दीवारों पर लिक्खा है, 31 दिसंबर 2024



 

फिजूलखर्ची और हरामखोरी बढ़ाने की केजरीचाल...

 31  दिसंबर 2024

 

दिल्ली में होने जा रहे विधानसभा चुनाव के पहले एक बार फिर रेवड़ी, लॉलीपॉप दिखाने का काम शुरू हो गया है। पिछले सीएम और अब जमानत पर छूटे हुए, आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने एक पुजारी-ग्रंथी सम्मान योजना की घोषणा की है, और हर पुजारी और गुरूद्वारा ग्रंथी को 18 हजार रूपए महीने दिए जाएंगे, अगर आम आदमी पार्टी की सरकार फिर आएगी। केजरीवाल ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि पुजारी एक ऐसा तबका है जिसमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी कर्मकांड को आगे बढ़ाया है, और कभी अपने परिवार पर ध्यान नहीं दिया, और हमने कभी उन पर ध्यान नहीं दिया। केजरीवाल ने प्रेस कांफ्रेंस में दावा किया कि ऐसी योजना देश में पहली बार लागू होगी। इससे पहले वे महिलाओं और बुजुर्गों के बारे में कुछ अलग योजनाओं की चुनावी घोषणा कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि दिल्ली (प्रदेश) के हर मंदिर और गुरूद्वारों में पुजारियों और ग्रंथियों का पंजीयन किया जाएगा।

दिल्ली में केजरीवाल के विरोधियों ने याद दिलाया है कि आम आदमी पार्टी की सरकार दस बरस से मस्जिदों के इमामों को हर महीने 18 हजार रूपए देते आई है, और अगर पुजारी-ग्रंथी को बराबरी का हक देना है, तो फिर इमामों की तरह इतने बरसों का एरियर्स भी पुजारी-ग्रंथी को मिलना चाहिए। लेकिन कुछ दूसरे लोगों ने यह याद दिलाया है कि मौलवियों-इमामों को तनख्वाह पहले कांग्रेस और भाजपा की सरकारें भी देती आई हैं। खुद इमाम सडक़ों पर उतरे हुए हैं कि आम आदमी पार्टी की सरकार ने तीन बरस से उन्हें यह तनख्वाह नहीं दी है, और जब उन्हें पहले से मिलती आ रही तनख्वाह नहीं दी जा रही है, तो पुजारी-ग्रंथी को यह कहां से मिल जाएगी?

ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट फ्रीबीज या रेवड़ी के मामले में वहां चल रहे एक जनहित मामले की सुनवाई को भूल ही गया है। कुछ बरस हो चुके हैं, इस जनहित याचिका पर सुनवाई चल ही रही है, और सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग से लेकर केन्द्र, राज्य सरकारों को, और राजनीतिक दलों को नोटिस भेज चुका है। यह नोटिस गए भी लंबा वक्त हो गया है, और राजनीतिक दल और सरकारें चला रहीं पार्टियां उसके बाद के चुनावों में घोषणाएं करने में लगी हुई हैं। कोई राजनीतिक दल चुनावी तोहफे बांटने की सामंती प्रथा को छोडऩा नहीं चाहते, जबकि 16 जनवरी 2022 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक जनसभा में कहा था कि मुफ्त रेवड़ी बांटकर वोट पाने की कोशिशें की जा रही हैं, और यह रेवड़ी संस्कृति देश के विकास के लिए बहुत खतरनाक है। इसके बाद मोदी की पार्टी से जुड़े हुए एक वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने जनवरी 2022 में जनहित याचिका दायर की थी, जिस पर सुनवाई किसी किनारे पहुंची नहीं है। बल्कि अगस्त 2022 में आम आदमी पार्टी ने इस जनहित याचिका के खिलाफ एक पीटीशन लगाई थी, और कहा था कि जनता को पानी, बिजली, या सार्वजनिक परिवहन, जैसी सहूलियतें मुफ्त में उपलब्ध कराना रेवड़ी नहीं है। अदालत के जोर देने पर चुनाव आयोग ने अप्रैल 2022 में जवाब दाखिल करके कहा कि वह चुनाव अभियानों में फ्रीबीज के वायदों को नियंत्रित करना नहीं चाहता। आयोग का कहना था कि यह एक नीतिगत निर्णय रहता है, और राजनीतिक दलों पर चुनाव आयोग का किसी भी तरह का रोक-टोक करना जरूरत से अधिक प्रतिक्रिया रहेगा। चुनाव आयोग का कहना था कि यह मतदाताओं को ही तय करना चाहिए कि किस पार्टी के कौन से वायदे कितने व्यवहारिक और मुमकिन है। अगस्त 2022 में तीन जजों की बेंच ने एक विशेषज्ञ कमेटी बनाने का सुझाव दिया जो कि रेवड़ी-संस्कृति कहे जाने वाले इन तौर-तरीकों का अध्ययन करे। अभी तक यह मामला निपटारे के कहीं आसपास भी नहीं है। 

हम बुनियादी सहूलियतों की बातों पर तो नहीं जाते, क्योंकि कोई भी पार्टी या सरकार गंभीरता से भी यह मान सकती है कि बिजली, पानी, और मेट्रो-बस जैसी सुविधाएं जरूरतमंद तबकों को मुफ्त मिलनी चाहिए। लेकिन केजरीवाल ने अभी जो नया डोरा डाला है, वह कुछ अधिक ही है। मंदिरों के पुजारी, और गुरूद्वारों के ग्रंथी न तो गरीब रहते हैं, और न ही भूखे। आज तक किसी भी धर्मस्थल से ऐसी मांग भी नहीं आई कि सरकार से उन्हें वेतन-भत्ता मिले। इनके मुकाबले मस्जिदों के इमाम कुछ गरीब हो सकते हैं, क्योंकि मुस्लिमों में गरीबी अधिक है, लेकिन वे भी भूखे मरते हों, ऐसा नहीं लगता। धर्मस्थल कोई बुनियादी जरूरत नहीं है, और वहां पर किसी पुजारी को पूरे वक्त कोई काम नहीं करना पड़ता। इन्हें आस्थावानों की ओर से कुछ न कुछ मिलते भी रहता है। धर्म को मानने वाले लोग इनका ख्याल रखते हैं। और ये लोग आमतौर पर मंदिर या गुरूद्वारे में ही कहीं रह लेते हैं, और मर्जी से धर्म का काम करते हैं, कमाई करते हैं, और अपना परिवार चलाते हैं। केजरीवाल का यह कहना कि इनकी तरफ कभी ध्यान नहीं दिया गया, निहायत बकवास बात है। धर्मस्थलों पर सरकार को किसी तरह का खर्च नहीं करना चाहिए, और अगर कोई धर्म इतना गरीब है कि उसे सरकारी मदद की जरूरत है, तो पहले तो उसे मानने वाले लोगों से पूछना चाहिए कि वे अपने उपासना स्थलों को क्यों नहीं चला पा रहे हैं? अधिकांश धर्मस्थल सरकारी और सार्वजनिक जमीनों पर कब्जा करके बनते हैं, या कि दानदाताओं की दी हुई मुफ्त की जमीनों पर। इनमें से सभी जगहों पर दानपेटियां रखी रहती हैं, और जितने भक्त वहां पहुंचते हैं, उनके मुताबिक वहां कमाई भी होती है। इसके अलावा धर्मस्थल अपने सामने और आसपास, सडक़ किनारे, और सार्वजनिक जगहों पर कई किस्म की पूजा सामग्री की बिक्री का कारोबार भी करते हैं, त्यौहारों पर उनकी अतिरिक्त कमाई होती है, और लोग नई गाडिय़ां खरीदने पर भी मंदिर जाकर पुजारी से पूजा करवाते हैं, और उन्हें कुछ सौ रूपए देते हैं। लोग अपनी खास पारिवारिक तिथियों पर भी मंदिर जाकर वहां चढ़ावा देते हैं। इन सबके चलते हुए किसी पुजारी के भूखे रहने की कोई नौबत नहीं रहती, और इन्हें वेतन या भत्ता देना धार्मिक कामकाज में गरीब जनता के पैसे की फिजूलखर्ची के अलावा कुछ नहीं होगा। कोई भी गुरूद्वारा इतना गरीब नहीं रहता कि वह अपने ग्रंथी की देखभाल न कर सके। इसलिए केजरीवाल का यह नया शिगूफा वोटों के लिए किया जा रहा एक पाखंडी नाटक है, और इससे देश में फिजूलखर्ची और हरामखोरी की एक नई संस्कृति पैदा होगी, और पहले से चली आ रही ऐसी संस्कृति आगे बढ़ेगी। यह सिलसिला बिल्कुल नहीं चलना चाहिए, क्योंकि यह चुनाव में धर्म का इस्तेमाल भी है। एक तरफ तो चुनाव आयोग चुनाव प्रचार में धर्म के इस्तेमाल के खिलाफ बात करते आया है, और दूसरी तरफ यह नया शिगूफा उसके ठीक खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट को भी अपनी धीमी रफ्तार को छोडक़र इस मामले की सुनवाई करना चाहिए, और देश में अगर कोई धर्मनिरपेक्ष संगठन अदालत तक जाने की ताकत रखते हैं, तो उन्हें भी केजरीवाल की इस घोषणा के खिलाफ हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट पहुंचना चाहिए। हमारा तो यह मानना है कि धार्मिक संगठनों को खुद होकर सामने आना चाहिए, और राजनीति के केजरीवालों से कहना चाहिए कि उन्हें इस तरह के टुकड़ों की जरूरत नहीं है, और धर्मालु जनता अपने धर्मस्थलों पर काम करने वाले इमामों, पुजारियों और ग्रंथियों का ख्याल रखने में पर्याप्त सक्षम हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 दिसंबर 2024



 

अनपढ़ मंत्री के कंधे पर हजारों करोड़ के घोटाले की बंदूक धरकर चलाई

30  दिसंबर 2024

 

छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित शराब घोटाले में अब आखिरी में जाकर ईडी ने पिछली भूपेश सरकार के आबकारी मंत्री रहे कवासी लखमा और उनके करीबी लोगों पर छापे मारे। दो हजार करोड़ से अधिक का शराब घोटाला बताते हुए ईडी ने मामला अदालत में पेश कर दिया है, और इस मामले में गिरफ्तार कई दिग्गजों को जमानत भी नहीं मिल रही है। इनमें अखिल भारतीय सेवाओं के कुछ ऐसे चर्चित अफसर भी हैं जिनके भ्रष्ट और गुनहगार होने पर उनके मां-बाप को भी कोई शक नहीं था, यह अलग बात है कि अब भी तमाम पकड़ाए और घेरे गए लोग अपने को मासूम बता रहे हैं। कवासी लखमा ने अपने खुद के, बेटे, और सहयोगियों के ठिकानों पर पड़े छापों पर कहा कि वे बेकसूर हैं, और उन्हें आबकारी विभाग हांकने वाले अफसर अरूणपति त्रिपाठी जहां कहते थे, वहां वे दस्तखत कर देते थे। यह बात जगजाहिर है कि कवासी लखमा की कभी बचपन में मामूली प्रायमरी स्कूल पढ़ाई हुई होगी, लेकिन वे लिखना-पढऩा नहीं जानते, और दस्तखत करना भर जानते हैं। उनके आसपास उठने-बैठने वाले लोग भी यह बात बताते हैं कि त्रिपाठी जब फाइलों पर दस्तखत करवाने जाते थे, तो वे जहां-जहां कहते थे, वहां-वहां कवासी लखमा दस्तखत कर देते थे। यह एक अलग बात है कि कुछ देखने वालों का यह भी कहना है कि कवासी लखमा फाइलों की संख्या गिनना जानते थे, और साथ में टेबिल पर रखे गए उतनी ही संख्या के लिफाफों को भी गिन लेते थे। यह जो भी इंतजाम था, पूरी सरकार की जानकारी में था, और ऐसा कोई दूसरा मंत्री हमें अविभाजित मध्यप्रदेश से अब तक याद नहीं पड़ता जिसके विभाग के बारे में पूछे गए जवाब स्थाई रूप से एक दूसरा मंत्री देता था। तकरीबन तमाम वक्त भूपेश के एक विश्वस्त मंत्री रहे मो.अकबर ही विधानसभा में कवासी लखमा के विभागों की तरफ से जवाब देते थे। आबकारी जैसा विभाग जिससे राज्य सरकार की हर बरस की सबसे अधिक कमाई जुड़ी हुई है, उसे एक तकरीबन अनपढ़ मंत्री को देकर मुख्यमंत्री और कांग्रेस पार्टी ने कौन सी नीयत दिखाई थी, इसका अंदाज लगाना बहुत मुश्किल भी नहीं है। ईडी अदालत में यह कहा भी है कि मुख्यमंत्री के करीबी, और रायपुर के मेयर के बड़े भाई अनवर ढेबर ही छत्तीसगढ़ के आबकारी मंत्री की तरह काम करते थे। प्रदेश के शराब कारखाने वाले भी इस बात को कसम खाकर बताते हैं कि ढेबर ही शराब का पूरा कारोबार चलाता था, और अब जब छापा पड़ रहा है, तो एक अनपढ़ मंत्री भी इसकी लपेट में आ रहा है। ईडी ने 21 सौ करोड़ रूपए से अधिक का शराब घोटाला स्थापित करने के सुबूत अदालत में लगाए हैं, और यह कहा है कि कवासी लखमा को हर महीने 50 लाख रूपए दिए जाते थे। यह कैसा भयानक मजाक है कि पांच बार के विधायक रहे एक बहुत ही लोकप्रिय आदिवासी नेता के दस्तखत को 50 लाख रूपए महीने के किराए पर ले लिया गया था, और अखिल भारतीय सेवाओं का अफसर त्रिपाठी मनचाही फाइलों पर दस्तखत कराते रहता था। अब ढेबर और त्रिपाठी सरीखे तमाम लोग जेल में हैं, और कवासी लखमा ईडी के छापे के बाद ईडी के दफ्तर में बैठे हैं।

किसी आदिवासी नेता की समझ पर कोई शक नहीं किया जा सकता लेकिन उसकी पढऩे-लिखने की क्षमता अगर बहुत सीमित है तो उसे सरकारी या संवैधानिक फाइलों की जिम्मेदारी देने वाले लोगों से सवाल तो बनते हैं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, और कांग्रेस पार्टी के उस वक्त के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी को ये तमाम बातें अच्छी तरह मालूम थीं, और उसके बाद भी ऐसा खतरनाक विभाग अगर एक सीधे-सरल आदिवासी नेता के कंधे पर बंदूक की तरह रखकर चलाया जा रहा था, तो पूरी की पूरी पार्टी इसके लिए जिम्मेदार है, उस वक्त के मुख्यमंत्री तो जिम्मेदार हैं ही। हमको यह भी लगता है कि क्या मंत्रिमंडल को शपथ दिलाने वाले राज्यपाल किसी व्यक्ति की क्षमता को लेकर यह सवाल नहीं कर सकते थे, या कि जब विधानसभा में यह मंत्री कोई भी जवाब नहीं दे पा रहा था, और लगातार दूसरा मंत्री ही जवाब दे रहा था, तो फिर आबकारी मंत्री अपने पद और गोपनीयता की शपथ को कैसे पूरा कर रहा था? ये बुनियादी सवाल पांच बरस की कांग्रेस सरकार के दौरान ईडी और आईटी के तमाम छापों के बावजूद, तमाम मामले-मुकदमों के बावजूद कभी कांग्रेस पार्टी ने नहीं पूछे। छत्तीसगढ़ में भूपेश सरकार किसी क्षेत्रीय पार्टी की सरकार नहीं थी कि मानो ममता बैनर्जी या हेमंत सोरेन, चन्द्राबाबू नायडू से कौन सवाल पूछ सकते हैं? चाहे छत्तीसगढ़ कांग्रेस के लिए एटीएम ही क्यों न रहा हो, पार्टी अपनी नैतिक जिम्मेदारी से, और मुख्यमंत्री अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से बरी नहीं हो सकते। आज अगर कवासी लखमा भ्रष्टाचार के मामले में, और दारू के एक असाधारण, अद्वितीय काले कारोबार में फंसे दिख रहे हैं, तो एक आदिवासी को ऐसी मुसीबत में डालने की जवाबदेही औरों की भी आनी चाहिए। यह बात हर कोई अच्छी तरह जानते थे कि त्रिपाठी और अनवर ढेबर जैसे लोग जहां चाहे वहां कवासी लखमा का अंगूठा लगवा लेते थे, और उन्होंने जिस बड़े पैमाने पर दारू का संगठित अवैध साम्राज्य खड़ा किया, उसके बारे में सुनते हैं कि इटली से कुछ माफिया डॉन भी अपने बच्चों को ट्रेनिंग लेने भेज रहे हैं।

सार्वजनिक रूप से इस पर बहस होनी चाहिए कि कम पढ़े-लिखे, कम जानकार, या कवासी लखमा की तरह के लगभग अनपढ़ लोगों के कंधे पर जुर्म की बंदूक रखकर चलाना क्या जायज है? यह बात इसलिए भी अधिक चर्चा के लायक है कि आने वाली किसी सरकार में हो सकता है कि फिर किसी अनपढ़ नेता को इसी तरह ठेके पर रखा जाए, और जेल जाने के वक्त उसे जेल भेजा जाए। आदिवासी समाज के साथ ऐसा बर्ताव ठीक नहीं है। कवासी लखमा को आबकारी जैसे विभाग का मंत्री बनाना आदिवासी समाज का सम्मान नहीं था, बल्कि आदिवासी को खतरे और बदनामी में डालने का काम तो यह शर्तिया था। कवासी लखमा से अदालत यह सवाल जरूर कर सकती है कि वे जब पढ़-लिख नहीं सकते थे तो फाइलों पर दस्तखत क्यों करते थे, लेकिन कोई मंत्री अपने मुख्यमंत्री और अपनी पार्टी पर इतना भरोसा तो रखेंगे ही कि वे उन्हें गड्ढे मेें नहीं डालेंगे। फिलहाल कवासी लखमा गहरे गड्ढे में गिराए गए हैं, और इस देश में हमने मंत्री रहे हुए कुछ लोगों को कैद काटते भी देखा है, अदालती फैसला चाहे जो हो, जनता की अदालत में कांग्रेस सरकार और भूपेश बघेल को कवासी लखमा मामले पर जवाब देना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

किसी हीरे के फलक जितने किस्म की हिंसा होती है हिन्दुस्तानी लडक़ी-महिला से

29  दिसंबर 2024

 

महाराष्ट्र की परभनी जिले की खबर है, एक आदमी ने तीसरी बेटी का जन्म होने पर पत्नी को पेट्रोल डालकर जिंदा जला डाला। यह हिंसा सीसीटीवी कैमरे पर कैद भी हुई है, और लोग इसके गवाह भी हैं। कुंडलिक उत्तम काले नाम के व्यक्ति ने अपनी मैना नाम की 34 बरस की पत्नी से लगातार हिंसा का सिलसिला चला रखा था, और एक के बाद एक बेटियां पैदा होने पर उसकी हिंसा बढ़ती जा रही थी जो कि अब इस तरह के भयानक कत्ल में तब्दील हुई।

यह मामला हिन्दुस्तान के बहुसंख्यक तबके में लडक़ों की चाह का एक बड़ा सुबूत है। अजन्मी बच्चियों की भ्रूण-हत्या रोकने के लिए भ्रूण की मेडिकल जांच से लडक़े-लडक़ी का पता लगाना गैरकानूनी कर दिया गया है, लेकिन फिर भी वह लुके-छिपे चलते रहता है, और उससे अजन्मी बच्चियों को मारना भी जारी है। गिनती में जरूर कम होंगे, लेकिन अधिक संपन्न तबकों के लोग ऐसी जांच के लिए दुनिया के उन देशों में चले जाते हैं जहां पर कि भ्रूण-लिंग परीक्षण गैरकानूनी नहीं है, क्योंकि उन देशों में किसी को ऐसा अंदाज भी नहीं होगा कि हिन्दुस्तानी अजन्मी लड़कियों को छांट-छांटकर मारते हैं। हमने यहां पर बहुसंख्यक हिन्दू तबके का खास जिक्र इसलिए किया है कि इसकी कई धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ इसके सामाजिक रिवाजों में भी बेटे का होना एक किस्म से जरूरी मान लिया जाता है क्योंकि उसके बिना न अंतिम संस्कार हो सकता, और न ही स्वर्ग प्राप्त हो सकता, जिसका कि कोई सुबूत भी नहीं है। दूसरी तरफ लडक़ी है जिसे जन्म से शादी तक ‘पराए घर की अमानत’ माना जाता है, और फिर शादी से लेकर मरने तक ‘पराए घर से आई हुई’। हिन्दू लडक़ी एक किस्म से फिलीस्तीन होती है, जो बेघर रहती है, जिसका अपना कोई घर होता ही नहीं, शायद वृंदावन का विधवाश्रम उनका पहला और आखिरी घर होता है।

हमें मालूम है कि कई लोग हमारे इस विश्लेषण और निष्कर्ष को अन्यायपूर्ण मानेंगे, और इस तस्वीर को हिन्दू समाज की अधिक बड़ी हकीकत नहीं मानेंगे, लेकिन हिन्दुओं में लड़कियों और महिलाओं की हालत ऐसी ही है। इस धर्म से जुड़े कुछ पुराने मार्गदर्शक ग्रंथ इस बात की वकालत करते हैं कि लडक़ी को पहले पिता के नियंत्रण में रहना चाहिए, फिर पति के नियंत्रण में, और पति के जाने के बाद पुत्र के नियंत्रण में। ऐसे में यही लगता है कि वृंदावन के विधवाश्रम में पहुंचने के बाद ही वह इन तीनों किस्मों के नियंत्रण से जिंदगी में पहली बार बाहर हो पाती है। लोगों को याद होगा कि हर बरस हिन्दुस्तान में दर्जनों या सैकड़ों ऑनरकिलिंग होती हैं, जो कि मोटेतौर पर लडक़ी के परिवार द्वारा लडक़ी की की गई हत्या रहती है क्योंकि उसने अपनी मर्जी से शादी की है। बालिग लडक़ी की शादी को भी परिवार अपने फैसले का सामान मानता है, और यह सोच हिन्दू विवाह की एक रस्म से उपजी और मजबूत हुई है कि शादी के लिए लडक़ी का कन्यादान किया जाता है। यह तो जाहिर है कि दान किसी सामान का होता है, या किसी जानवर का। ऐसे में जब इसे समारोहपूर्वक की जाने वाली एक रस्म बनाकर रखा गया है, तो जाहिर है कि कन्या को सामान मान लेने की हिन्दुस्तानी सोच में कुछ भी अटपटा नहीं है।

पहले भी कुछ मौकों पर हम इस मिसाल को लिख चुके हैं कि किस तरह देश के सबसे बड़े कैंसर अस्पताल, मुम्बई के टाटा मेमोरियल कैंसर हॉस्पिटल ने वहां पहुंचने वाले मरीजों का एक सर्वे करने पर यह पाया था कि कैंसर की शिनाख्त होने पर लोग बेटों को तो इलाज के लिए लेकर आते हैं, लेकिन बेटियों को लाने वाले बहुत कम रहते हैं। जाहिर है कि लोग यह मान लेते हैं कि बेटी तो पराया सामान है, किसी दूसरे परिवार की अमानत है, और उस पर खर्च क्यों किया जाए? हो सकता है कि बहुत संपन्न तबकों के लिए बेटों और बेटियों दोनों के इलाज का बोझ उतना बड़ा न रहता हो, लेकिन जिन परिवारों में इलाज का खर्च मायने रखता है, खर्च से परे भी बहुत किस्म की मेहनत लगती है, वहां बेटों को इलाज के लायक माना जाता है, और बेटियों को उनके हाल पर छोड़ देने के लायक। अगली पीढ़ी के लडक़े और लड़कियों में भेदभाव से परे भी भारत के आम समाज में महिला की हालत बहुत खराब है। कहीं खाना न पकने पर, या गर्म खाना न मिलने पर पति पत्नी को मार डाल रहा है, तो कहीं मामूली से झगड़े में उसे ऊपरी मंजिल से नीचे फेंक दे रहा है। कुल्हाड़े से काटकर फेंक देने के भी कई मामले सामने आते हैं, और भूले-भटके ही ऐसी खबर आती है कि पत्नी ने पति को मार डाला। शायद ऐसे मामले पांच-दस फीसदी भी नहीं होते होंगे।

दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में कामकाजी महिला के देह-शोषण को लेकर बने कानूनों पर अमल बहुत ही कमजोर है, और यह देश सुप्रीम कोर्ट के एक मुख्य न्यायाधीश को देख चुका है जिस पर उसकी मातहत कर्मचारी ने यौन-शोषण का आरोप लगाया था, और यह चीफ जस्टिस को शिकायत की सुनवाई के लिए खुद ही जजों की बेंच का मुखिया बनकर बैठ गया था। ऐसे रंजन गोगोई को आज यह देश राज्यसभा में भी देख रहा है। जाहिर है कि ऐसी मिसालों के चलते देश में लडक़ी और औरत की अधिक इज्जत भी मुमकिन नहीं है। जिस रंजन गोगोई के लिए हमने महाभियोग चलाने की सिफारिश इसी कॉलम में की थी, उस रंजन गोगोई को रिटायर होते ही राज्यसभा भेजा गया था। देश में लैंगिक न्याय की सोच का जैसा कत्ल इस जज ने किया था, उसकी कोई दूसरी मिसाल शायद पूरी दुनिया की किसी सुप्रीम कोर्ट में देखने नहीं मिलेगी। और ऐसी मिसाल देश के भीतर दसियों करोड़ मर्दों का हौसला तो बढ़ाती ही है जिनके लिए रंजन गोगोई एक आदर्श से कम नहीं। कोई हैरानी नहीं है कि इस देश के बड़े-बड़े नेता जब कभी किसी कैमरे पर गालियां बकते हुए कैद होते हैं, तो वे गालियां मां और बहन की ही होती हैं, बाप और भाई की नहीं। सामाजिक संस्कृति का असर इतना है कि जब इस देश की महिलाएं भी गंदी गालियां देने पर उतारू होती हैं, तो वे गालियां मां और बहन की ही होती है। इसलिए आज प्रताडि़त होने वाली बहू कल खुद सास बनने पर अपनी बहू की प्रताडऩा की हिंसक परंपरा जारी रखती है। अगर सास ही बहू के साथ होती हिंसा का विरोध करे, तो भला किस परिवार में बहू के साथ ज्यादती हो सकती है?

ऐसे बहुत से कतरा-कतरा पहलू हैं जो बताते हैं कि लडक़ी को किस तरह बोझ मान लिया जाता है, और लडक़े की चाह पूरी न होने पर किस तरह पति अपनी पत्नी को जिंदा जला डालता है। जिंदगी के अनगिनत पहलू लैंगिक-असमानता के शिकार हैं, और हर जिम्मेदार व्यक्ति को लगातार यह कोशिश करनी चाहिए कि यह बेइंसाफी खत्म हो, क्योंकि ऐसा न होने पर उनको आज अगर अपनी बेटी प्यारी भी है, तो भी वह ससुराल जाकर तीसरी बेटी को जन्म देने पर जलाकर मार डालने के लायक मान ली जाएगी।  

(Daily Chhattisgarh)

तीन दशक में एआई से इंसानी नस्ल खत्म होने का खतरा, बीस फीसदी!

 29 दिसंबर 2024

इस बरस फिजिक्स का नोबल पुरस्कार पाने वाले, और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के गॉडफॉदर कहे जाने वाले जेफ्री हिंटन की एक नई आशंका लोगों को चौंका, और हड़बड़ा सकती है कि दस-बीस फीसदी ऐसी आशंका है कि अगले तीस बरस में एआई इंसानों को पूरी तरह खत्म कर दे। बीबीसी के एक प्रोग्राम में पूछे गए कई सवालों के जवाब में इस कम्प्यूटर-वैज्ञानिक ने कहा कि इस टेक्नॉलॉजी में बदलाव की रफ्तार उम्मीद से बहुत अधिक है। प्रोफेसर जेफ्री को एआई पर उनके काम के लिए ही नोबल पुरस्कार मिला है, और उनकी बात को हलके में नहीं लिया जा सकता। उनका कहना है कि यह धरती पर पहला मौका है जब इंसान का अपने से अधिक बुद्धिमान से वास्ता पड़ रहा है। उनका कहना है कि इस बात की अब तक भला कौन सी ऐसी मिसाल थी जिसमें कम समझदार लोग अधिक समझदार से काम लेते हों, उस पर काबू रखते हों? उन्होंने कहा कि बहुत अधिक ताकत रखने वाले एआई के सामने इंसानों की हालत घुटनों पर चलने वाले बच्चों सरीखी रहेगी। उन्होंने कहा कि इंसानों को अपने आपको तीन बरस उम्र का मान लेना चाहिए, एआई के सामने उनका यही हाल रहेगा। पिछले बरस प्रोफेसर जेफ्री ने गूगल में अपना काम छोड़ दिया था ताकि वे एआई के बेकाबू विकास के खतरों के बारे में खुलकर बोल सकें, और यह बता सकें कि किस तरह बुरे हाथों में पडक़र यह टेक्नॉलॉजी तबाही ला सकती है। उन्होंने इस बात को मंजूर किया है कि जब उन्होंने एआई पर काम शुरू किया था तब उन्हें यह अंदाज नहीं था कि वह बढक़र यहां तक पहुंच जाएगी।

एआई के जनक कहे जाने वाले वैज्ञानिक की ये आशंकाएं बेबुनियाद नहीं हैं। कुछ अरसा पहले दुनिया के हजार से अधिक वैज्ञानिकों और टेक्नॉलॉजी-विशेषज्ञों ने एक सार्वजनिक अपील की थी कि एआई के विकास पर रोक लगाई जाए, वरना वह बेकाबू होकर तबाही का हथियार बन सकता है। लोगों को याद होगा कि बरसों पहले इंसान के क्लोन बनाने को लेकर भी ऐसी अपील हुई थी, और दुनिया भर की सरकारों ने मानव-क्लोन पर रोक लगा दी थी। अभी भी यह आशंका है कि दुनिया के लोकतांत्रिक ढांचे से बाहर रहने वाले कुछ बेकाबू देश ऐसा कर भी रहे हों। और बंद कमरों में या अस्पतालों में होने वाले प्रयोगों को बाहर की दुनिया न पूरी तरह जान पाती, और न उन्हें रोक पाती। इसलिए आज मानव-क्लोनिंग जैसी तकनीक से लेकर एआई तकनीक तक कहां पहुंची हुई हैं, इसका अंदाज लगाना बड़ा मुश्किल है। लोगों ने अभी कुछ अरसा पहले तक पेगासस जैसे फौजी-खुफिया-घुसपैठिया सॉफ्टवेयर के बारे में सोचा नहीं था कि ऐसा कोई सॉफ्टवेयर किसी के फोन में घुसकर उसे पूरी तरह काबू में कर सकता है। इसलिए विज्ञान हमेशा ही कल्पना की रफ्तार के साथ मुकाबला करते रहता है।

एआई को लेकर आज वैज्ञानिकों और टेक्नॉलॉजी-विशेषज्ञों की आशंकाओं से परे मेरी एक अलग आशंका है कि दुनिया में शोषण से असहमति रखने वाले लोग एआई को सामाजिक न्याय की उनकी सोच पूरी करने के लिए एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं। अभी तक एआई पर हुई चर्चा में एआई-टेररिज्म पर खबरें तो सामने नहीं आई हैं, लेकिन आज जिस तरह दुनिया के कई देशों में, और कई देशों की सरहदों के पार भी जिस तरह गुरिल्ला कार्रवाई चलती रहती है, जिस तरह अमरीका के वल्र्ड ट्रेड सेंटर के टॉवरों पर विमानों से हमले किए गए थे, उस तरह के अकल्पनीय हमलों के लिए भी कोई आतंकी समूह एआई का असाधारण और जानलेवा इस्तेमाल कर सकते हैं।

मुझे इस बारे में अपनी थोड़ी-बहुत कल्पना लिखने में कोई हिचक नहीं हो रही है, कि इससे किसी विद्रोही या आतंकी समूह को कोई राह सूझेगी। जो समर्पित और आत्मघाती बागी होते हैं, उनकी कल्पनाओं का आसमान अधिक बड़ा होता है। ऐसे में लगता है कि सिर्फ आतंकी ही नहीं, धरती को बचाने की नीयत रखने वाले कुछ ऐसे पर्यावरणवादी बागी भी हो सकते हैं जो कि कुछ तबकों को खत्म करके बाकी धरती को बचाने, और एक सामाजिक न्याय लाने की सोच सकें। मिसाल के लिए कुछ लोगों को लग सकता है कि दुनिया के जो लोग अंधाधुंध हवाई-ईंधन खपत करते हैं, अंधाधुंध बिजली का इस्तेमाल करते हैं, जिनकी निजी जीवनशैली धरती पर बहुत बड़ा कार्बन फुटप्रिंट छोड़ रही है, ऐसे लोगों को हटा देने से धरती के बचने की संभावना बढ़ सकती है। कोई दूसरा समूह गैरजरूरी सामानों से धरती पर बढऩे वाले बोझ को कम करने के लिए उन्हें बनाने वाले कारखानों को निशाना बना सकता है। और अब इस तरह के किसी भी हमले के लिए हथियारों की जरूरत नहीं पडऩे वाली है। कम्प्यूटरों से ही ऐसे सभी हमले हो सकेंगे जिनके लिए एआई निशाने छांटेगा, और हमले के तरीके तय करेगा। धरती पर जंगल बचाने में दिलचस्पी रखने वाले कोई संगठन लकड़ी की खपत वाले कारखानों को ठप्प कर सकेंगे, ऐसे फर्नीचर के कारोबार खत्म कर सकेंगे। कोई और समूह प्रति व्यक्ति बिजली की सबसे अधिक खपत करने वाले लोगों की शिनाख्त करके उनके घर-दफ्तर के सामानों को ठप्प कर सकेगा। अब मान लें कि एक-एक परिवार के लिए चलने वाले बड़े-बड़े स्वीमिंग पूल ठप्प कर दिए जाएं ताकि पानी और बिजली दोनों बच सकें, तो क्या इससे धरती का कुछ औसत भला हो सकेगा?

ऐसा लगता है कि इंसान से अधिक समझदार होने के बाद एआई खुद भी ऐसे फैसले ले सके कि धरती के पर्यावरण को बचाने के लिए कौन से जहरीले सामानों को बनाना ठप्प किया जाए, किस तरह सबसे संपन्न और पूंजीवादी देशों में खपत को घटाया जाए, और फिर साइबर-हमलों से कैसे ऐसे कारोबार और उनकी खपत खत्म की जाए। एआई में जिस दिन कम्प्यूटरी-समझ से परे सरोकार भी आ जाएगा, और मानव सभ्यता को, धरती को बचाने के लिए, सबसे गरीबों को एक न्यूनतम हक दिलवाने के लिए, सामाजिक न्याय लाने के लिए जिस दिन एआई अपने फैसले लेने लगेगा, उस दिन इंसान उसे रोक भी नहीं पाएगा। आज यह बात किसी विज्ञान कथा की तरह लग सकती है, लेकिन यह बहुत दूर की बात भी नहीं है। आने वाले कुछ बरसों के भीतर ही यह नजारा देखने मिल सकता है कि दुनिया के सबसे बड़े शोषक शासकों, कारोबारियों, और समूहों के खिलाफ एआई खुद ही फैसले ले, खुद ही हमला तय करे, और खुद ही इन तबकों की ताकतों को खत्म कर दे।

एआई के साथ अगर सरोकार जुड़ जाएंगे, तो ऐसा नहीं लगता कि वह मानव सभ्यता को खत्म कर दे। लेकिन अगर एआई बिना किसी सरोकार के अगर बेहद और बेकाबू ताकत वाला हथियार बनकर किसी सरकार, कारोबार, या मुजरिम के हाथ लग जाए, तो फिर उनके गैंगवॉर में मानव सभ्यता उसी तरह खत्म हो सकती है जिस तरह कि आज परमाणु तृतीय विश्वयुद्ध हो जाने पर हो सकती है। मेरी कल्पना यह है कि एआई कुछ बुनियादी सरोकारों से बाहर नहीं जाएगी, और अगर कुछ दूसरे लोग सरोकार-विहीन एआई को हथियार की तरह विकसित करने में कामयाब हो जाएंगे, तो हो सकता है कि सरोकारसंपन्न एआई ऐसे हथियारी एआई को भी पहले निपटा दे।

आज की यह कल्पना किसी विज्ञान कथा और अपराध कथा के प्लॉट के लायक है, लेकिन लोगों को एआई के ऐसे खतरों को भी याद रखना चाहिए। दूसरी तरफ एआई से धरती पर बीमारियों की शिनाख्त, इलाज, दवाओं और टीकों के विकास, और पर्यावरण को बचाने जैसी जरूरतों में असीमित योगदान की संभावनाएं भी एकदम सामने दिख रही हैं। एआई नायक और खलनायक, दोनों ही किस्म के किरदारों में एक साथ आते दिख रहा है, और सरोकारसंपन्न एआई को ध्यान में रखकर इस वाक्य में नायिका और खलनायिका को जोड़ देना भी सही होगा, वरना हो सकता है कि एआई असमानता की भाषा को दुनिया के कम्प्यूटरों से मिटाने का काम भी करने लगे। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 दिसंबर 2024



 

दीवारों पर लिक्खा है, 28 दिसंबर



 

सीजेआई के सामने चुनौती, देश का चरित्र बखान करें..

28  दिसंबर 2024

 

मध्यप्रदेश में जबलपुर के एक हिन्दू वकील, एडवोकेट ओ.पी.यादव ने हाईकोर्ट में एक याचिका लगाकर प्रदेश के पुलिस थानों में मंदिरों के निर्माण को चुनौती दी थी, और कहा था कि ऐसे मंदिर बनाना सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के ठीक खिलाफ है जिसमें सार्वजनिक जगहों पर धार्मिक निर्माण को रोका गया है। हाईकोर्ट ने इस याचिका पर पूरे प्रदेश के थानों में मंदिर बनाना रोक दिया था। यह फैसला अभी-अभी का है, और इस आदेश से कुछ खलबली इसलिए मची हुई है कि प्रदेश में 20 बरस से तकरीबन पूरे ही वक्त भाजपा का राज है, और पुलिस थानों में सिर्फ हिन्दू मंदिर बनाने की परंपरा है, और किसी धर्म का निर्माण किसी थाने में हुआ हो ऐसा कभी सुनाई भी नहीं पड़ा है। अब इस मामले के बाद एक दूसरा मामला यह आ गया है कि एमपी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैत ने अपने सरकारी आवास में स्थित हनुमान मंदिर को हटवा दिया है। इस पर वहां के वकीलों के संगठन ने देश के मुख्य न्यायाधीश को लिखकर शिकायत की है और कहा है कि मुख्य न्यायाधीश के बंगले के इस मंदिर में एमपी हाईकोर्ट के पिछले कई न्यायाधीश पूजा-अर्चना करते आए हैं, और इस बंगले पर काम करने वाले कर्मचारियों को भी पूजा के लिए दूर जाकर कीमती समय बर्बाद नहीं करना पड़ता, इसलिए यह मंदिर जीवन को सुखी, शांतिपूर्ण, और सुंदर बनाने का एक महत्वपूर्ण साधन है। चिट्ठी में कहा गया कि अब तक मुस्लिम जजों ने भी कभी इस पर आपत्ति नहीं जताई थी इसलिए इसे इस तरह से हटाना सनातन धर्म का अपमान है। वकीलों ने इसे जस्टिस कैत के बौद्ध होने से जोड़ा है, और कहा है कि वह भी एक कारण हो सकता है। वकीलों ने पुलिस थानों वाली याचिका की सुनवाई से जस्टिस कैत को अलग करने की अपील भी की है।

सुप्रीम कोर्ट ने बरसों पहले एक महत्वपूर्ण फैसले में यह कहा था कि सार्वजनिक जगहों पर किसी तरह के धार्मिक निर्माण नहीं होने चाहिए। अदालत ने इसके लिए जिले के अफसरों को जिम्मेदार भी ठहराया था कि ऐसा कोई भी निर्माण होने पर कलेक्टर-एसपी जिम्मेदार रहेंगे। बरसों पुराने इस आदेश के बाद अभी एक अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने फिर एक फैसले में यह कहा है कि सडक़ों और रेल पटरियों के किनारे के धार्मिक निर्माण, चाहे वो मंदिर हों, या दरगाह, उन्हें हटाना चाहिए क्योंकि जनता की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, और यह अदालती आदेश किसी भी धर्म से भेदभाव के बिना बराबरी से अमल में लाया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट का यह ताजा आदेश सुप्रीम कोर्ट के ही बरसों पुराने फैसले से अलग है, और इन दोनों में कोई टकराव भी नहीं है। सार्वजनिक जगह का मतलब हर सरकारी जगह से होता है चाहे वह कोई सरकारी बंगला हो, या पुलिस थाना।

मध्यप्रदेश के मुख्य न्यायाधीश ने सरकारी बंगले में चली आ रही पुरानी खराब परंपरा को तोडक़र एक हौसलामंद रूख दिखाया है, और हम उसकी तारीफ करते हैं। सरकारी बंगले, दफ्तर, इमारतें, सार्वजनिक जगहें, और सार्वजनिक गाडिय़ां, इन सबका पूरा चरित्र धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए। इनमें रहने या चलने वाले लोग अलग-अलग धार्मिक आस्थाओं के, या नास्तिक हो सकते हैं, लेकिन किसी को अपने धार्मिक प्रतीकों को सार्वजनिक या शासकीय सम्पत्ति पर लादना नहीं चाहिए। जो लोग सरकारी या संवैधानिक ओहदों पर काबिज रहते हैं, उन्हें तो इसलिए भी अधिक सावधान रहना चाहिए कि वे हर तरह के धर्म को मानने वाली जनता के बीच काम करते हैं, और उनकी कोई निजी पसंद या नापसंद उनके सरकारी या अदालती फैसलों में नहीं झलकना चाहिए। हम तो एक आदर्श स्थिति इस बात को मानते कि सरकारी और संवैधानिक, संसदीय, और दूसरे जनसेवक ओहदों पर बैठे लोग अपने कार्यकाल में अपने को धर्म के सार्वजनिक प्रदर्शनों से दूर रखते, लेकिन आज के वक्त में ऐसी उम्मीद करना भगत सिंह के वक्त की क्रांति की उम्मीद करने सरीखा हो जाएगा। लेकिन एमपी के मुख्य न्यायाधीश ने जो रूख दिखाया है, वह पूरी तरह कानूनसम्मत है, और इसे एक नजीर बनना चाहिए। भारत के मुख्य न्यायाधीश के सामने भी यह एक अच्छी चुनौती है कि देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को साफ-साफ बखान करने का मौका उन्हें मिला है, और उन्हें देश में बढ़ते हुए धार्मिक उन्माद पर रोक लगाने का काम भी करना चाहिए। एक बौद्ध जज अगर बंगले से हिन्दू मंदिर हटाकर कोई बौद्ध मंदिर बनवा देते, तो वह उतना ही गलत काम होता, लेकिन जस्टिस कैत ने ऐसा तो कुछ किया नहीं है।

इसी मध्यप्रदेश में लोगों को याद होगा कि जब उमा भारती मुख्यमंत्री बनी थीं, तो अपने परंपरागत भगवा धार्मिक कपड़ों के अलावा उन्होंने मुख्यमंत्री की सरकारी मेज पर भी एक प्रतिमा और पूजा सामग्री के साथ एक मंदिर सा बनवा लिया था। अब ऐसे मुख्यमंत्री के सामने किसी दूसरे धर्म के लोग किस भरोसे के साथ किसी धार्मिक विवाद के मामले लेकर पहुंच सकते थे? तमाम लोकसेवकों को पानी की तरह रहना चाहिए कि उन्हें जिस चीज में मिलाया जाए, वे अपना कोई स्वाद जोड़े बिना घुल-मिल जाएं। देश ने अपना धर्मनिरपेक्ष चरित्र बहुसंख्यकवाद में पूरी तरह खो दिया है, और अब तो हाईकोर्ट के एक मौजूदा जज ने मुस्लिमों को गंदी गालियां बकते हुए बहुसंख्यकवाद की मर्जी से देश चलने का सार्वजनिक दावा भी किया है। अभी अगले कुछ वक्त के लिए देश में लोकतंत्र बाकी है, और भारत को एक धार्मिक राष्ट्र होने में थोड़ा सा वक्त बचा है। उत्साही जजों और वकीलों को, देश के बाकी उत्साही धर्मान्ध या साम्प्रदायिक लोगों को भी थोड़ा सा सब्र करना चाहिए जब तक कि यह राष्ट्र हिन्दू राष्ट्र घोषित न हो जाए। जिस रफ्तार और अंदाज से देश इस मंजिल की तरफ बढ़ रहा है, यह इंतजार बहुत लंबा नहीं रहेगा, और उतने वक्त के लिए सरकारी बंगलों, और सरकारी पुलिस थानों में, सडक़ों के किनारे, और रेल पटरियों की चौड़ाई में, बगीचों और तालाब किनारे मंदिर और दूसरे धार्मिक निर्माण बनाना रोक रखना चाहिए। एक बार जब देश के नाम से धर्म निरपेक्ष शब्द हट जाएगा, और संशोधित संविधान में भारत हिन्दू राष्ट्र बन जाएगा, तब सभी जज भी अपनी टेबिलों पर हिन्दू प्रतिमाएं सजाकर बैठ सकेंगे, ताकि उनसे वे बीच-बीच में फैसलों के लिए तो प्रेरणा ले ही सकें, वकील से क्या सवाल करने हैं, इसकी प्रेरणा भी वे देवी-देवताओं से ले सकें। ऐसे काम में कोई जज अगर आड़े आएं, तो उनकी नींव खुदवाकर भी कुछ कंकाल निकाले जा सकते हैं।

इस देश ने अपने नागरिकों में जिस रफ्तार से धर्मनिरपेक्षता को एक गाली की तरह स्थापित कर दिया है, वह देखने लायक है। सेक्युलर शब्द को जिस तरह सिकुलर (सिक, यानी बीमार) से बदल दिया गया है, वह एक गजब का सनातनी भाषा शास्त्र है। बीते कुछ बरसों में ही इस देश ने यह भी साबित किया है कि हजारों बरस का सभ्यता का विकास, और पौन सदी का लोकतंत्र का विकास लोगों की समझ में बस चमड़ी जितनी मोटी सतह के ठीक नीचे था, जिसे जरा सा खुजाकर या नोंचकर हटाया जा सकता है, हटाया जा रहा है। अभी तो हालत यह है कि आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने देश में साम्प्रदायिक सद्भाव को लेकर, उसके पक्ष में, मंदिर-मस्जिद पर एक बयान दिया, तो आरएसएस के ही मुखपत्र में मानो उसके खिलाफ एक लेख लिखा गया है। सद्भाव की बातें करने पर क्या भागवत को उनके ही घर में किनारे किया जा रहा है? हम ऐसी तस्वीर को बहुत स्वाभाविक नहीं मान रहे, लेकिन सतह पर फिलहाल ऐसा ही कुछ दिख रहा है। देश की सभ्यता के बदन पर चर्बी ऐंठ रही है, देखना है कि वह कहां पर छंटती है, और कहां पर चढ़ती है। हिन्दुस्तानियों के बहुसंख्यक तबके के कुछ लोगों ने जिस तरह धर्मनिरपेक्षता को एक नाजायज औलाद करार दिया है, वह देखना भी तकलीफदेह तो है ही, इतिहास लेखन के हिसाब से वह बहुत दिलचस्प भी है।

(Daily Chhattisgarh)

पहले सप्लाई, और निर्माण फिर टेंडर की खानापूरी!

27  दिसंबर 2024

 

अभी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अखबार की खबर पर खुद होकर सुनवाई शुरू कर दी है, और राज्य सरकार को नोटिस दिया है। बस्तर के करीब दो सौ गांवों में बिना किसी टेंडर, और बिना किसी सरकारी आदेश के 18 करोड़ रूपए के सोलर लाईट लगा दिए गए, और जैसा कि हमेशा होता है इसका भी भुगतान बाद में होते रहता, लेकिन अखबारी खबर पर अदालत के सरकार से मांगे गए हलफनामे की वजह से मामला गड़बड़ा गया। लोगों को याद होगा कि प्रदेश में सरकार चाहे जो भी रहे, सरकारी विभागों का इस किस्म का भ्रष्टाचार चलते ही रहता है। सडक़ बन जाती है, इमारत बन जाती है, और टेंडर भी नहीं हुआ रहता। स्वास्थ्य विभाग ने लाखों की मशीनें हर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पर एक वक्त ले जाकर फेंक दी गई थीं, और प्रदेश स्तर पर उसका भुगतान किया गया था। यह डॉ. रमन सिंह के मुख्यमंत्री रहते स्वास्थ्य मंत्री डॉ.कृष्णमूर्ति बांधी, और स्वास्थ्य सचिव बाबूलाल अग्रवाल के वक्त का मामला था जब नकली सोनोग्राफी मशीनें सप्लाई की गई थीं। बाद में भी कहीं डीएमएफ फंड से, तो कहीं सीएसआर फंड से असली-नकली सामान सप्लाई कर दिए जाते हैं, निर्माण हो जाता है, और उसके बाद कागजी खानापूरी पूरी होती है। प्रदेश में पिछली भूपेश-सरकार के दौरान राजधानी रायपुर में ही एक सडक़ पर डिवाइडर को करोड़ों के खर्च से सजाया गया था, और बाद में जब हंगामा हुआ कि इसका तो कोई टेंडर ही नहीं हुआ, तो नगर निगम और राज्य सरकार ने मिलकर लीपापोती की थी कि उनकी जानकारी के बिना यह किसी कारोबारी संगठन ने करवाया था। जबकि इसके गवाह मौजूद थे कि यह म्युनिसिपल ने ही करवाया था। स्वास्थ्य विभाग से लगातार ये खबरें आ रही हैं कि बिना डिमांड के जिला अस्पतालों में या पीएचसी में दवाएं और उपकरण सप्लाई किए जाते रहे हैं, जो कि बर्बाद होते ही हैं।

एक तरफ तो सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार रोकने के लिए, या उसकी जांच के लिए आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो जैसी एजेंसी है, और दूसरी तरफ सरकार के भीतर के संगठित भ्रष्टाचार को बचाने के लिए नेता, अफसर, और ठेकेदार सब एक हो जाते हैं। पुरानी तारीखों पर कागज बना लिए जाते हैं, नीचे के दफ्तरों से डिलीवरी चालान दस्तखत करवा लिए जाते हैं, और भुगतान हो जाता है। यही सब करते हुए सप्लायर इतनी कमाई कर चुके रहते हैं कि कभी एक बार कुछ करोड़ रूपए डूब जाने पर भी वे नहीं डूब जाते, वे अगली सप्लाई के लिए फिर तैयार रहते हैं। इसके अलावा हर किस्म के सामान की सरकारी सप्लाई के साथ दो बातें जुड़ी रहती हैं, एक तो यह कि इस काम के लिए अतिरिक्त घटिया क्वालिटी के सामान बनाए जाते हैं, और दूसरी बात यह कि उन्हें बाजार से कई गुना अधिक दाम पर खरीदा जाता है। एक मुर्दे के लिए कफन सरकारी खरीदी में इतना महंगा पड़ता है कि उतनी रकम में खुले बाजार से दर्जन भर मुर्दों के लिए कफन आ सकते हैं, और बेहतर क्वालिटी के आएंगे इसकी भी गारंटी रहती है। भारत में सामान बनाने वाले कारखानों में गवर्नमेंट-सप्लाई नाम की एक अलग क्वालिटी रहती है जिसके बारे में बनाने वाले, सप्लाई करने वाले, और सरकारी दफ्तरों में डिलीवरी लेने वाले सभी को मालूम रहता है कि ये सामान कुछ ही दिनों के मेहमान हैं।

हम बरसों से इस बात को उठाते आए हैं कि सरकारी विभागों के भ्रष्टाचार को पकडऩे के लिए एक ऐसी मशीनरी बनानी चाहिए जो कि विभागों के इर्द-गिर्द हवा में तैरती खबरों की जांच करती रहे, और भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, घटिया खरीदी जैसी चीजों पर समय रहते कार्रवाई कर सके। सरकार का, हकीकत में तो जनता का, अधिकतर पैसा या तो सरकार अपने ऊपर स्थापना व्यय के नाम पर खर्च कर लेती है, और बचे हुए एक चौथाई पैसों में तीन चौथाई हिस्सा शायद भ्रष्टाचार में चले जाता है। एक वक्त राजीव गांधी के नाम से यह बात प्रचलित हुई थी कि दिल्ली से निकलने वाला एक रूपया गांव तक पहुंचते हुए सत्रह पैसे रह जाता है, कुछ उसी किस्म की हालत राज्य के अपने बजट की भी रहती है, आधे से लेकर तीन चौथाई तक बजट सरकार अपने ऊपर खर्च करती है, और बची हुई रकम में से खासा पैसा भ्रष्टाचार में चले जाता है, और घटिया क्वालिटी का निर्माण या सामान बहुत जल्द दम तोड़ देता है, और लागत की कोई भरपाई नहीं होती। 

हाईकोर्ट ने इस बार राज्य सरकार के आम ढर्रे से हो रहे कुछ मामलों को पकड़ लिया है, और इन्हें हांडी के चांवल के नमूने के एक दाने की तरह परखना चाहिए। ऐसी कौन सी दानदाता कंपनी हो सकती है जो कि दो सौ गांवों में करोड़ों के सोलर लाईट लगा दे? इस पूरे मामले की अदालत को बारीकी से जांच करवानी चाहिए, और जिम्मेदार अफसरों को पूछना चाहिए कि ‘दानदाता’ सप्लायर उन्होंने जुटाए कैसे हैं? और ऐसे ‘दानदाताओं’से बाकी प्रदेश में भी लाईट लगवानी चाहिए ताकि समाजसेवा की उनकी भावना का बेहतर सम्मान हो सके। अगर सरकारें अखबारों में आने वाली भ्रष्टाचार की खबरों पर बारीकी से कार्रवाई करती रहें, तो ऐसी नौबत घटती भी जाएगी, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है। कहीं पर बीज निगम, तो कहीं हार्टिकल्चर सोसायटी, तो कहीं सीएसआईडीसी से अंधाधुंध रेट कांट्रेक्ट होते हैं, एक से बढक़र एक नकली और घटिया सामान सप्लाई होते हैं, उसमें भी गिनती में कम सप्लाई होते हैं, और सरकार का काम यूं ही चलते रहता है। जो बात सरकारों को खुद होकर देखनी चाहिए, उसके लिए हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट की जरूरत पड़ती है, तो फिर संविधान की शपथ लेकर काम करने की सरकार की औपचारिकता की क्या जरूरत है? 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 दिसंबर



 

मोबाइल और सोशल मीडिया से मरने-मारने की आ रही नौबत समाज के लिए चुनौती

26  दिसंबर 2024

 

हिंदुस्तान में चारों तरफ से खबरेें आती हैं कि किस तरह मोबाइल फोन को लेकर परिवार में विवाद इतना हुआ कि कहीं पति ने पत्नी को मार डाला, तो कहीं पत्नी ने पति को। मोबाइल फोन का अंधाधुंध इस्तेमाल रोकने पर बहुत से छोटे-छोटे बच्चे खुदकुशी कर रहे हैं। एक टेक्नालॉजी और उसका औजार जिंदगी का इतना बड़ा हिस्सा बन गए हैं कि सार्वजनिक जगहों पर बैठे हुए लोग अपने मोबाइल फोन में डूबे रहते हैं, और दुपहिया चलाने वाले अनगिनत लोग एक हाथ में मोबाइल थामे, उस पर कुछ पढ़ते या टाईप करते, उस पर बात करते, एक हाथ से दुपहिया चलाते रहते हैं। सुबह-शाम पैदल घूमने वाले न तो आसपास के तालाब को देखते, न बगीचे को, और न ही पेड़ों को, लोग मोबाइल को देखते हुए पैदल चलते हंै। अभी बीस-पच्चीस बरस पहले तक इस देश में मोबाइल फोन का इस्तेमाल सिर्फ कॉल और एसएमएस के लिए होता था। लेकिन इन दिनों कैमरे से लेकर ई-मेल तक, इंटरनेट से लेकर खरीदी का भुगतान करने तक दर्जनों किस्म के काम एक स्मार्टफोन से होने लगे हैं, और लोगों के पास इसके बिना जी पाने का विकल्प मानो रह नहीं गया है। अब तो तरह-तरह की पहचान और शिनाख्त भी इसी फोन के रास्ते होने लगी है, और एक स्मार्टफोन न होने से जाने कितने तरह के काम हो ही नहीं सकते।

लेकिन स्मार्ट फोन एक औजार की तरह जितने काम का है, उतना ही वह एक आत्मघाती हथियार भी है जब वह इंटरनेट और सोशल मीडिया के साथ जुडक़र लोगों के लिए नशे के सामान की तरह हो जाता है। लोग तरह-तरह के खतरे उठाकर भी अपनी अनोखी और असाधारण रील बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के दबाव में रहते हैं। ऐसा न कर पाने पर उनके दायरे  के दूसरे लोगों से पिछड़ जाने का एक तनाव उन पर मंडराते रहता है, और अब तो किशोरावस्था में पहुंचने से पहले भी भारत जैसे देश में बच्चे किसी रोक-टोक के अपने सोशल मीडिया अकाउंट खोल सकते हंै, और उसके बाद उन पर आसपास के हमउम्र लोगों का यह दबाव शुरू हो जाता है कि तरह-तरह की पोस्ट की जाए, तरह-तरह के संदेश भेजे जाएं। और यह सिलसिला तब तक आगे बढ़ता रहता है, जब तक बहुत से नाबालिग बच्चे सोशल मीडिया पर शिकार ढूंढते हुए पेशवर मुजरिमों के जाल में नहीं फँस जाते। बहुत से देहशोषण के मामले सोशल मीडिया से ही शुरू होते हैं और फिर वॉट्सऐप जैसी मैसेंजर सर्विसों पर आगे बढ़ते हैं।

इन निजी संबंधों से परे भी इन दिनों लोग मोबाइल फोन पर हजार किस्म की धोखाधड़ी और जालसाजी के शिकार हो रहे हैं, और अपनी जिंदगी भर की कमाई को कुछ दिनों, घंटों, या मिनटों में गंवा दे रहे हैं। अमरीका जैसे कई पश्चिमी देश मोबाइल फोन पर स्कूली बच्चों को फंसाकर उनसे उगाही के सेक्सटॉर्शन के शिकार हैं, और हर बरस हजारों बच्चे ब्लैकमेल होते-होते थककर खुदकुशी कर रहे हैं। यही सब देखकर अभी ऑस्ट्रेलिया ने नया कानून बनाया है कि नाबालिग बच्चे किसी भी तरह से सोशल मीडिया का खाता नहीं खोल सकते। जो सोशल मीडिया कंपनी ऐसा करेगी, उस पर एक आसमान छूते जुर्माने का इंतजाम भी किया गया है। अगर मोबाइल फोन सिर्फ बातचीत और संदेश का औजार रहता, तो उससे कोई खूनखराबा नहीं होता। लेकिन अब वह असल जिंदगी से परे एक आभासी जिंदगी का मंच बन गया है, और बहुत से लोग अपनी असल निजी जिंदगी से कहीं अधिक घंटे इस आभासी जिंदगी में गुजारने लगे हैं। यह सिलसिला बहुत भयानक है। दसियों हजार बरसों से इंसान एक व्यक्ति से परे पारिवारिक और सामाजिक प्राणी रहते आए हैं। पिछले कुछ हजार बरसों से आधुनिक सभ्यता धीरे-धीरे लेकिन लगातार विकसित होती रही है। लेकिन पिछली चौथाई सदी में सोशल मीडिया और उसके इस्तेमाल के औजार इस रफ्तार से जिंदगी को ढांक चुके हैं कि असल जिंदगी के लोगों को इस धुंध के बीच कम दिखने लगे हैं। ऐसे में नई और अधेड़ पीढ़ी, दोनों ही मोबाइल फोन और सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में इस तरह डूब रही हैं कि आसपास के जीते-जागते करीबी लोगों से उनकी तनातनी और टकराव का खतरा रहना ही है। जिस तरह किसी का नशा छुड़ाने पर उनकी बेचैनी उन्हें खुदकुशी की कगार तक ले जाती है, उसी तरह मोबाइल फोन और सोशल मीडिया छीन लेने पर बहुत से बच्चे और बड़े खुदकुशी पर उतारू हो जाते हैं।

हमने इस बारे में एक मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता से पूछा तो उनका कहना है कि जब मां-बाप अपने बच्चों से मोबाइल फोन या सोशल मीडिया एकदम से छीन लेते हैं, तो ऐसा खतरा खड़ा होता है। वे बच्चों को सीमित समय के लिए मोबाइल दे सकते हैं, और इसके अलावा उन्हें खेलकूद, योग, या बच्चों की दिलचस्पी के पेंटिंग, डांस, संगीत, जैसे किसी शौक में शामिल करके व्यस्त रख सकते हैं। और एक सबसे जरूरी बात यह भी है कि परिवार के बड़े लोग खुद भी मोबाइल की लत छोडक़र एक साथ बैठने, और कुछ मनोरंजक करने जैसे काम कर सकते हैं जिसमें मोबाइल के आदी हो गए बच्चों का कुछ वक्त लग सके। यह सलाह बच्चों पर तो लागू होती है, लेकिन जब बालिग और अधेड़ लोग फोन पर कई किस्म के रिश्ते बनाने लगते हैं, कई किस्म के वयस्क मनोरंजन के खतरे भी उठाने लगते हैं, तो उनसे ऐसी लत, और ऐसे नशे को छुड़ाना एक अलग किस्म की समस्या है। चौथाई सदी में असल जिंदगी को बेदखल करके काबिज हो गई इस आभासी जिंदगी से छुटकारा पाना आसान नहीं है। लेकिन इससे जो पारिवारिक रिश्ते बिगड़ रहे हैं, परिवार टूट रहे हैं, उन्हें बचाना आज की समाज-व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 दिसंबर 2024



 

दीवारों पर लिक्खा है, 25 दिसंबर 2024



 

स्कूलों की बदहाली और अराजकता से नुकसान सिर्फ पढ़ाई का नहीं होता

25  दिसंबर 2024

 

छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के एक गांव की स्कूल में एक महिला शिक्षिका के खिलाफ छात्राओं की बड़ी गंभीर शिकायतों के बाद शिक्षिका को निलंबित कर दिया गया है। स्कूल की लड़कियों ने 22 किलोमीटर दूर कलेक्टर के पास जाकर कई तरह की शिकायतें की थीं जिनमें यह भी था कि शायद प्रधानपाठिका का काम देख रही यह शिक्षिका छात्राओं से मोबाइल पर वीडियो बनवाने में लगी रहती थी, उन्हें सज-धजकर आकर सोशल मीडिया के लिए रील बनाने दबाती थी। छात्राओं का कहना है कि मना करने पर शिक्षिका उन्हें टीसी दे देने की धमकी देती थी, हाथ-पैर तुड़वा देने की बात कहती थी, और गालियां देती थी। छात्राओं का यह भी कहना है कि स्कूल में शौचालय भी नहीं बनाया गया है, और माहवारी के दौरान उन्हें बड़ी दिक्कत होती है। विभाग की जांच में आरोप सही मिले, और कलेक्टर ने शिक्षिका को निलंबित कर दिया है। हम इस एक मामले की खबरों पर पहले इसलिए नहीं लिख रहे थे कि जांच रिपोर्ट सामने नहीं आई थी, और सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की थी। इन दोनों के बाद अब यह जाहिर है कि मामले में शिक्षिका की कुछ गलतियां तो निकली होंगी।

राज्य की स्कूलों में कई तरह की घटनाएं हो रही हैं। छेडख़ानी से लेकर बलात्कार तक, और नाबालिग स्कूल छात्रों के किए हुए कई और किस्म के जुर्म तक। पहली नजर में ऐसा लगता है कि सरकारी स्कूलों का, छात्रावासों का हाल बेकाबू है। और इनमें छात्र-छात्राओं की संख्या भी काफी अधिक है। 30 लाख या उससे भी अधिक छात्र-छात्राओं का इंतजाम आसान भी नहीं है क्योंकि शाला भवनों और फर्नीचर से लेकर स्कूल ड्रेस और किताब-साइकिल तक, मिड-डे-मील से लेकर स्कॉलरशिप तक हर किस्म के काम स्कूलों से होते हैं। फिर यह भी है कि सरकार के बहुत किस्म के गैरस्कूली काम भी स्कूल शिक्षकों के मत्थे आते हैं। स्कूलों में बड़े पैमाने पर बदअमनी की घटनाएं सामने आती हैं, और बहुत सी जगहों पर, खासकर आदिवासी इलाकों में बहुत से शिक्षक नशे में धुत्त स्कूल पहुंचते हैं। बहुत सी जगहों पर एक-एक शिक्षक कई कक्षाओं को पढ़ा रहे हैं, और किसी जगह शिक्षक की मांग करते हुए, तो किसी जगह शाला भवन की दिक्कतों को लेकर छात्र-छात्राओं को सडक़ों पर देखा जाता है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने खुद होकर स्कूलों के बुरे हाल पर सुनवाई चालू की है, और सरकार को कटघरे में खड़ा किया है।

किसी भी जनकल्याणकारी शासन में स्कूल शिक्षा, और चिकित्सा, ये दो विभाग सबसे अधिक प्राथमिकता के रहते हैं, और छत्तीसगढ़ में इन्हीं दोनों की हालत सबसे खराब दिखती है। सच तो यह है कि खराब हालत की स्कूलों से निकले बच्चे किसी भी राष्ट्रीय दाखिला इम्तिहान के लायक तैयार नहीं हो पाते। दूसरी तरफ अगर स्कूलों के वक्त ही जुर्म से उनका सामना होने लगता है, तो स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के पहले ही वे नाबालिग मुजरिम बनने लगते हैं। स्कूलों को सिर्फ पढ़ाई की जगह मानना ठीक नहीं होगा, यहां पर बचपन से लेकर किशोरावस्था तक का व्यक्तित्व विकास भी होता है, और ऐसे में अगर कहीं शिक्षक नहीं, कहीं इमारत नहीं, और कहीं शौचालय तक नहीं, तो ऐसे में बच्चे लोकतंत्र और सरकार के बारे में किस तरह की धारणा के साथ बड़े होंगे? और स्कूल की पढ़ाई पूरी होने, या पढ़ाई छोड़ देने के तुरंत बाद ही ये बच्चे वोटर भी बनते हैं, और एक गैरजिम्मेदार व्यक्तित्व विकास उनसे किस तरह के उम्मीदवार या पार्टी को छांटने का काम करवाता होगा, यह सोचना अधिक मुश्किल नहीं है। फिर यह भी है कि स्कूल की पढ़ाई छोड़ देने वाले बच्चों के जुर्म में दाखिल हो जाने का एक बहुत बड़ा खतरा रहता है। इसलिए स्कूलों को पढ़ाने के साथ-साथ, बच्चों और किशोरों को पटरी पर बनाए रखने की जगह भी मानना चाहिए। आज स्कूलों की जो हालत दिख रही है, उसके चलते हुए हम खेलों में बहुत आगे बढऩे, या किसी और किस्म की प्रतिभा के विकसित होने की बात सोच भी नहीं पा रहे हैं। और छत्तीसगढ़ की आम सरकारी स्कूल के बच्चों की शायद ही कोई और कामयाबी हो। इसलिए इस विभाग को बहुत मेहनत और काबिलीयत के साथ चलाने की जरूरत है। स्कूल शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल कुछ महीने काम करने के बाद ही सांसद बनाकर दिल्ली भेज दिए गए, और तब से इस विभाग का अतिरिक्त कार्यभार मुख्यमंत्री के पास चले आ रहा है, मंत्रिमंडल का विस्तार उसके बाद से हुआ नहीं है, और पूर्णकालिक मंत्री के बिना किसी को इसकी जिम्मेदारी देनी भी नहीं चाहिए।

केन्द्र सरकार के कई तरह के सर्वे में बरसों से यह बात सामने आती है कि छत्तीसगढ़ की सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर कितना कमजोर है। पिछली भूपेश बघेल सरकार ने सरकारी स्कूलों के बीच कुछ सौ चुनिंदा बेहतर स्कूलों को छांटकर उन्हें अंग्रेजी माध्यम की आत्मानंद स्कूलें बना दिया था। अब वे स्कूलें भी तिरस्कृत सी पड़ी दिखती हैं, और जगह-जगह से खबरें आती हैं कि पिछले पांच बरस आम सरकारी स्कूलों का पेट काटकर भी जो आत्मानंद स्कूलें लाड़ले बच्चों की तरह शानदार बनाई गई थीं, अब उन्हें भी खर्च का टोटा पड़ रहा है, और उनकी हालत भी खराब है। हम बदहाल स्कूलों के समंदर में आत्मानंद नाम के ऐसे सुविधा-संपन्न टापुओं के खिलाफ थे, और भूपेश सरकार के वक्त भी हमने ऐसी अनुपातहीन उत्कृष्टता की सोच का विरोध किया था। अब आज की सरकार के सामने यह दुविधा की नौबत है कि भूपेश सरकार की इस महंगी और खर्चीली योजना को आगे बढ़ाए, या फिर इस पर कोई और फैसला ले। 

छत्तीसगढ़ में सरकारी स्कूलों को एक मिशन और मुहिम की तरह मेहनत करके सुधारने की जरूरत है। इन्हें भ्रष्टाचार से भी बचाने की भी जरूरत है। पता नहीं इतनी उम्मीद आज के वक्त में किसी सरकार से करना जायज होगा या नहीं, लेकिन हमारी सोच इससे कम पर रूक नहीं पाती है। जब तक कोई स्कूल शिक्षा मंत्री न बने, तब तक मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को चाहिए कि इसके लिए अलग से कोई इंतजाम करें क्योंकि मुख्यमंत्री के बहुत से अपने विभागों के बाद स्कूल शिक्षा जैसे दसियों लाख बच्चों, और शायद लाखों शिक्षकों-कर्मचारियों वाले इस विभाग को पूरी तरह देख पाना मुमकिन नहीं है। किसी भी सरकारी या राजनीतिक वजह से स्कूल शिक्षा में ऐसा नुकसान नहीं होना चाहिए क्योंकि इसकी भरपाई बाद में नहीं हो पाएगी। खासकर प्रदेश के आदिवासी इलाकों में सरकारी स्कूलों और छात्रावासों में जैसी गंभीर घटनाएं हो रही हैं, और शिक्षकों के बीच जैसी अराजकता की स्थिति है, उसमें नई पीढ़ी का किसी भी तरह से अच्छा बन पाना मुमकिन नहीं है।   

(Daily Chhattisgarh)

चोरी के शक में की गईं दो भीड़त्याओं से सबक

 24  दिसंबर 2024

 

कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले में एक गांव के भूतपूर्व उपसरपंच को गांव की ही एक भीड़ ने उसी के घर में जिंदा जला दिया क्योंकि उन्हें शक था कि गांव के एक व्यक्ति की सरहदी मध्यप्रदेश में लाश टंगी हुई मिली थी, और वह आत्महत्या न होकर इस भूतपूर्व उपसरपंच की करवाई हुई हत्या थी। भीड़ ने उपसरपंच को उसी के घर के भीतर घेरकर, बांधकर घर सहित जिंदा जला दिया था, घर की कुछ महिलाओं को किसी तरह बचाकर निकाला गया था। अब छत्तीसगढ़ की ही दो और खबरें दो दिनों में दहलाने वाली आई हैं। रायगढ़ जिले के एक गांव में धान चोरी के शक में आरोप लगाते हुए एक आदमी को खंभे से बांधकर इतना पीटा गया कि उसकी मौत हो गई। और धमतरी जिले के एक गांव में एक नौजवान के घर आदमी-औरत आधी रात के बाद लाठी-डंडों से लैस होकर पहुंचे, और उसे उस पर धान चोरी का आरोप लगाया, और उसे बाहर ले जाकर सुबह तक पीटा गया। मरने वाले नौजवान का बाप गिड़गिड़ाते रहा, कोटवार ने भी उसे छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन उसे भी भगा दिया गया। इस मामले में सामने आया है कि सरपंच की मौजूदगी में इस युुवक को पीट-पीटकर मारा गया। जब जी-भरकर मारकर यह टोली चली गई, तब पिता और दूसरे लोग इस जख्मी युवक को अस्पताल ले गए, अस्पताल के रास्ते उसकी मौत हो गई।

जिन लोगों को ये घटनाएं मामूली हिंसा लगती हैं, उन्हें अपनी खैरियत की फिक्र करनी चाहिए। इन तीनों ही मामलों में मारने वाले लोग पेशेवर मुजरिम न होकर आम लोग थे, और उन्होंने यह सोचते-समझते यह हिंसा की कि इसमें मौत हो सकती है, या मार डालने के लिए ही उन्होंने इस हद तक पीटा। दोनों ही मामलों में धान चोरी का आरोप था, और यह जाहिर है कि कोई एक इंसान भला कितनी धान चोरी कर सकता है। और इतनी सी बात को लेकर अगर खुली जगह पर सबके सामने ऐसी भीड़त्या की जाती है, तो यह मामला एक जान जाने से अधिक फिक्र का इसलिए है कि गैरमुजरिम लोगों के मुंह ऐसे कत्ल का खून लग चुका है। मुजरिम अगर कत्ल करें, सुपारी लेकर किसी को मारें, या आपसी गैंगवार में किसी को खत्म करें, तो भी वह उतनी बड़ी फिक्र की वजह नहीं रहती है क्योंकि ऐसे मुजरिम या गुंडे-बदमाश पहले से लोगों और पुलिस की नजरों में रहते हैं। लेकिन जब आम लोग कत्ल करने लगें, तो वह अधिक फिक्र की बात रहती है।

किसी देश या समाज में जब धर्म या जाति के नाम पर, या राजनीतिक मुकाबले और दुश्मनी में लोगों का कत्ल करना शुरू हो जाता है, तो जहां-जहां तक ऐसी खबरें पहुंचती हैं लोगों के भीतर वह आदिम हिंसा जागने लगती है जिसे कि हजारों बरस के सभ्यता के विकास ने, और पौन सदी के लोकतंत्र ने कुछ हद तक सुलाया हुआ था। लोकतंत्र के पहले भी अलग-अलग युगों में अलग-अलग किस्म की राज व्यवस्था, और न्याय व्यवस्था थी, और लोगों का खुद सजा दे देना, कत्ल कर देना, सभ्यता के विकास के साथ घटता चला गया था। अलग-अलग शासन व्यवस्थाओं में भी लोगों का सीधे हिसाब चुकता करना बंद या खत्म हो चुका था, और उन्हें राजा के पास शिकायत लेकर जाना पड़ता था, और वहां सजा होती थी। भारत में पिछली पौन सदी में एक बहुत साफ-साफ लोकतांत्रिक न्याय व्यवस्था विकसित और स्थापित हुई है जिसमें जनता या भीड़ को इंसाफ करने की कोई भूमिका नहीं दी गई है। ऐसे में अगर मामूली से धान की चोरी के आरोप में गैरमुजरिम लोगों की भीड़ भी पीट-पीटकर किसी को मार डाल रही है, तो लोगों के बीच यह देश के कानून के लिए, प्रदेश की पुलिस व्यवस्था के लिए एक बड़ी गहरी हिकारत के अलावा और कुछ नहीं है।

लोगों को इस बात का अच्छी तरह अंदाज और अहसास है कि कत्ल करने पर क्या होता है। आज के वक्त तकरीबन तमाम कातिल पकड़ लिए जाते हैं, फिर चाहे वे दूसरे प्रदेशों से आए हुए पेशेवर शूटर ही क्यों न हों। ऐसे में अपने इलाके में सार्वजनिक रूप से लोगों के बीच की गई सामूहिक हत्या के बारे में लोगों को अच्छी तरह अंदाज होगा कि इससे जेल जाने का बहुत बड़ा खतरा रहेगा, और उम्रकैद जैसी सजा भी हो सकेगी। इसके बाद भी अगर भीड़ इस तरह की हिंसा करती है, और एक मामले में तो घरेलू महिलाएं भी इस हिंसा में शामिल थीं, तो यह साधारण लोगों के इस बुरी तरह हिंसक हो जाने का एक खतरनाक सुबूत है। जब घर-परिवार के भीतर लोग बलात्कार करने लगें, जब स्कूल के शिक्षक, हेडमास्टर, और प्रिंसिपल ही छात्रा से बलात्कार करने लगें, जब बेटियां ही अपने प्रेमी के साथ मिलकर मां-बाप का कत्ल करवाने लगें, जब बीवी प्रेमी के साथ मिलकर पति का कत्ल करवाने लगें, तो यह समाज में कानून के राज के लिए बड़ी हिकारत, और सजा के डर से आजादी का साफ मामला है।

जब देश में कुछ ताकतें धार्मिक आधार पर इस तरह की भीड़त्या का अभिनंदन करती हैं, कुछ ताकतें जातियों के आधार पर ऐसे कत्ल को जायज ठहराती हैं, तो फिर कातिल सोच का संक्रमण खबरों के साथ-साथ दूर-दूर तक फैलता है, और बाकी आम लोगों को भी ऐसे कत्ल का हौसला देता है, उकसावा देता है। यह भी याद रखने की जरूरत है कि हर समाज में नाबालिगों की पीढ़ी को भी अपने आसपास के बालिग लोगों के ऐसे सार्वजनिक और सामूहिक जुर्म से एक राह सूझती है, और हमने देखा है कि आसपास चारों तरफ नाबालिग लडक़े रेप और गैंगरेप कर रहे हैं, कत्ल कर रहे हैं। हिंसा का संक्रमण कानून के सम्मान को पूरी तरह खत्म करते चल रहा है। नतीजा यह निकल रहा है कि समाज में जो लोग आसपास के लोगों को गलत काम करने से रोक सकते थे, रोकते थे, वे भी अब दूसरों के हाथों में चाकू, या जेब में पिस्तौल की कल्पना करते हुए अपनी अतडिय़ों पर हाथ रखते हुए सहमे हुए चुप रह जाते हैं, और समाज में रोक-टोक की सामूहिक जिम्मेदारी भी खत्म हो रही है। अब कम ही लोगों का हौसला बीच-बचाव करने का, या गुंडागर्दी को रोकने का रह गया है।

इस नौबत को सुधारना तो तुरंत मुमकिन नहीं है, लेकिन इसे और अधिक बिगडऩे देने से रोकने के लिए यह जरूरी है कि समाज में धर्म, राजनीति, जाति, किसी भी आधार पर हिंसा को मान्यता देना बंद किया जाए। अभी चार दिन पहले ही बीबीसी पर एक रिपोर्ट आई थी कि किस तरह बंगाल में राजनीतिक पार्टियों के बीच टकराव में इस्तेमाल होने वाले घरों में बने हुए बम टकराव के बाद खुले में पड़े रह जाते हैं, और वहां पिछले तीन दशकों में इनसे खेलते हुए या इनसे टकराकर 565 बच्चे या तो मारे गए हैं, या घायल हुए हैं। बंगाल की राजनीति में बमबारी की ऐसी हिंसा बढ़ते-बढ़ते अब आम हो चुकी है। देश में भीड़त्या को इसी तरह आम नहीं होने देना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 दिसंबर 2024



 

दीवारों पर लिक्खा है, 23 दिसंबर 2024



 

यौन कुंठा से घिरे समाज में सनी लियोनी से सनसनी...

23  दिसंबर 2024

 

एक तो चर्चित अभिनेत्री सनी लियोनी का नाम वैसे भी हिन्दुस्तानियों में सनसनी पैदा करता है क्योंकि वे हिन्दुस्तान आने के पहले कनाडा में वयस्क मनोरंजन की फिल्मों में काम कर चुकी हैं। यहां हिन्दुस्तान में भी सेक्स के मामले में दमित कुंठाओं से भरे हुए समाज में वयस्क मनोरंजन शब्द भी लोगों को उत्तेजित कर देते हैं। इसलिए छत्तीसगढ़ में जब यह पता लगा कि गरीब महिलाओं को फायदा देने के लिए हजार रूपए महीने वाली महतारी वंदन योजना का फायदा पाने वालों में सनी लियोनी का नाम भी है, तो सरकारी योजना में लापरवाही, या भ्रष्टाचार कम लोगों को सूझा, सनी लियोनी की देह तुरंत लोगों की कल्पनाओं को भर गई। जांच में पता लगा है कि आदिवासी इलाके बस्तर में किसी छोटी जगह सनी लियोनी के नाम से एक बैंक खाता खुलवाकर एक व्यक्ति ने महतारी वंदन योजना के हजार रूपए महीने की रकम इस खाते में हासिल कर ली, और अब पुलिस ने इस आदमी को गिरफ्तार भी कर लिया है। दो दिनों से खबरें महतारी वंदन योजना के बेजा इस्तेमाल से कहीं अधिक सनी लियोनी पर केन्द्रित हैं, और इस अभिनेत्री की तस्वीरों के साथ खबरें बनती जा रही हैं। महतारी वंदन योजना में और बैंक खाते में ‘इस’ सनी लियोनी के पति का नाम कुछ और है, जो कि अभिनेत्री सनी लियोनी के पति का नाम नहीं है। इस बारे में एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता वेदमती जोशी और एक व्यक्ति वीरेन्द्र जोशी का नाम सामने आया है, और खाते पर रोक लगाकर वीरेन्द्र जोशी को गिरफ्तार भी कर लिया गया है। वीरेन्द्र जोशी की पत्नी भी महतारी वंदन योजना की हितग्राही है।

छत्तीसगढ़ में हर शादीशुदा, या अकेली रह गई भूतपूर्व शादीशुदा महिला को महतारी वंदन योजना के तहत सरकार हजार रूपए महीने देती है, और करीब 70 लाख महिलाओं को इसका फायदा मिल रहा है। सबसे गरीब महिलाओं के लिए यह रकम बहुत मायने रखती है, क्योंकि ये सीधे उनके नाम के बैंक खाते में पहुंचती है, और घर के मर्द इस रकम को सीधे छू नहीं सकते। सरकारी कर्मचारी महिलाओं और आयकरदाता महिलाओं को ही इसका फायदा नहीं मिल पाता। किसी नागरिक तक सीधे नगद राहत पहुंचाने की यह प्रदेश के इतिहास की सबसे बड़ी योजना है, और इसे विधानसभा चुनाव में भाजपा की सरकार आने के बाद जल्द ही लागू कर दिया गया था। जिन महिलाओं ने इस योजना के फॉर्म भरे थे, उन्हें भी सरकार की यह घोषणा मालूम थी कि अगर अपात्र लोग इसका फायदा लेने लगेंगे तो बाद में उनसे वसूली की जाएगी। प्रदेश की आबादी की करीब 20 फीसदी को अगर इतना व्यापक फायदा पहुंचाया जा रहा है, तो जाहिर है कि इसमें कुछ गड़बड़ी तो होगी ही। और यह गड़बड़ी इसलिए भी होगी क्योंकि सरकार ने लोगों के आवेदनों और घोषणा पत्रों पर भरोसा करके भी उन्हें यह राहत देना शुरू किया है।

लोगों को याद होगा कि 2013 के वक्त प्रदेश की तीन करोड़ की आबादी में आधा-पौन करोड़ राशन कार्ड बन गए थे, और बाद में बारीकी से जांच करने पर 10 लाख से अधिक राशन कार्ड रद्द भी हुए थे। सुप्रीम कोर्ट ने भोजन की सुरक्षा पर चल रहे एक मामले में अदालत को जनहित याचिकाकर्ताओं ने इस बात के लिए सहमत कराया था कि गरीबों की सौ फीसदी शिनाख्त के बाद राशन शुरू करने से बहुत जरूरतमंद दसियों लाख लोग तब तक भूखे रह जाएंगे, इसलिए पहले तो ऐसे हर व्यक्ति को राशन शुरू कर दिया जाए जो बीपीएल की किसी भी लिस्ट में दर्ज है, और उसके बाद भी सरकार इनकी छंटनी करती रहे। इसी तरह महतारी वंदन योजना में 70 लाख महिलाओं को फायदा पहले मिलने लगा है, और एक-एक महिला की जांच अब चल ही रही है। जनकल्याण की, और सबसे गरीब लोगों की जरूरत की योजनाओं में कई बार ऐसी छोटी-मोटी गड़बडिय़ों को रोकने के लिए सारी की सारी योजना को नहीं रोका जाता।

अब अगर छत्तीसगढ़ में 70 लाख महिलाओं को महतारी वंदन की मदद मिल रही है, तो उसमें कुछ लाख अपात्र महिलाओं का होना बड़ी मामूली बात होगी। हिन्दुस्तान में भला सौ लोगों का भी कोई ऐसा हितग्राही-समूह बनाया जा सकता है जिसमें कुछ अपात्र लोग न हों? सडक़ किनारे हर फुटपाथी खाने-पीने के कारोबारी के पास घरेलू गैस सिलेंडर दिखते हैं, और जाहिर तौर पर ऐसा हर सिलेंडर सरकार को चूना लगाता है। हिन्दुस्तानियों की आम नीयत सरकार से टैक्स चोरी की रहती है, रियायत का नाजायज फायदा उठाने की रहती है। इसलिए 70 लाख महिलाओं में कुछ गिने-चुने नाम लेकर इस तरह का बवाल खड़ा करना कुछ वैसा ही है कि ऐसा कहने और लिखने वाले लोग हिन्दुस्तानियों के आम चरित्र को नहीं जानते हैं। यहां तो एक संयुक्त परिवार में अगर सात लोग भी रहते हैं, तो अधिक गुंजाइश यह है कि उनमें से कम से कम एक-दो टैक्स चोरी के हिमायती निकल आएंगे। इस योजना से क्या व्यापक नफा और नुकसान हो रहा है, उसका आंकलन बड़ा मुश्किल काम होगा, और किसी और पति की पत्नी बताई जा रही कोई सनी लियोनी  एक सनसनीखेज कल्पना पैदा करती है, और प्रदेश में मानो महतारी वंदन योजना का यही एक हासिल है। लोगों को याद रहना चाहिए कि देश में शायद एक अरब लोगों के आधार कार्ड बने होंगे, और उसमें से कुछ हजार आधार कार्ड कुत्ते-बिल्ली के नाम के भी बनवा लिए गए थे। उनसे खबरें तो निकली थीं, लेकिन उनकी वजह से आधार कार्ड का महत्व, और उसकी उपयोगिता कम हो गए थे?

किसी भी व्यापक जनहित की ऐसी विस्तृत योजना के बारे में लापरवाह टिप्पणियों के साथ-साथ यह भी सोचना चाहिए कि गड़बड़ी का अनुपात क्या है, और कितने जरूरतमंद गरीबों का कितना फायदा हुआ है। गरीब तबके के लिए बड़ी अहमियत रखने वाली इस योजना को मसखरी का सामान बनाना बहुत से गरीब लोगों को आहत भी कर सकता है। शहरी, शिक्षित, संपन्न, और सवर्ण अहंकार को गरीबों के आहत होने से कोई फर्क पड़ता नहीं है, लेकिन समाज के जो जिम्मेदार लोग हैं उन्हें ऐसी व्यापक योजना को समग्र रूप में भी देखना चाहिए। किसी सॉफ्टड्रिंक की बोतल से निकलते बुलबुलों, या बीयर की गिलास से उठते झाग की तरह की सनसनी वहीं तक सीमित रखनी चाहिए, जनकल्याण के कामों में एक मादक और उत्तेजक नाम से हुई गड़बड़ी मिल जाने से आधा करोड़ से अधिक जायज जरूरतमंदों के हक को कम आंकना नाजायज होगा।

(Daily Chhattisgarh)

पड़ोसियों से जंग सबको पड़ती है बड़ी भारी...

  22  दिसंबर 2024

 

इधर इजराइल और फिलीस्तीन की खबर अभी आ ही रही है कि उनके बीच युद्धविराम पर सहमति तकरीबन पूरी हो गई है, और अब उसकी घोषणा ही बची हुई है। कुछ हफ्ते पहले इजराइल और हिजबुल्ला नाम के एक दूसरे हथियारबंद संगठन के बीच ऐसी सहमति हुई, और लेबनान में बसे हुए हिजबुल्ला के साथ इजराइल की जंग थम गई। बड़े खूनी संघर्ष के बाद ये दो युद्धविराम मध्य-पूर्व के इस इलाके के लिए बड़ी कामयाबी होंगे, या कि तकरीबन हो चुके हैं। लोग ऐसा भी मान रहे हैं कि 20 जनवरी को अमरीकी राष्ट्रपति का पद संभालने के बाद डोनल्ड ट्रम्प किसी तरह के दबाव का इस्तेमाल करके रूस और यूक्रेन के बीच की जंग को भी शांत कर सकते हैं। ऐसे में भारत और बांग्लादेश के बीच छिड़ा हुआ तनाव कम न होना फिक्र की बात है।

बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार को जनआक्रोश और जनआंदोलन की वजह से खुद होकर कुर्सी छोडऩी पड़ी, और प्रधानमंत्री हसीना जान बचाकर भारत में शरण लेकर रह रही हैं। आज बांग्लादेश पर काबिज अंतरिम सरकार शेख हसीना के कट्टर विरोधियों की है, और उसे भारत से इस बात की शिकायत भी है कि भारत ने बांग्लादेश के अंदरुनी मामलों में दखल देने की हद तक हसीना सरकार का समर्थन किया था। इस शिकायत के साथ बांग्लादेश के मौजूदा शासक, और उनके सलाहकार भारत के खिलाफ इस हद तक हैं कि बांग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा की घटनाएं बढ़ती चल रही हैं। भारतवंशी हिन्दू और ईसाई बांग्लादेश में निशाना बनाए जा रहे हैं, और दोनों देशों के बीच बड़ी तल्खी के बयान भी हवा में तैर रहे हैं। चूंकि बांग्लादेश की मौजूदा सरकार के लोगों को सरकार चलाने का तजुर्बा बहुत कम है, या नहीं है, इसलिए उनकी प्रतिक्रिया कुछ अधिक आक्रामक बनी हुई है। लेकिन बीच-बीच में भारत की तरफ से भी कुछ ऐसे बयान आते हैं जो कि बांग्लादेश को माकूल नहीं बैठते, और दोनों देशों के बीच सोशल मीडिया और खबरों के मार्फत तनातनी बढ़ती जाती है।

हम दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में कहीं तनातनी बढऩे, और कहीं कम होने की चर्चा एक साथ इसलिए कर रहे हैं कि जहां दो पक्षों में कोई शक्ति संतुलन नहीं रहता, कोई बराबरी नहीं रहती, वहां पर भी एक हद तक जंग चल जाने के बाद किसी समझौते की बात से ही रास्ता निकलता है। न तो फिलीस्तीन के हमास की ताकत की इजराइल से कोई बराबरी थी, और न ही लेबनान की जमीन पर काम करने वाले हिजबुल्ला की ताकत इजराइल के आसपास भी थी, लेकिन इजराइल ने एक सीमा तक इन दोनों को कमजोर करने के बाद उनसे युद्धविराम करने, शांतिवार्ता करने को ही बेहतर समझा। इसलिए दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी तनातनी को कम करने की इस ताजा मिसाल पर गौर करना चाहिए। अपने से ताकत में बहुत कमजोर संगठनों से समझौता करके इजराइल छोटा साबित नहीं हुआ, उसने अपनी ताकत को फिजूल में बर्बाद करना रोका, और शायद वह अपने देश की हिफाजत की फिक्र भी कर रहा है जो कि अड़ोस-पड़ोस पर बम बरसाते हुए हमेशा के लिए कायम नहीं रह पाएगी।

कोई देश कितना ही ताकतवर क्यों न हो, आज की वैश्विक राजनीति में, उसे किसी पड़ोसी को दुश्मन बनाकर रखने की बददिमागी नहीं करनी चाहिए। रूस इसकी सबसे बड़ी मिसाल है जिसने यूक्रेन पर हमला करते हुए इसे एक हफ्ते की फौजी कार्रवाई करार दिया था। आज हालत यह है कि छोटे से यूक्रेन ने नाटो की मदद से रूस की नाक में दम कर दिया है, और जंग हजार दिन से अधिक लंबी हो चुकी है। रूस की फौजी साज-सामान बनाने की जितनी क्षमता है, उससे कहीं अधिक उसकी रोज यूक्रेन में खपत हो रही है। पश्चिमी देशों को शायद इसी में मजा आ रहा है कि यूक्रेनी जिंदगियों की कीमत पर, उनके कंधों पर बंदूक रखकर पश्चिम रूस को खोखला कर रहा है, और आज परमाणु हथियारों को छोड़ दें, तो परंपरागत हथियारों के मामले में नाटो रूस को शिकस्त दे सकता है। इसलिए पड़ोस के यूक्रेन को गुपचुप की तरह उठाकर मुंह में भर लेने की रूसी चाह उसे बड़ी महंगी पड़ रही है। ठीक उसी तरह इजराइल को भी अड़ोस-पड़ोस पर कब्जा करने की चाह एक किस्म से भारी पड़ी, और उसे अपनी आबादी को सुरक्षित रखने के लिए चाहे-अनचाहे ये युद्धविराम करने पड़ रहे हैं।

भारत की बांग्लादेश से मौजूदा तनातनी दो गैरबराबरी के देशों के बीच की तनातनी तो है, लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि श्रीलंका हो, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, म्यांमार, या बांग्लादेश, जिस किसी की भारत के साथ तनातनी होगी, चीन वहां पर अपनी रणनीतिक संभावनाएं देखने लगेगा। एक किस्म से चीन की नीयत भारत के इर्द-गिर्द मोतियों की माला की तरह बेचैनी की एक माला बनाने की है, और वह किसी भी तरह के टकराव और असंतोष का फायदा उठाने की ताक में रहता है जो कि फौजी टकराव वाले किन्हीं भी दो देशों के बीच एक स्वाभाविक और आम बात रहती ही है। ऐसे में भारत को बांग्लादेश के आकार और उसकी ताकत से अपनी तुलना करके संतुष्ट हो जाने की चूक नहीं करनी चाहिए। पड़ोसी कितना भी छोटा हो, उससे दुश्मनी तकलीफदेह रहती है। और खासकर उस वक्त तो एक अधिक नाजुक हालत है जब भारत के बगल का उससे अधिक सैनिक ताकत वाला चीन भारत के हर पड़ोसी का हमदर्द और मददगार बनने के लिए एक पैर पर खड़ा हुआ है। 

बांग्लादेश के साथ जंग और तनाव के फतवों से बचना चाहिए। दोनों ही देशों में कुछ बेदिमाग और बददिमाग लोग इस तरह की बात सोच सकते हैं, लेकिन दोनों तरफ सरकारों में बैठे लोगों को अधिक समझदारी दिखानी चाहिए। खासकर बांग्लादेश के लिए यह बात अधिक जरूरी इसलिए है कि भारत जितने बड़े पड़ोसी, और एक बड़ी आर्थिक ताकत से बिना वजह कड़वाहट और दुश्मनी से बांग्लादेश का सीधा-सीधा नुकसान अधिक होगा, और उस पूरे नुकसान की भरपाई चीन भी नहीं करेगा। 

(Daily Chhattisgarh)

...मां-बाप बिना जिंदा न रह पाने और खुद भी चले जाने की आत्मघाती सोच

22 दिसंबर 2024

दो दिन पहले एक खबर आई कि अपने पिता की बीमारी से परेशान एक नौजवान ने खुदकुशी कर ली। और इस खबर से कुछ घंटों के भीतर ही बीमार पिता चल बसा। एक साथ दोनों की अर्थी निकली। अभी उस खबर की स्याही सूखी भी नहीं थी कि आज पास से ही एक दूसरी खबर आई कि पिता की मौत से सदमे में आई बेटियों ने रेलवे पटरी पर जाकर जान देने की कोशिश की, एक बहन मौके पर ही खत्म हो गई, और दूसरी बुरी तरह से जख्मी हालत में अस्पताल में है। अब इन दोनों ही खबरों में खुदकुशी करने वाले लोग नौजवान हैं। जाहिर है कि इन्होंने अपने परिवार में, आसपास में कुछ तो मौतें देखी हुई होंगी। इसके बावजूद अपने पिता की बीमारी या मौत को बर्दाश्त कर पाना इनके लिए इतना भारी था।

कैसे कुछ लोग इतने कमजोर दिल के होते हैं कि पिता की बीमारी या मौत को बिल्कुल बर्दाश्त न कर पाएं? अगर माता-पिता अपने किसी औलाद के लिए ऐसा महसूस करें, तो भी समझ पड़ता है कि वे जिंदा हैं, और उनकी अगली पीढ़ी इस तरह चल बसी। औलाद के चले जाने का गम मां-बाप के चले जाने के गम से अधिक शायद इसलिए भी होता होगा कि प्राकृतिक जीवनचक्र के मुताबिक तो मां-बाप ही जल्दी बूढ़े होते हैं, और जल्दी जाते हैं। इसलिए औलाद का जाना जाहिर तौर पर अधिक तकलीफ का होता है।

क्या लोगों की मौत को समझने के लिए अलग-अलग धर्मों की नसीहतें कुछ अलग-अलग हद तक लोगों को तैयार करती हैं? क्या सामाजिक और आर्थिक स्थिति लोगों को मजबूत बना देती है कि वे तकलीफ झेल सकें? क्या बहुत गरीब परिवारों में बच्चों से लेकर बूढ़ों तक की मौतें वक्त के पहले होती हैं, और गरीबी भी लोगों को ऐसी तकलीफ झेलने के लिए कुछ अधिक हद तक तैयार करती है? हमारे पास इसका कोई सीधा-सीधा जवाब नहीं है, क्योंकि अलग-अलग धर्मों के मानने वालों के बीच अपने धार्मिक संस्कारों और मान्यताओं की वजह से मृत्यु को लेकर स्वर्गवासी होने, या मुक्ति पा लेने, मोक्ष पा लेने जैसी अलग-अलग सोच रहती होगी। और शायद नास्तिक लोग इन तमाम मामलों में अधिक प्राकृतिक या वैज्ञानिक नजरिया रखते होंगे, और हो सकता है कि वे भी दिमागी रूप से आसपास के लोगों की मौत देखने के लिए कुछ अधिक हद तक तैयार रहते हों।

समाज में लोगों को एक-दूसरे को मजबूती देना भी आना चाहिए। यह तो अधिकतर लोगों को समझ में आ जाता है कि बीमारी बीमार को कब मौत के करीब पहुंचाती है, और वैसे में मौत के लिए तैयार रहने का हौसला परिवार के लोगों को देने वाले लोग भी रहना चाहिए। रिश्तेदार, पड़ोस के लोग, या कि दोस्त इस काम को बेहतर तरीके से कर सकते हैं, और जाने वाले के साथ चले जाने की निराशा से आसपास के लोगों को उबार सकते हैं। हम तो बहुत मामूली समझ के साथ इस बात को कह रहे हैं, लेकिन मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता बेहतर तरीके से ऐसी नौबत से निपटना बता सकते हैं, दिक्कत महज यह है कि ऐसे परामर्शदाता गिनती के हैं, और ऐसी निराशा कुछ या अधिक हद तक बड़ी आम है।

बहुत से लोगों को अपने परिवार के लोगों को मृत्यु के डर से, और अकेले रह जाने की आशंका से जूझना सिखाना चाहिए। शायद किशोरावस्था के आने तक सभी लोग इस बात के लिए तैयार रहते हैं कि वे जीवन और मृत्यु के इस सिलसिले को समझ सकें कि किसी भी काबू से परे यह सिलसिला हमेशा चलता है, और नई पीढ़ी के आने के बाद एक वक्त पुरानी पीढ़ी की रवानगी धीरे-धीरे शुरू हो जाती है। लोगों को अपने जाने का वक्त आने के पहले ही उसकी चर्चा शुरू करना चाहिए, अपनी वसीयत के बारे में बात करनी चाहिए, गुजरने के बाद देहदान की बात करनी चाहिए, किसी ब्रेन-डेथ की नौबत आने पर अंगदान की बात करनी चाहिए, उसके फॉर्म भरने चाहिए, जब कभी ऐसी खबरें कहीं आएं, तो परिवार के लोगों को दिखानी चाहिए कि किसी गुजरे हुए के अंगों से कितने लोगों की जिंदगी मिली है। आज का चिकित्सा विज्ञान मौत की तकलीफ को दवाओं से मरीज के लिए तो कम करता ही है, देहदान और अंगदान जैसी चीजों से वह ऐसी चर्चा का मौका भी देता है कि परिवार के लोग परिवार में मौत के लिए दिल-दिमाग से बेहतर तरीके से तैयार हो सकें।

कम से कम बौद्ध धर्म का तो हमें याद पड़ता है जिसमें मृत्यु को दुख नहीं माना जाता, और इसे जीवनचक्र का एक स्वाभाविक हिस्सा माना जाता है। बौद्ध मानते हैं कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं है, इससे डरना नहीं चाहिए, और मृत्यु के बाद आत्मा का पुनर्जन्म होता है। इसलिए मृत्यु को शांति और खुले मन से स्वीकार करना चाहिए। महाराष्ट्र के बौद्ध लोगों के कम से कम कुछ समुदायों में यह चलन है कि अंतिम यात्रा के दौरान बैंडबाजे के साथ लोग नाचते-गाते अर्थी ले जाते हैं। इस तरह धर्म की सोच और धार्मिक संस्कार भी लोगों को मौत का सामना करने, या कि परिजनों के गुजरने के लिए बेहतर तरीके से तैयार करते हैं।

दो दिनों में ऐसी दो घटनाओं को अपने एकदम आसपास देखकर तकलीफ हो रही है। नौजवान लोग भी अगर माता-पिता के जाने के लिए तैयार न हों, तो नाबालिग छोटे बच्चों के बारे में क्या कहा जा सकता है? इस बारे में सोचते हुए एक घटना याद आती है कि किस तरह कुछ बरस पहले एक टीवी चैनल पर समाचार पढ़ रही एक एंकर को यह समाचार पढऩा पड़ा कि उसके पति की एक सडक़ हादसे में मौत हो गई है, और बुलेटिन शुरू होने के बाद मिली इस खबर को पढ़ते हुए भी उसने आपा नहीं खोया, काम छोडक़र नहीं उठी।

लोगों को खुद होकर आसपास की किसी मौत की खबर पर अपने परिवार के भीतर भी ऐसी नौबत की चर्चा करनी चाहिए। दूसरों की मिसाल देकर यह मजबूती लानी चाहिए कि किसी के चले जाने के बाद भी बाकी लोग उसे याद करते हुए भी कुछ बेहतर बनकर दिखा सकते हैं, बजाय खुदकुशी करने के, या कि निराश होने के। अंग प्रत्यारोपण की हसरत जाहिर करना भी परिवार के लोगों को अपरिहार्य मृत्यु के बारे में बेहतर तैयार कर सकता है। आपके जाने के बाद पीछे रह गए लोग आपके पास पहुंचने की हड़बड़ी में कुछ ऐसा न कर बैठें, यह भी आपकी ही जिम्मेदारी रहती है। मृत्यु की चर्चा हमेशा ही अप्रिय और विचलित करने वाली हो ऐसा जरूरी तो है नहीं, ऐसी चर्चा अपने जीते-जी अधिक तैयारी करवाने वाली भी हो सकती है।

(Daily Chhattisgarh)

मोहन भागवत का तारीफ के लायक बयान, उसे आगे बढ़ाने की जरूरत

 21  दिसंबर 2024

 

आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने अभी एक कार्यक्रम में सार्वजनिक रूप से मंदिर-मस्जिद विवादों के फिर से उठने को लेकर फिक्र जाहिर की है। उन्होंने कहा कि मंदिर-मस्जिद के रोज नए विवाद निकालकर कोई नेता बनना चाहते हैं, तो ऐसा नहीं होना चाहिए, हमें दुनिया को दिखाना है कि हम एक साथ रह सकते हैं। उन्होंने कहा- हमारे यहां हमारी ही बातें सही, बाकी गलत, यह चलेगा नहीं..., अलग-अलग मुद्दे रहे तब भी हम सब मिलजुलकर रहेंगे। हमारी वजह से दूसरों को तकलीफ न हो, इस बात का ख्याल रखेंगे। जितनी श्रद्धा मेरी खुद की बातों में है, उतनी श्रद्धा मेरी दूसरों की बातों में भी रहनी चाहिए। हर धर्म और दूसरों के आराध्य का सम्मान करना चाहिए। मोहन भागवत ने पुणे में एक व्याख्यानमाला में कहा- हर दिन एक नया विवाद उठाया जा रहा है, इसकी इजाजत कैसे दी जा सकती है। हाल के दिनों में मंदिरों का पता लगाने के लिए मस्जिदों की सर्वेक्षण की मांगें अदालतों में पहुंची हैं। उन्होंने कहा कि दूसरे देशों में अल्पसंख्यकों के साथ क्या हो रहा है? अक्सर भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर चर्चा की जाती है, अब दूसरे देशों में अल्पसंख्यक समुदायों को किस तरह की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।

इसके दो-चार दिन पहले ही दिन मोहन भागवत ने कहा था कि व्यक्ति को अहंकार से दूर रहना चाहिए, नहीं तो वह गड्ढे में गिर सकता है। उन्होंने कहा था कि हर व्यक्ति में एक सर्वशक्तिमान ईश्वर होता है जो समाज की सेवा करने की प्रेरणा देता है, लेकिन अहंकार भी होता है। उन्होंने कहा था कि राष्ट्र की प्रगति केवल सेवा तक सीमित नहीं है, सेवा का उद्देश्य नागरिकों को विकास में योगदान देने में सक्षम बनाना होना चाहिए। यहां यह भी चर्चा के लायक है कि मोहन भागवत ने कुछ महीने पहले एक ऐसा बयान दिया था जिसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना माना जा रहा था। मोदी ने अपने आपको एक खास मकसद पूरा करने के लिए ईश्वर का भेजा हुआ बताया था, और इसके बाद आए भागवत के एक बयान में उन्होंने कहा था कि इंसान पहले सुपरमैन फिर भगवान बनना चाहता है। उन्होंने एक और बयान में मणिपुर के बारे में कहा था कि मणिपुर जल रहा है उस पर कौन ध्यान देगा? प्राथमिकता देकर उसका विचार करना कर्तव्य है।

मोहन भागवत हिन्दुओं के सबसे पुराने और सबसे बड़े संगठन, आरएसएस के मुखिया हैं। और उनके बयान कई बार परस्पर विरोधाभासी भी रहते हैं, और कई बार उनसे गैरजरूरी विवाद भी खड़े होते हैं। लेकिन इस बार के उनके बयान को हम एक हिन्दू नेता, और एक हिन्दुस्तानी की एक जायज फिक्र से उपजे हुए मानते हैं। कुछ अरसा पहले भी उन्होंने कहा था कि हर मस्जिद के नीचे मंदिर ढूंढने की कोशिश गलत है, यह नहीं होना चाहिए, और अभी फिर उन्होंने जगह-जगह मस्जिद के नीचे मंदिर विवाद पर साफ-साफ आपत्ति जाहिर की है। ऐसा लगता है कि भागवत पिछले कुछ अरसे में आत्ममंथन और आत्मविश्लेषण करके, चाहे अस्थाई और तात्कालिक रूप से ही सही, इस नतीजे पर पहुंच रहे हैं कि अधिकतर हिन्दू आबादी वाले देश में एक हिन्दूवादी सरकार के रहते अगर हिन्दुओं को लगातार खतरे में बताया जाता रहेगा, और लगातार साम्प्रदायिक तनाव खड़े किए जाते रहेंगे, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान हिन्दुओं को ही होगा, और हो भी रहा है। देश की अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े हिस्से पर हिन्दू ही काबिज हैं, और देश में किसी भी तरह के तनाव की वजह से जब कानून व्यवस्था बिगड़ती है, उत्पादकता मार खाती है, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान हिन्दू समाज को होता है, और इससे दुनिया भर में साख हिन्दूवादी सरकार की खराब हो रही है। दुनिया भर में यह माना जा रहा है कि भारत में धार्मिक अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं हैं। और अभी भागवत ने बांग्लादेश के हिन्दुओं पर हमले की जो चर्चा की है, उसके बारे में भी यह समझने की जरूरत है कि उसे मुद्दा बनाने का भारत का, और हिन्दू समाज का नैतिक अधिकार भारत में जगह-जगह खड़े किए जा रहे, और स्थाई बनाए जा रहे साम्प्रदायिक तनावों से कमजोर हो जा रहा है। पड़ोस का छोटा सा बांग्लादेश भी वहां चल रहे साम्प्रदायिक तनाव के जवाब में भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति को गिना रहा है।

संघ प्रमुख मोहन भागवत के इस बयान के पीछे की उनकी नीयत पर हम जाना नहीं चाहते, उनके जो शब्द हैं, उनकी साफगोई की हम आज के इस वक्त में तारीफ करते हैं। उनका यह कहना कि हमें दुनिया को दिखाना है कि हम एक साथ रह सकते हैं, यह देश संविधान के मुताबिक चलता है, और पुरानी लड़ाईयों को भूलकर हमें सबको संभालना चाहिए, सबको एक साथ रहना चाहिए, ये बातें मायने रखती हैं। इसके बाद आरएसएस से जुड़े हुए राजनीतिक दल भाजपा, और संघ परिवार के दूसरे दर्जनों अलग-अलग संगठन मस्जिदों की नींव खोदने के फतवों से हो सकता है कुछ अरसा परे रहें। वैसे तो सुप्रीम कोर्ट ने इस धंधे पर पूरी ही रोक लगा दी है, और धर्मस्थल उपासना कानून पर व्यापक विचार-विमर्श कर रहा है, लेकिन देश भर जो माहौल खराब किया जा रहा है, उस पर हो सकता है कि भागवत के बयान के बाद कुछ रोक लगे।

हमारा वैसे भी यह मानना है कि देश में अगर नरेन्द्र मोदी की भाजपा की अगुवाई वाली सरकार के रहते अगर हिन्दुत्व पर खतरा बार-बार कहा जाता है, अगर हिन्दू को असुरक्षित बताया जाता है, तो इससे सरकार की साख खराब होती है, और ऐसा लगता है कि क्या 80 फीसदी हिन्दू आबादी के सौ करोड़ लोग भी इतने कमजोर हैं कि वे अपने को बचा नहीं पा रहे हैं? अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत की साख में सबसे बड़ा बट्टा भारत के साम्प्रदायिक तनाव को लेकर ही लगता है। और मोहन भागवत जिस विचारधारा के अगुवा हैं, उन्हें भी यह बात शायद अच्छी नहीं लगेगी कि हिन्दुओं की बहुतायत वाले देश की साख अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खराब हो। कांग्रेस सांसद शशि थरूर से लेकर बहुत से मुस्लिम नेताओं ने भी मोहन भागवत के इस ताजा बयान और रूख का गर्मजोशी से स्वागत किया है। हमारा भी यही मानना है कि संघ के इतिहास की नींव खोदने के बजाय उसके इस ताजा रूख का सार्वजनिक समर्थन किया जाना चाहिए, और पुरानी बातों का हवाला देकर भागवत को नीचा दिखाने के बजाय उनके इस ताजा रूख को आगे बढ़ाना चाहिए ताकि देश में फैलाई जा रही साम्प्रदायिक हिंसा को भागवत के असर से रोका जा सके। देश और कई प्रदेशों की सरकारों के साथ-साथ हिन्दुओं का कई हिस्से भागवत के बयानों से सहमत होते हैं, ऐसे में उनकी अभी कही गई बातों का देश के हित में फायदा उठाना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 दिसंबर 2024



 

दीवारों पर लिक्खा है, 20 दिसंबर 2024



 

अपने-आपको अप्रासंगिक साबित करती यह संसद..

20  दिसंबर 2024

 

संसद सत्र के दौरान कल जिस तरह कांग्रेस और भाजपा के सांसदों पर दूसरे पक्षों से धक्का-मुक्की करने के आरोप लगे हैं, और भाजपा के दो सांसद घायल होने की बात कहते हुए, या घायल होने पर अस्पताल में भर्ती हुए हैं, वह पूरा सिलसिला लोकतंत्र को बड़ा निराश करता है। भाजपा ने प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी पर आरोप लगाया है कि उन्होंने भाजपा सांसदों को धक्का देकर गिराया जिससे वे जख्मी हुए। दूसरी तरफ कांग्रेस की तरफ से प्रियंका गांधी ने कहा है कि उनके सामने ही राज्यसभा के नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को धक्का दिया गया, और वे गिर पड़े, इसके बाद एक सीपीएम सांसद को धक्का दिया गया, और वे खरगे पर गिर पड़े। उन्होंने कहा कि राहुल अंबेडकर की तस्वीर लेकर जय भीम के नारे लगाते हुए संसद में जा रहे थे, और उन्होंने (भाजपा सांसदों ने) विरोध किया, धक्का-मुक्की की, और यह गुंडागर्दी हुई। उसके बाद यह साजिश फैलाना शुरू किया गया कि राहुल ने किसी को धक्का दिया है। यह संसद भवन के एक प्रवेश द्वार पर भाजपा सांसदों द्वारा इंडिया-गठबंधन के सांसदों का दाखिला रोकने के दौरान हुई घटना बताई जा रही है। इसके बाद लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने निर्देश जारी किए हैं कि संसद के किसी भी गेट पर कोई भी सदस्य, उनके समूह, या राजनीतिक दल के सदस्य धरना-प्रदर्शन नहीं करेंगे।

हम न तो इस घटना को लेकर लोगों और पार्टियों के चाल-चलन पर किसी पूर्वाग्रह को काम में लाना चाहते, न ही कोई अटकल लगाना चाहते कि क्या हुआ होगा। अगर कोई ईमानदार जांच होगी, तो यह साफ हो जाएगा कि किसने किसे रोका, और किसने किसे धक्का दिया। हम इस बात पर भी जाना नहीं चाहते कि आज जख्मी होने की बात जिस सांसद के बारे में की जा रही है वह एक वक्त ओडिशा में ग्राह्म स्टेंस और उनके बच्चों को जिंदा जला देने के मामले से किस तरह जुड़ा हुआ था। वह इतिहास कल की घटना में प्रासंगिक नहीं है, और हम इसमें भी जाना नहीं चाहते कि राहुल गांधी को किसी भी कीमत पर घेरने की कैसी कोशिशें चल रही हैं। इन सबसे परे हम भारत के संसदीय लोकतंत्र की कुछ बुनियादी बातों पर आना चाहते हैं कि क्या 140 करोड़ जनता के बीच से चुने गए जनप्रतिनिधियों से देश की जनता ऐसे ही संसदीय आचरण की उम्मीद करती है? क्या संसद का कुख्यात रियायती खाना, सांसदों पर होने वाला बड़ा खर्च, और उन्हें मिले हुए असाधारण विशेषाधिकार क्या इसीलिए हैं कि वे छात्र संघ चुनाव की तरह की धक्का-मुक्की करें? हम कल की घटना के किसी जिम्मेदार के नाम पर अटकल लगाने का काम नहीं करना चाहते, बल्कि देश के संसदीय माहौल पर अपनी निराशा दिखाना चाहते हैं कि संसद की इमारत ही नई नहीं बनी है, इसके चाल-चलन में गिरावट के नए रिकॉर्ड भी बन रहे हैं।

किसी इमारत से किसी संस्था की इज्जत नहीं बढ़ती। अनाथाश्रम या अस्पताल की इमारतें जर्जर हो सकती हैं, लेकिन वे सम्मान का प्रतीक रहती हैं। दूसरी तरफ जुआघर या शराबखाने आलीशान हो सकते हैं, लेकिन वे कलंक ही रहते हैं, उन पर किसी को सम्मान नहीं हो सकता। इसलिए हजारों करोड़ रूपए लगाकर भारतीय संसद की इमारत को आलीशान बनाना, और वहां की परंपराओं को शर्मनाक बनाना, इस पर जाने किसे गर्व हो सकता है। सत्ता और विपक्ष के बीच असहमति एक स्वस्थ लोकतंत्र का सुबूत रहती है, लेकिन जब असहमति बढक़र हिकारत और नफरत में, हिंसा में तब्दील हो जाती है, तो जनता क्या करे? कल की धक्का-मुक्की को लेकर अभी दोनों तरफ की तोहमतें हवा में तैर रही हैं, लेकिन इसी नई आलीशान इमारत के भीतर वह गाली-गलौज याद पड़ती है जो कि सत्तारूढ़ भाजपा के एक सांसद ने बसपा के एक मुस्लिम सांसद को दी थी, तरह-तरह की गंदी साम्प्रदायिक गालियां दी थीं, देश का गद्दार कहा था, और उस पर क्या हुआ, यह याद भी नहीं पड़ता। देश की राजधानी की एक सीट, दक्षिण दिल्ली के भाजपा सांसद रमेश विधुड़ी ने संसद के बाहर के अपने तेवरों की निरंतरता में जिस तरह संसद के भीतर अश्लील और हिंसक, साम्प्रदायिक और राष्ट्रविरोधी जुबान में बसपा के सांसद दानिश अली को गालियां दी थीं, और ऐसी गाली देने वाले के पीछे बैठे बड़े-बड़े नेता जिस अंदाज में हँस रहे थे, वह संसद की नई इमारत पर कालिख पोतने का काम था। अब कल की जिसकी भी जिससे धक्का-मुक्की हुई, उससे यह कालिख कुछ और फैल गई।

यह बात भी कुछ अजीब है कि संसद में जब-जब कुछ जलते-सुलगते मुद्दों पर चर्चा का दौर शुरू होने को रहता है, किसी न किसी तरह का एक असंसदीय बवाल खड़ा हो जाता है, और सदन का पूरा ध्यान उस पर चले जाता है, और जलता-सुलगता मुद्दा हाशिए पर। लोगों को याद होगा कि किस तरह कभी एक चुम्बन-चर्चा शुरू हो जाती है, तो किस तरह कभी एक अरबपति वकील-सांसद की सीट के नीचे 50 हजार रूपए मिलने को लेकर दिन खराब हो जाता है। क्या देश की संसद ऐसे ही निहायत गैरजरूरी और नाजायज विवादों के लिए बनी है? क्या पांच किलो राशन पर जिंदा 80 करोड़ आबादी के साथ अब ऊंची बना दी गई दुकान के इस फीके संसदीय पकवान को इंसाफ कहा जाएगा? ऐसा लगता है कि हम किसी दूसरे ग्रह पर बैठे हुए भारतीय संसद को यह सलाह देते रहते हैं कि एक वक्त यह देश से परे भी पूरी दुनिया के मुद्दों पर चर्चा करती थी, और बहुत से ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय दौर और घटनाएं भारत की राय से प्रभावित रहते थे। आज तो ऐसा लगता है कि किसी मतदान केन्द्र पर दो प्रमुख पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच हो रहा हिंसक टकराव, और उनके बीच चलती गाली-गलौज संसद के भीतर तक पहुंच चुके हैं। क्या ऐसे सांसदों को, और ऐसे सदन को किसी भी विशेषाधिकार का हक होना चाहिए? क्या इसकी अवमानना करने को बाहर के किसी व्यक्ति की जरूरत है? क्या इसके अपने लोग इसकी इतनी अवमानना नहीं कर रहे हैं जितनी कि बाहर के लोगों के लिए मुमकिन भी हो?

संसद की इस नई और ऐतिहासिक खर्चीली, महंगी इमारत के ढांचे के आकार को लेकर कई लोग इसे ताबूत सरीखी बताते हैं। हमें आकार की तो अधिक समझ नहीं है, लेकिन लोकतांत्रिक मूल्य, संसदीय परंपराएं, और बुनियादी इंसानियत जरूर यहां दफन होते दिख रही हैं। आज सांसद जिस किस्म की खेमेबाजी का शिकार हो चुकी है, उसके प्रति जनता के मन में शायद ही कोई विश्वास बचा हो। और यह भी हो सकता है कि हम ही कुछ अधिक बारीकी से और उम्मीद से इस ऊंची दुकान के फीके पकवानों से मिठास की उम्मीद करते हैं, और हमारी निराशा आम जनता की निराशा से कुछ अधिक है, लेकिन लोकतंत्र को लेकर हमारी जो बुनियादी समझ है, उसमें हम इससे कम कोई उम्मीद रख नहीं सकते, फिर चाहे यह लोकतंत्र हमें, बार-बार, कितनी ही बार, हर बार ही निराश क्यों न करता चले। बाहुबल और बहुमत लोकतंत्र नहीं होता, और अल्पमत लोकतंत्र में कम मायने नहीं रखता। संसद भवन से निकलती लोकतांत्रिक और संसदीय निराशा दिल्ली के धुंध और धुएं के मुकाबले अधिक गहरी है, और अधिक दमघोंटू भी।  

(Daily Chhattisgarh)