भारत की घटनाओं की प्रतिक्रिया बाहर भी...

30  नवंबर 2024

 

उत्तरप्रदेश के संभल में एक स्थानीय अदालत के आदेश पर वहां की शाही जामा मस्जिद का सर्वेक्षण किया गया, और इस दौरान वहां हुए तनाव और हिंसा में कुछ मौतें हुई हैं। अब स्थानीय अदालत के ऐसे आदेश के बाद एक दिन के भीतर सर्वेक्षण करने, और उसे अचानक दो दिनों बाद फिर से दुहराने पर सुप्रीम कोर्ट ने हैरानी जाहिर की है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्थानीय अदालत की कार्रवाई पर रोक लगा दी है, और प्रशासन को हिदायत दी है कि उसे तटस्थ रहना है। यह उत्तरप्रदेश के पुलिस और प्रशासन को सुप्रीम कोर्ट से बार-बार मिलने वाली हिदायतों के लंबे सिलसिले की ताजा कड़ी है। सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद कमेटी को हाईकोर्ट जाने कहा है, और हाईकोर्ट को कहा है कि वह इनकी याचिका पर तीन दिन में सुनवाई करे। सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि जिला अदालत के जज के आदेश पर उसे भी संदेह है, और आपत्ति है, लेकिन वह चाहती है कि मस्जिद कमेटी पहले हाईकोर्ट जाए, तब तक सुप्रीम कोर्ट इस मामले को अपने पास रख रही है, और मस्जिद का जो सर्वे जिला अदालत के आदेश पर हुआ है उस रिपोर्ट को बंद रखने को भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा है। इस मामले को अजमेर की एक स्थानीय अदालत के आदेश के साथ जोडक़र देखा जाना चाहिए जिसमें वहां की आठ सौ बरस पुरानी और विश्वविख्यात दरगाह के नीचे शिव मंदिर होने का दावा सुनवाई के लिए मंजूर किया गया है, और दरगाह सहित सभी पक्षों को नोटिस दिया गया है। इस मामले को देश के करीब डेढ़ दर्जन वरिष्ठ रिटायर्ड अफसरों द्वारा प्रधानमंत्री को लिखी गई एक चिट्ठी से भी जोडक़र देखना चाहिए जो देश में साम्प्रदायिकता खड़ी करने की कोशिशों के बारे में लिखी गई है। 

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देश के सबसे प्रमुख कुछ ओहदों पर रहे हुए करीब डेढ़ दर्जन लोगों ने प्रधानमंत्री को लिखा है कि यह अकल्पनीय है कि एक स्थानीय अदालत सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की 12वीं सदी की दरगाह पर सर्वेक्षण का आदेश दे। यह भिक्षुक संत सूफी/भक्ति आंदोलन का अविभाज्य अंग था, और प्रधानमंत्री खुद हर बरस इस दरगाह के उर्स पर चादर भेजते आए हैं। इन लोगों ने प्रधानमंत्री से मिलने का समय मांगा है ताकि देश में साम्प्रदायिकता को घटाने के बारे में कुछ सोचा और किया जा सके। 

अब हम भारत के पड़ोस के बांग्लादेश की बात करना चाहते हैं जहां पर कई हिन्दू मंदिरों के खिलाफ हिंसा की खबरें आ रही हैं, और इस्कॉन संगठन के एक प्रमुख स्वामी को वहां राजद्रोह के जुर्म में गिरफ्तार किया गया है। भारत सरकार ने इस पर बांग्लादेश की मौजूदा कार्यवाहक सरकार से विरोध दर्ज किया है, और इस पर ढाका का कहना है कि देशविरोधी गतिविधियों के कारण यह गिरफ्तारी हुई है। सडक़ों पर भी इस्कॉन को प्रतिबंधित करने के खिलाफ प्रदर्शन चल रहे हैं। शेख हसीना सरकार को जनाक्रोश से बेदखल करने के बाद अब वहां भारत विरोधी माहौल भी बना हुआ है, और भारत में मुस्लिमों के खिलाफ जो हिंसक माहौल चल रहा है, उसका भी असर शायद बांग्लादेश पर पड़ रहा हो। 

भारत में 787 जिले हैं, इनमें से तकरीबन हर किसी में अदालतें हैं। और आज देश का जैसा माहौल है, उसमें किसी भी किस्म के ओहदों पर बैठे हुए लोगों के बीच भी साम्प्रदायिकता उसी तरह घुसपैठ कर गई है जिस तरह समाज के दूसरे तबकों में। वरना सुप्रीम कोर्ट को यूपी के संभल के प्रशासन को यह हिदायत क्यों देनी पड़ती कि उसे निष्पक्ष रहना है, और कल ही यूपी की पुलिस को एक दूसरे मामले में चेतावनी देनी पड़ी कि अगर उसने अदालती आदेश के खिलाफ काम किया, तो उसे ऐसी सजा दी जाएगी कि सब याद रखेंगे। यूपी में मुस्लिमों के मकान-दुकान पर बुलडोजर चलाने को लेकर कितनी ही अदालती चेतावनियां आ चुकी हैं, और देश के कुछ दूसरे प्रदेशों में भी अदालतों को सरकार को ऐसी चेतावनी देनी पड़ी है। हमने बांग्लादेश में हिन्दुओं और बाकी भारतीयों के खिलाफ सत्ता पलट के तुरंत बाद हिंसा के वक्त बांग्लादेशियों को यह याद दिलाया था कि ऐसी घटनाओं की प्रतिक्रिया भारत में उन लाखों बांग्लादेशियों के खिलाफ हो सकती है जो कि भारत में वैध या अवैध रूप से बसे हुए, और जिन्हें भारत ने 1971 की जंग के दौरान शरण दी थी। ठीक वैसी ही सलाह हम दुनिया के उन तमाम देशों में बसे लोगों को देना चाहते हैं कि वे वहां दूसरे समुदाय के साथ जैसा बर्ताव करेंगे, वह दुनिया के किसी दूसरे कोने में उनके समुदाय के दूसरे लोगों के साथ कोई और करेंगे। साल भर से अधिक से इजराइल फिलीस्तीनियों पर जो कहर ढा रहा है, उसी का नतीजा है कि अभी योरप में एमस्टरडम में इजराइलियों और यहूदियों पर एक फुटबॉल टूर्नामेंट के बाद हमला हुआ। योरप के एक विशेषज्ञ-जानकार के मुताबिक फिलीस्तीन पर इजराइली हमले शुरू होने के बाद से पूरी दुनिया में जगह-जगह यहूदी विरोधी हिंसा या हमले की नौबत आ रही हैं। कई जगहों पर जहां हिंसा तो नहीं होती, वहां भी सामाजिक बहिष्कार होता है, और उसकी गिनती पुलिस के आंकड़ों में नहीं हो पाती। 

भारत में आज चारों तरफ जिस तरह एक मुस्लिम लहर पैदा की जा रही है, और उसे बढ़ाया जा रहा है, उसके नतीजे न तो देश के भीतर अच्छे होंगे, और न देश के बाहर उन देशों में जहां पर कि भारतवंशी बसे हुए हैं। जिन लोगों ने दुनिया देखी नहीं है, सिर्फ वही लोग यह मानकर चल सकते हैं कि वे अपने देश में जिससे जैसा चाहे बर्ताव करें, और उसकी दुनिया में कोई प्रतिक्रिया नहीं होगी। अब यह ताजा प्रतिक्रिया तो बांग्लादेश में ही देखने मिल रही है। हर देश में किसी न किसी धर्म या जाति के लोग अल्पसंख्यक हो सकते हैं, जैसे कि बांग्लादेश में हिन्दू हैं। 

देश के जिन प्रमुख, और जागरूक भूतपूर्व अफसरों ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी है, उसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। हालांकि इस चिट्ठी में ही उन्होंने यह लिखा है कि उन्हें इस बात में कोई संदेह नहीं है कि प्रधानमंत्री मौजूदा परिस्थितियों से अच्छी तरह वाकिफ हैं। भारत में अगर कुछ मुस्लिमों को बरसों तक बिना सुनवाई, बिना जमानत जेलों में बंद रखा गया है, देश की सुप्रीम कोर्ट भी न उनका मामला एक इंच आगे बढ़वा पाई, न उन्हें जमानत दे पाई, तो किसी के ऐसे पांच बरस दुनिया के बाकी लोग भी देखते हैं, और ऐसी बातों का भी असर भारत के बाहर बसे हिन्दू और हिन्दुस्तानियों को झेलना पड़ता है। आज भारत की कुछ जिला अदालतों के छोटे-छोटे जज जिस अंदाज में इस देश के उपासना स्थलों को लेकर बने कानून की अनदेखी कर रहे हैं, वह हैरान कर देने वाली बात है। दो दिन पहले ही हमने अपने यूट्यूब चैनल पर यह कहा था कि अगर हर पूजा स्थल की खुदाई करके मौजूदा धर्म के कब्जे को खारिज करना, और पिछले कब्जे को स्थापित करना है, तो फिर इस देश में हजारों हिन्दू मंदिरों के नीचे से बौद्ध मठ निकल आएंगे, और धर्मान्ध-साम्प्रदायिक लोग खुदाई करते-करते गुफा मानव तक पहुंच जाएंगे, और तब तक देश इस लायक ही रह जाएगा कि वह चकमक पत्थर से आग जलाएगा। कुछ उसी किस्म की बात कल भूतपूर्व अफसरों की चिट्ठी में भी है। देखते हैं प्रधानमंत्री क्या करते हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 30 नवंबर 2024


 

शहर सुधरें कैसे, और यह जिम्मेदारी किसकी?

  29  दिसंबर 2024

  हिन्दुस्तान के अधिकतर शहरों के साथ यह एक आम दिक्कत है कि वहां जमकर अवैध निर्माण होता है, कुछ या अधिक हद तक सार्वजनिक जगह पर अवैध कब्जा होता है, और उसके साथ-साथ अपने दायरे से बाहर जाकर सामान फैलाकर कारोबार होता है। दूसरी तरफ सडक़ों पर जमकर ट्रैफिक जाम भी रहता है। जिन जगहों से गाडिय़ां निकलनी चाहिए वहां दुकानदारों का सामान पटे रहता है, नुमाइशी पुतले सजाकर खड़े कर दिए जाते हैं, और फुटपाथी कारोबारी भी सडक़ की चौड़ाई को खत्म कर देते हैं। जिनको बड़ी दुकान हासिल है, उनकी नीयत भी सामने सडक़ को दस-पन्द्रह फीट तक घेरने की रहती है। अभी कल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पुलिस, प्रशासन, और म्युनिसिपल की मिलीजुली टीम ने एक-दो जगह से ऐसे अवैध कब्जे हटाए, तो लोगों का तर्क था कि वे 20-25 बरस से वहां कारोबार कर रहे हैं। इसका मतलब यही है कि 20-25 बरस में अवैध कब्जा करने वालों को हटाने की कार्रवाई की नहीं गई थी। 

हिन्दुस्तान के अधिकतर शहर किसी योजनाबद्ध कॉलोनी की तरह नहीं हैं, और वे धीरे-धीरे फैलते हुए मनमाने बने हुए हैं, लेकिन किसी भी तरह का अवैध काम अगर वह सडक़ किनारे के निर्माण का है तो वह छुप तो नहीं सकता, और वह जब कभी बनना शुरू होता है, तब से ही वह म्युनिसिपल के अधिकारियों और कर्मचारियों को दिखता ही है, हर इलाके के चुने हुए वार्ड मेम्बर रहते हैं, और ऐसे पार्षदों की मर्जी के बिना तो उनके वार्ड में एक गुमटी भी नहीं लग सकती। इसलिए ऐसे कब्जे चाहे दस बरस से हों, चाहे पच्चीस बरस से, ये इन तमाम जिम्मेदार लोगों की नजरों में रहते हैं, और वे लोग ऐसे अवैध कब्जे या अवैध निर्माण के लिए जिम्मेदार भी रहते हैं। प्रमुख सडक़ों के किनारे कई मंजिलों की इमारत अगर अवैध बन जाती है, तो इसमें जब तक तमाम जिम्मेदार लोगों की कम या अधिक हिस्सेदारी न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। स्थानीय संस्थाओं में तकरीबन सौ फीसदी कर्मचारी और मझले अधिकारी स्थानीय ही होते हैं, और गलत निर्माण, गलत कब्जा करने वाले लोगों के साथ उनके पुराने रिश्ते रहते हैं, इसलिए इन पर कार्रवाई आसान नहीं रहती है। गिने-चुने बड़े अफसर म्युनिसिपल के बाहर से आते हैं, और वे अकेले कुछ अधिक कर नहीं पाते। 

स्थानीय निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के अपने कई किस्म के स्वार्थ रहते हैं। अवैध कब्जा और अवैध निर्माण करने वालों से उन्हें मोटी कमाई होती है, और इसलिए वे कई जगहों पर तो अवैध कामों को बढ़ावा देने में लगे रहते हैं। अगर सब कुछ नियम से बने, तो न कोई चुने हुए नेताओं को पैसे दे, और न ही म्युनिसिपल के कर्मचारियों-अधिकारियों को। जहां से गैरकानूनी काम शुरू होते हैं, वहीं से ऊपरी कमाई की संभावना भी शुरू होती है। इसलिए अभी जब 20-25 बरस से किसी जगह पर काबिज लोगों को हटाया गया, तो यह अंदाज लगाना अधिक मुश्किल नहीं था कि आम जनता की सहूलियत खत्म करने वाले ऐसे कब्जों को इतने बरस किसकी मेहरबानी से रहने दिया गया था।

कुछ लोगों को यह लग रहा है कि राजधानी रायपुर में पुलिस, प्रशासन, और म्युनिसिपल ने मिलकर पहली बार ऐसी कार्रवाई की है। आज से 40 बरस पहले भी इस शहर में एक सीएसपी, और एक एडीएम, म्युनिसिपल कमिश्नर के साथ सडक़ों पर निकलते थे, और तमाम अवैध कब्जे कुछ घंटों में ही अपने आप हट जाते थे, सडक़ तक रखे गए सामान जब्त हो जाते थे। यह तो बाद के बरसों में वोटरों से डरे हुए सांसदों, विधायकों, और म्युनिसिपल नेताओं ने गैरकानूनी कामों को अनदेखा करना शुरू किया, और जब अनदेखा ही करना था, तो फिर जिस-जिससे बन पड़ता था, उन्होंने वसूली और उगाही भी शुरू कर दी। बहुत से नेता तो अपने समर्थकों से ही कब्जा करवा देते हैं ताकि उनकी कमाई चलती रहे तो वे नेता के उपकार के बदले उनका काम करते रहें। 

यह तो भारत में पंचायती राज व्यवस्था के तहत म्युनिसिपल और पंचायत के चुनाव अनिवार्य हो गए हैं, और हर इलाके को स्थानीय संस्थाओं में प्रतिनिधित्व मिलना जरूरी है। वरना इसके पहले बीच-बीच में चुनाव न होने पर राज्य शासन किसी म्युनिसिपल में प्रशासक बिठा देती थी। और वैसे प्रशासक कभी-कभी निर्वाचित नेताओं के मुकाबले ज्यादा अच्छा काम करते थे क्योंकि उन पर स्थानीय दबाव नहीं रहता था। कुछ लोग प्रशासक की व्यवस्था को ही बेहतर मान लेते थे, लेकिन अगर इसी पैमाने पर देखें, तो फिर राज्य शासन ठीक न चलने पर मुख्य सचिव को उसका प्रशासक बना देना चाहिए, और प्रधानमंत्री का काम ठीक न रहने पर कैबिनेट सचिव को देश का प्रशासक बना देना चाहिए। लोकतंत्र की भावना को देखते हुए स्थानीय संस्थाएं चाहे कितनी ही भ्रष्ट हो जाएं, चाहे कितना ही खराब काम करें, उन्हें निर्वाचित लोगों के तहत ही काम करना है। इसलिए चुनाव होते रहेंगे, और अच्छे या बुरे जैसे भी हों, नेता उन पर काबिज रहेंगे। 

स्थानीय संस्थाओं की व्यवस्था इस किस्म की रहती है कि वहां म्युनिसिपल कमिश्नर राज्य शासन की तरफ से तैनात होते हैं, जो कि शासन के लिए ही जवाबदेह रहते हैं, और निर्वाचित नेताओं के मनमाने फैसलों पर काफी हद तक रोक-टोक करने का हक उनको रहता है। अगर वे ही ईमानदारी और सख्ती से काम करें, तो वे बहुत सारे गलत काम रोक सकते हैं। हमें इस सिलसिले में नागपुर में एक वक्त तैनात म्युनिसिपल कमिश्नर याद पड़ते हैं जो कि वहां के एक आईएएस अफसर थे, और उन्हें राज्य सरकार ने शहर को सुधारने की खुली छूट दी थी। एक अकेले अफसर ने पूरे शहर की सडक़ों से अवैध कब्जे हटवा दिए थे, सारे रास्ते चौड़े हो गए थे, और शहर एक बार फिर जिम्मेदार शहर लगने लगा था, खूबसूरत भी, और सहूलियतों वाला भी। इसलिए शहरों को सुधारने का काम उन नेताओं पर नहीं छोड़ा जा सकता जिन्हें उसी शहर से वोट पाकर म्युनिसिपल, या विधानसभा-लोकसभा तक जाने की हसरत रहती है। इसके लिए एक संतुलन बनाकर राज्य सरकार को काबिल अफसरों को म्युनिसिपल भेजना चाहिए, और इस तैनाती को कम से कम दो बरस का रखना चाहिए ताकि ये अफसर शहर को समझ भी सकें। 

बरसों बाद जब किसी शहर में कार्रवाई शुरू होती है, तो लोग इंतजार इसी बात का करते हैं कि कब राजनीतिक दबाव इसे रोक देगा। सरकार को प्रदेश के हित में ऐसी राजनीतिक दखल से बचना चाहिए, और अफसरों को कड़ाई से सुधार करने का जिम्मा देना चाहिए। कोई शहर कितना व्यवस्थित है, उससे न सिर्फ उस शहर की साख बनती है, बल्कि उस प्रदेश की भी इज्जत बनती या बिगड़ती है। अब तो टेक्नॉलॉजी बड़ी सस्ती हो गई, इसलिए म्युनिसिपल को अपने पूरे इलाके की हर बरस वीडियो रिकॉर्डिंग करानी चाहिए ताकि यह अच्छी तरह दर्ज रहे कि कहां पर नए कब्जे हो रहे हैं, या नए अवैध निर्माण हो रहे हैं। एक तरफ गैरकानूनी काम करने वाले सडक़ों पर कब्जा करें, और दूसरी तरफ आम लोग सडक़ों से गुजर न पाएं, यह बहुत शर्मनाक नौबत है। यह सारा काम सरकार और स्थानीय संस्थाओं की बुनियादी जिम्मेदारी है, इसलिए इसके लिए अदालत तक जाने की नौबत लाना ठीक नहीं है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 नवंबर 2024


 

ईसाई-दलित का आरक्षण के लिए हिन्दू होना नाजायज...

  28  नवंबर 2024

 

सुप्रीम कोर्ट का एक दिलचस्प और महत्वपूर्ण फैसला आया है कि महज आरक्षण का फायदा पाने के लिए किसी का धर्म परिवर्तन करना जायज नहीं है। इस मकसद से किए गए धर्म परिवर्तन पर ऐसा कोई फायदा नहीं दिया जा सकता। मद्रास हाईकोर्ट ने इसी साल जनवरी में ऐसा ही फैसला दिया था जिसके खिलाफ अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने उसे जारी रखा है। एक हिन्दू, अनुसूचित जाति के पिता और ईसाई माता की बेटी को जन्म के बाद जल्द ही ईसाई धर्म की दीक्षा दी गई थी। बाद में बड़े होने पर उन्होंने सरकारी नौकरी के लिए एससी प्रमाण पत्र मांगा, लेकिन उसे देने से मना कर दिया गया क्योंकि परिवार ईसाई परंपरा पर चल रहा था, ईसाई हो भी चुका था, और नियमित चर्च जाता था। यहां याद रखने की बात यह है कि अनुसूचित जनजाति के लोग, आदिवासी अगर ईसाई बनते भी हैं, तो भी उनका आरक्षित दर्जा कायम रहता है। लेकिन अगर अनुसूचित जाति, एससी के लोग ईसाई बनते हैं, तो चूंकि ईसाई समाज में जाति व्यवस्था नहीं है, इसलिए वे ईसाई होकर अछूत नहीं रह जाते, और इसी आधार पर उन्हें आरक्षण का लाभ मिलना बंद हो जाता है। इस पुरानी संवैधानिक व्यवस्था को लेकर लोगों के बीच जानकारी थोड़ी सी कम इसलिए रहती है कि एसटी-एससी आरक्षित तबकों को लोग आमतौर पर एक साथ गिनते हैं, लेकिन दोनों तबकों के लिए धर्म बदलने पर व्यवस्था अलग-अलग है। अभी सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में कहा है कि ईसाई बने दलित अपनी जातिगत पहचान खो देते हैं, और अगर वे दलित होने की वजह से आरक्षण दुबारा चाहते हैं, तो इसके लिए उन्हें दुबारा हिन्दू होने, और अपनी आरक्षित दलित जाति में जाने, वहां मंजूर किए जाने के ठोस सुबूत देने होंगे। और यह सहूलियत भी उन लोगों को हासिल नहीं होगी जो कि ईसाई परिवार में ही पैदा हुए हैं। जो लोग जन्म से हिन्दू-दलित रहे हों, और बाद में ईसाई बने हों, वे कई तरह की कानूनी और सामाजिक औपचारिकताओं को पूरा करके, अपनी पिछली जाति में शामिल होने के बाद आरक्षण का दावा कर सकते हैं। 

भारत में आरक्षण हमेशा से एक दिलचस्प बहस का मुद्दा रहा है क्योंकि संविधान के तहत अलग-अलग तबकों को दी गई रियायत का समाज के अनारक्षित तबके बड़ा विरोध करते हैं, और लोगों को लगता है कि आरक्षण से बाकी लोगों की संभावनाएं सीमित होती चली जाती हैं। फिर शुरूआत से ही चले आ रहे एसटी-एससी आरक्षण से परे बाद के दशकों में जोड़े गए ओबीसी आरक्षण, उसके बाद महिला आरक्षण, उसके बाद अनारक्षित तबके के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए आरक्षण भी विवाद का सामान बने रहे। फिर यह भी है कि राष्ट्रीय स्तर पर और प्रदेशों में सरकारी नौकरियों में तो ओबीसी आरक्षण है, स्कूल-कॉलेज के दाखिले में भी है, लेकिन संसद और विधानसभा के चुनावों में ओबीसी आरक्षण नहीं है। अब अगली जनगणना के बाद होने वाले डी-लिमिटेशन के बाद महिला आरक्षण लागू होगा, और वह संसद और विधानसभाओं की पूरी तस्वीर बदल देने वाला होगा। ऐसे देश में जब धर्म में जाना, या धर्म को बदलना भी दलितों के लिए आरक्षण की व्यवस्था बदल देता है, तो फिर इस मुद्दे पर अभी सुप्रीम कोर्ट के इस लंबे फैसले को बारीकी से समझना जरूरी हो जाता है, और इसीलिए आज हम इस पर यहां लिख रहे हैं। 

सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने इस फैसले में यह साफ किया है कि जाति व्यवस्था का नुकसान तभी तक ध्यान में रखा जा सकता है जब तक कोई व्यक्ति जाति आधारित धर्म का पालन कर रहे हों। जब वे जातिविहीन धर्म में चले जाते हैं, तो फिर वहां वे अपने पिछले धर्म के तहत अपनी पिछली जाति के आरक्षण-नफे का दावा नहीं कर सकते। इस सिलसिले में यह भी समझने की जरूरत है कि भारत में डी-लिस्टिंग नाम से आंदोलन का एक पुराना इतिहास है। आदिवासी समाज के जो लोग ईसाई बन जाते हैं, लेकिन उसके बाद भी आरक्षण का फायदा पाते हैं, उनके खिलाफ बाकी आदिवासी समाज की तरफ से एक डी-लिस्टिंग आंदोलन दशकों पहले झारखंड में शुरू हुआ था, और कांग्रेस के एक बड़े नेता उसके पीछे थे, और हाल के बरसों में छत्तीसगढ़ में यह आंदोलन जोर पकड़ रहा है। इसमें राज्य सरकार से अपील जरूर की जा रही है, लेकिन यह केन्द्र सरकार के अधिकार क्षेत्र की बात है। कुछ लोग इसे आदिवासी जनजागरण का दौर भी मान रहे हैं कि ईसाई बने आदिवासियों से आरक्षण का लाभ वापिस ले लेना चाहिए। लेकिन दलितों के विपरीत आदिवासियों के ईसाई बनने पर भी यह व्यवस्था इसलिए जारी रहती है कि दलित तो अछूत से छूत हुए मान लिए जाते हैं, लेकिन ईसाई बनने के बाद भी आदिवासी अपनी आदिवासी संस्कृति और परंपराओं को जारी रखते हैं। फिलहाल देश में जहां-जहां आदिवासियों के ईसाई बनने के खिलाफ आंदोलन चल रहे हैं, उन्हें इससे रोका जा रहा है, वहां पर डी-लिस्टिंग का मुद्दा एक बड़े हथियार की तरह हवा में लहराया जा रहा है। 

भारत में स्कूल-कॉलेज के दाखिलों से लेकर नौकरी और चुनाव आरक्षण तक जातियों की जागरूकता का एक नवजागरण का दौर चल रहा है। सभी समुदायों के लोग अपने-अपने हक के लिए उठ खड़े हुए हैं, और अगले कुछ दशक तक यह एक बड़ा चुनावी, राजनीतिक, और सामाजिक मुद्दा बने रहेगा।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 28 नवंबर 2024


 

छात्रा को ब्लैकमेल कर कत्ल की धमकी देकर प्रिंसिपल, शिक्षकों ने किया बलात्कार!

 27  नवंबर 2024

 

छत्तीसगढ़ का एक ताजा जुर्म स्तब्ध कर देने वाला है। सरगुजा इलाके के एक नए जिले मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (एमसीबी) में एक स्कूल के शिक्षक ने छात्रा का अश्लील वीडियो बना लिया, और उसे इसे उजागर करने की धमकी देकर स्कूल के प्रिंसिपल, दो शिक्षकों, और बलात्कार के लिए घर मुहैया कराने वाले एक डिप्टी रेंजर ने इस नाबालिग छात्रा के साथ कई दिन तक बलात्कार किया। उसे अलग-अलग जगहों पर ले जाकर बलात्कार किया, सामूहिक बलात्कार किया। अब छात्रा की मां की शिकायत पर पुलिस ने इन लोगों को गिरफ्तार किया है। इस छात्रा को यह बात उजागर करने पर जान से मारने की धमकी भी दी जा रही थी, और उसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर देने की भी। 55 बरस का प्रिंसिपल, और 50 बरस का व्याख्याता, 48 बरस का हेडमास्टर गिरोह बनाकर स्कूल की एक नाबालिग और आदिवासी छात्रा को ब्लैकमेल करके, मारने की धमकी देकर हफ्ते भर लगातार सामूहिक बलात्कार करें, तो लोग किस भरोसे अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढऩे भेजेंगे? अगर वे दूसरे स्कूल की छात्रा के साथ ऐसा कर सकते हैं तो अपने स्कूल की छात्राओं से भी ऐसा कर सकते हैं। 

छत्तीसगढ़ का एक तजुर्बा यह भी है कि आदिवासी इलाकों में जगह-जगह आश्रम-छात्रावास जैसी स्कूलें रहती हैं जहां गरीब-आदिवासी बच्चे मां-बाप से दूर आश्रम और स्कूल के कर्मचारियों और अधिकारियों के मोहताज हुए पड़े रहते हैं, और दूर-दूर के गांवों में रहने वाले मां-बाप बच्चों से लगातार संपर्क में भी नहीं रहते। बस्तर के इलाके में दसियों हजार बच्चे आश्रम-छात्रावासों में रह रहे हैं। आदिवासी इलाकों से देह-शोषण की शिकायतें तो निकलकर बाहर आ भी नहीं पातीं, और जब कभी बड़े पैमाने पर यौन-शोषण होता है तो विस्फोट की तरह वह घटना सामने आती है, इक्का-दुक्का घटनाएं बाहर पता भी नहीं लगतीं। कुछ मामलों में तो छात्राएं गर्भवती हो जाती हैं, और संतान को जन्म देती हैं, तब पता लगता है कि उनके साथ किसी ने ज्यादती की थी। बस्तर में इलाका बहुत बड़ा है, और स्कूलें या आश्रम-छात्रावास बहुत दूर-दूर के इलाकों में हैं, इसलिए वहां तक शासन-प्रशासन की नजर भी अधिक नहीं जाती है। लेकिन सरगुजा के जिस जिले में यह मामला हुआ है वह तो नया बना हुआ छोटा जिला है जहां पर कलेक्टर और एसपी तैनात हैं। इसके बाद भी अगर इस किस्म का संगठित और गिरोहबंदी का भयानक जुर्म वहां हुआ है, तो पुलिस और प्रशासन पर कई सवाल भी खड़े होते हैं। क्या जिलों को छोटा-छोटा करने के बाद भी वहां अफसरों की निगरानी इतनी कमजोर रहती है? 

एक दूसरा मुद्दा यह है कि प्रदेश में होने वाले बलात्कारों में उनकी शिकार लड़कियों में आदिवासियों का अनुपात बहुत अधिक है। क्या समाज के लोग आदिवासियों को इतना कमजोर पाते हैं कि उनसे बलात्कार करते हुए उन्हें फंसने का डर नहीं रहता? क्या बलात्कारियों को यह लगता है कि आदिवासी लडक़ी की तो जुबान ही नहीं होती है, और उसकी बात सुनने के लिए पुलिस-प्रशासन के कान नहीं होते? जो भी हो, बलात्कार के बहुत से मामलों में आदिवासी लड़कियों का शिकार होना बहुत फिक्र की बात है, और यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि आदिवासी इलाकों की बहुत सी स्कूलें, और छात्रावास शिक्षा विभाग के न होकर आदिम जाति कल्याण विभाग के होते हैं, और यह किस तरह का कल्याण हो रहा है इस पर सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह भी रहना चाहिए। 

हमारा यह भी मानना है कि सामने आने वाले ऐसे हर मामले के मुकाबले दर्जनों मामले तो उजागर ही नहीं होते होंगे। हर किसी का इतना हौसला नहीं होता है कि वे पुलिस तक जा सकें , क्योंकि पुलिस और अदालत आमतौर पर संवेदनाशून्य रहती हैं, और बलात्कार की शिकार होकर वहां पहुंचना हिकारत और शोषण के एक नए जाल में लड़कियों को फंसा देता है। चाहे शिक्षा विभाग हो, चाहे आदिम जाति कल्याण विभाग हो, राज्य में सरकारी स्कूलों की हालत खराब है। शिक्षक जगह-जगह दारू पिये पड़े रहते हैं, यहां तक कि राजधानी रायपुर की एक सबसे प्रमुख स्कूल में वहां का शिक्षक छात्रा को अश्लील संदेश भेज-भेजकर परेशान करता रहा, और आखिर में जाकर गिरफ्तार हुआ। ऐसा लगता है कि छात्र-छात्राओं में जागरूकता और हौसला बढ़ाने के लिए पूरे प्रदेश में एक अभियान छेडऩे की जरूरत है, और स्कूलों में अनिवार्य रूप से शिकायत पेटी लगाने, उसे स्कूल के बाहर के लोगों द्वारा खोलने का इंतजाम करना चाहिए, और इन तमाम शिकायतों को गंभीरता से लेना चाहिए। किसी शिक्षक या कर्मचारी की यौन शोषण की हिम्मत रातों-रात नहीं होती, पहले वे कई किस्म की हरकतें करके छात्राओं की कमजोरी को तौल चुके रहते हैं, और तब जाकर वे देह-शोषण या बलात्कार पर उतरते हैं। अगर सरकार की निगरानी व्यवस्था चौकस रहे, अगर लड़कियों से स्कूल के बाहर की कोई दूसरी संवेदनशील महिला समय-समय पर बात करती रहे, तो हो सकता है कि लड़कियां वक्त रहते अपनी शिकायत दर्ज करा सकें, और बलात्कार की नौबत के पहले बच सकें। यह पूरा का पूरा मामला सरकार के जिम्मे का है, और समाज की लड़कियों पर यह खतरा बहुत नया भी नहीं है। राज्य के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी के समय से लेकर अब तक हर दौर में ऐसे मामले सामने आए हैं, लेकिन इसी आधार पर इसकी गंभीरता को अनदेखा करना बहुत बड़ी गैरजिम्मेदारी होगी। छात्राओं के प्रति, और आदिवासियों के प्रति सरकार को अतिरिक्त संवेदनशील होना चाहिए। इस तरह का शोषण समाज में दूसरी हजारों लड़कियों के आगे बढऩे की राह में रोड़ा बन जाता है। ऐसे एक हादसे के बाद हजारों मां-बाप अपनी बच्चियों को पढऩे, खेलने, या किसी और मुकाबले के लिए बाहर भेजने से कतराने लगते हैं। इसलिए महज बलात्कार की शिकार लड़कियां ही इस जुर्म का शिकार नहीं होतीं, ऐसी हर घटना के बाद हजारों दूसरी लड़कियों से उनकी संभावनाएं छीन ली जाती हैं, और उन्हें घर पर सुरक्षित रहने को कह दिया जाता है। सरकार को छात्राओं के मामले में अपने निगरानी तंत्र को मजबूत करना पड़ेगा। हमारा यह भी ख्याल है कि लड़कियों और महिलाओं की जिम्मेदारी जिन पर रहती है, वे ही अगर बलात्कार जैसे जुर्म करने लगते हैं, तो उनके लिए राज्य को एक अलग कड़ी सजा बनानी चाहिए। अभी एक डीएफओ पर उसकी मातहत आदिवासी अधिकारी ने धमकी देकर लगातार यौन-शोषण की रिपोर्ट दर्ज कराई है। छात्रा से बलात्कार करने वाले शिक्षक अगर उसी की स्कूल के हैं, तो उनको भी आम बलात्कार के मुकाबले अधिक सजा मिलनी चाहिए।   

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 नवंबर 2024



 

संविधान के शब्द जिंदा, भावना अब स्मृति-शेष

 26  नवंबर 2024

 

संविधान के 75 बरस होने का मौका किसी भी देश के लिए बड़ी अहमियत रखता है, 75वां बरस शुरू होने का मौका भी। यह साल हिन्दुस्तान में संविधान की पौन सदी पूरी होने के जलसों से भरा रहेगा। लेकिन जब कभी ऐसी सालगिरह या ऐसे जलसों की बात आती है तो वैसे में यह भी सूझता है कि क्या जलसों से परे संविधान का सम्मान भी हो रहा है, उस पर अमल भी हो रही है? इसके साथ ही यह भी याद पड़ता है कि संविधान निर्माताओं में जो प्रमुख नाम डॉ.भीमराव अंबेडकर का है, उन्होंने इस संविधान को लेकर कैसी कल्पनाएं की थी, उन्होंने कौन सी सावधानियां गिनाई थी। फिर हमारा मानना है कि संविधान अपने शब्दों को लेकर बहुत हद तक एक स्थिर दस्तावेज रहता है, तब तक, जब तक कि उसमें किसी फेरबदल की जरूरत न लगे। लेकिन संविधान के गिने-चुने शब्दों से कई गुना अधिक मायने उसकी भावना रखती है, और वह भावना बुनियादी तौर पर तो नहीं बदलती, लेकिन वह समय के साथ-साथ देश, काल, और परिस्थितियों के मुताबिक अपने मायने बदलती है। शब्द स्थिर और जड़ होते हैं, लेकिन भावना वक्त-जरूरत के साथ, बदलती हुई परिस्थितियों के अनुकूल बदल सकती है। संविधान को एक मुर्दा दस्तावेज मानना ठीक नहीं होगा। उसके शब्द लिखे गए हैं, लेकिन उसकी भावना उसकी आत्मा से निकलती है। 

अब हम एक छोटे से मुद्दे की चर्चा जरूरी समझते हैं जो कि अंबेडकर ने बतौर चेतावनी देश के सामने रखा था। उन्होंने कहा था कि लोकतंत्र में जब तक संवैधानिक रास्ते खुले हैं, तब तक उन चीजों के लिए आंदोलन नहीं होना चाहिए। उनकी दूसरी बात यह थी कि राजनीतिक लोकतंत्र पा लेने से ही सामाजिक असमानता खत्म नहीं हो जाती। अगर समाज लंबे समय तक समानता से वंचित रहा, तो वह देश राजनीतिक लोकतंत्र को खतरे में डाल देता है, इसलिए लोगों को महज इस बात से संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए कि देश आजाद हो गया। उनकी कही तीसरी बात यह है कि राजनीति में भक्ति, या नायक की पूजा तानाशाही की राह खोलती है। हम अंबेडकर की चेतावनियों को भी ऐसा स्थिर नहीं मानते कि पौन सदी बाद भी उसकी व्याख्या दुबारा न कर सकें। हमारा मानना है कि उनकी पहली बात कि जब तक संवैधानिक रास्ते खुले हैं आंदोलन जैसे तरीके अख्तियार नहीं करने चाहिए, यह आज प्रासंगिक और अमल में लाने लायक बात नहीं है। इसके बजाय हमें लोहिया की कही हुई वह बात अधिक माकूल लगती है कि जिंदा कौमें पांच बरस इंतजार नहीं करतीं। संवैधानिक रास्ते खुले रहने के कई मतलब निकलते हैं, एक मतलब तो यह निकलता है कि लोग हाईकोर्ट से होकर सुप्रीम कोर्ट तक किसी मुद्दे को लेकर लड़ते रहें, और फिर सुप्रीम कोर्ट से संतुष्ट न होने पर पुनर्विचार याचिका लगाएं, और फिर सुप्रीम कोर्ट किसी बड़ी बेंच में उसकी सुनवाई करे, और इन सबमें कुछ दशक भी लग सकते हैं। तो क्या एक जीवंत लोकतंत्र में संवैधानिक विकल्प की राह देखते हुए दशकों तक कोई आंदोलन ही न किया जाए? हम अंबेडकर की बात को पूरे के पूरे संदर्भ में पढक़र यहां नहीं लिख रहे, इसलिए अगर उनकी बात का संदर्भ कुछ और होगा, तो हम महज एक बात पर अपनी टिप्पणी कर रहे हैं कि लोकतंत्र कभी संवैधानिक विकल्पों का इंतजार करते हुए अपने आपको आंदोलनों से परे नहीं रखता। आंदोलन लोकतंत्र का एक अविभाज्य अंग है, और उसके बिना जीवंत लोकतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती। फिर चाहे सत्ता को आंदोलनों के नाम से भी परहेज क्यों न हो। इस देश के इतिहास में लोकतंत्र का विकास अनिवार्य रूप से आंदोलनों के कंधों पर चढक़र आगे बढ़ा है, और संवैधानिक विकल्प का एक हिस्सा हम लोकतांत्रिक विकल्पों को भी मानते हैं क्योंकि संविधान और लोकतंत्र को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। अंबेडकर की दूसरी बात हमें बहुत प्रासंगिक और जरूरी लगती है कि जो लोग देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद पाकर संतुष्ट हैं, और जिन्हें समाज की असमानता फिक्र में नहीं डालती, वे लोग संविधान को ही, भारत के लोकतंत्र को ही खतरे में डालने का खतरा उठा रहे हैं। सामाजिक असमानता गुलामी का एक बड़ा प्रतीक है, सुबूत भी। यह असमानता मर्द और औरत के बीच की हो, सवर्ण और गैरसवर्ण के बीच की हो, संपन्न और विपन्न के बीच की हो, ताकतवर और कमजोर के बीच की हो, किसी भी तरह की हो, असमानता स्वतंत्रता न होने का सुबूत है, शोषित तबकों के परतंत्र होने का। इस मुद्दे पर हिन्दुस्तान में लगातार काम करने की जरूरत इसलिए है कि एक तरफ एक तबका अपनी गाड़ी के हॉर्सपॉवर, या अपने ओहदे और संपन्नता की ताकत, या अपनी मर्दानगी के अहंकार से हर किस्म की स्वतंत्रता भोग रहा है, और उसके शोषण के शिकार तबके परतंत्रता के शिकार हैं। संविधान सभा का काम पूरा होने पर अंबेडकर ने एक भाषण में इस बात का खुलासा भी किया था कि जो लोग असमानता से पीडि़त हैं, वे उस लोकतांत्रिक ढांचे को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं, जिसे संविधान सभा ने बड़ी ही मेहनत से खड़ा किया है। 

अब अंबेडकर की कही हुई एक तीसरी बात को देखें, तो उन्होंने कहा था कि राजनीति में भक्ति, या नायक की पूजा तानाशाही की राह प्रशस्त करती हैं। इस बात को उन्होंने 1950 के वक्त गांधी को लेकर कहा हो, या हिटलर को लेकर, या किसी और को लेकर, या फिर उन्होंने दुनिया के दूसरे देशों की मिसालें देखकर इसे कहा हो, या फिर किसी भविष्यवक्ता की तरह उन्होंने अंदाज लगाया हो, उनकी यह बात पूरी दुनिया में कारगर साबित हो रही है, और जहां-जहां लोग हीरो-वारशिप करते हैं, जीते-जागते लोगों की पूजा करते हैं, वहां-वहां तानाशाही आने लगती है। तानाशाही जरूरी नहीं है कि संविधान को कुचलकर आए, वह संविधान के ढांचे के भीतर अपने आपको न्यायोचित ठहराने के लिए कई तरह के छेद ढूंढकर घुस जाती है, और लोकतंत्र का घर संभाल बैठती है। दुनिया का इतिहास इस बात को साबित करता है, और ऐसा लगता है कि अंबेडकर के सामने उस वक्त भी कई मिसालें थीं, और उनकी आशंकाएं भी बहुत गलत साबित नहीं हुई हैं। 

हमने अंबेडकर से सहमति और असहमति के साथ संविधान को लेकर आज इस मौके पर अपनी सोच का एक कतरा पेश किया है। इस व्यापक मुद्दे पर एकमुश्त तो सब कुछ लिख पाना मुमकिन नहीं है, लेकिन यह जरूरी है कि संविधान को लेकर होने वाले जलसों के इस साल में इस बात को ध्यान रखा जाए कि संविधान की उस वक्त की भावनाएं, और आज बदले हुए वक्त-जरूरत में उन भावनाओं की नई व्याख्या को शब्दोंतले दम न तोडऩे दिया जाए। जब कभी संविधान के शब्दों पर चर्चा हो, उसकी भावना पर भी चर्चा होनी चाहिए। और आज इस देश के माहौल में जब संविधान के शब्दों को लेकर भी कोई सम्मान नहीं रह गया है, तो इस बात की अधिक उम्मीद नहीं की जा सकती कि उसकी भावना को लेकर कोई सम्मान होगा। जलसा जरूर हो सकता है। दुनिया में जलसा होना सबसे आसान है, क्योंकि वह सरकारी खर्च से भी हो सकता है, और समाज के किसी तबके की दीवानगी को ठीक लगे, तो जनता भी अपनी जेब का खर्च ऐसे जलसे पर कर सकती है। जिस तरह हर दीवाली समाज के उन गरीबों की याद भी दिलाती है जो अगली सुबह बूझे हुए दियों से तेल निकालने जगह-जगह घूमते हैं, उसी तरह संविधान की हर चर्चा उन कमजोर लोगों की याद दिलाती है जिन्हें संविधान उनका हक नहीं दिला पाया है। संविधान के शब्दों पर इस बरस बड़े-बड़े व्याख्यान होंगे, लेख लिखे जाएंगे, बहसें होंगी, और हो सकता है कि किताबें भी छपेंगी, लेकिन संविधान की भावना को याद करके उसकी शेष-स्मृतियों की तस्वीर पर चंदन की माला चढ़ाने जितनी जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 नवंबर 2024



 

दीवारों पर लिक्खा है, 25 नवंबर 2024



 

सडक़ों की अराजकता किसी भी राज्य में और किस्म के जुर्म बढ़ाती है

25  नवंबर 2024

 

पिछले चार दिनों में छत्तीसगढ़ की सडक़ों पर जितने किस्म के हादसे हुए हैं उनसे सरकार को सबक लेने की जरूरत है। दो अलग-अलग सडक़ दुर्घटनाओं में दो मंत्रियों की कारें हादसे की शिकार हुईं, और वे कम-अधिक जख्मी हुए। दूसरा एक हादसा बस्तर में हुआ जहां सडक़ पर चल रही पुलिस जांच से बचने के लिए दो मोटरसाइकिल सवार नौजवान रेलवे पटरी पर भाग निकले, और उसी पटरी पर आती हुई ट्रेन से बचने के लिए कूदे, या पुल से गिरे, और बुरी तरह जख्मी हुए। राजधानी रायपुर की खबरें है कि किस तरह यहां पर दो आवारा नौजवान अपने दुपहियों की नंबर प्लेट पर कोई संख्या बदलकर ट्रैफिक नियम तोड़ते थे, और चालान दूसरे लोगों तक पहुंचता था। इसी तरह की नंबर प्लेट छेडख़ानी का एक अलग मामला भी सामने आया है। इनसे परे हर दिन इस प्रदेश में सडक़ों पर कई मौतें हो रही हैं। मालवाहक गाडिय़ों में मजदूर या गरीब परिवार के लोग सामान की तरह लदकर जाते हैं, और गाड़ी पलटने से थोक में एक साथ जख्मी होते हैं। बिना हेलमेट हर दिन एक से अधिक दुपहिया वाले मारे जा रहे हैं। और न सिर्फ मौजूदा सरकार का, बल्कि पिछली सरकारों का भी रूख इसी तरह का रहता है कि यह तो चलते ही रहता है। 

छत्तीसगढ़ में हैरानी की बात यह है कि एक-एक करके कई मुद्दों पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट सरकार से जवाब-तलब कर रहा है कि सडक़ों पर से जानवर क्यों नहीं हटाए जा रहे, सडक़ों की मरम्मत क्यों नहीं हो रही, या ट्रैफिक लाईटें कितनी जगह काम कर रही हैं, और कितनी जगह खराब हैं। यह देखकर हैरानी होती है कि जो सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी होनी चाहिए, उसके लिए हाईकोर्ट को लाठी लेकर सरकार के पीछे पडऩा पड़ रहा है। देश भर में हर प्रदेश की सरकारों में केन्द्र सरकार के चुने हुए अखिल भारतीय सेवाओं के अफसर काम करते हैं, जिन्हें देश की सबसे महत्वपूर्ण सरकारी सेवाएं माना जाता है। इसके बाद भी अगर छोटी-छोटी सी बुनियादी जिम्मेदारियां भी पूरी नहीं होती हैं, तो किसे जिम्मेदार ठहराया जाए? इन नामी-गिरामी अफसरों को, या इनके राजनीतिक बॉस निर्वाचित नेताओं को? आखिर रोजमर्रा की जिंदगी को सुरक्षित बनाने की एकदम ही जरूरी जिम्मेदारी से शासन-प्रशासन में बैठे हुए नेता और अफसर इस हद तक कैसे कतरा सकते हैं? और फिर मानो हाईकोर्ट की तो कोई कदर ही नहीं है, जजों की आवाज तो डीजे की आवाज में खत्म हो जाती है, और नेताओं-अफसरों के कान तक पहुंच ही नहीं पाती है। नतीजा यह होता है कि आम जनता भयानक शोरगुल में अपना सुख-चैन, और अब तो जिंदगी भी, खोती रहती हैं, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज उसकी फिक्र करते रहते हैं, और जनता के वोटों से बनी हुई सरकारें अदालत को अनसुना करने में मानो पीएचडी कर चुकी है। 

और यह हाल सिर्फ हाईकोर्ट और किसी प्रदेश की सरकार का नहीं है, अब तो सुप्रीम कोर्ट भी बहुत से मामलों में यह रोना रोते बैठे रहता है कि सरकारें और उनके अफसर अदालत की बात नहीं सुन रहे। क्या लोकतंत्र में सरकारों के लिए यह शर्मिंदगी की बात नहीं होनी चाहिए? क्या सडक़ से जानवर हटाने, और लाउडस्पीकर का गैरकानूनी शोरगुल रूकवाने का काम भी हाईकोर्ट का होना चाहिए? और अदालत की बात अनसुनी करने का यह नतीजा है कि छत्तीसगढ़ की सडक़ें इतनी असुरक्षित हो चुकी हैं कि दो दिनों में दो मंत्रियों की गाडिय़ों का सडक़ हादसा हो रहा है, और राजधानी में गुंडे-मवाली बेफिक्री से नंबर प्लेट बदल-बदलकर घूम रहे हैं, और पुलिस बेवकूफ बन रही है। 

हम सडक़ पर अराजकता को सिर्फ वहीं तक नहीं देखते। हमारा मानना है कि अधिकतर लोगों की जिंदगी में कानून पहली बार सडक़ पर ही तोड़ा जाता है, बिना लाइसेंस, बिना उम्र हुए बच्चे गाडिय़ां दौड़ाते हैं, स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्रा तीन-तीन, चार-चार लदकर दुपहिए दौड़ाते हैं, पुलिस हेलमेट को लागू करने से कतराती है, हर कोई गाड़ी चलाते हुए मोबाइल या तो हाथ में थामे रहते हैं, या फिर गर्दन मोडक़र सिर और कंधे के बीच दबाए रखते हैं। और यह अराजकता लोगों को अगला कानून तोडऩे का हौसला देती है। तमाम अधिक गंभीर जुर्म सडक़ों से ही शुरू होते हैं, और ट्रैफिक नियम तोडऩे के बाद वे अधिक बड़े अपराधों की तरफ बढ़ते हैं। सरकारों के साथ दिक्कत यह है कि वे पिछली सरकारों की परंपराओं से परे कुछ नया सोचने के लिए अपने को मजबूर नहीं पाती हैं। लीक से हटकर कुछ सोचना और करना दिमागी मेहनत मांगता है, और सरकार चलाने वाले अफसर बाबुओं से पिछले फैसले पूछते हैं, और अधिक से अधिक कोशिश करते हैं कि उन घिसे-पिटे फैसलों से परे कहीं खिसका न जाए। नतीजा यह होता है कि टेक्नॉलॉजी और जिंदगी की जरूरतें अंधाधुंध बढ़ चुकी होती हैं, सडक़ों पर सब कुछ बदल गया रहता है, और सरकार का रूख वही पुराना चलते रहता है। जो सरकारें अपनी सडक़ों पर ट्रैफिक और सडक़ सुरक्षा के बाकी नियम कड़ाई से लागू नहीं करती हैं, वे अपने राज्य में अराजकता को बढ़ावा देती हैं। 

दो-दो मंत्रियों के सडक़ हादसों के बाद तो सरकार को पूरे प्रदेश के स्तर पर ट्रैफिक सुधारने के लिए, और सडक़ों को सुरक्षित बनाने के लिए गंभीरता से कोई फैसला लेना था। अविभाजित मध्यप्रदेश के समय पूरे प्रदेश में संभाग स्तर पर यातायात सुधार समिति रहती थी जिसमें कुछ वरिष्ठ पत्रकारों को रखा जाता था, और बाजार-कारोबार के कुछ प्रतिनिधि भी उसमें अफसरों के साथ रहते थे। अब वह परंपरा खत्म हो चुकी है। अब सरकारें फैसले लेने, और लागू करने के अपने एकाधिकार का कोई हिस्सा दूसरों के साथ बांटने को तैयार नहीं रहती। और सरकार खुद सडक़ों को सुरक्षित नहीं रख पा रही है, हाईकोर्ट को आए दिन सरकार के सबसे बड़े अफसरों से हलफनामे लेने पड़ रहे हैं। सत्ता का ऐसा रूख सडक़ों पर और अधिक मौतों को तो बढ़ाएगा ही, वह नौजवानों को और भी तरह-तरह के जुर्म करने का हौसला देगा जिसकी शुरूआत ट्रैफिक नियमों को तोडक़र होती है।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 नवंबर 2024



 

सत्ता पर लोगों को बिठाने में ट्रम्प की मनमानी के सबक

24  नवंबर 2024

जब लोगों के हाथ में अपनी मर्जी का काम करने की अपार ताकत रहती है, और जिन्हें रोकने-टोकने वाले लोग नहीं रहते हैं, तो ऐसे लोगों की गलतियां करने, और उनके गलत काम करने के खतरे बढ़ जाते हैं। अमरीका के अगले निर्वाचित राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के साथ यही हो रहा है। वे अपने अगले मंत्रिमंडल के लिए लोगों को मनोनीत करते चल रहे हैं, और देश के दूसरे प्रमुख ओहदों पर भी अपने समर्थकों, और अपने पसंदीदा लोगों के नाम घोषित करते जा रहे हैं। उनकी बहुत सी पसंद ऐसी हैं जिन्हें लेकर अमरीका में उनके समर्थकों, और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी बेचैनी है। उनके छांटे गए नामों में कुछ तो ऐसे हैं जिनके खिलाफ बड़े आरोप लगे हुए हैं, और जब संसदीय समिति इनके काम संभालने के पहले इन लोगों से सवाल-जवाब करेगी, तो हो सकता है कि इनमें से कुछ नाम उन ओहदों पर न भी पहुंच पाएं। अमरीका की यह व्यवस्था भारत की राजनीतिक व्यवस्था से परे है जहां पर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की तरफ से राष्ट्रपति या राज्यपाल को दिए गए नामों को शपथ दिलानी ही रहती है। अमरीका में राष्ट्रपति के मनोनीत तमाम लोगों को संसदीय सुनवाई का सामना करना पड़ता है, और वहां बहुमत की मंजूरी मिलने के बाद ही वे सरकार का हिस्सा बन पाते हैं। अब इससे बचने के लिए ऐसी चर्चा है कि ट्रम्प वहां अमरीकी संविधान के एक ऐसे प्रावधान का सहारा लेने की सोच रहे हैं जो राष्ट्रपति को उस वक्त लोगों को सीधे नियुक्त कर देने का हक देता है जब संसद सत्र नहीं चलता रहता। न सिर्फ मंत्री स्तर के 15 विभागीय मुखिया लोगों को, बल्कि सरकार के अलग-अलग करीब एक हजार ओहदों पर मनोनीत लोगों को संसद की कमेटी की मंजूरी लगती है जिसमें तमाम राजदूत भी शामिल हैं। मतलब यह कि अमरीकी राष्ट्रपति जो कि दुनिया का सबसे ताकतवर व्यक्ति माना जाता है, वह हर मनोनयन के बाद उसकी मंजूरी के लिए संसदीय सुनवाई पर निर्भर करता है। 

इस बात की चर्चा आज जरूरी इसलिए है कि ट्रम्प ने अटार्नी जनरल के लिए मैट गेट्स नाम के जिस आदमी का नाम घोषित किया था, उसने कुछ पुराने विवादों को लेकर अपना नाम वापिस ले लिया जिनमें किसी महिला से जबर्दस्ती करने का आरोप भी है। अब अगर संसद की सुनवाई का सामना करना पड़ता, तो इस आदमी से हजार किस्म के असुविधाजनक सवाल किए जा सकते थे। अब दिलचस्प बात यह है कि इसकी जगह पैम बॉंडी का नाम ट्रम्प ने घोषित किया है, और उन पर भी कई तरह के गंभीर आरोप लगे हुए हैं जिनमें चुनावी चंदा, रिश्वतखोरी, और चुनाव अभियान के लिए मौत की एक सजा में देर कराने की कोशिश जैसे मामले हैं। 

अमरीकी सरकार के लोगों के बारे में अधिक चर्चा करना आज का मकसद नहीं है, लेकिन दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में सत्ता के मुखिया के हाथ कितने अधिकार रहने चाहिए, और उन अधिकारों पर निगरानी रखने, सवाल-जवाब करने, और उसके गलत कामों को रोकने का कैसा संवैधानिक इंतजाम होना चाहिए, इस पर बात जरूरी है। जहां लोकतंत्र नहीं है वहां तो कोई बात भी नहीं है क्योंकि वहां पर राजशाही या तानाशाही की ताकत से मनमाने फैसले लिए जाते हैं जिनमें असहमति रखने वाले लोगों के कत्ल के फैसले भी रहते हैं, वहां पर सत्ता के किसी जुर्म को रोकने की गुंजाइश नहीं रहती है। लेकिन लोकतंत्र में सत्ता के मुखिया जिस तरह के सहयोगी छांटते हैं, उनसे लोकतंत्र सीधे-सीधे प्रभावित होता है। 

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की पिछली भूपेश बघेल सरकार के वक्त उनके सबसे अधिक भरोसे की एक डिप्टी कलेक्टर सौम्या चौरसिया को सरकारी कामकाज का मुखिया बनाकर रखा गया था। प्रदेश के मुख्य सचिव और डीजीपी भी इस डिप्टी कलेक्टर को रिपोर्ट करते थे, उससे हुक्म लेते थे। नतीजा यह हुआ कि पूरी सरकार एक मुजरिम-गिरोह की तरह काम करने लगी, और जिस दर्जे की सरकारी रंगदारी इन पांच बरसों में देखने मिली, वह हिन्दुस्तान के इतिहास में किसी प्रदेश में कभी नहीं थी। अगर खुद सरकार के भीतर सत्ता का विकेन्द्रीकरण होता, मुख्यमंत्री अपने सहयोगियों को उनकी वरिष्ठता के मुताबिक काम करने देते, तो आज इतने अफसर जेल में नहीं पड़े रहते। जब एक महिला डिप्टी कलेक्टर तानाशाह की ताकत से पूरी सरकार और पूरे प्रदेश को अपनी उंगलियों पर नचा रही थी, तब न तो संगठन की ताकत इसे रोकने की थी, न ही सरकार में किसी एक ने भी नियम-कानून के खिलाफ ऐसी व्यवस्था का विरोध किया। अघोषित रूप से चल रही इस तानाशाही ने ही सरकार के बड़े-बड़े अफसरों को मुजरिम बना दिया। 

इसलिए इस बात को समझने की जरूरत है कि सरकार के कोई भी मुखिया अपने सहयोगी किस तरह के छांटते हैं, वे चाहे मंत्री रहें, अफसर रहें, या किसी और संवैधानिक ओहदे के लिए छांटे लोग रहें, उन्हीं से किसी सरकार के सफल या असफल होने का फैसला होता है। भूपेश सरकार के महाधिवक्ता आज हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका लेकर खड़े हैं। उन पर तोहमत है कि एजी रहते हुए उन्होंने अभियुक्तों के पक्ष में मामले खत्म करवाने के लिए कोशिश की, अभियुक्तों की जमानत की कोशिश की, और सरकार के हितों के खिलाफ काम किया। अब अगर प्रदेश में सरकार के सबसे बड़े वकील पर यह तोहमत लगती है कि वह अभियुक्तों और हाईकोर्ट के एक जज के बीच पुल का काम कर रहे थे, तो इससे जाहिर होता है कि एजी की जिम्मेदारी के पद के लिए वे सही व्यक्ति नहीं थे। अगर किसी ईमानदार, और काबिल वकील को एजी बनाया जाता, तो आज शायद उस वक्त की सरकार इतनी कानूनी दिक्कतों में नहीं फंसी होती कि वह जेल में होती, और खुद एजी अग्रिम जमानत मांगते घूमते रहते। 

कोई देश हो, या प्रदेश हो, उसमें अगर सत्ता के अहमियत वाले ओहदों पर अच्छे और बेहतर लोगों को नहीं छांटा जाता, तो नाकामयाबी वहीं से शुरू हो जाती है, जो कि खतरों से होते हुए जेल तक ले जाती है। इसलिए लोकतंत्र यही सुझाता है कि देश-प्रदेश के मुखिया के हाथ में असीमित ताकत रहते हुए भी उसे लोकतांत्रिक तरीके से अपने साथियों से सलाह लेनी चाहिए। जहां कहीं बड़े फैसले सामूहिक जिम्मेदारी से लिए जाएंगे, व्यापक विचार-विमर्श होगा, वहां पर खराब फैसलों की आशंका घट जाएगी। कुछ अरसा पहले तक केरल में यह व्यवस्था थी कि वहां किसी भी जिले के कलेक्टर और एसपी के नाम तय करने का काम पूरा मंत्रिमंडल बैठकर करता था। आज हालत यह है कि दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमरीका में मंत्रियों (वहां सचिव कहा जाता है) और दूसरे ताकतवर ओहदों के नाम एक अकेला ट्रम्प मनमाने अंदाज में कर रहा है, विवादास्पद लोगों को कर रहा है, और शायद न सिर्फ अमरीका, बल्कि बाकी दुनिया को भी इस मनमानी के दाम चुकाने होंगे। 

इस सिलसिले में एक ही मिसाल सूझती है कि अगर पूरी मनमानी का हक दे दिया जाए, और कोई व्यक्ति पखाने में रखे जाने वाले टॉयलेट पेपर की जगह रेत कागज रख दे, और लोहे से जंग छुड़ाने के लिए नर्म टॉयलेट पेपर रख दे तो क्या होगा? आज दुनिया, देश, और प्रदेशों में इसी किस्म के कई फैसले देखने मिल रहे हैं। सत्ता के फैसलों का लोकतंत्रीकरण किया जाना एक अधिक समझदारी का काम होता है। 

(Daily Chhattisgarh)

कॉमेडियन के गंभीर दावे का भांडाफोड़ करने आना पड़ा सैकड़ों डॉक्टरों को..

24  नवंबर 2024

 

क्रिकेट खिलाड़ी, राजनेता, और कॉमेडियन नवजोत सिंह सिद्धू ने अभी एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि उनकी पत्नी नवजोत कौर का कैंसर एक खास घरेलू डाईट से ठीक हुआ है। उन्होंने कहा था कि शक्कर, और दूध के सामानों से परहेज करने, और हल्दी और नीम के सेवन से उनकी पत्नी के कैंसर ठीक होने में कामयाबी मिली। सिद्धू ने कहा था कि नवजोत स्टेज-4 के कैंसर से जूझ रही थी, डॉक्टरों ने उनके बचने की उम्मीद सिर्फ पांच फीसदी बताई थी, लेकिन हल्दी, नीम का पानी, सेव का सिरका, और नींबू पानी के नियमित सेवन से, शक्कर और कार्बोहाइडे्रट से सख्त परहेज, और इंटरमिटेंट फॉस्टिंग की मदद से वे सिर्फ 40 दिनों में अस्पताल से डिस्चार्ज हो गईं। 

इस पर देश के एक सबसे बड़े कैंसर अस्पताल टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के डायरेक्टर ने कहा है कि ऐसे दावों के पीछे कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। टाटा मेमोरियल के मौजूदा और भूतपूर्व 262 कैंसर विशेषज्ञों ने दस्तखत किया हुआ एक बयान जारी किया हुआ है कि इस तरह हल्दी और नीम वगैरह से कैंसर ठीक होने का कोई वैज्ञानिक अध्ययन नहीं है, और इन डॉक्टरों ने कैंसर मरीजों से अपील की है कि ऐसी गंभीर बीमारी के मामले में वे ऐसे अप्रमाणित उपचार पर बिल्कुल भरोसा न करें। टाटा मेमोरियल के डायरेक्टर डॉ.सी.एस. प्रमेश ने डॉक्टरों का बयान एक्स पर पोस्ट करते हुए सिद्धू के वीडियो को भी पोस्ट किया है, और लिखा है- ऐसी बातें सुनकर किसी को मूर्ख नहीं बनना चाहिए, इस तरह के दावे गैरवैज्ञानिक, और निराधार होते हैं, नवजोत कौर की सर्जरी और कीमोथैरेपी हुई थी, यही कारण है कि आज उन्हें कैंसर से मुक्ति मिली है, इसमें हल्दी, नीम, या किसी भी गैरचिकित्सकीय चीज के मददगार होने का दावा गैरवैज्ञानिक है। 

किसी एक व्यक्ति के ऐसे बयान और दावे पर सैकड़ों विशेषज्ञों के ऐसे खंडन की पहले की कभी कोई याद नहीं पड़ती। हाल के बरसों में अपने आपको स्वामी और योगी कहने वाला रामदेव नाम का एक भगवाधारी कारोबारी आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के खिलाफ अंतहीन नाजायज बकवास करते रहा, और उसे सुप्रीम कोर्ट में माफी मांगनी पड़ी, और माफी के ईश्तहार छपवाने पड़े। लेकिन तब तक कोरोना काल के प्रभावित हिन्दुस्तानी लोगों में से करोड़ों लोग इस कारोबारी के झांसे में आकर अपनी सेहत बर्बाद कर चुके रहे होंगे। अब हर किसी मामले में तो लोग सुप्रीम कोर्ट जा नहीं सकते, और अदालत हर किसी को कटघरे में ला नहीं सकती। इसलिए सिद्धू जैसे मशहूर इंसान के इस तरह के नाजायज दावे का भांडाफोड़ करने के लिए डॉक्टरों ने सामने आकर ठीक ही किया है। इस देश के 262 कैंसर विशेषज्ञ अगर एक साथ ऐसा बयान जारी करते हैं, तो देश के आम लोगों को नीमहकीमी सुझाने वाले लोगों की असलियत समझना चाहिए। 

दरअसल सोशल मीडिया पर हर किसी को लिखने की जिस किस्म की आजादी हासिल है, उसके चलते हुए बहुत से लोग बेसिर पैर के इलाज सुझाने लगते हैं। सोशल मीडिया पर किसी को भी किसी वैज्ञानिक स्रोत को देने की मजबूरी नहीं रहती है, और यह बात सिर्फ हिन्दुस्तान में नहीं, पश्चिम के पढ़े-लिखे और वैज्ञानिक रूप से विकसित देशों में भी धड़ल्ले से चलती है। नवजोत सिंह सिद्धू ने तो जो बात कही है वह घरेलू नुस्खों की बात है, लेकिन रामदेव जैसे लोगों ने कोरोना को रोकने के दावे के साथ अपनी कंपनी की बनाई हुई जिन दवाईयों का बाजार खड़ा किया, वह तो और भयानक था। फिर केन्द्र सरकार का हाथ रामदेव की पीठ पर था, और रामदेव की दवा लाँच करने के लिए केन्द्र सरकार के मंत्री मौजूद थे, और सरकार के बड़े-बड़े लोगों ने इस बेबुनियाद दवा को बढ़ावा देने का काम किया था। अगर सुप्रीम कोर्ट की दखल नहीं आई होती, तो अब तक रामदेव और भी बहुत सी बीमारियों को ठीक करने का दावा करते रहता, और देश की जनता का भरोसा ऐलोपैथी जैसी आधुनिक चिकित्सा से खत्म करता रहता। 

लोगों को लिखने और बोलने की आजादी का ऐसा बेजा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए कि वे सोशल मीडिया पर बड़ी-बड़ी बीमारियों को ठीक करने के सरल और आसान इलाज के दावे करते रहें। कुछ लोग तो इससे भी आगे बढक़र अपने घर पर तैयार की हुई किसी तरह की तथाकथित दवाई बांटने में लगे रहते हैं, और यह मानकर चलते हैं कि वे समाजसेवा कर रहे हैं। ऐसे उत्साह, और ऐसी अवैज्ञानिक सनक पर कानूनी रोक भी लगनी चाहिए। देश में जगह-जगह किसी खास दिन पर अस्थमा ठीक करने के लिए कई लोग तरह-तरह की दवाई बांटते हैं, और इन दवाईयों में क्या है इसे एक रहस्य की तरह रखते हैं, उसकी कोई जानकारी किसी को नहीं देते, और लाईलाज लगती बीमारियों के ठीक हो जाने की उम्मीद के साथ अस्थमा के मरीज इन जगहों पर पहुंचते रहते हैं। देश में ऐलोपैथी के डॉक्टरों के ही ऐसे संगठन हैं जो कि अवैज्ञानिक दावों पर सवाल खड़े करते हैं, और ऐसे ही संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में रामदेव को उजागर किया था, और माफी छपवाने पर मजबूर किया था। हमारा ख्याल है कि सेहत से जुड़े हुए अवैज्ञानिक दावों के खिलाफ न सिर्फ डॉक्टरों को, बल्कि वैज्ञानिक चेतना रखने वाले नागरिकों को भी सरकार और अदालत तक जाना चाहिए। देश में शिक्षा की कमी है, वैज्ञानिक चेतना की कमी है, और इलाज की भी कमी है। ऐसे में न सिर्फ गरीब और बेबस लोग, बल्कि किसी भी तरह के सनसनीखेज दावों पर आसानी से भरोसा कर लेने वाले कमअक्ल लोग भी सोशल मीडिया पर सुझाए गए इलाज पर अमल करने लगते हैं। नतीजा यह होता है कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में देर होती है, और वह बीमारी फैलते हुए जानलेवा हो जाती है। कायदे से तो केन्द्र और राज्य सरकारों की यह जिम्मेदारी है कि वे अवैज्ञानिक चिकित्सकीय दावे करने वाले लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करें, लेकिन चूंकि ऐसे लोगों के इर्द-गिर्द भीड़ जुटी रहती हैं, और तमाम भीड़ वोटरों की रहती है, इसलिए सत्ता चलाने वाले नेता ऐसे लोगों पर कार्रवाई नहीं करते हैं। हमारा ख्याल है कि समाज के जो लोग अपने आपको जिम्मेदार मानते हैं, उन लोगों को भी इलाज के नाम पर बकवास फैलाने से बचना चाहिए। सिद्धू जैसे लोगों को भी चिकित्सा विज्ञान की तरफ से आए इतने बड़े खंडन के बाद अब अक्ल आनी चाहिए, लेकिन लोकतंत्र में ऐसा कोई कानून भी नहीं है जो लोगों को अक्ल के इस्तेमाल पर मजबूर कर सके।  

(Daily Chhattisgarh)

दोनों राज्यों में मौजूदा सत्ता जारी, बाकी कहीं खुशी, कहीं गम

23  नवंबर 2024

 

दो राज्यों में विधानसभा के चुनाव के नतीजे, और कई राज्यों में बिखरे हुए विधानसभा उपचुनावों के नतीजे भाजपा के लिए बड़ी खुशी लेकर आए हैं। महाराष्ट्र में भाजपा, शिंदे सेना, और अजीत पवार का गठबंधन भारी बढ़ोत्तरी के साथ सत्तारूढ़ गठबंधन बना रहेगा। एनडीए गठबंधन को 38 सीटें अधिक मिल रही हैं, जो कि कांग्रेस-उद्धव-शरद पवार गठबंधन की 19 सीटों, और अन्य की 19 सीटों की कीमत पर हासिल हो रही हैं। महाराष्ट्र में भाजपा शिंदे-सेना से दोगुने से अधिक सीटें पाते दिख रही है, और इसका जाहिर मतलब यह है कि वहां अगला मुख्यमंत्री भाजपा का ही रहेगा। लगे हाथों महाराष्ट्र के नतीजों का एक शुरूआती विश्लेषण करें, तो दो कुनबों के बंटवारे में कुनबों के मुखिया नुकसान में रहे, शरद पवार और उद्धव ठाकरे अपनी पार्टी के बचे-खुचे हिस्से के साथ बहुत सी सीटें विभाजित हिस्से के हाथों गंवा चुके हैं, फिर भी दिलचस्प बात यह है कि अभी दोपहर की लीड के मुताबिक महाराष्ट्र में सबसे बड़ा नुकसान कांग्रेस का हुआ है जिसने पिछली बार के मुकाबले 26 सीटें खोई हैं, और भाजपा ने महाराष्ट्र में 22 सीटें अधिक पाई हैं। इस तरह पूरे देश में कांग्रेस और भाजपा को आमने-सामने रखकर तुलना करने की जो आम बात है, वह महाराष्ट्र में साफ दिख रही है। दूसरी तरफ कांग्रेस के साथ गठबंधन में उद्धव ठाकरे और शरद पवार की सीटें दोपहर 12 बजे मामूली बढ़ते दिख रही हैं। 

महाराष्ट्र की सत्ता जिस गठबंधन के हाथ थी उसी के हाथ बनी हुई है।  दूसरी तरफ झारखंड को देखें तो वहां इंडिया-गठबंधन की सरकार जारी रहने के आसार दिख रहे हैं। वहां इसके 51 सीटों पर बढ़त के आंकड़े आ रहे हैं, और इस पल एनडीए 22 सीटों पर पीछे है। कुल 81 सीटों की विधानसभा में यह रूख झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस गठबंधन की सत्ता जारी रहने का रूख दिखा रहा है। दोनों ही राज्य जिन गठबंधनों के हाथ थे, उन्हीं गठबंधनों के हाथ रहते हुए दिख रहे हैं। दूसरी बात यह कि भाजपा की सीटें इन दोनों ही राज्यों में बढ़ रही हैं। दोनों ही राज्यों में इन दोनों गठबंधनों से परे की सीटें कम होते दिख रही हैं, और वे गठबंधनों में जा रही हैं। मतलब साफ है कि गठबंधनों के बाहर स्वतंत्र रूप से लडऩे वाली छोटी पार्टियां इस बार मतदाताओं ने किनारे कर दी हैं, और दो ध्रुवों के बीच चुनाव हुआ है। दो छोटी-छोटी और बातें चर्चा के लायक हैं, झारखंड में लालू की पार्टी आरजेडी छह सीटों पर लड़ी थी, और वह पांच पर जीतते दिख रही है। दूसरी तरफ बंगाल के उपचुनावों में सभी छह सीटें सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस जीत रही है। मतलब यह कि कम से कम इन तीन राज्यों में वोटर सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन के साथ है। 

दोनों ही राज्यों में विधानसभा के चुनाव बहुत किस्म की अदालती कार्रवाई के साये में हुए हैं। केन्द्रीय जांच एजेंसियां लगातार चुनिंदा लोगों को निशाना बनाते हुए लगी हुई थीं, और महाराष्ट्र और झारखंड दोनों जगह एनडीए विरोधी नेता जेल भी आते-जाते रहे हैं। खासकर महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी में जिस तरह से विभाजन हुआ उसने राज्य की राजनीति को छिन्न-भिन्न कर दिया, और केन्द्र और राज्य दोनों जगह सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन मजबूत होता चले गया। चुनावी नतीजे पहली नजर में मतदाताओं का यह रूख भी बताते हैं कि उसने एक स्थिर सरकार बनाने के लिए महाराष्ट्र में एनडीए को वोट दिया है क्योंकि एनडीए से परे किसी गठबंधन की सरकार महाराष्ट्र में स्थिर और स्थाई नहीं रह पाती। 

महाराष्ट्र में एनडीए छलांग लगाकर आगे बढ़ा है, और विपक्षी राज वाले झारखंड में भी उसकी लीड अभी पिछली बार से अधिक सीटों पर दिख रही है। भाजपा इन चुनावों में सबसे बड़ी विजेता बनकर सामने आई है। दोनों ही राज्यों में एनडीए के भीतर कमल छाप की सीटें भी बढऩे का रूझान है। कांग्रेस के लिए राहत की एक छोटी सी बात यह हो सकती है कि विधानसभा चुनावों से परे केरल के वायनाड में हुए लोकसभा उपचुनाव में राहुल की खाली की हुई सीट पर प्रियंका तीन लाख से अधिक वोटों की लीड से आगे हैं, और यहां पर सीपीआई को डेढ़ लाख वोट, और भाजपा को 84 हजार वोट अब तक मिले हैं। गांधी परिवार के लिए यह एक निजी खुशी और राहत की बात है कि उत्तर भारत में अपनी कुछ जड़ें खो चुका यह परिवार दक्षिण के एकदम किनारे के केरल में अभी लाखों वोट से जीत रहा है। कांग्रेस के लिए यह भी एक फायदे की बात होगी कि लोकसभा में भाई उत्तर भारत की तरफ से खड़ा होगा, तो बहन दक्षिण भारत की तरफ से। इससे कांग्रेस की उत्तर, दक्षिण दोनों तरफ मौजूदगी बनी रहेगी, और हो सकता है कि शायद मजबूत भी हो। 

वोट बढऩे और सीट बढऩे से परे ये चुनाव यथास्थिति को जारी रखने वाले दिखते हैं। दोनों राज्यों में मौजूदा सरकारें जारी रहेंगी, केरल की लोकसभा सीट गांधी परिवार में बनी रहेगी, बंगाल की सीटें टीएमसी के पास बनी रहेंगी, और छत्तीसगढ़ के अकेले विधानसभा उपचुनाव में भी भाजपा की सीट भाजपा के पास आ चुकी है। कर्नाटक में भी सभी तीन उपचुनावों में सत्तारूढ़ कांग्रेस की जीत हुई है। यूपी में भी आधा दर्जन सीटें सत्तारूढ़ बीजेपी को मिली हैं। आने वाले दिनों में अलग-अलग प्रदेशों के राजनीतिक विश्लेषण से यह बात साफ होगी कि बारीक मुद्दे क्या रहे। लेकिन अभी हम आसमान पर उड़ते पंछी की नजरों से देश के नक्शे को एक नजर देख रहे हैं, तो यह भाजपा-एनडीए की बढ़ोत्तरी, और काफी हद तक यथास्थिति जारी रहने की नौबत है। दोनों ही पक्षों के पास खुशी मनाने को कुछ-कुछ है, और कुछ-कुछ गम गलत करने को भी है। शाम को बैठने वाले इन दोनों ही गठबंधनों के लोगों के मूड और मर्जी पर यह निर्भर करेगा कि वे खुशी मनाएंगे, या गम गलत करेंगे, वैसे मतदाता ने दोनों ही बातों के लिए गुंजाइश छोड़ी है।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 नवंबर 2024



 

दीवारों पर लिक्खा है, 22 नवंबर 2024



 

अडानी का अमरीका में जो होना है वो हो, पर भारत सरकार की जिम्मेदारी है...

 22  नवंबर 2024

 

भारत की कारोबारी दुनिया में गजब का भूचाल आया हुआ है। जब देश में कोई भी एक कारोबारी इतना बड़ा हो जाता है कि उसके अकेले के धंधों से देश की अर्थव्यवस्था तय होने लगती है, जो इतने अलग-अलग किस्म के धंधों में इतना बड़ा बन चुका रहता है कि उसका कोई मुकाबला नहीं रहता, और जिसे बचाने के लिए कारोबार से जुड़ी संवैधानिक और नियामक संस्थाएं एक पैर पर खड़ी रहती हैं, तो उसकी गिरफ्तारी के लिए अमरीका में वारंट निकल जाना इस देश में भूचाल तो ला ही देता है। फिर अडानी की साख हिन्दुस्तान में कुछ इस किस्म की है कि वह मोदी सरकार की सबसे पसंदीदा, और सबसे चहेती कंपनी है, इसलिए अगर वह अमरीका में धोखाधड़ी और जालसाजी, और दूसरे देश में सरकार को रिश्वत देने वाली अमरीका में रजिस्टर्ड कंपनी है, तो यह भी भारत सरकार की साख पर आंच आने की बात है क्योंकि विपक्ष तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, और अडानी के संबंधों को लेकर बरसों से हमलावर चले ही आ रहा है। देश में ऐसा भी माहौल है कि केन्द्र सरकार इस कंपनी पर बेतहाशा मेहरबान है, और यह कंपनी सरकार में जो चाहे करवा सकती है। 

अब अगर हम अमरीकी अदालत में पेश इस ताजा मामले को देखें जिसमें वहां के न्याय विभाग ने गौतम अडानी, उनके भतीजे, और आधा दर्जन दीगर लोगों के खिलाफ जालसाजी, धोखाधड़ी, और रिश्वत देने का मुकदमा चलाना शुरू किया है, और इन तमाम लोगों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी निकल गए हैं, तो यह हिन्दुस्तान के लिए बहुत फिक्र की बात है। जब किसी एक कारोबारी का आकार इतना दानवाकार हो चुका है, तो फिर उसके जेल जाने के खतरे से देश के बैंक, बाकी वित्तीय संस्थान, शेयर बाजार, और बहुत सी सरकारें हिलने की नौबत आ गई है। केन्द्र की मोदी सरकार से परे देश के दर्जन भर राज्यों में अडानी का राज्य सरकारों से भी कारोबार है, और भारत में सरकारी लोगों को 22 सौ करोड़ रूपए की रिश्वत देने की जो चार्जशीट अमरीकी अदालत में पेश की गई है, उसमें भारत के आन्ध्र, ओडिशा, छत्तीसगढ़, और तमिलनाडु की सरकारों, और सरकारी लोगों पर भी आंच आ रही है। कहने के लिए अब कुछ प्रदेशों के नेता यह कह रहे हैं कि उन्होंने केन्द्र सरकार की एक कंपनी से समझौते किए थे, और सीधे अडानी से समझौता नहीं किया था। लेकिन यह कुछ उसी तरह का मामला है कि छत्तीसगढ़ के हसदेव में कोयला खदान की लीज तो राजस्थान सरकार को अपने बिजलीघर के मिली है, लेकिन उसे खोदने, और कोयला पहुंचाने का काम राजस्थान की तरफ से अडानी को दिया गया है। और अब अडानी हसदेव में जो कुछ कर रहा है, वह यह तकनीकी आड़़ ले सकता है कि खदान की लीज तो राजस्थान सरकार की है, वह तो वहां सिर्फ मजदूरी कर रहा है, सिर्फ पेड़ों पर कुल्हाड़ी चला रहा है, राजस्थान सरकार के लिए। 

पहली नजर में अडानी पर जो तोहमतें लगी हैं वे यह हैं कि चार साल से अडानी भारत में रिश्वत देकर सोलर प्रोजेक्ट के लिए समझौते कर रहा था, और अमरीकी पूंजी बाजार में उसने इन सोलर प्रोजेक्ट का हवाला देकर, मोटी कमाई का भरोसा दिलाकर 24 हजार करोड़ रूपए जुटाए थे, जो पूरी तरह धोखाधड़ी, और जालसाजी से किया गया काम बताया जा रहा है। अमरीकी न्याय विभाग ने अदालत में कहा है कि पूंजी बाजार में अडानी ने अपने खिलाफ चल रही जांच और कानूनी कार्रवाई को पूरी तरह से छुपा लिया था, और एक झूठी तस्वीर पेश करके इतना पैसा इकट्ठा किया। अमरीकी जांच एजेंसी एफबीआई ने गौतम अडानी के भतीजे सागर अडानी की जांच में यह पाया कि अमरीकी निवेशकों और वित्तीय संस्थानों को झूठी जानकारी दी गई। इस जांच में अडानी के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भी जब्त किए जा चुके थे। 2020 से 2023 के बीच इन सभी आरोपियों के बीच घूसखोरी की चर्चा वाले ई-मेल आए-गए, और इन लोगों ने मिलकर भी इस पर चर्चा की। जांच एजेंसी ने अदालत को बताया है कि गौतम अडानी और उनके बड़े अधिकारियों ने 2022 में दिल्ली में घूस की साजिश रचने के लिए बैठक भी की थी। 

लेकिन अमरीका में जांच एजेंसियों ने, और वहां के पूंजी बाजार के नियामक आयोग ने अडानी को जिस धोखाधड़ी और जालसाजी का आरोपी ठहराया है, वह बड़ा गंभीर मामला है। अमरीका का कानून वहां की सरकार को यह अधिकार और जिम्मेदारी देता है कि वहां कारोबार करने वाली कंपनी अगर दुनिया के किसी भी देश में रिश्वत देती है, तो उस पर अमरीका में मुकदमा चलाया जा सकता है। यह बड़ा अजीब नौबत है कि भारत में केन्द्र सरकार और आधा दर्जन राज्य सरकारों के लोगों को रिश्वत देने की तोहमत लगी है, उसके सुबूत अदालत में पेश कर दिए गए हैं, अमरीका में मुकदमा चल रहा है, वहां गिरफ्तारी वारंट निकला है, लेकिन भारत में देश या किसी प्रदेश की सरकारों के माथों पर कोई बल नहीं पड़ा है। अमरीका का यह मामला अडानी के लिए इसलिए खतरनाक है कि जिन धाराओं में खुलासे से सुबूत पेश किए गए हैं, उनमें अडानी चाचा-भतीजे के अलावा उनकी कंपनी के आधा दर्जन और लोगों को पांच साल तक की सजा मुमकिन है। इसके साथ-साथ यह भी है कि भारत और अमरीका के बीच प्रत्यर्पण संधि की नौबत और जरूरत उस वक्त आ सकती है जब इन लोगों को भारत में रहते हुए ही अमरीका में सजा हो जाए। कभी-कभी ऐसा भी हुआ है कि भारत सरकार ने अपनी पूरी ताकत लगाकर अमरीकी राष्ट्रपति के एक विशेषाधिकार का अनुरोध किया है जिसके तहत वे किसी भी मुजरिम की सजा माफ कर सकते हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जाते हुए अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन से उनके बचे हुए हफ्तों में ऐसी कोई अपील कर सकते हैं, और क्या अमरीकी कानून में किसी मुकदमे में मुजरिम साबित होने के पहले भी राष्ट्रपति माफी दे सकते हैं? और क्या अगले राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप अपने कार्यकाल में भारत सरकार की ऐसी किसी संभावित अपील पर भारत से बहुत बड़ा मोलभाव किए बिना ऐसी कोई माफी दे सकते हैं? लेकिन ये तमाम बातें आगे की हैं, फिलहाल तो ऐसा लगता है कि अडानी भारत में रहकर अमरीका में दिग्गज वकीलों के मार्फत अदालती मुकदमा लड़ेंगे। 

भारत में राहुल गांधी पिछले कई बरस से अडानी और मोदी के रिश्तों को लेकर असाधारण स्तर के हमलावर बने हुए हैं। अब कांग्रेस पार्टी ने इस पर अडानी की गिरफ्तारी भी मांगी है, और संयुक्त संसदीय समिति की जांच भी। यह केन्द्र सरकार से इतने करीबी रिश्तों वाली, देश के इतने अधिक राज्यों में कारोबार करने वाली, और ऐसी दानवाकार कंपनी है, कि इसकी और कोई मिसाल नहीं हो सकती थी। यह तो अच्छा है कि यह मामला अमरीकी जांच एजेंसियां जांच रही हैं, और अमरीकी अदालत में यह चल रहा है। क्योंकि भारत में ऐसा कुछ भी मुमकिन नहीं था। देखना यह है कि अमरीका में पहली नजर में इस कंपनी के किए हुए जो जुर्म सरीखे काम दिख रहे हैं, वे अगर वहां जुर्म साबित होते हैं, तो फिर अमरीकी एजेंसियों के जुटाए गए सुबूतों पर भारत सरकार, और इसकी प्रदेश सरकारें क्या करेंगी? हमारा तो यह मानना है कि भारत सरकार को तुरंत ही अमरीका सरकार को लिखकर इस मामले के अधिक से अधिक सुबूत मांगने चाहिए क्योंकि भारत सरकार ने संविधान की शपथ ली है, और अगर उसकी जानकारी में यह बात आ रही है कि भारत की किसी कंपनी ने भारत की सरकारों को 22 सौ करोड़ रूपए रिश्वत दी है, तो मोदी सरकार को तुरंत ही इस पर जांच करनी ही चाहिए, संविधान की शपथ सरकार पर यह जिम्मेदारी डालती है कि वह इसे अनदेखा न करे। अडानी का अमरीकी अदालत में जो होना है सो हो, लेकिन भारत ने अगर अमरीका से तुरंत सुबूत नहीं मांगे, और उन सुबूतों पर इस देश में अगर कोई कानूनी कार्रवाई बनती है, उसे शुरू नहीं किया, तो भारत सरकार खुद शक के बादलों तले रहेगी।  

(Daily Chhattisgarh)

सरकारी कारोबार घाटे में चलाना कितना जायज?

21  नवंबर 2024

 

हिमाचल हाईकोर्ट से एक ऐसा फैसला निकलकर आया है जिसे पहली नजर में कोई सरकार के कामकाज में दखल करार दे सकते हैं, लेकिन यह पूरे देश पर लागू होने वाला मामला दिखता है। वहां हाईकोर्ट ने राज्य के पर्यटन विकास निगम के लगातार घाटा दे रहे 18 होटलों को बंद करने का फैसला दिया है। उन्होंने इसके लिए 25 नवंबर की तारीख दे दी है, और कहा है कि निगम के एमडी इसके लिए व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह रहेंगे। हालांकि राज्य सरकार की तरफ से मुख्यमंत्री ने कहा है कि वे इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे, लेकिन जज की जुबान में, इन सफेद हाथियों, के घाटे को सरकार कैसे निपटाएगी इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है। सरकारी वकील ने कहा है कि यह फैसला बड़ा रूटीन है, और इसकी खबर इसलिए बन रही है क्योंकि अदालत ने इन होटलों की नीलामी का जिक्र किया है। ये तमाम होटलें बड़ी खास जगहों पर बनाई गई हैं, फिर भी घाटे में चल रही हैं। अदालत ने कहा कि इन सफेद हाथियों के रखरखाव पर जनता का पैसा बर्बाद नहीं करना चाहिए। 

अब सार्वजनिक संपत्तियों के निजीकरण का मामला हमेशा से विवादों में घिरा हुआ रहा है। आज मोदी सरकार पूरे देश में अधिक से अधिक सार्वजनिक उपक्रमों को बेचते चल रही है। इनमें एयर इंडिया सरीखे पुराने संस्थान भी हैं जो हजारों करोड़ के घाटे में चल रहे थे, और जिनका घाटा सरकार पूरा करते चल रही थी। अभी जब टाटा ने इसे खरीदा तो एयर इंडिया पर 61 हजार करोड़ रूपए की देनदारी थी, और उसे मोदी सरकार ने ही चुकता किया। दिलचस्प बात यह है कि टाटा की ही 1932 में शुरू की हुई एयर इंडिया के 49 फीसदी शेयर भारत सरकार ने आजादी के तुरंत बाद 1948 में ले लिए थे, और 1953 में एक कानून बनाकर और भी शेयर ले लिए। बाद में यह पूरी तरह से सरकारी एयरलाईंस हो गई, और घाटे में डूबती चली गई। जब देश में दूसरी निजी एयरलाईंस को इजाजत दी गई, तो एयर इंडिया का भविष्य खत्म हो गया। अब मोदी सरकार ने इसे बेचा तो एक बार फिर टाटा इसे लेकर घाटे से उबारने की कोशिश कर रहा है। 

अब हम हिमाचल के फैसले के आसपास की दूसरी मिसाल देखें तो छत्तीसगढ़ में भी राज्य बनने के बाद प्रदेश भर में कई टूरिस्ट मोटल बनाए गए, और वे तकरीबन सारे के सारे घाटे में चलते रहे। कुछ जगहों पर तो हालत यह रही कि नेताओं ने अपने विधानसभा क्षेत्र में कुछ काम दिखाने के लिए ऐसी जगहों पर ये मोटल बनवाए जहां पर्यटकों के जाने का कोई काम ही नहीं था। नतीजा यह निकला कि उन्हें चलाने के लिए जिस तरह के किराए पर देना पड़ा, वैसा किराया देकर निर्माण कंपनियों ने ऐसे मोटल को अपना गोदाम बना लिया, और वहां मजदूर ठहरा लिए। सरकारी कारोबार की ऐसी बदहाली देखकर लगता है कि सरकार को कारोबार करना नहीं चाहिए, बल्कि कारोबार पर नियंत्रण करना चाहिए। डॉ.रमन सिंह के मुख्यमंत्री रहते हुए केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह छत्तीसगढ़ आए थे, और मुख्यमंत्री निवास पर संपादकों के साथ खाने पर उनकी चर्चा हुई थी। उन्होंने छत्तीसगढ़ के पहले के एक सरकारी उपक्रम बालको के बारे में पूछे गए सवाल पर कहा था कि उनकी पार्टी घाटा झेलकर सरकारी कारोबार चलाना नहीं चाहती, इसलिए अटलजी के प्रधानमंत्री रहते हुए बालको का विनिवेश किया गया था। उन्होंने बालको के बिक्री के दिन के शेयर का दाम और इस चर्चा के दिन का शेयर का दाम बताया था, और कहा था कि सरकार ने करीब आधी हिस्सेदारी बेचकर मोटी कमाई पाना शुरू कर दिया है, और बालको की कमाई पर सरकार को टैक्स भी मिलता है। उन्होंने गुजरात के एक-एक बस स्टैंड पर निजी भागीदारी से बनाए गए बड़े-बड़े मॉल का जिक्र भी किया था कि जहां दूसरे प्रदेशों में बस स्टैंड गंदी जगह रहती है, गुजरात के बस स्टैंड पर लोग पिकनिक मनाने जाते हैं। 

अब निजीकरण के साथ जुड़ी हुई कई दूसरी बातों को भी समझना जरूरी है कि सरकारी या सार्वजनिक संपत्ति निजी कारोबारियों को किस दाम पर, और किन शर्तों पर दी जा रही है। खानदानी सोने के गहने कहीं चांदी के दाम पर तो चुनिंदा कारोबारियों को नहीं बेच दिए जा रहे हैं? अगर पूरी पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक उपक्रम बेचे जाते हैं, और निजी कारोबारी उन्हें बेहतर तरीके से चलाते हैं, सरकार को हिस्सेदारी या टैक्स भी मिलता है, तो निजीकरण को महज सरकारी नौकरियों को बनाए रखने के लिए रोकना ठीक नहीं है। कई कारोबार ऐसे रहते हैं जो सरकारी अमले के मिजाज से ही मेल नहीं खाते, जिनमें होटल या रेस्त्रां चलाना भी है। और जहां कहीं सरकारी संस्थान जनता के पैसों से घाटा पूरा कर रहे हैं, उन्हें लीज पर देने, या बेच देने के बारे में इसलिए सोचना चाहिए कि सरकारी नालायकी का दाम करदाता क्यों चुकाएं? एयर इंडिया के मामले में देश ने यह देखा हुआ है कि किस तरह बिना तली वाले एक अंधेरे कुएं में सरकार अपनी मदद डालती जा रही थी, और घाटा कभी पटने का नाम ही नहीं ले रहा था। 

दूसरी तरफ कुछ ऐसे मामले हैं जहां पर सरकार की मौजूदगी हट जाने से बाजार बुरी तरह शोषण पर उतर जाता है। जिन राज्यों में सरकारी बसें बंद हो गई हैं, वहां पर निजी बसें सिर्फ प्रमुख रास्तों पर चलती हैं, और मनमानी वसूली करती हैं। छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्य हैं जहां अब फिर से सरकारी बसें शुरू करने की मांग उठ रही है। भारत में मोबाइल-इंटरनेट कंपनियों ने शुरूआती रियायत के बाद जिस अंदाज में ग्राहकों से उगाही चालू की, उससे भी अब दसियों लाख ग्राहक सरकारी कंपनी बीएसएनएल की तरफ लौट रहे हैं। इसलिए सरकारी धंधों का सौ फीसदी निजीकरण भी ठीक नहीं है, और हर कारोबार को देख-समझकर चलाना, बेचना, या बंद करना चाहिए। हम हिमाचल हाईकोर्ट के फैसले को आज की इस चर्चा की शुरूआत के लिए एक मुद्दा मानकर आगे बढ़े हैं, लेकिन हर प्रदेश को अपने सरकारी कारोबार के बारे में सोचना-विचारना चाहिए कि वे घाटे में न चलें, और उनकी फायदे की संभावनाएं अछूती न रह जाएं। आज अमरीका में अगले राष्ट्रपति बनने जा रहे डोनल्ड ट्रम्प ने जिस तरह सरकारी अमले की नालायकी और निकम्मेपन को घटाने के लिए एक छंटनीमास्टर कारोबारी एलन मस्क को जिम्मा दिया है, उसी तरह भारत की देश-प्रदेश की सरकारों को अपनी-अपनी चर्बी छांटने का काम करना चाहिए।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 नवंबर 2024



 

जाती और आती अमरीकी सरकारों में विरोधाभास को गौर से देखती हुई दुनिया...

  20  नवंबर 2024

 

अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने अपने कार्यकाल के बचे कुल दो महीनों में एक बड़ा रणनीतिक फैसला लिया, और यूक्रेन को इस बात की अनुमति दी कि वह अमरीका की दी हुई मिसाइलों से रूस के भीतर हमले कर सकता है। लंबी दूरी वाली इन मिसाइलों का इस्तेमाल रूस के खिलाफ शुरू भी हो गया है, और रूस में राष्ट्रपति पुतिन से परे के कुछ सत्तारूढ़ नेताओं ने इसे तीसरे विश्व युद्ध की तरफ एक कदम बढ़ाना करार दिया है। अब तक अमरीका और योरप के देश यूक्रेन को जो फौजी मदद कर रहे हैं, उनमें हथियारों के इस्तेमाल पर उन्होंने कुछ किस्म के प्रतिबंध भी लगाए हुए हैं ताकि रूस उसे उस पर हमला न मान सके, और नाटो देशों से मिले हथियार मोटेतौर पर यूक्रेन अपनी ही खोई हुई जमीन पर काबिज रूसी फौजों पर इस्तेमाल कर पा रहा था। रूसी राष्ट्रपति वोलोदीमीर जेलेंस्की लगातार पश्चिम के देशों और नाटों सदस्यों पर लगे हुए थे कि उन्हें रूस की सरहद के भीतर हथियारों के इस्तेमाल की छूट मिले क्योंकि रूसी फौजी विमानतलों से यूक्रेन पर लगातार हमलावर विमान आते हैं। लेकिन फौजी तनाव न बढ़े यह सोचकर अब तक अमरीका और नाटो की तरफ से यूक्रेन को उनके दिए हथियारों के सीमित इस्तेमाल की ही शर्त लगाई हुई थी। अमरीकी राष्ट्रपति ने इस तस्वीर को एकदम से बदल दिया है।
 
इस तस्वीर के कई पहलू हैं। यूक्रेन और नाटो के पास आज से कुल 60 दिन है अमरीका के नए राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के काम संभालने को। और ट्रम्प इस बात को दर्जनों बार बोल चुके हैं कि वे यूक्रेन की ऐसी मदद जारी नहीं रखने वाले हैं, और न ही वे नाटो के बाकी सदस्य देशों के मुकाबले अमरीका का अधिक फौजी खर्च करने वाले हैं। ट्रम्प ने यह भी कई बार कहा है कि वे यूक्रेन की जंग एक दिन में खत्म करवा देंगे। अब एक दिन में जंग को खत्म करने का काम या तो रूसी राष्ट्रपति कर सकते हैं, या यूक्रेन के राष्ट्रपति, दूसरे पक्ष की शर्तों को मानकर। इसके अलावा ऐसा कोई जाहिर जरिया नहीं दिखता कि अमरीकी राष्ट्रपति इसे एक दिन में रूकवा सकें। फिर भी हम इसे महज बातचीत का एक अंदाज मानते हैं कि ट्रम्प ने चुनाव अभियान के दौरान लापरवाही से इस तरह का बयान दिया होगा। लेकिन आज के अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन आखिरी हफ्तों में यह जो बहुत बड़ा फैसला कर गए हैं, उसके खतरों को भी समझने की जरूरत है। आज सुबह ही रूस के कुछ फौजी विश्लेषकों ने यह कहा है कि कल ही यूक्रेन ने अमरीकी इजाजत मिलते ही लंबी दूरी की मिसाइलों से रूस के भीतर हमला किया है, और इन अमरीकी मिसाइलों से ऐसा हमला अमरीकी मदद के बिना नहीं किया जा सकता था। इन विश्लेषकों का यह भी कहना है कि अमरीका एक किस्म से यूक्रेन की जंग में शामिल हो गया है, और अमरीकी फौजियों ने इस मिसाइल हमले में मदद भी की होगी, और अमरीकी उपग्रहों से मिली जानकारी भी इसमें इस्तेमाल हुई होगी। रूस ने अभी-अभी, यूक्रेन को मिली अमरीकी इजाजत के बाद, अपनी परमाणु नीति में यह बदलाव किया है कि अगर उसके साथ युद्ध में शामिल किसी देश की मदद अगर कोई परमाणु-हथियार शक्ति संपन्न देश करेगा, तो उसे रूस पर परमाणु शक्ति का सीधा हमला माना जाएगा, और ऐसे में रूस परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर सकेगा। इस पर राष्ट्रपति पुतिन ने अभी दस्तखत किए हैं, और खुद नाटो के भीतर अमरीकी राष्ट्रपति के फैसले पर सवाल उठ रहे हैं। जर्मनी ने इस अमरीकी फैसले पर कहा है कि वे यूक्रेन को रूस के भीतर हमला करने वाली लंबी दूरी की मिसाइलें देने के हिमायती नहीं है क्योंकि इससे कोई समाधान नहीं होगा, बल्कि समस्या बढ़ेगी।
 
अब अमरीकी राष्ट्रपति के इस ताजा फैसले को इस हिसाब से भी समझने की जरूरत है कि अमरीका चाहे नाटो (नार्थ एटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) का सदस्य है, और यूक्रेन को मदद देने में सबसे आगे है, लेकिन अगर कोई नौबत रूसी परमाणु हथियारों तक पहुंचती है, और तीसरे विश्व युद्ध का खतरा मंडराता है, तो अमरीका नाटो के अधिकतर यूरोपीय सदस्यों के बाहर के इक्का-दुक्का देशों में से है, और रूसी हमले की सीमा से दूर भी है। इसलिए तकरीबन तमाम यूरोपीय देशों वाले नाटो की अपनी हिफाजत अमरीका की हिफाजत से कुछ अलग भी है। और अमरीका में यह अपने आपमें एक बहुत बड़े फेरबदल का दौर है जिसमें कुछ हफ्तों के भीतर देश की विदेश नीति, और फौजी रणनीति दोनों में जमीन आसमान का फर्क आ सकता है। इसलिए आज बिदाई की बेला में पहुंचे हुए राष्ट्रपति बाइडन के दूरगामी नतीजों वाले ऐसे फैसले को लेकर योरप में बेचैनी बढ़ रही है। खुद ट्रम्प के सलाहकार और सहयोगी इस फैसले के खिलाफ बोल रहे हैं, और ऐसा लगता है कि काम संभालते ही ट्रम्प पहला फैसला यूक्रेन से हाथ खींचने का ले सकते हैं। और शायद यही एक वजह है कि मौजूदा राष्ट्रपति बाइडन इन दो महीनों में रूस के खिलाफ यूक्रेन को एक बेहतर और मजबूत नौबत में पहुंचा देना चाहते हैं।
 
यह बात हर देश की अपनी लोकतांत्रिक और संसदीय परंपराओं पर निर्भर करती है कि जाती हुई सरकार कितने दूर तक के फैसले ले। हमारा अपना सोचना यह है कि जब अगली निर्वाचित सरकार अपनी नीति-रणनीति साफ कर चुकी है, तो उसे काम सौंपने के दो महीने पहले ऐसा फैसला लेना जायज नहीं है जिसका असर आने वाले बरसों तक रहेगा। रूसी राष्ट्रपति पुतिन ट्रम्प का कार्यकाल शुरू होने पर राहत की सांस लेंगे क्योंकि यूक्रेन को अमरीकी मदद तकरीबन बंद हो सकती है। उस हालत में रूसी फौजें यूक्रेन की जितनी जमीन पर कब्जा कर चुकी हैं, वह कब्जा जारी रख सकती हैं। शायद ऐसे ही कब्जे को अगले दो महीने में छुड़ाने के हिसाब से बाइडन यूक्रेन की मदद कर रहे हैं। 

ट्रम्प के आते ही अमरीका के योरप के साथ रिश्ते एक बार फिर कसौटी पर चढ़ेंगे, और ट्रम्प की ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति परवान चढ़ेगी। आज भी योरप के नेताओं में यह फिक्र चल ही रही है कि क्या अमरीका योरप में बने सामानों पर कोई टैरिफ लगा सकता है? जब योरप के देश अपने खुद के पेट पर लात पडऩे की आशंका से जूझ रहे हों, तो अमरीका के साथ उनके रिश्ते कैसे रहेंगे, और अमरीका की यूक्रेन-नीति का नाटो कितना समर्थन या विरोध कर सकेगा, ऐसी कई बातें अभी परेशानी और दुविधा खड़ी कर रही हैं। अमरीकी व्हाइट हाऊस में सत्ता का यह हस्तांतरण बिना हिंसा के तो होने जा रहा है, लेकिन नीतियों के भूचाल के बिना नहीं। आने वाले कुछ महीने जाती हुई सरकार के जायज या नाजायज दीर्घकालीन फैसलों को देखने के रहेंगे, और अगली सरकार की नीतियों, और उन पर अमल की रफ्तार दोनों को बारीकी से देखने के भी रहेंगे। आगे-आगे देखें, होता है क्या।   

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 नवंबर 2024



 

दाखिले और नौकरी के भ्रष्टाचार पर उम्रकैद हो

 19  नवंबर 2024

 

देश के बहुत से राज्यों में भर्ती घोटाला सामने आते रहता है। कभी किसी राज्य में, तो कभी किसी और में। अब ताजा मामला छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित पीएससी घोटाले का है जिसमें डिप्टी कलेक्टर से आईएएस बने, और फिर पिछली भूपेश बघेल सरकार के बनाए हुए पीएससी चेयरमैन को अब सीबीआई ने गिरफ्तार किया है। टामन सिंह सोनवानी ने अपने पूरे कुनबे को पीएससी के रास्ते राज्य शासन की सबसे बड़ी नौकरियों पर चुन लिया था, लेकिन बात यहीं तक सीमित नहीं थी। इससे आगे बढक़र सोनवानी ने प्रदेश के एक बड़े उद्योगपति एस.के.गोयल से भी अपने किसी एनजीओ के लिए सीएसआर मद से करीब आधा करोड़ ले लिया था, और एवज में गोयल के बेटा-बहू को भी डिप्टी कलेक्टर बना दिया था। सोनवानी के राज में पीएससी ने जिस बेशर्मी से उस वक्त की सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के नेताओं के कुनबों को नौकरी दी, और कुछ अफसरों के बच्चों को भी, वह देखने के बाद लगता है कि प्रदेश के लाखों बेरोजगार आखिर किस भरोसे और उम्मीद से पीएससी का इम्तिहान दे रहे थे, अगर उनके हक की कुर्सियों पर पूरी तरह भ्रष्टाचार से ही लोगों को छांटना था। 

छत्तीसगढ़ को ऐसा लगता है कि अविभाजित मध्यप्रदेश से ही नौकरियों और दाखिलों में भ्रष्टाचार की परंपरा विरासत में मिली है। यहां राज्य बनने के बाद से ही पीएससी का घोटाला होते आ रहा है, और 20 बरस पुराने घोटाले पर भी हाईकोर्ट में सब कुछ साबित हो जाने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट में बरसों से कोई फैसला नहीं हुआ है, और शायद गलत चुने गए लोगों के रिटायर हो जाने, और हक खो बैठे बेरोजगारों के मर जाने के बाद अदालत में उनकी बारी आएगी। देश भर में दाखिला इम्तिहानों, और नौकरी के इस सिलसिले में भ्रष्टाचार पनपने की एक बड़ी वजह यह भी है कि पहले तो हर किस्म की सत्ता ऐसे कमाऊ जुर्म में शामिल हो जाती है, और फिर मुजरिमों को बचाने के लिए एक बार फिर नेता, अफसर, जज, कारोबारी सभी जुट जाते हैं, क्योंकि जब कद्दू कटा था, तो सबमें बंटा था। ऐसे देश-प्रदेश में होनहार और काबिल बेरोजगार की कोई गुंजाइश कहां बचती है? और जब कभी भी दाखिला या नौकरी का एक भ्रष्टाचार सामने आता है, गरीब प्रतिभाशाली नौजवानों का हौसला पस्त हो जाता है। उनके सामने उम्मीद की वह चर्चित और तथाकथित किरण नहीं रह जाती जिसे गिनाते हुए बहुत सारी सूक्तियां बनती हैं। 

सीबीआई ने इस मामले की गहरी जांच करके जुर्म की पहेली के टुकड़ों को जोडक़र तस्वीर बना ली है, और इसके पहले का कभी का याद नहीं पड़ता कि रिश्वत देने वाले इतने बड़े कारोबारी को भी इस तरह गिरफ्तार किया गया हो। यह बात भी हैरान करती है कि करोड़पति कारखानेदार भी अगर अपने बेटे-बहू को डिप्टी कलेक्टर बनवाने पर उतारू हैं, और उसके लिए सीएसआर मद से एक किस्म की रिश्वत देते हैं, तो इन ओहदों से आगे उन्हें किस तरह कमाई की उम्मीद है? अब अगर 25-50 लाख रूपए लेकर एक-एक डिप्टी कलेक्टर बनाए जा रहे हैं, तो गरीब बेरोजगारों के होनहार रहने पर भी उनके मां-बाप किडनी बेचकर भी ऐसी रकम नहीं जुटा सकते। कुछ प्रदेशों में दाखिला इम्तिहानों के पर्चे आऊट करने के पेशेवर गिरोह साल भर जुटे रहते हैं, और अभी कुछ जगहों पर ऐसा करने वालों के लिए उम्रकैद का भी प्रावधान किया गया है। छत्तीसगढ़ को भी यह सोचना चाहिए कि दाखिले और नौकरी के इम्तिहानों में भ्रष्टाचार साबित हो जाने पर सजा कितनी कड़ी होनी चाहिए, और रिश्वत लेने वालों के साथ-साथ देने वालों के लिए भी कड़ी कैद का इंतजाम किया जाना चाहिए। देश के कानून से परे प्रदेशों को अपने स्तर पर नए कानून बनाने की छूट भी है, और छत्तीसगढ़ को इस पर सोचना चाहिए। 

प्रदेश में पिछली सरकार चलाने वाली कांग्रेस पार्टी को इस बात पर भी जवाब देना चाहिए कि उसके नेताओं के बच्चे राज्य सेवा के सबसे बड़े ओहदों पर किस तरह पहुंच गए। यह नहीं हो सकता कि कांग्रेस सरकार ऐसे परले दर्जे के मुजरिमों को संवैधानिक कुर्सियों पर बिठाए, और वहां का ऐसा व्यापक संगठित भ्रष्टाचार सत्तारूढ़ पार्टी की भागीदारी से चलता रहे, और अब तमाम सुबूत सामने आने के बाद भी कांग्रेस सन्यास भाव से बैठी रहे। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी दसियों लाख बेरोजगार नौजवानों और छात्रों के प्रति जवाबदेह है कि उसके मनोनीत लोगों ने, उसकी निगरानी में, उसकी पार्टी के लोगों को कुछ ओहदे देकर बाकी जुर्म के लिए प्रोटेक्शन कैसे खरीद लिया था। जो लोग भी गरीब और होनहार लोगों का हक मारकर बेइंसाफी भरा ऐसा भ्रष्टाचार करते हैं, उन्हें उम्रकैद भी मिलनी चाहिए, और उनके कुनबे की तमाम अनुपातहीन सम्पत्ति जब्त करके कुर्क करनी चाहिए, और उससे लाइब्रेरी बना देनी चाहिए। 

आज बीती पीढ़ी के बहुत से लोगों को नई टेक्नॉलॉजी की बात यह समझ ही नहीं आ रही है कि अब मोबाइल फोन, कम्प्यूटर, फोन की लोकेशन, बैंकों के लेन-देन की बातें इतनी जगह दर्ज होती हैं कि जुर्म का छूट पाना बड़ा मुश्किल रहता है। फिर एक हैरानी इस बात की भी होती है कि जिन लोगों को लाखों रूपए महीने की सरकारी नौकरी मिलती है, तमाम सहूलियतों वाला संवैधानिक ओहदा मिलता है, जिनकी मोटी पेंशन का इंतजाम रहता है, उनकी लार टपकना भी बंद क्यों नहीं होता। देश की अदालतों को भी इस बारे में सोचना चाहिए कि दाखिला और नौकरी के मामलों में फैसला इतनी देर से न आए कि वह इंसाफ ही न रह जाए। छत्तीसगढ़ के एक पुराने पीएससी घोटाले में 20 बरस बाद भी देश की आखिरी अदालत का फैसला न आना यह बताता है कि भ्रष्टाचार को लंबे वक्त तक बचाकर रखना भी मुमकिन है, और भ्रष्टाचार के शिकार लोगों को इंसाफ, हो सकता है कि उनकी जिंदगी रहने तक न मिल पाए। यह इंसाफ भी कोई इंसाफ है लल्लू? 

(Daily Chhattisgarh)