किसी पर अभिभावक थोपने से भला किसका होता है भला?

31 अगस्त 2025

एक टीवी समाचार चैनल पर प्रस्तुतकर्ता-एंकर ने जब मेहमान-पैनलिस्ट से सवाल-जवाब किए, तो एक खास विचारधारा से आए हुए उस मेहमान ने अपनी विचारधारा के मुखिया के बारे में एंकर को कहा कि वे तो आपके भी अभिभावक हैं। इस पर एंकर ने साफ-साफ शब्दों में मना कर दिया, तो भी मेहमान अपने वैचारिक-मुखिया को एंकर का अभिभावक साबित करने में लगे रहे। मैंने यह पूरी बातचीत, या बहस देखी नहीं है, लेकिन कई गंभीर पत्रकारों की इस बहस पर पोस्ट देखी है, जो कि इस वैचारिक-असहमति को समझने के लिए काफी है। इस बात पर जाने का भी कोई अधिक मतलब नहीं रहता कि ऐसी बातचीत या बहस में आखिर में जीत किसकी हुई। यह कोई पंजा-कुश्ती, या सूमो-कुश्ती तो है नहीं जिसमें कि आखिर में किसी की जीत होना जरूरी हो, बल्कि कुछ मामलों में तो ऐसे मुकाबलों में भी टक्कर बराबरी पर छूट जाती है। वैचारिक विचार-विमर्श या बहस का बड़ा मकसद तो अलग-अलग विचारधाराओं और तर्कों को एक साथ सामने रखना होता है, ताकि देखने-सुनने वाले आगे उन पर अपना दिल-दिमाग लगा सकें। हर बातचीत किसी निष्कर्ष पर खत्म होने की उम्मीद करना एक बड़ा तंगनजरिया रहता है। 

अब अगर बहस में शामिल कोई एक व्यक्ति अगर किसी को अपना अभिभावक मानना न चाहे, तो उसके धर्मांतरण की कोशिश क्यों करनी चाहिए? मैं अपने फेसबुक पेज पर लगातार अपने नास्तिक होने की बात लिखता हूं, और जहां-जहां मुझे नकारात्मक मिसालें मिलती हैं, मैं ईश्वर की धारणा, और धर्म के पाखंड के खिलाफ भी लिखता हूं। मेरे कुछ बहुत ही अच्छे और धर्मालु दोस्त ऐसे हैं जो मुझे अपने धर्म में ले जाने, या मुझे आस्तिक बनाने की कोशिश के बिना भी धर्म की अपनी समझ को लिखते हैं, और वह पढऩे लायक रहती है। दूसरी तरफ कई लोग इस जिद पर अड़ जाते हैं कि चूंकि मेरे माता-पिता आस्तिक थे, इसलिए मैं आस्तिक हूं, चूंकि मैं कुछ अच्छे काम भी करता हूं, इसलिए भी मैं धर्मालु भी हूं, और आस्तिक भी हूं। इस पर मुझे साफ करना पड़ता है कि मैं ईश्वर और धर्म नाम के झांसों से दूर हूं, और हाल-फिलहाल में किसी मौलाना या पादरी से मुलाकात का यह नतीजा नहीं है, स्कूली जिंदगी में ही अपने धर्मालु माता-पिता के बीच रहते हुए भी मैं ईश्वर और धर्म की हकीकत जान-समझकर अच्छा मजबूत नास्तिक बन गया था। 

लेकिन मेरे नास्तिक रहने से परिवार के कुछ दूसरे लोगों के आस्तिक रहने का कोई टकराव नहीं है। जब तक पोप शंकराचार्य के धर्मांतरण की कोशिश न करें, और जब तक शंकराचार्य किसी बिशप को फिर से हिन्दू बनाने की कोशिश न करें, जब तक हिन्दूवादी लोग भारत की मुस्लिम आबादी को इस्लाम से परे करने पर न अड़े रहें, तब तक सहअस्तित्व में कोई दिक्कत नहीं है। अभी दो दिन पहले तो आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने साफ-साफ शब्दों में यह कहा है कि जो लोग भारत से इस्लाम खत्म करने की सोचते हैं, वे लोग हिन्दू नहीं हैं। उन्होंने साफ-साफ कहा कि भारत में इस्लाम पुरातन काल से रहा है, आज भी है, और भविष्य में भी रहेगा। यह विचार कि इस्लाम नहीं रहेगा, हिन्दू दर्शन नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत में इस्लाम का हमेशा एक स्थान रहेगा। 

भागवत की कही बातें पिछले बरसों से लगातार जलेबी की तरह सीधी रहती हैं, और उनके अगले बयान तक वे मीठी भी लगती रहती हैं। लेकिन आगे जाकर वे अपने ही बयानों से किनारा करने लगते हैं, और अभी-अभी वे 75 बरस की उम्र में रिटायर होने की चर्चा को खारिज कर चुके हैं, जो कि उनके ही एक बयान से अभी कुछ हफ्ते पहले जोर पकड़ रही थी। फिर भी हम अपने अखबार में भागवत के कहे हुए शब्दों को तब तक गंभीरता से लेते हैं, जब तक वे उसके उल्टे कोई बात नहीं करते। उनकी सबसे ताजा बात को हम उनकी सोच मानते हैं। बहुत से लोग हैं जिनका यह मानना है कि भागवत जो कहते हैं, और उस बात को साबित करने के लिए, या लागू करने के लिए उन्हें जो करना चाहिए, उसे वे करते नहीं हैं, महज कहते रहते हैं। ऐसे में अगर एक टीवी एंकर ने भागवत को अपना अभिभावक मानने से इंकार कर दिया, तो भागवत की विचारधारा के एक गंभीर और सीनियर आदमी को यह वल्दियत उस एंकर पर क्यों लादनी चाहिए? आज आल-औलाद ऐसी भी हैं जो अभिभावक का अपमान करती रहती हैं। दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं, जो किसी के अभिभावक न रहने पर भी उसका सम्मान करते हैं। वैचारिक असहमति किसी अपमान की वजह क्यों बने? और वैचारिक सहमति के लिए जिद क्यों करनी चाहिए? 

मेरा तो हमेशा से यह मानना रहा है कि लोगों को वैचारिक असहमति के बीच रहने का हौसला रखना चाहिए क्योंकि असहमति को सुन-समझकर ही अपनी खुद की सोच को परिपक्व किया जा सकता है, वरना कीर्तन, प्रार्थना, और किसी दरगाह पर कव्वाली से कोई सोच विकसित नहीं हो सकती। लोगों के पास अपने मंच पर अपनी बात रखने का आज पूरा मौका रहता है क्योंकि सोशल मीडिया मुफ्त की आजाद जगह है। अपनी जगह पर आप कितनी असहमति, कितनी आलोचना, कितनी मोहब्बत, और कितनी नफरत को जगह देना चाहते हैं, यह भी आज फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म ने आसान कर दिया है। अब अखबारों में संपादक के नाम पत्र कॉलम में किसी शिकायत या विचार, या तारीफ के छपने के लिए संपादक की मर्जी जरूरी नहीं है, सोशल मीडिया पर आप अपनी बात को भरपूर तरीके से रख सकते हैं। ऐसे में एक टीवी एंकर ने यह दिलचस्प काम किया कि मेहमान प्रवक्ता के लादे गए अभिभावक को अपनी वल्दियत में लिखने से मना कर दिया। इस बात से और लोगों को भी सबक लेना चाहिए, शंकराचार्य को यह नहीं कहना चाहिए कि राम का नाम लो पोप, राम का नाम लो। और न पोप को चाहिए कि शंकराचार्य को बताए कि बपतिस्मा लेने के बाद यीशु सभी बीमारियां ठीक कर देंगे। लोगों को अपनी-अपनी दुकानों से अपने-अपने ब्राँड बेचने चाहिए। आपने कभी पावभाजी बेचने वाले को गुपचुप वाले के ठेले पर जाकर पावभाजी बेचते देखा है? दोनों के ग्राहक हैं, और दोनों एक-दूसरे के पीछे न लगें। और फिर, शंकराचार्य, और पोप के नामलेवा भक्तजन, दोनों ही मेरे सरीखे नास्तिक के पीछे न लगें।

महिलाओं के लिए असुरक्षित, पर्यटक किस हौसले से आएं?

31 अगस्त 2025 

 

भारत के अलग-अलग शहरों में महिलाओं की सुरक्षा, और उन पर खतरों को लेकर बनने वाली एक सालाना रिपोर्ट में कोहिमा, विशाखापट्टनम, भुवनेश्वर, आइजोल, गंगटोक, ईटानगर, और मुम्बई को सबसे सुरक्षित माना गया है। दूसरी तरफ पटना, जयपुर, फरीदाबाद, दिल्ली, कोलकाता, श्रीनगर, और रांची को सबसे ही असुरक्षित माना गया है। ये आंकड़े अभी दो दिन पहले जारी 2025 के एक सर्वे पर आधारित हैं जिनमें 31 शहरों का सर्वे किया गया था। यहां पर महिलाओं से बात करके यह पूछा गया था कि वे इन शहरों में अपने आपको कितना महफूज महसूस करती हैं। यह सर्वे राष्ट्रीय महिला आयोग ने जारी किया है, और कुछ विश्वविद्यालयों, और कुछ संगठनों ने मिलकर इसे पूरा किया है। सर्वे के कुछ और आंकड़ों को देखें, तो 24 बरस से कम उम्र की महिलाएं सबसे अधिक खतरे में हैं, और इस आयु वर्ग 14 फीसदी ने किसी न किसी तरह का शोषण बताया है। ऐसी घटनाओं पर महिलाओं की प्रतिक्रिया भी समझने की जरूरत है, 28 फीसदी महिलाओं ने हमलावर, या शोषण करने वाले का सामना किया, 25 फीसदी घटनास्थल को छोडक़र चली गईं, 21 फीसदी ने भीड़ के बीच जाकर अपनी सुरक्षा की, और 20 फीसदी ने पुलिस या अधिकारियों तक इसकी शिकायत की। शिकायत करने वाली महिलाओं में से कुल एक चौथाई को यह भरोसा है कि उनकी शिकायत पर कार्रवाई होगी। महिलाओं में से आधी से अधिक को इस बात की पक्की जानकारी नहीं है कि उनके कामकाज की जगह पर यौन शोषण के खिलाफ कोई नीति लागू है, या नहीं। ऐसे और भी बहुत से आंकड़े इस सर्वे से सामने आए हैं, और अलग-अलग प्रदेशों या शहरों को, या विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों को अपने-अपने इलाकों के बारे में अधिक खुलासे से समझना चाहिए, और कुछ करना चाहिए। 

महिलाएं जहां अपने आपको सबसे अधिक असुरक्षित पाती हैं, उनमें दो शहर ध्यान खींचते हैं, जयपुर, और दिल्ली। भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों में से शायद आधे ऐसे रहते हैं जो भारत के एक पर्यटन गोल्डन ट्रैंगल को घूमकर वापिस चले जाते हैं। दिल्ली, आगरा, और जयपुर, ये तीनों शहर सडक़, ट्रेन, और प्लेन से बहुत अच्छे से जुड़े हुए हैं, इनके बीच आवाजाही में बड़ा कम समय लगता है, और तीनों ही शहरों में पर्यटकों के हिसाब से रहने, घूमने-खाने का इंतजाम अंतरराष्ट्रीय स्तर का है। फिर इन तीन जगहों पर पर्यटक इतिहास, हस्तकला, खानपान की विविधता, और भारत के इतिहास के पिछले कई सौ बरसों की झलक पाते हैं, और सीमित बजट में, सीमित समय के लिए भारत आने वाले पर्यटकों के लिए इतना काफी भी होता है। इन तीनों में से किसी भी शहर जाएं, वहां चेहरे-मोहरे, और पोशाक से विदेशी दिखने वाले सैलानियों की भीड़ दिखती है। अब अगर भारत आकर इसी त्रिकोण से होकर अगर करीब आधे, या उससे अधिक सैलानी लौट जाते हैं, तो यह जाहिर है कि वे इन तीन में से दो शहरों, दिल्ली, और जयपुर को महिलाओं के लिए असुरक्षित देखकर लौटते हैं। हर कुछ दिनों में किसी गोरी -विदेशी पर्यटक महिला का ऐसा वीडियो सामने आता है जिसे घेरकर हिन्दुस्तानी उसके साथ बलपूर्वक सेल्फी ले रहे हैं, या उसे होली के रंग लगा रहे हैं, और कुछ मामलों में उसे दबोच भी रहे हैं। पर्यटकों और शोहदों-मवालियों की ऐसी भीड़ बताती है कि ये कोई प्रमुख पर्यटन केन्द्र ही है, और अधिक संभावना इस बात की है कि सबसे बुरे सात शहरों में ये भी शामिल हों। लगे हाथों दो और शहरों की चर्चा जरूरी है जहां पर्यटक बड़ी संख्या में जाते हैं, और ये दो शहर भी महिलाएं असुरक्षित पाती हैं, कोलकाता, और श्रीनगर भी इसी दर्जे में हैं। 

अभी कुछ अरसा पहले जब अमरीकी सरकार ने भारत आने वाले अपने नागरिकों को यह नसीहत जारी की थी कि भारत में महिलाएं कई प्रदेशों में अकेले सफर न करें, उन पर कई तरह के यौन हमले होने का खतरा रहता है, तो उसे ट्रम्प की नाराजगी से जोडक़र देखा गया था। लेकिन न सिर्फ अमरीका बल्कि योरप के कई देश भी ऐसी एक सावधानी अपने नागरिकों को भारत के बारे में जारी कर चुके हैं, करते रहते हैं कि यहां महिलाओं पर खतरा रहता है। और इस बात में कोई दुर्भावना भी नहीं है। न केवल विदेशी महिलाओं को, बल्कि देशी महिलाओं को भी तरह-तरह के शोषण झेलने पड़ते हैं, और सीमित समय के लिए भारत आने वाली महिलाओं से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे अपने हर बुरे तजुर्बे की शिकायत पुलिस तक करें। ऐसा करने पर उन्हें गिने-चुने दिनों में से दो-चार दिन इसी पर बर्बाद करने होंगे, और ऐसा तो देश के भीतर भारतीय पर्यटक भी करना नहीं चाहते। नतीजा यह होता है कि छेड़छाड़ या शोषण करने वाले अधिकतर लोगों को अपने बच जाने का भरोसा रहता है, और वे यह सिलसिला जारी रखते हैं। 

भारत के किसी शहर या प्रदेश में जाने वाले विदेशी पर्यटकों को हर बार अपनी सरकार की सलाह या चेतावनी की जरूरत नहीं पड़ती। किसी प्रदेश के अखबारों को एक नजर देख लिया जाए, या इंटरनेट पर खबरों को ढूंढ लिया जाए, तो भी आसानी से पता लग जाता है कि किस शहर, या प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ कितने जुर्म हो रहे हैं। अब तो जो एआई औजार हैं, वे खबरों, और इंटरनेट पर मौजूद जानकारी का विश्लेषण करके भी बता देते हैं कि किन शहरों, और इलाकों में महिलाओं पर कितने हमले होते हैं। यह नौबत बताती है कि भारत की पर्यटक-संभावनाएं महिलाओं के शोषण की वजह से भी बुरी तरह मार खाती हैं, और देश के भीतर भी अकेली महिला अधिक जगहों पर अपने को सुरक्षित महसूस नहीं करतीं, यानी अकेली महिला सैलानी या तो कम निकलती हैं, या सीमित जगहों पर ही जाती हैं। 

इस ताजा सर्वे की लिस्ट को देखना कुछ और परेशान करता है। जिन सात शहरों को महिलाएं सबसे सुरक्षित पाती हैं, उनमें हिन्दी प्रदेश, या उत्तर भारत की कोई जगह नहीं है। सात में से तीन जगहें, कोहिमा, आइजोल, गंगटोक, और ईटानगर तो उत्तर-पूर्व की हैं, और बाकी तीन शहर, विशाखापट्टनम, भुवनेश्वर, और मुम्बई भी गैरहिन्दीभाषी हैं, उत्तर भारत के बाहर के हैं। सर्वे में जिन सात शहरों को सबसे असुरक्षित पाया गया है उसमें से पांच तो सीधे-सीधे हिन्दी-भारत के हैं, पटना, जयपुर, फरीदाबाद, दिल्ली, और रांची। बचे दो शहर कोलकाता और श्रीनगर हैं। देश में हिन्दी राज्य कहे जाने वाले यूपी, बिहार, एमपी, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, हरियाणा, हिमाचल, और दिल्ली में देश की आधी आबादी, करीब 70 करोड़ लोग बसते हैं। यह कैसी शर्मिंदगी की बात है कि सात सबसे सुरक्षित महसूस किए जाने वाले शहरों में से एक भी इस आधी आबादी में नहीं हैं। पर्यटन का ढांचा बना देना ही सब कुछ नहीं होता, लोगों को सुरक्षा देना भी बहुत कुछ होता है, और ऐसा नहीं हो सकता कि लोग सिर्फ पर्यटक महिलाओं को सुरक्षा दें, और सिर्फ स्थानीय महिलाओं पर यौन हमले करें। यौन हमलावर सिर्फ औरत और मर्द का फर्क करते हैं, देशी और विदेशी का नहीं। हर प्रदेश को अपनी पर्यटन संभावनाओं को बढ़ाने की कोशिश करने के साथ-साथ महिलाओं के खिलाफ जुर्म पर काबू भी करना चाहिए, उसके बिना कभी पूरी संभावनाएं हासिल नहीं हो सकेंगी।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 31 अगस्त 2025



 

बेइंसाफी घटाने की एक प्रणाली बनाने की जरूरत

30 अगस्त 2025 

 

सुप्रीम कोर्ट ने अभी इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो मामलों को लेकर सख्त बेचैनी जाहिर की है और एक किस्म से हाईकोर्ट को यह याद दिलाया है कि वह किसी की जमानत की अर्जी पर तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख नहीं बढ़ा सकता। इस मामले में जमानत अर्जी पर सुनवाई 21 बार टल चुकी थी। मुख्य न्यायाधीश और दो अन्य जजों की बेंच के सामने जेल में बंद इस आरोपी के वकील ने याद दिलाया कि कुछ दिन पहले ही एक दूसरे केस में सुप्रीम कोर्ट ने एक व्यक्ति को यह देखकर जमानत दे दी थी कि हाईकोर्ट ने उसकी जमानत अर्जी पर सुनवाई 43 बार टाल दी थी। यह आदमी साढ़े तीन बरस से जेल में बंद था, और उसकी जमानत अर्जी पर सुनवाई हो ही नहीं रही थी, इलाहाबाद हाईकोर्ट जाने क्या सोचकर उस सुनवाई को आगे टालते चल रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह सब देखकर कहा- हम बार-बार कह रहे हैं कि नागरिकों से जुड़े मामलों को तेजी से सुना, और तय किया जाए। हम हाईकोर्ट की इस आदत को मंजूर नहीं कर सकते कि निजी आजादी से जुड़े मामलों को बार-बार टाल दिया जाए। ऐसे मामलों को सबसे तेजी से निपटाना चाहिए। हम इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से गुजारिश करते हैं कि इस मामले को जल्द निपटाएं। अब कम से कम अगली तारीख पर हाईकोर्ट को उसकी जमानत अर्जी पर फैसला करना ही होगा।

ये दोनों मामले देश की कई केंद्रीय जांच एजेंसियों, और राज्य की पुलिस या दूसरी जांच एजेंसियों के चलाए जा रहे बहुत से दूसरे मुकदमों की तरह हैं जिनमें एजेंसियां किसी एक या दूसरे बहाने से जमानत का विरोध करती हैं। दिल्ली में हुए दंगों में जिनके खिलाफ यूएपीए के तहत मामले दर्ज किए गए थे उनमें से बहुत सारे लोगों को पांच बरस गुजर जाने पर भी जमानत नहीं मिली है, और मामले की सुनवाई भी आगे नहीं बढ़ी है। अब अगर ये लोग अदालत से बेकसूर साबित होते हैं, तो पांच बरस की इस कैद की यह लोकतंत्र क्या भरपाई कर सकता है? और ऐसी बेगुनाही कई दूसरे मामलों में साबित होती रहती है, उसमें अनोखा कुछ भी नहीं है। अभी-अभी एक हफ्ते के फासले में ही मुंबई ट्रेन ब्लॉस्ट और मालेगांव बम धमाकों के दो अलग-अलग मामलों में सारे ही आरोपी छूट गए। इनमें साध्वी प्रज्ञा ठाकुर जैसी चर्चित भूतपूर्व सांसद भी शामिल थीं। देश की एक सबसे ताकतवर बनाई गई जांच एजेंसी ने बम धमाकों के इन मामलों के मुकदमे चलाए थे।

भारत की अदालतों में मुकदमों और अर्जियों की तारीखें आगे बढऩे का सिलसिला उसी तरह चलता है जिस तरह भारत के सरकारी दफ्तरों पर बने हुए एक टीवी सीरियल में दिखाया गया था। हिंदुस्तानी इंसान मुसद्दीलाल बनकर रह गए हैं। अब ऐसे कितने फीसदी लोग होंगे जो हाईकोर्ट का फैसला होने से पहले सुप्रीम कोर्ट तक जा सकें? भारत के कानून में सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि जमानत एक अधिकार होना चाहिए, और उसे खारिज करके जेल एक अपवाद रहना चाहिए। हाल ही के महीनों में सुप्रीम कोर्ट ने ईडी और सीबीआई सरीखी कई जांच एजेंसियों को जमकर फटकारा है कि वे लगातार जमानत का विरोध करते चलते हैं, या किसी-किसी मामले में एक मामले में जमानत का आसार दिखते ही दूसरा मामला दर्ज कर लेते हैं। लेकिन जेल में अधिक से अधिक समय तक रखने की अंग्रेजों के समय से चली आ रही सोच भारत की बड़ी जांच एजेंसियों, और राज्य की पुलिस तक में बराबरी से हावी है। 

हमारा मानना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट सचमुच ही देश की अदालतों पर से वजन हटाना चाहता है, जेलों से कैदियों को कम करना चाहता है, और नागरिकों को इंसाफ देना चाहता है तो उसे सारी अदालती कार्रवाई का कम्प्यूटरीकरण करके यह व्यवस्था करनी चाहिए कि किसी मामले में सुनवाई कितने बार आगे बढऩे पर कम्प्यूटर ही जज को याद दिला दे कि इसे और आगे बढ़ाने का अधिकार अब खत्म हो चुका है। अगर एक हाईकोर्ट में जमानत अर्जी पर 43 बार पेशी बढ़ चुकी है, तो ऐसे मामले में सुप्रीम कोर्ट में वकील के पहुंचने पर ही जजों को यह क्यों पता लगे? क्या यही जनता का इंसाफ पाने का हक है? होना तो यह चाहिए था कि सुप्रीम कोर्ट को अदालत का सॉफ्टवेयर यह बताते चलता कि हाईकोर्ट में किस-किस मामले की सुनवाई अब तक कितनी बार बढ़ चुकी है? बहुत मामूली से सॉफ्टवेयर से यह काम हो सकता था, हो सकता है। और अब तो एआई की मेहरबानी से ऐसी निगरानी और भी आसान हो गई है। आज के वक्त मुजरिम भी एआई के मामूली औजार इस्तेमाल करके अपने शिकार छांट रहे हैं, ऐसे में भारत की न्यायपालिका को तो अपने कामकाज को बेहतर बनाने के लिए अब साधारण हो चली ऐसी तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए। हाईकोर्ट में 43 बार वकील खड़े कर चुके इंसान के पास सुप्रीम कोर्ट में फिर वकील खड़ा करने की ताकत हो सकता है कि बची भी न हो। अदालत को ही निगरानी का एक साधारण सा सॉफ्टवेयर बनवाना चाहिए जिससे अदालतों और जेलों का वजन भी कम होगा।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 अगस्त 2025



 

सत्ता की बददिमागी का नतीजा बिहार में दिख रहा है, एमपी में जरूरत

 29 अगस्त 2025 

 

मध्यप्रदेश का एक वीडियो दो दिन से सोशल मीडिया पर घूम रहा है, और इन दिनों किसी वीडियो के साथ जोड़ी जा रही सच्ची या झूठी जानकारी की जांच-पड़ताल के बाद अब उसकी जानकारी सही पाकर अब उस पर लिख रहे हैं। भिंड जिले के कलेक्टर-बंगले के गेट पर विधायक अपने दर्जन-दो दर्जन समर्थकों के साथ नारेबाजी कर रहे हैं, और कलेक्टर को गेट के आर-पार से तरह-तरह की धमकियां दे रहे हैं। बीच-बीच में वे खूब गाली-गलौज पर उतरते हैं, फिर अपने समर्थकों को कलेक्टर चोर होने के नारे लगाने के लिए कहते हैं, और नारेबाजी के बीच एक बार फिर वे कलेक्टर को धमकाने में लग जाते हैं। विधायक समर्थकों का बनाया हुआ वीडियो ही बताता है कि विधायक कलेक्टर को मारने के लिए हाथ उठाते हैं, इस दौरान कोई एक सुरक्षागार्ड बीच-बचाव करता है। झगड़ा खाद संकट का बताया जाता है, लेकिन असल मुद्दा शायद रेप-चोरी का था। जो भी हो, सत्तारूढ़ पार्टी का एक बुजुर्ग सा दिखता विधायक जिस हमलावर हाथापाई के अंदाज में कलेक्टर बंगले पहुंचकर कलेक्टर से बदसलूकी करता है, उससे विधायक के साथ-साथ सरकार के तेवर भी उजागर होते हैं।

कई लोगों का यह मानना रहता है कि चूंकि कलेक्टर जिले का सबसे अधिक अधिकारसंपन्न, और सबसे अधिक जिम्मेदार समझे जाने वाला वरिष्ठ अधिकारी रहता है, इसलिए उसके साथ बदसलूकी बर्दाश्त नहीं की जा सकती। हम तो ऐसे किसी ओहदे के दिखावे को सही नहीं मानते, और चपरासी से लेकर कलेक्टर तक, या सिपाही से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज तक हर किसी का सम्मान उनके सरकारी, या अदालती, या संवैधानिक कामकाज के हिसाब से बराबर ही रहना चाहिए, लोकतंत्र में सिपाही से बदसलूकी तो ठीक है, लेकिन बहुत बड़े अफसर, या हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के जज से बदसलूकी पर जुर्म दर्ज हो जाए, यह तो ठीक नहीं है। यह भी बात समझने की जरूरत है कि बड़े अफसर, नेता, या जज तो अपने से मातहत कर्मचारियों के सुरक्षा घेरे में रहते हैं, और बदसलूकी के उन तक पहुंचने का मतलब नीचे के लोगों से बदसलूकी हो चुकना भी रहता है। इसलिए सरकार हो, अदालत हो, या कोई और संवैधानिक संस्था, इनमें से किसी के भी छोटे या बड़े कर्मचारी-अधिकारी का सम्मान बराबर ही रहना चाहिए, और अगर कोई भी व्यक्ति इनके ओहदों से जुड़े कामकाज को लेकर इन पर हमला करे, तो उसके लिए जो नियम है वे एक बराबरी से लागू होने चाहिए, चाहे  कर्मचारी को थप्पड़ मारने वाले मंत्री-मुख्यमंत्री हों, या मातहत से बदसलूकी करने वाले जज ही क्यों न हों।

भारत में ऐसे तो कहने के लिए लोकतंत्र की पौन सदी पूरी हो रही है, और चारों तरफ जलसे चल रहे हैं, लेकिन लोगों की सोच अब तक सामंती बनी हुई है। किसी के सिर पर सत्तारूढ़ पार्टी का होने का गुरूर रहता है, किसी के सिर पर किसी ‘बड़े’ व्यक्ति की औलाद होने का अहंकार रहता है, और बहुत से लोगों पर अपनी संपन्नता का घमंड उनकी गाड़ी के हॉर्सपावर के साथ जुडक़र काम करता है। बड़े शहरों की जितनी संपन्न रिहायशी इमारतें होती हैं, वहां कर्मचारियों के साथ बदसलूकी हिन्दुस्तानियों के आम मिजाज में बैठी हुई है। कई ऊंची बिल्डिंगों में तो घरेलू कामगारों, और चौकीदारों को लिफ्ट में चढऩे की भी मनाही रहती है, और ढेरों वीडियो आते हैं जिनमें कोई संपन्न महिला संपन्नता और दारू के नशे में छोटे-छोटे कर्मचारियों को मां-बहन की गालियां बकते दिखती हैं। लोगों की सोच ऐसी सामंती है कि वे सरकारी अमले को अपने बाप का नौकर मानकर उनसे बदसलूकी को अपना हक मान लेते हैं। फिर यह भी है कि जिनके पास उस वक्त थोड़ी-बहुत ताकत रहती है, उनके आभामंडल के दूसरे लोग उस ताकत को अपनी बपौती मानकर चलते हैं।

मध्यप्रदेश के ही एक डीजीपी के बददिमाग बेटे ने उनके एक जिले के दौरे के दौरान पुलिस के एक डीएसपी के साथ बड़ी बदसलूकी की थी, तो जिले के आईपीएस अफसर ने डीजीपी के बेटे को थप्पड़ मारी थी, और बाद में कई तरह की जांच भी भुगती थी। लेकिन ऐसा जवाब देने का हौसला कितने लोगों का हो सकता है कि वे अपने मातहत के सम्मान की रक्षा के लिए खुद का कॅरियर इस तरह दांव पर लगाएं? छत्तीसगढ़ में भी बहुत से ऐसे मौके आए हैं जब सत्ता की बददिमागी में लोगों ने मातहत कर्मचारियों और अधिकारियों को पीटा है, और ऐसे हर मौके पर हमने उसके खिलाफ लिखा है। मध्यप्रदेश में सत्तारूढ़ विधायक, और कलेक्टर के बीच की ऐसी तनातनी सत्ता की बददिमागी का एक बड़ा सुबूत है। कोई पार्टी अपने विधायक का तो तबादला कर नहीं सकती, कलेक्टर को ही वहां से हटा सकती है, लेकिन ऐसे में हमलावर विधायक का दिमाग और आसमान पर पहुंच जाएगा, और वह अगले कलेक्टर को अपने जूते की नोंक पर लेकर चलेगा।

अभी पिछले हफ्ते-दस दिन से बिहार के दो अलग-अलग वीडियो आए हैं जिनमें से एक में किसी सत्तारूढ़ विधायक को भीड़ खदेड़ रही है, और वह किसी तरह वहां से भागकर जान बचा रहा है। दूसरा वीडियो वहां के एक मंत्री का है जो कुछ मौतों के बाद गांव पहुंचे थे, और वहां ऐसा पथराव करके उन्हें भगाया गया है कि वे भागते चले जा रहे हैं, और कार के शायद शीशे भी टूट गए हैं, किसी तरह उनकी जान बची है। बिहार की जनता का मिजाज कुछ अलग है, हर प्रदेश में जनता कानून इस तरह अपने हाथ में नहीं लेती है। लेकिन जैसा कि बहुत सी फिल्मों में होता है, जुल्मी और जुर्मी नेताओं को कहीं पर बागी तेवर वाला कोई पुलिस अफसर घर-दफ्तर से घसीटकर ले जाकर सडक़ पर मारता है, या जनता मंच से उतारकर ऐसे नेताओं को मारती है, ऐसा भी किसी जगह असल जिंदगी में हो सकता है। गुंडागर्दी सिर्फ निर्वाचित या सत्तारूढ़ नेताओं का एकाधिकार तो है नहीं, कभी उन्हें भी इसका स्वाद चखना पड़ सकता है। विपक्ष के नेता अफसरों से टकराएं, यह तो समझ में आता है, लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी का बुजुर्ग विधायक कलेक्टर के बंगले पर जाकर हाथापाई पर उतारू हो जाए, मारने को हाथ उठा ले, तो यह विधायक की ही शान (?) के खिलाफ हैं। विधायक में अगर दमखम होता, अगर उनकी बात सही होती, तो वे मुख्यमंत्री से मिलकर इसे निपटाते, मवालियों जैसी हरकत नहीं करते। इस घटना में विधायक की इतनी इज्जत रह गई कि कलेक्टर अपने बंगले के गेट पर शॉल लपेटे शोले के ठाकुर साहब की तरह बिना हाथ उठाए खड़े रहे, वे अगर चाहते तो पुलिस को बुलाकर लाठी भी चलवा सकते थे, क्योंकि उनके ऊपर हमले का तो एक वास्तविक खतरा था ही। फिर सत्तारूढ़ पार्टी की भला क्या इज्जत रह जाती? नेताओं को तैश दिखाने के पहले कानून की भी परवाह रहनी चाहिए, लेकिन उन्हें यह फिक्र तभी होगी जब कोई अदालत उन्हें बुलाकर कटघरे में खड़े करवाएगी।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 अगस्त 2025



 

दीवारों पर लिक्खा है, 28 अगस्त 2025



 

मीडिया और सोशल मीडिया की सुनामी में फंसे अखबार..

28 अगस्त 2025 

 

सोशल मीडिया राजनीतिक दलों के लोगों, और उनके खेमेबाज तथाकथित पत्रकारों के बयान लगातार ब्लॉक करने लायक रहते हैं क्योंकि राजनीति घटिया के जवाब में और अधिक घटिया होने के लिए बेसब्र, और उस पर उतारू रहती है। दूसरी तरफ खेमेबाज जर्नलिस्ट किसी नेता या पार्टी के हिमायती और ढिंढोरची एक्टिविस्ट की तरह काम करने, और उस शिनाख्त को अपने माथे पर सजाकर चलने में फख्र हासिल करते हैं। ऐसी खेमेबाजी के बीच किसी ईमानदार अखबारनवीस के लिए अपने को काबू में रखना, और अपने पेशे के साथ ईमानदार बने रहना किसी सुनामी में पैर जमाए रखने की तरह होता है, खासा मुश्किल, तकरीबन नामुमकिन। 

लेकिन जब बहुत से लोग चुनौती देने के अंदाज में हमारे अखबार को यह  कहते हैं कि फलां ने इस जुबान में कहा या लिखा है, तो उसका जवाब तो इसी जुबान में हो सकता है, तो हम हाथ जोडक़र यह कहते हैं कि किसी भी तरफ की बदजुबानी में हमारी दिलचस्पी नहीं है। और यह बात सच भी है, जब गंदी जुबान के सैलाब, और गढ़ी गई तस्वीरों या वीडियो की आंधी आती है, और वह खासी बड़ी संख्या में पाठक और दर्शक दे जाती है, तो इस धंधे में बने रहने के बावजूद अपने पर काबू रखना कुछ मुश्किल लगता है क्योंकि आखिर जिंदा तो पाठकों या दर्शकों के बल पर ही रहा जा सकता है। यह भी समझने की जरूरत है कि आज जिस तरह की भाषा प्रचलन में आम और सर्वमान्य मान ली गई है, उसके बिना भी लिखते हुए, या बोलते हुए हमें कभी भाषा की किसी खूबी की कमी नहीं खली। अच्छी से अच्छी, और बुरी से बुरी बात बिना घटिया जुबान के कही जा सकती है। फिर हमें यह भी लगता है कि घटिया के मुकाबले घटिया जुबान या बातें बोलना, इससे तो जवाब देने वाले भी अपने आपको घटिया ही साबित करते हैं। आज भी सामान्य शिष्टाचार के दायरे में भी बड़ी-बड़ी बातें कही जा सकती हैं, तकरीबन हर बार। 

सार्वजनिक जीवन के मुद्दों और लोगों पर लिखते हुए कई बार विशेषणों की जरूरत पड़ती है, और अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प जैसे व्यक्ति के बारे में लिखते हुए हम इसी संपादकीय कॉलम में जब बददिमाग, बेदिमाग, बदचलन, घटिया, तानाशाह जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं, तो इनमें से कोई भी विशेषण नहीं रहता, वह इस घटिया आदमी के बारे में अदालतों में साबित हो चुका तथ्य ही रहता है। इसलिए जब किसी के बारे में इस्तेमाल किया जाने वाला आलोचना का विशेषण तथ्यों से साबित हो चुका रहता है, तो वह विशेषण भी नहीं रहता, महज तथ्य हो जाता है। हम अपनी आलोचना या तारीफ की भाषा को इसी सीमा के भीतर रखते हैं। 

अब जब तारीफ की बात निकली है, तो सार्वजनिक रूप से किसी की तारीफ आलोचना की तरह ही होती है, जिसमें विशेषणों का तथ्यों से बड़ा ही कम लेना-देना होता है। किसी के गुजरने पर, या किसी के अभिनंदन के मौके पर, और बहुत से लोगों की जुबान में तो हर बरस आने वाली सालगिरह के मौके पर भी इतने विशेषण इस्तेमाल किए जाते हैं कि उन्हें पाने वाले को भी इस पर भरोसा नहीं होगा कि वे इतने अच्छे हैं। फिर भी किसी की झूठी तारीफ, चाहे वह मुसाहिबी की हद पार करती हो, किसी दूसरे का कोई नुकसान नहीं करती। लेकिन आजकल तारीफ से परे, किसी की आलोचना या निंदा में जिस जुबान का इस्तेमाल हो रहा है, वह तो लोकतांत्रिक, और मानवीय सीमाओं से बाहर-बाहर ही चलती दिखती है। ऐसी जुबान सिर्फ यही साबित करती है कि तथ्य और तर्क चुक चुके हैं, और इन विशेषणों के बाद अगली बारी नाली के कीचड़ की होगी। दिलचस्प यह भी है कि ऐसे कीचड़ के आकांक्षी पाठक और दर्शक बढ़ते चले जा रहे हैं, और कीचड़ के मुकाबले का जीवंत प्रसारण न करना मीडिया के धंधे में खासे घाटे का काम रहता है। 

ऐसी तमाम नौबत के बावजूद अपने अखबार के लिए हमारा यह मानना रहता है कि अखबारों को अपने पुराने दिनों के तौर-तरीकों को याद रखना चाहिए जब वे मीडिया नहीं गिनाते थे, वे सिर्फ प्रेस कहलाते थे। उन दिनों सोशल मीडिया था नहीं, नतीजा यह होता था कि प्रेस को, यानी अखबारों को सोशल मीडिया सरीखे किसी प्लेटफॉर्म से प्रभावित होने की जरूरत नहीं रहती थी। अखबार प्रभावित होते नहीं थे, करते थे। और उनकी मौलिकता ही उनकी ताकत रहती थी जिसकी वजह से वे प्रभावित करने की ताकत रखते हैं। इन दिनों कल के प्रेस कहे जाने वाले, और आज मीडिया में शुमार होने वाले अखबारों को सोशल मीडिया से प्रभावित होने से कोई परहेज नहीं है, और इसीलिए अब उनसे प्रभावित होने वाले लोगों, और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गिनती सीमित होने लगी है। जब सोशल मीडिया, जिस पर कोई संपादक नहीं है, की जुबान अखबार भी इस्तेमाल करने लगे, या संपादक और पत्रकार अपने सोशल मीडिया पेज पर उस जुबान में लिखने और बोलने लगें, तो फिर उनका असर सोशल मीडिया से अधिक कैसे हो सकता है? आज जब अखबार इस बात के लिए बेताब रहते हैं कि वे एक हरकारे या डाकिये की तरह ओछी जुबान में दिए गए एक बयान को दूसरों तक पहुंचाने के बाद उनसे इसका जवाब लेकर बाकियों तक पहुंचाने को अपनी गौरवशाली पत्रकारिता मानें, तो हम इस धंधे में पिछड़ जाना बेहतर समझते हैं। 

आज टीवी समाचार चैनल जिस तरह सबसे घटिया बातों को, सबसे घटिया नजारों को बार-बार, बार-बार सुनाकर और दिखाकर टीआरपी बटोरते हैं, अगर उनसे सीखकर वही तरीका अखबारों को भी इस्तेमाल करना है, तो यह बेहतर ही होगा कि वे अपने आपको मीडिया ही कहें, और प्रेस न कहें। लोगों को यह याद रखना चाहिए कि सोशल मीडिया पर संपादक नाम की कोई संस्था नहीं है। और अखबार किसी संपादक के लिए शान या शर्म का सामान हुआ करते थे। आज जिन लोगों को शान और शर्म के बीच का फर्क नहीं रह गया है, वे अखबार को मीडिया का हिस्सा मानने के साथ-साथ, सोशल मीडिया का हिस्सा भी मान सकते हैं, और उसी अंदाज में छप सकते हैं। फिलहाल आज का यह लिखना सोशल मीडिया पर आज की घटिया बातों के संदर्भ में है कि उनके लिए वही एक बेहतर जगह है जहां कोई संपादक नहीं है। कोई भी जिम्मेदार और आत्मसम्मानी संपादक अपने अखबार को सोशल मीडिया की बदजुबानी से कुछ या अधिक हद तक अनछुआ रखने की कोशिश करते होंगे, ऐसी कम से कम हमारी उम्मीद तो है।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 अगस्त 2025



 

नशे की जब्ती वाले गुजरात में पार्टियों के नाम पर हजारों करोड़ की अफरा-तफरी!

 27 अगस्त 2025 

 

देश में चुनाव आयोग भारी शक के घेरे में है। जिस तरह से पिछले कुछ चुनावों में शाम को मतदान का समय खत्म होने के बाद एकाएक वोटों का सैलाब आया, उसने बहुत सी सीटों पर नतीजे बदल दिए। अब अगर सचमुच ही किसी मतदान केन्द्र पर वोट का समय खत्म होने के बाद इतनी लंबी कतारें लगी थीं, तो कांग्रेस पार्टी चुनाव आयोग से ऐसे केन्द्रों के वीडियो मांग रही है, और डरा-सहमा चुनाव आयोग भारतमाता के पल्लू के पीछे जा छुपा है, और तर्क दे रहा है कि माताओं-बहनों के वीडियो देना क्या ठीक होगा? माताओं और बहनों के जो वीडियो चुनाव आयोग मतदान केन्द्र पर खुद ही बनाता है, और प्रचार में उसका इस्तेमाल करता है, वही वीडियो तो प्रमुख विपक्षी दल मांग रहा है, उसमें मां-बहन की आड़ क्यों लेना? खैर, चुनाव आयोग के तौर-तरीके एक कांग्रेसविरोधी राजनीतिक दल सरीखे हो गए हैं, और राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेंस के मिनटों बाद, जब तक सत्तारूढ़ पार्टियों के प्रवक्ताओं के भी बयान नहीं आते, तब तक चुनाव आयोग राहुल गांधी को एक राजनीतिक जुबान वाला नोटिस जारी कर चुका रहता है। ऐसे में गुजरात का एक ताजा मामला जो कि चुनाव आयोग के ही आंकड़ों का है, वह हैरान करता है। 

एक प्रमुख अखबार, भास्कर की एक रिपोर्ट बताती है कि गुजरात में दस गुमनाम सरीखे दलों को पिछले पांच बरस में 43 सौ करोड़ रूपए चंदा मिला बताया गया है, और चुनाव आयोग की रिपोर्ट में इनका खर्च कुल 39 लाख बताया गया है जबकि इन पार्टियों की ऑडिट रिपोर्ट में यह खर्च 35 सौ करोड़ रूपए दिखाया गया है। ये पार्टियां कागजी किस्म की दिख रही हैं, और 2019, 2024 के लोकसभा चुनाव, और इनके बीच हुए 2022 के विधानसभा चुनाव में इन्होंने कुल 43 प्रत्याशी उतारे, किसी को भी पांच हजार वोट भी नहीं मिले, और सभी पार्टियों ने कुल मिलाकर चुनाव आयोग को तो 39 लाख का हिसाब दिया, जबकि सीए की ऑडिट रिपोर्ट में 35 सौ करोड़ खर्च दिखा दिया। पहली नजर में यह पूरा मामला कालेधन का दिखता है कि जिन पार्टियों का किसी ने नाम भी न सुना हो, उन्हें करोड़ों रूपए चंदा मिला, और अधिकतर रकम को सीए की रिपोर्ट में खर्च दिखा दिया। हो सकता है कि कालेधन को सफेद करने की लॉंड्री चलाने वाले लोगों ने इसे कोई तरकीब बना लिया हो, लेकिन सवाल यह भी उठता है कि जब इन पार्टियों को इस तरह का अविश्वसनीय चंदा मिल रहा है, तो क्या इस पर इंकम टैक्स या ईडी की नजर नहीं जाती? और फिर जब ये हजारों करोड़ का खर्च दिखा रही हैं, तो भी किसी जांच के घेरे में इनको नहीं लाया जाता? जो चुनाव आयोग राहुल गांधी के जूतों के फीते बंधे न रहने पर उन्हें नोटिस देने के इरादे में दिखता है, उसे इन गैरमौजूद, और कागजी दलों का हजारों करोड़ का लेन-देन नहीं दिखता?

इससे एक दूसरा सवाल यह उठता है कि देश में कालेधन का इतना अधिक बोलबाला अभी तक कैसे बना हुआ है? नोटबंदी को बरसों हो चुके हैं, पांच सौ रूपए से बड़े तमाम नोट बंद हो गए हैं, अधिकतर लेन-देन बैंकों के मार्फत होने लगा है, चारों तरफ छोटे-छोटे लेन-देन भी अब मोबाइल फोन के जरिए हो रहे हैं, तो फिर दो-नंबर की इतनी रकम आती कहां से है? अभी भी हर कुछ दिनों में सडक़ों पर ऐसी गाडिय़ां पकड़ाती है जिनमें कोई खुफिया बक्सा बनाया गया है, और करोड़ों रूपए की नगदी ले जाई जा रही है। कारोबारी लोगों से पता लगता है कि हवाला कारोबार उसी तरह चल रहा है, जैसा पहले चलता था। व्यापार में आज भी देश में कहीं से भी, कहीं भी, कितनी भी रकम नगदी भेजी जा सकती है, और इसके लिए नोट सफर नहीं करते, केवल फोन पर सब काम हो जाता है। तो नोटबंदी के बाद क्या नगदी पर कोई भी रोक नहीं लग पाई? अभी दो दिन पहले ही कर्नाटक के कांग्रेस विधायक पर छापा पड़ा, तो दस करोड़ से अधिक के नगदी नोट मिले। पिछले दिनों बिहार में एक-एक करके कई अफसरों पर छापे पड़े, तो वे करोड़ों के नोट जलाते हुए मिले। दिल्ली में हाईकोर्ट के एक जज के बंगले से जले हुए नोटों से भरी हुई बोरियां मिलीं। आखिर इतने नोट जब जलाए जा रहे हैं कि कहीं बोरियां भरी हुई हैं, कहीं नालियां चोक हो जा रही हैं, तो देश में समानांतर अर्थव्यवस्था तो जारी ही है। 

एक अकेले राज्य गुजरात में ऐसे राजनीतिक दलों को हजारों करोड़ रूपए चंदा मिल जाए, जिनका नाम भी किसी ने सुना नहीं था, तो सरकार की एजेंसियां कर क्या रही थीं? क्योंकि जिन पार्टियों का अकाऊंट ऑडिट हो रहा है, उन्हें इंकम टैक्स में हिसाब-किताब देना पड़ता है, चुनाव आयोग को बताना पड़ता है, और चुनाव आयोग में सिर्फ 39 लाख का खर्च इन दस पार्टियों ने मिलकर दिखाया है, और ऑडिट में 35 सौ करोड़! जब आंकड़े ऐसे भयानक है, तो सरकार की एजेंसियों की नजरों में क्यों नहीं आ रहे हैं, और चुनाव आयोग जो कि राहुल गांधी के एक-एक शब्द पर नोटिस जारी करने के लिए कम्प्यूटर-प्रिंटर चालू ही रखता है, उसकी नजर में भी एक राज्य का ऐसा हिसाब-किताब सामने नहीं आए? गुजरात वैसे भी एक संवेदनशील राज्य है। वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का अपना राज्य तो है ही, वह समुद्री सरहद वाला राज्य भी है, जहां पर सरकार और अडानी के बंदरगाहों पर हजारों करोड़ का नशा पकड़ा रहा है। जाहिर है कि ऐसे नशे के धंधे में जो पैसा खर्च होता है, या जो कमाई होती है, वे बैंक खातों से तो आते नहीं हैं। ऐसे में गुजरात में जिस तरह हजारों करोड़ की जाहिर तौर पर दिखती अफरा-तफरी पहले ही नजर में आ जानी चाहिए थी। 

देश में एनजीओ, दूसरे तथाकथित समाजसेवी संगठन, और राजनीतिक दल दो-नंबर के पैसों के लिए एक बड़ा अड्डा बने हुए हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि अपने-अपने दायरे में इन पर नजर रखें। फिलहाल तो गुजरात का यह बड़ा बवाल सामने आया है, और इस पर चुनाव आयोग, या केन्द्र सरकार की कोई प्रतिक्रिया भी अभी सामने नहीं आई है।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अगस्त 2025


 

पारिवारिक सम्पत्ति की दो खबरें, दो कहानियां..

 26 अगस्त 2025 

 

आज के अखबारों में दो खबरों को मिलाकर देखने की जरूरत है। पहली खबर मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले की है जिसके साथ एक भयानक वीडियो भी है। एनडीटीवी की खबर बताती है कि वहां एक रिटायर्ड डीएसपी को रिटायरमेंट के वक्त जो भुगतान मिला है, उसे पाने के लिए उस बुजुर्ग की बीवी, और उसके दो जवान बेटे मिलकर उसे पीट रहे हैं, और पड़ोसियों की दखल भी उसे बचा नहीं पा रही है। छोटे से अंतरंग कपड़ों में इस बुजुर्ग को जमीन पर गिराकर अलग रहने वाले उसके बीवी-बेटे उस पर जुल्म कर रहे हैं। एक बेटा उसकी छाती पर चढक़र बैठ गया है, और बीवी ने उसके पैरों को रस्सी से बांध दिया है। इसके बाद उसे रस्सी से बांधकर खींचा जा रहा है, और बीवी उसका एटीएम कार्ड छीनकर भाग गई है। यह वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने इसकी जांच शुरू की है। इन दिनों जब उत्तर भारत में, और छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश जैसे हिन्दीभाषी इलाकों में कई तरह के त्यौहार मनाए जा रहे हैं, महिलाएं कई तरह की कामना करते हुए उपवास रख रही हैं, तब यह वीडियो देखना भी दिल दहलाता है कि एक रिटायर्ड बुजुर्ग से उसकी जिंदगी भर की बचत लूटने के लिए बीवी-बेटे यह कैसी हिंसा कर रहे हैं!

एक दूसरी खबर छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले की है। दैनिक भास्कर ने इसे पहले पन्ने पर छापा है कि किस तरह जून-जुलाई के महीनों में जिला पंजीयन कार्यालय में 103 मामलों में संपत्ति का हित त्याग किया गया, जिनमें 90 फीसदी हित त्याग बहनों ने किया है। भाईयों के हित में बहनों के इस हित त्याग का बड़ा गुणगान इस खबर में किया गया है कि यह छत्तीसगढ़ की माटी में पली-बढ़ी बहनों का भाई के लिए त्याग है, रिश्तों की गहराई और संवेदनशीलता की सबसे बड़ी मिसाल है। समाचार में ही एक विचार भी लिखा गया है कि मायके से एक लोटा पानी, और तीज की एक साड़ी की ही आस रहती है, और इसके लिए छत्तीसगढ़ की बहन-बेटियां करोड़ों की संपत्ति भी ठुकरा देती है, जबकि कानून बेटे-बेटी दोनों को बराबरी का हक देता है।

परिवार के भीतर संपत्ति के बंटवारे के यह दो मामले एक तो हिंसा का है, और दूसरा त्याग बताया जा रहा है। अब सवाल यह उठता है कि दुर्ग जिले के जिस त्याग की महिमा का गुणगान समाचार में किया गया है, वह त्याग क्या अकेली महिला का ही जिम्मा होता है जो कि 90 फीसदी महिलाएं ऐसा करती हैं? या फिर यह उनके भाईयों का भी जिम्मा होना चाहिए कि वे भी अपनी बहन के लिए कुछ करने को तैयार रहें, और वे भी बहन के लिए हित त्याग करें? भारत में महिला जब छोटी बच्ची रहती है, तब से उसे त्याग सिखाया जाता है, और त्याग का गुणगान किया जाता है। प्रायमरी स्कूल की किताब में पढ़ाया जाता था, कमल घर चल, कमला नल पर जल भर। वही सोच लड़कियों के बड़े होने पर भी जारी रहती है, वही सोच लडक़ों को जुल्मी बनाती है, और लड़कियों को अपार सहने की जिम्मेदारी देती है।

मध्यप्रदेश के मामले में चूंकि पुलिस जुर्म दर्ज करके मां-बेटों को ढूंढ रही है, इसलिए हम उस पर कुछ कहना नहीं चाहते, सिवाय इसके कि हर किसी को ऐसी नौबत का ख्याल रखते हुए अपने पैसों की फिक्र करनी चाहिए, और उन्हें अपने आखिरी वक्त के लिए संभालकर रखना चाहिए। अलग रहने वाले मां-बेटे भी आकर अगर रिटायर्ड की ऐसी दुर्गति करके उसकी बचत नोंचना चाहते हैं, तो बाकी लोगों को भी सावधान रहना चाहिए। लेकिन छत्तीसगढ़ के दुर्ग की जो तथाकथित त्याग की खबर है, उस बारे में समाज को अलग से सोचना चाहिए। भारत के कानून में भाई-बहनों का हक संपत्ति पर बराबरी का है। और समाज के भीतर सोच क्या है, वह इस समाचार में दिए गए आंकड़ों से ही साफ हो जाती है कि हित त्याग करने वालों में 90 फीसदी बहनें हैं। समाज की ऐसी सोच को देखते हुए कानून को अपने आप पर गौर करना चाहिए कि बराबरी का हक देने की बात तो उसने कही है, लेकिन वह बात महिलाओं से त्याग की उम्मीदों के चलते परास्त हो जा रही है। कुछ जगहों पर तो ऐसा हो सकता है कि शादीशुदा बहन को संपत्ति की जरूरत न हो, लेकिन 90 फीसदी मामलों में बहन को जरूरत न हो, और भाई को जरूरत हो, यह बात तो गले नहीं उतर सकती। यह सीधे-सीधे समाज की इस सोच से जुड़ी हुई बात दिखती है कि बहन की शादी में जो देना था दे दिया, अब मां-बाप की संपत्ति पर उसका और कोई हक नहीं होना चाहिए। लडक़ी की शादी में खर्च एक ऐसा सामाजिक दिखावा रहता है जो कि जुर्म की हद तक बिखरा हुआ रहता है, और उससे ब्याह कर जाती हुई बेटी की बाकी जिंदगी कोई मदद नहीं मिलती। लडक़े-लड़कियों के मां-बाप सामाजिक दिखावे के लिए इस तरह का दिखावा करते हैं, और इसके साथ ही मां-बाप, और भाई भी लडक़ी से हाथ धो लेते हैं कि अब तुम्हारी अर्थी ससुराल से ही उठना चाहिए। अब यह अर्थी ससुराल से कैसे उठती है, यह दिल्ली के इलाके में अभी सामने आया है जिसमें दहेज की मांग करते हुए पत्नी को जलाकर मार डालने का जुर्म दर्ज हुआ है।

जिस तरह बहन के त्याग का गुणगान होता है, उस तरह के गुणगान का हकदार बनकर भाई को भी दिखाना चाहिए। आज हालत यह है कि देश में अंगदान करने वालों में 90 फीसदी महिलाएं हैं, और अंग पाने वालों में 90 फीसदी पुरूष हैं। दुर्ग जिले में दो महीने में हित त्याग करने वालों में भी स्त्री-पुरूष का यही अनुपात है। ऐसा लगता है कि भारत की महिला की सोच सिर्फ त्याग के लिए ही तैयार की जाती है, और पुरूष की सोच उस त्याग का फायदा पाने वाले की। भारत में परिवार के लिए भूखे रहकर भी पति और बच्चों का पेट भरने वाली महिला का खूब गुणगान किया जाता है। सती सावित्री भी महिला को ही बनना रहता है, और जब पति घर से निकाले, तो महिला को ही चुपचाप चले जाना पड़ता है, फिर चाहे वह गर्भवती ही क्यों न हो। युग-युग से चली आ रही यह सोच आज जब अखबार के पहले पन्ने पर तारीफ भी पाती है, तो लगता है कि इसे अभी और युग-युग तक जारी रहना है। ज्यादा अच्छा तो यह हो कि बाप-भाई बैठकर शादी के खर्च का हिसाब निकालकर रखें, और संपत्ति में जो कानूनी हिस्सा बनता है, उस हिस्से से वह खर्च घटाकर बाकी रकम महिला को देने का रिवाज भी बन जाए, और कानून भी बन जाए। इस तरह का हित त्याग एक सामाजिक हिंसा का पुख्ता सुबूत है, और संसद को भी इस पर विचार करना चाहिए। एक लोटा पानी, और एक साड़ी को हर बरस महिला का मायके से कुलजमा हक मानना नाजायज सोच है।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अगस्त 2025



 

कुत्तों के नाम पर इंसानों की तो ऐश हो गई...

25 अगस्त 2025 

 

सरकारों के काम करने का तरीका बड़ा दिलचस्प रहता है कि हर सरकार, और सरकार के ढांचे में ऊपर बैठे लोग अपने से नीचे के लोगों पर जिम्मेदारियां डालते चलते हैं, और वे बेअक्ली की हद तक नीचे चली जाती हैं मानो कोटवार ही हर समस्या को हल करेगा। अभी सुप्रीम कोर्ट ने सडक़ों से कुत्तों को हटाने का फैसला बदला तो जिम्मेदारी सरकार पर आ गई कि कुत्तों की नसबंदी करवाई जाए क्योंकि सडक़ों से हटाना तो अब है नहीं। केन्द्र सरकार ने सभी राज्यों को चिट्ठी लिख दी कि 70 फीसदी कुत्तों की नसबंदी करवाई जाए, और उन्हें एंटी रेबिज टीका लगाया जाए। समाचार बताता है कि अब तक केन्द्र इस बारे में केवल सुझाव देते आया था, लेकिन अब उसने राज्यों को एक स्पष्ट लक्ष्य दिया है, और हर महीने इसके पूरे होने के आंकड़े भेजने को भी कहा है। केन्द्र सरकार नसबंदी और टीकाकरण पर हर कुत्ते पर आठ सौ रूपए, और हर बिल्ली पर छह सौ रूपए राज्य को देगी। इसके अलावा संक्रमित या हिंसक कुत्तों को रखने के लिए अलग से आश्रय केन्द्र बनाने के लिए भी केन्द्र सरकार कुछ रकम देगी। जब सुप्रीम कोर्ट अगली किसी पेशी पर सरकार से इस बारे में पूछेगा, तो केन्द्र सरकार के पास चिट्ठियों की फाइल रहेगी कि उसने राज्यों को क्या-क्या लिखा है, और कितने पैसे दिए हैं। राज्य सरकारें यह काम म्युनिसिपल और पंचायतों को देगी, और ये स्थानीय संस्थाएं कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण करने वाली कुछ एजेंसियों, या कुछ एनजीओ के मार्फत इस काम को करवाएंगी। 

भारत में सरकारी कामकाज में भ्रष्टाचार और बेईमानी के आम पैमानों को देखें तो लगता है कि जहां सडक़, बांध, पुल, या इमारत बनाने में भी परले दर्जे का भ्रष्टाचार होता है, वहां पर कुत्तों को टीका लगा है या नहीं, उनकी नसबंदी हुई है या नहीं, इसकी जांच-परख कैसे हो सकेगी? अगर निगरानी का काम किसी और संस्था को दिया जाएगा, तो वह संस्था भी रहेगी तो हिन्दुस्तानियों की ही, देश के प्रति ईमानदार रहने वाले जापानी तो हिन्दुस्तान की फुटपाथी-कुत्ता योजना चलाएंगे नहीं। जहां स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों की गिनती ज्यादा बताकर, उनके नाम पर यूनिफॉर्म, दोपहर का भोजन, किताब-कॉपी का घोटाला चलते ही रहता है, जहां पर मेडिकल कमिशन ऑफ इंडिया की जांच टीम को धोखा देने के लिए भाड़े के मरीज लाकर अस्पतालों में भर्ती कराए जाते हैं, वहां पर सडक़ों के कुत्तों की नसबंदी और उनका टीकाकरण कितनी ईमानदारी से हो सकेंगे? यह योजना सरकारों को बहुत सुहा सकती है, क्योंकि इसमें लंबी-चौड़ी ‘गुंजाइश’ रहेगी। 

जब सुप्रीम कोर्ट के कहे हुए किसी बात को कड़ाई से लागू करवाना रहता है, तो ऊपर से लेकर नीचे तक उस काम के लिए बजट भी मंजूर हो जाता है, और काम को समय पर करने के लिए दबाव भी बने रहता है। लेकिन सडक़ों पर कुत्तों की बढ़ती हुई आबादी से जूझ पाना सुप्रीम कोर्ट के जजों के काबू के बाहर का है। सरकार खर्च के आंकड़े जरूर अदालत को बताती रहेगी, लेकिन वह खर्च कितना काम में आएगा, कितना नाली में बहते जाएगा, यह समझना मुश्किल है। भारत के कुछ आंकड़े बताते हैं कि देश में सिर्फ एक महानगर मुम्बई में पिछले एक दशक में बड़े पैमाने पर नसबंदी से कुत्तों की संख्या में 21 फीसदी गिरावट हुई है। लेकिन चेन्नई के आंकड़े बताते हैं कि 2018 से 2024 तक वहां सडक़ों पर कुत्ते तीन गुना से अधिक हो गए हैं। अकेली दिल्ली में 10 लाख कुत्तों का अनुमान है, जिनमें से पिछले छह महीने में 65 हजार कुत्तों की नसबंदी का दावा किया गया है, लेकिन एक लाख के करीब लोगों को इस शहर में कुत्तों ने काटा भी है। भारत में करीब सवा पांच करोड़ फुटपाथी कुत्तों का अंदाज है, और एक कुत्ते के नसबंदी और टीकाकरण पर डेढ़-दो हजार रूपए का खर्च आम है, कहीं-कहीं यह दो हजार रूपए से अधिक भी है। जिस तरह इंसानों की दवाईयां, इंसानों के बाकी चिकित्सा-उपकरण की खरीदी भारी भ्रष्टाचार में डूबी हुई है, उससे यह अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है कि बेजुबान, महज भोंकने वाले कुत्तों को महंगे टीके लगे, या सिर्फ कागजों पर टीकाकरण हो गया, नसबंदी ऑपरेशन हुआ, या कागजों पर नसबंदी दिखा दी गई, इसकी जांच कौन करेंगे? इसी देश में आपातकाल के दौरान सबका देखा हुआ है कि नसबंदी के आंकड़े किस तरह फर्जी भरे जाते थे ताकि संजय गांधी को खुश किया जा सके। 

सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि जिस इलाके से कुत्तों को उठाया जाए, उनके टीकाकरण, उनके पेट से कृमि हटाने, और नसबंदी करने के बाद उन्हें उसी इलाके में वापिस छोड़ा जाए। यह मानवीय लगता आदेश देश में दसियों लाख लोगों की कमाई का एक जरिया बन जाएगा, क्योंकि पूरी दुनिया का यह तजुर्बा है कि कुत्तों के टीकाकरण की जांच कर पाना संभव नहीं है। फिर यह भी है कि कुत्तों को रैबिज का टीका हर साल लगाने पर ही उसका असर रहेगा। आज तो इस देश में इंसानों की मतदाता सूची तय नहीं हो पा रही है, सडक़ के, या पालतू कुत्तों के नाम और फोटो से वोटर कार्ड, या निवासी कार्ड बन जा रहे हैं, डोनल्ड ट्रम्प को बिहार का निवासी बना दिया गया है, ऐसे में एक सरीखे दिखने वाले फुटपाथी कुत्तों का भला क्या रिकॉर्ड रह सकेगा कि उसे अगले साल फिर टीका लगाया जा सके? 

दरअसल सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला लोगों को कुत्तों की आजादी का हिमायती लग रहा है, लेकिन सच तो यह है कि उस पर अमल किसी तरह से मुमकिन नहीं है। यह देश जितनी बेईमानी के सरकारी इंतजाम का शिकार है, उसमें इस तरह की कोई जटिल व्यवस्था कामयाब नहीं हो सकती। इस देश में अदालतों के साफ-साफ फैसलों के बाद कई-कई महीने तो कैदी रिहा नहीं हो पा रहे हैं, यहां पर सडक़ के कुत्तों का हिसाब-किताब भला कौन रखेंगे? फिलहाल सवा पांच करोड़ कुत्तों में से 70 फीसदी कुत्तों के नसबंदी और टीकाकरण में बहुत से लोगों के घर पैसों से भर जाएंगे, और उन्हें चाहिए कि वे कम से कम एक-दो फुटपाथी-कुत्ते तो पाल ही लें। आने वाले वक्त में यह देश कुत्तों के नाम पर कमाई का एक बड़ा सिलसिला देखेगा, और टीके बनाने वाली कंपनियां आज जश्न मना रही होंगी। फिलहाल अगर आप सडक़ पर पैदल, या दुपहिए पर चलते हैं, तो अपने आपको बचाकर चलें, क्योंकि देश का सुप्रीम कोर्ट भी अब आपको कुत्तों से बचाने वाला नहीं है। चलते-चलते सोशल मीडिया पर चल रहा एक पोस्टर बता देना ठीक होगा जो कह रहा है, इस देश में कुत्ते ही सबसे अधिक ताकतवर हैं, रातों-रात तीन जजों की बेंच बनवा दी, और दस दिनों में अपनी आजादी का फैसला पा लिया! 

(Daily Chhattisgarh)

कुछ अलग-अलग खबरों-बातों के जोडऩे से उभरती हकीकत!

 24 अगस्त 2025

कुछ हफ्ते पहले देश के केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों की एसटी-एससी, और ओबीसी के लिए आरक्षित कुर्सियों की खबर आई थी कि इनमें से 80 फीसदी से अधिक खाली पड़ी हैं। अनुसूचित जनजाति के प्रोफेसर पद तो 83 फीसदी खाली हैं। इससे यह भी जाहिर होता है कि सरकार इन तबकों के लिए आरक्षित जितने पदों का यह मतलब निकालती है कि उन पर काम करने वाले लोग अपने बच्चों को भी आगे बढ़ा पा रहे होंगे, वह मतलब जायज नहीं है। दो बिल्कुल ही अलग-अलग खबरें और हैं जिन पर गौर करना चाहिए। एक खबर में कल ही राहुल गांधी ने यह कहा है कि देश की सबसे बड़ी निजी यूनिवर्सिटियों में दलित छात्रों का अनुपात एक फीसदी से कम है, आदिवासी छात्रों का अनुपात आधे फीसदी से भी कम है, और ओबीसी छात्रों का अनुपात 11 फीसदी है। उन्होंने कहा कि ये आंकड़े उनके नहीं है, बल्कि शिक्षा पर संसदीय स्थाई समिति के रिपोर्ट के हैं जिसने देश के चार निजी ‘इंस्टीट्यूट ऑफ इमिनेंस’ का सर्वे किया है। उन्होंने कहा कि संसदीय समिति ने यह साफ कहा है कि निजी शिक्षा में भी आरक्षण का कानून जरूरी है। इस बात से परे राहुल गांधी ने राजनीतिक बयान भी दिया है, लेकिन वह हमारी आज की इस चर्चा का मुद्दा नहीं है। एक अलग खबर और है, जिसे मैक्सेसे सम्मान प्राप्त सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडेय ने आज फेसबुक पर पोस्ट किया है। इस पोस्टर में सोशलिस्ट छात्रसंघ, और सोशलिस्ट युवजन सभा ने आंबेडकर, लोहिया, गांधी, जयप्रकाश, कर्पूरी ठाकुर, ज्योतिबा फूले, जैसे लोगों की तस्वीरों के साथ यह मांग की है कि सिर्फ सरकारी विद्यालय में पढऩे वाले को ही सरकारी नौकरी मिले। समान शिक्षा प्रणाली लागू की जाए।

अब इन तीन बिल्कुल अलग-अलग बातों का आपस में कोई सीधा रिश्ता नहीं है, लेकिन इन तीनों का भारत की सामाजिक हकीकत से लेना-देना है जो कि इन तीनों बातों को बहुत तल्खी के साथ बताती है। मोदी सरकार ने जिन चार निजी विश्वविद्यालयों को ‘इंस्टीट्यूट ऑफ इमिनेंस’ का दर्जा दिया था, उसके पीछे बड़े-बड़े औद्योगिक घराने हैं। वहां दाखिला कितनी फीस पर होता है, वह एक अलग मुद्दा है, लेकिन उनके आंकड़ों को देखने के बाद अगर संसद की कमेटी निजी शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण के महत्व को दुहरा रही है, तो इस संसदीय समिति की सोच और भावना के साथ इन संस्थानों, और ऐसे दूसरे संस्थानों में दलित-आदिवासी, और ओबीसी छात्र-छात्राओं के अनुपात को देखना जरूरी है। ठीक उसी तरह जिस तरह कि केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों की कुर्सियों पर एसटी-एससी और ओबीसी की गैरमौजूदगी समाज की बहुत ही कड़वी हकीकत बताती है। फिर ऊपर के पैराग्राफ में आखिरी बात समाजवादी-लोकतांत्रित सोच के छात्र और नौजवान संगठनों की उठाई हुई है कि सरकारी नौकरियां सिर्फ उन्हें मिलें जो सरकारी स्कूलों में पढक़र निकले हैं। जाहिर है कि निजी स्कूलों में महंगी शिक्षा पाकर निकलने वाले छात्र, बाद में महंगी कोचिंग पाकर हर किस्म की नौकरी पाने में आगे बढ़ जाते हैं, और गरीब बच्चे इन मुकाबलों में बराबरी के मैदान पर भी नहीं आ पाते। लोगों को याद होगा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज ने बरसों पहले यह फैसला भी दिया था कि सत्तारूढ़ नेताओं और अफसरों के बच्चों के लिए यह अनिवार्य किया जाए कि वे सरकारी स्कूलों में ही पढ़ें। जज की सोच यह थी कि सरकारी स्कूलों की खराब हालत सुधारने में ऐसा नियम मददगार हो सकता है कि सत्ता हांकने वाले लोगों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे, तो उनके मां-बाप की यह मजबूरी भी रहेगी कि वे इन स्कूलों को सुधारें। यह एक किस्म की समाजवादी सोच का फैसला था, जो कि लोकतांत्रिक-मानवीयता के हिसाब से अच्छा था, हालांकि हमने अपने अखबार में उसी समय यह लिखा था कि यह फैसला संवैधानिक रूप से सही नहीं है, और इस पर अमल नहीं हो सकेगा। वही हुआ भी।

आज देश में अधिकतर सत्तारूढ़ लोगों के बच्चे महंगे स्कूल-कॉलेज में पढ़ते हैं, और जो सचमुच ही अधिक तनख्वाह, या अधिक ऊपरी कमाई वाले लोग हैं, उनके बच्चे विदेशी विश्वविद्यालयों में पढऩे चले जाते हैं। ऐसे सत्तारूढ़ तबकों के बहुत से लोग देश के गरीब लडक़ों और नौजवानों को धार्मिक पाखंड में झोंककर और जोतकर रखते हैं क्योंकि उनके पास अच्छी तालीम पाने की कोई प्रेरणा नहीं रहती, और किसी तरह पढ़-लिखकर बेरोजगार बनने से उन्हें कुछ हासिल भी नहीं होता। धर्म और जाति के नाम पर इस पीढ़ी को सडक़ों पर उन्माद में झोंक दिया जाता है, और ऐसी भीड़ में अधिकतर लडक़े-युवक दलित-आदिवासी, और ओबीसी तबकों के ही रहते हैं। जिन तबकों को पढ़ाई में हर कदम पर आरक्षण का फायदा मिलना चाहिए, वे धर्मान्धता में उलझा दिए गए हैं, जाहिर है कि ऊपर जाकर केन्द्रीय विश्वविद्यालयों से लेकर ऊंची पढ़ाई तक में उनकी कुर्सियां खाली हैं। कांवर से केन्द्रीय विश्वविद्यालय की प्रोफेसरी तक का सफर आसान तो हो नहीं सकता है। और अब ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग को चुनावी घोषणापत्र में इस सामाजिक सच्चाई की जानकारी भी उम्मीदवारों से मांगकर मतदाताओं को देना चाहिए कि उम्मीदवार के बच्चे किन स्कूल-कॉलेजों में पढक़र किन विश्वविद्यालयों तक पहुंचे हैं, और अब क्या कर रहे हैं। इस जानकारी को पाकर हो सकता है कि ऐसे नेताओं के फतवों पर अपनी जवानी उन्मादी-कुर्बानी में झोंकने के बजाय लोग यह सोच सकेंगे कि नेताओं के बच्चे क्यों कांवड़ यात्रा में नहीं हैं, क्यों फौज में नहीं हैं। 

धर्म और जाति ये दो ऐसे बड़े मुद्दे हैं जिन्हें छेडक़र पूरी की पूरी नौजवान पीढ़ी को सडक़ों पर लाया जा सकता है, उनके हाथों को किताबों और कम्प्यूटर से दूर करके, उनमें धार्मिक झंडे-डंडे थमाए जा सकते हैं, और उन्हें इस अफसोस या मलाल से स्थाई रूप से मुक्त रखा जा सकता है कि वे अच्छी पढ़ाई और अच्छी नौकरी क्यों नहीं पा सकते। आज की यह बात कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है, यह विशुद्ध रूप से, और पूरी तरह एक सामाजिक मुद्दा है, और समाज के अलग-अलग तबकों को अपनी हकीकत, और अपनी जगह समझनी होगी। देश में जाति जनगणना के बाद यह सवाल और तल्खी से उठेगा, और इस जनगणना के सवालों में आदिवासियों को किधर गिना जाएगा, उन्हें अलग-अलग धर्मों में, या अलग-अलग जातियों में गिना जाएगा, या जैसा कि आदिवासियों के बीच से लंबे समय से यह मांग हो रही है कि उनके लिए एक सरना कोड लागू किया जाए, वैसा कुछ होगा? 

इन तमाम बातों से परे यूपी के लखनऊ की एक खबर आई है जहां सरकार के किसी संपूर्ण समाधान दिवस शिविर में अफसरों के सामने एक बुजुर्ग महिला ने अपनी भयानक जिंदगी रखी, और बताया कि उसके पति का 25 साल पहले निधन हो गया, तो गांव के ही अशोक और अनमोल तिवारी घर आए, और उसके 10 साल के बेटे राममिलन को यह कहकर उठा ले गए कि उसके दादा ने तीन सौ रूपए उधार लिए थे, जिसे अपनी जिंदगी में उसका बेटा, यानी इस बच्चे का बाप अदा नहीं कर सका, इसलिए अब 10 साल का यह लडक़ा उनके पास मजदूरी करेगा। इस बूढ़ी महिला का कहना है कि 25 साल से उसके बेटे को बंधक बनाकर उससे मजदूरी करवाई जा रही है, और इस महिला को मरा हुआ दिखाकर उसका मकान बेच डाला, और अब परिवार की जमीन को भी हड़पने की तैयारी है। यह देश में एक सबसे ताकतवर मानी जाने वाली योगी सरकार के राज का हाल है। 

इस देश के मीडिया से अधिक उम्मीद नहीं करनी चाहिए क्योंकि उसके मालिकाना हक से लेकर उसमें समाचार-विचार लिखने वाले, और उनके ऊपर के फैसले लेने वाले लोगों में एसटी-एससी, और ओबीसी गिनती के हैं। इसके लिए किसी जाति-जनगणना की जरूरत भी नहीं है, अखबारी पन्नों पर, और टीवी के समाचार बुलेटिनों में, मालिक, संपादक, लेखक-पत्रकार, और रिपोर्टर-एंकर के जितने नाम आते हैं, उन नामों को ही लिखते चलिए, और अपने सामान्य ज्ञान के आधार पर उनके जात-धरम की गिनती कर लीजिए। फिर देश की आबादी में इन जात-धरमों का अनुपात देखकर हिसाब लगा लीजिए कि क्या विचारों के कारोबार में वंचित तबकों को कोई हक मिलता है? तो इस हिसाब-किताब के बाद आपका केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों के खाली पदों, और निजी विश्वविद्यालयों में एसटी-एससी, ओबीसी के अनुपात का दर्द जाता रहेगा। अधिक बुरा हाल देखकर उससे कुछ कम बुरा हाल भी अच्छा लगने लगता है, भारत में यही सामाजिक हकीकत है, लेकिन इसके ठीक-ठीक अहसास, और इससे आजादी पाने की भी जरूरत है। अगर सचमुच ही लोकतांत्रिक-न्याय की बात करें, तो इस सोच में क्या बुराई है कि सरकारी नौकरियां उन्हीं को मिलें जो सरकारी स्कूलों में पढ़े हैं?

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अगस्त 2025



 

फौज की पोशाकों से अर्धनारीश्वर बनना!

24 अगस्त 2025 

 

अभी अमिताभ बच्चन के एक लोकप्रिय कार्यक्रम कौन बनेगा करोड़पति में विशेष आमंत्रित मेहमानों के दर्जे में भारतीय फौज की उन महिला अधिकारियों को अमिताभ के सामने बिठाया गया जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मीडिया को ब्रीफ किया था। उस बात की भी कुछ लोगों ने आलोचना की थी कि फौज की जिम्मेदारियों का इस तरह से लोक-लुभावनीकरण नहीं किया जाना चाहिए। खैर, वह बात आई-गई हुई, अब दिल्ली में मिस यूनिवर्स बनी स्मृति छाबड़ा का एक ऐसा वीडियो सामने आया है जिसमें वे कर्नल सोफिया कुरैशी, और विंग कमांडर व्योमिका सिंह दोनों को टू-इन-वन दिखा रही हैं। वे भारत के प्रतीक, शायद इंडिया-गेट की प्रतिकृति के नीचे एक फौजी यूनिफॉर्म पहनकर परेड के अंदाज में चलकर आती हैं, और फौजी सलामी देती हैं। इसमें एक बड़ी दिक्कत यह है कि वे जो यूनिफॉर्म पहने दिखती हैं, वह शिव के अर्धनारीश्वर रूप की तरह आधी थलसेना की है, और आधी वायुसेना की। कोई और कार्यक्रम रहता, मिस यूनिवर्स किसी और धर्म की रहती, तो अब तक उसका किसी पड़ोसी देश का वीजा बन गया रहता। अब सवाल यह उठता है कि लोकप्रियता के लुभावने अभियानों में फौज का कितना इस्तेमाल करना चाहिए? 

दुनिया भर में फौज की टीमें उनका हौसला बरकरार रखने के लिए, उन्हें फिटनेस की तरफ बढ़ाने के लिए तरह-तरह के रोमांचक अभियानों में लगाई जाती हैं। कहीं वे पर्वतारोहण करती हैं, कहीं वे समंदर पर अकेले बोट के सफर पर चली जाती हैं। लेकिन इसका रोमांच और हौसले से सीधा लेना-देना रहता है। फौज के लोग आमतौर पर स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस की परेड जैसे कार्यक्रमों तक सीमित रखे जाते हैं। ऐसे में कौन बनेगा करोड़पति तक फौज का जो विस्तार हुआ, वह मिस यूनिवर्स की रैम्पवॉक-परेड तक बिखर गया। कुछ लोगों को इसमें कुछ भी गलत नहीं लगेगा, लेकिन जिस फौज को अपनी संवेदनशील भूमिका को ध्यान में रखते हुए अपने दायरे को सीमित रखना चाहिए, जिसे सोशल मीडिया से भी दूर रहने को कहा जाता है, इधर-उधर दोस्ती करने से भी जिसे रोका जाता है, उसे, या उसकी वर्दी को अर्धनारीश्वर की तरह पेश करना फौज की गंभीरता को कम करना है या नहीं, उस बारे में भी सोचना चाहिए। अभी वह विवाद तो खत्म हुआ ही नहीं है जिसमें मध्यप्रदेश के एक भाजपा मंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर की मीडिया प्रभारी कर्नल सोफिया को मंच से चीख-चीखकर आतंकियों की बहन कहा था, और जो सुप्रीम कोर्ट की बड़ी कड़ी फटकार के बाद भी माफी मांगने के लिए भी तैयार नहीं हैं। 

फौज को लेकर न तो कोई राष्ट्रवादी उन्माद जायज है, और न ही फौज का कोई मनोरंजक इस्तेमाल। फौज को उसकी पूरी जरूरी-गंभीरता के साथ अलग-थलग रहने देना चाहिए। देश वैसे भी इस विवाद को बरसों से झेल रहा है कि फौज से निकलने के बाद अफसरों का तुरंत ही राजनीति में आ जाना, और चुनाव लडऩा कितना जायज है, और कितना नहीं। यह बात सिर्फ फौजी अफसरों के लिए हो रही हो ऐसा भी नहीं है, यह बात जजों के बारे में भी हो रही है कि एक दिन पहले तक राजनीतिक रूझान वाले मामलों पर सक्रियता से फैसले देने वाले जज कार्यकाल के बीच इस्तीफा देकर अगले दिन एक राजनीतिक दल में आ जाएं, और उसके उम्मीदवार बनकर चुनाव भी लड़ लें। फौज हो या अदालत, इनको घरेलू जमीन पर, और अपने दायरे में किसी लगाव या दुराव से परे रहना चाहिए। एक वक्त था जब सरहद पर जवानों के मनोरंजन के लिए सुनील दत्त और नरगिस जैसे कलाकार लगातार वहां जाते थे। अब फौजी अफसर ऑपरेशन सिंदूर के बारे में बोलने के लिए देश के सबसे बड़े, और खालिस बाजारू टीवी कार्यक्रम पर जा रहे हैं। इस सिलसिले की संवेदनशीलता हो सकता है कि बहुत लोगों को समझ भी न आए क्योंकि आम जनता जटिल पहलुओं को समझने से अपने आपको आजाद रखती है, और यह भी मानकर चलती है कि किसी जटिलता का अस्तित्व भी नहीं है। लेकिन जब जिंदगी के किसी एक दायरे में किसी संवेदनशील सरहद को पार किया जाता है, तो उसकी मिसाल का कई और जगहों पर बेजा इस्तेमाल भी होता है। 

जिस तरह आईएएस अफसरों पर यह बंदिश रहती है कि वे नौकरी छोडऩे के बाद कुछ वक्त तक किसी निजी कंपनी में काम नहीं कर सकते। यह बंदिश तो रहती ही है कि जिस कंपनी से उनका सरकारी नौकरी में रहते हुए कोई वास्ता पड़ा हो, वहां तो तुरंत बिल्कुल ही नहीं जा सकते। ऐसे में अभी जब कुछ अरसा पहले एक केन्द्रीय जांच एजेंसी का एक अफसर नौकरी छोडक़र तुरंत ही देश की एक सबसे बड़ी, और खासी विवादास्पद कंपनी में चले गया तो भी लोगों ने जायज और नाजायज के सवाल उठाए। आखिर में हम इसी बात को दोहराना चाहते हैं कि फौज और अदालत जैसी जगहों से निकलकर, या इन जगहों पर रहते हुए भी लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि वे कहां जा रहे हैं, क्या कर रहे हैं, या क्या कह रहे हैं। लोकतंत्र में जो महत्वपूर्ण संस्थान हैं, उन्हें विवादों से एकदम ही दूर रहना चाहिए।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अगस्त 2025



 

स्कूलों में चाकू-पिस्तौल, गुजरात से लेकर छत्तीसगढ़, और उत्तराखंड तक एक हाल

23 अगस्त 2025 

 

दो दिन पहले गुजरात की राजधानी अहमदाबाद के एक स्कूल में 8वीं के छात्र ने 10वीं के छात्र को चाकू मार दिया और उसकी मौत के बाद स्कूल में घुसकर लोगों ने जमकर तोडफ़ोड़ की। चाकू मारने वाले इस छात्र के मोबाइल फोन से दूसरे छात्र की बातचीत भी सामने आई है जिसमें मौत की खबर मिलने पर भी यह चाकूबाज लडक़ा बेफिक्र रहता है। आज गुजरात के एक और जिले में चाकूबाजी हुई, वहां भी 8वीं के छात्र ने 10वीं के एक छात्र को चाकू घोंप दिया, और घायल लडक़ा अस्पताल में है। लेकिन गुजरात ऐसा अनोखा राज्य नहीं है, छत्तीसगढ़ में रायपुर, बिलासपुर जैसे कई शहरों में स्कूलों में चाकूबाजी धड़ल्ले से चल रही है, और कहीं उसके वीडियो सामने आते हैं, तो कहीं खून से लहूलुहान छात्रों की तस्वीरें आती हैं। उत्तराखंड की एक अलग खबर है कि 9वीं कक्षा का एक छात्र होमवर्क पूरा न करने पर टीचर की डांट से खफा था, और वह घर से टिफिन में देसी पिस्तौल लेकर गया, और उस टीचर पर गोली चलाकर उसे जख्मी कर दिया। टीचर अभी अस्पताल में है, और छात्र स्कूल छोडक़र भाग गया। 

यहां पर दो चीजें अलग-अलग चर्चा के लायक हैं, पहली तो यह कि स्कूली छात्रों के बीच हिंसा इतनी क्यों बढ़ रही है? दूसरी बात यह कि स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राओं से परे भी चाकू का इतना इस्तेमाल क्यों हो रहा है? इन दोनों के पीछे सोशल मीडिया पर डाली जा रही रील का भी असर है, पेशेवर मुजरिमों से लेकर शौकिया शेखी बघारने वाले लोगों तक को वीडियो बना-बनाकर जगह-जगह पोस्ट करना इतना पसंद है कि लोग अपने खुद के जुर्म के वीडियो डाल रहे हैं, यह जानते-समझते कि ऐसे ही वीडियो पर कार्रवाई करना पुलिस के आसान इसलिए हो जाता है कि वे सीधे-सीधे सुबूत भी रहते हैं, और जहां से पोस्ट किए गए हैं, वे फोन नंबर या इंटरनेट कनेक्शन भी तुरंत ही पुख्ता सुबूत बन जाते हैं। हर दिन ऐसे कई लोग गिरफ्तार होते हैं, और उससे सैकड़ों गुना अधिक लोग अपने ऐसे ही जुर्म पोस्ट करते रहते हैं। शायद समाज में हिंसक ताकत का ऐसा प्रदर्शन एक फैशन बन गया है, और इन दिनों इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया पर अपनी रील बना-बनाकर डालने वाले स्कूली बच्चों से लेकर नौजवान और अधेड़ लोगों तक को अपने जुर्म के वीडियो भी शान का सामान लगते हैं। हर दिन आवारा और मवाली लडक़ों के वीडियो आते रहते हैं जिनमें वे पिस्तौल और चाकू दिखाते हुए, अपने आपको डॉन कहते हुए दिखते हैं, और कमउम्र के या नौजवान बाकी लोगों पर भी ऐसी ही हरकत करने का एक मानसिक दबाव बन जाता है। फिर कब सिर्फ वीडियो के लिए लाए गए चाकू-कट्टा असल हिंसा का सामान बन जाते हैं, यह पता भी नहीं चलता। 

स्कूल के छात्रों के बीच हिंसा इतनी बढऩे की दो वजहें हमें और लगती हैं। जिन राज्यों में पढ़ाई-लिखाई से जिंदगी में आगे बढऩे का बहुत अधिक लेना-देना नहीं रहता है, वहां पर मां-बाप की छाती पर मूंग दलते हुए टीनएजर्स और नौजवान स्कूल-कॉलेज में जाते जरूर हैं, लेकिन उनके सामने पढ़ाई के लिए कोई प्रेरणा नहीं रहती। पढ़-लिखकर क्या होगा जब नौकरी के लिए तो रिश्वत देनी ही होगी! ऐसी सोच में जीने वाले लडक़े-लड़कियों के बीच हिंसा आसानी से पनप जाती है, और हिंसा से परे के दूसरे किस्म के जुर्म भी। अभी हमारे पास उत्तर भारत, या हिन्दी राज्यों के स्कूली छात्रों के जुर्म के आंकड़ों की दक्षिणी राज्यों से तुलना नहीं है, लेकिन फिर भी ऐसा लगता है कि जिन राज्यों में पढ़ाई-लिखाई का आगे की जिंदगी से सीधा रिश्ता रहता है, वहां स्कूल-कॉलेज की उम्र में इस तरह के जुर्म कम होते होंगे क्योंकि पढ़ाई उनके लिए मायने रखती है।

दूसरी बात यह भी लगती है कि सरकारी या गैरसरकारी, किसी भी किस्म की स्कूलों में अब शिक्षकों का छात्र-छात्राओं से पहले सरीखा रिश्ता नहीं रह गया है। अब क्लासरूम की पढ़ाई से परे बहुत अधिक मेहनत करना शिक्षक-शिक्षिकाओं के लिए जरूरी नहीं है, बल्कि मेहनत करने का नतीजा दिख रहा है कि किस तरह होमवर्क के मुद्दे पर टीचर को गोली खानी पड़ी है। कुछ बहुत महंगी निजी स्कूलों में तो परामर्शदाता रहते भी होंगे, लेकिन अब सरकारी स्कूलों में तो जहां शिक्षक भी पूरे नहीं हैं, हैं तो वे दारू पीकर पड़े हैं, ठेके पर दूसरे को पढ़ाने के लिए रख लिया है, लड़कियों से छेडख़ानी कर रहे हैं, तो वे छात्र-छात्राओं को हिंसा के प्रति क्या जागरूक करेंगे? एक किस्म से स्कूली उम्र के बच्चे न मां-बाप के काबू के रह जाते, और न स्कूल के। वे बस अपने हमउम्र बच्चों के साथ बुरी आदतें सीखने के लिए आजाद रहते हैं, और उनमें से कुछ तब पकड़ाते हैं जब वे कोई बड़ा जुर्म कर बैठते हैं। वरना इसी उम्र के लडक़े-लड़कियों के बीच सेक्स के जुर्म होते हैं, वीडियो बनाकर ब्लैकमेलिंग चलती है। 

भारत में आज सरकारों की प्राथमिकता जुर्म दर्ज होने के बाद जांच और सजा तक सीमित है, या फिर महापुरूषों की जीवनियां पढ़ाने तक। ये बच्चे आज मोबाइल की मेहरबानी से हर दिन कई घंटे जिन सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स पर गुजारते हैं, वहां पर इन्हें दिखने वाली सामग्री पर सरकार या समाज का कोई काबू नहीं है। और तो और जो कमउम्र बच्चे स्कूटर-मोटरसाइकिलों पर स्कूल जाते हैं, उन पर हेलमेट अनिवार्य करने जैसी मामूली सी बात भी स्कूल लागू नहीं करते, और सरकार उस पर कोई कार्रवाई नहीं करती। ट्रैफिक-नियम तोडऩे से जो दुस्साहस मिलता है, वह बाकी-कानून तोडऩे तक, और जुर्म करने तक जारी रहता है, और कोई अगर यह सोचे कि छात्रों के बीच चाकूबाजी को मैटल डिटेक्टर लगाकर रोका जा सकता है, तो वह गलतफहमी होगी। कानून की इज्जत किस्तों या कतरों में नहीं आती, वह आती है तो मिजाज में आती है, नहीं तो फिर दूर चली जाती है। इसलिए राज्य सरकारों को, या कि निजी स्कूल संचालकों को अपने छात्र-छात्राओं के बीच कानून के सम्मान का मिजाज ही बनाना पड़ेगा, उन्हें हेलमेट जैसी छोटी चीज से भी कानून की इज्जत सिखानी होगी, वरना बढक़र वह चाकूबाजी तक पहुंच रही है। सरकारों को पुलिस और अदालत से परे भी इस बारे में सोचना होगा, वरना यह सिलसिला बढ़ते ही चलेगा। अब तो बहुत सारे लोग अपनी हिंसा के वीडियो पोस्ट करते हुए यह परवाह भी नहीं करते कि यह उनके जुर्म का पुख्ता सुबूत भी है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 अगस्त 2025



 

कुत्तों पर सुप्रीम फैसला पलटा, अब सडक़ें उनकी

22 अगस्त 2025 

 

देश भर में सडक़ और फुटपाथ के कुत्तों के बारे में पिछले पखवाड़े सुप्रीम कोर्ट का फैसला आज एक बड़ी बेंच ने पलट दिया है। दो जजों की बेंच ने 11 अगस्त को दिल्ली-एनसीआर इलाके की म्युनिसिपलों, और सरकारों को कहा था कि सडक़ों से तमाम कुत्तों को उठाकर उन्हें बनाए गए बाड़ों में रखा जाए, और वापिस नहीं छोड़ा जाए। जजों ने सडक़ों पर बच्चों और आम लोगों को कुत्तों द्वारा बहुत बुरी तरह काटने की घटनाओं पर फिक्र जाहिर करते हुए यह कड़ा फैसला दिया था, जिस पर पशुप्रेमियों ने सार्वजनिक प्रदर्शन भी किया, और सुप्रीम कोर्ट तक दुबारा दौड़ भी लगाई। जनभावनाओं को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश ने तीन जजों की एक नई बेंच बनाई, जिसने आज सुबह फैसले को पलटकर यह कहा कि कुत्तों को जिस इलाके से उठाया जाए, उसी इलाके में नसबंदी-टीकाकरण के बाद उन्हें वापिस छोड़ा जाए। इससे परे अदालत ने यह भी कहा कि हर इलाके में फुटपाथी कुत्तों को खाना खिलाने की जगह तय की जाए, और उस जगह के अलावा दूसरी जगहों पर उन्हें खाना देने पर जुर्माना लगाया जाए। 

अदालत का यह फैसला दिल्ली शहर में पशुप्रेमियों के प्रदर्शन, विरोध, और उनके रोने-धोने के वीडियो की प्रतिक्रिया दिखता है। वैसे तो सुप्रीम कोर्ट में किसी भी आदेश या फैसले को अधिक बड़ी बेंच पलट सकती है, और ऐसा बहुत से मामलों में होता है, लेकिन यह फैसला उन लोगों के असर में, उन लोगों द्वारा लिया हुआ है जो कि कारों में चलते हैं। जो गरीब और आम लोग सडक़ों पर पैदल चलते हैं, साइकिल या किसी और दुपहिया पर चलते हैं, या विकलांग हैं, और बैसाखियों के साथ चलते हैं, उन्हें इस फैसले से निराशा होगी, क्योंकि उन पर हिंसक कुत्तों का खतरा मंडराता ही रहेगा। पिछले पखवाड़े का फैसला दिल्ली-एनसीआर इलाके के लिए दिया गया था, आज के फैसले को पूरे देश के लिए लागू किया गया है, और सभी राज्यों को अदालत ने निर्देश भेज दिए हैं। 

पशुप्रेमियों के तर्क यह है कि सार्वजनिक जगहों पर कुत्तों की मौजूदगी हमेशा से रहती आई है, और वे समाज का हिस्सा हैं, उन्हें कैदी की तरह किसी बाड़े में नहीं रखा जा सकता। राहुल गांधी भी दिल्ली के कार सवार तबकों की तरह कुत्तों पर रोक के खिलाफ खुलकर सामने आए हैं। दूसरी तरफ आम जनता का हाल यह है कि उसे कुत्ते दौड़ा रहे हैं, काट रहे हैं, और आम लोग सार्वजनिक जगहों का इस्तेमाल कई मायनों में नहीं कर पाते हैं। हमने पिछले फैसले की तारीफ की थी, और उसे देश भर में लागू करने की वकालत की थी। आज का यह फैसला उसके ठीक खिलाफ है। (ऐसे में आज फिर इस पर लिखते हुए यह साफ कर देना जरूरी है कि इस संपादक को अभी कुछ हफ्ते पहले सडक़ के कुत्ते ने काटा, और उसके बाद एक महीने में पांच इंजेक्शन लगवाने पड़े। चूंकि कॉलोनी के उसी हिस्से में 50-60 और कुत्ते हैं जिन्हें खिलाने के लिए लोग आते ही रहते हैं, इसलिए इस हादसे के बाद इस संपादक का शाम-रात उस इलाके में रोज घंटे-दो घंटे पैदल चलने का सिलसिला पूरी तरह खत्म हो गया है क्योंकि अगर बारी-बारी से हर कुत्ता काटना तय करेगा, तो बाकी पूरी जिंदगी हर हफ्ते इंजेक्शन में ही गुजरेगी। )

हम अपने अखबार में सोशल मीडिया पर पोस्ट एक विकलांग आंदोलनकारी का एक लेख आज ही छाप रहे हैं कि बैसाखियों पर चलने वाले लोगों को कुत्तों से किस तरह खतरा रहता है, और उनके हमले से गिर जाने के बाद वे अपने आपको बचा भी नहीं पाते हैं। कुछ ऐसा ही हाल बच्चों, और बुजुर्गों पर कुत्तों के झपटने से होता है, वे भी अपने को नहीं बचा पाते। साइकिल और दूसरे दुपहियों पर चलने वाले लोगों के पीछे कुत्ते कई बार दौड़ते हैं, और संतुलन और आपा खोकर ऐसे लोग गिरते हैं। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इन सबकी सडक़ों पर मौजूदगी की गारंटी कर दी है, तो लोग अपने आपको बचाकर चलें, बचा नहीं सकते, तो फिर न चलें, क्योंकि अब तो टेलीफोन और मोबाइल एप्लीकेशन से हर चीज घर पर बुलाई जा सकती है, हालांकि कुत्तों के काटने के बाद लगने वाले एंटीरैबीज इंजेक्शन की डोर-डिलीवरी अभी शुरू नहीं हुई है।

जिन लोगों को यह लगता है कि कुत्ते हमेशा से समाज का हिस्सा रहे हैं, उन्हें इतिहास पढऩा चाहिए कि इंसानों ने एक जंगली जानवर को पालतू और घरेलू बनाकर उन्हें आज के कुत्तों की तरह ढाला था। लेकिन वे कुत्ते सार्वजनिक नहीं होते थे, वे उनके परिवार का हिस्सा होते थे, शिकार पर उनका साथ देते थे, उनके जानवरों की रखवाली करते थे। आज भारत के तमाम शहर, गांव-कस्बों में जो खतरा है, वह पालतू कुत्तों से नहीं है, वह सडक़ों के कुत्तों से है, जो कि समाज का हिस्सा नहीं बनाए गए थे, घरों से निकाल दिए जाने पर, या बेकाबू आबादी बढऩे पर वे बढ़ते चले गए, और आज कोई भी इंसान उनके लिए जवाबदेह नहीं हैं। यह सिलसिला खतरनाक है, और सुप्रीम कोर्ट के जजों ने शायद बहुत पहले से सार्वजनिक सडक़ों पर रोज का काम पैदल करना छोड़ दिया है। फौलादी कारों के भीतर झपटते कुत्तों के जबड़ों की धार का पता नहीं चलता है।  

किसी भी रिहायशी बस्ती में घूमने निकलने वाले लोगों, या कामकाज से आने-जाने वाले लोगों की जिंदगी ऐसे कुत्तों की वजह से खतरे में है, वे आशंका में भरे हुए किसी इलाके में जाते हैं, और सरकारी अस्पतालों में कई जगह इंजेक्शन नहीं रहते, और रहने पर भी उन्हें लगवाने के लिए लोगों को घंटों का वक्त लगता है। जो गरीब और मजदूर लोग हैं, उनके लिए पांच-पांच बार अस्पताल जाना भी आसान नहीं रहता है। सुप्रीम कोर्ट ने आज के अपने फैसले में सडक़ों पर कुत्तों को खिलाने के खिलाफ हिदायत दी है, लेकिन यह आदेश अमल के लायक नहीं है। आज जब सडक़ों पर हो रहे दंगे-फसाद को रोकने के लिए भी पुलिस नाकाफी है, ट्रैफिक को पुलिस देख नहीं पा रही है, म्युनिसिपलें शहरों को साफ नहीं कर पा रही हैं, हाईवे पर हादसों में इंसान और जानवर थोक में मर रहे हैं और हाईकोर्ट भी कुछ नहीं करवा पा रहा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के लिए तो यह कहना आसान है कि तय की हुई जगहों पर ही लोग कुत्तों को खिलाएंगे, और बाकी सडक़ों पर नहीं खिलाएंगे। इस बात पर अमल कौन करवा सकते हैं? और घने बसे हुए शहरों के बीच में कुत्तों को खिलाने के लिए जिस जगह को तय किया जाएगा, उसके आसपास के लोगों के लिए जो नया खतरा खड़ा होगा, जो नई दिक्कत खड़ी होगी, उसका सुप्रीम कोर्ट क्या इलाज करेगा? कुत्तों को सडक़ों से हटाने, उनकी लगातार नसबंदी करने, और दूसरे तरीकों से उनकी आबादी बढऩा रोकने के अलावा और कोई चारा नहीं है। पशुप्रेमियों को चाहिए कि जब तक सरकारी कोशिशों से आबादी कम नहीं होती तब तक वे अपने घर-परिवार में सडक़ के कुछ कुत्तों को ले जाएं, और उन्हें वहां पालें। वे खुद कारों में घूमें, और गरीब लोगों को कुत्तों के रहमोकरम पर धकेल दें, यह नाजायज बात है। 

कुत्ते समाज में चाहे जो जगह रखते आए हों, आज अगर वे पालतू नहीं हैं, उनके लिए कोई व्यक्ति जिम्मेदार नहीं हैं, तो उन्हें आम जनता पर इस तरह छोड़ देना उस जनता के सार्वजनिक जीवन के हक के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट ने जितनी कागजी बातें कही हैं, उनका भारत में सरकार और म्युनिसिपलों की हकीकत के साथ कोई रिश्ता नहीं है। सडक़ों पर आज मंडराता खतरा जारी रहेगा, और कुत्तों की बढ़ती हुई आबादी लगातार खतरा भी बढ़ाती रहेगी। हो सकता है कि पांच-दस साल बाद कुछ जजों को कुत्ते काटें, तो उसके बाद उन्हें आम जनता की तकलीफ का अहसास हो।  

(Daily Chhattisgarh)

राज्यपाल-राष्ट्रपति पर समय सीमा के खिलाफ सरकारी लड़ाई कहां तक?

 21 अगस्त 2025 

 

सुप्रीम कोर्ट में इस बात पर बहस चल ही रही है कि किसी विधानसभा के पास किए हुए विधेयक को रोकने का अधिकार राज्यपाल और राष्ट्रपति के पास कितने समय के लिए होना चाहिए? यह बहस सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से आगे बढ़ी जिसमें अदालत ने इसके लिए तय किया कि राज्यपाल और राष्ट्रपति एक समय सीमा के भीतर विधेयकों पर फैसला लें। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल और राष्ट्रपति के अभी तक के चले आ रहे असीमित अधिकारों की एक सीमा तय की। और इसी के साथ तमिलनाडु के जिस मामले को लेकर यह सुनवाई चल रही थी, वहां भी एनडीए के मनोनीत राज्यपाल हैं, राज्य सरकार केन्द्र की एनडीए सरकार के खिलाफ है, और यह बात केन्द्र सरकार को बहुत ही बुरी तरह खल गई कि राज्यपालों को बरसों तक विधेयकों पर बैठने का हक नहीं मिले। इसे लेकर मामला जब राष्ट्रपति तक पहुंचा, और सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि राष्ट्रपति भी तीन महीने के भीतर राज्यपाल के भेजे हुए ऐसे किसी विधेयक पर फैसला ले लें, तो फिर राज्यपाल की तरफ से भी सुप्रीम कोर्ट से इस मामले पर राय ली गई, और केन्द्र सरकार ने तो अदालत में इसका बहुत जमकर विरोध किया कि यह अदालत के अधिकार क्षेत्र में ही नहीं है कि वह राज्यपाल और राष्ट्रपति के फैसलों की समय सीमा तय करे। 

कुछ महीने पहले जब सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आया था, उस वक्त भी हमने उसकी तारीफ में जमकर लिखा था कि राज्यपाल हो या राष्ट्रपति, उनके अधिकार कहीं भी अलोकतांत्रिक नहीं हो सकते। ये दोनों ओहदे तो बने ही लोकतंत्र के तहत हैं, और भारत का संविधान भी लोकतंत्र के तहत ही बना है। संविधान लोकतंत्र से ऊपर नहीं है, और इसीलिए समझदार लोग इस बात को कहते हैं कि संविधान के शब्दों के साथ-साथ उसकी एक भावना भी होती है। केन्द्र सरकार राज्यपाल और राष्ट्रपति के अधिकारों को असीमित बनाने के लिए अदालत में बहुत ही अलोकतांत्रिक, और हास्यास्पद तर्क दे रही है। जिस पर अभी सुनवाई चलते बीच ही हम एक बार फिर लिख रहे हैं, ताकि पाठकों के सामने इस बहुत महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दे पर हम अपनी सोच और समझ सामने रख सकें। सुप्रीम कोर्ट में कल इस पर चल रही बहस के दौरान केन्द्र सरकार के वकील ने कहा कि राज्यपाल के पास से बिल को मंजूरी नहीं मिलने का मतलब है कि वह बिल समाप्त हो गया। पांच जजों की संविधानपीठ ने इस पर कहा कि अगर विधेयक लौटाए बिना राज्यपाल रोककर अंतहीन रख सकते हैं, तो इसका मतलब तो यह हो जाएगा कि जनता के द्वारा निर्वाचित सरकारें अब राज्यपाल की मर्जी से चलेंगी। मुख्य न्यायाधीश ने केन्द्र सरकार के वकील से पूछा कि जो सरकार कह रही है उसका मतलब तो यह है कि बहुमत से चुनी गई सरकार राज्यपाल की मनमानी की मोहताज होगी। बेंच के एक जज ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि राज्यपाल अनुमति देने से इंकार करें, और विधेयक खत्म हो जाए। इस पूरे मामले पर ऐसी दिलचस्प बहस चल रही है कि आम लोगों को भी खबरों में उसे पढऩा चाहिए, या अगर वे अंग्रेजी समझ सकते हैं, और सुप्रीम कोर्ट की इस मामले की कार्रवाई का प्रसारण हो तो उसे देखना चाहिए।

हम तो लोकतंत्र की भावना को लेकर अपनी पिछली बात को दुहरा भी रहे हैं, और आगे भी बढ़ा रहे हैं कि राज्यपाल हो या राष्ट्रपति, उन्हें लोकतंत्र में तानाशाह के हक नहीं दिए जा सकते। भारत की संवैधानिक व्यवस्था को समझने की जरूरत है। राज्यपाल पूरी तरह से केन्द्र सरकार के मातहत काम करते हैं, और संवैधानिक रूप से उन्हें कागजों पर राष्ट्रपति के प्रति जवाबदेह भी बताया जाता है। यह बात बिल्कुल साफ-साफ लिखी गई है कि राष्ट्रपति के कोई भी फैसले केन्द्रीय मंत्रिमंडल के लिए गए फैसलों के मुताबिक ही रहते हैं। ऐसे में जाहिर है कि राज्यपाल जो कि केन्द्र सरकार द्वारा मनोनीत रहते हैं, केन्द्र सरकार को रिपोर्ट करते हैं, केन्द्र के प्रति जवाबदेह रहते हैं, वे केन्द्र सरकार के ही एक किस्म से एजेंट रहते हैं जो कि अंग्रेजीराज में रहते थे। जहां कहीं राज्य की निर्वाचित सरकार केन्द्र की निर्वाचित सरकार से असहमति वाली रहती है, वहां पर राज्यपाल तिकड़म के खेल खेलते हैं, सरकारों को अस्थिर करने का काम करते हैं, दलबदल के खेल में वे खेल प्रशिक्षक बनकर मैदान को सुबह पांच बजे भी खोल देते हैं, जैसा कि महाराष्ट्र में हुआ था। भारत की लोकतांत्रिक संवैधानिक व्यवस्था में राज्यपाल और राष्ट्रपति ये दोनों ही केन्द्र सरकार की मर्जी से काम करते हैं, और इनके ओहदों को सुर्खाब के कितने ही पर खोंस दिए जाएं, ये केन्द्र के मनोनीत रहते हैं, और केन्द्र के ताबेदार रबरस्टाम्प रहते हैं। इनके रहमोकरम पर निर्वाचित सरकार और विधानसभा के भेजे गए विधेयकों को छोडऩे का मतलब उन्हें सीधे-सीधे केन्द्र सरकार के रहमोकरम पर छोड़ देना है। 

अगर सुप्रीम कोर्ट के जजों का बहुमत लोकतंत्र का सम्मान करेगा, तो केन्द्र सरकार की सारी आपत्तियों को सिरे से खारिज कर देगा। लेकिन पूरी दुनिया में जगह-जगह जब सरकारों की दखल जज बनाने में रहती है, तो जजों की दिलचस्पी उन सरकारों की पसंद-नापसंद से जुड़ जाती है। भारत के सुप्रीम कोर्ट के जजों के बारे में हम अलग से कोई बात कहना नहीं चाहते, लेकिन बहुत से ऐसे मुख्य न्यायाधीश हुए हैं, या दूसरे जज हुए हैं जिनकी सरकार के प्रति एक खास रहमदिली की चर्चा होती ही रही है। अब पांच जजों की इस बेंच में बहुमत की रहमदिली लोकतंत्र के साथ है, या कि सरकार के साथ है, इसका कोई अंदाज हमें नहीं है। फिर भी केन्द्र सरकार आज देश के अधिकतर राज्यों में अपनी सरकारों को देखते हुए, और सौ फीसदी राजभवनों में अपने मनोनीत राज्यपालों की वजह से, अपनी बनाई हुई राष्ट्रपति को देखते हुए इन दो ओहदों को तानाशाह बनाने पर उतारू दिख रही है। यह सिलसिला कोई भी लोकतांत्रिक संवैधानिकपीठ खारिज करेगी ही। आने वाले हफ्तों या महीनों में इस मामले पर फैसला होगा, और यह भी हो सकता है कि उस फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट की किसी और बड़ी बेंच तक इसे ले जाया जाए क्योंकि केन्द्र सरकार जिस स्तर पर इस मामले को लड़ रही है, वह हार जाने पर यहीं पर थम नहीं जाएगी। यह मामला लोगों के लोकतांत्रिक-शिक्षण के लिए एक बहुत अच्छा मामला है, और आम लोगों को भी इस बहस में दिलचस्पी लेना चाहिए।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 अगस्त 2025



 

बिना नाम, 140 करोड़ का सोना तिरूपति में दान!

20 अगस्त 2025 

 

आन्ध्र के मुख्यमंत्री चन्द्राबाबू नायडू ने अभी एक बेनाम दानदाता के तिरूपति मंदिर को दिए गए दान की जानकारी दी जो कि शायद इस मंदिर को मिलने वाला एक सबसे बड़ा चढ़ावा है। उन्होंने बताया कि एक व्यक्ति ने भगवान वेंकटेश्वर से आशीर्वाद मांगकर कारोबार शुरू किया था, और उसमें उसे बड़ी कमाई हुई। उसने अपनी कंपनी के 60 फीसदी शेयर बेचे, और उससे उसे 6 हजार करोड़ रूपए मिले। उसने समाज और तिरूपति मंदिर का उपकार चुकाने के लिए मंदिर में करीब 140 करोड़ रूपए दाम का 121 किलो सोना दिया है। इस मंदिर में देव प्रतिमा को हर दिन सोने के जो गहने पहनाए जाते हैं, वे 120 किलो के रहते हैं, यह जानकार इस दानदाता ने उससे अधिक सोना दिया है, और अपना नाम भी नहीं बताया है। लोगों को यह बात पहले से पता भी होगी कि दक्षिण भारत में, और तिरूपति के दूसरे राज्यों में बसे भक्तों के बीच भी यह बात प्रचलन में है कि वे अपने कारोबार में भगवान वेंकटेश्वर को भागीदार बनाते और बताते हैं, और फिर कमाई का एक हिस्सा इस मंदिर को चढ़ा देते हैं। 

बिना वाहवाही और नाम कमाए कोई व्यक्ति अगर दान करे, तो उसका अधिक महत्व भी होता है। दुनिया में कई जगहों पर लोग दान तो करते हैं, लेकिन अपने या परिवार के नाम के ट्रस्ट बना लेते हैं, और फिर उसके मार्फत अपनी कमाई का एक हिस्सा समाज को देते हैं। लोगों को याद होगा कि किस तरह दुनिया के कुछ सबसे बड़े कारोबारी, वारेन बफेट और बिल गेट्स ने अपनी आधी, या उससे भी अधिक संपत्ति समाज के लिए देना तय किया, और वे लगातार दान देते चल रहे हैं। ये कारोबारी दुनिया के दूसरे अतिसंपन्न लोगों को भी इस बात के लिए हौसला देते हैं कि वे भी समाज को लौटाने का काम करें। भारत में भी कई ऐसे बड़े कारोबारी हैं जो अपनी संपत्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा समाज को दे रहे हैं, और खुद बहुत सादगी की जिंदगी जीते हैं। अजीम प्रेमजी ने हजारों करोड़ रूपए समाज पर बेहतरी के लिए खर्च करना जारी रखा है, और वे खुद विमान की इकॉनॉमी क्लास में चलते हुए देखे जाते हैं। वे अपनी दौलत का बहुत बड़ा हिस्सा शिक्षा पर खर्च कर रहे हैं, और उनका फाउंडेशन सात राज्यों में साढ़े तीन लाख स्कूलों में वे शिक्षकों को ट्रेनिंग देने का काम करता है, और उनके दान की रकम अविश्वसनीय किस्म की है। उनके मुकाबले इस देश में सैकड़ों गुना बड़े दौलतमंद भी अपनी जेब के कुछ सिक्कों जितना दान भी नहीं करते हैं। भारत में एक दिक्कत यह लगती है कि लोग, अधिकतर लोग धर्म के नाम पर ही जेब से पैसा निकालते हैं, किसी मंदिर, या किसी बाबा के लिए वे मोटा दान देने तैयार हो जाते हैं, लेकिन समाज के सबसे जरूरतमंद तबकों की सीधी भलाई के लिए कोई सामाजिक संगठन बनाने, या किसी साख वाले सामाजिक संगठन को सीधे दान देने वाले लोग कम हैं। इसलिए अजीम प्रेमजी सरीखे लोगों का एक ऐतिहासिक महत्व है, और वे हो सकता है कि देश के दूसरे अरब-खरबपतियों के लिए एक मिसाल भी बन सकें।

कल की ही खबर है कि अजीम प्रेमजी फाउंडेशन ने छत्तीसगढ़ सरकार के साथ एक एमओयू किया है जिसके तहत वह अंबिकापुर में और धरमजयगढ़ में अस्पताल बनाएगा, बालिकाओं को उच्च शिक्षा के लिए स्कॉलरशिप देगा, और अभी चलाए जा रहे चार सौ झूलाघरों को बढ़ाकर ढाई-तीन हजार झूलाघरों तक ले जाएगा। आज देश में किसी भी धर्म के दानदाताओं में अजीम प्रेमजी का योगदान बेमिसाल है, और इस बात से देश के जिन भी हमलावर तबकों को कोई नसीहत मिल सकती है, उन्हें लेनी चाहिए। इस मौके पर हम यह भी याद दिलाना चाहते हैं कि कई किस्म के संगठन जरा सी कोई सामाजिक मदद करके अपने ढेर सारा प्रचार जुटाते हैं। कहीं-कहीं से ऐसी तस्वीरें भी सामने आती हैं जिनमें अस्पताल में भर्ती मरीज को एक केला या सेब थमाते हुए दर्जन भर लोग अपनी फोटो खिंचवाते हैं। गरीबों की बहुत मामूली मदद का ऐसा अश्लील नगदीकरण करने वाले लोगों को वाहवाही की जगह धिक्कार मिलनी चाहिए, ऐसे लोगों को यह भी देखना चाहिए कि तिरूपति में कल 140 करोड़ का चढ़ावा चढ़ाने वाले ने अपना नाम भी उजागर करना पसंद नहीं किया। ऐसे लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि विमान की सबसे मामूली सीट पर सफर करने वाले अजीम प्रेमजी कितने बड़े दानदाता हैं, और कई देशों में अपने बेटे की शादी का जलसा मनाने वाले, उस एक शादी पर हजारों करोड़ रूपए खर्च करने वाले खरबपति का दान का क्या रिकॉर्ड है। चाहे अमरीका के अतिसंपन्न लोग हों, चाहे योरप के, उनमें से हजारों लोग इकट्ठे होकर अब अपनी सरकारों से यह मांग भी कर रहे हैं कि अतिसंपन्नता पर टैक्स बढ़ाना चाहिए क्योंकि आज क्षमता के बावजूद ऐसे लोगों पर टैक्स बहुत ही कम है। अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प सरीखे लोग बहुत बड़े कारोबारी होने के बाद भी इतनी तिकड़मों से टैक्स चुराते हैं कि अमरीकी अदालतों में उनके खिलाफ मामले बड़ी संख्या में चल रहे हैं। 

अच्छी समाजसेवा करने वाले कोई धर्मस्थान हों, धार्मिक संगठन हों, ऐसा बहुत कम होता है। इसलिए लोगों को बिना धार्मिक भावना के सीधे समाज सेवा करने वाले लोगों को, संगठनों को दान देना चाहिए, या उनके दान का आकार बहुत बड़ा हो, तो उन्हें अजीम प्रेमजी फाउंडेशन जैसी संस्था बनाकर दान का सद्उपयोग करना चाहिए। धर्म का दान अगर चर्च के रास्ते भी किसी देश पहुंचता है, तो बहुत से मामलों में वह धर्मांतरण में इस्तेमाल होता है। इसलिए धर्म का चक्कर ही बेकार है। लोगों को सीधे भरोसेमंद संगठन छांटने चाहिए, या खुद होकर मदद के लायक लोगों को ढूंढकर उनकी मदद करनी चाहिए। आपके पास अगर निजी जरूरतों से अधिक पैसा है, और उस पैसे का समाज के जरूरतमंद लोगों के लिए कोई इस्तेमाल नहीं हो रहा है, तो यह आपकी हिंसा के बराबर है। पैसे पर सांप के कुंडली मारकर बैठने की कहावत चलती है, लेकिन सांप को तो नाहक बदनाम किया जाता है, इंसान ही अधिकतर ऐसी कुंडली मारकर बैठते हैं। उनके मरने के बाद उनकी इज्जत कहावतों के सांप जितनी ही रहती है।  

(Daily Chhattisgarh)