संपादकीय
30 अप्रैल 2018

हिंदुस्तान में कल करीब पौने दो हजार किलोमीटर पर बसी दो जगहों पर दो अलग-अलग बातें हो रही थीं जिनका आपस में कोई रिश्ता नहीं था। या शायद यह कहना अधिक सही होगा कि दोनों का आपस में रिश्ता ही रिश्ता था!?!?
छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचल सरगुजा के जशपुर जिले के गांवों में लोग शहरी लोकतंत्र के खिलाफ खड़े हुए हैं। कहा जा सकता है कि वे लोकतंत्र के खिलाफ हैं, लेकिन ऐसा कहने के पहले यह भी समझना होगा कि भारत के मौजूदा शहरी, सवर्ण संपन्न और शिक्षित रह गए लोकतंत्र में आदिवासियों की जगह क्या है? उन आदिवासियों का इस शहरी लोकतंत्र पर भरोसा कितना है, क्यों नहीं है, क्यों उन्हें शायद इसकी जरूरत भी नहीं है। लेकिन जशपुर से पौने दो हजार किलोमीटर दूर गुजरात के उना को एक नजर देख लें। उना का नाम दो बरस पहले तब खबरों में आया जब वहां के दलितों को सवर्ण हिंदू गौरक्षकों ने सरेआम बुरी तरह पीटा और उसके वीडियो दुनिया भर में फैले। वह मुद्दा देश भर में एक नई दलित उत्तेजना बनकर उभरा और एक नया ध्रुवीकरण होने के आसार दिखे। कल उसी उना में तीन सौ दलित परिवार बौद्ध हो गए कि जिस हिंदू धर्म में उन्हें इंसान भी नहीं माना जाता, वे उसमें क्यों रहें?
छत्तीसगढ़ के जशपुर और गुजरात के उना के बीच की यह बराबरी कुछ अटपटी लग सकती है, लेकिन है नहीं। ये दोनों ही तबके सवर्ण हिंदू समाज के शोषण और अत्याचार के शिकार हैं, आदिवासी शहरी लोकतंत्र के शिकार भी हैं। हिंदू समाज के सवर्ण हिस्से के हिंसक लोगों को समझना चाहिए कि अंबेडकर का बौद्ध आंदोलन इसी सवर्ण-हिंसा के खिलाफ शुरू हुआ था, और उना उस इतिहास का ताजा पन्ना है जिसकी स्याही अभी गीली है। हिंदुत्व के हमलावर और जानलेवा त्रिशूलों ने ऐसी एक भी वजह नहीं छोड़ी है कि दलित हिंदू धर्म के पांवों के तलुए बनकर हिंदू बन रहें।
ठीक इसी तरह देश के आदिवासी इलाकों की बेचैनी उन्हें लोकतंत्र के शहरी सोच वाले मॉडल के भीतर सांस नहीं लेने दे रही। यह सहज बात समझने की जरूरत है कि जहां जंगल हैं, जहां खदानें हैं, जहां कुदरत की ऐसी नेमतें हैं, आदिवासी वहीं पर बसे हुए हैं। वे जल, जंगल, जमीन से जुड़े हैं, उसी पर जिंदा हैं, और आदिवासी आंदोलन से निपटने का यह सही तरीका नहीं है। अगर अहिंसक आदिवासी आंदोलनकारियों की मांग या घोषणा संविधान से परे की है, तो इसके लिए ऐसी राजनीतिक तोड़मोड़ गलत है। भाजपा और दूसरी कई बाहरी पार्टियों के लोग दिन में हजार जगहों पर संविधान के खिलाफ बोलते हैं, खुलकर बोलते हैं, लिखते हैं, तो क्या उन सबको असहमत लोग तोड़ दें?
सत्तारूढ़ पार्टी या सरकार का ऐसा करना संवेदनाशून्य कार्रवाई है। इस मुद्दे को कानूनी नुक्तों से परे समझने की जरूरत है। देश के जल, जंगल, जमीन भी आदिवासियों की वजह से जिंदा बचे हैं। शहरों ने अपने लिए लोहा, कोयला, लकड़ी, पानी, और दूसरे खनिज जुटाने के लिए आदिवासी इलाकों तक पहुंच बनाई और स्थानीय मूल निवासियों को समझे बिना यह काम किया। नतीजा यह हुआ कि चौथाई सदी के ऐसे दोहन और शोषण के खिलाफ आदिवासी इलाकों में बेचैनी बढ़ी और नक्सलियों को जगह मिली।
छत्तीसगढ़ के जिस सरगुजा से नक्सल हिंसा कई बरस पहले खत्म हो चुकी है, उस इलाके में पत्थरगढ़ी आंदोलन शुरू हुआ है। वर्ष 2002 में अस्तित्व में आया पत्थरगड़ी आंदोलन देश के आधा दर्जन से अधिक राज्यों के उन इलाकों में हो चुका है जहां आदिवासी बसते हैं। सरगुजा से लगे झारखंड के आदिवासी बहुल इलाकों में यह जोरों पर चल रहा है। जिसमें संविधान के कुछ प्रावधानों का हवाला देते हुए बाहरी लोगों को अपने इलाके में आने से मना कर दिया है कि वे खुद अपने इलाके में शासन कर लेंगे। जिस पांचवी अनुसूची का जिक्र किया गया है सचमुच में वे संविधान में दर्ज हैं, जिसमें ग्रामसभा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।
कुछ लोगों को यह बात असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक लग सकती है, लेकिन इस असहमति और विरोध को समझने के लिए पहले यह समझना होगा कि संविधान पांचवीं सूची के ऐसे आदिवासी इलाकों में ग्राम सभाओं को कितने और कैसे हक देता है जिनकी अनदेखी केन्द्र और राज्य सरकारें हमेशा से करते आई हैं। उस अनदेखी के खिलाफ अगर जमीन खो रहे आदिवासी विरोध के लिए संविधान की अपनी समझ से एक व्याख्या कर रहे हैं, तो उसके पीछे की वजहें को समझना होगा। यह इसलिए भी समझना जरूरी है कि छत्तीसगढ़ के इस हिस्से से दूर, दक्षिण में बसे बस्तर में सरकार की दसियों हजार जवानों की ताकत भी नक्सल हिंसा को खत्म नहीं कर पाई है। इस मोर्चे पर हजारों करोड़ रुपये साल का खर्च हो रहा है और हजारों बेकसूर आदिवासियों पर जुल्म भी हो रहा है जो उन्हें शहरी लोकतंत्र से दूर धकेल रहा है।
प्राय: प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इलाकों पर राज्य सरकारों की नजर रहती है, इसका विरोध और आंदोलन कुचले जाते हैं। जशपुर के पास जहां आदिवासियों ने अपने स्वराज का पत्थर लगाया था, उसे उस इलाके से केन्द्रीय मंत्री बने भाजपा नेता के दौरे के दौरान उनकी सत्तारूढ़ पार्टी के लोगों ने तोड़ दिया। इस एक कोने में आदिवासी बेचैनी और दूसरे कोने में दलितों का सवर्ण हिंसा में धार्मिक विद्रोह हल्के में नहीं लेना चाहिए। सरकारों को ऐतिहासिक गलतियां या ऐतिहासिक गलत काम नहीं करने चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

















