31 अक्टूबर 2014
संपादकीय
देश भर में आज केन्द्र की मोदी सरकार के निर्देश पर राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया गया। आज ही इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि थी, और आज ही सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती भी है। अब तक हर बरस इस दिन इंदिरा गांधी को ही याद किया जाता था क्योंकि देश के अलगाववादी आतंकियों के हाथों उनकी शहादत हुई थी। दूसरी तरफ सरदार पटेल इतिहास में तो जरूर थे, लेकिन सरकारी समारोहों में उनका अधिक जिक्र नहीं होता था। नेहरू-गांधी परिवार से परे महात्मा गांधी ही सरकारी श्रद्धांजलियों में रहते थे, और अब सत्ता बदल गई है, इसलिए नई सत्ता की नई सोच को लोकतंत्र में प्रमुखताएं फिर से तय करने का हक है, और उसी का इस्तेमाल गुजरात में सरदार पटेल की तीन हजार करोड़ प्रतिमा से लेकर देश भर में आज सरदार जयंती तक हो रहा है।
भारत की आजादी के इतिहास में सरदार पटेल के योगदान का मूल्यांकन कांग्रेस सत्ता से परे का वक्त आने पर एक बार फिर किया जा सकता है, और बहुत से लोगों का यह मानना हो सकता है कि उनका योगदान नेहरू से अधिक था। और बहुत से नेहरूवादी इतिहासकारों का भी इंदिरा के योगदान को लेकर एक संदेह बना रहता है, और कुछ लोग उनको भारत के सबसे महान नेताओं में मानने से इंकार भी करते हैं। लेकिन हम ऐसे किसी मूल्यांकन की दौड़ में हिस्सा लेना नहीं चाहते, क्योंकि हम इतिहास की वैसी कोई तुलना इस जगह पर नहीं करना चाहते, लेकिन आज देश में जो तुलना जनता के बीच हो रही है, उस बारे में जरूर यहां चर्चा होनी चाहिए।
इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि के परंपरागत दिन को आज एकदम से सरदार जयंती में तब्दील करना एक नजर में ठीक नहीं लगता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस पार्टी के हैं, उसने आपातकाल में भी इंदिरा का विरोध किया था, और 1977 के चुनाव में भी जनता पार्टी में अपने आपको विलीन करके इंदिरा-संजय के खिलाफ चुनाव लड़ा था। और प्रधानमंत्री बनने के खासे पहले से नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए भी सरदार पटेल की रिकॉर्ड ऊंचाई की प्रतिमा बनाने का बीड़ा उठाया था, और देश भर से उसके लिए मदद भी मांगी थी। लेकिन आज इस मौके पर गुजरात सरकार का दिया हुआ ठेका भी सामने है जिसमें जनता के खजाने से तीन हजार करोड़ रूपए खर्च करके सरदार पटेल की प्रतिमा बनाई जा रही है।
तीन हजार करोड़ की रकम भारत जैसे देश में बहुत बड़ी होती है, जहां कि खुद प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में देश में शौचालयों की कमी है और लड़कियों का स्कूल छूटने के पीछे यह भी एक वजह रहती है। ऐसे देश में जहां कुपोषण से दसियों लाख बच्चे हर बरस मरते हों, जहां लोगों को पखाने नसीब न हों, वहां पर सरकार का, मतलब जनता का, इतना सारा पैसा एक प्रतिमा पर खर्च करना ठीक नहीं है। आज केन्द्र और गुजरात की सरकारों को सरदार पटेल की स्मृति को इस तरह स्थापित करना जरूरी लग रहा है, कल केन्द्र या किसी और राज्य में किसी दूसरी पार्टी की सरकार लोहिया, जयप्रकाश, आंबेडकर, नेहरू, इंदिरा, या राजीव की प्रतिमा पर अगर पांच हजार करोड़ खर्च करने पर उतारू हो जाएगी, तो उसे पटेल प्रतिमा के मुकाबले नाजायज कैसे कहा जा सकेगा? और ऊंचाई का, भव्यता का यह मुकाबला कहां जाकर खत्म होगा? नरेन्द्र मोदी ने सरदार पटेल की प्रतिमा को अमरीका की विश्वविख्यात लिबर्टी ऑफ स्टेच्यू से दो गुना ऊंचाई का बनवाना तय किया है, कल के दिन किसी दूसरी पार्टी की सरकार अपने प्रिय नेता की प्रतिमा की ऊंचाई इस स्टेच्यू ऑफ यूनिटी से दो गुना करने बैठ जाएगी।
स्टेच्यू ऑफ यूनिटी की ऊंचाई से किसी नेता या देश-प्रदेश का सम्मान नहीं बढ़ सकता। यह सम्मान तो किसी देश या प्रदेश में यूनिटी (एकता) बढऩे से ही बढ़ सकता है। और एकता की सोच को पूरे देश में बढ़ावा देने में कोई खर्च भी नहीं होगा, बल्कि एकता मजबूत होने के बाद देश में दंगों से होने वाले नुकसान की बचत भी होगी, और राष्ट्रीय उत्पादकता भी बढ़ेगी। हम देश और प्रदेशों में ऐसी खर्चीली स्मृति के खिलाफ हैं। सरदार पटेल की याद में तीन हजार करोड़ नहीं, छह हजार करोड़ रूपए से अगर कोई अस्पताल बनाया जाता तो वह उनकी स्मृति का एक बेहतर सम्मान होता। ऐसे ठोस प्रतीक जनता के पैसों से ठीक नहीं हैं। देश में आज प्रतिमा की नहीं, एकता की प्रेरणा की जरूरत है, और वह चबूतरों पर खड़े रहकर नहीं, सरकार और संसद चलाते हुए, जनता से बात करते हुए, बिना खर्च आगे बढ़ाई जा सकती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इस किफायती तरीके की एकता के बारे में सोचना चाहिए।



