकृतिक न्याय अगर देखें तो लोगों के बुनियादी मानवाधिकार धार्मिक नियम-कायदों से ऊपर रहते हैं। इंसान तो धर्मों के बनने के दसियों हजार बरस पहले से चले आ रहे हैं जिस वक्त न कोई धर्म थे, न सामाजिक ढांचा था। उस वक्त भी अलग-अलग इंसानों के अलग-अलग अधिकार रहना ही प्राकृतिक न्याय था, यह एक अलग बात है कि उस वक्त न्याय की धारणा पनपी नहीं थी, और बाहुबल ही अकेला इंसाफ था। लेकिन तब से अब तक समाज व्यवस्था विकसित हुई है, और लोकतंत्र आने के बाद संविधान में लोगों के अधिकारों की अच्छी तरह व्याख्या हुई है। ऐसे में अलग-अलग धर्म या जातियों के लिए जो रीति-रिवाज को संरक्षण दिया गया है, उसे कभी भी लोगों के बुनियादी मानवाधिकार के ऊपर नहीं लादा जा सकता। इसलिए सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मानवाधिकार की एक बड़ी बुनियादी समझ पर टिका हुआ है, और हमें यही उम्मीद भी थी कि यह अलग-अलग विवाह कानूनों के तकनीकी जाल में नहीं उलझेगा। 

भारत में इसका सबसे बड़ा असर मुस्लिम समाज पर पड़ेगा जहां लड़कियों की माहवारी शुरू होते ही उन्हें शादी के लायक मान लिया जाता है। और 12-13 बरस की लडक़ी खुद तो कोई फैसला लेने लायक रहती नहीं है इसलिए मां-बाप उसे जिस खूंटे से चाहें, उससे बांध देते हैं। हैदराबाद जैसे शहर से भयानक खबरें आती हैं कि छोटी-छोटी बच्चियों को मरणासन्न बुजुर्गों के हाथों किस तरह निकाह के नाम पर बेच दिया जाता है, और ऐसे बूढ़े मर्द कुछ महीने एक नए बदन से खेलने के बाद उसे तलाक दे देते हैं, और ऐसी लड़कियां फिर अगली शादी के लिए कतार में खड़ी कर दी जाती हैं। हैदराबाद में ऐसे बाल विवाह रोकने के काम में लगे हुए एक संगठन ने एक मामला सामने रखा था जिसमें किशोरावस्था के पहले से शादी और तलाक झेलती हुई एक लडक़ी युवती बनने तक 18वीं शादी के लिए खड़ी कर दी गई थी। धर्म पर आधारित कोई भी समाज खुद होकर सुधरने को तैयार नहीं होता है, इसीलिए हिन्दू समाज में भी सतीप्रथा से लेकर देवदासी प्रथा तक कई चीजें बंद करवानी पड़ी थीं, और विधवा विवाह पर लगा हुआ सामाजिक प्रतिबंध खत्म करवाना पड़ा था। तकलीफ की बात यह भी है कि जितनी भी समाजों में इस किस्म की बुरी प्रथाएं चल रही हैं, वे अनिवार्य रूप से महिलाओं पर ही लादी जाती हैं, और मुस्लिम महिलाएं तो तीन तलाक का वार भी झेलती थीं जिन्हें मोदी सरकार ने एक कानून बनाकर गैरकानूनी करार दिया है, और अब ऐसे तलाकों पर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज होने लगी हैं। 

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से ग्रामीण इलाकों में गरीब मजदूर परिवारों पर एक दबाव पड़ेगा जो कि पति-पत्नी दोनों के काम पर निकल जाने पर घर में अकेली लडक़ी छोडऩा नहीं चाहते। यह बात तो जाहिर है कि भारत में कहीं भी लडक़ी या महिला सुरक्षित नहीं हैं, ऐसे में गरीब परिवार लडक़ी की जल्द शादी करके उसकी जिम्मेदारी ससुराल पर डाल देते हैं। समाज के इस तबके को बाल विवाह के खिलाफ सहमत कराने में यह बात भी आड़े आएगी कि लडक़ी की हिफाजत की गारंटी कौन लेंगे? देश-प्रदेश की सरकारें तो इसमें पूरी तरह नाकामयाब साबित हो चुकी हैं, और जब बालिग हो चुकी लड़कियां और महिलाएं भी महफूज नहीं रह गई हैं, तब गरीब मजदूर परिवारों की बच्चियां किसके भरोसे सूने घरों में छोड़ी जा सकेंगी? इसके साथ-साथ आदिवासी समाज के बारे में भी सोचना पड़ेगा, जिसके लिए अलग से कोई पर्सनल लॉ तो नहीं बना है, लेकिन समाज के रीति-रिवाज के मुताबिक इन्हें कई किस्म की छूट दी गई है। उत्तर-पूर्वी राज्यों में बहुपति प्रथा जैसी बात को भी कानूनी माना गया है। इस आदिवासी समाज में कमउम्र में होने वाली शादियों का क्या होगा, इस बारे में भी केन्द्र और राज्य सरकारों को सुप्रीम कोर्ट के बाल विवाह के खिलाफ इस ताजा फैसले की रौशनी में कोई रास्ता निकालना होगा। कुल मिलाकर इस फैसले के बाद ही अब सरकारों पर, संसद और विधानसभाओं पर, और समाज पर भी दबाव पड़ेगा कि गैरकानूनी करार दिए गए बाल विवाह को पूरी तरह जड़ से कैसे मिटाया जाए। 

(Daily Chhattisgarh)