अफगानिस्तान में अमरीकी फ़ौज तालिबान के रहम पर जिन्दा है !

 30 अगस्त 2021

  अफगानिस्तान के ताजा हालात देखें तो अमेरिका पर तरस आता है। बीस बरस जिन तालिबान पर अमेरिका बम बरसाते रहा, जिनके खिलाफ उसने अपने सहयोगी देशों की भी फौज लेकर अफगानिस्तान पर कब्जा करके रखा, अपनी पिट्ठू सरकारों को वहां लाद कर रखा, आज उन्हीं तालिबान के रहमोकरम पर अमेरिका काबुल में जिंदा है। हालत यह है कि काबुल एयरपोर्ट के भीतर तालिबानी इजाजत से अमेरिकी फौजों का काबू है, और 31 अगस्त तक है। लेकिन इसी एयरपोर्ट के पास हुए बम धमाके में अभी 4 दिन पहले 1 दर्जन से अधिक अमेरिकी फौजियों सहित करीब डेढ़ सौ मौतें हुई हैं, और उसके बाद अमेरिकी फौज तालिबान की हिफाजत में वहां से लोगों को निकालने का काम कर रही है। एयरपोर्ट का नियंत्रण अमेरिका के हाथ है लेकिन एयरपोर्ट के बाहर सुरक्षा घेरा तालिबान का है।

किसने ऐसे दिन की कल्पना की होगी कि दुनिया का सबसे ताकतवर देश होने का दावा करने वाला अमेरिका आज अपनी फौज को अफगानिस्तान से निकालने के लिए तालिबान का मोहताज है। आज अमेरिका के सामने यह बहुत बड़ा खतरा है कि अगले तीन-चार दिनों में वह जैसे-जैसे अपनी फौज वहां से रवाना करेगा, वैसे-वैसे एयरपोर्ट पर मौजूद घटती चली जाने वाली अमेरिकी फौज पर खतरा बढ़ते चले जाएगा, क्योंकि किसी हमले से जूझने के लिए वहां अमेरिकी फौज कम संख्या में रह जाएगी। इस बारे में हमने इसी जगह लिखा भी था कि जिस तरह महाभारत में अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घुसना तो मां के पेट से सीखने मिल गया था, लेकिन चक्रव्यूह को तोडक़र निकलना वह नहीं सीख पाया था, कुछ वैसी ही हालत काबुल में अमेरिका की हो रही है। दुनिया के बड़े-बड़े देश इस बात को लेकर अमेरिका से खफा हैं कि उसने 20 बरस के फौजी कब्जे में तो अगुवाई की, लेकिन आज अफगानिस्तान छोडऩे की नौबत आने पर दसियों हजार अफगान सहयोगियों को छोडक़र वहां से निकल रहा है, जिन्होंने इतने बरस राज्य चलाने के लिए अमेरिका के लिए काम किया था। अमेरिका इस नौबत को लेकर इस कदर हिला हुआ है कि पिछले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तालिबान के साथ किए गए समझौते पर अमल करते हुए भी मौजूदा राष्ट्रपति जो बाईडन के काबू में नौबत नहीं रह गई है, और अपने फौजियों के मरे जाने के बाद वे मीडिया से बात करते हुए थम गए थे। लंबे समय के बाद अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की इस तरह एक हमले में मौत हुई है, और इतनी बड़ी संख्या में हुई है।

अगले दो-तीन दिन अफगानिस्तान से किस तरह अमेरिकी फौज और अमेरिकी नागरिक खुद निकल पाते हैं इस पर दुनिया की नजरें हैं। दुनिया की नजरें इस पर भी हैं कि जितना अमरीकी फौजी सामान अफगानिस्तान में आज है, उसमें से कितना वह निकाल सकेगा। काबुल की जो खबरें हैं वे ये हैं कि एयरपोर्ट पर अमेरिका और तालिबान के बीच बातचीत भी चल रही है, अमेरिका मदद भी मांग रहा है, तालिबान बेरुखी से कुछ मदद कर भी रहा है, और उसी के तहत आईएस के आतंकी हमले के बाद अब ताजा हिफाजत तालिबान मुहैया करा रहा है जिसने कि एयरपोर्ट के पूरे इलाके को घेरकर रखा है, अपने कब्जे में रखा है। आज अमेरिकी फौजियों की हिफाजत उस एयरपोर्ट पर तालिबानियों की वजह से है और तालिबान के हाथ है।

अमेरिका और उसके सहयोगी देश अफगानिस्तान को जैसी बदहाली में छोडक़र निकल रहे हैं उसका ब्यौरा संयुक्त राष्ट्र के पास है जिसने कहा है कि अफगानिस्तान की जनता एक बहुत विशाल और विकराल मानवीय त्रासदी पेश कर रही है और दुनिया को इसके बारे में तुरंत सोचना पड़ेगा। लगे हुए पाकिस्तान और ईरान में लाखों की संख्या में अफगान शरणार्थी सरहद खटखटाते खड़े हैं, और उनके पास न खाना है इलाज का ठिकाना है। पाकिस्तान पहले ही अपने हाथ खड़े कर चुका है कि उसकी जमीन पर पहले से जो 15 लाख अफगान शरणार्थी मौजूद हैं, वह उनका ख्याल रखने की ताकत भी नहीं रखता है, और जो नया सैलाब अफगानिस्तान से अब पाकिस्तान सरहद पर पहुंचा हुआ है उसे जगह देने की ताकत पाकिस्तान में नहीं बची है। अब हैरानी इस बात को लेकर भी होती है कि दुनिया की सबसे ताकतवर अमेरिकी सरकार और उसकी फौज अफगानिस्तान में 20 बरस की अपनी मौजूदगी के बावजूद इस दिन की कल्पना नहीं कर पाई थी कि उसके बाहर निकलने पर अफगान जनता का क्या होगा। खैर, जिसे खुद के निकलने का तरीका नहीं पता, उससे अफग़़ान जनता का अंदाज लगाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 अगस्त 2021


 

हम अंग्रेज़ों के ज़माने के कानून हैं..

 29 अगस्त 2021

  सुप्रीम कोर्ट ने अभी महाराष्ट्र के अमरावती जिले के एक पत्रकार की याचिका पर जिला प्रशासन का यह आदेश खारिज कर दिया जिसमें इस पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता को जिला बदर किया गया था। महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में अमरावती में पुलिस और प्रशासन से मिलकर पत्रकार रहमत खान को अमरावती शहर या अमरावती ग्रामीण जिले में एक साल तक न आने-जाने का आदेश दिया था। जिला बदर के इस आदेश के खिलाफ यह पत्रकार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था और अदालत ने सरकार के इस आदेश को खारिज करते हुए कहां कि किसी व्यक्ति को देश में कहीं भी रहने या स्वतंत्र रूप से घूमने के उसके मौलिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

लोगों को याद होगा कि सामाजिक कार्यकर्ताओं या राजनीतिक कार्यकर्ताओं को, मजदूर नेताओं को, जिला बदर करने को जिला प्रशासन और पुलिस एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं। देश के तकरीबन सभी राज्यों में प्रशासन जिला बदर के अंग्रेजों के समय से चले आ रहे कानून को डराने के लिए भी इस्तेमाल करता है और अपने को नापसंद लोगों को जिले से निकाल देने की एक ऐसी सजा देता है, जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचना हर किसी के बस का नहीं रहता। छत्तीसगढ़ में कई दशक पहले पीयूसीएल नाम के मानवाधिकार संगठन के एक बड़े कार्यकर्ता राजेंद्र सायल ने इस बात को कई जगह उठाया था कि जिला बदर करने का कानून संविधान में बताए गए मौलिक अधिकारों के खिलाफ है। उन्होंने कई मंचों पर इस बात को उठाया था, और इस बारे में लिखा भी था। लेकिन पुलिस और प्रशासन को प्रतिबंध के सारे तौर-तरीके बहुत सुहाते हैं क्योंकि उन्हें आसानी से लादा जा सकता है, और सत्तारूढ़ नेताओं को उनके फायदे को गिनाया जा सकता है। दूसरी तरफ सत्तारूढ़ नेता पुलिस और प्रशासन की मदद से अपनी राजनीति चलाते हैं और इसलिए वे तमाम किस्म के प्रतिबंधों की प्रशासन की पहल के हिमायती भी रहते हैं।

इस प्रतिबंध को ही देखें तो अगर कोई व्यक्ति किसी जिले में वहां के लोगों की जिंदगी के लिए खतरा बन जाता है तो उसे उस जिले से बाहर रहने के लिए पर्याप्त कारण मानते हुए उसे जिला बदर कर दिया जाता है। अब कुछ देर के लिए, बहस के लिए यह मान भी लें कि कोई व्यक्ति एक जिले में इतना बड़ा गुंडा हो जाता है, अपराधी हो जाता है कि वहां के लोगों को उससे खतरा रहता है, और उसे जिले से बाहर निकाल देना जिले की हिफाजत के लिए जरूरी लगता है। ऐसे में सवाल यह है कि जो एक जिले के लिए खतरा है उसे उस जिले से निकालकर उसे दूसरे जिले पर खतरा बनाकर क्यों डालना चाहिए? और फिर जिले की सुरक्षा तो अधिकारियों का जिम्मा है, कोई एक व्यक्ति इतना खतरनाक हो सकता है कि वह उस जिले से निकाल देने के लायक हो जाए? दिलचस्प बात यह है कि अभी जिस व्यक्ति को अमरावती से जिला बदर किया गया था उसने सरकार में कई तरह की सूचना के अधिकार की अर्जियां लगाई थीं और कई शैक्षणिक संस्थाओं और मदरसों में हुई आर्थिक अनियमितता के बारे में जानकारी मांगी थी। सुप्रीम कोर्ट में रहमत खान नाम के इस कार्यकर्ता ने तर्क दिया कि उसके खिलाफ यह कार्रवाई इसलिए की गई क्योंकि उसने सार्वजनिक धन के दुरुपयोग को खत्म करने और अवैध गतिविधियों में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के लिए कदम उठाया था। उसका कहना है कि कलेक्टर और पुलिस से उसने ऐसे दुरुपयोग की जांच का अनुरोध किया था और इसके बाद इन संस्थाओं से जुड़े लोगों ने उसके खिलाफ एक रिपोर्ट लिखाई थी।

अमरावती जिला प्रशासन और पुलिस का यह रुख बताता है कि अफसर अपने अधिकारों का कैसा बेजा इस्तेमाल करते हैं, और हो सकता है कि राजनीतिक ताकतें भी ऐसे भ्रष्टाचार को बचाने के पीछे रहती हों। पुलिस और सत्तारूढ़ नेताओं के बीच का गठबंधन पूरे देश के हर राज्य में इतना खतरनाक हो चुका है कि अभी दो-चार दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने इसके खिलाफ एक टिप्पणी भी की है। छत्तीसगढ़ के एक आईपीएस जीपी सिंह के खिलाफ राजद्रोह का मामला दर्ज करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान ऐसी बहुत सी बातें कहीं। अदालत ने देश के कई राज्यों के ऐसे मामलों के बारे में कहा कि जब कोई सरकार जब कोई पार्टी सत्ता में आती है तो पिछली सरकार के करीबी अफसरों के खिलाफ कई तरह के मामले दर्ज होने लगते हैं, यह हिंदुस्तान में एक नया रुख देखने में आ रहा है। देश के बहुत से राज्यों में ऐसा हो रहा है कि सत्तारूढ़ पार्टी को नापसंद लोगों के खिलाफ तरह-तरह के फर्जी मामले दर्ज कर लिए जाते हैं। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट को भी दखल देनी पड़ी जिसमें राज्य सरकार द्वारा दंगाइयों के खिलाफ दर्ज मामले वापस ले लिए गए, और उसके लिए हाईकोर्ट से लेने इजाजत लेने की शर्त भी पूरी नहीं की गई। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि हाईकोर्ट की इजाजत के बिना ऐसा नहीं किया जा सकता है।

पुलिस और प्रशासन के हथियार अंग्रेजों के वक्त बनाए गए ऐसे बहुत से कानून हैं जिन्हें कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी बताया जाता है, लेकिन जो मोटे तौर पर एक विदेशी जुल्मी सरकार के अत्याचार जारी रखने के लिए अंग्रेजों के वक्त पर बनाए गए थे। आज भी हिंदुस्तान की अफसरशाही, यहां की पुलिस उन्हें जारी रखने के पक्ष में हैं। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ऐसे बहुत से कानूनों को खत्म करने की बात करती है, कई कानूनों को खत्म किया भी गया है, लेकिन नरेंद्र मोदी की पार्टी ही कई प्रदेशों की अपनी सरकारों में लोगों के खिलाफ बड़ी रफ्तार से राजद्रोह के मामले दर्ज करती है, जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट बरसों पहले फैसला दे चुका है। अभी सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली का ही एक मामला चल रहा है जिसमें जब अदालत ने यह पूछा कि कुछ छात्रों के खिलाफ राजद्रोह का मामला कैसे दर्ज किया गया, तो पुलिस ने कुछ टीवी चैनलों का नाम लिया कि वहां वीडियो देखकर पुलिस ने उन पर राजद्रोह का मामला लगाया। जब इन चैनलों से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्होंने ट्विटर पर कुछ ट्वीट में यह वीडियो देखकर उन्हें अपने समाचारों में दिखाया था। और जब उन ट्वीट की जांच की गई तो यह पता लगा कि उन्हें भाजपा के आईटी सेल के प्रमुख ने ट्वीट किया था, और वहां से लेकर वे समाचार चैनलों में दिखाए गए, और वहां से उन वीडियो को देखकर पुलिस ने राजद्रोह के मुकदमे दर्ज कर लिए थे।

अब यह वक्त आ गया है कि पूरे देश में पुलिस और प्रशासन के ऐसे मनमानी करने के अधिकार खत्म किए जाएं, ऐसे कानून खत्म किए जाएं जिनमें कानून-व्यवस्था बनाए रखने जैसे बहुत ही अमूर्त और अस्पष्ट किस्म के बहाने गिनाकर लोगों पर कड़ी कार्यवाही की जाती है, और लंबे समय तक उन्हें परेशान किया जाता है। आज क्या इस बात की कल्पना की जा सकती है कि किसी मामूली व्यक्ति को एक साल के लिए जिला बदर कर दिया जाए तो किस तरह वह अपने जिले के बाहर रहेगा, कैसे जिंदा रहेगा, उसे कौन काम देगा, और किस तरह उसका परिवार उसके बिना साल भर जिंदा रह सकेगा? ऐसी नौबत की सोचे बिना सिर्फ सरकारी बहाने बनाकर ऐसी कार्रवाई पूरी तरह पूरी तरह से नाजायज है और इस पर रोक लगनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने बहुत अच्छा किया है जो जिला बदर करने की कार्रवाई के खिलाफ एक व्यापक टिप्पणी की है जो कि जिला बदर के बाकी मामलों में भी देशभर मैं इस्तेमाल की जा सकेगी। 

(Daily Chhattisgarh) 

मंदिर में छोटे कपड़ों में जाने पर रोक क्या निजी आज़ादी को कुचलना है?

  28 अगस्त 2021

  हरियाणा के एक विख्यात तीर्थ स्थान माता मनसा देवी मंदिर में ट्रस्ट की सचिव ने एक जुबानी आदेश निकालकर सुरक्षाकर्मियों को कहा है कि छोटे कपड़े और जींस पहनकर आने वाले लोगों को मंदिर में इजाजत ना दी जाए। सचिव के पद पर काम कर रही इस महिला का तर्क यह है कि दूसरे श्रद्धालु और दर्शनार्थी कुछ लोगों को छोटे कपड़ों में देखकर आपत्ति करते थे और उनका कहना था कि मंदिर में मर्यादा का पालन होना चाहिए। दूसरी तरफ इस मंदिर ट्रस्ट के प्रशासक और पंचकूला जिले के कलेक्टर का कहना है कि उन्होंने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है और यह बोर्ड सचिव की निजी राय हो सकती है, ट्रस्ट ने ऐसा कोई फैसला नहीं लिया है। कुछ लोगों ने इस फैसले का स्वागत किया है, कुछ लोगों ने इसका विरोध किया है, कुछ लोगों ने इसे मौलिक अधिकारों का हनन, और तुगलकी फैसला बताया है, लेकिन कुछ लोगों ने यह भी कहा है कि हर धार्मिक स्थल की मर्यादा रहती है, इसलिए श्रद्धालुओं को यहां भी ध्यान रखना चाहिए। मनसा देवी के मंदिर में देशभर से लोग पहुंचते हैं और यह करीब पौने 200 साल पुराना मंदिर है।

हरियाणा का यह कैसा दिलचस्प मामला है जिसमें महिलाओं के कपड़ों को लेकर या जींस को लेकर लगाई गई रोक पर मिलीजुली प्रतिक्रिया रही है। इस राज्य में लड़कियों पर कई तरह की रोक खाप पंचायतों से लेकर मौजूदा भाजपा सरकार के मंत्रियों, मुख्यमंत्री तक की तरफ से लगती रही है, ऐसे में यह देखना दिलचस्प है कि इस राज्य में कई लोग खुलकर कपड़ों पर ऐसी रोक का विरोध भी कर रहे हैं। इस बारे में सोचने की जरूरत है कि क्या मंदिर में ऐसे किसी ड्रेस कोड को लागू करना चाहिए या नहीं? हम बहुत खुले ख्याल से इस जगह पर अपनी बात लिखते हैं लेकिन इस मुद्दे पर ऐसा लगता है कि मंदिर ट्रस्ट की सचिव ने जो जुबानी प्रतिबंध लगाया है, वह प्रतिबंध एक हिसाब से ठीक है। मंदिर में अगर लड़कियां और महिलाएं छोटे कपड़ों में पहुंचेंगे तो हो सकता है कि दूसरे श्रद्धालुओं और दर्शनार्थियों का ध्यान देवी की तरफ से हटकर इनकी तरफ चले जाए। मंदिर में जाने वाले लोग तपस्वी और सन्यासी तो होते नहीं कि छोटे कपड़ों में महिलाओं को देखकर भी उनकी नजरें उधर न जाएँ। फिर यह भी है कि एक मंदिर में जाने वाले लोग किसी मजबूरी में वहां नहीं जाते, अपनी मर्जी से जाते हैं और अपनी तैयारी से जाते हैं। ऐसे में अगर वहां जाते हुए लोग साधारण कपड़ों में वहां जाते हैं और छोटे कपड़े नहीं पहनते हैं, या जींस नहीं पहनते हैं, तो यह उनके लिए बहुत असुविधा की बात नहीं है। एक धर्मस्थल में लोगों का ध्यान धर्म और उपासना की तरफ ही केंद्रित रह सके, इसमें उससे मदद मिल सकती है। अब दूसरे धर्म स्थलों के बारे में बात करें तो देश में जहां कहीं भी गुरुद्वारे हैं या मस्जिदें हैं उन सबमें भीतर जाते हुए लोग पगड़ी-टोपी पहनते हैं या सर पर रुमाल बांधते हैं, उसके बिना वहां कोई दाखिला नहीं होता। आज तक किसी गुरुद्वारे जाने वाले ने ऐसी शिकायत नहीं की कि उन्हें सिर पर कुछ रखे बिना, सर ढंके बिना वहां जाने नहीं मिलता है। मस्जिदों में जितनी नमाज होती हैं उनमें भी लोग सिर पर रूमाल बांधे होते हैं, या टोपी लगाए होते हैं। जो दुनिया के सबसे उदार देश हैं उनमें भी बहुत सी जगहों पर चर्च पर यह नोटिस लगे होते हैं कि भीतर आने वाले लोगों के घुटने ढंके रहें। और ये चर्च किसी गांव या कस्बे के चर्च नहीं है, ये दुनिया के मशहूर पर्यटन केंद्रों के चर्च हैं, जहां पर दुनिया भर के सैलानी घूमने-फिरने के अंदाज में बिना किसी आस्था के भी इमारत को देखने के लिए पहुंच जाते हैं, और भीतर भी देखने जाते हैं। ऐसे देशों में चर्च पर भी ऐसे नोटिस लगे होते हैं और उन पर अमल भी करवाया जाता है।

हर धर्म के अपने रीति रिवाज रहते हैं और किसी भी धार्मिक स्थान पर वहां के लोग ऐसे साधारण नियम लागू भी कर सकते हैं जिन पर अमल करना बहुत बड़ी दिक्कत की बात ना हो। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी मंदिर से लेकर हिंदुस्तान में बहुत सारे ऐसे मंदिर हैं जहां पर जाने वाले पुरुषों को धोती लपेट कर ही भीतर जाना होता है। केरल का एक प्रमुख तीर्थ स्थान ऐसा है जहां सारे पुरुष काले कपड़ों में जाते हैं। अलग-अलग तरह के धार्मिक अनुशासन रहते हैं और इन्हें लोगों की आजादी में खलल मानना ठीक नहीं है। हिंदुस्तान में किसी धार्मिक स्थल पर जाति के आधार पर दाखिला ना हो या महिलाओं के दाखिले पर रोक हो तो उसके खिलाफ तो संघर्ष करना ठीक बात है। लेकिन किसी मंदिर में छोटे कपड़े पहन कर ही जाने की जिद जायज नहीं लगती है क्योंकि छोटे कपड़ों में लड़कियों या महिलाओं को देखकर उस धर्म स्थल का माहौल गड़बड़ा सकता है। इसलिए पंचकूला के कलेक्टर ने चाहे मंदिर सचिव के इस जुबानी आदेश को अनधिकृत बतलाया हो, हमारे हिसाब से यह आदेश ठीक है और जिन लोगों को ऐसे कपड़ों में वहां पहुंचने की बात नाजायज लगती है, वे लोग वहां न जाएं। हर उपासना स्थल को अपने ड्रेस कोड तय करने का अधिकार रहता ही है, और उसके खिलाफ किसी को जिद करना नहीं चाहिए। निजी स्वतंत्रता जैसे बड़े-बड़े शब्दों को ऐसे मामले में बीच में लाना पूरी तरह से फिजूल की बात है, और जिनको किसी धर्म स्थल पर वहां के नियम नहीं मानने हैं वे वहां न जाएं। हम जाति के आधार पर या धर्म के आधार पर या औरत मर्द होने के आधार पर किसी के दाखिले पर रोक टोक के खिलाफ हैं। देश के धर्म स्थलों पर ऐसी रोक हो तो लोगों को वहां संघर्ष करना चाहिए और निजी स्वतंत्रता का दर्जा इतना गिरा भी नहीं देना चाहिए कि उसका इस्तेमाल मंदिर में छोटे कपड़े पहनने की जिद के लिए किया जाए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 अगस्त 2021


 

पति पत्नी को थप्पड़ मारे तो जेल, और रेप करे तो कोई सजा नहीं !

 27 अगस्त 2021

   देश की एक और अदालत ने शादीशुदा जोड़े के बीच बलात्कार के मामले में एक फैसला सुनाया है जिसमें उसने निचली अदालत द्वारा एक आदमी पर अपनी बीवी से बलात्कार करने का जुर्म दर्ज करके सुनवाई शुरू करने को खारिज किया है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाई कोर्ट ने इस राज्य के एक मामले में शादीशुदा जोड़े के बीच बलात्कार पर मौजूदा कानून का हवाला देते हुए कहा है कि अगर यह सेक्स जोर जबरदस्ती से भी किया गया है, लेकिन पत्नी 18 वर्ष से अधिक उम्र की है, और साथ रहती है, तो इसे बलात्कार नहीं कहा जाएगा। भारत में बलात्कार के कानून के तहत बहुत से प्रदेशों में ऐसे फैसले आए हुए हैं, और महिला अधिकारों के आंदोलनकारी लगातार इस कानून के खिलाफ और अदालतों के ऐसे रुख के खिलाफ बोलते आए हैं, और यह मांग करते आए हैं कि हिंदुस्तान में शादीशुदा जोड़ों के बीच भी असहमति के बाद जबरदस्ती बनाए गए सेक्स संबंधों को बलात्कार गिना जाए। लेकिन आज कानून ऐसा नहीं है और हाई कोर्ट का यह फैसला मौजूदा बलात्कार कानून की तंग परिभाषाओं के भीतर ही लिखा गया है।


कुछ लोगों को यह शिकायत हो सकती है कि अगर हाई कोर्ट के जज चाहते तो वे मौजूदा कानूनों से अपनी असहमति जताते हुए या मौजूदा कानून की आलोचना करते हुए भी फैसला यही लिख सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। कानून के दायरे में कोई आदेश या फैसला लिखते हुए किसी जज पर यह बंदिश नहीं रहती कि वे उस कानून से अपनी असहमति को अनिवार्य रूप से दर्ज करें। दूसरी तरफ देश की बड़ी अदालतों के कई जज ऐसा करते भी आए हैं और उनके ऐसा करने से कानून बनाने वाली संसद और विधानसभाओं को कुछ सोचने का मौका भी मिलता है लेकिन यह अलग-अलग जज की अपनी अलग-अलग सोच पर निर्भर बात है कि वह कानून से परे अपनी राय कितनी देना चाहते हैं। फिलहाल क्योंकि मौजूदा कानून से देश के एक बड़े मुखर तबके की बड़ी कड़ी असहमति है, इसलिए इस पर चर्चा होनी चाहिए।

भारत में महिला अधिकारों के आंदोलनकारियों की इस बात को लेकर गहरी नाराजगी है कि इस देश में महिला को एक सामान की तरह देखा जाता है जिसका मालिक शादी के पहले उसका पिता होता है, और शादी के बाद उसका पति। महिला आंदोलनकारियों का यह भी कहना है कि भारत में बलात्कार को किसी महिला के शरीर पर हमले की तरह नहीं देखा जाता बल्कि उसके पिता या उसके पति के परिवार की इज्जत पर हमले की तरह देखा जाता है कि परिवार की इज्जत लुट गई या उस महिला की इज्जत लुट गई. यह नहीं देखा जाता कि उस महिला पर एक शारीरिक हमला भी हुआ है, इस हमले से उसका बड़ा नुकसान भी हुआ है जिसकी भरपाई हो सकता है कि बची पूरी जिंदगी पूरी ना हो. लेकिन हिंदुस्तान का पुरुष प्रधान नजरिया, मर्दाना नजरिया कानून को इस नजर से सोचने ही नहीं देता। आज दुनिया में कुल 36 ऐसे देश हैं जहां पर पति-पत्नी के बीच बलात्कार को बलात्कार नहीं गिना जाता। यह मान लिया जाता है कि पति-पत्नी के बीच में जो होता है, उसमें अगर असहमति भी है, तो भी वह जुर्म नहीं है। इस बात को लेकर भारत की महिलाओं में, और महिलाओं के हक की वकालत करने वाले पुरुषों में भी, बड़ी नाराजगी है और शादीशुदा जिंदगी के बलात्कार को एक जुर्म बनाने के लिए आंदोलन चल रहा है।

एक सांसद शशि थरूर ने 2018 में संसद में इस बारे में एक प्रस्ताव भी पेश किया था लेकिन किसी समर्थन के बिना वह विधेयक अपने-आप ही खत्म हो गया और उस पर कोई चर्चा भी नहीं हुई। आज इस बुनियादी बात पर संसद के भीतर और संसद के बाहर चर्चा की जरूरत है कि जब महिलाओं की दूसरे कई किस्म की हिंसा की शिकायत जुर्म के दायरे में आती हैं, और बिलासपुर हाईकोर्ट ने जिस मामले में इस रेप को जुर्म मानने से इनकार किया है, उस मामले में भी पत्नी के साथ पति द्वारा दूसरे किस्म की हिंसा के खिलाफ मामला चलाने की इजाजत दी है। अब सवाल यह उठता है कि एक शादीशुदा महिला से उसके पति द्वारा दूसरे किस्म की हिंसा तो जुर्म के दायरे में आ रही है लेकिन सेक्स की हिंसा को बाहर कर दिया गया है, और बलात्कार को भी सजा के लायक नहीं माना गया है। यह कानून भारत में चले आ रहे दूसरे सैकड़ों कानूनों की तरह पूरी तरह से नाजायज और खराब कानून हैं। आज पूरी दुनिया के सभी लोकतंत्रों में महिला के अधिकारों को लेकर जिस तरह की जागरूकता आई है, और जिस तरह से महिला अधिकारों के मुद्दे को उठाया जा रहा है उसे देखते हुए हिंदुस्तान को अपने इस कानून के बारे में फिर से सोचना चाहिए। एक महिला पर पति अगर हाथ हो उठा दे तो वह तो सजा के लायक है, जुर्म है, लेकिन अगर वह उसकी मर्जी के खिलाफ उससे बलपूर्वक बलात्कार करे, तो भी वह जुर्म नहीं है, यह बलात्कार की और शादीशुदा जोड़े के बीच हिंसा की एक बहुत ही खराब और बेइंसाफ परिभाषा है जिसे बदले जाने की जरूरत है. हिंदुस्तान में मर्दाना सोच इस तरह हावी है कि लोग यह मानते हैं कि शादीशुदा जोड़े के बीच अगर बलात्कार को सजा मान लिया जाएगा तो इससे शादीशुदा जिंदगी और विवाह नाम की संस्था खतरे में पड़ जाएंगे। लेकिन शादीशुदा जिंदगी और विवाह तो वैसे भी गैरसेक्स हिंसा के आधार पर खतरे में पड़ सकते हैं वे तलाक का भी पर्याप्त आधार बनते हैं, और सजा दिलाने के लायक भी हैं। ऐसे में यह सोचने की जरूरत है कि जब थप्पड़ मारना जुर्म के लायक है, तो बलात्कार को जुर्म के लायक न मानना एक बहुत ही घटिया किस्म की सोच का सबूत है।

कानून जिस वक्त बना होगा उस वक्त अंग्रेज या हिंदुस्तानी जो भी इसके लिए जिम्मेदार रहे होंगे, लेकिन आज संसद में इस कानून को बदलने की ताकत जिन लोगों के हाथ में है वे अगर इसे नहीं बदलते हैं, तो वे इस कानून के साथ हैं, वे इस हिंसा के साथ हैं, और वे ऐसे शादीशुदा बलात्कार के हिमायती हैं। हिंदुस्तान में शादीशुदा महिला के अधिकारों को दकियानूसी और गुफाकालीन सोच से बने हुए कानूनों से कुचलना ठीक नहीं है। इस कानून को बदलने के लिए न सिर्फ महिला अधिकारवादियों को, बल्कि देश के सभी मानवाधिकारवादियों को, लोकतंत्रवादियों को, और इंसाफपसंद लोगों को खुलकर आवाज उठानी चाहिए। जो बात हिंदुस्तान में आज फैशन में नहीं है, चलन में नहीं है वह भी शुरू होनी चाहिए कि अलग-अलग इलाकों के प्रतिनिधिमंडल जाकर अपने विधायकों और सांसदों से मिलें और उन्हें कानून में फेरबदल करने के लिए कहें। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अगस्त 2021


 

महाशक्ति के महापमान के बाद दुनिया के बदल गए समीकरण

   26 अगस्त 2021

 अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी के बाद जिस तरह का माहौल पूरी दुनिया में बन रहा है उसे देखते हुए लगता है कि 20 बरस की फौजी कवायद के बाद जितनी बड़ी शिकस्त अमेरिका को अफगानिस्तान में मिली है उसका कोई मुकाबला नहीं है। खुद अमेरिका को ऐसी शर्मिंदगी और इतना बड़ा नुकसान शायद इसके पहले कहीं देखने नहीं मिला होगा। लेकिन तालिबान के हाथों ऐसी हार की शर्मिंदगी तो एक बात है, इसकी वजह से आज पूरी दुनिया में जो तस्वीर बन रही है, उसमें अमेरिका आज दुनिया का सबसे अधिक नुकसान झेलने वाला देश दिख रहा है। इस बात को समझने के लिए यह देखना पड़ेगा कि पश्चिमी देशों के जिस फौजी संगठन को साथ लेकर अमेरिका ने 20 वर्ष पहले अफगानिस्तान पर हमला किया था, उसके बाद कब्जा किया था, और आज जिस तरह वहां से जान बचाकर उसे निकलना पड़ रहा है, तो इससे अपने साथी देशों के बीच अमेरिका की साख एकदम चौपट हुई है। आज जब अलग-अलग देशों के लोग वहां से नहीं निकल पा रहे हैं, और इन देशों की फौजों और सरकारों के साथ काम करने वाले स्थानीय अफगान नागरिक भी मुसीबत में फंसे हुए हैं, तो साथी देश अमेरिका को इस बात की तोहमत दे रहे हैं कि उसने तालिबान से बिना किसी शर्त के केवल जान बचाकर भाग निकलने का समझौता किया है और अपने साथियों की जान की परवाह भी नहीं की। अपने साथी देशों के बीच अमेरिका की इतनी थू थू पहले कभी नहीं हुई थी। और इससे एक बात और साफ हो जाती है कि आगे अगर अमेरिका इस तरह का कोई और फौजी दुस्साहस करेगा तो शायद कोई दूसरा देश उसके साथ इस हद तक शामिल नहीं होगा। दुनिया की सबसे बड़ी फौजी ताकत अमेरिका, तालिबान से हारकर अलग-थलग पड़ गया है।

अब एक दूसरी बात को देखें तो अब अफगानिस्तान की संभावित तालिबान सरकार की शक्ल में वहां एक ऐसी सरकार बनने जा रही है जो कि बगल के लगे हुए ईरान की तरह ही अमेरिका के खिलाफ बागी तेवर वाली सरकार है। आज के तालिबान का यह बयान सामने आया है कि न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की इमारतों पर विमानों से हमले में ओसामा बिन लादेन का कोई हाथ नहीं था। यह बयान अमेरिका के उस दावे को ही खारिज करता है जिस दावे के चलते अमेरिका ने अफगानिस्तान पर अलकायदा और ओसामा बिन लादेन को खत्म करने के लिए 2001 में हमले शुरू किए थे। लोगों को याद होगा कि जब इराक पर अमेरिका ने हमला किया था तो सद्दाम हुसैन के पास जनसंहार के हथियारों का जखीरा होने का दावा किया था। और दुनिया को सद्दाम से बचाने के नाम पर इस हमले को जायज ठहराने की कोशिश की थी। लेकिन अमेरिका की फौज ने पूरे इराक को खंगाल डाला था, वहां से कोई हथियार बरामद नहीं हुए थे। पूरी तरह से यह साबित हुआ था कि अमेरिका ने फर्जी खुफिया रिपोर्टों के हवाले से उस हमले की साजिश बनाई थी और उसमें ब्रिटेन जैसे दूसरे पश्चिमी देशों को साथ में लेकर वहां हमला किया था जिसमें बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे। अब अमेरिका से बागी तेवर वाली अफगान सरकार के साथी वे देश हैं जो खुद भी अमेरिका से एक सीधा टकराव रखते हैं। तालिबान सरकार के साथ चीन, पाकिस्तान, रूस, ईरान और टर्की जैसे देश खड़े हैं, जो सारे के सारे अमेरिका के खिलाफ हैं। इस हिसाब से अगर देखें तो एशिया के इस हिस्से में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, और ईरान, चीन और टर्की यह तमाम लगे हुए, या करीबी देश जिस तरह अमेरिका के खिलाफ तेवरों वाले हैं, उससे न सिर्फ अमेरिका को फिक्र करने की जरूरत है, बल्कि अमेरिकी गिरोह के एक सबसे हमलावर और मुजरिम देश इजराइल को भी फिक्र करने की जरूरत है। अफगानिस्तान की शक्ल में एक ऐसी नौबत आकर खड़ी हो गई है जिसमें पाकिस्तान, चीन, रूस, टर्की, और ईरान, इन सबको एक साथ आने का मौका मिल रहा है और एक साथ आने की एक बड़ी वजह भी है कि अफगानिस्तान में तालिबान सरकार को कामयाब किया जाए। आज अगर देखें तो एशिया के इस पूरे हिस्से में अमेरिका के पास अपने फौजी या खुफिया ठिकाने को बनाने के लिए भी इन तमाम देशों में कहीं पांव धरने की गुंजाइश नहीं है।

यह बात भी समझने की जरूरत है कि भारत जैसा देश जिसने अमेरिका के फेर में पिछले बरसों में ईरान से भी अपने संबंध खराब किए हैं, आज अफगानिस्तान की अगली सरकार के साथ अपने संबंध बनाए रखने के लिए उसे रूस, ईरान, या चीन की सरकारों के रास्ते अपने पांव धरने की कोई गुंजाइश निकालनी पड़ेगी। इनमें से चीन की कोई हमदर्दी भारत के साथ नहीं होगी लेकिन रणनीतिक रूप से यह बात उसके लिए अच्छी होगी कि भारत अपनी विदेश नीति के किसी एक हिस्से के लिए अमेरिका के बजाय चीन का मोहताज हो रहा है। इस तरह भारत कम से कम अफगानिस्तान के एक मामले में अमेरिका पर आश्रित रहने नहीं जा रहा है। इस नाते अमेरिका को पाकिस्तान से लगा हुआ एक और देश अपने प्रभामंडल से कुछ हद तक बाहर होते दिख सकता है। इसके अलावा इस बात को भी समझने की जरूरत है कि मुस्लिम आतंकी संगठनों से परे अगर अफगानिस्तान की सरकार बनती है, तो बहुत से दूसरे मुस्लिम देश भी उस सरकार को और अफगानिस्तान को मदद देने के लिए तैयार होंगे। इस तरह अमेरिका के खिलाफ मुस्लिम देशों का एक अलग जमघट हो सकता है, और यह बात भी इजराइल के लिए खतरनाक हो सकती है जो कि इन्हीं देशों के इलाके में ईरान के निशाने पर बना हुआ देश है।

खुद अमेरिका के भीतर आज वहां के लोग अपनी सरकार को धिक्कार रहे हैं कि किस तरह अमेरिकी सरकार का साथ देने वाले अफगान नागरिकों को छोडक़र, खतरे में डालकर अमेरिकी फौज अपनी जान बचाकर वहां से वहां से भाग निकल रही है। यह बात अमेरिका जैसी दुनिया की सबसे बड़ी फौजी ताकत के लिए बड़ी शर्मिंदगी की भी है और अमेरिकी नागरिक इस बात को अच्छी तरह समझ भी रहे हैं। वे इस बात से तो खुश हैं कि उनके लोग दूर के एक देश के आंतरिक झगड़ों को निपटाने के लिए अपनी शहादत देने का सिलसिला खत्म करके घर आ रहे हैं, लेकिन अमेरिका के एक तबके का यह भी मानना है कि एक देश के रूप में अफगानिस्तान से जैसी शर्मनाक शिकस्त लेकर अमेरिकी फौज घर आ रही है, वह अमेरिका की दुनिया भर में साख चौपट करने के लिए काफी है। फिर अमेरिका में मानवाधिकार की फिक्र करने वाले और उसके लिए लडऩे वाले जागरूक लोगों का भी एक तबका है और यह लोग यह सवाल भी कर रहे हैं कि जिन अफगान महिलाओं के बुनियादी अधिकारों को लेकर लडऩे की बात अमेरिकी सरकार इतने समय से करते आ रही थी, उन्हें तालिबान के भरोसे छोडक़र निकलने पर उनके अधिकारों का क्या होगा?

यह बात भी समझने की जरूरत है कि आज बहुत सारे देश तालिबान के रुख को देखने की बात तो कर रहे हैं और लगे हाथों में यह मुद्दा भी उठा रहे हैं कि महिलाओं के बारे में तालिबान की क्या सोच सामने आएगी यह देखना अभी बाकी है। लेकिन क्या सचमुच ही बाकी देशों को अफगान महिलाओं से इतनी हमदर्दी है? या फिर यह दुनिया की जन भावनाओं के सामने अपना एक नैतिक रुख दिखाने की ऐसी कोशिश है, जिसकी कूटनीति में या फौजी रणनीति में कोई जगह नहीं रहती। आज तालिबान जिस तरह की धर्मांधता, धार्मिक कट्टरता, और दकियानूसीपन पर खड़े हुए हैं, वे लोकतंत्र से जिस तरह कोसों दूर हैं, दुनिया के, सभ्य समाज के तौर तरीकों से जिस तरह कोसों दूर हैं, ऐसे में उनके साथ रिश्ते रखने की मजबूरी वाले देशों के सामने भी अपने नागरिकों और बाकी दुनिया के सामने यह दिखाने की एक मजबूरी रहती है कि वह अफगानिस्तान में मानवाधिकारों की भी फिक्र करेंगे। सच तो यह है कि तालिबान के साथ दूसरे देश एशिया के इस हिस्से में भौगोलिक मजबूरियों की वजह से रिश्ता रखना चाहते हैं, अपने-अपने फौजी मोर्चों को ध्यान में रखते हुए रिश्ता रखना चाहते हैं, और कारोबार की जरूरतों के लिए भी वे अगली तालिबान सरकार से जुडऩा चाहते हैं। अमेरिका सहित दुनिया का कोई भी देश अफगान महिलाओं के लिए किसी भी किस्म की फिक्र से पूरी तरह आजाद है। अफगानिस्तान में मानवाधिकार अफगान जनता के अलावा किसी की भी प्राथमिकता नहीं है, और दुनिया का कोई भी देश अगर अफगान लोगों के मानवाधिकार की बात करता भी है, तो वह देश केवल जुबानी जमा-खर्च कर रहा है। ऐसे देश तालिबान से किसी संबंध की संभावना नहीं रखते या इस बात की कोई फिक्र नहीं करते कि उनकी कही हुई बात तालिबान पर असर कर पाएगी या नहीं।

आज अमेरिका ने दसियों लाख अफगान लोगों की जिंदगी को खतरे में डाला है और इनमें से लाखों लोग देश छोडक़र निकलने की कोशिश कर रहे हैं जिन्हें दुनिया में किस देश में जगह मिलेगी इसका कोई ठिकाना नहीं है। फिर यह भी समझने की जरूरत है कि अफगानिस्तान से तमाम काबिल लोग तमाम अधिक पढ़े लिखे लोग और तमाम हुनरमंद लोग पहले बाहर निकल जाना चाहते हैं जिससे कि उस देश का अपना ढांचा एक नुकसान झेलने जा रहा है। इसलिए 20 बरस कब्जा जमाए रखने के बाद अमेरिका अफगान लोगों और अफगानिस्तान को एक बड़े खतरे और नुकसान में छोडक़र निकला है और इतिहास में इसे अच्छी तरह दर्ज किया जाएगा। एक आखरी बात यह कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने तालिबान के पूरे कब्जे के कुछ ही हफ्ते पहले जिस तरह के बड़े-बड़े दावे करके अफगानिस्तान में तालिबान के आने की किसी भी संभावना को पूरी तरह से खारिज कर दिया था, उससे यह साफ है कि अमेरिका की सारी खुफिया ताकत, वहां के फौजी विश्लेषक, सब बुरी तरह नाकामयाब साबित हुए हैं, और उन्होंने अपने राष्ट्रपति को एक मसखरा साबित होने दिया। यह नौबत दुनिया के सबसे ताकतवर माने जाने वाले इंसान के लिए अपने देश के भीतर भी एक बड़ी शर्मिंदगी की है, और इससे अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन पता नहीं कैसे उबरेंगे।

(Daily Chhattisgarh)

आबादी काबू में रखने वाले राज्य की संसद सीटें घटने का उसे मुआवजा क्यों न मिले-हाईकोर्ट

   24 अगस्त 2021

  तमिलनाडु के हाई कोर्ट से एक दिलचस्प सवाल निकलकर सामने आया है। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरई पीठ ने एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और राजनीतिक दलों को एक नोटिस जारी किया है, और उनसे पूछा है कि 1965 के बाद से तमिलनाडु में आबादी घटने की वजह से 2 लोकसभा सीटें कम कर दी गई थी, अदालत ने कहा है कि राज्य को इसका आर्थिक मुआवजा क्यों न दिया जाए? अदालत ने यह बुनियादी बात उठाई है कि तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश ने क्योंकि अपनी आबादी काबू में रखी और बाकी देश के मुकाबले कम की, इसलिए आबादी के अनुपात में लोकसभा की सीटें तय करते हुए इन दो राज्यों में 1967 के चुनाव से सीटें घटा दी गई थी। हाईकोर्ट ने यह सवाल उठाया है कि किसी राज्य को परिवार नियोजन और आबादी नियंत्रण को कामयाबी से लागू करने की वजह से क्या इस तरह की सजा दी जा सकती है कि लोकसभा में उसकी सीटें कम हो जाए? अदालत ने इस बात को भी याद दिलाया है कि किस तरह अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार एक वोट की वजह से गिर गई थी, तो ऐसे एक सांसद का महत्व कितना होता है यह उस समय सामने आ चुका है। अदालत ने कहा है कि एक सांसद का 5 वर्ष के कार्यकाल में राज्य के लिए 200 करोड़ का योगदान माना जाना चाहिए इस हिसाब से केंद्र सरकार तमिलनाडु को 14 चुनावों में 2-2 सांसद कम होने का मुआवजा 5600 करोड़ रुपए क्यों न दे?

यह बड़ा ही दिलचस्प मामला है और बहुत से लोगों को यह बात ठीक से याद भी नहीं होगी कि आबादी के अनुपात में लोकसभा क्षेत्र तय करने का मामला इमरजेंसी के दौरान एक  संविधान संशोधन करके रोक दिया गया था क्योंकि उत्तर भारत के बड़े-बड़े राज्य लगातार अपनी आबादी बढ़ाते चल रहे थे, और केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिण भारतीय राज्य अपनी अधिक जागरूकता की वजह से आबादी घटा रहे थे और इस नाते उनकी सीटें भी कम होने जा रही थी। यह बुनियादी सवाल मदुरई हाई कोर्ट से परे भी पहले उठाया जा चुका है कि क्या किसी राज्य को उसकी जिम्मेदारी और जागरूकता के लिए सजा दिया जाना जायज है? लोगों को यह ठीक से याद नहीं होगा कि हिंदुस्तान में हर जनगणना के बाद लोकसभा सीटों में फेरबदल की एक नीति थी लेकिन बाद में जब यह पाया गया कि उत्तर और दक्षिण का एक बड़ा विभाजन इन राज्यों की जागरूकता और जिम्मेदारी को लेकर हो रहा है और अधिक जिम्मेदार राज्य को सजा मिल रही है तो फिर आपातकाल के दौरान 1976 में 42 वें संविधान संशोधन से लोकसभा सीटों में घट बढ़ की इस नीति को रोक दिया गया, और इसे 2001 तक न छेडऩा तय किया गया। लेकिन 2001 में भी यह पाया गया कि अभी भी उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच एक बड़ी विसंगति जारी है और अगर आबादी के अनुपात में सीटें तय होंगी तो संसद में दक्षिण का प्रतिनिधित्व घटते चले जाएगा और भीड़ भरे उत्तर भारत का प्रतिनिधित्व बढ़ते चले जाएगा इसलिए 2001 में इसे फिर 25 बरस के लिए टाल दिया गया और अब 2026 तक सीटों तक ऐसा फेरबदल नहीं होना है। यह एक अलग बात है कि उत्तर और दक्षिण में आबादी का फर्क, आबादी में बढ़ोतरी का फर्क, अभी तक जारी है और 2026 में भी ऐसे कोई आसार नहीं हैं कि आबादी के अनुपात में लोकसभा सीटें तय की जाएं। ऐसा होने पर जिम्मेदार राज्यों के साथ बड़ी बेइंसाफी होगी और गैरजिम्मेदार राज्यों को संसद में अधिक सांसद मिलने लगेंगे।

यह पूरा सिलसिला प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के भी खिलाफ है इसलिए कि किसी व्यक्ति किसी इलाके प्रदेश या लोकसभा सीट को अधिक जिम्मेदार होने की वजह से सजा देना किसी भी कोने से जायज नहीं है। दूसरी तरफ आबादी घटाने के राष्ट्रीय कार्यक्रम और सामाजिक जरूरत के खिलाफ जाकर लगातार आबादी बढ़ाने वाले राज्यों का आर्थिक पिछड़ापन जारी है, लेकिन वे पुराने कानून के हिसाब से देखें तो संसद में अधिक सदस्य भेजने के हकदार हो सकते थे, इसलिए इस सिलसिले को रोक देना ही ठीक था। 1976 के बाद से अभी तक सीटों को बढ़ाने या घटाने का सिलसिला तो थमा हुआ है, लेकिन तमिलनाडु के इस हाईकोर्ट ने एक नया सवाल उठाया है कि क्या राज्य से छीने गए 2 सांसदों के एवज में आर्थिक भरपाई नहीं की जानी चाहिए?

इस पर चर्चा होनी चाहिए क्योंकि आज तो यह मामला 2026 तक थमा हुआ है, लेकिन 2026 तक न तो राज्यों के बीच आबादी का अनुपात बहुत नाटकीय अंदाज से बदलने वाला है, और न ही 2026 में ऐसी नीति देश में लागू करना मुमकिन हो पाएगा। ऐसा करने पर उत्तर और दक्षिण के बीच एक बगावत जैसी नौबत आ जाएगी और देश टूटने की तरह हो जाएगा, जिसमें जिम्मेदार दक्षिण को लगेगा कि उसे उसकी जागरूकता की सजा दी जा रही है। इसलिए 2026 का वक्त आने के पहले देश में इस पर चर्चा होनी चाहिए, लोगों को बात करना चाहिए, दूसरे देशों की मिसालें भी देखनी चाहिए। अमरीका में काम कर रहे एक हिंदुस्तानी पत्रकार ने अभी लिखा है-‘अमरीकी संसद के उच्च सदन सेनेट (राज्यसभा) में सौ सदस्य होते हैं। अमेरिका में पचास राज्य हैं। हर राज्य से दो सदस्य सेनेट में चुनकर आते हैं। भारत में राज्यसभा सदस्य चुनने के लिए राज्यों के विधायक भी वोट डालते हैं, जबकि अमेरिकी सेनेट के सदस्य हर राज्य की पूरी जनता चुनती है। हर राज्य से दो सेनेटर होने का नियम बहुत ही जबरदस्त है। चार करोड़ की आबादी वाले कैलिफोर्निया के भी दो सेनेटर हैं और पौने छह लाख की आबादी वाले वायोमिंग राज्य के भी दो ही हैं। भारत में ऐसा होता तो राज्यसभा में मणिपुर और यूपी के बराबर सदस्य होते। इस तरह अमेरिकी सेनेट में कोई भी राज्य किसी से ऊपर या नीचे नहीं है।’

(Daily Chhattisgarh)

ऑनलाइन की मजबूरी ने अनायास जुटा दिया मौका इस तरह गंवाना नहीं चाहिए

   23 अगस्त 2021

 अगले कुछ महीनों में हिंदुस्तान में घर से काम करने, ऑनलाइन क्लास लेने, और इंटरनेट के रास्ते सेमिनार में हिस्सा लेने के 2 बरस पूरे हो जाएंगे। इस डेढ़ बरस में बहुत से इम्तिहान नहीं लिए गए, और बच्चों को अगली क्लास में भेज दिया गया। जो स्कूल ऑनलाइन पढ़ा सकती थीं, वे इस कोशिश में लगी हुई हैं कि पढ़ाने वाले लोगों को दी जा रही पूरी या आधी तनख्वाह, कुछ हद तक बच्चों की फीस की शक्ल में वसूल हो सके। लेकिन यह मामला भी देशभर में बड़ा कमजोर सा चल रहा है और निजी स्कूलों को यह समझ नहीं आ रहा है कि वे कब तक इस तरह काम कर सकेंगी और अगर कोरोना महामारी की तीसरी लहर आएगी तो उसके बाद निजी स्कूलों और कॉलेजों का क्या होगा? सरकारों ने कोरोना से जूझने के तरीके तो कुछ या अधिक हद तक ढूंढ लिए हैं, लेकिन खुद सरकार का अपना काम जिस तरह वीडियो कांफे्रंस पर चल रहा है, और पढ़ाई-लिखाई जिस तरह कंप्यूटर या मोबाइल फोन पर चल रही है, उस बारे में काफी कुछ करने की जरूरत है। अब कोरोना का तीसरा दौर आता है या नहीं यह तो किसी के हाथ में नहीं है, लेकिन हो सकता है कि आने वाले वर्षों में कोई और महामारी आए या किसी और वजह से स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई को ऑनलाइन करना पड़े, सेमिनार और कान्फ्रेंस ऑनलाइन होने लगें, तो उस दिन के लिए राज्य सरकारों ने कोई बेहतर तैयारी की हो, ऐसी मिसालें भी सामने नहीं आ रही हैं।

हम अपने आसपास के जितने राज्यों के बारे में खबरें पढ़ते हैं, किसी राज्य से ऐसी खबर अभी तक नहीं आई है कि सरकार ने अपने प्रदेश के स्कूल-कॉलेज के ढांचे को डिजिटल कामकाज के लिए बेहतर तैयार करने पर मेहनत की हो। स्कूल-कॉलेज में काम करने वाले शिक्षक या प्राध्यापक कंप्यूटर और इंटरनेट पर अधिक का काम करने के आदी नहीं रहे हैं। पढ़ाने, इम्तिहान लेने का काम तो ऑनलाइन करने की किसी की आदत नहीं रही है, कोई तजुर्बा नहीं रहा है। ऐसे में सरकारों को चाहिए तो यह था कि वे मामूली तकनीकों के जानकार लोगों को लेकर प्रदेश के स्कूल-कॉलेज के शिक्षकों और छात्र-छात्राओं, सभी को एक डिजिटल तैयारी करवाते। आज मामूली निजी जानकारी से लोग किसी तरह काम चला रहे हैं, लेकिन एक तरफ तो पढ़ाई के ढांचे पर खर्च लगभग उतना ही हो रहा है, दूसरी तरफ छात्र-छात्राओं के एक के बाद एक बरस निकले चले जा रहे हैं। ऐसे में अगर काम को बेहतर बनाने पर मेहनत नहीं हो रही है, तो जाहिर है कि उत्पादकता और उत्कृष्टता दोनों ही कम और कमजोर रहेंगे। वही आज हो रहा है।

यह एक ऐसा मौका भारत जैसे देश के लिए सामने आया था, और आज भी खड़ा हुआ है कि अपने पढ़ाई के ढांचे का डिजिटलीकरण बेहतर तरीके से किया जाए, और कामचलाऊ अंदाज में औपचारिकता पूरी करने के बजाए अच्छी क्वालिटी का काम किया जाए। सरकार के स्कूल-कॉलेज के अधिकतर शिक्षक-शिक्षिकाओं की उम्र आसानी से सीखने की निकल चुकी है, अब अगर उनसे यह उम्मीद की जाए कि वे अपने घर-परिवार के बच्चों को पकडक़र उनसे कुछ सीख लें, तो इस उम्मीद से अधिक उम्मीद नहीं करनी चाहिए। सरकारों को अपने इतने संगठित ढांचे में योजनाबद्ध तरीके से अपने शिक्षक-शिक्षिकाओं को तकनीक के इस्तेमाल का प्रशिक्षण देना चाहिए था। इसके साथ ही स्कूल-कॉलेज के बच्चों को भी ऑनलाइन तकनीक का इस्तेमाल सिखाने पर मेहनत करनी थी।

यह तो सरकारों के हाथ में है कि वे एक और साल बिना इम्तिहान लिए बच्चों को अगली क्लास में भेज सकती हैं, लेकिन क्या इतना गुजरता जा रहा वक्त कभी लौटकर आएगा? क्योंकि सरकारों ने ऑनलाइन पढ़ाई जारी रखने का फैसला लिया है और स्कूल-कॉलेज में इसे लेकर खासा संघर्ष भी जारी है यह एक ऐसा मौका है जब राज्यों को अपनी कंप्यूटर से जुड़ी किसी एजेंसी को तुरंत ही ऐसे प्रशिक्षण की तैयारी करने कहना था और आज देश में जितनी बेरोजगारी है उसमें मामूली तकनीक सिखाने के लिए हुनरमंद लोग भी तुरंत मिल सकते थे। यह एक ऐसा मौका भी है जब स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालयों को तरह-तरह के लेक्चर तैयार करने के लिए कम से कम शहर के स्तर पर अच्छे स्टूडियो मुहैया कराए जा सकते थे जिनसे पढ़ाने की बेहतर सामग्री तैयार हो सकती थी। यह भी हो सकता था कि इस मौके के सही इस्तेमाल से कोरोना की दिक्कतें खत्म होने के बाद भी पढ़ाई को बेहतर करने की तैयारी हो चुकी रहती, लेकिन ऐसा कहीं होते दिख नहीं रहा है। इस महामारी ने लॉकडाउन और ऑनलाइन पढ़ाई ने यह मौका दिया है कि पढ़ाई का तेजी से कंप्यूटरीकरण हो सकता था, और दूर-दूर बसे हुए स्कूल-कॉलेज में पढ़ाने वालों की कमी भी ऐसी ऑनलाइन पढ़ाई से दूर हो सकती थी। लेकिन बजाए बेहतर तैयारी के, बजाए एक अच्छी योजना बनाने के, सरकार ने मोटे तौर पर अपने ढांचे को किसी तरह से इस नौबत से जूझने में लगा दिया।

सरकार का अपने पढ़ाई के ढांचे पर खासा खर्च होता है और उसका इस्तेमाल एक औपचारिकता निभाने के लिए, साल काटने के लिए नहीं करना चाहिए बल्कि उसकी उत्पादकता और उत्कृष्टता दोनों को लगातार बढ़ाते चलने की कोशिश करनी चाहिए। अभी भी वक्त है समझदार राज्य अपने स्तर पर एक अच्छी योजना बनाकर पढ़ाई के पूरे ढांचे के ऐसे प्रशिक्षण का काम कर सकते हैं जिससे सबका भला हो।

(Daily Chhattisgarh)

अफगानिस्तान से जिस रफ़्तार से लोग निकल रहे हैं, उसी रफ़्तार से दुनिया के लिए सबक भी निकल रहे

  22 अगस्त 2021

 अफगानिस्तान लगातार खबरों में बना हुआ है, तकरीबन हर दिन वहां से हिंदुस्तानी लौट भी रहे हैं, और सैकड़ों हिंदुस्तानी वहां अभी भी बाकी है जिन्हें लाने की तैयारी चल रही है। इन बातों को देखें और अफगानिस्तान पर कुछ लिखने के पहले वहां के बारे में पढ़ें तो ऐसा लगता है कि अफग़़ानिस्तान का इतिहास उन इलाकों से परे भी दूसरे देशों को, दूसरे समुदायों को बहुत सी चीजें सिखा सकता है। अफगानिस्तान में एक वक्त, आज ऐसे करीब आज से करीब डेढ़ सौ बरस पहले, हिंदुस्तान पर काबिज अंग्रेज सरकार और कम्युनिस्ट सोवियत संघ के बीच अफगानिस्तान पर कब्जे की कोशिशें चलीं, और उसके बाद अभी इक्कीसवीं सदी में वहां अमेरिका ने यही काम किया। लेकिन अफगानिस्तान की स्थानीय जीवन शैली को समझे बिना जिस तरह इन विदेशी साम्राज्यवादी ताकतों ने वहां पर कब्जा करने की लंबी कोशिशें की और लंबी मुंह की खाई, उससे पूरी दुनिया को एक सबक लेना चाहिए कि जिस जगह जाकर कोई बड़ा काम करने का इरादा हो, उस जगह को पहले समझ लेना बेहतर होता है।

आज दुनिया के इतिहासकार और विश्लेषक लगातार इस बात को लिख रहे हैं कि अलग-अलग वक्त पर दुनिया की इन तीन बड़ी ताकतों ने अफग़़ानिस्तान पर कब्जे का सपना देखा, कोशिश की, और दशकों तक फौजी ताकत का इस्तेमाल किया, उनकी सबसे बड़ी चूक यह हुई कि वह वे वहां पर कब्जा करने के लिए आमादा तो हो गए लेकिन वहां से निकलना नहीं जाना। उन्हें यह समझ ही नहीं आया था कि कभी उन्हें अफगानिस्तान छोडक़र निकलना भी पड़ेगा। यह नौबत इन तीनों महाशक्तियों की शिकस्त की सबसे बड़ी वजह रही कि उन्होंने अफगानिस्तान जाने की योजना या साजिश तो बना ली थी। लेकिन वहां से निकलने के बारे में कुछ नहीं सोचा था। इसलिए आज अमेरिका के सबसे करीबी साथी भी अमेरिका को इस बात के लिए धिक्कार रहे हैं कि उसने न केवल अफगानिस्तान को मंझधार में छोडक़र चले जाना तय किया बल्कि अफगानिस्तान में मौजूद लाखों मददगारों और सहयोगियों को वहां छोडक़र अमेरिका निकल आया है और अब किसी तरह उनमें से कुछ लोगों को खतरे में निकालने की कोशिश कर रहा है।

हिंदुस्तान में देखें तो पौराणिक कहानियों में एक ऐसा जिक्र आता है कि महाभारत में अभिमन्यु ने युद्ध के घेरे में घुसना तो सीखा हुआ था मां के पेट से ही, लेकिन निकलना नहीं सीखा था और इसलिए वह चक्रव्यूह में फंस गया। अफगानिस्तान दुनिया की इन तीनों महाशक्तियों के लिए चक्रव्यूह ही साबित हुई जिसमें से कोई जिंदा या कामयाब बाहर नहीं निकल पाया। अफगानिस्तान के दसियों लाख लोगों को इन डेढ़ सौ बरसों में इन फौजी ताकतों ने मारा और खुद अपने भी लाखों सैनिक खोए। यह सिलसिला दुनिया को एक सबक दे जाता है। लेकिन अफगानिस्तान से दुनिया के लिए और भी बहुत से सबक निकल रहे हैं कि किस तरह वहां पर कट्टर, धर्मांध, और हिंसक तालिबान की बनाई हुई शरिया अदालतें पूरे अफगानिस्तान के लोगों के बीच लोकप्रिय थीं क्योंकि तथाकथित शहरी लोकतंत्र की बनाई हुई औपचारिक आधुनिक लोकतांत्रिक अदालतें इस कदर भ्रष्ट हो चुकी थी कि लोगों का उन पर से भरोसा उठ गया था, और किसी कमजोर और गरीब के लिए वहां इंसाफ पाना मुमकिन नहीं था। नतीजा यह था अफगान लोग शरिया अदालतों में जाने लगे थे वहां के इंसाफ पर उन्हें भरोसा भी था और उससे परे, वे अदालत ने भ्रष्टाचार से भी दूर थी।

अब आज दुनिया में तालिबान को जिस तरह से देखा जा रहा है, कौन इस बात को आसानी से मान सकते हैं कि उनकी बनाई हुई अदालतें शहरी लोकतंत्रों की अदालतों के मुकाबले बहुत अधिक ईमानदार थीं और भ्रष्टाचार से मुक्त थीं। अब यह बात हिंदुस्तान जैसे किसी देश के संदर्भ में सोचें तो जहां पर अदालतों को आमतौर पर भ्रष्ट मान लिया गया है, और लोगों को अदालतों पर कोई भरोसा नहीं है, तो लोकतंत्र की ऐसी असफलता क्या किसी किस्म के धार्मिक फतवों को बढ़ावा दे सकती है? क्या ऐसी नौबत आ सकती है जिसमें लोगों को अपने बाहुबल पर अधिक भरोसा हो या लोग मुंबई में किसी माफिया के पास, या उत्तर प्रदेश बिहार में किसी बड़े गुंडे के पास जाने लगें, कि वहां उनके झगड़ों का आसानी से ईमानदार निपटारा हो जाए? ऐसी तमाम बातें अफगानिस्तान से आज बाकी दुनिया के लिए सबक के रूप में निकल रही हैं।

अफगानिस्तान में 1980 के पहले जिस तरह से वहां स्थानीय कम्युनिस्ट पार्टी के जुल्म भरे राज को जारी रखने के लिए रूस ने दसियों हजार सैनिकों को वहां झोंक दिया था और अंधाधुंध कत्लेआम शुरू कर दिया था, वह भी एक वजह थी कि अफगान जनता कम्युनिज्म से नफरत करने लगी थी, फिर चाहे वह बराबरी के आर्थिक अधिकारों की बात करता था और महिलाओं के लिए बराबरी के अधिकार की बात भी करता था। लेकिन उसने जिस हद तक लोगों पर जुल्म ढहाना शुरू किया था उसी का नतीजा था कि कम्युनिस्टों को आखिर में जाकर अपने रूसी आकाओं के साथ सत्ता छोडऩी पड़ी थी, और रूस के आखिरी फौजी को भी अफगानिस्तान से जाना पड़ा था। लेकिन दूसरी तरफ बाहर से लाकर पश्चिमी अंदाज का लोकतंत्र लादने की अमेरिका की गुंडागर्दी की कोशिश ने जिस तरह के जुल्म किए थे और अमेरिकी सरगनाई में जिस तरह पश्चिमी फौजियों ने अफगान जनता पर जुल्म किए थे, उन्हीं का नतीजा था कि इन 20 वर्षों में धीरे-धीरे तालिबान को एक बार फिर जगह मिली और आज अमेरिका की वापिसी को तालिबान की जीत के जश्न के रूप में मनाया जा रहा है। फिर चाहे अमेरिका कहने के लिए एक संविधान से बंधा हुआ लोकतंत्र क्यों ना हो, उसने अफगानिस्तान में जितने जुल्म किये हैं, उन्हीं का नतीजा रहा कि तालिबान एक बार फिर लोगों की हमदर्दी पाकर सत्ता पर आ चुके हैं। हम ऐसी किसी भी बात का अतिसरलीकरण करना नहीं चाहते लेकिन मोटे तौर पर वहां की नौबत को समझाने के लिए इन बातों को कर रहे हैं कि किस तरह किसी के गलत काम दूसरे गलत लोगों के लिए एक जगह पैदा कर देते हैं। जैसे हिंदुस्तान में देश की सरकार हो या बिहार की सरकार हो, जब इन सरकारों ने खूब भ्रष्टाचार किया, तो इनकी धर्मनिरपेक्षता किनारे धरी रह गई और देश के सबसे सांप्रदायिक लोगों को भी जनता ने इनके ऊपर चुन लिया क्योंकि जनता भ्रष्टाचार से थक गई, और जनता शायद कुनबापरस्ती से भी थक गई थी। ऐसे में लोगों को लगा कि सांप्रदायिक होना इतनी बड़ी बुराई नहीं है जितनी बड़ी बुराई भ्रष्ट होना और कुनबापरस्त होना है।

अफगानिस्तान को आज देखें तो वहां 1840 के आसपास से अंग्रेजी फौजियों की जो दखल शुरू हुई थी वह 100 बरस बाद जाकर रूसी फौजियों की शक्ल में बदल गई और उसकी चौथाई सदी बाद वह अमेरिकी फौजों की शक्ल में बदल गई। इस दौरान अफगानिस्तान के भीतर स्थानीय तबकों में भी लोग अलग-अलग समय पर अलग-अलग किस्म की ताकतों को खारिज करते रहे, और अलग-अलग किस्म की ताकतों का साथ देते रहे। अफगानिस्तान का पूरा ताजा इतिहास बड़ा दिलचस्प है और यह बाकी दुनिया के लिए एक बड़ा सबक बन कर भी आया है कि सरकारों को क्या-क्या नहीं करना चाहिए देश के भीतर राज्य करने की हसरत रखने वाले राजनीतिक दलों और समुदायों को क्या-क्या नहीं करना चाहिए। फिर अफगानिस्तान इस बात का भी एक बहुत बड़ा सबूत है कि लोकतंत्र को अपने आपको इस हद तक नाकामयाब नहीं करना चाहिए कि कट्टरता और धर्मांधता भी बेहतर लगने लगे। हिंदुस्तान सहित बाकी दुनिया के लोकतंत्रों को भी अफगानिस्तान के बारे में पढक़र अपने खुद के बारे में भी सोचना चाहिए। यह भी सोचना चाहिए कि धर्मांधता और कट्टरता जब वह बढऩा शुरू होती हैं, तो वे इस हद तक बढ़ जाती हैं कि अमेरिका और तमाम पश्चिमी देशों के फौजी गठबंधन को भी नाकामयाब कर देती हैं। यह भी सोचना चाहिए कि जब देशों की सरकारें किसी एक धर्म की धर्मांधता को बढ़ावा देती हैं, तो पाकिस्तान, सऊदी अरब जैसे देश तालिबान को किस ऊंचाई तक पहुंचा सकते हैं, उसे कितनी ताकत दे सकते हैं। अफगानिस्तान का यह पूरा तजुर्बा दुनिया को बहुत कुछ सीखने का मौका दे रहा है और लोगों को अफगानिस्तान की फिक्र करने के बजाए अपने देश और अपने समाज की फिक्र करनी चाहिए, अपने धर्म की खामियों की फिक्र करनी चाहिए, हिंसा और कट्टरता की फिक्र करनी चाहिए और यह सोचना चाहिए कि कैसे-कैसे उनके साथ यह नौबत ना आए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 अगस्त 2021


 

मोदीविरोधी एकजुटता के साथ, कुनबापरस्त होने की दिक्कत भी

  21 अगस्त 2021

 सोनिया गांधी ने करीब डेढ़ दर्जन गैर-भाजपा, गैर-एनडीए पार्टियों से बात की और भाजपा के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा बनाने की चर्चा की। कोरोना के खतरे को देखते हुए यह पूरी चर्चा ऑनलाइन हुई लेकिन इसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि देश में आज यह चर्चा छिड़ चुकी है कि उत्तर प्रदेश, पंजाब जैसे राज्यों के चुनावों को देखते हुए और 2024 के आम चुनाव को देखते हुए जो कोई पार्टी मोदी से निपटना चाहती है, उसे दूसरे विपक्षी दलों के साथ एक तालमेल बैठाना ही पड़ेगा, उसके बिना मोदी से पार पाना मुमकिन नहीं है। एक वक्त हिंदुस्तान की राजनीति में कांग्रेस के खिलाफ बाकी सबको एक करने की जो मुहिम चलती थी, वह मुहिम अब मोदी के खिलाफ बाकी सब एक में बदल चुकी है क्योंकि आज वक्त की जरूरत वही है। आज यह आसान नहीं रह गया है कि मोदी से सिर्फ यूपीए अकेले पार पा सके।

ऐसे मौके पर मोदी विरोधियों के बीच जेल से छूटे हुए लालू यादव भी हैं, जिनके आने के बाद बिहार की राजनीति में बड़े फेरबदल होने की उम्मीद जताई जा रही थी। यह एक अलग बात है कि पिछले हफ्ते-दस दिन से लालू की पार्टी उनके बेटों के आपसी झगड़ों और पार्टी के भीतर चल रही टकराहट को लेकर खबरों में बनी हुई है। सोनिया गांधी ने कांग्रेस के अलावा डेढ़ दर्जन और पार्टियों को साथ लेकर जो एक संयुक्त बयान जारी किया है वह अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण तो है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सोनिया गांधी अगले चुनाव तक ऐसे किसी प्रस्तावित गठबंधन में उसके नेता के रूप में, या कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में सक्रिय रहेंगी, या फिर कांग्रेस पार्टी को कोई दूसरा अध्यक्ष मिलेगा? यह बात जरूरी इसलिए है कि विपक्ष की पार्टियों में कांग्रेस चाहे सबसे बड़ी पार्टी न भी रह गई हो, वह अकेली पार्टी है जिसकी पूरे हिंदुस्तान में मौजूदगी है। कांग्रेस के अलावा गैर-एनडीए पार्टियों में पूरे देश में पहुंचे रखने वाली कोई दूसरी पार्टी नहीं है। इसलिए कांग्रेस के जो घरेलू मामले हैं, उन मामलों में भी कांग्रेस के साथ जुडऩे वाली दूसरी पार्टियों की फिक्र जुड़ी हुई है, और उन्हें फिक्र करने का हक भी है। आज कोई भी पार्टी मोदी के मुकाबले एक किसी गठबंधन में कई किस्म की कुर्बानी देकर जुडऩे के लिए तैयार होती है तो उस गठबंधन की मुखिया पार्टी के बारे में उसके कुछ सवाल भी हो सकते हैं, और इनका जवाब दिए बिना बचा नहीं जा सकता।

आज मोदी के मुकाबले जो भी मोर्चा खड़ा होगा उसमें बिहार में लालू यादव की आरजेडी की भूमिका रहेगी ही रहेगी, और ऐसे में अगर आरजेडी के भीतर, लालू के जेल के बाहर रहते हुए भी गृहयुद्ध चल रहा है कि उनके दोनों बेटे मीडिया और सोशल मीडिया के रास्ते एक दूसरे पर हमले कर रहे हैं, तो इससे लालू यादव की किसी भी विपक्षी गठबंधन पर पकड़ कमजोर भी होती है। आज जिस तरह कांग्रेस के अगले अध्यक्ष को लेकर एक रहस्य, और रहस्य से भी बड़ा असमंजस फैला हुआ है, तो उससे भी किसी संभावित गठबंधन में कांग्रेस की बात का वजन घटता है। ऐसे किसी भाजपा विरोधी गठबंधन के बीच आज वैसे भी बहुत किस्म के विरोधाभास और विसंगतियां हैं, लेकिन जब बड़ी-बड़ी पार्टियों के भीतर का गृहयुद्ध या उनके भीतर का असंतोष इस तरह खुलकर सामने आएगा, तो ऐसे गठबंधन की संभावनाएं कमजोर ही होती हैं। एक तो भाजपा के मुकाबले दूसरी बहुत सी पार्टियों पर कुनबापरस्ती की जो तोहमत लगती है, उसका कोई आसान जवाब किसी के पास नहीं है। कांग्रेस पार्टी पर तो देश में राजनीति में कुनबापरस्ती को शुरू करने की ही तोहमत लगती है, लेकिन कांग्रेस से परे भी एनसीपी का पवार परिवार, शिवसेना का ठाकरे परिवार, टीएमसी का ममता परिवार, आरजेडी का लालू परिवार, समाजवादी पार्टी का मुलायम परिवार, कश्मीर की दोनों पार्टियों के अपने कुनबे, डीएमके का स्टालिन परिवार, और इस तरह के और कई पार्टियों के परिवारवाद के जलते-सुलगते मामले सामने हैं। इनके मुकाबले भाजपा एक अधिक वजन के साथ अपने-आपको कुनबापरस्ती से परे की पार्टी साबित करने में कामयाब होती है। मोदी तो अपने को परिवारमुक्त नेता साबित करके एक साख पा ही चुके हैं।

अब देखना यही है कि मोदी विरोधी यह नया मोर्चा अपने आंतरिक विरोधाभास और अपनी विसंगतियों से किस तरह उभरता है, और इसकी हिस्सेदार पार्टियां किस तरह अपने आपको जनता के बीच एक भरोसेमंद विकल्प की तरह पेश कर पाती हैं। आज तो जिस अंदाज में लालू यादव का कुनबा जिस तरह सडक़ पर लड़ रहा है और जिस तरह पार्टी पर उनका कुनबा हावी है, यह विपक्षी गठबंधन में लालू यादव की स्थिति को कमजोर बनाने वाली बात है। कांग्रेस को भी अपने भीतर के दो दर्जन असंतुष्ट नेताओं के बीच अपने घर को चलाना सीखना होगा, वरना उसकी बात का वजन भी कम रहेगा। आगे आगे देखें होता है क्या!

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 अगस्त 2021


 

अपने लोगों को लाईफ जैकेट के ऊपर और लाईफ जैकेट, बाकी गरीब लोग डूब जाएँ...

 20 अगस्त 2021

 एक के बाद दूसरे विकसित और संपन्न देशों ने अपने नागरिकों को कोरोना वैक्सीन के दो डोज के बाद तीसरा डोज लगाने की घोषणा की है और कुछ देशों ने यह शुरू भी कर दिया है। इजरायल जैसा छोटा देश जो कि अति संपन्न देशों में से है, उसने तीसरा डोज लोगों को लगा भी दिया है। अमेरिका और यूरोप के बहुत से देशों ने इसकी घोषणा कर दी है। इसे देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इन देशों को यह चेतावनी दी है कि जब दुनिया के गरीब देशों में लोगों को वैक्सीन की पहली खुराक भी नहीं लग पा रही है तब अगर कुछ देश अपनी संपन्नता की वजह से अपने नागरिकों को तीसरी खुराक लगा रहे हैं, तो इससे दुनिया के अमीर और गरीब देशों के बीच एक गहरी और चौड़ी खाई खुद रही है। एक अंतरराष्ट्रीय संगठन दुनिया में अपने आपको परिपच् लोकतंत्र करार देने वाले देशों को यह मामूली समझ की नसीहत दे रहा है, जो कि इन देशों को खुद ही समझ आनी चाहिए थी। वैसे भी दुनिया में विकसित और संपन्न देश अपनी कई किस्म की नीतियों को लादते हुए बाकी दुनिया को गरीब बनाए रखने की साजिश करते ही हैं। लेकिन एक महामारी जिसका असर दुनिया में कहीं से कहीं भी फैल रहा है, उसे काबू में करने के लिए भी विकसित देशों को यह बात समझ नहीं आ रही है कि उनके लोगों को तीसरी खुराक लगने के पहले गरीब देशों में स्वास्थ्य कर्मचारियों और दूसरे लोगों को पहली खुराक लग जाना अधिक जरूरी है, तभी यह दुनिया महामारी से बच सकेगी। संपन्नता लोगों को इस हद तक हिंसक बना देती है कि वे दुनिया को अलग-अलग टापुओं में बांटकर चलने लगते हैं और गरीब लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने संपन्न देशों की इस रणनीति पर तंज कसते हुए कहा है कि ये देश अपने लोगों को अतिरिक्त लाइफ जैकेट देने जा रहे हैं, जिनके पास पहले से लाइफ जैकेट हैं, जबकि बाकी लोगों को डूबने के लिए छोड़ दे रहे हैं।


अंतरराष्ट्रीय संगठनों के सामने हमेशा से ही यह बात चली आ रही है कि विकसित संपन्न और ताकतवर देश गरीब देशों की कोई फिक्र नहीं करते और गरीब देशों को अपना कबाड़ फेंकने के लिए, अपनी जरूरत के ऐसे सामान बनवाने के लिए इस्तेमाल करते हैं जिनसे उन गरीब देशों में चाहे जितना प्रदूषण हो जाए। गरीबों को मरने के लिए छोड़ देना अमीर समाज या अमीर देश की एक आम सोच हमेशा से चली आ रही है। दिलचस्प बात यह भी है कि कोरोना वैक्सीन की तीसरी डोज के बारे में अभी तक विश्व स्वास्थ्य संगठन को ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है कि इस तीसरी डोज से लोगों पर खतरा कुछ घटेगा। फिर भी जो संपन्न देश वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों से मनमाना स्टॉक खरीद सकते हैं, वे अपने नागरिकों को 3-3 डोज लगाना शुरू कर चुके हैं।


आज दुनिया में देशों के बीच में ऐसा कोई तालमेल नहीं बचा है कि पूरी दुनिया की एक सामूहिक जिम्मेदारी अधिक ताकतवर और अधिक संपन्न देशों पर कुछ अधिक आए। दुनिया के देश अपनी सरहदों को अपनी जिम्मेदारी की सरहद भी मान लेते हैं, और सरहद के दूसरी तरफ के दूसरे देशों की कोई जिम्मेदारी भी अपने ऊपर नहीं मानते। तरह-तरह के फौजी झगड़ों के मौके पर संयुक्त राष्ट्र संघ किसी काम का नहीं रह गया है, उसी तरह तरह-तरह की महामारी और दूसरी बीमारियों से जूझने के लिए डब्ल्यूएचओ जैसे संगठनों के हाथ में कोई ताकत नहीं रह गई है, और ये संगठन संपन्न देशों से मिलने वाले आर्थिक अनुदान पर चल रहे हैं, उनको कुछ कहने की हालत में नहीं हैं। फिर यह भी है कि विकसित और संपन्न लोकतंत्रों के भीतर भी ऐसी कोई सामाजिक और सामूहिक चेतना नहीं रह गई है कि वहां के लोग अपनी सरकारों के ऐसे फैसलों के खिलाफ उठकर खड़े हों और एक जनमत तैयार करें कि पहले दुनिया के गरीब देशों को वैक्सीन का पहला डोज दिया जाए उसके बाद संपन्न देश अपने लोगों को तीसरा डोज देने की सोचें। यह सिलसिला बड़े-बड़े विकसित लोकतंत्र होने का दावा भरने वाले देशों की गैरजिम्मेदारी का एक बड़ा सबूत है, और यह बड़ी तकलीफदेह सच्चाई है कि दुनिया में स्वार्थ इस कदर हावी है कि लोग अपने से परे दूसरों की जरूरत, उनकी जिंदगी पर खतरे, के बारे में कुछ सोच भी नहीं रहे हैं। किसी लोकतंत्र, किसी राजनितिक चेतना, किसी धर्म का भी कोई दवाब नहीं दिखता कि गरीबों के भी जिन्दा रहने को एक बुनियादी हक माना जाये।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 अगस्त 2021


 

ये लोग पाकिस्तान का पर्यटन उद्योग चौपट करके हिन्दुस्तान को अफगान भेजकर मानेंगे...

 19 अगस्त 2021

 हिंदुस्तान के भीतर नफरतजीवियों का एक तबका एक बार फिर बहुत सक्रिय हो गया है उसे अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी से एक बड़ा मुद्दा हाथ लगा है और हिंदुस्तान में ये लोग आज इस वक्त किसी भी वजह से अमेरिकी फौजों की वापिसी के बारे में कुछ कह रहे हैं या दुनिया भर में जाहिर की जा रही ऐसी संभावना पर चर्चा भी कर रहे हैं कि तालिबानियों का नया रुख देखना होगा कि क्या उनमें कोई फेरबदल आया है?  ऐसे तमाम खुले दिमाग के लोगों के लिए नफरतजीवियों के पास एक ही फार्मूला है कि सेक्युलर लोग अफगानिस्तान चले जाएं वहां जाकर बसें। कुछ नफरतजीवियों जिन्होंने कुछ अधिक कल्पनाशीलता भी दिखाई है, और वे ऐसे इश्तहार बनाकर पोस्ट कर रहे हैं कि बहुत सस्ते में काबुल में एक बड़ा मकान किराए पर उपलब्ध है और लोग वहां जाकर उसमें रह सकते हैं। अगर अफगानिस्तान के बाद तालिबान से अधिक कट्टर कोई और इस्लामी संगठन दुनिया के किसी और देश में सक्रिय हो जाएगा तो हिंदुस्तान के ये नफरतजीवी यहां के अमनपसंद लोगों को ऐसे किसी देश भी भेज देंगे जहां अलकायदा का राज होगा, जहां तालिबानियों से अधिक कट्टर लोग होंगे।

दुनिया के जटिल मुद्दों की जब न समझ हो, न समझने की ताकत हो, और न समझने की इच्छा हो, तो कुछ इसी किस्म की बात की जाती है। अफगानिस्तान और तालिबान के मुद्दे पर आज दुनिया भर के विश्लेषकों को भी लिखने में दिक्कत जा रही है क्योंकि बहुत सी चीजें अभी भी लोगों की समझ से परे हैं बहुत अधिक जटिल हैं लेकिन जो लोग हिंदुस्तान के कुछ लोगों को अफगानिस्तान धकेलना चाहते हैं उनके लिए हालात का अतिसरलीकरण करना बड़ा आसान है, उसमें दिमाग के इस्तेमाल की जरूरत नहीं पड़ती। उसमें न जानकारी लगती, न कोई विश्लेषण लगता, उसमें सिर्फ एक नीयत लगती है कि कैसे अपने से असहमत लोगों को देश निकाला दिया जाए। यह लोग पहले पाकिस्तान भेजने की ट्रैवल एजेंसी चला रहे थे, अब उन्होंने अफगानिस्तान भेजने की ट्रैवल एजेंसी शुरू कर दी है। कुल मिलाकर हालत यह है कि हिंदुस्तान के जिन लोगों को और जितने लोगों को ये लोग पाकिस्तान भेज रहे थे, अब पाकिस्तान का पर्यटन उद्योग भूखा ही मर जाएगा, क्योंकि अब यह तमाम लोगों को अफगानिस्तान भेजने पर उतारू हैं।

हिंदुस्तान में अकल बिना, और नफरत से लबालब एक तबका ऐसा हो गया है जो दुनिया में कहीं भी होने वाली किसी धर्मांधता, कट्टरता, या सांप्रदायिकता को लेकर हिंदुस्तान के उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष, और अमनपसंद लोगों पर हमला करना शुरू कर देता है। ऐसा इसलिए होता है कि जब हिंदुस्तान में धार्मिक कट्टरता और धार्मिक हिंसा सिर चढक़र बोलती है, तो तालिबान सऱीखों की मिसाल देते हुए समझदार लोग यह नसीहत देते हैं कि तालिबान बनने की कोशिश ना करें, क्योंकि उसके बाद मुल्क का जो हाल होता है वह सबका देखा हुआ है। इस नसीहत को समझने के बजाय, क्योंकि समझने से तो धार्मिक हिंसा छोडऩी भी पड़ेगी, ऐसे धर्मांध और हिंसक लोग, अपने ही मुल्क के लोगों को अफगानिस्तान रवाना करने पर उतारू हैं। उन्हें तालिबान से परहेज नहीं है क्योंकि तालिबान के बहुत से तौर-तरीके तो उन्हें हिंदुस्तान में इस्तेमाल करने में भी मजा आ रहा है। लेकिन उन्हें हिंदुस्तान में आईना दिखाने वाले लोगों से दिक्कत है, और वे ऐसे अमनपसंद लोगों को धकेलकर देश के बाहर करना चाहते हैं।

इसमें कोई नई बात भी नहीं है। आईना दिखाने वालों का हर युग में यही हाल होते आया है। यह तो सैकड़ों बरस पहले कबीर के वक्त पर धर्मांधता और धार्मिक हिंसा आज सरीखी हावी नहीं थी इसलिए कबीर धार्मिक पाखंड के खिलाफ सौ किस्म की नसीहतें देकर भी जिंदा रह गए। आज का वक्त होता तो कबीर के हाथकरघे को आग लगा दी गई होती और कबीर की सडकों पर भीड़त्या कर दी गई होती। हिंदुस्तान का सोशल मीडिया इस बात का गवाह है कि आबादी का कम से कम एक तबका किसी भी किस्म की समझ से ठीक उसी तरह परहेज करता है, जिस तरह किसी धार्मिक उपवास के दिन कई चुनिंदा चीजों से परहेज किया जाता है। यह तबका न तो इतिहास को देखना चाहता है, क्योंकि इतिहास का सच उसके लिए बड़ी असुविधा का है, न वह वर्तमान को देखना चाहता है क्योंकि वर्तमान में उसकी खुद की हरकतें शर्मनाक हैं, और न वह भविष्य को देखना चाहता है क्योंकि बेहतर भविष्य के लिए तो मेहनत करनी पड़ती है।

ऐसे लोगों को तालिबान की वजह से अफगानिस्तान में हुए नुकसान से सबक लेने के बजाय हिंदुस्तान में तालिबानी हरकतें करने में मजा आता है और वे यह मानकर चलते हैं कि उनके बावजूद हिंदुस्तान में कोई नुकसान उन्हें नहीं होगा। लोगों को याद रखना चाहिए कि सोशल मीडिया पर अभी कुछ लोगों ने एक तंज कसा है जो कि सच के बहुत करीब भी है कि संसद भवन की नई इमारत बना देने से संसदीय व्यवस्था मजबूत नहीं हो जाती है, संसदीय लोकतंत्र मजबूत नहीं हो जाता है। अफगानिस्तान का संसद भवन तो भारत ने बनाकर दिया लेकिन क्या नतीजा निकला? नए और मजबूत संसद-भवन से अफग़़ान लोकतंत्र मजबूत तो नहीं हो गया?  धर्मान्धता ने एक देश को खा लिया। दुनिया के 3 सबसे बड़े साम्राज्यवादी देशों ने अफगानिस्तान की डेढ़ सदी से ज्यादा का वक्त खत्म कर दिया, उस देश का भविष्य खत्म कर दिया, और किस तरह कट्टर धर्मान्ध तालिबानियों ने अपने देश की सारी संभावनाओं को खत्म कर दिया, अमेरिका जैसे साम्राज्यवादी देश को यह मौका दिया कि वह अलकायदा को खत्म करने का बहाना बनाकर अफगानिस्तान पर हमला करे, उसे कुचल डाले। इसलिए जिन लोगों को तालिबानी कट्टरता सुहाती है उन्हें याद रखना चाहिए कि ऐसी धर्मांध कट्टरता, ऐसी धर्मांध हिंसा किसी देश की संभावनाओं को तो खत्म करती ही है, उस देश के लोकतंत्र को भी खतरे में डाल देती है, और उसे बाहरी हमलों के लायक तैयार निशाना बना देती है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 18 अगस्त 2021


 

हिंदुस्तानी न्यायपालिका प्रमुख की विधायिका को खरी-खरी...

 18 अगस्त 2021

 सुप्रीम कोर्ट में आज़ादी की सालगिरह के मौके पर देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एन वी रमना ने संसद की कार्यवाही पर नाराजगी जताई। संसद में हुए हंगामों का जिक्र करते हुए उन्होंने संसदीय बहसों पर चिंता जताई और कहा कि संसद में अब बहस नहीं होती। उन्होंने कहा कि संसद से ऐसे कई कानून पास हुए हैं, जिनमें काफी कमियां थीं। पहले के समय से इसकी तुलना करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि तब संसद के दोनों सदन वकीलों से भरे हुए थे, मगर अब मौजूदा स्थिति अलग है। उन्होंने कानूनी बिरादरी के लोगों से भी सार्वजनिक सेवा के लिए अपना समय देने के लिए कहा। सीजेआई ने कहा कि अब बिना उचित बहस के कानून पास हो रहे हैं। अगर आप उन दिनों सदनों में होने वाली बहसों को देखें, तो वे बहुत बौद्धिक, रचनात्मक हुआ करते थे और वे जो भी कानून बनाया करते थे, उस पर बहस करते थे...मगर अब खेदजनक स्थिति है। हम कानून देखते हैं तो पता चलता है कि कानून बनाने में कई खामियां हैं और बहुत अस्पष्टता है। उन्होंने आगे कहा कि अभी के कानूनों में कोई स्पष्टता नहीं है। हम नहीं जानते कि कानून किस उद्देश्य से बनाए गए हैं। इससे बहुत सारी मुकदमेबाजी हो रही है, साथ ही जनता को भी असुविधा और नुकसान हो रहा है। अगर सदनों में बुद्धिजीवी और वकील जैसे पेशेवर न हों, तो ऐसा ही होता है। उन्होंने कहा, ‘आज की स्थिति देख कर दुख होता है। क़ानूनों में बहुत अस्पष्टता है। हमें नहीं पता कि किस कारण से ये बने थे। लेकिन इसकी वजह से कोर्ट के सामने अधिक मामले हैं और लोगों और कोर्ट को असुविधा हो रही है।’ चीफ़ जस्टिस ने कहा ‘आज़ादी की लड़ाई में वकीलों ने अग्रणी भूमिका निभाई थी और स्वतंत्र भारत के पहले नेता भी बने थे। उन्होंने कहा कि आज़ादी की लड़ाई का नेतृत्व करने वाले महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेता वकील थे। उन्होंने न केवल अपने काम की आहुति दी बल्कि आज़ादी की लड़ाई में अपना परिवार और संपत्ति का भी त्याग किया। उस दौर में संसद में सकारात्मक बहस होती थी। क़ानूनों के बारे में विस्तार से चर्चा होती थी उन पर बहस होती थी। लेकिन वक्त के साथ आप देख सकते हैं कि संसद में क्या हो रहा है। बहस की गुणवत्ता खऱाब हुई है और कोर्ट अब नए क़ानूनों का मकसद और उद्देश्य समझ पाने में असमर्थ है।’ उन्होंने अपील की कि वकील अपने काम को अपने घर या कोर्ट तक सीमित की बजाय सार्वजनिक हितों के काम में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेकर संसद में बुद्धिजीवियों की कमी को पूरा कर सकते हैं।

देश के मुख्य न्यायाधीश के आजादी के सालगिरह पर दिए गए इस बयान को गंभीरता से लेने की जरूरत है क्योंकि अभी कुछ ही दिन पहले संसद के मानसून सत्र में जिस तरह सरकार ने अपने संसदीय बाहुबल से कानून बनवा लिए हैं, और विपक्ष केवल विरोध करते रह गया, वह नौबत मुख्य न्यायाधीश के इस बयान में खुलकर रखी गई है। इसके पहले भी यह देखा गया कि किसान कानूनों को बनवाते समय भी मोदी सरकार संसद में बहस से कतराती रही और नतीजा यह निकला है कि अपने ही बनवाए हुए कानून के खिलाफ महीनों से चले आ रहे आंदोलन में सरकार उलझी हुई है, और उसे कोई रास्ता समझ नहीं पड़ रहा है। यह सिलसिला ठीक नहीं है। लेकिन यह सिलसिला केवल मोदी सरकार के आने के बाद खराब हुआ हो ऐसा भी नहीं है। पिछली यूपीए सरकार के वक्त इस देश में सूचना के अधिकार का कानून बना और अटल सरकार के वक्त सूचना प्रौद्योगिकी कानून आईटी एक्ट बना। इन दोनों की गंभीरता को संसद में ना तो पार्टियां समझ पाई थीं, और ना ही सांसद समझ पाए थे। संसद के बाहर के लोगों ने मिलकर विधेयक तैयार किए थे, कानून की बारीकियां लिखी थीं, और उन पर न तो पर्याप्त चर्चा हुई थी, और न ही सांसदों ने उन्हें ठीक से समझा था, और उन्हें बहुमत से पारित कर दिया गया था। नतीजा यह निकला कि इन दोनों ही कानूनों में बार-बार कई तरह के फेरबदल की बात होती है, और इनसे कई तरह के खतरे भी सामने आ रहे हैं। अब तो संसद में मोदी सरकार का बहुमत इतना बड़ा है कि लोकसभा और राज्यसभा दोनों जगह अधिकतर कानूनों के लिए सरकार को विपक्ष की कोई जरूरत ही नहीं रह गई है, और सरकार अपनी उसी सोच के साथ वहां कानून बनवाते चल रही है।

भारतीय संसद में किसी प्रस्तावित कानून पर चर्चा को पिछली सरकार या इस सरकार जैसी बातों पर आंकना ठीक नहीं होगा। यह समझने की जरूरत है कि संसद में दलबदल विरोधी कानून के नाम पर वैचारिक विविधता को जिस तरह से खत्म कर दिया गया है, और किसी पार्टी के सचेतक अपनी पार्टी के सारे सांसदों को किसी एक वोट देने के मौके पर पूरी तरह से बेबस करके पार्टी की मर्जी का वोट डलवा सकते हैं। उसके भी पहले उस पर अगर कोई चर्चा होती है तो उस चर्चा में पार्टी की घोषित नीति से परे जाकर कोई सांसद कुछ नहीं बोल सकते, तो कुल मिलाकर जिस संसद में एक वक्त अलग-अलग बहुत से जागरूक और विद्वान वकीलों, और दूसरे बुद्धिजीवियों की चर्चा भारत के मुख्य न्यायाधीश ने अभी की है, उन सांसदों में जो वैचारिक विविधता बहस में सामने आती थी, और तरह-तरह की बातों पर विचार होता था, वह सिलसिला अब खत्म हो चुका है। अब कोई पार्टी या कोई गठबंधन एक गिरोह की तरह बर्ताव करते हैं, और किसी भी तरह की ईमानदार चर्चा की गुंजाइश अब खत्म सरीखी हो गई है। नतीजा यह है कि अलग-अलग सांसदों की निजी सोच, उनके निजी तजुर्बे के आधार पर प्रस्तावित कानूनों पर जो चर्चा होती थी, वह निजी हैसियत अब पूरी तरह खत्म हो गई है। अब तमाम लोग अपनी पार्टी की मशीन के पुर्जे की तरह बर्ताव करते हैं, पार्टियां ही अपने सांसदों को बताती हैं कि उन्हें किन-किन मुद्दों पर बोलना है, और क्या-क्या बोलना है। इसलिए आज भारतीय संसद किसी भी प्रस्तावित कानून पर चर्चा करते हुए वहां मौजूद प्रतिभाओं का पूरा इस्तेमाल करने की हालत में भी नहीं रह गई है, यह एक अलग बात है कि आज भारतीय संसद में प्रतिभाएं घटकर हाशिए पर चली गई हैं, और धर्म या जाति के नाम पर, क्षेत्रीयता के नाम पर, या गुटबाजी के नाम पर, वहां पर प्रतिभाहीन लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई है। भारत के मुख्य न्यायाधीश ने बड़े हौसले का काम किया है जो उन्होंने संसद में मौजूद लोगों और संसद में चल रही बहस, इन दोनों के बारे में बहुत खुलकर कड़ी आलोचना की है। इसके बारे में देश के दूसरे तबकों को भी बोलना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश अकेले ही पूरे देश का प्रवक्ता बन जाए यह भी ठीक नहीं है, लोकतंत्र में बाकी तबकों को अपनी जिम्मेदारी भूल नहीं जाना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 17 अगस्त 2021


 

तालिबान अब एक हकीकत है, हिंदुस्तान संपर्क स्थापित करे

17 अगस्त 2021

 अफगानिस्तान में हालात जिस तेजी से बदल रहे हैं, उसे देखते हुए अफगान जनता जिस तरह के खतरे से घिरी है, और वहां की किसी भी सरहद को पार करके पड़ोस के किसी भी देश चले जाना चाह रही है, कुछ वैसा ही असमंजस भारत सरकार के सामने भी आ खड़ा हुआ है। भारत अफगानिस्तान में आज काबिज तालिबान से बात करे या ना करे, और बात करें तो कैसे करे? तालिबानियों की सरकार को लेकर पूरी दुनिया में आज यह आशंका है कि उसमें इस्लामी कानूनों के नाम पर एक बार फिर महिलाओं के खिलाफ जुल्म का दौर शुरू होगा, धार्मिक कट्टरता हावी होगी, और ऐसे तालिबानियों की सरकार को मान्यता देकर दुनिया के बहुत से देश क्या अपनी नीतियों और अपने सिद्धांतों के खिलाफ नहीं चले जाएंगे?

भारत के साथ यह एक दिक्कत है कि वह अपने देश से इतने करीब के अफगानिस्तान की नई सरकार के साथ रिश्ते कैसे रखे? खासकर तब जब तालिबानियों को पाकिस्तान, चीन, रूस, इन सबने खुलकर अपना समर्थन घोषित किया है। भारत को रूस से तो कोई दिक्कत नहीं है लेकिन पाकिस्तान और चीन के साथ भारत के दुश्मनी के रिश्ते चले आ रहे हैं, और भारत की तमाम फौज भी इन्हीं दोनों देशों को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है। ऐसे में अगर पाकिस्तान और चीन तालिबान के सबसे बड़े हमदर्द बनकर उसे गले लगा रहे हैं, तो यह भारत के लिए विदेश नीति की एक चुनौती रहेगी। जानकार लोगों का यह कहना है कि भारत को तालिबानियों के आगे-पीछे बात तो करनी ही होगी क्योंकि उनकी घरेलू नीतियां चाहे जो रहें, दुनिया के अधिकतर देशों की नीतियां यह रहती हैं कि वे किसी देश में आज काबिज सरकार से बात करती ही हैं। भारत की सरकार एक वक्त इजराइल से परहेज करती थी क्योंकि उसका फिलिस्तीन पर ज्यादती का एक बड़ा लंबा इतिहास था। लेकिन वक्त बदला और कारोबारी दोस्तों ने भारत और इजरायल के रिश्ते बदल दिए।

जहां तक अफगानिस्तान में तालिबानियों की जोर-जबरदस्ती की बात है, तो कुछ उसी किस्म की जबरदस्ती सऊदी अरब में भी इस्लामी कानूनों के नाम पर महिलाओं के खिलाफ चलती आई है, और दुनिया भर के देशों ने सऊदी अरब से अपने रिश्ते रखे ही हैं। इसलिए अफगानिस्तान में आज तालिबानियों का राज एक ऐसी हकीकत है जिसे अनदेखा करके हिंदुस्तान चुप नहीं बैठे रह सकता, और उसे वक़्त आते ही इस ताकत से बातचीत का सिलसिला शुरू करना ही चाहिए। यह भी हो सकता है कि मानवाधिकार का जितना खात्मा तालिबान अफगानिस्तान में करने जा रहे हैं, बाहर के देश उससे संबंध रखके उसे एक बेहतर सरकार बनाने के लिए मजबूर भी कर सकते हैं। फिलहाल 20 वर्षों के अमेरिकी राज्य के बाद आज अफगानिस्तान अपने इतिहास के एक सबसे डांवाडोल दौर में पहुंचा हुआ है, और ऐसे में भारत उससे बातचीत न करके अपना ही नुकसान कर सकता है। यहां पर यह भी याद रखने की जरूरत है कि बीते दो दशक में भारत ने अफगानिस्तान की बहुत मदद की है और वहां की ढांचागत सुविधाओं को बनाने में भी अपना बहुत खर्च किया है। इसके अलावा भारत के फौजी हितों को देखते हुए भी उसे अफगानिस्तान की सरकार के साथ अच्छे रिश्ते रखने हैं क्योंकि चीन और पाकिस्तान दोनों अफगानिस्तान की आज की तालिबान सरकार के बड़े हिमायती होकर सामने आए हैं। लेकिन यह बात कहना आसान है और करना कुछ मुश्किल, क्योंकि इस्लामी कानूनों को लेकर तालिबान जिस किस्म की ज्यादतियां अफगानिस्तान में कर सकते हैं, उनके साथ अधिक दूरी तक चलना भारत की मौजूदा हिंदूवादी सरकार के लिए घरेलू दिक्कत का सामान भी हो सकता है। भारत में उदारवादी तबका भी तालिबानियों को लेकर खासे असमंजस में है कि वहां अमेरिका की पिट्ठू सरकार का खत्म होना जरूरी था, फिर तालिबानियों का वहां पर आना क्या उससे भी अधिक बड़ा खतरा रहेगा?

भारत के सामने ऐसी कई दिक्कतें हैं, और पिछले कुछ महीनों से ऐसी चर्चा चल भी रही थी कि अफगानिस्तान की निर्वाचित सरकार का साथ देते हुए भी भारत ने तालिबानियों से पर्दे के पीछे बातचीत का सिलसिला चला रखा था। यह भी याद रखने की जरूरत है कि पाकिस्तान ने कई महीनों से अफगानिस्तान की सरकार के खिलाफ भारी बगावती तेवर बना रखे थे और वह खुलकर तालिबानियों का साथ दे रही थी। यह बात भी याद रखने लायक है कि इसके बावजूद तालिबानियों ने कश्मीर को भारत का घरेलू मुद्दा माना था और दिल्ली सरकार के कश्मीर पर फैसलों के खिलाफ कुछ कहने से इंकार कर दिया था। आज जब अमेरिका अफगानिस्तान में अपना आखिरी पखवाड़ा गुजारते दिख रहा है, जिस तरह से वहां सरकार के नाम पर सिर्फ तालिबानी रह गए हैं, ऐसे में भारत सरकार को किसी न किसी स्तर पर तालिबानियों से बातचीत करनी होगी क्योंकि यह बिल्कुल पड़ोस का एक देश है. अमेरिका सहित पश्चिम के देशों ने तालिबानियों के राज को लेकर कई तरह के शक जाहिर किए हैं, और जाहिर है कि जो देश पिछले 20 बरस अफगानिस्तान में अमेरिकी कब्जे के हिमायती रहे हैं, एकाएक तालिबानियों से बातचीत भी शुरू नहीं कर सकते, लेकिन हिंदुस्तान की हालत उन देशों से अलग है और इस देश को अपने फौजी हितों को ध्यान में रखते हुए किसी न किसी स्तर पर तालिबान से बात करनी चाहिए। कम से कम रूस भारत का एक ऐसा दोस्त देश है जो कि इस मौके पर भारत के काम आ सकता है। 

(Daily Chhattisgarh)



 

दीवारों पर लिक्खा है, 16 अगस्त 2021


 

अमरीकी नाकामयाबी और उसकी भयानक गैरजिम्मेदारी की मिसाल, अफगानिस्तान

16 अगस्त 2021

  20 बरस बाद अफगानिस्तान में एक बार फिर तालिबान का राज कायम हो गया है। अभी कुछ हफ्ते पहले की ही बात थी जब अमरीकी फौजियों की अफगानिस्तान से वापस ही शुरूआत हुई थी और नए अमेरिकी राष्ट्रपति डेमोक्रेटिक पार्टी के जो बाइडन ने खुलकर पिछले रिपब्लिकन राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के इस फैसले पर अमल की बात कही थी कि अमेरिका 11 सितंबर 2021 तक अमेरिकी फौजियों को अफगानिस्तान से निकाल लेगा। अमेरिका और उसके फौजी-समुदाय में नाटो के बैनर तले अमेरिकी लीडरशिप में फौज अफग़़ानिस्तान में 20 बरस से काबिज थी, और उन्होंने वहां की सरकार को अपने कब्जे में कठपुतली की तरह चलाया हुआ था, क्योंकि असली काबू अमेरिकी फौजियों का था, वहां के बजट का 80 फीसदी हिस्सा विदेशी मदद से आ रहा था। लेकिन इस पूरे दौर में भी जब अमरीका ने यह पाया कि 20 बरस में भी तालिबान को कुचलना उसके लिए मुमकिन नहीं हो सका उसके लड़ाकू फौजी विमानों की बमबारी से भी तालिबान पूरी तरह खत्म नहीं हो रहे थे, तो पिछले 3 बरस में अमेरिका ने तालिबान से बातचीत का सिलसिला शुरू किया और अफगानिस्तान की जमीन से बाहर एक तीसरे देश में हुई बातचीत में यह तय हुआ कि अमेरिका एक तय समय में अफगानिस्तान छोडक़र निकल जाएगा, अब वहीं कुछ हफ्ते चल रहे हैं, जब अमेरिकी फौजी निकल रही हैं और तालिबान तकरीबन तमाम देश पर काबिज हो चुके हैं। अमेरिका की मदद से राष्ट्रपति बने हुए अशरफ़ गऩी देश छोडक़र दूसरे देश में शरण ले चुके हैं, और अफगानिस्तान में आज तालिबान का राज पूरी तरह से स्थापित हो चुका है।


अभी 2 दिन पहले की ही बात है कि अमेरिकी खुफिया विभाग की एक रिपोर्ट खबरों में आई कि अमेरिकी फौजों की अफगानिस्तान से वापसी पूरी तरह हो जाने के 6 महीनों के भीतर वहां की सरकार खतरे में आ सकती है, वहां तालिबान का राज लौट सकता है। लेकिन इस रिपोर्ट के आने के कुछ घंटों के भीतर ही 6 महीने तो दूर, अमेरिका की वापसी तो दूर, तालिबान का राज वैसे भी कायम हो चुका है। लेकिन आज का यह मौका तालिबान पर चर्चा का जितना है, उतना ही इस बात पर चर्चा का भी है कि तीसरे देश में जाकर 20 बरस पहले अमेरिका ने जिस तरह से वहां उस वक्त की सोवियत समर्थित सरकार को बेदखल करने का काम किया था, और उसके बाद वहां अपना राज एक बहुत महंगे दाम पर कायम रखा, उसके बारे में सोचने की जरूरत है।


अमेरिका के इतिहास को देखें तो उसने कुछ इसी अंदाज़ में, इतने ही वक्त 20-21 बरस तक वियतनाम के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, और वियतनाम में अमेरिकी फौजियों को वहां की एक पूरी पीढ़ी को खत्म करने में झोंक दिया था। लेकिन उसके बाद बिना किसी नतीजे के अमेरिका को वियतनाम छोडऩा पड़ा था और अमेरिकी फौज की एक पूरी पीढ़ी वियतनाम युद्ध की त्रासदी को लेकर वहां आज तक मानसिक चिकित्सा करवाते हुए जी रही है। और कुछ उसी किस्म के 20 वर्ष का यह फौजी दौर अमेरिका ने अफगानिस्तान में चलाया है। यहां के हालात बिल्कुल अलग थे, यहां की वजह बिल्कुल अलग है, लेकिन 20 बरस के फौजी हमले जो वियतनाम पर चलते रहे, वैसे ही 20 बरस के फौजी हमले अफगानिस्तान पर चलते रहे। वियतनाम में अमेरिकी फौजियों ने अमेरिकी अंदाज के लोकतंत्र का जैसा नंगा नाच किया था, वैसा ही अफगानिस्तान में भी चलते रहा, और बेकसूरों को मारने का अमेरिकी फौज का अंदाज यह था कि वह वहां पर तालिबान होने के शक में अफगान नागरिकों की उंगलियां काट रही थी, उन्हें इकट्ठा करने का एक फौजी खेल खेला जाता था।


आज के वक्त की दिक्कत यह है कि आज अमेरिकी फौज की आलोचना करने का मतलब कई लोग धर्मांध, कट्टर और इस्लामिक राज्य कायम करने वाले तालिबान की तारीफ या तालिबान का समर्थन भी मान सकते हैं। लेकिन यह चर्चा आज जरूरी इसलिए है कि अमेरिका ने 20 वर्षों में अफगानिस्तान के पूरे ढांचे को अपने हिसाब से ढाला, अफगान नागरिकों को अपने हिसाब से जिंदगी जीने का एक मौका मुहैया कराया, उन्हें अमेरिका की मदद करने के काम में लगाया और आज रातों-रात अमेरिका उन तमाम लोगों को तालिबान के रहमोकरम पर छोडक़र जिस तरह से निकल जा रहा है, और जिस तरह से इन 20 वर्षों को मानो मिटाकर तालिबान के हवाले कर दिया जा रहा है वह एक अंतरराष्ट्रीय गैरजिम्मेदारी का ऐतिहासिक मामला है। इन 20 वर्षों में लाखों अफगान नागरिक अमेरिकी हमलों, तालिबानी हमलों, और इन दोनों तबकों के बीच की लड़ाई में मारे गए। आज की तारीख में भी लाखों अफगान औरत-बच्चे, आम नागरिक बेदखल हैं, शरण पाने के लिए दूसरे देशों की सरहदों पर जा रहे हैं, और आज अफगानिस्तान दुनिया का सबसे बड़ा बेदखल नागरिक समुदाय बन गया है, जिसकी कोई जिम्मेदारी अमेरिका आज उठाते नहीं दिख रहा है। अमेरिका की हालत यह है कि अफगानिस्तान पर कब्जा करने के वक्त ब्रिटिश फौज को उसने अपना सबसे बड़ा साथी बनाकर रखा हुआ था, वह ब्रिटिश सरकार भी आज अमेरिकी फौजियों की अफगान से वापिसी के खिलाफ है। लोगों को याद होगा कि चाहे इराक पर अमेरिकी हमला हो, चाहे अफगानिस्तान पर, इनमें ब्रिटिश सरकार उसकी सबसे बड़ी भागीदार रही है, और आज ब्रिटिश प्रतिरक्षामंत्री ने खुलकर अमेरिकी फौजियों की इस तरह से एकतरफा वापिसी के खिलाफ सार्वजनिक बयान दिया है।


यह पूरा सिलसिला एक विश्व समुदाय के रूप में दुनिया की नाकामयाबी का भी है कि आज संयुक्त राष्ट्र जैसे किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन की बोलती ही अफगानिस्तान को लेकर बंद है, और वह महज एक शरणार्थी कार्यक्रम चलाकर अपनी जिम्मेदारी को पूरा मान रहा है। दूसरी तरफ पूरी दुनिया का सबसे बड़ा दादा बना घूम रहा अमेरिका किस तरह इराक पर हमले के बाद कुछ भी साबित नहीं कर सका कि इराक के पास जनसंहार के हथियार थे। अमेरिका ने इराक के उस वक्त के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को जिस अंदाज में फांसी चढ़ाया  और अमेरिकी सरकार के सारे दावे झूठे साबित हुए कि इराक के पास पूरी दुनिया को खत्म करने के हिसाब से जनसंहार के हथियारों का जखीरा मौजूद था। इराक के पास से ऐसा एक हथियार भी अमेरिका बरामद करके नहीं दिखा सका। अब उसके बाद अफगानिस्तान में अमेरिकी रणनीति की ऐसी शिकस्त और शरणार्थियों की अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी से मुंह मोडऩे के अमेरिकी तौर-तरीकों को देखने की जरूरत है। हम अफगानिस्तान को एक धार्मिक कट्टरता में डुबा देने वाले तालिबानों के जुर्म कहीं से भी कम आंकने के हिमायती नहीं हैं। लेकिन तालिबान तो दुनिया के किसी लोकतंत्र के प्रति जवाबदेह नहीं थे, उन्होंने कभी किसी लोकतंत्र में भरोसा नहीं दिखाया था। दूसरी तरफ अफगानिस्तान में लोकतंत्र कायम करने, बचाने, के नाम पर अमेरिका ने अपने आपको दुनिया का एक सबसे ताकतवर लोकतंत्र साबित करते हुए जिस तरह की फौजी कार्रवाई 20 बरस अफगानिस्तान पर की, वह जरूर अधिक फिक्र की बात है। यह अधिक क्षेत्र की बात है कि 20 बरस पहले अफगानिस्तान जिस हाल में था, उस हाल से अधिक बदहाल उसे छोडक़र, तालिबान के रहमोकरम पर छोडक़र अमेरिका जिस गैरजिम्मेदारी के साथ वहां से बाहर निकला है, उससे दुनिया को यह भी सबक लेने की जरूरत है कि क्या दुनिया के इस गुंडे देश को इस तरह 20-20 बरस किसी इलाके पर फौजी हुकूमत चलाकर उस इलाके को एक अंधड़ के बीच में छोडक़र निकल जाने की इजाजत दी जानी चाहिए?


लेकिन सवाल यह है कि अमेरिका को रोकेगा कौन? सद्दाम हुसैन पर हमले के वक्त संयुक्त राष्ट्र में कुछ देशों ने यह बात तो उठाई थी लेकिन अमेरिका ने उस वक्त भी किसी की कोई बात नहीं सुनी। लोगों को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सोवियत कब्जे के खिलाफ, सोवियत फौजियों की मौजूदगी के खिलाफ अफगानिस्तान में तालिबानों को अमेरिका ने ही बढ़ाया था और पाकिस्तान के रास्ते इन तालिबानियों को फौजी ट्रेनिंग और फौजी हथियार दे-देकर अफगानिस्तान में कम्युनिस्ट फौजियों को छोडऩे के लिए मजबूर कर दिया गया था। तालिबानियों के खिलाफ अमेरिका उस वक्त अधिक हमलावर हुआ जब उसे लगा कि न्यूयॉर्क के वल्र्ड ट्रेड सेंटर में हमला करने वाले ओसामा बिन लादेन को तालिबानी बचाकर रख रहे हैं। लेकिन हकीकत यह निकली ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में, पाकिस्तानी सरकार की जानकारी में, शहर के बीच छुपा बैठा था और वहां घुसकर अमेरिका को उसे मारना पड़ा था। लेकिन फिर भी अमेरिका की पाकिस्तान पर मेहरबानियां कम नहीं हुई थीं और हिंदुस्तान जैसा देश बार-बार अमेरिका को यह याद दिला रहा था कि पाकिस्तान आतंकियों की पैदावार की जगह हो गई है, और वहां से आतंक की उपज आसपास के देशों में जा रही है।


आज भी जब तालिबानी अफगानिस्तान पर चारों तरफ कब्जा कर चुके हैं, तब भी बार-बार यह बात आ रही है कि पाकिस्तान की जमीन से तालिबानियों को साथ दिया जा रहा है। इसलिए अमेरिका की साजिश किसी कोने से खत्म होते नहीं दिखती है, वह खुद एक मोर्चे पर अपनी फौजों को तालिबानियों के खिलाफ झोंककर रख रहा है, और दूसरी तरफ उसी के पैसों से पाकिस्तान जैसे देश तालिबानियों की मदद करते आ रहे हैं। अमेरिका दुनिया का एक सबसे गैरजिम्मेदार देश से साबित हुआ है जिसने बिना किसी जरूरत दूसरे देशों पर जंग थोपी है और फिर वहां के लोगों को एक आंधी-तूफान के बीच में छोडक़र अपनी फौज सहित भाग निकला है। आज दुनिया के बाकी देशों को देखें तो अमेरिका के मुकाबले यूरोप के अधिकतर देश अधिक जिम्मेदार साबित हो रहे हैं जिन्होंने इराक और सीरिया और दूसरी जगहों के शरणार्थियों को अपने देश में जगह दी है, आज देखने की बात यह रहेगी कि अमेरिका अपने देश के  लाखों मील के बंजर इलाकों में अफगानिस्तान के शरणार्थियों के लिए कितनी जगह निकालता है, या फिर उसके लिए अफगानिस्तान महज रूस के फौजियों को शिकस्त देने का एक मैदान था, और उस काम को पूरा करने के बाद वह अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों से मुंह चुराकर भाग निकला है। अमेरिका ने आज ना महज अफगानिस्तान को बेसहारा नहीं छोड़ा है, हिंदुस्तान जैसे देशों को भी एक चौराहे पर लाकर छोड़ दिया है। उसने हिंदुस्तान जैसे बहुत से देशों को भी खतरे में डाल दिया है जो कि अफगानिस्तान में एक निर्वाचित सरकार को देखना चाहते थे, और वहां ऐसी सरकार की मदद कर रहे थे। अब तालिबानियों ने हिंदुस्तान जैसी फ़ौज से यह साफ कर दिया है कि हिंदुस्तान वहां ना आए, हिंदुस्तान तालिबानियों से टकराव न ले। और दूसरी तरफ हिंदुस्तान के कुछ नेताओं ने इस बात को लेकर आशंका जाहिर की है भारत-पाकिस्तान सरहद पर पाकिस्तान की तरफ से होने वाले आतंकी हमलों में तालिबान भारत के खिलाफ जा सकते हैं। अमेरिका दुनिया को अस्थिरता में हिंसक धार्मिक कट्टर लड़ाकों के भरोसे छोडक़र भाग निकला है। उसके बुरे नतीजे दुनिया के बहुत से देश भुगतने जा रहे हैं, सबसे अधिक तो अफगानिस्तान के लोग जिनके पास आज जाने के लिए कोई देश भी नहीं बचा है।

(Daily Chhattisgarh)



दीवारों पर लिक्खा है, 14 अगस्त 2021


 

सौ बीमारी का एक इलाज, गर्व !

  14 अगस्त 2021

  हिंदुस्तान में गर्व करने के मौके बड़ी आसानी से आ जाते हैं। एक मौका टलता नहीं कि दूसरा खड़ा रहता है। अब जैसे कल आजादी की सालगिरह। जाहिर है कि किसी भी मुल्क को जब सैकड़ों बरस की गुलामी से आजादी मिली, एक के बाद दूसरे विदेशी हमलावर के कब्जे से छुटकारा मिला, तो मुल्क का अपने पर गर्व करना एक जायज हक की बात थी। यह एक अलग बात है कि करीब पौन सदी पहले जो आजादी मिली उस आजादी को खत्म करने में आज कोई कसर नहीं रखी गई है, और उस दिन 15 अगस्त 1947 को गर्व इस बात का था कि मुल्क आजाद हो रहा था, आज गर्व इस बात का है इस मुल्क के टुकड़े-टुकड़े कर दिए जा रहे हैं, धर्म के नाम पर टुकड़े, जाति के नाम पर टुकड़े, पैसे के नाम पर टुकड़े, खानपान और पहनावे के नाम पर टुकड़े। और मजे की बात यह है कि इस पर भी गर्व है। पौन सदी पहले जो एक धर्मनिरपेक्ष देश बनाया गया था, उस देश में आज गर्व से यह कहने के लिए कि कोई एक तबका हिंदू है, लोगों को यही राष्ट्रीय गौरव हासिल हो गया है। दूसरे लोगों को मार-मारकर, सडक़ों पर भीड़ की शक्ल में पीटकर और मार डालकर भी अगर उनसे अपने ईश्वर का नाम लिवाया जा रहा है, तो अपनी इस आजादी पर, और दूसरों की उस बेबसी पर लोगों को गर्व है। और गर्व का यह सिलसिला थम नहीं रहा है। गर्व से कहो हम हिंदू हैं का यह गर्व बढ़ते-बढ़ते इतना खूनी हो गया है कि जिस ईश्वर को इस हिंदू धर्म का प्रतीक बना लिया गया है वह खुद ही शर्म से डूब रहा है कि यह किन लोगों के बीच वह फंस गया है। फिर भी उसे फंसाकर भी लोग गर्व से फूले नहीं समा रहे हैं और अपनी इस आजादी पर उन्हें खूब गर्व है। गर्व का यह सिलसिला अपनी आजादी का कम है और दूसरों की गुलामी पर कुछ अधिक है।

आज ऐसा नहीं कि लोगों की अपनी खुद की जिंदगी में तकलीफ कम है, लेकिन जब लोग देखते हैं कि जिन्हें उनका दुश्मन बताया जाता है, जिन्हें विधर्मी और विदेशी खून से उपजा हुआ बताया जाता है, वे जब अधिक तकलीफ में दिखते हैं, तो अपनी तकलीफ जाते रहती है। गर्व कुछ तो उनकी तकलीफ अधिक देखने का अधिक है। और फिर कुछ गर्व इन बातों का भी है कि अपना ईश्वर आज सब पर हावी है, अपना झंडा सबसे बड़े डंडे में लगा हुआ है। लोग गर्व करने के लिए दूसरों के खिलाफ नफरत को भी जोडऩे की एक बड़ी ताकत की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। नफरत ने लोगों को इतना जोड़ लिया है कि वह अपने इसी जोड़ पर फिदा है और दूसरों को सबक सिखाने पर आमादा है। यह कैसा गौरव है जिसे जिंदा रहने के लिए पड़ोस में कोई एक दुश्मन देश लगता है, क्योंकि दुश्मन के बिना यह गर्व जिंदा नहीं रह पाता। जिसे अपने देश के भीतर भी एक दुश्मन मजहब की जरूरत पड़ती है क्योंकि उसके बिना, उससे नफरत के बिना, अपना धर्म इतने बड़े गर्व का सामान नहीं बन पाता है, जितने बड़े गर्व की जरूरत लोगों को लग रही है। इसलिए एक दुश्मन देश और एक नापसंद धर्म, इन दो पर यह गर्व खड़े रह पाता है, लेकिन इनके बिना वह अदालत के कटघरे में एक मासूम गवाह की तरह फर्श पर बिछने लगता है।

यह सिलसिला देश के लोगों को अपनी तकलीफ भुलाने में मदद भी करता है। जब पेट्रोल-डीजल खरीदना अपने बस में नहीं रह गया, जब इलाज कराना और बच्चों को अच्छा पढ़ाना अपनी मर्जी में नहीं रह गया, अपने बस में नहीं रह गया, तो फिर वैसे में एक झूठा गर्व तमाम किस्म की तकलीफों पर मरहम की तरह लगाने के काम आता है। जब मन गर्व से भर जाता है तो उस फूलकर कुप्पा हुए जा रहे मन में किसी तकलीफ और मलाल की जगह ही नहीं रह जाती। गर्व ऐसे कई मौकों पर लोगों को तकलीफ भुलाने में मदद करता है, झूठी खुशी पाने में मदद करता है, दूसरों को नीचा दिखाने में मदद करता है, और अगर कोई दूसरी वजह ना रहे तो दूसरों के नीचे दिखने की वजह से अपने आपको ऊंचा पाने  के एहसास में भी मदद करता है।

लोगों को आज हिंदुस्तान की हालत को देखते हुए बहुत सी बातें समझ में नहीं आ रही है, लेकिन फिर भी उन्हें यह लग रहा है क्यों उन्हें गर्व के साथ जीना है। यह सिलसिला किसी देश के इतिहास में रहा हो, या ना रहा हो, वैसे काल्पनिक इतिहास को याद कर-करके, उस पर गर्व करते हुए जीना बड़ा आसान काम रहता है। लोगों को याद होगा कि जब नोटबंदी हुई थी, और उसमें गर्व के लायक कुछ नहीं मिल रहा था, तो एटीएम पर लगी कतारों को कारगिल के बर्फ में 6 महीने ड्यूटी करने वाले सैनिकों से जोडक़र एक गर्व का सामान जुटा लिया गया था। आज हिंदुस्तान का भाला फेंकने वाला एक नौजवान ओलंपिक से गोल्ड मेडल लेकर लौटता है, उस पर गर्व करना तो जायज है, लेकिन उसकी मेहनत में जब देश के खेल संगठनों ने, और देश की सरकार ने हाथ नहीं जुटाया था, तो उस जिम्मेदारी को उठाना तो भारी-भरकम काम होगा, तुरंत ही उसके भाले को इतिहास के महाराणा प्रताप के भाले से जोड़ देना एक आसान काम रहता है। और महाराणा प्रताप के उस भाले की तारीफ में किसी कविता की चार लाइनें और ढूंढकर उस पर भी गर्व किया जा सकता है। यह एक और बात है कि इतिहास के इस दौर में हिंदुस्तान के राजाओं की कहां-कहां शिकस्त हुई थी, और कैसे-कैसे हिंदुस्तान के राजा मुगलों की शरण में जाकर बचे थे, या जिन्होंने अंग्रेजों के पिट्ठू बनकर रहना मंजूर किया था, उसे याद करेंगे तो आज के गर्व का दूध फट जाएगा। इसलिए खटास की वैसी बातों को याद करना बेकार रहता है, और इतिहास के टुकड़ों में से कुछ चुनिंदा कतरे छांटकर उन पर गर्व कर लेना ठीक रहता है। आज नीरज चोपड़ा की तैयारी में भारत सरकार ने खानपान तक की मदद नहीं की थी यह सोचने से देश को गर्व करने में कुछ दिक्कत हो सकती है। लेकिन राणा प्रताप के भाले पर लिखी गई कविता को याद करना बेहतर है क्योंकि राणा प्रताप भारत सरकार से कोई खानपान का भत्ता भी तो नहीं मानते !

इसलिए हिंदुस्तान में आज ताकत का मनमानी इस्तेमाल करने की इजाजत रखने वाले तमाम तबकों को गर्व करने की बहुत सी वजह हैं, और जिन लोगों को 1947 में मिली आजादी को आज खो देना पड़ा है, ऐसे तबकों को यह मान लेने की काफी वजह हैं कि उन्हें हिंदुस्तान में किसी बात पर गर्व करने का भी कोई हक हासिल नहीं है।

(Daily Chhattisgarh)