खूनी लूट-डकैती की जगह अब अहिंसक जुर्म, और हिंसा घरों में घुसी

 31 जुलाई 2024

 अभी दस बरस पहले तक हिन्दुस्तान के शहर-कस्बों में लूटपाट के बहुत से मामले होते थे। लोग दुकान बंद करके घर जाते रहते थे, और उन पर निगरानी रखने वाले लोग रास्ते में उन्हें घेरकर गोली मारकर नगदी या दूसरा कीमती सामान लेकर चले जाते थे। सराफे की किसी दुकान में हथियारबंद लोग घुसकर गहने-नगदी लूट लेते थे, और फिर पुलिस रपट से पता चलता था कि कितने का माल गया। ऐसी तमाम घटनाओं में कहीं लोगों की मौत होती थी, तो कहीं लोग जख्मी होते थे। हाल के बरसों में हथियारबंद और हिंसक-ठगी के मामले जिस तरह से कम सुनाई पड़ते हैं, और साइबर-ठगी, फ्रॉड, ब्लैकमेल के मामले जितनी रफ्तार से बढ़े हैं, उनसे समझ पड़ता है कि खूनी जुर्म किस तरह से बिना खून बहाए जुर्मों में बदलते जा रहे हैं। 

हम अपने आसपास के अखबारों को देखते हैं, तो हथियारबंद लूट या डकैती में हफ्ते भर में जितनी रकम जाते दिखती है, उससे अधिक रकम हर दिन लोगों से मोबाइल पर ठगी, जालसाजी, धोखाधड़ी में हर दिन जा रही है। इंटरनेट और मोबाइल बैंकिंग से अब लोगों के हाथ किसी भी तरह का भुगतान करना एकदम आसान काम हो गया है, और डिजिटल लेन-देन से, इंस्टेंट मैसेजिंग एप्लीकेशनों के इस्तेमाल से लोगों का मिजाज हर काम को आनन-फानन करने का इस हद तक हो गया है कि लोग धोखेबाजों के किसी संदेश के जवाब में लाखों का भुगतान पहले करते हैं, उसकी जांच शायद बाद में भी नहीं करते हैं। अभी मोबाइल पर किसी लडक़ी के साथ वीडियो कॉल पर कपड़े उतारने के लिए मर्द मानो बेसब्र रहते हैं, और एक बार ऐसी रिकॉर्डिंग ब्लैकमेलरों के हाथ लग जाती है, तो फिर वे जोंक की तरह खून की आखिरी बूंद भी निचोड़ लेते हैं। ऐसे एक-एक मामले में एक-एक आदमी 25-50 लाख रूपए गंवा रहे हैं, और इतनी रकम लूटने के लिए लुटेरों को खासी मेहनत लगती, गोलियां चलानी पड़ती, कत्ल भी करना पड़ता, और तब कहीं जाकर फरार होकर पुलिस से बचते हुए ऐसी रकम मिल पाती। अब लोग अपने घरों में सुरक्षित बैठे हुए सिर्फ मोबाइल और इंटरनेट पर लोगों को लूट रहे हैं, और कमअक्ल अधेड़ और बूढ़े सभी लोग जिंदगी भर की कमाई और बचत गंवा रहे हैं। इससे परे क्रिप्टोकरेंसी और शेयर बाजार में मोटी कमाई का झांसा देकर लोगों को लूटा जा रहा है, और हर दिन अखबार ऐसी खबरों से पटे हुए हैं, लेकिन बहुत पढ़े-लिखे लोग भी लुटेरों का इंतजार करते हुए मानो आरती की थाली सजाए बैठते हैं। इस तरह अब साफ दिखता है कि खूनी जुर्मों में से खून अब हटते जा रहा है। जब दुनिया में मासूम, नासमझ, और मूर्ख भरे पड़े हैं, तो फिर हाथ क्यों गंदे किए जाएं? बात की बात में बैंक खातों में सभी किस्म के साइबर-जुर्म का पैसा आ जाता है, वहां से दूसरे खातों में चले जाता है, और उसे नगद निकालकर लोग गायब भी हो जाते हैं। एक किस्म से यह नौबत अच्छी इसलिए है कि इसमें खून नहीं बहता, लेकिन दूसरी तरफ खतरनाक इसलिए है कि जो लोग ब्लैकमेलिंग का शिकार होते हैं, वे खुदकुशी भी कर बैठते हैं, और उनमें कोई अधिक दुस्साहसी रहते हैं, तो वे ब्लैकमेलर का कत्ल भी कर बैठते हैं। लेकिन ये दोनों ही नौबतें ठगी-ब्लैकमेलिंग हो जाने के बाद की हैं, जहां तक पैसे लूटना या ठगना है, तो वह मामला अब तकरीबन पूरी तरह अहिंसक हो चुका है। 

आज भी हिंसक जुर्म एकदम घटे नहीं हैं, लेकिन अधिकतर हिंसा परिवारों के भीतर, आपसी संबंधों में, या प्रेम और सेक्स के संबंध टूट जाने पर बदला निकालने के लिए होते दिखती है। यह हिंसा बड़ी रफ्तार से बढ़ रही है। इसके पीछे शहरीकरण जैसी एक स्थिति भी जिम्मेदार है, लेकिन एक दूसरी दिलचस्प बात यह है कि अब लड़कियां और महिलाएं पहले के मुकाबले अधिक आत्मनिर्भर हैं, वे अधिक हिम्मती भी हैं, और हर किस्म के निजी संबंध बनाने में वे अब कुछ या अधिक हद तक आदमियों की बराबरी भी करने लगी हैं। अब औरत-मर्द के रिश्तों में भी महिलाएं पहले की तरह बेबस नहीं रह गई हैं कि वे हर किस्म के जुल्म को सहती रहें। जब कोई एक पक्ष जुल्म सहने को तैयार हो, तो फिर ऐसे रिश्ते में हिंसा की नौबत और जरूरत कम आती है। दूसरी तरफ जब महिला किसी विवाद में रीढ़ सीधी करके सामने खड़ी होने लगे, तो फिर टकराव की नौबत बढ़ती है। हाल के बरसों में लगातार ऐसे भी बहुत से मामले सामने आए हैं जिनमें किसी लडक़ी या महिला ने प्रेमी या पति के कत्ल की योजना बनाई, भाड़े के हत्यारे लिए, या पति या प्रेमी को साथ में जोड़ा, और कत्ल कर दिया, या करवा दिया। महिलाओं की इस नई ताकत के चलते भी अब कई तरह की हिंसा बढ़ रही हैं। 

इस मुद्दे पर आज लिखने का एक मकसद यही था कि भारत में जो परंपरागत लूट-डकैती जैसे जुर्म थे, जिनमें कत्ल की नौबत आती थी, वह धंधा अब सफेदपोश साइबर-मुजरिम बिना हिंसा करने लगे हैं। दूसरी तरफ आपसी संबंधों और परिवार के भीतर परले दर्जे की हिंसा होने लगी है। समाज को इस किस्म के विश्लेषण खुद भी करने चाहिए, और इनके निष्कर्षों पर लोगों को बैठकर बात भी करना चाहिए कि असल जिंदगी के हिंसा और साइबर जिंदगी की लूट या ब्लैकमेलिंग पर काबू कैसे पाया जाए। आज इन दोनों में पुलिस का दाखिला तभी होता है, जब जुर्म हो चुका रहता है। इसलिए लोगों को ही अपनी जिंदगी को जुर्म से बचाने के लिए मेहनत करनी पड़ेगी। पुलिस तो किसी भी तरह के जुर्म में जब बाद में पहुंचती है, तो वह अधिक से अधिक मुजरिमों पर कार्रवाई कर पाती है। पूरे देश का आंकड़ा अगर देखें, तो साइबर-जुर्म में होने वाली ठगी-ब्लैकमेलिंग का एक फीसदी पैसा भी पुलिस पकड़ नहीं पाती। इसलिए जनता के बीच ही हर किस्म के जुर्म से बचने पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 31 जुलाई 2024

 


दीवारों पर लिक्खा है, 30 जुलाई 2024


 

टीनएज हिंसा, चाहे खुद के खिलाफ, चाहे दूसरे के...

30 जुलाई 2024

 पुणे की एक तकलीफदेह खबर है कि किसी ऑनलाईन गेम की आदत के शिकार, 10वीं के एक छात्र ने उस गेम के एक टॉस्क को पूरा करने के लिए 14वीं मंजिल से छलांग लगा दी, और उसकी मौत हो गई। उसके लिखे हुए कागज मिले हैं जिनमें इस तरह से छलांग लगाने की बात लिखी गई है, और स्कैच बनाया गया है। परिवार का कहना है कि वह 6 महीने से ऑनलाईन गेम की लत में पड़ा हुआ था, और कहीं आना-जाना भी छोडक़र दिन-रात कमरे में बंद रहता था, और खेलते रहता था। लोगों को याद होगा कि ऐसे कुछ और भी खेल कुछ अरसा पहले भारत सहित दुनिया के कुछ दूसरे देशों में भी प्रतिबंधित किए गए थे, जिन्हें खेलते हुए लोग जान खतरे में डालते थे, या सीधे-सीधे खुदकुशी कर लेते थे। यह ताजा घटना कई हिसाब से फिक्र की है कि 14 बरस का लडक़ा असल जिंदगी से इस हद तक कट जाए, और एक ऑनलाईन खेल को ही अपनी जिंदगी मान बैठे। 

लेकिन हम अपने अगल-बगल के शहरों को देख रहे हैं, तो नाबालिग लडक़े-लड़कियां इतने किस्म के भयानक जुर्म कर रहे हैं कि उन्हें देखकर लोगें को लगता है कि कत्ल और बलात्कार जैसे जुर्म पर नाबालिगों की सुनवाई भी बालिग की तरह होनी चाहिए। ऐसी एक मांग देश में लगातार उठ रही है। हम छत्तीसगढ़ के भीतर ही यह देख रहे हैं कि हर दिन नाबालिग औसतन एक कत्ल या एक बलात्कार कर रहे हैं, कई मामलों में नाबालिग लडक़े किसी लडक़ी से अंतरंग संबंधों के दौरान बनाए गए वीडियो पोस्ट करके ब्लैकमेल कर रहे हैं, और नशा करके गुंडागर्दी करना तो बहुत आम बात हो गई है। ऐसा लगता है कि हिंसा या सामूहिक हिंसा करने में नाबालिगों और बालिगों के बीच कोई फर्क ही नहीं रह गया है। और कानून है कि नाबालिग को छूने नहीं देता, उसकी गिरफ्तारी नहीं हो पाती, उसके लिए अलग अदालत या बोर्ड का इंतजाम है, उसे जेल नहीं भेजा जा सकता, उसे सिर्फ सुधारगृह में रखा जा सकता है, उसकी शिनाख्त उजागर नहीं की जा सकती। कानून ने उसे तोडऩे वाले नाबालिगों को भी खूब सारी रियायतें दी हैं, लेकिन अब बहुत से लोग यह सोचने लगे हैं कि भयानक किस्म के अपराधों ने नाबालिगों को उम्र की रियायत नहीं मिलनी चाहिए। 

हम अभी इस बारे में कोई साफ-साफ राय नहीं बना पाए हैं, और ऐसा लगता है कि देश में किशोरावस्था की बेहतर समझ रखने वाले मनोचिकित्सकों, परामर्शदाताओं, और कानून के जानकार तमाम तबकों के बीच अधिक विचार-विमर्श की जरूरत है। कायदे से तो यह विचार-विमर्श देश की संसद, और विधानसभाओं में खुलकर होना चाहिए, लेकिन हिन्दुस्तान में संसदीय चर्चा की कोई संभावना रह नहीं गई है। इसकी दो वजहें हैं। एक वजह तो यह है कि पार्टियों के बीच कटुता इतनी अधिक बढ़ गई है, कि सांसद या विधायक गिरोह जैसे खेमों में बंट गए हैं। और जैसा कि किसी भीड़ में होता है, गिरोह में दिमाग सिर्फ एक सरगना का होता है, बाकी के पास सिर्फ हामी में हिलाने को सिर होते हैं। सदनों में पिछले काफी बरस से पार्टियों के अनुशासन में बंधे सांसदों की निजी सोच की संभावना खत्म हो चुकी है, और महज पार्टी लाईन पर बोलने के लिए उन्हें कुछ-कुछ मिनट मिलते हैं जिनमें वे अपने नेता की स्तुति करते अधिक दिखते हैं। इसलिए सदनों में जो विचारों का उन्मुक्त प्रवाह होना चाहिए, वह गुंजाइश खत्म हो चुकी है। इसलिए भारतीय लोकतंत्र में अब एक दूसरी जरूरत आ खड़ी हुई है कि वैकल्पिक संसद या वैकल्पिक सदन नाम की एक नई परंपरा शुरू हो, और समाज के अलग-अलग तबकों के लोग इन मंचों पर अपनी राय रख सकें। आज तो टेक्नॉलॉजी मुफ्त में हासिल है, और ऐसे विचार-विमर्श, या बहस को ऑनलाईन भी किया जा सकता है, या किसी स्टेज के प्रोग्राम का प्रसारण भी किया जा सकता है। आज जरूरत संसद से परे एक छाया संसद, यानी शैडो पार्लियामेंट बनाने की है, ताकि लोकतांत्रिक विमर्श जारी रह सके। देश में जो प्रमुख, और जागरूक विश्वविद्यालय हैं, वे भी लोकतांत्रिक चेतना बढ़ाने के लिए इस तरह की पहल कर सकते हैं। यह एक अलग बात है कि कई जगहों पर सत्ता असहमति, या विचारों की विविधता को बर्दाश्त नहीं कर पाएगी, लेकिन जनता को तो लोकतंत्र में रास्ता सत्ता की नापसंदगी के बाद भी निकालना होता है। 

हम जुवेनाइल क्राइम कहे जाने वाले अपराध के इस दर्जे पर यह भी बात करना चाहते हैं कि क्या समाज की भी फिक्र इसमें होना चाहिए, और समाज को सामुदायिक स्तर पर भी इससे निपटने की कोशिश करनी चाहिए? सरकार और संसद का मुंह देखने के बजाय समाज के लोगों को खुद ही समाधान तलाशना चाहिए। लोगों को याद रखना चाहिए कि दुनिया में कहीं पहाड़ को चीरकर रास्ता बनाने वाले एक अकेले समर्पित व्यक्ति की कहानी भी अच्छी तरह दर्ज है, तो कहीं उजड़ चुके पहाड़-जंगल को हरियाली में तब्दील कर देने वाले अकेले इंसान भी दुनिया के कई देशों में हैं। इसलिए हम किसी एक व्यक्ति की शुरू की हुई छोटी पहल की संभावनाओं को भी कम नहीं आंकते। हो सकता है कि कोई व्यक्ति ऐसे रहें, जो कि अकेले ही किशोर-मुजरिमों को सुधारने के लिए कुछ कर सकें। कोई एक छोटा सा संगठन भी ऐसी शुरूआत कर सकता है, और आगे चलकर या तो उसका काम आगे बढ़ सकता है, या कोई दूसरे बड़े संगठन उस किस्म का काम आगे बढ़ा सकते हैं। 

नाबालिग या किशोर मुजरिमों को सुधारे बिना समाज सुरक्षित नहीं रह पाएगा, क्योंकि इनमें से हर किसी के सामने जेल के बाहर भी एक लंबी जिंदगी रहेगी, और न सुधर पाने की हालत में जुर्म करते ही रहेंगे। इसलिए समाज के लिए इन्हें सुधारने की कोशिश एक अधिक आसान और सस्ता काम हो सकता है, बजाय इन्हें इनके हाल पर छोड़ देने के, और इनके अधिक खतरनाक मुजरिम बन जाने का खतरा उठाने के। कुल मिलाकर किशोर-अपराध के मुद्दे पर समाज में खुलकर चर्चा की जरूरत है, और ऐसी चर्चा से ही किसी किस्म की पहल शुरू हो सकेगी। 

(Daily Chhattisgarh)

अमरीका क्या एक धर्मान्ध तानाशाह चुनना पसंद करेगा

 29जुलाई 2024

अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए कुछ बुनियादी सवाल खड़े कर रहा है। ट्रंप ने अभी लोगों को हैरान करने वाला एक बयान दिया है। एक चुनावी रैली में उसने मंच और माईक से कहा- ‘ईसाईयों बाहर निकलो, और सिर्फ इस बार वोट कर दो। फिर आपको वोट डालने की जरूरत ही नहीं होगी। चार साल में सब सही कर दिया जाएगा। मेरे प्यारे ईसाईयों, आपको फिर वोट डालने की जरूरत नहीं होगी, मैं आपसे प्यार करता हूं।’ बीबीसी की एक रिपोर्ट बताती है कि पहले भी कई बार ट्रंप ने दुनिया के तानाशाहों और बेकाबू शासकों की तारीफ की है। इनमें रूस के पुतिन, हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन, और उत्तर कोरिया के तानाशाह किंग जोन ऊन के नाम शामिल हैं। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि ट्रंप ने किसी वक्त हिटलर की कुछ बातों की भी तारीफ की थी। लोगों को याद होगा कि पिछला राष्ट्रपति चुनाव हारने के बाद जब ट्रंप के समर्थकों ने ट्रंप के उकसावे पर अमरीकी संसद पर हमला बोला था, तो वहां भी ईसाई धर्म से जुड़े झंडे लिए हुए लोग थे, बहुत से लोग हमले के वक्त प्रार्थना भी कर रहे थे, कुछ लोगों ने लकड़ी का सलीब उठाया हुआ था, और कई ट्रंप समर्थकों ने उसे ईसाई धर्म बचाने वाला बताया था। 2020 के चुनाव में भी ट्रंप अपने चुनाव प्रचार में धर्म का मुद्दा बार-बार उठाते थे, और अपने प्रतिद्वंद्वी बाइडन को ईश्वर विरोधी बताते थे। अब 2024 के चुनाव में उन्होंने एक बार फिर ईसाई धर्म का फतवा दुहराना शुरू किया है। अमरीका की एक शोध संस्था का अंदाज है कि वहां की करीब 70 फीसदी आबादी ईसाई है। 

अब यह देखें कि ट्रंप जो लोकतंत्र विरोधी फतवा दे रहे हैं कि इस बार के वोट के बाद वोट की जरूरत ही नहीं रहेगी, इसे लेकर यह याद पड़ता है कि किस तरह डेमोक्रेटिक पार्टी ट्रंप को लोकतंत्र के लिए खतरा बताते आई है। और अभी ट्रंप के इस बयान पर जब अलग-अलग लोगों से पूछा गया, तो वहां के एक प्रमुख वकील ने सोशल मीडिया पर लिखा- ये ईसाई राष्ट्रवाद नहीं है, ट्रंप लोकतंत्र को खत्म करने, और ईसाई देश बनाने की बात कर रहे हैं। एक अभिनेता ने, ट्रंप के बयान कि इस बार के बाद वोट डालने की जरूरत ही नहीं होगी, सोशल मीडिया पर पूछा- लेकिन अगर मैं फिर से वोट डालना चाहूं तो? एक बड़े टीवी चैनल एनबीसी की कानूनी टिप्पणीकार ने कहा- दूसरे शब्दों में कहें तो ट्रंप राष्ट्रपति चुने गए, तो वो व्हाईट हाऊस कभी नहीं छोड़ेंगे। एक राजनीतिक टिप्पणीकार ने कहा- वो, ट्रंप ने 2028 के चुनाव को रद्द कर दिया। एक डेमोक्रेटिक प्रवक्ता ने कहा- जब हम ये कहते हैं कि ट्रंप लोकतंत्र के लिए खतरा है, तो हम यही बताने की कोशिश कर रहे होते हैं, जो ट्रंप ने अब कहा है। एक प्रमुख पॉडकॉस्टर ने कहा- ये ड्रील नहीं है, लोकतंत्र खतरे में है। 

सच बात यही है कि ट्रंप की लोकतंत्र पर कोई आस्था नहीं है, और वे धार्मिक मामलों में बहुत ही कट्टर हैं। ऐसे में अब अचानक उन्हें ईसाई धर्म की जरूरत इस हद तक क्यों पड़ रही है, यह समझने की जरूरत है। मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडन के मुकाबले ट्रंप वहां के रिपब्लिकन वोटरों, और अपने दीवानों के बीच शोहरत के सैलाब पर तैर रहे थे। लेकिन जैसे ही बाइडन ने चुनाव न लडऩे की घोषणा की, खुलकर कमला हैरिस को प्रत्याशी बनाने की वकालत की, दोनों पार्टियों के उम्मीदवारों की शोहरत के आंकड़े एकदम से बदल गए। ताजा सर्वे में पता लग रहा है कि उम्मीदवारी की संभावना के कुछ ही दिनों में कमला हैरिस ट्रंप को कड़ी टक्कर देने की हालत में आ गई हैं। अब जब ट्रंप को पहले जीती हुई दिख रही बाजी, आज हाथों से फिसलते हुए दिख रही है, तो उन्हें धर्म और राष्ट्रवाद ये दो हथियार सूझ रहे हैं। उन्होंने तुरंत ही इन दो बंदूकों को बैसाखियों की तरह एक-एक कांखतले टिका लिया है, और इनके सहारे से वे जीत की मंजिल तक पहुंचने की उम्मीद कर रहे हैं। अमरीका के शिक्षित या विकसित होने से वहां धर्मान्धता कम होने की कोई उम्मीद नहीं करना चाहिए। ऐसे में ईसाई धर्म का फतवा देकर अगर ट्रंप खुलकर यह मुनादी कर रहे हैं कि इस बार वोट देने के बाद आगे कभी वोट देने की जरूरत ही नहीं रह जाएगी, तो वे संसद पर हमले के दर्जे की किसी तानाशाही की तरफ इशारा भी कर रहे हैं। जिन नेताओं का मिजाज अमर होने और तानाशाही का रहता है, वे कभी उग्र राष्ट्रवाद का फतवा देकर अपने देश के झंडे के पीछे छुप जाते हैं, या फिर धर्म का फतवा देकर लोगों के बीच एक धार्मिक उन्माद पैदा करते हैं। ट्रंप यह कोई अनोखी तरकीब इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, दुनिया में कई नेता ऐसा कर चुके हैं। 

अब सवाल यह उठता है कि जो अमरीका अपने घरेलू लोकतंत्र पर गर्व करता है, उस अमरीका में लोकतंत्र के खिलाफ, और धार्मिक उन्माद वाले, ऐसे फतवों को लोग बर्दाश्त कैसे कर सकते हैं? क्या वहां पर ईसाई धर्म की कट्टरता वाले लोग, बंदूकों की संस्कृति के हिमायती लोग, महिलाविरोधी मर्दानगी वाले लोग, और ट्रंप की तरह के बदचलन को बुरा न मानने वाले लोग, धर्म और राष्ट्रवाद के फतवों पर अगला अमरीकी राष्ट्रपति चुनेंगे? यह देखना दिलचस्प है कि विपक्षी उम्मीदवार की जरा सी शोहरत दिखते ही रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार, और पिछले राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने लोकतंत्र और सभ्यता दोनों के कपड़े उतार फेंके हैं, और अपने जन्म के कपड़ों पर उतर आए हैं। ऐसे नंगे को भी अगर अमरीकी जनता चुनती है, तो दुनिया में अमरीकी लोकतंत्र को मुंह छिपाने की जगह भी नहीं मिलेगी। दुनिया में लोकतंत्र का सरदार बना देश क्या एक ऐसा राष्ट्रपति चुनेगा जो कि अपने चुनाव को देश के भविष्य का आखिरी चुनाव कह रहा है, और जो संसद पर हमला करवाने के जुर्म में अदालती कटघरे में भी खड़ा है? 

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 29 जुलाई 2024


 

अभियुक्तों का मुजरिमों की तरह प्रचार कितना जायज?

 28 जुलाई 2024

हर दिन देश भर में पुलिस हजारों मामलों में लोगों की गिरफ्तारी करती है, और अगर जुर्म करने वाले लोग नाबालिग होते हैं, तो उन्हें महज हिरासत में लेकर सुधारगृह भेजा जाता है। बाकी तमाम लोगों के नाम-पते सहित उनकी तस्वीरें पुलिस समाचार में जारी करती है। इनमें नाबालिग को बहला-फुसलाकर ले जाने, और बलात्कार करने से लेकर मारपीट या बकरी चोरी तक की खबरें रहती हैं। इनमें जो लोग पकड़ाते हैं, उनके चेहरे दिखाते हुए पूरी जानकारी पुलिस प्रेसनोट से शुरू होकर पुलिस के ही सोशल मीडिया पेज, या अखबार-टीवी तक छपती और दिखती है। अब तो पुलिस प्रेसनोट के साथ छोटे-छोटे वीडियो बनाकर भी भेजने लगी है ताकि टीवी चैनलों और यूट्यूब पर उसका इस्तेमाल हो सके। यहां एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है कि भारत की जांच और न्याय व्यवस्था में बड़ी संख्या में लोग अदालत से छूट जाते हैं। बहुत से लोगों को अदालतें संदेह का लाभ देकर बरी करती हैं क्योंकि जांच एजेंसियां कमजोर जांच, या कमजोर गवाह और सुबूत के चलते अदालत ने आरोप साबित नहीं कर पातीं। दूसरी तरफ कई ऐसे मामले रहते हैं जिनमें अदालतें गिरफ्तार और कटघरे में खड़े किए गए लोगों को पूरी तरह बेकसूर पाती हैं, और उन्हें बाइज्जत बरी करती है। कुछ मामले तो ऐसे भी होते हैं जिनमें अदालतें पुलिस और दूसरी जांच एजेंसियों के खिलाफ कड़ी टिप्पणी लिखती हैं कि उन्होंने साजिशन किसी को गिरफ्तार करके जेल में डाला, और मुकदमा चलाया, जबकि पुलिस को अच्छे से मालूम था कि वे बेकसूर हैं।

अब इनमें से जिस किसी किस्म का जो भी मामला हो, अदालत ने तो अभियुक्त बनाकर खड़े किए गए लोगों की इज्जत जितनी मटियामेट होनी रहती है, वह तो होती ही है, लेकिन जब तक मामला अदालत में चलते रहता है, और साबित कुछ भी नहीं हुआ रहता, तब तक उनकी गिरफ्तारी की तस्वीरें जारी करना क्या ठीक है? इसे एक दूसरे तरीके से देखें कि जिन नेताओं पर ऐसे मुकदमे चलते हैं जिसमें उन्हें एक सीमा से अधिक सजा हो सकती है, और उनके आगे चुनाव लडऩे की अपात्रता हो सकती है, ऐसे मामलों में जब तक उन्हें सजा नहीं हो जाती, तब तक चुनाव घोषणापत्र में उन पर चल रहे मुकदमों का जिक्र होने के बाद भी उनके चुनाव लडऩे पर रोक नहीं रहती। दूसरी तरफ जिन लोगों को साइकिल चोरी से लेकर छेडख़ानी तक के जुर्म में गिरफ्तार किया गया है, उनके चेहरे पुलिस पहले दिन से जारी कर देती है, और उनके जमानत पर छूटने के बाद भी, उनका चेहरा लोगों के दिमाग में बैठे रहता है, और शायद ही उन्हें कोई नौकरी पर रखे। ऐसे में सवाल यह उठता है कि किसी के जुर्म के लिए किस तरह की सजा का प्रावधान होना चाहिए? क्या सजा अदालत दे, हिरासत में पिटाई करके पुलिस दे, सडक़ों पर पीटकर जनता दे, या रोजगार पाने का हक छीनकर समाज दे? किसी एक व्यक्ति के किसी एक जुर्म पर उसे कब, कब तक, और कितनी, कितने किस्म की सजाएं दी जानी चाहिए? जब देश के सांसद उन पर चल रहे मुकदमों के बावजूद अपनी रोजी-रोटी पाते रहते हैं, सांसद बने रहते हैं, वहां से वेतन-भत्ते पाते रहते हैं, शायद रियायती खाना भी पाते हैं, विशेषाधिकार भी कायम रहते हैं, तो फिर छोटे-छोटे आम जुर्म में फंसे हुए लोगों की बदनामी करके उनके जिंदा रहने की संभावनाओं को खत्म करना क्या इंसाफ कहलाएगा?

हमारी यह बात कई लोगों को बहुत खटक सकती है कि हम मुजरिमों को बचाने की बात कह रहे हैं। सवाल यह है कि क्या किसी जुर्म के शक में गिरफ्तार लोग समाज में जिंदा रहने का अपना हक खो बैठते हैं? पुलिस के प्रेसनोट से संदिग्ध लोगों, और आरोपियों की बदनामी गिरफ्तारी के साथ ही इतनी हो जाती है कि समाज एक किस्म से उनका बहिष्कार कर देता है। जब कोई काम पर न रखे, कोई काम न दे, तो लोग जिंदा रहने का हक खो बैठते हैं। इसलिए सवाल यह उठता है कि क्या एक आरोपी और अभियुक्त को अदालती सजा के साथ-साथ ऐसी सामाजिक सजा देना भी जायज है जिससे उन्हें आगे मुजरिम बनने की एक मजबूरी ही हो जाए? ऐसी बात हमने पुलिस और प्रशासन द्वारा जिलाबदर किए जाने वाले लोगों के बारे में भी लिखी थी। जिन लोगों पर बहुत से जुर्म दर्ज होते हैं, और जिनके बारे में पुलिस का मानना रहता है कि उनके सुधरने के आसार नहीं दिख रहे, और जिन्हें उनके इलाके से हटा देना ही अकेला इलाज है, उन्हें पुलिस की सिफारिश पर कलेक्टर जिलाबदर करते हैं। हमें इसमें दो बातें नाजायज लगती हैं। कोई व्यक्ति अपने इलाके में कितने ही बड़े गुंडे या मुजरिम क्यों न हों, वे पुलिस की नजर में रहते हैं, और समाज में भी उन्हें काफी लोग पहचानते हैं, इसलिए लोग उनके संभावित जुर्म से बचकर भी रह सकते हैं, और पुलिस भी उन्हें किसी भी शक की नौबत में तुरंत उठा सकती है। दूसरी तरफ जब वे अपने जिले के बाहर भेज दिए जाते हैं, और अड़ोस-पड़ोस के लगे हुए जिलों से भी परे जाने उन्हें कह दिया जाता है, तब उनके सामने नई जगह पर किसी भी तरह का रोजगार पाना मुश्किल हो जाता है, उन्हें रहने के लिए अलग से घर बसाना पड़ता है, जिसका खर्च रहता है, और उनके सामने सिवाय मुजरिम बनने के और कोई आसान रास्ता नहीं रहता। दूसरी तरफ जिस जिले में जाकर वे बसते हैं, वहां की पुलिस और जनता उन्हें पहचानती नहीं है, और उनसे सावधान रहना किसी के लिए मुमकिन नहीं रहता, वे समाज के लिए वहां अधिक बड़ा खतरा हो सकते हैं।

खैर, जिलाबदर पर कार्रवाई का वर्तमान कानून एक अलग किस्म की बेइंसाफी है, और समाज के लिए कहीं अधिक बड़ा खतरा है, दूसरी तरफ हर तरह के छोटे-छोटे आरोपों में गिरफ्तार लोगों की तस्वीरें रोज जारी करके पुलिस रोजाना ही कई लोगों के बुनियादी हक कुचलती है। हो सकता है आज सरकार के नियमों में इस पर कोई रोक न हो, और यह भी हो सकता है कि आज के नियम ऐसे प्रचार का समर्थन भी करते हों, ताकि बाकी समाज सावधान रह सके, लेकिन किसी संदिग्ध आरोपी के भी कुछ बुनियादी हक होने चाहिए, यह सोच भारत में लोकप्रिय नहीं है। यहां पर लोगों को यही सुहाता है कि शराबी, या किसी संदिग्ध के कोई बुनियादी हक नहीं होने चाहिए। यही वजह है कि जब पुलिस कुछ आरोपियों की बेरहमी से, अमानवीय तरीके से पिटाई करती है, तो लोग उसकी भी तारीफ करते हैं। कुछ पुराने लोगों को याद होगा कि 1980 में बिहार के भागलपुर में यह मामला सामने आया था जब पुलिस ने सजायाफ्ता या अभियुक्त लोगों की आंखों में तेजाब डालकर 31 लोगों को अंधा कर दिया था, क्योंकि पुलिस का यह मानना था कि ये लोग ऐसे आदतन मुजरिम हो गए थे कि इनके लिए और कोई सजा असरदार नहीं थी।

हमारा मानना है कि भारत की न्याय व्यवस्था में अदालती सजा ही अकेली सजा है, और पुलिस को अभियुक्तों के फोटो जारी करते हुए यह सोचना चाहिए कि क्या वे जुर्म के आरोप में फंसे लोगों को किसी रोजगार की संभावना से दूर करके महज मुजरिम बनने का विकल्प तो नहीं दे रहे हैं?

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 28 जुलाई 2024



 

पोर्न देख बहन से रेप, नाबालिग को स्कूल में सेक्स शिक्षा मिलनी थी...

  28 जुलाई 2024

 एमपी के रीवां की खबर है कि एक गांव में तीन महीने पहले 9 बरस की एक बच्ची से रेप के बाद उसका कत्ल करने वाला उसका 13 बरस का सगा भाई ही था। जांच के बाद, डीएनए टेस्ट के बाद पुलिस ने अभी इस लडक़े को उसकी मां और दो बहनों के साथ गिरफ्तार किया है। नाबालिग भाई-बहन को सुधारगृह भेजा गया है, और मां और एक बालिग बहन को जेल भेजा गया है। पुलिस ने जांच के नतीजे बताए हैं कि 13 बरस का यह लडक़ा मोबाइल पर पोर्न वीडियो देखा करता था। एक रात उसने पोर्न वीडियो देखने के बाद अपने पास सो रही छोटी बहन के साथ बलात्कार किया। जब बहन ने यह बात पिता को बताने की धमकी दी, तो उसने 9 बरस की बहन को गला घोंटकर मार डाला। इसके बाद उसने मां को जगाकर सब बताया, फिर मां और दो बहनों ने मिलकर सारे सुबूत खत्म किए, और पुलिस को कहा कि कोई अनजान व्यक्ति ऐसा कर गया है। लेकिन लडक़ी के बदन से मिले डीएनए सेम्पल की जांच से मुजरिम भाई के ही होने के सुबूत मिले, और पुलिस ने एक परिवार के ही इन चार लोगों को गिरफ्तार किया, दो लोग सुधारगृह और दो लोग जेल भेजे गए। छोटी सी बेकसूर लडक़ी बलात्कार और कत्ल से गुजर ही गई। किसी परिवार के साथ इससे बड़ी तबाही और क्या हो सकती है? और सोचने की बात यह है कि यह सिलसिला शुरू कहां से हुआ?

हिन्दुस्तान में किशोरावस्था में पहुंचे लडक़े-लड़कियों के लिए सेक्स की जानकारी पाने का अकेला जरिया पोर्न वीडियो ही रहते हैं। इन दिनों दस बरस के बच्चों को भी ऐसे वीडियो कहीं न कहीं मिल जाते हैं, और जिनके हाथ मोबाइल फोन, लैपटॉप या कम्प्यूटर लग जाते हैं, उनकी पहुंच तो दुनिया के सबसे हिंसक वयस्क वीडियो तक हो जाती है। हालत यह है कि लोग छोटे बच्चों के सेक्स के वीडियो भी एक-दूसरे को भेजते रहते हैं, सोशल मीडिया पर पोस्ट करते रहते हैं, और हर हफ्ते हम अपने आसपास ऐसी गिरफ्तारियां देखते हैं जो कि अंतरराष्ट्रीय निगरानी एजेंसियों की भेजी जानकारी के आधार पर होती हैं, वहां से जानकारी भारत सरकार को आती है, और यहां पर सरकार उसे प्रदेशों में भेजकर बच्चों के पोर्न अपलोड या पोस्ट करने वाले लोगों को गिरफ्तार करती हैं। जो लोग बालिग हो चुके हैं, उन्हें भी नाबालिग लोगों के पोर्न वीडियो पोस्ट न करने की जिम्मेदारी समझ में नहीं आती, क्योंकि उन्हें देह और सेक्स की जानकारी कभी वैज्ञानिक तरीके से दी नहीं गई, और वे सिर्फ पोर्न वीडियो के रास्ते ग्रेजुएशन हासिल करने वाले लोग रहते हैं। उन्हें यह भी समझ नहीं पड़ता कि नाबालिगों के सेक्स की फोटो या उसका वीडियो आगे बढ़ाना जुर्म के दायरे में आता है।

आज 13 बरस का एक लडक़ा घर के भीतर 9 बरस की सगी बहन से बलात्कार कर रहा है, और उसे बलात्कार की जानकारी और उसकी प्रेरणा पोर्न वीडियो से मिल रही है। जबकि उसकी उम्र इतनी हो चुकी थी कि स्कूल में उसकी देह और सेक्स की जिज्ञासा का जवाब वैज्ञानिक जानकारियों के साथ शिक्षकों द्वारा सरल तरीके से दिया जाना चाहिए था, लेकिन वैसा हो नहीं पा रहा है। लोग भारत की एक काल्पनिक ऐतिहासिक परंपरा और संस्कृति का हवाला देते हुए प्रेम और सेक्स के इतने खिलाफ हो गए हैं कि आज कृष्ण के लिए भी गोपियों के साथ रास रचाना मुमकिन नहीं हो पाता। कहीं नदी किनारे, तो कहीं पेड़ों के नीचे कृष्ण की रासलीला की जो तस्वीरें भारत में सैकड़ों बरस से प्रचलित हैं, जिनका बड़ा बखान संस्कृत से लेकर लोकभाषाओं और बोलियों तक में मिलता है, वह आज लाठी खाने लायक काम मान लिया जाता।

एक काल्पनिक और पूरी तरह से झूठी तस्वीर भारत की पुरानी संस्कृति की बनाई गई है जिसका हकीकत से कोई लेना-देना नहीं रहा, और नई पीढ़ी को अपनी देह को समझने से पूरी तरह दूर रखा जाता है। यही वजह है कि बच्चे अपनी जानकारी ऐसे हिंसक और क्रूर पोर्न वीडियो से पाते हैं, जो कि असल जिंदगी का सेक्स भी नहीं बताता। वह सेक्स के मामले में गब्बर सिंह सरीखे एक काल्पनिक किरदार को खड़ा करता है, और न सिर्फ बच्चों, बल्कि हिन्दुस्तानी बालिग लोगों के दिमाग में भी सेक्स की ऐसी कल्पना भर देता है जो कि असल जिंदगी में कभी पूरी नहीं होती। पोर्न फिल्मों के कैमरों के सामने पेशेवर चुनिंदा किस्म के वयस्क कलाकार, कई किस्म की दवाईयों की मदद से सेक्स की जो शक्ल सामने रखते हैं, वहीं से उसके दर्शकों के दिमाग में सेक्स का एक बहुत ही हिंसक रूप बैठ जाता है। और नाबालिग लोगों या छोटे बच्चों के दिमाग में तो यह हिंसक किस्म का प्रायोजित और नाटकीय सेक्स तूफान ही ला देता है।

कुछ बरस ही हुए हैं जब छत्तीसगढ़ के एक परिवार में एक छोटी लडक़ी से, उसी के तीन-चार भाईयों ने गैंगरेप किया था, और परिवार इस दुविधा में पड़ गया था कि सच्ची रिपोर्ट लिखाने से घर के सारे बच्चे सुधारगृह चले जाएंगे, तो रिपोर्ट लिखाई जाए, या नहीं?

फिलहाल इस घटना की चर्चा इसलिए जरूरी है कि तथाकथित भारतीय संस्कृति के फतवों से नौजवान पीढ़ी का दिल-दिमाग विकसित नहीं होता, उसके लिए उन्हें अपनी उम्र के मुताबिक जानकारी दी जानी चाहिए। सत्तारूढ़ पार्टी के लिए यह एक अलोकप्रिय बात हो सकती है कि स्कूलों में सेक्स-शिक्षा या देह-शिक्षा देने का फैसला उसके नाम संग जोड़ा जाए। राजनीतिक दल इससे कतराते रहेंगे। दूसरी तरफ आज के वक्त की बच्चों की पीढ़ी की शारीरिक और मानसिक, भावनात्मक, और सामाजिक जरूरतों को देखते हुए स्कूलों का पाठ्यक्रम बनाने का जिम्मा जिन जानकार विशेषज्ञों पर होना चाहिए, उनकी बजाय वोटों के गलाकाट मुकाबले में लगे हुए नेता यह फैसला लेने लगे हैं। बच्चों की शिक्षा-दीक्षा एक बहुत ही विशेषज्ञता वाला काम है, और उसे हिन्दुस्तान में एक लुभावनी राजनीतिक घोषणा का सामान बना लिया गया है, नेता आमसभाओं के मंच से माईक पर पाठ्यक्रम तय करते हैं, और यह अंदाज देखकर दुनिया के विकसित देश हक्का-बक्का रह सकते हैं, जहां पढ़ाई में नेताओं की कोई दखल नहीं होती।

(Daily Chhattisgarh)

सीएजी की रिपोर्ट से परे भी बहुत सुधार की जरूरत है स्वास्थ्य विभाग को...

  27 जुलाई 2024

विधानसभा में यह बड़ी अजीब सी परंपरा रहती है कि सीएजी की रिपोर्ट सत्र के आखिरी दिन पेश होती है, इस तरह रिपोर्ट के बाद उस पर किसी तरह की चर्चा की गुंजाइश नहीं रह जाती। अब छत्तीसगढ़ विधानसभा में 31 मार्च 2022 के पहले तक की स्वास्थ्य विभाग के ढांचे, और सेवाओं पर नियंत्रक एवं महालेखक परीक्षक की रिपोर्ट पेश हुई, तो इसमें 2016 से 2022 तक का हिसाब-किताब पेश हुआ। इसमें पिछली दो सरकारों के कार्यकाल का लेखा-जोखा था, और उस पर भी अभी चर्चा न होना कुछ हैरानी की बात है। सरकारें चली जाती हैं, मंत्री चुनाव हार जाते हैं, सचिव रिटायर हो जाते हैं, या केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर चले जाते हैं, और जवाबदेही की संभावना खत्म हो जाती है। आठ महीने पहले आई विष्णु देव की सरकार से अब रमन सिंह और भूपेश बघेल की सरकारों की नाकामयाबी पर क्या जवाब मांगा जा सकता है। यह एक अलग बात है कि विधानसभा की लोकलेखा समिति सीएजी रिपोर्ट पर विभाग के अधिकारियों को बुलाकर जवाब-तलब कर सकती है, लेकिन उससे किसी सुधार की संभावना नहीं रहती।

अभी प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं पर 2016 से 2022 के बीच का प्रदेश का हाल अगर देखें, तो भारत सरकार के ऑडिटर जनरल के छत्तीसगढ़ दफ्तर ने ऑडिट या जांच में यह पाया है कि स्वास्थ्य विभाग के खरीदी निगम ने पौने चार हजार करोड़ के दवा, उपकरण, और बाकी सामानों की खरीदी में भारी अनियमितता बरती है। जो सैकड़ों टेंडर निकाले गए, उनमें से आधे से अधिक टेंडर दो-दो साल तक फाइनल नहीं किए। पचास करोड़ के उपकरण बिना इस्तेमाल पड़े रहे, शायद उन्हें बिना जरूरत खरीद भी लिया गया था, या उन्हें चलाने के लिए प्रशिक्षित लोग नहीं थे। इसी से जुड़ा हुआ जो निष्कर्ष सीएजी ने इस रिपोर्ट में निकाला है कि वह यह कि प्रदेश के तीन चौथाई जिलों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के एक तिहाई पद खाली पड़े हैं। सीएचसी में स्पेशल डॉक्टरों के तीन चौथाई पद खाली पड़े हैं। इससे भी भयानक बात इस रिपोर्ट में यह है कि राजधानी रायपुर के सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल में नियमित कर्मचारियों के 280 पदों में से कुल 9 पद भरे गए हैं, और 208 पद संविदा कर्मचारियों से भरे गए हैं। आईसीयू में हर बिस्तर पर एक नर्स नियुक्त होने का अनुपात रहना चाहिए लेकिन वहां 20-20 बिस्तरों पर एक नर्स काम करते पाई गई, और गैरआईसीयू वार्डों में तीन बिस्तरों पर एक नर्स होनी चाहिए थी, जो कि 39 बिस्तरों पर एक नर्स मिली है। आयुर्वेद महाविद्यालयों में भी कुर्सियां इसी तरह खाली पड़ी हैं, डॉक्टर 30 फीसदी कम हैं, नर्सें 60 फीसदी कम हैं, और बाकी पदों पर भी ऐसा ही हाल है। जिलों में 538 आयुर्वेद औषधालयों में से 130 में कोई चिकित्सक नहीं पाए गए। सीएजी ने अस्पतालों में हर किस्म की सहूलियतों की क्षमता और वहां उसके इस्तेमाल का बारीकी से विश्लेषण किया है, उसके आंकड़े बहुत निराश करने वाले हैं। कायदे से तो इस रिपोर्ट को ही अगर आज की तारीख पर आंका जाए, तो भी यह समझ में आ सकता है कि छत्तीसगढ़ के मरीजों के इलाज का हाल कितना बदहाल है।

अभी हम सीएजी रिपोर्ट में पौने चार हजार करोड़ की खरीदी की अनियमितता की बारीकियों पर नहीं जा रहे हैं क्योंकि लोकलेखा समिति उस पर देखेगी, लेकिन आए दिन खबरें छपती रहती हैं कि किस तरह कालातीत दवाइयां खरीदी जा रही हैं, या खरीदी गई दवाओं का वक्त खत्म हो जाने से उन्हें नष्ट किया जा रहा है। ये खबरें भी छपती हैं कि बाजार भाव से कितने अधिक गुना दाम पर स्वास्थ्य विभाग दवाइयां और उपकरण खरीदता है। हमें रमन सिंह के कार्यकाल की याद है जब बाबूलाल अग्रवाल नाम के आईएएस अफसर की खुली गड़बड़ी से नकली सोनोग्राफी मशीनें खरीदी गई थीं, और बाद में इस अफसर के खिलाफ जाने क्या-क्या कार्रवाई नहीं हुईं। इंकम टैक्स के कुछ मामलों में यह अफसर बहुत रहस्यमय और संदिग्ध तरीके से निकल आया था, लेकिन सीबीआई ने गिरफ्तारी की थी, और इसे जेल में रहना पड़ा था। लेकिन आमतौर पर हिन्दुस्तानी अदालतों में मामले जितने लंबे चलते हैं, उनमें आज उस वक्त के इस विभाग के खरीदी घोटाले के मामले, और इस अफसर की संपत्ति के मामले कहां पहुंचे, किसी को याद नहीं है। इस एक विभाग के भ्रष्टाचार में छत्तीसगढ़ के मूल निवासी इस अफसर का कॅरियर ऐसा बर्बाद किया कि सबसे कम उम्र में आईएएस बनने के बाद भी यह चीफ सेक्रेटरी तक पहुंचना तो दूर रहा, बीच में ही बर्खास्त हो गया, और जेल चले गया। यह सिलसिला स्वास्थ्य विभाग में इसके पहले से चले आ रहा था, और इसके बाद से जारी भी है, इसमें कोई रोक-टोक नहीं हुई।

स्वास्थ्य विभाग का भ्रष्टाचार प्रदेश के सबसे गरीब मरीजों की जिंदगी को प्रभावित करता है जो कि इलाज के लिए सरकारी सहूलियतों के ही मोहताज रहते हैं। ये एक अलग बात है कि अब भारत की उदारवादी अर्थव्यवस्था में गरीबों को स्वास्थ्य बीमा के जो कार्ड मिलते हैं, उनकी वजह से बहुत से मरीज निजी अस्पतालों में इलाज करा पाते हैं, और बाद में ऐसे अस्पतालों का सरकार से जो हिसाब-किताब होता है, उसमें फर्जीवाड़े की चर्चाएं कभी खत्म ही नहीं होतीं। पता नहीं राज्य सरकार के कुछ विभागों में भ्रष्टाचार की ऐसी असीमित संभावनाएं क्यों बनी रहती हैं, और वहां पहुंचने वाले कभी अफसर, तो कभी मंत्री, और अक्सर ही दोनों विभाग से हर किस्म की कमाई और उगाही में जुटे रहते हैं। हमारा ख्याल है कि छत्तीसगढ़ में आईआईएम जैसी राष्ट्रीय स्तर की एक बेहतर मैनेजमेंट-शिक्षण संस्थान काम कर रही है। और केन्द्र सरकार की ऑडिट एजेंसी सीएजी ने यह रिपोर्ट तैयार की है। विधानसभा की लोकलेखा समिति में जानकार और अनुभवी विधायक अपने हिसाब से सीएजी रिपोर्ट के आधार पर सरकारी अफसरों से जवाब मांगेंगे। लेकिन क्या सरकार के लिए यह बेहतर नहीं होगा कि वह स्वास्थ्य विभाग के कुल कामकाज को सुधारने के लिए आईआईएम के विशेषज्ञों से एक योजना बनवाए। जो आईआईएम-ग्रेजुएट अमरीका जाकर दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों को चलाते हैं, उसके छात्र, और प्राध्यापक अपनी इस जमीन के लिए कोई योजना क्यों नहीं बना सकते? जिस आईआईएम की विशेषज्ञता से दुनिया के सबसे बड़े कारोबार चलते हैं, उसकी टीम को यहां के हाल सुधारने का काम क्यों नहीं दिया जा सकता? एक सवाल जरूर उठ सकता है कि क्या पूरी तरह ईमानदारी से काम चलाने की योजना को भारत के देश-प्रदेश की सरकारें पूरी तरह पचा सकती हैं? जो भी हो, हमारा तो जिम्मा यही है कि गरीब देश-प्रदेश के मरीजों के हक के पैसों का कैसे बेहतर इस्तेमाल हो सके। वैसे अभी हमें यह बात नहीं मालूम है कि स्वास्थ्य विभाग के ढांचे में तीन चौथाई या उससे अधिक कुर्सियां खाली पड़ी हैं, या सरकार अपना खर्च बचाने के लिए इन पर नियुक्तियां ही नहीं करती हैं?

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 26 जुलाई 2024


 

बेल एक हक, और जेल एक अपवाद हो

  26 जुलाई 2024

   सुप्रीम कोर्ट ने अभी कई अलग-अलग मामलों में लोगों के जमानत पाने के हक की वकालत की है। कुछ मामलों में जब निचली अदालत से मिली जमानत को खारिज करने में ऊपर की अदालत ने उत्साह दिखाया, तो सुप्रीम कोर्ट ने उसके भी खिलाफ टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने दिल्ली हाईकोर्ट के एक आदेश को खारिज कर दिया जिसमें मनी लॉंड्रिंग के मामले में एक व्यक्ति को दी गई जमानत पर दिल्ली हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी। अदालत ने कहा कि  जजों के पास जमानत पर रोक लगाने का अधिकार तो है, लेकिन ऐसी कार्रवाई हल्के में या बिना किसी ठोस आधार के नहीं की जानी चाहिए। जजों ने कहा कि ऐसा सिर्फ असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए। भारत में हाल के बरसों में बहुत से ऐसे मामले हुए हैं जिनमें अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के लोगों को आतंक के किसी कानून के तहत जेल में डाल दिया गया, और मामले की सुनवाई भी शुरू नहीं हो पाई, और चार-पांच बरस से ऐसे लोग जेल में बंद हैं क्योंकि जांच एजेंसियां उनकी जमानत का विरोध कर रही हैं।

हम धर्म के आधार पर, या किसी कानून के तहत होने वाली गिरफ्तारियां की बात नहीं कर रहे। हम सभी तरह के मामलों की बात कर रहे हैं कि बिना सुनवाई किसी भी व्यक्ति को लंबे समय तक जेल में बंद रखने की बड़ी ठोस वजहें होनी चाहिए, ऐसा नहीं होना चाहिए कि कुछ आतंकरोधी, मनीलॉंड्रिंग के कानून की मदद लेकर एजेंसियां जरूरत से ज्यादा बेरहमी से लोगों को जेल में बंद रख सकें। खासकर इन दो किस्म के मामलों में देश का तजुर्बा यह है कि इनमें सजा दिलवाना बड़ा मुश्किल रहता है, और जमानत को रोकते चले जाना आसान। इसलिए इन कानूनों के तहत गिरफ्तारी और बिना जमानत जेल में बंद रहना ही सजा है। ऐसे अधिकतर मामलों में यह माना जाता है कि विचाराधीन कैदी के रूप में जितना समय जेल में रखा जाता है, बस वही सजा है, और एक बार जमानत होने पर वह तकरीबन रिहाई है।

खुद भारतीय न्यायपालिका की भावना यह है कि बेल एक स्वाभाविक अधिकार होना चाहिए, और जेल अपवाद की तरह। लेकिन बहुत से मामलों में आर्थिक रूप से कमजोर, किसी अल्पसंख्यक समुदाय के, दलित या आदिवासी आरोपी ऐसे रहते हैं जो बिना जमानत जेलों में पड़े रहते हैं। कुछ मामलों में तो लोग सुनवाई शुरू हुए बिना जेल में मर गए हैं, और जांच एजेंसियां जमानत का विरोध करती रहीं। भीमा-कोरेगांव मामले में फादर स्टेन स्वामी जो कि एक मानवाधिकार आंदोलनकारी थे, और 84 बरस की उम्र में वे माओवादियों के हमदर्द होने के आरोप में जेल में डाले गए थे, और गंभीर बीमारी की हालत में वे कैद में रहते-रहते ही मर गए। जांच एजेंसियों का हाल यह था कि बहुत बूढ़े और बीमार स्टेन स्वामी ने अदालत में अर्जी दी थी कि वे पार्किसन बीमारी के कारण गिलास नहीं पकड़ पाते हैं, इसलिए उन्हें स्ट्रॉ (पानी पीने की नली) की इजाजत दी जाए, लेकिन एनआईए ने इसका भी घनघोर विरोध किया, और वे कांपते हाथों से गिलास छलकाते हुए ही मर गए। उन्हें कोई सजा नहीं हो पाई, और न ही घर जाने के लिए जमानत दी गई, बिना सुनवाई भारतीय न्याय व्यवस्था ने उन्हें हर तरह की तकलीफ से मुक्ति दिला दी।

भारतीय न्याय व्यवस्था का यह बड़ा ही भयानक और हिंसक पहलू है कि कुछ एजेंसियां बिना जमानत लोगों को जेल में अंतहीन रखकर ही उन्हें सजा दे रही हैं, मामलों की सुनवाई भी नहीं हो रही है, एजेंसियां आगे कोई पूछताछ भी बाकी नहीं रख रही हैं, लेकिन जमानत का विरोध कर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट को इस बारे में सोचना चाहिए कि अगर प्रक्रिया ही सजा है, तो फिर अदालत की जरूरत क्यों होना चाहिए? कल के दिन कोई ऐसा कानून भी बन सकता है कि जांच एजेंसियां कुछ बरस तक बिना अदालत में पेश किए किसी को गिरफ्तार रख सके। अभी देश में जो नया कानून लागू हुआ है, उसके तहत भी कुछ लोगों की आशंका है कि पुलिस को 15 दिनों की हिरासत का अधिकार बढ़ाकर 90 दिन कर दिया गया है, और उसका भी ऐसा ही बेजा इस्तेमाल हो सकता है। हम न्यायपालिका के कुछ लोगों की इस सोच का समर्थन करते हैं कि बेल स्वाभाविक हक होना चाहिए, और जेल एक अपवाद होना चाहिए। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट को कुछ ठोस मिसालें पेश करनी चाहिए, ताकि नीचे की अदालतें उससे सबक ले सकें। आज तो हमारा तजुर्बा यह है कि जिला स्तर की अदालतें जमानत की तमाम अर्जियों को खारिज कर देती हैं, और बहुत से मामलों में लोगों को सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ता है। आबादी का शायद एक फीसदी हिस्सा ही सुप्रीम कोर्ट की चौखट चढ़ सकता है। सुनाई यही पड़ता है कि वहां के वकील एक-एक पेशी का लाख-लाख रूपए तक ले लेते हैं, कितने लोग ऐसे होंगे जो जमानत के लिए इतनी बड़ी अदालत तक जा सकें। हमारा मानना है कि गरीबों को अदालती प्रक्रिया में भी एक रियायत मिलनी चाहिए, क्योंकि वे पूरी प्रक्रिया का फायदा पाने की हालत में नहीं रहते हैं। इस बारे में मानवाधिकार आंदोलनकारी लंबे समय से भारतीय न्यायपालिका के गरीबविरोधी रूख को गिनाते आए हैं, सुप्रीम कोर्ट जजों को देश की गरीबी के आंकड़े देखना चाहिए, और फिर अपने महंगे कोट में सज जाने के बाद आईने में अपना चेहरा भी देखना चाहिए, हो सकता है इससे जमानत पर अदालती रूख बदल जाए। 

(Daily Chhattisgarh)

धार्मिक बनाई जाती पुलिस साम्प्रदायिक होती जा रही

 25 जुलाई 2024

 2020 में भारत की राजधानी दिल्ली में दंगे हुए जिनमें 40 मुसलमान और 13 हिन्दू मारे गए थे। इनमें से फैजान नाम का एक नौजवान उन 5 लडक़ों में था जिन्हें दिल्ली पुलिस मार-मारकर राष्ट्रगान गाने को कह रही थी। बाद में पुलिस हिरासत से निकलते ही दो दिन में बहुत ही संदिग्ध हालात में फैजान की मौत हो गई थी। हिरासत-मौत की वैसे भी कड़ी जांच का इंतजाम है, लेकिन दिल्ली पुलिस ने अपने ही साथियों पर आ रही तोहमत के इस मामले में अदालत के बार-बार झिडक़ने पर भी इस तरह से जांच की थी कि अभी दिल्ली हाईकोर्ट ने यह जांच सीबीआई को दे दी है। हाईकोर्ट ने पाया कि वीडियो पर जो पुलिसवाले मुस्लिम लडक़ों को मार-मारकर राष्ट्रगान गाने पर दबाव डाल रहे हैं, उनकी चार साल में भी न शिनाख्त हुई है, न ही कोई चार्जशीट पेश हुई है। हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को फटकार लगाते हुए यह कहा है कि अब तक की जांच लापरवाह और ढीली रही है, और ऐसा लगता है कि पुलिस अभियुक्तों को बचा रही है। फैजान की मां ने अदालत को बताया था कि जब वे उससे मिलने थाने पहुंची थी, तो उन्हें मिलने नहीं दिया गया, और एक रात पुलिस ने उन्हें फैजान को ले जाने दिया, तो उसकी हालत बहुत खरीब थी, उसके कपड़े खून से लथपथ थे। रहस्यमय और संदिग्ध बात यह है कि जिस रात फैजान को थाने में इस तरह के जख्म आए, उस रात थाने का सीसीटीवी कैमरा काम नहीं कर रहा था। अब हाईकोर्ट के जस्टिस अनूप भंभानी ने दिल्ली पुलिस के रवैये की कड़ी निंदा की है, और कहा है कि पुलिसवालों का पांच मुस्लिम लडक़ों को पीटना धार्मिक कट्टरता से प्रेरित था, और इसलिए ये एक हेट-क्राईम माना जाएगा, जिस पर कार्रवाई और तेजी से होनी चाहिए। जज ने पुलिस के इस बयान पर भी सवाल उठाया कि फैजान उस रात खुद थाने में रूकना चाहता था। जज ने कहा कि जब उसका परिवार उसे ढूंढ रहा था, तो उसके खुद थाने में रूकने की बात गले नहीं उतरती है, और यह एक असामान्य बात है। अदालत ने यह भी पूछा कि पुलिस फैजान का इलाज करवाने के बजाय उसे थाने क्यों ले गई? जज ने कहा कि ऐसे नाजुक मौके पर पुलिस थाने के सारे सीसीटीवी कैमरों का खराब हो जाना भी भरोसे के लायक नहीं है। इन सब तर्कों के आधार पर हाईकोर्ट ने इस मामले को दिल्ली पुलिस से लेकर सीबीआई को दे दिया है। यह एक अलग बात है कि आज की तारीख में दिल्ली पुलिस और सीबीआई दोनों ही केन्द्र सरकार के मातहत काम करती हैं, यह एक अलग बात हो सकती है कि सीबीआई में चूंकि अलग-अलग सभी प्रदेशों से आए हुए लोग प्रतिनियुक्ति पर काम करते हैं, इसलिए हो सकता है कि उसकी जांच कुछ ईमानदार हो सके। जहां तक दिल्ली पुलिस का सवाल है तो उसका सूरजमुखी के फूल की तरह सूरज की तरफ घूम जाना सत्ता के प्रति उसका समर्पण दिखाता है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2020 के दंगों की जांच को लेकर अदालतों ने दिल्ली पुलिस को पहले भी फटकार लगाई हुई है। सितंबर 2021 में दिल्ली कडक़डड़ूमा अदालत के जज विनोद यादव ने तीन लोगों को बरी करते हुए लिखा था कि आजादी के बाद हुए दिल्ली के सबसे भीषण साम्प्रदायिक दंगे को इतिहास देखेगा तो इसमें जांच एजेंसियों की नाकामी पर लोकतंत्र समर्थकों का ध्यान जाएगा कि किस तरह से जांच एजेंसियां वैज्ञानिक तौर-तरीके का इस्तेमाल नहीं कर पाईं। इसी अदालत के एक दूसरे जज पुलस्त्य प्रमचाला ने 2023 में दंगा फैलाने के मामले में तीन लोगों को बरी करते हुए लिखा था कि उन्हें शक है कि पुलिस ने सुबूतों के साथ छेड़छाड़ की है, और केस की ठीक तरह से जांच नहीं की।

हम दिल्ली पुलिस के खिलाफ पूर्वाग्रह, भेदभाव, और पक्षपात के मामलों की पूरी लिस्ट यहां पर गिनाना नहीं चाहते, वरना लोगों को यह तो याद है ही कि किस तरह अभी हाल ही में पहलवान लड़कियों की अनगिनत शिकायतों पर भी दिल्ली पुलिस ने भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ जुर्म दर्ज नहीं किया था, और सुप्रीम कोर्ट की दखल, और बहुत कड़े रूख के बाद बहुत मजबूरी में दिल्ली पुलिस ने अनमने ढंग से केस दर्ज किया था, लेकिन बृजभूषण शरण सिंह पर कार्रवाई तो कभी की भी नहीं। देश की राजधानी में पुलिस को बाकी राज्यों के मुकाबले भी कुछ बेहतर होना चाहिए क्योंकि वहां हर राज्य की सरकारों का आना-जाना लगे रहता है, वहां पर दुनिया के हर देश के डिप्लोमेटिक दफ्तर हैं, संयुक्त राष्ट्र की हर संस्था के दफ्तर हैं। लेकिन दिल्ली पुलिस केन्द्र सरकार के निजी सेवक की तरह उसके हुक्म पर काम करते दिखती है, और जब दिल्ली में पुलिस का यह हाल है, तो अधिकतर राज्यों में मानो इसी से सीखकर पुलिस सत्ता की चाटुकार एजेंसी बन गई दिखती है। आज कहीं पुलिस से किसी इलाके में लाउडस्पीकर बहुत तेज बजने की शिकायत की जाए तो पुलिस सबसे पहले यह पूछती है कि कोई राजनीतिक कार्यक्रम तो नहीं है, किस पार्टी का है, या धार्मिक कार्यक्रम है, तो किस धर्म का है? जब पुलिस को यह भरोसा हो जाता है कि उसकी किसी कार्रवाई से सत्ता पर काबिज लोग नाराज नहीं होंगे, तभी वह थाने से हिलने को तैयार होती है। अब सवाल यह है कि देश में राज्य की पुलिस से कौन-कौन सा काम छीन लिया जाए?

जिन मामलों की जांच में आम पुलिस काबिल मानी जा सकती है, उन मामलों को भी पुलिस की धर्म या राजनीति के साथ गिरोहबंदी की वजह से अगर सीबीआई को देने की नौबत आ रही है, तो पहली बात तो यह कि सीबीआई पर भी सत्ता के दबाव की तोहमतें कम नहीं है, और दूसरी बात यह कि देश की बुनियादी जांच एजेंसी पुलिस को जड़ों से पत्तों तक सुधारने के बजाय कुछ मामले उससे लेकर सीबीआई को दे देने से पुलिस में तो कोई सुधार आ नहीं सकता। मुद्दा कुछ चुनिंदा मामलों की जांच का नहीं है, मुद्दा तो पुलिस में जड़ों तक फैल चुकी बीमारी का है, जिसमें भ्रष्टाचार से लेकर साम्प्रदायिकता तक की बीमारी है, और जो राजनीति में खुशी-खुशी शामिल होने वाली एजेंसी हो गई है। हम अभी देश में पुलिस सुधार के लिए बने हुए आयोगों और उनकी रिपोर्टों की चर्चा करना नहीं चाहते, क्योंकि अभी इस कॉलम की बाकी जगह में उसे लिखा नहीं जा सकता। लेकिन अब यह समय आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट को केन्द्र और राज्य सरकारों से पुलिस की इस आम बर्बादी को सुधारने के बारे में राय मांगनी चाहिए, और दखल देना चाहिए। पुलिस राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र की बात रहती है, और हाल के बरसों में उसे राजनीतिक पसंद-नापसंद के आधार पर काम करने वाले घरेलू कामगार की तरह इस्तेमाल करना बढ़ते चले गया है। देश में जहां-जहां पुलिस का धार्मिक इस्तेमाल हो रहा है, वहां-वहां वह साम्प्रदायिक तो खुद होते चल रही है। धर्म और साम्प्रदायिकता के बीच अहाते की कोई दीवार नहीं खड़ी है, बल्कि इनके बीच एक खुला मैदान है, और पुलिस अपनी पसंद उस पर कहीं भी जाकर खड़ी हो सकती है। यह देश के लिए बहुत फिक्र की बात है, क्योंकि राज्यों में पुलिस का एकाधिकार है, और उसका कोई विकल्प भी नहीं है। दिल्ली में हुए साम्प्रदायिक दंगों को लेकर वहां की अदालतों के जजों को अगर बार-बार पुलिस के खिलाफ टिप्पणी करनी पड़ रही है, तो यह केन्द्र सरकार के खिलाफ भी कड़ी टिप्पणी है, और देश की बाकी संवैधानिक संस्थाओं को भी इस बारे में सोचना चाहिए। 


दीवारों पर लिक्खा है, 25 जुलाई 2024


 

नेता-अफसर बड़े मुजरिमों की हिफाजत के लिए बने हुए हैं सीट बेल्ट-एयरबैग

24 जुलाई 2024

  छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कुछ बड़े बिल्डरों ने सरकारी नहर को लगभग पूरा ही पाट दिया, और अवैध कब्जा करके अवैध निर्माण भी कर लिया। नतीजा यह निकला कि तकरीबन बंद हो चुकी इस नहर पर इन बड़े कब्जों के आसपास और लोगों ने भी कब्जा कर लिया। अब एक जनहित याचिका के हाईकोर्ट पहुंचने पर वहां से जांच का हुक्म दिया गया तो राज्य शासन ने कलेक्टर की रिपोर्ट के हवाले से यह माना कि सरकारी नहर पर इन बड़े बिल्डरों ने अवैध कब्जा और अवैध निर्माण कर लिया है। हाईकोर्ट इस बात पर हैरान है कि कलेक्टर की रिपोर्ट के बाद भी राजधानी के नगर निगम ने इस अवैध कब्जे को हटाया नहीं है। अदालत ने निगम आयुक्त को नोटिस भेजकर इस पर जवाब मांगा है।

राज्य बनने के पहले से भी छत्तीसगढ़ के इस सबसे बड़े शहर का हाल देखें, तो यहां बड़े-बड़े बिल्डर सरकारी जमीन पर, नहर, नालों, और तालाबों पर कब्जा करके कॉलोनियां बना लेते हैं। अभी शहर की एक सबसे महंगी, और सबसे अधिक इश्तहार करने वाली कॉलोनी का हाल यह है कि उसने अपने भीतर कोटवार की सरकारी जमीन को घेर लिया है, और चारों तरफ कॉलोनी बनाकर बेच दी है। हाईकोर्ट ने इस जमीन को कोटवार के नाम चढ़ाने का हुक्म भी दिया है, लेकिन इससे भी इस बड़े बिल्डर और कॉलोनाइजर की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। राजधानी में, और प्रदेश के दूसरे तमाम शहरों में भी कॉलोनियां बनाने वाले लोग कहीं बगीचों की जमीन बेच खा रहे हैं, तो कहीं खेल के मैदान पर मंदिर बना दे रहे हैं। इन पर कोई कार्रवाई इसलिए नहीं होती क्योंकि जिन विभागों को ऐसे गैरकानूनी कामों पर कार्रवाई करनी रहती है, उसके बड़े-बड़े अफसरों को अपनी कॉलोनी में पहले से चुनिंदा जमीनें दे दी जाती हैं, और उसके बाद ऐसे बिल्डरों के गैरकानूनी कामों को हिफाजत देना इन अफसरों की जिम्मेदारी हो जाती है। कई बरस हुए इस राजधानी में स्वागत विहार नाम की एक विवादास्पद कॉलोनी सरकारी जमीन पर कब्जा करके बना ली गई थी, और उस पर प्लॉट बेच दिए थे। बाद में शिकायतें होने पर पता लगा कि इस कॉलोनाइजर ने आसपास की तमाम सरकारी जमीनों पर कब्जा करके उसे बेच खाया था। मामले की जांच हुई तो इस कॉलोनी में प्लॉट पाने वाले अफसरों की लिस्ट में प्रदेश के सबसे बड़े अफसरों के, उनके रिश्तेदारों के नाम भरे पड़े थे, और ऐसे लोगों को उपकृत करने वाले मुजरिम पर हाथ डालने वाला कानून भला इस देश में कैसे बन सकता है? नतीजा यह हुआ कि स्वागत विहार में सरकारी जमीन पर कब्जे और उसकी बिक्री का साफ-साफ मामला रहते हुए भी वहां जमीन खरीदने वाले लोगों को बचाने के नाम पर सरकार ने किसी तरह इस मामले का निपटारा किया। जबकि सरकार की नीयत आम खरीददारों को बचाने की नहीं थी, बल्कि जो आला अफसर यहां जमीन के मालिक बन गए थे, उनके कब्जों को बचाने की थी।

छत्तीसगढ़ में हमने बीते दशकों में यह सबसे बड़ा खेल देखा है कि शहरों के नक्शों में अलग-अलग जमीनों के भू-उपयोग तय करते हुए जिसे फायदा पहुंचाना हो, उसकी रिहायशी जमीन को भी कारोबारी बना दिया जाए, और जिससे नाराजगी हो उसकी कारोबारी या रिहायशी जमीन को भी उद्यान या किसी और सार्वजनिक उपयोग का बना दिया जाए। राज्य शासन के बड़े-बड़े नौकरशाहों ने, और नेताओं ने अपनी जमीनों का सिर्फ रंग बदलवाकर करोड़ों की जमीन को अरबों का करवा लिया, और अपने आपको साफ-सुथरा भी बताते रहे। अभी हाईकोर्ट में मामला जाने के बाद भी सरकारी नहर पर से कब्जा अगर नहीं हट रहा है, तो सत्ता पर काबिज कुछ नेता और अफसर इस कार्रवाई को रोक रहे होंगे, क्योंकि जिस तरह किसी हादसे से बचने के लिए कारों में एयरबैग लगाए जाते हैं, उसी तरह कॉलोनाइजर अपनी स्कीम (या स्कैम?) में कुछ नेताओं और अफसरों को जमीनें देकर रखते हैं, और ऐेसे लोग एयरबैग बनकर कॉलोनाइजर की हिफाजत करते हैं। इस ताजा मामले में होना तो यह चाहिए था कि सरकार एक मिसाल कायम करती, सरकारी जमीन, खासकर सार्वजनिक उपयोग की नहर जैसी सहूलियत पर कब्जा कर लेना, सरकारी नालों को अपनी योजना के भीतर ले लेना, सरकारी जमीनों के इर्द-गिर्द अपनी कॉलोनी बना लेना, इन सब पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए थी। आज एक तरफ तो प्रदेश के अलग-अलग शहरों से यह सुनाई पड़ता है कि प्रशासन ने गैरकानूनी प्लॉटिंग करके जमीन बेचने वाले लोगों पर कार्रवाई की, और मशीनों से ऐसी अवैध कॉलोनियों को तहस-नहस कर दिया। दूसरी तरफ सरकारी नहर पर अवैध कब्जा और अवैध निर्माण करने वाले लोग धड़ल्ले से बड़े-बड़े कारोबार कर रहे हैं। कानून के खिलाफ काम करने वाले ऐसे बड़े बिल्डरों के इश्तहारों का दबाव इतना रहता है कि आमतौर पर हमलावर बने रहने वाले अखबार और टीवी चैनल भी सबसे बड़े मुजरिमों के मामलों में आंखें बंद कर लेते हैं, और फिर अपने कारोबारी कार्यक्रमों में अपने मंच पर ऐसे ही मुजरिमों को बुलाकर मंत्री-मुख्यमंत्री के हाथ से उनका सम्मान करवाते हैं। हमें इस बात पर भी हैरानी होती है कि जिन कारोबारियों के खिलाफ कई तरह के मुकदमे दर्ज रहते हैं, उनका सम्मान करने के लिए मंत्री-मुख्यमंत्री तैयार कैसे हो जाते हैं? पिछली सरकार में एक स्पा सेंटर चलाने वाले का सम्मान सीएम के हाथों करवाया गया था, और बाद में वह स्पा सेंटर वेश्यावृत्ति करते पकड़ाया था। सरकार में बैठे नेताओं को भी किसी कार्यक्रम में ऐसे नाजायज सम्मान करने से बचना चाहिए, क्योंकि ऐसे सम्मान के बाद ये मुजरिम अफसरों पर और अधिक दबाव डालने की हालत में आज जाते हैं।

फिलहाल छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जिस मामले पर छत्तीसगढ़ सरकार और रायपुर म्युनिसिपल को उनकी जिम्मेदारी याद दिलाई है, उस मामले पर आगे क्या होता है, यह देखना चाहिए। इसी राजधानी में सबसे बड़े अवैध कब्जे, और सबसे बड़े अवैध निर्माण हाईकोर्ट में मुकदमा हारने के बाद भी मजबूती से जमे हुए हैं, और दसियों करोड़ रूपए साल की कमाई कर रहे हैं। मुकदमा जीती हुई सरकार अपनी जीत के बाद भी मुजरिमों पर कोई कार्रवाई नहीं कर रही है, ऐसा करने वाली प्रदेश की यह तीसरी सरकार चल रही है, और इससे मुजरिमों की ताकत का अंदाज लगाया जा सकता है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट अगर चाहे तो वह लगे हाथों यह पूछ सकता है, कि उसके पिछले फैसलों पर दस-दस बरस हो जाने पर भी कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई है। वैसे तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी अवैध निर्माण इस शहर में टूटा नहीं है, और अपने फैसले पर अमल के लिए सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को ही इंचार्ज बनाया था।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 जुलाई 2024


 

दीवारों पर लिक्खा है, 23 जुलाई 2024


 

चीन और जापान के तजुर्बों से सीख सकता है हिन्दुस्तान

23 जुलाई 2024

   आबादी के आंकड़े बड़े दिलचस्प रहते हैं। इतिहास के मुकाबले आज की आबादी के आंकड़े तो सामने रहते हैं, लेकिन आज के मुकाबले भविष्य के आंकड़ों का एक अनुमान ही लगाया जा सकता है, और यह अनुमान जब बाकी दुनिया की आबादी के अनुमान के साथ जोडक़र देखा जाता है, तो यह बताता है कि 2050 या 2070 की दुनिया में हिन्दुस्तानियों का अनुपात क्या होगा। फिर आबादी को जब अलग-अलग उम्र के तबकों में बांटकर देखा जाता है, तो उससे भी बड़ी दिलचस्प तस्वीर उभरती है। आज सुबह ही चीन के आंकड़ों का एक विश्लेषण बता रहा था कि किस तरह वहां आने वाले बरसों में रिटायर्ड लोगों का अनुपात कामकाजी लोगों से अधिक हो जाएगा, और चीन की सरकार को यह समझ ही नहीं आ रहा है कि इतनी बड़ी संख्या में रिटायर्ड और अनुत्पादक हो चुके लोगों का खर्च कैसे उठाया जाएगा? कुछ लोग इसे चीन की इस गलती का नतीजा बतलाते हैं कि उसने अपने कामकाजी लोगों के रिटायर होने की उम्र बड़ी कम रखी थी, नतीजा यह हुआ कि जापान के मुकाबले चीन के लोग दस बरस कमउम्र में ही रिटायर होकर देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ बनने लगे। दुनिया का ऐसा कई किस्म का तजुर्बा हिन्दुस्तान के सामने भी बहुत सी बातों के सबक लेने का मौका पेश करता है।

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की भारत की ईकाई, यूएनएफपीए-इंडिया की प्रमुख इंड्रिया ओजनार ने अभी एक इंटरव्यू में भारत के सामने चुनौतियों और संभावनाओं का अपना एक विश्लेषण पेश किया है। उनका कहना है कि 2050 तक इस देश में बुजुर्ग आबादी आज के मुकाबले संख्या में दो गुना हो जाएगी। इस साल तक 60 साल से ऊपर के लोग 34 करोड़ 60 लाख हो जाने का अंदाज है। इन बुजुर्ग लोगों की रहने-खाने की जरूरतों को लेकर भारत को एक योजना बनाने की जरूरत है। इंड्रिया का कहना है कि खासकर बूढ़ी महिलाओं के लिए ऐसा करना जरूरी है जिनके अकेले रहने, और गरीबी का सामना करने की अधिक आशंका है। उन्होंने भारत की नौजवान आबादी के बारे में संभावनाओं की चर्चा की, और कहा कि इस देश में आज दस से बीस बरस के दायरे में 25 करोड़ से अधिक लोग हैं, और इस उम्र के लोगों का देश के लिए एक उत्पादक उपयोग हो सकता है, अगर इनकी क्षमता को उस लायक बनाया जा सके। उन्होंने कहा कि लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के साथ-साथ प्रशिक्षण और रोजगार सृजन में निवेश करने से नौजवान कामकाजी पीढ़ी की इस क्षमता को भुनाया जा सकता है।

हम इस पर चर्चा इसलिए भी कर रहे हैं कि अभी दो-चार दिन पहले ही हमने भारत के राज्यों से यह उम्मीद की थी कि वे अपनी नौजवान पीढ़ी को हुनरमंद बनाएं, उनके हुनर में उत्कृष्टता लेकर आएं, और उन्हें स्थानीय मजदूरी से ऊपर के कामों के लिए भी तैयार करें। हमने यह भी सुझाया था कि चीन जैसे देश में प्रति व्यक्ति आय भारत के लोगों के मुकाबले सवा पांच गुना से अधिक है, और यह फर्क आबादी को हुनरमंद बनाने का है, और फिर उस आबादी को हुनर के लायक काम मुहैया कराने का है। भारत को जापान और चीन के बीच के तजुर्बे के फर्क को देखना चाहिए। जापान में लोग औसतन दस बरस अधिक उम्र तक कामकाजी रहते हैं, और उनकी उत्पादक भूमिका की वजह से वे सरकार पर बोझ नहीं बनते। चीन ने अर्थव्यवस्था के कई पहलुओं पर खासा काम किया है, लेकिन इस एक मामले में वह चूक गया दिखता है। उसने अपनी आबादी पर एक फौलादी पकड़ बना रखी थी, और आज जब उसे अधिक से अधिक कामगारों की जरूरत है, देश के आर्थिक और निर्माण ढांचे के बेहतर इस्तेमाल के लिए उसे अधिक कामकाजी लोग चाहिए, तो उसकी नौजवान पीढ़ी सिमटती चली जा रही है, आज चीनी नौजवान अधेड़ हो जाते हैं, लेकिन वे एक से अधिक बच्चे पैदा करना नहीं चाहते। यह चीन की दूसरी बड़ी दीर्घकालीन गलती थी कि उसने अपनी अर्थव्यवस्था में कामगारों की उत्पादक भूमिका का अंदाज नहीं लगाया था, और आज उसे आबादी की कमी खल रही है। चीन की दूसरी चूक यह रही कि उसने कामकाजी लोगों को कमउम्र में रिटायर करना जारी रखा, और आज घर बैठे ऐसे लोग सरकार पर बोझ बन गए हैं।

भारत के सामने आज ऐसे तमाम तजुर्बों से नसीहत लेने का मौका है। यहां आबादी अभी चीन की तरह सिमटती नहीं जा रही है, और 2060 तक यह आबादी बढ़ते जाने का अंदाज है। आबादी बढऩे से कामगार भी बढ़ेंगे, और भारत की आर्थिक नीतियां, काम का माहौल अगर अच्छा रहेगा, तो चीन से कई वजहों से निराश बाकी देश भारत को चीन के अलावा एक और मेन्युफेक्चरिंग केन्द्र बना सकते हैं। लेकिन इसके लिए बहुत ही हुनरमंद कामगारों की जरूरत पड़ेगी, और भारत के दक्षिण के राज्यों के अलावा बहुत कम राज्य ऐसे हैं जो कि इसके लिए तैयार हैं। भारत को यह भी देखना होगा कि अलग-अलग कामकाज में किस तरह लोगों को अधिक उम्र तक रखा जा सकता है, ताकि उनका उत्पादक उपयोग देश के लिए हो सके, और वे बुढ़ापे की तकलीफों और जरूरतों से अपनी कमाई से ही जूझ सकें। भारत को नौजवान पीढ़ी को अंतरराष्ट्रीय स्तर के कामकाज के लिए भी तैयार करना पड़ेगा। आज एप्पल जैसी एक सबसे बड़ी कंपनी के मोबाइल फोन बनाने का कारखाना दक्षिण भारत के तमिलनाडु और कर्नाटक में चल रहा है। इन दो राज्यों को कारखानों ने इसलिए भी छांटा होगा कि यहां पर तकनीकी कौशलयुक्त कामगार उपलब्ध होंगे। तमिलनाडु में इसके लिए एक और कारखाना बन रहा है, और आज आईफोन बनाने में 20 हजार कर्मचारी लगे हैं, जो बढक़र 55 हजार हो जाएंगे। भारत जैसे देश में अपनी आबादी को कामकाजी बनाने, और कमाऊ बनाए रखने में केन्द्र सरकार से परे राज्य सरकारों की भी बहुत बड़ी भूमिका है। हर राज्य सरकार को यह सोचना चाहिए कि क्या उसकी कामकाजी आबादी महज सरकारी राशन, और न्यूनतम मजदूरी पर जिंदा है, या उसके उगाए अनाज पर सरकारी सब्सिडी से जिंदा है? अपने कामगारों को सरकारी राशन पर जिंदा भी रखा जा सकता है, और उन्हें हुनरमंद-कामकाजी बनाकर चीन की तरह उनके पसीने की एक-एक बूंद का नगदीकरण भी किया जा सकता है। भारत को अपने कामगारों को रिटायर करने की हड़बड़ी नहीं रहना चाहिए, बल्कि अधिक उम्र तक लोग क्या-क्या काम कर सकते हैं, उसकी संभावनाएं भी ढूंढनी चाहिए, और नई पीढ़ी को आज की विकसित दुनिया की जरूरतों के मुताबिक कौन-कौन से हुनर सिखाकर, कितना उत्कृष्ट बनाय जा सकता है, यह भी देखना चाहिए। हालांकि हम जो कह रहे हैं उसके लिए पांच-पांच बरस में होने वाले चुनावों के दबावों से परे के लोग लगेंगे जो लंबी दूरी की सोच सकें, और आबादी के हर व्यक्ति को देश के विकास में जोड़ सकें। 

(Daily Chhattisgarh)

सुबह के भूले जो बाइडन शाम तक घर लौटे, कमला हैरिस की घोषणा

 22 जुलाई 2024

   

दुनिया का एक बड़ा असमंजस आज खत्म हुआ। अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने अपनी पार्टी के लोगों, दानदाताओं, और शुभचिंतकों की बात सुनी, और राष्ट्रपति चुनाव न लडऩा तय किया। उन्होंने इसके साथ-साथ अपनी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस का नाम डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार के लिए सुझाया है। वे न सिर्फ राष्ट्रपति चुनाव से बाहर हो गए हैं, बल्कि उन्होंने पार्टी के भीतर एक दुविधा को भी खत्म कर दिया कि उनके बाद अब और किसे उम्मीदवार बनाया जाए। बाइडन का समर्थन करने वाले जितने लोग हैं, उनमें से अधिकतर अब कमला हैरिस के साथ हो जाएंगे, और ऐसा माना जा रहा है कि चुनाव इतना करीब आ चुका है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर कमला हैरिस को चुनौती देने की हसरत रखने वाले लोग भी पार्टी में अस्थिरता पैदा करने की तोहमत पाना नहीं चाहेंगे, और ऐसा लगता है कि रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार, भूतपूर्व राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के मुकाबले अब कमला हैरिस की उम्मीदवारी तय हो सकती है। जो बाइडन ने न सिर्फ मुकाबले से बाहर होना तय किया है बल्कि कमला हैरिस को उपराष्ट्रपति बनाने को अपना सबसे अच्छा फैसला भी घोषित किया है, इस तरह से अब उनका पूरा समर्थन कमला हैरिस को है। भारतवंशी मां और जमैका से अमरीका आए पिता की संतान, कमला हैरिस अमरीका की पहली महिला राष्ट्रपति भी बन सकती है, और वे पहली काली महिला राष्ट्रपति उम्मीदवार तो बनी हुई दिख रही है। अमरीका के सामने ओबामा के बाद अब यह दुविधा तो नहीं बची है कि क्या कोई काला अमरीकी राष्ट्रपति बन सकता है, लेकिन महिला को राष्ट्रपति बनाने वाले लोगों को तब निराशा हुई थी जब हिलेरी क्लिंटन को राष्ट्रपति चुनाव में शिकस्त मिली थी। अमरीकी समाज को इस बार कमला हैरिस की शक्ल में पहली काली महिला चुनने का मौका मिल रहा है, देखते हैं उसका फैसला क्या होता है। यहां यह भी जिक्र करना काम का हो सकता है कि एक पिछले अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की पत्नी मिशेल ओबामा का नाम भी डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार के तौर पर लिया गया था, लेकिन उन्होंने खुद ही इन चर्चाओं को खारिज कर दिया था। ओबामा का नाम जो बाइडन के उन शुभचिंतकों में शामिल था जिन्होंने राष्ट्रपति को मनाने की कोशिश की थी कि अपनी सेहत और उम्र का हाल देखते हुए उन्हें चुनाव नहीं लडऩा चाहिए। 

कमला हैरिस को लेकर भारत के जो लोग अतिउत्साही हैं, उन्हें यह बात याद रखना चाहिए कि वे वहीं पर पैदा हुई हैं, और उनकी मां भारत के तमिलनाडु से अमरीका जाकर विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक की तरह काम किया था, और वहीं जमैका से आए एक छात्र से उनकी मुलाकात हुई थी, और फिर शादी के बाद कमला हैरिस का जन्म हुआ। कमला हैरिस का अपने पुरखों के यहां चेन्नई आना-जाना लगे रहा, लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति के रूप में हिन्दुस्तान को उनसे किसी रियायत की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। भारत के मामलों को अगर वे बारीकी से देखती भी होंगी, तो भी वे इस देश की कई मौजूदा बातों को लेकर निराश भी होंगी। लेकिन भारत की महिलाओं के लिए यह एक प्रेरणा की बात हो सकती है कि किस तरह कमला की मां ने भारत से जाकर बर्कले विश्वविद्यालय में पहले दाखिला पाया था, फिर काम किया था, और उनकी बेटी आज अमरीकी राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार है। अमरीका में नस्लीय भेदभाव और रंगभेद अपनी जगह है, लेकिन वहां हर किस्म के लोगों की आगे बढऩे की संभावनाएं अपार रहती हैं। अमरीका की इस खूबी से आज कम से कम हिन्दुस्तान सरीखे देश को यह सीखने मिल सकता है कि किस तरह हर किसी को बराबरी से आगे बढऩे के मौके दिए जाएं, तो देश में कैसी प्रतिभाएं सामने आ सकती हैं। हिन्दुस्तान में विख्यात वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम के इतिहास गढ़ देने के बाद भी आज किसी अब्दुल को सडक़ किनारे चायठेला लगाने में भी खतरा झेलना पड़ रहा है, और ऐसे देश को अमरीका में पैदा कमला हैरिस के आसमान तक पहुंचने पर खुशी मनाने का ज्यादा हक तो है नहीं।

खैर, हिन्दुस्तान से परे अमरीका की बात करें, तो जो बाइडन ने समय रहते एक अच्छा फैसला लिया है। उनकी उम्र उनकी जीत की संभावनाओं को घटा रही थी, और उनकी सेहत बार-बार लडख़ड़ा रही थी। यह एक अलग बात है कि पिछली आधी सदी के संसदीय जीवन का एक असाधारण और अनोखा तजुर्बा उनके साथ था जो कि जटिल अंतरराष्ट्रीय स्थितियों में मुश्किल फैसले लेने में मददगार हो सकता था। लेकिन चुनाव तो जनधारणाओं पर भी लड़ा जाता है, और ट्रंप की तरह गोली खाए हुए, और जख्मी सांड की तरह मंच और माईक पर फुंफकारते हुए रिपब्लिकन उम्मीदवार के सामने जो बाइडन की संभावनाएं बुरी तरह सिमट चुकी थीं। ऐसे में उन्होंने अपनी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस का नाम बढ़ाकर एक अच्छा फैसला लिया है, वरना बहुत बुरी तरह शिकस्त की हालत में उन्हें इतिहास में अपनी डेमोक्रेटिक पार्टी को बड़ा नुकसान पहुंचाने वाला दर्ज किया जाता। आज वे बेफिक्र होकर राष्ट्रपति का कार्यकाल पूरा कर सकते हैं, और डेमोक्रेटिक पार्टी इस तोहमत से भी बच रही है कि उसने पहली बार किसी काली महिला की संभावनाएं पैदा होने पर भी उन्हें खारिज कर दिया। ट्रंप कल तक बाइडन को कमजोर और बीमार साबित कर रहे थे, अब कमला हैरिस के मुकाबले वे खुद बूढ़े दिखने लगेंगे। फिर यह भी है कि ट्रंप अपनी बदजुबानी, बददिमागी, और बदचलनी के साथ कमला हैरिस के मुकाबले अधिक बुरे दिखने लगेंगे, जिनके साथ किसी तरह का कोई दाग लगा हुआ नहीं है। हालांकि जो बाइडन के साथ भी उनके जवान बेटे के एक-दो कानूनी मामलों से परे कोई बड़े विवाद नहीं थे, लेकिन कमला हैरिस बाइडन के मुकाबले भी अधिक बेदाग हैं।

अमरीकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार तय करने का काम उनकी पार्टी का कोई संगठन नहीं करता है, बल्कि पूरे देश में बिखरे हुए पार्टी के स्थानीय नेता बड़े लोकतांत्रिक तरीके से करते हैं जिसे भारत के मॉडल से नहीं समझा जा सकता। वहां पर अपनी पार्टी का उम्मीदवार बनने के लिए पार्टी के नेताओं के बीच मंच और माईक से जैसा खुला मुकाबला होता है, वह बड़ा पारदर्शी और हिम्मती काम होता है। एक-दूसरे के खिलाफ मतभेद खुलकर सामने आते हैं, और जब किसी एक उम्मीदवार को सबसे अधिक समर्थन मिल जाता है, तो फिर बाकी के दावेदार भी उसका साथ देते हैं। वह एक अलग ही किस्म की राजनीतिक व्यवस्था है, और भारत में जिस तरह पार्टियों में आंतरिक तानाशाही चलती है, यहां अमरीकी मॉडल को समझना भी मुश्किल है। कमला हैरिस की उम्मीदवारी से, जो कि तय सी लग रही है, उससे हमें कुछ बातों की खुशी है कि ट्रंप जैसे घटिया इंसान के मुकाबले अमरीकी मतदाताओं को एक भली और काबिल महिला को चुनने का मौका मिल रहा है। एक काली महिला को राष्ट्रपति बनाने का मौका पहली बार है, और कमला हैरिस ने पिछले चार बरस राष्ट्रपति भवन के काम को, और उस मार्फत पूरी दुनिया को बड़ी बारीकी से देखा है। वे जो बाइडन की विचारधारा और रणनीति को ही मोटेतौर पर जारी रख सकती हैं, और ट्रंप की शक्ल में दुनिया के सामने खड़े हुए एक भयानक खतरे को टालने के लिए वे एक विकल्प की तरह मौजूद हैं। आज अरब देशों से लेकर पूरे के पूरे योरप तक कोई भी ट्रंप को झेलने के लिए तैयार नहीं है, ट्रंप एक पूरी तरह सिद्धांतहीन, बेअक्ल सनकी तानाशाह है, लेकिन अमरीकी जनता एक बार उसे चुन चुकी है, और अमरीकी जनता के बहुमत का फैसला हमेशा सही रहता हो, ऐसा जरूरी भी नहीं है, वह घटिया लोगों को भी चुनने का भी इतिहास रखती है।

फिलहाल जो बाइडन ने बहुत अधिक देर किए बिना एक सही फैसला अपनी पार्टी और अमरीकी वोटरों के सामने रखा है, और हम भी इससे चुनाव में पडऩे जा रहे फर्क को लेकर उत्साहित हैं कि डेमोक्रेटिक उम्मीदवार को महज बढ़ती उम्र और घटती ताकत की वजह से खारिज नहीं किया जाएगा, और ट्रंप के मुकाबले करीब बीस बरस छोटी कमला हैरिस डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए भी एक बेहतर लंबे भविष्य की उम्मीद है, अमरीका के लिए तो है ही।  

दीवारों पर लिक्खा है, 22 जुलाई 2024


(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 21 जुलाई 2024


 

कम्प्यूटर-पैरालिसिस के सबक, साइबर-आतंकियों से बचने की तैयारी जरूरी

   21 जुलाई 2024

   

दुनिया में सबसे बड़ी संख्या में कम्प्यूटरों पर माइक्रोसॉफ्ट का ऑपरेटिंग सॉफ्टवेयर विंडोज काम करता है। अभी माइक्रोसॉफ्ट से जुड़ी हुई साइबर सुरक्षा मुहैया कराने वाली एक कंपनी क्राउडस्ट्राईक ने सॉफ्टवेयर को अपडेट किया, तो माइक्रोसॉफ्ट का सर्वर ही डाउन हो गया, और उससे जुड़े हुए दर्जनों देशों की दसियों हजार कंपनियों के कम्प्यूटर ठप्प पड़ गए। पूरी दुनिया में बैंकों, शेयर बाजारों का काम ठप्प हो गया, हजारों विमान उडऩे से रूक गए, अस्पतालों का काम रूक गया, मीडिया कंपनियों का काम रूक गया। एक साथ दुनिया में दसियों लाख कम्प्यूटरों पर स्क्रीन नीली दिखने लगी, और क्राउडस्ट्राईक ने अपनी चूक को सुधार भी लिया, लेकिन एक बार बैठ गए कम्प्यूटरों में फिर जान डालने के लिए हर किसी को बहुत मशक्कत करनी पड़ी, जो अभी भी जारी है। हिन्दुस्तान भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुआ था। और पूरी दुनिया में यह चर्चा चल रही है कि क्या कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर या साइबर सुरक्षा के मामले में गिनी-चुनी कंपनियों का एकाधिकार दुनिया के लिए खतरनाक नहीं है? आज जब पूरी दुनिया का कामकाज इन्हीं दो-चार कंपनियों के हार्डवेयर या सॉफ्टवेयर पर टिका हुआ है, तो इसके खतरे समझना जरूरी है। न्यूयॉर्क पुलिस ने कम्प्यूटरों को लकवा मार जाने के बारे में यह कहा कि एकाएक उसके पास काम करने के औजार 1970 और 1980 के दशक के रह गए थे, और टेलीफोन और कागज-पेन से न्यूयॉर्क की पुलिस पर नियंत्रण किया जा रहा था, और यह इंतजाम पूरी तरह नाकाफी था।

लेकिन हम पहले भी इस तरह की आशंका जता चुके थे कि दुनिया के साइबर-हैकर, और अब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस नाम के औजार या हथियार से लैस साइबर-आतंकी किसी भी वक्त दुनिया को घुटनों पर ला सकते हैं। अभी तो एक साइबर-सुरक्षा कंपनी के बनाए हुए सॉफ्टवेयर में एक चूक से एक-दो दिन दुनिया की जिंदगी बुरी तरह प्रभावित ही हुई थी, लेकिन अगर किसी दिन साइबर-आतंकी अपनी पूरी तैयारी से आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल करके अगर दुनिया के प्रमुख कम्प्यूटरों पर काबू पा लेंगे, तो क्या होगा? हॉलीवुड में 20 बरस पहले ऐसी फिल्में बन चुकी हैं जिनमें साइबर-मुजरिम सार्वजनिक कम्प्यूटर प्रणालियों पर कब्जा कर लेते हैं, और किस तरह महानगरों के ट्रैफिक को पल भर में ध्वस्त कर देते हैं। जब चौराहों पर हर तरफ ग्रीन लाईट दिखने लगेगी, तो जाहिर है कि हर तरफ से आगे बढ़ी गाडिय़ां टकराकर सब कुछ उलझा देंगी, जिसे सुलझाना नामुमकिन सा रहेगा। इसके अलावा आज ट्रेन, प्लेन, बैंक, एटीएम, क्रेडिट कार्ड, अस्पताल के रिकॉर्ड, सुपर बाजारों की बिलिंग, पेट्रोल पंपों का काम, सब कुछ तो कम्प्यूटरों, और इंटरनेट से जुड़ गया है। अगर कोई आतंकी गिरोह एक तैयारी करके इन सबको चौपट कर दे, मोबाइल फोन और इंटरनेट ठप्प कर दे, बिजलीघरों का उत्पादन ठप्प कर दे, पानी की सप्लाई बंद कर दे, तो अपने आपको बचाने के लिए आबादी का एक बड़ा हिस्सा एक दिन के भीतर ही दुकानों से सामान, या कहीं से ईंधन लेने के लिए जुर्म करने को तैयार हो जाएगा। जो अमन-पसंद लोग हैं वे भी हिंसा पर उतारू हो जाएंगे, और दुनिया के ऐसे देशों की पुलिस अराजक हालात पर एक फीसदी भी काबू नहीं पा सकेगी। सरकार की आज की क्षमता नियमों के तहत चलने वाले समाज के मुताबिक बनी हुई है, और अगर आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपने जिंदा रहने के लिए लूटपाट पर आमादा रहेगा, तो उसे रोकने के लिए तो दूसरे ग्रह से लाई पुलिस भी कम पड़ेगी।

पूरी दुनिया आज जिस तरह ऑटोमेटिक मशीनों पर, कम्प्यूटरों, और संचार व्यवस्था पर टिक गई है, वह अपने आपमें एक नाजुक और खतरनाक नौबत है। हम यह तो नहीं कहते कि इससे बेहतर कोई इंतजाम हो सकता था, लेकिन यह इंतजाम कितना नाजुक है, यह भी देखने-समझने की जरूरत है। अभी तो दुनिया में छोटे-मोटे जुर्म करने वाले साइबर-मुजरिमों ने इस धंधे को दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बना लिया है। और अगर साइबर-जुर्म में, साइबर-आतंकी घुस जाएंगे, उनके हाथ आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस जैसा बड़ा हथियार आज भी है, तो वे अपनी विचारधारा और मकसद के हिसाब से किसी भी स्तर की तबाही ला सकते हैं। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की अपनी कोई नैतिकता या सोच नहीं है, अपनी कोई विचारधारा नहीं है, इसलिए वह अगर आतंकियों का हथियार रहेगी, तो उनकी ताकत को दुनिया की सरकारों की क्षमता के ऊपर ले जा सकती है। हमने पहले भी एक बार इस मुद्दे को उठाया था कि सिर्फ ठगने या जुर्म करने के लिए नहीं, दुनिया में पर्यावरण की तबाही को रोकने के लिए भी अगर कोई आतंकी समूह बीड़ा उठा लेगा, तो हो सकता है कि वह दुनिया में पर्यावरण को सबसे बड़ा नुकसान पहुंचाने वाले अतिसंपन्न देशों, अतिसंपन्न लोगों, और सबसे अधिक सुख-सुविधाओं के खर्चीले साधनों को तबाह करने पर जुट जाएं। ऐसे तमाम तबकों की शिनाख्त बड़ी आसान है, और ऐसे पहचाने और तय किए गए निशानों पर हमले की एक साजिश बनाई जा सकती है। किसी विचारधारा के प्रति समर्पित लोग यह सोच सकते हैं कि अतिसंपन्न तबकों को निशाना बनाकर पर्यावरण को बचाया जा सकता है, जलवायु परिवर्तन की धीमा किया जा सकता है, और इस सोच के साथ ये लोग धरती के साधनों की बड़ी बर्बादी को रोकने का हमला कर सकते हैं। हमारा ख्याल है कि किसी भी तरह की सुरक्षा व्यवस्था मुजरिमों और आतंकियों से अधिक असरदार नहीं रहती, और जब कुछ बड़े हमले हो चुके रहते हैं, तब जाकर सबसे काबिल देश भी अपने को बचा सकते हैं। 11 सितंबर को न्यूयॉर्क के वल्र्ड ट्रेड सेंटर में ओसामा के विमान जिस तरह घुसे थे, उसके लिए अमरीका तैयार नहीं था, अभी पिछले बरस 7 अक्टूबर को फिलीस्तीन के हमास के हमलावरों ने जिस तरह इजराइल पर हमला किया था, इस फौजी देश की सारी सुरक्षा तैयारियां धरी रह गई थीं।  यह भी समझने की जरूरत है कि आज फिलीस्तीनियों पर जिस तरह के जुल्म हो रहे हैं, उसके खिलाफ अगर दुनिया के साइबर-घुसपैठिया दिमाग एकजुट होकर इजराइल और उसके मददगार देशों पर, कारोबारियों पर, बैंकों, और उनकी अर्थव्यवस्था पर हमला करेंगे, तो 7 अक्टूबर जैसी नौबत फिर सामने रहेगी।

सिर्फ पर्यावरण बचाने के लिए नहीं, दुनिया में गरीबों को हक दिलाने के लिए हो सकता है कि कोई आतंकी समूह अमीरों पर और पूंजीवादी व्यवस्था पर साइबर-हमला करे, या धार्मिक विचारधारा के आधार पर कोई आतंकी समूह अपने से असहमत देशों या अर्थव्यवस्थाओं पर हमला करे। आज जिस घटना को लेकर हम इन खतरों को गिना रहे हैं, वह तो एक कंपनी की चूक से उपजी हुई नौबत है, लेकिन जब दुनिया के कुछ सबसे काबिल, शातिर, और आतंकी दिमाग दुनिया के किसी तबके को तहस-नहस करने पर उतारू हो जाएंगे, तो शुरूआती हमलों का सामना करने की तैयारी तो शायद किसी की नहीं रहेगी। और कई अर्थव्यवस्थाएं वल्र्ड ट्रेड सेंटर की इमारतों के मलबे की तरह दिखने लगेंगी। इसलिए कम्प्यूटर-इंटरनेट, और इनसे चलने वाली दुनिया की व्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए यह भी जरूरी है कि दुनिया की अपनी शासन व्यवस्था को भी न्यायप्रिय रखा जाए, उसके बिना कुछ भी सुरक्षित नहीं रह पाएगा।

(Daily Chhattisgarh)

खत्म तो राजभवन हों, लेकिन तब तक राज्यपालों की एफआईआर से छूट हटे

  21 जुलाई 2024

 हिन्दुस्तानी सुप्रीम कोर्ट अभी एक दिलचस्प मामले पर गौर कर रहा है कि भारत के राज्यपालों को आपराधिक मुकदमों से मिली सुरक्षा जायज है या नहीं। हम बरसों से इस बात को लिखते आ रहे हैं कि संविधान में राज्यपालों को दी गई हिफाजत की रियायत अलोकतांत्रिक है। अभी सुप्रीम कोर्ट में यह मामला पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सी.वी.आनंद बोस के खिलाफ राजभवन की एक महिला कर्मचारी द्वारा यौन शोषण की शिकायत को लेकर पहुंचा है। संविधान में धारा 361 में राज्यपाल को पद पर रहने तक किसी भी आपराधिक मामले से छूट मिली हुई है। इसलिए बंगाल पुलिस महिला की एफआईआर पर भी राज्यपाल पर कोई कार्रवाई नहीं कर पा रही है। लेकिन हम देश में कई दूसरे राज्यपालों की मिसालें भी देखें तो भी यह समझ पड़ता है कि आज के वक्त राज्यपालों का जो हाल रहता है उसमें ऐसी अंधी रियायत देना ठीक नहीं है। दूसरे भी कई राज्यपाल ऐसे हुए हैं जो कि बड़े-बड़े आपराधिक मामलों में फंसे रहे, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हो पाई। मध्यप्रदेश में 2015 में भयानक विशाल पैमाने के व्यापमं घोटाले में वहां के उस वक्त के राज्यपाल रामनरेश यादव के खिलाफ विशेष जांच दल ने सुबूत पाए थे। उनके बेटे शैलेष यादव को भी भर्ती घोटाले में शामिल पाया गया था। उनके ओएसडी धनराज यादव को गिरफ्तार भी किया गया था। अपने खिलाफ मामला देखकर राज्यपाल हाईकोर्ट गए थे कि संविधान के हिसाब से पद पर रहने तक उन पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकती, और अदालत ने रामनरेश यादव की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी, लेकिन जांच जारी रखने की छूट दी थी। जांच दल के मुखिया ने कहा था कि यादव के रिटायरमेंट के बाद उनके खिलाफ कार्रवाई होगी, लेकिन शायद वे ऐसी नौबत आने के पहले गुजर ही गए थे। यह मामला इतना भयानक था कि इसमें एमपी के बड़े भाजपा नेता और राज्य के मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा की भी गिरफ्तारी शिक्षक भर्ती घोटाले में हुई थी।

संविधान में राज्यपाल की चाहे जो भी भूमिका बनाई गई हो, उसे किसी तरह की अलोकतांत्रिक हिफाजत देना बहुत ही नाजायज है। इसका मतलब तो यह है कि जिन बातों को लेकर एक छोटे कर्मचारी को तुरंत जेल में डाला जा सकता है, उससे हजार गुना बड़ा जुर्म करके भी राज्यपाल या राष्ट्रपति जैसे लोग बच सकते हैं। यह परले दर्जे की शर्मिंदगी की बात है कि जांच में कुसूरवार दिखने पर भी राज्यपाल अपने संवैधानिक ओहदे को छोडक़र घर नहीं बैठते, बल्कि कुर्सी पर चिपके रहकर गिरफ्तारी से बचने के लिए एक पेशेवर मुजरिम की तरह अदालत दौड़ते हैं। कुछ लोगों को अपनी ऊंची और विशेषाधिकार से लैस कुर्सी की इज्जत का ख्याल भी नहीं रहता, बस उससे चिपके रहकर, तरह-तरह के जुर्म करके कमाने या मजा लेने की ही सूझती है।

मैं लंबे समय से राज्यपाल की व्यवस्था के ही खिलाफ लिखते आ रहा हूं। मेरा मानना है कि राजभवन की व्यवस्था पूरी तरह गैरजरूरी, अलोकतांत्रिक, राजनीतिक-साजिश की, और खर्चीली है। दुनिया के बहुत से लोकतंत्र बिना ऐसे राज्यपाल के चलते हैं, और उनका कोई भी काम नहीं रूकता। हिन्दुस्तान में तो राजभवनों को राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने, विधायकों की खरीद-फरोख्त की मंडी चलाने, भ्रष्टाचार करने, और निर्वाचित लोकतांत्रिक ताकतों को कमजोर करने के लिए नियमित रूप से इस्तेमाल किया जाता है। जाने कितने ही राज्यपालों को सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर झिडक़ चुका है, और महाराष्ट्र सरीखे राज्य में तो एक वक्त राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष इन दोनों के बीच यह मुकाबला चल रहा था कि केन्द्र सरकार को अधिक खुश कौन कर सकता है। अब जब राज्यों में निर्वाचित विधायकों की चुनी गई सरकार बिल्कुल साफ-साफ चलनी चाहिए, तो उसमें केन्द्र सरकार की राजनीतिक एजेंट की तरह राज्यपाल साजिश में जुट जाएं, यह लोकतंत्र को कमजोर और खोखला करने के अलावा और कुछ नहीं है। फिर अलग-अलग समय पर अलग-अलग प्रदेशों के राज्यपाल भ्रष्टाचार में भी फंसे रहे, निर्वाचित सरकार के काम में अड़ंगे लगाते रहे, और कुछ राजभवन तो सेक्स के मजे का अड्डा भी बने रहे। लोगों को शायद होगा कि किस तरह एक बहुत बुजुर्ग हो चुके राज्यपाल के सेक्स-वीडियो हैदराबाद के राजभवन से निकलकर चारों तरफ फैले थे, और एक उच्च-सवर्ण बुजुर्ग की रवानगी का सामान बने थे। भारत में ऊंचे संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों के जुर्म करने पर धर्म या जाति की कोई व्यवस्था आड़े नहीं आती, बल्कि मुजरिमों का एक जातिविहीन, सर्वधर्म समाज अलग ही नजर आता है।

सुप्रीम कोर्ट शायद राज्यपाल की संवैधानिक व्यवस्था पर सुनवाई करने का हकदार नहीं है, लेकिन राज्यपाल को किसी भी जुर्म के मामले में मिले हुए संरक्षण के खिलाफ सुनवाई का हक तो उसे है ही। लोकतंत्र में ऐसी कोई भी रियायत किसी को नहीं मिलनी चाहिए। जिस वक्त ऐसी रियायत का इंतजाम संविधान में किया गया होगा, उस वक्त लोगों को पता नहीं होगा कि एक दिन ऐसा आएगा, जब राज्यपाल अपनी आल-औलाद सहित राज्य की नौकरियों को बेचने का धंधा करेंगे, कॉलेजों की सीट बेचेंगे, महिला कर्मचारियों को दबोचेंगे, और उनके सेक्स के वीडियो लोगों का वयस्क मनोरंजन करेंगे। अब जब लोकतंत्र की इतनी दुर्गति हो चुकी है, और राज्यपाल बहुत से राज्यों में केन्द्र से सुपारी लेकर लोकतांत्रिक-संवैधानिक व्यवस्था की हत्या के लिए भाड़े के हत्यारे की तरह काम करने लगे हैं, तो ऐसे मुजरिमों को पूरे कार्यकाल तक मुकदमे से रियायत क्यों दी जाए? ममता बैनर्जी चाहे राज्यपाल के खिलाफ ही क्यों न रहती आई हो, क्या उस वजह से राजभवन की महिला कर्मचारी को अपने देहशोषण के खिलाफ आवाज उठाने का हक गंवाना पड़ेगा? और जब यह बेशर्म राज्यपाल मीडिया के सौ चुनिंदा लोगों को इकट्ठा करके राजभवन के सीसीटीवी कैमरों की चुनिंदा रिकॉर्डिंग दिखाकर, उनमें उस महिला को दिखाकर अपने को बेकसूर साबित करने का काम कर सकता है, तो यही काम वह अदालत के कटघरे से करे। इस देश में ऊंचे ओहदे पर बैठे एक आदमी का ऐसा हक कैसे हो सकता है कि उसके जुल्म के खिलाफ एक आम नागरिक को इंसाफ पाने का हक न रह जाए? अगर किसी वक्त मासूमियत और नासमझी से ऐसी संवैधानिक व्यवस्था की भी गई थी, तो राज्यपालों के ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए यह व्यवस्था खत्म करनी चाहिए। हो सकता है कि यह संवैधानिक-हिफाजत खत्म होने से बहुत से राज्यपालों का जुर्म करना कम हो जाएगा। आज तो यह हिफाजत राज्यपालों को मुजरिम बनने का एक असाधारण हौसला देती है, यह लोकतंत्र की किस भावना का सम्मान है? देश के राजभवनों में महिलाओं की हिफाजत के लिए भी यह जरूरी है कि राज्यपालों के खूनी पंजों को भी हथकड़ी के दायरे में लाया जाए।  

(Daily Chhattisgarh)

सुप्रीम कोर्ट को अब न सुनाई पड़ रही हेट-स्पीच, और न दिख रही हेट-हरकतें!

   20 जुलाई 2024

  उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, और मध्यप्रदेश ठीक उसी तरह हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बने हुए हैं, जिस तरह आज दुनिया के कुछ दूसरे देशों को कुछ दूसरे धर्मों के सबसे अधिक हमलावर चेहरों की प्रयोगशाला पाया जा रहा है। उत्तरप्रदेश में मोदी सरकार का ताजा आदेश यह है कि जहां-जहां कांवड़ यात्रा निकलती है, वहां रास्ते के सभी दुकानदारों को अपना नाम और कर्मचारियों का नाम लिखना होगा ताकि उनका जात-धरम कांवडिय़ों को पता लग सके, और उनकी दुकान से कुछ खाने-पीने से उनकी धार्मिक आस्था आहत न हो। मोदी सरकार बनने के कुछ महीनों के भीतर ही देश में पहली बार किसी धार्मिक-साम्प्रदायिक मुद्दे पर एनडीए गठबंधन के भीतर दरार दिख रही है, और चिराग पासवान सहित जेडीयू ने भी इस पर आपत्ति की है। इस पर बखेड़ा अधिक होने के बाद योगी ने यह आदेश पूरे प्रदेश में लागू करने की घोषणा की है, और कॉमन सिविल कोड लागू करने में देश में अव्वल रहने वाले उत्तराखंड के भाजपा मुख्यमंत्री तुरंत ही इन पदचिन्हों पर चल पड़े हैं। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी सरीखे बहुत से राजनीतिक दलों ने इसका घोर विरोध किया है, और अखिलेश यादव ने तो कहा है कि अदालत को खुद इस मामले पर गौर करना चाहिए। इन दिनों भारत में हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं हैरान करने की रफ्तार से आहत हो रही हैं, और हिन्दू राजनीति करने वाली भाजपा की अगुवाई वाला केन्द्र पर सत्तारूढ़ गठबंधन अपने तीसरे कार्यकाल में दाखिल हो चुका है, लेकिन देश में हिन्दू इतने खतरे में दिख रहे हैं, जितने खतरे में इसके पहले कभी नहीं थे।

हिन्दुस्तान के अलग-अलग राजनीतिक दलों का धर्म और साम्प्रदायिकता पर अलग-अलग रूख बड़ा साफ है, लेकिन वह चुनाव के वक्त और अधिक ईमानदारी से दिखता है। उत्तरप्रदेश में तो लोकसभा का चुनाव भी निपट गया है, और विधानसभा के चुनाव बहुत दूर हैं। ऐसे में आक्रामक हिन्दुत्व के पैरोकार, सीएम योगी आदित्यनाथ के अपने असाधारण पैमानों पर भी यह ताजा आदेश कुछ अधिक ही आक्रामक है। जो लोग पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तरप्रदेश में भाजपा की खासी शर्मनाक पराजय का विश्लेषण कर रहे हैं, उनमें से कुछ जानकार लोगों का यह कहना है कि अपनी 60 सीटों में से 17 खो बैठे योगी एक बड़े खतरे में फंसे हुए हैं, और शायद अपने हिन्दुत्व की धार बढ़ाने के लिए उन्होंने यह नया शिगूफा छोड़ा है। उत्तरप्रदेश में खासी खलबली मची हुई है, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस प्रदेश से लोकसभा का चुनाव लगातार लड़ रहे हैं, उस प्रदेश में अपनी ऐसी बुरी हार बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे होंगे। बनारस से उनकी अपनी लीड सदमा पहुंचाने की हद तक कम हो चुकी है, और लोकतंत्र में किसी पूरे प्रदेश में ऐसी शर्मनाक नौबत के लिए जिम्मेदार तो सीएम को ही माना जाता है। इसलिए योगी आज एक खतरे में है, और शायद ऐसे में उन्होंने अपने अस्तित्व रक्षा के लिए भी यह मुहिम शुरू की है।

अब हम मुद्दे की बात पर लौटें तो जिन लोगों को लग रहा है कि राह चलते कांवडिय़े अगर किसी मुस्लिम की दुकान से कुछ खा-पी लेंगे, तो उनसे उनका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा, तो ऐसे नाजुक धर्म की रक्षा के लिए कुछ दूसरे काम तुरंत करने चाहिए। एक तो यह कि हिन्दुओं के सारे उपवास का खाना-पीना साधारण नमक से नहीं होता, बल्कि सेंधे नमक से होता है जो कि पाकिस्तान के सिंध से आता है। उसमें जाने कितने मुस्लिमों का हाथ लगता होगा, इसलिए भी, और एक मुस्लिम देश से आ रहा है, इसलिए भी उपवास में इसका इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए। फिर सबसे बड़ी बात यह कि हिन्दुस्तान का अधिकतर पेट्रोलियम खालिस मुस्लिम देशों से आता है, और जिनकी धार्मिक भावनाएं बहुत अधिक नाजुक हैं, उन्हें डीजल-पेट्रोल का इस्तेमाल पूरी तरह छोड़ देना चाहिए। उससे देश की विदेशी मुद्रा भी बचेगी, और दूसरी तरफ प्रदूषण भी कम होगा। ऐसे लोग भारत के अधिक परंपरागत वाहनों का इस्तेमाल कर सकते हैं, और रथ पर चलने से एक गौरवशाली इतिहास की याद भी ताजा होती रहेगी। भारत में पटाखों का कारोबार अधिकतर मुसलमानों के हाथ में है, और पटाखे जलाना भी बंद करना चाहिए, इससे एक धार्मिक मकसद भी पूरा होगा, और दूसरी तरफ प्रदूषण भी घटेगा, सुप्रीम कोर्ट भी इस खुशफहमी में जी सकेगा कि उसके फैसले और हुक्म से पटाखों पर रोक लगी है। तमाम हिन्दू शादियों में इस बात पर भी गौर करना होगा कि कपड़ों पर कसीदाकारी, उनकी सिलाई किस धर्म के हाथों ने की है, और शादी चाहे दो-चार बरस बाद हो जाए, शादी के कपड़ों पर हाथ तो अपने मनपसंद ही लगने चाहिए। फिर शादी की घोड़ी लेकर किस जात-धरम का आदमी आया है, बैंड में किस जाति के लोग हैं, कौन लोग हैं जो शामियाना खड़ा कर रहे हैं, फूलों की माला किस धर्म के हाथों से होकर आई है, किसने सुहागरात का कमरा सजाया है, इन सबकी भी दरयाफ्त कर लेना जरूरी होगा, क्योंकि बाद में पता लगा कि किसी मुस्लिम के सजाए फूलों की शेज पर हिन्दुत्व की अगली पीढ़ी का निर्माण शुरू हो जाए, तो फिर घड़ी के कांटों को वापिस लाना भी मुश्किल होगा। जो खजूर खाड़ी के मुस्लिम देशों से आता है, उसका किसी भी शक्ल में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, और अफगानिस्तान जैसे देशों से किसी वक्त काबुलीवाला मेवे लाकर बेचकर चले जाता था, अब यह चालबाजी नहीं चलने देना चाहिए। साथ-साथ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि बीफ खाने वाले डोनल्ड ट्रंप को गोली लगने पर हिन्दुस्तान में उसकी अच्छी सेहत के लिए हवन करने पर भी रोक लगना चाहिए, क्योंकि वह जब तक रहेगा, गाय खाते ही रहेगा।

बहुत से लोग सोशल मीडिया पर लिख भी रहे हैं कि महज सडक़ किनारे की दुकानों और ठेलों पर ही क्यों, अस्पताल के खून पर भी दानदाता का जात-धरम लिखना चाहिए, वरना किसी और का खून लग जाने पर बाद में पूरी जिंदगी धार्मिक भावनाओं के जख्म ही न भर पाएं। हमारा तो यह भी ख्याल है कि तमाम मंदिरों को दानपेटियां हटा देना चाहिए क्योंकि उनमें पडऩे वाले हर नोट और सिक्के जाने कितने ही विधर्मियों के हाथों से होकर आए होंगे, और जाने कितने ही मुस्लिम-ईसाईयों ने उन नोटों को गिनते हुए उन पर थूक भी लगाया होगा। ऐसे पैसे को मंदिर में घुसने देना, कम से कम यूपी और उत्तराखंड के लिए तो ठीक नहीं है, और इस बात को तो बिना देर किए लागू किया जा सकता है। फिर इन प्रदेशों में सिर्फ सडक़ किनारे के दुकानदारों का धरम उनके बोर्ड पर लिखवाना काफी नहीं है, हो सकता है कि कांवडिय़ों के आगे-आगे कोई गैरहिन्दू सडक़ पर चलकर जा रहा हो, और उसकी धूल पर कांवडिय़ों का पैर पड़ रहा हो, ऐसे में कांवडिय़ों के आगे मीलों तक सडक़ को धुलवाना भी चाहिए, और आगे चलने वाले लोगों के लिए भी कपड़ों के सीने पर नाम की तख्ती लगाना जरूरी करना चाहिए, वरना धार्मिक भावनाएं बहुत बुरी तरह आहत हो सकती हैं। साथ-साथ धर्मालु हिन्दुओं को अमरनाथ, वैष्णो देवी, या बद्री-केदार जैसे तीर्थों पर जाते हुए मुस्लिम कंधों पर लदकर चलने वाली पालकी पर नहीं बैठना चाहिए, और इसके साथ-साथ उनके हांके जाने वाले खच्चर-घोड़ों पर भी। धार्मिक भावना सबसे बड़ी चीज है, उसे आहत होने से बचाने की हर कोशिश करनी चाहिए।

हम तो हिन्दुस्तान के सुप्रीम कोर्ट को देखकर हैरान हैं जो कि एक जुबानी जमाखर्च के अंदाज में हेट-स्पीच के खिलाफ एक बड़ी कड़ी बात कहकर फिर मानो उसे भूल ही गया है। उसके बाद से अब तक हजारों नेताओं ने तरह-तरह की नफरती बातें कही हैं जो कि कैमरों पर दर्ज हैं, और जिनका चुनावी इस्तेमाल भी किया जा चुका है। इसके बाद से सुप्रीम कोर्ट इस पर सब कुछ देखते-सुनते हुए भी चुप बैठा है जिस तरह घर में रिटायर्ड बूढ़े अपने आखिरी बरस गिनते हुए बड़बड़ाते भी रहते हैं, और लोगों के अनसुना करने पर चुप भी रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपना कुछ वैसा ही हाल बना रखा है। वरना हिन्दुस्तान में आज हेट-स्पीच तो बहुत पीछे रह गई, बहुत नीचे छूट गई, अब तो यहां हेट-हरकतें चल रही हैं। गाय बचाने के नाम पर इंसानों को थोक में मारा जा रहा है, और इससे किसी अदालत की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा। फिलहाल यह उम्मीद की जानी चाहिए कि डीजल-पेट्रोल के बहिष्कार से, पटाखों और आतिशबाजी के बहिष्कार से देश में प्रदूषण घटेगा, और हिन्दुओं की सेहत सुधरेगी। इससे खाड़ी के मुस्लिम देशों की अर्थव्यवस्था चौपट भी होगी, और हिन्दुस्तान के बहुसंख्यक-हिन्दुओं का खासा पैसा भी बचेगा।

(Daily Chhattisgarh)